Friendship Day Special: ब्रेकअप के बाद भी कायम है इन बॉलीवुड स्टार्स की दोस्ती

1. रणबीर-दीपिका:

रणबीर और दीपिका की दोस्ती को बौलीवुड सलाम करता है. ब्रेकअप के बाद दोस्ती के रिश्ते को मैंटेन करना सीखना है तो कोई इन से सीखे.

2. अनुष्का शर्मा-रणवीर सिंहः

रणवीर सिंह और अनुष्का शर्मा ने अपनी पहली फिल्म ‘‘बैंड बाजा बारात’’ के बाद से एकदूसरे को डेट करना शुरू कर दिया था. लेकिन इन का यह रिलेशन बहुत समय तक चल नहीं पाया और ब्रेकअप हो गया. ब्रेकअप के बाद ये कुछ समय के लिए एकदूसरे से दूर थे लेकिन फिर दोनों ने दोस्ती मैंटेन कर ली.

3. शिल्पा-अक्षय:

90 के दशक में इन की जोड़ी हिट जोड़ी थी. लेकिन कुछ समय बाद ये अलग हो गए और अक्षय ने ट्विंकल से शादी कर ली और शिल्पा ने राज कुंदरा में प्यार ढूंढ़ लिया. लेकिन आज भी दोनों मिलते हैं तो अच्छे दोस्त की तरह मिलते हैं.

4. ऋषि कपूर-डिंपल कपाड़िया:

रणबीर ने दीपिका से ब्रेकअप के बाद दोस्ती काफी अच्छे से बरकरार रखी. आखिरकार इतने अच्छे से मैनेज करना उन्होंने अपने पापा से सीखा है. ऋषि कपूर ने भी एक जमाने में डिंपल कपाड़िया के साथ दोस्ती मैंटेन की थी.

5. गौरव चोपड़ा-नारायणी शास्त्रीः

गौरव चोपड़ा और नारायणी शास्त्री काफी समय तक साथ थे. लेकिन इन के ब्रेकअप के बाद गौरव ने मोनी राय से रिश्ता जोड़ लिया. इस के बाद भी गौरव और नारायणी के बीच दूरियां नहीं बढ़ीं. आज भी वे अच्छे दोस्त हैं.

6. डीनो मोरिया-बिपाशा बसु:

मौडलिंग के दिनों में ये दोनों साथ रहते थे. 2002 में ‘राज’ फिल्म में एकसाथ परदे पर आए और काफी समय तक चर्चा में रहे. लेकिन इन का ब्रेकअप हो गया और बिपाशा जौन के पास चली गई. कई सालों तक बिपाशा और जौन का रिलेशनशिप रहा, लेकिन फिर इन का रिश्ता टूट गया. इस के बाद बिपाशा ने करण से शादी कर ली और शादी की तसवीरों में बिपाशा और डीनो की दोस्ती को साफ देखा जा सकता है.

Friendship Day Special: द साइंस औफ फ्रेंडशिप

फोन आया तो लोगों का मिलना जुलना कम हुआ. लेकिन इससे लोगों के बीच दोस्तियां कम नहीं हुईं. इंटरनेट आया और उसके बाद वीडियो काॅलिंग तो मिलने जुलने की तकरीबन जरूरत ही खत्म हो गई. मगर इससे भी न तो लोगों का सदेह एक दूसरे से मिलना जुलना खत्म हुआ और न ही दोस्ती की जरूरत को वीडिया काॅलिंग दरकिनार कर पायी. लब्बोलुआब यह है कि दोस्ती जैसी भूमिका निभाने के लिए भले कितनी ही कम्युनिकेबल तकनीकें विकसित हो गई हों, लेकिन दुनिया में न तो दोस्त खत्म हुए हैं और न ही दोस्ती की जरूरत खत्म हुई है. शायद इसी आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि भविष्य में भी कमी दोस्ती की जरूरत या दोस्तों का होना खत्म नहीं होगा. सवाल है इसकी वजह क्या है? निश्चित रूप से इसकी वजह है साइंस औफ फ्रेंडशिप.

दोस्ती महज दो लोगों के संयोग से एक दूसरे के प्रति अच्छे भाव रखने और एक दूसरे के साथ सकारात्मक व्यवहार का नाम भर नहीं है. लोगों में दोस्ती की एक बड़ी स्वभाविक जैविक जरूरत होती है. कहने का मतलब यह है कि दोस्ती महज इच्छाभर का खेल नहीं है. इसके पीछे पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया है. दोस्ती शरीर की रासायनिक गतिविधियों का हिस्सा भी है. इसलिए दोस्तियां तब भी थीं, जब हम दोस्ती जैसी भावना को व्यक्त कर पाने में असमर्थ थे और दोस्तियां तब भी होंगी जब हममें इस तरह की किसी भावना की जरूरत नहीं रह जाएगी. चाहे कोई इंसान कितना ही आत्मनिर्भर क्यों न हो जाए, चाहे वह कितना ही प्रोफेशनल ही क्यों न हो जाए? लेकिन जीवन में हर किसी के लिए कम से कम एक दोस्त का होना जरूरी होता है.

हमें दोस्त क्यों चाहिए? अगर मेडिकल साइंस की मानें तो दोस्त हमारी उम्र बढ़ाते हैं, दोस्त हमें स्वस्थ रखते हैं, दोस्त हमें सक्रिय रखते हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि दोस्त हमें जीवन में रूचि बनाये रखने में मदद करते हैं. यकीन मानिये इतना कुछ कहने के बाद भी कभी कोई लेखक दोस्ती के सभी फायदों को कलमबद्ध नहीं कर सकता. इसलिए मानकर चलिये कि हम जीवन के लिए जिन-जिन वजहों के चलते दोस्तों को जरूरी पाते हैं, हमेशा वे वजहें हमारी जानकारियों से बहुत ज्यादा होती है. दोस्ती के महत्व को इंसान आज से नहीं तब से जानता है, जब वह इस जरूरत को अभिव्यक्त भी नहीं कर पाता था.

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शायद इसीलिए दुनिया में सबसे पुराना मानव रिश्ता दोस्ती का ही है. यहां तक कि परिवार और परिवार चलाने के लिए सेक्स संबंधों की जरूरत भी दोस्ती और दोस्तों के बाद की जरूरत है. साल 2011 में एक बहुत बड़े शोध अध्ययन से यह साबित हुआ कि दरअसल हमें दोस्तों की जरूरत इसलिए होती है; क्योंकि ये दोस्त ही हैं जो हमारे दिमाग में एक ऐसे रसायन को स्रावित करने में मददगार होते हैं, जिससे हमें चीजें अच्छी लगती हैं.

शायद यही कारण है कि दुनिया मंे अपवाद के तौरपर भी एक भी आदमी ऐसा नहीं मिलेगा, जिसका कोई दोस्त न हो या जिसकी जीवन में कभी किसी से बहुत पक्की दोस्ती न बनी हो. एक किस्म से दोस्त बनाने में हम अपने तात्कालिक कौशल का भले कुछ उपयोग करते हों, लेकिन दोस्ती एक ऐसी बायोलाॅजिकल प्रक्रिया है, जो अपने आप होती है, उसमें हम बहुत कुछ जोर जबरदस्ती नहीं कर सकते. दरअसल हमारे दोस्त नहीं हैं तो इसका मतलब यह है कि हमारे सकारात्मक सामाजिक संबंध नहीं हैं और सकारात्मक सामाजिक संबंध न होना महज हमारे व्यक्तिगत स्वभाव पर निर्भर नहीं करता. यह वास्तव में हमारे अंदर स्रावित रसायनों का नतीजा होता है. साल 2016 में कुछ शोधकर्ताओं ने पाया कि जब दो दोस्त आपस में बातचीत करते हैं, साथ रहते हैं, एक दूसरे के बारे में सोचते हैं, यहां तक कि लड़ते और झगड़ते हैं तो भी उनके मस्तिष्क में आॅक्सीटाॅसिन रिलीज होता है. इसलिए अब वैज्ञानिकों ने एक फार्मूला विकसित किया है, जिससे वह यह जान सकते हैं कि निजी जीवन में किसी के कितने दोस्त हैं?

दोस्ती हमारे मस्तिष्क के उस हिस्से को उज्वल करती है या प्रखर करती है, जिसमें हम तमाम परेशानियों के बीच भी अपने दोस्तों के साथ खुश रहते हैं और उन्हीं के साथ रहना चाहते हैं. विकासवादी जीव वैज्ञानिक और प्रोफेसर डाॅ. लाॅरेन ब्रेंट के मुताबिक दरअसल दोस्ती की भावना या दोस्ती का मनोविज्ञान हमारी विकासवादी परंपरा का हिस्सा है. जब हम बंदरों के रूप में थे, तब भी हम सामूहिकता की महत्ता को पहचानते थे और एक समूह में रहते थे. यह समूह दोस्तों से मिलकर ही बनता था. हमारे दिलदिमाग में आज भी विकासक्रम का यह सिरा मौजूद है. इसलिए हम अपनी तमाम खुशियां समूह में मनाकर ही खुश होते हैं. अकेले में हम अपनी बड़ी से बड़ी खुशी से भी बहुत ज्यादा खुश नहीं होते.

कहने का मतलब यह कि दोस्ती की प्रक्रिया हमारे अस्तित्व में रची बसी है. हम दोस्ती करना सीखते नहीं हैं बल्कि अपने जेनेटिक्स में मौजूद दोस्ती के प्रारूप को बस अपनी क्षमताओं के हिसाब से खोलते भर हैं या दूसरी शब्दों में उसे विकसित भर करते हैं. बीज रूप में दोस्ती की चाहत हमारे अंदर जन्म लेने के पहले गर्भ से ही मौजूद होती है. अगर हम अकेले में किसी बड़ी से बड़ी भावना से भी दोचार हों तो हमारे दिल की धड़कनें बहुत ज्यादा गति नहीं करतीं. खास करके अगर भावनाओं का रिश्ता खुशी और आनंद से हो. हम दोस्तों के साथ रहकर ही सही मायनों में खुश होते हैं. अगर दुनिया में कोई व्यक्ति दोस्तविहीन है, तो चाहे उसके पास कितना ही धन और ऐश्वर्य क्यों न हो, वह जीवन के मामले में बहुत कंगाल समझा जायेगा.

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प्राचीनकाल में हममें दोस्ती के जो जैविक गुण विकसित हुए और हमेशा हमेशा के लिए हमारे अस्तितव का हिस्सा बन गये, उसमें बड़ी भूमिका असुरक्षा की थी. इंसान करीब एक लाख साल तक भयानक जंगली जानवरों के साथ जीवन साझा किया है, ऐसे में हर समय जीवन को लेकर जोखिम बना रहता था. हर समय असुरक्षा की भावना मजबूत रहती थी. दोस्ती दरअसल इसी असुरक्षा की काट के लिए पैदा हुई. इसलिए हमारे मनो मस्तिष्क में दोस्ती के लाखों साल पुराने बीज है, उन्हें कोई कोरोना या कोई भी संकट कभी भी खत्म नहीं कर सकता.

Friendship Day Special: कब आती है दोस्ती में दरार

‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे…’ श्रुति और राधिका बचपन से साथ रही थीं. दोनों का परिवार भी एकदूसरे को काफी अच्छी तरह जानता था. दोनों ने अपनी पढ़ाई भी एकसाथ पूरी की और अब दोनों नौकरी भी एक ही कंपनी में करती थीं. इन की दोस्ती को देख कर लोग हैरान रह जाते थे.

मगर फिर दोनों में न जाने ऐसा क्या हुआ कि उन की दोस्ती भी टूट गई और साथ भी छूट गया.

दरअसल, 20 साल की दोस्ती में उन दोनों ने किसी तीसरे को कभी अपने बीच नहीं आने दिया था. वैसे श्रुति और राधिका की बहुत सी आदतें मेल खाती थी, लेकिन राधिका की एक आदत ऐसी थी जिसे श्रुति बचपन से झेलती आ रही थी. राधिका हमेशा लेट हो जाती थी. श्रुति हमेशा टाइम पर तैयार हो कर राधिका के घर पर पहुंच जाती थी और दोनों वहीं से औफिस जाती थीं. एक दिन श्रुति औफिस निकलने वाले टाइम पर उस के घर पहुंच गई. लेकिन राधिका फिर से लेट थी.

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‘‘राधिका, तू अपनी आदत कब सुधारेगी? हद होती है किसी चीज की. अब हम स्कूलकालेज में नहीं पढ़ते हैं,’’ राधिका ने चिढ़े स्वर में कहा.

‘‘अरे सौरी… तू इतना गुस्सा क्यों हो रही है? बस 5 मिनट ही तो लेट हुए हैं. पहुंच जाएंगे,’’ राधिका औफिस पहुंचने तक श्रुति को मनाने का प्रयास करती रही. लेकिन श्रुति बहुत ज्यादा नाराज हो गई थी.

औफिस पहुंच दोनों अपनेअपने काम में लग गईं. राधिका का ध्यान काम में बिलकुल नहीं था. वह बारबार अपनी दोस्त की तरफ देखे जा रही थी. उधर हंसतेहंसते काम करने वाली श्रुति बहुत सीरियस हो कर काम कर रही थी.

तभी औफिस में उन के साथ काम करने वाली प्रिया राधिका के पास आ कर खड़ी हो गई और फिर बोली, ‘‘हाय राधिका.’’

राधिका ने बड़ी मायूसी के साथ प्रिया को हाय बोला.

‘‘क्या हुआ? तुम्हारे और श्रुति के बीच कुछ हुआ है क्या? आज तुम दोनों बहुत अलगअलग और चुपचुप नजर आ रही हो?’’

‘‘अरे नहीं, ऐसा कुछ नहीं है. आज हम दोनों ने सोचा कि बहुत मन लगा कर काम करेंगे. टारगेट पूरा करना है न.’’

‘‘ओह, गुड.’’

आज पहली बार ऐसा हुआ था कि किसी ने उन दोनों की दोस्ती पर सवाल किया था.

राधिका को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर श्रुति को हुआ क्या है? राधिका रोज लेट होती थी, लेकिन श्रुति ने कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया था. फिर आज ऐसा क्या हुआ कि श्रुति इतनी ज्यादा नाराज हो गई?

राधिका ने झट अपनी मां को फोन किया, ‘‘हैलो मां… क्या आप ने श्रुति को कुछ कहा है?’’

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मां ने चौंकते हुए जवाब दिया, ‘‘श्रुति को? नहीं, मैं ने तो कुछ नहीं कहा. जब वह आई थी तब मैं फोन पर तेरी मौसी से बात कर रही थी. क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘नहीं, कुछ नहीं हुआ. चलो, मैं बाद में बात करती हूं,’’ कह राधिका ने फोन काट दिया और मन ही मन सोचने लगी कि आखिर हुआ क्या? इतना तो मुझे पता है कि श्रुति मेरे लेट होने पर इतनी नाराज नहीं हो सकती है.

औफिस में लंच ब्रेक के टाइम भी राधिका ने श्रुति से बहुत पूछा कि वह नाराज क्यों है.

श्रुति का बस यही जवाब था, ‘‘मैं नाराज नहीं हूं.’’

शाम को घर जाते वक्त श्रुति ने अचानक राधिका से एक सवाल किया, ‘‘क्या तू हमारे बीच किसी तीसरे को आने देगी?’’

राधिका ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘नहीं,

कभी नहीं.’’

फिर श्रुति ने एक और सवाल किया, ‘‘अच्छा तो तू शादी भी नहीं करेगी?’’

राधिका ने जोरजोर से हंसते हुए कहा, ‘‘अरे, यह कैसा सवाल है? शादी तो हम दोनों को करनी है.’’

श्रुति बस ‘‘हां’’ कह कर चुप हो गई.

दरअसल, जब श्रुति राधिका के घर गई थी तब राधिका की मां उस की मौसी से उस के रिश्ते की बात कर रही थीं. यह बात श्रुति ने सुन ली थी और यह सुन कर ही ऐसा व्यवहार करने लगी थी.

कितनी अजीब बात है न कि कहां तो श्रुति को राधिका को रिश्ते की बात पर छेड़ना चाहिए था, उस से मजाक करना चाहिए था और कहां श्रुति का व्यवहार ऐसा हो गया जैसे उस की कोई कीमती चीज उस से छिनने वाली है.

कुछ दिन बीत गए, श्रुति फिर से पहली वाली श्रुति जैसा व्यवहार करने लगी. एक दिन राधिका ने श्रुति को बताया कि उस के रिश्ते की बात हो रही है और कल उसे लड़के वाले देखने आ रहे हैं.

श्रुति यह सुन कर चौंक गई, ‘‘क्या? तू सच में शादी करना चाहती है?’’

राधिका बोली, ‘‘हां, लड़का भी अच्छा है. मैं उसे पहले मिल चुकी हूं. तुझे भी बहुत पसंद आएगा… और हां तुझे कल जरूर आना है.’’

श्रुति ने कोई जवाब नहीं दिया और वहां से चली गई.

अगले दिन श्रुति राधिका के घर तो आई, लेकिन बेमन से. उस दिन राधिका का रिश्ता तय हो गया. सब बहुत खुश थे, लेकिन श्रुति के चेहरे पर मातम छाया था. 6 महीने बाद राधिका की शादी की तारीख भी फिक्स कर दी गई थी.

इन 6 महीनों में श्रुति के व्यवहार में सच में बदलाव आने लगा था. राधिका जब भी श्रुति से पूछती कि ‘‘तू शादी में क्या पहनेगी तो श्रुति बहुत चिढ़ कर जवाब देती कि पहन लूंगी कुछ भी.’’

श्रुति ने राधिका की शादी की खरीदारी में भी ज्यादा मदद नहीं की. जब भी राधिका उसे शौपिंग पर चलने को कहती वह खुद को व्यस्त बताती. अब राधिका भी समझने लगी थी कि श्रुति और उस की दोस्ती में दरार आ रही है. राधिका ने शुरुआत में सबकुछ ठीक करने की कोशिश भी की, लेकिन अब उस ने भी कोशिश छोड़ दी. वह समझ गई थी कि शायद अब सच में कुछ ठीक नहीं होगा.

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लेखिका शासता नैल्सन दोस्ती में होने वाली ऐसी खटास पर कहती हैं, ‘‘मुश्किल वक्त में तो हम दोस्तों के साथ रहने की बहुत बात करते हैं. दरअसल, असलियत यह है कि हमारी जिंदगी के जो खुशी वाले मौके होते हैं उन्हीं पर दोस्तों से सब से ज्यादा तकरार होती है.

शादी का दिन नजदीक आने लगा. गानाबजाना भी शुरू हो गया. श्रुति के कानों में यह गानाबजाना किसी कील की तरह चुभ रहा था. वह अपनी सब से खास दोस्त को, जिस के साथ वह बचपन से रही उसे खुद से दूर जाता देख रही थी.

राधिका भी अब अपना ज्यादातर समय अपने मंगेतर को देती थी. शादी के कुछ दिन पहले राधिका ने श्रुति से कहा, ‘‘मैं चाहती हूं कि मैं जो ड्रैस शादी के फंक्शन में पहनने वाली हूं उस की ज्वैलरी और फुटवियर तेरी पसंद के हों. मेरे पास बिलकुल समय नहीं है. तू देख लेना ये सब और शादी के दिन भी तू मेरे साथ रहना. अगर मुझे किसी चीज की जरूरत हो तो मैं तुझे ही बोलूंगी.’’

श्रुति को ये सब नौकरानी के काम की तरह लगने लगा. वह उस दिन बहुत रोई और बाद में उस ने राधिका को साफ मना कर दिया.

यह सुन कर राधिका को बहुत बुरा लगा. उन के बीच की दूरियां और बढ़ने लगीं. श्रुति राधिका के मंगेतर से तो बहुत अच्छी तरह बात करती थी, लेकिन राधिका से उतना ही दूर रहने लगी थी. राधिका ये सब देख रही थी जिस से उस के अंदर जलन की भावना उत्पन्न हो गई.

मनोचिकित्सक जोसेलिन चार्नस का कहना है, ‘‘शादीविवाह के माहौल के दौरान अकसर ऐसा होता है कि 2 दोस्तों के बीच अगर कोई दरार है तो वह और बढ़ जाती है. शादीविवाह के मामलों में लोगों को एकदूसरे के प्रति नाराजगी जाहिर करना और भी आसान हो जाता है, इसलिए ऐसे मामले सामने आते हैं जहां लोग अपने अंदर दबी बातों को अपनी नाराजगी से जता पाते हैं.’’

शादी वाले दिन श्रुति बहुत अकेला महसूस कर रही थी. उसे बाद में एहसास हुआ कि उस ने इन कीमती लमहों को बेकार कर दिया. वह राधिका से माफी मांगना चाहती थी और बोलना चाहती थी कि वह उस के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण है. बिदाई के वक्त श्रुति और राधिका एकदूसरे के सामने आईं, लेकिन कुछ बोल नहीं पाईं. आंखों में आंसू लिए दोनों ने एकदूसरे को गले लगाया और राधिका अपनी नई जिंदगी की तरफ मुड़ गई.

मनोचिकित्सक सेथ मेयर्स का कहना है, ‘‘शादी का मतलब होता है बहुत बड़ा बदलाव और अकसर इंसान बदलाव के साथ खुद को आसानी से नहीं ढाल पाते. इसलिए दोस्त

आप को खोने के डर से अपने दिमाग से पहले

ही निकालने की कोशिश करने लगते हैं ताकि जब आप उन्हें ठुकराएं तो उन्हें ज्यादा बुरा

न लगे.’’

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‘फ्रेंडशिप डे’ पर अपने दोस्तों को दें ये ट्रेंडी गिफ्टस

दोस्ती हर किसी की लाइफ में एक अहम महत्व रखता है. माता-पिता के बिना जैसे लाइफ अधूरी होती है उसी तरह दोस्तों के साथ लाइफ के मजे लेना भी जरूरी है. इसीलिए साल में दोस्ती के लिए एक दिन मनाते हैं ‘फ्रेंडशिप डे’. इस दिन हर कोई अपनी लाइफ में मौजूद खास दोस्तों के लिए कुछ न कुछ करता है या गिफ्ट देता है, लेकिन दोस्त को गिफ्ट क्या दें ये भी जानना जरूरी हैं. लड़का हो या लड़की दोनों के लिए अलग-अलग गिफ्ट देना सही रहता है. आज हम आपको ट्रैंडी गिफ्ट्स के लिए कुछ टिप्स बताएंगे, जिसे आप ‘फ्रेंडशिप डे’ पर अपने खास दोस्तों को देकर उनकी अपनी लाइफ में अहमियत के बारे में बता सकते है.

1. लड़कियों के लिए ज्वैलरी है खास

आजकल ज्वैलरी के मामले में लड़कियों को ट्रेंडी या हल्की ज्वैलरी पहनना ज्यादा पसंद आता है. अगर आप भी अपनी किसी लड़की दोस्त को कुछ गिफ्ट करना चाहते हैं तो ऐसी ज्वैलरी आपके लिए बेस्ट औप्शन रहेगा. हल्की होने की वजह से ये डेली लाइफस्टाइल में आसानी से पहना जा सकता है.

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2. परफ्यूम है ट्रेंडी गिफ्ट

डेली लाइफस्टाइल में आजकल लोगों को परफ्यूम की जरूरत ज्यादा पड़ती है. पार्टी हो या औफिस परफ्यूम लगाए बिना कोई नही निकलता. परफ्यूम एक ट्रेंडी गिफ्ट है जो लड़का हो या लड़की हर किसा को पसंद आता है.

3. लड़कियों को दें पर्स

 

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अगर आप अपनी किसी लड़की को कुछ ऐसा गिफ्ट देना चाहते हैं जो वह डेली इस्तेमाल करें तो बैग्स बेस्ट औप्शन रहेगा. ये ऐसा गिफ्ट है जिसे आपकी दोस्त रोजाना इस्तेमाल के साथ-साथ आपकी दोस्ती को याद रखेगी.

4. हेल्थ वौच रखेगा आपके दोस्त का ख्याल

 

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अगर आप भी अपने दोस्त की हेल्थ की फिक्र करते हैं तो हेल्थ वौच एक बेस्ट औप्शन है. हेल्थ वौच ट्रेंडी गिफ्ट है, जिससे आप अपने दोस्त के साथ जिंदगीभर बिना किसी बीमारी के बिता सकते हैं.

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5. ईयर फोन है बेस्ट औप्शन

आजकल हर कोई सफर हो या घर पर गाने सुनना हर किसी को पसंद आता है. इसीलिए हर किसी लाइफ में ईयरफोन जरूरी होता है. अगर आप भी अपने दोस्त को कुछ ट्रेंडी देना चाहते हैं तो ये गिफ्ट आपके लिए बेस्ट औप्शन होगा.

Friendship Day Special: मेकिंग फ्रेंड्स इज एन आर्ट

वाकई दोस्ती करना एक कला है और यह भी तय है कि यह कला सब को नहीं आती. लेकिन इसकी जरूरत सभी को पड़ती है. दोस्ती करने का गुण जिसमें होता है उसे जिंदगी में बहुत सारी परेशानियों से स्वतः मुक्ति मिल जाती है. हालांकि कई बार इसके चलते कई समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है; लेकिन कुल मिलाकर दोस्ती करने का गुण जिंदगी के लिए एक फायदेमंद सौदा ही है.  अतः अगर आपको यह कला नहीं आती तो आइये हम बताते हैं ये कला कैसे सीख सकते हैं?
जब भी किसी नये व्यक्ति से मिलें और उससे दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहें तो कुछ सामान्य शिष्टता का पालन जरूर करें. मसलन किसी अपिरिचित को भूलकर भी ‘तुम’ या ‘तू’ जैसे शब्दों से संबोधित न करें. भले वह कितना ही अनौपचारिक लग रहा हो. क्योंकि जब तक हम किसी के बहुत करीब नहीं होते, तब तक हमारा दिल और दिमाग दोनो ही किसी से इस कदर बिंदास जुबान की उम्मीद नहीं करते. ऐसे में जब हम किसी को उसकी बिना उम्मीद के इतने अधिकार से संबोधित करते हैं तो यह बात उसे बुरी लगती है. इस तरह पहली मुलाकात में ही आपके प्रति किसी का इम्प्रेशन बहुत खराब हो जाता है. क्योंकि हम इस बात को मानें या न मानंे फस्र्ट इम्प्रेशन आपके बारे में किसी को भी राय बनाने की छूट देता है.
हमारी किसी से तब भी दोस्ती नहीं हो पाती, जब हम किसी से पहली बार मिल रहे हों और इस पहली बार में ही उस पर अपनी रहीसियत का रौब डाल दें. वैसे तो अपनी रहीसियत का रौब किसी पर कभी भी नहीं जमाना चाहिए. लेकिन अगर आप किसी पहली बार मिल रहे हों, जो आपको अब के पहले बिल्कुल न जानता हो, उस पर इस तरह की कोशिश कभी न करें वरना वह कभी आपका दोस्त तो क्या अच्छी राय रखने वाला परिचित भी नहीं बन सकेगा. किसी अपरिचित व्यक्ति के साथ बातचीत करते हुए जब हम बार बार उबासियां लेते हैं तो भले यह हमारी किसी समस्या की वजह से हो लेकिन यह बात सामने वाले व्यक्ति को अपने अपमान जैसा महसूस होती है. अगर वाकई आपको बहुत उबासियां आ रही हों, तो सामने वाले व्यक्ति से माफी मांगें और किसी और दिन बैठने व बातचीत की बात कहें, उस दिन और उस समय तो इस बातचीत को विराम देना ही शिष्टाचार है. क्योंकि अगर आप उबासियों के बावजूद बातचीत करते रहते हैं तो सामने वाला व्यक्ति समझ जाता है कि आप उसे टेकेन फाॅर ग्रांटेड ले रहे हैं.
किसी भी नये व्यक्ति के साथ बातचीत करते हुए न तो आप उसे लगातार सुनाते रहें और न ही लगातार सिर्फ उसे सुनते रहें. एक प्रभावशाली मुलाकात का तरीका यही है कि आपके सुनने और सुनाने पर बराबर की भागीदारी हो, बराबर नहीं तो 60 और 40 का अनुपात तो हो ही. अगर आप किसी नए नए परिचित हुए व्यक्ति को बोलने का मौका ही नहीं देंगे तो वह आप से किस तरह जुड़ पायेगा. लेकिन यदि आप चुप्पे बने रहे और वही एकालाप के स्वर में बोलता रहा तो यह भी बोरियत भरा बर्ताव होगा. एक बात का और ध्यान रखें नए-नए परिचित व्यक्ति की वैयक्तिक जिंदगी के बारे में जानने की उत्सुकता न दिखायें. साथ ही इस बात का ध्यान रखें कि किसी नए परिचित हुए व्यक्ति की तारीफ में कंजूसी न करें. लेकिन इस पर भी सजग रहें कि किसी को इतना भी महिमामंडित न करें कि आपकी तारीफ चापलूसी लगने लगे.
अगर हम वाकई किसी के साथ दोस्ती के इच्छुक हैं तो हमेशा पहल की अपेक्षा ही न करें. दोस्ती करना चाहते हैं तो पहल भी करना सीखें. दोस्ती की गाइडलाइन में एक बड़ी सलाह ये भी है कि पहली बार परिचित हुए किसी व्यक्ति पर अपने ज्ञान का रौब कभी न गांठें. साथ इस पुरानी सीख पर भी हमेशा अमल करें कि किसी पुरुष की तनख्वाह और किसी औरत की उम्र नहीं पूछनी चाहिए. अगर मामला पहली मुलाकात का हो, तब तो ऐसी हरकत बिल्कुल ही नहीं करनी चाहिए. अगर आपमें यह आदत होगी तो आपकी कभी किसी से दोस्ती की गुंजाइश नहीं बनेगी. अगर किसी पार्टी में किसी से पहली बार मिल रहे हों, तो मेजबान के द्वारा परिचय कराये जाने पर हमेशा संतुलित और व्यवहारिक बात करें. बातचीत का संदर्भ वही रखंे जिसमें इस नए व्यक्ति की भी रूचि हो. उसके कपड़ों की क्वालिटी और उनकी कीमत के बारे में कतई न पूछें. इसी क्रम में इस बात को भी जान लें कि अगर आपकी किसी औरत से पहली मुलाकात हो रही है तो कृपा करके कभी भी पहली मुलाकात में किसी महिला से उसका मोबाइल नंबर न मांगें और अगर यह मुलाकात किसी पुरुष से है तो पहली ही मुलाकात में उसके साथ किसी बिजनेस का प्लान न बनाएं वरना वह घर जाकर आपको शेखचिल्ली की पदवी से नवाजेगा, दोस्ती तो भला आपसे क्या करेगा.

Friendship Day Special: दोस्ती कल भी थी, आज भी है, कल भी रहेगी

मार्क ट्वेन ने अपनी एक कविता ‘युद्ध भूमि में प्रार्थना’ में लिखते हैं भगवान से पहले युद्ध के समय दोस्त काम आते हैं और भगत सिंह समाजवादी दर्शन की विवेचना करते हुए कहते हैं, ‘किसी भी इज्म से, दर्शन से, बड़ा फलसफा है दोस्ती का.’ शायद यही वजह है कि चाहे दुनिया पहिए से राॅकेट युग में पहुंच गई हो; लेकिन दोस्ती की संवेदना में, दोस्ती की भावना में जरा भी फर्क नहीं आया.

समाज विज्ञान का इतिहास लिखने वाले समाजशास्त्री कहते हैं, ‘दुनिया का सबसे पहला रिश्ता दोस्ती का था.’ आदमी जब अपने आपको जानवरों से अलग किया तो उसे जिस नजदीकी रिश्ते के बोध ने जानवरों से अलग किया और बाद में आज तक के सफर का हमसफर बनाया वह बोध, दोस्ती का ही था. यह अलग बात है कि वह दोस्ती सहयोग और फायदे का सौदा थी. जब इंसान ने अपने को जानवरों से अलग किया तो उसके दिमाग में यह विचार आया कि आखिर वह कौन सा तरीका हो सकता है जिससे जानवरों से बचा जा सकता है और तब इस बात पर आकर दिमाग रुका कि अगर आदमी आपस में एकजुट होकर रहें तो जानवरों का सामना आसानी से किया जा सकता है. दोस्ती की यही बुनियाद थी जो बाद में विकसित होते-होते तमाम भावनात्मक एवं संवेदनात्मक सीढ़ियों को चढ़ते हुए आज यहां तक पहुंची है कि कुछ लोगों के लिए दोस्ती से बड़ा दुनिया में कोई रिश्ता नहीं है.

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महान विचारक मार्क्स के बारे में एंगेल्स ने लिखा है कि उन्हें दो ही लोग विचलित कर सकते थे या तो उनकी पत्नी जेनी जो पत्नी से ज्यादा दोस्त थीं और खुद एंगेल्स जिनकी दोस्ती मार्क्स के साथ वैसी ही थी जैसे महाभारत में कर्ण और दुर्याेधन की दोस्ती. मजे की बात यह है कि दुनिया में जितना साहित्य रचा गया है, उसमें सबसे ज्यादा साहित्य दोस्ती पर ही है. चाहे दोस्त की महानता पर हो, दोस्त के त्याग पर हो या फिर दोस्ती के विश्वासघात पर. दुनिया के तमाम महानग्रंथ दोस्तों के त्याग और दोस्ती में हुए छल कपट के ही ब्यौरे हैं. होमर का ओडेसी, कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास का महाभारत सबके सब दोस्ती की जय व विजय गाथाओं के ब्यौरे हैं.

समय बदलता है, सोच बदल जाती है और जरूरतें भी; लेकिन सामाजिक इतिहास इस बात की तस्दीक करता है कि समय बदलने के साथ न तो दोस्ती की जरूरत बदलती है और न ही दोस्ती का भाव. सवाल है दोस्ती इतना अजर-अमर रिश्ता क्यों हैं? इसके कई जवाब हैं. कुछ विज्ञान से, कुछ भावनाओं से. आइंस्टीन ने एक बार कहा था ‘अगर ईश्वर है (…और मैं समझता हूं भले ईश्वर वैसे ही न हो जैसे कि माना जा रहा है; लेकिन कुछ न कुछ तो है) तो इंसान के जैविक संरचना में दोस्ती का एक स्थाई भाव भी है. दरअसल यह दोस्ती का भाव ही है जिसने हमसे ईश्वर की रचना करवाई है.’

दोस्ती के बारे में भारत के सबसे क्रांतिकारी विचारक भगत सिंह कहते हैं, ‘यह कुछ न कुछ तो है जो दिलों में तूफान पैदा करती है. दोस्ती में पहाड़ों से कूद जाने का दिल करता है और हंसते-हंसते जान देने में जरा भी असहजता नहीं महसूस होती. इसलिए यह कुछ न कुछ तो है.’ कुछ समाजशास्त्रियों का 80 के दशक में विचार था जिसमें आल्विन टोएफलर (फ्यूचर शाक) प्रमुख थे जो मानते थे कि जैसे-जैसे तकनीक का विकास होगा दोस्ती का खात्मा हो जाएगा. दोस्ती की जरूरतें खत्म हो जाएंगी. मगर ऐसा नहीं हुआ और न ही कभी होगा. दोस्ती आज भी है, कल भी रहेगी और सदियों-सदियों यह नगमा गूंजेगा …सलामत रहे दोस्ताना हमारा.

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Friendship Day Special: ईमानदारी की गहरी नींव पर ही टिकती है दोस्ती की बुलंद इमारत

संदीप जितने समय तक कालेज कम्पाउंड में रहता है, महेश उसके आगे-पीछे घूमता रहता है. लेकिन जैसे ही वह कालेज से बाहर जाता है महेश के मुंह से उसके लिए गालियां ही गालियां निकलती हैं. लगभग यही हाल ऐक्टिंग स्कूल की उन तीन लड़कियों की है. शीला, मीता और रोजी. तीनों की तीनों क्लास के एक लड़के राकेश ग्रोवर के इर्द गिर्द मंडराती रहती हैं. राकेश जिसको भी इशारा कर दे, वह उसकी मर्सिडीज की आगे वाली सीट में बैठने को तैयार रहती है. लेकिन इन तीनों से कोई ईमानदारी से पूछे तो इन तीनों में से राकेश को प्यार कोई नहीं करता. चाहे महेश हो या शीला, मीता और रोजी. ये सभी संदीप या राकेश के आगे-पीछे इसलिए घूमती हैं क्योंकि राकेश और संदीप बड़े घरों के बेटे हैं. इनके आगे-पीछे घूमने का मतलब खाना-पीना और मस्त रहना है. एक तरह से घूमने के ये संबंध इसी मस्ती के एवज के संबंध हैं.
लेकिन याद रखिए ये एवजी संबंध न तो लंबे समय तक चलते हैं और न ही इनमें कोई आत्मीयता होती है. दरअसल जीवन के तमाम रंग होते हैं. सुबह सोकर उठने से लेकर रात में बिस्तर पहुंचने तक न जाने कितने मोड़ आते हैं. न जाने कितने रंगों से गुजरना पड़ता है. कई बार जिंदगी चलाने के लिए कई किस्म के गणितीय संबंधों को भी निभाना पड़ता है जैसे स्वागत बाला की नौकरी के लिए होठों पर मुस्कुराहट को चिपकानी पड़ती है. ठीक उसी तरह घर और दफ्तर में कई औपचारिक रिश्तों की चादर ओढ़नी पड़ती है. ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं है. समस्या तब आती है जब हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी गणितीय संबंधों से संवेदनशीलता या स्थायित्व की उम्मीद करने लगते हैं.
याद रखें संबंध हमेशा आपके अपने स्वभाव के मुताबिक ही बनते हैं. इसलिए यदि आप इस मुगालते में हैं कि फलां से आपका स्वभाव मेल नहीं खाता इसके बावजूद भी वह आपका घनिष्ठ दोस्त हो सकता है या कि आपके मौके पर वह काम आ सकता है तो ऐसी अपेक्षा महज गलतफहमी भर ही होगी. आप किसी से महज फायदे के लिए कोई झूठी दोस्ती रचकर उसे संवेदनशील संबंधों का लबादा नहीं पहना सकते. दफ्तरों और कालेजों में इस तरह के गणितीय संबंध सबसे ज्यादा बनते हैं. दरअसल दफ्तरों में लोग झूठ की एक भरी-पूरी जिंदगी जिया करते हैं. आमतौर पर दफ्तरों में पुरूष कर्मचारी खासकर अपनी महिला सहकर्मियों के साथ जिस तरह से पेश आते हैं, वह उनका मूल स्वभाव नहीं होता. घरों में उनका असली रूप और स्वभाव कुछ अलग ही होता है. दफ्तरों में ज्यादा पुरूष अपनी महिला सहकर्मियों के साथ इस तरह से पेश आते हैं जैसे उनके जैसे संवेदनशील और स्त्रियों का सम्मान करने वाला आदमी दुनिया में कोई दूसरा है ही नहीं. वही पुरूष घरों में अपनी पत्नियों से इस तरह पेश आते हैं जैसे संवेदना से उनका दूर-दूर तक का कोई नाता ही न हो.
महिलाएं भी ठीक इसी तरह का व्यवहार करती हैं. दफ्तरों में वह जितनी मधुर मिश्री होती हैं, घरों में उतनी ही कर्कशा. दरअसल दफ्तरों में औरतें और पुरूष तथा कालेजों में लड़के-लड़कियां एक-दूसरे के सामने जो छवि प्रस्तुत किया करते हैं, वह नकली छवि होती है. वह तात्कालिक रिश्तों का महज गणितीय आयाम भर होता है. ऐसे रिश्ते थोड़ी ही देर या कि घरों से बाहर तक ही चल सकते हैं. क्योंकि ऐसे रिश्तों में असलियत कुछ नहीं होती. ऐसे रिश्ते महज अपने इंटरनेट के लिए होते हैं. इसलिए ऐसे रिश्तों के आधार पर कोई दीर्घकालिक फैसला नहीं लेना चाहिए.
कुछ साल पहले मुंबई की एक एजेंसी ने सर्वे कराया कि जो टाप एक्जीक्यूटिव हैं, वे अपनी महिला पर्सनल सेक्रेटरी को अपनी पत्नी के बारे में क्या बताते हैं और किस तरह बताते हैं. सर्वेक्षण में पाया गया कि 70 प्रतिशत से ज्यादा एक्जीक्यूटिव अपनी सेक्रेटरी से यही प्रदर्शित करते हैं कि उनके अपनी पत्नियों से बहुत खराब रिश्ते हैं. वे उनसे असंतुष्ट हैं. कई तो अपनी सेक्रेटरी की नजर में बेचारे बनने के लिए यह पुराना हथकंडा अपनाने से भी बाज नहीं आते कि उनकी पत्नी अक्सर बीमार रहती है. जबकि ऐसा कुछ भी नहीं होता. जो लोग अपने दफ्तरों में यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि वे अपनी पत्नी से असंतुष्ट हैं, अकसर होता उल्टा है. ऐसे लोग अपनी पत्नियों से संतुष्ट होते हैं. इनकी पत्नियां दबंग नहीं होतीं और न ही बेचारी वह अक्सर बीमार रहती हैं. दरअसल उनको इस तरह पेश करने के पीछे अपने निजी स्वार्थ होते हैं. स्वार्थ भी कोई बहुत स्थायी और व्यापक नहीं होते. कई लोग तो महज इसलिए ये सब बातें करते हैं कि उन्हें औरतों की हमदर्दी मिल जाए.
मगर सिर्फ पुरूष ही ऐसा नहीं करते औरतें भी ऐसा करती हैं. तमाम औरतें अपने दफ्तरों में कुछ खास पुरूषों की सहानुभूति हासिल करने के लिए अपने आपको यूं प्रदर्शित करती हैं जैसे उन्हें किसी जाहिल, अत्याचारी के साथ बांध दिया गया है जिसमें न तो कोई संवेदना है और न ही सुरूर या सलीका. ये सब झूठी और बनावटी बातें होती हैं. इनके जरिए महज कुछ व्यक्तिगत किस्म के फायदे लिए जा सकते हैं. बस इसके अलावा इनकी कुछ और उपयोगिता नहीं होती. इसलिए ऐसे गणितीय संबंधों से बचें.

Friendship Day Special: दोस्ती के इस ग्लोबल युग में भी खरी है बचपन की दोस्ती

आज जब कोरोना संक्रमण ने दुनियाभर को वनवास में भेज दिया है और इंट्रैक्शन के लिए सोशल मीडिया, मोबाइल, ई-मेल, स्काईप, काॅन्फ्रेंस चैटिंग जैसे अनेक साधनों के चलते एक किस्म से पूरी दुनिया से हम जुड़ गये हैं, तब भी अगर हम अपने बचपन के दोस्तों से वंचित हैं तो यह सब खाली खाली लगता है. कानपुर के अंकित भारद्वाज का जब मुंबई आईआईटी में एडमिशन हुआ तो जहां पूरा घर खुश था, रिश्तेदारों के फोन पर फोन आ रहे थे. हर तरफ से बधाइयों की बौछार हो रही थी, वहीं खुद अंकित एक अजीब सी असहजता से घिरा हुआ था. हालांकि ऊपरी तौरपर वह भी हंस-मुस्कुरा रहा था. बधाई देने वालों को थैंक यू कह रहा था. लेकिन अंदर ही अंदर वह कुछ उदास था. इस उदासी का कारण थे राजीव और लता. दरअसल वे तीनो बचपन से बारहवीं तक एक साथ पढ़े थे. एक ही मोहल्ले में एक दूसरे के इर्द-गिर्द रहने वाले तीनों हमेशा मिलकर होम वर्क करते थे. मिलकर परीक्षाओं में पढ़ाई करते थे. तीनों साथ ही खेलते भी थे. लेकिन अब पहली बार तीनों बचपन के दोस्त एक दूसरे से बिछुड़ रहे थे. राजीव का होटल मैनेजमेंट में एडमिशन हो गया था, वह बंग्लुरू की तैयारी कर रहा था, जबकि लता दिल्ली में साइकोलोजी आनर्स में एडमिशन लेने जा रही थी.

तीनों इस बिछुड़न से परेशान थे. यह बात उनके घर वाले भी जानते थे. इसलिए वे समझा भी रहे थे कि परेशान होने का कोई मतलब नहीं है, तुम सबके जल्द ही नए दोस्त बन जायेंगे. हुआ भी कुछ ऐसा ही. कम से कम अंकित के मामले में तो सौ फीसदी ऐसा ही हुआ. उसकी सॉफ्ट नेचर और पढ़ाई में होनहार होने का नतीजा यह था कि दो महीने के भीतर ही करीब-करीब क्लास का हर लड़का और लड़की उसे अपनी तरफ से बुलाने लगा था. लेकिन अंकित मुंबई से, राजीव बंग्लुरू से और लता दिल्ली से हर समय आपस में कुछ यूं जुड़े रहते, जैसे किसी डिपार्टमेंट के तीन अधिकारी अलग-अलग जगह तैनात रहकर किसी साझे मिशन में जुटे हों. तीनों को हर पल एक दूसरे की खबर रहती है. लता का सेमेस्टर कब पूरा हो रहा है, यह जितना लता को पता होता उतना ही राजीव को और अंकित आजकल क्या पढ़ रहा है, किसके साथ उसने इस हफ्ते मूवी देखी. यह सब लता और राजीव को मिनट दर मिनट के हिसाब से पता होता है. तीनों के घर वालों में से किसी को किसी के बारे में जानना होता है तो वे किसी को भी फोन कर लेते हैं. राजीव की छुट्टियां कब पड़ रही हैं, अंकित होली में कानपुर आयेगा या नहीं, यह जितना अंकित को पता होता है उतना ही राजीव और लता को भी.

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सवाल है बचपन के दोस्त इतने खास क्यों होते हैं कि हम जिंदगी में बहुत आगे निकल जाने के बाद भी उन्हें कभी नहीं भूल पाते ? इस इंटरनेट और मोबाइल के युग में जब हमारे कोई एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों और हजारों की संख्या में वर्चुअल दोस्त होते हैं, यह एक अजूबा ही है. जब इंटरनेट शुरू-शुरू में दोस्ती के एक नए युग का सूत्रपात सोशल मीडिया के जरिये कर रहा था तो तमाम समाज वैज्ञानिकों को आशंका हो रही थी कि शायद अब दोस्तियां स्थाई न रहें. क्योंकि यह पहला ऐसा युग है जब तकनीक ने हमें इंटरैक्शन की अपार सुविधा दी है. आज हम घर बैठे दुनिया के किसी भी कोने में किसी से भी दोस्ती बना सकते हैं. पहले एक शहर के दूसरे मुहल्ले के लोग भी आपस में अपरिचित होते थे और शायद सदेह आज भी हों. लेकिन इंटरनेट ने हमें आज ग्लोबल कनेक्टीविटी और वर्चुअल फ्रेंडशिप के जरिये दुनिया के चप्पे-चप्पे तक पंहुचा दिया है.

आज जब कोरोना संक्रमण ने दुनियाभर को वनवास में भेज दिया है और इंट्रैक्शन के लिए सोशल मीडिया, मोबाइल, ई-मेल, स्काईप, काॅन्फ्रेंस चैटिंग जैसे अनेक साधनों के चलते एक किस्म से पूरी दुनिया से हम जुड़ गये हैं, तब भी अगर हम अपने बचपन के दोस्तों से वंचित हैं तो यह सब खाली खाली लगता है. भले दोस्ती के लिए सारा विश्व एक गांव में तब्दील हो चुका है, तब भी बचपन की दोस्तियां न केवल जिंदा हैं बल्कि पहले से ज्यादा मजबूत और घनिष्ठ हो रही हैं. न्यूजीलैंड में काम कर रहे मथुरा के तमाम इंजीनियरों ने अपने बचपन के तमाम दोस्तों का ग्रुप बनाया हुआ है और उसी के जरिये वे आपस में आज इस तरह से जुड़े हैं, जितनी मजबूती से तो शायद बचपन में भी न जुड़े रहे हों. इंटरनेट ने बचपन की दोस्ती को उम्र भर का अभयदान दे दिया है. वास्तव में दोस्ती संबंधों की भव्य इमारत की बुनियाद है. यह इंसान के एक दूसरे के नजदीक आने की पहली मुकम्मिल भावना है. इसलिए दोस्ती किसी भी रिश्ते से ज्यादा अहम होती है. जिस भी रिश्ते में दोस्ती की बुनियाद होती है, वह हमेशा सबसे मजबूत रिश्ता होता है. दोस्ती सभी रिश्तों का मूल है. यह रिश्तों की बुनियाद ही नहीं इंसान की सकारात्मकता, उसके अंदर मौजूद मानवीयता की भी पहली शर्त है. इंसान की यह पहली भावना है जिसने बाद में रिश्ते गढ़े, परिवार रचा और फिर समाज भी. इसलिए दोस्ती इंसान होने का पहला जरूरी फर्ज है.

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बचपन की दोस्ती आज भी इतनी खरी इसलिए है क्योंकि बचपन की दोस्ती बहुत ही मासूम और ईमानदार होती है न हमें कुछ छिपाने की जरुरत पड़ती है और न ही कुछ बनाने की. बाद की तमाम दोस्तियों में एक किस्म की औपचारिकता होती है लेकिन बचपन की दोस्ती औपचारिकताओं से मुक्त होती है. बचपन की दोस्ती में इतना कुछ साझा होता है कि बाद में हम चाहे जितनी बड़ी उपलब्धियां हासिल कर लें सब बौनी लगती हैं. बचपन के दोस्तों को हम मनचाहे शब्दों में संबोधित कर लेते हैं. इसीलिए दोस्ती के इस ग्लोबल युग में भी बचपन की दोस्ती सबसे खरी है.

Friendship Day Selfie: एक कविता दोस्त के नाम

डौक्टर प्रीती प्रवीण खरे (भोपाल)

दुख की रात विफल करता, सुख की भोर धवल करता

मुश्किल सारी हल करता

धूप हमारी वो हर लेता, छांव हमेशा हमको देता

धोखा हमसे कभी न करता, सच्चाई के रस्ते चलता

दिल में वो उल्लास जगाये, ख़ुशियों वाले दीप जलाये

मुस्कानों से प्यार लुटाये, साथ सदा त्यौहार मनाये

महकाये संसार हमारा,  दूर करे अंधियार हमारा

विश्वासों का सार हमारा, मित्र ही है घर बार हमारा

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Friendship Day Selfie: इस दोस्ती को किसी की नजर न लगे

Friendship Day Selfie: हर रिश्ते से बढ़कर है दोस्ती

पूनम पाठक           

दोस्ती जैसे रिश्ते को शब्दों में बांध पाना मुश्किल है. सच्चा दोस्त वही होता है जो खुशियों से अधिक परेशानी के वक्त आपके साथ खड़ा हो. एक ऐसा दोस्त जो आपके ‘ठीक हूं’ कहने के बाद भी आपकी आंखों को नमी को महसूस कर ले. यूं तो मेरे दोस्तों की संख्या बहुत कम है. लेकिन जो हैं वे सभी दिल के बहुत करीब हैं. ऐसी ही एक दोस्त है राखी.

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राखी से अकस्मात हुई अपनी दोस्ती को मैं कभी नही भूल पाती. उसके घर के सामने वाली सड़क पर अपनी बेटी की स्कूल बस का इंतजार किया करती थी मैं और ऐसे ही एक दिन उससे बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ जो कभी न खत्म होने वाले किसी मूल्यवान खजाने में तब्दील हो गया. हम एक दूसरे के साथ खुल कर अपनी भावनाओं और विचारों की साझेदारी करते हैं. जहां एक दूसरे के गुणों की प्रशंसा करते हैं वहीं एक दूसरे की गलतियों की खुलकर आलोचना भी करते हैं. वक्त पड़ने पर एक दूसरे को सही सलाह देते है भले ही वह उस वक्त उसे थोड़ी कड़वी ही क्यों न लगे.

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जिंदगी के कई मुश्किल दौर में राखी ने नाते रिश्तेदारों से पहले मेरी ओर मदद का हाथ बढ़ाया है. हमारी दोस्ती सभी मानको से परे है. वो मेरी सफलता में शामिल होकर मेरी खुशियों को दुगुना कर देती है, जबकि दुखो को बांटकर उन्हें आधा कर देती है. इस तरह उसके साथ बिताया हर पल मेरे लिये खूबसूरत याद बन जाता है. भले ही कभी हम महीनों न मिले हों लेकिन दिल में उसकी याद हर लम्हा बरकरार रहती है. उसकी दोस्ती ने मुझे कई मानो में तराशा है. एक तरफ़ मानसिक तौर पर मुझे मजबूत बनाया है तो दूसरी ओर जिंदादिली से जीना सिखाया है. उसकी सबसे बड़ी खूबी है कि वह अपने सभी रिश्तों के प्रति ईमानदार है. फ्रेंडशिप डे पर मैं उसे खूब सारी बधाई और ढेर सा प्यार कहना चाहूंगी. सच उसकी दोस्ती मेरे लिए प्रकृति का अनमोल उपहार है जिसे मैं ताउम्र संभाल कर रखना चाहूंगी.

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एडिट- निशा 

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