आज के दौर में ज़रूरतें इतनी हैं कि कई बार क़र्ज़ लेना -चाहे वो मकान बनाने के लिए लिया जाए या बच्चों की एजुकेशन ,और शादी के लिए लिया जाए ,मजबूरी बन जाता है. दूसरी ओर बैंक और वित्तीय संस्थाए भी क़र्ज़ आसानी से देने लगीं हैं तो लोग ज़रूरत पड़ने पर इनसे लोन लेना ,दूसरे विकल्पों के तुलना में आसान मानते हैं और ईज़ी ई एम आई, डिसकाउंट और सेल्ज़ के चक्कर में फँसते चले जाते हैं. जबकि ज़रूरी ख़र्च उनके फ़ाईनेंस पर दबाव डालते हैं.

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