जिस्म के भीतर रोग प्रतिरोधक क्षमता एक रक्षात्मक लड़ाकू सेना की तरह होती है. जब कोई दुश्मन बैक्टीरिया या वायरस जिस्म में घुसता है तो कोशिकाओं (सैल्स) की यह क्षमता यानी लड़ाकू सेना उससे लड़ती है और उसे कमजोर करके खत्म कर देती है.

दुश्मन बैक्टीरिया या वायरस या बीमारी से लड़ने वाली यह सेना कभीकभी जरूरत से ज्यादा सक्रिय होकर असंतुलित, या कह लें कंफ्यूज्ड, हो जाती है. और तब दुश्मन को खत्म करने की कोशिश में लगी होने के साथसाथ जिस्म को भी नुकसान पहुंचाने लगती है. यानी, कोशिकाओं की इस सेना को जिन कोशिकाओं की रक्षा करनी होती है, यह उन पर भी हमला बोल देती है. ऐसी अवस्था को 'साइटोकाइन स्टौर्म' कहते हैं और ऐसे मामलों को 'साइटोकाइन स्टौर्म सिंड्रोम' कहते हैं.

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