Love Story: मेरे जीवन में उस का प्रवेश बरखा की शीतल फुहारों समान हुआ था जो बारिश से धुले आसमान में सतरंगी इंद्रधनुषीय छटा की भांति कुछ देर दृष्टिगोचर हो विलीन हो गया. मैं उस के मिलन और विछोह का अर्थ भी न समझ सका कि वह बिजली की भांति मेरे जीवन को कुछ क्षण चमका कर ओझल हो गई. मेरे बालपन की 11-12 वर्ष की उम्र में उस का आगमन हुआ था. मैं एक सरकारी स्कूल में कक्षा 6 का छात्र था.

उसी स्कूल में मेरी ही कक्षा में एक नई लड़की ने दाखिला लिया. उस के कक्षा में प्रवेश करते ही सभी बच्चों की निगाहें उसे देखने के लिए उठीं, मैं भी उधर ही देखने के लिए घूमा. सांवली सी साधारण नैननक्श की होते हुए भी वह अन्य लड़कियों से अलग थी. उस की नीली आंखों में अजीब सा आकर्षण था जो मेरे जीवन में हलचल मचाने के लिए काफ़ी था. उसे रोज निहारते रहना मुझे अच्छा लगने लगा. वह अन्य लड़कियों के साथ अलग बैंच पर बैठती थी. मैं उसे दूर से ही निहारता रहता.

वह भी मुझे वहीं से बैठीबैठी देखा करती. हम दोनों में कभी कोई बात नहीं हुई, बस एकदूसरे को देखना अच्छा लगता था तो देखते रहते. उस का नाम आभा है यह मुझे स्कूल की हाजिरी लेते वक्त मास्टरजी के पुकारने से ज्ञात हुआ. शायद ऐसे ही मेरा नाम भी उसे पता लग गया होगा. 70 वर्ष पूर्व के बच्चे प्रेम क्या होता है जानते भी नहीं थे. हम दोनों अबोध, अबोले मासूमियत से भरे आंखों ही आंखों से एकदूसरे को निहारते रहते. खेल के मैदान में पहुंचता तो वह भी आ जाती और दूर से खड़ीखड़ी मुझे ताकती रहती. वह झला झलती तो मैं उसे देखता रहता. हम दोनों ने कभी एकदूसरे से बात नहीं की न कक्षा में न कक्षा के बाहर. बस हमें एकदूसरे को देखते रहने में खुशी महसूस होती थी. वार्षिक परीक्षा का परिणाम आने के बाद अचानक एक दिन वह अपने नाम के अनुरूप अपनी आभा बिखेर आकाश की बिजली की भांति चमक कर चली गई. मेरा मन कुछ दिनों तक उदास रहा. समय के साथ उस की यादें कम होती गईं.

मैं अपनी उच्च शिक्षा ग्रहण करने में व्यस्त हो गया परंतु उसे भूल नहीं पाया. जड़ें कहीं दिल की गहराई में पैठी हुई थीं. युवावस्था में पहुंच मैं ने उस के प्रति अपने लगाव के बारे में सोचा और इस गुत्थी को सुलझने की कोशिश की. जितना सुलझया उस से ज्यादा उलझ. मन ने सोचा कहीं मैं उस से प्यार तो नहीं करने लगा. मेरा बालमन तुरंत बोला कि बच्चू प्यार जानते हो क्या होता है? मैं ने कहा कि उस समय तो नहीं जानता था पर अब कुछ कुछ जान गया हूं. स्कूल के दिनों में उसे देखे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता था. वह भी तो दूर से मुझे ताकती रहती थी. जब मैं खेल के मैदान में पहुंचता वह भी तुरंत आ जाती. बता यह प्यार नहीं तो क्या था? हम एकदूसरे को निहार वापस अपनी कक्षा में आ जाते. यों ही मन ही मन मैं अपने आप को भुलावे में रख कर उस की उन्हीं भावनाओं को प्यार का रूप देने की हिमाकत करता या वास्तव में प्यार करता था दोनों का अंतर नहीं समझ सका.

एक लंबे अंतराल के बाद मैं उच्च शिक्षा ग्रहण कर अपने ही शहर के एक कालेज में लैक्चरर के पद पर नियुक्त हो गया. मेरी नौकरी लगने से मेरे मातापिता बहुत खुश हुए. अब उन की एक ही इच्छा शेष थी वह थी मेरी शादी. वे जल्द से जल्द मेरी शादी कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे. शादी करने का अभी मेरा इरादा नहीं था. दिल के किसी कोने से उस का खयाल उभरता, मन उड़ान भरने लगता. कभी सोचता बड़ी हो गई होगी, कैसी दिखती होगी, मेरी याद भी होगी या नहीं. कहां होगी, क्या किया है उस ने, कभी मुझे मिली तो क्या हम दोनों एकदूसरे को पहचान भी पाएंगे? हो सकता है कि शादी हो गई हो बच्चे भी हों.

यह सब सोचतेसोचते दिमाग का दही बनने लगता. थकहार कर अपनी किताबें उठा अगले लैक्चर की तैयारी करने की कोशिश करता. वह भी नहीं होता तो थकहार कर सो जाता. दिनों का काम ही गुजरना है, गुजरते जाते हैं किसी के दिन गम में तो किसी के खुशी में और किसी के दिन पुरानी यादों में. पुरानी यादें… कितनी सुहानी, कितनी मीठी. बचपन की हैं तो सोने में सुहागा. क्या भूलूं क्या याद करूं बैठा हुआ सोच रहा था कि दरवाजे की कुंडी खटकी. विचारों में खलल पड़ने पर झल्लाहट में उठ दरवाजा खोला, सामने अपने बचपन के यार राम प्रकाश को देख सारी झल्लाहट हवा हो गई.

वह मेरी उतरी शक्ल देख पूछ बैठा, ‘‘क्या बात है जो इतना परेशान नजर आ रहा है?’’ मैं ने कहा, ‘‘तू पहले अंदर तो आ. चौखट पर खड़ा हो कर बातें करेगा क्या?’’ मैं उस के साथ अपने कमरे में आया. कमरे में बैठ उस की तरफ मुखातिब होते हुए बोला, ‘‘मेरी बात छोड़ अपनी सुना. डाक्टर बन गया है, अपने मरीजों को ढंग से देखता है कि नहीं? कैसी प्रैक्टिस चल रही है? कहां पर है आजकल? शादी कर ली क्या?’’ रामप्रकाश इतने सवाल सुन झल्ला गया. मेरी पीठ पर धौल जमाते हुए कहने लगा, ‘‘इतने दिनों बाद आया हूं कुछ चायपानी तो पिलाया नहीं ऊपर से सवाल पर सवाल दाग रहा है. तेरी आदत अभी तक गई नहीं. चल पहले पानी पिला गला सूख रहा है.’’ मैं रामप्रकाश के लिए पानी ले कर आया. पानी पीने के बाद गिलास टेबल पर रख आराम से पैर पसार कर सोफे पर बैठ गया.

यह उस की पुरानी आदत थी. राम की आवाज सुन मां चाय बनाने चली गईं. मां जानती थीं कि थोड़ी देर बाद ही वह उन के पास चाय की फरमाइश करने आ जाएगा. दरअसल, राम को मां के हाथों की बनी चाय बहुत पसंद थी. मां को भी उस की हर पसंदनापसंद पता थी. बचपन से घर में आताजाता रहा था. राम मां से चाय के लिए कहने ही वाला था कि मां चाय ले कर आ गईं. साथ में ढेर सारा नमकीन भी. राम ने मां के पैर छुए हम दोनों चाय पीते हुए एकदूसरे से चुहलबाजी कर देर तक ढेरों बातें करते रहे. वह अचानक ही बोला, ‘‘तुझे याद है अपने साथ आभा नाम की एक लड़की पढ़ती थी जो तुझे घूरती रहती थी, पता है वह डाक्टर बन गई है?’’ आभा नाम सुन सोते से जागा. उसे झिंझड़ते हुए बोला, ‘‘क्या बात कर रहा है, तुझे पक्का यकीन है कि वह वही थी?’’ रामप्रकाश ने बताया कि वह एक सेमिनार में गया था वहीं उस से मुलाकात हुई थी.

मैं ने उसे नहीं पहचाना मेरा नाम सुन कर वह स्वयं ही मेरे पास आई और पूछने लगी कि ‘‘क्या आप फलांफलां शहर से आए हैं?’’ मेरे हां कहने पर बोली कि मेरी याद है मैं आभा आप के साथ उसी शहर के सरकारी स्कूल में पढ़ती थी. मुझे सब याद आ गया. मैं ने कहा, ‘‘हां याद आया आप 1 साल तक हमारे साथ उसी स्कूल में पढ़ी हैं.’’ ‘‘आभा ने तेरा नाम लेकर पूछा कि क्या आप उन्हें जानते हैं? वे भी हमारे साथ पढ़ते थे?’’ ‘‘उस के मुख से तेरा नाम सुन जोर से हंसते हुए मैं ने कहा कि वह तो मेरा लंगोटिया यार है. उसी शहर में एक कालेज में लैक्चरर बन गया है. बच्चों को ज्ञान बांटता रहता है.’’ ‘‘आभा के चेहरे पर अनेक भाव आ और जा रहे थे. खुशी उस के चेहरे से टपक रही थी. चहकते हुए बोली कि आप जब भी वहां जाएं मेरे बारे में उन्हें जरूर बताइएगा और कहिएगा कि मैं अभी तक उन्हें भूली नहीं हूं. आभा ने अपने शहर और होस्टल का पता बताया साथ में तेरा पता पूछ मुसकराती, गुनगुनाती चली गई.’’ रामप्रकाश से आभा की बातें सुन कर हक्काबक्का सा हो मैं उस का मुंह ताकने लगा.

रामप्रकाश कहने लगा, ‘‘क्या तू भी उसे भूला नहीं है? वह वहां मुसकरा रही है यहां तू पगलाया दिख रहा है,’’ यह कहते हुए उस ने आभा के हास्टल का पता बताया और हंसता हुआ अपने घर चला गया. मेरा मन जैसे अपना होश ही खो बैठा. जीवन में अनेक वसंत एकसाथ खिल उठे. पोस्ट औफिस से ढेर सारे लिफाफे और टिकट ले कर आया और उसे पत्र लिखने बैठा. किस नाम से संबोधित करूं, क्या डाक्टर नाम से या आभा नाम से. उन दिनों में वह मेरी दोस्त भी नहीं थी, कौन थी वह मेरी कि मैं उस के बारे में सुन कर बेचैन हो रहा था. आखिर मैं ने ‘आभा’ नाम से ही संबोधित करते हुए 2 लाइन का पत्र लिख डाक में डाल दिया.

आभा को भी कहां चैन था. उस ने रामप्रकाश से मिलने के बाद ही मुझे 2 लाइन का पत्र डाल दिया था कि मैं आप का इंतजार कर रही हूं, कब आएंगे? मेरे पंख परवाज मिलते ही उड़ने को बेताब हो उठे. तुरंत पत्र लिख डाक में डाल दिया कि फलां ट्रेन से आ रहा हूं तुम स्टेशन पर मिलना. ट्रेन की रातभर की यात्रा बड़ी लंबी लग रही थी, समय ही नहीं कट रहा था. नींद कोसों दूर, मन उमंग में उड़ान भर झम और घूम रहा था. साथ में यह जिज्ञासा भी थी कि हम एकदूसरे को कैसे पहचानेंगे, बातचीत की पहल कौन करेगा यदि नहीं आई तो? जैसेतैसे रात कटी, सवेरा होते ही ट्रेन अपने गंतव्य पर पहुंच गई. मैं ट्रेन से उतर वेटिंगरूम में पहुंच कर तरोताजा हो बाहर आया.

स्टेशन के दरवाजे के पास पहुंच मेरी निगाहें उसे खोजने लगीं. वह भी मुझे खोज रही थी. भीड़ छंटते ही उस ने अचानक मेरे सामने आ कर मुझ से पूछा, ‘‘क्या आप रामप्रकाश के मित्र हैं?’’ ‘‘मैं ने कहा हां.’’ अपना परिचय देते हुए बोली, ‘‘मैं आभा.’’ मेरे मुंह से बोल ही नहीं निकले, भौचक सा खड़ा हुआ कभी उसे देखता कभी अपने को. कुछ पल मौन रह. पहल करते हुए आभा ने कहा, ‘‘यहीं खड़े रहने का विचार है क्या?’’ मेरी तंद्रा टूटी. मैं ने कहा, ‘‘मैं कहीं खो गया था.’’ वह पूछ बैठी, ‘‘कहां?’’ मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारी नीली आंखों में.’’ आभा के साथ मैं अपने बचपन के दोस्त के घर पहुंचा, आभा का परिचय कराया, चायनाश्ता कर हम दोनों घूमने निकल गए. आभा के साथ उस के होस्टल गया.

वह एमबीबीएस करने के बाद पीजी की परीक्षा की तैयारी कर रही थी. उस ने मुझे पूरा मैडिकल कालेज घुमाया. दोपहर का भोजन हम ने वहीं कैंटीन में किया. शाम तक वहीं बैठ कर अपने बचपन और बीते दिनों की बातें एकदूसरे को सुना हंसतेहंसाते रहे. बचपन की जिस बात को हम बचपना समझ रहे थे वह वास्तव में प्यार का अंकुर था जो अब फूट रहा था. 3-4 दिन यों ही बीत गए, सुबह का निकला मैं रात को अपने दोस्त के घर पहुंचता. भाभीजी खिलखिला कर कहतीं, ‘‘वाह देवरजी क्या ऊंचा हाथ मारा है अब बस बरात की तैयारी कर लो.’’ मैं ने उन से कहा, ‘‘माताजी को तो आप ही राजी करोगी, शादी की तैयारी भी आप को ही करनी है.’’ पत्र लिखते रहने का वादा कर मैं आभा से विदा ले वापस आ गया. हमारे संपर्क का माध्यम अब पत्र थे.

हफ्ते में 1-2 पत्र उस के आते और प्रत्युत्तर में मेरे भी उतने ही पहुंच जाते. दुनिया गोल है यह अब पता लगा, अबोध, अबोले बच्चों के एकदूसरे के प्रति आकर्षण ने दोनों को यौवनकाल में मिला दिया. वक्त का चक्र कब किस का समय बदल दे कोई नहीं जानता. महीने 2 महीने में मैं आभा से मिलने चला जाता. 2-3 दिन वहां रुकता एकदूसरे से दिल की बातें कर नई उमंगों से सराबोर हो वापस आता. कभीकभी मैं उस से शादी के बाद आगे के भविष्य की बातें करने लगता कि वह कहां रहेगी, किसी हौस्पिटल में काम करेगी या अपना क्लीनिक खोल प्राइवेट प्रैक्टिस करेगी. वह हंस कर टाल देती कहती, ‘‘शादी की जल्दी क्या है समय आने पर हो जाएगी.’’ मेरी माताजी भी मुझ पर शादी करने का दबाव डाल रही थीं, वे जल्द से जल्द अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती थीं.

मैं उन्हें यह कह कर टाल देता कि अभी शादी की जल्दी क्या है? मैं ने आभा के बारे में उन्हें कुछ नहीं बताया था, पर मुझे यकीन था कि वे मेरी इच्छा जरूर पूरी करेंगी. मैं ने सोचा कि शादी के बारे में पहले आभा से सब बातें तय कर लूं फिर उन्हें बताऊंगा. इधर हम दोनों का प्यार परवान चढ़ रहा था उधर तकदीर अपनी तदबीर से जीवन की शतरंज की गोटी बिछा रही थी. भविष्य की अनहोनी से अनजान मैं अपने नए जीवन के तानेबाने बुन रहा था. वसंत का मदहोश महीना विरह की आग लगाने लगा, रातभर करवट बदलते बीत जाती. मन ने कुछ निर्णय लिया और मैं रात की ट्रेन से आभा से मिलने चल दिया.

अचानक मुझे आया देख वह चौंक गई, मेरी ओर देख अपनी आंखों का जादू बिखेरते हुए बोली, ‘‘सब ठीक तो है न?’’ हंसते हुए मैं बोला, ‘‘मदमाते इस वसंती मौसम में सब ठीक कैसे हो सकता है तुम्हारी याद सताती है? अब हमें शादी कर लेनी चाहिए. मेरी माताजी भी मेरी शादी का इंतजार कर रही हैं.’’ आभा ने कहा, ‘‘अभीअभी तो आए हो 1-2 दिन बाद इस बारे में बात करेंगे अभी कौफी पीने चलते हैं थकान दूर कर लो,’’ आभा को कौफी बहुत पसंद थी. 2-3 दिन ऐसे ही इधरउधर घूमने में निकल गये. मेरा मन घबरा रहा था कुछ अनहोनी का आभास भी हो रहा था. मैं रात की ट्रेन से वापसी का टिकट बुक करा चुका था.आभा और मैं एक पार्क में बैठे हुए वसंती मौसम का आनंद ले रहे थे.

तभी मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम्हारा शादी का क्या इरादा है? मुझे आज वापस भी जाना है, मैं चाहता हूं कि इस बार माताजी को यह खुशखबरी दे ही दूं.’’ आभा यह सुन कर बोली, ‘‘अपने मातापिता को इस संबंध में बताने से पहले मैं तुम्हें अपने बारे में कुछ बताना चाहती हूं.’’ मैं आश्चर्य से उस की ओर देख कुछ सोचने लगा. कुछ क्षण मौन रहने के बाद आभा ने कहा, ‘‘तुम अपने मातापिता के इकलौते बेटे हो और उन की इच्छा होगी कि उन के खानदान की वंश बेल आगे बढ़ती रहे…’’ आभा की बात बीच में ही काटते हुए मैं ने कहा, ‘‘भला यह भी कोई कहने की बात है हर किसी की यही इच्छा होती है.’’ वह मेरे मुंह पर हाथ रख कहने लगी, ‘‘शांत मन हो ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनो, दिल से नहीं दिमाग से सोच कर जवाब देना.’’ बातें करते हुए आभा अपने अतीत में खो गई, उसे वह दिन याद आ रहा था जब वह उस छोटे शहर और अपनी चाहत को छोड़ कर एक नए शहर में जा रही थी. मन ही मन वह काफी दुखी थी. अभी प्यार को समझने की उम्र भी नहीं थी किस को बोले और क्या बोले कि उस का यहां बहुत कुछ छूट रहा है.

आभा को वह पल भी याद आया जब उस के पिताजी मां से कह रहे थे कि अच्छा हुआ कि मेरा तबादला बड़े शहर में हो गया अब हम आभा को किसी बड़े डाक्टर को दिखा सकते हैं. वहां उस का ठीक से इलाज भी हो जाएगा. आभा के पेट में अकसर दर्द उठता रहता था. यहां के इलाज से फायदा नहीं हो रहा था. वह अपनी जिंदगी का एक अमूल्य हिस्सा छोड़ कर मातापिता के साथ बड़े शहर आ गई. उस के मातापिता ने वहां पहुंच कर बड़े हौस्पिटल में उसे दिखाया.

सघन जांच के बाद डाक्टर ने बताया कि उस के गर्भाशय में गांठ है जिस का औपरेशन करना होगा. कुछ क्षण मौन रहने के बाद डाक्टर ने कहा कि एक बात और है औपरेशन के बाद यह मां नहीं बन सकेगी. आप लोग सोचविचार कर जवाब दीजिए तभी हम औपरेशन करेंगे. डाक्टर की बातें सुन मातापिता दुविधा में पड़ गए. वे कुछ निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थे. एक तरफ बेटी का जीवन तो दूसरी तरफउस की बाकी बची जिंदगी. आखिर काफी सोचविचार कर के उन्होंने डाक्टर को औपरेशन करने की अनुमति दे दी. औपरेशन के बाद आभा को उस की मां ने धीरेधीरे सब बातें बता दीं. आभा ने तभी एक निर्णय लिया कि वह बड़ी हो कर डाक्टर ही बनेगी, अपने निर्णय से मातापिता को भी अवगत करा दिया.

अचानक अपने विचारों को झटका दे वर्तमान में वापसी कर उस ने कहना शुरू किया, ‘‘चूंकि मैं एक डाक्टर हूं और जानती हूं कि किसी कारणवश मैं मां नहीं बन सकती, तुम से शादी करूंगी तो तुम्हारे मातापिता की खवाहिश अधूरी रह जाएगी.’’ कुछ क्षण मौन में बीते. अपनी जादुई आंखें मेरी आंखों में डाल कर बोली, ‘‘जरा सोचो, क्या हम दोनों दोस्त बने रहकर ज्यादा खुश रह सकते हैं या पतिपत्नी. निर्णय तुम्हें लेना है.’’ मैं यह सुन अवाक रह गया. मुंह से बोल ही नहीं निकला जबान जैसे तालू से चिपक गई थी. असमंजस की स्थिति से मुझे उबारते हुए बड़े ही प्यार से बोली, ‘‘देखो सोचसमझ कर ही किसी नतीजे पर पहुंचना ठीक होता है् जल्दबाजी अच्छी नहीं होती.’’ अचानक अपने हाथ की घड़ी में समय देखा. मुसकराई और बोली, ‘‘मुझे अपनी नाइट ड्यूटी पर जाना है और तुम्हें स्टेशन, हम फिर मिलेंगे.’’ उसे हौस्पिटल छोड़ता हुआ मैं स्टेशन के लिए रवाना हो गया. लुटापिटा थकाहारा सा स्टेशन पहुंचा. 1 कप चाय पी ट्रेन में बैठ गया. व्यथित मन मझधार में फंस कर चक्कर काट रहा था.

दिल से बीचबीच में आवाज आती काश यह सब झठ होता. कुदरत के खेल निराले हैं. बचपन में मिलना फिर बिछड़ना जवानी में मिलना फिर बिछड़ना क्या यही नियति है? अगर ऐसा ही था तो दोबारा क्यों मिलाया? मेरे पास इन सवालों के जवाब नहीं थे. कभी अपना प्यार याद आता तो कभी बूढ़े मांबाप का चेहरा. सारी रात आंखों में कट गई. सुबह थकाहारा घर पहुंचा, पहुंचते ही सीधे अपने कमरे में जा कर लेट गया. माताजी ने कमरे में आ कर पूछा ‘‘क्या हुआ, तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’ मैं ने कहा, ‘‘बुखार आ गया था अब ठीक हूं.’’ मां तो मां होती हैं. झट तेल ले आईं सिर में मालिश कर कहने लगीं, ‘‘अब ठीक हो जाओगे.’’ मां का आशीर्वाद भरा हाथ सिर पर आते ही मन को शांति मिली.

कुछ देर लेटे रहने के बाद स्वयं को तरोताजा महसूस कर उठ गया. अपने सकुशल पहुंचने का 2 लाइन का पत्र लिख डाक में डाल दिया. मैं हमेशा वापस आने पर आभा को एक लंबी सी चिट्ठी लिख कर डालता था परंतु इस बार सिर्फ चंद लाइनें. क्या सोचेगी वह? अपना निर्णय भी बताना है, क्या करूं क्या न करूं. मेरी नैया मझधार में डोल रही थी. कल चिट्ठी लिखूंगा सोचतेसोचते कितने ही कल निकल गए पर मेरा कल नहीं आना था तो नहीं आया. 8-10 दिन बाद आभा की एक लंबी सी चिट्ठी आई, हैरानपरेशान मन को कुछ चैन आया.

आभा ने मुझे संबोधित करते हुए लिखा था कि उस ने बहुत सोचसमझ कर एक निर्णय लिया है और इसे पूरा करने में मेरा सहयोग चाहती है. उस ने लिखा था कि चूंकि मैं अपने मातापिता की इकलौती संतान हूं और उन की इच्छा पूरी करना मेरा फर्ज है. तुम्हारे मातापिता की अभिलाषा अपने परिवार की वंश बेल को फलीभूत होते हुए देखने की है जिसे मैं पूरा नहीं कर सकती. ‘‘मैं अपने प्यार को यहीं विराम दे रही हूं. जो प्यार रूह से किया जाता है वही वास्तव में प्यार होता है, प्यार का कोई नाम नहीं होता.

हमारा प्यार बचपन का पवित्र प्यार है, अब भी है और हमेशा रहेगा. शादी के बंधन में बंधने से प्यार का रूप कुछ और ही हो जाता है. ‘‘मैं तुम्हें और तुम्हारे मातापिता को सुखी देखना चाहती हूं. कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. ऐसे ही कुछ निर्णय दिल से नहीं विवेक से लिए जाते हैं. मैं ने जो कुछ भी सोचा है उसी में हम दोनों की खुशियां निहित हैं. ‘‘मेरा चयन गायनिक में पीजी के लिए हो गया है फिलहाल मैं शादी नहीं करूंगी. तुम अपने मातापिता की इच्छानुसार शादी जरूर कर लेना. ‘‘यही हमारे प्यार का सुखद अंत होगा. मैं तुम्हें भूल तो नहीं पाऊंगी और जानती हूं कि तुम भी नहीं भूल पाओगे क्योंकि तुम से ज्यादा मैं तुम्हें जानती हूं. हम मिलतेमिलाते रहेंगे.

आशा है तुम मेरे निर्णय का सम्मान करोगे.’’ पत्र पढ़ कर सन्न रह गया,आंखों में अश्रुबिंदु छलछला गए. क्या जवाब दूं. सारे सवालजवाब तो उसी ने कर दिए. आभा के पास से वापस आने के बाद से मन और शरीर वैसे ही अधमरा था. अब पत्र पढ़ कर तो जैसे जान ही निकल गई. मन की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी. अक्ल ने भी जैसे काम करना बंद कर दिया. क्या करूं कुछ सूझ ही नहीं रहा था. नियति ने हमारे प्यार का क्या यही अंत रचा था? 2-4 गहरीगहरी सांसें ले अपने मन पर काबू किया और शांति से सोचसमझ कर आखिरी बार आभा से मिलने का निर्णय लिया. मन कहीं भटक रहा था. तन स्थिर था दोनों के बीच किसी तरह तालमेल बैठाने में लगा हुआ था.

आभा के पत्र को वापस लिफाफे में डाला, जाने की तैयारी करने के लिए जरूरी सामान निकाल कर पलंग पर रखा. विचारों की रेलमपेल के बीचोंबीच दरवाजे की कुंडी की खटखटाहट ने खलल डाल दिया. झंझलाते हुए मैं ने दरवाजा खोला. देखा तो सामने रामप्रकाश खड़ा था. मुझे इस हालत में देख वह सकते में आ गया. बिना कुछ कहेसुने धकियाते हुए मुझे कमरे में ले आया. कमरे में बिखरा सामान और मेरे चेहरे पर उड़ती हवाइयां देख उस ने मन ही मन अंदाजा लगा लिया कि हम दोनों के बीच कुछ तो हुआ है. सबकुछ देखने के बाद उस ने पूछा, ‘‘बता आभा और तेरे बीच सब ठीकठाक है न?’’ कोई उत्तर न दे कर मैं ने उस के हाथ में आभा का पत्र थमा दिया.

एक ही सांस में रामप्रकाश ने आभा का पत्र पढ़ लिया. पत्र पढ़ कर वापस लिफाफे में डाला. मेरी ओर मुखातिब हो बोला, ‘‘तुझ से एक ही बात पूछ रहा हूं सचसच बताना. अपना एक बच्चा होना चाहिए सिर्फ एक इसी कारण आभा की बात मान कर तू दूसरी लडकी से शादी करेगा. अरे पढ़ेलिखे बेवकूफ आदमी यह बता कि उस दूसरी लड़की से भी शादी के बाद बच्चा नहीं हुआ तो क्या करेगा? क्या मुझे नहीं देखा? मैं मां को सारी बातें समझ दूंगा.’’ रामप्रकाश की बातों ने मुझे अंदर तक हिला दिया, यह क्या अनर्थ करने जा रहा था मैं? बचपन के बिछड़े अब मिले वह भी कुदरत ने मौका दिया और मैं उसे गंवाने को तैयार हूं. नहीं ऐसा नहीं कर सकता मैं, राम ने सच ही कहा था कि मैं पढ़ालिखा बेवकूफ आदमी ही हूं. एक बच्चे के कारण 2 जिंदगियां बरबाद नहीं होने दूंगा. मेरा बड़बड़ाना चालू था. एकाएक राम ने मुझे झकझरते हुए पूछा, ‘‘क्या बड़बड़ा रहा है तू?’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं आभा की बात नहीं मानूंगा, उसे राजी कर उसी से शादी करूंगा. तू ने मेरी आंखों से परदा हटा दिया. चल मेरे साथ मैं मां को खुशखबरी दे दूं.’’ हम दोनों की कुछकुछ बातें मां के कानों में जा रही थीं.

चाय देने के बहाने वे कमरे में आईं. कमरे की हालत और मेरी उतरी सूरत देख ठिठक कर दरवाजे पर खड़ी की खड़ी रह गईं. रामप्रकाश ने आगे बढ़ कर मां के हाथ से चाय ले कर टेबल पर रखी और झक कर उन के पैर छुए. मां ने प्रश्नवाचक निगाहों से रामप्रकाश से पूछा, ‘‘बेटा राम सचसच बताना क्या हुआ है?’’ राम ने पलक झपकते ही सारी बात मां को बता दीं. मां ने मेरी ओर देखा और फिर कहने लगीं, ‘‘मुझे तो शुरू से सब समझ में आ गया था. तुम्हारा बारबार जानेआने और चेहरे के हावभाव से मैं अनजान नहीं थी बस इंतजार कर रही थी कि तुम मुझे कब बताओगे? ‘‘आभा मां नहीं बन सकती तो क्या हुआ उस ने अपना सच नहीं छिपाया इस बात से मैं बहुत खुश हूं. बेटे राम की ही भांति हम भी किसी बच्चे को गोद ले कर उसे एक अच्छी जिंदगी देंगे,’’ मैं ने मां के चरणों में प्रणाम किया.

मन इतना हलका हो गया था कि जैसे हवा में उड़ रहा हो. वह उड़तेउड़ते आभा से बातें करने लगा. आभा और मैं पार्क में बैठ कर बातचीत में मशगूल हो कर अपनी जिंदगी की पुस्तक के पन्नों को अपने ख्वाबों के सतरंगी रंगों से सजा कर रखने में लगे हुए थे. ऐसे समय मेरी आंखें अकसर बंद हो जाती थीं. तब आभा हंस कर कहती ज्यादा ख्वाब मत देखा करो. ख्वाबों में आंखें बंद रहती हैं और बंद आंखों से ठोकरें ही लगती हैं. मेरा एक ही जवाब होता कि तुम हो न और हौले से मुसकरा देता.

लेखक- आशा सक्सेना

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