Hindi Story : ‘ सुनों,    आज तुम्हारी बड़ी मामी का फोन आया था.’’ औफिस से आते ही सुधीर ने कहा.

‘‘अच्छा, तुम्हारे नंबर पर?’’ सुरभी ने पूछा, ‘‘मामी क्या कह रही थी?’’ चाय का प्याला सुधीर को पकड़ाते हुए सुरभी ने पूछा.

‘‘कुछ ज्यादा नहीं वह उन के बेटे अपूर्व की शादी है अगले महीने. उसी का निमंत्रण देने के लिए फोन किया था. कह रही थीं शादी में जरूर आना है. तुम से बात करने के लिए भी कह रही थीं. तुम कल बात कर लेना.’’

‘‘हां, कल ही करूंगी आज तो रात भी हो गई. बेवक्त बात करना तो ठीक नहीं,’’ कह कर सुरभी काम में लग गई. पर मन बड़ी मामी पर ही उल?ा गया. उन का बेटा अपूर्व मन बारबार इसी शब्द पर उल?ा रहा था. क्या वह सच में उन का बेटा है या मामी यहां भी छली गईं? क्या अपूर्व उन्हें अपनी मां सम?ाता है या संबंधों का निर्वाहन मात्र है?

सुरभी की नानी का घर भरापूरा था पर सब से ज्यादा प्यार बड़े मामा से मिलता था. मामा ने एक शादी समारोह में उन्होंने बड़ी मामी को देख लिया था और उन्हीं से शादी करने की ठान ली.

जब यह बात उन्होंने नानी से कही तब नानी ने कहा, ‘‘तुम्हारा दिमाग खराब है वे लोग हमारी हैसियत के नहीं हैं. शादीविवाह तो बराबरी वालों में की जाती है. उन के पास है क्या जो हमें देंगे.’’

बड़े मामा का चेहरा उतर गया. पहली बार में ही जबरदस्त विरोध हुआ. बात नाना तक भी पहुंच गई. समाज में हैसियत, नाम, प्रतिष्ठा सब की दुहाई दी जाने लगी. बड़े मामा शांत हो गए. धीरेधीरे घर में सन्नाटा पसरने लगा. सदा हंसते और बोलते रहने वाले बड़े मामा अब चुप हो गए थे. अनेक रिश्ते आए मामा के लिए पर मामा ने किसी को देखा तक नहीं.

सब के समझने पर और थकहार कर नानानानी ने इस रिश्ते के लिए हां कर दी. तय हुआ कि गांव के नाई के द्वारा उन के घर खबर भिजवा दी जाए और वही हुआ.

इतने बड़े घर से रिश्ता आया है यह खबर ही मामी के घर वालों के लिए बहुत थी. भागेभागे से आए मामी के पिता हाथ जोड़ कर नाना के सामने खड़े थे, ‘‘मेरी बिटिया रूपवती, गुणवती है जी. इस से ज्यादा कुछ नहीं है मेरे पास. आप ने स्वीकार कर लिया. यह हम पर बहुत बड़ा एहसान है.

शादी की तारीख तय की गई और विवाह की तैयारी शुरू हो गई. नानानानी अपनी हैसियत के अनुसार तैयारी कर रहे थे. आखिर उन के बड़े बेटे की शादी थी. बस नानी कुछ न मिलने का मलाल रख रही थीं. बड़े मामा की खुशियों का ठिकाना ही नहीं था.

फिर वह दिन भी आ गया जब लाल जोड़े में मामी ने गृहप्रवेश किया. मेहंदी महावर से सजे पांव जब आंगन में उतरे तो ऐसा लगा जैसे पूरा घर जी उठा. आंगन में घूंघट उठते ही लगा जैसे चांद का टुकड़ा जमीन पर उतर आया. सभी ने जी खोल कर दुलहन की तारीफ की. नानी भी इतनी खुश हुईं कि कुछ न मिलने का मलाल मन से निकल गया.

समय पंख लगा कर उड़ता गया. 3 साल बाद भी मामी की गोद हरी नहीं हुई और यहीं से मामी के जीवन का तप आरंभ हुआ. नानी के चेहरे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं. नातेरिश्तेदारों में भी बातें शुरू हो गईं. पूजापाठ और डाक्टरों के चक्कर शुरू हुए. पर सफलता हाथ नहीं आती. धीरेधीरे घर का वातावरण तनावपूर्ण हो गया. मामी सबकुछ हंसते हुए सहती रहती.

इस बीच कुछ नहीं बदला था तो वह था मामा का मामी के लिए प्यार. मामा अब भी मामी से बेइंतहा प्यार करते थे. मामी को हौसला देते तो कभी नानी को सम?ाते पर परिणाम कुछ भी नहीं निकलता.

1-2 साल बीत जाने पर नानी ने एलान किया कि मैं अपने बेटे की दूसरी शादी करूंगी. मामी चुप रहतीं पर मामा विरोध करते. कहते ऐसा नहीं होगा. मैं शिला (मामी) के अलावा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकता इसलिए ऐसा सोचिए भी मत. डाक्टरों को दिखाया गया. उन्होंने कहा कि फैलोपियन ट्यूब ब्लाक है और यूट्ब भी छोटी है इसलिए गर्भ नहीं हो रहा. आईवीएम का नाम तब आने लगा था पर पुरानी सोच वाले इस हद तक कहां पहुंच पाते.

कुछ समय और बीत गया. अब नानी ने अपना ब्रह्मास्त्र चलाया. मामी को समझने लगी, ‘‘आखिर तू भी तो मां बनना चाहती होगी कल को वीरेंद्र (मामा) का बच्चा होगा तो तू भी तो मां बनेगी. मैं सिर्फ अपने लिए थोड़े ही कह रही हूं. इस में तुम दोनों का ही भला है. मेरा क्या है? मेरी आंखें तो कुछ साल बाद बंद हो जाएंगी, पर तुम लोगों के आगे तो पूरा जीवन पड़ा है. जो कुछ बोल रही हूं तुम्हारे भले के लिए ही बोल रही हूं और ब्याहता पत्नी तो तू ही कहलाएगी, वह तो बस बच्चा जनने आएगी.’’

नानी को मालूम था कि  1955 के कानून के कारण दूसरी बीवी तो आ नहीं सकती पर 50 साल बाद भी लोग छिप कर दूसरी औरत ले आते थे.

‘‘पर मां जी कौन ऐसी आएगी?’’ पहली बार मामी ने जबान खोली.

अपनी बात का असर होते देख नानी ने तुरंत सम?ाना शुरू किया, ‘‘अरे तेरी छोटी बहन है न. उस से ही कर देंगे. घर की बात है. तेरी बहन को अच्छा घर मिल जाएगा. यहां आ कर वे तेरे साथ प्यार से रह लेगी. बच्चा होने के बाद आराम से रहेगी इस घर में. तुम और वीरेंद्र मांबाप बन जाओगे. सौतिया डाह भी न होगा तुम दोनों के बीच. जैसा तू कहेगी वैसा ही वह करेगी. जैसे तुम उसे रखना चाहो वैसे रखना. आखिर तेरी लाडली बहन जो है और तेरे मांबाप को भी सुकून रहेगा नहीं तो बिना दहेज जाने कैसा घर मिले? मैं तो सब का भला ही सोच रहीं, कह कर नानी वहां से चल दी.

स्त्री जब अपने बारे में सोचती है तो कठिन फैसले भी कर लेती है पर बात जब मांबाप और छोटे भाईबहन की हो तो भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाती है. उस पर मां बनने की इच्छा भी बलवती हो तो क्या सोचना. मामी को नानी की बात सही लगी. वे राजी हो गईं. मामा उन का फैसला सुनते ही भड़क उठ,’’ मैं यह हरगिज नहीं करूंगा. तुम जान भी रही हो तुम क्या कह रही हो? एकसाथ 3 जिंदगियों से खेल रही हो. हम कोई बच्चा गोद ले लेंगे पर ऐसा कदम नहीं उठाएंगे. यह कानून के खिलाफ है और हम पकड़े जा सकते हैं.’’

पर मामी को न जाने क्या हो गया था वे अपनी जिद पर उतर आई. ‘हंसनाबोलना बंद कर दिया. चुपचाप अपनी दिनचर्या करती और खामोश रहतीं. घर में फिर सन्नाटा पसर गया.

अंत में मामा ने हार कर कहा, ‘‘जैसी इच्छा है करो पर बाद में मुझे दोष मत देना.’’

मामी की बहन साधारण रंग की थी. न ज्यादा होशियार थी और न मांबाप के सामने बोलने वाली. पैसे की कमी की वजह से उस की शादी कहीं नहीं हो पा रही थी. मामी बहन के लिए चिंतित रहती थीं.

मामी को मन की मुराद मिल गई. भाग कर मायके गई. अपनी मांबाबूजी से अपनी इच्छा कही, ‘‘मेरी खुशी के खातिर छोटी का ब्याह इन से कर दो. मैं वादा करती हूं इसे कोई तकलीफ न होने दूंगी. मेरी बहन मेरे साथ प्यार से रहेगी. कल को कोई और आएगी तो मेरी खुशियों को ग्रहण लग जाएगा. छोटी को भी तो बड़ा घर मिल जाएगा.’’

‘‘पर मैं छोटी की खुशी के लिए तेरा अधिकार तो नहीं छीन सकता न?’’ विरोध किया था बाबूजी ने.

मगर मामी ने वहां भी रोधो कर सब को मना लिया. फिर सर्वसम्मति से विवाह होना तय हुआ. गरीब घर की बेटियां एकदूसरे की पर्याय होती हैं.

शादी वाले दिन अगर कोई सब से खुश था तो वे थीं मामी. बाकी सब औपचारिक ही थे. छोटी मामी को खूब अच्छे से तैयार कर अपने कमरे में छोड़ दूसरे कमरे में खुशीखुशी रहने चली गई. मामा के उदास चेहरे को अपनी हथेलियों में लेती हुई बोली, ‘‘बस कुछ समय की ही तो बात है हम फिर पहले की तरह रहेंगे.’’

2 महीने ही बीते थे कि छोटी मामी के पांव भारी हो गए. पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई. सब के चेहरे खिल गए. नानानानी को जीने की उम्मीद मिल गई. बड़े मामा के चेहरे पर इत्मीनान और छोटी मामी के चेहरे पर रौनक आ गई. इस बार भी जो सब से ज्यादा खुश थीं वे थीं बड़ी मामी जिन का सपना पूरा होने जा रहा था.

छोटी मामी को पलकों पर बैठाया उन्होंने. घर का कोई भी काम करने की उन्हें मनाही थी. खाना भी उन के कमरे में बड़ी मामी खुद ले कर जाती थीं. फल, दवा सब समय पर देतीं. ऐसा लगता जैसे छोटी मामी कोई राजरानी हों. छोटी मामी तो शुरू से ही अपनी बड़ी बहन की बात मानती थीं. दोनों बहनों में प्रेम भी बहुत था जो अब भी बरकरार था. छोटी मामी के पेट में होने वाली हलचल को भी हाथों से छू कर महसूस करतीं और कहतीं कि कि मेरा बच्चा.

9 महीने 9 दिन की तरह गुजर गए. आधी रात को प्रसव पीड़ा सहने के बाद छोटी मामी ने पुत्र को जन्म दिया. उस रात जैसे रात हुई ही नहीं. घरआंगन बच्चे की किलकारियों से रोशन हो गया.

आज की सुबह नया परिवर्तन ले कर आई. बड़ी मामी के मांबाबूजी बधाई ले कर आए. आंगन में ही बड़ी मामी मिल गईं. दौड़ कर अपनी मां के गले लगने गईं कि उन की मां ने ?िड़क दिया, ‘‘पहले छोटी को देख तो लेने दे, देखूं मेरी बेटी और नाती कैसे हैं.’’

ठीठक सी गईं मामी पर खुशी के अतिरेक में ज्यादा ध्यान नहीं

दिया, ‘‘हां मां देख लो न छोटी को बिलकुल स्वस्थ है. मैं ने बहुत अच्छे से ध्यान रखा है उस का.’’

फिर वे अपनी मां को छोटी को प्यार करते हुए चुपचाप देखती रहीं. जाते समय उन की मां ने ढेरों नसीहतें दीं, ‘‘देख छोटी के सिर पर बराबर तेल लगाना. दूध और भोजन समय पर देना और हां मेवे का हलवा पूरा एक महीना खिलाना. आखिर उसे अपने बच्चे को दूध जो पिलाना है.’’

‘‘अपना बच्चा?’’ पहली बार मामी के अंदर कुछ दरका, ‘‘मां वह मेरा बच्चा है,’’ मामी ने जोर से कहा, ‘‘हांहां तेरा ही बच्चा है. पर उस का खयाल तो रख,’’ कह कर मामी की मां ने बात टाल दी.

दूसरे दिन मामी जब सो कर उठीं तो देखा नानी छोटे बच्चे की मालिश कर रही थीं.

‘‘लाइए मांजी मैं करती हूं.’’

‘‘अरे नहीं तू कैसे कर पाएगी, तूझे कहां आता है, इतना छोटा बच्चा बहुत नाजुक होता है. मैं ही कर लेती हूं.’’

मामी का चेहरा उतर गया.

‘‘ऐसा कर छोटी के सिर पर तेल लगा दे और उसे दूध दे दे. कमजोरी आ गई होगी न,’’ बोलीं.

सारा दिन मामी घर के कामों में और छोटी मामी की सेवा में लगी रहतीं.

शाम को मामा ने ढेर सारे फल और मेवे ले कर घर में प्रवेश किया. देखते ही बड़ी मामी दौड़ीं, ‘‘लाइए मैं फ्रिज में रख देती हूं.’’

‘‘हां लो और समय पर छोटी को देती रहना,’’ कह कर मामा कमरे की ओर बढ़ गए. ठगी सी मामी आंगन में ही खड़ी रह गईं.

पासपड़ोस की औरतें बधाई देने आतीं तो दादी खुश हो कर सब से कहतीं, ‘‘बड़ी खुशी है भई छोटी बहू ने सालभर में ही मुझे दादी बना दिया. इस एक खुशी के लिए सालों से तरस रहे थे.’’

अब हरकोई बस छोटी और बच्चे के आसपास ही रहता. धीरेधीरे 1 महीना गुजर गया. सबकुछ सामान्य हो चला. जो परिवर्तन होना था वह बड़ी मामी की जिंदगी में ही हुआ. बड़ी मामी उपेक्षित और गैरजरूरी हो गई. उन्हें सिर्फ घर के कामों के लायक ही समझ जाता. बच्चा उन के पास तभी आता जब वह फैला करता बाकी का समय वह नानानानी, बड़े मामा और छोटी मामी के पास होता.

धीरेधीरे बड़ी मामी की जिंदगी रंगहीन और उदास हो गई. उन्हें लगा शिकायत करें भी तो किस से? फिर भी एक दिन हिम्मत कर के उन्होंने नानी से कहा, ‘‘अम्मा अब तो बच्चा हो गया अब तो मेरा सब लौटा दीजिए.’’

‘‘अरे तेरा क्या लौटाना? घर में तू रह रही है अच्छा खापहन रही है और क्या चाहिए? हम तेरे साथ क्या गलत कर रहे?’’

‘‘मैं अपने कमरे में वापस जाना चाहती हूं,’’ हिम्मत कर के कहा मामी ने.

‘‘लो अब यह क्या बात हो गई? जिस कमरे में तू रह रही है वहां क्या परेशानी है? क्या वीरेंद्र अपने बच्चे के बिना रह पाएगा और बच्चा अपनी मां के बगैर कैसे रहेगा? तू इतना परेशान क्यों हो रही है सब साथ ही तो हैं.’’

पर आप ने कहा था, ‘‘बच्चा मेरा और वीरेंद्र का होगा.’’

‘‘हां तो वह तो है ही. तू बच्चे को अपना न सम?ाती है क्या,’’ नानी ने जवाब दिया.

बड़ी मामी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें.

एक दिन उन्होंने बड़े मामा से कहा, ‘‘एक बात पूछूं?’’

‘‘हां,’’ बड़े मामा ने कहा.

‘‘अब आप मुझ से प्यार नहीं करते?’’

‘‘यह क्यों कह रही हो?’’

‘‘तो अब तो बच्चा हो गया न. तो अब हम साथ रह सकते हैं न.’’

‘‘हम साथ ही तो हैं,’’ मामा ने कहा, ‘‘तुम्हें कुछ चाहिए तो बताओ मैं पूरी कर दूंगा तुम्हारी मांग.’’

‘‘मैं आप के साथ अपने कमरे में रहना चाहती हूं.’’

‘‘देखो शिला मैं ने बहुत सालों के बाद बच्चे का सुख पाया हूं कैसे अपने से दूर करूं और फिर तुम भी तो मेरे साथ इसी घर में हो फिर क्यों परेशान हो रही हो?’’ कह कर उन के गालों को थपथपा दिया.

तड़प कर रह गईं बड़ी मामी. बड़ी मामी की स्थिति न घर की न घाट की वाली हो गई. वे चाहती थीं सब पहले जैसा हो जाए. वे मामा के साथ रहें. मामा उन के साथ हंसेंबोलें, उन्हें प्यार करें, उन के साथ सोएं पर यह हो नहीं पाया. छोटी मामी उन की बिना ब्याहता पत्नी थीं. पर उन के बच्चे की मां थीं और सोने, रहने योग्य थीं तो मामा उन्हें क्यों दूर करते? यह बात बड़ी मामी के लिए असहनीय हो गई. वे सम?ा नहीं पाईं कि गुजरा हुआ वक्त कभी नहीं लौटता.

बड़ी मामी धीरेधीरे अवसाद में जाने लगीं. एकदम से चिड़चिड़ी हो गईं. एक दिन छोटी मामी पर बरसने लगीं, ‘‘चली जा यहां से, मेरा सबकुछ तुम ने छीन लिया अब मैं तुम्हें नहीं बरदाश्त कर सकती.’’

‘‘मैं क्या करूं जीजी? मेरी क्या गलती है? सारे फैसले तो आप ने ही किए थे न? फिर मेरा क्या कुसूर है?’’ छोटी मामी ने मासूमियत से कहा.

सिर पर हाथ रख कर बैठ गईं बड़ी मामी. दूसरे दिन भाग कर मायके गईं. अपनी मां के गले लग रो पड़ीं, ‘‘मां छोटी को वापस बुला लो, मेरा सब लौटा दो.’’

‘‘यह क्या कह रही है तू? तुम ही छोटी को मांग कर ले गई था न यह कह कर कि तू उसे प्यार से रखेगी? अब वह कहां जाएगी? वह उस का भी घर है.’’

‘‘तुम इतना स्वार्थी हो गईं मां?’’ बस इतना ही निकल पाया मामी के मुंह से.

दूर खड़े पिता के गले से लग कर फूटफूट कर रो पड़ी. पिता ने धीरेधीरे उन के पीठ को सहलाते हुए कहा, ‘‘मैं ने तो पहले ही मना किया था पर तू न मानी. इसे जिंदगी का फैसला मान कर स्वीकार कर ले बेटा. मैं भी बेबस हूं. गुजरा हुआ समय लौट कर नहीं आता.’’

थक कर बड़ी मामी चुप हो गईं. अपने को एक कमरे में सीमित कर लिया.

हमेशा सजीसंवरी रहने वाली मामी ने शृंगार करना छोड़ दिया. साधारण वेशभूषा में मामी बिलकुल तपस्विनी सी लगने लगीं. हर समय खुद में ही खोई हुई, चुप सी.

हां, इस बीच में एक घटना और घटी जो सब से अलग थी. वह था बड़ी मामी और उस नन्हे से बच्चे का प्यार. बच्चा कितना भी रोता या परेशान रहता, ज्यों ही बड़ी मामी को देखता था गोद में जा वह चुप हो जाता जैसे वे ही उस की मां हों. कुदरत का ये अनोखा फैसला था.

धीरेधीरे वक्त अपने पंख फैलाता चला गया. छोटे मामा की शादी हो गई. वह शहर में अपने परिवार को ले कर चले गए. सुरभी का भी नानी के घर जाना कम हो गया. खबरें मां के द्वारा सुनने को मिलतीं.

गांव में अब नानानानी, बड़े मामामामी और छोटी मामी बच्चे के साथ रह गए. कुदरत ने छोटी मामी की गोद दोबारा नहीं भरी. बड़ी मामी का जीवन तप जारी था. पर अभी बहुत कुछ शेष था. 10 वर्ष बीत गए. पहाड़ी पर एक पिकनिक स्पौट था. गांव के लोग कई बार वहां जाते थे. वहां 2-4 दुकानें खुली थीं. दूरदूर तक जगह दिखती थी. सब पिकनिक पर जा रहे थे.

‘‘जीजी चलो न साथ में,’’ छोटी मामी ने कहा.

‘‘मेरा मन नहीं है तुम लोग हो आओ,’’ बड़ी मामी ने जवाब दिया.

‘‘अपने बेटे के लिए तो चलो जीजी. 10 वर्ष का हो गया आप का बेटा. घर से निकलने और खेलने के दिन हैं उस के. कुछ घंटों की बात हैं. दिन बिता आते हैं. वैसे भी अपूर्व आप के साथ कितना खुश रहता है. सच अपूर्व सब से ज्यादा बड़ी मामी के पास ही रहना चाहता था और इसी एक खुशी के सहारे मामी जी रही थीं.

पिकनिक कर के सभी लौट रहे थे कि बारिश शुरू हो गई.

गाड़ी में आगे बड़े मामा और छोटी मामी थे. पीछे बड़ी मामी और अपूर्व. सामने से आते ट्रक न जाने कैसे लड़खड़ाते हुए आया और मामा की गाड़ी से टकरा गया. सब बिखर गया. बड़ी मामी को जब होश आया तो देखा कुछ लोग उन्हें गाड़ी से बाहर निकाल रहे हैं. साथ में अपूर्व अचेत है. बड़े मामा और छोटी मामी निष्प्राण पड़े थे. मामी को सम?ा नहीं आ रहा था कि क्या करें. किसी तरह लोगों की मदद ले कर घर पहुंचीं. सब खत्म हो गया था. पूरे घर में मातम फैल गया.

15 दिन बाद घर पूरी तरह खाली हो गया. बाहर के कमरे में खामोशी ओढ़े हुए नाना पड़े थे. भीतर बेटे के गम में बिस्तर पकड़ी हुई नानी. सफेद साड़ी में तपस्विनी सी मामी और उन से लिपटा हुआ अबोध अपूर्व. पूरे घर में सन्नाटा.

समय न किसी के लिए रुकता है और न रुका. बड़ी मामी कर्तव्यपथ पर फिर बहुत बहादुरी से चलीं. घर के साथसाथ मामा का व्यवसाय भी संभालने लगीं. मामी के कंधों पर एकसाथ अनेक जिम्मेदारियां आ गईं. नन्हे अपूर्व के साथसाथ बीमार सासससुर की सेवा भी उन के हिस्से आ गई. मामी चुपचाप शांत हो कर अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रही थीं. बेटे के गम में नानी ज्यादा दिन नहीं जी पाईं और कुछ वर्षों में नाना ने भी साथ छोड़ दिया.

अब घर में सिर्फ मामी और अपूर्व ही रह गए.

सुरभी को इधरउधर से खबरें मिलती रहतीं. सुना था कि मामी ने अपूर्व की परवरिश बहुत अच्छी की थी. मां बनने के सारे अरमान पूरे किए. हलात ने उन्हें मां बनाया भी तो किस कीमत पर.

दोपहर बड़ी मामी का नंबर मिलाया. मामी की प्यारी आवाज आई, ‘‘सुरभी कैसी हो? बहुत दिनों से बात नहीं की. अपूर्व की शादी है अगले महीने. जल्दी से आने की तैयारी करो. ऐसे तो तुम आती नहीं इस बहाने तो आओ.’’

‘‘नहीं मामी बहाने की क्या बात है बस जिंदगी की आपाधापी में फुरसत नहीं मिली.’’

‘‘हां वह तो है,’’ मामी ने कहा.

‘‘सुनो शादी के बाद भी मेरे पास रुक जाना. बहुत दिन हो गए किसी अपने से बातें नहीं कीं न,’’ मामी हंस कर बोलीं, ‘‘वैसे अपूर्व मेरा बहुत खयाल रखता है फिर भी बच्चा ही है न,’’ वात्सल्य से भीगे शब्द थे.

‘‘एक तुम ही तो हो जो मेरे दिल के बहुत करीब हो इसलिए मेरे पास रुक कर जाना.’’

‘‘ठीक है मामी मैं आप के पास रुक कर ही आऊंगी,’’ कह कर फोन रख दिया सुरभी ने.

कई सालों के बाद आज सुरभी अपनी नानी के गांव जा रही थी.

नानी का घर बदल गया था. आधुनिक साजसज्जा से लैस. घर में शादी का माहौल था. चारों ओर भव्य सजावट हुई थी. उसे देखते ही बड़ी मामी ने दौड़ कर गले लगा लिया, ‘‘ऐसे भी कोई भूलता है क्या? कितने वर्षों बाद आ रही है,’’ प्यार से उलाहना दिया.

सभी रिश्तेदारों की यही शिकायत थी. कुछ नए चेहरे थे, कुछ पुराने और कुछ बूढ़े हो चले थे. सुरभी क्या कहती सब से कि बड़े मामा के बाद आने का मन ही नहीं किया. चुप ही रही.

मामी ने सुरभी को उस का कमरा दिखाया और कहा, ‘‘जल्दी से तैयार हो जा अपूर्व को हलदी लगानी है.’’

तैयार हो कर जब सुरभी निकली तो सामने ही अपूर्व पीले कुरते में दिख गया. सुरभी अपलक उसे देखती ही रह गई. ऐसा लगा जैसे सामने बड़े मामा खड़े हों. वही रंगरूप, वही कदकाठी. सुरभी की आंखें भर आईं कि मामी ने बढ़ कर संभाल लिया.

अपूर्व ने पांव छूते हुए कहा, ‘‘दीदी, अब आ रही हैं. मां से सिर्फ आप के बारे में सुना ही है.’’

सुरभी ने उसे गले लगा लिया.

2 दिन शादी की रस्मों में ही गुजर गए. बड़ी मामी ने बहुत धूमधाम से बेटे की शादी की. अपने सारे अरमानजी खोल कर पूरे किए. खुश इतनी कि सारा आसमान उन के कदमों में हो. पता चला कि अपूर्व की पसंद की लड़की है. अपूर्व की खुशी को ही अपनी खुशी मान लिया था मामी ने. मां बनने का गर्व उन के चेहरे पर दमक रहा था.

बहू ने घर में कदम रखा. चारों ओर रौनक हो गई. एकएक कर सारे मेहमान लौटने लगे. सुरभी भी मामी के साथ 4 दिन के लिए रुक गई.

शाम के समय सारे कामों के समेटे जाने के बाद सुरभी यों ही पुराने दिनों को याद कर रही थी और घर के बाहर टहल रही थी. टहलतेटहलते अपूर्व के कमरे की खिड़की तक पहुंच गई.

तभी उसे नए जोड़े की आवाज सुनाई दी. अपूर्व अपनी पत्नी से कह रहा था, ‘‘परी हर स्त्री चाहती है कि उस का स्थान उस के जीवन में सब से पहले हो, पर मैं तुम्हें यह नहीं दे सकता. मैं अपने जीवन में तुम्हें दूसरा स्थान दूंगा. जानती हो क्यों? क्योंकि पहला स्थान मेरी मां का है. अगर वे मुझे जन्म न देतीं तो कुछ भी खास न होता पर उन्होंने मेरे लिए तप किया है. मैं ने अपने जीवनकाल में उन्हें उपेक्षित होते देखा है. सिर्फ मुझे पाने के लिए उन की सांसें चलती रहीं.

‘‘मैं उन के तप का फल हूं. मेरी जिंदगी संवारने के लिए उन्होंने कड़ी साधना की है तो मैं उन को ही मिलना चाहिए न. मेरी जीवनसंगिनी होने के नाते मैं तुम्हारा साथ चाहूंगा. हां, फिर यह अपूर्व पूरा तुम्हारा है. कह कर शरारत से हंसने लगा अपूर्व.’’

सुरभी धीरे से खिड़की से हट गई और सोचने लगी कि आज मामी का जीवन सार्थक हुआ. वह अपूर्व जैसे बेटे की मां हैं.

3 दिन बाद सुरभी ने कहा, ‘‘मामी, अब मैं भी कल घर जाऊंगी.’’

‘‘कुछ दिन और रुक जा सुरभी मैं अकेली हूं,’’ मामी ने प्यार से कहा.

‘‘आप अकेली नहीं हैं मामी, आप के साथ आप का बेटा है न.’’

सुरभी की आवाज में जो खनक थी उसे मामी ने समझ लिया था. अगले दिन

सुबह ही अपूर्व की पत्नी ने मामी को जोर से हग किया और खिलखिला कर मिनटों तक चिपकी रही.

फिर उन्हें डाइनिंगटेबल पर बैठाया और कहा, ‘‘मौम, ब्रेकफास्ट तो आप को हमेशा मेरे हाथ का खाना पड़ेगा. लंबा और डिनर आप चाहे बनाएं या न बनाएं. मैं दिन की शुरुआत आप के हाथों के बने खाने से करूंगी. हमेशा, हमेशा,’’ अपूर्व की पत्नी में मिठास भी थी, दृढ़ता भी थी, भरोसा भी था.

अगले दिन सुरभि और मामी दोनों एकदूसरे से गले लग कर विदा हो रही थीं. दोनों के दिलों में अलगअलग सुकून था.

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...