Heart Touching Stories : सागर  की रेत पर अंकित मेरे पदचिह्नों ने मुझे फिर से समुद्र्र के किनारे ले जा कर मेरे कदमों को ठिठका दिया. लहरें अठखेलियां करती हुई मेरे पांवों को चूमने लगी थीं. सूर्य अपने सात घोड़ों के रथ पर सवार था और अब उस ने अपने रथ के पहियों की गति धीमी कर ली थी. सूर्यास्त के समय सूर्य अहिस्ताआहिस्ता वृहद समुद्र्र के मध्य लहरों के पीछे जैसे शनै:शनै: जल समाधि लेने लगा था. नीलांबर लाल केसरी चोला धारण किए साधु सा शांतचित्त और ध्यान में डूबा हुआ प्रतीत हो रहा था.

भानु की बुझीबझी आंखें जैसे मझे ही देख रही थीं. मैं सूरज को डूबता देख कर अपनी बुझती आंखों से अपने इर्दगिर्द देखने लगी.

समुद्र्र के किनारे हो रहा सनसैट, लकड़ी के आधे ठूंठ से बंधी नाव, बिखरी हुई सीपियां, लहरों पर तैरती छोटीबड़ी मछलियां और अथाह समुद्र का अनुपम दृश्य मेरी आंखों के सामने था. मेरी नजरें चारों ओर विचरण कर रही थीं. एक तरफ सागर किनारे रेत पर पीठ घुमाए बैठे प्रेमी युगल, अपनी उंगलियों से बड़ेबड़े हार्ट और उस के भीतर हृदय को आरपार भेदते तीर वाली आकृतियां सागर की गीली रेत पर उकेर रहे थे तो वहीं दूसरी ओर खेलते, खिलखिलाते छोटेछोटे बच्चे उसी सागर की रेत पर इधर से उधर दौड़ रहे थे. उन में से कुछ बच्चे रेत के घर बनाने में व्यस्त थे जो उस सुरमई शाम के सुहावने दृश्य में चार चांद लगा रहे थे.

मैं समुद्र्रतट पर खड़ी उस सारे नजारे को मुख पर उदासीनता की चादर ओढ़े निहार रही थी. एक ऊंची लहर और शीतल बयार के झांके से मेरे चेहरे पर बिखरी पलकों ने मेरी स्तब्ध हो चुकी दृष्टि की तटस्था को अचानक भंग कर दिया. एक बार लगा जैसे मैं नींद से जाग गई, किंतु मेरी चेतना क्षणिक थी जो मु?ो छोड़ कर पुन: गायब हो गई और मेरा अवचेतन मन अतीत की मांद में अंधेरी राहों की भूलभुलैया में खो गया…

विहान भी मुझे एक शाम इसी समुद्र्र किनारे मिला था. मैं उस की प्रतिभा पर मुग्ध थी. हां, उस की प्रतिभा ही उस का पैशन था. वह सैंड आर्टिस्ट था जो रेत पर तरहतरह की आकृतियों को जीवंत रूप देने में माहिर था. मैं यहां जब भी आती, उसे दूर से ही देखती रहती थी. वह अपने काम में व्यस्त होते हुए भी कभीकभी मु?ो खुद को देखते हुए देख लेता था तो हलका सा मुसकरा देता था. मैं उस की कला की मुरीद थी और उस की मुसकान की भी. इस तरह 5-6 महीनों में हमारी दोस्ती हुई और फिर वही हुआ जो अधिकतर होता है हमारी दोस्ती प्यार में बदल गई.

हम अकसर शाम को सूर्यास्त के समय यहां आ कर बैठ जाते थे. सूरज के लाल, केसरिया चोले के रंग से अपना नीलांबर का रंग बदल लेता. आकाश में उड़ान भर घौंसलों की ओर जाते पंछी, रेत की सौंधी खुशबू, किनारों पर खड़े हम दोनों की ओर आती सागर की बड़ी लहरें, ठंडी हवा के ?ांके, बड़े पत्थरों पर बैठ यंग कपल्स, सब मिल कर यहां के वातावरण को मोहक और आकर्षक बनाते थे. अपनी सुखद अनुभूतियां और फ्यूचर प्लानिंग जैसी तमाम चीजों का आनंद हम यहीं उठाते थे.

एक सांझ मैं उस के कंधे पर सिर रख इत्मीनान से बैठी थी कि तभी बातों ही बातों में उस ने मुझ से उत्सुकता से कहा, ‘‘सुनो.’’

‘‘हूं.’’

‘‘मैं तुम्हारे लिए कुछ बनाना चाहता हूं. बताओ तीर वाला हार्ट बनाऊं, अपने दोनों का कपल या कुछ और जो तुम्हें पसंद हो?’’ उस ने मेरी ओर प्यार से देखते हुए जवाब की आस में यह प्रश्न पूछा. उस के प्रश्न पर मैं कुछ देर के लिए मौन हो गई और उस की आंखों में देखने लगी. उस की आंखें मेरे उत्तर की प्रतीक्षा कर रही थीं, ‘‘घर… घर बनाओ तुम मेरे लिए,’’ मैं ने धीमे से कहा, ‘‘मुझे घर बहुत पसंद है. ऐसा घर जिस की खिड़कियां से विस्तृत आकाश, पंक्तिबद्ध पंछी, डूबता सूरज और वृहद समुद्र्र दिखाई दे. ठंडी हवाएं हम से बातें करने घर में हौले से चली आएं और रात को जिस की खिड़कियां से आकाश में लटकता रोशन चांद दिखाई दे. ऐसा ही एक घर जो हमारे सपनों का महल हो,’’ मैं ने उस के कंधे पर अपना सिर फिर से टिका दिया.

वह मुसकराते हुए अपनी जगह से उठा और रेत इकट्ठा कर ढेर लगाने लगा. मैं भी इस निर्माण में उस का साथ देने लगी. हम दोनों अपने चारों हाथों से घर बनाने में जुट गए. मैं उस के पास बैठी उस के अंदर बसे कलाकार को देख रही थी. वह अपने कार्य में इतना मगन था जैसे साधक सिद्धि में. वह उस घर की नींव रख चुका था और निर्माणकार्य जोरों पर था.

वह घर अभी आधा ही बन पाया था कि अचानक उस का फोन बज उठा. उस ने रेत से सने अपने हाथों को जल्दी से सागर के खारे पानी से धोया और मोबाइल पौकेट से निकाल कर बात करने लगा. बातों ही बातों में वह 10 कदम आगे निकल गया. काल कट होते ही जब वह वापस मेरे पास आया तो उस की आंखें चमकने लगी थीं. उस का चेहरा खुशी से खिला हुआ था. वह प्रसन्नता से उछल पड़ा और मुझे कंधों से पकड़ किनारे पर ही मुझ से लिपट गया. उसे इंटरनैशनल कंपनी में एक साल के लिए औफर मिला था. उस का खवाब उस की आंखों में जुगनू सा चमक रहा था. हम दोनों फूले नहीं समा रहे थे लेकिन उस के जुदा होने के एहसास से अचानक मेरे चेहरे का रंग उड़ने लगा था.

उस ने मेरा उदास चेहरा देख कर मुझे बहुत प्यार से समझते हुए कहा, ‘‘पागल, 1 ही साल की तो बात है. बातों ही बातों में निकल जाएगा. आते ही सब से पहले तुम्हारे लिए इस अधूरे घर को पूरा बनाऊंगा और उस के बाद हम शादी करेंगे.’’

यह सुन कर मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. मेरे मुख पर दुख और प्रसन्नता के मिलेजुले भाव तैर रहे थे.

धीरेधीरे अंधेरे ने अपना डेरा डालना प्रारंभ कर दिया था. हम अपनेअपने घर लौट आए. दिन गुजरते गए और एक शाम ऐसी भी आई जो उसे उड़ा कर मुझ से दूर ले गई.

समुद्र्र के तट पर मेरे आंसुओं की बारिश होते हुए 2 बरस गुजर गए जो लगातार समुद्र्र के नमक की मात्रा को बढ़ाती रही है. मैं आज तक भूतकाल के स्मृति कांटे में फंसी मछली सी छटपटा रही हूं. हां, मैं यहां भक्क नीले आकाश के नीचे इसी किनारे पर प्रतिदिन आती हूं और सुनती हूं स्मृतियों में मल्लाह के गीतों के सुरों की वेदना, किसी वायलन से निकलती आंतरिक पीड़ा की धुन को जो मेरे हृदय का अंतर्नाद सा प्रतीत होता है.

‘‘मम्मी मेरा घर टूट गया,’’ किनारे पर खड़े रो रहे एक बच्चे की इस आवाज ने मेरी सारी स्मृतियों को अचानक से पीछे धकेल दिया. मैं ने अपने बहते अश्कों को गालों से पोंछ लिया और उस बालक को देखने लगी.

‘‘मेरा घर टूट गया. मैं ने मुश्किल से बनाया था,’’ वह बच्चा बिलखने लगा. एक सागर की लहर किनारे पर बने उस के घर को अपने साथ बहा ले गई.

मेरी आंखें अपनी बगल में उस बिलखते, आंखें मलते बच्चे को देख रही थीं जो घर टूटने के दुख में विलाप कर रहा था. अगर वह सम?ाने या सुनने लायक होता तो मैं उसे अवश्य बताना चाहती कि मैं ने भी बनाना चाहा था उस की भांति रेत पर निर्मित अपना घर, जिसे लील लिया इस समुद्र्र ने जो मेरे जीवन में किसी सुनामी से कम हादसा नहीं था. रेत में धंसे सपनों के पांव भी बहा ले जाती हैं लहरें, वे बेबस हो कर भाग भी नहीं पाते.

आवेग भावनाओं का हो या समुद्र्र का सब कुछ बहा ले जाता है. ये स्मृतियां मछुआरे का वह गूथा हुआ जाल है, जिस में फंसा मेरा प्रेम, सपने, घर हमेशा छटपटाते रहेंगे. मेरे पैर मुझे बारबार इस किनारे पर घसीट लाते हैं पिछले 2 बरस से. मेरे साथ छल किया है प्रेमी और सागर दोनों ने. एक मौत के साथ जीवन बहा ले गया और दूसरा अधूरा घर. प्रेम और घर का इंतजार है कि खत्म ही नहीं होता. मेरी आंखें, आंखें कम बरसते बादल की बारिश अधिक हैं.

बरसती आंखें लिए मैं असीम सागर को देखते हुए सोचने लगती हूं कि समुद्र्र शांत हो कर भी कितने तूफान, सुनामी समेटे बैठा है.

लहरें कितने पांवों के निशान और घर निगले सुस्ता रही हैं. इस बच्चे का घर और सपने भी नहीं लौटेंगे, उसी तरह जैसे वह कभी नहीं लौटा और न लौटा रेत का आधाअधूरा घर. ऐरोप्लेन क्रैश होने के बाद यह अंबर, धरती, सागर, किनारे, लहरें और ये हवाएं भी मेरी दुश्मन हैं. आत्मिक रिक्तता, नीरसता, दुख जीवन में स्थायी हो गए. लहरों ने फिर मेरे पैरों को ऐसे स्पर्श किया जैसे कोई बालक बारबार पैर छू कर माफी मांगता है. मैं विशाल समुद्र्र को अपनी कज्जलकूट सम श्यामल और धुंधली आंखों से हिलोरें मारते हुए निहारने लगी और सोचती रही कि सागर, किनारे, लहरें सब यहीं स्थित और तटस्थ रहेंगे, किंतु घर. घर नहीं क्योंकि रेत की इमारतों की उम्र नहीं होती. वह बह जाती है या ढह जाती है, हवा और पानी के साथ. बस यही तो रेत की कला है. यही तो है आर्ट औफ सैंड.

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