Failure of Municipal Corporation: मौनसून के आते ही पूरी मुंबई पानीपानी हो जाती है। थोड़ी सी बारिश होने पर जलभराव की समस्या आधी मुंबई को लचर बना देती है। लोकल ट्रेन की ट्रैक से ले कर सङकों तक जलभराव की समस्या से हर नागरिक को गुजरना पड़ता है। ऐसे में हर साल नागरिक बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानि बीएमसी को भलाबुरा कहती है. लेकिन करें, तो क्या करें क्योंकि बीएमसी हर बार की तरह लोगों को समुद्र में आई हाई टाइड और अधिक जनसंख्या के भार का बहाना दे कर अपनी जान छुड़ाना चाहती है.

आप को जान कर हैरानी होगी कि शहर की मौनसून की तैयारियों का जायजा लेने के लिए मुंबई की मेयर रितु तावड़े जब मीडिया को मौनसून की तैयारी पर ब्रीफिंग दे रही थीं और यह दावा कर रही थीं कि महानगरपालिका (बीएमसी) पूरी तरह से तैयार है, तभी बिलकुल उन के पीछे खड़े बीएमसी का एक सफाई कर्मचारी अचानक संतुलन बिगड़ने से पानी से भरे एक खुले मैनहोल (गटर) में जा गिरा. गनीमत यह रही कि वहां मौजूद लोगों ने मुस्तैदी दिखाई और कर्मचारी को तुरंत सुरक्षित बाहर निकाल लिया, जिस से एक बड़ा हादसा टल गया.

इतिहास को अगर हम देखें, तो मुंबई का निर्माण मूल रूप से 7 अलगअलग द्वीपों (कोलाबा, लिटिल कोलाबा, बौंबे, मझगांव, परेल, वर्ली और माहिम) को आपस में जोड़ कर किया गया था. यह विशाल कायापलट 18वीं और 19वीं सदी के बीच ‘हौर्नबी वेलार्ड’ जैसी विशाल इंजीनियरिंग परियोजनाओं और भूमि सुधार (Reclamation) के माध्यम से पूरा किया गया. तब से ले कर आज तक इस की इंफ्रास्ट्रक्चर में अधिक परिवर्तन नहीं आया है, जबकि मुंबई देश की आर्थिक नगरी है और यहां सब से अधिक टैक्स कलैक्शन होता है.

यह सही है कि मुंबई जैसे अत्यधिक जनसंख्या वाले मैट्रो शहरों में नगर निगम (जैसे बृहन्मुंबई महानगरपालिका- बीएमसी) के लिए करोड़ों नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं देना और टैक्स व्यवस्था समझाना वाकई एक भयंकर चुनौती है, लेकिन धीरेधीरे इस में सुधार करने की जरूरत है, जो वे नहीं करती.

मुंबई की आबादी लगभग 2.25 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जिस से प्रति वर्ग किलोमीटर आबादी का दबाव दुनिया में सब से ज्यादा है.

डेटा और रिकौर्ड्स का भारी दबाव

मुंबई में हर छोटीबड़ी झुग्गी, चाल, बहुमंजिला इमारतों और व्यावसायिक संपत्तियों का सटीक डेटा रखना मुश्किल होता है.

घनी आबादी के कारण संपत्तियों की खरीदबिक्री तेजी से होती है, जिस से टैक्स रिकौर्ड्स को अपडेट रखना एक बड़ी चुनौती है, जिसे बीएमसी करने में नाकाम सिद्ध हो रही है.

इतना ही नहीं, टैक्स नियमों को समझाने में कठिनाई यहां बहुत अधिक है. कैपिटल वैल्यू सिस्टम यहां लागू है और बड़े शहरों में टैक्स का निर्धारण संपत्ति के बाजार मूल्य (Ready Reckoner Rate) और निर्माण के प्रकार पर होता है, जिसे आम नागरिकों को समझाना पेचीदा होता है.

भाषा और डिजिटल साक्षरता

भाषा भी एक बड़ी समस्या मुंबई में है। इस से हर वर्ग के नागरिक औनलाइन पोर्टल का उपयोग नहीं कर पाते, जिस से नगर निगम के नागरिक सुविधा केंद्रों (सीएफसी) पर भारी भीड़ उमड़ती है.

कचरा मैनेजमेंट पड़ता है भारी

बुनियादी सुविधाओं का संकटपानी और कचरा मैनेजमेंट इतनी बड़ी आबादी को रोजाना साफ पानी देना और मीठी नदी जैसे क्षेत्रों में सीवेज या कचरा प्रबंधन संभालना निगम के बजट और मैनपावर पर भारी पड़ता है क्योंकि यह स्थान समुद्र से घिरे होने के कारण मुंबई के पास जमीन सीमित है, जिस से नए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजैक्ट्स को लागू करना बेहद जटिल हो जाता है.

शहरों का पुराना ड्रैनेज सिस्टम पानी का दबाव झेल नहीं पाता, जिस से सड़कें और निचले इलाके पूरी तरह जलमग्न हो जाते हैं. भारी जनसंख्या और कंक्रीट के फैलाव के कारण महानगर पालिकाओं को इस संकट से निबटने में काफी मुश्किलें आती हैं. इस के अलावा इस शहर में मिट्टी की जगह कंक्रीट और डामर ने ले ली है. इस के कारण बारिश का पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाता और सीधे सड़कों पर बहने लगता है.

मैंग्रोव्स और तालाब निर्माण कार्यों में कमी

मुंबई के तटीय इलाकों में प्राकृतिक रूप से पानी सोखने वाले मैंग्रोव्स और तालाब निर्माण कार्यों के कारण तेजी से कम हुए हैं, जिसे आज तक ठीक नहीं किया गया है.

पुराना और सीमित क्षमता का ड्रैनेज सिस्टम और ब्रिटिशकाल की प्रणालियां आज भी चल रही हैं. यहां का अधिकांश भूमिगत तूफान जल ड्रैनेज (Storm Water Drain-SWD) सिस्टम बेहद पुराना है, जिसे हर साल ठीक करने का दावा म्युनिसिपल करती है. यह केवल 25 से 50 मिलीमीटर प्रति घंटे की बारिश को संभालने के लिए डिजाइन किया गया था, जबकि मौनसून में अकसर 100 मिलीमीटर से अधिक बारिश हो जाती है.

कचरा और प्लास्टिक का ब्लौकेज

घनी आबादी द्वारा फेंका गया प्लास्टिक, कचरा नालियों को चोक कर देते हैं, जिस से पानी आगे नहीं बढ़ पाता. साथ ही समुद्र का हाई टाइड पानी की निकासी में बाधक होती है.

नागरिक भी जिम्मेदार

इस बारे में शिवसेना ठाकरे ग्रुप के कारपोरेटर रमाकांत रहाटे कहते हैं कि मुंबई में पानी भरने की जिम्मेदारी सिर्फ म्युनिसिपल कारपोरेशन को ठहराना ठीक नहीं क्योंकि यहां के नागरिक भी शहर को गंदा करने में कम जिम्मेदार नहीं हैं। वे हर जगह कूड़ा, कूड़ेदानी में न फेंक कर घरों से बाहर फेंकते रहते हैं, जो नालों में जा कर फंस जाते हैं, जिस में खासकर प्लास्टिक होता है.

सरकार हर साल नई स्कीम मुंबई के लिए निकालती है, लेकिन उस का भी ठीक तरह से प्रयोग नहीं किया जाता. अब तो मोदी इंडिया ने और भी सब को परेशान कर रख दिया है। कभी यह करो, वह करो करते रहते हैं और स्टेट में सही काम करने वालों को कम पैसे मिलते हैं, जिस से वे किसी तरह अपना काम पूरा करते हैं.

इतना ही नहीं, सरकारी अस्पतालों में नए आधुनिक उपकरण डाल दिए हैं, लेकिन कोई चालू नहीं है क्योंकि उसे चलाने के लिए किसी को प्रशिक्षण नहीं दिया गया. दिखावा अधिक है और काम ठीक से कोई नहीं करता। चारों तरफ करप्शन है.

मैट्रो शहरों का हाल बेहाल

मौनसून में जलजमाव और बुनियादी ढांचे का चरमराना अब सिर्फ मुंबई की नहीं, बल्कि दिल्ली और बैंगलुरु जैसे देश के सभी बड़े शहरों की एकजैसी बदतर हालात बन चुकी है. हर साल मौनसून आते ही ये तीनों वैश्विक शहर पूरी तरह लाचार नजर आने लगते हैं.

बेकार इंफ्रास्ट्रक्चर

दिल्ली की अगर बात करें, तो वीआईपी इलाकों से ले कर अंडरपास तक जलभराव का संकट हर साल बना रहता है. यहां भी पीडब्ल्यूडी और एमसीडी की नाकामी है, जिस में खासकर दिल्ली में मिंटो ब्रिज, जखीरा, मूलचंद और द्वारका जैसे 169 हौटस्पौट्स की पहचान की गई है, जहां जरा सी बारिश में ही नावें चलने जैसी स्थिति हो जाती हैं.

यमुना का बैकफ्लो और गाद

मौनसून के दौरान यमुना नदी का जलस्तर बढ़ जाने से दिल्ली के प्रमुख नालों का पानी नदी में जाने के बजाय वापस शहरों में घुसने लगता है. इस के अलावा समय पर नालों की गाद न निकालने से ड्रैनेज पूरी तरह चोक हो जाते हैं.

नालों पर अवैध कब्जा

तीसरा मैट्रो शहर है बैंगलुरु, जो आईटी हब और ‘झीलों के शहर’ के नाम से भी जाना जाता है, बारिश के दौरान टेक पार्कों में भयंकर बाढ़ की स्थिति बन जाती है. आउटर रिंग रोड, व्हाइटफील्ड और सिल्क बोर्ड जैसे मुख्य आईटी और टेक हब हर बारिश में घुटनों तक पानी में डूब जाते हैं.

हालिया जून की बारिश में भी इन रास्तों पर कई ऐंबुलेंस तक फंस गईं. प्राकृतिक नालों पर अवैध कब्जा यहां की स्थिति को बद से बदतर बनाती जा रही है.

बैंगलुरु कभी अपनी खूबसूरत झीलों के लिए जाना जाता था, लेकिन बिल्डरों और अनियोजित शहरीकरण के कारण झीलों को जोड़ने वाले प्राकृतिक नालों पर कंक्रीट की इमारतें खड़ी कर दी गईं, जिस से पानी के बहने का रास्ता ही बंद हो गया है। यहां की म्युनिसिपल कारपोरेशन भी अपने शहर की स्थिति को ठीक करने में नाकाम है क्योंकि यहां के बिल्डर को जैसेतैसे कर इमारतें खड़ी करने का परमिशन कारपोरेशन से निकलवा ही लेती है, जिस का खामियाजा पूरे शहर के लोग भुगतने पर मजबूर हो जाते हैं.

इस प्रकार बड़े शहरों की बिगड़ती स्थिति आज चिंता का विषय है क्योंकि बढ़ती आबादी, गलत इंफ्रास्ट्रक्चर और गैर जिम्मेदार नागरिक सभी कमोवेश इस के लिए दोषी हैं क्योंकि कोई भी अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करना चाहता। ऐसे में म्युनिसिपल कारपोरेशन इन शहरों को संभालने में पूरी तरह नाकाम हो रही है, जिस का परिणाम सभी को भुगतना पड़ रहा है.

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...