Satire: हमारे समय में लोकतंत्र को सब से बड़ा खतरा विपक्ष से नहीं, नैपो बेबीज से है. ये ऐसे पौधे हैं जिन की खाद भ्रष्टाचार का पैसा और धूप सत्ता की ताकत है. नेपाल का हालिया आंदोलन इस बात का सुबूत है कि जनता अब इंस्टारील्स के तख्तापलट को भी गंभीरता से लेने लगी है. सोचिए, एक तरफ आम नेपाली युवा बेरोजगारी, महंगाई और भविष्य की चिंता में धंसे हुए हैं और दूसरी तरफ नैपो बेबीज महंगी कारों की चाबियां झनझनाते, लंदन, न्यूयौर्क के स्कूलों की पढ़ाई का बखान करते, इंस्टाग्राम पर अपने बाप की दौलत का तमाशा दिखाते फिरते हैं.
यही विरोधाभास अंतत: फट पड़ा. नेपाल में लोग सड़कों पर उतर आए न नारों के लिए, न किसी वैचारिक एजेंडे के लिए बल्कि नैपो बेबीज की ऐयाशी की रील्स देख कर. आम जनता ने पहली बार समझ कि डिजिटल क्रांति का मतलब क्या होता है जब जनता का गुस्सा व्यूज बन कर सरकार को गिरा दे. ये नैपो बेबी कौन हैं? ये वे लोग हैं जिन की डिक्शनरी में ‘मेहनत’ शब्द नहीं है. इन की डिगरियां विदेश से हैं पर अक्ल जमीनी स्तर पर शून्य.
इन की लाइफ में सब से बड़ा काम है कार के बोनट पर बैठ कर रील बनाना, पार्टी करना, महंगी शराब उड़ाना, रोड रेज करना और फिर बाप के ओहदे से छूट जाना. आम युवा नौकरी ढूंढ़ें, ये ‘नया क्लब’ ढूंढ़ते हैं. गाड़ी चलाना इन्हें स्पोर्ट्स समझ में आता है, कानून नहीं. जब ये अपनी मसिडीज में गले में हाथ डाले लिपटी गर्लफ्रैंड के साथ स्पीडिंग करते हैं तो महाकाल भी घबराहट में फुटपाथियों के ऊपर मंडराने लगते हैं. बाप भ्रष्टाचार करे, बेटा डिस्को में नोट उछाले. बाप संसद में हंगामा करे बेटा पब में. मेहनत सिर्फ जिम में, वह भी फोटो क्लिक कराने की. इन के लिए राजनीति कैरियर नहीं, वसीयत है. इन के संघर्ष की कहानियां व इंस्टाग्राम फिल्टर दोनों नकली हैं. पापा की फोन बुक इन का टेलैंट है.
यदि पूछो बड़ा हो कर बेटा क्या बनेगा तो बताएंगे बेटा पहले से ही बनाबनाया है. एक आम नौजवान की जिंदगी हर महीने की किस्त और रोजगार के संघर्ष में बीत रही है, जबकि नैपो बेबी की जिंदगी में किस्त सिर्फ गडि़यों की ईएमआई की होती है. उसे भी पापा भरते हैं. जब ये रील्स वायरल हुईं. जहां महंगी कारें, डौलर के बंडल और स्विमिंगपूल में शैंपेन तैर रही थी तो जनता ने पूछा, ‘‘ये पैसे कहां से आए?’’ उत्तर सरल था. हमारे टैक्स और इन के बाप की लूट से. यही सवाल ज्वालामुखी बन गया. नेपाल की सड़कों पर वही नौजवान उतरे, जिन के लिए कल तक डाटा पैक भी महंगा था. आज वे पूछ रहे थे, ‘‘हमें बेरोजगारी और इन्हें बाप की विरासत में ऐयाशी क्यों?’’ पापा की फोन बुक इन का टेलैंट है.
ये क्विक कौमर्स हैं राजनीति के. नैपो बेबी का असली गुण यही है कि ये न तो खुद के दम पर पासपोर्ट बनवा सकते हैं, न लाइसैंस, न नौकरी. सभी चीजें बाप की मुहर से आती हैं. वे बारबार जनता को भरोसा दिलाने की कोशिश करते हैं कि न पापा के दम पर न उन की मनी के दम पर बल्कि हनी अपने टेलैंट के दम पर मुकाम बना रहे हैं. नेपाल में सरकार गिरी, पर गिराने वाला नारा गरीबी, बेरोजगारी दूर करो, महंगाई कम करो नहीं था. चिनगारी का कार्य किया.
नैपो बेबी की रील्स और बवाल बढ़ने पर सोशल मीडिया पर रातोंरात ठोकी प्रतिबंध की कील्स ने. युवाओं ने देखा कि हमें रोजगार, रोटी के लाले और ये रोज नई लग्जरी कार निकालें तो तख्त हिलना तय था. नैपो बेबीज की नस्ल वैश्विक है. घाटी का देख लो, नेताओं की औलादें विदेशों में पढ़ रही हैं और स्थानीय युवाओं को नफरत और नारे थमा रहे हैं. दरअसल, नैपो बेबी लोकतंत्र को अपने पापा की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी मानते हैं. मगर एक दिन जनता का गुस्सा आता है और फिर नैपो बेबी की पूरी पीढ़ी सत्ता से उखड़ नप जाती है. हद पार की तो पलक झपकते सत्ता के पार लगा दिए जाओगे. नेपाल ने यह कर दिखाया. अब नैपो बेबी समझ लें. रील्स सिर्फ व्यूज नहीं लातीं, कभीकभी क्रांति भी ले आती हैं. बिगड़ैल औलाद की रील्स बाप की पौलिटिकल ओबीच्यूरी बन जाती हैं.
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