Latest Hindi Stories : पता नहीं कि तुम ही नए आए थे उस लाल तिकोनिया बंगले में या मुझे ही हर पुरानी चीज के नए अर्थ तभी समझ में आने शुरू हुए थे. पिछले 12 सालों से नित्य नियम से सुबहशाम मेरी वैन उसी रास्ते से, उन्हीं पेड़ों के झुरमुट के बीच से होती हुई तुम्हारे तिकोनिया बंगले के सामने से स्कूल जाती थी. मगर तब मुझे वह कभी महज किसी सड़क, दुकान या बेरौनक वीरान मकानों से ज्यादा कुछ नहीं लगा था. उस घुसी हुई वैन में मैं हमेशा

उस तरफ बैठती थी जहां से तिवोनिया बाग दिखता था. कुछ वक्त से मुझे वह लाल रंग का छिली ईंटों वाला बंगला व उस के तीनों ओर आम, अमरूद व बेरिया के हरे झाड़ कुछ ज्यादा ही खुशगवार लगने लगे थे. वहां आड़ू के पेड़ पर उस की नंगी शाखाओं पर हजारों नन्हे मोतियों से जुड़े बैगनी रंगत के गुलाबी फूलों पर आंखें अटक कर रह जाती थीं. मेरे लिए हर चीज का अर्थ बदलता जा रहा था? यह हैरानी मेरी छोटी उम्र

में बड़ीबड़ी आंखों में छोटी उम्र में जैसे समाती नहीं थी.

फिर एक दिन मेहंदी की महीन झाड़ के पीछे परशियन गुलाब की छतनार शाखाओं के साए में सफेद टीशर्ट और शौर्ट्स में मेज पर लैपटौप खोले किताबों के गट्ठर के बीच सिर झुकाए तुम भी मेरे उस फोटो फ्रेम में शामिल हो गए थे.

अभी मैं ने तुम्हारा चेहरामुहरा कुछ नहीं देखा था. पर तुम… तुम… ही थे जिस का वहां बैठे दिखना मुझे जरूरी सा लगने लगा था. जिस दिन तुम नहीं दिखते थे, हर वक्त एक खाली बेचारगी सी मेरे दिमाग में घूमती रहती थी. तुम ने मुझे व हमारी वैन को शैतान स्कूली लड़कियों की कही निकलती टोलियों में से एक समझ कर कभी देखने या झांकने की जरूरत नहीं समझ थी. वैसे भी वैन को गुजरने में लगते ही कितने सैकंड्स थे पर आमतौर पर तुम्हारे घर के सामने जाम रहता या और वैन खड़ी रहती थी. हां, तुम्हारी चाची जरूर फाटक पर खड़े हो अकसर हम लोगों की वैन को आतेजाते देखा करती थीं. घर में शायद और कोई नहीं था. बच्चे के नाम पर एक तुम ही थे जो संजीदगी में बुजुर्गों से भी बढ़ कर रहे होगे.

ऐक्सरसाइज करने के लिए दिन तुम आम के पेड़ पर चढ़े हुए थे. एक तुम्हारे लड़कियों जैसे सुडौल लंबे पंजे व फिर धूप से तपा चेहरा पहली बार दिखाई दिया था. क्या था उस में जो मेरे दिल और दिमाग में नक्ष हो कर रह गया था. मैं मूर्त्त सी चोर निगाहों से कभी तुम्हें और कभी तुम्हारी चाची को देख रही थी.

उस दिन के बाद तुम कतई दिखना बंद हो गए थे. तुम्हारे पासपड़ोस की मेरी सहेलियां

हंसती थीं, ‘‘राजा बेटा आईआईटी में इंजीनियर बनने गए हैं.’’

तुम्हारा घर हमारे घर से कुछ ही दूरी पर था इसलिए उड़तीउड़ती खबरें मिल ही जाती थीं.

कुछ बनने के लिए कुछ खोना ही पड़ता है और फिर खोना ही तो पाने की पहली शर्त है. मैं क्यों अपने को सम?ासम?ा कर परेशान हो रही थी. अपने एक पागलपन पर परेशान हो रही थी. अपने एक पागलपन पर अकेले ही हंस पड़ती थी. मेरी उम्र वह हो चुकी थी जब मन के किसी जानेअनजाने कोने में कोई बैठ जाता है. कई बार मैं बाजार जाने के बहाने तुम्हारे घर के सामने से पैदल भी जाती थी. वहां लगे सफेद गुलाबी गुच्छों में जैसे हर जगह मुझे तुम्हारी छुअन का रेशमी सा एहसास सहला जाता था. सच तो यह था कि मेरी उम्र का वह गुलाबी टुकड़ा एहसासों में ही जी रहा था.

कई साल बीत गए तुम कभी दिखते कभी नहीं. मैं नौकरी करने लगी थी. एक दिन दफ्तर से लौटी तो मेरी पढ़ने की मेज पर तुम्हारा छोटा सा फोटो रखा था. कैसे एकदम से पहचान गई थी मैं, ‘‘अरे, यह तो तिकोनिया बंगले वाले…’’

सोनाली चहकने लगी, ‘‘हाय जीजी, तू इन्हें जानती है क्या? यही तो हैं जिन से तेरी शादी की बात चल रही है.’’

मेरे सिर से पैर तक लाज के लाल गुलमोहर दहक उठे थे.

‘‘जीजी, उन की चाची ने तुम्हें कई बार घर के सामने से गुजरते देखा है और तुम पसंद आ गई हो. बगल वाली सुशीला आंटी से उन की जानपहचान है इसलिए यह फोटो आया है.

बाकी तुम फेसबुक पर देख लो. अगर प्रोफाइल खुला है तो.’’

‘‘धत्,’’ मैं ने सोनाली को एक धौल जमाई.

सोनाली उम्र में मुझ से सालभर छोटी थी. पर अकल में शायद सौ साल सयानी. कहने लगी, ‘‘दीदी, ठाट करेगी तू अब उस बंगले में. इंजीनियर साहब हैं ये जनाब. चाची ने गोद ले रखा है. अकेले ही हैं. कोई ननददेवरों को झमेला नहीं है. मुझे भी आराम रहेगा भरभर झेली आड़ू, अमिया और झरबेरी खाने को मिला करेंगे.’’

मेरे लाख छिपाने पर भी खुशी जैसे रोमरोम से फूट पड़ रही थी. क्या कभी इतनी आसानी से किसी के सपने पूरे हो जाते हैं? अभी तो खुमार से पलकें ही ?ापी थीं. अभी तो मैं ने सपने देखने भी शुरू नहीं किए थे कि यह सुनहरा संसार मुझ तक स्वयं ही चल कर आ गया था. दफ्तर में मुझे अभी तक कोई मनचाहा नहीं मिल था. शायद इसलिए कि मन के किसी कोने में तुम्हारी तसवीर बैठी थी.

अब तो हालत यह थी कि खुली आंखों में ही मुझे  सपने आने लगे थे. कभी बंगले की मखमली दूब पर चांदनी रात में हौलेहौले आंखों ही आंखों में बतियाते हमतुम, फूलों से लदी

डाली झलाते तुम और उस के नीचे फूलों के अंबार में लालगुलाबी होती मैं. कभी आम

तोड़ते तुम और कुहनी तक भरी चूडि़यों से खनकते हाथों से टोकरी में आम उलटती मैं. कभी टै्रक पैंट में क्यारी गुड़ाती मैं और अंजली भर मेहंदी की महीन पत्तियां मुझ पर उड़ेल कर खिलखिलाते तुम.

बंगले के अंदर का भी एक मनभावना नक्शा मेरे मन में बन कर तैयार हो गया था. कभी गुलाबी, कभी प्याजी परदे बदलती, अबीरी सलवारकमीज से सिर से पांव तक ढकी, बड़ी सी लाल बिंदी और डायमंड के इयररिंग्स, हाई हील्स में मैं अपनी ही खींची छवि के पीछे पागल हो उठती थी.

प्रतीक्षा के इस लंबे लगते अंतराल के बाद सोनाली ने मुजे पाजेबों सी खनकती खबर दी थी, ‘‘अगले सोमवार को तेरी सास और ये मोशाय तुझे देखने और बात करने के लिए आ रहे हैं.’’

सारे घर में हबड़दबड़ मच गई थी. मांबाबूजी को इतना अच्छा रिश्ता पाने की उम्मीद नहीं थी. फिर तुम्हारे चाचाचाची ने एक पैसे का भी लेनदेन नहीं ठहराया था. इसी से मांबाबूजी भी खातिरदारी में कोई कोरकसर नहीं छोड़ना चाहते थे. सो बड़े धूमधड़ाके से तैयारियां शुरू हो गई थीं.

यह देखनादिखाना तो औपचारिक ही था. बातों में पता चला, ‘‘मिताली, मैं तो तुम्हें अरसे से देख रहा था. तुम ऐसे ही घर के सामने से कहीं गुजरती थीं. छमछम करती तुम्हारी सहेली की आवाज मुझे भी यह देखने को मजबूर कर देती थीं.’’

कुछ मिनटों में सब तय हो गया. इंगेजमैंट की डेट भी पक्की हो गई.

बिजनौर से छोटी मामी और नानी भी इतवार को आ गई थीं. गत रात तक मां और नानी ने दहीबड़े, सौंठ और भरभर छबड़े मिठाई तैयार की थी. कैटरर का भी इंतजाम कर लिया गया. मामी मेरी सजावट को ले कर परेशान हो रही थीं. कभी लाल साड़ी खोलतीं, कभी धानी. कौन सी साड़ी फबेगी? ब्लाउज किस रंग का हो? कौन सी लिपस्टिक लगेगी? मसकारे के बिना तो कुछ अच्छा ही नहीं लगेगा. सुबह से मैं 2 बार पार्लर हो आई थी. मामी सुबह से मुझे सजानेसंवारने में जुट  गई थीं. मामी ने जब सच्चे मोतियों का नाजुक सा हीरों का हार व झुमके पहनाए तो मैं सच कहीं की रानी लगने लगी थी.

हारसिंगार के बाद अपने को शीशे में देख मैं खुद ठगी सी रह गई थी. कालेज की सीधीसादी सफेद पोशाक और दफ्तर की फौर्मल ड्रैस में इतना रूप कहां कैसे छिपा हुआ, मैं अवाक थी.

‘‘मिताली, तेरी ये भोली, हैरानी भरी आंखें बहुत आकर्षक हैं. इन का पूरा इस्तेमाल करना,’’ मामी खिलखिला कर बोलीं तो अपनी बड़ीबड़ी आंखों में तुम्हारी छवि समेटे मैं लाजवंती सी लरज उठी.

तुम्हारी ताइयां, भाभियां, दादी और नानी आईर् हुई थीं. कुछ लड़केलड़कियां दोस्त भी थे. पर मेरे रूप की यह दपदप दहकती ज्योति देखने तुम आए और कुछ मिनट देखते रह गए. इतने रूप की तुम ने कल्पना नहीं की थी. पर जल्द ही गोदभराई की रस्म के बीच अपनी शहदीली चितवनों, लाल, कटावदार होंठों, दूधिया गुलाबी रंग और सलोनी मूर्त की तरह गढ़े जिस्म के बारे में मीठीमीठी बातें सुन कर एक अजनबी से

लगते अछूते नशे से मैं सिर से पांव तक सराबोर हो उठी थी.

सब से अंत में तुम्हारी दादी व चाची मां ने बड़े चाव से मेरी गोद में नारियल, मेवा, मिठाई रखी फिर सहसा मांग में रोली लगाते हुए दादी चौंक गईं, ‘‘अरी बेटी, जरा देख तो नजदीक से,’’ उन्होंने बड़ी बेदर्दी से मेरा आंचल हटा कर मांग पर हाथ फिराया, ‘‘यह… यह तो मांग में नागिन है.’’

चाची सन्न सी खड़ी रह गईं. मेरे सारे जिस्म का खून खिंच कर जैसे आंखों में भर आया था. आवाक, हैरान आंखें फाड़े देख रही थी मैं. क्या हुआ? फौरन दादी व चाची रोली का थाल जमीन पर रख उठ गईं. मेरी सांस रुकने सी लगी. दिमाग फटने सा लगा जैसे किसी ने सिर के बीचोंबीच आरी चला दी हो.

मां बारबार कह रही थीं, ‘‘ये सब पुरानी बातें हैं… बहनजी अब इन्हें कौन मानता है? कोई सचाई नहीं है इन में.’’

पर चाची पर्स उठा कर खड़ी हो गईं, ‘‘बहनजी, कोई माने या न माने, हम तो मानते हैं. हमारे दोचार तो हैं नहीं, यही एक इकलौता लड़का है. जानतेबूझते कैसे गला फंसा दें? मांग की नागिन तो सुहाग का साक्षात काल है.’’

तुम चुपचाप खड़े अपनी चाची की बेबकूफी को सहते रहे. फिर चाची के साथ हट गए. मैं दहशत से जड़ बनी बैठी थी. मामी ने हलके से मुझे उठाया था. बिजली का ?ाटका खाए से तन से चलती मैं कैसे ऊपर कमरे तक आई थी, मालूम नहीं. बहस फिरकब नीचे की थमी, कब मेरी जगह तुम ने सोनाली को अपना लिया

और पन्ने का हारझुमका पहना कर वे सब कब चले गए, मुझे कुछ पता नहीं चला.

यह ऐसा झटका था जिस ने फिर से मेरी जिंदगी में हर चीज के अर्थ बदल दिए थे.

2025 में भी कोई इतना अंधविश्वासी हो सकता है दिल नहीं मान रहा था. पता चला कि उन के यहां तो पूजापाठ, पंडितों का रेला लगा रहता है. चाची घोर दकियानूसी थीं. मैं हिल कर रह गईर् थी. इस से संभलना मेरे लिए दुश्वार था. हर पल गिलहरी सी उछलतीकूदती सोनाली अलग अनजाने अपराध के भार से पाला पड़े बिरवे सी मुर?ा गई थी. मैं उस से और वह मु?ा से आंख चुरा रही थी. मां भी अच्छा लड़का हाथ से न निकलने देने के लालच में जो निर्णय जल्दी में कर बैठी थीं, वह खुद उन्हें खाए जा रहा था.

सुलग रहा था मेरा सारा संसार. उस से उठते धुएं में मेरा दम घुट रहा था. मैं उस जहरीली आग में जिंदा जल रही थी, पर तुम? तुम तो बिलकुल बेखबर थे. काश, तुम ने मुझ बेगुनाह पर ढाए गए इस कहर के खिलाफ कुछ कहा होता. एक शब्द भी तो सांत्वना का तुम नहीं दे सके थे मेरे बुझाते हुए दिल को. कैसे पढ़ेलिखे थे तुम? दकियानूस, कायर, दब्बू. नफरत होने लगी थी मुझे तुम से और सच कहूं

तो धीरेधीरे सोनाली से भी. क्या वह नहीं जानती थी कि मेरे मनमंडप में तुम ही तुम थे. बस

केवल तुम. क्या यों ही सगी बहन से ही छिन जाने के लिए. पर उस का भी क्या दोष था? था ही क्या मेरी प्रेम कथा में कहने को? मेरा गूंगा प्रेम तो मेरे सामने भी अभी पूरा मुंह नहीं खोल पाया था, फिर तुम या सोनाली क्या समझते?

तुम तो दादीचाची के कदमों पर चलने वाले कठपुतली निकले. बहुत सोचने के बाद मैं ने दूसरे शहरों में नौकरी के लिए आवेदन भेजने शुरू कर दिए थे. किसी भी हालत में सनोली की शादी की रात को मैं उस घर में नहीं रहना चाहती थी, जहां गाजेबाजे के साथ मेरा प्राप्य मुझ से छीन मेरी ही सगी बहन की ?ोली में डाला जाना था. मेरी यह इच्छा पूरी हो गई थी और कंटीली यादों का बोझ समेटे बहेलिए के जाल से छूटी आकुल हिरनी सी मैं अपने और तुम्हारे शहर से बहुत दूर निकल आई थी.

तुम सोनाली की मांग में सिंदूर भर कर उसे डोली में बैठा कर अपनी छिली ईंटों के लाल बंगले में ले गए थे और मैं अपने अपमान के

डंक को कलेजे से निकालने के प्रयत्न में लहूलुहान होती रही थी. 2 साल तक गरमी की छुट्टियों में भी जानबू?ा कर मैं घर नहीं आई थी. टूर पर जाती लड़कियों के साथ निकल जाती थी. पर तुम ने जैसे मेरे लहू रिसते जख्मों को सूखने न देने का प्रण कर रखा था. तुम्हारे घर में साल बीतते संगम जन्मा था और अगले बरस तबादले के बाद तुम वहीं आ गए थे जहां मैं अपने बनाए बंधनों में अपने जख्मी वजूद को कसे किस तरह जी रही थी, मैं ही जानती थी. तुम्हें वहीं नौकरी मिल गई थी.

तुम्हारा सामान तुम्हारे घर में उतर रहा था और तुम एक पुराने रिवाज और जर्जर रिश्ते को निभाने के लिए सोनाली और गोलमटोल संगम को संभाले मेरे यहां लंच पर आए थे. आखिर चाह कर भी मैं छोटी बहन और भतीजे को देखने का मोह नहीं छोड़ सकी. तब तुम ने एक भरपूर निगाह मुझ पर डाली थी. उस में कितना अपराधबोध था और कितना एक रहस्य से जुड़ी कमजोर शख्सियत को देख कर उपजी करुणा मिश्रित प्रशंसा का भाव, मैं आंक भी न पाई थी कि तुम फिर तुरंत ही संभल कर फिर सोनाली और संगम की ओर देखने लगे थे. सोनाली से पता चला था कि चाचाजी नहीं रहे और तुम्हारी चाची साथ ही हैं पर वह सामान लगवा रही थीं, इसलिए नहीं आईं.

मैं इस बेबात के बहाने पर खिसियाई सी मुसकराई थी. मकान में बिजली, पानी का प्रबंध होने में कुछ समय लगा था और सोनाली की तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. अत: सोनाली और संगम मेरे ही पास रुके थे. तुम उन्हें लेने आखिरी दिन आए थे. इन 4 दिनों में ही संगम मुझ से बेहद हिल गया था. जाते समय वह बहुत हिलकहिलक कर रोया था. मैं ने दफ्तर में 4 दिन की छुट्टी ली थी. मेरा भी रहरह कर संगम को प्यार करने और तुम्हारी सजीसंवरी दुनिया देखने का मन होता था. पर हिम्मत नहीं जुटा पाईर् थी. इतना बड़ा कलेजा मैं कहां से लाती?

रास्ते में, बाजार में, रिश्तेदारी में कभीकभी तुम और सोनाली मिल जाते थे. बातों के बीच वह अपनत्व व बेबाकी कभी नहीं आ पाई जो ऐसे रिश्ते में रहती है. हम तीनों ही जरूरत से ज्यादा सावधान रहते थे कि कहीं मुंह से कोई बेजरूरत अमर्यादित बात न निकल जाए. तब बहुत शिद्दत से यह सचाई महसूस हुई थी कि दर्द का हद से गुजर जाना है दबा हो जाना. अब मेरे अंदर एक हिमानी संयम सा भर गया था. तुम्हारे लिए नफरत और प्यार दोनों बराबर हो कर शायद खुद ही एकदूसरे के वार से खत्म हो अब सुलहसफाई कर चुके थे. सोनाली, मां और मेरे सहकर्मियों ने सहमतेसहमते हुए कई बार कहा, पर मुझे शादी के नाम से नफरत हो गईर् थी.

मैं अडिग, अविचल तापसी सी अपने अंधेरों और वीरानों में संतुष्ट थी. पर एक चाह चोर सी जरूर मेरे दिल के किसी कोने में हर वक्त बैठी रही थी कि काश, कभी, कहीं, कैसे ही तुम मु?ा से कहते, शिद्दत से अपना अपराध महसूसते हुए कि मीताली, मैं तुम्हारा अपराधी हूं. मैं कमजोर था. मजबूर था. इतना बड़ा दंड तुम निर्दोष को ?ोलना पड़ा मेरी कमजोरी की वजह से… पर कितने कंजूस निकलते तुम… कितने मायावी. मेरी यह चाह चाह ही रह गई.

कितनी बार अवसर आया जब तुम मुझ से यह कह सकते थे, पर तुम वीतरागी ही बने रहे जैसे तुम्हें कुछ मालूम ही नहीं था. मेरा सोने का संसार तुम्हारे पांवों तले जल कर खाक हो गया और तुम्हें सेंक भी नहीं पहुंचा, यह कैसे संभव था? मेरा मन हाहाकार कर उठता था. कितना चाहती थी कि मैं तुम्हें अपनी जिंदगी से काट कर सोचूं पर सोचने की कोशिश में तुम्हारे बारे में उलटा कुछ ज्यादा ही सोच जाती थी. ऊपर की शांत सतह के नीचे एक अजीब चूहादौड़ सी मची रहती थी मेरे मन में. सोनाली से कुछ छीन लेने की न तो इच्छा थी न हिम्मत. असल पूछो तो अंदर तुम्हारे खिलाफ नफरत का समंदर भी लहरा रहा था.

सिर उस दिन भी बहुत भारी हो रहा था. काफी देर ठंडे पानी के फुहारे के नीचे खड़ी हो कर नहाई. बाल शैंपू कर हलकी सी मूंगिया कोटा की प्याजी साड़ी पहनी तो कुछ हलकापन महसूस हुआ. शाम की चाय रंभा से लौन में ही लगवा कर 1-1 चुसकी ले रही थी कि  तुम्हारी जीप की धड़धड़ाहट मेरे कानों में पड़ी.

रंभा टिकोजी हटाते हुए बोली, ‘‘शायद आप की छोटी बहन और बहनोई आए हैं.’’ ‘‘हां, दो प्याले और ले आ. चाय भी और चढ़ा देना. क्रिड से नाश्ता भी ले आना.’’

मगर आश्चर्य, जीप से तुम नहीं तुम्हारे कोई साथी उतरे थे. उन की गोद में संगम को देख कर मैं चौंक गई. सोनाली हमेशा उसे खूब सजासंवार कर रखती थी, पर आज मैली कमीज और चेहरे पर रोतेरोते खिंचीं आंसू और मैलकी लकीरें कुछ और ही कह रही थीं. तब उन्होंने ही वह विस्फोटक खबर दी तुम्हारे व सोनाली के एक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो जाने की.

संगम को कलेजे से चिपटाए मैं कांपते कदमों से वैसे ही गीले बालों में उन के साथ अस्पताल पहुंची थी. तुम विशेष देखभाल वाले कक्ष में थे और सोनाली औपरेशन थिएटर में. तुम्हारे सिर में गंभीर चोट आई थी. तुम बेहोश थे और सोनाली के पेडू से पैर तक का सारा भाग कुचल गया था. हुआ वही जिस का हर पल मु?ो डर था. सोनाली को सारे डाक्टर एकजुट चौबीस घंटे लगे रह कर भी नहीं बचा पाए. रात तक बेहाल मांबाबूजी के साथ तुम्हारी चाची भी आ गई थीं. अगले दिन सोनाली का दाहसंस्कार चुपचाप कर दिया गया था.

सब ने अपने होंठ सी रखे थे क्योंकि तुम अभी तक बेहोश थे. एक अनकहा आतंक हम सब पर छाया हुआ था. 3 दिन के जानलेवा अंतराल के बाद तुम ने आंखें खोली थीं. आंख खोलते ही जो सब से पहला लड़खड़ाता वाक्य तुम्हारे होंठों पर आया था वह था, ‘‘सोनाली और संगम कहां हैं?’’

पूरे संयम के बावजूद यह कहते हुए मेरा वजूद कांप गया था, ‘‘सोनाली लेडीज वार्ड में है और संगम यह रहा.’’

तुम्हारे घबराए चेहरे पर ढेर सा सुकून उभर आया था. तुम पूरे 7 दिन अस्पताल में रहे थे.

पर फिर मैं साहस नहीं जुटा पाई थी, दोबारा उस ?ाठ को सच ठहराने का. चाची, अम्मां व बाबूजी ने ही साधा था तुम्हें 7 दिन. 8वें दिन तुम्हारे घर जाने पर संगम को ले कर मैं आईर् थी. तुम बिल्ली को देख सहमे किसी परिंदे की तरह खामोश आंखों में खून के आंसू रोते पड़े थे. संगम को चिपटा कर तुम जोरजोर से रो उठे थे. मेरा भी सब्र का बांध टूट गया था. घुटनों में सिर दे मैं वहीं बिलख पड़ी थी. संगम घबरा कर तुम से अपने को छुड़ा कर मेरी साड़ी खींचने लगा था, ‘‘अपने घर चलो. अपने घर चलो.’’ यह रट लगाने लगा था. चाची, अम्मां और तुम कितना बहलाते रहे, ललचाते रहे, पर वह नन्ही सी जान मु?ा से ही चिपका रहा.

आखिरकार मां के कहने से 15 दिन की छुट्टी ले कर मैं तुम्हारे ही घर पर रही थी. कैसे संगम को संभालने के साथसाथ तुम्हारी दवा, पानी, पथ्य की भी पूरी व्यवस्था मैं ने संभाल ली है, देख कर चाची कुछ आश्वस्त सी लगी थीं.

इन 15 दिनों में तुम्हारी सुबह की नीबू चाय,

फिर उबले अंडे, परांठे का विचित्र नाश्ता, लंच में 2 बेसनी पराठों के साथ ढेर सी हरी सब्जी और साथ में जीरा पड़ा मट्ठा, शाम को गरम मलाईदार कौफी और रात को दही, दालभात, सलाद, चटनी से भरपूर पक्का हिंदुस्तानी भोजन. खाने के बाद कुछ मीठा, नहीं तो चम्मच भर चीनीमिश्री ही. मु?ो 1-1 चीज रट गईर् थी. जिस दिन से तुम ने दफ्तर जाना शुरू किया था, उस के तीसरे ही दिन मैं भी अपने घर लौट आई थी.

कमरतोड़ व्यस्तता के बाद थकान से मेरा अंगअंग टूट रहा था. पर साथ ही सुबह से रात तक खत्म न होने वाले हजारों छोटेमोटे कामों के बिना बड़ा विकट सूनापन भी भास रहा था. एक प्याला कौफी पी कर मैं सो गई थी. बहुत गहरी नींद में थी. कोशिश करने पर भी आंखें खुल नहीं पा रही थीं. अखनक संगम के छोटेछोटे हाथों की छुअन मु?ो अपने माथे पर लगी. मैं लगभग उछलते हुए उठ कर बैठ गई, ‘‘हाय मेरा सोनू…’’ उसे कस कर अंक में भरने के बाद ही मैं देख पाई कि तुम भी वहीं खड़े थे.

कुछ सकुचा कर उठ खड़ी हुई मैं.

‘‘यह तो आप के जाने के बाद से न सोया है, न दूध पी रहा है. बस यहां आने की रट लगाए हुए है,’’ तुम ?झिझक कर बोले.

‘‘इसे अब कुछ दिन यहीं रहने दीजिए. सहम गया है,’’ कहने को तो मैं कह गई थी पर ऐसे कब तक चलेगा? फिर तो बिलकुल ही भूल जाएगा इन सब को. मैं ने घबरा कर सोचा था. तुम भी उसी भूलभुलैया में भटक रहे थे. मैं ने एक कुछ टाइम मेड रख ली थी. संगम का अबोध मन समझ चुका था कि कुछ हुआ है कि मां साथ नहीं है. उस ने मेड को सहज स्वीकार कर लिया.

पूरे 6 महीने इसी भटकन में गुजर गए. संगम बारबार आता, मुझे लगा था कि तुम भी संगम जितने ही नन्हे थे. न अपने कपड़े, न चप्पल, न दवा कुछ भी तुम खुद नहीं ले सकते थे. इतने लापरवाह और बेखबर कि फटे, बिना बटन की कमीज में ही तुम अपने से छोटे अधिकारियों के साथ मीटिंग करते थे. संगम अब अपने घर जा कर रहने लगा था. चाची देखभाल कर रही थीं और हर दिन में 4 बार मुझ से पूछतीं कि क्या करना है. अब उन्हें मेरे में नागिन नहीं दिखती थी.

एक दिन जब घर पर संगम से मिलने आए तो मुझे टोकना ही पड़ गया, तुम 3 दिनों से मैले कपड़े पहन कर दफ्तर जा रहे थे आज ये धुलेंगे. आज दूसरे कपड़े पहन कर दफ्तर जाइए.

तुम्हारे घर से कपड़े ले आई थी. पलंग पर कर रख दिए हैं.’’

तुम ने जिस भोले विस्मय से मुझे और कपड़ों को देखा था उस से मैं शर्म से गड़ सी गई थी. मैं ने अपनी जीभ काट ली थी. यह आज्ञा जैसा आग्रह किस अधिकार से कर बैठी थी मैं?

मगर बावजूद सावधान रहने के अनजाने में ही मैं ये अनाधिकार चेष्टाएं अकसर करने लगी थी. जवाब में तुम एक भोली पर बेधने वाली निगाह से देखते रह जाते थे. तब मुझे अपनी सीमा रेखा के अतिक्रमण का एहसास होता था.

उस दिन औफिस में एक विशेष कार्यक्रम था. 2-3 दिन पहले से बहुत काम था. इधर चाची को मियादी बुखार हो गया था. संगम की शायद दाढ़ें निकल रही थीं, इसलिए वह बहुत चिड़चिड़ा हो गया था. ऊपर से तुम्हें अचानक दौरे पर जाना पड़ा. मैं सब तरह की जिम्मेदारी संभालतेसंभालते परेशान सी हो गई थी. कार्यक्रम वाले दिन मैं चाची को नौकर के हवाले कर संगम को औफिस साथ ही ले गई थी. मेड ने 4 दिन की छुट्टी ले रखी थी.

शाम को हाल में संगम को साथ लिए मैं काम संभाल रही थी कि तुम सीधे दौरे से दूल भरे कपड़ों में थकान से निस्तेज चेहरों के साथ आ खड़े हुए. संगम को लेने हाथ आगे बढ़ाते समय तुम्हारी भीगी लाल आंखें तुम्हारे बिना होंठ खोले ही सबकुछ कह गई थीं.

अगली सुबह तुम मेरे उठने से पहले ही आ गए थे. पता नहीं कि सारी रात तुम सो भी पाए थे या नहीं. मैं ने तुम्हारी मनपसंद नीबू चाय बनाई तो मुरझाई मुसकान होंठों पर खींचते हुए तुम ने बहुत दर्द के साथ कहा, ‘‘संगम और मेरी वजह से आप को बहुत तकलीफ उठानी पड़ रही है. दरअसल, मेरी कहने की हिम्मत तो नहीं हो रही, पर…’’

मैं ने आंखों में प्रश्नचिह्न भर कर तुम्हें देखा. तुम ने बड़े जोर से मु?ो देखते हुए रुकरुक कर कहा, ‘‘मैं… मैं तुम्हें हमेशा के लिए ले जाने आया हूं.’’

‘‘मनु,’’ मेरे होंठ कांप रहे थे.

‘‘हां, मिताली, मैं तुम से शादी करना

चाहता हूं.’’

‘‘पर तुम्हारी चाची…’’ लरजते कंठ से फंसेफंसे शब्द निकले थे.

तुम मुसकराए, ‘‘नहीं, वे मेरा दिल नहीं तोड़ेंगी.’’

‘‘पर पहले भी तो…’’ मैं ने जान कर वाक्य अधूरा छोड़ दिया था.

‘‘तब मजबूरी थी. चाची का पहला हठ था,’’ तुम गड़बड़ा गए थे.

‘‘अब भी वे फिर यही हठ कर सकती हैं,’’ गहरे दरिया में डूबतीतिरती मैं अचानक सतर्क हो कर सिर उठा कर बोली.

‘‘नहीं, अब संगम की वजह से वे मजबूर हैं. तुम्हारे सिवा उसे संभालने वाला कोई और…’’

मेरे कानों के पास बजते शहनाई के मीठे स्वर सहसा गरम औंटते लावे की तरह सारे जिस्म के खून में मिल कर सुलग उठे थे. मेरा सर्वस्व कांप उठा था जैसे किसी ने सरेआम मेरी खुली पीठ पर चाबुक मार दिया हो. तड़प कर दोनों हथेलियों से मुंह ढांपे मैं फफक उठी, ‘‘पहले तुम चाची की वजह से मजबूर थे मु?ो त्यागने के लिए और आज… आज तुम संगम की वजह से मजबूर हो मुझे अपनाने को. मेरे अपने वजूद से तुम्हें कोई मतलब नहीं, कोई रिश्ता नहीं?’’

एक लंबी सिसकी से कांप उठी थी मैं, ‘‘ऐसी किसी मजबूरी को किसी पवित्र रिश्ते का ऊंचा नाम देना गलत है, ?ाठ है… सैनियशनेस है.’’

एक ?ाटके में तमाम अरमानों के बंदनवार तोड़ विक्षिप्त सी मैं अंदर दौड़ी चली गई अपना मुंह अंधेरे और वीरान में छिपाने के लिए, जहां कहीं दूर से आते भटकेभटके स्वर रो रहे थे.

उस दुख भरे उन्माद के उतरने से पहले ही मैं ने निर्णय ले लिया था- अपनी घुटघुट कर मरती जिंदगी को एक मुक्म्मल जहान देने का, उमेश को अपना जीवनसाथी बनाने का, मेरा

बौस उमेश जिस तरह मेरे पीछे पागल था, उसे मैं कम और दफ्तर के लोग ज्यादा जानते थे. मेरी ‘हां’ सुन कर वह खुशी से हत्प्रभ हो उठा था.

और आज मेरे सफल वैवाहिक जीवन की 12वीं वर्षगांठ है. सिर से पांव तक सितारों जड़ी अबीरी साड़ी में लिपटी बड़ी सी लाल बिंदी और चांदी के घुंघरू जड़े रुपहले बिछुए पहने, बड़ा सा चांदी का ?ाब्बेदार गुच्छा झलाती मैं अपने आंगन में सरसराती फिर रही हूं.

प्याजी परदों की आड़ में मेरे राजा बेटे मनु तथा विभु लुकाछिपी खेल रहे हैं और पुराने सड़ेगले अंधविश्वास को जड़ से उखाड़ अरमानों के सतरंगे बंदनवारों की सरसराहट मेरे मनप्राणों में भर देने वाला मेरा प्रियतम उमेश मेरी ओर चाहतभरी नजरों से देख रहा है. उस ने मुझे चाहा है, केवल मुझे, मेरे अपने वजूद को… किसी मजबूरी को नहीं.

विचित्र संयोग है कि 12 साल बाद तुम्हारे बंगले की बगल में ही मुझे यह छोटा सा बंगला मिला है. अपनी सर्पिला मांग को संवराती मैं अयाचित एक नए निर्णय से रोमांचित हो उमेश को बुलाने दौड़ पड़ी.

आज तुम्हारी चाची को घर पर आमंत्रित करूंगी. उन की आंखों में पड़े अंधविश्वास के काले जाले को हटा कर प्रेम की शांत, शीतल ज्योति दिखाने को ताकि आगे किसी की कच्ची उम्र की मिठास को यह सर्पिला नागदंश असमय ही न निगल सके.

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