राइटर- कात्यायनी सिंह

Hindi Kahaniyan : आंखें  बंद थी क्या मैं जाग रही थी? हां जाग ही रही थी, क्योंकि मनहर के झिंझोड़ने पर आंखें खोली. पर आंख खोलने पर आंखों को नहीं मली और आश्चर्य से उस को देखा भी नहीं. जो नींद के बाद अकसर होता है.

‘‘हद है सुम्मी. इतनी देर कोई सोता है. जल्दी करो, औफिस के लिए देर हो जाएगी.’’

मन किया कुछ कटू वाक्य बोल दूं. लेकिन सुबह का माहौल ख़राब नहीं करना चाहती थी.

मनहर बाथरूम में चला गया. पर मैं… मैं वहीं थी. उस की कही बातें, रात की चुप्पी और उसके चीखनेचिल्लाने की आवाज.

गलती… इस को गलती नहीं कहते. पार्थ खेलतेखेलते गिर गया था और उस के पैरों में हल्की खरोंच आ गई थी. चोट को देखते ही मनहर ने चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘क्या करती हो सारा दिन? एक पार्थ को नहीं संभाल सकती.’’

सारा दिन क्या करती हो? ये लगभग हर पुरूष का व्यंग्य बाण है. जिस से आहत हो हम स्त्रियां छिन्नभिन्न हो जाती हैं. 24 घंटे का बेशर्त श्रम हमारे जिम्मे होता है फिर भी.

मैं जल्दीजल्दी हाथ चलाने लगी. चाय के साथ नाश्ता तैयार करना, पार्थ के लिए दूध, मनहर का कपड़ा, सब करतेकरते 9 बज गए.

‘‘जल्दी करो, आज फिर बगैर लंच औफिस जाना पड़ेगा क्या?’’

मनहर की चुभती आवाज को अनसुना कर डायनिंग टेबल पर ब्रेड, आमलेट और चाय रख दी और साथ में लंच बौक्स भी.

बहुत सावधानी से सहजता का लेप चेहरा पर चढ़ाया और होठों पर मुसकान के साथ उस के सामने बैठ गई. पर कितनी तरह के युद्ध मेरे भीतर चल रहा था.

मनहर चला गया और मेरे हिस्से आया घुटन, टूटन और मन का अवसाद.

जिस दिन मैं और मनहर मिले थे वे गरमियों की शाम थी और जिस दिन हमारी शादी हुई थी वो भी गरमियों की रात थी.

मुझे लगा था कि मनहर को चुन कर जिंदगी की सारी परेशानियां खत्म हो जाएगी. पर पता नहीं था कि एक नई मुसीबत अपने साथ लाई हूं.

अपनी बेचैनी का हल मुझ मिल नहीं रहा था.

पहली बार जब मनहर को देखा था, बोसा लेने का मन किया था. उस के होंठ

और उस की आंखें दोनों बोलती रहती थीं. कालेज का नायक कब मेरा बन गया. मुझ भी नहीं पता चला.

उस ने एक दिन हंसते हुए कहा था कि तुम जब किसी के प्यार में होगी तब तुम उस की गुलाम बन जाओगी और मेरा तन मन कब उस का गुलाम बन गया. सम?ा में तब आया जब मुझ होश आया.

मेरी स्वतंत्रता, मेरी अस्मिता, आत्मविश्वास सब उस के कैदी बन गए.

एक बार मैं ने उस से कहा, ‘‘मनहर मुझे गाड़ी चलाना सिखा दो. अच्छा लगता है खुद से ड्राइव करना. सशक्त होने का एहसास होता है.’’

‘‘क्या करोगी गाड़ी चला कर. जहां तुम कहती हो मैं ले जाता हूं न तुम्हें. अकेले मौजमस्ती करने का मन कर रहा है क्या? लेकिन मैं जानता हूं तुम्हारा संस्कार और मेरे प्रति प्यार ऐसा नहीं करने देगा. तुम स्त्रियां हमारे पहलू में ही सुरक्षित हो और घर की चारदीवारी तुम्हारी सुरक्षा कवच. अच्छा सुम्मी, तुम्हारा मन नहीं करता कि मु?ा से छुप कर कुछ ऐसा करो जिस में तुम्हें थ्रिल महसूस हो. ‘‘उस ने हंसते हुए कहा था पर पता नहीं उस की आंखों में कैसा व्यंग्य था कि मेरी नजरें झुक गई.

मूक सम?ाता मेरी आदत बन गई थी. या घर टूटने का डर मुझ आतंकित करता. इसलिए गुलामी ही अपनी नियति मानने लगी थी.

उस दिन बरसात की शाम थी. पेड़पौधे धुल गए थे और मिट्टी से आती सोंधी महक मेरे मन में बसती जा रही थी. बादलों की आवाजाही, नीलेसफेद की बनती बिगड़ती आकृतियां और इन आकृतियों में मैं मेरा अक्स तलाशती हुई. सुखद लग रहा था. हवा के ?ांको से बजता विंड चाइम और हल्की आवाज में गुलाम अली की गजल सबकुछ रोमानी अहसास.

गाड़ी की आवाज सुन मैं चौकी. मनहर इतनी जल्दी?

मैं अभी संभलती की अजहर को देखा. अजहर मेरा और मनहर का दोस्त. नीली आंखों का जादू और प्यारी मुसकान उस के चेहरे को आकर्षक बनाती थी.

मैं ने उस को गले लगा लिया. ओह, अजहर कितने दिन बाद दिखे. जैसे सदियां बीत गई हो. तुम कहां थे? न कोई खोज और न कोई खबर. ऐसा भी क्या बेगानापन.

वे हंसते हुए बोला, ‘‘तुम चुप रहोगी, तब तो बताऊंगा. सच, अभी भी तुम नहीं बदली. एक बच्चे की मां अनु,’’ उस ने चिढ़ाते हुए कहा.

तभी मेरी निगाह मनहर पर गई. उस की आंखों में गुस्सा दिखाई दिया. समझ नहीं पाई, क्यों? शादी के पहले हम ऐसे ही तो मिला करते थे.

उस शाम के बाद अकसर हमारी शाम अच्छी गुजरने लगी. अजहर का आना हमारी जिंदगी में खुशियों का आना था.

वे मुझे समझता. तुम क्यों ऐसी हो गई हो? तुम्हारा बदलना मुझ बिलकुल अच्छा नहीं लगा. तुम फिर से कालेज वाली सुमन बन जाओ. वही जो मुझ पसंद थी. शादी क्या हुई कि तुम अपना ही अक्स भूल गई.

मैं हंसती पर अंदर से दंश चुभता रहता. कैसे कहूं? मनहर को मेरा यही रूप पसंद है.

अजहर ने बताया कि उस ने शादी नहीं की. अकेला है और अकेला ही रहना चाहता है. बंधन में बंधना उसे पसंद नहीं है.

कभीकभी मजाक करता, तुम मिल जाओ बंधन पसंद आने लगेगा.

वक्त पैरहन बदल चुका था. नवंबर की गुलाबी ठंडक आ गई थी. खिड़की से छन कर आती धूप कमरे को रोशनी से भर देता थी.

रात गहराई, बिस्तर पर आई ही थी कि मनहर का हाथ मेरे शरीर पर. थकान से चूर मेरा मन बिलकुल हिलने का मन नहीं कर रहा था. मैं ने धीरे से कहा, ‘‘मेरे शरीर में दर्द है प्लीज मुझ सोने दो़’’

इतना सुनते ही उस की आवाज में व्यंग्य की धार बहने लगी. मुझ लगा कौन सा अपराध कर दिया है मैं ने. इच्छाअनिच्छा का मान रखना भी तो प्यार है. लेकिन यहां तो पुरुष अहं पर चोट लगी थी. वैसे भी ये आज की बात नहीं है. जब भी मैं ने मना करने की कोशिश की है… या तो मनुहार से या आहत मन कर के बात मनवा ही लेते हैं. पर आज तो ऐसे व्यंग्य बाण से कभी छलनी नहीं किया. तो आज अजहर हम दोनों के बीच आ गया है?

सपनों की दुनिया पहले से ही लहूलुहान थी अब चोट और बेदर्दी से.

धैर्य ने जवाब दे दिया और मैं अपने कमरे में. नींद भी अपने पूरे तेवर में. नहीं आऊंगी कह कर दगा दे गई.

दीवार पर टंगी बुद्ध की पेंटिंग पर नजर गई, जिस में बुद्ध का चेहरा आधा था. पता नहीं क्यों मुझ ये तस्वीर बहुत अच्छी लगी थी और मैं खरीद कर लाई थी. पेंटर ने क्या सोच कर ऐसी तस्वीर बनाई होगी. क्या हम स्त्रियां इस के केंद्र में थीं?

तभी टेबल पर रखी किताब के पन्ने फड़फड़ाने लगे. जैसे मुक्ति के लिए वे भी छटपटा रही हो. रात उतर रही थी. मेरी आंखें बरस रही थी.

सुबह का उजाला दंभ ले कर आया.

‘‘सुम्मी,’’ मेरे पति की भीगी और नरम आवाज.

‘‘सुनो.’’

‘‘हां कहो न,’’ मेरी आवाज कहीं दूर से आ रही थी.

‘‘तुम मुझ तुम नहीं लगती अब. एकनिष्ट और पतीव्रत. तुम में कुछ तो बदला है. क्या यह बदलाव अजहर के आने की दस्तक है? मुझ ऐसा ही लग रहा है. आज उस को घर आने से मना कर दो.’’

मैं सिहर गई. क्या इन के मन में अजहर दुश्मन की तरह पैठ बना रहा है. कालेज के दिनों में हमारी दोस्ती बहुत गहरी थी. तब तो शक नहीं था. तो क्या प्रेमी जब पति बन जाता है तो पत्नी के प्रति बहुत पजेसिव हो जाता है.

अपराध बोध से मैं दब गई. पर जिन पहलुओं को छुआ है मनहर, वो मेरे दिमाग में बैठ गया. अब अजहर जब भी आता, खुल कर मिल नहीं पाती. संकोच और दायरा बढ़ने लगा.

दीवार पर कैलेंडर बदल गया.

मैं ने खिड़की का पर्दा सरकाया. आसमान में सफेद बादल और बादलों के बीच काले धब्बे. अचानक बिजली चमकी. परदे के पीछे से कड़कती आवाज.

मैं ने बिस्तर पर मनहर को गहरी नींद सोते देखा. खयाल आया, अभी सपनों में वे किसे देख रहा होगा. मुझ, पार्थ या अजहर को?

कुछ देर बैठे रहने के बाद किचिन में आ गई. सोच का पतंग उड़ने लगा. अजहर अब भी आता है. मनहर से बातें करता है, पार्थ के साथ खेलता है. बातें वे मुझ से भी करता है पर मैं ही अपने खोल में सिमटी रहती.

चाय अपने रंग में आने लगी थी. कमरे में जाकर खिड़की का परदा सरकाया.

मनहर को जगा कर चाय दी और खुद भी उस के बगल में बैठ कर चाय पीने लगी. मेरा मन सोचने लगा. कहां क्या बदल गया? मेरे मन से प्यार कहां लुप्त हो गया?

मनहर का हिटलर अंदाज. बातबात पर तानाकशी. मेरी खूबियां जो कभी बहुत पसंद थी अब उसे बेवकूफी लगती. बात बेबात उग्र हो जाना उस की आदत बन गई थी. चाय की अंतिम घूंट भरी और उठ गई. इस दरम्यान हमारे बीच कोई बात नहीं हुई.

किस्मत… हमें मिलवाने में किस्मत का हाथ था. दोस्ती की शुरुआत अजहर से ही हुई थी.

उस की आंखों में कई बार अपने लिए प्रशंसा का भाव देखा था मैं ने. उस का नरम व्यवहार और हर समय सहायता के लिए तत्पर रहना पसंद था मुझे. पर मनहर का आकर्षक व्यक्तित्व और बेपरवाह अंदाज उस को अलग करता था सब से.

अजहर हमारे प्यार का साक्षी बना.

तारीख दर तारीख मुझ सबकुछ याद आता रहा और अजहर का दूर जाना भी. तो क्या अजहर?

आज शाम अजहर आया. मनहर घर में नहीं था.

सहजता से मैं उस के पास बैठ गई. बातों का सिलसिला निकल पड़ा. कालेज की कई मीठी यादें हम ने याद किया.

बातों में पता नहीं चला कब मनहर आया. पता नहीं क्यों आज मुझ डर या झिझक का एहसास नहीं हुआ. बल्कि आत्मशक्ति के साथ उठी और चाय बनाने चली गई.

अजहर के जाने के बाद अजीब सा सन्नाटा हमारे घर और मन पर छा गया.

कुछ देर के बाद मनहर बोला, ‘‘आज मेरी अनुपस्थिति में क्यों आया था. तुम उसे मना क्यों नहीं करती हो, कि मत आए मेरे घर.’’ उस की आवाल तल्ख थी.

‘‘मैं मना नहीं कर सकती.’’

‘‘तुम्हारा आशिक है तो तुम क्यों मना करोगी.’’

‘‘मनहर, हद से आगे मत जाओ. सबकुछ बर्दाश्त कर सकती हूं चरित्र पर दाग नहीं. खबरदार,’’ तभी गाल पर झन्नाटेदार थप्पड़.

मेरा आत्मविश्वास, स्वाभिमान सब ढह गया एक पल में.

कांपते पैरों को संभाल मैं वहीं सोफे पर बैठ गई. पूरा वजूद चूरचूर हो रहा था. मनहर बाहर चला गया.

दिमाग सोचता पर दिल धड़कता अपने ही आरोहअवरोह में. अब नहीं हो सकेगा मुझ से, निबाह मुश्किल है. कोई जानते समझते अंगार में कैसे रह सकता है.

मैं ने फैसला किया…

अब अंत होगा और यही अंत मेरी जिंदगी की शुरुआत. मैं चल दी अजहर के घर. मनहर के नाम एक संदेश लिख कर टेबल पर रख दी, ‘‘जब कोई रिश्ता नहीं चल पाए तो उसे ढोना नहीं चाहिए, बल्कि उसे एक खूबसूरत मोड़ पर छोड़ देना चाहिए.’’

दिल में एक टीस उठी कि मेरे बगैर मनहर रह लेगा पर पार्थ के बगैर…

अजहर मेरी मन:स्थिति सम?ाता था. काफी हाथ में पकड़ाते हुए पूछा, ‘‘क्या सोच रही हो?’’

‘‘कमरे में जो कैलेंडर है. उस में उदास, अकेली और टूटी हुई जो स्त्री है, उस में खुद को तलाश रही हूं.’’

अजहर हंसा, ‘‘और मैं उस स्त्री के होठों पर हंसी देख रहा हूं.’’

अजहर के कंधों पर मैं बो?ा नहीं डाल सकती थी. एमबीए की डिगरी काम आई, प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई.

एक बार मनहर आया था मुझ बुलाने पर मेरी आंखों में शुन्य देख कर चला गया.

खामोश गुजरते दिन और धड़कती रातों में एक दिन मैं और अजहर एक हो गए.

मैं ने मनहर से तलाक नहीं लिया और न ही अजहर से शादी की.

अजहर और मेरा रिश्ता दोस्ती और प्यार से बना था. मेरी जिंदगी, मेरा रहनसहन, मेरी आस्थाअनास्था, किसी में वे दखल नहीं देता था. उस के त्योहार में मैं सम्मिलित रहती, मेरे में वे.

बहुत खूबसूरत एहसास के साथ हम जी रहे थे. मनहर का आना कभी उसे बुरा नहीं लगता था. मुझ भी कभी उसे देख कर अपराध बोध नहीं हुआ.

सबकुछ व्यवस्थित हो गया था. सुबह होती थी. सूरज भी निकलता था और चांद भी. हवा का ?ांका आता था जाता था.

हमारे जीवन के बसंत में सरसों खिलते रहते थे.

शरद पूर्णिमा की रात बेटी का जन्म हुआ. स्वच्छ धुले आकाश पर चांद सा चेहरा. खुशियों के हिंडोले में झुलती, धरती और आसमान को नापती, सपनों के सतरंगी इंद्रधनुष… जिंदगी के सारे रंग मेरी झोली में. सच, प्रेम से ही घर संपूर्ण होता है.

कभीकभी लगता कि मनहर का अकेलापन बांटने वाला कोई नहीं है. शादी कर लो मनहर. एक दिन मैं बोली.

मनहर ने कहा, ‘‘भागतेभागते मुझ यह पता ही नहीं चला कि कब तुम और अजहर करीब आ गए और मैं मुड़तेमुड़ते पीछे रह गया. समझ तब आया जब तुम छोड़ कर चली गई. अब

पार्थ के अलावा किसी को अपनी जिंदगी में हिस्सेदारी नहीं दे सकता. उस से मिल कर परिपूर्ण हो जाता हूं.’’

पार्थ, नव्या और अब एक और बेटा शौर्य मेरी आंचल में आया.

अजहर ने कभी किसी बात के लिए मुझ विवश नहीं किया. अपनी मरजी से मैं कुछ भी करती, अजहर हमेशा मेरा साथ देता.

सपनों की रात छोटी होती है. एक दिन मेरा सपना भी बिखर गया. अजहर को दिल का दौरा पड़ा… अस्पताल ले जाते ही दम तोड़ दिया.

उस के जाने के बाद मेरी जिंदगी अंधेरों से भर गई. उस की एकएक बात मेरे जेहन में चलती रहती.

अजहर ने कहा था सुम्मी तेरे माथे की बिंदिया और मांग का सिंदूर मुझे बहुत पसंद है. इसे कभी मत हटाना.

आंखों में आंसू लिए आईना के सामने जा कर खड़ी हो गई. माथे पर बड़ी बिंदी लगाई और मांग में सिंदूर भरा. जैसे ही कमरे से बाहर आई, रिश्तेदारों की नजर मेरे चेहरे पर अटक गई.

तभी मेरी मां की कड़कती आवाज सुनाई दी, ‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या,

अजहर अब इस दुनिया में नहीं है. तुम्हारा सुहाग उजड़ गया है. अशोभनीय बातें मत करो.’’ मेरी आवाज शांत और गंभीर थी, ‘‘प्रेमी मरा है, पति नहीं.’’

अजहर कहीं दूर आसमान में मुसकरा रहा था.

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