Parivarik Kahani: माधुरी दीक्षित सी सुंदर लड़की

Parivarik Kahani: लगभग 20 साल बाद जब उस दिन मैं ने अल्पना को देखा तो सोचा भी नहीं था कि अमेरिका वापस जाते वक्त एक विलक्षण सी परिस्थिति में अल्पना भी मेरे साथसाथ अमेरिका जा रही होगी…

उस दिन ड्राईक्लीन हो कर आए कपड़ों में मेरे कुरते पाजामे की जगह लेडीज ड्रैस देख कर उसे वापस दे कर अपना कुरता पाजामा लेने के लिए मैं ड्राईक्लीन की दुकान पर गया था. वहीं पर मैं ने इतने सालों बाद अल्पना को देखा.

उसे दुकानदार से झगड़ता देख कर विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसी बेहूदगी बातें करने वाली औरत अल्पना होगी. लेकिन यकीनन वह अल्पना ही थी.

कुछ देर तक तो मैं दुकानदार और अल्पना के बीच का झगड़ा झेलता रहा और फिर दुकान के बाहर से ही बिना अल्पना की तरफ देखते हुए बड़े ही शांत स्वर में मैं ने दुकानदार से कहा, ‘‘भैयाजी, मेरे कुरते पाजामे की जगह यह किसी की लेडीज ड्रैस आ गई है मेरे कपड़ों में… प्लीज, जरा देखेंगे क्या?’’

‘‘अरे, यह मेरी ड्रैस आप के पास कैसे आई? 4-5 दिन हो गए हैं इसे खोए हुए… इतने दिन क्यों सोए रहे?’’ गुस्से से कह अल्पना ने लगभग झपटते हुए मेरे हाथ से ड्रैस ले ली.

यह सब कहते हुए उस ने मुझे देखा नहीं था. लेकिन मैं ने उसे पहचान लिया था. उस के गुस्से को नजरअंदाज करते हुए मैं ने कहा था, ‘‘अरे, अंजू तुम? तुम यहां कैसे? तुम… आप अल्पना ही हैं न?’’

मेरी बात सुन उस ने तुरंत मेरी तरफ देखा और फिर बोली, ‘‘अरे हां, मैं वही तुम्हारी बैस्ट फ्रैंड अल्पना हूं… लेकिन आप यानी अरुण यहां कैसे? आप तो अमेरिका सैटल हो गए थे न?’’

फिर करीब 10-15 मिनट की बातचीत में उस ने 20 सालों का पूरा लेखाजोखा मेरे सामने रख दिया था. मेरे अमेरिका जाने के तुरंत बाद ही उस की शादी हो गई थी. अमीर मांबाप की लाडली बेटी होने के बावजूद मांबाप की अपेक्षाओं के विपरीत जगह उस की शादी हुई थी. उस का पति किसी प्राइवेट कंपनी में सहायक मैनेजर तो था, लेकिन घर के हालात बहुत अच्छे नहीं थे. इसीलिए उसे अपनी सैंट्रल गवर्नमैंट की नौकरी अब तक जारी रखनी पड़ी थी. उस की एक ही बेटी है और इंजीनियरिंग के आखिरी साल में पढ़ रही है. और ऐसी कितनी ही बातें वह लगातार बताती जा रही थी और बिना कुछ बोले मैं उसे निहारता जा रहा था.

इन 20 सालों में अल्पना थोड़ी मोटी हो गई थी, लेकिन अब भी बहुत सुंदर लग रही थी… गोरा रंग, बड़ीबड़ी आंखें और कंधों तक कटे बाल… सचमुच आज भी अल्पना उतनी ही आकर्षक थी जितनी 20 साल पहले थी.

बीते सालों की कई यादें संजोए हुए मैं सोच ही रहा था कि उस से क्या कहूं, तभी वह फिर से बोल पड़ी, ‘‘तुम कब आए अमेरिका से यहां? अब यहीं रहोगे कि वापस जाओगे? मृणाल कैसी है? बालबच्चे कितने हैं तुम्हारे?’’

‘‘अरे भई, अब सारी बातें यहीं रास्ते में खड़ीखड़ी करोगी क्या? चलो घर चलो मेरे… मैं यहीं पास में रहता हूं. मैं अपनी कार ले कर आया हूं… चलो घर चलो.’’

‘‘नहीं नहीं, आज रहने दो. आज जरा जल्दी में हूं… फिर कभी… अपना कार्ड दे दो… मैं पहुंच जाऊंगी कभी न कभी तुम्हारे घर.’’

‘‘अभी थोड़ी देर पहले दुकानदार से लड़ते वक्त तो तुम्हें जल्दी नहीं थी… अब कह रही हो जल्दी में हूं…’’

‘‘लड़ने से फायदा ही हुआ न? एक तो तुम मिल गए और मेरी बेटी की खोई हुई ड्रैस भी मिल गई.’’

‘‘लड़ने झगड़ने में काफी ऐक्सपर्ट हो गई हो तुम. क्या पति से भी ऐसे ही लड़ती हो?’’

‘‘और नहीं तो क्या…? कुदरत ने हर औरत को एक पति लड़ने के लिए ही तो दिया होता है… मृणाल ने तुम्हें बताया नहीं अब तक?’’

हम बातें करते करते मेरी गाड़ी के बिलकुल पास आ गए थे. मेरी नई मर्सिडीज को देख कर अल्पना की आंखें कुछ देर चुंधिया सी गई थीं और फिर अचानक बोल पड़ी थी, ‘‘वाऊ… मर्सिडीज… बड़े ठाट हैं तुम्हारे तो.’’

मेरी कार को निहारते वक्त अल्पना का चेहरा किसी भोलेभाले बच्चे सा हो गया था.

‘‘चलो, अंजू आज मैं ही तुम्हें तुम्हारे घर तक पहुंचा देता हूं… तुम्हारा घर भी देख लूंगा… चलो बैठो.’’

‘‘वाऊ, दैट्स ग्रेट… लेकिन थोड़ी देर रुको… मैं ने यहीं पास की गली में अपनी ड्रैस सिलने दी है. अभी उसे ले कर आती हूं… गली बहुत छोटी है… तुम्हारी मर्सिडीज नहीं जा सकती… मुझे सिर्फ 5-10 मिनट लगेंगे… चलेगा?’’

‘‘औफकोर्स चलेगा… मैं यहीं गाड़ी में बैठ कर तुम्हारा इंतजार करता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘ठीक है,’’ कह कर वह चली गई.

गाड़ी में बैठेबैठे 20 साल पहले की न जाने कितनी यादें मेरे मन में उमड़ने लगीं…

20 साल पहले यहां दिल्ली में ही लाजपत नगर में हम दोनों के परिवार साथसाथ के मकानों में रहते थे. हमारे 2 मकानों के बीच सिर्फ एक दीवार थी. आंगन हमारा साझा था. अल्पना के परिवार में अल्पना के मांबाप, अल्पना और उस का उस से 10 साल छोटा भाई सुरेश यानी 4 लोग थे. मेरा परिवार अल्पना के परिवार से बड़ा था. हमारे परिवार में मां बाबा, हम 4 भाई बहन, हमारी दादी और हमारी एक बिनब्याही बूआ कुल 8 लोग थे. लाजपत नगर में तब सिर्फ हमारे ही 2 परिवार महाराष्ट्रीयन थे, इसलिए हमारे दोनों परिवारों में बहुत ज्यादा प्यार और अपनापन था.

अल्पना की मां मेरी मां से 10-12 साल छोटी थीं, इसलिए हर वक्त मेरी मां के पास कुछ न कुछ नया सीखने हमारे घर आती रहती थीं. अल्पना का छोटा भाई सुरेश अल्पना से 10 साल छोटा होने के कारण हम दोनों परिवारों में सब से छोटा था, इसलिए सब को प्यारा लगता था. अल्पना के पिताजी बैंक में बहुत बड़ी पोस्ट पर होने के कारण हरदम व्यस्त रहते थे. अल्पना देखने में सुंदर तो थी ही, लेकिन उस के बातूनी, चंचल और मिलनसार स्वभाव के कारण हम सभी भाई बहनों की वह बैस्ट फ्रैंड बन गई थी. मेरी दोनों बहनें तो हरदम उसी की बातें करती रहतीं… मेरा बड़ा भाई अजय अपने नए नए शुरू किए बिजनैस में हरदम व्यस्त रहता था, लेकिन मेरे और अल्पना के हमउम्र होने के कारण हमारी बहुत बनती थी.

12वीं कक्षा तक मैं और अल्पना एक ही स्कूल में पढ़ते थे. 12वीं कक्षा पास करने के बाद इंजीनियरिंग करने के लिए मैं मुंबई चला गया. इंजीनियरिंग करतेकरते मेरी अपनी क्लास की मृणाल से दोस्ती हो गई, जो फिर प्यार में बदल गई. शादी करने के बाद मृणाल और मैं दोनों अमेरिका चले गए. उस के बाद अल्पना और उस के परिवार की यादें मेरे लिए धुंधली सी पड़ती गई थीं.

मैं अमेरिका में ही था. तभी अल्पना की शादी हो गई थी. यह खबर मुझे अपनी मां से मिली थी. मां बाबा थे तब तक अल्पना और उस के परिवार की कुछ न कुछ खबर मिलती रहती थी… 7-8 साल पहले मां का और फिर बाबा का देहांत हो जाने के बाद कभी इतने करीबी रहने वाले अल्पना के परिवार से मानों मेरा संबंध ही टूट गया था.

आजकल सचमुच जीवन इतना फास्ट हो गया है कि जो वर्तमान में चल रहा है बस उसी के बारे में हम सोच सकते हैं… बस उसी से जुड़े रहते हैं… कभीकभार भूतकाल इस तरह अल्पना के रूप में सामने आ जाता है तभी हम भूतकाल के बारे में सोचने लगते हैं.

मैं अपने ही विचारों में खोया हुआ था कि तभी अल्पना सामने आ खड़ी हुई तो मैं वर्तमान में लौटा. फिर कार का दरवाजा खोल कर अल्पना को बैठने को कहा.

‘‘क्यों, मन अमेरिका पहुंच गया था क्या?’’ कार में बैठते हुए अल्पना ने कहा, ‘‘अमेरिका से कब आए? अब क्या यहीं रहोगे या वापस जाना है?’’

‘‘वापस जाना है… यहां बस साल भर के लिए एक प्रोजैक्ट पर आया हूं…. यहां पास ही एक किराए पर मकान ले लिया है… आजकल इंडिया में काफी सुविधाएं हो गई हैं.’’

‘‘और मृणाल कैसी है? बच्चे क्या कररहे हैं?’’

‘‘एक ही बेटा है.’’

‘‘क्या पढ़ाई कर रहा है?’’

‘‘इंजीनियरिंग कर रहा है… आखिरी साल है उस का भी.’’

‘‘यानी तुम्हें भी एक ही लड़का है?’’

‘‘हांहां, बिलकुल तुम्हारी ही तरह हम दोनों एक जान और हमारी अकेली जान.’’

हम बातें करतेकरते अल्पना के घर तक पहुंच गए थे. अल्पना के कहने पर मैं उस का फ्लैट देखने ऊपर उस के घर गया.

छोटा सा 2 कमरों का फ्लैट था, लेकिन निहायत खूबसूरती से सजाया गया था. डाइनिंग टेबल के साथ लगी खिड़की के इर्दगिर्द लहराता हुआ मनीप्लांट, घर के द्वार पर रखा मोगरे का गमला. उस छोटे से ड्राइंगरूम में घर की हर चीज घर की गृहिणी की कलात्मक रुचि की गवाही दे रही थी.

घर को निहारते हुए अनायास ही मैं बोल पड़ा, ‘‘वाह, क्या बढि़या सजा रखा है तुम ने घर… नौकरी करते हुए भी कैसे कर लेती हो यह सब…?’’

मेरी बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि तभी अंदर से एक बेहद हैंडसम व्यक्ति लगभग चिल्लाता हुआ बाहर आया और अल्पना पर बरस पड़ा, ‘‘इतनी देर तक कहां मटरगस्ती हो रही थी… मुझे काम पर जाना है… याद भी है? तुम्हारी तरह औफ नहीं है मेरा.’’

अल्पना की बड़ी विचित्र स्थिति हो गई थी. मैं भी हैरान हो कर कभी अल्पना को कभी उस इनसान को देख बड़ी मुश्किल से खुद को संभाले खड़ा था.

‘‘ये मेरे पति हैं शशिकांत और शशि ये हैं अरुण… मैं ने तुम्हें इन के बारे में बताया था न… हमारे पड़ोस में रहते थे,’’ अल्पना ने कुछ झेंपते हुए अपने पति से मेरी मुलाकात करानी चाही थी.

‘‘अच्छा… ठीक है… लेकिन मेरे पास अब जरा भी फुरसत नहीं है और होती भी तो तुम्हारे पुराने यारों से परिचित होने का मुझे कोई शौक नहीं है…’’ कह वह मेरे हाथ मिलाने के लिए बढ़े हाथ को इग्नोर कर अंदर चला गया.

मैं अवाक खड़ा रह गया. फिर बोला, ‘‘ओके अंजू, मैं चलता हूं… मृणाल राह देख रही होगी,’’ और फिर उस की तरफ बिना देखे ही घर से बाहर निकल आया.

गाड़ी में बैठतेबैठते अनायास ही मेरी नजरें ऊपर गईं तो देखा अल्पना अपनी छोटी सी बालकनी में खड़ी हो कर बड़ी असहाय सी नजरों से मुझे देख रही थी. आंखों में आंसू थे, जिन्हें छिपाने का प्रयास कर रही थी. उस की वे असहाय सी नजरें मेरा घर तक पीछा करती रहीं.

घर पहुंचते ही मृणाल को सारी बात बताई तो वह भी अवाक सी रह गई. हमारी शादी के बाद से ही मृणाल अल्पना और उस के पूरे परिवार को जानती थी. अल्पना की मां की दी हुई कांजीवरम की साड़ी आज भी मृणाल ने संभाल कर रखी है. अल्पना की सुंदरता और मिलनसार स्वभाव से तो मृणाल उसे देखते ही प्रभावित हो गई थी और कभीकभी मुझे चिढ़ाते हुए कहती कि ऐसी माधुरी दीक्षित सी सुंदर लड़की पड़ोस में थी फिर भी तुम मेरे पीछे कैसे पड़ गए थे अरुण.

जाने कितनी देर तक हम दोनों अल्पना के बारे में ही बातें करते रहे.

तभी मेरे मोबाइल पर फोन आ गया.

‘‘मैं… मैं अल्पना बोल रही हूं.’’

‘‘बोलो.’’

‘‘तुम्हें सौरी कहने के लिए फोन किया है… तुम पहली बार हमारे घर आए और… और तुम्हारी बिना वजह इनसल्ट हो गई.’’

‘‘अरे, नहींनहीं… मेरी इनसल्ट की छोड़ो… तुम मुझे सचसच बताओ कि तुम दोनों में कोई प्रौब्लम चल रही है क्या?’’

‘‘प्रौब्लम? मेरी कोई प्रौब्लम नहीं. सारी प्रौब्लम्स शशि की ही हैं.’’

‘‘जरा खुल कर बताओ. शायद मैं कुछ मदद कर सकूं?’’

‘‘अब फोन पर नहीं बता सकती… लेकिन इतना जरूर कहूंगी कि शशि का गुस्सैल व शक्की स्वभाव मेरे लिए सहना मुश्किल होता जा रहा है. उस के इस स्वभाव की वजह से ही मैं किसी के घर नहीं जाती और न किसी को अपने घर बुलाती… कल अचानक तुम मिल गए… मुझे पहुंचाने घर तक आ गए… न जाने कैसे मैं ने तुम्हें ऊपर अपने घर में बुला लिया…’’

‘‘तुम ने ये सारी बातें मां बाबा को बताई हैं कि नहीं?’’

‘‘शुरूशुरू में कोशिश की थी बताने की उसी का परिणाम आज तक भुगत रही हूं.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘तुम्हें तो पता ही है मेरे बाबा भी कितने गुस्सैल थे… उन्हें जब यह सब पता चला तो उन्होंने शशि को गुस्से में बहुत कुछ बोल दिया था… जो नहीं बोलना चाहिए था वह भी बोल गए थे…

‘‘अरे, मेरी शादी के वक्त से ही शशि बाबा को पसंद नहीं था. उस की नौकरी, तनख्वाह कुछ भी उन्हें मेरे लायक नहीं लगा था. लेकिन शशि देखने में इतना हैंडसम था कि मैं देखते ही उस के प्यार में पागल हो गई थी. और मांबाप के लाख समझाने पर भी मैं शशि से ही शादी करने की जिद कर बैठी थी. आखिर मेरी जिद की वजह से मेरी शशि से शादी हो गई. शादी के बाद हम दोनों जब भी मांबाबा के घर जाते शशि को हमेशा ही लगता कि उस की नौकरी और कम तनख्वाह के कारण बाबा उसे नीची नजरों से देखते हैं.

‘‘मैं ने जब शशि की शिकायत बाबा से करी तो बाबा ने गुस्से में भर कर उसे सुना दिया कि तुम मेरी बेटी के लायक कभी थे ही नहीं और कभी हो भी नहीं सकते.

‘‘यह सब सुनने के बाद मेरा मायका छूट गया. शशि के स्वभाव ने और भयंकर रूप धारण कर लिया था… यही है मेरी गृहस्थी का असली रूप. मां बाबा और सुरेश अब अमेरिका में ही रहने लगे हैं… न वे कभी मेरे से मिलने आए और न मैं कभी उन के पास गई… जीवन में मुझे एक ही सुख मिला है और वह है मेरी बेटी प्रिया. उसे देख कर ही मैं जी रही हूं.’’

‘‘बेटी से कैसा सलूक है तुम्हारे पति का?’’

‘‘बेटी को तो वह बहुत प्यार करता है. लेकिन उस के स्वभाव के कारण प्रिया उस से डरी डरी सी रहती है… हम दोनों के झगड़े में पिसती जा रही है… हर समय सहमी सहमी सी रहती है.’’

‘‘तुम्हें कुछ दिन सुरेश के साथ मां बाबा के साथ जा कर रहना चाहिए.’’

‘‘मां बाबा सुरेश के साथ काफी सैटल हो गए हैं. उन्होंने वहां की सिटीजनशिप भी ले ली है. सुरेश और उस की पत्नी उन की बहुत सेवा करते हैं… ऐसे में मुझे अपना यह दुख उन के सिर पर डालना ठीक नहीं लगता. अच्छा यह सब रहने दो… तुम्हें और एक बात बतानी थी. मैं कल 4 बजे तक तुम्हारे घर आऊंगी… कुछ काम है… मां बाबा के कुछ पेपर्स देने हैं. तुम जब अमेरिका जाओ तो पेपर्स सुरेश को मेल कर देना.’’

‘‘हांहां, जरूर… जरूर आना कल. मैं और मृणाल वेट करेंगे… अपनी बेटी को भी लाना… उस से भी मुलाकात हो जाएगी,’’ कह कर मैं ने फोन बंद कर दिया.

मगर दूसरे दिन दोपहर 4 बजे तक का इंतजार हमें करना ही नहीं पड़ा. सुबहसुबह 7 बजे ही प्रिया का यानी अल्पना की बेटी का फोन आ गया. बहुत ही डरी आवाज में उस ने कहा, ‘‘अंकल, आप प्लीज अभी हमारे घर आ जाएं. कल पापा ने मम्मी को बहुत मारा है… मम्मी ने ही आप को फोन करने को कहा था.’’

मैं ने बिना कुछ सोचेसमझे अपनी गाड़ी निकाली. मृणाल को भी साथ ले लिया. फिर अपने एक पुलिस वाले दोस्त इंस्पैक्टर राणा को पुलिस की वरदी में अपने साथ ले लिया.

अल्पना के घर पहुंच गए. अल्पना की हालत बहुत खराब थी. उस की एक आंख सूजी हुई थी. दोनों गालों पर भी चोट के निशान दिखाई दे रहे थे. एक हाथ भी जख्मी था. वह बहुत घबराई हुई थी और कराह रही थी. प्रिया उस की बगल में बैठी थी. शशिकांत पलंग की दूसरी ओर सिर पकड़े बैठा था.

मुझे और मेरे साथ आए पुलिस इंस्पैक्टर को देख कर शशिकांत घबरा गया. फिर दूसरे  ही पल अपने तमाम पुरुष अहंकार को समेटते हुए अल्पना की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘क्या तुम ने बुलाया है इन्हें यहां?’’

‘‘मैं इंस्पैक्टर राणा… आप की बेटी के फोन के आधार पर यहां इन्वैस्टिगेशन करने आया हूं.’’

शशिकांत इंसपैक्टर राणा की बात सुन कर हक्काबक्का रह गया.

मैं और मृणाल भी चुपचाप खड़े थे. पहले तो इंस्पैक्टर राणा ने शशिकांत को अपने कब्जे में किया. फिर मृणाल प्रिया के साथ घर पर रुकी रही और मैं और अल्पना पुलिस स्टेशन चले गए. अल्पना ने थाने में शशिकांत के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई.

इस के बाद अल्पना और प्रिया को ले कर हम दोनों अपने घर आ गए. घर आते ही मृणाल ने पहले सब के लिए चाय बनाई. अल्पना को पानी दे कर थोड़ा शांत  होने दिया और फिर थोड़ी देर बाद बहुत ही शांत संयत भाव से मैं ने अल्पना से पूछा, ‘‘क्या है यह सब अंजू? पत्नी पर इस तरह हाथ उठाना गुनाह है, यह क्या तुम्हारा पति जानता नहीं? क्या पहले भी कभी उस ने इस तरह मारा था?’’

‘‘ऐसा दूसरी बार हुआ है… 2-3 साल पहले मुझे औफिस में अचानक चक्कर आ गया था… मेरी तबीयत बहुत बिगड़ गई थी. तब मेरा एक कलीग मुझे घर छोड़ने आया था… तब भी शशि ने मुझे रात को इसी तरह मारा था… वह मेरे लिए बहुत पजैसिव है… मेरे साथ किसी और पुरुष को वह देख ही नहीं सकता.’’

‘‘वह देख नहीं सकता, लेकिन तुम यह सब सह कैसे लेती हो? पति को तुम्हारा नौकरी कर के पैसे कमाना मंजूर है, लेकिन तुम्हारे साथ किसी को देखना मंजूर नहीं? यह क्या बात हुई?’’

‘‘मैं ने भी यह सब हजार बार सोचा है अरुण… सिर्फ अपनी बेटी की सोच सब सहती रही हूं.’’

‘‘लेकिन सहन करने की कोई सीमा होती है, अंजू… मैं मानता हूं कि तुम मांबाबा, सुरेश और सब के बारे में सोच कर अपना दर्द आज तक छिपाती रही हो, लेकिन सहनशीलता की भी कोई सीमा होनी चाहिए… इतनी मार सहने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं है. कभी न कभी सहनशीलता का भी अंत होना ही चाहिए.’’

‘‘वह आज हो गया अरुण… इतने दिनों तक मैं अपनी इस स्वीट बेटी के लिए चुप रही थी, लेकिन अब नहीं… अब वह सब समझ चुकी है… अब मुझे शशि से अलग होने से कोई नहीं रोक सकता.’’

‘‘वैरी गुड… हम सब तुम्हारे साथ हैं.’’

2-3 महीने तक प्रिया और अल्पना हमारे साथ ही रही. फिर अल्पना ने कोर्ट में तलाक का नोटिस दे दिया.

शशि काफी दिनों तक हमारे घर आ कर अल्पना को मनाने का नाटक करता रहा,

लेकिन अल्पना नहीं मानी. तलाक के लिए 6 महीने का सैपरेशन का समय जब शुरू हुआ तभी हमारा अमेरिका वापस जाने का समय भी आ गया. अल्पना और प्रिया के पास भी पासपोर्ट थे ही… जब हम दोनों अमेरिका वापस जा रहे थे तब अल्पना और प्रिया भी हमारे साथ अमेरिका जा रही थीं. उन दोनों को सुरेश तक पहुंचाने का जिम्मा मैं ने ही लिया था. Parivarik Kahani

Hindi Family Story: शादीशुदा औरत का पुरुष दोस्त

Hindi Family Story: मेरे बचपन का दोस्त रमेश काफी परेशान और उत्तेजित हालत में मुझ से मिलने मेरी दुकान पर आया और अपनी बात कहने के लिए मुझे दुकान से बाहर ले गया. वह नहीं चाहता था कि उस के मुंह से निकला एक शब्द भी कोई दूसरा सुने.

‘‘मैं अच्छी खबर नहीं लाया हूं पर तेरा दोस्त होने के नाते चुप भी नहीं रह सकता,’’ रमेश बेचैनी के साथ बोला.

‘‘खबर क्या है?’’ मेरे भी दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं.

‘‘वंदना भाभी को मैं ने आज शाम नेहरू पार्क में एक आदमी के साथ घूमते देखा है. वह दोनों 1 घंटे से ज्यादा समय तक साथसाथ थे.’’

‘‘इस में परेशान होने वाली क्या बात है?’’ मेरे मन की चिंता काफी कम हो गई पर बेचैनी कायम रही.

‘‘संजीव, मैं ने जो देखा है उसे सुन कर तू गुस्सा बिलकुल मत करना. देख, हम दोनों शांत मन से इस समस्या का हल जरूर निकाल लेंगे. मैं तेरे साथ हूं, मेरे यार,’’ रमेश ने भावुक हो कर मुझे अपनी छाती से लगा लिया.

‘‘तू ने जो देखा है, वह मुझे बता,’’ उस की भावुकता देख मैं, मुसकराना चाहा पर गंभीर बना रहा.

‘‘यार, उस आदमी की नीयत ठीक नहीं है. वह वंदना भाभी पर डोरे डाल रहा है.’’

‘‘ऐसा तू किस आधार पर कह रहा है?’’

‘‘अरे, वह भाभी का हाथ पकड़ कर घूम रहा था. उस के हंसनेबोलने का ढंग अश्लील था…वे दोनों पार्क में प्रेमीप्रेमिका की तरह घूम रहे थे…वह भाभी के साथ चिपका ही जा रहा था.’’

जो व्यक्ति वंदना के साथ पार्क में था, उस के रंगरूप का ब्यौरा मैं खुद रमेश को दे सकता था पर यह काम मैं ने उसे करने दिया.

‘‘क्या तू उस आदमी को पहचानता है?’’ रमेश ने चिंतित लहजे में प्रश्न किया.

मैं ने इनकार में सिर दाएंबाएं हिला कर झूठा जवाब दिया.

‘‘अब क्या करेगा तू?’’

‘‘तू ही सलाह दे,’’ उस की देखादेखी मैं भी उलझन का शिकार बन गया.

‘‘देख संजीव, भाभी के साथ गुस्सा व लड़ाईझगड़ा मत करना. आज घर जा कर उन से पूछताछ कर पहले देख कि वह उस के साथ नेहरू पार्क में होने की बात स्वीकार भी करती हैं या नहीं. अगर दाल में काला होगा… उन के मन में खोट होगा तो वह झूठ का सहारा लेंगी.’’

‘‘अगर उस ने झूठ बोला तो क्या करूं?’’

‘‘कुछ मत करना. इस मामले पर सोचविचार कर के ही कोई कदम उठाएंगे.’’

‘‘ठीक है, पूछताछ के बाद मैं बताता हूं तुझे कि वंदना ने क्या सफाई दी है.’’

‘‘मैं कल मिलता हूं तुझ से.’’

‘‘कल दुकान की छुट्टी है रमेश, परसों आना मेरे पास.’’

रमेश मुझे सांत्वना दे कर चला गया. घर लौटने तक मैं रहरह कर धीरज और वंदना के बारे में विचार करता रहा.

हमारी शादी को 5 साल बीत चुके हैं. वंदना उस समय भी उसी आफिस में काम करती थी जिस में आज कर रही है. धीरज वहां उस का वरिष्ठ सहयोगी था. शादी के बाद जब भी वह आफिस की बातें सुनाती, धीरज का नाम वार्तालाप में अकसर आता रहता.

वंदना मेरे संयुक्त परिवार में बड़ी बहू बन कर आई थी. आफिस जाने वाली बहू से हम दबेंगे नहीं, इस सोच के चलते मेरे मातापिता की उस से शुरू से ही नहीं बनी. उन की देखादेखी मेरा छोटा भाई सौरभ व बहन सविता भी वंदना के खिलाफ हो गए.

सौरभ की शादी डेढ़ साल पहले हुई. उस की पत्नी अर्चना, वंदना से कहीं ज्यादा चुस्त व व्यवहारकुशल थी. वह जल्दी ही सब की चहेती बन गई. वंदना और भी ज्यादा अलगथलग पड़ गई. इस के साथ सब का क्लेश व झगड़ा बढ़ता गया.

अर्चना के आने के बाद वंदना बहुत परेशान रहने लगी. मेरे सामने खूब रोती या मुझ से झगड़ पड़ती.

‘‘आप की पीठ पीछे मेरे साथ बहुत ज्यादा दुर्व्यवहार होता है. मैं इस घर में नहीं रहना चाहती हूं,’’ वंदना ने जब अलग होने की जिद पकड़ी तो मैं बहुत परेशान हो गया.

मुझे वंदना के साथ गुजारने को ज्यादा समय नहीं मिलता था. उस की छुट्टी रविवार को होती और दुकान के बंद होने का दिन सोमवार था. मुझे रात को घर लौटतेलौटते 9 बजे से ज्यादा का समय हो जाता. थका होने के कारण मैं उस की बातें ज्यादा ध्यान से नहीं सुन पाता. इन सब कारणों से हमारे आपसी संबंधों में खटास और खिंचाव बढ़ने लगा.

यही वह समय था जब धीरज ने वंदना के सलाहकार के रूप में उस के दिल में जगह बना ली थी. आफिस में उस से किसी भी समस्या पर हुई चर्चा की जानकारी मुझे वंदना रोज देती. मैं ने साफ महसूस किया कि मेरी तुलना में धीरज की सलाहों को वंदना कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण, सार्थक और सही मानती थी.

‘‘आप का झुकाव अपने घर वालों की तरफ सदा रहेगा जबकि धीरज निष्पक्ष और सटीक सलाह देते हैं. मेरे मन की अशांति दूर कर मेरा हौसला बढ़ाना उन्हें बखूबी आता है,’’ वंदना के इस कथन से मैं भी मन ही मन सहमत था.

घर के झगड़ों से तंग आ कर वंदना ने मायके भाग जाने का मन बनाया तो धीरज ने उसे रोका. घर से अलग होने की वंदना की जिद उसी ने दूर की. उसी की सलाह पर चलते हुए वह घर में ज्यादा शांत व सहज रहने का प्रयास करती थी.

इस में कोई शक नहीं कि धीरज की सलाहें सकारात्मक और वंदना के हित में होतीं. उस के प्रभाव में आने के बाद वंदना में जो बदलाव आया उस का फायदा सभी को हुआ.

पत्नी की जिंदगी में कोई दूसरा पुरुष उस से ज्यादा अहमियत रखे, ये बात किसी भी पति को आसानी से हजम नहीं होगी. मैं वंदना को धीरज से दूर रहने का आदेश देता तो नुकसान अपना ही होता. दूसरी तरफ दोनों के बीच बढ़ती घनिष्ठता का एहसास मुझे वंदना की बातों से होता रहता था और मेरे मन की बेचैनी व जलन बढ़ जाती थी.

धीरज को जाननासमझना मेरे लिए अब जरूरी हो गया. तभी मेरे आग्रह पर एक छुट्टी वाले दिन वंदना और मैं उस के घर पहुंच गए. मेरी तरह उस दिन वंदना भी उस के परिवार के सदस्यों से पहली बार मिली.

धीरज की मां बड़ी बातूनी पर सीधीसादी महिला थीं. उस की पत्नी निर्मला का स्वभाव गंभीर लगा. घर की बेहतरीन साफसफाई व सजावट देख कर मैं ने अंदाजा लगाया कि वह जरूर कुशल गृहिणी होगी.

धीरज का बेटा नीरज 12वीं में और बेटी निशा कालिज में पढ़ते थे. उन्होंने हमारे 3 वर्षीय बेटे सुमित से बड़ी जल्दी दोस्ती कर उस का दिल जीत लिया.

कुल मिला कर हम उन के घर करीब 2 घंटे तक रुके थे. वह वक्त हंसीखुशी के साथ गुजरा. मेरे मन में वंदना व धीरज के घनिष्ठ संबंधों को ले कर खिंचाव न होता तो उस के परिवार से दोस्ती होना बड़ा सुखद लगता.

‘‘तुम्हें धीरज से अपने संबंध इतने ज्यादा नहीं बढ़ाने चाहिए कि लोग गलत मतलब लगाने लगें,’’ अपनी आंतरिक बेचैनी से मजबूर हो कर एक दिन मैं ने उसे सलाह दी.

‘‘लोगों की फिक्र मैं नहीं करती. हां, आप के मन में गलत तरह का शक जड़ें जमा रहा हो तो साफसाफ कहो,’’ वंदना ध्यान से मेरे चेहरे को पढ़ने लगी.

‘‘मुझे तुम पर विश्वास है,’’ मैं ने जवाब दिया.

‘‘और इस विश्वास को मैं कभी नहीं तोड़ूंगी,’’ वंदना भावुक हो गई, ‘‘मेरे मानसिक संतुलन को बनाए रखने में धीरज का गहरा योगदान है. मैं उन से बहुत कुछ सीख रही हूं…वह मेरे गुरु भी हैं और मित्र भी. उन के और मेरे संबंध को आप कभी गलत मत समझना, प्लीज.’’

धीरज के कारण वंदना के स्वभाव में जो सुखद बदलाव आए उन्हें देख कर मैं ने धीरेधीरे उन के प्रति नकारात्मक ढंग से सोचना कम कर दिया. अपनी पत्नी के मुंह से हर रोज कई बार उस का नाम सुनना तब मुझे कम परेशान करने लगा.

उस दिन रात को भी वंदना ने खुद ही मुझे बता दिया कि वह धीरज के साथ नेहरू पार्क घूमने गई थी.

‘‘आज किस वजह से परेशान थीं तुम?’’ मैं ने उस से पूछा.

‘‘मैं नहीं, बल्कि धीरज तनाव के शिकार थे,’’ वंदना की आंखों में चिंता के भाव उभरे.

‘‘उन्हें किस बात की टैंशन है?’’

‘‘उन की पत्नी के ई.सी.जी. में गड़बड़ निकली है. शायद दिल का आपरेशन भी करना पड़ जाए. अभी दोनों बच्चे छोटे हैं. फिर उन की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं है. इन्हीं सब बातों के कारण वह चिंतित और परेशान थे.’’

कुछ देर तक खामोश रहने के बाद वंदना ने मेरा हाथ अपने हाथों में लिया और भावुक लहजे में बोली, ‘‘जो काम धीरज हमेशा मेरे साथ करते हैं, वह आज मैं ने किया. मुझ से बातें कर के उन के मन का बोझ हलका हुआ. मैं एक और वादा उन से कर आई हूं.’’

‘‘कैसा वादा?’’

‘‘यही कि इस कठिन समय में मैं उन की आर्थिक सहायता भी करूंगी. मुझे विश्वास है कि आप मेरा वादा झूठा नहीं पड़ने देंगे. हमारे विवाहित जीवन की सुखशांति बनाए रखने में उन का बड़ा योगदान है. अगर उन्हें 10-20 हजार रुपए देने पड़ें तो आप पीछे नहीं हटेंगे न?’’

वंदना के मनोभावों की कद्र करते हुए मैं ने सहज भाव से मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘अपने गुरुजी के मामलों में तुम्हारा फैसला ही मेरा फैसला है, वंदना. मैं हर कदम पर तुम्हारे साथ हूं. हमारा एकदूसरे पर विश्वास कभी डगमगाना नहीं चाहिए.’’

अपनी आंखों में कृतज्ञता के भाव पैदा कर के वंदना ने मुझे ‘धन्यवाद’ दिया. मैं ने हाथ फैलाए तो वह फौरन मेरी छाती से आ लगी.

इस समय वंदना को मैं ने अपने हृदय के बहुत करीब महसूस किया. धीरज और उस के दोस्ताना संबंध को ले कर मैं रत्ती भर भी परेशान न था. सच तो यह था कि मैं खुद धीरज को अपने दिल के काफी करीब महसूस कर रहा था.

धीरज को अपना पारिवारिक मित्र बनाने का मन मैं बना चुका था.

2 दिन बाद रमेश परेशान व उत्तेजित अवस्था में मुझ से मिलने पहुंचा. वक्त की नजाकत को महसूस करते हुए मैं ने भी गंभीरता का मुखौटा लगा लिया.

‘‘क्या वंदना भाभी ने उस व्यक्ति के साथ नेहरू पार्क में घूमने जाने की बात तुम्हें खुद बताई, संजीव?’’ रमेश ने मेरे पास बैठते ही धीमी, पर आवेश भरी आवाज में प्रश्न पूछा.

‘‘हां,’’ मैं ने सिर हिलाया.

‘‘अच्छा,’’ वह हैरान हो उठा, ‘‘कौन है वह?’’

‘‘उन का नाम धीरज है और वह वंदना के साथ काम करते हैं.’’

‘‘उस के साथ घूमने जाने का कारण भाभी ने क्या बताया?’’

‘‘किसी मामले में वह परेशान थे. वंदना से सलाह लेना चाहते थे. उस से बातें कर के मन का बोझ हलका कर लिया उन्होंने,’’ मैं ने सत्य को ही अपने जवाब का आधार बनाया.

‘‘मुझे तो वह परेशान या दुखी नहीं, बल्कि एक चालू इनसान लगा है,’’ रमेश भड़क उठा, ‘‘उस ने भाभी का कई बार हाथ पकड़ा… कंधे पर हाथ रख कर बातें कर रहा था. मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि भाभी को ले कर उस की नीयत खराब है.’’

‘‘मेरे भाई, तेरा अंदाजा गलत है. वंदना धीरज को अपना शुभचिंतक व अच्छा मित्र मानती है,’’ मैं ने उसे प्यार से समझाया.

‘‘मित्र, पराए पुरुष के साथ शादीशुदा औरत की मित्रता कैसे हो सकती है?’’ उस ने आवेश भरे लहजे में प्रश्न पूछा.

‘‘एक बात का जवाब देगा?’’

‘‘पूछ.’’

‘‘हम दोस्तों में सब से पहले विकास की शादी हुई थी. अनिता भाभी के हम सब लाड़ले देवर थे. उन का हाथ हम ने अनेक बार पकड़ कर उन से अपने दिल की बातें कही होंगी. क्या तब हमारे संबंधों को तुम ने अश्लील व गलत समझा था?’’

‘‘नहीं, क्योंकि हम एकदूसरे के विश्वसनीय थे. हमारे मन में कोई खोट नहीं था,’’ रमेश ने जवाब दिया.

‘‘इस का मतलब कि स्त्रीपुरुष के संबंध को गलत करार देने के लिए हाथ पकड़ना महत्त्वपूर्ण नहीं है, मन में खोट होना जरूरी है?’’

‘‘हां, और तू इस धीरज…’’

‘‘पहले तू मेरी बात पूरी सुन,’’ मैं ने उसे टोका, ‘‘अगर मैं और तुम हाथ पकड़ कर घूमें… या वंदना तेरी पत्नी के साथ हाथ पकड़ कर घूमे…फिल्म देख आए…रेस्तरां में कौफी पी ले तो क्या हमारे और उन के संबंध गलत कहलाएंगे?’’

‘‘नहीं, पर…’’

‘‘पहले मुझे अपनी बात पूरी करने दे. हमारे या हमारी पत्नियों के बीच दोस्ती का संबंध ही तो है. देख, पहले की बात जुदा थी, तब स्त्रियों का पुरुषों के साथ उठनाबैठना नहीं होता था. आज की नारी आफिस जाती है. बाहर के सब काम करती है. इस कारण उस की जानपहचान के पुरुषों का दायरा काफी बड़ा हुआ है. इन पुरुषों में से क्या कोई उस का अच्छा मित्र नहीं बन सकता?’’

‘‘हमें दूसरों की नकल नहीं करनी है, संजीव,’’ मेरे मुकाबले अब रमेश कहीं ज्यादा शांत नजर आने लगा, ‘‘हम ऐसे बीज बोने की इजाजत क्यों दें जिस के कारण कल को कड़वे फल आएं?’’

‘‘मेरे यार, तू भी अगर शांत मन से सोचेगा तो पाएगा कि मामला कतई गंभीर नहीं है. पुरानी धारणाओं व मान्यताओं को एक तरफ कर नए ढंग से और बदल रहे समय को ध्यान में रख कर सोचविचार कर मेरे भाई,’’ मैं ने रमेश का हाथ दोस्ताना अंदाज में अपने हाथों में ले लिया.

कुछ देर खामोश रहने के बाद उस ने सोचपूर्ण लहजे में पूछा, ‘‘अपने दिल की बात कहते हुए जैसे तू ने मेरा हाथ पकड़ लिया, क्या धीरज को भी वंदना भाभी का वैसे ही हाथ पकड़ने का अधिकार है?’’

‘‘बिलकुल है,’’ मैं ने जोर दे कर अपनी राय बताई.

‘‘स्त्रीपुरुष के रिश्ते में आ रहे इस बदलाव को मेरा मन आसानी से स्वीकार नहीं कर रहा है, संजीव,’’ उस ने गहरी सांस खींची.

‘‘क्योंकि तुम भविष्य में उन के बीच किसी अनहोनी की कल्पना कर के डर रहे हो. अब हमें दोस्ती को दोस्ती ही समझना होगा…चाहे वह 2 पुरुषों या 2 स्त्रियों या 1 पुरुष 1 स्त्री के बीच हो. रिश्तों के बदलते स्वरूप को समझ कर हमें स्त्रीपुरुष के संबंध को ले कर अनैतिकता की परिभाषा बदलनी होगी.

‘‘देखो, किसी कुंआरी लड़की के अपने पुरुष प्रेमी से अतीत में बने सैक्स संबंध उसे आज चरित्रहीन नहीं बनाते. शादीशुदा स्त्री का उस के पुरुष मित्र से सैक्स संबंध स्थापित होने का हमारा भय या अंदेशा उन के संबंध को अनैतिकता के दायरे में नहीं ला सकता. मेरी समझ से बदलते समय की यही मांग है. मैं तो वंदना और धीरज के रिश्ते को इसी नजरिए से देखता हूं, दोस्त.’’

मैं ने साफ महसूस किया कि रमेश मेरे तर्क व नजरिए से संतुष्ट नहीं था.

‘‘तेरीमेरी सोच अलगअलग है यार. बस, तू चौकस और होशियार रहना,’’ ऐसी सलाह दे कर रमेश नाराज सा नजर आता दुकान से बाहर चला गया.

मेरा उखड़ा मूड धीरेधीरे ठीक हो गया. बाद में घर पहुंच कर मैं ने वंदना को शांत व प्रसन्न पाया तो मूड पूरी तरह सुधर गया.

हां, उस दिन मैं जरूर चौंका था जब हम रामलाल की दुकान में गए थे और वहां रमेश की पत्नी किसी के हाथों से गोलगप्पे खा रही थी और रमेश मजे में आलूचाट की प्लेट साफ करने में लगा था. यह आदमी कौन था मैं अच्छी तरह जानता था. वह रमेश के मकान में ऊपर चौथी मंजिल पर रहता है और दोनों परिवारों में खासी पहचान है. मैं ने गहरी सांस ली, एक और चेला, गुरु से आगे निकल गया न. Hindi Family Story

Inspiring Story : दीपिका म्हात्रे : घरेलू काम से स्टैंड-अप कौमेडी तक

लेखिका: सबा गुरमत

किस्मत ने एक मोड़ लिया और दीपिका म्हात्रे सुर्खियों में आ गईं. उन की कामयाबी का रास्ता बनाने में दूसरी महिलाओं ने तो उन का साथ दिया ही, इस के अलावा उन के खुद के निर्भीक स्वभाव ने भी उन के लिए राह बनाई.
यह आदत थी, बिना किसी डर के उन नाइंसाफियों का हंस कर सामना करना, जो रोजमर्रा की जिंदगी में उन्हें झेलनी पड़ती थीं.

साल 2017 के मार्च महीने के शुरुआती दिनों में दीपिका घरेलू कामगार के तौर पर एकसाथ कई जगहों पर काम कर रही थीं. एक दिन उन को महिला दिवस पर आयोजित किए जा रहे एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया.
यह कार्यक्रम संगीता व्यास ने आयोजित किया था, जो उसी हाउसिंग सोसाइटी की निवासी थीं, जहां दीपिका और उन की बड़ी बहन रागिनी काम करती थीं. इस कार्यक्रम के माध्यम से लोग अपने हुनर का प्रदर्शन कर रहे थे. रागिनी ने एक जोरदार गाना गाया, उन की एक और दोस्त ने नृत्य किया, लेकिन दीपिका का इरादा कुछ और ही था.
दीपिका ने याद किया कि उन्होंने संगीता से कहा था, ‘मैं कुछ कौमेडी करूंगी.’ लेकिन जब वे मुंबई के पश्चिमी उपनगर गोरेगांव स्थित, अब बंद हो चुके सभागार ‘पितारा द आर्ट बौक्स’ के मंच पर पहुंचीं, तब उन्हें खुद भी नहीं पता था कि वे क्या करने वाली हैं. फिर वे दर्शकों की तरफ मुड़ीं, अपनी जिंदगी के अनुभवों को साझा किया और उन लोगों पर चुटकी ली जिन्होंने उन के जैसे कामगारों की जिंदगी को थोड़ा बेवजह मुश्किल बनाया था.

कार्यक्रम के दौरान दीपिका ने बताया, ‘‘जब भी मैं नियोक्ताओं के घर खाना बनाती थी तो मैडम मु?ा से कहती थीं कि दीपिका, रोटी में ज्यादा घी मत डालना, सैंडविच में ज्यादा चीज मत डालना, मैं डाइट पर हूं, मेरा वजन बढ़ा तो गलती तुम्हारी होगी. तब मैं कहती कि अगर मेरा थोड़ा सा घी आप का वजन बढ़ा देगा तो आप जो रात को पिज्जाबर्गर खाते हैं उन का क्या? उन्हें तो पहले कम करना पड़ेगा.’’

जिंदगी में बदलाव

किस्मत से कार्यक्रम के दिन वहां रिचल लोपेज नाम की एक पत्रकार भी मौजूद थीं. जब कार्यक्रम समाप्त हुआ, तो उन्होंने दीपिका से बातचीत की और जल्द ही उन्हें जानीमानी स्टैंड-अप कौमेडियन अदिति मित्तल से मिलवाया. यहीं से दीपिका की जिंदगी में बदलाव आने शुरू हुए.

अदिति ने दीपिका को अपने साए में लिया. उन्होंने दीपिका के जोक्स की धार को तराशने में मदद की, मंच पर प्रस्तुत करने का सलीका सिखाया और कौमेडी सर्किट में लोगों से जुड़ने में मदद की.

दीपिका ने बताया, ‘‘उन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया. स्टेज पर कैसे खड़ा होना है, माइक कैसे पकड़ना है, कब मुड़ना है और जब दर्शक हंसें तो क्या करना है. पहले तो मैं बस मंच पर जाती थी, खड़ी होती थी, कुछ भी बोल देती थी और मस्ती करती थी.’’

दीपिका अपने पति दिलीप के साथ

मार्च, 2018 में अदिति के यूट्यूब शो ‘बैड गर्ल्स’ में दीपिका की एक परफौर्मैंस की रिकौर्डिंग दिखाई गई. यह शो उन महिलाओं को पेश करता था जो पारंपरिक रास्तों से हट कर काम कर रही थीं. दीपिका की यह परफौर्मैंस मुंबई के पौश उपनगर बांद्रा में स्थित कौमेडी वेन्यू ‘हैबिटैट’ में हुई थी.

चटक लाल और सुनहरे कुरते में सजी दीपिका ने जैसे ही माइक संभाला वे बिलकुल सहज नजर आ रही थीं. वे बोलीं, ‘‘नमस्ते, मैं दीपिका म्हात्रे हूं, मैं मेड का काम करती हूं. मैं ने देखा है कि स्टैंड-अप कौमेडियन हमेशा अपनी मेड की स्टोरी बोलते हैं, मगर आज मैं बोलूंगी.’’

सैट के दौरान दीपिका ने मुसकराते हुए सुखसुविधाओं में जीने वालों की सोच पर तंज कसा. दीपिका ने सब से सख्त आलोचना उन लोगों के लिए रखी जो अपने घरेलू कामगारों के साथ अन्याय करते हैं. जहां रोजमर्रा की आदतों में जाति और वर्ग का भेदभाव अकसर छिपा होता है और काम के अनौपचारिक ढांचे की वजह से शोषण की गुंजाइश बनी रहती है. उन्होंने कहा, ‘‘मैं जिस बिल्डिंग में काम करने जाती हूं, वहां मैं बहुत स्पैशल हूं क्योंकि वहां मेरे लिए लिफ्ट अलग है और बरतन भी अलग हैं.’’ कुछ पल ठहर कर वे फिर बोलीं, ‘‘आप छिपाओ अपने बरतन, रोटी तो आप मेरे ही हाथ की तोड़ते हो न.’’इतना सुनते ही सभागार दर्शकों की तालियों और सीटियों से गूंज उठा.

 फुलटाइम कौमेडियन के रूप में स्थापित

तब से अब तक 50 वर्षीय दीपिका ने खुद को फुलटाइम कौमेडियन के रूप में स्थापित किया है और वे न केवल भारत में बल्कि विदेश में भी अपनी पहचान बना रही हैं. उन्होंने कई पुरस्कार जीते हैं, जिन में से एक उन्हें मशहूर बौलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर खान के हाथों मिला, जिसे वे गर्व से याद करती हैं. उन्हें कई टैलीविजन शो में भी आमंत्रित किया गया है, जिन में जीटीवी प्रस्तुत ‘डांस इंडिया डांस: सुपरमौम्स’, स्टार प्लस प्रस्तुत ‘सब से स्मार्ट कौन?’ और मराठी गेम शो ‘सक्के शेजारी’ शामिल हैं. लाइव शो के साथसाथ वे कई ब्रैंड्स के विज्ञापनों में भी नजर आ चुकी हैं. ब्रिटेन के अखबार द गार्जियन में छपे एक सराहनीय प्रोफाइल में लिखा गया, ‘‘म्हात्रे के सैट्स को भारत की गहरी सामाजिक असमानता और अमीरों की गरीबों को बराबर न समझ पाने की कमजोरी पर तीखा प्रहार माना जा सकता है.’’

भारत के समकालीन कौमेडी सीन में, जहां अधिकांश कलाकार जाति और वर्ग के विशेषाधिकार वाले हैं, वहां अकसर हाशिए के लोगों को मजाक का पात्र बनाया जाता है. लेकिन दीपिका उन कुछ चुनिंदा हास्य कलाकारों में से हैं जो इस ढांचे को पलट रही हैं. उन का हास्य अभिजात वर्ग को खुश करने के बजाय उन से टकराने और उन को जगाने के लिए है.

अमीरों को आईना दिखाना चाहती

‘‘मैं अमीरों को आईना दिखाना चाहती हूं,’’ उन्होंने मुझसे कहा. हमारी बातचीत 2018 में उसी हैबिटैट वेन्यू में हो रही थी, जहां उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत में प्रदर्शन किया था.
‘‘मैं चाहती हूं कि वे यह समझ जाएं कि हम भी इंसान हैं,’’ दीपिका ने कहा.

दीपिका का जन्म मुंबई के प्रभादेवी इलाके की एक चाल में हुआ था, जो सिद्धिविनायक मंदिर से कुछ ही कदमों की दूरी पर है. इस एकजुट बस्ती में बड़े होते हुए दीपिका को बचपन से ही हंसीमजाक और खेलकूद से प्यार हो गया था.

‘‘चाल में हर तरह के फंक्शन होते थे. गणपति, नवरात्रि, दीवाली, शादीब्याह हम सब एकदूसरे के घर जाते थे और बहुत मजा करते थे. उसी वक्त से मुझे मजाक करना अच्छा लगने लगा था,’’ दीपिका ने बताया.

हालांकि दीपिका को अदिति मित्तल की कौमेडी पसंद है और वे अभिनेता कौमेडियन जानी लीवर और उन की बेटी जैमी लीवर के काम को भी फौलो करती हैं, लेकिन उन की शुरुआती प्रेरणा के स्रोत केवल उन की अपनी जिंदगी और आसपास का माहौल था.

दीपिका के पिता एक सरकारी अस्पताल में क्लर्क थे और मां वड़ापाव की छोटी सी ठेली चलाती थीं. दोनों मिल कर 5 बच्चों का पालनपोषण करते थे. ‘‘मेरी असली प्रेरणा मेरे मातापिता हैं क्योंकि वे बेहद मेहनती थे,’’ दीपिका ने कहा, ‘‘वे दिनरात काम करते थे.’’ दीपिका ने 10वीं कक्षा तक की अपनी पढ़ाई म्युनिसिपल स्कूल से की. वे स्कूल में चुपचाप रहने वाली छात्रा थीं, जो ज्यादा हलचल में नहीं पड़ती थीं.

‘‘मैं ने कभी किसी स्कूल प्रोग्राम में हिस्सा नहीं लिया,’’ उन्होंने याद करते हुए कहा.

‘‘मुझे तो बस दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ मजाक करने की आदत थी,’’ उन्होंने नीबू पानी पीते हुए कहा.

उन दिनों दीपिका एक और नाम से जानी जाती थीं, कमल. शादी के बाद उन्होंने अपना नाम बदल दिया. उस समय वे 20 साल की थीं. दीपिका याद करते हुए बताती हैं, ‘‘मेरे पति भी उसी चाल से थे, उन के परिवार ने मेरे बारे में मेरे घर वालों से बात की थी.’’

दीपिका के पति दिलीप, जो अब 55 साल के हैं, पहले एक सिक्युरिटी गार्ड के तौर पर काम करते थे.

शादी के तुरंत बाद यह नवविवाहित जोड़ा कांदिवली चला गया, जो दीपिका के मायके से करीब 26 किलोमीटर दूर था. वहां वे दिलीप के बड़े परिवार के साथ रहने लगे, जिस में उन के 5 भाई भी शामिल थे. वहां से वे और उत्तर की ओर बढ़े, पहले विरार और आखिरकार नल्लासोपरा बस गए.

टाइनी मिरेकल्स फाउंडेशन के साथ स्टैंड-अप शो के लिए हुए कोलौबोरेशन के दौरान एक औडियंस मेंबर दीपिका के साथ सैल्फी लेते हुए

संघर्ष के वे दिन

शादी के कुछ साल बाद दिलीप को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होने लगीं, जिन में अस्थमा भी शामिल था, जो लगातार बिगड़ता गया. उस समय दीपिका और दिलीप 3 बेटियों की परवरिश कर रहे थे, जिन का उन्होंने इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिला कराया था. दिलीप की सैलरी का अकसर आधा हिस्सा उन के इलाज पर खर्च हो जाता था.

‘‘मैं ने उन से कहा कि आप घर पर रहें, बच्चों और घर का खयाल रखें और मैं बाहर जा कर काम ढूंढ़ लूंगी,’’ दीपिका याद करते हुए बताती हैं.

‘‘जो भी काम मिला, मैं ने किया,’’ दीपिका ने कहा. उस समय वे लगभग 25 साल की थीं. उन के दिन का शैड्यूल बेहद थकाऊ होता था.

वे सुबह 3 बजे उठतीं, आटा गूंथतीं और स्कूल की शिक्षिकाओं को देने के लिए रोटियां बनाती थीं. फिर वे अपने बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करतीं और घर के बाकी कामों को संभालतीं. सुबह 9 बजे वे अचार, पापड़ और फरसान (नमकीन स्नैक्स) आसपास की बस्तियों में बेचने निकल जातीं.

‘‘मैं ने इतनी मेहनत की है, बाप रे, पूछो ही मत,’’ दीपिका ने कहा. उन की रोज की कमाई मुश्किल से 150 रुपए होती थी, जो जरूरत की चीजों में ही खत्म हो जाती थी. बाद में दीपिका को एक एजेंसी के जरीए केयरटेकिंग का काम मिला.

‘‘मैं ने 104 साल के अंकल की देखभाल की है. एक दिन के बच्चे की भी और आंटियों की भी,’’ उन्होंने बताया. लेकिन यह काम फिर भी उन के घर का खर्च चलाने के लिए काफी नहीं था.

2010 के शुरुआत में दीपिका ने लोकल अखबार में घरेलू कामगार एजेंसी का एक विज्ञापन देखा और उस नौकरी के लिए आवेदन किया. इंटरव्यू के लिए वे मुंबई के पश्चिमी उपनगर मलाड की एक हाउसिंग सोसाइटी में गईं. मैं ने उन से कहा, ‘‘जो भी काम है, मैं कर लूंगी. मेरी हालत बहुत खराब है,’’ उन्होंने याद करते हुए बताया.

उस दंपती ने उन्हें खाना बनाने के काम पर रख लिया. जल्द ही दीपिका 5 घरों में काम करने लगीं और लोकल ट्रेन में नकली गहने बेच कर अपना गुजारा चलाने लगीं.

करीब 10 साल तक रोज दीपिका का दिन सुबह 4 बजे शुरू होता था. तब वे लोकल ट्रेन में गहने बेचने निकल जाती थीं. फिर दोपहर तक घरघर जा कर खाना बनातीं और सफाई का काम करतीं. इस काम को निबटाने के बाद वे सीधे थोक बाजार जातीं, जहां से वे गहनों का नया स्टौक ला कर अगली सुबह की तैयारी करतीं.

लोकल ट्रेन में दीपिका के ग्राहक अकसर 10 रुपए जैसी छोटी रकम पर भी खूब मोलभाव करते थे. ग्राहकों द्वारा किए जाने वाले बेधड़क मोलभाव पर दीपिका की पैनी नजर 2018 के हैबिटैट में किए गए स्टैंड-अप सैट में भी दिखाई देती है.

‘‘मौल में जाते हैं आप लोग, उधर स्टिकर पे जो भाव रहता है वही भाव देते हैं. उधर ऐसा मांडवल नहीं करते,’’ उन्होंने कहा, ‘‘तो मैं ने भी स्टिकर लगाना चालू कर दिया है. यहां इंसान के लिए दया कम और स्टीकर के लिए इज्जत ज्यादा है,’’ दीपिका ने तीखे व्यंग्य के साथ जोड़ा.

पूरे दिन कई घरों में मेहनत करने के बाद भी दीपिका को कुल मिला कर लगभग 15 हजार रुपए ही मिलते थे, हर घर से करीब 3 हजार रुपए. नकली गहनों की बिक्री से होने वाली अतिरिक्त आमदनी मिला कर उन की कुल कमाई मुश्किल से 20 हजार से 25 हजार रुपए तक पहुंचती थी.

लेकिन अब उन्होंने मुसकुराते हुए कहा, ‘‘जितना मैं पहले एक महीने में नहीं कमा पाती थी, उतना कभीकभी अब एक ही दिन में कमा लेती हूं.’’

दीपिका अपनी ज्वैलरी शौप में. फुल टाइम कौमेडी कैरियर चुनने के बाद दीपिका ने इमिटेशन ज्वैलरी स्टोर भी शुरू किया.

कड़वी सचाइयां सामने लाती हैं

हालांकि दीपिका की कौमेडी कड़वी सचाइयां सामने लाती हैं. वे इसे हमेशा हलके अंदाज में पेश करती हैं. खुद पर तंज करते हुए और अपनी हंसी से माहौल को खुशनुमा बनाते हुए.

एक बार बैंगलुरु में एक शो के दौरान, दीपिका ने बताया, ‘‘एक दर्शक को पतिपत्नी के रिश्तों में लैंगिक असमानता पर किए गए उन के मजाक से आपत्ति हो गई,’’ मैं ने उन से कहा, ‘‘सर, मैं ने यह कभी नहीं कहा कि सारे पति बुरे होते हैं. लेकिन 10त्न पति ऐसे जरूर होते हैं जो शराब पीते हैं, अपनी पत्नियों को मारते हैं, झगड़ा करते हैं और मेरे जोक्स उन लोगों के बारे में होते हैं,’’ शायद दीपिका उस आदमी का मन बदलने में सफल रहीं. प्रदर्शन के बाद वे उन्हें कौमेडी सैट पर बधाई देने आए.

दीपिका कहती हैं कि जिंदगी का कोई भी पहलू मजाक से परे नहीं है. चाहे वे रोमांटिक रिश्ते हों या राजनीति, ‘‘लेकिन मुझे अमीरों पर मजाक करना था,’’ उन्होंने साफ कहा.

हमारी बातचीत के दौरान उन का फोन लगातार आने वाले नोटिफिकेशन से बज रहा था. दीपिका बताती हैं कि इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स ने उन की पहुंच को काफी बढ़ाया है, ‘‘अब मैं दूसरे शहरों में भी शो करती हूं जैसे बैंगलुरु, हैदराबाद और भी कई जगहों पर. लोग मुझे इंस्टाग्राम पर डाइरैक्ट मैसेज कर के अपने इवेंट्स में परफौर्म करने के लिए बुलाते हैं या स्टैंड-अप करने का आग्रह करते हैं,’’ इतना ही नहीं, उन्हें विदेशों से भी आमंत्रण आने लगे हैं.

जब तक दीपिका ने खुद मंच पर कौमेडी नहीं की थी, तब तक उन्होंने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. उन्होंने कुछ टैलीविजन शो जरूर देखे थे, लेकिन उन में से कोई भी उन के मन पर असर नहीं छोड़ पाया. अदिति मित्तल के साथ हुई बातों ने उन्हें यह एहसास दिलाया कि एक घरेलू कामगार के रूप में उन के पास ऐसे अनुभव हैं जो इस इंडस्ट्री में किसी और के पास नहीं हैं और यही उन की सब से बड़ी ताकत है.

हास्य को एक नया आकार देती है

घरेलू काम के 2 दशकों की आपबीती दीपिका के हास्य को एक नया आकार देती है. उन के अपने अनुभवों के साथ ही उन की उन सहेलियों के अनुभव भी शामिल हैं, जो इस काम में हैं. अदिति की सलाह पर दीपिका ने अपने उन विचारों और तजरबों को लिखना शुरू किया, जिन्हें वे स्टैंड-अप में विकसित करना चाहती थीं. उस के बाद से अब तक वे कई डायरियां भर चुकी हैं, उन्होंने बताया.

दीपिका बताती हैं, ‘‘अमीर लोग जब खुद के लिए चाय बनाते हैं, तो उस में खूब सारा दूध डालते हैं, लेकिन जब हमारे लिए बनाते हैं तो उस में थोड़ा सा दूध डाल कर कहते हैं कि यह तुम पी लो. उन की कुछ सहेलियों को तो चाय भी नहीं मिलती या फिर उन्हें वे गिलास दिए जाते हैं जो खासतौर पर कामवालों के लिए रखे गए होते हैं. यहां तक कि जब कुछ घरों में काम करने वालों को खाना भी दिया जाता है, तो वह अकसर बासी होता है.

‘‘अगर आप को खाना देना ही है,’’ दीपिका कहती हैं, ‘‘तो 2 दिन पहले क्यों नहीं देते? मुझे यह बहुत गलत लगता है.’’

दीपिका ने याद किया कि कई बार जब वे किसी ऐसी लिफ्ट में चढ़ गईं जो सिर्फ रिहायशियों के लिए थी, तो लोग गुस्से में चिल्लाने लगे थे, ‘‘हम आप के घरों के अंदर आते हैं, आप के लिए खाना बनाते हैं, आप हमारे हाथों से मसाज तक करवाते हैं. हम आप की सारी सफाई करते हैं,’’ दीपिका ने ऐसे लोगों को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘तो फिर आप हमें अपनी लिफ्ट में खड़ा क्यों नहीं देख सकते?’’

ऐसी बातें दीपिका को चुभती हैं. ‘‘इसी तरह के भेदभाव के खिलाफ मैं अपनी आवाज उठाना चाहती हूं,’’ उन्होंने कहा.

जब भी दीपिका के दिमाग में कोई नया आइडिया आता है, तो वे पहले उसे डायरी में दर्ज करती हैं. उस के बाद वे लगभग 1 महीने तक उस पर मेहनत करती हैं. उस की टाइमिंग, संदर्भ और प्रस्तुति को निखारती हैं, तब फिर जा कर मंच पर प्रस्तुत करती हैं. अदिति मित्तल आज भी उन की स्क्रिप्ट और परफौर्मैंस को संवारने में मदद करती हैं. एक समय तो ऐसा था कि दोनों का एजेंट भी एक ही होता था.

शुरुआत में दीपिका को इस बात की चिंता थी कि उन की जिंदगी और पृष्ठभूमि बाकी भारतीय कौमिक्स से काफी अलग है. उन्हें डर था कि क्या वे इस दुनिया में खुद को फिट कर पाएंगी. लेकिन जल्द ही उन्होंने महसूस किया कि ज्यादातर कौमेडियन ने उन्हें खुले दिल से अपनाया, ‘‘कभी किसी ने मेरा मजाक नहीं उड़ाया,’’ दीपिका ने कहा, ‘‘कई बार तो उन्होंने मुझे टैक्निक्स सिखाने में भी मदद की.’’

दीपिका कहती हैं कि जब कुछ कौमेडियन घरेलू कामगारों को आसान मजाक का जरीया बनाते हैं, तो उन्हें बुरा लगता है. ‘‘एक घरेलू कामगार अपना घर छोड़ कर आप के घर आती है, अपना काम पूरी ईमानदारी से करती है,’’ दीपिका ने कहा, ‘‘तो आप उस का मजाक मत उड़ाइए, उसे छोटा मत दिखाइए.’’

2021 में टूथपेस्ट ब्रैंड कोलगेट ने दीपिका की जिंदगी पर आधारित एक लंबा विज्ञापन बनाया. इस विज्ञापन में उन के जीवन की झलक दिखाई गई. उन के घर से ले कर लोकल ट्रेन में सफर और फिर स्टेज पर उन की परफौर्मैंस तक. विज्ञापन का अंत  “Keep India Smiling”   नामक कोलगेट की छात्रवृत्ति योजना के प्रचार से होता है. यह छात्रवृत्ति वंचित बच्चों के लिए है. फिलहाल दीपिका कुछ हिंदी और मराठी टीवी चैनलों से बातचीत कर रही हैं ताकि वे शो होस्ट करने की संभावनाएं तलाश सकें.

बाएं से दाईं तरफ संगीता व्यास , निधि गोयल, अदिति मित्तल और पत्रकार फे डिसूजा के साथ दीपिका.

पहचान और शोहरत

इस तरह की पहचान और शोहरत ने उन लोगों का नजरिया बदल दिया है. अब वे उन्हें सम्मान से देखने लगे हैं. लेकिन दूसरी ओर दीपिका बताती हैं, ‘‘उन के कुछ रिश्तेदारों में कुंठा पैदा हुई है. कभीकभी मेरे रिश्तेदार ताना मारते थे- कहते थे कि अखबार में यह क्या छपा है, तुम्हें कामवाली बाई कह रहे हैं,’’ दीपिका ने याद करते हुए कहा, मैं उन से कहती कि कम से कम मेरा नाम तो छपा है, आप का तो कहीं नहीं आया.’’

दीपिका खुद ‘बाई’ शब्द को अपमानजनक मानती हैं. ‘बाई’ के बजाए वे ‘ताई’ का इस्तेमाल करने की वकालत करती हैं. मराठी भाषा में यह सम्मान से, बड़ी बहन के लिए कहा जाता है.

दीपिका बताती हैं कि उन के सब से बड़े समर्थक उन के पति और बेटियां ही रही हैं. उन की मं?ाली बेटी ऐश्वर्या, जो एक इवेंट मैनेजर हैं, अब दीपिका की बुकिंग्स भी संभालती हैं. दीपिका की बेटियों से कभीकभी यह भी पूछा जाता है कि क्या वे अपनी मां को परफौर्म करने के लिए राजी कर सकती हैं. वे कहती हैं, ‘‘हमारी मां पैसे लेती हैं, फ्री में नहीं आतीं, आप को उन के मैनेजर से बात करनी पड़ेगी,’’ दीपिका ने हंसते हुए बताया, ‘‘उन्हें भी इस बात पर गर्व होता है.’’

हैबिटैट, जहां दीपिका ने अपने कैरियर की शुरुआत की और जहां हम बात कर रहे थे, भारत में कौमेडियन होने की नाजुक स्थिति का प्रतीक है. इस साल मार्च में महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली राजनीतिक पार्टी शिव सेना के सदस्यों ने इस स्थल को तोड़फोड़ का शिकार बनाया था. वजह थी एक स्टैंड-अप कौमेडियन कुणाल कामरा का जोक, जो उन्होंने शिंदे पर किया था और जो हैबिटैट में रिकौर्ड किए गए एक सैट का हिस्सा था.

जब मैं ने दीपिका से पूछा कि क्या उन्हें भारत में कौमेडी के मौजूदा हालात को ले कर चिंता होती है? तो उन्होंने बेहिचक जवाब दिया, ‘‘मुझे डर नहीं लगता, अगर लोगों को लड़ना है तो आने दो.’’

हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि वे खुद राजनीतिक व्यंग्य नहीं करती हैं. दीपिका का फोकस अब भी अमीरों की विचित्रताओं और मेहनतकश वर्ग के साथ उन के व्यवहार ही हैं. ‘‘हम भी इंसान हैं,’’ दीपिका ने कहा, ‘‘हमारे साथ भी इंसानों की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए, न कि जानवर समझ कर जो 24 घंटे काम करने के लिए बने हैं.’’

रूढि़यों और सोच को चुनौती

दीपिका बताती हैं कि घरेलू कामगारों की तनख्वाह अकसर बेहद कम होती है और नौकरी देने वाले थोड़ी सी तनख्वाह बढ़ाने में भी कंजूसी करते हैं, जबकि यही लोग औनलाइन शौपिंग पर हजारों रुपए खर्च कर देते हैं. वे बताती हैं कि दिन में कईकई घंटों तक काम करने के बावजूद घरेलू कामगारों को आमतौर पर महीने में केवल 2 दिन की ही छुट्टी मिलती है, जोकि अधिकांश वेतनभोगी पेशेवरों को मिलने वाली साप्ताहिक छुट्टियों की तुलना में कम हैं.

दीपिका की सफलता ने उन की कुछ दोस्तों को भी हिम्मत दी है. अब वे भी अपनी आवाज उठाने लगी हैं. ‘‘वे अपनी मैडम को मेरे वीडियो दिखाती हैं,’’ दीपिका हंसते हुए कहती हैं, ‘‘वे इस जागरूकता को घरेलू कामगारों के अधिकारों के एक संगठन में बदलना चाहती हैं. यह विचार वे सही साझेदार मिलने पर और अधिक सक्रिय रूप से आगे बढ़ाएंगी.

इस बीच दीपिका अपनी कौमेडी के जरीए घरेलू कामगारों को ले कर बनी रूढि़यों और सोच को चुनौती देने की कोशिश कर रही हैं.

कुछ शो के दौरान वे बताती हैं कि जब वे दर्शकों के गंभीर चेहरे देखती हैं, तो घबरा जाती हैं कि शायद उन के जोक्स का असर नहीं हुआ है. लेकिन वही लोग बाद में आ कर मुझे गले लगाते हैं और कहते हैं, ‘‘आप अपनी कौमेडी से बहुत अच्छा काम कर रही हैं, हमारी आंखें खोल दीं आप ने. हमें समझ नहीं आ रहा था कि हंसें या रोएं.’’

सोशल मीडिया पर भी लोग उन के पोस्ट पर कमैंट करते हैं, सराहना करते हैं या यह वादा करते हैं कि वे अपने यहां काम करने वालों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करेंगे. ‘‘तभी लगता है कि जो भी काम मैं ने हाथ में लिया है, उस में मैं कुछ हद तक सफल तो रही हूं,’’ दीपिका ने कहा और फिर मुसकराते हुए जोड़ा, ‘‘मैं दुनिया बदल दूंगी.’’

Instagram रील्स ने बढ़ाई फल खाने की उलझन, क्या कहता है साइंस

Instagram: सोशल मीडिया पर इन दिनों कब खाना है, कितना खाना है और क्या खाना चाहिए कि इतनी ओपिनियन हैं कि हम अपने पसंद के अनुसार हेल्दी खाना तक नहीं खा पाते. अब खाने के साथ फ्रू्ट्स के सेवन को लेकर भी विभिन्न आयुर्वेद और एलोपैथी डॉक्टर्स की अलग राय है. एक डॉक्टर ने तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ये तक कह दिया कि एक्सरसाइज ही ना करें, न वॉक न जिम. जबकि सभी हमें दिन में 30 मिनट्स कम से कम वर्कआउट की सलाह देते हैं. इतने मतभेदों में आखिर किसी मानें हम.

फ्रूट्स को लेकर भी राय है रात को फल मत खाओ, खाने के बाद फल गैस बनाते हैं, फल खाना है तो खाली पेट ही खाओ,  ऐसे तमाम सलाह इंस्टाग्राम, यूट्यूब, रील्स और डॉक्टरों की शॉर्ट क्लिप्स में रोजाना सुनने को मिलती हैं. इतने मतभेद हैं कि इंसान उलझकर रह जाता है. क्या खाएं, कब खाएं, कितना खाएं. ये तय करने से पहले ही भूख खत्म हो जाती है.

खाने के साथ फल खाने को लेकर खासकर आयुर्वेद और एलोपैथी की राय अलग-अलग है. कुछ लोग कहते हैं कि खाने के तुरंत बाद फल खाना पाचन को खराब करता है, वहीं कुछ लोग इसे एक मिथ मानते हैं. तो क्या वाकई खाने के साथ फल खाना नुकसानदेह है? चलिए तथ्यों, विज्ञान से इस सवाल का जवाब ढूंढते हैं.

  1. आयुर्वेद का दृष्टिकोण

आयुर्वेद के अनुसार, भोजन और फल का पाचन समय (Digestion Time) अलग-अलग होता है. आयुर्वेद कहता है कि:

फल जल्दी पचते हैं (लगभग 30-45 मिनट में), वहीं अन्न (गेहूं, चावल, दाल आदि) को पचने में 2 से 4 घंटे तक लग सकते हैं. अगर हम दोनों को एक साथ खाते हैं, तो फल पेट में ‘रुक’ जाते हैं और किण्वन (fermentation) की प्रक्रिया से गैस, एसिडिटी, या ब्लोटिंग हो सकती है. इस कारण आयुर्वेद में “food combining” के नियम हैं — जिनमें फल को अकेले, खासकर खाली पेट खाने की सलाह दी जाती है.

 

पर क्या ये बातें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सही हैं?

एलोपैथी और न्यूट्रिशन साइंस क्या कहता है?

आधुनिक पोषण विज्ञान (Modern Nutrition Science) कहता है कि शरीर के भीतर पाचन एक जटिल लेकिन व्यवस्थित प्रक्रिया है. हमारा शरीर खाने में मौजूद हर चीज (कार्ब, फैट, प्रोटीन, फाइबर, फल, सब्जी) को पहचानता है और अलग-अलग एंजाइम्स की मदद से उसे पचाता है.

 

अब बात करते हैं कुछ रिसर्च की:

क्या फल खाना धीमा करता है खाना पचाना?

नहीं. साल 2009 में “American Journal of Clinical Nutrition” में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, जब भोजन के साथ फल या फाइबरयुक्त भोजन खाया गया, तो पेट फलों में मौजूद सोल्यूबल फाइबर जैसे पेक्टिन से ज्यादा देर तक फुल रहता है, यह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है क्योंकि इससे शुगर धीरे-धीरे रिलीज़ होती है, जिससे ब्लड शुगर स्थिर रहता है. और इससे बाउल मूवमेंट भी अच्छी होती है तो इससे कब्ज से परेशान लोगों को भी फायदा मिलता है.

 

 क्या खाने के साथ फल गैस बनाते हैं?

कुछ लोग अनुभव करते हैं कि खाने के बाद फल खाने से गैस बनती है. पर इसका कारण फल नहीं, बल्कि उनकी इनडिविजुअल डाइजेस्टिव टॉलरेंस होती है, जैसे कुछ लोगों को दूध से गैस होती है, तो कुछ को छोले, काले चने या राजमा गैस बनाते हैं.

University of California, Davis की एक डायजेस्टिव स्टडी के अनुसार, फल में मौजूद फाइबर और नेचुरल शुगर (फ्रुक्टोज़) सामान्य स्थिति में गैस नहीं बनाते, हाँ, यदि किसी को पहले से IBS (Irritable Bowel Syndrome) या Fructose Intolerance है, तो समस्या हो सकती है. यानी कुल मिलाकर फ्रुट्स को किसी भी समय और चीजों से पेयर करके खाने से अधिकतर लोगों के लिए सेफ है.

 

 क्या खाने के साथ फल खाने से उसका न्यूट्रिशन घट जाता है?

नहीं, फलों का पोषण (जैसे विटामिन C, पोटैशियम, फाइबर) आपके शरीर में वैसे ही अवशोषित होता है, चाहे आप उसे अकेले खाएं या उसे रोटी सब्जी या चावल के साथ या बाद में खाए.

 

यह धारणा कहां से आई कि “फल खाने के साथ नहीं खाने चाहिए”?

ये धारणा कई हद तक आयुर्वेदिक फूड-कॉम्बिनेशन नियमों, इंटरमिटेंट फास्टिंग ट्रेंड्स और सोशल मीडिया “डाइट गुरुओं” की बातें सुनकर बनी है. सोशल मीडिया ने इसमें चार चांद लगा दिए हैं. क्योंकि हर दूसरी रील आपको कुछ अलग कहती है. हर डॉक्टर कुछ अलग सलाह देते हैं ऐसे में लोग कंफ्यूज हो जाते हैं कि क्या खाएं क्या नहीं.

 

 कब फल खाना फायदेमंद है?

खाने के साथ फल खाना नुकसानदेह नहीं है, आप जब चाहें जो भी चाहें फल खा सकते हैं. सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध 30 सेकंड की क्लिप आपके जीवन के लिए आधार नहीं हो सकती. जब तक कोई डॉक्टर ठोस सबूत, रिसर्च पेपर हाथ में रखकर बात न करे, उनकी बातों पर विश्वास करना बेकार है. सबकी बॉडी अलग होती है, और खाने को लेकर अलग रिएक्ट करती है. इसलिए

 

किसी भी चीज़ को “जहर” या “जादू” न बनाएं

फल पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं. यह सच है कि भोजन के समय, मात्रा और पाचन की आदतें हर इंसान के शरीर पर अलग असर डालती हैं. लेकिन फल को “खाने के साथ न खाओ वरना पेट सड़ जाएगा” जैसी बातें अधूरी जानकारी पर आधारित हैं. संतुलन और आत्म-निरीक्षण ही सबसे बड़ी कुंजी है. अगर आपको फल खाने के बाद कोई दिक्कत नहीं होती, तो आप उन्हें भोजन के साथ भी खा सकते हैं. अगर कोई गैस, ब्लोटिंग या भारीपन महसूस करता है तो टाइमिंग एडजस्ट कर सकते हैं. हर दिन बदलती इंस्टाग्राम की राय से ज़्यादा आपकी बॉडी की फीडबैक मायने रखती है.

 

सीजनल और लोकल फलों को खाएं, एक्जॉटिक के चक्कर में न पड़ें

सोशल मीडिया में फिटनेस इंफ्लूएंसरों ने हमारे बजट को भी गड़बड़ा दिया है. उनके हिसाब से जो मंहगा है वो ही अच्छा है. विदेशी फल अवोकाडो को इन दिनों इतना प्रोमोट किया जा रहा है कि जो उसे नहीं खा रहा उसे लग रहा है वो ज्यादा दिन जीवित नहीं रह पाएगा, क्योंकि इतना हेल्दी फ्रूट उसके बजट से बाहर है,120 रूपये में एक पीस बिकने वाला अवाकाडो इन दिनों स्टेट्स सिंबल भी बन गया है, हेल्थ और फिटनेस की दुनिया का सुपरस्टार बन चुका है, लेकिन बहुत से लोगों के मन में यह सवाल होता है कि आखिर इसमें ऐसा खास क्या है? ये कहां से आया, और भारत में इसके जैसा फल कौन-सा है.

अवोकाडो की बात करें तो इसकी खेती की शुरुआत 5000–7000 साल पहले मैक्सिको में मानी जाती है. आज अमेरिका, मैक्सिको, पेरू, चिली, और दक्षिण अफ्रीका इसके सबसे बड़े उत्पादक हैं. भारत में यह दक्षिण भारत (केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र के कुछ भागों) में उगाया जाता है.

अगर इंडियन लोकल और सीजनल फ्रूट की बात करें तो अमरूद काफी फैक्टर्स में अवाकाडो को पछाड़ देता है. न्यूट्रीशनल वेल्यू पर फोकस करें तो अवोकाडो बनाम अमरूद: न्यूट्रिशनल तुलना (100 ग्राम में)

पोषक तत्व

अवोकाडो (Avocado)

अमरूद (Guava)

कैलोरी

160 kcal- 68 kcal

कार्बोहाइड्रेट

8.5 g-14 g

शुगर

0.7 g-9 g

फाइबर

6.7 g-5.4 g

फैट

15 g (Healthy fats)-0.9 g

प्रोटीन

2 g-2.6 g

विटामिन C

10 mg (11% RDA)-228 mg (380% RDA!)

विटामिन A

7 mcg-31 mcg

फोलेट (B9)

81 mcg-49 mcg

पोटेशियम

485 mg-417 mg

मैग्नीशियम

29 mg-22 mg

 

स्रोत: USDA Food Data Central और IFCT, ICMR 2021

अब अगर आपको अपना वजन बढ़ाना है तो जरुर अवाकाडो को चुनिए क्योंकि इसमें कैलोरी अमरूद से ज्यादा है. लेकिन विटामिन सी और विटामिन ए की कैटेगरी में अमरुद अवाकाडो से कहीं आगे है. सिर्फ हेल्दी फैट के मामले में अवाकाडो आगे है लेकिन ये फैट आप ओलिव ओयल या फिर घी, नारियल से पा सकते हैं.

हम ये नहीं कर रहे हैं कि आप अवाकाडो मत खाइए, लेकिन अवाकाडो सिर्फ इसलिए मत खाइए कि इसे सब खा रहे हैं. अगर आपको पसंद है और आपको जेब अलाउड कर तभी इसे लें. अदरवाइज बहुत से हेल्दी और किफायती फ्रूट्स आपके लोकल वेंड्र्स आपको उपलब्ध करा सकते हैं.

कुल मिलाकर आप ये समझें कि किसी की भी कही किसी बात को मानने से पहले एक बार गूगल जरुर कर लें कि इस बात में कितनी सच्चाई है. आज के युग में यू आर जस्ट वन टच अवे फ्रोम इन्फोर्मेंशन. तो इस सुविधा का इस्तेमाल करें पढ़े लिखे गवार बनने से बचें.

 

मजेदार ड्रेसिंग से फ्रूट चाट का टेस्ट बढ़ाएं

आपको यदि फल खाना बोरिंग लगता है तो ये ड्रेसिंग ट्राई कर सकते हैं. इससे आपकी फ्रूट चाट के फ्लेवर बढ़ जाएंगे.

 

1- हनी-लेमन फ्रूट ड्रेसिंग (Sweet & Tangy)

1 टेबल स्पून शहद, 1 छोटा नींबू का रस, थोड़ा सा नींबू का ज़ेस्ट(यानी कसा हुआ जरा सा नींबू का छिलका), एक चुटकी काला नमक या सेंधा नमक, थोड़ी सी काली मिर्च पाउडर. इन सभी चीजों को अच्छे से मिलाएं और कटे हुए फलों पर डालकर हल्के हाथ से मिक्स करें.

 

  1. मिर्च-मसाला ट्विस्ट (Spicy Street-Style)

1/2 टीस्पून भुना जीरा पाउडर, 1/2 टीस्पून चाट मसाला, चुटकी भर कश्मीरी लाल मिर्च पाउडर, 1 टीस्पून नींबू का रस, थोड़ा काला नमक एक कटोरी या छोटी डब्बे में डालकर अच्छे से मिक्सर कें और ड्रेसिंग को कटे हुए पाइनएप्पल, पपीता, अमरूद, तरबूज पर डालें.

 

  1. पीनट बटर-हनी योगर्ट ड्रेसिंग (Protein Rich Creamy)

2 टेबल स्पून दही (ग्रीक योगर्ट हो तो बेहतर), 1 टीस्पून पीनट बटर (स्मूद टाइप), 1 टीस्पून शहद, एक चुटकी दालचीनी पाउडर. सभी चीज़ों को मिक्स कर के एक क्रीमी ड्रेसिंग बनाएं. केला, सेब, अंगूर और स्ट्रॉबेरी के साथ बढ़िया कॉम्बो तैयार होगा.

इस तरह कि बहुत सी डेसिंग रेसिपी से आप अपने फ्रूट चाट के स्वाद को बढ़ा सकते हैं.  Instagram

Hindi Love Story: महक और मोहित की लव स्टोरी

Hindi Love Story:  महक अपनी ही मस्ती में झूमती, गुनगुनाती चली आ रही थी. अपार खुशी से उस का मन गुलाब की तरह खिल उठा था. वह मोहित से मिल कर जो आ रही थी. मोहित, जिस के लिए बचपन से उस का दिल धड़कता था. जब वह मात्र 10 वर्ष की थी, तब मोहित उस के पड़ोस में रहने आया था. उस के और मोहित के परिवार में अच्छी दोस्ती हो गई थी.

एक दिन मोहित की मम्मी ने मजाक में कह दिया, ‘‘महक तो सचमुच बड़ी प्यारी है. इसे तो मैं अपने घर की बहू बनाऊंगी.’’

बस फिर क्या था, सब हंस दिए थे. मोहित और महक तो मारे शर्म के लाल हो गए थे.

‘‘मुझे शादी ही नहीं करनी,’’ कहते हुए महक अपने घर भाग गई.

मगर यह बात यहीं समाप्त नहीं हुई थी. तभी से मोहित और महक के मन में प्रेम का बीज आरोपित हो गया था. यह बीज समय के साथ धीरेधीरे पनपने लगा था और फिर प्रीत का एक हराभरा वृक्ष बन कर तैयार हो गया था. बचपन दोनों का साथ खेलते बीता था.

12वीं कक्षा के बाद मोहित मैडिकल की पढ़ाई करने के लिए लखनऊ चला गया. दूर रहने पर भी दोनों अनकहे प्रेम की मधुर डोर से बंधे रहे थे. जब मोहित रुड़की आता तो दोनों सारा दिन साथ ही गुजारते. ऐसा लगता जैसे महक और मोहित दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं. महक तो मोहित के प्यार में राधा की तरह दिनरात डूबी रहती थी.

मोहित की मैडिकल की पढ़ाई पूरी होने पर एक दिन मोहित और महक बगीचे में हरसिंगार के वृक्ष के नीचे बैठे थे. तभी मोहित ने महक को बड़े सीधे शब्दों में प्रोपोज करते हुए कहा, ‘‘महक, क्या तुम मुझ से शादी करोगी?’’

महक के गाल शर्म से लाल हो गए. वह नजर नीची किए मुसकरा रही थी. बिना कुछ बोले ही महक ने आंखों ही आंखों में स्वीकृति दे दी थी. हवा के एक झोंके के साथ हरसिंगार के कुछ फूल उन के ऊपर आ गिरे. महकते हुए फूलों से उन की प्रीत महक उठी. प्रकृति भी उन दोनों को मानो आशीर्वाद दे रही थी.

महक अपने प्रेम के विषय में अपने मातापिता को सबकुछ सच बता देना चाहती थी. उसे पूरी आशा थी कि उस के मातापिता भी उस के निर्णय से बहुत खुश होंगे, क्योंकि मोहित था ही इतना प्यारा और व्यवहारकुशल.

अनेक सपने संजोती हुई वह घर पहुंची ही थी कि उस के पिता सुरेंद्रजी का फोन आ गया. उन्होंने महक से कहा, ‘‘बेटा, मेरी अलमारी में एक ब्लू फाइल रखी है उसे निकाल कर ड्राइवर को दे दो. तुम्हारी मां अभी कहीं गई हुई हैं.’’

‘‘जी पापा,’’ महक ने कह वह अलमारी में फाइल ढूंढ़ने लगी. फाइल ढूंढ़ते समय उसे एक फाइल पर अपना नाम दिखाई दिया. वह थोड़ा रुकी. उस ने वह फाइल ड्राइवर को दे दी, पर अपने नाम की फाइल के विषय में उस की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी. उसे लगा ऐसे चोरी से पापा के पेपर देखना गलत है, पर वह अपने मन को न रोक सकी.

उस ने अलमारी से वह फाइल निकाली और देखने लगी. इस में एक पुराने मुकदमे के पेपर्स थे, जिन में पीडि़ता का नाम महक लिखा था और अभियुक्त कोई जोगेंद्र सिंह था. स्तब्ध सी वह बारबार उलटपलट कर कागजात देख रही थी. उस फाइल से उसे पता चला कि जब वह मात्र 3 वर्ष की थी तब उस अपराधी ने उस के साथ दुष्कर्म किया था. उस का दिल धक से रह गया. महक की सारी खुशी काफूर हो गई थी.

उसे इस फाइल पर विश्वास नहीं हो रहा था. उसे लगा कोई और महक होगी, पर पीडि़ता के मातापिता का नाम लिखा था. उसी के मातापिता का नाम था. उस के हाथपैर कांपने लगे थे. वह जमीन में बैठ कर जोरजोर से रोने लगी. उस की आंखों के समाने अंधेरा छा गया. उस ने अपने शरीर को कभी मोहित को भी छूने की इजाजत नहीं दी थी. फिर वह कौन दुष्ट था, जिस ने उसे दूषित किया? उसे अपनेआप से नफरत होने लगी थी.

उस के प्यार के हरेभरे वृक्ष पर अचानक बिजली गिर पड़ी और लहलहाते वृक्ष के पत्ते और टहनियां जल उठीं. उसे लगा कि वह अब अपने प्यारे मोहित के योग्य ही नहीं रही. उसे अपने ही शरीर से घिन हो रही थी. अपनी जिस पावनता पर उसे फख्र था, वही आज न जाने कहां गायब हो गई थी. महक रोतेरोते उस फाइल को देख रही थी. तभी उस ने डाक्टर का भी एक नोट पढ़ा, जिस में लिखा था, ‘‘अंदरूनी चोट के कारण महक अब कभी मां नहीं बन सकेगी.’’

महक को अपनी दुनिया समाप्त होती नजर आने लगी थी. उसे अपनी जिंदगी व्यर्थ लगने लगी थी. वह सोच रही थी कि आखिर किस के लिए और क्यों जीएं? उसे ऐसा लग रहा था जैसे उस का सबकुछ लुट गया हो. वह बहुत देर तक रोती रही. जब उस की मां मनीषा घर आईं, तो उन्होंने उस के हाथ में वह फाइल देखी. उन्हें पूरी स्थिति समझते देर नहीं लगी. वे उसे उठाते हुए बोलीं, ‘‘उठ बेटा.’’

महक जोरजोर से चिल्लाने लगी, ‘‘मुझे हाथ मत लगाओ, मैं गंदी हूं.’’

मां ने उसे बहुत समझाया, ‘‘बेटा, इस में तुम्हारा क्या दोष है?’’

महक को एक गहरा आघात पहुंचा था. उस राक्षस की कल्पना मात्र से वह बुरी तरह डर गई थी. महक अपनी मां के सीने से चिपक कर रोए जा रही थी. दोनों मांबेटियों के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे.

कुछ देर बाद पिता भी घर आ गए पर महक ने अपनेआप को एक कमरे में बंद कर लिया था. उस में पिता का सामना करने की हिम्मत नहीं थी. पिता को जब सारी बात पता चली तो उन के पैरों के नीचे से जमीन सरक गई. जिस सत्य को उन्होंने इतने वर्षों से छिपा रखा था, आज वह महक के सामने अचानक प्रकट हो गया. सुरेंद्र इस सच को आजीवन महक से छिपाना चाहते थे ताकि उन की फूल सी बच्ची को कभी आघात न पहुंचे. उन्हें अपने ऊपर बहुत क्रोध आ रहा था कि क्यों उन्होंने महक से फाइल देने के लिए कहा, पर होनी को कौन टाल सकता है?

महक इस आघात से बहुत परेशान हो गई. वह बहुत उदास हो गई. न किसी से बात करती और न किसी के सामने आती. दूसरे दिन मोहित उस के घर आया. मनीषा ने महक का दरवाजा खटखटाते हुए कहा, ‘‘महक, देख तो मोहित आया है.’’

पहले तो महक ने कोई जवाब नहीं दिया पर मां के बारबार खटखटाने पर उस ने कह दिया, ‘‘मेरा सिर दुख रहा है. मैं दवा खा कर सो रही हूं.’’ निराश मोहित घर लौट गया और महक तकिए में मुंह छिपा कर रोती रही. पूरा तकिया आंसुओं से भीग गया. उस का रोना बंद ही नहीं हो रहा था.

महक की हालत देख कर मनीषा बहुत दुखी थीं. उन की आंखों के सामने वह पुरानी घटना चित्रवत घूमने लगी… एक दिन जब वे नन्ही महक को एक पार्क में ले गई थीं तब कुछ पलों के लिए वे महक को अकेला छोड़ कर उस के लिए गुब्बारा लेने चली गईं. बस उसी समय महक को कोई चुरा ले गया. मनीषा चिंतित सी उसे सब जगह ढूंढ़ती रहीं. सुरेंद्र भी अपनी बच्ची को ढूंढ़ने के लिए तुरंत वहां पहुंच गए. पुलिस में भी रिपोर्ट लिखवा दी. मातापिता का रोरो कर बुरा हाल हो गया था.

सुबह से दोपहर हो गई पर महक का कोई पता नहीं चल रहा था. बहुत देर बाद अचानक पार्क के एक कोने में खून से लथपथ महक अचेतावस्था में पड़ी मिली. उसे देख कर मातापिता को समझते देर नहीं लगी कि उस के साथ क्या हुआ है. वे उसे डाक्टर के पास ले गए.

डाक्टर ने कहा, ‘‘इतनी छोटी बच्ची के साथ किसी ने बड़ी निर्दयता से दुष्कर्म किया है. मुझे यह बताते हुए बहुत अफसोस है कि अब यह बच्ची कभी मां नहीं बन सकेगी.’’

मातापिता के दुख और क्रोध का कोई ठिकाना नहीं था. सुरेंद्र ने तभी प्रण कर लिया कि अपराधी को उस के किए की सजा अवश्य दिलाएंगे.

कुछ समय बाद वह अपराधी पुलिस की गिरफ्त में आ गया था. उसे जेल में डाल दिया गया. फिर मुकदमे की तारीखें चलती रहीं. सुरेंद्र को बहुत परेशानी झेलनी पड़ी, पर उन्होंने अपराधी को सजा दिलवाने की ठान रखी थी. सालों कोशिश करने पर भी मुकदमे का निर्णय न होने से कभीकभी तो मनीषा और सुरेंद्र बहुत निराश हो जाते थे.

अंतत: उन के लिए वह दिन बड़े ही संतोष और चैन का दिन था, जब नाबालिग बच्ची के साथ ऐसा कुकृत्य करने वाले उस अपराधी को सजा ए मौत सुनाई.

सुरेंद्र और मनीषा महक को इन सब बातों से दूर रखना चाहते थे. अत: उन्होंने अलीगढ़ शहर छोड़ कर रुड़की में रहना शुरू कर दिया था.

मनीषा अपनी ही दुनिया में खोई हुई थी कि अचानक घंटी बज उठी. उस ने देखा दरवाजे पर मोहित खड़ा था.

‘‘आओ बेटा,’’ मनीषा ने उसे अंदर आने को कहा.

मोहित को देखते ही महक उठ कर चुपचाप अपने कमरे में चली गई. मोहित महक के बदले व्यवहार से बहुत आश्चर्यचकित था. उसे महक का उदास चेहरा परेशान कर रहा था. वह सोच रहा था कि महक 2 दिन पहले तो कितनी खुश थी, कितनी चहक रही थी, फिर ऐसा क्या हो गया कि वह इतनी उदास हो गई है? मुझ से बात क्यों नहीं कर रही है?

फिर उस ने मनीषा से पूछा, ‘‘आंटी, क्या बात है महक इतनी बुझीबुझी क्यों है? मुझ से मिलती क्यों नहीं है?’’

मनीषा मोहित की परेशानी समझ रही थीं. वे मन ही मन मोहित और महक के प्यार के विषय में भी जानती थीं, हालांकि मोहित और महक ने उन्हें अपने प्यार के विषय में कभी नहीं बताया था. पर मां तो आखिर मां होती है. वह तो आंखों की भाषा से ही सबकुछ समझ जाती है.

मनीषा जानती थीं कि मोहित ही महक को इस अंधेरे से निकाल सकता है. अत: उन्होंने मोहित को महक के जीवन में घटित घटना के बारे में संक्षेप में बताते हुए कहा, ‘‘मोहित, तुम महक के बहुत अच्छे मित्र हो. मेरा विश्वास है कि तुम ही उसे इस कठिन स्थिति से निकाल सकते हो.’’

मोहित ने पूरी घटना सुनी. उस के तनबदन में आग लग गई. उस की जान महक के साथ यह कैसा बहशीपन? उस ने अपनेआप को संयत करने का प्रयास किया. वह महक से बात करने की कोशिश करने लगा, पर महक तो अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकलती. वह 1 महीने तक कोशिश करता रहा.

महक के मातापिता भी उसे समझासमझा कर परेशान हो गए पर उसे उस सदमे से बाहर लाने में असमर्थ रहे. डिप्रैशन बढ़ता ही जा रहा था. सुरेंद्र और मनीषा उसे मनोवैज्ञानिक के पास भी ले गए पर कोई आशाजनक सुधार नहीं हुआ.

मोहित इस बिगड़ी स्थिति से बहुत परेशान हो गया था. महक का दर्द उसे अंदर तक व्यथित कर देता. वह महक को भरपूर प्यार दे कर वापस अपनी दुनिया में लाना चाहता था.

एक दिन जब घर में सुरेंद्र और मनीषा नहीं थे, तब मोहित का महक से आमनासामना हो गया. मोहित ने उस का हाथ पकड़ लिया. बोला, ‘‘महक प्लीज…’’

महक अपना हाथ छुड़ा कर भागने लगी. उस की आंखों से टपटप आंसू बह रहे थे. पर मोहित उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया. कहने लगा, ‘‘महक तुम मुझ से बात क्यों नहीं कर रहीं? मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.

तुम्हारी यह उदासी मेरी जान ले लेगी. तुम ही मेरी जिंदगी हो.’’ महक कुछ नहीं बोली. वह तो बस लुटी सी रोती रोती जा रही थी.

मोहित ने उस का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारे साथ ही जीवन के सारे सपने पूरे करना चाहता हूं. तुम्हारे बिना तो मैं जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकता.’’

महक फूटफूट कर रोने लगी, मोहित, मैं तुम्हारे काबिल नहीं हूं. किसी के गंदे हाथों ने मुझे…’’

मोहित ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया और कहने लगा, ‘‘बस महक, कुछ मत बोलो. मुझे सब पता है. मनीषा आंटी ने मुझे सब बता दिया है.’’

महक की हिचकियां और तेज हो गईं. वह मोहित को फटीफटी आंखों से देख रही थी.

फिर बोली, ‘‘मोहित, मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सकती. मैं मां भी नहीं बन सकती. मेरा जीना बेकार है. प्लीज मुझे भूल जाओ. अपनी नई दुनिया बसा लो.’’

मोहित ने उसे एक प्यार की झप्पी दी और कहा, ‘‘महक, मुझे कुछ नहीं चाहिए. अगर तुम मेरे साथ हो तो दुनिया की सारी खुशियां मेरे साथ हैं. क्या तुम मुझे अपने से अलग कर के मुझे दुखी देखना चाहती हो? अपनी जान से दूर रह कर मैं कैसे जिंदा रह पाऊंगा?’’

महक मोहित के पास खड़ी रोती रही. फिर बोली, ‘‘मोहित तुम से शादी कर के मेरा मन मुझे कचोटता रहेगा. मुझे हमेशा ऐसा लगेगा जैसे मैं ने तुम्हें जूठी पत्तल दी. मैं अपवित्र हूं.’’ मोहित ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम कैसे अपवित्र हो सकती हो? अपवित्र, मक्कार दुष्ट तो वह राक्षस है, जिस ने तुम्हारे साथ यह दुष्कृत्य किया था. वह दुष्ट, जिस ने शिशु कन्या को भी नहीं छोड़ा… वह सब से बड़ा दानव है. तुम अपने को क्यों कोस रही हो? तुम परमपवित्र हो.’’

‘‘ये सब तुम मुझे झूठी सांत्वना देने के लिए कह रहे हो न? मुझे तुम्हारी दया नहीं चाहिए. अब तो मैं तुम्हें बच्चा भी नहीं दे सकती… तुम्हें तो बच्चे इतने पसंद हैं,’’ महक ने तीखे स्वर में कहा. उस की आंखें रोतेरोते लाल हो गई थीं. उस की कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उस का भविष्य क्या होगा.

मोहित ने उसे पुन: समझाया, ‘‘महक, तुम चिंता मत करो. हम कोई बच्चा गोद ले लेंगे या फिर सैरोगेट मदर से बच्चा पैदा कर लेंगे. आज के विज्ञान के युग में बहुत कुछ संभव हो सकता है. हम मातापिता जरूर बनेंगे. बस तुम मेरी खुशी के लिए पहले जैसी बन जाओ. मैं तुम्हें ऐसे उदास नहीं देख सकता.

अंकल और आंटी भी कितने परेशान हैं. प्लीज, तुम अपनी सोच बदलो. मुझे अपनी पहले वाली हंसमुख, चुलबुली, प्यारी सी महक चाहिए. अपनी महक से मिलने के लिए मैं बेचैन हूं.’’

मोहित कई दिनों तक महक को समझाता रहा. मोहित घर आता फिर मनीषा से पूछता, ‘‘आंटी, मैं महक को अपने साथ घुमाने ले जाऊं?’’ मनीषा भी सहर्ष उसे मोहित के साथ भेज देतीं. मनीषा और सुरेंद्र को मोहित से बहुत आशा थी.

मोहित हर दिन एक नए अंदाज में महक से प्यार की बातें करता. उस के खोए आत्मसम्मान और विश्वास को जगाता. उस में प्रेम की भावना के प्राण फूंकता. धीरेधीरे उस का प्रयास रंग लाने लगा. समय बदलने लगा था. उन के प्रेम के वृक्ष पर आत्मसम्मान और विश्वास की कोंपलें फूटने लगी थीं. उस की शाखाओं पर फिर मुसकराहट के फूल खिल उठे थे. चहकती चिडि़यां फिर आ कर नीड़ बनाने लगी थीं. पावनी प्रीत की मधुरता और प्रसन्नता से वह वृक्ष पुन: लहलहाने लगा था.

महक और मोहित को पुन: प्रसन्न देख कर सुरेंद्र और मनीषा भी बहुत खुश थे. एक दिन मोहित ने सुरेंद्र और मनीषा से कहा, ‘‘अंकल मैं महक से विवाह करना चाहता हूं.’’ मोहित की बात सुनते ही सुरेंद्र और मनीषा की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे. महक खुशी से खिल उठी थी.

सुरेंद्र और मनीषा ने प्रसन्नता से कहा, ‘‘यह तो हमारे लिए दुनिया की सब से बड़ी खुशी है. महक और तुम्हारी जोड़ी बहुत सुंदर है. तुम दोनों ही एकदूसरे के पूरक हो.’’

सुरेंद्र और मनीषा ने मोहित के मातापिता के सामने महक और मोहित के विवाह का प्रस्ताव रखा तो वे तुरंत तैयार हो गए. मुंह मीठा कराते हुए मोहित की मां दीप्ति बेहद खुशी से बोलीं, ‘‘मनीषाजी, मैं ने तो बचपन में ही इसे अपनी बहू मान लिया था.’’

सब के मन में शहनाई की धुन बज उठी थी. Hindi Love Story

Kapil Sharma का 21-21-21 फ‍िटनेस रूल, किया जबरदस्त ट्रांसफॉर्मेशन

Kapil Sharma: हमेशा सबको हंसाने वाले स्टैंड अप कॉमेडियन और एक्टर कपिल शर्मा फिलहाल अपनी हंसाने की कला के वजह से नहीं बल्कि अपने जबरदस्त ट्रांसफॉर्मेशन की वजह से चर्चा में है . आजकल कपिल शर्मा पहले से कहीं ज्यादा दुबले पतले और हैंडसम नजर आ रहे हैं. खबरों के अनुसार उन्होंने अपना यह नया लुक अपनी आने वाली फिल्म किस किसको प्यार करूं 2 के लिए मेहनत करके बनाया है.
गौरतलब है कपिल शर्मा ने अपना यह फिगर ट्रांसफॉर्मेशन महज 63 दिनों में 11 किलो वजन कम करके हासिल किया है. जिसके लिए उन्होंने 21 21 21 फिटनेस प्लान फॉलो किया है . ये 21 21 21 प्लान एक ऐसा प्लान है जिसमें ना तो ज्यादा एक्सरसाइज है और ना ही बहुत ज्यादा डाइट फॉलो करना है.

कपिल शर्मा के फिटनेस कोच योगेश भटेजा ने कपिल के फिटनेस का राज शेयर करते हुए बताया की कपिल ने 21-21 -21 फिटनेस प्लान फॉलो किया है. जिसमें 21 दिन के बाद एक बदलाव होता है जिसमें पहला फेज होता है जिसमें सिर्फ अपने शरीर को अच्छे से हिलाना डुलाना जैसे फ्री स्टाइल एक्सरसाइज करना स्ट्रेचिंग करना शामिल होता है.

इन दिनों आप जलेबी भी खा ले तो कोई परवाह नहीं , लेकिन शरीर को हिलाना डुलाना वर्कआउट करना मुख्य मकसद होता है इसमें शरीर को एक्टिव बनाना मुख्य लक्ष्य होता है वजन घटाना नहीं , इसके बाद दूसरे फेस में 21 दिन तक खाने में बैलेंस बनाना क्या खाना यह बताया जाता है और उसे फॉलो किया जाता है जिसमें ना तो कोई डाइट फॉलो करना होता है ,और ना ही खाने में कोई बदलाव करना है और अंतिम आखिर के 21 दिनों में मेंटल और इमोशनल फिटनेस के लिए ट्रेनिंग देते हैं जिसमें आदमी को अपनी खराब आदतों को पहचानना है और उस पर नियंत्रण करना है.

अगर आप अपनी खराब आदत पर कंट्रोल कर लेते हैं तो वजन कम करने का प्रोग्राम अपने आप शुरू हो जाता है सही खानपान और सही आदतों के चलते जब ऑटोमेटेकली आपका वजन कम होता है को किसी और मोटिवेशन की जरूरत नहीं पड़ती , अपने शरीर के बदलाव को देखकर मोटिवेट हो जाते हैं और वजन कम करने की प्रक्रिया तेज कर देते हैं इसी फिटनेस प्रोग्राम को फोलो करके कपिल ने अपना 63 दिनों में 11 किलो वजन कम किया है. Kapil Sharma

Family Story: देवरानी वर्सेज जेठानी

Family Story: ‘‘वाह भई, मजा आ गया… भाभी के हाथों में तो जैसे जादू की छड़ी है… बस खाने पर घुमा देती हैं और खाने वाला समझ ही नहीं पाता कि खाना खाए या अपनी उंगलियां चाटे,’’ मयंक ने 2-4 कौर खाते ही हमेशा की तरह खाने की तारीफ शुरू कर दी तो रसोई में फुलके सेंकती सीमा भाभी के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई.

पास ही खड़ी महिमा के भीतर कुछ दरक सा गया, मगर उस ने हमेशा की तरह दर्द की उन किरचों को आंखों का रास्ता नहीं दिखाया, दिल में उतार लिया.

‘‘अरे भाभी, महिमा को भी कुछ बनाना सिखा दो न… रोजरोज की सादी रोटीसब्जी से हम ऊब गए… बच्चे तो हर तीसरे दिन होटल की तरफ भागते हैं,’’ मयंक ने अपनी बात आगे बढ़ाई तो लाख रोकने की कोशिशों के बावजूद महिमा की पलकें नम हो आईं.

इस के पास कहां इतना टाइम होता है जो रसोई में खपे… एक ही काम होगा… या तो कलम पकड़ लो या फिर चकलाबेलन… सीमा की चहक में छिपे व्यंग्यबाण महिमा को बेंध गए, मगर बात तो सच ही थी, भले कड़वी सही.

महिमा एक कामकाजी महिला है. सरकारी स्कूल में अध्यापिका महिमा को मलाल रहता है कि वह आम गृहिणियों की तरह अपने घर को वक्त नहीं दे पाती. ऐसा नहीं है कि उसे अच्छा खाना बनाना नहीं आता, मगर सुबह उस के पास टाइम नहीं होता और शाम को वह थक कर इतनी चूर हो चुकी होती है कि कुछ ऐक्स्ट्रा बनाने की सोच भी नहीं पाती.

महिमा सुबह 5 बजे उठती है. सब का नाश्ता, खाना बना कर 8 बजे तक स्कूल पहुंचती है. दोपहर 3 बजे तक स्कूल में व्यस्त रहती है. उस के बाद घर आतेआते इतनी थक जाती है कि यदि घंटाभर आराम न करे तो रात तक चिड़चिड़ाहट बनी रहती है. रात को रसोई समेटतेसमटते 11 बज जाते हैं. अगले दिन फिर वही दिनचर्या.

इतनी व्यस्तता के बाद महिमा चाह कर भी सप्ताह के 6 दिन पति या बच्चों की खाने, नाश्ते की फरमाइशें पूरी नहीं कर पाती. एक रविवार

का दिन उसे छुट्टी के रूप में मिलता है, मगर यह एक दिन बाकी 6 दिनों पर भारी पड़ता है. सब से पहले तो वह खुद ही इस दिन थोड़ा देर से उठती. फिर सप्ताह भर के कल पर टलने वालेकाम भी इसी दिन निबटाने होते हैं. मिलनेजुलने वाले दोस्तरिश्तेदार भी इसी रविवार की बाट जोहते हैं. इस तरह रविवार का दिन मुट्ठी में से पानी की तरह फिसल जाता है.

क्या करे महिमा… अपनी ग्लानि मिटाने के लिए वह बच्चों को हर रविवार होटल में खाने की छूट दे देती है. धीरेधीरे बच्चों को भी इस आजादी और रूटीन की आदत सी हो गई है. महिमा महसूस करती है कि उस का घर सीमा भाभी के घर की तरह हर वक्त सजासंवरा नहीं दिखता. घर के सामान पर धूलमिट्टी की परत भी दिख जाती है. कई बार छोटेछोटे मकड़ी के जाले भी नजर आ जाते हैं. इधरउधर बिखरे कपड़े और जूते तो रोज की बात है. लौबी में रखी डाइनिंगटेबल भी खाने के कम, बच्चों की किताबों, स्कूल बैग, हैलमेट आदि रखने के ज्यादा काम आती है.

कई बार जब महिमा झुंझला कर साफसफाई में जुट जाती है, तो बच्चे पूछ बैठते हैं, ‘‘आज अचानक यह सफाई का बुखार कैसे चढ़ गया? कोई आने वाला है क्या?’’ तब वह और भी खिसिया जाती.

हालांकि महिमा ने अपनी मदद के लिए कमला को रखा हुआ है, मगर वह उस के स्कूल जाने के बाद आती है, इसलिए जो जैसा कर जाती है उसी में संतुष्ट होना पड़ता है.

स्कूल में आत्मविश्वास से भरी दिखने वाली महिमा भीतर ही भीतर अपना आत्मविश्वास खोती जा रही थी. यदाकदा अपनी तुलना सीमा भाभी से करने लगती कि कितने आराम से रहती हैं सीमा भाभी. घर भी एकदम करीने से सजा हुआ… अच्छे खाने से पतिबच्चे भी खुश.

दिन में 2-3 घंटे एसी की ठंडी हवा में आराम… और एक मैं हूं…. चाहे हजारों रुपए महीना कमाती हूं… कभी अपने पैसे का रोब नहीं झाड़ती… जेठानी के सामने हमेशा देवरानी ही बनी रहती हूं… कभी भी रानी बनने का गरूर नहीं दिखाती… फिर भी मयंक ने कभी मेरी काबिलियत पर गर्व नहीं किया. बच्चे भी अपनी ताई के ही गुण गाते रहते हैं.

वैसे देखा जाए तो वे सब भी कहां गलत हैं. कहते हैं कि दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से हो कर गुजरता है. मगर मैं कहां इन दूरियों को तय कर पाई हूं… जल्दीजल्दी जो कुछ बना पाती हूं बस बना देती हूं. एक सा नाश्ता और खाना खाखा कर बेचारे ऊब जाते होंगे… कैसी मां और पत्नी हूं… अपने परिवार तक को खुश नहीं रख पाती… महिमा खुद को कोसने लगती और फिर अवसाद के दलदल में थोड़ा और गहरे धंस जाती.

क्या करूं? क्या इतनी मेहनत से लगी नौकरी छोड़ दूं? मगर अब यह सिर्फ नौकरी कहां रही… यह तो मेरी पहचान बन चुकी है. स्कूल के बच्चे जब मुझे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. उन के अभिभावक बच्चों के सामने मेरा उदाहरण देते हैं तो वे कितने गर्व के पल होते हैं… वह अनमोल खुशी को क्या सिर्फ इतनी सी बात के लिए गंवा दूं कि पति और बच्चों को उन का मनपसंद खाना खिला सकूं. महिमा अकसर खुद से ही सवालजवाब करने लगती, मगर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाती.

इसी बीच महिमा की स्कूल में गरमी की छुट्टियां हो गईं. उस ने तय कर लिया कि इन पूरी छुट्टियों में वह सब की शिकायतें दूर करने की कोशिश करेगी. सब का मनपसंद खाना बनाएगी. नईनई डिशेज बनाना सीखेगी… घर को एकदम साफसुथरा और सजा कर रखेगी…

छुट्टी का पहला दिन. नाश्ते में गरमगरम आलू के परांठे देखते ही सब के चेहरे खिल उठे. भूख से अधिक ही खा लिए सब ने. उन्हें संतुष्ट देख कर महिमा का दिल भी खुश हो गया. मयंक टिफिन ले कर औफिस निकल गया और बच्चे कोचिंग क्लास. महिमा घर को समेटने में जुट गई.

दोपहर ढलतेढलते पूरा घर चमक उठा. लगा मानो दीवाली आने वाली है. मयंक और बच्चे घर लौट आए. आते ही बच्चों ने अपनी किताबें और बैग व मयंक ने अपनी फाइलें और हैलमेट लापरवाही से डाइनिंगटेबल पर पटक दिया. महिमा का मूड उखड़ गया, मगर उस ने एक लंबी सास ली और सारा सामान यथास्थान पर रख कर डाइनिंगटेबल फिर से सैट कर दी.

महिमा ने रात के खाने में भी 2 मसालेदार सब्जियों के अलावा रायता और सूजी का हलवा भी बनाया. सजी डाइनिंगटेबल देख कर मयंक और बच्चे खुश हो गए. उन्हें खुश देख कर महिमा भी खुश हो उठी.

अब रोज यही होने लगा. नाश्ते में अकसर मैदा, बेसन, आलू और अधिक तेलमिर्च मसाले का इस्तेमाल होता था. रात में भी महिमा कई तरह के व्यंजन बनाती थी. अधिक वैरायटी बनाने के चक्कर में अकसर रात का खाना लेट हो जाता था और गरिष्ठ होने के कारण ठीक से हजम भी नहीं हो पाता था.

अभी 15 दिन भी नहीं बीते थे कि मयंक ने ऐसिडिटी की शिकायत की. रातभर खट्टी डकारों और सीने में जलन से परेशान रहा. सुबह डाक्टर को दिखाया तो उस ने सादे खाने और कई तरह के दूसरे परहेज बताने के साथसाथ क्व2 हजार का दवाओं का बिल थमा दिया.

दूसरी तरफ घर को साफसुथरा और व्यवस्थित रखने के प्रयास में बच्चों की आजादी छिनती जा रही थी. महिमा उन्हें हर वक्त टोकती रहती कि इस्तेमाल करने के बाद अपना सामान प्रौपर जगह पर रखें. मगर बरसों की आदत भला एक दिन में छूटती है और फिर वैसे भी अपना घर इसीलिए तो बनाया जाता है ताकि वहां अपनी मनमरजी से अपने तरीके से रहा जाए. मां की टोकाटाकी से बच्चे घर वाली फीलिंग के लिए तरसने लगे, क्योंकि घर अब होटल की तरह लगने लगा था.  घर को संवारने और सब को मनपसंद खाना खिलाने की कवायद में महिमा पूरा दिन उलझी रहने लगी. हर वक्त कोई न कोई नई डिश या नया आइडिया उस के दिमाग में पकता रहता. साफसफाई के लिए भी दिन भर परेशान होती, कभी कमला पर झल्लाती तो कभी बच्चों को टोकती. नतीजन, एक दिन रसोई में खड़ीखड़ी महिमा गश खा कर गिर पड़ी. मयंक ने उसे उठा कर बिस्तर में लिटाया. बेटे ने तुरंत डाक्टर को फोन किया.

चैकअप करने के बाद पता चला कि महिमा का बीपी बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है. डाक्टर ने आराम करने की सलाह के साथसाथ मसालेदार, ज्यादा घी व तेल वाले खाने से परहेज करने की सलाह दी. साथ ही लंबाचौड़ा बिल थमाया वह अलग.

‘‘सौरी मयंक मैं एक अच्छी पत्नी और मां की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकी,’’ महिमा ने मायूसी से कहा.

‘‘पगली यह तुम से किस ने कहा? तुम ने तो हमेशा अपनी जिम्मेदारियां पूरी शिद्दत के साथ निभाई है. मुझे गर्व है तुम पर,’’ मयंक ने उस का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

‘‘तो फिर वे हमेशा सीमा भाभी की तारीफें… वह सब क्या है?’’ महिमा ने संशय से पूछा.

‘‘अरे बावली, तुम भी गजब करती हो… पता नहीं किस आसमान तक अपनी सोच के घोड़े दौड़ा लेती हो,’’ मयंक ने ठहाका लगाते हुए कहा.

महिमा अचरज के भाव लिए मुंह खोले उसे देख रही थी. जब हमारी सगाई हुई थी उस के बाद से ही सीमा भाभी के व्यवहार में परिवर्तन नजर आने लगा था. उन्हें लगने लगा था कि नौकरीपेशा बहू आने के बाद घर में उन की अहमियत कम हो जाएगी. यह भी हो सकता है कि तुम उन पर अपने पैसे का रोब दिखाओ. बस, तभी हम सब ने तय कर लिया था कि सीमा भाभी को इस कमतरी के एहसास से छुटकारा दिलाना है और इसीलिए हम सब बातबात में उन की तारीफ करते हैं ताकि वे किसी हीनभावना से ग्रस्त न हो जाएं. मगर इस सारे गणित में अनजाने में ही सही, हम से तुम्हारा पक्ष नजरअंदाज होता रहा. हम सब तुम्हारे गुनाहगार हैं,’’ मयंक ने शर्मिंदा होते हुए अपने कान पकड़ लिए.

यह देख महिमा खिलखिला पड़ी, ‘‘तो अब सजा तो आप को मिलेगी ही… आप सब को अगले 20 दिन और इसी तरह का चटपटा और मसालेदार खाना खाना पड़ेगा.’’

‘‘न बाबा न… इतनी बड़ी सजा नहीं… हमें तो वही सादी रोटीसब्जी चाहिए ताकि हमारा पेट भी हैप्पी रहे और जेब भी. क्यों बच्चो?’’ मयंक ने नाटकीयता से कहा. अब तक बच्चे भी वहां आ चुके थे.

‘‘ठीक है, मगर सप्ताह में एक दिन तो होटल जाने दोगे और हमें अपनी मनपसंद डिशेज खाने दोगे न?’’ दोनों बच्चे एकसाथ चिल्लाए तो महिमा के होंठों पर भी मुसकराहट तैर गई. Family Story

Drama Story in Hindi: धोखेबाज पति

Drama Story in Hindi: ‘कौन कहता है कि एक म्यान में दो तलवारें नहीं समा सकतीं? आदमी में समझ होनी चाहिए,’ रूपेश ने दिल ही दिल में कहा. फिर उस ने अर्चना के सुंदर मुखड़े की ओर ताका व उस के बाद उस की नजरें अपनी पत्नी शिखा के चेहरे पर पड़ीं. शिखा अपनी प्लेट में धीरेधीरे उंगलियां चला रही थी. अर्चना से रूपेश की मुलाकात अपने एक मित्र के कार्यालय में हुई थी, जो उसे इंतजार करने को कह कर खुद कहीं चला गया था. एकडेढ़ घंटे की बातचीत के बाद अर्चना और रूपेश में इतनी घनिष्ठता हो गई थी कि रूपेश को अर्चना के बगैर रहना कठिन महसूस होने लगा था. कुछ दिनों तक सिनेमाघरों, पार्कों और होटलों में मुलाकातों के बाद रूपेश उसे अपने घर लाने की लालसा को न दबा पाया. शिखा को रूपेश ने जब यह कहा कि वह अर्चना को भी अपने घर में रहने दे तो शिखा पर मानो बिजली गिर पड़ी थी. वह काफी चीखीचिल्लाई थी किंतु रूपेश ने उस को समझाया था कि जब हम अपने हर रिश्तेदार, मित्रों और जानपहचान वालों की खुशियों के लिए सबकुछ करने को तैयार रहते हैं, तब यह कितनी अजीब बात है कि पतिपत्नी, जिन का रिश्ता संसार में सब से बड़ा और गहरा होता है, एकदूसरे की खुशियों का खयाल न रखें.

रूपेश ने शिखा से कहा कि अर्चना पर और घर पर उसे पूरा अधिकार होगा. उस को अपनी हर इच्छा को पूरा करने का अधिकार होगा. बस, वह अर्चना को उस के साथ इस घर में रहने पर आपत्ति न उठाए. पड़ोसियों को वह यही बताए कि अर्चना उस की मामी की या चाची की लड़की है और वह, यहां पर नौकरी करने आई है तथा अब उन लोगों के साथ ही रहेगी. आखिर जब शिखा ने देखा कि रूपेश को समझानेबुझाने का अब कोई फायदा नहीं है तो एक हफ्ते की खींचतान के बाद उस ने रूपेश की इच्छा के आगे सिर झुका दिया. रूपेश के पांव धरती पर न टिकते थे. वह उसी दिन जा कर अर्चना को अपने घर ले आया. पड़ोसियों से कहा गया कि वह शिखा की बहन है. रिश्तेदारों ने आपत्ति उठाई तो रूपेश ने यह कह कर मुंह बंद कर दिया कि जब मियांबीवी राजी तो क्या करेगा काजी. शिखा ने अर्चना का खुले दिल से स्वागत किया. उस के रहने की व्यवस्था रूपेश के कमरे में कर दी गई. अर्चना को नहानेधोने के लिए शिखा स्नानघर में खुद ले गई. अपने हाथों से तौलिया, साबुन, तेल वहां पहुंचाया. बाथरूम स्लीपर खुद अर्चना के पांव के पास रख दिए. रूपेश मानो खुशियों के हिंडोलों में झूल रहा था. नहाने के बाद नाश्ते की मेज पर बड़े आग्रह के साथ शिखा ने अर्चना को खिलायापिलाया. शिखा से ऐसे बरताव की आशा रूपेश को कभी न थी.

रूपेश मन ही मन मुसकरा रहा था और अपने सुंदर जीवन की कल्पना में डूबतैर रहा था. औटोरिकशा की भड़भड़ाहट से उस की कल्पना में सहसा विघ्न पड़ा. औटोरिकशा से एक लंबाचौड़ा खूबसूरत युवक उतरा और ‘हैलो शिखा’ बोलते हुए घर में घुस गया. शिखा एकाएक उस की तरफ बढ़ी. किंतु फिर थोड़ा रुक गई. उस नौजवान ने आगे बढ़ कर शिखा के कंधे पर अपनी बांह रख दी.

‘‘रूपेश भैया, जरा औटोरिकशा से सामान तो उतार लाना,’’ उस नवयुवक ने रूपेश की तरफ मुंह फेर कर कहा. कुछ न समझते हुए भी रूपेश ने औटोरिकशे वाले से उस नवयुवक का सामान अंदर रखवाया और उसे पैसे दे कर चलता किया. शिखा और वह युवक सोफे पर पासपास बैठे बातों में मग्न थे जैसे जिंदगीभर की सारी बातें आज ही खत्म कर के दम लेंगे.

‘‘आप की तारीफ,’’ रूपेश ने शिखा से पूछा. शिखा थोड़ा सा मुसकराई और शर्म से सिमटसिकुड़ गई. फिर उस ने एक बार उस नवयुवक के सुंदर मुखड़े की ओर ताका. ‘‘यह संजय है. तुम्हें शायद याद होगा कि एक बार तुम्हारे बहुत जोर देने पर मैं ने स्वीकार किया था कि शादी से पहले मैं भी किसी से प्यार करती थी. मेरी अधूरी प्रेमकहानी का हीरो यही है.’’ रूपेश को झटका सा लगा. उस की आंखें फैल गईं.

‘‘जब मैं ने अर्चना को साथ रखने की बात सुनी और तुम ने मेरा पूरा हक और मेरी खुशियां मुझे देने का वचन दे दिया, तब मैं ने संजय को अपने साथ रखने का फैसला कर लिया,’’ शिखा ने अपनी आंखों को नचाते हुए कहा, ‘‘अपने मिलनेजुलने वालों से हम यही कहेंगे कि संजय आप के मामाजी, फूफाजी या चाचाजी का बेटा है और यह नौकरी के सिलसिले में यहां आया हुआ है और अब हमारे साथ ही रहेगा.’’ ‘‘अरे, शिखा डार्लिंग, पहले तो मुझे यकीन ही नहीं आया. किंतु जब तुम ने बताया कि तुम लोग एकदूसरे की खुशियों के लिए झूठे रस्मोरिवाज तोड़ रहे हो तब मैं ने उस महान आदमी के दर्शन करने के लिए यहां आने का निश्चय कर ही लिया,’’ संजय बोला.

‘‘अब तुम इन से खुद पूछ लो,’’ शिखा ने संजय की तरफ देखा और फिर वह अपने पति की तरफ घूम गई, ‘‘क्यों जी, है न यही बात? आप मेरी खुशियों के आगे दीवार तो नहीं बनेंगे? प्यार की जिस प्यास से मैं आज तक तड़पती रही हूं, अब उसे बुझाने में आप मुझे पूरा सहयोग देंगे न?’’ ‘‘हांहां.’’ रूपेश आगे कुछ न कह सका.

‘‘डार्लिंग, तुम थकेहारे आए हो. आओ, नहाधो लो ताकि थकावट दूर हो जाए.’’

‘‘स्नानघर किधर है?’’ संजय ने पूछा. ‘‘जाइए जी, इन को स्नानघर बताइए,’’ शिखा ने कहा, ‘‘और हां, यह तौलिया और साबुन वहां रख दीजिएगा.’’ रूपेश ने तौलिया और साबुन हाथ में ले लिया और स्नानघर की ओर मुड़ा. संजय उस के पीछेपीछे चल पड़ा.

‘‘अरे हां, यह बाथरूम स्लीपर भी साथ ले जाइए.’’ शिखा ने संजय का ब्रीफकेस खोल कर उस में से बाथरूम स्लीपर निकाले. संजय बाथरूम से स्लीपर लेने के लिए पलटा.

‘‘अरे, नहीं. आप चलिए. ये ले कर आते हैं.’’ शिखा ने बाथरूम स्लीपर रूपेश की तरफ बढ़ा दिए. रूपेश ने कंधे उचकाए और फिर बाथरूम स्लीपर पकड़ कर आगे बढ़ गया.

स्नानघर से पानी गिरने की आवाज आ रही थी और संजय मग्न हो कर गुनगुना रहा था. ‘‘यह क्या मजाक है?’’ रूपेश ने शिखा से कमरे में लौटते ही कहा.

‘‘कैसा मजाक, क्या आप को संजय का यहां आना अच्छा नहीं लगा?’’ शिखा ने पूछा. ‘‘नहीं, यह बात नहीं, मैं पूछता हूं कि संजय के बाथरूम स्लीपर मुझ से उठवाना क्या तुम्हें शोभा देता है?’’

‘‘डार्लिंग, मैं आप की खुशी के लिए अर्चना बहन की दिल से सेवा कर रही हूं. आप मेरी खुशी के लिए माथे पर बल न डालिए. कहीं ऐसा न हो कि संजय के दिल को चोट पहुंचे. वह बहुत भावुक है,’’ शिखा ने कहा. रूपेश मन ही मन ताव खाए कंधे हिला कर रह गया.

‘‘अब ऐसा करिए, दो?पहर के खाने के लिए कुछ सब्जी वगैरह लेते आइए. आप डब्बों में बंद सब्जी ले आइए.’’ रूपेश ने अर्चना की तरफ देखा.

‘‘यदि अर्चना बहन आराम करना चाहती हैं तो आराम करें या आप के साथ जाना चाहती हैं तो बाजार घूम आएं. मैं रसोई की तैयारी करती हूं.’’ ‘‘नहीं, अर्चना यहीं रहेगी,’’ रूपेश ने जल्दी से कहा.

‘‘क्या आप मुझे संजय के साथ अकेले छोड़ते हुए डरते हैं?’’ शिखा ने तीखी नजरों से रूपेश की तरफ देखा. ‘‘नहीं, मैं ऐसा तंगदिल नहीं हूं. मैं तो इसलिए कह रहा हूं कि यह काम में तुम्हारी मदद करेगी,’’ रूपेश ने जल्दी से कहा और फिर थैला उठा कर बाहर निकल गया.

रूपेश ताव खाते हुए बाजार की ओर जा रहा था. उस के घर में उस की पत्नी उस से किसी के जूते उठवाए, यह कहां तक ठीक था. शिखा ने यदि अर्चना के लिए तौलिया, साबुन, स्लीपर स्नानघर में पहुंचा दिए तो अपनी खुशी से. उस ने उसे मजबूर तो नहीं किया था? संजय को बुलाने से पहले वह उस से पूछ तो लेती, सलाह तो कर लेनी चाहिए थी. और अब नौकर की तरह थैला थमा कर उसे बाजार की ओर ठेल दिया है. यह ठीक है कि शिखा को उस ने घर में पूरा हक देने का वादा जरूर किया था, मगर उसे एकदूसरे की बेइज्जती करने का तो अधिकार नहीं है.

इस की कुछ न कुछ सजा जरूर संजय और शिखा को मिलनी चाहिए. वे दोनों फूड पौयजन से बीमार हो जाएं तो कैसा रहे? रूपेश के दिमाग में एकदम विचार उभरा. हां, यह ठीक रहेगा. उस के कदम एक डिपार्टमैंटल स्टोर की ओर बढ़े.

‘‘आप के यहां कोई ऐसी डब्बाबंद सब्जी है जिस से फूड पौयजन होने का खतरा हो?’’ उस ने सेल्समैन से सीधा सवाल किया. ‘‘क्या मजाक करते हैं, साहब? हमारे यहां तो बिलकुल ताजा स्टौक है,’’ सेल्समैन ने दांत निकालते हुए कहा.

‘‘एकआध डब्बा भी नहीं?’’ ‘‘क्या आप स्वास्थ्य विभाग से आए हैं?’’ सेल्समैन ने सतर्क हो कर पूछा.

‘‘नहीं, डरो नहीं. हां, यह बताओ कि कोई ऐसा डब्बा…’’ ‘‘जी नहीं. हम इमरजैंसी से पहले और इमरजैंसी के बाद भी अच्छा ही माल बेचते रहे हैं,’’ सेल्समैन ने कहा.

‘‘अच्छा, कोई ऐसी दुकान का पता बता दो जहां ऐसी डब्बाबंद सब्जी मिल जाए.’’ अपनी बेइज्जती के बाद की भावना से पागल हो रहे रूपेश ने 500 रुपए का नोट सेल्समैन की तरफ सरकाया. ‘‘क्रांति बाबू, जरा पुलिस को फोन करना. यह पागल आदमी किसी की हत्या करना चाहता है,’’ सेल्समैन ने टैलीफोन के करीब बैठे एक नौजवान से कहा.

पुलिस का नाम सुन कर रूपेश उड़नछू हो गया. 500 रुपए का नोट काउंटर से उठाने की भी उसे सुध न रही, संजय व शिखा को बीमार कर देने का विचार भी उस के दिमाग से उड़ गया. अब तो वह उन दोनों की सेहत ठीक रहने की ख्वाहिश कर रहा था. उस के डरे हुए मस्तिष्क में यह विचार उभरा कि संजय व शिखा को कुछ हो गया तो सेल्समैन की गवाही पर वह पकड़ लिया जाएगा. रात को खाने के बाद कौफी का दौर चला. वे चारों बैठक में बैठे थे. संजय अपने चुटकुलों से सब को हंसाता रहा.

‘‘क्या बात है, डार्लिंग, तुम कुछ नहीं बोल रहे हो?’’ अर्चना ने रूपेश के करीब सरकते हुए कहा. ‘‘मैं तो कहता हूं, रूपेशजी, यदि सब लोग आप की तरह समझदार हो जाएं तो प्रेम के कारण होने वाली सारी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं,’’ संजय ने कहा.

‘‘और प्रेम में निराश हो कर आत्महत्याएं भी कोई न करे,’’ अर्चना बोली. ‘‘मानव जाति को कितना अच्छा सुझाव दिया है रूपेशजी ने,’’ शिखा

ने कहा. ‘‘मगर पहले तो तुम अडि़यल घोड़े की तरह दुलत्तियां झाड़ रही थीं, मरनेमारने की धमकियां दे रही थीं,’’ रूपेश ने शिखा की तरफ देख कर कहा.

‘‘तब मैं तुम्हारे दिल की गहराई नाप नहीं पाई थी.’’ ‘‘अच्छा भई, तुम दिल की गहराइयां नापो. हम तो नींद की गहराइयों में उतरने चले,’’ संजय उठ खड़ा हुआ, ‘‘शिखा डार्लिंग, सोने का कमरा किधर है?’’

‘‘वह बाएं कोने वाला इन का है और दाएं वाला हमारा.’’ ‘‘अच्छा भई, गुडनाइट,’’ स्लीपिंग गाउन सरकाता हुआ संजय दाईं ओर के सोने के कमरे की ओर बढ़ गया.

संजय के चले जाने के बाद कुछ देर तक अर्चना अंगरेजी पत्रिका के पन्ने पलटती रही. फिर वह भी अंगड़ाई ले कर उठ खड़ी हुई.

‘‘सोना नहीं है, रूपेश डार्लिंग?’’ ‘‘तुम चलो, मैं थोड़ी देर और बैठूंगा.’’ रूपेश ने अनमने स्वर में कहा.

‘‘ओके, गुडनाइट.’’ ‘‘गुडनाइट,’’ रूपेश कुछ नहीं बोला लेकिन शिखा ने स्वेटर पर सलाई चलाते हुए कहा.

फिर बैठक में खामोशी छा गई. घड़ी की टिकटिक और शिखा की सलाइयों की टकराहट इस खामोशी को तोड़ देती. रूपेश अनमना सा कुरसी पर बैठा रहा.

‘‘अब सो जाइए, 1 बजने को है, मुझे तो नींद आ रही है,’’ शिखा ऊन के गोलों में सलाइयां खोंसती हुई बोली. शिखा ने स्वेटर और ऊन के गोलों को कारनेस पर टिका कर एक अंगड़ाई ली, रूपेश की तरफ देखा और और फिर पलट पड़ी दाएं कोने वाले सोने के कमरे की ओर.

‘‘रुक जाओ, शिखा,’’ रूपेश तड़प कर शिखा और कमरे के दरवाजे के बीच बांहें फैला कर खड़ा हो गया, ‘‘बेशर्मी की भी हद होती है.’’ ‘‘बेशर्मी, कैसी बेशर्मी? रूपेश डार्लिंग, तुम ने मुझे जो हक दिया है मैं उसी का इस्तेमाल कर रही हूं. हट जाओ, मेरी वर्षों से मुरझाई हुई खुशियों के बीच दीवार न बनो. मुझे खुशियों का रास्ता दिखा कर राह में कांटे न बिछाओ.’’

‘‘अपने पति के सामने ऐसा कदम उठाते हुए तुझे डर नहीं लगता? शर्म नहीं आती?’’ ‘‘डर, शर्म आप से? क्यों? यह तो बराबरी का सौदा है. रात काफी हो चुकी है, सो जाइए. आप का कमरा उधर है,’’ शिखा ने बाएं कोने में कमरे की ओर इशारा किया, ‘‘छोडि़ए, मेरा रास्ता.’’

‘‘बेशर्म, मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि तुम इतनी गिर सकती हो. तुम्हारी इस हरकत से एक पति के दिल पर क्या गुजर सकती है, यह तुम ने कभी सोचा है?’’ रूपेश की आंखें क्रोध से जल उठीं. ‘‘मर्द जब दूसरी पत्नी ब्याह कर लाता है तब क्या अपनी पहली पत्नी के दिल में उठने वाली चीखों की शहनाइयों के शोर को सुनता है? रातरातभर कोठों पर ऐश की शमाएं जलाने वाले पति कभी अपनी पत्नी के दिल के अंधेरों में झांक कर देखते हैं? हर जवान लड़की पर लार टपकाने वाला पति कभी यह भी सोचता है कि उस की पत्नी के गालों पर आंसू के निशान क्यों बने रहते हैं? आप ने जब अर्चना को लाने की तजवीज पेश की थी, तब मैं भी रोईचिल्लाई थी. अब मैं संजय के पास जा रही हूं तो आप क्यों चीख उठे?’’

‘‘मैं उस का सिर तोड़ दूंगा,’’ रूपेश कमरे की तरफ बढ़ा. ‘‘अरे, रुको तो,’’ शिखा ने उस की बांह पकड़ ली.

‘‘मैं कुछ सुनना नहीं चाहता. उसे इसी वक्त चलता कर दो.’’ ‘‘और अर्चना?’’

‘‘वह भी जाएगी. मेरा फैसला गलत था. मैं अंधे जज्बात की धारा में बह गया था,’’ रूपेश ने हथियार डाल दिए. ‘‘अंधे जज्बात नहीं, वासना ने तुम्हें अंधा कर दिया था. रूपेश भैया,’’ संजय पूरे कपड़े पहन अतिथिकक्ष के दरवाजे पर खड़ा था.

रूपेश कभी सोने के कमरे की तरफ और कभी अतिथिकक्ष के दरवाजे पर खड़े संजय की ओर देख रहा था. ‘‘जी हां, आप का खयाल ठीक है. मैं सोने के कमरे में स्लीपिंग सूट पहन कर गया जरूर था. किंतु दूसरे दरवाजे से बाहर निकल गया था,’’ संजय ने कहा, ‘‘आप को फिर कोई शो करना हो तो याद कीजिएगा. यह रहा मेरा कार्ड.’’

‘नितिन…निर्देशक तथा स्टेज आर्टिस्ट,’ रूपेश कार्ड की पहली पंक्ति पर अटक गया. ‘‘आगे हमारे ड्रामा क्लब का पता भी लिखा है. नोट कर लीजिए,’’ नितिन मुसकरा दिया.

रूपेश मुंह फाड़ कभी कार्ड को तो कभी उस युवक को देख रहा था, जो संजय से नितिन बन गया था.

‘‘यह नितिन है, हमारे शहर के माने हुए कलाकार और भैया के जिगरी दोस्त. जब मैं ने भैया को आप की अर्चना को साथ रखने की जिद के बारे में लिखा तब उन्होंने नितिन की सहायता से यह सारा नाटक रचवाया,’’ शिखा ने सारी बात समझाते हुए कहा. ‘‘ओह,’’ रूपेश ने एक लंबी सांस ली और धम से सोफे पर बैठ गया. Drama Story in Hindi:

Online Friendship: फेसबुक, इंस्टा, व्हाट्सएप ने बदली दोस्ती की परिभाषा…

Online Friendship: जिंदगी में जैसे मां बाप, भाई बहन ,पति पत्नी, अन्य रिश्ते जरूरी होते हैं, वैसे ही इन सभी रिश्तों से बड़ा होता है एक ऐसा रिश्ता जो खून का रिश्ता तो नहीं होता लेकिन दिल से जुड़ा रिश्ता होता है, और वह रिश्ता होता है दोस्ती का रिश्ता.

एक ऐसा सच्चा दोस्त जिससे हम अपने दिल की सारी बातें कर सकते हैं , कोई दिखावा नहीं होता, दोस्तों के बीच कोई सेंसर नहीं होता, वह हमारी औकात देखकर हमें जज नहीं करता, जिससे हमारा दिल का रिश्ता होता है, सच्चे दोस्त वह होते हैं जो हर हाल में आपका साथ देते हैं, बारिश के मौसम में भीगे हुए चेहरे के पीछे आंखों में भरे आंसुओं को भी पहचान लेते है , जिससे मिलने के बाद और दिल की बातें करने के बाद आपका मन हल्का हो जाता है.

ऐसा सच्चा और प्यार करने वाला निस्वार्थ दोस्त हर इंसान की जिंदगी में एक जरूर होता है . जो मरते दम तक हमारे साथ रहता है, आसमान की बुलंदियों को छूने वाले सेलिब्रिटी हो या अमीर इंसान हो, या गरीबी में जीने वाले आम इंसान ही क्यों ना हो.

असल दोस्त का मतलब यह होता है जब वह आपसे मिले तो खुले दिल से मिले, जैसे की  उसके सामने हमारी छवि बिल्कुल आईने में देखने जैसी हो, जो पूरी तरह पारदर्शी हो, सच्चा दोस्त अगर गाली देकर बात करें , कड़वा बोले, तो भी बुरा नहीं लगता क्योंकि हमें पता होता है कि वह किसी भी हाल में हमारा बुरा नहीं चाहता. जिनके पास ऐसे दोस्त होते हैं जहां पर वह दिल खोलकर बात कर सके , सोच समझ कर बोलने की जरूरत ना पड़े, ऐसे लोगों को दिल का इलाज करने के लिए डॉक्टर और अस्पतालों और औजारों की जरूरत नहीं पड़ती. क्योंकि वह पहले ही दोस्त के सामने अपना सारा टेंशन और दिल की बाते  शेयर कर चुके होते हैं.

सलमान खान के पिता सलीम खान ने अपने एक इंटरव्यू में अच्छे इंसान की पहचान बताई थी . सलीम साहेब अनुसार अच्छा इंसान की पहचान ये होती है,की जिसका नौकर पुराना हो, और दोस्त पुराने हो . वह अच्छा इंसान होता है , कहने का मतलब यह है कि आज के स्वार्थी युग में जो लोग अपने से ज्यादा अपने दोस्तों की परवाह करते हैं ,बिना किसी शर्त के अपने दोस्त से प्यार करते हैं वह अच्छे इंसान की श्रेणी में गिने जाते हैं, लेकिन आज जैसे-जैसे इंसान तरक्की कर रहा है इंटरनेट और पैसों के पीछे भाग के  तरक्की और कामयाबी की राह में जितना आगे बढ़ रहा है, उतना ही वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से दूर होता जा रहा है.

हर इंसान को खुश होने के लिए दोस्तों की जरूरत होती है इसलिए वह इंटरनेट के जरिए हजारों में दोस्त बना रहा है जिनके बारे में वह खुद ठीक से जानता भी नहीं, सोशल मीडिया के जरिए बनने वाले दोस्त के बारे में हम उतना ही जानते हैं जितना कि वह फेसबुक इंस्टाग्राम व्हाट्सएप जैसे सोशल साइट पर हमें बताते हैं .

 फेस बुक, इंस्टाग्राम , व्हाट्सएप जैसे एप के जरिए दोस्तों की तादाद ज्यादा लेकिन उन दोस्तों की दोस्ती कम या नकली….

जब से फेसबुक इंस्टाग्राम जैसे पब्लिक रिलेटेड ऐप आए हैं , कई लोगों ने इसको ही अपने नए दोस्त बनाने का जरिया बना लिया है. इन एप्स के जरिए हम एक ऐसे इंसान को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं जिन्हें हम ठीक से जानते भी नहीं , ऐसे में जब वह इंसान हमारी फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर लेता है , तो उस इंसान की प्रोफाइल से जुड़े बाकी लोगों को भी हमारी सारी डिटेल मिलती है. ऐसे में उस इंसान की तरह ही कई अन्य लोग भी हमे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं, और हम बिना कुछ सोचे समझे खाली दोस्तों की संख्या बढ़ाने के चक्कर में फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करते जाते हैं, ऐसे में हमारे दोस्तों की संख्या तो बढ़ जाती है, लेकिन उन दोस्तों में से एक भी दोस्त ऐसा नहीं होता जिससे हम दिल की बात कर सके.

ऐसे ही एक फेसबुक के फ्रेंड लिस्ट में एक अमीर आदमी ने ऐसा दोस्त सेलेक्ट कर लिया जिस के बारे में उसे कुछ पता भी नहीं था, लिहाजा एक बार जब उसकी कार सिग्नल पर रुकी तो वहां पर फूल बेच रहे एक लड़के ने उस कार मलिक को बताया कि वह उसका फेसबुक पर फ्रेंड है , ये सुनते ही उस अनजान इंसान को फ्रेंड बनाने वाला  कार मलिक हक्का-बक्का रह गया.

कहने का मतलब यह है कि नेट के जरिए बनाए गए दोस्त या प्यार भरे रिश्ते की कोई गारंटी नहीं होती , वह असल दोस्त नहीं होते, दोस्त वह होते हैं जिनसे मिलने के बाद हम अपना टेंशन कुछ समय के लिए ही सही भूल जाते हैं , और मस्ती भरे मूड में आ जाते हैं. या फिर अगर हम किसी मुसीबत या परेशानी में है तो ऐसे अच्छे दोस्त हमे सहीं गाइड भी करते हैं.

 

फिल्म इंडस्ट्री में भी कई स्टार्स ऐसे हैं जिनके दोस्त सालों पुराने और मजेदार है…..

बॉलीवुड में कई ऐसे एक्टर हैं जो अपनी सच्ची दोस्ती के लिए पहचाने जाते हैं , अक्षय कुमार के कई ऐसे दोस्त हैं जिन में लड़कियां भी शामिल हैं , उनके बचपन के दोस्त हैं , जिनसे आज स्टार बनने के बाद भी अक्षय कुमार मिलते जुलते रहते हैं , और कपिल कॉमेडी शो जैसे मनोरंजन शो में अक्षय अपने सारे पुराने दोस्तों को लेकर जाते हैं, खुद कपिल के भी पुराने दोस्त उनके शो में काम कर रहे है ,जो पंजाब से ही उनके साथ है.

इसी तरह अजय देवगन और तब्बू की दोस्ती तो तब से है  जब से उनके अभिनय करियर की शुरुआत हुई थी, अमिताभ बच्चन और डैनी की दोस्ती, जितेंद्र ऋषि कपूर राकेश रोशन की दोस्ती, सलमान खान की कुमार गौरव, मोहनीश बहल, अनिल कपूर साजिद नाडियाडवाला और शाहरुख खान से गहरी दोस्ती, शाहरुख खान के कई दोस्त हैं जो दिल्ली में रहते हैं , फराह खान उनकी अच्छी दोस्त है, आलिया भट्ट अपनी बचपन की स्कूल फ्रेंड की शादी अटेंड करने खास गोवा गई थी, करीना कपूर और अमृता अरोड़ा की गहरी दोस्ती आज भी कायम है.

इन सारे नामचीन स्टारों ने जिनके लाखों फैन हैं लेकिन बावजूद इसके उनके करीबी दोस्त जिसके सामने वह दिल की बात कर सकते हैं, जिसके सामने कोई दिखावा नहीं करना पड़ता, यह अपने दोस्त को स्टार की तरह नहीं बल्कि एक नॉर्मल दोस्त की तरह पहचानते हैं, ऐसे दोस्तों की जरूरत सिर्फ फिल्मी स्टारों को ही नहीं बल्कि हर किसी को होती है,इसलिए फेसबुक और इंस्टा पर नए और अंजान दोस्त बनाने के बजाय ऐसे दोस्त बनाएं जिनसे आपके दिल और विचार मिले, और उनके साथ आप सब कुछ भूल कर खुश रहे. Online Friendship

Hindi Family Story: दुनिया- असमा की जिंदगी में किसने मचाई खलबली

Hindi Family Story: यह फ्लैट सिस्टम भी खूब होता है. कंपाउंड में सब्जी वाला आवाजें लगाता तो मैं पैसे डाल कर तीसरी मंजिल से टोकरी नीचे उतार देती, लेकिन मेरे लाख चीखनेचिल्लाने पर भी सब्जी वाला 2-4 टेढ़ीमेढ़ी दाग लगी सब्जियां व टमाटर चढ़ा ही देता. एक दिन मामूली सी गलती पर पोस्टमैन 1,800 रुपए का मनीऔर्डर ले कर मेरे सिर पर सवार हो गया और आज हौकर हमारा अखबार फ्लैट नंबर 111 में डाल गया.

मिसेज अनवर वही अखबार लौटाने आई थीं. मैं ने शुक्रिया कह कर उन से अखबार लिया और फौर्मैलिटी के तौर पर उन्हें अंदर आने के लिए कहा तो वे ?ाट से अंदर आ गईं और फैल कर बैठ गईं. कुछ देर इधरउधर की बातें कर के मैं उन के लिए कौफी लेने किचन की तरफ बढ़ी तो वे भी मेरे पीछे ही चली आईं और लाउंज में मौजूद चेयर संभाल ली. मैं ने वहीं उन्हें कौफी का कप थमाया और लंच की तैयारी में जुट गई.

वे बोलीं, ‘‘कुछ देर पहले मैं ने तुम्हारे फ्लैट से एक साहब को निकलते देखा था. उन्हें लाख आवाजें दी मगर उन्होंने सुनी नहीं, इसलिए मुझे खुद ही आना पड़ा.’’

‘‘चलिए अच्छी बात है, इसी बहाने आप से मुलाकात तो हो गई,’’ कह कर मैं मुसकरा दी. फिर गोश्त कुकर में चढ़ाया, फ्रिज से सब्जी निकाली और उन के सामने बैठ कर छीलने लगी.

‘‘सच कहती हूं, जब से तुम आई हो तब से ही तुम से मिलने को दिल करता था, मगर इस जोड़ों के दर्द ने कहीं आनेजाने के काबिल कहां छोड़ा है.’’

मैं खामोशी से लौकी के बीज निकालती रही.

तब उन्होंने पूछा, ‘‘तुम्हारे शौहर तो मुल्क से बाहर हैं न?’’

‘‘जी…?’’ मैं ने चौंक कर उन्हें देखा, ‘‘जिन साहब को आप ने सुबह देखा, वही तो…’’

‘‘हैं… वे तुम्हारे शौहर हैं?’’

मिसेज अनवर जैसे करंट खा कर उछलीं और मैं ने ऐसे सिर झुका लिया जैसे आफताब सय्यद मेरे शौहर नहीं, मेरा जुर्म हों. वैसे इस किस्म के जुमले मेरे लिए नए नहीं थे मगर

हर बार जैसे मुझे जमीन में धंसा देते थे. मैं ने लाख बार उन्हें टोका है कि कम से कम बाल ही डाई कर लिया करें, मगर बनावट उन्हें पसंद ही नहीं है.

मिसेज अनवर ने यों तकलीफ भरी सांस ली जैसे मेरी सगी हों. फिर बोलीं, ‘‘कितनी प्यारी दिखती हो तुम, तुम्हारे घर वालों को तुम्हें जहन्नुम में धकेलते वक्त जरा भी खयाल नहीं आया?’’

फिर वे लगातार व्यंग्य भरे वाक्य मु?ा पर बरसाती रहीं और कौफी पीती रहीं.

मेरी अम्मी को सारी जिंदगी ऐसे ही लोगों की जलीकटी बातें सताती रहीं. अब्बा बैंकर थे और बहुत जल्दी दुनिया छोड़ गए थे. अम्मी पढ़ीलिखी थीं, इसलिए अब्बा की बैंकरी उन के हिस्से में आ गई. अम्मी की आधी जिंदगी 2-2 पैसे जमा करते गुजरी. उन्होंने अपने लहू से अपने पौधों की परवरिश की, मगर जब फल खाने का वक्त आया तो…

बड़ी आपा शक्ल की प्यारी मगर मिजाज की ऊंची निकलीं. उन के लिए रिश्ते तो आते रहे मगर उन की उड़ान बहुत ऊंची थी. मास्टर डिगरी लेने के बाद उन्हें लैक्चररशिप मिल गई तो उन की गरदन में कुछ ज्यादा ही अकड़ आ गई और अम्मी के खाते में बेटी की कमाई खाने का इलजाम आ पड़ा.

बेटी की शादी कब कर रही हैं आप? अब कर ही डालिए. इतनी देर भी सही नहीं. लोग ऐसे कहते जैसे अम्मी के कान और आंखें तो बंद हैं. वे मशवरे के इंतजार में बैठी हैं. अम्मी बेटी की बात मुंह पर कैसे लातीं. किसकिस को बड़ी आपा के मिजाज के बारे में बतातीं. अम्मी पाईपाई पर जान देती थीं और सारा जमाजोड़ बेटियों के लिए बैंक में रखवा देती थीं.

आपा हर रिश्ते पर नाक चढ़ा कर कह देतीं, ‘‘असमा या हुमा की कर दीजिए न, आखिर उन्हें भी तो आप को ब्याहना ही है.’’ और इस से पहले कि असमा या हुमा के लिए कुछ होता बड़े भैया उछलने लगे, ‘मेरी शादी होगी तो जारा सरदरी से ही.’ अम्मी भौचक्की रह गईं. अभी तो पेड़ का पहला फल भी न खाया था. अभी दिन ही कितने हुए थे बड़े भाई को नौकरी करते हुए. जारा सरदारी भैया की कुलीग थी. अम्मी ने ताड़ लिया कि बेटा बगावत के लिए आमादा है. ऐसे में हथियार डाल देने के अलावा कोई चारा न था. फिर वही हुआ जो भाई ने चाहा था.

जारा सरदरी को अपनी कमाई पर बड़ घमंड और शौहर पर पूरा कंट्रोल था. ससुराल वालों से उस का कोई मतलब न था. बहुत जल्दी उस ने अपने लिए अलग घर बनवा लिया.

अम्मी को बड़ी आपा की तरफ से बड़ी मायूसी हो रही थी लेकिन हुमा के लिए एक ऐसा रिश्ता आ गया, जो अम्मी को भला लगा. आखिरकार बड़ी आपा के नाम की सारी जमापूंजी खर्च कर उन्होंने उसे ब्याह दिया. हुमा का भरापूरा ससुराल था. ससुराल के लोगों के मिजाज अनूठे थे. इस पर शौहर निखट्टू.

उस की सारी उम्मीदें ससुराल वालों से थीं कि वे उसे घरजमाई रख लें, कारोबार करवा दें या घर दिलवा दें. यह कलई बाद में खुली.  झूठ पर झूठ बोल कर अम्मी को दोनों हाथों से लूटा गया मगर ससुराल वालों की हवस पूरी न हुई.

हुमा बहुत जल्दी घर लौट आई. उस का सारा दहेज ननदों के काम आया. फिर बहुत मुश्किल से तलाक मिलने पर उसे छुटकारा मिला. लेकिन इस पर खानदान के कई लोगों ने अम्मी को यों लताड़ा जैसे अम्मी को पहले से सब कुछ पता था.

हुमा का उजड़ना उन्हें मरीज बना गया. वे आहिस्ताआहिस्ता घुल रही थीं. एक रोज वे बिस्तर से जा लगीं, मगर सांसें जैसे हम दोनों बहनों में अटकी थीं.

कभीकभी बड़े भैया बीवीबच्चे समेत घर आते तो अम्मी की परेशानियां जबान पर आ जातीं. लेकिन वे हर बात उड़ा जाते. अम्मी, हो जाएगा सब कुछ. आप फिक्र न किया करें.

परेशानियों के इसी दौर में छोटे भैया से मायूस हो कर अम्मी ने उन्हें ब्याहा. छोटे भैया अपने पैरों पर खड़े थे, लेकिन घर की जिम्मेदारियों से दूर भागते थे. घर की गाड़ी अम्मी के बचाए पैसों पर ही चल रही थी. लेकिन घर चलाने के लिए एक जिम्मेदार औरत का होना जरूरी होता है, यह सोच कर ही अम्मी ने छोटे भैया को ब्याह दिया था.

लेकिन अम्मी एक बार फिर मात खा गईं. छोटी भाभी बहुत होशियार और सम?ादार साबित हुईं, मगर मायके के लिए. उन के दिलोदिमाग पर मायके का कब्जा था. कोई न कोई बहाना बना कर मायके की तरफ दौड़ लगाना और कई दिन डेरा डाल कर वहां पड़ी रहना उन की फितरत थी. ससुराल में वे कभीकभी ही नजर आतीं. अचानक छोटे भैया को दुबई में नौकरी का चांस मिल गया और भाभी का पड़ाव हमेशा के लिए मायके में बन गया.

इस दौरान एक खुशी की बात यह हुई कि बड़ी आपा के लिए एक भला रिश्ता मिल गया. संजीदा, सोबर और जिम्मेदार एहसान अलवी. खूब पढ़ेलिखे थे और एक अरसे से अमेरिका में रहते थे. आपा जितनी उम्र की थीं, उस से कम की ही नजर आती थीं और एहसान अलवी अपनी उम्र से 2-4 साल ज्यादा के दिखते थे.

अम्मी को फिर इनकार का अंदेशा था. उन्होंने आपा को सम?ाया, ‘‘ऐसा रिश्ता फिर मिलने वाला नहीं. समझे कि गोल्डन चांस है. पानी पल्लू के नीचे से गुजर जाए तो लौट कर नहीं आता.’’

पता नहीं क्या हुआ कि यह बात आपा की अक्ल में समा गई. फिर चट मंगनी, पट ब्याह. आपा अमेरिका चली गईं.

शादी के नाम पर हुमा रोने बैठ जाती और एक ही रट लगाती, ‘मुझे नहीं करनी शादीवादी.’

मैं आईने के सामने खड़ी होती तो आठआठ आंसू रोती. हमारे खानदान के हर घर में रिश्ता मौजूद था, मगर लड़के 4 अक्षर पढ़ कर किसी काबिल हो जाते हैं, तो खानदान की फीकी सीधी लड़कियों पर हाथ नहीं रखते हैं. ऐसे में सारी रिश्तेदारी धरी की धरी रह जाती है. फिर अब उन्हें बदला भी लेना था. अम्मी ने भी तो खानदान की किसी लड़की पर हाथ नहीं रखा था. उन के दोनों बेटों की बीवियां तो पराए खानदान की थीं. इस धक्कमपेल में मेरी उम्र 30 पार कर गई.

फिर अचानक बड़ी आपा की ससुराल के किसी फंक्शन में आफताब सय्यद के रिश्तेदारों ने मुझे पसंद किया. आफताब की सारी फैमिली कनाडा में रहती थी और उन के सभी भाईबहन शादीशुदा थे. आफताब की पहली शादी नाकाम हो चुकी थी. बीवी ने नया घर बसा लिया था. उन के 2 बच्चे थे, जो आफताब के पास ही थे. अम्मी को मेरी नेक सीरत पर भरोसा था और मुझे भी कहीं न कहीं तो समझौता करना ही था. पानी पल्लू के नीचे से गुजर जाए तो लौट कर नहीं आता, यह बात मैं ने गिरह में बांध ली थी.

आफताब बहुत खयाल रखने वाले शौहर साबित हुए. हमारी उम्र में फर्क बहुत ज्यादा न था मगर दुनिया तो यही समझती थी कि वे मुझ से बहुत बड़े हैं और बच्चों समेत सारी गृहस्थी मेरी मुट्ठी में है. इस एहसास की ?झोल में कोई न कोई कंकड़ डाल कर हलचल मचा ही देता था. तब मुझे लगता था कि इंसान अपनी जिंदगी से समझौता कर भी ले तो दुनिया उसे कहां छोड़ती है? Hindi Family Story

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