Girls education : गुजरात के छोटा उदयपुर जिले की कलेक्टर गार्गी जैन ‘कलेक्टर इन क्लासरूम’ प्रोजेक्ट चला रही हैं. कलेक्टर हर हफ्ते आदिवासी इलाकों के स्कूलों में जाती हैं, लड़कियों के साथ बैठती हैं, उनकी बातें सुनती हैं, अपनी बताती हैं और उन्हें आगे बढ़ने की सीख देती हैं. कलेक्टर साहिबा की बातों ने इन लड़कियों के मन पर ऐसा असर डाला कि इलाके में इनका स्कूल ड्रॉपआउट दर 60% कम हो गया है.

कलेक्टर दीदी बनने का सफर

गार्गी जैन, अब कलेक्टर दीदी कहलाने लगी हैं और पांच कन्या विद्यालयों की 750 से ज्यादा लड़कियों की गाइड भी बन गई हैं. वे क्लास में लाइफ स्किल्स, कैरियर, बेसिक और लीगल राइट्स और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लड़ना सीखा रही हैं. गर्ल स्टूडेंट बिना किसी संकोच के प्रॉब्लम, करियर, और पारिवारिक मुद्दे ‘कलेक्टर दीदी’ के साथ शेयर करती हैं. कलेक्टर की इस पहल ने आदिवासी इलाकों की लड़कियों का कॉफिडेंस जगाया है.

कलेक्टर गार्गी जैन 5 आदिवासी लड़कियों को आईएएस बनाना चाहती हैं. इनमें सुरक्षा की भावना विकसित करने के लिए अपने जीवन का कड़वा अनुभव बताती हैं. इतना ही नहीं ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बीच का अंतर भी से समझाती हैं.

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ड्रॉप आउट रेट में कमी एक मॉडल

छोटा उदयपुर जिले में 2025 में लगभग 9,000 लड़कियों ने स्कूल छोड़ा. सरकारी योनाओं के साथ-साथ कलेक्टर के प्रयासों से 2026 में यह संख्या घटकर लगभग 5,500 हो गई. 4500 छात्राएं वापस स्कूल लौटीं यानी ड्रॉपआउट में लगभग 39% की कमी हुई जबकि एक साल में लड़कियों का ड्रॉपआउट 60% तक कम हुआ.

आखिर लड़कियों ने क्यों छोड़ा था स्कूल

भारतीय गांवों और आदिवासी इलाकों में आमतौर पर ड्रॉपआउट होने के कई कारण होते हैं-

• कई परिवारों की बड़ी लड़कियों को घर के काम करने पड़ते हैं जैसे खाना बनाना
• दूरदराज के इलाकों से पीने का पानी ढोकर लाना
• जब मातापिता काम पर हो, तो छोटे भाई-बहनों की देखभाल करना
• स्कूल, गांव या घर से बहुत दूर हो, तो माता-पिता लड़कियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं.
• स्कूल का रास्ता सुनसान हो, तो रास्ते में छेड़खानी का डर या ट्रांसपोर्ट के साधनों की कमी के कारण पेरेंट्स स्कूल भेजना बंद कर देते हैं
• कई सरकारी या गांवों के स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग और साफ-सुथरे शौचालय की सुविधा नहीं होती है.
• माहवारी के समय सेनेटरी नैपकिन की कमी और इससे जुड़ी झिझक के कारण लड़कियां टीनएज में कदम रखते ही स्कूल छोड़ देती हैं.
• परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और परिवार में ढेरों बच्चे भी हैतो लड़कियों की तुलना में लड़कों की पढ़ाई को अधिक जरूरी माना जाता है और लड़कियों की पढ़ाई बंद करवा देते हैं.
• बेटे पर निवेश करने को फायदेमंद माना जाता है क्योंकि लड़कियां पढ़लिख कर शादी कर दूसरे घर जाएंगी और इससे दूसरे घर की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी जबकि बेटे पढ़ेगे तो उनके घर का प्रत्यक्ष फायदा होगा.
• कई जातियों या वर्गों में आज भी लड़कियों की शादी जल्दी कर दी जाती है. पेरेंट्स को लगता है कि अधिक पढ़ाने पर बेटी के लिए उचित वर ढूढ़ने में दिक्कत होगी.
• ग्रामीण या आदिवासी इलाकों में गाइडेंस की कमी के कारण लड़कियों और उनके माता-पिता को शिक्षा का महत्व समझ नहीं आता.

ड्रापआउट के नुकसान

लड़कियों की पढ़ाई और शिक्षा का फायदा सिर्फ उन्हें ही नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ियों को मिलता है. जब एक लड़की पढ़ती है, तो इसका लॉन्ग-टर्म असर कई जेनरेशन्स तक देखा जाता है.

शिक्षित होने से लड़कियों को अच्छे रोजगार और करियर के अवसर मिलते हैं, जिससे वह किसी और पर निर्भर नहीं रहतीं. जिससे पूरे परिवार का जीवन स्तर सुधरता है. एक शिक्षित मां अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और उनके भविष्य को लेकर ज्यादा जागरूक होती है. ऐसा कहा भी जाता है कि “एक लड़का पढ़ता है तो एक व्यक्ति शिक्षित होता है, लेकिन जब एक लड़की पढ़ती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है.”
शिक्षित लड़कियों की शादी सही उम्र में होती है, जिससे वे शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व होती हैं. वह फैमिली प्लानिंग को बेहतर समझती हैं.

शिक्षित महिलाएं खुद के और अपने बच्चों के हेल्थ, और न्यूट्रिशन का बेहतर ध्यान रखती हैं. इससे बच्चों की मृत्यु दर और कुपोषण जैसी समस्याओं में कमी आती है जो देश के विकास के लिए भी जरूरी होता है.
शिक्षा लड़कियों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक बनाती है. वे घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ खड़ी हो सकती हैं.

लड़कियां पढ़ लिख जाती है, तो समाज और परिवार में उनकी बात को अहमियत दी जाती है. आज शिक्षा की बदौलत ही महिलाएं राजनीति, प्रशासन, जैसे हर क्षेत्र में लीडरशिप रोल निभा रही हैं.
शिक्षा से सोचने का नजरिया बदलता है। लड़कियों में किसी भी चुनौती या संकट का सामना करने कॉफिडेंस आता है.

गार्गी जैन की तरह बाकी भी सोचें तो ड्रॉप रेट जीरो हो जाए

भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की ओर से जारी Unified District Information System for Education Plus 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्कूली बच्चों और विशेषकर लड़कियों के ड्रॉपआउट रेट में गिरावट दर्ज की गई है. माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट घटकर 5.7% रह गया है, जो कि लड़कों के ड्रॉपआउट रेट (8.3%) की तुलना में काफी कम और बेहतर है. अगर लड़के और लड़कियों दोनों को मिलाकर देखा जाए, तो कुल माध्यमिक ड्रॉपआउट रेट पिछले वर्ष (2024-25) के 8.2% से घटकर 7.0% पर आ गया है. प्राइमरी लेवल के क्लासेज (कक्षा 3 से 5) में भी कुल ड्रॉपआउट रेट 2.3% से घटकर 1.8% हो गया है. जहां तक बात स्कूलों में एडमीशन की है, तो मिडिल स्कूल में लड़कियों का कुल नामांकन लड़कों की तुलना में करीब 5 प्रतिशत अधिक रहा, इसका मतलब है कि माध्यमिक कक्षाओं में लड़कों की तुलना में अधिक लड़कियां दाखिला ले रही हैं.

सुधार के उदाहरण और संभावनाओं की गुंजाइश

देश के 98.5% स्कूलों में अब लड़कियों के लिए अलग शौचालय की सुविधा है, जिससे ड्रॉपआउट को रोकने में मदद मिली है. अब महिला शिक्षकों की संख्या बढ़कर कुल वर्कफोर्स का 54.9% हो गई है, जिससे स्कूल का माहौल लड़कियों के लिए अधिक सुरक्षित और सहज बना है। ये आंकड़े बताते है कि अगर व्यवस्था चाहे तो ड्रॉपआउट के आंकड़े जीरो हो सकते हैं, अभी भी कई क्षेत्रों में काम होने बाकी है, इच्छाशक्ति की कमी ही लड़कियों को स्कूल से दूर रख रही है जबकि यह उनका फंडामेंटल राइट है।

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