domestic violence : घरेलू हिंसा कभी भी अचानक हुए किसी बड़े हमले से शुरू नहीं होती. इस की जड़ें अकसर उस खामोशी में पनपती हैं, जो एक पीड़ित पहली बार अपमान या दुर्व्यवहार सहते हुए अपना लेता है. बारबार हिंसा होने पर चुप रहना आरोपी की हिम्मत को बढ़ावा देता है और मानसिक प्रताड़ना और गालियों से शुरू हुआ यह चक्र, समय के साथ जानलेवा शारीरिक चोट तक पहुंच जाता है.
शारीरिक चोट इस बात का सुबूत है कि चुप रहने से हालत सुधरती नहीं बल्कि और बिगड़ती जाती है. इसलिए अगर किसी के साथ भी घरेलु हिंसा हो रही है और पति ने बहुत मारा और हौस्पिटल तक पहुंचा दिया, तो वहां पति की गलतियों को छिपाने के बजाए उस पर आवाज उठाएं.
दरअसल, घरेलू हिंसा के मामलों में जब पति द्वारा पत्नी को गहरी और गंभीर चोटें पहुंचाई जाने लगें, तो यह स्पष्ट चेतावनी है कि स्थिति अब जानलेवा हो चुकी है. ऐसी स्थिति में तुरंत घर छोड़ना और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना सब से पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.
सहेली के घर में किराए का कमरा लें
किसी सच्ची सहेली के घर में एक छोटा सा किराए का कमरा सब से अच्छा और तुरंत राहत देने वाला विकल्प हो सकता है. यहां आप को छिपने की जगह के साथसाथ भावनात्मक सहारा भी मिलता है.
मायके में आप का अपना कमरा हो
अगर आप के मातापिता और परिवार आप के साथ मजबूती से खड़े हैं, तो मायका सब से सुरक्षित जगह है. लेकिन यह तभी सही है जब आप के परिवार वाले हिंसक पति के दबाव या ‘समाज क्या कहेगा’ के डर से आप पर वापस जाने का या समझौता करने का दबाव न डालें.
सरकारी वन स्टौप सैंटर और एनजीओ की मदद लें
यदि परिवार या दोस्तों से तुरंत मदद न मिल पाए, तो घबराने की जरूरत नहीं है. भारत सरकार के ‘वन स्टौप सैंटर’, महिला हेल्पलाइन (181 या 1091), नारी निकेतन या प्रतिष्ठित गैरसरकारी संस्थाओं के शेल्टर होम में शरण ली जा सकती है. यहां न सिर्फ रहने की सुरक्षित जगह मिलती है, बल्कि मुफ्त कानूनी और मैडिकल मदद भी उपलब्ध होती है.
वर्किंग वूमेन होस्टल या पेइंगगेस्ट
अगर आप के पास आमदनी का अपना स्वतंत्र जरीया है, तो शहर के किसी अच्छे इलाके में केवल महिलाओं के लिए बने होस्टल या पीजी में रहा जा सकता है. यहां एक स्वतंत्र और सुरक्षित माहौल मिलता है.
अपनी कमाई के तरीके खोजें
किसी भी रिश्ते में खुद को पूरी तरह निर्भर न बनाएं. हाथ में अपना कोई हुनर या कमाई का स्वतंत्र साधन जरूर रखें. आप जिस काम में अच्छी हैं भले ही वह छोटामोटा पार्लर का काम, ट्यूशन पढ़ाना, डांस सीखना ही क्यों न हो उसे करें. खली न बैठें बल्कि कोई न कोई काम करें.
इमरजेंशी कैश फंड
बुरे वक्त के लिए कम से कम 5 से 6 महीने के खर्च के लायक कैश हमेशा एक सुरक्षित जगह पर रखें, जिस की जानकारी सिर्फ और सिर्फ आप को हो.
अस्पताल में डाक्टर के पूछने पर क्या कहें
सच न छिपाएं : कई बार महिला डर जाती है और अपना मुंह नहीं खोलती. उसे लगता है कि सच बताया तो बाद में पति और मारेगा. यह किसी भी समस्या का हल नहीं है. डाक्टर से कुछ न छिपाएं. उन्हें स्पष्टतौर पर बताएं कि पति ने मारपीट की है और चोटें घरेलू हिंसा के कारण आई हैं.
एमएलसी मैडिकोलीगल केस (MLC Medicolegal Case) दर्ज कराएं : डाक्टर को मैडिकल रिपोर्ट में चोट के सही कारण (जैसे- पति द्वारा मारपीट) दर्ज करने के लिए कहें. यह रिपोर्ट अदालत और पुलिस काररवाई में सब से मजबूत सुबूत बनती है.
शरीर की हर चोट दर्ज कराएं : बाहरी और अंदरूनी, हर तरह के दर्द और चोट के बारे में डाक्टर को बताएं ताकि वे इसे मैडिकल फाइल में लिख सकें.
मैडिकल डौक्यूमेंट्स की कापी संभाल कर रखें : इलाज के पर्चे, डिस्चार्ज समरी, मैडिकल बिल और चोटों की तसवीरें (यदि संभव हो) अपने पास सुरक्षित रखें.
पुलिस को सूचना दें (112/100) : अस्पताल प्रशासन खुद भी पुलिस को सूचित करता है. आप खुद भी 112 नंबर पर काल कर के शिकायत दर्ज करा सकती हैं.
-महिला हैल्पलाइन से मदद लें.
-महिला घरेलू हिंसा हेल्पलाइन 181
-मुफ्त कानूनी सहायता प्राप्त करें.
-आप घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act, 2005) के तहत संरक्षण, रहने का अधिकार और मुआवजे की मांग कर सकती हैं. जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण से आप को मुफ्त वकील मिल सकता है.
सुरक्षित स्थान चुनें
यदि आप को घर लौटने में जान का खतरा महसूस हो, तो पुलिस या महिला हैल्पलाइन की मदद से किसी सुरक्षित स्थान या अपने मायके जाएं.
हिंसा को सहना रिश्ता बचाने का कोई हल नहीं है
कई बार महिला अपने परिवार और बच्चों के बारे में सोच कर चुप हो जाती है और शिकायत नहीं करती क्योंकि उसे लगता है कि अगर वह ऐसा करेगी तो उस की शादीशुदा जिंदगी बिखर जाएगी. जबकि यह सोच गलत है. घरेलु हिंसा में गहरी चोट का लगना इस बात का सुबूत है कि शादीशुदा जिंदगी तो आप की वैसे भी सही नहीं चल रही. अगर सही होती तो यह नौबत ही नहीं आती.
साथ ही जुल्म या टौर्चर होने पर भी चुप रहना आप की कमजोरी को दर्शाता है और ऐसा कर के आप सामने वाले को इस से भी ज्यादा कुछ बुरा करने की हिम्मत देता है जोकि न सिर्फ आप के लिए गलत है बल्कि किसी भी लिहाज से यह बच्चों के लिए भी सही नहीं है.
आत्मविश्वास खोना
लगातार हिंसा और दुर्व्यवहार से व्यक्ति का आत्मविश्वास और आत्मसम्मान पूरी तरह टूट जाता है. धीरेधीरे वह ऐसे ही माहौल में रहने का आदि हो जाता है और इस माहौल से निकलने के प्रयास करना भी बंद कर देता है. समय के साथ पीड़ित का आत्मविश्वास इतना कमजोर हो जाता है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए आवाज उठाने से डरने लगता है.डिप्रैशन और
भय के साए में जीने से गंभीर डिप्रैशन, ऐंग्जाइटी और मानसिक बीमारियां घेर लेती हैं. वह इस हद तक तनाव में रहने लगती है कि रोजमर्रा के कामों में भी उसे परेशानी होती है. वह खुद को बीमार मान लेती है और पिटाई को अपनी किस्मत मान लेती है.
हिंसा का बढ़ता दायरा
हिंसा की शुरुआत अकसर तानों, अपमानजनक भाषा, चीखनेचिल्लाने, संदेह करने या ताने कसने से होती है. इस स्तर पर पीड़ित को यह महसूस कराया जाता है कि गलती उसी की है. जब मौखिक और सामाजिक नियंत्रण को सह लिया जाता है, तब धक्कामुक्की, हाथ उठाना, चीजें फेंकना या बाल खींचना जैसी घटनाएं शुरू होती हैं. इस के बाद अकसर माफी मांगने या दोबारा न करने का दिखावा किया जाता है.
यदि कोई कानूनी या सामाजिक रुकावट न आए, तो हिंसा का चक्र खतरनाक रूप ले लेता है. इस में थप्पड़ या धक्के से बात बढ़ कर लातघूंसे मारना, किसी वस्तु/हथियार का इस्तेमाल करना, गला दबाना या जहर/गंभीर चोट पहुंचाना शामिल हो जाता है.
चुप रहने से अपराधी का हौसला बुलंद होता है
जब हिंसा का कोई विरोध या कानूनी परिणाम नहीं होता, तो हिंसा करने वाले को लगता है कि वह कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है. इसलिए हिंसा को सबक जरूर सीखना चाहिए ताकि उसे आगे के लिए डर हो जाए कि मैं ने अगर कुछ गलत किया तो मुझे इस का परिणाम भुगतना होगा.
इसलिए अच्छा तो यही है कि अगर आप गलत नहीं हैं तो सहन न करें और सामने वाले को उस की गलती का एहसास कराएं ताकि वह आगे आप के साथ ऐसा दुर्व्यवहार न कर पाएं.
