जानें क्या है डबल बर्डन सिंड्रोम

प्रसव के डेढ़ महीने ही बीते थे कि मोनिका ने औफिस जाना शुरू कर दिया. अगले 6 महीनों तक घर पर बच्चे की देखभाल मोनिका की गैरमौजूदगी में कभी उस की सास तो कभी उस की मां करती रहीं. मगर बच्चे के साल भर के होते ही दोनों ने ही अपनीअपनी मजबूरी के चलते बच्चे को संभालने में आनाकानी शुरू कर दी.

अब बच्चे को क्रेच में डालने के अलावा मोनिका के पास और कोई रास्ता नहीं बचा था. वह जौब नहीं छोड़ना चाहती थी. मगर बच्चे को भी क्रेच में डाल कर खुश नहीं थी. औफिस में काम के दौरान कई बार उस का मन बच्चे की ओर चला जाता तो वहीं घर में बच्चे के साथ रहने पर उसे औफिस में अपनी खराब होती परफौर्मैंस का एहसास होता.

दोनों जिम्मेदारियों के बीच मोनिका पिसती जा रही थी. चिड़चिड़ाहट और घबराहट के कारण काम करने में उस से गलतियां होने लगी थीं. घर वालों के ताने और बौस की डांट धीरेधीरे मोनिका को डबल बर्डन सिंड्रोम जैसी मानसिक बीमारी का शिकार बना रही थी. एक समय ऐसा भी आया जब मोनिका खुद को बच्चे और अपने बौस का अपराधी समझने लगी. आखिरकार उस ने जौब छोड़ दी और गृहिणी बन कर बच्चे की परवरिश में जुट गई.

क्या कहता है सर्वे

मोनिका जैसी हजारों महिलाएं हैं, जो अच्छे पद, अच्छी आमदनी होने के बावजूद प्रसव के बाद या तो बच्चे और औफिस की दोहरी जिम्मेदारी निभाते हुए डबल बर्डन सिंड्रोम की शिकार हो जाती हैं या फिर अपने कैरियर से समझौता कर के घर और बच्चे तक खुद को सीमित कर लेती हैं.

केली ग्लोबल वर्कफोर्स इनसाइट सर्वे के अनुसार, शादी के बाद लगभग 40% भारतीय महिलाएं नौकरी छोड़ देती हैं वहीं 60% महिलाएं मां बनने के बाद बच्चे की परवरिश को अधिक महत्त्व देती हैं और नौकरी छोड़ देती हैं. इस के अतिरिक्त 20% महिलाएं जो घर और नौकरी दोनों जिम्मेदारियां निभा रही होती हैं, वे कभी न कभी जिम्मेदारियों के बोझ तले दब कर डबल बर्डन सिंड्रोम की शिकार हो जाती हैं.

इस बाबत एशियन इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस की मनोचिकित्सक डाक्टर मीनाक्षी मनचंदा का कहना है, ‘‘भारतीय समाज है ही ऐसा. यहां महिला सशक्तीकरण की बड़ीबड़ी बातें की जाती हैं, मगर महिलाएं जब सशक्त  होने का प्रयास करती हैं, तो यही समाज उन्हें परिवार की जिम्मेदारी की बेडि़यों में जकड़ देता है.’’

पुष्पावती सिंघानियां रिसर्च इंस्टिट्यूट की मनोचिकित्सक डाक्टर कौस्तुबि शुक्ल का मानना है, ‘‘यह सिंड्रोम महिला और पुरुष दोनों को होता है. मगर भारत में इस सिंड्रोम की शिकार अधिकतर महिलाएं ही होती हैं. इस की बड़ी वजह यहां की संस्कृति है, जो कहती है कि महिलाएं अपने पेशेवर जीवन में कितनी भी उन्नति कर लें, मगर घर के प्रमुख कार्यों की जिम्मेदारी उन्हें ही संभालनी होगी. हालांकि नौकरों और आधुनिक तकनीकों की मदद से जिम्मेदारियों का बोझ कुछ हद तक हलका हो जाता है, मगर बच्चा होने के बाद इन जिम्मेदारियों का स्वरूप बदल जाता है. आधुनिक तकनीक और नौकरों के साथ मातापिता को खुद भी बच्चे की देखभाल में समय देना पड़ता है. इस स्थिति में भी बच्चे की जिम्मेदारी मां पर डाल दी जाती है और पिता खुद को आर्थिक मददगार बनने की बात कह कर बचा लेता है.’’

मगर सवाल यह उठता है कि इस से फायदा क्या है? देखा जाए तो घर के किसी सदस्य के नौकरी छोड़ने पर परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होने के स्थान पर कमजोर ही होती है. वहीं जिम्मेदारियों का सही बंटवारा परिवार की आर्थिक जरूरतों में रुकावट भी पैदा नहीं होने देता और महिलाओं को इस सिंड्रोम का शिकार होने से भी बचा लेता है. मगर अब दूसरा सवाल यह उठता है कि जिम्मेदारियों का बंटवारा हो कैसे?

सास के साथ सही साझेदारी

मनोचिकित्सक मीनाक्षी कहती हैं, ‘‘आर्थिक मददगार तो महिलाएं भी बन सकती हैं. वर्तमान समय में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जहां महिलाओं ने पुरुषों के वर्चस्व को न तोड़ा हो.  मगर घरेलू काम में पतियों से सहायता लेना आज भी महिलाओं के लिए एक चुनौती बना हुआ है.  खासतौर पर उन घरों में जहां रिश्तेदारों का दखल ज्यादा होता है.’’

रिश्तेदारों की इस सूची में सब से पहले लड़के की मां का नाम आता है. घर के कामकाज में बेटे और बहू की हिस्सेदारी का वर्गीकरण भी यही मुहतरमा करती हैं, जिस में बच्चे के कामकाज से बेटे का कोई लेनादेना नहीं होता. बहू नौकरीपेशा है तब भी बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी उसी की है. भले ही बहू की घर पर गैरमौजूदगी में सास बच्चे की देखरेख कर भी लें, मगर इस बात को सुनहरे शब्दों में बहू पर जताने से भी वे पीछे नहीं हटतीं.

मीनाक्षी का मानना है कि इन स्थितियों में महिलाओं को थोड़ी सूझबूझ दिखानी चाहिए. सब का अपनाअपना स्वभाव होता है, मगर सास के साथ बहू की सही साझेदारी ऐसे मौकों पर बहुत काम आ सकती है. यह बात तो पक्की है कि रूढिवादी सोच वाली सास बेटे को भले ही घर के काम न करने दें, मगर बहू से सही तालमेल बैठा कर घर की कुछ जिम्मेदारियां वे खुद संभाल लेती हैं. यहां जरूरत है कि महिलाएं सास पर थोड़ा विश्वास करें. उन की दिल को चुभने वाली बातों को अनसुना कर दें. रिश्तों में थोड़ा तालमेल बैठा कर चलें ताकि घर और कार्यस्थल दोनों ही स्थानों पर अच्छी परफौर्मैंस दे सकें.

पार्टनर से बात करें

सास के साथ ही अपने पति को भी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के बारे में बताएं. दरअसल, भारतीय समाज की इस रूढिवादी मानसिकता के चलते ही कई औरतें स्वीकार कर लेती हैं कि सहूलत से यदि बच्चे की देखभाल और नौकरी के बीच संतुलन बैठाया जा सकता है, तो ठीक है नहीं तो मानसिक तौर पर वे खुद को नौकरी छोड़ने और बच्चे को अच्छी परवरिश देने के लिए तैयार कर लेती हैं.

इस बाबत डाक्टर कौस्तुबि कहती हैं,  ‘‘आजकल महिलाएं शादी से पूर्व अपने कैरियर को अधिक महत्त्व देती हैं. फिर अब शादी भी

देर से ही होती है. ऐसे में महिलाओं की रीप्रोडक्टिव लाइफ छोटी हो जाती है. उन्हें यह फैसला जल्दी लेना पड़ता है कि वे मां कब बनना चाहती हैं.  अब यदि यह कहा जाए कि कैरियर के लिए मां बनने की ख्वाहिश ही छोड़ दें, तो शायद यह सही नहीं होगा. लेकिन मां बनने के लिए नौकरी छोड़ दें, यह भी कोई हल नहीं है. इसलिए महिलाओं को अपने पार्टनर से पहले ही अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का जिक्र कर लेना चाहिए और उस के हिसाब से भविष्य की प्लानिंग करनी चाहिए.’’

आज का दौर पढ़ेलिखों का है. पतिपत्नी इस बात को बखूबी समझते हैं कि महंगाई के इस जमाने में दोनों की कमाई से ही परिवार रूपी गाड़ी खींची जा सकती है. इसलिए आपस में समझौता कर लेना ही सही निर्णय है. इस समझौते में बहुत सारी बातों का जिक्र किया जा सकता है, जो महिलाओं को दोहरी जिम्मेदारी के बोझ और बेरोजगारी दोनों से बचा सकता है.

मनोचिकित्सक कौस्तुबि ऐसे ही कुछ समझौतों के बारे में बताती हैं:

– आज के वर्क कल्चर में शिफ्ट में काम करना चलन में है और यह गलत भी नहीं है.  नौकरीपेशा दंपती अपनी सहूलत के हिसाब से शिफ्ट का चुनाव कर सकते हैं और बारीबारी से अपनी जिम्मेदारियों को निभा सकते हैं.

– यदि कंपनी में वर्क फ्रौम होम की सुविधा है, तो कभीकभी पतिपत्नी इस सुविधा का फायदा भी उठा सकते हैं. इस से घर और कार्यालय दोनों का ही काम बाधित नहीं होता.

– कुछ कार्यक्षेत्रों में फ्रीलांसिंग काम भी किया जा सकता है और इस में भी अच्छी आमदनी की गुंजाइश होती है. पति या पत्नी में से कोई एक अपनी फुलटाइम नौकरी छोड़ कर फ्रीलांसिंग में भी हाथ आजमा सकता है.

दांपत्य जीवन में थोड़ी सूझबूझ से फैसले लिए जाएं, तो आपसी मनमुटाव डबल बर्डन सिंड्रोम से बचा जा सकता है.

क्या मुझ में मां बनने में कोई कमी है?

सवाल

मैं 21 वर्षीय युवती हूं. अपने बौयफ्रैंड के साथ 1 साल से कई बार शारीरिक संबंध बना चुकी हूं पर मुझे कभी संतुष्टि प्राप्त नहीं हुई. मैं जानना चाहती हूं कि क्या मुझ में कोई कमी है और क्या मैं भविष्य में मां बन पाऊंगी या नहीं?

जवाब

सहवास के दौरान आनंदानुभूति न होने की मुख्य वजह सैक्स के प्रति आप की अनभिज्ञता ही है. जहां तक संतानोत्पत्ति का प्रश्न है तो उस का इस से कोई संबंध नहीं है. पीरियड के तुरंत बाद के कुछ दिनों में पति पत्नी समागम के बाद स्त्री गर्भ धारण कर लेती है, बशर्ते दोनों में से किसी में कोई कमी न हो. इसलिए आप कोई पूर्वाग्रह न पालें.

पर विवाह से पहले किसी से संबंध बनाना किसी भी नजरिए से उचित नहीं है. अत: इन संबंधों पर तुरंत विराम लगाएं वरना पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा.

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सैक्स से शर्म कैसी

तान्या की शादी तय हो गई थी और उस की विवाहित सहेलियां जबतब उसे छेड़ती रहती थीं. कभी सुहागरात की बात को ले कर, तो कभी पति के साथ हनीमून पर जाने की बात को ले कर. उन की बातें सुन कर अगर एक तरफ तान्या के शरीर में सिहरन दौड़ जाती, तो दूसरी ओर वह यह सोच कर सिहर जाती कि आखिर कैसे वह सैक्स संबंधों का मजा खुल कर ले पाएगी?

उसे तो सोचसोच कर ही शर्म आने लगती थी. आज तक वह यही सुनती आई थी कि सैक्स संबंधों के बारे में न तो खुल कर बात करनी चाहिए, न ही उसे ले कर उत्सुकता दिखानी चाहिए. पति के सामने शर्म का एक परदा पड़ा रहना आवश्यक है. नहीं तो पता नहीं वह क्या सोचे. दूसरी ओर उसे यह डर भी सता रहा था कि कहीं उस के पति को उस की देहयष्टि में कोई कमी तो महसूस नहीं होगी?

कितनी बार तो वह शीशे के सामने जा कर खड़ी हो जाती और हर कोण से अपने शरीर का मुआयना करती. पता नहीं, उस की फिगर ठीक है भी कि नहीं. कभी वह शरीर के गठन को ले कर कौंशस हो जाती, तो कभी यह सोच कर परेशान हो उठती कि पता नहीं वह अपने पति के साथ मधुर संबंध बना भी पाएगी या नहीं.

कहां से उपजती है शर्म

तान्या जैसी अनेक लड़कियां हैं, जो सैक्स को शर्म के साथ जोड़ कर देखती हैं, जिस की वजह से इस सहजस्वाभाविक प्रक्रिया व आवश्यकता को ले कर कई बार उन के मन में कुंठा भी पैदा हो जाती है. सैक्स के प्रति शर्म की भावना हमारे भीतर से नहीं वरन हमारे परिवेश से उत्पन्न होती है.

यह हमारे परिवारों से आती है, हमारी सांस्कृतिक व धार्मिक परंपराओं से आती है, फिर हमारे मित्रों व हमारे समुदाय से हम तक पहुंचती है. आगे चल कर हम एक तरफ तो उन चित्रों और संदेशों को देख कर यह सीखते हैं जो हैं कि सैक्स एक सुखद एहसास है और जीवन में खुश रहने के लिए सफल सैक्स जीवन एक अनिवार्यता है तो दूसरी ओर उन संदेशों के माध्यम से सैक्स को शर्म से जोड़ कर देखते हैं, जो बताते हैं कि सैक्स संबंध बनाना गलत व एक तरह का पाप है. 

समाजशास्त्री कल्पना पारेख मानती हैं कि ज्यादातर ऐसा उन स्थितियों में होता है, जब लड़कियां यौन शोषण का शिकार होती हैं. सैक्स से संबंधित कोई भी मनोवैज्ञानिक, शारीरिक या भावनात्मक शोषण उस के प्रति अनासक्ति तो पैदा कर ही देता है, साथ ही अनेक वर्जनाएं भी लगा देता है.

जुड़ी हैं कई भ्रांतियां

शर्म इसलिए भी है क्योंकि हमारे समाज में सैक्स एक टैबू है और उस के साथ हमेशा कई तरह की भ्रांतियां जुड़ी रही हैं. अगर एक स्वाभाविक जरूरत की तरह कोई लड़की इस की मांग करे, तो भी शर्म की बात है. इस के अलावा सैक्स संबंधों को ले कर लड़कियों के मन में यह बात डाल दी जाती है कि इस के लिए उन का शरीर सुंदर और अनुपात में होना चाहिए.

ऐसे में जब तक वे युवा होती हैं समझ चुकी होती हैं कि उन का शरीर कैसा लगना चाहिए और जब उन का शरीर उस से मेल नहीं खाता, तो उन्हें शर्मिंदगी का एहसास होने लगता है. मैत्रेयी का विवाह हुए 1 महीना हो गया है, पर वह अभी भी पति के साथ संबंध बनाने में हिचकिचाती है. वजह है, उस का सांवला और बहुत अधिक पतला होना. उसे लगता है कि पति उस की रंगत और पतलेपन को पसंद नहीं करेंगे, इसलिए वह उन के निकट जाने से घबराती है. 

पति जब नजदीक आते हैं, तो वह कमरे में अंधेरा कर देती है. अपने शरीर के आकार को ले कर वह इतनी परेशान रहती है कि सैक्स संबंधों को ऐंजौय ही नहीं कर पाती है.

मनोवैज्ञानिक संध्या कपूर कहती हैं कि सैक्स के प्रति शर्म पतिपत्नी के बीच दूरियों की सब से बड़ी वजह है. पत्नी कभी खुले मन से पति के निकट जा नहीं पाती. फिर वे संबंध या तो मात्र औपचारिकता बन कर रह जाते हैं या मजबूरी. उन में संतुष्टि का अभाव होता है. यह शर्म न सिर्फ औरत को यौन आनंद से वंचित रखती है, वरन प्यार, सामीप्य व साहचार्य से भी दूर कर देती है. 

न छिपाएं अपनी इच्छाएं

यह एक कटु सत्य है कि भारतीय समाज में औरतों की यौन इच्छा को महत्त्व नहीं दिया जाता है. वे सैक्स को आनंद या जरूरत मानने के बजाय उसे विवाह की अनिवार्यता व बच्चे पैदा करने का जरिया मान कर या तो एक दिनचर्या की तरह निभाती हैं या फिर संकोच के चलते पति से दूर भागती हैं. उन की सैक्स से जुड़ी शर्म की सब से बड़ी वजह यही है कि बचपन से उन्हें बताया जाता है कि सैक्स एक वर्जित विषय है, इस के बारे में उन्हें बात नहीं करनी चाहिए. 

‘‘ऐसे में विवाह के बाद सैक्स के लिए पहल करने की बात तो कोई लड़की सोच भी नहीं पाती. इस की वजह वे सामाजिक स्थितियां भी हैं, जो लड़की की परवरिश के दौरान यह बताती हैं कि सैक्स उन के लिए नहीं वरन पुरुष के ऐंजौय करने की चीज है. जबकि संतुष्टिदायक सैक्स संबंध तभी बन सकते हैं, जब पतिपत्नी दोनों की इस में सक्रिय भागीदारी हो और वे बेहिचक अपनी बात एकदूसरे से कहें,’’ कहना है संध्या कपूर का.

संकोच न करें

सैक्स का शर्म से कोई वास्ता नहीं है, क्योंकि यह न तो कोई गंदी क्रिया है न ही पतिपत्नी के बीच वर्जित चीज. बेहतर होगा कि आप दोनों ही सहज मन से अपने साथी को अपनाते हुए सैक्स संबंधों का आनंद उठाएं. इस से वैवाहित जीवन में तो मधुरता बनी ही रहेगी, साथ ही किसी तरह की कुंठा भी मन में नहीं पनपेगी. पति का सामीप्य और भरपूर प्यार तभी मिल सकता है, जब आप उसे यह एहसास दिलाती हैं कि आप को उस की नजदीकी अच्छी लगती है. 

आंखों में खिंचे शर्म के डोरे पति को आप की ओर आकर्षित करेंगे, पर शर्म के कारण बनाई दूरी उन्हें नागवार गुजरेगी. मन में व्याप्त हर तरह की हिचकिचाहट और संकोच को छोड़ कर पति के साहचर्य का आनंद उठाएं.          

सफल सैक्स एक अनिवार्यता है

  1. विशेषज्ञों द्वारा किए गए कई शोधों से यह साबित हो चुका है कि सैक्स एक नैसर्गिक प्रक्रिया है और इस से न सिर्फ वैवाहिक जीवन में मधुरता बनी रहती है, बल्कि शरीर स्वस्थ और मन प्रसन्न रहता है.
  2. धार्मिक आडंबरों में फंस कर सैक्स को बुरी नजर से देखना गलत है. हकीकत में हमारी उत्पत्ति ही इसी की देन है.
  3. सैक्स सुरक्षित और साथी की सहमति से करना चाहिए.
  4. सैक्स में असंतुष्टि अथवा शर्म से दांपत्य संबंधों में मौन पसर सकता है. इसलिए इस पर खुल कर बात करें और इसे भरपूर ऐंजौय करें.
  5. नीमहकीम या झोलाछाप डाक्टरों के चक्कर में फंस कर सैक्स जीवन प्रभावित हो सकता है. इन से दूर रहें.
  6. सैक्स में निरंतरता के लिए मानसिक मजबूती व भावनात्मक संबंध जरूरी है.

पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी लें सेक्स का आनंद

‘‘और्गेज्म क्या होता है? क्या यह सैक्स से जुड़ा है? मैं ने तो कभी इस का अनुभव नहीं किया,’’ मेरी पढ़ीलिखी फ्रैंड ने जब मुझ से यह सवाल किया तो मैं हैरान रह गई.‘‘क्यों, क्या कभी तुम ने पूरी तरह से सैक्स को एंजौय नहीं किया?’’ मैं ने उस से पूछा तो वह शरमा कर बोली, ‘‘सैक्स मेरे एंजौयमैंट के लिए नहीं है, वह तो मेरे पति के लिए है. सब कुछ इतनी जल्दी हो जाता है कि मेरी संतुष्टि का तो प्रश्न ही नहीं उठता है, वैसे भी मेरी संतुष्टि को महत्त्व दिया जाना माने भी कहां रखता है.’’

यह एक कटु सत्य है कि आज भी भारतीय समाज में औरत की यौन संतुष्टि को गौण माना जाता है. सैक्स को बचपन से ही उस के लिए एक वर्जित विषय मानते हुए उस से इस बारे में बात नहीं की जाती है. उस से यही कहा जाता है कि केवल विवाह के बाद ही इस के बारे में जानना उस के लिए उचित होगा. ऐसा न होने पर भी अगर वह इसे प्लैजर के साथ जोड़ती है तो पति के मन में उस के चरित्र को ले कर अनेक सवाल पैदा होने लगते हैं. यहां तक कि सैक्स के लिए पहल करना भी पति को अजीब लगता है. इस की वजह वे सामाजिक स्थितियां भी हैं, जो लड़कियों की परवरिश के दौरान यह बताती हैं कि सैक्स उन के लिए नहीं वरन पुरुषों के एंजौय करने की चीज है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

कुछ ऐसे करें नाखूनों की देखभाल

आजकल बड़े और लंबे नाखूनों का चलन है. ये रंग-बिरंगे, अलग-अलग आकार और विभिन्न सलीके से तराशे हुए नाखून, आपकी सुंदरता में चार चाँद लगा देते हैं. ये आपके हाथों की खूबसूरती बढ़ाने के साथ, आपके व्यक्तित्व में भी एक निखार लेकर आते हैं.

आपकी इस सुंदरता को बरकरार रखने के लिये ये जरूरी है कि आप अपने नाखूनों को अच्छे तरीके से काटें और उन्हें साफ रखें. कुछ युवतियों के नाखून जरुरत से ज्यादा मुलायम हो जाते हैं, इस कारण किसी भी तरह की चोट लग जाने से या जरा साभी मुड़ने पर भी वो टूट सकते हैं.

आज हम आपको कुछ उपायों को बताने जा रहे हैं. इन सारे उपायों को ध्यान में रखकर आप अपने  नाखूनों की सुंदरता को और निखार सकते हैं और ज्यादा आकर्षक बना सकते हैं..

नाखूनों का आकार

अगर आपको भी लंबे नाखून रखने के शौक है तो नाखूनों को आकार देने से पहले आपको ये बात मालूम होनी चाहिए कि आपके अंगुलियों के पोरों की बनावट कैसी है. अपने पोरों की बनावट के अनुसार आप नाखून काटें और उसी के अनुसार इन्हें आकार भी दें.

नाखूनों की सफाई

आपके नाखूनों को काटने और सुंदर बनाने हेतू तराशने से भी पहले जरुरी है कि आपके नाखून स्वच्छ और निरोगी रहें. इसीलिए उन्हें साफ रखना बेहद आवश्यक है. अपने नाखूनों में गंदगी जैसे काले मैल को जमने न दें. अगर आप कभी अपने नाखूनों में गंदगी के निशान देखते हैं तो इनकी तह में जमें मैल को किसी ब्रश या पतली सींक में रूई लगाकर, इनकी मदद से सफाई करते रहे.

नाखूनों को मजबूत रखने के लिये

कई बार आपके नाखून बहुत कमजोर हो जाते हैं. नाखूनों को मजबूत रखने औऱ टूटने से बचाने के लिये रोजा उन्हें पाँच मिनट तक मिट्टी के तेल में डुबो कर रखना चाहिए. कुछ दिनों ऐसा करने से नाखून कड़े होते हैं. इसके अलावा हर रोज फिटकरी के पानी से अपने हाथों और नाखूनों की मालिश करने से भी आपके नाखून सख्त और मजबूत होते हैं.

नाखूनों के बीच दरार

कई बार आपने भी देखा होगा कि कुछ लोगों के नाखूनों के बीच में एक दरार आ जाती है. आपके नाखूनों के बीच भी अगर दरार है तो ऐसा आपके शरीर में विटामिन-ए की कमी होने के कारण होता है. इसीलिए आपको अपने भोजन में विटामिन-ए की उचित मात्रा लेनी चाहिये. अपने प्रतिदिन के भोजन में उन सभी फलों और सब्जियों को शामिल करें जिनमें विटामिन-ए प्रचुर मात्रा में पाया जाता है.

इसके अलावा अपने हाथो और नाखूनों को जैतून के तेल से मालिश करना चाहिए. जैतून के तेल की मालिश आपके नाखूनों की सुंदरता को बढ़ाने में फायदेमंद होती है.

स्वस्थ नाखून

स्वस्थ नाखूनों के लिये एक-दो महीने तक लगातार कैल्शियम और प्रोटीन की नियमित मात्रा का सेवन करना चाहिए. ऐसा इसीलिए करना चाहिए क्योंकि इससे नाखून जल्दी नहीं टूटते.

नाखून कैसे काटें

अगर आपके नाखून थोड़े सख्त हैं तो अपने नाखूनों को काटने से पहले उन्हें थोड़ी देर गरम पानी में डुबो कर रखें, इसके बाद जब कड़े नाखून नरम हो जाऐं तब उन्हें अपने मनचाहे आकार में काटें.

Travel Special: प्रकृति का खूबसूरत तोहफा है ‘मालशेज घाट’

हर मौसम में खूबसूरत मालशेज घाट प्रकृति प्रेमियों, ट्रैकर्स, साहसिक पर्यटन प्रेमियों सभी को समान रूप से लुभाता है. शहर की हलचल से दूर मात्र साढ़े तीन घंटे की यात्रा के बाद अप्रतिम सौंदर्य से परिपूर्ण प्रकृति की गोद में स्वयं को पाना एक कौतूहलपूर्ण आश्चर्य लगता है, मगर मालशेज घाट की यही खासियत है. मुंबई से आधी दूरी तय करने के बाद से ही आप छोटे-छोटे झरने, जलप्रपात, हरे-भरे खेत, पर्वतश्रेणियां, काले अंगूर, केले आदि के फार्म, खूबसूरत जंगल व झील आदि का नजारा लेते हुए यहां पहुंचते हैं.

यह एक ऐसा पर्वतीय स्थल है, जहां किसी भी मौसम में जाइए आप प्रकृति के रंग-रूप देख मुग्ध हो जाएंगे और यहां की खूबसूरती में खो जाएंगे. मगर मॉनसून में यहां का सौंदर्य देखते ही बनता है, बादल आपके संग चलते हुए प्रतीत होंगे.

महाराष्ट्र के पुणे जिले के पश्चिमी घाटों की श्रेणी में स्थित है प्रसिद्ध मालशेज घाट. समुद्र तल से 700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मालशेज एक बेहद आकर्षक पर्वतीय पर्यटन स्थल है, जो आम पर्यटकों के अलावा प्रकृति प्रेमियों, हाईकर्स, ट्रैकर्स एवं इतिहासकारों को समान रूप से लुभाता है. वीकेंड या दो-तीन दिन की यात्रा के बाद आप कई महीनों तक अपने को तरोताजा महसूस करेंगे.

मालशेज घाट में ठहरने के लिए यहां सबसे ऊंचाई पर महाराष्ट्र पर्यटन विभाग का गेस्ट हाउस भी एक बेहतरीन जगह पर है. गेस्ट हाउस के परिसर में घूमते हुए आप पर्वतों एवं घाटियों के सौंदर्य का आनंद ले सकते हैं. परिसर के पीछे अनेक हिल प्वाइंट, जैसे-कोंकण, वाटर रिवर्स प्वाइंट, हरिश्चंद्र प्वाइंट, कालू आई प्वाइंट, मालशेज प्वाइंट आदि बने हुए हैं और उसके पीछे सघन वन है. यहां से नीचे की ओर गहरी घाटियों को और मई से सितंबर महीनों में अनेक जलप्रपातों के सौंदर्य को निहारा जा सकता है.

मालशेज घाट और इसके आसपास भीम नदी प्रवाहित होती है. यहां की झीलों में और आसपास सफेद एवं नारंगी फ्लेमिंगो को देखना एक अनूठा अनुभव है, जो दूसरी जगह दुर्लभ है. इसी प्रकार और भी कई खूबसूरत प्रवासी पक्षी यहां की प्रकृति में रमने के लिए आते हैं. मालशेज घाट कोंकण और डक्कन के पठार को जोडऩे वाला सबसे पुराना मार्ग है, इसलिए यह विश्वास किया जाता है कि बौद्ध भिक्षुओं ने यहां थोड़ी दूरी पर स्थित लेनयाद्री में गुफा मंदिरों का निर्माण कराया.

मालशेज घाट के आसपास मात्र एक घंटे की ड्राइव के बाद कई आकर्षक स्थल हैं. इनमें अष्टविनायक मंदिर, शिवाजी की जन्म स्थली, नैने घाट, जीवधन और कुछ जल प्रपात प्रमुख हैं.

शिवनेरी

सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि भारत के इतिहास में भी शिवनेरी का विशेष स्थान है, क्योंकि यह महाराज शिवाजी की जन्मस्थली है. सैकड़ों खड़ी चट्टानी सीढ़ियां चढ़ने के बाद इस स्थान पर पहुंचना भी एक उपलब्धि है. यहां एक छोटा कमरा है, जहां शिवाजी का जन्म हुआ था. यहां पर उनका पालना सुरक्षित रखा गया है. इसे

कई लोग शिवाजी का मंदिर मानते हैं और एक तीर्थस्थल की तरह ही यहां भी कुछ लोग समूह में शिवाजी की जयकार करते हुए इतनी ऊंचाई तक पहुंचते हैं. शिवनेरी की बौद्ध गुफाएं तीसरी सदी की हैं.

हरिश्चंद्रगढ़

ट्रैकिंग के लिहाज से हरिश्चंद्रगढ़ का अपना महत्व है. यह काफी लंबा और कठिन ट्रैक भी है, इसलिए गर्मियों में यहां ट्रैकिंग नहीं करें, तो बेहतर होगा. यहां की ट्रैकिंग के लिए खिरेश्वर गांव उपयुक्त बेस माना जाता है. इसके अलावा, पचनाई और कोठाले को भी बेस बनाया जा सकता है.

जीवधन

जीवधन भी एक कठिन ट्रैकिंग रूट है. प्राचीन काल में नैनेघाट एक प्रमुख व्यापारिक मार्ग था और सुरक्षा की दृष्टि से यहां किलों का निर्माण किया गया था. यह क्षेत्र जीवधन, हदसर, महिषगढ़ और चावंड से सुरक्षित किया गया था. जीवधन वंदारलिंगी के कारण भी प्रसिद्ध है.

पिपलगांव जोग बांध

इस रमणीय स्थल में विविध सुंदर प्रवासी पक्षियों को देखने का मौका मिलता है. धवल नदी और घने वन से सुसज्जित यह स्थान पक्षी प्रेमियों के लिए बेहतरीन है.

कैसे पहुंचे?

रेलवे स्टेशन- मुंबई-कल्याण-घाटघर-मालशेज निकटतम रेलवे स्टेशन कल्याण (90 किमी.), थाणे (112 किमी.), पुणे (116 किमी.)

निकटतम हवाई अड्डा- पुणे (116 किमी.), मुंबई (136 किमी.)

प्रमुख शहरों से दूरियां- थाणे (112 किमी.), नवी मुंबई (130 किमी.), पुणे (116 किमी.), मुंबई (136 किमी.)

कब जायें?

उपयुक्त मौसम यहां की खासियत है कि पूरे साल खुशनुमा मौसम रहता है, मगर जून से सितंबर तक यहां घूमने का अलग ही रोमांच है.

मीडिया की इस रिपोर्ट के कारण Alia Bhatt को आया गुस्सा, कही ये बात

बॉलीवुड एक्ट्रेस आलिया भट्ट इन दिनों अपनी प्रैग्नेंसी के चलते सोशलमीडिया पर छाई हुई हैं. जहां फैंस और सेलेब्स एक्ट्रेस पर प्यार लुटा रहे हैं तो वहीं हाल ही में मीडिया की एक खबर ने एक्ट्रेस को नाराज कर दिया है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर….

आलिया ने कही ये बात

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शादी के 2 महीने बाद ही अपनी प्रैग्नेंसी की न्यूज फैंस को बताने वाली एक्ट्रेस ने हाल ही में एक मीडिया समूह को आड़े हाथ लिया है. एक एंटरटेनमेंट पोर्ट्ल की खबर पर एक्ट्रेस ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए सोशलमीडिया पर एक स्टोरी शेयर की है. दरअसल, एक रिपोर्ट ने दावा किया था कि एक्ट्रेस की प्रेग्नेंसी के चलते पति रणबीर कपूर उन्हें लेने के लिए यूके जाएंगे. हालांकि एक्ट्रेस ने पोर्ट्ल के पोस्ट को शेयर करते हुए लिखा, ‘हम आज भी उन लोगों के दिमाग में रहते हैं. जो कि कुछ पितृसत्तामक लोगों की दुनिया में रहते हैं. आपकी जानकारी के लिए… कुछ भी देरी से नहीं होने वाला है. किसी को किसी को लेकर आने की जरूररत नहीं हैं.  मैं एक औरत हूं एक पार्सल नहीं. मुझे बिल्कुल भी आराम करने की जरूरत नहीं है. लेकिन ये सुनकर अच्छा लगा कि आप सभी को डॉक्टर का सर्टिफिकेशन भी है.  ये 2022 है.  क्या हम कृप्या करके इस सोच की दुनिया से बाहर निकल सकते हैं.  अगर आप मुझे माफ करें तो मेरा शूट रेडी है. ‘

 

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शूटिंग के बीच सुनाई खुशखबरी

एक्ट्रेस आलिया भट्ट इन दिनों अपनी हॉलीवुड फिल्म की शूटिंग में बिजी है. वहीं इस दौरान ही उन्होंने अपनी प्रैग्नेंसी का खुलासा किया और फैंस का सोशलमीडिया के जरिए शुक्रिया भी अदा किया है. वहीं खबरों की मानें तो हॉलीवुड की फिल्म शूट करने के बाद वह रॉकी और रानी की प्रेम कहानी को भी पूरा करेंगी. इसके अलावा रणबीर कपूर की बात करें तो वह इन दिनों अपकमिंग फिल्म शमशेरा के प्रमोशन में बिजी हैं.

अनुज को अपना हक छीनते देख वनराज को आएगा गुस्सा, क्या करेगी Anupama

सीरियल अनुपमा में इन दिनों किंजल का गोदभराई सेलिब्रशन देखने को मिल रहा है. जहां शाह हाउस में कपाड़िया फैमिली की एंट्री हुई है तो वहीं वनराज-काव्या इस सेलिब्रेशन का हिस्सा नहीं बन पाए हैं, जिसके चलते वनराज का गुस्सा देखने को मिलने वाला है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे…

पाखी-अधिक की गहरी हुई दोस्ती

अब तक आपने देखा कि पाखी की अधिक से दोस्ती बढ़ती जा रही है, जिसके चलते अनुपमा परेशान लग रही है. वहीं  लीला को पाखी की हरकतों पर शक हो जाता है और वह उस पर नजर रखने की सोचती है. दूसरी तरफ राखी दवे गोदभराई में पहुंचती है. जहां बा और राखी दवे के बीच दोबारा तानों की शुरुआत हो जाती है.

बरखा पर बा मारेगी ताने

 

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अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि बरखा और पूरी कपाड़िया फैमिली शाह हाउस आएगी. जहां एक बार फिर बा, बरखा को ताना मारते हुए दिखेगी. इसी के साथ शाह हाउस में कपाड़िया परिवार की एंट्री होगी. हालांकि बा कदम-कदम पर बरखा को नीचा दिखाती नजर आएंगी. वहीं राखी दवे, बरखा का साथ देती दिखेगी. दरअसल, बा, बरखा को बैकलेस दादी कहकर बुलाएगी तो वहीं बरखा, शाह हाउस के छोटा होने पर बा को ताना मारती नजर आएगी. हालांकि अनुपमा पूरी बात संभालने की कोशिश करेगी.

 

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वनराज को आएगा गुस्सा

 

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इसके अलावा, आप देखेंगे कि किंजल की गोद भराई की रस्म में शुरु होंगी, जिसमें पूरा परिवार नाचता गाता नजर आएगा. वहीं बा, वनराज को सेलिब्रेशन की झलक दिखाएगी. इसी बीच राखी दवे बीच में आकर वनराज को ताना मारेगी कि अनुज ने किंजल की गोदभराई में उसकी यानी दादा की जगह ले ली है, जिसे सुनकर वनराज गुस्से में नजर आएगा. दूसरी तरफ राखी दवे, बरखा के साथ मिलकर कोई न कोई साजिश करती हुई नजर आएंगी, जिसके चलते देखना होगा कि अनुपमा कैसे गोदभराई को बर्बाद होने से बचाएगी.

ताकि ढलती उम्र में भी दिखें जवां

अपनी उम्र से कम दिखना भला कौन नहीं चाहता. अगर बात महिलाओं की की जाए, तो वे अपनी बढ़ती उम्र को छिपाने के लिए कुछ भी ट्राई करने से पीछे नहीं हटतीं.

तभी तो कौस्मैटिक इंडस्ट्री ने भी बढ़ती उम्र पर लगाम लगाने वाले कई उत्पाद बाजार में उपलब्ध कराए हैं. ये उत्पाद चेहरे पर उभरती उम्र की रेखाओं को छिपाने में महिलाओं की बड़ी मदद करते हैं. मगर यह जरूरी है कि इन उत्पादों का उपयोग करने से पहले महिलाओं को इन के सही इस्तेमाल के बारे में पूरी जानकारी हो वरना इन का त्वचा पर विपरीत असर भी देखने को मिल सकता है.

कौस्मैटोलौजिस्ट, अवलीन खोखर कहती हैं, ‘‘कौस्मैटिक प्रोडक्ट्स खूबसूरती को बढ़ाने के लिए होते हैं. इन से चेहरे की कमियों को सुधारा जा सकता है, लेकिन यह जरूरी है कि उन कमियों के बारे में पता हो और उन्हें किस उत्पाद से ठीक करना है, यह भी जानकारी हो वरना उम्र कम लगने की जगह ज्यादा लगने लगती है.’’

त्वचा को करें मेकअप के लिए तैयार

अवलीन के अनुसार त्वचा पर कोई भी कौस्मैटिक उत्पाद लगाने से पहले उस का प्रकार जानना बहुत जरूरी है, क्योंकि त्वचा के अुनरूप मेकअप उत्पाद का चुनाव करने पर ही सही लुक मिलता है. बाजार में ड्राई, औयली और कौंबिनेशन स्किन के लिए अलगअलग कौस्मैटिक उत्पाद उपलब्ध हैं. सही चुनाव के साथ मेकअप के लिए त्वचा को तैयार करना भी जरूरी है. यदि त्वचा को साफ किए बगैर मेकअप किया जाए तो गंदगी स्किन पोर्स के अंदर ही रह जाती है और मेकअप की लेयर पोर्स को बंद कर देती है. इस से संक्रमण का डर रहता है. इसलिए मेकअप से पहले त्वचा की क्लीनिंग, टोनिंग और मौइश्चाराइजिंग जरूर करें. इस से मेकअप में स्मूदनैस आती है.

बचें कंसीलर के इस्तेमाल से

कंसीलर का इस्तेमाल काले धब्बों को छिपाने के लिए किया जाता है. इसे चेहरे के केवल उन हिस्सों पर लगाया जाता है जहां काले धब्बे होते हैं. मगर कुछ महिलाएं इसे पूरे चेहरे पर लगा लेती हैं. ऐसा करने से चेहरे की झाइयां उजागर होने लगती है. अवलीन कहती हैं कि कंसीलर थिक होता है और जरा सा लगाने पर ही असर दिखा देता है. ज्यादा लगाने पर यह चेहरे पर लकीरें बना देता है. कुछ महिलाएं काले घेरों को छिपाने के लिए भी कंसीलर का इस्तेमाल करती हैं, जोकि गलत है, आंखों के नीचे कंसीलर हमेशा इनर कौर्नर पर ही लगाना चाहिए. ज्यादा कंसीलर लगाने पर आंखें अलग से चमकती दिखाई देती हैं, जिस से पता लग जाता है कि आंखों पर कंसीलर लगाया गया है.

न लगाएं ज्यादा फाउंडेशन

सब से पहले फाउंडेशन का चुनाव अपनी स्किन टाइप के हिसाब से करें. मसलन, नौर्मल त्वचा वाली महिलाएं जहां मिनरल बेस्ड या फिर मौइश्चराइजर युक्त फाउंडेशन का इस्तेमाल कर सकती हैं, वहीं ड्राई त्वचा के लिए हाइड्रेटिंग फाउंडेशन उचित रहेगा. फाउंडेशन सेम स्किन कलर टोन का ही लें वरना स्किन ग्रे दिखने लगेगी. औयली त्वचा के लिए पाउडर डबल फाउंडेशन का इस्तेमाल करना चाहिए. यह त्वचा को मैटीफाई करता है.

फाउंडेशन के सही चुनाव के साथ ही इस का सही इस्तेमाल भी बहुत जरूरी है. अमूमन महिलाएं पूरे चेहरे पर फाउंडेशन की परत चढ़ा लेती हैं, जो गलत है. फाउंडेशन को चेहरे पर लगाने का सही तरीका है कि जरा सा फाउंडेशन उंगली में ले कर डैब करते हुए अच्छी तरह चेहरे पर लगाया जाए. यह उम्र के साथ त्वचा में हुए डिस्कलरेशन को दूर करता है.

कौंपैक्ट से दें फिनिशिंग

बहुत सी महिलाएं फाउंडेशन के बाद कौंपैक्ट पाउडर नहीं लगातीं. अवलीन इसे मेकअप ब्लंडर मानती हैं. वे कहती हैं कि कौंपैक्ट पाउडर मेकअप को फिनिशिंग देता है. हां, इस का भी अधिक इस्तेमाल नहीं करना चाहिए वरना चेहरे पर लकीरें उभर आती हैं.

इस का चुनाव भी सावधानी से करना चाहिए. सब से पहले तो स्किन कलर टोन के हिसाब से ही शेड चुनें. अपनी स्किन टाइप का भी ध्यान रखें. मसलन, औयली त्वचा के लिए औयल कंट्रोल मैट फिनिशिंग वाला कौंपैक्ट पाउडर तो ड्राई स्किन के लिए क्रीमी कौंपैक्ट लें. यह त्वचा को हैल्दी लुक देता है. सैंसिटिव स्किन के लिए इमोलिएंट औयल एवं वैक्स युक्त कौंपैक्ट सब से अच्छा विकल्प होता है.

आई मेकअप करें ध्यान से

यंग दिखने के लिए बहुत जरूरी है कि आई मेकअप अच्छी तरह किया गया हो. अधिकतर महिलाओं को भ्रम होता है कि आंखों पर डार्क मेकअप करने से जवां लुक आ जाता है मगर अवलीन इसे भ्रम करार देते हुए कहती हैं कि  ‘एशियन स्किन कलर टोन पर अर्थी कलर नैचुरल लगते हैं. खासतौर पर उम्र को कम दिखाने में कौपर, ब्राउन और रस्ट कलर सब से अधिक कारगर हैं. आईशेड्स में इन रंगों का ही इस्तेमाल करना चाहिए. इस बात का भी ध्यान रखें कि क्रीमी आईशेड्स न चुनें, क्योंकि ये आंखों की झुर्रियों को छिपाने में सफल नहीं होते. आईशेड्स के साथ ही आईलाइनर भी ब्राउन ही चुनें.’

आंखों का मेकअप काजल और मसकारे के बिना अधूरा है. काजल आंखों को हाईलाइट करता है. आजकल स्मजप्रूफ काजल फैशन में है इसलिए अपने लिए यही काजल चुनें. मसकारा चुनते वक्त भी थोड़ी सावधानी बरतें. बढ़ती उम्र के साथ आईलैशेज झड़ने लगती हैं. गलत मसकारे से डाउन फाल बढ़ सकता है, वहीं हाइडे्रटिंग मसकारे से आईलैशेज को मजबूती मिलती है. सही मसकारा चुनने और इस के सही इस्तेमाल से ही जवां लुक पाया जा सकता है. इसलिए मसकारे को हमेशा अपर और लोअर लैशेज पर लगाएं. इस से आंखों को बहुत अच्छा लुक मिलता है.

लिपस्टिक के ब्राइट शेड्स चुनें

वैज्ञानिक तौर पर डार्क शेड्स किसी भी सरफेस को छोटा दिखाते हैं. मगर बात जब होंठों की आती है तो इस का विपरीत प्रभाव देखने को मिलता है. डार्क शेड होंठों को बड़ा दिखाते हैं. अपनी उम्र से कम दिखना है तो न्यूड और ग्लौसी लिपस्टिक का चुनाव करें. साथ ही, यह भी ध्यान रखें कि लिपलाइनर लिपस्टिक के शेड से मैच करता हो और फटे होंठों पर लिपस्टिक न लगाएं. होंठ फटे हैं तो पहले पैट्रोलियम जैली लगा कर स्मूद कर लें.

इस तरह अगर मेकअप की बारीकियों की सही जानकारी हो तो ढलती उम्र में भी आप जवांजवां दिख सकती हैं.

Fat To Fit हुईं Aashika Bhatia, ‘मोटी’ और ‘भैंस’ कहने वालों को दिया जवाब

बौलीवुड से लेकर टीवी सीरियल्स में काम कर चुकीं एक्ट्रेस आशिका भाटिया जाना माना नाम हैं. वहीं एक्टिंग की दुनिया से दूर होने के बावजूद वह सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनकर अपने फैंस को एंटरटेन करती रहती हैं. हालांकि हाल ही में शेयर की गई एक्ट्रेस की वीडियो सोशलमीडिया पर छा गई है. दरअसल, एक वीडियो में वह अपने वेट ट्रांसफौर्मेशन की झलक दिखा रही हैं.

 वेट ट्रांसफौर्मेंशन की दिखाई झलक

एक्ट्रेस आशिका भाटिया ने हाल ही में अपनी कुछ फोटोज से बनी एक वीडियो शेयर की थी, जिसमें वह खुद को मोटी और भैंस कहने वालों को जवाब देते हुए अपने वेट ट्रैंसफौर्मेशन की फोटोज शेयर करती दिखीं थीं. हालांकि इन फोटोज में एक्ट्रेस का फैशन भी सुर्खियां बटोर रहा है. वेट ट्रांसफौर्मेंशन के बाद वह एक से बढ़कर एक लुक को फ्लौंट करती नजर आ रही हैं.

फैशन में हुआ बदलाव

‘प्रेम रतन धन पायो’ में सलमान खान की बहन के रोल में नजर आ चुकीं एक्ट्रेस आशिका भाटिया वेस्टर्न लुक्स में बेहद खूबसूरत लगती हैं. जींस हो या ड्रैसेस हर लुक्स में एक्ट्रेस बेहद खूबसूरत लगती हैं. फैंस को भी एक्ट्रेस के हर लुक पसंद आते हैं और तेजी से सोशलमीडिया पर वायरल होते हैं.

सीरियल में दिखा था फैशन का जलवा

आखिरी बार शहीर शेख और एरिका फर्नांडीज के सीरियल ‘कुछ रंग प्यार के ऐसे भी’ (Kuch rang Pyaar Ke Aise Bhi 3) के सीजन 3 में एक्ट्रेस आशिका भाटिया को देखा गया था, जिसमें वह इंडियन से लेकर वेस्टर्न हर अवतार में नजर आईं थीं, जिसे फैंस ने काफी पसंद किया था. हालांकि कुछ ही दिनों सीरियल औफ एयर हो गया था. लेकिन एक्ट्रेस आशिका भाटिया अपने सोशलमीडिया पेज से फैंस को वीडियो से एंटरटेन करते हुए दिखती हैं, जो सोशलमीडिया पर तेजी से वायरल होती रहती हैं.

Monsoon Special: लंच में परोसें चटनी पुलाव

पुलाव हर किसी को पसंद आता है और आप अगर लंच या डिनर में अगर आप पुलाव की नई रेसिपी परोसना चाहते हैं तो ये आर्टिकल पढ़ना ना भूलें.

सामग्री

2 कप चावल

2 बड़े चम्मच रिफाइंड तेल

2 प्याज बारीक कटे

2 टमाटर बारीक कटे

4-5 हरीमिर्चें कटी

1/2 छोटा चम्मच जीरा

1 चम्मच अदरकलहसुन बारीक कटा

1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर,

1/2 छोटा चम्मच धनिया पाउडर

1/2 छोटा चम्मच कालीमिर्च पाउडर

थोड़ा सा अदरक लंबाई में पतला काट

दरक और थोड़ी सी कटी पुदीनापत्ती गार्निशिंग के लिए.

विधि

एक बड़े पैन में तेल गरम कर के प्याज, टमाटर, हरीमिर्चें, अदरकलहसुन, लालमिर्च पाउडर, धनिया पाउडर, नमक और कालीमिर्च पाउडर डाल कर भूनें. अब इस में चावल और पर्याप्त पानी डाल कर चावल पक जाने तक पकाएं. फिर अदरक और पुदीनापत्ती से सजा कर परोसें.

जून में क्यों मनाते हैं प्राइड परेड, आइए जानते हैं इसका पूरा इतिहास

पूरी दुनिया खासतौर से लैटिन-अमेरिकन देशों में जून को ‘प्राइड मंथ’ के रूप में मनाया जाता है. कुछ विशेष समुदायों के द्वारा जून महीने को प्राइड परेड मंथ कहा जाता है. हर साल दुनिया भर में LGBTQ समुदाय और इसे समर्थन देने वाले लोग इसे बड़े  उत्साह से मनाते है. प्रदर्शन के दौरान ये लोग हाथो में एक झंडा लेकर चलते हैं जिसे इंद्रधनुष कहते हैं.

क्यों मनाया जाता है प्राइड मंथ?

28 जून 1969 को अमेरिका के मैनहट्टन के स्टोन वॉल में LGBTQ समुदाय के लोगों के ठिकानों पर छापेमारी की गई थी, यह छापेमारी गे समुदाय के लोगों के द्वारा लगातार किए जा रहे प्रदर्शनों और धरनों के विरोध में की गई थी. इस छापेमारी के दौरान ही पुलिस और वहां मौजूद लोगों के बीच हिंसक झड़प हो गई. इसके बाद पुलिस ने जब लोगों को गिरफ्तार करना शुरू किया तो हालात नियंत्रण से बाहर हो गए. जिसके बाद इस समुदाय के लोगों ने विद्रोह करना शुरू कर दिया और यह संघर्ष लगातार तीन दिनों तक चला. इस लड़ाई से न केवल अमेरिका में समलैंगिक आजादी के आंदोलन की शुरूआत हुई, बल्कि बहुत से देशों में आंदोलन शुरू हो गया. इसके बाद इस समुदाय के लोगों ने अपने अधिकारों की मांग और अपनी आइडेंटिटी पर गर्व करने के लिए प्रत्येक साल जून महीने में शांति रूप से प्राइड परेड करने का फैसला लिया.

प्राइड मंथ पर निकलती है लाखों लोगों की परेड

इस मंथ को LGBTQ समुदाय के खिलाफ हो रही यातनाओं के खिलाफ विरोध में भी देखा जाता है.  इस महीने का इस्तेमाल राजनैतिक तौर पर LGBTQ कम्युनिटी के बारे में पॉजिटिव प्रभाव डालने के लिए भी होता है. पूरे महीने ये लोग शहर में जगह-जगह परेड निकालते हैं. इस समुदाय के प्रति समर्थन जाहिर करने के लिए भी कई संस्थाएं इनकी परेड में शामिल होती हैं.

अमेरिका में प्राइड मंथ को कब मिली मान्यता?

बिल क्लिंटन साल 2000 ऑफिशियल तौर पर प्राइड मंथ को मान्यता देने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं.  साल 2009 से 2016 तक अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा रहें, तो इस दौरान इन्होंने जून माह को LGBTQ के लोगों के लिए प्राइड मंथ की घोषणा की.  मई 2019 में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक ट्वीट के साथ प्राइड मंथ को मान्यता दी. इसमें घोषणा की गई थी कि उनके प्रशासन ने LGBTQ को अपराध की श्रेणी से हटाने के लिए एक वैश्विक अभियान शुरू किया है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी आधिकारिक रूप से ‘प्राइड मंथ’ की घोषणा की है. न्यूयॉर्क प्राइड परेड होने वाली सबसे बड़ी और सबसे प्रसिद्ध परेड में से एक है.

प्राइड परेड का झंडा कैसा होता है

प्राइड परेड का झंडा साल 1978 में अमेरिका के शहर सैन फ्रांसिस्को के कलाकार गिल्बर्ट बेकर द्वारा डिज़ाइन किया गया था. बेकर द्वारा बनाये गए झंडे में 8 रंग थे – गुलाबी, लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, इंडिगो और वायलेट, लेकिन अगले ही साल से इस झंडे में छह-रंग कर दिए गए जिसमें लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला और वायलेट रंग हैं. ये लोग इसे इंद्रधनुष मानते हुए परेड में शामिल करते हैं. महीने भर चलने वाली इस परेड में कार्यशालाएं, संगीत कार्यक्रम समेत कई अन्य कार्यक्रम शामिल हैं, जो हर जगह लोगों को आकर्षित करते हैं. इस समुदाय के लोग अपने उत्सव में शामिल होने के लिए वेशभूषा, श्रृंगार के साथ तैयार होते हैं.

किसने दिया प्राइड परेड नाम?

इस आंदोलन को ‘प्राइड’ कहने का सुझाव साल 1970 में समलैंगिक अधिकारों के कार्यकर्ता एल क्रेग शूनमेकर ने दिया था. इसका खुलासा उन्होंने दिए एक इंटरव्यू में किया इन्होंने कहा कि इससे जुड़े हुए लोग अंदर ही अंदर संघर्ष कर रहे थे और उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि खुद को समलैंगिक साबित कर अपने पर गर्व कैसे महसूस करें.

भारत में LGBTQ के कानूनी अधिकार क्या हैं?

भारत में आर्टिकल 377 के तहत समलैंगिकता अपराध की श्रेणी में था लेकिन साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता पर लगी धारा 377 को मान्यता दे दी. इस ऐतिहासिक फैसले के बाद भारत में  LGBTQ को संबंध बनाने का क़ानूनी अधिकार दे दिया गया. इस ख़ुशी के मौके पर इसे सेलिब्रेट करने के लिए LGBTQ समुदाय के लोगों ने पूरे देश में एक स्वतंत्र नागरिक होने की हैसियत से मार्च किया.

हालांकि अभी भी भारत में LGBTQ समुदाय के लोगों को शादी करने और बच्चे गोद लेने का अधिकार नहीं है जबकि ऑस्ट्रेलिया, माल्टा, जर्मनी, फिनलैंड, कोलंबिया, आयरलैंड, अमेरिका, ग्रीनलैंड, स्कॉटलैंड समेत 26 देशों में  LGBTQ समुदाय के लोगों को शादी करने और बच्चे गोद लेने का अधिकार है.

भारत में कब शुरू हुई प्राइड परेड और इसका इतिहास?

भारत में पहली प्राइड परेड 02 जुलाई, 1999 को कोलकाता में आयोजित की गई थी. इसे तब कोलकाता रेनबो प्राइड वाक नाम दिया गया था. सिटी ऑफ जॉय के नाम से मशहूर कोलकाता में हुई इस परेड में सिर्फ 15 लोग शामिल हुए थे जिसमें एक भी महिला नहीं थी. इसके बाद आने वाले सालों में देश के कई राज्यों में इसका आयोजन किया जाता है.

साल 2008 में दिल्ली और मुंबई में पहली बार LGBTQ समुदाय लोगों ने प्राइड परेड का आयोजन किया था. दिल्ली में इस समुदाय के द्वारा हर साल नवंबर के आखिरी संडे को प्राइड परेड का आयोजन किया जाता है.

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