-ज्योति शाहराजा  (ड्राइंग टीचर, एसकेवी, आदर्श नगर )

Colors and Child Development : दुनिया  का हर बच्चा अपनेआप में बहुत अनोखा और प्यारा होता है. लेकिन जब हम विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (सीडब्ल्यूएसएन) खासतौर पर औटिज्म से जूझ रहे बच्चों को देखते हैं तो पाते हैं कि उन की दुनिया बाकी बच्चों से थोड़ी अलग होती है. इन बच्चों के लिए अपनी बात बोल कर समझना, दूसरों के साथ खुल कर बातचीत करना या अपनी खुशीउदासी को शब्दों में बयां करना काफी कठिन होता है. कई बार जब वे अपनी बात नहीं कह पाते तो भीतर ही भीतर अकेलापन और बेचैनी महसूस करने लगते हैं.

ऐसे समय में कला और शिल्प उन के लिए अपनी बात कहने का सब से आसान और सुंदर जरीया बन जाता है. जहां शब्द काम नहीं आते, वहां कागज पर बिखरे रंग, हाथों से बनी लकीरें और मिट्टी से तराशी गई आकृतियां इन बच्चों के दिल की बात को सब के सामने ले आती हैं. कला उन के मन के भावों को बाहर निकालने और उन्हें दुनिया से जोड़ने का एक मजबूत पुल बन जाती है.

एक कला शिक्षिका के रूप में मैं ने देखा है कि जब बच्चे के हाथ में ब्रश या रंगीन चौक आती है तो उस का डर गायब हो जाता है. उसे यह चिंता नहीं होती कि कोई उस की भाषा पर हंसेगा या उसे टोकेगा. रंग किसी भाषा या व्याकरण के मुहताज नहीं होता. यही वजह है कि कला इन बच्चों को सब से ज्यादा सुकून देती है और इन के आत्मविश्वास को एक नई उड़ान देती है.

आर्ट थेरैपी: मन को शांत करने और तनाव घटाने का आसान तरीका आर्ट थेरैपी का मतलब है कला के माध्यम से मन का इलाज करना. औटिज्म से प्रभावित बच्चे अकसर तेज आवाज, बहुत ज्यादा भीड़ या अचानक होने वाले बदलावों से घबरा जाते हैं. इस से उन के अंदर गुस्सा, चिड़चिड़ापन या बेचैनी बढ़ जाती है. ऐसे समय में जब उन्हें चित्रकारी करने दी जाती है तो उन का मन बहुत जल्दी शांत हो जाता है.

गुस्सा और तनाव कम होना: जब बच्चे खाली सफेद कागज पर अपनी मरजी से रंग भरते हैं तो उन का अंदरूनी तनाव और गुस्सा धीरेधीरे पिघलने लगता है. वे ब्रश को कागज पर चला कर अपनी सारी बेचैनी को बाहर निकाल देते हैं.

इंद्रियों को आराम मिलना: रंगों को हाथों से छूना, उन की ठंडक महसूस करना और अलगअलग तरह के कागजों पर हाथ फेरना इन बच्चों के दिमाग को बहुत आराम पहुंचाता है. इस से उन का चंचल मन स्थिर होता है.

ध्यान केंद्रित करने की आदत: जब बच्चे किसी गोल घेरे या तितली के चित्र में रंग भरते हैं तो उन का पूरा ध्यान उसी एक काम पर लग जाता है. इधरउधर भटकने वाला मन एक जगह टिकने लगता है, जिस से उन का ध्यान लगाने का समय बढ़ता है.

सब से अच्छी बात यह है कि ड्राइंग करते समय बच्चों पर कोई दबाव नहीं होता. कोई परीक्षा नहीं होती कि उन्हें इतने में से इतने नंबर लाने हैं. वे पूरी आजादी से जो मन में आए, वह बनाते हैं. इस खुली छूट की वजह से वे बिना किसी डर के अपनी सच्ची भावनाएं दिखा पाते हैं.

शिल्पकारी (क्राफ्ट): हाथों और उंगलियों को मजबूत बनाना क्राफ्ट केवल सजावट की चीजें बनाना नहीं है बल्कि यह बच्चों की उंगलियों और हाथों की कसरत कराने का सब से मजेदार तरीका है. औटिस्टिक और विशेष बच्चों को अकसर उंगलियों से बारीक काम करने में बहुत परेशानी होती है. उन्हें पैंसिल पकड़ने, शर्ट के बटन लगाने, जूते के फीते बांधने या कैंची चलाने में कठिनाई आती है. क्राफ्ट की छोटीछोटी गतिविधियां उन की इन कमजोरियों को आसानी से दूर करती हैं:

मिट्टी (क्ले) का खेल: चिकनी मिट्टी को हाथों से गूंधना, दबाना, गोलगोल लड्डू बनाना और खिलौने गढ़ना उंगलियों की नसों को मजबूत करता है. जब बच्चा मिट्टी पर हलका या जोर से दबाव डालता है तो उस के हाथों की पकड़ मजबूत होती है.

कागज मोड़ना और काटना: कागज को मोड़ कर नाव या पंखा बनाना और गोल नोक वाली सेफ कैंची से कागज की पट्टियां काटना बच्चों की आंखों और हाथों के तालमेल को सुधारता है. इस से उन का हाथ सधने लगता है.

धागे में मोती पिरोना: धागे के अंदर बड़े मोती, बटन या मैकरोनी डालना बच्चों के सब्र की परीक्षा लेता है. जब बच्चा ध्यान लगा कर धागे को छेद के पार निकालता है तो उस की नजरें और उंगलियां एकसाथ काम करना सीख जाती हैं. इस तरह खेलखेल में किए गए क्राफ्ट के काम से बच्चों के हाथ इतने मजबूत हो जाते हैं कि वे आगे चल कर पैंसिल पकड़ना, लिखना और अपने रोजमर्रा के काम खुद करना सीखने लगते हैं.

आगे चल कर यह हुनर इन बच्चों के जीवनयापन का साधन भी बन सकता है. हाथ से बने सुंदर लिफाफे, मिट्टी के दीए, सजावटी प्लेटें, ईको फ्रैंडली बैग और रीसाइकिल्ड गिफ्ट आइटम्स बना कर ये बच्चे बड़े हो कर खुद अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं. इस तरह वे किसी पर बो?ा बनने के बजाय गर्व से अपनी आजीविका कमा सकते हैं.

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