Satire : मुझे आप खाली डब्बा समझने की भूल कतई न करें. इस शहर के सब से शानदार शौपिंग मौल ‘महाराजा’ की दुकान ‘ऐलिगैंट सूटसाड़ी शौप’ का मैं डब्बा हूं. इस शौप के मालिक जतिन भाई ने अपनी तरफ से इस दुकान को अत्याधुनिक बनाने में कोई कोरकसर नहीं रख छोड़ी है. वे जानते हैं कि आजकल की पीढ़ी के पसंदीदा परिधान कौन से हैं. इस के लिए बाकायदा वे पत्रपत्रिकाओं के फैशन विशेषांकों से ले कर मुंबईकोलकाता तक के फैशन से संबंधित समाचारों पर नजर रखते हैं. वे भलीभांति जानते हैं कि खाओपीयो, ऐश करो वाली यह पीढ़ी कल की नहीं, आज की चिंता करती है. सो कमाई भले ही हजारों में हो या लाखों में, वह तब तक नहीं रुकती, जब तक जेब खाली न हो जाए.

वैसे जेब की चिंता कौन करता है, जब वौलेट में क्रैडिट कार्ड हो. जब सरकार ही यह कहती हो कि लोन ले कर मौज करो तो समाज का क्या कहना. वैसे भी पुराने जमाने में भी… नाम का कोई साधु हुआ करता था, जो कहता था कि घी पीयो. भले ही इस के लिए लोन लेना क्यों न पड़ जाए. वैसे पुरानी पीढ़ी की सुनता कौन है. वह तो मिलेनियम, जेन जैड, अल्फा के आगे बीटा पीढ़ी की तरफ जा रही है. कल किस ने देखा है जो चिंता की जाए. सो आज को जी भर जी लेना है. कहीं युद्ध हो रहे हैं तो कहीं दंगे चल रहे हैं. ऐसे में प्रेजैंट लिविंग स्टैंडर्ड को क्यों मंदा किया जाए.

मगर फिलहाल इन फालतू बातों की जरूरत नहीं. और आप मु झ डब्बे की मेरी औकात को कतई कमतर न सम झें. मेरे अंदर जो है, उसे लोग बाद में देखते हैं. पहले तो मु झे ही हसरत भरी निगाहों से देखते हैं. मेरी सजधज पर ही यह निर्भर है कि अंदर कितना उम्दा माल हो सकता है. जी हां, पैकिंग पर ही तो सारी मार्केट और शौपिंग टिकी है.

खैर, मु झे इस बात का क्या लेनादेना. सच पूछिए तो मैं तो बस डब्बा भर हूं, जिस में परिधान पैक होते हैं. मैं तो बस यही जानता हूं कि मैं एक ब्रैंडेड दुकान का डब्बा हूं, जहां लोग आंख मूंद कर खरीदारी करने आते हैं और फख्र से कहते हैं कि अमुक शौपिंग मौल से खरीद कर लाया गया है. शौपिंग मौल के मालिक को इस बात पर फख्र है कि वह सिर्फ ऊंचे और भरोसेमंद लोगों को ही अपने यहां की दुकान किराए पर देते हैं.

लोग भी भरोसा करते हैं कि फलां शौपिंग मौल में तो सारा कुछ ब्रैंडेड ही है, तो माल उम्दा और चोखा ही होगा. हालांकि लोग यह भी जानते हैं कि ‘फैशन के इस दौर में टिकाउपन की क्या गारंटी’ और इसी का फायदा बिजनैसमैन को मिलता है.

बल्कि इस के आगे एक कदम और कि पैकिंग जरा बढि़या से हो तो अंदर लोग  झांकते भी नहीं कि माल कैसा है. सो इसलिए मु झे सिर्फ निरा डब्बा भर मत सम िझए. मेरे पीछे मालिक ने कितना श्रम किया है. 3 सौ जीएसएम वाले हार्ड बोर्ड गत्ते का चुनाव किया गया. फिर उस पर  ग्लौसी पेपर पर खास डिजाइन किए गए सिने तारिकाओं की सी अर्धनिरावृत्त तसवीरें सजाई गईं और सतरंगी आभा लिए अक्षरों में दुकान का नाम प्रिंट कराया गया. वैसे इन प्रिंटेड सिनेतारिकाओं को देख पता भी नहीं लगता कि वे सूटसाड़ी का विज्ञापन कर रही हैं कि सैंडलों का.

कुछ यही हाल उन के इमिटेशन से ले कर औरिजिनल ज्वैलरी का है, जिसे वे इनडाइरैक्ट विज्ञापित करती हैं. पता ही नहीं चलता कि असली क्या है और नकली क्या है बल्कि यों कहें कि नकली ही असली पर भारी पड़ जाता है. जो भी हो, विस्तृत जानकारी में न जा कर यही जान लें कि मेरे अंदर एक अदद सूट है.

सूरत से ये सूटसाडि़यां गट्ठरों में बेदर्दी से बांध कर यहां आती हैं और यहां इस शहर में मु झ जैसे खूबसूरत डब्बों में इन्हें पूरे प्यार के साथ रखासजाया जाता है. पतले रैपिंग पेपर से लिपट, मु झ में बैठ सजी इतराते हैं सूट और साडि़यां. जब डब्बे से ये निकलते हैं तो महिलाओं के दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं. मगर उन की उत्सुकता और जिज्ञासा के क्या कहने. वे डब्बे पर डब्बे खुलवाती जाती हैं और सेल्समैन पूरा धैर्य धारण कर उन के आगे सूट अथवा साडि़यों का अंबार लगा देता है. बमुश्किल कोई सूट या साड़ी पसंद आती है उन्हें तो मु झ जैसे खूबसूरत डब्बों में उन हसीना सूटसाडि़यों को बंद किया जाता है.

मगर ठहरिए, अभी यहीं बस नहीं है. उन्हें एक अदद थैला भी चाहिए. आप लाख पर्यावरण का रोनाधोना कीजिए, बाजार उस की चिंता क्यों करे. जब आप ही पर्यावरण प्रदूषण में अपना अंशदान दे रहे हों तो दोषी तो आप ही हुए. सो प्लास्टिक का एक और थैला बाहर निकलता है, जिस में मु झ डब्बे को भरा जाता है.

छोडि़ए इस कथा संसार को. बात तो मु झे अपनी यात्रा की करनी है न. तो हुआ यह कि महाराजा शौपिंग मौल के सेठ जतिनजी को अचानक इलहाम हुआ कि होली के इस मौसमी मौके पर समधियाने में साड़ी भेजनी चाहिए. उन की बेटी इसी साल ब्याही गई है. सास नामक खतरे से वे भलीभांति वाकिफ हैं. सो वे अपने खास दोस्त अमित के साड़ी शौपिंग सैंटर पर आ गए. उस समय वे नहीं थे और उन का छोरा छगन दुकान पर बैठा हुआ था. उस ने बी टैक की डिगरी ले रखी थी और बैंगलुरु में कहीं नौकरी करता था.

पता नहीं कैसी नौकरी करता था कि हमेशा उस के हाथ तंग रहते थे. बाद में  झख मार कर अमित बोले कि जितना तू वहां कमा पाता है, उस से दूना मैं दूंगा. सो इस दुकान में बैठ. और वह भी जैसे मौके की तलाश में था. बैंगलुरु में उस की जो आय थी, उस से अधिक तो वहां के डिलिवरी बौय और रैपिडो वाले कमा लेते थे. फट से उस ने हां की और दुकान संभाल ली. अब अमित दोपहर में घर पर चैन की नींद सोते हैं. और इसी समय वह यहां आए थे. छगनमल उन्हें देखते ही उठ खड़ा हुआ.

जतिनजी पुरुष थे, महिला नहीं, सो उन्होंने ज्यादा साडि़यां नहीं खुलवाईं. वैसे वह कोई दुर्योधन भी तो नहीं थे जो उन्हें साड़ी उतरवाने में रुचि रहती. 8-10 डब्बे खुलवाए और उन्हीं में से 8 हजार की एक खास लाल साड़ी छांट कर मु झ डब्बे में अपनी देखरेख में पैक कराया. फिर घर आ कर अपनी पत्नी शिवानीजी को हिदायत की कि ससम्मान समधियाने में उसे भिजवाया जाए.

शिवानीजी ने डब्बा खोल कर साड़ी देखी तो उन के मुख से सहज ही ‘हाय?’ निकल गया. ऐसी बढि़या साड़ी और वह घुन्नी, खूसट समधिन पहनेगी, तो कैसा लगेगा, यह साड़ी तो उन के पहनने योग्य है. लेकिन जतिनजी के कड़क स्वभाव को वह जानती थी. यह भी कि वह कुछ रंगीनमिजाज भी हैं. सो बिना कुछ चूंचपड़ किए उस साड़ी को अपने नौकर के हाथों भिजवा दिया.

समधिन शुभांगीजी ने उस साड़ी को देखा तो वे जतिनजी पर सौसौ जान निछावर होने को सोचने लगीं. मगर उन के पति समीरजी ने उसे सजैस्ट किया कि हमें भी तो अपनी बेटी के समधियाने का खयाल रखना चाहिए. सो यह साड़ी इसी प्रकार अपनी बेटी के सास को भेंट की जानी चाहिए.

समीर कुछ अलग ही मिट्टी के बने थे. वे जो बोल दें, वह घर में ब्रमवाक्य है अन्यथा वे अगियाबैताल बन जाएंगे, शुभांगीजी यह जानती हैं. सो उन्होंने भी हामी भर दी. सो हम डब्बे को उसी तरह बैरंग अपनी बेटी सीमा की ससुराल को रवाना कर दिया.

रीनाजी ने पहले काफी हसरत से मु झे खोल कर साड़ी को देखा. पता नहीं उन्हें यह साड़ी पसंद आई या नहीं, मगर खूब खुश तो हुईं ही. आखिर साड़ी पा कर कौन महिला खुश नहीं होगी. मगर उन के पति ने जोर दे कर कहा कि यह साड़ी तो उन की बहू के लिए मायके से भेजी गई है तो उन्होंने बुरा सा मुंह बनाया. इस समय उन के पति का कारोबार चरम पर था. इसलिए उन के भी हाथ खुले थे. इसी कारण वे खुले हाथ दानपुण्य भी खूब किया करती थीं. तत्काल उन की यही प्रतिक्रिया रही, ‘‘ऐसी खराब साड़ी, ऐसी साड़ी तो हमारे यहां की कामवाली बांधती है.’’ फिर अपनी बहू से कहा, ‘‘रहने दो इसे. मैं तुम्हें इस से बढि़या साड़ी आज ही दिलवाऊंगी. तुम यह साड़ी किसी और को दे देना.’’

सीमा किसी भी सूरत में अपनी सास को नाराज नहीं करना चाहती थी. वैसे भी उस की सास बड़ी उदार थीं. जाहिर सी बात है ससुराल जब मायके से ज्यादा मजबूत हो तो वही भाएगा. पुराने जमाने की और बात थी, जब लड़कियां मायके से ससुराल जाते भरभर आंखमुंह बना कर रोती थीं. संयोग की बात उस के पति के एक दोस्त अपनी पत्नी के साथ उन से मिलने उन के घर पहली बार आए हो. उस ने पति से सलाह कर वह साड़ी स्वीटी को दे दी.

स्वीटी के हसबैंड नीरज ने साड़ी को देख मुंह बनाया और कहा, ‘‘पहले ही तुम्हारे पास इतनी सारी साडि़यां हैं, जिन्हें तुम पहनती तो हो नहीं. तुम्हें तो सूट पहनना ही ज्यादा अच्छा लगता है. सो तुम इस का क्या करोगी. हमारी फैक्टरी का एक स्टाफ है अजय. उस की भी अभी हाल ही में शादी हुई है. तुम ऐसा करो कि उसी की पत्नी को यह भेंट कर दो. लंबे समय तक हम ने अजय को कुछ नहीं दिया है. होली के अवसर पर जब उस की पत्नी इसे पहनेगी तो वह बहुत खुश होगा. स्वीटी ने बिना कुछ नानुकुर किए वह साड़ी नीरज के मुंहलगे स्टाफ अजय के सुपुर्द कर दी.

अजय पहले मु झ डब्बे को अपने घर ले गया. फिर अपनी पत्नी सुनीता से बोला, ‘‘महंगी साड़ी है. तुम इसे कब पहनोगी? हां, तुम्हारी बहन विनिता ब्यूटीपार्लर में नौकरी करती है तो वह पहन कर कभीकभार ब्यूटीपार्लर आयाजाया करेगी तो अच्छा लगेगा.’’

अगर बहन की बात न होती तो सुनीता उसे दम भर खरीखोटी सुनाती. इस अजय

का क्या ठिकाना कि मन में क्या चल रहा हो, इसलिए उस ने दोपहर में ही छोटी बहन विनिता को बुला कर उसे मु झ डब्बे को, नहींनहीं मु झ में रखी साड़ी के साथ सौंप दिया.

विनिता तो सौसौ जान से निछावर हो गई, अपने जीजू पर. कितना खयाल रखते हैं उस के जीजू, उस ने लाललाल साड़ी देखी. ओह, यह तो पुराने जमाने के लोगों की चीजें हैं. मगर इतनी महंगी साड़ी है तो अच्छा ही होगा. आजकल का जमाना ही ऐसा हुआ ठहरा. अब चीजें ऐसे नहीं देखी जाती हैं कि वे कितनी अच्छीबुरी हैं. देखने का नजरिया ऐसा कि जो महंगा, वह अच्छा है और जो सस्ता है, उसे खराब ही होना है. थोड़े नए स्टाइल से बांधेगी साड़ी, तो यह साड़ी भी बिजली बन गिर सकती है किसी पर.

अब इतनी महंगी साड़ी है तो उस के मैचिंग कलर की ब्लाउज भी तो होना चाहिए और इस के लिए महाराजा मौल से उत्तम शौपिंग सैंटर और क्या हो सकता था. सो वह सीधे वहां पहुंच गई.

संयोगवश उसी समय काउंटर पर जतिनजी मौजूद थे. वे मु झ डब्बे को देख कर चौंके. अरे, यह डब्बा यहां कैसे? चूंकि वे इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें फुरसत नहीं थी ऐसे छोटेमोटे मामले देखने की. मगर फिर भी अपनी खास चीज को पहचानने में वे चूक नहीं करते. आखिर इतने बड़े महाराजा शौपिंग कौंप्लैक्स को ऐसे नहीं चला रहे, जिस में सवा सौ लोग अपनी सेवाएं देते हैं.

किंतु यह कोई जरूरी तो नहीं कि उन्होंने जो डब्बा और उस में पैक कर के साड़ी भिजवाई थी, वह यही हो. ऐसे हजारों डब्बे और साडि़यों यहां से निकलती हैं. मगर जतिनजी ने मु झ डब्बे के एक कोने में छोटा सा स्टिकर लगा रखा था, जिस में उन्होंने अपने हाथ से ‘विद बैस्ट विसेज’ लिखा था. वह अपनी जगह पर मौजूद था. ओह, तो यह वही डब्बा है और वही साड़ी है जो उन के टार्गेट तक नहीं पहुंची और अभी यह एक सेल्स गर्ल्स के हाथ में है.

वे मेरे यात्रा वृतांत को जानना चाहते थे. वे अपनी पत्नी से सवालजवाब करना चाहते थे.

उन्हें यकीन हो चुका था कि उन्होंने इतने प्यार से जिसे वह गिफ्ट भेजी थी, वह तो उस तक पहुंचा ही नहीं. फिर उस का फोन कैसे आता, जिस के लिए वह विगत एक सप्ताह से तरस रहे थे. पोल खुलने का डर तो उन्हें भी था. सो उन्होंने पूछताछ के बजाय चुप रहने में ही भलाई सम झी. इस समय वे जैसे हाथ मलते उस साड़ी की मैचिंग करते ब्लाउज पीस को छांटती उस लड़की को देख रहे थे, जिस के हाथ में वह सुंदर साड़ी थी. डब्बा जैसे उन्हें मुंह चिढ़ा रहा हो, उन का उपहास कर रहा हो उन की बेबसी का, यह उन्हें लग रहा था. उन्हें क्या पता कि यह डब्बा कितनी और कैसी यात्रा कर चुका.

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