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लेखिका- उर्मिला वर्मा

‘‘शालू की ससुराल वाले बोल रहे हैं कि रमेश की पढ़ाई का अभी एक साल और है इसलिए वे लोग नहीं ले जाएंगे. अभी हमारी शालू एक साल हमारे पास और रहेगी,’’ रामबरन मूंछों पर ताव देते हुए मुसकरा कर बोले.

रामबरन की बातें सुन कर दीपा बूआ के हाथ से गिलास छूट कर गिर गया.

रामबरन चौंक कर दीपा की तरफ देखने लगे. इस से पहले कोई कुछ बोलता, दरवाजे के पास खड़ी शालू बेहोश हो कर गिर पड़ी.

वे दोनों दौड़ कर शालू के पास गए और उसे उठा कर उस के कमरे में ले गए. डाक्टर को बुलाया गया.

डाक्टर ने शालू का चैकअप किया और बोला कि परेशानी की कोई बात नहीं है. कमजोरी की वजह से इन को चक्कर आ गया था. दवा पिला दीजिए और इन का ध्यान रखिए. ये मां बनने वाली हैं और ऐसी हालत में लापरवाही ठीक नहीं है.’’

डाक्टर के मुंह से मां बनने की बात सुन कर रामबरन हक्केबक्के रह गए. डाक्टर के जाते ही सब से सवालों की झड़ी लगा दी.

दीपा बूआ ने पूरी बात रामबरन को बताई और बोलीं, ‘‘भैया, गौने की तारीख जल्दी से पक्की कर के आइए. अभी कुछ नहीं बिगड़ा है. सब ठीक हो जाएगा.’’

उधर होश में आते ही शालू रोने लग गई. रोतेरोते वह बोली, ‘‘बाबूजी, मुझे माफ कर दीजिए. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई.’’

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रामबरन शालू के सिर पर हाथ रख कर लंबी सांस ले कर बाहर चले गए.

अगले दिन वे फिर शालू की ससुराल गए. घर पर दीपा और शालू बेचैन घूम रही थीं कि न जाने क्या खबर आएगी.

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