Holi Special: वह राज बता न सकी

लीलाबाई ने जिस लड़की को उस के पास भेजा था, उस की खूबसूरती देख कर ग्राहक गोविंदराम दंग रह गया था और बोला, ‘‘तुम चांद से भी ज्यादा खूबसूरत हो?

‘‘ठीक है, ठीक है. तारीफ करने का समय नहीं है. मैं एक धंधे वाली हूं और धंधे वाली ही रहूंगी. आप कितनी भी तारीफ कर लो.’’

‘‘लगता है, तुम कोठे पर अपनी मरजी से नहीं आई हो?’’ गोविंदराम ने सवाल पूछा.

‘‘देखिए मिस्टर, फालतू सवाल  मत पूछो.’’

‘‘ठीक है नहीं पूछूंगा, मगर मैं नाम तो जान सकता हूं तुम्हारा?’’

‘‘आप को नाम से क्या है? लीलाबाई ने जिस काम से भेजा है, वह करो और भागो.’’

‘‘फिर भी मैं तुम्हारा नाम जानना चाहता हूं.’’

‘‘मेरा नाम जमना है.’’

‘‘क्या तुम अब भी शादी करने की इच्छा रखती हो?’’

‘‘अब कौन करेगा मुझ से शादी?’’

‘‘अगर कोई तुम से शादी करने को तैयार हो तो शादी कर लोगी?’’

‘‘मैं इन मर्दों को अच्छी तरह से जानती हूं. ये सब केवल औरत के जिस्म से खेल कर इस गंदगी में धकेलना जानते हैं.’’

‘‘तुम्हें मर्दों से इतनी नफरत क्यों?’’

‘‘मगर आप यह सब क्यों पूछ रहे हैं? आप अभी धंधे वाली के पास हैं. आप अपना काम कीजिए और यहां से जाइए.’’

‘‘मैं ने अभी तुम से कहा था कि अगर कोई शादी करने को तैयार हो जाए, क्या तब तुम तैयार हो जाओगी?’’

‘‘ऐसा कौन बदनसीब होगा, जो मुझ से शादी करने को तैयार होगा?’’

‘‘क्या तुम मुझ से शादी करने के लिए तैयार हो?’’ कह कर गोविंदराम ने अपना फैसला सुना दिया.

यह सुन कर जमना हैरान रह गई और बोली, ‘‘आप करेंगे?’’

‘‘हां, तुम्हें यकीन नहीं है?’’

‘‘मैं कैसे यकीन कर सकती हूं… दरअसल, मुझे मर्द जात पर ही भरोसा नहीं रहा.’’

‘‘लगता है, तुम ने किसी मर्द से चोट खाई है, इसलिए हर मर्द से अब नफरत करने लगी हो.’’

‘‘बस, ऐसा ही समझ लो.’’

‘‘अपनी कहानी बताओ कि वह कौन था, जिस ने आप के साथ धोखा किया?’’

‘‘क्या करेंगे जान कर? सुन कर क्या आप मेरे घाव भर देंगे?’’ जमना ने जब यह सवाल उछाला, तब गोविंदराम सोच में पड़ गया. थोड़ी देर बाद इतना ही कहा, ‘‘अगर तुम बताना नहीं चाहती?हो तो मत बताओ, मगर इतना तो बता सकती हो कि यहां तुम अपनी मरजी से आई हो या कोई जबरन लाया है?’’

ये भी पढ़ें- Holi Special: मौन निमंत्रण- क्या अलग हो गए प्रशांत और प्राची

‘‘प्यार में धोखा खाया है मैं ने,’’ कह कर जमना ने अपनी नजरें नीचे झुका लीं. मतलब, जमना के भीतर गहरी चोट लगी हुई थी.

‘‘साफ है कि जिस लड़के में तुम ने प्यार का विश्वास जताया, वही तुम्हें यहां छोड़ गया?’’

‘‘छोड़ नहीं गया, लीलाबाई को बेच गया,’’ बड़ी तल्खी से जमना बोली.

‘‘प्यार करने के पहले तुम ने उसे परखा क्यों नहीं?’’

‘‘एक लड़की क्याक्या करती? मैं अपनी सौतेली मां के तानेउलाहनों से तंग आ चुकी थी. ऐसे में महल्ले का ही कालूराम ने मुझ पर प्यार जताया. वह कभी मोबाइल फोन, तो कभी दूसरी चीजें ला कर देता रहा. मेरे ऊपर खर्च करने लगा, तो मैं भी उस के प्रेमजाल में उलझती गई.

‘‘जब सौतेली मां को हमारे प्यार का पता लगा, तब वे चिल्ला कर मारते हुए बोलीं, ‘नासपीटी, चोरीछिपे क्या गुल खिला रही है. तेरी जवानी में इतनी आग लगी है तो उस कालूराम के साथ भाग क्यों नहीं जाती है. खानदान का नाम रोशन करेगी.

‘‘‘खबरदार, जो अब उस के साथ गई तो… टांगें तोड़ दूंगी तेरी. तेरी मां ऐसी बिगड़ैल औलाद पैदा कर गई. अगर तुझ से जवानी नहीं संभल रही है, तो किसी कोठे पर बैठ जा. वहां पैसे भी मिलेंगे और तेरी जवानी की आग भी मिट जाएगी.’

‘‘इस तरह आएदिन सौतेली मां सताने लगीं. पर मैं कालूराम से बातें कहती रही. वह कहता रहा,  ‘घबराओ मत जमना,  मैं तुम से जल्दी शादी  कर लूंगा.’

‘‘मैं ने उस से पूछा, ‘मगर, कब करोगे? मेरी सौतेली मां को हमारे प्यार का पता चल गया है. उन्होंने मुझे खूब पीटा है.’

‘‘यह सुन कर वह बोला, ‘ऐसी बात है, तब तो एक ही काम रह गया है.’

‘‘मैं ने हैरान हो कर पूछा, ‘क्या काम रह गया है?’

‘‘उस ने धीरे से कहा, ‘तुम्हें हिम्मत दिखानी होगी. क्या तुम घर से भाग सकती हो?’

‘‘यह सुन कर मैं ने कहा, ‘मैं तुम्हारे प्यार की खातिर सबकुछ कर सकती हूं.’

‘‘मेरी यह बात सुन कर कालूराम बहुत खुश हुआ और बोला, ‘चलो, आज रात को भाग चलते हैं. जबलपुर में मेरी लीला मौसी हैं. वहां हम दोनों मंदिर में शादी कर लेंगे. तुम घर से भागने के लिए तैयार हो न?’

‘‘मैं ने बिना कुछ सोचेसमझे कह दिया, ‘हां, मैं तैयार हूं.’

‘‘कालूराम जबलपुर में मुझे लीला मौसी के यहां ले गया. फिर वह यह कह कर वहां से चला गया कि मंदिर में पंडितजी से शादी की बात कर के आता हूं. पर वह मुझे छोड़ कर जो गया, फिर आज तक नहीं आया. बाद में पता चला कि वह औरत उस की लीला मौसी  नहीं थी, बल्कि उसे तो वह मुझे बेच गया था.’’

‘‘सचमुच तुम ने प्यार में धोखा खाया है,’’ अफसोस जाहिर करते हुए गोविंदराम बोला, ‘‘फिर कभी तुम्हारी सौतेली मां ने तुम्हें ढूंढ़ने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘की होगी, मगर मुझे नहीं मालूम. उस के लिए तो अच्छा ही था कि एक बला टली. अगर मैं जाती भी तब मुझे  नहीं अपनाती.’’

‘‘अब तुम ने क्या सोचा है?’’ गोविंदरम ने कुरेदा.

‘‘सोचना क्या है, अब लीलाबाई ने कोठे को ही सबकुछ मान लिया है,’’ जमना ने साफ कह दिया.

‘‘मतलब, तुम मुझ से शादी नहीं करना चाहती हो?’’

‘‘हम एकदूसरे को नहीं जानते हैं. फिर मैं औरत जात ठहरी, आप जैसे पराए मर्द पर कैसे यकीन कर लूं. कहीं दूसरे कालूराम निकल जाओ…’’

‘‘तुम्हारे भीतर मर्दों के लिए नफरत बैठ गई है. मगर मैं वैसा नहीं हूं जैसा तुम समझ रही हो.’’

‘‘एक ही मुलाकात से मैं कैसे  मान लूं?’’

‘‘ठीक है. मैं कल फिर आऊंगा, तब तक अच्छी तरह सोच लेना,’’ कह कर गोविंदराम उठ कर चला गया.

जमना को यह पहला ऐसा मर्द मिला था, जो उस के शरीर से खेल कर नहीं गया था. 3-4 दिन तक गोविंदराम लगातार आता रहा, मगर कभी जमना के शरीर से नहीं खेला.

तब जमना बोली, ‘‘आप रोज आते हैं, पर मेरे शरीर से खेलते नहीं… क्यों?’’

‘‘जब तुम से मेरी शादी हो जाएगी, तब रोज तुम्हारे शरीर से खेलूंगा.’’

‘‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने मत देखो. जब तक लीलाबाई के लिए मैं खरा सिक्का हूं, वह मुझे नहीं छोड़ेगी.’’

‘‘यह बात है, तो मैं लीलाबाई से बात करता हूं.’’

‘‘कर के देख लो, वह कभी राजी  नहीं होगी.’’

‘‘मैं लीलाबाई को राजी कर लूंगा.’’

‘‘मगर, मैं नहीं जाऊंगी.’’

‘‘देखो जमना, तुम्हारी जिंदगी का सवाल है. क्या जिंदगीभर इसी दलदल में रहोगी? अभी तुम्हारी जवानी बरकरार है, इसलिए हर कोई मर्द तुम से खेल कर चला जाएगा. तुम्हें तम्हारे शरीर की कीमत भी दे जाएगा, मगर जब उम्र ढल जाएगी, तब तुम्हारे पास कोई नहीं आएगा.

ये भी पढ़ें- Holi Special: मीठी परी- सिम्मी और ऐनी में से किसे पवन ने अपनाया

‘‘तुम चाहती हो कि इतना पैसा कमा लूंगी… फिर बैठेबैठे वह पैसा भी खत्म हो जाएगा…’’ समझाते हुए गोविंदराम बोला, ‘‘इसलिए कहता हूं कि अपना फैसला बदल लो.’’

‘‘ऐ, तू रोजरोज आ कर जमना को क्यों परेशान करता है?’’ खुला दरवाजा देख कर लीलाबाई कमरे में घुसते  हुए बोली.

गोविंदराम बोला, ‘‘लीलाबाई, मैं जमना से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘शादी… अरे, शादी की तो तू सोच भी मत. अभी जमना मेरे लिए सोने का अंडा देने वाली मुरगी है. मैं इसे कैसे छोड़ दूं,’’ लीलाबाई बोली.

‘‘यही सोचो कि यह मुरगी एक दिन सोने का अंडा देना बंद कर देगी, तब क्या करोगी इस का?’’

‘‘मगर, मुझे एक बात बताओ कि तुम जमना से शादी करने के लिए ही क्यों पीछे पड़े हो? इस कोठे में दूसरी लड़कियां भी तो हैं,’’ लीलाबाई ने पूछा.

‘‘दूसरी लड़कियों की बात मैं नहीं करता लीलाबाई. जमना मुझे पसंद है. मैं इसी से शादी करना चाहता हूं. आप अपनी रजामंदी दीजिए,’’ एक बार फिर गोविंदराम ने कहा.

‘‘ऐसे कैसे इजाजत दे दूं? तुम कौन हो? तुम्हारा खानदान क्या है? अपने बारे में कुछ बताओ?’’

‘‘अगर मैं अपना खानदान बता दूंगा, तब क्या तुम जमना से मेरी शादी के लिए तैयार होगी?’’

‘‘मुमकिन है कि मैं तैयार हो भी जाऊं,’’ लीलाबाई ने कहा.

‘‘देखो लीलाबाई, मरने से पहले मेरे पापा कह गए थे कि तुम अपनी  मां नहीं धंधे वाली से पैदा औलाद  हो. तुम्हारी मां तो बांझ है.’’

लीलाबाई खामोश हो गई. थोड़ी देर बाद वह बोली, ‘‘तुम्हारे पिता ने यह नहीं बताया कि वह धंधे वाली कौन थी?’’

‘‘बताना तो चाहते थे, मगर तब तक उन की मौत हो गई,’’ गोविंदराम ने कहा.

लीलीबाई ने पूछा, ‘‘अच्छा, तुम अपने पिता का नाम तो बता सकते हो?’’

‘‘गोपालराम.’’

तब लीलाबाई कुछ नहीं बोली. वह अपने अतीत में पहुंच गई. बात उन दिनों की थी, जब लीलाबाई जवान थी.

एक दिन गोपालराम का एक अधेड़ कोठे पर आया था और बोला, ‘देखो लीलाबाई, मैं तुम्हारे पास इसलिए आया हूं कि मुझे तुम्हारे पेट से बच्चा चाहिए.

‘मैं एक धंधे वाली हूं. मैं बच्चा नहीं चाहती हूं,’ लीलाबाई ने इनकार करते हुए कहा कि अगर बच्चा ही चाहिए तो किसी और से शादी क्यों नहीं कर लेते.

‘मेरी शादी के 10 साल गुजर गए हैं, मगर पत्नी मां नहीं बन पाई है.’

‘तब दूसरी शादी क्यों नहीं कर  लेते हो?’ ‘कर सकता हूं, मगर मैं अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता हूं. उस की खातिर दूसरी शादी नहीं कर सकता…’ गोपालराम ने कहा, ‘मैं इसी उम्मीद से तुम्हारे पास आया हूं.’

तब लीलाबाई सोच में पड़ गई कि क्या जवाब दे? बच्चा देना मतलब  9 महीने तक धंधा चौपट होना.

उसे चुप देख कर गोपालराम ने पूछा, ‘क्या सोच रही हो लीलाबाई?’

‘देखो, मैं तो आप का नाम भी नहीं जानती हूं.’

‘मुझे गोपालराम कहते हैं. इस शहर से 30 किलोमीटर दूर रहता हूं. कपड़े की दुकान के साथ पैट्रोल पंप भी है. मेरे पास खूब पैसा है और अब मुझे अपना वारिस चाहिए.’

‘देखो, मेरे पेट में अगर आप का बच्चा आ गया, तो 9 महीने तक मेरा धंधा चौपट हो जाएगा. मैं अपना धंधा चौपट नहीं कर सकूंगी. आप कोई अनाथ बच्चा गोद ले लीजिए.’

‘अगर मुझे गोद ही लेना होता, तब मैं तुम्हारे पास क्यों आता?’ कह कर गोपालराम ने आगे कहा, ‘जब तुम्हारे पेट में बच्चा ठहर जाएगा, तब सालभर तक सारा खर्चा मैं उठाऊंगा.’

जब लीलाबाई ने यकीन कर लिया, तब गोपालराम अपनी गाड़ी ले कर रोज उस के कोठे पर आने लगा. महीनेभर के भीतर उस के बच्चा ठहर गया. वह सालभर तक रखैल बन कर रही. उस की सारी सुखसुविधाओं का ध्यान रखा जाने लगा.

9 महीने बाद लीलाबाई के लड़का हुआ, तब सारी बस्ती में मिठाई बांटी गई. 6 महीने के भीतर जब तक मां का दूध बच्चा पीता रहा, तब तक गोपालराम उसे अपने साथ नहीं ले गया.

बच्चा गोपालराम को सौंपने के बाद लीलाबाई अपने पुराने ढर्रे पर आ गई. जब शरीर ढलने लगा, ग्राहक कम आने लगे, तब वह कोठा चलाने वाली बन गई.

‘‘ओ लीलाबाई, कहां खो गई?’’ कह कर गोविंदराम ने उसे झकझोरा, तब वह अतीत से वर्तमान में लौटी.

गोविंदराम को अपने सामने देख कर लीलाबाई ने मन ही मन सोचा, अब बता दूं कि मैं इस की मां हूं? मगर यह राज राज ही रहेगा. मैं तो इसे जन्म दे कर अपनी गोद में खिलाना चाहती थी. रातरात भर तड़पती थी, ग्राहकों को भी संतुष्ट करती थी…

ये भी पढे़ं- Holi Special: समानांतर- क्या सही था मीता का फैसला

‘‘अरे, आप फिर कहां खो गईं?’’ गोविंदराम ने एक बार फिर टोका.

‘‘तुम्हारी मां तो हैं न?’’

‘‘हां, मां हैं, मगर आप को यकीन दिलाता हूं कि जमना को मैं खुश रखूंगा. किसी तरह की तकलीफ नहीं होने दूंगा.’’

‘‘हां बेटे, जमना को ले जा. इस से शादी कर ले.’’

‘‘अरे, आप ने मुझे बेटा कहा,’’ गोविंदराम ने जब यह पूछा, तब लीलाबाई बोली, ‘‘अरे, उम्र में तुम से बड़ी हूं, इसलिए तू मेरा बेटा हुआ कि नहीं…

‘‘देख जमना, मैं तुझे आजाद करती हूं. तू इस के साथ शादी रचा ले. मेरी अनुभवी आंखें कहती हैं कि यह तुझे धोखा नहीं देगा.’’

‘‘मगर, मैं एक धंधे वाली हूं. यह दाग कैसे मिटेगा?’’ जमना ने पूछा, ‘‘क्या इन की मां एक धंधे वाली को अपनी बहू बना लेगी?’’

‘‘देखो जमना, मैं ने अपनी मां से इजाजत ले ली है, बल्कि मां ने ही मुझे यहां भेजा है,’’ कह कर गोविंदराम ने एक और राज खोल दिया.

‘‘जा जमना जा, कुछ भी मत सोच. इस गंदगी से निकल जा तू. वहां महारानी बन कर रहेगी,’’ दबाव डालते हुए लीलाबाई बोली.

‘‘ठीक है. आप कहती हैं तो मैं चली जाती हूं,’’ उठ कर जमना अपनी कोठरी में गई. मुंह से पुता पाउडरलाली सब उतार कर साड़ी पहन कर एक साधारण औरत का रूप बना कर जब गोविंदराम के सामने आ कर खड़ी हुई, तो वह देखता रह गया.

बाहर कार खड़ी थी. वे दोनों तो कार में बैठ गए.

लीलाबाई सोचती रही, ‘कभी इस का बाप भी इसी तरह कार ले कर आता था…’

ये भी पढ़ें- Holi Special: गुप्त रोग: रुबी और अजय के जाल में क्या फंस गया रणबीर

लोकतंत्र और धर्म गुरु

देशभक्ति न नारों से आती है न सिर्फ पूजापाठ हालांकि दोनों को ही जरूरत हर युग में देशभक्ति दर्शाने और उसे अंधभक्ति बनाने में पड़ी है. यूक्रेन में देश भक्ति का मामला कुछ और ही है. यहां न तो राष्ट्रीय व्लादिमीर जेलेंस्की ने नारेबाजी की और न ही धर्माचार्य ने ‘हिंदू खतरे में हैं’ जैसा नारा लगाया. यूक्रेन के निवासियों ने ही नहीं. यूक्रेन से बाहर बसे यूक्रेनियों ने भी यूक्रेन पहुंच कर रूसी हमले का मुकाबला करने का फैसला ले लिया.

लगभग 1, 40,000 जवान बाहर से यूक्रेन पहुंच चुके हैं कि वे देश की रक्षा करने के लिए जान की बाजी लगाएंगे. यूक्रेनी आमतौर पर औरतों, बच्चों और बूढ़ों को देश से बाहर भेज रहे हैं और खुद देश की रक्षा में लग गए हैं. यह नारेबाजी की देन नहीं, यह चर्च की पहल पर नहीं हो रहा. यह तो एक बदमाश को सही सबक सिखाने का कमिटमैंट है.

ये भी पढ़ें- मत पहनाओ धर्म की चादर

यूक्रेनी ही नहीं लगभग 10,000 दूसरी नागरिकता के लोग भी यूक्रेन पहुंच गए हैं जो लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए लडऩे के लिए रूस की भारी भरकम फौज को सबक सिखाने को तैयार हैं. यह रूस यूक्रेन युद्ध वियतनाम, इराक, लीबिया, अफगानिस्तान की लड़ाइयों अपर्ग दिख रहा है. लोकतंत्र प्रेमी सभी देश एक तरफ हैं. भारत, पाकिस्तान, चीन जैसे देशों की मरकलें जो लोकतंत्र अब कोरे वोट तंत्र में बदल चुकी हैं या बदलने की कोशिश कर रही हैं, रूस को खुला या छिपा सपोर्ट दे रही हैं. यह लड़ाई तो आम जनता के हकों की है क्योंकि रूस के व्लादिमीर पुतिन अपने टैंकों से सोवियत यूनियन की तर्ज पर रौंद कर मास्को का साम्राज्य बनाना चाह रहे हैं.

यूक्रेनी और दूसरे देशों के लोकतंत्र के समर्थक युवा रूस के मंसूबों पर पानी फेर देने के चक्कर में अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार हैं. देशभक्ति इसे कहते हैं जिस का उद्देश्य सिर्फ कुछ शासकों या धर्मगुरूओं की रक्षा करना न हो. दुनिया में ज्यादातर युद्ध शासकों की सत्ता को फैलाने या बचाने के लिए या फिर किसी धर्म को फैलाने के नाम पर हुए हैं. अब यह पहला बड़ा युद्ध बन रहा है जिस में एक तरफ देश भक्ति और जनशक्ति से लबाबदा युवा. यूक्रेन की परीक्षा लोकतंत्र की परीक्षा है. उम्मीद करें कि जीत युवाओं की हो, तानाशाहों की नहीं.

ये भी पढ़ें- भेदभाव समाज के लिए घातक

निवेश से पहले न करें ये 5 गलतियां

अपने कल को बेहतर बनाने के लिए आज से बचत शुरु करने से बेहतर कुछ और नहीं है. एक्सपर्ट्स भी यही मानते हैं कि अपने जीवन की पहली नौकरी लगते ही सेविंग्स शुरु कर देनी चाहिए. अक्‍सर लोग ऐसा करते  भी हैं. लेकिन कई बार हम सेविंग, इंवेस्‍टमेंट के दौरान कई छोटी छोटी गलतियां कर जाते हैं. ऐसा कई बार जानकारी के अभाव में होता है. कई लोग ऐसे भी होते हैं जो बचत तो कर रहे हैं, मगर उनके जहन में ढेर सारे सवाल है और वह यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि बचत को और कैसे बेहतर किया जा सकता है.

1. बीमा पॉलिसी को टैक्स बचाने के उदेश्य से खरीदना

कई लोग टैक्स बचाने के लिए बीमा पॉलिसी खरीद लेते हैं. उन्हें अपनी इस गलती का एहसास साल के आखिरी में होता है जब उन्हें अपने नियोक्ता को निवेश संबंधित प्रमाण देने होते हैं. बीमा पॉलिसी होना एक अच्छी बात है, लेकिन जीवन बीमा की तुलना में अन्य सभी टैक्स सेविंग विकल्प बेहतर होते हैं. टैक्स सेविंग फंड्स जैसे कि ईएलएसएस कम उम्र के बचत करने वाले लोगों के लिए सबसे अच्छा ऑप्शन है.

ये भी पढे़ं- जानें प्रौपर्टी गिरवी रखें या बेचें

2. निवेश से पहले जानकारी का अभाव

जब लोग नियमित रूप से बचत नहीं करते तो बैंक एकाउंट में पड़े पड़े वह खर्च हो जाते है. इससे दो नुकसान होते हैं, पहला छोटी उम्र में निवेश करने के अनुरुप यह आपकी पूंजी को नहीं बढ़ा पाता. और दूसरा इससे बेफिजूल खर्च करने की आदत पड़ जाती है. बचत करने के लिए शुरुआत में अपनी मासिक तनख्वाह का 5 फीसदी से 10 फीसदी तक नियमित रूप से डेट फंड या फिर रेकरिंग डिपॉजिट में निवेश करें.

3. दूसरों को देखकर शेयर बाजार में निवेश करना

ऐसा लोग तब करते हैं जब उनमें स्टॉक्स में निवेश को लेकर कम जानकारी होती है. साथ ही शेयर बाजार में निवेश करते समय लोगों को लगता है कि उनकी निवेश राशि दो गुना हो जाएगी, जबकि ऐसा सोचना गलत है. निवेश करने से पहले अपने दोस्त, रिश्तेदार या सहकर्मी का देख लें कि किसको कितना मुनाफा या नुकसान हुआ है. निवेश करने से पहले स्टॉक से जुड़ी सारी जानकारी प्राप्त कर लें.

4. हर साल नौकरी बदलना

कई लोग सैलरी बढ़ाने के लिए जल्दी-जल्दी नौकरी बदलते हैं. जबकि नौकरी तब बदलनी चाहिए जब आप एक जगह काम करके अपनी स्किल्स अच्छी करें. इसके बाद आप जहां भी जाएंगे आपको अच्छी सैलरी का ऑफर दिया जाएगा.

ये भी पढ़ें- तो होम लोन लेना हो जाएगा आसान

5. एजुकेशन लोन के बारे में भूल जाना

नौकरी से पहले कई लोग आगे की पढ़ाई के लिए एमबीए जैसे कोर्स में दाखिला लेते हैं. ऐसे में पढ़ाई के खर्चे को उठाने के लिए लोन की आवश्यकता पड़ती है. घर से दूर रहकर नौकरी करने पर लोग अपने बैंक से संपर्क नहीं कर पाते. ऐसे में ब्याज बढ़ता रहता है. इसलिए अपने एजुकेशन लोन के बारे अपना ध्यान केंद्रित करें.

Holi Special: बच्चों को बेहद पसंद आयेंगे ये ट्विस्ट वाले Traditional Recipe

होली का पर्व रंगों के साथ साथ गुझिया, अनरसा और सेव मठरी जैसे पारम्परिक व्यंजनों के लिए जाना जाता है. फ़ास्ट फ़ूड और इंस्टेंट फ़ूड के इस दौर में बच्चों को इन व्यंजनों को खिलाना बेहद मुश्किल काम होता है. आज हमने होली के इन पारम्परिक व्यंजनों को थोड़ा सा ट्विस्ट देकर बनाया है जिससे आपको एक नया स्वाद तो मिलेगा ही साथ ही ये बच्चों को भी बहुत पसंद आयेंगें. तो आइये देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाते हैं.

-चाकलेटी गुली गुझिया

कितने लोगों के लिए               8

बनने में लगने वाला समय          30 मिनट

मील टाईप                       वेज  

सामग्री

आटा                          1 कटोरी

मैदा                           1 कटोरी

घी                            250 ग्राम

बारीक कटी मेवा             (किसा नारियल, किशमिश, चिरोंजी)1 कटोरी

पिसी शकर                     1 कटोरी

इलायची पाउडर                  1/4 टीस्पून

चाकलेटी चिप्स                   1 टेबलस्पून

चाकलेटी सौस                    1 टेबलस्पून

विधि-

मैदा में 1 टी स्पून घी का मोयन डालकर कड़ा गूंधकर सूती गीले कपड़े से ढककर रख दें. आटे को पानी की सहायता से पूड़ी जैसा कड़ा गूंध लें. तैयार आटे से एक मोटा सा परांठा बनाएं और नानस्टिक तवे पर घी डालकर धीमी आंच पर सुनहरा होने तक शैलो फ्राई करें. ठंडा होने पर मिक्सी में बारीक पीसकर छलनी से छान लें. अब 1 टी स्पून गरम घी में पिसे मिश्रण को भून लें. ठंडा होने पर शकर, मेवा और चाकलेट चिप्स मिलाएं. मैदे की छोटी पूड़ी बनाकर गुझिया के सांचे में रखें 1 चम्मच भरावन की सामग्री भरकर गुझिया बनाएं. गरम घी में हल्का सुनहरा होने तक तलें. चाकलेट सौस से गार्निश करके सर्व करें.

ये भी पढ़ें- Holi Special: होली पर बनाएं राजस्थानी मालपुआ

-चीजी अनरसा      

कितने लोगों के लिए                10

बनने में लगने वाला समय           30 मिनट

मील टाईप                        वेज

सामग्री

चावल                           1/2 किलो

पिसी शकर                       250 ग्राम

गाढा दही                         1 कटोरी

चीज क्यूब्स                       2

खसखस के दाने                    1 टेबलस्पून

तलने के लिए                      पर्याप्त मात्रा में घी

विधि

अनरसा बनाने से 12 घंटे पूर्व चावल को पानी में भिगो दें. सुबह पानी निकालकर एक सूती कपड़े पर फैला दें. लगभग 6 घंटे बाद इन्हें मिक्सी में बारीक पीस लें. अब पिसे चावल के आटे को दही और शकर मिलाकर सख्त गूंध लें. इसे 3-4 घंटे के लिए ढककर रख दें. 1 चीज क्यूब को 8 भाग में काट लें और हथेली पर छोटी सी लोई रखकर चपटी करके बीच में 1 टुकड़ा रखकर चरों तरफ से पैक कर दें और ऊपर से खसखस के दाने चिपकाएं. गरम घी में धीमी आंच पर हल्का सुनहरा होने तक तलें और गरम गरम में ही उपर से चीज किसकर सर्व करें.

-गुलाब कतरी लड्डू

कितने लोगों के लिए              10-12

बनने में लगने वाला समय         30 मिनट

मील टाइप                       वेज

सामग्री

मील बेसन                          500 ग्राम

तेल                                पर्याप्त मात्रा में

मीठा सोडा                         1/4 टी स्पून

गुड़                                500 ग्राम

रंग बिरंगी गुलाब कतरी                50 ग्राम

नारियल लच्छे                       1 टेबलस्पून

विधि

बेसन में मीठा सोडा और 1 टेबलस्पून तेल डालकर नरम गूंध लें. अब गरम तेल में सेव बनाने के झारे अथवा सेव मेकर से मोटे सेव बना लें, ध्यान रखें कि सेव पतले न हों. अब  गुड़ में 1 कप पानी डालकर तीन तार की गाढी चाशनी बनाएं. सेव, नारियल लच्छे और गुलाब कतरी  को चाशनी में अच्छी तरह मिलाकर स्वादिष्ट लड्डू बना लें.

ये भी पढ़ें- Holi Special: फैमिली के लिए बनाएं कुरकुरी कमल ककड़ी

-चाकलेटी शकरपारे

कितने लोगों के लिए                10 

बनने में लगने वाला समय           30 मिनट

मील टाइप                         वेज  

सामग्री

मैदा                                 250 ग्राम

मोयन के लिए तेल                   1 टी स्पून

तलने के लिए                         पर्याप्त मात्रा में तेल

डार्क चाकलेट                          50 ग्राम

मिल्क चाकलेट                         50 ग्राम

विधि

मैदा में मोयन डालकर गुनगुने पानी से पूड़ी जैसा गूंध लें. अब इससे एक मोटी सी पूड़ी बनाकर लंबी लंबी मठरी काट लें. इन्हें गरम तेल में धीमी आंच पर सुनहरा होने तक तलकर बटर पेपर पर निकाल लें. दोनों चाकलेट को छोटे छोटे टुकड़ों में कटकर एक कटोरे में डालें. गर्म पानी के ऊपर इस कटोरे को रखकर लगातार चलायें. जब चाकलेट पिघल जाये तो गैस बंद कर दें. तले हुए मठरी को एक एक करके चाकलेट में डुबोकर सिल्वर फॉयल पर रखें. आधे घंटे तक फ्रिज में रखकर सर्व करें.

नीड़ का निर्माण फिर से: भाग 5- क्या मानसी को मिला छुटकारा

लेखक- श्रीप्रकाश

चांदनी के कथन पर मानसी एकाएक चिल्लाई. मां का रौद्र रूप देख कर वह बच्ची सहम गई. मानसी की आंखों से अंगारे बरसने लगे. उसे लगा जैसे किसी ने भरे बाजार में उसे नंगा कर दिया हो. गहरी हताशा के चलते उस के सामने अंधेरा छाने लगा. उसे सपने में भी उम्मीद न थी कि चांदनी से यह सुनने को मिलेगा. जिसे खून से सींचा, जिस के लिए न दिन देखा न रात, जो जीने का एकमात्र सहारा थी, उसी ने उसे अपनी नजरों से गिरा दिया. मनोहर उसे इतना प्रिय लगने लगा और आज मैं कुछ नहीं.

मानसी यह नहीं समझ पाई कि मनोहर से उस के संबंध खराब थे बेटी के नहीं. मनोहर उसे पसंद नहीं आया तो क्या चांदनी भी उसी नजरों से देखने लगे. बच्चे तो सिर्फ प्रेम के भूखे होते हैं. चांदनी को पिता का प्यार चाहिए था बस.

रात को मनोहर का फोन आया, ‘‘मानसी, मैं मनोहर बोल रहा हूं.’’

सुन कर मानसी का मन कसैला हो गया.

‘‘मिल गई तसल्ली,’’ वह चिढ़ कर बोली.

‘‘मुझे गलत मत समझो मानसी. मैं चाह कर भी तुम लोगों को भुला नहीं पाया. चांदनी मेरी भी बेटी है.’’

‘‘शराब पी कर हाथ छोड़ते हुए तुम्हें अपनी बेटी का खयाल नहीं आया,’’ मानसी बोली.

‘‘मैं भटक गया था,’’ मनोहर के स्वर में निराशा स्पष्ट थी.

‘‘नया घर बसा कर भी तुम्हें चैन नहीं मिला.’’

‘‘घर, कैसा घर…’’ मनोहर जज्बाती हो गया, ‘‘मानसी, सच कहूं तो दोबारा घर बसाना आसान नहीं होता. अगर होता तो क्या अब तक तुम नहीं बसा लेतीं. सिर्फ कहने की बात है कि पुरुष के लिए सबकुछ सहज होता है. उन्हें भी तकलीफ होती है जब उन का बसाबसाया घर उजड़ता है.’’

मनोहर के मुख से ऐसी बातें सुन कर मानसी का गुस्सा ठंडा पड़ गया. मनोहर काफी बदला लगा. उस ने अब तक शादी नहीं की. यह निश्चय ही चौंकाने वाली बात थी. मनोहर के साथ बिताए मधुर पल एकाएक उस के सामने चलचित्र की भांति तैरने लगे. कैसे उस ने अपनी पहली कमाई से उस के लिए कार खरीदी थी. तब उसे मनोहर का पीना बुरा नहीं लगता था. अचानक वक्त ने करवट ली और सब बदल गया. अतीत की बातें सोचतेसोचते मानसी की आंखें सजल हो उठीं.

‘‘मम्मी, आप को मेरे साथ पापा के पास चलना होगा वरना मैं उन्हें यहीं बुला लूंगी,’’ चांदनी ने बालसुलभ हठ की.

तभी मनोहर की बहन प्रतिमा आ गईं. 10 साल के बाद पहली बार वह आई थीं. उन्हें आया देख कर मानसी को अच्छा लगा. दरवाजे पर आते समय प्रतिमा ने चांदनी की कही बातें सुन ली थीं.

ये भी पढ़ें- इतना बहुत है- परिवार का क्या था तोहफा

‘‘तलाक ले कर तुम ने कौन सा समझदारी का परिचय दिया था?’’

‘‘दीदी, आप तो जानती थीं कि तब मैं किन परिस्थितियों से गुजर रही थी,’’ मानसी ने सफाई दी.

‘‘और आज, क्या तुम उस से मुक्त हो पाई हो. औरत के लिए हर दिन एक जैसे होते हैं. सब उसी को सहना पड़ता है,’’ प्रतिमा ने दुनियादारी बताई.

‘‘दीदी, आप कहना क्या चाहती हैं?’’

‘‘बाप के साए से बेटी महरूम रहे, क्या यह उस के प्रति अन्याय नहीं,’’ प्रतिमा बोली.

‘‘मैं ने कब रोका था,’’ कदाचित मानसी का स्वर धीमा था.

‘‘रोका है, तभी तो कह रही हूं. 10 साल मनोहर ने अकेलेपन की पीड़ा कैसे झेली यह मुझ से ज्यादा तुम नहीं जान सकतीं. मैं ने सख्त हिदायत दे रखी थी कि वह तुम से न मिले, न ही फोन पर बात करे. जैसा किया है वैसा भुगते.’’

‘‘दूसरी शादी कर लेते. क्या जरूरत थी अकेलेपन से जूझने की,’’ मानसी बोली.

‘‘यही तो हम औरतें नहीं समझतीं. हम हमेशा मर्द में ही खोट देखते हैं. जरा सी कमी नजर आते ही हजार लांछनों से लाद देते हैं,’’ प्रतिमा किंचित नाराज स्वर में बोलीं. एक पल की चुप्पी के बाद उस ने फिर बोलना शुरू किया, ‘‘आज उस ने अपनी बेटी के लिए मेरी हिदायतों का उल्लंघन किया. जीवन एक बार मिलता है. हम उसे भी ठीक से नहीं जी पाते. अहं, नफरत और न जाने क्याक्या विकार पाले रहते हैं अपने दिलों में.’’

‘‘मुझ में कोई अहं नहीं था,’’ मानसी बोली.

‘‘था तभी तो कह रही हूं कि प्यार, मनुहार और इंतजार से सब ठीक किया जा सकता है. आखिर मनोहर रास्ते पर आ गया कि नहीं. अब वह शराब को हाथ तक नहीं लगाता. अपने काम के प्रति समर्पित है,’’ प्रतिमा बोलीं.

‘‘काम तो पहले भी वह अच्छा करते थे,’’ मानसी के मुख से अचानक निकला.

‘‘तब कहां रह गई कसर. क्या छूट गया तुम दोनों के बीच जिस की परिणति अलगाव के रूप में हुई. तुम ने एक बार भी नहीं सोचा कि बच्ची बड़ी होगी तो किसे गुनहगार मानेगी. तुम ने सोचा बाप को शराबी कह कर बेटी को मना लेंगे… पर क्या ऐसा हुआ? क्या खून के रिश्ते आसानी से मिटते हैं? मांबाप औलाद के लिए सुरक्षा कवच होते हैं. इस में से एक भी हटा नहीं कि असुरक्षा की भावना घर कर जाती है बच्चों में. ऐसे बच्चे कुंठा के शिकार होते हैं.’’

‘‘आप कहना चाहती हैं कि तलाक ले कर मैं ने गलती की. मनोहर मेरे खिलाफ हिंसा का सहारा ले और मैं चुप बैठी रहूं…यह सोच कर कि मैं एक औरत हूं,’’ मानसी तल्ख शब्दों में बोली.

‘‘मैं ऐसा क्यों कहूंगी बल्कि मैं तुम्हारी जगह होती तो शायद यही फैसलालेती पर ऐसा करते हुए हमारी सोच एकतरफा होती है. हम कहीं न कहीं अपनी औलाद के प्रति अन्याय करते हैं. दोष किसी का भी हो पर झेलना तो बच्चों को पड़ता है,’’ प्रतिमा लंबी सांस ले कर आगे बोलीं, ‘‘खैर, जो हुआ सो हुआ. वक्त हर घाव को भर देता है. मैं एक प्रस्ताव  ले कर आई हूं.’’

मानसी जिज्ञासावश उन्हें देखने लगी.

‘‘क्या तुम दोनों पुन: एक नहीं हो सकते?’’

एकबारगी प्रतिमा का प्रस्ताव मानसी को अटपटा लगा. वह असहज हो गई. दोबारा जब प्रतिमा ने कहा तो उस ने सिर्फ इतना कहा, ‘‘मुझे सोचने का मौका दीजिए,’’

प्रतिमा के जाने के बाद वह अजीब कशमकश में फंस गई. न मना करते बन रहा था न ही हां. बेशक 10 साल उस ने सुकून से नहीं काटे सिर्फ इसलिए कि हर वक्त उसे अपनी और चांदनी के भविष्य को ले कर चिंता लगी रहती. एक क्षण भी चांदनी को अपनी आंखों से ओझल होने नहीं देती. उसे हमेशा इस बात का भय बना रहता कि अगर कुछ ऊंचनीच हो गया तो किस से कहेगी? कौन सहारा बनेगा? कहने को तो तमाम हमदर्द पुरुष हैं पर उन की निगाहें हमेशा मानसी के जिस्म पर होती. थोड़ी सी सहानुभूति जता कर लोग उस का सूद सहित मूल निकालने पर आमादा रहते.

अंतत: गहन सोच के बाद मानसी को लगा कि अपने लिए न सही, चांदनी के लिए मनोहर का आना उस की जिंदगी में निहायत जरूरी है. हां, थोड़ा अजीब सा मानसी को अवश्य लगा कि जब मनोहर फिर उस की जिंदगी में आएगा तो कैसा लगेगा? लोग क्या सोचेंगे? कैसे मनोहर का सामना करूंगी. क्या वह सब भूल जाएगा? क्या भूलना उस के लिए आसान होगा? टूटे हुए धागे बगैर गांठ के नहीं बंधते. क्या यह गांठ हमेशा के लिए खत्म हो पाएगी?

एक तरफ मनोहर के आने से उस की जिंदगी में अनिश्चितता का माहौल खत्म होगा, वहीं भविष्य को ले कर उस के मन में बुरेबुरे खयाल आ रहे थे. कहीं मनोहर फिर से उसी राह पर चल निकला तो? तब तो वह कहीं की नहीं रहेगी. प्रतिमा से उस ने अपनी सारी दुश्ंिचताओं का खुलासा किया. प्रतिमा ने उस से सहमति जताई और बोलीं, ‘‘मैं तुम से जबरदस्ती नहीं करूंगी. मनोहर से मिल कर तुम खुद ही फैसला लो.’’

ये भी पढ़ें- बीरा- गांव वालों ने क्यों मांगी माफी

मनोहर आया. दोनों में इतना साहस न था कि एकदूसरे से नजरें मिला सकें. मानसी की मां और प्रतिमा दोनों थीं पर वे उन दोनों को भरपूर मौका देना चाहती थीं, दोनों दूसरे कमरे में चली गईं.

‘‘मानसी, मैं ने तुम्हारे साथ अतीत में जो कुछ भी सलूक किया है उस का मुझे आज भी बेहद अफसोस है. यकीन मानो मैं ने कोई पहल नहीं की. मैं आज भी तुम्हारे लायक खुद को नहीं समझता. अगर चांदनी का मोह न होता…’’

‘‘उस के लिए विवाह क्या जरूरी है,’’ मानसी ने उस का मन टटोला.

‘‘बिलकुल नहीं,’’ वह उठ कर जाने लगा. कुछ ही कदम चला होगा कि मानसी ने रोका, ‘‘क्या हम अपनी बच्ची के लिए नए सिरे से जिंदगी नहीं शुरू कर सकते?’’

मानसी के अप्रत्याशित फैसले पर मनोहर को क्षणांश विश्वास नहीं हुआ. वह एक बार पुन: मानसी के मुख से सुनना चाहता था. मानसी ने जब अपनी इच्छा फिर दोहराई तो उस की भी आंखों से खुशी के आंसू बह निकले.

जिस दिन दोनों एक होने वाले थे अचला भी आई. उसे तो विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि ऐसा भी हो सकता है. सुबह का भूला शाम को लौटे तो उसे भूला नहीं कहते. दरअसल, सब याद कर के ही नहीं, कुछ भूल कर भी जिंदगी जी जा सकती है.

मनोहर और मानसी ने उस अतीत को भुला दिया, जिस ने उन दोनों को पीड़ा दी. चांदनी इस अवसर पर ऐसे चहक रही थी जैसे नवजात परिंदा अपनी मां के मुख में अनाज का दाना देख कर.

ये भी पढ़ें- गुरु की शिक्षा: क्या थी पद्मा की कहानी

लड़ाई जारी है: भाग 2- सुकन्या ने कैसे जीता सबका दिल

मेट्रिक में सुकन्या के 95 प्रतिशत अंक आये तो उसने भी डाक्टर बनने की अपनी इच्छा दादाजी के सामने प्रकट की. दादाजी जब तक कुछ कहते दादी कह उठीं,‘ लड़कियों को शिक्षा इसलिये दी जाती है जिससे उनका विवाह उचित जगह हो सके. कोई आवश्यकता नहीं डाक्टरी पढ़ने की…घर के काम में मन लगा, घर संभालने में तेरी पढ़ाई नहीं वरन् तेरी घर संभालने की योग्यता ही काम आयेगी.’

‘अरे भाग्यवान, अब समय बदल गया है, आजकल लड़कियाँ भी लड़कों की तरह पढ़ रही हैं और घर भी संभाल रही हैं. मनीषा तेरी वजह से ज्यादा नहीं पढ़ पाई किन्तु ससुराल में अपनी पढ़ाई पूरी कर कितने ही छात्रों को विद्यादान दे रही है. अपनी बहू की देख अगर यह पढ़ी होती तो क्या तेरे कटु वचन सुनती !! यह भी मनीषा की तरह ही नौकरी करते हुये अपने बच्चों का भविष्य संवार रही होती. मेट्रिक में हमारे घर में किसी के इतने अच्छे अंक नहीं आये जितने मेरी पोती के आये हैं…इसके बावजूद तुम ऐसा कह रही हो.’

‘ लड़की जात है ज्यादा सिर पर मत चढ़ाओ, बाद में पछताओगे.’ दादी बड़बड़ाती हुई अंदर चली गईं.

दादाजी बहुत दिनों से अम्माजी का सुकन्या के साथ रूखा व्यवहार देख रहे थे आज वह स्वयं पर संयम न रख पाये तथा दिल की बात जुबां पर आ ही गई. उन्होंने सुकन्या को उसकी इच्छानुसार मेडिकल में जाने के लिये अपनी स्वीकृति दे दी.

दादाजी से हरी झंडी मिलते ही सुकन्या ने बारहवीं की पढ़ाई करते हुये मेडिकल की तैयारी प्रारंभ कर दी. इसके लिये शहर से किताबें भी मँगवा लीं थीं. समय पर फार्म भी भर दिया. आखिर वह दिन भी आ गया जब उसे परीक्षा देने जाना था. वह अपने दादाजी के साथ परीक्षा देने जाने वाली थी कि अचानक दादी की तबियत खराब हो गई, आखिर दादाजी ने मनीषा को फोन कर अपने नौकर के साथ अनुराधा और सुकन्या को भेज दिया. साथ ही कहा बेटा, अगर तू न होती तो ऐसे अकेले इतने बड़े शहर में बहू को कभी अकेला न भेजता. उसने भी उन्हें चिंता न करने का आश्वासन दे दिया.

ये भी पढे़ं- Women’s Day: अकेली लड़की- कैसी थी महक की कहानी

परीक्षा वाले दिन मनीषा उसे परीक्षा सेंटर पर छोड़ने जाने लगी तो अनुराधा ने सुकन्या को दही चीनी खिलाते हुए  कहा,‘  बड़ा शहर है, अकेले इधर-उधर मत जाना…परीक्षा के बाद भी जब तक चंद्रेश, न पहुँच जाये तब तक इंतजार करना.’

मनीषा की एक मीटिंग थी जिसकी वजह से उसने चंद्रेश, अपने पुत्र को सुकन्या को एक्जामिनेशन सेंटर से लाने के लिये कह दिया था. शाम को परीक्षा समाप्त होने पर सुकन्या नियत स्थान पर खड़ी हो गई. लड़के-लड़कियाँ अपने-अपने घरों की ओर चल दिये. दस मिनट बीता, पंद्रह मिनट बीते…यहाँ तक कि आधा घंटा बीत गया. स्कूल का परिसर खाली होने लगा था…सूना परिसर उसे डराने लगा था. सुकन्या ने सोचा कि लगता हैं भइया किसी काम में फँस गये होंगे आखिर कब तक वह इसी तरह खडी रहेगी…!! शहर की भीड़-भाड़, चकाचौंध उसे आश्चर्यचकित कर रहे थे. गाँव से अलग एक नई दुनिया नजर आ रही थी. यहाँ लड़के -लड़कियाँ अपने स्कूटर से स्वयं आना जाना कर रहे थे जिनके पास स्वयं के वाहन नहीं थे ,वे आटो से जा रहे थे. अचानक उसे लगा अगर वह शहर की आत्मनिर्भर लड़कियों की तरह नहीं बन पाई तो पिछड़ जायेगी. कुछ हासिल करना है, तो हर परिस्थिति का मुकाबला करना होगा…  डर-डर कर नहीं वरन् हिम्मत से काम लेना होगा तभी वह जीवन में अपना लक्ष्य प्राप्त कर पायेगी.

बुआ का पता उसके पास ही था उसने आटो किया और चल दी. चंद्रेश वहाँ पहुँचा , सुकन्या को नियत स्थान पर न पाकर पूरे कालेज का चक्कर लगाकर घर पहुँचा.  उसे अकेले आया देखकर अनुराधा भाभी के तो होश ही उड़ गये. पहली बार सुकन्या घर से बाहर निकली है…इतना बड़ा शहर, पता नहीं कहाँ चली गई…? परीक्षा में मोबाइल ले जाना मना था अतः वह मोबाइल भी नहीं ले गई थी.

सुदेश चंद्रेश को डाँटने लगे कि वह समय पर क्यों नहीं पहुँचा. वह बेचारा भी सिर झुकाये बैठा था. वह करता भी तो क्या करता, ट्रेफिक जाम में ऐसा फँसा कि चाहकर भी समय पर नहीं पहुँच पाया. उसने तो सुकन्या से कहा भी था कि अगर देर भी हो जाये तो उसका इंतजार कर लेना पर उसके पहुँचने से पूर्व ही चली गई. इसी बीच मनीषा आ गई. मनीषा ने चंद्रेश को एक बार फिर सुकन्या को देखकर आने के लिये कहा. अनुराधा भाभी रोये जा रही थी…मनीषा भी डर गई थी पर भाभी को समझाने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती थी. चंद्रेश जाने ही वाला था कि घंटी बजी. दरवाजा खोलते ही सुकन्या ने अंदर प्रवेश किया उसे देखकर भाभी तो मानो पागल हो उठी…

वह उसे मारती जा रही थीं तथा कह रही थीं,‘ अकेले क्यों आई ? कुछ और देर इंतजार नहीं कर सकती थी…कहीं कुछ हो जाता तो मैं क्या जबाब देती तेरे दादाजी को….बस हो गई पढ़ाई, नहीं बनाना तुझे डाक्टर, बस तेरा विवाह कर दूँ , मुझे मुक्ति मिल जाए.’

सुदेश अनुराधा के इस अप्रत्याशित रूप को देखकर अवाक् थे वहीं मनीषा ने भाभी की मनःस्थिति समझकर उन्हें शांत कराने का प्रयत्न करने लगी…इसके बावजूद भाभी स्वयं पर काबू नही रख पा रही थीं.

सुकन्या उससे लिपटकर रोती हुई कह रही थी,‘ बुआ, आखिर गलती क्या है मेरी, कब तक मैं किसी की बैसाखी के सहारे चलती रहूँगी…? आखिर ये बंदिशें सिर्फ लड़की के लिये ही क्यों हैं..? क्यों उसे ही सदा अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है…? मैं लड़की हूँ इसलिये मुझे शहर पढ़ने के लिये नहीं भेजा गया…गाँव के ही स्कूल में मैंने जैसे तैसे पढ़ा जबकि मुझसे दो वर्ष छोटा भाई, उसे इंजीनियर बनना है इसलिये उसका शहर के अच्छे स्कूल दाखिला करवा दिया. वह हॉस्टल में रहता है, अकेले आता जाता है, उस पर तो कोई बंदिश नहीं है….फिर मुझ पर क्यों ?’

ये भी पडे़ं- बीजी यहीं है: क्या सही था बापूजी का फैसला

‘ भाभी, सुकन्या छोटी नहीं है, उसे अच्छे, बुरे का ज्ञान है. कब तक उसे अपने आँचल से बाँधकर रखोगी ? मुक्त कर दो उसे इन बंधनों से…तभी वह जीवन में कुछ कर पायेगी. क्या तुम चाहती हो कि वह भी तुम्हारी तरह ही घुट-घुट कर जीये…जिसके पल्लू से तुम उसे बाँध दो, उसी पर अपनी पूरी जिंदगी अर्पित कर दे. अपना अच्छा बुरा भी न सोच पाये. भाभी तुमने तो अपनी जिंदगी काट ली पर भगवान न करे इसकी जिंदगी में कोई हादसा हो जाए तो….उसे आत्मनिर्भर बनने दो.’ कहकर मनीषा ने सुकन्या को अपनी बाहों में भर लिया था.

भाभी की परेशानी वह समझ सकती थी. वह उन्हें ठेस नहीं पहुँचना चाहती थी पर उस समय अगर भाभी का पक्ष लेती तो सुकन्या के आत्मविश्वास और भावना को ही चोट पहुँचती जिससे वह अपने लक्ष्य से भटक सकती थी. वह उसे टूटते हुये नहीं वरन् सफल होते देखना चाहती थी तथा यह भी जानती थी कि सुकन्या का पक्ष लेना भाभी को खटकेगा, हुआ भी यही…अनुराधा भाभी आश्चर्य से उसकी ओर देखती रह गई, फिर धीरे से बोली,‘ दीदी, आपके दोनों बेटे हैं, आप नहीं समझ पाओगी, लड़की की माँ का दिल…..’

आगे पढे़ं- पिताजी के मन में द्वन्द था तो …

जड़ों से जुड़ा जीवन: भाग 4- क्यों दूर गई थी मिली

कहानी- वीना टहिल्यानी

मिली के मन से एक आह सी निकली, ‘तो आखिर, मैं आ ही गई अपने नगर, अपने शहर.’ जौन ने भारत के बारे में लाख पढ़ रखा था पर जो आंखों से देखा तो चकित रह गया. ज्योंज्यों गंतव्य नजदीक आ रहा था, मिली के दिल की धुकधुकी बढ़ती जा रही थी. कई सवाल मन में उठ रहे थे.

कैसी होंगी फरीदा अम्मां? पहचानेंगी तो जरूर. एकाएक ही सामने पड़ कर चौंका दूं तो? तुरंत न भी पहचाना तो क्या…नाम सुन कर तो सब समझ जाएंगी…मृणाल…मृणालिनी कितना प्यारा लग रहा था आज उसे अपना वह पुराना नाम.

लोअर सर्कुलर रोड के मोड़ पर, जिस बड़े से फाटक के पास टैक्सी रुकी वह तो मिली के लिए बिलकुल अजनबी था पर ऊपर लगा नामपट ‘भारती बाल आश्रम’ बिलकुल सही.

टैक्सी के रुकते ही वर्दीधारी वाचमैन ने दरवाजा खोला और सामान उठवाया.

अंदर की दुनिया तो मिली के लिए और भी अनजानी थी. कहां वह लाल पत्थर का एकमंजिला भवन, कहां यह आधुनिक चलन की बहुमंजिला इमारत.

सामने ही सफेद बोर्ड पर इमारत का इतिहास लिखा था. साथ ही साथ उस का नक्शा भी बना था. मिली ठहर कर उसे पढ़ने लगी.

सिर्फ 5 वर्ष पहले ही, केवलरामानी नाम के सिंधी उद्योगपति के दान से यह बिल्ंिडग बन कर तैयार हुई थी. मिली भौंचक्क सी रह गई. लाल गलियारे और हरे गवाक्ष, ऊंची छतों वाला शीतल आवास काल के गाल में समा चुका था. मिली अनमनी हो उठी.

रिसेप्शन पर बैठी लड़की ने रजिस्टर में उन का नाम पता मिलाया. गेस्ट हाउस में उन की बुकिंग थी. कमरे की चाबी निकाल कर जब लड़की उन का लगेज लिफ्ट में लगवाने लगी तो मिली ने डरतेडरते पूछा, ‘‘क्या मैं पहली मंजिल पर बनी नर्सरी को देखने जा सकती हूं?’’

लड़की ने बहुत शिष्टता से कहा, ‘‘मैम, उस के लिए आप को आफिस से अनुमति लेनी होगी. और आफिस शाम को 5 बजे के बाद ही खुलेगा.’’

‘‘तो आप ऊपर से फरीदा अम्मां को बुलवा दीजिए, प्लीज,’’ मिली ने हिचक के साथ अनुरोध किया.

लड़की ने जब यह कहा कि वह यहां की किसी फरीदा अम्मां को नहीं जानती तो मिली निराश सी हो गई. उस का लटका चेहरा देख कर जौन ने लिफ्ट में उसे टोकते हुए कहा, ‘‘चीयर अप सिस्टर, वी आर इन इंडिया…’’

मिली बेमन से हंस दी.

मिली ने विशेष आग्रह कर के अपने लिए मछली का झोल और भात मंगवाया. पहले उसे यह बंगाली खाना पसंद था पर आज 2 चम्मच से अधिक नहीं खा पाई, जीभ जलने लगी. आंखों में जल भर आया.

ये भी पढ़ें- तेजतर्रार तिजोरी: क्या था रघुवीर का राज

मिली की हताशा पर जौन हंस कर बोला, ‘‘चलो, चलो, पानी पियो…मुंह पोंछो… यह लो, मेरे सैंडविच खाओ.’’

जौन की लाख कोशिशों के बाद भी मिली अधीर और उदास ही बनी रही. इतने बदलावों ने उस के मन में इस शंका को भी जन्म दिया कि कहीं अगर फरीदा अम्मां भी…और इस के आगे वह और कुछ नहीं सोच सकी.

मिली के लिए 2 घंटे 2 युगों के बराबर गुजरे. 5 बजे कार्यालय खुला और जैसे ही संचालक महोदय आए मिली सब को पीछे छोड़ती हुई जौन को साथ ले कर उन के पास पहुंच गई.

संचालक, मिलन मुखर्जी आश्रम की बाला को बरसों बाद वापस आया जान खूब खुश हुए और आदरसत्कार कर मिली से इंगलैंड के बारे में, उस के परिवार के बारे में बात करते रहे. मिली ने अधीरता से जब नर्सरी देखने के लिए आज्ञापत्र मांगा तो मुखर्जी महोदय होहो कर हंस दिए और बोले, ‘‘अरे, तुम्हारे लिए कैसा आज्ञापत्र? तुम तो हमारी अपनी हो…यह तो तुम्हारा अपना घर है…चलो…मैं दिखाता हूं तुम्हें नर्सरी.’’

बड़ा सा हौल. छोटेछोटे पालने. नन्हेमुन्ने बच्चे. कितने सलोने, कितने सुंदर. वह भी तो ऐसे ही पलीबढ़ी है, यह सोचते ही मिली का मन फिर उमड़ने- घुमड़ने लगा.

हौल में बच्चों को पालनेपोसने वाली मौसियां उत्सुकता से मिलीं. वे सब जौन को देखे जा रही थीं. मुखर्जी बाबू ने बड़े अभिमान से मिली का परिचय दिया कि यहीं की बच्ची है मृणालिनी, अब लंदन से अपने भाई के साथ आई है.

हौल में हलचल सी मच गई. खूब मान मिला. मिली के साथसाथ लंबे जौन ने भी सब को बड़ा प्रभावित किया.

मिली बच्चों से मिली. बड़ों से मिली लेकिन उस फरीदा अम्मां से नहीं मिल पाई जिस के लिए समंदर पार कर वह भारत आई थी.

‘‘बाबा, फरीदा अम्मां कहां हैं?’’ उसे याद है बचपन में संचालक को सभी बच्चे बाबा ही कह कर बुलाते थे. आज मुखर्जी बाबू के लिए भी मिली के पास वही संबोधन था.

‘‘कौन? फरीदा बेग? अरे, वह 4-5 साल पहले तक यहीं थी. उस की नजर कमजोर हो गई थी. मोतियाबिंद का आपरेशन भी हुआ पर अधिक उम्र होने के कारण वह काम नहीं कर पाती थी, लेकिन रहती यहीं थी. फिर एक दिन उस का बेटा सेना से स्वैच्छिक अवकाश ले कर आ गया और वह अपने साथ फरीदा को भी ले गया,’’ मुखर्जी ने पूरी जानकारी एकसाथ दे दी.

अम्मां चली गई हैं, यह जानते ही मिली का चेहरा सफेद पड़ गया. उस के निरीह चेहरे को देख कर जौन ने एक और प्रयत्न किया, ‘‘आप के पास उन का कोई पता तो होगा ही मिस्टर मुखर्जी?’’

‘‘हां…हां, क्यों नहीं. आप उन से मिलने जाएंगे? खूब खुश होंगी वह अपनी पुरानी बच्ची से मिल कर.’’ मुखर्जी बाबू आनंदित हो उठे. मिली की जाती जान जैसे वापस लौट आई.

पुराने खातों की खोज हुई. कोलकाता के उपनगर दमदम से भी आगे, नागेर बाजार के किसी पुराने इलाके का पता लिखा था.

अगले दिन, संचालक ने उन के जाने के लिए टूरिस्ट कार की व्यवस्था कर दी.

अम्मां के लिए फलफूल लिए गए. चौडे़ पाड़ वाली बंगाली धोती खरीदी गई. मिली बहुत खुश थी. आखिर दूरियां नापतेनापते जब वे दिए गए पते पर पहुंचे तो पता चला कि वहां तो कोई और परिवार रहता है. पड़ोसियों से पूछताछ की लेकिन पक्के तौर पर कोई कुछ कह न सका. शायद वे अपने गांव उड़ीसा चले गए थे, जहां उन की जमीन थी. पर वहां का पता किसी को मालूम न था.

मिली की तो जैसे सुननेसमझने की शक्ति ही जाती रही. फिर रुलाई का ऐसा आवेग उमड़ा कि उस की हिचकियां बंध गईं. जौन ने उसे संभाल लिया. बांहों में उसे बांध कर उस का सिर सहलाया. स्नेह से समझाया पर मिली तो जैसे कुछ सुननेसमझने के लिए तैयार ही न थी.

उस का कातर कं्रदन जारी रहा तो जौन घबरा उठा. कंधे झकझोर कर उस ने मिली को जोर से डांटा, ‘‘मिली, बहुत हुआ…अंब बंद करो यह नादानी.’’

‘‘यहां आना तो बेकार ही हो गया न जौन,’’ मिली रोंआसे स्वर से बोली.

ये भी पढ़ें- बदला व्यवहार: क्या हुआ था जूही के साथ

‘‘यह तो बेवकूफों वाली बात हुई,’’ जौन फिर नाराज हुआ, ‘‘अरे, अपने भाई के साथ तुम वापस अपने देश आई हो. मैं तो पहली बार ही इंडिया देख रहा हूं और इसे तुम बेकार कहती हो. असल में मिली, तुम्हारी अपेक्षाएं ही गलत हैं. तुम ने सोचा, तुम जो जैसा जहां छोड़ गई हो वह वैसा का वैसा वहीं पाओगी. बीच के समय का तुम्हें जरा भी विचार नहीं…तुम्हें तुम्हारा पुराना भवन न दिखा तो तुम निराश हो गईं. फरीदा अम्मां न मिलीं तो तुम हताश हो उठीं. तनिक यह भी सोचो कि बिल्ंिडग कितनी सुविधामयी है. फरीदा अम्मां अपने परिवार के साथ सुख से हैं. यह    दुख की बात है कि तुम उन से नहीं मिल पाईं पर इस बात को दिल से तो न लगाओ. जिन को चाहती हो, प्यार करती हो उन को अपना आदर्श बनाओ. जुझारू, बहादुर और सेवामयी बनो, फरीदा अम्मां जैसे.’’

भाई की बातों को ध्यान से सुनती मिली एकाएक ही बोल पड़ी, ‘‘जौन, मैं तो अभी कितनी छोटी हूं…मैं भला क्या कर सकती हूं.’’

‘‘तुम क्याक्या कर सकती हो, समय आने पर सब समझ जाओगी. फिलहाल तो तुम इस संस्था को कुछ दान दो जिस ने तुम्हें पाला, पोसा, बड़ा किया, प्यार दिया. मौम तुम्हें कितना सारा पैसा दे कर गई हैं…आओ, मैं तुम्हें चेक भरना बताऊं.’’

दोनों भाईबहनों ने ‘भारती बाल आश्रम’ के नाम एक चेक बनाया जिसे चुपचाप गलियारे में रखे दानपात्र में डाल दिया.

‘‘कोलकाता घूम कर शांतिनिकेतन चलेंगे फिर नालंदा और बोधगया देखेंगे. उस के बाद आगरा का ताज देख कर दिल्ली पहुंचेंगे और दिल्ली दर्शन के बाद वापस लंदन लौट चलेंगे. इस ट्रिप में तो बस, इतना ही घूमा जा सकता है.’’

आंख खुली तो मिली ने देखा एक सितारा अभी भी अपनी पूरी निष्ठा से दमक रहा था. मिली इस सितारे को पहचानती है यह भोर का तारा है.

फरीदा अम्मां कहती थीं, भोर का यह तारा भूलेभटकों को राह दिखाता है, दिशाहारों की उम्मीद जगाता है. बड़ा ही हठीला है पूरब दिशा का यह सितारा. किरणें उसे लाख समझाएं पर जबतक सूरज खुद नहीं आ जाता यह जिद्दी तारा जाने का नाम ही नहीं लेता. इसी हठी सितारे के आकर्षण में बंधी मिली बिस्तर से उठ खड़ी हुई.

पिछवाड़े की बालकनी खोल मिली ने बाहर कदम रखा ही था कि सहसा ठिठक गई. सामने जटाजूटधारी बरगद खड़ा था. वही वैभवशाली वटवृक्ष. पहले से कहीं ऊंचा, उन्नत, विराट और विशाल.

मिली ने हाथ आगे बढ़ा कर हौले से पेड़ के पत्तों को सहलाया, धीरे से उस की डालों को छुआ, मानो पूछ रही हो कि  पहचाना मुझे? मैं मिली हूं जो कभी तुम्हारी छांव में खेलती थी, तुम्हारी जटाओं पर झूलती थी. और इस तरह एक बार फिर मिली बचपन में भटकने लगी थी.

अचानक मसजिद से अजान की आवाज उभरी तो किसी मंदिर के घंटे घनघना उठे. और यह सब सुनते ही मिली को अभिमान हो आया कि कैसी विशाल, विराट, भव्य और उदार है उस की मातृभूमि.

मौम सच कहती थीं, हर जीवन अपनी जड़ों से जुड़ा होता है. मनुष्य अपनी माटी से अनायास ही आकर्षित होता है. अपनी जमीन और अपनी मिट्टी ही देती है व्यक्ति को असीम ऊर्जा और अलौकिक आनंद.

दिन चढ़ने लगा था. कोलकाता शहर के विहंगम विस्तार पर सूरज दमक रहा था. सड़कों पर गलियों में धूप पसर रही थी. सूरज की किरणों के साथ ही जैसे संपूर्ण शहर जाग उठा था.

मिली को अचानक ही लंदन की याद हो आई. शांत, सौम्य लंदन. लंदन उस का अपना नगर, अपना शहर, जहां बर्फ भी गिरती है तो चुपचाप बेआवाज. सर्द मौसम में, पेड़ों की फुनगियों पर, घरों की छतों पर, सड़कों और गलियों में. यहां से वहां तक बस चांदी ही चांदी, बर्फ की चांदी. मिली के मन में जैसे बर्फ की चांदी बिखर गई. मिली अकुला उठी. उसे अपना घर याद हो आया. भोर का सितारा तो न जाने कब, कहां निकल गया था. अब तो उसे भी जाना था, वापस अपने घर.

ये भी पढ़ें- घुट-घुट कर क्यों जीना

जानें कैसे Dancing से एक्टिंग में आए फैजल खान, पढ़े इंटरव्यू

अभिनेता फैसल खान एक अभिनेता और डांसर है, उन्हें बचपन से डांस का शौक है. उन्होंने रियलिटी शो डांस इंडिया डांस लिटल मास्टर 2 के विजेता रहे. उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में डांस रियलिटी शो में भाग लिया और इसके विजेता बनने पर 10 लाख रुपये मिले. इसके अलावा उन्होंने “डांस के सुपरकिड्स“, “इंडियाज बेस्ट ड्रामेबाज़“, “डीआईडी ​​डांस का टशन” आदि कई डांस रियलिटी शो में भाग लिया. फैजल ने टीवी डेब्यू 2013 में ऐतिहासिक टीवी धारावाहिक “भारत के वीर पुत्र महाराणा प्रताप’ में बाल महाराणा प्रताप की भूमिका निभाई, इसके अलावा फैजल ने भारतीय ऐतिहासिक टीवी शो “चंद्रगुप्त मौर्य” में युवा चंद्रगुप्त मौर्य की मुख्य भूमिका निभाई.प्रसिद्ध शो C.I.D.के भी कुछ एपिसोड में फैजल ने काम किया है. उन्होंने हिपहॉप डांस फॉर्म सीखा है और आज भी उन्हें डांस करना बेहद पसंद है.

स्वभाव से हंसमुख फैजल के पिता मुंबई में ऑटोरिक्शा चलाते है और उनकी माँ गृहिणी है. फैजल को यहाँ तक पहुँचने में वह अपने माता- पिता का श्रेय मानते है, जिन्होंने उन्हें पढाई पर अधिक ध्यान न देकर डांस के लिए प्रेरित किया. सोनी सब पर उनकी फिक्शन शो ‘गरुड़’ आने वाली है, वे बहुत खुश है, क्योंकि कोविड के बाद एक अच्छी शो में काम मिला है. इसमें उनकी भूमिका गरुड़ की है, बात करना रोचक रहा, पेश है कुछ अंश

सवाल – कोरोना के बाद अभी शूटिंग पर कितनी सावधानी रख रहे है?

जवाल – कोरोना के बाद हम सभी हायजिन और साफ़-सफाई पर अधिक ध्यान देने लगे है. अभी कोई छींकता है या थूकते है,तो डर लगने लगता है. पहले लोग हमेशा ही छींकते थे, पर मुझे कुछ नहीं लगता था. सब्जी वाला अगर थूक से नोट गिनकर दें तो उससे सब्जी मैं नहीं लेता. हांलांकि पहले से ही ये जागरूकता लोगों में आनी चाहिए थी, पर अब काफी लोग समझने लगे है. शूट भी बहुत सावधानी के साथ किया जाता है और मुझसे तो लोग 6 फीट की दूरी पर ही रहते है, इसलिए मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. इस बदलाव से मुझे बहुत ख़ुशी हुई है, सभी जगहों पर सेनिटाईजर और मास्क के साथ जाना पड़ता है. ये एक आदत बन चुकी है और ये अच्छी भी है.

ये भी पढे़ं- GHKKPM: श्रीदेवी बनकर विराट का दिल जीतेगी सई, देखें प्रोमो

सवाल – इस फील्ड में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

जवाब – मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं यहाँ तक पहुँच सकता हूं, ये माता-पिता का सब्र है, जिसकी वजह से मैं यहाँ तक आ पाया. मैं जिस माहौल से आया हूं, वहां किसी ने कभी नहीं सोचा था, मेहनत करते-करते आगे बढ़ा. पहले मुझे डांस का बहुत शौक था. मैंने मुश्किल से इसे सीखा. फिर टीवी पर ‘डांस इंडिया डांस का ऑडिशन हो रहा था, मैंने उसमे फॉर्म भरा और सेलेक्ट हुआ, विजेता भी बना, फिर किसी ने मेरे डांस को देखकर मुझे शो में कास्ट किया और अब यहाँ तक पहुंचा हूं. बचपन में अपनी बहनों के साथ बेहोश हो जाने का एक्टिंग करता था, लेकिन रियल में एक्टिंग करूँगा, पता नहीं था.

सवाल –इस शो की भूमिका में खास क्या थी?

जवाब – ये भूमिका बहुत चुनौतीपूर्ण और अलग है, क्योंकि गरुड़ के बारें में बहुत कम लोग जानते है,गरुड़ एक पक्षी है, बस इतना ही मैं जानता हूं, फिर इसे इस कहानी में कैसे काम करना है ये सब मुझे प्रेरित किया और मैने हां कह दी.

सवाल – पक्षी की भूमिका निभाने के लिए क्या-क्या करना पड़ा?

जवाब – बहुत तैयारी करनी पड़ी,मानसिक रूप से अधिक तैयारी करनी पड़ी, क्योंकि ऐसा चरित्र मैंने कभी देखा नहीं था, एनिमेटेड भी नहीं मिला. सिर्फ रियल गरुड़ देखने को मिले. इसलिए मैंने मन में सोचा कि अगर गरुड़ होगा, तो देखने में कैसा होगा, उसकी चाल कैसी होगी, कैसे अपने संवाद बोलेगा, कब उसकी चोंच आएगी आदि सब मानसिक रूप से तैयार करना पड़ा. ये तैयारी मैं दो महीने पहले से कर रहा हूं. मेरा वजन 10 किलो अधिक था और एक पक्षी को इतना मोटा नहीं मस्क्युलर होना चाहिए, क्योंकि जब उड़े तब हल्का हो. इसलिए मुझे वजन कम करना पड़ा.

सवाल – इस शो से यूथ को किस तरह की प्रेरणा मिलेगी?आप में कितना बदलाव आया है?

जवाब –इस शो में दिखलाया गया है कि माँ की हर बात को बेटा गरुड़ किस तरह से मानता है, जबकि आज के माहौल में बच्चे माता – पिता की बात को सुनते नहीं है, बहुत कम ऐसे यूथ है जो सुनना चाहते है. बच्चे को माता-पिता की बात सुनना जरुरी है. वे बच्चे की भलाई के लिए ही कुछ कहते है. इस शो से कुछ बच्चों में सीख अवश्य मिलेगी.

इस शो से मैं कुछ बदला नहीं हूं, लेकिन मेरी चाल बदल गई है, क्योंकि 6 फीट दायें और 6 फीट बायें हाथ में पंख लेकर चलना पड़ता है, इससे मैं आम समय में भी कंधा उपर कर चलता हूं. नार्मल चलना मुश्किल हो गया है.

सवाल – आज की दुनिया में अधिकतर यूथ विद्रोही क्यों होते है, परिवार छोड़कर चले जाते है, आपकी सोच इस बारें में क्या कहती है?

जवाब – सच बात यह है कि आज के पेरेंट्स बच्चों की बहुत अधिक केयर करते है, जिससे वे इंडिपेंडेंट नहीं बन पाते, मेरा परिवार भी मेरा केयर करते है पर उस हद तक नहीं, उनके हिसाब से मुझे खुद आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है, क्योंकि उनके न रहने पर भी मैं अपनी जिम्मेदारी खुद सम्हाल सकूँ. इसमें पेरेंट्स और बच्चे सभी को समझने की जरुरत है.

ये भी पढ़ें- शादी के बाद रोमांस करते दिखे Imlie और आर्यन! वीडियो वायरल

सवाल – क्या आप हिंदी फिल्म और टीवी सीरीज में काम करना चाहते है?

जवाब – अवश्य करना चाहता हूं, लेकिन मुझे मेरे लायक भूमिका मिलनी चाहिए. कोविड की वजह से वेब सीरीज का क्रेज़ बढ़ी है, कई निर्माता निर्देशक जो टीवी पर शो बनाते थे, उन्होंने वेब सीरीज बनाना शुरू कर दिया है. एक बार ऐसा भी लगा था कि टीवी बंद हो जायेगी. मेरे घर में केबल नहीं है, हम सभी वेब सीरीज ही देखते है. वेब सीरीज ठीक है, पर कभी – कभी ऐसी सीन्स आती है कि सबके सामने बैठकर देखना मुश्किल हो जाता है. असल में वेब सीरीज बहुत खुलकर सबको दिखाती है. एक अच्छी सीरीज में काम मिले तो अवश्य करना चाहूंगा. मुझे सुपर नैचुरल कहानियां बहुत पसंद है. इसके अलावा मिर्जापुर वाला मुन्नाभाई का चरित्र करने की इच्छा है.

सवाल – कोई सुपर पॉवर मिलने पर आप क्या बदलना चाहते है?

जवाब – सुपर पॉवर मिलने पर मैं देश के लोगों की सोच को बदलना चाहता हूं, क्योंकि आज भी धर्म और पहनावे को लेकर बात की जाती है, झगड़े होते है, लेकिन किसी को अगर खून की जरुरत हो, तो वह जाति और धर्म नहीं देखता, भागकर रोगी को बचाता है.

GHKKPM: श्रीदेवी बनकर विराट का दिल जीतेगी सई, देखें प्रोमो

स्टार प्लस के सीरयल ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisi key Pyaar Meiin) की कहानी में फैंस विराट और सई के रोमांस का इंतजार कर रहे हैं. इसी बीच शो के मेकर्स ने एक प्रोमो रिलीज किया है, जिसमें खूबसूरत अंदाज में सई, विराट को प्रपोज करती नजर आ रही हैं. आइए आपको दिखाते हैं प्रोमो की झलक…

श्रीदेवी बनी सई

 

View this post on Instagram

 

A post shared by StarPlus (@starplus)

इन दिनों सई से नाराज विराट चौह्वाण निवास लौट आया है. वहीं सई भी विराट को मनाने के लिए घर वापस लौट आई है. हालांकि चौह्वाण परिवार इस बात से नाखुश नजर आ रहा है. इसी बीच मेकर्स द्वारा शेयर किए गए नए प्रोमो में सई चुपचाप अस्पताल जाकर डॉक्टर की ड्रेस पहने नजर आ रही है. वहीं अपना चेहरा छिपाकर विराट (Neil Bhatt) के पास जाती है और श्रीदेवी के पौपुलर गाने ‘कांटे नहीं कटते दिन और रात’ पर डांस करती हुई नजर आ रही है. वहीं सई का ये अंदाज देखकर विराट के दिल में प्यार का एहसास होता है. लेकिन वह अपनी नाराजगी दिखाता हुआ नजर आता है.

ये भी पढ़ें- शादी के बाद रोमांस करते दिखे Imlie और आर्यन! वीडियो वायरल

भवानी करेगी ये काम

इसके अलावा सीरियल के अपकमिंग एपिसोड की बात करें तो सई के चौह्वाण परिवार में कदम रखते ही भवानी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाएगा और वह उसे घर से निकालने की कोशिश करेगी. वहीं भवानी की बातों का जवाब देते हुए वह विराट के साथ तलाक के कागज फाड़ देगी, जिसे देखकर पाखी समेत पूरा परिवार हैरान रह जाएगा. इसी के कारण पाखी, भवानी को सई के खिलाफ भड़काने का काम करती नजर आएगी.

बता दें, सीरियल के लीड कलाकार यानी नील भट्ट और ऐश्वर्या शर्मा इन दिनों स्मार्ट जोड़ी शो में नजर आ रहे हैं, जिसे दर्शक काफी पसंद कर रहे हैं. हालांकि दोनों की इस जोड़ी को कुछ ट्रोल भी करते नजर आते रहे हैं.

ये भी पढ़ें- Nimki Mukhiya बनीं दुल्हन, देखें वेडिंग फोटोज

शादी के बाद रोमांस करते दिखे Imlie और आर्यन! वीडियो वायरल

सीरियल इमली (Imlie) की कहानी में जल्द ही नया मोड़ आने वाला है, जिसके चलते आर्यन और इमली की शादी होती नजर आएगी. हालांकि ये एक झूठी शादी होगी. इसी बीच सीरियल के सेट से एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें शादी के बाद इमली और आर्यन साथ में डांस और रोमांस करते नजर हुए नजर आ रहे हैं. आइए आपको दिखाते हैं वायरल वीडियो…

रोमांस करते दिखे आर्यन-इमली

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sumbul Touqeer Khan (@sumbul_touqeer)

इन दिनों सीरियल में आर्यन और आदित्य के बीच लड़ाई देखने को मिल रही है. हालांकि इमली पूरी कोशिश कर रही है कि वह आदित्य को बचा सके. वहीं अब इमली के रोल में नजर आने वाली सुंबुल तौकीर खान ने आर्यन यानी फहमान खान संग एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें दोनों रोमांस करते नजर आ रहे हैं. फैंस को दोनों की ये जोड़ी काफी पसंद आ रही है, जिसके चलते सोशलमीडिया पर दोनों की वीडियो वायरल हो रही है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by gashhhh (@aditya_kumartriphati)

ये भी पढे़ं- Nimki Mukhiya बनीं दुल्हन, देखें वेडिंग फोटोज

लाल साड़ी और चूड़ा पहनें दिखी इमली

वीडियो की बात करें तो इमली लाल साड़ी पहने नई नवेली दुल्हन की तरह सजी धजी नजर आ रही हैं. वहीं आर्यन और इमली दोनों एक दूसरे के साथ डांस करते नजर आ रहे हैं. हालांकि सुंबुल और फहमान की ये वीडियो एक #reel है, जिसे देखकर फैंस दोनों को सीरियल में भी ऐसे रोमांस करने के लिए कहते नजर आ रहे हैं.

सीरियल में आएगा नया ट्विस्ट

सीरियल की कहानी की बात करें तो अपकमिंग एपिसोड में आर्यन, इमली के साथ शादी की शर्त रखेगा, जिसे वह आदित्य के लिए मान जाएगी. वहीं इमली के दिल में अपने लिए प्यार देखकर वह उसे प्रपोज करेगा. लेकिन इमली उसे मना करते हुए कहेगी कि उसकी शादी आर्यन से हो चुकी है, जिसके कारण आदित्य को झटका लगता नजर आएगा.

ये भी पढ़ें- Aditya Narayan ने 15 साल बाद कहा SaReGaMaPa को अलविदा

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें