Short Hindi Stories : ‘‘पूर्वी  औफिस में अच्छा लग रहा है न?’’

‘‘हां अंकल, सब लोग बहुत अच्छे हैं और मुझे अपना काम समझ भी भी आ रही है.’’

‘‘मैं ने सब से कह दिया है. अगर किसी की तरफ से सहयोग न मिले तो मुझे तुरंत बता देना. तुम्हें तो बहुत आगे बढ़ना है. एक और बात औफिस में तुम्हें मुझे अंकल कहने की जरूरत नहीं. यह हमारा निजी संबंध है, इस से औफिस स्टाफ में गलत छाप पड़ेगी और मैं तुम्हारी मदद नहीं कर पाऊंगा. मेरे लिए यहां सिर्फ तुम पूर्वी हो और तुम्हारे लिए मैं केवल अमन सर या सर हूं,’’ मैनेजर साहब मिस्टर अमन ने पूर्वी को औफिस रिलेशनशिप समझ दी. अमन सर पूर्वी की दोस्त मीता के पिता थे.

पूर्वी और मीता दोनों सहपाठी थीं. बहुत करीबी दोस्त. दोनों हाईस्कूल में साथ, कालेज में भी साथ. दोनों ने साथ ही कालेज ग्रैजुएशन पूरी की थी. दोनों एकदूसरे के घर जातीं, साथ घूमतींफिरतीं. कभीकभी एकदूसरे के घर पर रात में भी रुकतीं. सीमित पारिवारिक रिश्ते भी बन गए थे. फिर भी दोनों परिवारों की आर्थिक स्थिति अलग थी.

मीता के पिता यानी अमन साहब मशहूर कंपनी के ब्रांच मैनेजर थे. अच्छाखासा वेतन और उसी हिसाब से जीवनस्तर भी बहुत ऊंचा था.

पूर्वी मध्यवर्गीय परिवार की बेटी थी. एक भाई कालेज में था, दूसरा अभी हाईस्कूल में. पूर्वी पीजी करना चाहती थी लेकिन आर्थिक कारणों से संभव नहीं था. नौकरी मिलना भी आसान नहीं था. रिजल्ट आने से पहले ही सैकड़ों आवेदन कर चुकी थी. कहीं से भी आशाजनक उत्तर नहीं मिला.

‘‘मीता, अंकल कोई मदद कर सकते हैं?’’

‘‘पापा, किसी भी तरह पूर्वी को कहीं भी नौकरी दिलवा दो,’’ मीता ने पापा से कहा.

55 वर्षीय पापा के लिए पूर्वी अनजानी नहीं थी. वह भले कोई ऐश्वर्या न थी लेकिन आकर्षक व्यक्तित्व वाली युवती थी. पापा ने मीता और पूर्वी की मौजूदगी में ही कई जगह फोन किए. चपरासी की भी 5 जगहों के लिए 50 हजार आवेदन आते हों, वहां बेचारी बी.कौम पास पूर्वी का नंबर कहां आता?

मगर नहीं… पूर्वी को अमन अंकल के औफिस में ही अच्छी सैलरी पर नौकरी मिल गई. पूर्वी के मातापिता मिठाई का डब्बा ले कर धन्यवाद देने मीता के घर आ पहुंचे.

आज पूर्वी का औफिस में पहला दिन था. अमन सर ने उसे व्यक्तिगत और औफिस रिलेशन का पहला पाठ पढ़ाया.

अमन  साहब की बेटी मीता तेजस्वी युवती

थी. उसे मास्टर और उस के बाद डौक्टरेट करना था. पड़ोस के फ्लैट में ही 70 वर्षीय रिटायर्ड कालेज प्रोफैसर डा. रमन रहते थे. मीता और पूर्वी को कालेज की पढ़ाई में घर पर भी अच्छा मार्गदर्शन प्रोफैसर रमन से मिलता. प्रोफैसर की पत्नी भी हाईस्कूल में शिक्षिका थीं और नाट्य संस्था में कलाकार थीं. पड़ोसी परिवार से बहुत अच्छे संबंध बने हुए थे. सबकुछ ठीकठाक था.

‘‘पूर्वी, यह कौरपोरेट जगत बहुत निर्मम है. हमारे माने हुए सिद्धांतों में व्यावहारिक सम?ाते करें तो ही आगे बढ़ा जा सकता है. न करें तो तुरंत बाहर फेंक दिए जाते हैं.’’

2 महीने बाद पूर्वी के लिए यह दूसरा पाठ था. अंकल अब अंकल की तरह बात नहीं कर रहे थे, यह पूर्वी सम?ा गई. अमन सर की नजर और शब्दों को वह पहचानने लगी. सम?ाते का मतलब समझने की कोशिश कर रही थी.

पूर्वी मन लगा कर काम करती रही. उसे सम?ा थी कि बौस उस के काम से संतुष्ट होंगे तो ही आगे बढ़ पाएगी.

एक शाम…

‘‘पूर्वी, बहुत थक जाती हो न?’’ अमन सर ने उस के कंधे पर दोनों हाथ रख कर हलका मसाज करते हुए पूछा.

‘‘सर, मैं अपनी समझ और शक्ति के अनुसार दिल लगा कर काम करती हूं.’’

‘‘तुम अच्छा काम करती हो. 2 दिन बाद हमें दिल्ली हैड औफिस जाना होगा. तुम्हें मेरे साथ आने में कोई आपत्ति तो नहीं? मुझे तुम्हारी प्रमोशन और वेतन बढ़ाने के लिए भी बौस से बात करनी है.’’

‘‘अगर मैं न आऊं तो चलेगा?’’

‘‘चलेगा. क्यों नहीं? अब तक मैं कृतिका को साथ ले जाता था. अब प्रमोशन के लिए तुम्हें साथ आना होगा. तुम्हें कौरपोरेट वर्ल्ड के बारे में बहुत कुछ सीखना है. अगर तुम जिम्मेदारी लोगी तो आगे बढ़ोगी. इनकार करोगी तो कौरपोरेट जगत में पहले ही बाहर होना पड़ेगा, यही नियम है.’’

पूर्वी ने ‘‘हां’’ कहा… कहना पड़ा.

दोनों दिल्ली पहुंचे. फाइवस्टार होटल में साथसाथ 2 कमरे बुक थे. बीच में एक दरवाजा था. अच्छा डिनर हुआ. हां, वह कौरपोरेट डिनर था. गुजरात नहीं था. डिनर के साथ अमन सर ने शराब का भी अच्छाखासा सेवन किया. जोर दे कर पूर्वी को भी 2 घूंट पिलवा दिए.

अमन अंकल पूर्वी की कमर पर हाथ रख कर कमरे में लौटे. पूर्वी सम?ा गई कि अंकल अब अंकल नहीं रहे. उस ने दरवाजा अच्छी तरह बंद कर लिया.

थोड़ी देर में दरवाजे पर दस्तक हुई, ‘‘पूर्वी हनी, अभी पार्टी बाकी है. प्लीज दरवाजा खोलो.’’

अंदर  से कोई जवाब नहीं. फोन की घंटी बजती रही. रात 3 बजे तक यही चलता रहा. आखिरकार फोन और दरवाजे की दस्तक बंद हुई.

सुबह ब्रेकफास्ट पर अमन सर खिन्न थे.

पूर्वी ने कहा, ‘‘सर, अमन सोडा में क्या था पता नहीं, लेकिन जिंदगी में पहली बार इतनी अच्छी नींद आई. सपने में जैसे कोई देवदूत मेरा दरवाजा खटखटा रहा था लेकिन उठ कर खोलने की ताकत नहीं थी.’’

सुबह दोनों हैड औफिस गए. जनरल मैनेजर से 15 मिनट बात हुई. कौरपोरेट चर्चा समाप्त हुई. फिर वे प्लेन से अहमदाबाद पहुंचे.

‘‘मीता, अंकल ने मुझे अच्छी नौकरी तो दी लेकिन उस की कीमत चुकाना मेरे लिए संभव नहीं. मैं बहुत वास्तविकता समझती हूं. अंकल मेरे लिए पिता तुल्य हैं. अगर कोई दूसरा बौस होता तो शायद मैं समझता कर लेती. लेकिन अंकल मेरे लिए पूज्य हैं. मैं इस्तीफा दे कर निकल जाऊंगी. अपने रिश्ते पर कोई दाग नहीं लगने दूंगी. आज के समय में शरीर का लेनदेन बिजनैस वर्ल्ड में आम बात हो गई है. अब मुझे काम का अनुभव है. जल्द ही दूसरी नौकरी मिल जाएगी. मैं रिजाइन कर दूंगी.’’

मीता की मां दोनों सहेलियों की बात सुन रही थीं. बोलीं, ‘‘तुम्हारा बाप बूढ़ा बंदर हो गया है लेकिन अभी भी बंदरी गुलाट नहीं भूला. उसे थोड़ा सबक सिखाना पड़ेगा.’’

पूर्वी ने इस्तीफे का पत्र अमन सर की टेबल पर रख दिया और निकल गई. वे त्यागपत्र को घूरते रहे. फिर बड़बड़ाए, ‘‘स्टूपिड गर्ल.’’

तभी पत्नी का फोन आया, ‘‘अपने पड़ोसी, तुम्हारा प्रोफैसर दोस्त रमन, हमारी मीता को ले कर भाग गया. जल्दी घर आओ. तुम्हें तो लगता था कि वह मुफ्त में पढ़ाता है. मीता उसे अंकल कहती थी, अब तुम्हारी बेटी मीता ने फोन पर कहा है कि शायद वह प्रोफैसर के बच्चे की मां बनने वाली है.’’

अब अमन सर कौरपोरेट वर्ल्ड के अधिकारी नहीं रहे, वे मीता के पिता थे. सीधे अपने फ्लैट पहुंचे. सेफ में रखी गन ढूंढ़ी, लेकिन नहीं मिली. हौकी ले कर रमन के फ्लैट पहुंचे, ‘‘कहां है वह निकम्मा, नालायक रास्कल? बेटी की उम्र से छोटी लड़की पर नजर डाली? शर्म नहीं आती? कहां गया तुम्हारा बुड्ढा हसबैंड? आज उस का सिर न तोड़ा तो मेरा नाम अमन नहीं. आई विल किल हिम.’’

‘‘अरे अमनजी, शांत हो जाइए. मुझे भी चिंता है, लेकिन सब बड़े हो चुके हैं. जमाना बदल गया है. अब तो मैं भी आप की पत्नी से सहन करना सीख गई हूं. बुढ़ापे में मैं क्या कर सकती हूं? सहन करने में ही छुटकारा है.’’

‘‘लेकिन वह निकम्मा कहां है? भाग कर कहां गया तुम्हारा बुड्ढा? और मेरी बेटी ही मिली उसे?’’

तभी  बालकनी से गीत सुनाई दिया. मीता और पूर्वी झुले पर झूल रही थीं. फोन के यूट्यूब से पुराना गीत बज रहा था, ‘‘हायहाय क्या करूं राम, मुझे बुड्ढा मिल गया.’’

रमन बालकनी में कुरसी पर बैठे आराम से आइसक्रीम खा रहे थे, ‘‘आइए अमन साहब, आइए… बेटी मीता, अपने अंकल के लिए भी आइसक्रीम ले आओ.’’

अमनजी को सम?ा आ गया कि पूर्वी और मीता ने मिल कर उन्हें सबक सिखाने के लिए ?ाठा फोन किया है.

कौरपोरेट मैनेजर अमन साहब को सांसारिक सबक मिल गया. वे साहब से बदल कर बेटी मीता के पिता और पूर्वी के अंकल बन गए. इस आयु में अपने से कम उम्र की लड़कियों पर लाइन मारना सही नहीं है.

यह पाठ न तो दुनियादारी सिखाती है, न समाज और न धर्म जो ढोल पीटते रहते हैं सभ्यता उन की देन है. धर्म में तो कहानियां भरी हैं जिन में देवीदेवता तरहतरह के कारनामे करते रहते थे और आज के समाज के नियमों को तोड़ने के लिए काफी हैं.

‘‘पूर्वी बेटी, औफिस में काम का ढेर है और तुम यहां झुले पर झूल रही हो? चलो, आज आराम कर लो लेकिन कल सुबह जल्दी जा कर मेरी डैस्क पर रखा अपना लैटर फाड़ देना.’’

अमन सचमुच पूर्वी के अंकल बन गए. छुट्टा सांड फिर से बैल बन गया था.

राइटर-  प्रवीण शास्त्री

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