Geeta Kapoor : इंडियाज बैस्ट डांसर्स में जज की भूमिका निभा रहीं गीता कपूर का नाम टीवी खोलते ही हर घर में गूंजता है. पर एक वक्त था जब वे मुंबई की लोकल ट्रेन से फराह खान के ग्रुप में बैकग्राउंड डांसर का काम करने जाती थीं. 15 साल की उम्र में ‘कुछ कुछ होता है’ और ‘कोई मिल गया’ पर कदम थिरक रहे थे और आंखों में सपना था कि एक दिन पूरा स्टेज मेरा होगा. फिर वक्त ने करवट ली. असिस्टैंट कोरियोग्राफर से कोरियोग्राफर बनीं. ‘फिजा,’ ‘अशोका,’ ‘साथिया,’ ‘हे बेबी,’ ‘तेरे नाल लव हो गया’ में गानों को हिट बनाया. पर असली पहचान मिली डांस इंडिया डांस के जज पैनल से. वहां कुरसी पर बैठी गीता कपूर कब सब की ‘गीता मां’ बन गईं, पता ही नहीं चला. डांट में ममता, तारीफ में तालियां और आंसुओं में साथ, इन्होंने डांस को रिऐलिटी शो से निकाल कर हर ड्राइंगरूम का इमोशन बना दिया.
आज 25 साल इंडस्ट्री में पूरे कर चुकीं गीता मां के लिए डांस सिर्फ स्टैप्स नहीं, जिंदगी का सलीका है. कैमरे के सामने स्ट्रिक्ट जज और बैकस्टेज न्यूकमर्स की सब से बड़ी सपोर्ट.
कहती हैं, ‘‘टेलैंट को उम्र, शक्ल या बैकग्राउंड का मुहताज नहीं होना चाहिए. स्टेज सब का है.’’
2 दशक से ज्यादा के कैरियर में सैकड़ों कोरियोग्राफर, हजारों डांसर इन के हाथों तराशे गए. पर आज भी रिहर्सल हाल में सब से पहले पहुंचती हैं और सब से आखिर में निकलती हैं. सिंगल वूमन, सैल्फ मेड और लाखों लड़कियों के लिए मिसाल, गीता कपूर वह नाम है जिस ने ‘पीछे वाली रौ’ से निकल कर ‘सैंटर स्टेज’ पर अपनी कुरसी खुद बनाई.
गीता कपूर का जन्म मुंबई में हुआ. वे कोलाबा में रहती थीं और वहीं उन का बचपन गुजरा. उन्हें 14 साल की उम्र में समझ में आ गया कि उन्हें जिंदगी से कुछ ज्यादा चाहिए. फिर 15 साल की उम्र में उन्होंने काम ढूंढ़ना शुरू कर दिया. वे पढ़ाई पूरी कर नहीं पाईं और उन की यह एक अधूरी इच्छा रह गई. वे आज भी किताबें बहुत पढ़ती हैं. उन की मम्मी टीचर थीं और उन्होंने नर्स का कोर्स भी किया था. पापा गल्फ में काम करते थे और एअरलाइंस में ग्राउंड स्टाफ में थे.
2008 में ‘डांस इंडिया डांस’ शो में गीता कपूर को जज बनने का न्योता मिला. अब 17 साल हो गए हैं और न्योते अभी भी आ रहे हैं.
कैसे मिला गीता कपूर को गीता मां का टैग
गीता कपूर बताती हैं, ‘‘गीता मां का टैग मुझे बहुत साल पहले मिला था जब मैं ने एक शो ‘डांस इंडिया डांस’ किया था. वहां मेरी टीम में बहुत सारे साउथ इंडियंस थे. वे लोग प्यार से मुझे ऐड्रैस करते हुए कहते थे कि मां आप कैसी हैं? दरअसल, यह उन का एक लहजा होता है बात करने का जिसे सुन कर जो बच्चे ‘डांस इंडिया डांस’ में आए थे उन को लगा कि इज्जत के तौर पर वे मुझे मां का दर्जा दे रहे हैं. सो उन्होंने भी मां बोलना शुरू कर दिया. फिर मजाकिया तौर पर शो पर बताया गया कि इन को तो सब मां कहते हैं. लेकिन वह मजाक सीरियस हो गया.
‘‘सीरियस होने के बाद यह बात लोगों तक पहुंची. फिर वह जाने कब इतना सीरियस मामला हो गया कि मैं पूरे भारत की मां हो गई. पहलेपहल तो मुझे कुछ समझ में ही नहीं आया लेकिन आगे जा कर एहसास हुआ कि इस नाम के साथ मुझ पर एक जिम्मेदारी भी आई है और उस जिम्मेदारी को निभाना मेरा फर्ज बन गया.’’
इस फील्ड में आने वाले नए बच्चों को सलाह
‘‘अब कोरियोग्राफी की फील्ड में आगे बढ़ना मुश्किल नहीं है. जब हम ने शुरू किया था तब डांस को कैरियर औप्शन नहीं माना जाता था. इसलिए तब लोगों को यह समझना मुश्किल था कि इस से मेरा घर चलता है और यह एक कैरियर औप्शन बन सकता है. बस यही मुश्किल था. आज तो अगर डांस आता है तो कोरियोग्राफर का मुकाम हासिल करना आसान हो गया है. जो लड़कियां कोरियोग्राफर बनने की इच्छा रखती हैं उन के लिए मेरी सलाह यही रहेगी कि डांस को अच्छी तरह सीखें और समझें. लगातार प्रैक्टिस करें और किसी गुरु के अंडर रह कर बारीकियां सीखें. डांस का फाउंडेशन यानी बेस अगर स्ट्रौंग नहीं रहा तो यहां सस्टेन करना बहुत मुश्किल हो जाता है. कोरियोग्राफी के बारे में कोई ऐसा स्कूल नहीं है जहां पर पढ़ाईलिखाई हो. लेकिन इसे ऐक्सपीरियंस से सीखना होता है.
‘‘यह ऐक्सपीरियंस तभी आएगा जब आप किसी के अंडर काम करेंगे. डांस के जो क्लासिकल फार्म्स हैं उन के लिए टैक्नीक का सीखना बहुत जरूरी है. फिल्म की कोरियोग्राफी अलग है जबकि डांस की कोरियोग्राफी बाय इटसैल्फ अलग है. फिल्म में आप को टैक्निकली स्ट्रौंग कैमरे के लिए होना पड़ता है कि क्या शौट्स लगाना है, कैसे लगाना है और कौन सा ऐंगल आर्टिस्ट को अच्छा लगेगा वगैरह.’’
अच्छा डांसर बनने के लिए जरूरी बातें
‘‘सब से पहले तो डांस आना चाहिए. सैंस औफ रिदम बहुत जरूरी है. इस के अलावा भावना भी हो क्योंकि यह हम इंडियंस के दिल तक पहुंचने का एक सब से आसान तरीका है. इन सब के अलावा अच्छा डांसर बनने के लिए अपनी एक अलग पहचान रखनी बहुत जरूरी है. जब आप डांस में अपना एक स्टाइल डालते हैं, अपनी एक यूनीक पर्सनैलिटी और अलग पहचान बनाते हैं तब जा कर कोई एक बच्चन साहब बनते हैं या राजेश खन्ना बनते हैं. इन का अलग अंदाज था जिस ने इन्हें एक अलग पहचान दिलाई. साथ ही आप का डांस से प्यार और लगाव होना जरूरी है.’’
बच्चों से कनैक्शन
गीता कहती हैं, ‘‘जब इंडियाज बैस्ट डांसर शो में ऐलिमिनटेड बच्चा रोता है तो ऐसे में मेरा दिल कहता है कि रोना तो ठीक है लेकिन इस हार को इतना दिल से न लगाएं क्योंकि यह प्रतियोगिता का हिस्सा है. कोई जीतता है तो कोई हारता है. हार से क्या सीखते हैं वह ज्यादा इंपौर्टैंट है. लेकिन फिर भी मेरे दिल में कहीं दर्द तो होता ही है क्योंकि आप इतने हफ्ते बिताते हैं बच्चों के साथ तो उन से लगाव हो ही जाता है. बच्चा जब जाता है/जाती है तो ऐसा लगता है कि हाय यह न जाए आखिर सब कितनी मेहनत करते हैं. हमारा बस चले तो सारे बच्चों को रख लें और ऐलिमिनेट न करें.
‘‘बहुत साल पहले पहली बार मुझे एक बच्चे के लिए महसूस हुआ कि इस बच्चे के लिए कुछ करना चाहिए और काश यह बच्चा अच्छा कर जाए. उस से एक गहरा कनैक्शन बन गया था. उस का नाम था फैजल. बहुत प्यारा बच्चा था. उस ने पहली बार मुझे एहसास करवाया कि मेरा बच्चा हो तो बिलकुल ऐसा हो वरना न हो. वह पहली और आखिरी बार मुझे ऐसा महसूस हुआ. पता नहीं क्या था उस बच्चे में बहुत सुलझा हुआ और बहुत छोटा सा था करीब 10-12 साल का. दिल छू गया था वह बच्चा.’’

मां की चिट्ठियां
‘‘5 जुलाई को गीता कपूर का बर्थडे आता है. वे बताती हैं, ‘‘मेरे बर्थडे का बैस्ट गिफ्ट पिछले 5 सालों से मुझे नहीं मिला है. लेकिन उस से पहले हर साल मेरे बर्थडे पर मेरी मां मुझे एक चिट्ठी लिखा करती थी और वे चिट्ठियां मेरे लिए बहुत इंपौर्टैंट थी. वे बैस्ट गिफ्ट होती थीं. उन चिट्ठियों से मैं ने बहुत कुछ सीखा है. अब भी मुझे जब उन की याद आती है या हर बर्थडे पर मैं जाती हूं तो उस कलैक्शन में से कोई एक चिट्ठी निकाल कर पढ़ती हूं. मेरी मां 2021 में गुजर गई थीं और तब से सिर्फ यादें हैं. ये अच्छी यादें हैं जो बहुत अनमोल होती हैं. उन चिट्ठियों में जिंदगी का फलसफा होता था. मुझे क्या करना चाहिए, कैसे रहना चाहिए, मैं कैसी बेटी हूं, मुझे क्या चीजें अपनानी चाहिए, जिंदगी में क्या नहीं अपनाना चाहिए, कैसा व्यवहार करना चाहिए ये सब बातें मां उन में लिखती थीं.’’
मां और वर्किंग बेटी का रिश्ता
‘‘आजकल जो लड़कियां अपने मांबाप का खयाल रखना या घर चलाना चाहती हैं और काम करती हैं तो कई दफा उस काम को करतेकरते भूल जाती हैं कि पेरैंट्स को भी वक्त देना पड़ता है. मेरी सलाह उन बच्चों/बच्चियों को यही होगी कि काम जरूर करें, घर जरूर चलाएं लेकिन थोड़ा सा वक्त अपने परिवार के लिए और अपने मातापिता के लिए जरूर निकालें क्योंकि हम काम की उलझन में उलझ जाते हैं.
‘‘हमारे जीवन में काम ही काम रह जाता है. फिर जब वक्त आता है वक्त बिताने का तो शायद वही पेरैंट्स नहीं रहते जिन के लिए हम ये सब जद्दोजहद कर रहे हैं. ऐसे में बहुत जरूरी है कि थोड़ा सा वक्त अपने और अपने परिवार के लिए जरूर निकालें.’’
ग्रुप डांसर से कोरियोग्राफर तक का सफर
‘‘देखिए ग्रुप डांसर्स से कोरियोग्राफी का सफर मुश्किल नहीं होता क्योंकि जब आप तैयार हो जाते हैं तो आप को पता चल जाता है कि अब मैं कोरियोग्राफर बन सकती/सकता हूं. यह सीखने का एक प्रोसैस है और आप अगर इसे ऐंजौय करते हैं तो आप का काम मुश्किल नहीं होता है. जब आप ऐक्चुअली कोरियोग्राफर बनने के लिए तैयार हैं मगर बन नहीं पाते तो वह मुश्किल होता है. जब काम आना होता है तो वह आता ही है. लेकिन हां काम मिलना आज के जमाने में शायद थोड़ा डिफिकल्ट है क्योंकि कोरियोग्राफर बहुत ज्यादा हैं.
‘‘पहले इतना मुश्किल नहीं था. हम जहां काम करते थे वहां हमें बोला भी जाता था कि अब तुम तैयार हो. मेरी गुरु फराहजी थी. उन्होंने खुद कहा था कि अब तुम रैडी हो इसलिए तुम्हें अपना खुद का भी काम करना चाहिए. जब उन के पास वक्त नहीं था तो उन्होंने भी मुझे कोरियोग्राफर का काम दिया. मैं शुक्रगुजार भी हूं कि मुझे ऐसी बौस/गुरु मिलीं जिन्होंने हमेशा मुझ पर भरोसा किया. वह मेरे लिए बहुत अच्छा रहा.’’
एक महिला कोरियोग्राफर की चुनौतियां
‘‘आज के जमाने में इतनी चुनौतियां नहीं हैं लेकिन जब मैं ने जौइन किया था उस से पहले जो महिलाएं कोरियोग्राफी कर रही थीं उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा क्योंकि उस वक्त मेल कोरियोग्राफर ज्यादा थे. उन के बीच में अपनी एक जगह बनाना चैलेंजिंग था. उन के लिए ज्यादा मुश्किल आती थी लेकिन उन की जद्दोजहद की वजह से हमारे लिए सब आसान हो गया. अब तो आने वाले बच्चों के लिए और भी आसान है.’’
लाइफ लैसन
‘‘मेरी गुरु फराहजी ने मुझे यह लाइफ लैसन दिया है कि जिंदगी में धैर्य और निडरता बहुत इंपौर्टैंट है. निडर हो कर काम करना बहुत जरूरी है चूंकि अगर आप डर गए तो आगे नहीं बढ़ सकोगे. किसी काम को लेने से डरना नहीं है, कोई काम करने से डरना नहीं है यह सब से बड़ा लाइफ लैसन है. ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? वह काम अच्छा नहीं होगा और वह क्यों अच्छा नहीं होगा? उस से आप सीखें कि अगली बार अच्छा क्या करना है. बस डरना नहीं है.’’
इंडस्ट्री में लड़कियों की सेफ्टी
गीता कपूर कहती हैं, ‘‘फील्ड कोई भी हो अपने बच्चे की सेफ्टी के बारे में हर मांबाप सोचते ही हैं और सोचना भी चाहिए. बच्चे जो बाहर जा रहे हैं काम करने के लिए उन्हें अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए. मांबाप को भी अपने बच्चों को बताना चाहिए कि क्या अच्छा है और क्या बुरा. डरना नहीं चाहिए. एक तो अकसर बच्चे पेरैंट्स से और पेरैंट्स बच्चों से बात करने में थोड़ा कतराते हैं. मातापिता सोचते हैं कि बच्चा है, इस से बोलना चाहिए या नहीं. इसी तरह बच्चे मातापिता से खुल कर बात नहीं कर पाते हैं, जबकि आपस में बात करना बहुत जरूरी है ताकि आप को पता चल सके कि सेफ्टी क्या है और कितनी जरूरी है.
‘‘खासकर बेटियों के लिए अपने मातापिता से बात करना बहुत जरूरी है. उन्हें अपना दोस्त बनाएं क्योंकि सब से बड़ी गलतियां और सब से बड़ी जो मुश्किलें आती हैं जिंदगी में वे तब आती हैं जब आप अपने लोगों से बात नहीं कर पाते. आप का सब से बड़ा सेफ्टी नैट आप के घर वाले होते हैं. मैं हर लड़की से बोलना चाहूंगी कि अपने मातापिता को अपना दोस्त बनाएं और जब भी कहीं जाएं तो डैफिनेटली घर पर बता कर जाएं.’’
महिलाओं की सुपर पावर
‘‘जो सुपर पावर्स हमारे अंदर हैं हमें उन्हें रिकोग्नाइज करना चाहिए और उन्हें बना कर रखना चाहिए क्योंकि ये कोई और आप को दे नहीं सकता है. ये जब आप का जन्म हुआ था तब आलरैडी आप के अंदर थीं. ये सुपर पावर्स हैं सहनशीलता, धैर्य और निडरता. इन को उभरने दें. फालतू की चीजों के लिए नहीं लेकिन जहां जरूरत हो वहां पर अपनी आवाज जरूर उठाएं.’’
लाइव शोज हैं ज्यादा पसंद
बकौल गीता कपूर, ‘‘मेरा काम शुरू हुआ था इवेंट्स करने से. मैं पहले शोज पर बैकग्राउंड डांसर के रूप में काम करती थी. मेरे लिए लाइव शोज करना हमेशा ज्यादा अच्छा है क्योंकि आप को तभी के तभी वैलिडेशन, ग्रैटीफिकेशन सब मिल जाता है. लोग तालियां बजाते तो आप को पता चल जाता है आप का काम अच्छा था या नहीं था. जब लोग नाराज हो कर बगैर तालियां बजाय उठ कर चले जाएं तो समझ जाना कि अच्छा काम नहीं हुआ था. जबकि जो इंस्टैंट ग्रैटीफिकेशन है वह मुझे लाइव शोज से मिलता है जो मुझे बहुत पसंद है. रिऐलिटी शोज की कोरियोग्राफी बहुत डिफिकल्ट है.
‘‘आजकल के बच्चे जो करते हैं वह बहुत मुश्किल है. लोगों को लगता है कि ढाई मिनट का गाना है या 3 मिनट का गाना है तो यह बहुत आसान होगा, जबकि उस के पीछे बहुत मेहनत होती है. हमारे कोरियोग्राफर्स बहुत मेहनत करते हैं. वह काम आसान नहीं है क्योंकि आप के ऊपर एक बच्चे की जिम्मेदारी होती है. उस की जिंदगी आप के हाथ में है.’’
ग्रुप डांसर्स से कोरियोग्राफी का सफर मुश्किल नहीं होता क्योंकि जब आप तैयार हो जाते हैं तो आप को पता चल जाता है कि अब मैं कोरियोग्राफर बन सकती/सकता हूं. यह सीखने का एक प्रोसैस है और आप अगर इसे ऐंजौय करते हैं तो आप का काम मुश्किल नहीं होता है…
