आजरविवार की छुट्टी होने के कारण होटल में काफी भीड़ थी. हमें भी डिनर और्डर किए काफी वक्त हो चुका था पर अभी तक आया नहीं था. हम बैठेबैठे आपसी बातचीत में मशगूल थे. लेकिन मेरा ध्यान बारबार उस टेबल पर जा अटकता जहां एक फैमिली बैठी थी.

उन का टेबल हमारे टेबल को छोड़ तीसरा टेबल था, जिस में मातापिता और 3 बच्चे बैठे हुए थे. 2 बेटियां और एक बेटा. बेटियां अपनेअपने मोबाइल में व्यस्त थीं और मातापिता आपस में ही बातें कर रहे थे. पति का चेहरा तो नहीं दिख रहा था, क्योंकि उस का चेहरा दूसरी तरफ था, पर पत्नी के हावभाव से लग रहा था, उन में किसी बात को ले कर बहस चल रही थी, क्योंकि पत्नी अपनी आंखें बड़ी करकर के कुछ बोले जा रही थी और पति अपना हाथ उठा कर उसे शांत रहने को कह रहा था.

उन का बेटा, जिस की उम्र करीब 3-4 साल होगी, सब बातों से बेफिक्र अपनेआप में ही मगन, कभी कांटाचम्मच से खेलता तो कभी उसी कांटाचम्मच से प्लेट बजाने लगता. कभी टेबल पर रखे नमक और पैपर पाउडर को अपनी हथेली पर गिरा कर उंगली से चाटने लगता तो कभी टिशू पेपर निकाल कर अपना चेहरा खुद ही पोंछने लगता. जब उस की मां उसे आंखें दिखा कर इशारों से कहती कि बैठ जाओ तो वह बैठ भी जाता, पर फिर थोड़ी देर में वही सब शुरू कर देता. उस की छोटीछोटी शरारतें देख कर मुझे उस मासूम पर बड़ी हंसी आ रही थी और प्यार भी.

सच, बच्चे कितने मासूम होते हैं. उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन की हरकतों को कौन देख रहा है कौन नहीं. उस की शरारतें मुझे अपने बचपन की याद दिलाने लगीं. आखिर हम ने भी तो इसी तरह की शरारतें की होंगी कभी. बीचबीच में वह मुझे भी देखता कि मैं उसे देख रही हूं और फिर शांत खड़ा हो जाता और जब मैं उसे देख कर मुसकरा देती तो वह फिर शुरू हो जाता.

तभी मेरे पति वरुण बोले कि खाना आ गया. जहां मेरे बेटे ने पिज्जा और्डर किया था, वहीं बेटी ने पावभाजी और हम ने सिंपल दालरोटी और सब्जी मंगवाई थी. अभी हम ने खाना शुरू ही किया था कि वह बच्चा हमारे टेबल के सामने आ कर खड़ा हो गया. मैं उसे देख कर मुसकराई और उस के नरम गालों को छू कर प्यार भी किया, लेकिन उस का ध्यान तो बस पिज्जा पर ही अटका हुआ था. एकटक वह पिज्जा को देखे जा रहा था. लग रहा था अभी बोलूंगी और खाने लगेगा. ‘‘थोड़ा सा खिला दें क्या?’’ मैं ने वरुण की तरफ देखते हुए कहा.

‘‘नहीं मीरा, ऐसे किसी अनजान बच्चे को कुछ खिलानापिलाना ठीक बात नहीं है. पता नहीं उस के मांबाप क्या बोल दें.’’

तभी उस की मां ने आंखें दिखाते हुए उसे आने का इशारा किया. मां के डर से वह चला तो गया, लेकिन फिर वापस आ कर हमारे टेबल के सामने खड़ा हो गया. लग रहा था अभी पिज्जा उठा कर खाने लगेगा. हमें थोड़ा अजीब भी लग रहा था.

‘‘थोड़ा सा खिला देते हैं न इस में क्या हरज है? मेरा बेटा जिगर, पिज्जा का एक पीस उस बच्चे की तरफ  बढ़ाते हुए कहने लगा तो वरुण ने झट से उस का हाथ पकड़ लिया और कहने लगा, ‘‘मैं ने मना किया न. अरे, दूसरों के बच्चे को ऐसे कैसे कुछ खिला सकते हैं. अगर इस के मांबाप बुरा मान गए तो?’’

पर वो बच्चा तो वहां से हिलने का नाम ही नहीं ले रहा था. खातेखाते यह सोच कर मेरा हाथ रुक गया कि शायद बच्चा बहुत भूखा है और मैं उस से कुछ पूछती कि उस की मां ने आवाज दे कर उसे बुला लिया, क्योंकि उस के टेबल पर भी खाना लग चुका था.

सच में बच्चा भूखा था. जल्दीजल्दी वह पापड़ पर ही टूट पड़ा. उस की मां आंखें दिखाते हुए उसे बोल रही थी, ‘‘आराम से खाओ आराम से.’’ हमारा खाना तो बस हो ही चुका था और वेटर बिल के साथ सौंफ, चीनी भी ले कर आ गया.

हम रैस्टोरैंट से निकलने लगे, पर हमारी आदत ऐसी होती है कि अगर हम किसी चीज को बारबार देख रहे होते हैं तो जातेजाते भी लगता है कि एक बार मुड़ कर और देख लें. इसलिए मेरी नजर फिर एक बार उस बच्चे पर जा टिकी पर उस बच्चे के बगल वाली कुरसी पर प्रतीक को देख कर हैरान रह गई. लगा कहीं मेरी आंखों का धोखा तो नहीं.

हां धोखा ही होगा क्योंकि यहां प्रतीक कैसे हो सकता है और यह तो सिर्फ प्रतीक सा दिखता है. मैं ने अपने मन में कहा कि तभी पीछे से अपना नाम सुन कर मैं चौंक गई.

वह झटकते हुए मेरे पास आया और कहने लगा, ‘‘मीरा… तुम और यहां?’’

‘‘प्रतीक… तुम?’’ मैं आश्चर्यचकित रह गई उसे यहां देख कर.

तो क्या यह प्रतीक की फैमिली है? और प्रतीक कैसा हो गया? यह तो ठीक से पहचान में भी नहीं आ रहा है. सिर के आधे बाल उड़े हुए, आंखों पर मोटा सा चश्मा, चेहरे पर कोई रौनक नहीं, न वह हंसी न मुसकान. अपनी उम्र से करीब 10 साल बड़ा लग रहा था वह. उसे देख कर मेरे दिल में फिर से वही भावना जाग उठी.

‘‘मीरा… मीरा कहां खो गई? क्या पहचाना नहीं मुझे?’’ प्रतीक की आवाज से मेरा ध्यान भंग हुआ.

अपनेआप को भावनाओं के जाल से मुक्त कर और संभलते हुए मैं ने कहा, ‘‘प्रतीक तुम और यहां? और यह तुम्हारी फैमिली है क्या? मुझे उस की फैमिली के बारे में सामने से नहीं पूछना चाहिए था, पर अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया.’’

प्रतीक अपनी फैमिली से मिलवाते हुए कहने लगा, ‘‘हां, मेरी फैमिली है. मेरी पत्नी नंदा, बड़ी बेटी कोयल, छोटी बेटी पिंकी और बेटा अंश. अभी कुछ महीने पहले ही मेरा तबादला यहां मुंबई में हुआ है.’’

मैं ने अपने मन में ही कहा, ‘अच्छा तो ये हैं प्रतीक की जीवनसंगिनी? आखिर प्रतीक की मां को अपने मन की बहू मिल ही गई. वैसे बहुत खास तो नहीं है देखने में. हो सकता है उन की नजर में हो.’

मैं ने भी अपने परिवार से प्रतीक को मिलवाते हुए कहा, ‘‘प्रतीक, ये हैं मेरे पति वरुण और ये है बेटा जिगर और बेटी साक्षी.’’

प्रतीक बड़े गौर से मेरे पति और बच्चों को देखे जा रहा था.

वरुण कहने लगे, ‘‘क्या आप दोनों पहले से एकदूसरे को जानते हैं?’’

‘‘हां वरुण, हम ने एकसाथ ही प्रोबेशनरी औफिसर की ट्रैनिंग ली थी और तब से हम एकदूसरे को जानते हैं.’’

हमारे पिछले रिलेशन के बारे में कुछ न बता कर, हम ने एकदूसरे का परिचय सब के सामने रखा. वरुण, प्रतीक से हाथ मिलाते हुए बातें करने लगे और मैं प्रतीक की पत्नी नंदा से बातें करने लगी. थोड़ी देर में ही पता चल गया कि वह कितनी तेजतरार्र औरत है. बस अपनी ही हांके जा रही थी और बीचबीच में मेरे हाथों में डायमंड जड़ी चूडि़यां भी निहारे जा रही थी.

कुछ देर बाद जैसे ही हम चलने को हुए, अपनी आदत के अनुसार वरुण कहने लगे, ‘‘अब ऐसे सिर्फ हायहैलो से काम नहीं चलेगा. परसों क्रिसमस की छुट्टी है. आप सब हमारे घर खाने पर आमंत्रित हैं.’’ प्रतीक के न करने पर वरुण ने उस की एक न सुनी. मुझे वरुण पर गुस्सा भी आ रहा था. क्या जरूरत थी तुरंत किसी को अपने घर बुलाने की? प्रतीक मुझे देखने लगा, क्योंकि मुझे पता था वह भी मेरे घर नहीं आना चाह रहा होगा. पर वरुण को कौन समझाए. मजबूरन मुझे भी कहना पड़ा, ‘‘आओ न बैठ कर बातें करेंगे.’’

याद करना तो दूर, अब प्रतीक कभी भूलेबिसरे भी मेरे खयालों में नहीं आता था. पर आज अचानक उसे देख जाने मेरे मन को क्या हो गया. वरुण ने अपने फोन नंबर के साथ घर का पता भी प्रतीक को मैसेज कर दिया.

रास्ते भर मैं प्रतीक और उस की फैमिली के बारे में सोचती रही. मां ने ही तो बताया था मुझे. मेरे बाद प्रतीक के लिए कितने रिश्ते आए और कुंडली न मिलने के कारण लौट गए. हां, यह भी बताया था मां ने कि प्रतीक की जिस लड़की से शादी तय हुई है उस से प्रतीक के 28 गुणों का मिलान हुआ है. लेकिन प्रतीक और उस की पत्नी को देख कर लग नहीं रहा था कि दोनों के एक भी गुण मिल रहे हों. खैर, मुझे क्या. माना हमारा रिश्ता न हो पाया पर वरुण जैसा इतना प्यार करने वाला पति तो पाया न मैं ने.

घर आ कर हम ने थोड़ी बहुत इधरउधर

की बातें की और सो गए. सुबह उठ कर बच्चों को स्कूल भेज कर हमेशा की तरह हम जौगिंग पर निकल गए. वरुण बातें करते रहे और मैं उन की बातों पर सिर्फ हांहूं करती रही. मेरे मन में बारबार यही सवाल उठ रहे थे कि जन्मपत्री मिलान के बावजूद प्रतीक खुश था अपनी पत्नी के साथ? क्या सच में दोनों का मन मिल रहा था? चाय पीते हुए भी बस वही सब बातें चल रही थी मेरे दिमाग में. वरुण ने टोका भी कि क्या सोच रही हो, पर मैं ने अपना सिर हिला कर इशारों में कहा, ‘‘कुछ नहीं.’’ वरुण को औफिस भेज कर मैं भी अपने बैंक के लिए निकल गई.

रात में खाना खाते वक्त वरुण कहने लगे, ‘‘मीरा, कल मुझे औफिस जाना पड़ेगा. जरूरी मीटिंग है और हो सकता है लेट आऊं. मेरी तरफ से प्रतीक और उस के परिवार को सौरी बोल देना.’’

मुझे वरुण पर बहुत गुस्सा आया. मुझे गुस्सा होते देख कहने लगे, ‘‘सौरी… सौरी… अब इतना गुस्से से भी मत देखो. क्या बच्चे की जान लोगी?’’ और बच्चों के सामने ही मेरे गालों को चूमने लगे. वरुण की यह आदत भी मुझे नहीं पसंद थी. वे बच्चों के सामने ही रोमांस शुरू कर देते और बच्चे भी ‘हो… हो… पापा’ कह कर मजे लेने लगे.

दूसरे दिन वरुण अपने औफिस के लिए निकल गए और थोड़ी देर बाद बच्चे भी यह कह कर घर से निकल गए कि उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिल कर फिल्म जाने का प्रोग्राम बनाया है. अब मैं क्या करूंगी? सोचा चलो खाने की तैयारी ही कर लेती हूं क्योंकि अकेली हूं तो खाना बनाने में वक्त भी लगेगा और घर को भी व्यवस्थित करना था, तो लग गई अपने कामों में.

दोपहर के करीब 1 बजे वे लोग हमारे घर आ गए. मैं ने उन्हें बैठाया और पहले सब को जूस सर्व किया. फिर कुछ सूखा नाश्ता टेबल पर लगा दिया. प्रतीक ने वरुण और बच्चों के बारे में पूछा तो मैं ने उसे बताया, ‘‘उन्हें किसी जरूरी मीटिंग में जाना था इसलिए… लेकिन सामने वरुण को देख कर मुझे आश्चर्य हुआ, ‘‘वरुण, आप तो…?’’

‘‘हां, मीटिंग कैंसिल हो गई और अच्छा ही हुआ. बोलो कोई काम बाकी है?’’ वरुण ने कहा.

‘‘नहीं सब तैयार है,’’ मैं ने कहा.

खानापीना समाप्त होने के बाद हम बाहर लौन में ही कुरसी लगा कर बैठ गए. हम बातें कर रहे थे और बच्चे वहीं लौन में खेल रहे थे. लेकिन मेरा ध्यान प्रतीक के बेटे पर चला जाता जो कभी झूला झूलता तो कभी झूले को ही झुलाने लगता. उस की प्यारी शरारतों पर मैं मंदमंद मुसकरा रही थी. फिर मुझ से रहा नहीं गया तो मैं उस के पास जा कर उस से बातें करने लगी, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’ मैं ने पूछा तो उस ने तुतलाते हुए कहा, ‘‘अंछ है मेला नाम.’’

‘‘अंश, अरे वाह, बहुत ही सुंदर नाम है तुम्हारा तो.’’ उस की तोतली बातों पर मुझे हंसी आ गई. लेकिन अचानक से जब मेरी नजर प्रतीक पर पड़ी तो मैं सकपका गई. पता नहीं कब से वह मुझे देखे जा रहा था. मुझे लगा शायद वह मुझ से बहुत कुछ कहना चाह रहा था, कुछ बताना चाह रहा था, लेकिन अपने मन में ही दबाए हुए था.

‘‘ठीक है अब चलते हैं,’’ कह कर प्रतीक उठ खड़ा हुआ पर वरुण ने यह कह कर उन्हें रोक लिया कि एकएक कप चाय हो जाए. जिसे प्रतीक ठुकरा नहीं पाया. मैं चाय बनाने जा ही रही थी कि नंदा भी मेरे पीछेपीछे आ गई और कहने लगी, ‘‘हमारे आने से ज्यादा काम बढ़ गया न आप का?’’

‘‘अरे ऐसी बात नहीं नंदाजी. अच्छा अपने बारे में कुछ…?’’ अभी मैं बोल ही रही थी कि मेरी बात बीच में काटते हुए कहने लगी, ‘‘मैं अपने बारे में क्या बताऊं मीराजी, मेरा तो मानना है आप जैसी नौकरी करने वाली औरतें ज्यादा खुश रहती हैं, वरना हम जैसी गृहिणी तो बस काम और परिवार में पिसती रह जाती हैं. अब हमें ही देख लीजिए, दिन भर बस घर और बच्चों के पीछे पागल रहती हूं. ऊपर से मेरी सास, कुछ भी कर लो उन्हें मुझ से शिकायत ही लगी रहती है. कुछ तो काम है नहीं, बस दिन भर बकबक करती रहती हैं. अरे, मैं ने तो प्रतीक से कितनी बार कहा जा कर इन्हें गांव छोड़ आइए, आखिर हमारी भी तो जिंदगी है कब तक ढोते चलेंगे इस माताजी को पर नहीं, इन्हें मेरी बात सुननी ही कहा है.’’

मुझे कुछ बोलते नहीं बन रहा था. अभी हम एकदूसरे को ठीक से जानतेपहचानते भी नहीं और यह अपनी मां समान सास के बारे में कैसीकैसी बातें बोल रही है. इस के लिए आंटी ने मेरे सहित न जाने कितनी ही लड़कियों को ठुकरा दिया था.

नंदा फिर कहने लगी, ‘‘सच कहती हूं मीराजी, आप बड़ी किस्मत वाली हैं, जो आप की सास नहीं है, वरना मेरी सास तो मेरे लिए पनौती बन कर रह गई हैं. और ये मेरे पति, लगता है जैसे मैं इन के पल्ले जबरदस्ती बांध दी गई हूं.’’

‘‘क्यों?’’ मेरे मुंह से निकल गया.

कहने लगी, अरे, देख रही हैं आप. कभी भी मुझे प्यार भरी नजरों से नहीं देखते. पता नहीं किस के खयालों में खोए रहते हैं?

‘‘तो क्या आज भी प्रतीक के दिल में मैं ही हूं? सोच कर मेरी आंखें नम हो गईं. किसी तरह नंदा से छिपा कर अपने आंसू पोंछ कर बोली, ‘‘ऐसी बात नहीं हैं नंदाजी, मांबाप हों या सासससुर, सब हमारे अपने हैं और जैसे उन्होंने हमें पालापोसा, पढ़ायालिखाया, हमारे सुख को सब से ऊपर रखा, तो हमारा भी फर्ज बनता है कि हम अपने मांबाप को मानसम्मान दें, उन का सहारा बनें.’’ भले ही आंटी ने मेरे साथ जो भी किया पर मैं उन का अपमान कैसे सह सकती थी. लेकिन मेरी एक भी बात उसे अच्छी नहीं लगी. कहने लगी, ‘‘ठीक है जरा मैं आप का घर देख लेती हूं.’’

मैं उसे देख कर सोच में पड़ गई कि इतनी कड़वाहट भरी है इस के दिल में आंटी के लिए.

जातेजाते प्रतीक कहने लगा, ‘‘मीरा, खुश तो हो न अपनी जिंदगी में?’’

‘‘हां, बहुत खुश हूं, और तुम?’’ मेरे पूछने पर वह मेरा मुंह ताकने लगा, जैसे मुझ से ही पूछ रहा हो, क्या तुम्हें मैं खुश दिख रहा हूं? उस ने कुछ न बोला और अपनी नजरें नीची कर कहने लगा, ‘‘पापा नहीं रहे, मां भी शायद ज्यादा दिन न बच पाए. तुम्हें ठुकरा कर आज भी वे पश्चाताप की अग्नि में जल रही हैं. तुम्हारे बारे में बताया था उन्हें. मिलने को तड़प उठी. हो सके तो एक बार मां से मिल लेना,’’ कहतेकहते प्रतीक की आंखें भर आईं. मैं भी अपनी रुलाई कहां रोक पाई.

सोचने लगी, ‘‘आखिर ऐसा हुआ क्यों? क्यों अंधविश्वास की खाई इतनी गहरी हो गई कि आंटी को हमारा प्यार, हमारी खुशी नहीं दिखी.’’ उन्हें यहां से जातेजाते शाम के 5 बज गए थे. रात में खाना खा कर सब सो गए. पर मेरी आंखों से नींद कोसों दूर थी. प्रतीक का मुरझाया हुआ चेहरा, उस की उदासी भरी बातें मेरे मन को तड़पा गईं. स्मृति की सारी पपडि़यां एकएक कर मेरे आंखों के सामने खुलने लगीं…

हम पहली बार तब मिले थे जब प्रोबेशनरी औफिसर की ट्रैनिंग के लिए हम गुड़गांव गए थे.

बातोंबातों में ही जाना की हम एक ही शहर से हैं. ट्रैनिंग के 15 दिन कैसे बीत गए हमें पता ही नहीं चला. यह संयोग ही था कि हमारी पहली पोस्टिंग भी अपने शहर में ही मिल गई. अब तो हमारा मिलनाजुलना अकसर होने लगा. दोस्त तो पहले ही बन चुके थे लेकिन हमें एकदूसरे से प्यार हो गया, यह तब पता चला जब रातरात तक एकदूसरे से फोन पर बातें करने लगे. एक दिन न मिल पाना भी हमे बेचैन कर जाता. हमारे प्यार पर हमारे घर वालों ने भी हरी झंडी दिखा दी. अब हम एकदूसरे के घर भी आनेजाने लगे थे और प्रतीक के मांपापा मुझे अपने घर का सदस्य समझने लगे थे.

प्रतीक के पापा ने तो यहां तक कहा था, ‘‘प्रतीक बेटा, तुम ने अपने वास्ते इतनी सुंदर और गुणी लड़की खुद ही ढूढ़ ली. ऐसी तो शायद हम न ढूंढ़ पाते.’’

ऐसा नहीं था कि मैं आंटी को पसंद नहीं थी पर कोई एक बात उन्हें परेशान कर रही थी. एक रोज मेरे पापा को बुला कर वे बोलीं, ‘‘भाई साहब, हो सके तो मीरा की जन्मकुंडली भेज दीजिएगा.’’

मेरे पापा आश्चर्य से बोले, ‘‘जन्मकुंडली? पर किस लिए? और हम तो इस कुंडली मिलान पर विश्वास ही नहीं करते. इसलिए कभी बनवाने की सोची भी नहीं. हां, पर जब मीरा बहुत छोटी थी तब इस की दादी ने इस की कुंडली बनवाई थी. पर अब पता नहीं कहां होगी.’’

फिर मेरे पापा हंस कर कहने लगे, ‘‘बहनजी, अब हमें ही देख लीजिए, हमारा कोई कुंडली मिलान नहीं हुआ फिर भी क्या मस्त जिंदगी कट रही है हमारी एकदूसरे के साथ.’’

प्रतीक की मां कहने लगीं, ‘‘सब तो ठीक है, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य को ले कर थोड़ा सतर्क तो रहना पड़ता है और हरज ही क्या है जो कुंडली मिलान हो जाए तो? हो सके तो भेज दीजिएगा.’’

प्रतीक और उस के पापा इशारों से मना करते रहे पर प्रतीक की मां जिद पर अड़ गईं. अब दादी तो रही नहीं, फिर भी पापा ने कहा ‘‘ठीक है मैं कोशिश करूंगा.’’

प्रतीक की जिद पर हमारी सगाई तो हो गई पर शादी की डेट 6 महीने बाद की रखी गई. धीरेधीरे हम शादी की तैयारियों में जुट गए.

एक रोज प्रतीक के मांपापा ने मुझ से कहा कि मैं प्रतीक के साथ जा कर अपने लिए गहने पसंद कर लूं. हमें लगा अब उन्हें कुंडलियों के बारे में कुछ जानना नहीं है और हमारे रिश्ते से भी उन्हें कोई एतराज नहीं है.

उस रोज जल्दीजल्दी मैं ने अपने बाल संवारे और प्रतीक की पसंद की ड्रैस पहनी. न जाने कितनी बार खुद को आईने में देखा और बारबार घड़ी पर भी नजरें टिकाई थी. मुझे इस बात का खटका लग रहा था कि कहीं घड़ी ही तो अटक नहीं गई? कहीं ज्यादा देर तो नहीं हो गई? जब यह भरोसा भी टूट गया और बहुत देर बाद भी प्रतीक मेरे घर नहीं आया तो मैं ने ही फोन लगाया यह पूछने के लिए कि हमें गहने पसंद करने जाना था तो आए क्यों नहीं? पर प्रतीक तो फोन ही नहीं उठा रहा था. उस के घर के नंबर पर भी फोन लगाया. वहां भी कोई नहीं उठा रहा था. मुझे चिंता होने लगी. सोचा चल कर खुद ही देख आती हूं पर जैसे ही मैं प्रतीक के घर के अंदर जाने लगी, सब की बातें सुन मेरे पांव वहीं बाहर ही रुक गए.

प्रतीक बोल रहा था और उस की आवाज से लग रहा था कि वह काफी गुस्से में है, ‘‘आप तो मान गई थीं कि अब कोई कुंडली का मिलान नहीं करेंगी तो आज अचानक से क्या हो गया आप को? उस ढोंगी बाबा ने भड़काया है न आप को? ठीक है तो मेरी भी बात सुन लीजिए, अगर मीरा से मेरी शादी नहीं हुई तो मैं जिंदगी भर कुंवारा रह जाऊंगा पर किसी और से शादी नहीं करूंगा.’’

सुन कर मेरा हृदय व्याकुल हो उठा. कुछ देर तो मैं काठ की मूर्ति की तरह जड़वत चुपचाप वहीं खड़ी रह गई. फिर अंकल के चिल्लाने की आवाज से मेरा ध्यान टूटा.

‘‘अरे मूर्ख औरत, मैं ने तुम्हें कितनी बार समझाया, यह मंगलीफंगली कुछ नहीं होता है तो फिर कौन तुम्हें भड़का गया? वो ढोंगी बाबा? मत सुनो किसी की, यह शादी हो जाने दो. क्यों दो प्यार करने वालों को अलग करने का पाप अपने सिर पर ले रही हो?’’ अंकल आंटी को समझाने की कोशिश कर रहे थे.

आंटी कहने लगी, ‘‘देखोजी, सिर्फ प्यार से जिंदगी नहीं चलती है और दुनिया कितनी भी मौडर्न क्यों न हो जाए जो सही है सो है. मीरा मंगली तो है ही ऊपर से कालसर्प दोष भी है उस में. पंडितजी ने तो यहां तक कहा कि अगर हम अपने बेटे की शादी मीरा से कर देते

हैं तो प्रतीक की जान को भयंकर खतरा है. उस की जान भी जा सकती है. अब बोलो, क्या जानबूझ कर मैं अपने बेटे को मौत के मुंह में डाल दूं? जो भी हो पर अब मैं यह शादी नहीं होने दे सकती.’’

‘‘पर मां आप समझती क्यों नहीं हैं. ऐसे पंडित ढोंगी और पाखंडी होते हैं. अपनेआप को महान साबित करने के लिए कुछ भी बोल देते हैं. अब भी कहता हूं छोड़ दो अपनी जिद. किसी के बातों में आ कर हमारी जिंदगी नर्क मत बनाओ. हो जाने दो हमारी शादी.’’ प्रतीक की बातों में बेबसी साफ झलक रही थी. आंटी जब अपनी बातों पर अड़ी रहीं तो प्रतीक यह कह कर वहां से चला गया कि ‘‘ठीक है आप को जो अच्छा लगता है कीजिए और मुझे जो अच्छा लगेगा मैं करूंगा.’’

अंकल कहने लगे, ‘‘देखना एक दिन तुम जरूर पछताओगी और तब मैं नहीं रहूंगा तुम्हारे आंसू पोंछने के लिए.’’ कह कर वे भी वहां से चले गए. समझ नहीं आ रहा था क्या हो रहा है. मेरी आंखें पथरा गईं. जबान बंद हो गई, कान सुन्न हो गए. जैसे मेरी सारी शक्ति खत्म हो गई. घर आ कर मैं निढाल हो गई.

मां मेरे कमरे में चाय देने आईं और मेरा चेहरा देख कर पूछा भी कि मैं तो प्रतीक के साथ गहने पसंद करने जाने वाली थी तो गई क्यों नहीं, पर मैं ने चुप्पी साध ली. कुछ बताने की हिम्मत नहीं हुई. मां की जिद पर किसी तरह चाय समाप्त कर मैं सोने को हुई पर फिर उन की बातें याद कर झटके से उठी और वहां पड़े सामान को फेंकने लगी. मां डर गई और पूछने लगी, ‘‘क्या हो गया… सब ठीक है न?’’

मेरे होंठ कांप रहे थे. मैं बोलना चाह रही थी पर बोल नहीं पा रही थी. मां घबरा उठी, ‘‘मीरा क्या हुआ बेटा, सब ठीक तो है न?’’ फिर उन्होंने आवाज दे कर पापा को बुलाया. पापा मुझे रोते देख व्याकुल हो उठे. कहने लगे, ‘‘बेटा क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है न तुम्हारी?’’

‘‘पापा…’’ रोतेरोते मेरी हिचकियां बंधने लगी थीं. तभी प्रतीक की मां का फोन आया. उन्होंने जो कहा सुन कर पापा वहीं जमीन पर बैठ गए. पापा की तबीयत न बिगड़ जाए, सोच कर मैं ही पापा को ढाढ़स देने लगी. शाम को प्रतीक ने मुझे मिलने को बुलाया. वहीं जहां हम हमेशा मिलते थे.

‘‘मीरा, सुनो मेरी बात और रोना बंद करो. कल ही जा कर हम मंदिर में शादी कर लेंगे. नहीं चाहिए मुझे मां का आशीर्वाद,’’ जैसे प्रतीक फैसला कर के आया था.

प्रतीक की बातों पर मैं चौंक गई, ‘‘पर हम ऐसा कैसे कर सकते हैं प्रतीक?’’ मैं ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा.

‘‘तो मुझे भूल जाओ क्योंकि मां कभी हमें एक होने नहीं देंगी और मैं…? कहतेकहते प्रतीक चुप हो गया.’’

थोड़ी चुप्पी के बाद मैं ने ही कहा, ‘‘अभी मैं कुछ नहीं कह सकती हूं.’’ प्रतीक और मेरे बीच हुई बात मैं ने मां को बताई.

मां कहने लगी, ‘‘ऐसी शादी का क्या मतलब जिस से बड़ों का आशीर्वाद न मिले और जब उस की मां नहीं चाहतीं कि यह शादी हो तो मेरी बेटी कोई बोझ नहीं है हमारे ऊपर. और बेटा, शादी सिर्फ लड़का और लड़की से नहीं, बल्कि पूरे परिवार से होता है.’’

मैं ने सोचा कि मां सही कह रही थीं. अपने मन को कड़ा कर मैं ने अपना फैसला प्रतीक को सुना दिया. सब बातों को भूल, अपना मन काम और घर में रमाने लगी. पर जब आप किसी से बेइंतहा प्यार करते हैं तो उसे भूलना इतना आसान नहीं होता. पर मैं कोशिश कर रही थी. कई बार प्रतीक का फोन भी आया पर मैं ने कोई तवज्जो नहीं दी.

कुछ महीने बाद ही मेरी दीदी मेरे लिए एक रिश्ता ले कर आईं जो उन की ननद के रिश्ते में था. पर पापा ने लड़के वालों को सब बता दिया कि मैं मंगली हूं और इस वजह से मेरी शादी टूट गई थी.

लड़की के परिवार वाले कहने लगे, ‘‘हम मंगलीअंगली कुछ नहीं मानते. बस लड़कालड़की एकदूसरे को पसंद कर लें.’’

जल्द से जल्द मैं प्रतीक को अपनी यादों से मिटाना चाहती थी इसलिए शादी के लिए मैं ने तुरंत हां कर दिया. ज्यादा तामझाम लड़के वालों को भी नहीं पसंद था. बड़ी ही सादगी से मेरी शादी वरुण के संग हो गई. कहां मैं प्रतीक की दुलहन बनने वाली थी और बन गई वरुण की दुलहन. शादी के बाद मैं मुंबई आ गई और अपना तबादला भी मुंबई में ही करवा लिया. वरुण जैसा दिलोजान से प्यार करने वाला पति पा कर मैं पूरी तरह से प्रतीक को भूल चुकी थी. जिगर और साक्षी के आने के बाद तो हमारा जीवन और भी खुशियों से भर उठा था.

सुबह मन तो नहीं था पर प्रतीक ने बात ही ऐसी बोल दी थी कि जाने मां कब तक जिंदा रहें, यही सोच कर मैं ने आंटी से मिलने का मन बना लिया. सोचा अब क्या बैर रखना?

मुझे देखते ही, आंटी रो पड़ी और अपने सीने से लगाते हुए कहने लगीं, ‘‘बेटा, मुझ अभागन को माफ कर देना. तुम क्या गईं, तुम्हारे अंकल भी हमें छोड़ कर चले गए और जातेजाते बोल गए, ‘‘अपनी करनी पर पछताओगी. उन की बात लग गई. मैं बहुत पछता रही हूं. हीरा फेंक कांच का टुकड़ा उठा लिया अपने बेटे के लिए. बेटा, मैं अंधविश्वास के दलदल में फंस गई थी.’’ कह कर आंटी फिर फफक पड़ीं.

‘‘तो क्या हुआ जो हम सासबहू न बन पाए तो? मांबेटी सा रिश्ता तो है न हमारा, मां,’’ कह कर मैं उन के गले लग गई.’’

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