हमारे देश में सड़क हो या सिनेमाघर, बाजार हो या दफ्तर कुछ नजरें हर वक्त महिलाओं और लड़कियों का पीछा करती हैं. चौकचौराहे पर बैठे लड़के आतीजाती महिलाओं को तब तक घूरते रहते हैं जब तक वे उन की नजरों से ओझल नहीं हो जातीं. सरेराह महिलाओं को एक वस्तु समझ कर जब पुरुष घूरते हैं, फबतियां कसते हैं तो वे इस बात का अंदाजा नहीं लगा पाते कि उन की गंदी नजरों का सामना करने वाली लड़की के दिलोदिमाग पर क्या गुजर रही होगी.

दरअसल, महिलाएं जिसे घूरना कहती हैं पुरुष उसे निहारना कहते हैं. लेकिन पुरुषों का वह निहारना महिलाओं को लगता है जैसे वे बदन पर गड़ी आंखों से बलात्कार कर रहे हों.

हाल ही में प्रदर्शित फिल्म ‘फितूर’ में भी जब आदित्य राय कपूर कैटरीना को देखता है तो वह कहती है, ‘‘घूरना बंद करो.’’

पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ‘वूमन औफ वर्थ कौन्क्लेव’ में पत्रकार रवीश कुमार के साथ ‘हम जिस तरह से देखने के आदी हैं’ विषय पर चर्चा हुई. इस चर्चा में रवीश कुमार ने कहा, ‘‘लड़की देखी जाती है, लड़की देखना सिखाया जाता है. राह चलती लड़की को हजार तरह की निगाहों से गुजरना पड़ता है. किस ने लड़कों को इस तरह देखना सिखाया? कोई घर में बड़े हो रहे लड़कों को क्यों नहीं सिखाता कि लड़कियों को किस तरह देखना है? क्या इस में कहीं पारिवारिक परिवेश जिम्मेदार होता है? क्या परिवारों में लड़कों को लड़कियों के मुकाबले अतिरिक्त छूट मिलती है?’’

इस ताड़ने, देखने, घूरने, ताकने को कैसे रोका जा सकता है आदि सवालों के जवाब इस कौन्क्लेव तलाशे गए.

‘हम जिस तरह से देखने आदी हैं’ विषय पर अभिनेत्री शबाना आजमी का कहना था कि इस समस्या की जड़ में पितृसत्तात्मक मानसिकता है, जहां पुरुषों को महिलाओं से बेहतर दिखाया जाता है. एक पुरुष सिर्फ अपनी मां को अच्छी निगाह से यानी सम्मान की नजर से देखता है. लेकिन वह घर से बाहर की महिलाओं को मां, बहन, बेटी की नजर से नहीं देखता.

दरअसल, निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे सुर्खियों में जरूर आए, लेकिन आखिरकार जो मुद्दा उभर कर सामने आया, वह यही है कि महिलाओं को आज भी सुरक्षा की जरूरत है. आज की युवती, आज की महिला पहननेओढ़ने, घूमनेफिरने की आजादी चाहती है. आज भी अगर वह मर्द के द्वारा तय किए गए दायरे में है तो सुरक्षित है और अगर वह शराब, सिगरेट पीए, मिनी स्कर्ट पहन कर सड़क पर निकले तो फौरन उसे लूज कैरेक्टर का दर्जा दे दिया जाता है. कहा जाता है कि वह खुद को औब्जैक्टिफाई कर रही है. उस के लिए कहा जाता है कि वह ऐसा कर के पुरुषों को आकर्षित कर रही है. निर्भया कांड के बाद जो स्लोगन सामने आया वह है ‘शिफ्ट द ब्लेम शिफ्ट द गेन’.

शबाना आजमी ने आगे कहा कि जहां तक फिल्मों में महिलाओं की कामुकता को दिखाने की बात है तो उस के लिए फिल्मों में महिलाओं की कामुकता को दिखाने का तरीका बदलना चाहिए, क्योंकि कामुकता और अश्लीलता के बीच एक महीन रेखा है. कामुकता को जिस तरह दिखाया जाता है, वह कैमरे के घूमने पर निर्भर करता है न कि इस बात पर कि आप किस तरह के कपड़े पहनते हैं या कैसे नृत्य करते हैं.

इसी विषय पर सेफ्टीपिन की सहसंस्थापक कल्पना विश्वनाथ का कहना है, ‘‘हम लोगों ने एक अभियान चलाया था, ‘घूरना तकलीफ देता है’ घूरने और देखने में फर्क होता है. पुरुष घूरने के लिए महिलाओं की पोशाक को दोष देते हैं. हमारे समाज में सारे नियंत्रण महिलाओं पर ही लगाए जाते हैं कि ऐसे कपड़े पहनें, शाम के बाद घर से बाहर न निकलें वगैरह. समाज महिलाओं की आजादी पर पहरा लगा रहा है. हम औरतों की सुरक्षा की बात करते हैं उन के अधिकारों की नहीं. जरूरत है कि समाज में सैक्सुअलिटी पर खुल कर बात की जाए, घर में लड़कों के साथ हर विषय पर खुल कर बात की जाए ताकि वे समझ सकें कि महिलाओं के साथ कैसे पेश आना चाहिए. टकटकी लगाए देखने में सीधा संबंध सैक्सुअल आजादी से है.’’

‘‘जहां तक घूरने की और थाने में रिपोर्ट करने का सवाल है तो इस की रिपोर्ट शायद ही कभी होती है, क्योंकि कोई भी महिला पुलिस के पास जा कर रिपोर्ट करने और फिर अपराध को साबित करने के झंझट में नहीं पड़ना चाहती. जबकि घूरना, टकटकी लगाए देखना कानूनन गलत है. कानून पुरुष व महिला को बराबर अधिकार देता है, लेकिन भारतीय समाज की संस्कृति में असमानता है. आज की महिला एक आजाद इनसान की तरह जीना चाहती है,’’ यह कहना है वकील, शोधकर्ता तथा मानवाधिकार एवं महिला अधिकार कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर का.

इस अवसर पर राजनेता बलिकेश नारायण सिंह देव ने कहा कि समाज को महिलाओं के प्रति अपनी सोच बदलने की जरूरत है. लड़कों को घर से बाहर महिलाओं के साथ कैसे पेश आना चाहिए, यह वे अपने घर के पुरुषों से ही सीखते हैं कि वे कैसे उन की मां, भाभी, बहन के साथ व्यवहार करते हैं. आज जरूरत लड़कों को लड़कियों की तरह पालने की है ताकि वे महिलाओं का सम्मान करना सीख सकें.

घूरना अपमान निहारना सम्मान

‘‘घूरना अपराध है लेकिन देखना सौंदर्य का सम्मान,’’ पिछले दिनों जनता दल के राज्यसभा के सांसद केसी त्यागी ने महिलाओं को ले कर यह विवादित बयान दिया. उन के अनुसार, देश के प्राचीन कवियों ने भी महिलाओं के सौंदर्य का वर्णन किया है और वे संसद भवन में बैठने वाली फिल्म अदाकारा सांसदों को अकसर देखते रहते हैं.

इस के जवाब में बीजेपी महिला मोरचा की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश कार्यकारिणी की सदस्या लज्जारानी गर्ग ने कहा, ‘‘यह बयान त्यागी और उन के दल की मानसिकता को दर्शाता है. देश में प्राचीनकाल से ही महिलाओं को मां के रूप में देखा गया है और मां के शरीर की सुंदरता नहीं बल्कि उस का स्नेह देखा जाता है.’’

जब जनप्रतिनिधि ही इस तरह की टिप्पणी करते हैं तो महिलाओं का सम्मान करने की इन की दावेदारी पर सवालिया निशान लग जाता है.

क्यों घूरते हैं पुरुष महिलाओं को

एक ब्रिटिश रिसर्च के अनुसार, हर इनसान में विपरीत सैक्स को घूरने की फितरत होती है. इनसान चाह कर भी यह आदत छोड़ नहीं पाता, क्योंकि विपरीत सैक्स को निहारने या घूरने में जो आनंद या सुख मिलता है वह वैसा ही होता है जैसा किसी भूखे को भोजन और प्यासे को पानी मिलने के बाद होता है. विपरीत सैक्स पर नजर पड़ते ही शरीर में हारमोनल प्रतिक्रिया होती है और आनंदित होने का एहसास होता है. पुरुषों के अंदर मौजूद टैस्टोस्टेरौन नामक हारमोन उन में महिलाओं के प्रति अट्रैक्शन उत्पन्न करता है, जिस के चलते वे कई बार विपरीत सैक्स की तरफ ज्यादा देखते हैं या कहें घूरते हैं. लेकिन जब पुरुषों की घूरती नजरें जिस्म को भेदने वाली होती हैं तो लड़कियां घबरा जाती हैं. इस से उन के आत्मविश्वास में गिरावट आ सकती हैं, दिमागी सक्रियता में भी कमी हो सकती है.

सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के अनुसार, महिलाओं को जब लंबे समय तक पुरुषों द्वारा घूरा जाता है तो वे खुद को फिगर के आधार पर मूल्यांकन करना शुरू कर देती हैं. और वे शर्मिंदगी महसूस करने लगती हैं.

हस्तियां भी नहीं छोड़तीं मौका

ऐसा नहीं है कि सिर्फ आम पुरुष ही महिलाओं को घूरते हैं. ऐसा बड़ी हस्तियां भी करती हैं, जिन में किसी देश के राष्ट्रपति, खिलाड़ी भी शामिल होते हैं. हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी इटली में हुए जी-8 के सम्मेलन में लड़कियों को घूरते पाए गए. ऐसी ही कुछ हरकत फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलेस सरकोजी ने भी की. वे जी-8 सम्मेलन में हिस्सा लेने आई ब्राजील की महिला डैलिगेट को घूरते नजर आए. इसी तरह तिरछी नजर से अमेरिकी चीयर गर्ल पर नजरें गड़ाने वालों में जानेमाने फुटबौलर डैविड बेकहम भी हैं.

जिंदगी का कितना वक्त घूरने में बरबाद

ब्रिटिश संस्था कोडक लैंस विजल द्वारा 18 से 50 की उम्र के 3 हजार लोगों की राय को आधार बना कर किए गए एक शोध के अनुसार, पुरुष अपनी जिंदगी का पूरा 1 साल लड़कियों को घूरने में बरबाद कर देते हैं. शोध के अनुसार, एक पुरुष प्रतिदिन औसतन 1-2 नहीं बल्कि अलगअलग 10 लड़कियों को घूरता है. प्रतिदिन पुरुष 2-4 मिनट नहीं बल्कि औसतन पूरे 43 मिनट लड़कियों या महिलाओं को मुड़मुड़ कर घूरने या आंखें फाड़ कर ताड़ने में खर्च करता है. ब्रिटिश रिसर्च के अनुसार, इस आदत को पुरुष चाह कर भी छोड़ नहीं पाते. जहां तक लड़कियों की बात है तो उन में घूरने की आदत लड़कों के मुकाबले कम होती है. रिसर्च के मुताबिक, लड़कियां या महिलाएं औसतन जिंदगी के पूरे 6 महीने और रोजाना औसतन करीब 20 मिनट घूरने में खर्च करती हैं.

घूरते समय क्या देखते हैं लड़के

अमेरिका की यूनिवर्सिटी औफ नेब्रास्का लिनकोलन के अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, आई ट्रैकिंग तकनीक के जरीए जाना गया है कि लड़के लड़कियों को घूरते समय उन के चेहरे के बजाय उन की बौडी और उन की फिगर को ज्यादा देर तक देखते हैं. इस स्टडी के मुताबिक मर्द ज्यादातर उन महिलाओं को घूरने में अपना अधिकांश वक्त बिताते हैं जिन की कमर औसतन पतली हो या उन की ब्रैस्ट का साइज बड़ा हो. आप को जान कर हैरानी होगी कि महिलाएं भी दूसरी महिलाओं को पुरुषों वाली नजर से घूरती हैं यानी वे भी चेहरे के बजाय ब्रैस्ट व कमर के आसपास के हिस्से को घूरने में ज्यादा समय देती हैं.

प्रतिदिन 10 मिनट महिलाओं को देखना स्वास्थ्यवर्धक

एक ओर जहां भारत में महिलाओं को घूरने को अपराध की श्रेणी में रखा जाता है, वहीं न्यू इंगलैंड जर्नल औफ मैडिसिन के एक सर्वे के अनुसार प्रतिदिन महिलाओं को 10 मिनट तक देखना पुरुषों के लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा है. सुगठित महिला को मात्र 10 मिनट तक देखने से एक पुरुष उतनी उर्जा खर्च कर देता है जितनी 30 मिनट के ऐरोबिक्स व्यायाम में खर्च होती है. शोध में जिन लोगों ने प्रतिदिन 10 मिनट महिलाओं को देखा उन की टैस्टिंग पल्स रेट कम धीमी पाई गई. उन का रक्तचाप भी अन्य लोगों की तुलना में कम था. डाक्टरों के अनुसार, यौन उत्साह से हृदय के पंपिंग की गति तेज हो जाती है और ब्लड सर्कुलेशन में भी सुधार होता है. है न कमाल की बात. लेकिन भारत में सुंदर कन्या को घूरने का साहस न करें, क्योंकि यहां घूरना अपराध है.

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