अगस्त  का महीना था. देहरादून से मसूरी वाली सड़क पर कुहासा ऐसे लिपटा था जैसे किसी ने सफेद दुपट्टा डाल दिया हो. देवदार के पेड़ बारिश में नहा कर और गहरे हरे हो गए थे. नीचे घाटी में बादल रुई के पहाड़ों जैसे तैर रहे थे. हवा में गीली मिट्टी, चीड़ और भीगे पत्तों की खुशबू थी. दिल्ली से सुबह 6 बजे मसूरी के लिए 2 टैक्सियां निकली थीं. पहली टैक्सी में अमित और अलका थे जिन की शादी को 2 साल हो चुके थे और दोनों वीकैंड पर घूमने जा रहे थे.

अलका 28 साल की थी. तेज आंखें, तीखे बोल लेकिन चेहरे पर मासूमियत. अमित 30 साल का सौफ्टवेयर इंजीनियर था जो देखने में शांत लगता था मगर उस के दिमाग में काफी टैंशन थी.

अमित ड्राइवर के पास वाली सीट पर बैठा बड़बड़ा रहा था, ‘‘देखा 5 बजे निकलने को कहा था. अब 8 बज गए.’’

अलका खिड़की से बाहर देख रही थी. चिड़े हुए से स्वर में बोली, ‘‘मैं क्या करूं? तुम्हारी भी तो नींद नहीं खुली.’’

अमित चिल्लाता हुआ बोला, ‘‘हर बार यही गैरजिम्मेदाराना रवैया. तुम्हारे मांबाप ने यही सिखाया है क्या?’’

अलका बोली, ‘‘बस करो अमित. हर बात में मेरे मांबाप को मत लाओ.’’

‘‘और यह टैक्सी वाला जो 4,500 रुपए ले रहा है. हम शेयरिंग ले लेते तो 500 या हजार में काम हो जाता. सैटरडेसंडे विकास और प्रगति के साथ भी निकल सकते थे मगर तुम्हारे स्वामीजी ने तो आज का ही मुहूर्त निकाला था. औफिस में 2 के बजाय

4 दिन की छुट्टी लेनी पड़ी. हर तरफ लौस.’’

अलका ने गुस्से में कहा, ‘‘अरे यार इतना क्यों चीख रहे हो? मैं ने कहा था इस महीने के बजाय अगले महीने ज्यादा अच्छा मुहूर्त है. तुम कहां मानते हो मेरी बात?’’

‘‘अच्छा तुम्हारी बात मानूं या तुम्हारे स्वामीजी की? तुम जो कहती हो उस के पीछे तो तुम्हारे स्वामी ही होते हैं और उन्हीं के कहे अनुसार न हम आज जा रहे हैं.’’

‘‘हर बात में बस स्वामीजी को ले आते हो. वे तो हमारे भले के लिए कुछ कहते हैं न. मगर तुम तो हमेशा उन के पीछे पड़े रहते हो,’’ निशा ने कहा और फिर मुंह फेर लिया.

दूसरी टैक्सी में नितिन और निशा बैठे थे. निशा 27 साल की थी. गेहुआं रंग, बड़ीबड़ी आंखें, हमेशा मुसकराता चेहरा. सूट पर हलका काम और चेहरे पर लाइट मेकअप के साथ उस के बोलने का अंदाज भी बेहद खूबसूरत था.

नितिन 31 साल का हैंडसम बिजनैसमैन था. उस का गारमैंट्स का काम था.

हमेशा फोन हाथ में होता मगर आंखें निशा की तारीफ कर रही होतीं. उन की शादी को 3 साल हो चुके थे मगर उन के बीच का प्यार सालोंसाल बढ़ता ही जा रहा था. अभी भी नितिन निशा का हाथ पकड़े पीछे की सीट पर बैठा था.

नितिन ने हाथ बाहर निकालते हुए कहा, ‘‘जान देखो बादल. बिलकुल रुई जैसे. ऐसा लग रहा है हाथ पकड़ कर छू लेंगे.’’

निशा अपना सिर उस के कंधे पर रख कर प्यार से बोली, ‘‘हां. प्रौमिस करो रिजोर्ट पहुंच कर बालकनी या छत पर हम दोनों रात भर हाथों में हाथ लिए बस इसी तरह बैठे आसमान को निहारते रहेंगे.’’

नितिन ने उस के माथे पर किस किया, ‘‘प्रौमिस पर एक बात बताओ हमारी शादी के इतने साल हो गए. क्या अब भी मुझ से बोर नहीं हुई?’’

निशा हंसी, ‘‘तुम से और बोर? कभी नहीं. तुम्हारे साथ तो 7 जन्म भी बोर न होऊं.’’

मसूरी से 3 किलोमीटर पहले माल रोड की चढ़ाई पर जाम लगा था. आगे ट्रक पलट गया था. दोनों टैक्सी वाले यानी रमेश और पप्पू अपनीअपनी टैक्सी से उतरे.

रमेश बोला, ‘‘भाई मेरे वाले तो शुरू से लड़ रहे हैं, ‘तुम गैरजिम्मेदार हो,’ ‘तुम्हारे मांबाप ने कुछ सिखाया नहीं,’ ‘मेरी तो सुनते ही नहीं’ बगैराबगैरा.

पप्पू ने कहा, ‘‘और मेरे वाले शादी के 3 साल बाद भी ‘आई लव यू’ में लगे हैं. अभी भी हाथ पकड़े बैठे हैं.’’

रमेश ने आगे देखा और बोला, ‘‘रिजोर्ट सिर्फ 2 किलोमीटर ही रह गया है. क्यों न चारों को पैदल भेज दें? जाम 1-2 घंटे का है. हम सामान ले आएंगे.’’

रमेश ने अमित वाली टैक्सी का शीशा खटखटाया, ‘‘साहब आप चारों एक ही

रिजोर्ट जा रहे हैं. पैदल निकल जाओ. जाम से बच जाओगे.’’

अमित बोला, ‘‘हमें नहीं जाना.’’

अलका ने सम?ाया, ‘‘अमित चलो न.

1 घंटा यहीं खराब करेंगे?’’

अमित ने गुस्से में दरवाजा खोला और उतर गया.

उधर नितिन ने निशा का हाथ पकड़ा और प्यार से बोला, ‘‘जान, बस 2 किलोमीटर है. ड्राइवर भैया बोल रहे थे पैदल रास्ता साफ है. चलें?’’

निशा ने उस की तरफ देखा और बोली, ‘‘तुम्हारे साथ तो मैं हिमालय भी पैदल चल लूं,’’ कह कर उस के गाल पर धीरे से किस कर दिया.

नितिन ने ड्राइवर को सहमति दी, ‘‘ठीक है भैया, हम चल देते हैं.’’

और इस तरह चारों पैदल चल पड़े.

रास्ता तंग, कच्चा और फिसलन भरा था. हलकी बूंदाबांदी भी हो रही थी. निशा

और नितिन ने छाता ले रखा था. निशा ने अलका को और नितिन ने अमित को अपने छाते में ले लिया. एक तरफ खाई और दूसरी तरफ देवदार के ऊंचे पेड़. हवा में ठंडक थी और हर तरफ चीड़ की खुशबू फैली हुई थी.

आगेआगे निशा और अलका साथसाथ चल रहे थे. पीछे अमित और नितिन थोड़ी दूरी पर थे.

निशा ने बातचीत की पहल की, ‘‘आप का नाम क्या है?’’

‘‘अलका.’’

निशा मुसकराई, ‘‘और मैं निशा. आप बहुत प्यारी हैं. लेकिन बहुत कम बोलती हैं ऐसा लग रहा है.’’

अलका ने हलकी सी हंसी के साथ कहा, ‘‘मेरे हस्बैंड को तो लगता है मैं बहुत बोलती हूं. जहां जरूरत न हो वहां भी बोलती हूं,’’ और फिर दोनों हंस पड़ीं.

चलतेचलते निशा ने अपना छाता थोड़ा अलका की तरफ

कर दिया और बोली, ‘‘आप की हील्स गीली

हो जाएंगी.’’

अलका ने देखा और बोल पड़ी, ‘‘आप बहुत अच्छी हो.’’

‘‘आप भी.’’

‘‘आप की शादी को कितना टाइम हो चुका है?’’ निशा ने पूछा.

‘‘2 साल.’’

निशा ने आगे पूछा, ‘‘और कैसा चल रहा है सबकुछ?’’

अलका 2 सैकंड चुप रही फिर बोली,

‘‘बस रोज ?ागड़ा. रोज बातचीत बंद. आज सुबह से टैक्सी में भी हम ?ागड़ ही रहे थे. ‘लेट क्यों हुई’ ‘यह टैक्सी क्यों ली.’ ‘पैसा ज्यादा खर्च

करा दिया.’’’

‘‘ओह. सौरी.’’

‘‘सौरी की बात नहीं. सच यही है. वे स्वामीजी को मानते ही नहीं. मैं मानती हूं. शादी के समय ही कुंडली में दोष बताया था. पर मैं प्यार करती थी सो माना नहीं पर ग्रह, उपाय कर लिए थे.’’

निशा बोली, ‘‘नितिन भी नहीं मानते पर वे कभी चिल्लाते नहीं. बहुत प्यार करते हैं मु?ा से.’’

अलका ने निशा को देखा, ‘‘आप बहुत लकी हैं.’’

निशा ने आसमान की तरफ देखा, ‘‘लकी? पता नहीं अलका लेकिन कभीकभी लगता है सब बहुत परफैक्ट है. पर इस से भी डर लगता है.’’

‘‘किस बात का डर?’’

‘‘कि कहीं यह सपना टूट न जाए.’’

अलका हंसी, ‘‘पहाड़ों पर सपने नहीं टूटते. ये मजबूत होते हैं.’’

पीछे अमित और नितिन चल रहे थे.

नितिन बोला ,‘‘भाई पहली बार जा रहे हो मसूरी?’’

‘‘हां.’’

‘‘मौसम बढि़या है न?’’

‘‘हां.’’

नितिन हंसा, ‘‘आप बहुत कम बोलते हैं.’’

अमित बोला, ‘‘अरे नहीं भाई मगर अभी बीवी से ?ागड़ कर आ रहा हूं सो मूड खराब है. ऐसा लग रहा है जैसे बोलने को है ही क्या.’’

नितिन ने कहा, ‘‘मैं नितिन मेरा गारमैंट्स का बिजनैस है और मेरी पत्नी निशा टीचर है हिंदी की.’’

अमित बोला, ‘‘मैं सौफ्टवेयर इंजीनियर हूं और मेरी पत्नी अलका वकील है.’’

‘‘वैसे आप दोनों में बनती नहीं है क्या?’’ नितिन ने पूछा.

अमित चुप रहा फिर धीरे से बोला, ‘‘पिछले 2 सालों से यही जानने की कोशिश कर रहा हूं. हर बात पर टकराव होता है मगर कहीं न कहीं गहरा प्यार भी है.’’

नितिन बोला, ‘‘यह तो सच है कि टकराव में भी प्यार होता है भाई. बस प्यार दिखाना

पड़ता है.’’

अमित ने पहली बार नितिन को ध्यान से देखा मगर कुछ

बोला नहीं.

रास्ते में एक मोड़ आया. नीचे गहरी खाई थी.

अलका अचानक रुकी, ‘‘निशा देखो वह पक्षी कितनी अलग तरह का है.’’

निशा एकदम से मुड़ी. उस के पैर के नीचे काई थी जिस से उस का पैर फिसला और वह अलका से टकरा गई. अलका साइड में थी. धक्का लगने से वह लड़खड़ाती हुई नीचे खाई की तरफ गिरने लगी.

नितिन जो पीछे साइड की तरफ था अलका को बचाने दौड़ा. उस ने अलका का दुपट्टा पकड़ने की कोशिश की. पर दुपट्टा हाथ से छूट गया और उसे भी तेज ?ाटका लगा. बैलेंस बिगड़ने से वह भी नीचे गिर पड़ा. अलका और नितिन दोनों नीचे खाई में गिर चुके थे.

‘‘अलका.’’

‘‘नितिन.’’

निशा और अमित की तेज चीखों ने उस सन्नाटे में भयावह माहौल बना दिया. फिर कुछ सैकंड्स के लिए खामोशी छा गई. सिर्फ देवदार के पत्तों की आवाज आ रही थी. अमित और निशा पत्थर हो गए थे.

अमित की आवाज कांपी, ‘‘निशा… जी आप ठीक हो?’’ निशा की आंखों से आंसू बह निकले.

थोड़ी ही देर में पुलिस आई. एसडीआरएफ टीम आई. लोकल लोग भी इकट्ठे हो गए थे बड़ीबड़ी रस्सियां ले कर.

रात 3 बजे के बाद अमित और निशा रिजोर्ट आ गए.

रिजोर्ट की लौबी में हीटर की हलकी सी गरमाहट थी. बाहर कुंहरा और

देवदार के पेड़ों की सरसराहट खामोशी को चीरती हुई सी महसूस हो रही थी. दीवार पर घड़ी रात के 3 बजा रही थी.

लौबी में सिर्फ 2 लोग थे- अमित और निशा. बीच में एक सैंटर टेबल थी और उस पर

2 कप चाय रखी थी जो ठंडी हो चुकी थी. पहले 20 मिनट तक कोई नहीं बोला. सिर्फ उन की सांसों की आवाज उन्हीं को सुनाई दे रही थी.

निशा ने अचानक सिसकी ली. फिर

फूटफूट कर रो पड़ी और बोली, ‘‘यह… यह

मेरी वजह से हुआ अमित जी. अगर मैं नहीं मुड़ती… अगर मैं फिसलती नहीं तो कुछ नहीं होता.’’

अमित चौंका. उस ने घबरा कर निशा की तरफ देखा और उसे सम?ाते हुए बोला, ‘‘प्लीज शांत हो जाइए निशा जी इस में आप की कोई गलती नहीं थी,’’ उस की आवाज कांप रही थी.

निशा ने आंसुओं से भीगे चेहरे से अमित को देखा, ‘‘पर नितिन… नितिन मु?ो बचाने के लिए दौड़े थे और फिर अलकाजी को गिरता देख किनारे की तरफ भागे और फिर… मैं ने सबकुछ खो दिया और आप ने भी… सब मेरी लापरवाही का नतीजा है.’’

अमित ने आंखें बंद कर लीं. आंखें भीग गईं, ‘‘खुद को दोष मत दीजिए निशाजी. अलका… वह मेरी पत्नी थी. मगर मैं ने उसे दुख ही दिए. पूरे 2 साल हो गए थे. हम रोज लड़ते थे. आज सुबह भी लड़ा था. तुम गैरजिम्मेदार हो. यही आखिरी लाइन थी मेरी.’’

निशा ने धीरे से कहा, ‘‘गुस्से में कही बातें दिल पर नहीं लेनी चाहिए.’’

अमित, ‘‘अब किस को बताऊं यह बात कि मैं उसे बहुत प्यार करता हूं. उस के जाने का गम सहा नहीं जा रहा.’’

दोनों फिर चुप हो गए थे.

निशा ने टेबल पर रखा टिशू पेपर लिया और अपना चेहरा पोंछा.

निशा बोली, ‘‘नितिन बहुत अच्छे थे. हर छोटी बात पर पूछते थे चाय लोगी? थक गई? पिछले 3 सालों में एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब आई लव यूं न कहा हो.’’

अमित ने सिर हिलाया, ‘‘अलका… वह जिद्दी थी. स्वामीजी को मानती थी. मैं नहीं मानता था. इसीलिए रोज टकराव होता था. पर दिल की बुरी नहीं थी.’’

इस तरह पहली बार दोनों ने अपनेअपने पार्टनर के बारे में बात की. रो कर और खामोशी से.

इस खामोशी और दर्द के बीच उन के दिलों में एकदूसरे के लिए हमदर्दी पनपने लगी थी.

वे एकदूसरे का दर्द महसूस करने लगे थे. निशा को महसूस होने लगा था कि अमित काफी सुल?ा हुआ और प्यारा इंसान है. अमित को भी निशा से बातें करना अच्छा लगा था.

रात 4 बजे के करीब हीटर बंद हो गया. ठंड बढ़ गई.

निशा ने अपनेआप को बांहों में समेट लिया. वह कांप रही थी. अमित ने यह देखा तो उठ कर रिसैप्शन से एक कंबल ले आया. ‘‘लीजिए यह कंबल. आप को ठंड लग रही है.’’

‘‘थैंक्यू.’’

कंबल लेते वक्त उन के हाथ एक सैकंड के लिए छुए. दोनों ने नजरें ?ाका लीं.

अमित वापस अपनी कुरसी पर बैठ गया. पर इस बार टेबल के इस तरफ नहीं निशा वाली बैंच की दूसरे कोने पर.

अमित ने पूछा, ‘‘डर लग

रहा है?’’

‘‘बहुत.’’

‘‘मु?ो भी. घर जा कर किस से बात करूंगा?’’

‘‘और मैं? मम्मीपापा लखनऊ में रहते हैं,’’ निशा ने उदास स्वर में कहा.

अमित ने धीरे से कहा, ‘‘तो… तो जब तक घर वाले नहीं आते हम… हम साथ ही रहेंगे.’’

निशा ने सिर हिलाया. पहली बार लगा कोई अपना है.

सुबह 5 बजे खिड़की से हलकी रोशनी आने लगी थी. पहाड़ सुनहरे दिखने लगे.

निशा ने कंबल हटाया और चाय का ठंडा कप उठाया.

‘‘चाय ठंडी हो गई.’’

‘‘नई मंगवा दूं?’’

‘‘नहीं. रहने दीजिए.’’

अमित ने निशा को देखा. सूजी हुई आंखें, बिखरे बाल पर चेहरे पर एक मासूमियत. अलका कभी इतनी शांत नहीं दिखती थी. अमित ने सोचा. उसे गिल्ट भी हो रहा था.

निशा ने भी अमित को देखा. बढ़ी हुई दाढ़ी, थका हुआ चेहरा, बिखरे बाल पर

आंखों में सचाई थी. नितिन हंसमुख था और ये शांत हैं. पर इन की शांति में सुकून है, निशा ने सोचा.

‘‘अमितजी, आप क्या करते हैं?’’ निशा ने अमित को देखते हुए पूछा.

‘‘सौफ्टवेयर इंजीनियर हूं और आप?’’

‘‘टीचर. हिंदी पढ़ाती हूं.’’

बात शुरू हुई. धीरेधीरे स्कूल की बातें फिर औफिस की बातें, बचपन की बातें.

निशा हंसी, ‘‘पता है, मैं बच्चों को कहानी सुनाती हूं तो सब से अंत में हमेशा पूछती हूं क्या सीख मिली?’’

अमित ने कहा, ‘‘जिंदगी ने आज मु?ो भी एक सीख दी?’’

‘‘वह क्या?’’

अमित ने आंखें नीची कर लीं, ‘‘यही कि जिंदगी बहुत छोटी है. ?ागड़े में बरबाद करने के लिए नहीं है.’’

अमित चुप हो गया था. उस के सीने में

कुछ चुभ रहा था. निशा उस का दर्द महसूस

कर थोड़ी करीब आ गई. उस के हाथों को

थाम लिया.

अमित ने कहा, ‘‘निशा… थैंक्यू.’’

‘‘किसलिए?’’

‘‘इस वक्त मेरे साथ बैठने के लिए वरना मैं… मैं टूट जाता.’’

निशा ने धीरे से कहा, ‘‘मैं भी.’’

सुबह 6 बजे होटल वाले ने कहा, ‘‘सर, मैडम, कमरे में जा कर आराम

कर लीजिए.’’

दोनों उठे. 201 और 202 अगलबगल वाले कमरे थे उन के. दोनों अपने कमरों में चले गए.

अगले दिन सुबह के 9 बजे थे. रिजोर्ट

की लौबी में हीटर चल रहा था. बाहर धुंध थी.

टेबल पर 2 कप चाय रखी थी जो ठंडी हो चुकी थी. सामने अमित और निशा बैठे थे. वे रातभर सोए नहीं थे.

दरवाजा खुला. 2 कौंस्टेबल और इंस्पैक्टर रणवीर राणा अंदर आए.

इंस्पैक्टर ने दोनों की तरफ गहरी नजरों से देखते हुए पूछा, ‘‘आप ही हैं अमित और निशा?’’

अमित उठा, ‘‘हां जी सर.’’

निशा ने भी सिर हिलाया. सूजी हुई, लाल आंखें उस के दिल का दर्द बता रही थीं.

इंस्पैक्टर ने कुरसी खींची, ‘‘बैठिए. कल पिक्चर पौइंट के पास क्या हुआ था शुरू से बताइए?’’

अमित ने गला साफ किया. आवाज कांप रही थी, ‘‘सर… हम चारों मसूरी

घूमने आए थे दिल्ली से. मेरी पत्नी अलका और… और निशा के पति नितिन. रास्ते में जाम लग गया था तो हम पैदल निकल लिए.’’

निशा ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘पिक्चर पौइंट की शौर्टकट पगडंडी थी सर. एक तरफ खाई, दूसरी तरफ देवदार के पेड़.’’

इंस्पैक्टर ने बयान दर्ज करते हुए पूछा, ‘‘फिर?’’

अमित बोला, ‘‘अलका आगे चल रही थी. निशा उस के साथ. पीछे मैं और नितिन. अचानक अलका का पैर फिसला. वहां काई थी.’’

निशा सिसक पड़ी, ‘‘मैं चिल्लाई अलका… नितिन दौड़े. उन्होंने अलका का हाथ पकड़ने की कोशिश की… पर दोनों…’’

निशा आगे कुछ बोल नहीं पाई.

अमित ने पानी की बोतल निशा को थमाई.

इंस्पैक्टर ने कहा, ‘‘सम?ा गया. यह हादसा है. बस हमें कन्फर्म

करना पड़ता है वरना कई बार ऐसी स्थिति में क्राइम भी हो सकता है. कोई नहीं जानता कहीं आप दोनों पहले से मिले हुए हों, आप दोनों ने मिल कर अपनेअपने पार्टनर को मारने का प्लान बनाया हो, ऐसा भी तो हो सकता है न?

‘‘सर मैं अपने पति से बेहद प्यार करती थी,’’ कहतेकहते वह फिर से रो पड़ी.

‘‘और हम दोनों तो यहीं मसूरी में आ कर जाम में फंसने के कारण मिले थे,’’ अमित ने बात पूरी की.

‘‘हां, ठीक है मैं ने आप दोनों के बयान दर्ज कर लिए हैं. मैं तो बस अपना काम कर रहा था निशाजी, प्लीज टेक केयर.’’

अमित ने पूछा, ‘‘सर बौडी?’’

इंस्पैक्टर बोला, ‘‘एसडीआरएफ आज

सुबह 5 बजे बौडी निकालने में सफल हुई है. बौडीज पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई हैं. रिपोर्ट 1-2 दिन में आ जाएगी.’’

इंस्पैक्टर ने रजिस्टर पर कलम चलाई, ‘‘एफआईआर दर्ज हो गई है,

धारा 304ए यानी लापरवाही से मौत का केस दर्ज किया है. अभी कुछ और कागजी काररवाई भी होनी है. दोनों मृतक और आप दोनों के आधार कार्ड की भी जरूरत पड़ेगी. आप दोनों और दोनों ड्राइवर गवाह हैं. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक मसूरी मत छोडि़एगा. अभी दोनों ड्राइवर के भी बयान लेने होंगे मु?ो?’’

निशा ने धीरे से पूछा, ‘‘जी सर… हम… कमरे में जा सकते हैं.’’

इंस्पैक्टर ने कहा, ‘‘बिलकुल और हां अपना खयाल रखिएगा.’’

अगले दिन दोपहर 2 बजे फोन आया कि पोस्टमार्टम हो गया है. रिपोर्ट के मुताबिक इतनी ऊंचाई से गिरने से सिर और सीने में गहरी चोट लगी थी. इंटरनल ब्लीडिंग और बौडी पर भी काफी चोटें पाई गईं. मौके पर मौत हुई.

कागजी काररवाई के बाद उन्हें पोस्टमार्टम सर्टिफिकेट सौंप दिए गए.

उस रात 2 बजे निशा कमरे से निकल कर धीमी आवाज में बोली, ‘‘अमितजी…’’

अमित 5 सैकंड में बाहर आ गया. बाल बिखरे थे और आंखें रोंआसी.

अमित ने पूछा, ‘‘क्या हुआ निशा?’’

निशा दरवाजे पर खड़ी थी, हाथ में नितिन का फोटो लिए, ‘‘सपना देखा. नितिन

पूछ रहे थे तुम ठीक तो हो न? अजब सी बेचैनी लग रही है.’’

अमित ने गहरी सांस ली. पास रखी कुरसी खींची, ‘‘मैं यहीं बैठता हूं. आप सो जाओ.’’

‘‘नींद नहीं आ रही.’’

पूरी रात अमित और निशा चुपचाप कमरे के बाहर कुरसी पर बैठे रहे.

अगले दिन सुबह 11 बजे दोनों चाय पी रहे थे. जबान पर खामोशी थी.

निशा उठी और शून्य में देखती हुई बोली, ‘‘आज मैं ने होटल स्टाफ से 2 जोड़ी सफेद सूट लाने को कहा है.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘अब तो सफेद ही मेरी जिंदगी का रंग है न.’’

‘‘ये कैसी बातें कर रही हो निशा और किस जमाने की बातें हैं ये? आज के समय में एक पढ़ीलिखी जौब करने वाली महिला के लिए यह सब जरूरी नहीं. अपनी जिंदगी से रंग और खुशियां खत्म मत करो. मु?ो बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा. तुम हंसतीमुसकराती हुई कितनी अच्छी लगती हो. ठीक है अभी दुख ताजा है पर इस उदासी को हमेशा कायम मत रखना. प्लीज अपनी जिंदगी फिर से शुरू करो.’’

निशा को महसूस हुआ जैसे अभी भी कोई है जो केवल उस की खुशी चाहता है, उस के जीवन में रंग भरना चाहता है. अचानक निशा अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाई और अमित के सीने पर सिर रख कर सुबक उठी.

एक अजीब सा एहसास दोनों को भिगो गया. अमित ने उस के सिर पर हाथ फेरा और उस के हाथों को थाम कर उसे सामने रखी कुरसी पर बैठा दिया.

10 मिनट तक कोई कुछ नहीं बोला.

फिर निशा ने कहा, ‘‘घर जा कर क्या करूंगी?’’

अमित भी टूटे स्वर में बोला, ‘‘पता नहीं. मेरा फ्लैट भी अब घर नहीं लगेगा. मगर निशा आप को जब भी अकेलापन लगे आप याद रखिएगा मैं आप के साथ हूं. बस मु?ो एक काल कर दीजिएगा.’’

निशा की उदास आंखों में हलकी सी मुसकराहट आई, ‘‘थैंक यू.’’

रात में बारिश हुई और लाइट चली गई.

निशा अमित के कमरे में चली आई, ‘‘अमितजी… डर लग रहा है.’’

अमित टौर्च और बिस्कुट का पैकेट ले आया, ‘‘ये लो. सुबह से कुछ नहीं खाया.’’

‘‘आप ने भी तो नहीं खाया.’’

निशा ने पैकेट खोला. एक बिस्कुट तोड़ा. आधा उसे दिया, आधा खुद लिया.

अगले दिन उन के हाथ में पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई थी. रात में निशा अपने कमरे में थी. वह अपने मोबाइल पर नितिन का फोटो देख रही थी. तभी दरवाजे पर बैल बजी.

कौस्टेबल खड़ा था बोला, ‘‘मैडम आप के पति का सामान.’’

निशा ने बैग टेबल पर रखा और देर तक देखती रही. हिम्मत नहीं हो रही थी खोलने की. बहुत हिम्मत कर के खोला. बैग के अंदर शर्ट, पर्स, घड़ी, जूते और नितिन का फोन था.

रात 11 बज गए थे मगर निशा को नींद नहीं आ रही थी. उस ने नितिन का फोन उठाया

जो लौक था. उस ने पासवर्ड्स ट्राई किए. पहले ऐनिवर्सरी की डेट डाली मगर फोन नहीं खुला. फिर नितिन का बर्थडे डाला. फिर अपना बर्थडे लेकिन फोन नहीं खुला. आखिर में नितिन की मां का बर्थडे डाला तो फोन खुल गया.

निशा ने नितिन के फोन की गैलरी ओपन की और यह देख कर दंग रह गई कि उस के फोन में कितनी ही लड़कियों के हौट फोटोज थे. कहीं वह किसी लड़की के हाथों को किस कर रहा है कहीं किसी के हाथों को थामे प्यार से खड़ा है. किसी में कोई लड़की उस के एकदम करीब है तो कहीं हैट पोज दे रही है. इतनी लड़कियां नितिन की करीबी फ्रैंड थीं और निशा को इस का एहसास भी नहीं था. वह तो निशा को हमेशा यही एहसास दिलाता था कि वही उस की जिंदगी में सबकुछ है.

निशा के हाथ कांपने लगे. व्हाट्सऐप खोला. प्रिया डार्लिंग नाम से लंबी चैट हिस्ट्री थी. लास्ट मैसेज उस की सोच के परे थे.

प्रिया, ‘‘कब मिलोगे? निशा को पता तो नहीं चलेगा न?’’

नितिन, ‘‘पागल है क्या? वह भोली है. उसे कुछ पता नहीं चलेगा.’’

इस तरह के और भी कई लड़कियों के साथ चैट थे.

निशा ने फोन पटक दिया. सीने में जैसे किसी ने छुरा घोंप दिया हो. यह वही नितिन था जो 3 सालों से हर रात उसे आई लव यू कहता था.

वह फूटफूट कर रो रही थी. पर इस बार आंसुओं में दर्द के साथ गुस्सा भी था.

नितिन के उस प्यार के पीछे इतने बड़े धोखे

छिपे थे यह सोच कर ही उस का दिल विचलित हुआ जा रहा था. आज उसे किसी ऐसे हमदर्द

से अपने दिल का दर्द बांटने का मन कर रहा था जो सच में उसे थोड़ा सा सुकून और मन को राहत दे सके.

उस ऐक्सीडैंट में निशा ने अपनी जिंदगी के साथी, अपने पार्टनर को खोया था मगर आज उसे एहसास हो रहा था जैसे वास्तव में नितिन तो उस का था ही नहीं. जिस शख्स को वह अपनी जिंदगी मान रही थी वह तो उस की जिंदगी के साथ इतने धोखे कर रहा था.

थोड़ी देर आंखों से अपना दर्द बहा चुकने के बाद निशा ने अपना मोबाइल उठाया. मोबाइल पर उस ने अमित का नंबर डायल किया. शायद अमित ही था जो उस के टूटे मन पर मरहम लगा सकता था.

‘‘अमित मु?ो आप का साथ चाहिए. प्लीज मेरे कमरे में आओ.’’

निशा के चेहरे पर एक या उजास नजर आ रहा था. वह एक नई जिंदगी की तरफ अपने कदम बढ़ा चुकी थी. उस ने जो खोया था उस से बेहतर शायद उस ने पा लिया था.               द्य

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