वह हमेशा से बहुत कम बोलने वाला खामोश सा लड़का था. अपने में खोया, कुछ सोच रहा हो मानो. पहले मुझे लगा कोई बात है इस खामोशी में. लेकिन उस ने पूछने पर हर बार हलके से मुसकराते हुए कहा, ‘ऐसी तो कोई बात नहीं. मेरा स्वभाव ही है शायद ऐसा.’कालेज में काफी लंबा समय उस के साथ बिताया. प्रथम वर्ष में तो हम सब सीनियरों से डरेसहमे रहते थे. कालेज का नयानया माहौल. रमने में थोड़ा समय तो लगता है.

फिर द्वितीय वर्ष में हमारे मध्य बातचीत आरंभ हुई. बातें स्कूल के दिनों की, आने वाले भविष्य की, वर्तमान में जो चल रहा है, उस की. जानपहचान हुई तो बातें भी धीरेधीरे प्रगाढ़ता से होने लगीं. अकसर ऐसा होता है किन्हीं 2 लोगों की अच्छी बनती है. दोस्त हों, सहेलियां हों या कोई भी 2 लोग. लड़कालड़की भी हो सकते हैं. भले ही लोग उसे प्रेम का नाम दें लेकिन वह मित्रता भी हो सकती है. आरंभ तो मित्रता से ही होता है. मेरे और उस के विचार मिलते थे. मुझे उस का स्वभाव पसंद था. उस में फूहड़ता नहीं थी. वह शांत व गंभीर था. जोकि मुझे पहले खटकता था. लगता था इस गंभीरता के पीछे कोई हादसा छिपा हुआ है. लेकिन धीरेधीरे मुझे समझ आया कि उस का स्वभाव ही ऐसा है.

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वह 25 वर्ष का खूबसूरत युवक था. बीए द्वितीय वर्ष में हम साथसाथ थे. वह पढ़ने में अव्वल था और मैं ठीकठाक थी. मैं तो बस डिगरी के लिए पढ़ रही थी. मुझे पढ़ाई में कोई विशेष दिलचस्पी नहीं थी. न ही परिवार से ऐसा कोई दबाव था. मेरे सपने सीमित थे. जब तक शादी नहीं हो जाती, तब तक क्या करूं? सो पढ़ाई जारी रखी. मेरे पिता पूर्व विधायक थे. उन का अपना प्रौपर्टी का कारोबार था. प्रौपर्टी का कारोबार और पूर्व विधायक होने का अर्थ यही है कि मुझे न तो किसी नौकरी की जरूरत थी और न आर्थिक सुरक्षा की. पिताजी का यही कहना था कि बिना टैंशन के पढ़ाई करो. शादी किसी बड़े घर के लड़के से धूमधाम से करूंगा. किसी तरह का तनाव लेने की जरूरत नहीं है. हां इतना अवश्य चेताया था कि यदि लड़का तुम्हारी पसंद का हो तो जातबिरादरी का ध्यान रखना और उस से भी ज्यादा जरूरी यह कि पहले औकात देख लेना लड़के की. फिर प्यार के फेर में पड़ना. खाली प्यारमोहब्बत से जीवन नहीं चलता. प्यार करना लेकिन पागलपन मत करना.

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अब उन्हें कौन समझाए कि प्यार और पागलपन पर्यायवाची ही हैं एकदूसरे के. मैं पिताजी की हां में हां इसलिए मिलाती थी क्योंकि मेरा प्यार में पड़ने का कोई इरादा था ही नहीं. पिताजी ने दुनियादारी देखी है. उन्हें मेरी चिंता होना स्वाभाविक ही था. मैं उन की इकलौती कन्या संतान थी. मुझ से बड़े 2 भाई थे. जो पढ़लिख कर पिताजी के व्यवसाय में हाथ बंटा रहे थे. मैंउसे अपना दोस्त मानने लगी थी. सब से अच्छा दोस्त. मैं उस से हर बात शेयर करती थी. उसे अपने परिवार के विषय में बताती थी. कभी भाइयों से झगड़ा हो जाए या मां डांट दे तो भी उसे बता कर अपना मन हलका कर लेती थी.

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मैं उस के लिए घर से टिफिन लाती थी. वैसे मैं टिफिन तो अपने लिए लाती थी लेकिन जब से वह दोस्त बना था, खास दोस्त, तब से टिफिन में कुछ ज्यादा खाना रखवा लेती थी मां से कह कर. ‘किस के लिए?’ मां हास्य से पूछतीं. ‘फ्रैंड के लिए’, मैं बात को टालने वाले अंदाज में कहती. ‘लड़का या लड़की’, मां उत्सुकता से पूछती. ‘मां, तुम भी…’ मैं बात को खत्म करने के उद्देश्य से मां से दूर जा कर बात करने की कोशिश करती लेकिन मां पीछे से आ कर कहती, ‘मुझे कोई एतराज नहीं तुम्हारी दोस्ती से. चाहे किसी से भी हो. लेकिन बात आगे बढ़े तो सोचसमझ कर कदम उठाना. कोई ऐसी गलती मत कर बैठना कि…’

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मां की बात जब तक पूरी होती मैं कालेज के लिए निकल घर से बाहर होती. मां का चेतावनीभरा स्वर सुनाई देता था. चेतावनी थी या समझाइश या दोनों ही. लेकिन मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था. अपने बारे में क्या कहूं. बस ठीकठाक थी. 20 वर्ष की उम्र, दुबलापतला, गौर वर्ण का शरीर. नैननक्श अच्छा ही था. तभी तो कई लड़के निहारते रहते थे. वैसे लड़कों का क्या है, लड़की दिखी नहीं और टकटकी लगानी शुरू कर दी. मैं खुद क्या समझूं. अगर वह कहे तो समझ में आए और वह कहे ऐसी संभावना नजर नहीं आती.

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वो यानी मेरा बैस्ट फ्रैंड. दुबलापतला, मझोले कद का गोरा सा लड़का. वह शांत सा, खामोश सा लड़का. हिंदी प्रदेश के छोटे से शहर का लड़का. कहना भी चाहता होगा तो संकोच के मारे कह नहीं पाएगा. अब मुझ दिल्ली की लड़की को ही सब पूछना पड़ेगा. मुझे तो उस के बारे में कुछ भी पता नहीं. दोस्त के बारे में कुछ पता होना ही चाहिए. आज पूछूंगी. कालेज गई, हम दोनों एक ही डैस्क पर बैठते थे. 2 पीरियड हो गए. वह बहुत बारीकी से लैक्चर सुनता रहा. अपनी कौपी पर नोट करता रहा. तीसरा पीरियड राजनीतिशास्त्र का था. प्रोफैसर साहब अवकाश पर थे. सब क्लास से बाहर जाने लगे. मैं ने कहा, ‘चलो, क्लास खाली है.’ वह कहीं डूबा हुआ था. मैं ने उस को झकझोरा. जैसे उसे होश आया ‘हां, चलते हैं’ कहते हुए वह उठ खड़ा हुआ.

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हम कैंटीन में आ गए. मैं ने अपना टिफिन खोल कर उस के सामने रख दिया. ‘शुद्ध मैथी के परांठे,’ मैं ने चहकते हुए कहा. ‘शुद्ध मतलब.’ उस ने पूछा. ‘देशी घी से बना,’ मैं ने उत्तर दिया. वह कुछ नहीं बोला. मैं ने उस की तरफ एक परांठा बढ़ाते हुए कहा, ‘कुछ अपने बारे में बताओ.’ ‘क्या?’ उस ने मेरी तरफ देखते हुए कहा. ‘मतलब अपने परिवार के बारे में.’ ‘परिवार के बारे में क्या बताऊं?’ उस ने कहा. ‘नहीं बताना चाहते?’ ‘नहीं, ऐसी बात नहीं है.’ ‘तो बताओ.’ ‘तो सुनो, हम 3 भाई हैं. 2 मुझ से छोटे हैं. मां हैं, पिताजी हैं. पिताजी वकील हैं.’ इतना कह कर वह चुप हो गया. ‘किस शहर के हो?’

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‘शहर का नहीं, गांव का. छतरपुर से 30 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव का.’ ‘बिहार से हो या यूपी से?’ मैं ने पूछा ‘बिहार और यूपी के अलावा भी राज्य हैं. पढ़ने या काम की तलाश में निकला हर लड़का बिहार, यूपी का नहीं होता.’ ‘लेकिन ज्यादातर तो होते हैं.’ ‘मैं मध्य प्रदेश से हूं,’ उस ने कुछ गर्व से कहा, ‘नक्शे में ठीक बीचोंबीच.’ ‘ओह.’ ‘और कुछ?’ उस ने बात को खत्म करने वाले अंदाज में कहा. ‘बहुत कुछ,’ मैं ने बात को बढ़ाने के अंदाज में कहा, ‘क्या, कुछ?’ ‘सबकुछ.’ ‘अपना तो बस इतना ही है,’ उस ने परांठा खत्म करते हुए कहा और पानी का गिलास उठाया. मैं ने बात बदलते हुए पूछा, बात इसलिए बदल दी कि परिवार के बारे में बताते समय उस के चेहरे पर कुछ तनाव सा आ गया था.

‘मैं कैसी दिखती हूं?’ ‘मतलब?’ उस ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा. ‘ज्यादा मतलब मत निकालो. मैं सिर्फ ईमानदारी से यह जानना चाहती हूं कि मैं कैसी दिखती हूं?’ ‘तुम्हें नहीं पता, तुम कैसी दिखती हो? आईना तो रोज देखती होगी?’ ‘मुझे पता है कि मैं ठीकठाक दिखती हूं. बस तुम्हारा नजरिया जानना चाहती हूं. मतलब, मुझ में क्या खास है कि कोई मुझ से प्यार करे, शादी के लिए प्रपोज करे. कहने का मतलब लड़कों की देखने की जो दृष्टि होती है उस के हिसाब से मैं कैसी दिखती हूं?’ मुझे उस के उत्तर की प्रतीक्षा थी. मैं जानती थी उस का उत्तर ईमानदारी का होगा.

‘तुम इतनी तो अच्छी दिखती हो कि शादी का कोई प्रपोजल आए तो कोई लड़का तुम्हें इस कारण तो नहीं ठुकरा सकता कि तुम दिखने में सुंदर नहीं हो. तुम खूबसूरत हो.’ उस ने कहा और मुझे भरपूर यकीन हो गया. अपने सुंदर होने पर भरोसा तो था मुझे, लेकिन ठीकठाक सा. उस के कहने पर भरपूर भरोसा हो गया. ‘तुम्हें बीए ही करना था तो अपने शहर में ही कर सकते थे, क्या नाम बताया था, हां, छतरपुर. इतनी दूर दिल्ली आने की क्या जरूरत थी?’ मेरे अचानक पूछने से वह परेशान सा हो गया.

‘यों ही पूछा’ उस के चेहरे की परेशानी भांप कर मैं ने कहा. कुछ देर वह शांत रहा. फिर उस ने कहा, ‘मेरे पिता चाहते थे कि मैं घर से दूर रहूं.’ ‘क्यों?’ ‘ये तो वही बता सकते हैं और प्लीज तुम्हें मेरे बारे में जो जानना हो पूछ सकती हो लेकिन मेरे परिवार के विषय में मत पूछना. मैं बात नहीं करना चाहता उस बारे में. बताने लायक जितना था, मैं ने बता दिया.’ और वह खामोश हो गया. माहौल कुछ बोझिल सा हो गया था. मैं ने उस के परिवार के विषय में बात करना ठीक नहीं समझा.

मुझे कोई मतलब भी नहीं था उस के परिवार से. एक जिज्ञासा रहती है दोस्त के बारे में जानने की. अपने इस दोस्त के बारे में कुल जमा इतनी ही जानकारी से संतुष्ट होना पड़ा कि वह मेरे साथ बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ रहा है, कालेज के होस्टल में रहता है, उम्र 25 साल, रंग गोरा, मध्यम कदकाठी, दुबलापता, जिला छतरपुर, प्रांत मध्य प्रदेश, पिता वकील, घर में 2 छोटे भाई और मां गृहिणी, नाम प्रशांत सिंह, जो अपने शहर से तकरीबन हजार किलोमीटर दूर रह कर बीए कर रहा है. क्यों, पता नहीं जो अपने परिवार के बारे में बात करना नहीं चाहता, करता है तो तनाव में आ जाता है. अजीब सी खामोशी ओढे़ हुए है मेरा दोस्त.

‘कल रविवार है, मूवी चलोगे?’ मैं ने पूछा. ‘देखो, तुम मुझे कैंटीन में चायनाश्ता करवाती हो, इतना काफी है. मुझे अच्छा नहीं लगता कि कोई लड़की मेरे लिए अपने पैसे खर्च करे. लेकिन चलो ठीक है इतना, इस के आगे नहीं. मूवी चलेंगे लेकिन तब जब मेरे पास पैसे होंगे. और कब होंगे, यह कह नहीं सकता.’ ‘तुम्हारे मेरे बीच में पैसे कहां से आ गए? हम दोस्त हैं. आज मेरे पास हैं, मैं खर्च कर रही हूं. कल तुम्हारे पास होंगे, तुम खर्च कर देना.’ मैं ने नाराज होते हुए कहा. ‘अब तुम से कुछ पूछ भी तो नहीं सकती, तुम्हारे पिताजी तुम्हें हर महीने कितने रुपए भेजते हैं?’

‘7 हजार रुपए,’ उस ने उत्तर दिया, जिस में होस्टल और महीने के जरूरी खर्च निकाल कर मुश्किल से 500 रुपए बचते हैं. कभी वे भी नहीं.’ ‘चलो इतना तो बताया. लेकिन कल मूवी चलते हैं.’ ‘तुम्हें मालूम है, हमारे गांव में और शहर में भी इस तरह लड़केलड़की का बात करना ठीक नहीं समझा जाता. अभी तक तो पता नहीं क्या उपद्रव हो जाते,’ उस ने कहा. जनाब, यह आप का गांव नहीं, दिल्ली है. महानगर दिल्ली. भारत की राजधानी दिल्ली. मैंने दिल्ली की तारीफ करते हुए कहा, ‘दिलवालों की दिल्ली.’ ‘लेकिन दिल्ली है तो भारत में ही. यहां भी धर्मजाति कुछ तो माने रखती होगी,’ उस ने कहा. ‘हां रखती है. लेकिन इतना भी नहीं. इस कालेज में हमीं दोस्त नहीं हैं, हर लड़की का कोई दोस्त लड़का है. सब एकदूसरे के परिवार में आयाजाया करते हैं. आपस में मिलतेजुलते हैं.’

‘लेकिन हैसियत में बराबरी के होते हैं.’ ‘अब दोस्ती में हैसियत कहां से आ गई? हम दोस्त हैं और यही एक ऐसा रिश्ता है जिस में धर्म, जाति, भाषा जैसी समस्याएं आड़े नहीं आतीं.’ वह चुप हो कर सुनता रहा. ‘कभी चलो मेरे घर’, वह चुप रहा. ‘मैं तुम्हें अपने बारे में सबकुछ बताती हूं. अपने परिवार के बारे में, अपनी समस्याओं के बारे में, अपने भविष्य के बारे में. लेकिन तुम से कुछ पूछो तो तुम्हें बुरा लगता है. मत बताओ. लेकिन इतना तो बताओ कि आगे क्या इरादा है? बीए कर के वापस घर जाओगे या यहीं कुछ करोगे?’

‘घर, मेरा घर कहां है, मैं तो अनाथ हूं जैसे’, लरजते हुए उस के शब्द और उस की आंखें भर आईं. ‘कह देने से मन हलका हो जाता है,’ मैं ने कहा. ‘कहने को कुछ नहीं है. हां मैं घर वापस नहीं जाना चाहता. यहीं कुछ करना चाहता हूं, आगे एमए भी करना है और पिताजी से आर्थिक मदद लेने की इच्छा नहीं है.’ ‘थैंक्स, कुछ तो बोले,’ मैं ने कहा, ‘तो कल मूवी देखना पक्का रहा.’ ‘हां, पक्का.’ सिनेमाहौल में ज्यादा भीड़ नहीं थी. हौल में अधिकतर युवा थे और अपनी बीवियों या गर्लफ्रैंड के साथ थे.

बहुत से लड़केलड़कियां आपस में बातचीत कर रहे थे. कुछ धीरेधीरे, कुछ बहुत धीरे. एकदूसरे का हाथ थामे प्रेमभरी बातें हो रही थीं. फिल्म की तरफ आंखें थी लेकिन ध्यान दूसरी तरफ. शादीशुदा जोड़े सलीके से बैठे थे. इंटरवल में पत्नी की फरमाइशें पूरी कर रहे थे पति. प्रेमी जोड़े आपस में प्रेमालाप कर रहे थे. एक मैं थी और मेरा दोस्त, जो लोगों की दृष्टि में प्रेमी जोड़े ही थे, लेकिन हम चुपचाप फिल्म देख रहे थे, बात हुई भी तो कालेज की पढ़ाई की. हम पूरी फिल्म देख कर निकले. नजदीक ही कौफी शौप थी. मैं ने कहा, ‘एकएक कौफी हो जाए.’ मैं बात करना चाहती थी. लेकिन मेरा अभिन्न मित्र प्रशांत सिंह था कि हां, हूं के सिवा बहुत कम बात करता था.

पता नहीं क्यों मैं उस के विषय में अधिक से अधिक जानना चाहती थी. उस के पास कुछ था नहीं शायद बताने को. पहले उस की खामोशी मुझे अच्छी लगती थी. लेकिन अब यह सोच कर अखरने लगी कि वह मुझ से ठीक से खुल नहीं रहा है या नहीं खुल पा रहा है. पता नहीं क्या बात थी. बात थी भी या नहीं. कभीकभी मुझे खुद पर गुस्सा आता. मैं क्यों उस के बारे में सबकुछ जानने को उत्सुक हूं? क्यों वह मुझ से अपने घरपरिवार के लोगों की बात नहीं करता? अच्छीबुरी ही सही. कुछ तो बताए. कुछ तो बात करे. ‘तुम 25 साल की उम्र में बीए द्वितीय वर्ष में हो. कुछ लेट नहीं हो गए? फेल हुए थे या बीच में पढ़ाई छूट गई थी?’

मेरे पूछने पर उस ने कहा, ‘12वीं के बाद पढ़ने का इरादा ही नहीं था. वह तो घर का माहौल ऐसा था कि आना पड़ा.’ ‘वकील का लड़का और केवल 12वीं पास?’ ‘मां नहीं चाहती थी आगे पढ़ाना.’ ‘क्यों?’ ‘सौतेली जो थी.’ ‘क्या?’ ‘तुम्हारे पिता ने दूसरी शादी की?’ ‘हां.’ ‘एक जवान बेटे के होते हुए?’ ‘नहीं, 3 बेटों के होते हुए.’ ‘और लड़की शादी को राजी हो गई?’ ‘वहां ऐसा होता रहता है. गरीब घर की लड़कियों के मातापिता के पास चारा भी नहीं होता.’ ‘कितनी उम्र होगी तुम्हारी मां की?’

‘मुझ से 1-2 साल बड़ी.’ ‘और पिता की उम्र?’ ‘लगभग 50 साल.’ ‘क्या?’ ‘हां.’ मैं चुप रही और यह भी समझ गई कि विमाता के होते हुए लड़कों को कौन पूछता होगा? पिता नई पत्नी को खुश करने में लगे रहते होंगे. बेचारे लड़के नौकरों की तरह रहा करते होंगे. इसलिए प्रशांत ने इतनी दूर आ कर पढ़ने का निर्णय लिया. इसी कारण वह घर नहीं जाना चाहता. यहीं पर पढ़ाई के बाद काम की तलाश करना चाहता है. अब सबकुछ स्पष्ट था. मुझे आगे उस के परिवार के बारे में कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं थी. मेरे मन में जो प्रश्न थे उन का समाधान हो चुका था.

मेरे भाई की शादी थी. शादी की व्यस्तताओं के चलते मैं कालेज नहीं जा पा रही थी. पढ़ाई में बहुत कुछ छूट रहा था. इस समस्या का समाधान किया मेरे खामोश दोस्त ने. प्रशांत ने मुझ से कहा, ‘चिंता मत करो, मैं नोट्स बना कर दे दूंगा.’ मैं निश्ंिचत हो गई. शादी में मैं ने अपने कालेज के दोस्तों और कुछ प्रोफैसरों को भी निमंत्रण भेजा. प्रशांत से भी कहा, ‘तुम मेरे खास दोस्त हो, तुम्हें तो आना ही है.’ सब आए लेकिन प्रशांत नहीं आया. मैं प्रशांत के दोस्तों से पूछ भी नहीं सकी. सोचा, मिलने पर लड़ूंगी, पूछूंगी, गुस्सा करूंगी. क्यों नहीं आया?

वैसे उस का स्वभाव ही एकांतप्रिय है, कालेज में जब कोई सामूहिक कार्यक्रम होता तो वह कन्नी काट लेता था. लेकिन मैं ने इतने अपनेपन से बुलाया, फिर भी नहीं आया. शादी के कार्यक्रम निबटने के बाद जब मैं कालेज पहुंची तो पता चला कि वह अपने घर गया है. मुझे और भी ज्यादा गुस्सा आया. कम से कम मुझे बता कर तो जा सकता था. एक फोन तो कर सकता था. कभीकभी तो मुझे लगता कि मैं ही उसे अपना दोस्त मानती हूं, वह नहीं. मैं उस से जितना जुड़ने की कोशिश करती, वह उतना ही बचने की कोशिश करता है.

दोस्ती एकतरफा नहीं निभाई जाती. छोटे शहर की मानसिकता का अभी तक त्याग नहीं किया उस ने. कालेज की कैंटीन में मिलो या कौफी शौप में, हर जगह पर देखता रहता है कि हमें कौन देख रहा है, हमारे बारे में क्या सोच रहा है. सोच रहा है तो सोचता रहे, फिर मैं दिल्ली की हूं, मुझे इस की चिंता होनी चाहिए, मेरे घर वाले रिश्तेदार दिल्ली में रहते हैं. मैं लड़की हूं. कोई कुछ कहेगा तो मुझे. लेकिन नहीं, जनाब को ज्यादा चिंता रहती है. यह भी नहीं समझता कि यह दिल्ली है, यहां सब व्यस्त हैं अपनेअपने में. किसी को इतनी फुरसत नहीं. मैं ने उस को फोन लगाया, एक बार नहीं, कई बार. लेकिन हर बार स्विच औफ. हो सकता है यह सोच कर किया हो कि स्मौल टाउन के परिवार वाले यह न सोचें कि लड़की क्यों फोन कर रही है. खैर, जब आएगा तब बात करूंगी.

तभी कालेज में उस के खास दोस्त रहमान ने आ कर मुझ से कहा, ‘आप के लिए नोट्स छोड़ कर गया है प्रशांत.’ कालेज के बाहर खड़ी हुई अपनी गाड़ी की प्रतीक्षा कर रही थी. मैं ने रहमान को थैंक्स कह कर पूछा, ‘कुछ बता कर गया है प्रशांत, कब तक आएगा?’ ‘कह तो रहा था कि हफ्ते के लिए जा रहा हूं,’ रहमान ने कहा. इस से ज्यादा पूछना मैं ने उचित नहीं समझा. घर पहुंच कर मैं ने नोट्स अपने कमरे में रख दिए और नई भाभी के साथ गपें मारने लगी. रात में खाना खाने के पश्चात मैं अपने कमरे में पहुंच कर पढ़ाई करने बैठी. मैं ने नोट्स निकाले. नोट्स मिलने के बाद मुझे वह खामोश दोस्त बहुत याद आया. क्या बात थी जो अचानक उसे जाना पड़ा. वह तो जाना ही नहीं चाहता था. इसी सोच और उधेड़बुन में मस्तिष्क उलझा रहा.

रहीम ने मुझे करीब 15 दिनों बाद एक पत्र देते हुए कहा, ‘प्रशांत ने आप के लिए भेजा है’ और मैं पत्र को पढ़ने की लालसा में कालेज के पार्क में पहुंची. पार्क में बने संगमरमरी चबूतरे पर बैठ कर मैं पत्र पढ़ने लगी. मैं ने पत्र पढ़ना आरंभ किया. प्यारी दोस्त माही, ढेर सारा स्नेह. तुम ने मुझे जो अपनापन दिया वह मेरे लिए संसार की सब से बड़ी उपलब्धि है. तुम अकसर मेरे परिवार के बारे में जानना चाहती थीं और मैं बताने से कतराता था. क्या बताऊं? कैसे बताऊं? लेकिन अब बताना जरूरी है. अन्यथा मुझे लगेगा कि मैं ने अपने दोस्त से कुछ छिपाया है.

‘हम 3 भाई हैं. तीसरे भाई के पैदा होते समय मां चल बसी. उस समय मेरी उम्र 19 वर्ष थी. मैं 12वीं पास कर चुका था. पता नहीं पिताजी स्वयं को अकेला महसूस कर रहे थे या उन्होंने हमारी देखभाल के लिए शादी की थी. लेकिन हम दोनों भाई इतने भी छोटे नहीं थे कि पिता को हमारी देखभाल के लिए शादी करनी पड़े. तीसरे को वैसे भी हम स्वयं संभाल रहे थे. बहरहाल, बाद के कुछ दिनों में साफ हो गया कि उन्होंने अपने सुख के लिए शादी की थी. उन की नई पत्नी एक गरीब घर की अति सुंदर लड़की थी. जिस के पिता नहीं थे और उन की 2 बहनें और थीं. ऐसे में उन की मां ने हमारे 50 वर्षीय पिता को अपनी बेटी कुछ इस तरह सौंप दी मानो एक बड़ा कर्ज चुका दिया हो.

शादी के बाद पिता मात्र पति बन कर रह गए और विवाहित दंपती की हम तीनों भाइयों पर नजर भी नहीं जाती थी. हम जैसे अनाथ हो चुके थे. दोनों छोटे भाई तो स्कूल चले जाते, मुझे घर के सारे काम करने पड़ते. मैं ने कालेज जाने का प्रयास किया, लेकिन मुफ्त का नौकर कहां मिलता? पिता ने यह कह कर पढ़ाई छुड़वा दी कि मैं काम पर चला जाता हूं. दोनों भाई स्कूल, ऐसे में तुम्हारी मां यानी उन की पत्नी घर में अकेली रह जाती है. मेरा घर में रहना जरूरी है. पढ़ाई तो प्राइवेट भी कर सकता हूं, पढ़ कर करना भी क्या है? खेतीबाड़ी देखो.

पिता सुबह छतरपुर चले जाते और बहुत जल्दी लौटने के प्रयास में भी रात के 8 बज ही जाते. विमाता को मैं अकसर उदास ही देखता. कहने को तो वे पति के सामने खुश नजर आतीं लेकिन वे खुश नहीं थीं अंदर से. साथ रहतेरहते दुश्मनों में भी लगाव हो जाता है. हम दोनों में भी हो गया. लगाव स्वाभाविक भी था. हमउम्र थे. सुंदर तो वे थीं ही. वे मुझे अपने मन की बातें बता देती थीं. अपने सुखदुख मुझ से कह कर अपना दबा हुआ गुबार निकाल लेती थीं. उन्होंने कहा, ‘इस घर में आप नहीं होते तो मेरा तो दम घुट जाता. मैं आगे पढ़ना चाहती थी लेकिन मेरे पिता की मृत्यु और गरीबी ने मेरे सारे सपने धूल में मिला दिए. आज मेरे पिता होते तो तुम्हारे पिता की उम्र के होते. मैं उन से घुलमिल नहीं पाती. मुझे उन के सामने जाने में वैसा ही संकोच होता है जैसे एक जवान बेटी को पिता के सम्मुख. वे मुझे हर संभव खुश रखने का प्रयास करते हैं लेकिन मेरे लिए संभव नहीं हो पाता.’

सभी कामों में मैं उन का हाथ बंटाता, बाहर के सारे काम मैं करता. अकसर वे मेरे साथ बाहर घूमने जाने लगी. गांव में लगने वाले साप्ताहिक बाजार से ले कर खेतीबाड़ी देखने के लिए. पता नहीं किस ने क्या कहा पिताजी से. मैं तो उन्हें विमाता का पति ही कहूंगा. उन्होंने बाद में पूरी तरह सिद्ध भी कर दिया. एक दिन गुस्से में घर आए और अपनी पत्नी पर बरस पड़े. ‘कुछ तो मानपर्यादा का खयाल रखो. जवान लड़के के साथ घूमती हो, शर्म नहीं आती?’ ‘घर का ही तो लड़का है. किसी बाहर वाले के साथ तो नहीं घूमती,’ विमाता ने उन्हें पलट कर जवाब दिया. अपनी पत्नी से तो वे कुछ न कह सके लेकिन अपना गुस्सा उन्होंने मेरे ऊपर उतारा.

‘देखता हूं घर के कामकाज में तुम्हारा मन नहीं लगता. दिनभर आवारा बने घूमतेफिरते हो. इस घर की मानमर्यादा मिट्टी में मिलाने पर तुले हो. अभी घर से बाहर निकाल दूं तो रोटीदाल का भाव पता चल जाएगा.’ फिर वे भांतिभांति से मुझे अपनी पत्नी के खिलाफ भड़काने लगे. ‘औरत की जात से सावधान रहना चाहिए. तुम्हारी पूरी उम्र पड़ी है. तुम्हें अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए. मैं चाहता हूं तुम मजिस्ट्रेट बनो. बीए करो, फिर एलएलबी करो. हमारे खानदान का नाम रोशन करो. फिर तुम्हारे लिए एक पढ़ीलिखी खूबसूरत लड़की तलाश करूंगा ताकि तुम भी सुखमय जीवन व्यतीत करो.’

कहां तो स्वयं उन्होंने मेरी पढ़ाई छुड़ा दी थी और आज मुझे अपनी गृहस्थी उजाड़ने का कारण समझते हुए मुझे घर से दूर पढ़ने के लिए कह रहे हैं. ये कैसे पिता हैं जिन्हें अपनी औलाद पर भरोसा नहीं? ये कैसे पति हैं जिन्हें अपनी पत्नी पर भरोसा नहीं? मुझे नफरत सी होने लगी उन से. विमाता को जब पता चला कि उन के पति मुझे बाहर पढ़ने भेजना चाहते हैं तो उन्होंने विरोध करते हुए कहा, ‘एक ही तो व्यक्ति है जिस से हंसबोल कर समय कट जाता है, आप से मेरी उतनी खुशी भी नहीं देखी जाती. अगर आप को अपने ऊपर विश्वास ही नहीं था तो क्यों मुझ से शादी की? मैं सब समझ रही हूं कि आप के मन में क्या चल रहा है.’ ‘मेरे मन में कुछ चले न चले, समाज के लोगों के मन में चल रहा है.’ ‘आप को लोगों की बात पर भरोसा है, अपनी पत्नी, अपने बेटे पर भरोसा नहीं है?’

‘मैं लोकलाज के डर से कह रहा हूं,’ बात में नरमी लाते हुए पिता ने कहा. ‘तो फिर वे कहीं नहीं जाएंगे.’ ‘बालक है, उस का भी भविष्य है. हम अपनी सुखसुविधा के लिए उस के भविष्य से खिलवाड़ नहीं कर सकते.’ विमाता ने चुप रहना उचित समझा. अपने पति के मन को वे ताड़ गई थी. बारबार रोकने की बात कहने से उन के चरित्र पर उंगली भी उठ सकती थी. फिर बेटे के भविष्य के बारे में सोचना भी जरूरी था. वे चुप रहीं. और पिता ने मुझ से कहा, ‘तुम इस घर के बड़े लड़के हो. तुम्हारा कर्तव्य बनता है घर की जिम्मेदारियां संभालना. उस के लिए तुम्हें पढ़लिख कर अच्छी नौकरी करना जरूरी है. तुम ऐसा करो, छतरपुर कालेज में ऐडमिशन ले लो. वहीं किराए का कमरा या होस्टल में रहने का इंतजाम कर लो. जो खर्चा आएगा मैं भेज दिया करूंगा.’

पिता के अंदर चल रहे संदेह को मैं समझ रहा था. मेरा मन उदासी से भर गया. मुझे लगा कि इतनी दूर चला जाऊं कि दोबारा पिता से मुलाकात न हो. मैं ने पिता से कहा, ‘छतरपुर में तो बस पढ़ाई हो सकेगी, उस के बाद क्या? मैं चाहता हूं कि किसी बड़े शहर में जा कर पढ़ाई करूं ताकि…’ पिता ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘तुम दिल्ली क्यों नहीं चले जाते. मेरे दोस्त का लड़का दिल्ली में पढ़ रहा है. मैं बात करता हूं उस से.’ पिता ने सारी जानकारी जुटाई और मुझ से कहा, ‘असगर अली का बेटा रहमान दिल्ली कालेज में पढ़ रहा है. तुम चले जाओ. सारे काम वह करवा देगा. अभी प्रवेशपरीक्षा चल रही है.’ मैं जाने के लिए एक पैर से तैयार था. जब तक मैं दिल्ली नहीं चला गया, पिता ने कोर्ट जाना बंद कर दिया और बारीक निगाह से अपनी पत्नी और मुझ पर नजर रखने लगे.

मैं दिल्ली आ गया. इस बीच विमाता ने मुझ से कम ही बातचीत की. दिल्ली में तुम्हारा साथ मिला. खामोशियां टूटने लगीं. संदेह के पतझड़ से मुक्ति मिल गई. एक दिन तुम्हारे साथ पिक्चर देख कर होस्टल वापस लौटा तो विमाता का फोन आया. उन्होंने रोते हुए कहा, ‘एक तुम्हीं सहारा थे, तुम से बात कर के मन हलका हो जाता था, किंतु मेरी इतनी खुशी भी किसी से देखी नहीं गई. मैं तो घुटघुट कर जी रही हूं. काश कि आप ने अपने पिता का विरोध करने की हिम्मत की होती. काश कि तुम लौट आते. काश कि तुम मुझे अपने पास बुला सकते. जी करता है कि भाग जाऊं कहीं.’

‘भाग जाऊं’ शब्द पिता के कानों में पड़े जोकि शायद अचानक घर आ गए थे. उन्होंने मोबाइल छीन कर मुझ से बहुत गुस्से में कहा, ‘इतनी दूर जा कर भी ये तमाशा बंद नहीं हो रहा है. लानत है तुम्हारे जैसी नालायक, नीच औलाद पर.’ ‘मैं ने क्या किया? आप मुझ पर क्यों चिल्ला रहे हैं, जो कहना है आप अपनी पत्नी से कहिए,’ गुस्से में उत्तर दिया मैं ने. ‘यदि तुम सच्चे हो तो इस का प्रमाण दो.’ ‘प्रमाण किस बात का, मैं ने किया क्या है?’ ‘तुम्हारे साथ भागने की बात सुन चुका हूं मैं.’ ‘मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया कि मुझे शर्मिंदा होना पड़े. और क्या प्रमाण चाहिए आप को मेरे निर्दोष होने का?’ ‘तुम शादी कर लो. मैं ने एक अच्छे घर की लड़की देखी है. जब तुम विवाहित हो जाओगे तो सारी बात खत्म हो जाएगी, अन्यथा यह सब चलता रहेगा.’ ‘अभी मेरी पढ़ाई चल रही है.’

‘तुम्हें तभी निर्दोष मानूंगा, जब तुम तुरंत दिल्ली छोड़ कर मेरे कहने पर विवाह कर लोगे. यही तुम्हारे शुद्ध चरित्र का और मेरे मन की शांति का इलाज होगा.’ ‘जैसा आप समझ रहे हैं वैसा कुछ नहीं है.’ मेरी बात सुन कर पिता ने कहा, ‘तुम इतने गिरे हुए निकलोगे मैं सोच भी नहीं सकता था. अपने पिता की स्त्री पर ही…’ ‘बस करिए. आप के दिमाग में संदेह बैठ गया है और शक का कोई इलाज नहीं.’ ‘इलाज है. यदि तुम अपने पिता को जीवित देखना चाहते हो तो तुरंत वापस आ कर शादी कर लो. यहां सब तैयार है.’ ‘क्या मेरे शादी करने से आप को मुझ पर विश्वास हो जाएगा?’

‘हां, यह शादी तुम्हारे लिए अग्निपरीक्षा है मेरी दृष्टि में.’ पिता की दृष्टि में स्वयं को निष्कलंक सिद्ध करने के लिए मुझे यह कदम उठाना पड़ा. मैं तुरंत गांव पहुंचा. पिता के चेहरे पर संतुष्टि और निश्ंिचतता के भाव थे. मुझे उन की खुशी देख कर सुकून मिला. उन्होंने मुझ से कहा, ‘तुम सीता की तरह पवित्र हो. मुझे क्षमा करना. मैं ने तुम पर शक किया.’ ग्लानि से उन का चेहरा झुका हुआ था. मेरे विवाह का विमाता ने विरोध किया. उन्होंने अपने पति से कहा, ‘आप अपने शक के हवनकुंड में अपने बेटे की आहुति नहीं चढ़ा सकते. आप को शक मुझ पर या अपने बेटे पर नहीं, अपने बुढ़ापे पर है. क्यों किया आप ने मुझ से विवाह? इस विवाह के कारण आप अपने बेटे के शत्रु बन गए. आप घर के मुखिया हैं, इस का अर्थ यह नहीं कि आप सब पर अन्याय करें.’

पिता ने कहा, ‘तुम्हें इस शादी से एतराज है. इस का क्या मतलब समझूं?’ ‘आप को जो मतलब निकालना हो निकालें. आप ने मेरे चरित्र पर भी कीचड़ उछाला है. मैं आप को माफ नहीं करूंगी. आप यह शादी अपने बेटे के चरित्र की जांच के लिए कर रहे हैं तो मैं इस शादी के खिलाफ हूं.’ ‘यह शादी हो कर रहेगी.’ ‘तो मैं चली मायके.’ ‘शौक से जाओ. मायके में तुम्हें पालने की क्षमता होती तो मेरे मत्थे क्यों मढ़ते.’ विमाता ने गुस्से में मायके का रुख किया.

पिता को लगा, चलो, अच्छा है मुसीबत टली. शादी अच्छे से हो जाएगी. फिर रहेगी कितने दिन मायके में, आज नहीं तो कल आना ही पड़ेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वे नहीं आईं. बाद में पता चला कि वे अपने हमउम्र के किसी गैरजातीय युवक के साथ मुंबई चली गई हैं. गांव में तो अब उन का आना मुमकिन नहीं था. पंचायत ने बैठ कर निर्णय लिया था कि गांव में उन्हें प्रवेश न करने दिया जाए. विमाता ने मेरे प्रति अपनत्व दिखाया. मेरी अग्निपरीक्षा के विरुद्ध आवाज उठाई या उन्हें अपने हमउम्र जीवनसाथी की तलाश थी, कह नहीं सकता.

विमाता के जाने का पिता को कोई खास दुख नहीं हुआ. ऐसा प्रतीत हुआ कि उन के सिर से कोई बोझ उतर गया हो. क्योंकि शायद वे जान चुके थे कि उम्र का इतना अंतराल उन के लिए कभी भी घातक सिद्ध हो सकता था. यह बात वे समझ चुके थे. अब मैं छतरपुर में रह कर पढ़ाई करूंगा अगले वर्ष से. अपना शादीशुदा जीवन चलाने के लिए पिता ने मेरे हिस्से की जमीन बेच कर शहर में एक जनरल स्टोर की दुकान खुलवाने की तैयारी की हुई है.

तुम हमेशा मेरी स्मृति में रहोगी. पुनश्च: मैं कह नहीं सकता कि अपनी हमउम्र विमाता से मुझे प्रेम था, आकर्षण था, सहानुभूति थी, या कुछ और, तुम से यह सब कह कर मेरे मन का बोझ हलका हो गया. तुम्हारा खास दोस्त प्रशांत सिंह.

पत्र बंद किया मैं ने क्योंकि मेरा दिल और दिमाग दोनों भारी हो चुके थे. मेरा खास दोस्त जिस से मैं ने बहुत सी उम्मीदें पाल रखी थीं, पत्र पढ़ कर मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया.

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