बिट्टू और उसका दोस्त- भाग 3: क्या यश को अपना पाई मानसी

‘‘आप सब अदालत को बताना, हमें भी आप के कारनामे बताने हैं. जो बाप रातें क्लबों में बिताता हो, कई बार जेल भी जा चुका हो, जिस की अंगरेज पत्नी अपने किसी और दोस्त के साथ रह रही हो, उसे कोई मां अपना बच्चा कैसे दे सकती है?’’ यश ने कहा तो सुधांशु दांत पीसता रह गया.

‘‘मैं देख लूंगा तुम्हें,’’ सुधांशु जातेजाते वह धमकी दे गया.

अदालत ने बिट्टू का निर्णय मानसी के हक में दे दिया और मानसी को

बड़ी हैरानी इस बात पर हुई कि सुधांशु ने अदालत में उस पर किसी तरह का घटिया आरोप नहीं लगाया. वैसे कोर्ट ने उसे बिट्टू से मिलने का हक दे दिया.

शुरूशुरू में वह 1-2 बार बिट्टू से मिलने आया, फिर पता चला वह वापस अमेरिका चला गया है. मानसी ने चैन की सांस ली. वहां से वह कभीकभी बिट्टू से फोन पर बात करता रहता. सब नौर्मल चल रहा था.

6 महीने बाद सुधांशु के फिर आने की खबर ने मानसी को डिस्टर्ब कर दिया. बिट्टू की छुट्टियां थीं. सुधांशु आया तो बड़ी शराफत से उस ने 5 दिन के लिए बिट्टू को घुमाने की अनुमति मांगी. मानसी मना नहीं कर पाई. मानसी ने महसूस किया बिट्टू भी घूमने जाना चाहता है सुधांशु के साथ. सुधांशु बिट्टू को ले गया.

बिट्टू के जाने के बाद घर में सन्नाटा सा

छा गया. सब से ज्यादा बोर यश हो रहा था.

अभी उस की भी छुट्टियां थीं और नया काम शुरू होने में समय था. सारा दिन आशाजी और मानसी से बिट्टू की बातें करता रहता. बिट्टू सचमुच यश के जमीन का एक महत्त्वपूर्ण भाग बन चुका था.

फिर एक दिन यश ने अपने पापा और मानसी के मम्मीपापा के सामने मानसी की उंगली में डायमंड की अंगूठी पहना दी. मानसी के चेहरे पर इंद्रधनुष के रंग बिखर गए.

यश कहने लगा, ‘‘जब भी अपने घर के

बारे में सोचता हूं तो पापा के साथ तुम्हारा और बिट्टू का चेहरा मेरी आंखों में उभर जाता है.

अब बस बिट्टू जल्दी से आ जाए तो मेरा घर

भी बस जाए.’’

उस की इस बात पर सब हंस पड़े.

बिट्टू 5 की जगह 10 दिनों में आया, लेकिन उस का उखड़ाउखड़ा रवैया मानसी का दिल दहलाने लगा. वह काफी चुप और गंभीर था. सब से बड़ी बात यह थी कि यश के साथ उस का व्यवहार बहुत ही रूखा था. यश कई बार उसे साथ ले जाने के लिए आया तो बिट्टू ने उस से बात तक नहीं की.

मानसी को पहली बार अपनी गलती का एहसास हुआ कि उसे इतने दिनों के लिए सुधांशु की बातों में आ कर बिट्टू को उस के साथ नहीं भेजना चाहिए था. अब तो गलती हो ही गईर् थी.

मानसी बिट्टू से बात करने की कोशिश करती भी तो वह सिर्फ हांहूं में जवाब देता. यश

ने बिट्टू से बात करने की बहुत कोशिश की लेकिन यश को देख कर ही बिट्टू अपने कमरे में बंद हो जाता और उस के जाने के बाद ही निकलता. बिट्टू के इस व्यवहार से हरकोई

दुखी था.

फिर एक दिन बिट्टू ने जो कहा मानसी

का दिमाग सुन कर सुन्न रह गया, ‘‘पापा ठीक कहते हैं तुम्हारे नाना की दौलत पर पराए लोग ऐश करेंगे और वह तुम्हें दूध में मक्खी की तरह निकाल फेंकेंगे.’’

‘‘पराए… कौन पराए लोग.’’

‘‘यश अंकल और कौन.’’

‘‘बिट्टू, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? यह सब तुम ने कहां से सीख लिया?’’

‘‘मम्मी, रिलैक्स. पापा ठीक कहते हैं आप को लोगों की पहचान नहीं है. यश अंकल आप के माध्यम से नाना की संपत्ति पर कब्जा करना चाहते हैं.’’

मानसी का जी चाहा बिट्टू का मुंह थप्पड़ों से लाल कर दे. वह उसे गुस्से से देखती रही, फिर चुपचाप बाहर चल दी.

अगले दिन शाम को यश आया तो बिट्टू ने दहाड़ कर मानसी से कहा, ‘‘आप अंकल को मना कर दो कि यहां न आया करें.’’

मानसी ने प्यार से समझने का प्रयत्न किया, ‘‘बिट्टू तुम तो कहते थे अंकल तुम्हारे बैस्ट फ्रैंड हैं, उन्होंने तुम्हें कितना प्यार दिया है. क्या तुम सब भूल गए हो?’’

वह पांव पटक कर बोला, ‘‘नहीं हैं वे मेरे बैस्ट फ्रैंड, वे धोखेबाज हैं, आप से शादी करना चाहते है.’’ फिर यश को देख कर जो अपमानित सा खड़ा था बिट्टू फिर चिल्लाया, ‘‘आप गंदे हैं, हमारे घर मत आया करें. आप मेरी मम्मी को मुझ से छीन कर ले जाना चाहते हैं,’’ वह आप से बाहर था.

यश परेशान हो गया. बिट्टू का कच्चा दिमाग काफी हद तक बिगड़ चुका था. यश ने

प्यार से उस की तरफ हाथ बढ़ाया तो बिट्टू उस का हाथ जोर से झटक कर अंदर चला गया. यश दुखी हो कर अपने घर वापस चला गया.

फिर एक दिन यश के पापा का सोतेसोते हार्टफेल हो गया. अब यश दुनिया में बिलकुल अकेला था. मानसी और यश का घर कुछ कदम के फासले पर ही था. मानसी के मम्मीपापा अकसर यश के पास चले जाते. यश ने तो बिट्टू का मन जीतने की बहुत कोशिश की, लेकिन बिट्टू ने उस दिन से उस के घर पैर भी नहीं रखा जब से वह सुधांशु के पास से लौटा था. यश ने भी बिट्टू का ध्यान रखते हुए मानसी के घर जाना छोड़ रखा था.

एक दिन मानसी यश के घर गई और बहुत गंभीरतापूर्वक बोली, ‘‘आज बहुत सोचने

के बाद मैं तुम से एक बात कहना चाहती हूं.’’

यश का दिल धड़का, ‘‘कहो.’’

‘‘यश, मेरे जीवन में खुशियां कम ही आई हैं. मेरे इस फीके, बेरंग जीवन में एक ही खुशी है और वह है बिट्टू. उसे मैं नहीं छोड़ सकती. पहले मुझे लगता था वह तुम्हारे साथ खुश रहेगा, लेकिन अब हालात बदल गए हैं. अगर मैं तुम्हारा साथ देती हूं तो बिट्टू की नफरत मुझ से सहन नहीं होगी. मुझे दुख है तुम्हारे जीवन में आने वाली लड़की की मजबूरी है कि वह एक मां भी है जो अपनी हर खुशी संतान के लिए कुरबान कर सकती है. मुझे उम्मीद है तुम मेरी यह मजबूरी समझ कर मुझे माफ कर दोगे.’’

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया. यश के चेहरे पर दुख ही दुख था.

फिर मानसी मुश्किल से बोली, ‘‘मैं सिर्फ 1 महीना सुधांशु के साथ रही थी उस 1 महीने का दुख मैं आज तक नहीं भुला पाई.

सफर की हमसफर- भाग 2: प्रिया की कहानी

“कामवाली तो है आंटी पर खाना मैं खुद ही बनाती हूं. मेरी मां ने मुझे सिखाया है कि जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन. अपने हाथों से बनाए खाने की बात ही अलग होती है. इस में सेहत और स्वाद के साथ प्यार जो मिला होता है”.

उस की बात सुन कर मां मुस्कुरा उठीं. तुम्हारी मां ने तो बहुत अच्छी बातें सिखाई है. जरा बताओ और क्या सिखाया है उन्होंने?”

“कभी किसी का दिल न दुखाओ, जितना हो सके दूसरों की मदद करो. आगे बढ़ने के लिए दूसरे की मदद पर नहीं बल्कि अपनी काबिलियत और परिश्रम पर विश्वास करो. प्यार से सब का दिल जीतो। ”

प्रिया कहे जा रही थी और मां गौर से उसे सुन रही थीं. उन्हें प्रिया की बातें बहुत पसंद आ रही थी. इसी बीच मां बाथरूम के लिए उठी कि अचानक झटका लगने से डगमगा गई और किनारे रखे ब्रीफ़केस के कोने से पैर में चोट लग गई. चोट ज्यादा नहीं थी मगर खून निकल आया. उस ने मां को बैठाया और अपने बैग में रखे फर्स्ट ऐड बॉक्स को खोलने लगी. मां ने आश्चर्य से पूछा ,”तुम हमेशा यह डब्बा ले कर निकलती हो ?”

“हां आंटी, चोट मुझे लगे या दूसरों को मुझे अच्छा नहीं लगता। तुरंत मरहम लगा दूं तो दिल को सुकून मिल जाता है. वैसे भी जिंदगी में हमेशा किसी भी तरह की परेशानी से लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए।”

कहते हुए प्रिया ने तुरंत चोट वाली जगह पर मरहम लगा दिया और इस बहाने उस ने मां के पैर भी छू लिए. मां ने प्यार से उस का गाल थपथपाया और पूछने लगी, “तुम्हारे पापा क्या करते हैं? तुम्हारी मां हाउसवाइफ हैं या जॉब करती हैं?”

प्रिया ने बिना किसी लागलपेट के साफ़ स्वर में जवाब दिया,” मेरे पापा सुनार हैं और वे ज्वेलरी शॉप में काम करते हैं. मेरी मां हाउसवाइफ हैं. हम 2 भाईबहन हैं. छोटा भाई इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहा है और मैं यहां एक एमएनसी कंपनी में काम करती हूं. मेरी सैलरी अभी 80 हजार प्रति महीने है और उम्मीद करती हूं कि कुछ सालों में अच्छा मुकाम हासिल कर लूंगी।”

“बहुत खूब!” मां के मुंह से निकला। उन की प्रशंसा भरी नजरें प्रिया पर टिकी हुई थीं, “बेटा और क्या शौक है तुम्हारे?”

“मेरी मम्मी बहुत अच्छी डांसर है. उन्होंने मुझे भी इस कला में निपुण कराया है. डांस के अलावा मुझे कविताएं लिखने और फोटोग्राफी करने का भी शौक है. तरहतरह के डिशेज तैयार करना और सब को खिला कर वाहवाही लूटना भी बहुत पसंद है.”

ट्रेन अपनी गति से आगे बढ़ रही थी और इधर प्रिया और मां की बातें भी बिना किसी रूकावट चली जा रही थी.

कोटा और रतलाम स्टेशनों के बीच जब कि ट्रेन 140 किलोमीटर प्रति घंटे की तेज रफ़्तार से चल रही थी अचानक एक झटके से रुक गई. दूरदूर तक जंगली सूना इलाका था. आसपास न तो कोई आवागमन के साधन थे और न खानेपीने की चीजें थीं. ट्रेन करीब 8-9 घंटे वहीं खड़ी रहनी थी. दरअसल पटरी में क्रैक की वजह से ट्रेन के आगे वाला डब्बा उलट गया था. यात्री घायल तो नहीं हुए मगर अफरातफरी जरूर मच गई थी. क्रैन आने और पलटे हुए डब्बे को हटाने में काफी समय लगना था. इधर प्रिया खुश हो रही थी कि इसी बहाने उसे मां के साथ बिताने को ज्यादा वक्त मिल जाएगा.

एक्सीडेंट 11 बजे रात में हुआ था और अब सुबह हो चुकी थी. यह इलाका ऐसा था कि दूरदूर तक चायपानी या कचौड़ीपकौड़ी बेचने वाला तक नजर नहीं आ रहा था. ट्रेन के पैंट्री कार में भी अब खाने की चीजें खत्म हो चुकी थी. 12 बज चुके थे. मां सोच रही थी कि चाय का इंतजाम हो जाता तो चैन आता. तब तक प्रिया पैंट्री कार से गर्म पानी ले आई. अपने पास रखी टीबैग,चीनी और मिल्क पाउडर से उस ने फटाफट गर्मगर्म चाय तैयार की और फिर टिफिन बॉक्स निकाल कर उस में से दाल की कचौड़ी और मठरी आदि कागज़ के प्लेट में रख कर नाश्ता सजा दिया। टिफिन बॉक्स निकालते समय मां ने गौर किया था कि प्रिया के बैग में डियो के अलावा भी कोई स्प्रे है.

“यह क्या है प्रिया ” मां ने उत्सुकता से पूछा तो प्रिया बोली,” आंटी यह पेपर स्प्रे है ताकि किसी बदमाश से सामना हो जाए तो उस के गलत इरादों को कभी सफल न होने दूँ. सिर्फ यही नहीं अपने बचाव के लिए मैं हमेशा एक चाकू भी रखती हूं। मैं खुद कराटे में ब्लैक बेल्ट होल्डर हूं. इसलिए खुद की सुरक्षा का पूरा ख्याल रखती हूं.”

“बहुत अच्छे ! मां की खुशी चेहरे पर झलक रही थी. अच्छा प्रिया यह बताओ कि तुम अपनी सैलरी का क्या करती हो? खुद तुम्हारे खर्चे भी काफी होंगे आखिर अकेली रहती हो मेट्रो सिटी में और फिर ऑफिस में प्रेजेंटेबल दिखना भी जरूरी होता है. आधी सैलरी तो उसी में चली जाती होगी।”

“अरे नहीं आंटी। ऐसा कुछ नहीं है. मैं अपनी सैलरी के चार हिस्से करती हूं। दो हिस्से यानी 40 हजार भाई की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पापा को देती हूं. एक हिस्सा खुद पर खर्च करती हूं और बाकी के एक हिस्से से फ्लैट का किराया देने के साथ कुछ पैसे सोशल वर्क में लगाती हूं.”

“सोशल वर्क? ” मां ने हैरानी से पुछा.

“हां आंटी, जो भी मेरे पास अपनी समस्या ले कर आता है उस का समाधान ढूंढने का प्रयास करती हूँ. कोई नहीं आया तो खुद ही ग़रीबों के लिए कपड़े, खाना वगैरह खरीद कर उन्हें बाँट देती हूँ. ”

तब तक ट्रेन वापस से चल पड़ी। दोनों की बातें भी चल रही थीं. मां ने प्रिया की तरफ देखते हुए कहा,”मेरा भी एक बेटा है स्वरूप. वह भी दिल्ली में जॉब करता है. ”

स्वरुप का नाम सुनते ही प्रिया की आँखों में स्वाभाविक सी चमक उभर आई. अचानक मां ने प्रिया की तरफ देखते हुए पुछा, “अच्छा यह बताओ बेटे कि आप का कोई ब्वॉयफ़्रेंड है या नहीं ? सचसच बताना.”

प्रिया ने 2 पल मां की आँखों में झाँका और फिर नजरें झुका कर बोली,”जी है.”

ओह ! मां थोड़ी गंभीर हो गईं,”बहुत प्यार करती हो उस से? शादी करने वाले हो तुम दोनों? ”

प्रिया को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या जवाब दे? इस तरह की बातों का हां में जवाब देने का अर्थ है खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना. फिर भी जवाब तो देना ही था. सो वह हंस कर बोली, “आंटी शादी करना तो चाहते हैं मगर क्या पता आगे क्या लिखा है। वैसे आप अपने बेटे के लिए कैसी लड़की ढूंढ रही हैं?”

” ईमानदार, बुद्धिमान और दिल से खूबसूरत.” मां ने जवाब दिया.

स्किन की जलन को कैसे कम करुं?

सवाल-

मैं जब भी किचन से काम कर के निकलती हूं तो मु झे अपनी स्किन पर बहुत जलन महसूस होती है. उस वक्त मैं ऐसा क्या लगाऊं जिस से जलन कम हो जाए और मैं फ्रैश फील करूं?

जवाब-

इस के लिए आप दूध में कुछ बूंदें शहद की डाल दें. कुछ रोज की पत्तियां ले लें. उन को छोटाछोटा काट लें और उस में मिला दें. थोड़ी सी खसखस भी मिला लें. इस पूरे मिक्सर को बर्फ की ट्रे में डाल दें. जमने के लिए फ्रीजर में रख दें. जब भी आप गरमी महसूस करें इस में से एक क्यूब ले कर अपने फेस पर मसाज करें. इस से आप को ठंडक महसूस होगी और साथ में स्किन के ऊपर एक तरह से स्क्रब भी हो जाएगा. आप की स्किन फ्रैश भी महसूस करेगी और रंग भी गोरा होगा.

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क्या आपने भी कभी किसी एलर्जी की वजह से अपनी त्वचा पर किसी तरह के बदलाव का अनुभव किया है? जैसे कि त्वचा पर लाल-लाल चकत्तों का आना, खुजली या फिर नोंचने-खरोंचने की इच्छा. ये सभी स्किन सेंसेटिविटी यानि त्वचा संवेदनशीलता के संकेत हैं.

हालांकि ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें इस बात का नहीं पता होता कि उनकी त्वचा किस प्रकार की है? संवेदनशील या सामान्य. तो आइए, पहले जानते हैं कि वे कौन से संकेत हैं जो हमें हमारी त्वचा की संवेदनशीलता का आभास कराते हैं.

संवेदनशील त्वचा के प्रारंभिक संकेत :

1. थ्रेडिंग या वेक्सिंग के बाद त्वचा का रुखा हो जाना या फिर जलन और खुजली होना.

2. चेहरा धोने के बाद उसमें खिंचाव महसूस करना.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- ऐसे करें सैंसटिव स्किन की देखभाल

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

घर टूटने की वजह, महत्त्वाकांक्षी पति या पत्नी

निर्देशक गुलजार की 1975 में आई फिल्म ‘आंधी’ ने सफलता के तमाम रिकौर्ड तोड़ डाले थे. इस फिल्म पर तब तो विवाद हुए ही थे, यदाकदा आज भी सुनने में आते हैं, क्योंकि यह दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जिंदगी पर बनी थी. संजीव कुमार इस फिल्म में नायक और सुचित्रा सेन नायिका की भूमिका में थीं, जिन का 2014 में निधन हुआ था. ‘आंधी’ का केंद्रीय विषय हालांकि राजनीति था. लेकिन यह चली दरकते दांपत्य के सटीक चित्रण के कारण थी, जिस के हर फ्रेम में इंदिरा गांधी साफ दिखती थीं, साथ ही दिखती थीं एक प्रतिभाशाली पत्नी की महत्त्वाकांक्षाएं, जिन्हें पूरा करने के लिए वह पति को भी त्याग देती है और बेटी को भी. लेकिन उन्हें भूल नहीं पाती. पति से अलग हो कर अरसे बाद जब वह एक हिल स्टेशन पर कुछ राजनीतिक दिन गुजारने आती है, तो जिस होटल में ठहरती है, उस का मैनेजर पति निकलता है.

दोबारा पति को नजदीक पा कर अधेड़ हो चली नायिका कमजोर पड़ने लगती है. उसे समझ आता है कि असली सुख पति की बांहों, रसोई, घरगृहस्थी, आपसी नोकझोंक और बच्चों की परवरिश में है न कि कीचड़ व कालिख उछालू राजनीति में. लेकिन हर बार उसे यही एहसास होता है कि अब राजनीति की दलदल से निकलना मुश्किल है, जिसे पति नापसंद करता है. राजनीति और पति में से किसी एक को चुनने की शर्त अकसर उसे द्वंद्व में डाल देती है. ऐसे में उस का पिता उसे आगे बढ़ने के लिए उकसाता रहता है. इस कशमकश को चेहरे के हावभावों और संवादअदायगी के जरीए सुचित्रा सेन ने इतना सशक्त बना दिया था कि शायद असल किरदार भी चाह कर ऐसा न कर पाता.

आरती बनीं सुचित्रा सेन दांपत्य के दूसरे दौर में खुलेआम अपने होटल मैनेजर पति के साथ घूमतीफिरती और रोमांस करती नजर आती है, तो विरोधी उस पर चारित्रिक कीचड़ उछालने लगते हैं.

स्वभाव से जिद्दी और गुस्सैल आरती इस पर तिलमिला उठती है, क्योंकि उस की नजर में वह कुछ भी गलत नहीं कर रही थी. चुनाव प्रचार के दौरान जब उस से यह सवाल हर जगह पूछा जाता है कि होटल मैनेजर जे.के. से उस का क्या संबंध है, तो वह हथियार डालती नजर आती है. ऐसे में पति उसे संभालता है. चुनाव प्रचार की आखिरी पब्लिक मीटिंग में वह पति को साथ ले कर जाती है और सच बताते हुए कहती है कि ये उस के पति हैं. अगर इन के साथ घूमनाफिरना गुनाह है, तो वह गुनाह उस ने किया है. आखिर में रोतीसुबकती आरती भावुक हो कर जनता से अपील करती है कि वह वोट नहीं इंसाफ मांग रही है.

जनता उसे जिता कर इंसाफ कर देती है. फिल्म के आखिरी दृश्य में जब वह हैलिकौप्टर में बैठ कर दिल्ली जा रही होती है तब संजीव कुमार उस से कहता है कि मैं तुम्हें हमेशा जीतते हुए देखना चाहता हूं

फिल्म इसी सुखांत पर खत्म हो जाती है. लेकिन बुद्धिजीवी दर्शकों के सामने यह सवाल छोड़ जाती है कि क्या कल कैरियर के लिए छोड़े गए पति को सार्वजनिक रूप से स्वीकारना भी राजनीति का हिस्सा नहीं था? यह जनता के साथ भावनात्मक ब्लैकमेलिंग नहीं थी?

साबित यह होता है कि राजनीति में सब कुछ जायज होता है. साबित यह भी होता है कि एक महत्त्वाकांक्षी पत्नी, जिसे हार पसंद नहीं, जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है.

इंदिरा गांधी: मिसाल व अपवाद

फिल्म से हट कर देखें तो इंदिरा गांधी भारतीय महिलाओं की आदर्श रही हैं. वजह एक निकाली जाए तो वह यह होगी कि 70 के दशक में औरतों पर बंदिशें बहुत थीं. उन का महत्त्वाकांक्षी होना गुनाह माना जाता था और इस महत्त्वाकांक्षा की हत्या तब बड़ी आसानी से प्रतिष्ठा, इज्जत और समाज के नाम के हथियारों से कर दी जाती थी. चूंकि इंदिरा गांधी इस का अपवाद थीं, इसलिए उन्होंने अपनी महत्त्वाकांक्षा को जिंदा रखा और दांपत्य व गृहस्थी के झंझट में ज्यादा नहीं पड़ीं तो वे मिसाल और अपवाद बन गईं. नई पीढ़ी उन के बारे में यही जानती है कि वे एक सफल और लोकप्रिय नेत्री थीं. पर यह सब उन्होंने किन शर्तों पर हासिल किया था, इस की झलक फिल्म ‘आंधी’ में दिखाई गई है.

इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी का पत्नी पर कोई जोर नहीं चलता था. इसीलिए इंदिरा अपने अंतर्जातीय प्रेम विवाह पर कभी पछताई नहीं न ही उन्होंने कभी सार्वजनिक तौर पर पति की निंदा या चर्चा की. इस खूबी ने भी जिसे पति का सम्मान समझा गया था उन्हें ऊंचे दरजे पर रखने में बड़ा रोल निभाया.

लेकिन जब पत्नी इतनी महत्त्वाकांक्षी हो कि घर तोड़ने पर ही आमादा हो जाए तब पति को क्या करना चाहिए ताकि गृहस्थी भी बनी रहे और पत्नी का नुकसान भी न हो? इस सवाल का एक नहीं, बल्कि अनेक जवाब हो सकते हैं, जो मूलतया सुझाव होंगे, क्योंकि स्पष्ट यह भी है कि पत्नी का महत्त्वाकांक्षी होना समस्या नहीं है, समस्या है पति द्वारा उसे मैनेज न कर पाना.

इसी कड़ी में गत अक्तूबर के आखिरी हफ्ते में पाकिस्तान के मशहूर 63 वर्षीय क्रिकेटर इमरान खान का भी नाम आता है, जिन्होंने अपनी पत्नी रेहम खान को तलाक दे दिया. उल्लेखनीय है कि रेहम खान और इमरान दोनों की यह दूसरी शादी थी. रेहम को पहले पति से 3 बच्चे हैं और इमरान को भी पहली पत्नी से 2 बच्चे हैं. उम्र में रेहम इमरान से 20 साल छोटी हैं. इस तलाक की वजह दोनों की दूसरी शादी या बेमेल शादी नहीं, बल्कि इमरान खान की मानें तो रेहम की बढ़ती राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं जिम्मेदार हैं. इमरान पाकिस्तान के प्रमुख राजनीतिक दल तहरीके इंसाफ पार्टी (पीटीआई) के संस्थापक और मुखिया हैं. चर्चा यह भी रही कि रेहम पीटीआई पर कब्जा जमाना चाहती थीं. वे नियमित पार्टी की मीटिंग में जाने लगी थीं और कार्यकर्ताओं की पसंद भी बनती जा रही थीं. पीटीआई का दखल पाकिस्तान की सत्ता में हो या न हो, लेकिन वहां की सियासत में खासा दखल है, जिस की वजह पाकिस्तान में इमरान के चाहने वालों की बड़ी तादाद है.

इस तनाव पर पेशे से कभी बीबीसी में टीवी ऐंकर रहीं रेहम ने यह बयान दे कर जता दिया कि इस तलाक की वजह वाकई उन की महत्त्वाकांक्षा है. रेहम का कहना है कि पाकिस्तान में उन्हें गालियां दी जाती थीं. वहां का माहौल औरतों के हक में नहीं है. वे तो पूरे देश भर की भाभी हो गई थीं. जो भी चाहता उन्हें गालियां दे सकता था. तलाक के बाद रेहम ने यह भी कहा कि इमरान चाहते थे कि वे रोटियां थोपती रहें यानी एक परंपरागत घरेलू बीवी की तरह रहें, जो उन्हें मंजूर नहीं था. जाहिर है, वाकई रेहम की महत्त्वाकांक्षाएं सिर उठाने लगी थीं और इमरान को यह मंजूर नहीं था.

एक फर्क शौहर होने का

क्या सभी पतियों से ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि वे पत्नि की महत्त्वाकांक्षाएं पूरी करने के रास्ते में अड़ंगा नहीं बनेंगे? तो इस सवाल का जवाब साफ है कि नहीं, क्योंकि पुरुष का अपना अहम होता है. वह पत्नी को खुद से आगे बढ़ने का, अपनी अलग पहचान बनाने का और लोकप्रिय होने का मौका नहीं देता. इस बाबत पूरी तरह से उसे ही दोषी ठहराया जाना उस के साथ ज्यादती होगी. जब पत्नी कह सकती है कि वह ही क्यों झुके और समझौता करे, तो पति से यह हक नहीं छीना जा सकता. सवाल गृहस्थी और बच्चों के साथसाथ अघोषित विवाह नियमों का भी होता है.

1973 में अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी द्वारा अभिनीत फिल्म ‘अभिमान’ ने भी बौक्स औफिस पर झंडे गाड़े थे. इस फिल्म में पतिपत्नी दोनों गायक होते हैं. लेकिन पूछपरख पत्नी की ज्यादा होने लगती है, तो पति झल्ला उठता है. नौबत अलगाव तक की आ जाती है. पत्नी मायके चली जाती है और गर्भपात हो जाने से गुमसुम रहने लगती है. बाद में पति उसे मना कर स्टेज पर ले आता है और उस के साथ गाना गाता है. लेकिन ऐसा तब होता है जब पत्नी हार मान चुकी होती है. इस फिल्म की खूबी थी मध्यवर्गीय पति की कुंठा, जो पत्नी की सफलता और लोकप्रियता नहीं पचा पाता, इसलिए दुखी और चिड़चिड़ा रहने लगता है. उसे लगता है पत्नी के आगे बढ़ने पर दुनिया उस की अनदेखी कर रही है. पत्नी के कारण उस की प्रतिभा का सही मूल्यांकन नहीं हो पा रहा है और लोग उस का मजाक उड़ा रहे हैं. अब नजर रील के बजाय रियल लाइफ पर डालें, तो अमिताभ शीर्ष पर हैं और हर कोई जानता है कि इस में जया भादुड़ी का योगदान त्याग की हद तक है. जिन्होंने पति के डूबते कैरियर को संवारने के लिए ‘सिलसिला’ फिल्म में काम करना मंजूर किया था.

ऐसा आम जिंदगी में होना और हर कहीं दिख जाना आम बात है कि प्रतिभावान महत्त्वाकांक्षी पत्नी का पति अकसर हीनभावना और कुंठा का शिकार रहने लगता है. वजह उस की कमजोरी उजागर करता एक सच उस के सामने आ खड़ा होता है. यहां से शुरू होता है द्वंद्व, कशमकश, चिढ़ और कुंठा. पति जानतासमझता है कि वह पत्नी से पीछे है और यह सच सभी समझ रहे हैं. दांपत्य का यह वह मुकाम होता है जिस पर वह पत्नी को नकार भी नहीं सकता और स्वीकार भी नहीं सकता. जबकि पत्नी की इस में कोई गलती नहीं होती. इधर सफलता और लोकप्रियता की सीढि़यां चढ़ रही पत्नी पति की कुंठा और परेशानी नहीं समझ पाती. लिहाजा, अपना सफर जारी रखती है. उधर पति को लगता है कि वह जानबूझ कर उसे चिढ़ाने और नीचा दिखाने के लिए ऐसा कर रही है. ऐसे में जरूरत ‘अभिमान’ फिल्म की बिंदु, असरानी और डैविड जैसे शुभचिंतकों की पड़ती है, जो पतिपत्नी को समझा पाएं कि दरअसल में गलत दोनों में से कोई नहीं है. जरूरत वास्तविकता को स्वीकार लेने की है, जिस में किसी की कोई हेठी नहीं होने वाली. पर ऐसे शुभचिंतक फिल्मों में ही मिलते हैं, हकीकत में नहीं. इसलिए पति की कुंठा हताशा में बदलने लगती है और वह कई बार क्रूरता दिखाने लगता है.

इस कुंठा से छुटकारा पाने के लिए जरूरी है कि  पति पत्नी की हैसियत और पहुंच को दिल से स्वीकार करे और पत्नी को चाहिए कि वह पति को यह जताती रहे कि ये तमाम उपलब्धियां उस की वजह और सहयोग से हैं. इस में कोई शक नहीं कि महत्त्वाकांक्षी पत्नी की पहली प्राथमिकता उस की अपनी मंजिल होती है, गृहस्थी, बच्चे या पति नहीं. पर इस का मतलब यह भी कतई नहीं कि उसे इन की चिंता या परवाह नहीं होती. इस का मतलब यह है कि वह अपनी प्रतिभा पहचानती है, लक्ष्य तक पहुंचना उसे आता है और वह कोई समझौता करने में यकीन नहीं करती.

याद रखें

– पतिपत्नी में किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा गृहस्थी और दांपत्य दोनों के लिए सुखद नहीं है, इसलिए इस से बचें. एकदूसरे की भावनाओं और इच्छाओं के सम्मान से ही दोनों वे सब पा सकते हैं, जो वे पाना चाहते हैं.

– पत्नी जिंदगी में कुछ बनना या हासिल करना चाहती है, तो कुछ गलत नहीं है. यह उस का हक है. लेकिन पत्नियों को यह देखसमझ लेना चाहिए कि वे जो पाना चाहती हैं उस से आखिरकार हासिल क्या होगा और पति की भावनाओं को जरूरत से ज्यादा ठेस तो इस से नहीं लग रही.

– पति का प्रोत्साहन और प्रशंसा पत्नी की प्रतिभा को निखारती है. उस की मंशा पति को नीचा दिखाने की नहीं होती. यह नौबत तब ज्यादा आती है जब पति कुढ़ने लगता है और पत्नी की उपलब्धियों में से खुद की भागीदारी खत्म कर लेता है.

– पत्नी कमाऊ हो, सार्वजनिक जीवन जी रही हो तो पति को चाहिए कि वह बजाय हीनभावना से ग्रस्त होने के पत्नी पर गर्व करे.

कम खर्च की शादी : वैडिंग डैकोर की प्लानिंग के ये टिप्स अपनाएं

शादी और कम खर्च यह सुनना शायद सभी को अजीब लगे, पर अब शादी पर कम खर्च का चलन शुरू हो गया है, क्योंकि इस से समय और पैसा दोनों की ही बचत होती है. कुछ लोगों को यह सोच कंजूसी लग सकती है, क्योंकि वे सोचते हैं कि लकड़ी की मेजों पर सफेद चादरें बिछा कर, कैंडल लाइट कर और कम लोगों को आमंत्रित कर शादी के खर्च को कम किया जा सकता है. मगर ऐसा बिलकुल नहीं है.

कम खर्च की शादी के लिए यह जरूरी नहीं कि आप सब कुछ त्याग दें या न करें, बल्कि जो चीजें शादी में जरूरी नहीं होतीं या केवल दिखावे के लिए होती हैं उन्हें छोड़ प्रमुख चीजों पर ध्यान दें. इस प्रकार केवल थोड़ी सी समझदारी और सही प्लानिंग से ही आप शादी को अपने मनमुताबिक और यादगार बना सकते हैं.

इस बारे में वैडिंग प्लानर आशु गर्ग बताते हैं कि शादी सब के लिए यादगार बने इस की मैं हमेशा कोशिश करता हूं, क्योंकि शादी का खर्च व्यक्ति के बजट के आधार पर होना चाहिए ताकि किसी को भी बोझ न महसूस हो. यही मेरे लिए चुनौती होती है. ऐसे में इन बातों पर ध्यान देने की जरूरत होती है:

डिटेलिंग पर दें ध्यान

पीच कलर के साथ रैड और गोल्डन का चलन विवाह में सालों से है. वैडिंग में इन का खास महत्त्व होता है, लेकिन अब इन में हलके और प्राकृतिक रंगों के मिश्रण को भी अधिक महत्त्व दिया जा रहा है. इस में वैसी ही कलाकृतियों वाले फर्नीचर और पेड़पौधे इस की शोभा को बढ़ाते हैं.

बड़ीबड़ी चीजों से बनावटी सजावट का समय अब नहीं है. अब लोग अपनी पसंद से घर या विवाह मंडप को सजाते हैं, जिस में सजाने वाले का व्यक्तित्व और पसंद पूरी तरह से दिखाई देती है. यह उन के लिए एक चुनौती होती है. इस में कपल्स अधिकतर बौलीवुड की सजावट का सहारा लेते हैं, जिस में डिटेलिंग पर अधिक जोर होता है, जो अधिकतर तरहतरह के कलर कौंबिनेशन पर आधारित होती है ताकि पिक्चर्स अच्छी निकलें. कम खर्चे की शादी में खूबसूरती के अलावा अधिकतर कपल्स चाहते हैं कि उन की साजसजावट में भी एक शानदार लुक हो, इसलिए डिटेलिंग के अलावा छोटीछोटी चीजों पर भी खुद ध्यान देने की जरूरत होती है. इस में अतिथियों का मनोरंजन सब से ऊपर होना चाहिए. इस के अलावा स्टेज प्रैजेंटेशन, गैस्ट टेबलों का आकार जो गोल या चौकोर में हो और सिल्क के रंगीन कपड़े से ढकी हों ताकि एक कोणीय व्यू मिले.

एक डिजाइन को बड़ा दिखाएं

कम खर्चे की शादी में अधिकतर लोग दीवारों पर कम सजावट करते हैं, जबकि हकीकत में एक अच्छा थीम या डिजाइन सोच कर उसे ही बड़े और कलरफुल तरीके से दिखाना उचित होता है, जिस का केंद्र बिंदुविवाह होना चाहिए. इस में रंग और लाइट्स से ले कर हर बेसिक चीज शामिल होनी चाहिए.

फ्लौवर पावर

फूलों की सजावट आप के हर लुक को शानदार बना देती है. आशु कहते हैं कि फूलों के साथ आप तरहतरह के ऐक्सपैरिमैंट कर वैवाहिक परिदृश्य को अधिक सुंदर बना सकते हैं. फूल सजाने के लिए, दूल्हादुलहन के लिए, सैंटर टेबल और दीवार की डैकोरेशन आदि सभी जगहों पर किसी न किसी रूप में प्रयोग किए जा सकते हैं. गैस्ट टेबल और दीवारों को सजाने के लिए अगर बनावटी फूलों का भी सहारा लिया जाए, तो खर्च और भी कम होता है. इस के अलावा कलरफुल बैरीज और स्ट्राबैरीज को भी सजावट के लिए प्रयोग कर सकते हैं. ये फ्रैश लुक को बनाए रखने में मददगार साबित होती हैं.

नैचुरल लाइटिंग

रोशनी को वैडिंग में सब से खास माना जाता है. अगर यह सही तरह से कर ली जाए, तो सिंपल और ऐलिगैंट वैडिंग कल्पना जो आप ने की है वह गैस्ट और वैडिंग दोनों को ही आकर्षक लगती है. नैचुरल लाइटिंग विवाह के खर्चे को हमेशा कम करती है. मसलन, ओपन हौल, कोलोनियल स्टाइल हौल्स या मध्यम रोशनी के कैफे स्टाइल आदि सभी पारंपरिक और शिल्पकारी की पराकाष्ठा को बयान करते हैं.

डिनर फिएस्टा

वाह में भोजन सब से महत्त्वपूर्ण होता है, जिस में संतुलित आहार होने के साथसाथ उस की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान देने की जरूरत होती है. लंबी लिस्ट मेनू होने से अतिथि खुश हों, यह जरूरी नहीं, क्योंकि वे पूरे मेनू का स्वाद चखने में असमर्थ होते हैं. इसे साधारण और गुणवत्तापूर्ण रखें, क्योंकि आज लोग क्वांटिटी से अधिक क्वालिटी पर विश्वास रखते हैं. इसे परोसने के लिए थोड़ी कला और प्यार रखें ताकि उन्हें एक अच्छा माहौल मिले.

ट्रीट ओ ट्रीट

विवाह में आजकल केक काटने का चलन है. ऐसे में अलगअलग स्टाइल के केक इस की शोभा को बढ़ाते हैं. इस में आप अपनी कला को शामिल कर इसे खूबसूरत बना सकते हैं. जरूरत हो तो कुछ फूलों से इस की शोभा और अधिक बढ़ाई जा सकती है.

परिधान हों यादगार

हैवी ऐंब्रौयडरी वाले गाउन्स और लहंगों का जमाना अब नहीं है. ऐसे में स्टाइलिश और सुंदर दिखने वाले गाउन्स आज की मांग हैं. कपल्स आजकल आरामदायक और क्लासिक ड्रैस पहनना पसंद करते हैं, जिस में कट्स और प्लीट्स पर ध्यान देना आवश्यक होता है. लहंगाचोली या साड़ी, सिल्क या शिफौन के कपड़े पर मनपसंद रंग के अनुसार अच्छी कढ़ाई ही वैडिंग को शानदार बनाती है. साथ में सफेद लिली का बुके या बालों में फूल लगाने पर दुलहन मूर्तिकला की प्रतिरूप लगती है. गहने जरूरत के हिसाब से लेने चाहिए और उन में नथ, बाजूबंद और कमरबंद को शामिल करना न भूलें.

8 Tips: बेकिंग सोडा से करें स्किन की देखभाल

कभी बारिश और कभी तेज गर्मी. मौसम के इस लगातर बदलते मिजाज के कारण आपकी त्वचा की रंगत कम होने लगती है. ऐसे में रसोई में रखा बेकिंग सोडा आपकी खासी मदद कर सकता है. जानिए, कैसे बेकिंग सोडा आपकी खूबसूरती बढ़ा देगा.

1. कील-मुहासे दूर भगाएं

इस मौसम में औयली स्किन वाले लोगों को ज्यादा दिक्कत होती है. लड़कियां हों या लड़के जिनकी स्किन में भी औयल कंटेंट अधिक होता है उनकी स्किन पर ब्लैक हेड्स, वाइट हेड्स या मुहासों की दिक्कत होने लगती है. ऐसे में बेकिंग सोडा को पानी में मिलाकर पेस्ट बनाएं और प्रभावित जगहों पर लगाएं.

2. त्वचा को निखारे

त्वचा की रंगत निखारने के लिए भी बेकिंग सोडे का प्रयोग कर सकती हैं. बेकिंग सोडा त्वचा की रंगत निखारता है. इसे लगाने से स्किन की डेड सेल निकल जाती है. इसके लिए बेकिंग सोडे को गुलाबजल में मिक्स करके सर्कुलर मोशन में चेहरे पर लगाएं. कुछ देर बाद ताजे पानी से धो लें.

3. चेहरा चमकाए

बेकिंग सोडा एक अच्छा फेसवाश भी है. मेकअप हटाने के लिए बेकिंग सोडा में पानी मिलाकर चेहरे को धोएं. इससे मेकअप के कण अच्छी तरह से साफ हो जाते हैं. आप चाहें तो इससे चेहरे की स्क्रबिंग भी कर सकती हैं.

4. सनबर्न और टैनिंग हटाने के लिए

सनबर्न दूर करने के लिए भी बेकिंग सोडा प्रयोग में लाया जाता है. अगर आपको सनबर्न हो गया है तो बेकिंग सोडे को ठंडे पानी में मिलाकर एक गाढ़ा घोल बना लें और इस घोल को एक साफ कपड़े की मदद से प्रभावित जगह पर लगाएं. इससे आपको लाभ होगा.

5. बरकरार रखें दांतों की सफेदी

दांतों का पीलापन दूर करने के लिए आप इसका इस्तेमाल कर सकती हैं. इसके लिए बेकिंग सोडा में पानी मिलाकर इसका पेस्ट बना लें. अब अपनी उंगली में पेस्ट लेकर दांतों पर हल्के-हल्के स्क्रब करें. इस प्रक्रिया को हफ्ते में एक बार करें, इस उपाय से आपके दांतों के रंग में फर्क दिखने लगेगा.

6. डार्क अंडरआर्म से राहत

अंडरआर्म में जमा हुए डेड स्किन सेल्स इस हिस्से के कालेपन का सबसे बड़ा कारण होता है. इसको दूर करने के लिए उस हिस्से को स्क्रब करना चाहिए. इसके लिए बेकिंग सोडा और पानी मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बना लें. अब इस पेस्ट से अंडरआर्म पर स्क्रब करें, आपको फर्क दिखाई देगा.

7. पैरों की खूबसूरती बढ़ाएं

हम अक्सर अपने शरीर की देखभाल पर पूरा ध्यान देते हैं लेकिन पैरों की देखभाल में लापरवाही बरतते हैं. ऐसे में बेकिंग सोडा हमारे पैरों की देखभाल में मदद कर सकता है. इसके लिए एक टब में चार लीटर पानी भर लें, उसमें आधा कप बेकिंग सोडा मिला दें. आधे घंटे तक पैर को पानी में डालकर रखें. पैर पोंछ लें और फिर कोई मॉइस्चराइजर पैरों में लगा लें. यह पैरों की गंदगी को साफ करके पैरों की त्वचा को मुलायम बनाता है.

8. संक्रमण से बचाए

नाखूनों में होने वाले संक्रमण में भी बेकिंग सोडा बहुत फायदा करता है. नाखूनों में किसी भी तरह का संक्रमण होने पर दो चम्मच बेकिंग सोडा और एक चम्मच पानी मिलाकर पेस्ट बना लें. अब इसे संक्रमण वाली जगह पर लगा लें. 10 मिनट बाद धो लें. दिन में दो बार ऐसा करें, लाभ होगा.

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Festive Special: घर पर ऐसे बनाए कंडेंस्ड मिल्क

कन्डेंस्ड मिल्क एक प्रकार का गाढा दूध होता है, जिसमें शक्कर भी मिली हुई होती है. यह बाजार में भी मिलता है. पर आप खुद से भी बना सकती हैं. आपको इसकी रेसिपी बताते है.

 सामग्री :

– दूध (01 लीटर)

– शक्‍कर ( 200 ग्राम)

– बेकिंग सोडा ( 01 चुटकी)

कंडेंस्ड मिल्क बनाने की विधि :

– दूध को एक बड़े बर्तन में मीडियम आंच पर गर्म करें.

– जब दूध में उबाल आने लगे, शक्‍कर और बेकिंग सोडा डाल दें और पकाएं.

– दूध को पकाते समय उसे बराबर चलाते रहे, ताकि वह तली में लगने न पाये.

– धीरे-धीरे दूध गाढ़ा हो जाएगा तो गैस बंद कर दें.

मिल्‍क पाउडर से कंडेंस्ड मिल्क बनाने की विधि :

– सबसे पहले 150 ग्राम मिल्‍क पाउडर को पानी में पानी में घोल लें.

– इसके बाद दूध में 100 ग्राम शक्‍कर, 01 चुटकी बेकिंग सोडा और 01 चम्‍मच घी मिला कर अच्‍छी तरह   से घोल लें.

– अब दूध को एक बर्तन में मीडियम आंच पर उबालें.

– दूध को बीच-बीच में चलाते भी रहें.

– जब दूध एक तिहाई रह जाए गैस बंद कर दें.

– लीजिए आपका कंडेंस्ड मिल्क तैयार है.

Monsoon Special: वायरल फीवर को हल्के में न लें

बदलते मौसम में अधिकतर लोग वायरल फीवर के शिकार हो जाते है. वायरल फीवर को  ‘मौसमी बुखार’ के शिकार हो जाते हैं. वायरल फीवर से ठीक होने में 4-5 दिन लग जाते हैं. कई बार यह बुखार 10-12 दिन मंे ठीक नहीं होता है. फीवर तेजी मरीज की उम्र पर निर्भर करती है और अगर वायरल फीवर किसी फ्लू वायरस की वजह से हुआ है तो इसे ठीक होने में कम से कम 5 दिनों का समय लगता है.

अगर दवा लेने के बावजूद भी तीन दिनों के अन्दर बुखार कम नहीं हो रहा है तो आप तुरंत किसी डॉक्टर के पास जायें. ऐसे में सबसे जरूरी यह होता है कि वायरल फीवर को हल्के में न ले. जैसे ही बुखार का अनुभव हो डाक्टर के पास जाकर दवाएं लें. लापरवाही करने में यह बुखार ठीक होने में लंबा समय ले लेता है. बच्चों में अगर यह बुखार 48 घंटे में भी कम नहीं हो रहा है तो तुरंत डॉक्टर से चेकअप करायें.
वायरल फीवर रुक-रुक कर होता है. कई बार यह नियमित अंतराल में अनुभव होता है. उदाहरण के लिए ज्यादातर लोगों को दोपहर या शाम को एक विशेष समय के दौरान वायरल फीवर का अनुभव होता है. वायरल फीवर होने पर ठंड लगती है. वायरल फीवर के दौरान तेज गर्मी और नम तापमान के समय में ठंड का अनुभव होता है. नाक बहना, बंद नाक, आंखों में लालिमा, निगलने में कठिनाई आदि ये वायरल फीवर के कुछ लक्षण हैं.

वायरल फीवर सामान्य फीवर की दवाओं से ठीक नहीं होते. सामान्य फीवर की दवाएं वायरल फीवर को कुछ समय के लिए ही ठीक कर पाती हैं, जैसे ही दवाओं का असर खत्म होता है, वायरल फीवर फिर से हो जाता है. वायरल फीवर सामान्य फीवर से ज्यादा समय तक रहता है. वायरल फीवर वायरल संक्रमण के कारण होता है. इसकी मुख्य विशेषता होती है कि शरीर का तापमान का बढता है. वायरल फीवर का बच्चों और वृद्धों में होना काफी आम होता है. क्योंकि उनकी रोग प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है.

क्या होता है वायरल फीवर:

वायरल फीवर आमतौर पर एयरबोर्न यानि हवा में फैलने वाले वायरल इन्फेक्शन के कारण होता है. हालांकि यह वाटरबोर्न यानि पानी में फैलने वाले संक्रमण के कारण भी होता है. वाटरबोर्न इन्फेक्शन की रोकथाम करने के लिए उपाय किए जा सकते हैं, लेकिन जिस हवा में हम सांस लेते हैं उससे फैलने वाले इन्फेक्शन की रोकथाम करने के उपाय काफी कम हैं. वायरल फीवर बहुत ही कम मामले में चिंता का कारण बन पाता है. ज्यादातर मामलों में यह बिना किसी विशेष उपचार के ही ठीक हो जाता है.
वायरल फीवर और बैक्टीरियल इन्फेक्शन के बीच के अंतर को स्पष्ट करना इतना आसान नहीं है, क्योंकि इनके काफी सारे लक्षण एक समान होते हैं. इसलिए यदि आपके शरीर का तापमान 102 डिग्री फारेनहाइट से ऊपर हो जाता है या बुखार 48 घंटो तक कम नहीं होता तो डॉक्टर से बात करना आवश्यक है. जो लोग इस संक्रमण से पीड़ित होते है, उनको शरीर में दर्द, त्वचा पर चकत्ते और सिर दर्द की समस्या होती है. वायरल फीवर का इलाज करने के लिए दवाएं भी उपलब्ध हैं, कुछ मामलों में घरेलू उपचार भी इस स्थिति से निपटने में आपकी सहायता करते हैं.

जब वायरल फीवर हो जाये:

बैक्टीरिया के कारण होने वाले वायरल फीवर तीन दिनों के बाद हल्का पड़ जाता है. वैसे वायरल फीवर की शुरुवात में ही इसकी सही वजह की जांच कर पाना बहुत मुश्किल होता है.डॉक्टर्स शुरुवात में गले की जाँच, पेशाब में जलन को चेक करके ये पता लगाने की कोशिश करते हैं कि आपको वायरल किस वजह से हुआ है. आमतौर पर अगर मरीज को बहुत तेज बुखार रहता है तो डॉक्टर उनका सबसे पहले ब्लड टेस्ट करवाते हैं, क्योंकि ब्लड टेस्ट से सही कारण आसानी से पता चल जाता है. अगर बुखार के साथ साथ आपको सिरदर्द, खांसी और गले में इन्फेक्शन भी हो तो इसे अनदेखा न करें बल्कि इसकी जांच करवाएं.
यदि फीवर अधिक है तो सिर पर ठंडे पानी की पट्टी रख कर फीवर को नार्मल करें. खाने में फल, हरी सब्जी ले. पानी का सेवन करें. साफ और हवादार कमरे में रहे. अपने कपडे और बिस्तर रोज बदलते रहे. फीवर का एक चार्ट बना लें. जिससे डाक्टर को देखने में आसानी रहेगी कि कब कब फीवर रहता है.

वायरल फीवर के सामान्य लक्षण:
वायरल फीवर के लक्षणों में फीवर का कम या तेज होना, नाक का बहना, खाँसी का आना,  आँखों में लालिमा और जलन का एहसास होना, मसल्स और जॉइंट में दर्द बने रहना,  थकान और चक्कर आना, कमजोरी का अनुभव करना, सिर दर्द, टॉन्सिल में दर्द होना, छाती में जकड़न,  गले में दर्द, स्किन रैशेस, डायरिया, मतली, उल्टी और सामान्य रूप से कमजोरी का अनुभव होना होता है. कमजोरी से बचने के लिये अच्छा भोजन लें. सफाई का ध्यान रखें. आराम जरूर करें. अगर आप आराम नहीं करेगे तो फीवर लंबे समय तक चल सकता है. फीवर होने पर पारासिटामोल का उपयोग करें. कोई एंटीबायोटिक्स देने की जरूरत नहीं है.

एक मुलाकात ऐसी भी- भाग 1: निशि का क्या था फैसला

मौल में पहुंचे ही थे कि मिशिका को उस के फें्रड्स सामने दिख गए और वह मुझे तेजी से बायबाय कह कर उन के साथ हो ली. वह नोएडा के एमिटी कालिज से इंजीनियरिंग कर रही है. उस के सभी मित्रों को अच्छी कैंपस प्लेसमेंट मिल गई थी सो इसी खुशी में उस के ग्रुप के सभी साथी यहां पिज्जा हट में खुशियां मना रहे थे.

नोएडा का यह मशहूर जीआईपी यानी ‘गे्रट इंडिया प्लेस’ मौल युवाओं का पसंदीदा स्थान है. हम गाजियाबाद में रहते हैं. मिशिका अकेले ही रोज गाजियाबाद से कालिज आती है मगर इस तरह पार्टी आदि में जाना हो तो मैं या उस के पापा साथ आते हैं. यों अकेले तैयार हो कर बेटी को घूमनेफिरने जाने देने की हिम्मत नहीं होती. एक तो उस के पापा का जिला जज होना, पता नहीं कितने दुश्मन, कितने दोस्त, दूसरे आएदिन होने वाले हादसे, मैं तो डरी सी ही रहती हूं. क्या करूं? आखिर मां हूं न…

बच्चे अपने मातापिता की भावनाओं को कहां समझ पाते हैं. उन्हें तो यही लगता है कि हम उन की आजादी पर रोक लगा रहे हैं. कई बार मिशिका भी बड़ी हाइपर हुई है इस बात को ले कर कि ममा, आप ने तो मुझे अभी तक बिलकुल बच्चा बना कर रखा है. अब मैं बड़ी हो गई हूं. अपना ध्यान रख सकती हूं. अब उस नादान को क्या समझाएं कि मातापिता के लिए तो बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं. चाहे वे कितने भी बड़े क्यों न हो जाएं.

हां, मेरी तरह शायद जज साहब से वह इतना कुछ नहीं कह पाती. उन की लाडली, सिर चढ़ी जो है. जो बात मनवानी होती है, मनवा ही लेती है. बात तो शायद मैं भी उस की मान ही लेती हूं लेकिन उसे बहुत कुछ समझाबुझा कर, जिस से वह मुझ से खीझ सी जाती है.

अब क्या करूं, जब मुझे इस तरह के आधुनिक तौरतरीके पसंद नहीं आते तो. मैं तो हर बार इसे ही तरजीह देती हूं कि वह अपने पापा के संग ही आए. दोनों बापबेटी के शौकमिजाज एक से हैं. कितनी ही देर मौल में घुमवा लो, दोनों में से कोई पहल नहीं करता घर चलने की. मैं भी कभीकभी बस फंस ही जाती हूं. जैसे आज वह नहीं वक्त निकाल पाए. कोर्ट में कुछ जरूरी काम था.

मैं थोड़ी देर तक यों ही एक दुकान से दूसरी दुकान में टहलती रही. खरीदारी तो वैसे भी मुझे कुछ यहां करनी नहीं होती है. वह तो मैं हमेशा अपने शहर की कुछ चुनिंदा दुकानों से ही करती हूं. सरकारी गाड़ी में अर्दलियों और सिपाहियों के संग रौब से जाओ और बस, रौब से वापस आ जाओ. सामान में कोई कमी हो तो चाहे महीने भर बाद दुकान पर पटक आओ. यहां मौल में, इतनी भीड़ में किस को किस की परवा है, कौन पहचान रहा है कि जज की बीवी शौपिंग कर रही है या कोई और. शायद इतने सालों से इसी माहौल की आदी हो गई हूं और कुछ अच्छा ही नहीं लगता.

खैर समय तो गुजारना ही था. यों ही बेमतलब घूमते रहने से थकान सी भी होने लगी थी. घड़ी पर नजर डाली तो बस, आधा घंटा ही बीता था. सोचतेविचरते मैं मैकडोनाल्ड की तरफ आ गई. कार्य दिवस होने के बावजूद वहां इतनी भीड़ थी कि बस, लगा कालिज बंक कर के सब बच्चे यहीं आ गए हों. माहौल को देख कर मिशिका का खयाल फिर दिलोदिमाग पर छा गया कि पता नहीं, यह क्या मौलवौल में पार्टी करने का प्रचलन हो गया है. अरे, तसल्ली से घर में मित्रों को बुलाओ, खूब खिलाओपिलाओ, मौजमस्ती करो, कोई मनाही थोड़े ही है.

थोड़ी देर में ही सही, मेरा भी कौफी का नंबर आ ही गया था. कौफी और फ्रेंचफ्राइज ले कर भीड़ से बचतेबचाते मैं एक खाली सीट पर जा कर बैठ गई और अपने चारों तरफ देखती कौफी का सिप भरती जा रही थी.

तभी मेरे पास एक बड़ी स्मार्ट सी महिला आईं और खाली पड़ी सीट की ओर इशारा कर बोलीं, ‘‘क्या मैं यहां बैठ सकती हूं?’’

‘‘हांहां. क्यों नहीं…आप चाहें तो यहां बैठ सकती हैं,’’ इतना कहने के साथ ही मेरी इधरउधर की सोच पर वर्तमान ने बे्रक लगा दिया.

मैं उस संभ्रांत महिला को कौफी पीतेपीते देखती रही. उस ने कांजीवरम की भारी सी साड़ी पहन रखी थी. उसी से मेल खाता खूबसूरत सा कोई नैकलेस डाल रखा था. पर्स भी उस के हाथ में बहुत सुंदर सा था. कुल मिला कर वह हाइसोसाइटी की दिख रही थी.

मुझ से रहा नहीं गया. अटपटा सा लग रहा था कि उस के सामने मैं फे्रंचफ्राइज का मजा अकेले ही ले रही थी और वह सिर्फ कौफी ले कर बैठी थी. संकोच छोड़ मैं ने अपने चिप्स उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अकेले ही शौपिंग हो रही है…’’

अपने होंठों पर हलकी सी हंसी ला कर वह बोलीं, ‘‘शौपिंग नहीं, आज तो अपने बेटे के संग आई हूं. दरअसल, आज बच्चों की गेटटूगेदर है. मेरे पति रिटायर्ड आई.ए.एस. हैं. यहीं सेक्टर 30 में हमारा छोटा सा घर है. पति तो अपनी ताशमंडली में व्यस्त रहते हैं और मैं बस, कभी क्लब, कभी किटी और कभी समाज- सेवा…रिटायर होने के बाद कहीं न कहीं तो अपने को व्यस्त रखना ही पड़ता है न.’’

‘‘आज मेरा छोटा बेटा समर्थ बोला कि ममा, मेरे संग मौल चलिए, आप को अच्छा लगेगा. सो आज यहां का कार्यक्रम बना लिया,’’ उस ने दोचार फ्रेंचफ्राइज बिना किसी झिझक के उठाते हुए बताया.

हम समझ गए थे कि हमारे बच्चे एक ही ग्रुप में हैं. थोड़ी देर में ही हम सहज हो क र बातें करने लगे. कुछ अपने परिवार के बारे में वह बता रही थीं और कुछ मैं. बीचबीच में हम खानेपीने की चीजें भी मंगाते जा रहे थे. अब किसी के संग रहने से अच्छा लगने लगा था. बातोंबातों में ही पता चला कि उन के 2 बेटे थे. छोटा समर्थ, मिशिका के संग पढ़ रहा था और बड़ा पार्थ इंजीनियरिंग के बाद पिछले साल सिविल सर्विस में सिलेक्ट हो गया था. इस समय लाल बहादुर शास्त्री एकेडमी, मसूरी में उस की टे्रनिंग चल रही थी.

मैं ने सोचा कि बापबेटा दोनों आईएएस. शुरू में ही मुझे लग गया था कि मेरी तरह यह महिला कोई ऊंची हस्ती है.

उन का बेटा आईएएस है और जल्दी ही वह उस की शादी करने की इच्छुक हैं, यह जान कर तो मेरी रुचि उन में और भी बढ़ गई. मैं तो खुद मिशिका के लिए अच्छा वर ढूंढ़ने की कोशिश में थी और एक आईएएस लड़के को अपना दामाद बनाना तो जैसे मेरे ख्वाबों में ही था.

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