हल्के में न लें मुंह की जलन, जानें एक्सपर्ट से इसका उपचार

Burning mouth syndrome : मुंह में जलन सिर्फ अत्यधिक मसालेदार खाना खाने की वजह से ही नहीं होती वरन इस के अन्य कारण भी होते हैं.

आइए, जानें मुंह की जलन के कारण और निवारण के बारे में:

दांतों की सफाई: दांतों की स्वच्छता पर ध्यान न देने से मुंह में जलन, सूखापन, मौखिक अल्सर जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. मौखिक स्वच्छता के लिए नियमित ब्रशिंग जरूरी है.

पोषण की कमी: शरीर में विटामिन, लौह तथा खनिज की कमी भी इस समस्या का कारण हो सकती है. अत: ऐसा भोजन लें जिस में ये सारी चीजें पर्याप्त मात्रा में हों.

बीमारी: मधुमेह और थाइराइड से पीडि़त लोगों में भी यह परेशानी होती है.

अतिसंवेदनशीलता: ऐलर्जी से ग्रस्त लोगों को भी किसी खाद्य पदार्थ से इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है.

हारमोनल असंतुलन: हारमोनल समस्या से ग्रस्त व्यक्तियों में भी इस के लक्षण दिखाई देते हैं. हारमोनल असंतुलन रजोनिवृत्त महिलाओं में दिखाई देती है. इसलिए उन में मुंह में जलन की समस्या मुंह में लार की कमी की वजह से होती है.

दवाओं का सेवन और इलाज: रेडिएशन और कीमो थेरैपी जैसे उपचार कराने वालों को इस समस्या का सामना करना पड़ता है. इसलिए कोई भी दवा लेने के पहले इस विषय पर डाक्टर से जरूर परामर्श करें.

नशे की आदत: धूम्रपान व नशा भी मुंह जलाने के लिए कारण बनते हैं. खासतौर पर शराब पीने वाले लोगों में यह समस्या आम होती है. ऐसे लोगों को मुंह की जलन के साथसाथ पेट और सीने में जलन की शिकायत भी रहती है.

मुंह की जलन का उपचार

मुंह की जलन को हलके में न ले कर तुरंत डाक्टर से पदामर्श लें और इन बातों पर तुरंत गौर फरमाएं:

– धूम्रपान बंद कर दें.

– अम्लीय पेय और शराब का सेवन न करें.

– अपने आहार में पौष्टिक तत्त्वों जैसे दालें, फाइबरयुक्त खाना, मौसमी फल इत्यादि शामिल करें.

– तरल पदार्थ का सेवन ज्यादा से ज्यादा करें. यह ध्यान रखें कि तरल पदार्थ जरूरत से ज्यादा ठंडा न हो.

– सही ब्रशिंग तकनीक जानें.

– स्वाद मुक्त हलके टूथपेस्ट से दांतों की सफाई करें.

– अपने डैंचर फिक्स रखें.

– मसालेदार व ज्यादा गरम खाद्यपदार्थों के सेवन से बचें.

– खासतौर पर रात में बिना मसाले वाल खाना लें.

जिंदगी भर स्वादिष्ठ और पौष्टिक खाने का आनंद उठाना है तो मुंह की सेहत से जुड़ी इन बातों को आज से ही अपनाएं.

डा. शांतनु जरादी

डैंटज डैंटल केयर के चिकित्सक

रील लाइफ से अलग रियल लाइफ में प्यार करना आसान नहीं : ऐक्ट्रैस आशी सिंह

Ashi Singh : खूबसूरत, हंसमुख और सौम्य स्वभाव की 27 वर्षीय अभिनेत्री आशी सिंह उत्तर प्रदेश के आगरा से हैं. धारावाहिक ‘ये उन दिनों की बात है’ उन की चर्चित शो रही, जिस से वे घरघर पहचानी गईं और उन्हें कई सीरियल्स में काम करने का मौका मिला. इस कामयाबी को हासिल करने में उन्होंने लंबा सफर तय किया है, जिस में उन्होंने फिल्मों और धारावाहिकों में छोटेछोटे किरदार निभाए. इस दौरान उन्होंने कभी अपना धैर्य और मेहनत कम नहीं किया, क्योंकि इंडस्ट्री में उन का कोई गौडफादर फादर नहीं है, जो उन के लिए कहानियां लिखे.

17 साल की उम्र में आशी आगरा से निकल कर मुंबई पढ़ने आई थीं। 12वीं की परीक्षा देने के बाद उन्होंने ऐक्टिंग कालेज में दाखिला लिया, क्योंकि उन्हे ऐक्टिंग में कुछ करना था. उन्होंने 2 साल से अधिक समय तक औडिशन दिया और इस बीच कई एपिसोड का हिस्सा रहीं. पहली धारावाहिक में कामयाबी मिलने के बाद आशी को पीछे मुड़ कर देखना नहीं पड़ा. इस के बाद उन्होंने कई धारावाहिक ‘अलादीन : नाम तो सुना होगा’, मीत : बदलेगी दुनिया की रीत’, ‘सीक्रेट डायरीज : द हिडन चैप्टर’ आदि कई शोज में काम किया है.

अभी  आशी सिंह सोनी सब टीवी पर ‘उफ ये लव है मुश्किल’ में एक मौडर्न गर्ल एडवोकेट कैरी शर्मा की निभा रही हैं, जिसे ले कर वे बहुत उत्साहित हैं. उन्होंने खास गृहशोभा के लिए बात की. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के कुछ अंश :

इस शो में काम करने की खास वजह के बारे में पूछने पर आशी कहती हैं कि मैं तकरीबन 1 साल के बाद इस शो को कर रही हूं, क्योंकि इस बीच मैं ने जो भी कौंसैप्ट सुने थे, कोई भी मुझे रुचिकर नहीं लगा, लेकिन जब मैं ने इस की कहानी सुनी, तो काफी अच्छा लगा. इस में मेरा चरित्र भी अब तक की सारी भूमिकाओं से अलग है. शो का वाइब बहुत अलग है. इस भूमिका से मैं खुद को थोड़ा रिलेट कर पाती हूं, क्योंकि कैरी बहुत पौजिटिव है. मैं भी रियल लाइफ में बहुत सकारात्मक सोच रखती हूं. कभी निराश नहीं होती, हमेशा धीरज धरती हूं.

वे कहती हैं कि आज तक मैं ने ऐसी भूमिका नहीं निभाई है और मेरे लिए यह एक अच्छी औपरचुनिटी है.

प्यार करना वाकई मुश्किल

प्यार के बारे में आशी का कहना है कि चरित्र की लाइफ में प्यार करना मुश्किल नहीं, लेकिन रियल लाइफ में प्यार करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि मेरे लाइफ में प्रायोरिटी काम की है, प्यार की नहीं. लव मेरे जीवन में बहुत बाद में आता है, उस से पहले मुझे मेरे कैरियर से बहुत प्यार है। मुझे अपने परिवार और दोस्तों से बेइंतिहा मोहब्बत है. प्यार की बात मुझे बहुत कठिन लगती है, क्योंकि जीवन में अभी बहुत कुछ करना है. मैं ने अपने आसपास देखा है कि लोग रिलेशन और रिलेशनशिप से बहुत दुखी रहते है, क्योंकि वे एकदूसरे से बहुत आशाएं रखते हैं, जिस से उन की लाइफ बहुत खराब हो चुकी है। बहुत कम लोग हैं, जो अपने प्यार और रिश्ते में खुश हैं.

मिली प्रेरणा

आशी कहती हैं कि जब से होश संभाला है मुझे हीरोइन ही बनना था, जबकि मेरे परिवार में कोई भी इस फील्ड से नहीं है, लेकिन मेरे पेरैंट्स हमेशा हर क्षेत्र में ट्राई करने की सलाह मुझे देते थे, जिस से मुझे कौन्फिडेंस मिलता रहा. मैं ने कभी सोचा नहीं था कि मैं ऐसा कर पाऊंगी।

वे कहती हैं कि जब मैं आगरा से मुंबई आई थी, तो मैं 9वीं कक्षा में थी, मेरी पढ़ाई चल रही थी, 11वीं में पढ़ते वक्त मैं ने सोचा था कि मैं सीए बनूंगी और कौमर्स ले कर पढ़ाई करूंगी, लेकिन पेरैंट्स ने एक दिन कहा कि अगर तुम्हें ऐक्टिंग करनी है, तो इस का प्रशिक्षण यहां ले सकती हो। मैं ने हां कर दी और ऐडमिशन ले लिया. इस से मेरे अंदर अभिनय करने की इच्छा को बल मिला और मैं ने पहले मौडलिंग फिर अभिनय शुरू कर दिया। कई सारे औडिशन देने पड़े और धीरेधीरे काम मिलना शुरू हो गया.

चुनौतियां कम नहीं

आशी कहती हैं कि नए शहर में आ कर खुद को स्टैब्लिश करना आसान नहीं था और अभी भी नहीं है. बहुत मेहनत करनी पङती है. एक पड़ाव पार करने पर दूसरा सामने खड़ा हो जाता है. आज भी चुनौतियां हैं, लेकिन मुझे उसे हैंडल करना आ गया है. मैं नकारात्मक चीजों पर अधिक ध्यान नहीं देती, सकारात्मक सोच रखती हूं और जो भी मेरे साथ पौजिटिव बातें हुई हैं, उस पर ही खुद को केंद्रित करती हूं.

परिवार का सहयोग

आशी को परिवार का सहयोग हमेशा मिला है. वे कहती हैं कि परिवार ने आगे बढ़ कर मुझे सपोर्ट किया है. जब मैं पूरे दिन औडिशन देती थी, मां मुझे टिफिन बना कर देती थीं, लेकिन मैं उन्हें कभी साथ ले कर नहीं घूमी, क्योंकि मुझे पता था कि कहां क्या करना है. मैं ने थोड़ी उम्र के बाद अपनी फाइनेंशियल स्थिति को खुद संभाला. इस का श्रेय भी परिवार को ही जाता है, क्योंकि उन्होंने हमेशा मुझे सबकुछ खुद करने की आजादी दी है.

रिश्ते हैं जरूरी

आशी की नजर में रिश्ते बहुत जरूरी होते हैं, क्योंकि वे अकेले रहना पसंद नहीं करतीं. वे कहती हैं कि कई बार मुझे अकेले रहने को मन करता है, लेकिन 2 दिन बाद ही घरपरिवार और दोस्तों की याद आती रहती है. मुझे पता है कि ये सभी लोग आप के काम और आप की समस्या को अच्छी तरह से समझते हैं, अगर वे आप के किसी समस्या का समाधान भले ही न कर पाएं, पर उन का साथ रहना ही मेरे लिए बड़ी बात होती है, मन शांत हो जाता है. रिश्ते के बिना मेरा जीवन ही अधूरा है.

जौब कंपीटिशन हर जगह

आजकल ऐक्टिंग कैरियर में बहुत कंपीटिशन है। कई धारावाहिक अचानक बंद भी हो जाते हैं। क्या आप कोई प्रेशर महसूस करती हैं? इस के जवाब में आशी कहती हैं कि आज हर जौब के लिए कंपीटिशन है। एक जौब के लिए लाखों की संख्या में यूथ अप्लाइ करते हैं, मैं इस पर अधिक ध्यान नहीं देती। मैं मेहनत और कर्म पर विश्वास करती हूं. मैं जहां से आई हूं वहां से कोई भी नहीं आया है और जहां से कोई आया है, मैं वहां से नहीं हूं. इसलिए कोई प्रतियोगिता मेरे लिए नहीं है.

शो का बंद होना ठीक नहीं

धारावाहिकों का अचानक बंद हो जाने को ले कर वे कहती हैं कि कब कौन सी सीरियल बंद हो जाए, कोई कह नहीं सकता, फिर चाहे फिल्म्स हो या टीवी सीरीज सब के साथ अनिश्चितता है. कई बार दर्शकों की पसंद को फिल्ममेकर और टीवी सीरियल्स बनाने वालों को भी पता नहीं होता और दर्शक न मिलने से शो बंद करना पड़ता है. उन्हें भी किसी धारावाहिक को बंद करना अच्छा नहीं लगता, क्योंकि बहुत सारे लोग इस से जुड़े हुए होते हैं, बहुतों की रोजीरोटी चलती है और इसे बनाने में भी काफी समय जाता है.

सुपर पावर मिलने पर

सुपर पावर मिलने पर आशी ग्लोबल वार्मिंग को कम करना चाहती हैं, जिस की वजह से जलवायु में काफी परिवर्तन आ चुका है। कहीं अधिक बारिश तो कहीं सूखा पड़ने लगा है, जिस से काफी लोग परेशान हैं.

Skin Care Tips : पिंपल से पाना हो छुटकारा तो घर पर बनाएं क्‍लींजर

Skin Care Tips : आज कल टीनएजर्स में मुंहासों की बहुत बड़ी समस्‍या देखने को मिल रही है. इसकी वजह से त्‍वचा काफी संवेदनशील हो जाती है जिस वजह से चेहरे पर हर प्रकार की क्रीम सूट भी नहीं करती.

आपने क्‍लीजिंग, टोनिंग और मौस्चराइजिंग का नाम तो सुना ही होगा,‍ जो एक ब्‍यूटी प्रोडक्‍ट हैं. पर अगर हम आपको यही सब घर पर बनाने की विधि बता दें तो आपको बाजार में पैसे खर्च करने और अपनी त्‍वचा को नुकसान पहुंचाने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी.

चलिए हम आपको बताते हैं कि आप घर पर खुद के लिए क्‍लींजर कैसे बना सकती हैं

1. मुंहासों से मुक्ति पाने के लिए अन्‍नानास एक सबसे अच्‍छा क्‍लींजर है. आप चाहें तो इसका रस या फिर इसके गूदे को अपने चेहरे पर 3-5 मिनट तक रगड़ सकती हैं. इसको स्‍क्रब के तौर पर यूज करना हो तो इसमें बेकिंग सोडा मिला कर 4-5 मिनट तक रगड़ कर चेहरे को ठंडे पानी से धो लें. इसको लगाने से पहले इसका अपनी त्‍वचा पर एक टेस्‍ट जरुर कर लें.

2. शहद एक आम किस्म का क्‍लींजर है जो रोम छिद्र को खोलता है. अपने चेहरे पर दूध और शहद मिला कर लगाएं इससे फायदा होगा. पिंपल हटाने के लिए आप चेहरे पर शहद और नींबू मिला कर लगा सकती हैं.

3. दही और स्‍ट्राबेरी का पेस्‍ट बनाएं और उसे चे‍हरे पर 15 मिनट तक रहने दें. सबसे पहले इसको दूध से धोएं और उसके बाद पानी से. इसको लगाने से त्‍वचा के रोम छिद्र खुल जाते हैं और पिंपल होने के कम चांस होते हैं.

4. बेकिंग सोड़ा एक प्राकृतिक फेस स्‍क्रब होता है. आप इसको पानी के साथ मिला कर अपने मुंह और गर्दन में लगाएं जिससे कि मुंहासों से मुक्‍ती मिल सके. इस स्‍क्रब को 2 मिनट तक चेहरे पर रगड़े और मुंह धुल कर कोई क्रीम लगा लें जिससे त्‍वचा ड्राय न पड़े.

5. पिंपल जाने के बाद अगर मुंह पर दाग रह जाते हैं तो ओटमील को दूध के साथ मिला कर लगाएं. इससे मुंहासों से पैदा होने वाली जलन भी गायब हो जाती है और राहत मिलती है.

6. नींबू और सेंधा नमक एक सबसे बेहतर घरेलू क्‍लींजर है. थोड़े से सेंधा नमक को नींबू के टुकड़े पर लगाइये या फिर नींबू के रस में मिलाइये और चेहरे पर 5-8 मिनट तक रहने दीजिए. उसके बाद चेहरे को गरम पानी सेधो लीजिए.

Besan Barfi Recipe : घर पर बनाएं बेसन की बर्फी, फौलो करें ये स्टेप्स

Besan Barfi Recipe :  अक्सर आपने घर में बेसन का हलवा तो जरूर खाया होगा, लेकिन क्या आपने कभी बेसन की बर्फी ट्राय की है. बेसन की बर्फी बनाना आसान है आप इसे चाहें तो कभी भी डिनर में डेजर्ट के रूप में भी अपनी फैमिली या फ्रैंड्स को खिला सकते हैं.

हमें चाहिए

बेसन – 250 ग्राम,

शक्कर – 250 ग्राम,

देशी घी – 200 ग्राम,

दूध – 02 बड़े चम्मच,

काजू – 02 बड़े चम्मच (बारीक कतरे हुए),

बादाम – 02 बड़े चम्मच (बारीक कतरे हुए),

पिस्ता – 01 बड़ा चम्मच (लम्बे कटे हुए),

छोटी इलाइची – 05 नग (छीलकर पीसी हुई)

बनाने का तरीका

– सबसे पहले एक बर्तन में बेसन लेकर उसमें दूध और दो बड़े चम्मच घी डालें और सभी चीजों को अच्छी तरह से मिला लें.

– अब कढ़ाई में देशी घी डालकर गरम करें. घी गर्म होने पर उसमें बेसन डालें और लगातार चलाते हुए अच्छी तरह से भून लें.

– बेसन को एक प्लेट में निकाल कर रख दें. उसके बाद बर्तन में शक्कर और 1/2 कप पानी डालें और चलाते हुए पकाएं. जब शीरे में दो तार की चाशनी बनने लगे, तो उसमें बेसन डाल दें और चलाते हुए पकाएं.

– साथ ही इसमें इलाइची पाउडर, बादाम और काजू भी डाल दें. जब बेसन का मिश्रण जमने वाली स्थिति में पहुंच जाए उसे गैस से उतार लें.

– अब बेसन की चक्की जमाने की बारी है. इसके लिए एक समतल थाली में थोड़ा घी डालकर उसकी सतह चिकनी कर लें. इसके बाद बेसन का मिश्रण थाली में कलछी की सहायता से बराबर फैला दें.

– बर्फी के ऊपर कतरे हुए पिस्ता डाल दें और चम्मच की सहायता से बर्फी की सतह को बराबर कर दें औद 2 घंटे के लिए रख दें. और ठंडा-ठंडा डेजर्ट में अपनी फैमिली को परोसें.

Weight Gain Tips : वजन बढ़ाने का तरीका बताएं…

Weight Gain Tips : अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक पढ़ें

सवाल-

मैं 23 वर्षीय युवती हूं. मेरा वजन 31 किलोग्राम है. मैं बचपन से ही बहुत दुबलीपतली हूं. मेरा विवाह हो चुका है और 2 साल की एक बेटी भी है. मैं सारे टेस्ट भी करवा चुकी हूं. सब कुछ नौर्मल है. मैं कुछ भी पहनती हूं तो वह मुझ पर जंचता नहीं है. मेरे दोस्त, रिश्तेदार मेरा मजाक उड़ाते हैं. कृपया बताएं कि मैं ऐसा क्या करूं जिस से मेरा वजन बढ़ जाए और मैं आकर्षक दिखूं?

जवाब-

दुबलापतला होना कई कारणों पर निर्भर करता है. जैसे आनुवंशिकता, व्यक्ति विशेष का मैटाबोलिज्म, उस का खानपान व बौडी स्ट्रक्चर आदि. आप आकर्षक दिखने व चेहरे पर रौनक लाने के लिए ऐक्सरसाइज करें. चेहरे को गुब्बारे की तरह फुलाएं व बंद करें. ऐसा 15-20 बार करें. इस से चेहरे पर रौनक आएगी व गाल भरेभरे लगेंगे. जहां तक वजन बढ़ाने की बात है तो भोजन में दूध, दही, पनीर जैसे डेयरी प्रोडक्ट्स अधिक मात्रा में शामिल करें. कार्बोहाइड्रेट्स अधिक लें. केले का सेवन करें. दिन में 5-6 बार थोड़ेथोड़े अंतराल पर खाएं. ऐसा करने से वजन बढ़ाने में मदद मिलेगी. नियमित ऐक्सरसाइज करें. इस से भूख बढ़ेगी और फिर खाना खाने से वजन बढ़ेगा.

सवाल

मैं 16 वर्षीय युवती हूं. मैं अपने बड़े स्तनों को ले कर परेशान हूं. उन की वजह से मुझे बड़े साइज के कपड़े खरीदने पड़ते हैं. इस से सही फिटिंग नहीं आ पाती. कृपया स्तनों को छोटा करने का कोई तरीका बताएं?

जवाब

स्तनों का छोटा या बड़ा होना आनुवंशिकता पर निर्भर करता है. साथ ही अगर वजन अधिक हो तो भी स्तनों का साइज बड़ा होता है. उन के साइज को कम करने का एक तरीका प्लास्टिक सर्जरी है और एक ऐक्सरसाइज. कई बार हारमोनल असंतुलन भी ब्रैस्ट साइज के घटने या बढ़ने का कारण होता है. जहां छोटी ब्रैस्ट की वजह ऐस्ट्रोजन की कमी व टैस्टोस्टेरौन की अधिकता होती है, वहीं बड़ी ब्रैस्ट में स्थिति इस के विपरीत होती है. हारमोनल बैलेंस के लिए आप किसी गाइनोकोलौजिस्ट से संपर्क कर सकती हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Best Online Story : लमहों को आजाद रहने दो

Best Online Story :  भूमिका आज बेहद खुश नजर आ रही थी. अभीअभी तो उस ने फेसबुक पर अपनी डीपी अपलोड करी थी और 1 घंटे में ही सौ लाइक आ गए थे. गुनगुनाते हुए खुद को आईने के सामने निहारते हुए भूमिका मन ही मन सोच रही थी. पहले मैं कितनी गंवार लगती थी. न कोई फैशन सैंस थी और ना ही मेकअप की तमीज और अब देखो 50 वर्ष की उम्र में भी कितने पुरुष और लड़के उस के ऊपर मोहित हो रहे हैं. काश, कुछ वर्ष पहले यह सोशल मीडिया आ जाता तो उस की जिंदगी कुछ और ही होती.

तभी रोहित डकार मारता हुआ भूमिका के सामने आ गया. भूमिका बेजारी से रोहित को देखने लगी कि क्या रोहित ही मिला था उस के मातापिता को इस दुनिया में उस के लिए… रोहित का बढ़ता वजन, झड़ते बाल, बेतरतीबी से पहने कपड़े, जोरजोर से डकार लेना सभी कुछ तो उसे रोहित से और दूर कर देता था.

रोहित भूमिका को देखते हुए बोला, ‘‘आज खाना नहीं मिलेगा क्या?’’

भूमिका फेसबुक पर नजर गड़ाते हुए बोली, ‘‘अभी बनाती हूं.’’

खाना बनातेबनाते भूमिका बारबार आज शाम के फंक्शन में कैसे रील बनाएगी सोच रही थी. बालों को खुला छोड़े या कोई हेयर स्टाइल बनाए.

ये सब सोचतेसोचते उस की तंद्रा तब टूटी जब कुकर से जलने की महक आने लगी. जल्दीजल्दी कुकर की सीटी निकाली और जल्दी खाना खा कर पार्लर की भाग गई.

जब मेकअप खत्म हुआ तो भूमिका ने एक नजर आईने पर डाली और मन ही मन इतराते हुए सोचने लगी कि आज तो मेरे फौलोअर्स की खैर नहीं. शाम के फंक्शन में भूमिका ने जम कर रील बनाई. भूमिका के भाईभाभी, रोहित और उस की बेटी आर्या सभी भूमिका के इस व्यवहार से आहत थे.

आज भूमिका के भाई के बेटे का जन्मदिन था. भूमिका की भाभी को लगा कि भूमिका के आने से उस की कुछ मदद हो जाएगी मगर भूमिका तो अपने में ही व्यस्त थी. बारबार रील बनाते हुए टेक और रीटेक करते हुए भूमिका ने अपना सारा समय बिता दिया. जन्मदिन में कौनकौन मेहमान आए, कब केक कटा उसे कुछ भी नहीं पता. वह तो बस अपनी ही दुनिया में खोई हुई थी. घर पहुंच कर भी भूमिका अपनी रील की एडिटिंग में ही व्यस्त रही. आर्या ने ही उलटासीधा खाना बना लिया था. आर्या को किचन में काम करता देख कर रोहित को गुस्सा आ गया. भूमिका के हाथ से मोबाइल छीनते हुए रोहित बोला, ‘‘आर्या को इस साल 12वीं कक्षा के ऐग्जाम के साथसाथ ऐंट्रैंस ऐग्जाम भी देने हैं और वह तुम्हारे हिस्से का काम कर रही है.

भूमिका तुनकते हुए बोली, ‘‘मैं रातदिन किचन में लगी रहती हूं तो कभी दर्द नहीं हुआ. आज बेटी ने एक टाइम का खाना क्या बना लिया कि पूरा घर सिर पर उठा दिया.’’

रोहित के हाथ से अपना मोबाइल छीनते हुए भूमिका ने अपनेआप कमरे में बंद कर लिया. भूमिका अपनी रील के व्यूज को देखने में व्यस्त थी. बस 250 व्यूज ही आए थे. मन ही मन मनन कर रही थी कि क्या करे कि व्यूज बढ़ जाएं.

तभी भूमिका ने सोचा क्यों न डांस करते हुए अपनी एक रील बनाए. सोशल मीडिया पर वैलिडेशन की भूमिका का सिर पर इतना भूत सवार था कि उस ने बिना कुछ सोचेसमझे एक रील बना ली और फेसबूक पर अपलोड कर दी. भूमिका उस रील में बेहद भद्दी लग रही थी. साफ नजर आ रहा था कि उस ने किसी और के शौर्ट्स और टीशर्ट पहन रखे थे. खटाखट लाइक्स आ रहे थे और साथ ही साथ भूमिका की खुशी भी बढ़ती जा रही थी.

कितने सारे पुरुषों के मैसेंजर पर मैसेज आए हुए थे. हरकोई उस से दोस्ती करने को आतुर था. और तो और कुछ लड़के तो भूमिका से 10 से 15 साल छोटे थे मगर सब को वो हौट लग रही थी. तभी भूमिका के घर से उस की मम्मी का फोन आया, ‘‘लाली यह क्या कर रही है तू सारे लोग महल्ले में तेरा मजाक उड़ा रहे हैं.’’

‘‘ऐसे कैसा वीडियो बन कर तूने डाल दिया है. कम से कम देख तो लेती कि तू उस में कैसी लग रही है.’’

भूमिका ने कहा, ‘‘लगता है भैयाभाभी ने तुम्हारे कान भरे हैं. मम्मी मैं कभी भी तुम्हारी फैवरिट नहीं थी. तुम्हें तो हमेशा दीदी और भाभी की सुंदरता के आगे मैं फीकी ही लगी. इतनी फीकी कि तुम ने रोहित जैसे नीरस आदमी के साथ मुझे बांध दिया.

‘‘आज अगर लोग मुझे पहचान रहे हैं, मेरे काम की तारीफ कर रहे हैं तो तुम्हारी बहू को आग लग गई क्योंकि वह अपने बढ़ते वजन के कारण ये सब नहीं कर सकती है जो मैं अब कर पा रही हूं.’’

भूमिका की मम्मी ने फोन रखने से पहले बस यह कहा, ‘‘लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए क्याक्या करेगी तू,’’ और खटाक से फोन रख दिया.

घर के काम निबटाने के बाद भूमिका अपनी रील पर आए कमैंट्स को पढ़ने लगी कमैंट्स पढ़ कर उस का मन करा कि वह जल्द ही एक और डांस करते हुए रील बना ले. अगले दिन सब के जाते ही भूमिका ने फिर से डांस करते हुए रील बनाने की तैयारी करीए. मगर हर बार उसे संतुष्टि नहीं मिल रही थी. जब तीसरी बार भूमिका घूमघूम कर नाचने लगी उस का पैर फिसल गया और उस का सिर पास ही रखी शीशे की मेज से टकरा गया. शुक्र था कि सिर बच गया मगर पैर में मोच आ गई. किसी तरह गिरतेपड़ते डाक्टर के पास पहुंची और तमाम प्रोसीजर्स के बाद जब बाहर निकली तो 5 हजार की चपत लग चुकी थी.

जब तक भूमिका का पैर पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ उस ने बैठेबैठे ही कुछ रील बनाईं और अपलोड कर दी थीं. हर रील पर भूमिका को कुछ न कुछ कमैंट्स आते ही थे और धीरेधीरे ऐसा होने लगा कि भूमिका अपनी वर्चुअल दुनिया से इतनी जुड़ गई कि वह अपनी असल दुनिया से डिस्कनैक्ट हो गई.

भूमिका को यह लगने लगा था कि स्क्रीन के उस पार के लोग ही हैं जो उस के अपने हैं, जो उस की कद्र करते हैं. हर रील के साथ यह पागलपन बढ़ता ही जा रहा था.

अब तो यह हाल हो गया था कि मार्केट जाते हुए, चाट खाते हुए हर समय भूमिका रील बनाती रहती. हद तो तब हो गई जब भूमिका की हास्यास्पद रीलों के कारण आर्य अपने दोस्तों के बीच मजाक बन कर रह गई.

सीधेसीधे नहीं मगर इशारों से सभी लड़के आर्या के आते ही हौट आंटी, मस्त आंटी कह कर के कटाक्ष करने लगते थे. आर्या को सब समझ में आ रहा था मगर वह कैसे अपनी मम्मी को सम?ाए. इन्हीं सब कारणों से आर्या और भूमिका में दूरी बढ़ती जा रही थी. मगर भूमिका इन सब बातों से बेखबर अपनी ही दुनिया में मस्त थी. उधर रोहित भूमिका का घर के प्रति लापरवाह रवैया देख कर मन ही मन कुढ़ता रहता था.

भूमिका का यह सोशल मीडिया का बुखार बढ़ता ही जा रहा था. वह अपने जीवन के हर लमहे को कैद कर के अपलोड कर देती थी. भूमिका को जीने से अधिक अपलोडिंग में मजा आता था. उस का पहनना, खानापीना सबकुछ सोशल मीडिया तय करता था. क्या ट्रैडिंग कर रहा है क्या नहीं इस बात पर भूमिका की जिंदगी निर्भर हो गई थी.

आर्या के ऐग्जाम के बाद पूरा परिवार जब घूमने गया तो हर 1 घंटे में एक नई रील बनाने के कारण भूमिका साथ होकर भी साथ नहीं थी. उस का सारा ध्यान उस रमणीय स्थल को देखने में नहीं वहां पर फोटो खिंचवाने और रील बनाने में था. भूमिका हर हाल में अपने सब्स्क्राइबर बढ़ाना चाहती थी.

रोहित ने एक दिन गुस्से में कह भी दिया, ‘‘भूमिका, तुम हमारे साथ आई ही क्यों हो. लगता ही नहीं तुम हमारे साथ आई हो.’’

मगर भूमिका सारी बातें अनसुनी कर देती थी. 12वीं कक्षा के रिजल्ट के बाद आर्या पढ़ने के लिए बाहर चली गई. उस की एडमिशन से ले कर प्रवेश परीक्षा तक सब चीजों में उस के पापा रोहित का ही योगदान था. भूमिका का योगदान बस अपनी बेटी के प्रति बस उस की तसवीरों और हैशटैग को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने में ही सिमट गया था.

आर्या के कुछ बोलने से पहले ही भूमिका कहती, ‘‘तुम्हें सबकुछ वर्षों बाद भी याद रहेगा इसलिए मैं ये सब कर रही हूं.’’

आर्या व्यंग्य करते हुए बोली, ‘‘हां, महसूस तो कुछ हुआ ही नहीं है बस तसवीरों में ही याद रहेगा.’’

भूमिका इतनी अधिक इस नशे की शिकार हो गई थी कि उसे भनक भी नहीं लगी कि कब और कैसे रोहित अपनी खुशी अपनी एक तलाकशुदा सहकर्मी में ढूंढ़ने लगा था. उस महिला का नाम भावना था. रोहित अकसर दफ्तर के बाद भावना के घर ही चला जाता था. वैसे भी उसे अपना घर, घर कम स्टूडियो ज्यादा लगता था. कहीं रिंग लाइट, कहीं मेकअप का बिखरा समान… हर जगह बस दिखावा था. भावनाएं कहीं नहीं थीं.

जब से आर्या होस्टल चली गई थी तब से अधिकतर खाना या तो बाहर से आता या फिर रोहित बनाता था. भूमिका ने यह भी ध्यान नहीं दिया कि कब और कैसे रोहित रात के 9 बजे दफ्तर से घर आने लगा है.

रोहित को अब भूमिका से कोई फर्क नहीं पड़ता था. भूमिका रील बनाने में व्यस्त रहती और रोहित भावना के साथ चैटिंग करने में. जब आर्या छुट्टियों में घर आई तब भी भूमिका अपने सोशल मीडिया पर ही व्यस्त रही. रोहित आर्या को भावना के घर ले कर गया और भावना ने आर्या के साथ खूब सारी बातें और शौपिंग करी. दोनों बापबेटी को भावना में अपना नया घर मिल गया था.

भूमिका को तब होश आया जब रोहित रात को भी घर से गायब रहने लगा. आखिर एक दिन भूमिका ने रोहित को रंगे हाथ पकड़ लिया. जब भूमिका रोहित को लानतसलामत भेज रही थी तब रोहित बोला, ‘‘तुम इस बात पर रील बना कर अपने व्यूज बढ़ाओ. तुम्हारे सब्स्क्राइबर्स बढ़ाने का यह सुनहरा मौका है. तुम्हारा पति हूं कुछ तो ऐसा करूंगा जिस से मेरी पत्नी को फायदा हो,’’ यह बोल कर रोहित तीर की तरह घर से बाहर निकल गया.

भूमिका को समझ नहीं आ रहा था कि रोहित क्या सच में ऐसा उस के व्यूज बढ़ाने के लिए कर रहा है या वाकई में उस का अफेयर चल रहा है.

भूमिका इस मायावी दुनिया के सफर में इतना आगे बढ़ गई थी कि उसे वास्तविकता और वर्चुअल दुनिया में कोई फर्क ही नजर नहीं आता था. बरसों से भूमिका अपने किसी भी दोस्त से नहीं मिली थी. औनलाइन दोस्त ही उस की दुनिया बन कर रह गए थे.

भूमिका अपनी इस समस्या के लिए नए हैशटैग और अपनी एक दुखी तसवीर को क्लिक करने में व्यस्त हो गई थी. शायद जिंदगी के हर लमहे को कैद करतेकरते भूमिका कब और कैसे इस मायावी दुनिया में कैद हो गई थी उसे पता नहीं था.

Hindi Fiction Stories : सुख का संसार – कौन से कर्तव्य से बंधी थी शिखा

Hindi Fiction Stories : अभय डाक्टर बन गया तो घर में उस के लिए रिश्तों की बाढ़ आ गई. किसीकिसी दिन तो एकसाथ 2-2 लड़की वाले आ कर बैठ जाते. अपनीअपनी बेटियों की प्रशंसा के पुल बांधते, लड़की की योग्यता के प्रमाणपत्रों की फोटोस्टेट कापियां दिखलाते, लड़की दिखाने का प्रस्ताव रखते और विभिन्न कोणों से खींची गई लड़की की दोचार रंगीन तसवीरें थमा कर, बारबार नमस्कार कर के, उम्मीदें बांध कर चले जाते थे.

शिखा की समझ में नहीं आ रहा था, इन रंगीन तसवीरों के समूह में से किस लड़की को अपनी देवरानी बनाए. किसे पसंद करे. सभी तसवीरें एक से बढ़ कर एक फिल्म अभिनेत्रियों जैसे अंदाज व लुभावने परिधानों में थीं.

शिखा ने अपने पति दिनेश से पूछा. उस ने कह दिया, ‘‘अभय से पूछो, विवाह उसे करना?है. लड़की उस की पसंद की होनी चाहिए.’’

शिखा ने सभी तसवीरें और प्रमाणपत्रों की फोटोस्टेट कापियां अभय के सामने रख दीं. अभय ने उड़ती सी निगाह डाल कर सभी तसवीरें सामने से हटा दीं और बोला, ‘‘जो लड़की तुम्हें पसंद आए उसी को बहू बना कर ले आओ, भाभी. मुझे लडकी के रंगरूप से क्या लेनादेना. जो लड़की मेरी मां समान भाभी की सेवा व सम्मान कर सके, दोनों भाइयों में फूट न डलवाए, सुख का नया संसार बनाने में मदद करे, वही मुझे स्वीकार होगी.’’

‘लेकिन तसवीर से कैसे पता लग सकता?है कि लड़की का स्वभाव कैसा है? गुणों के साथ सुंदरता भी तो चाहिए. बहू घर की शोभा होती है,’ शिखा सोचती रह गई थी.

दिनेश व अभय ने गृहस्थी के अन्य कामों की तरह लड़की पसंद करने की जिम्मेदारी भी शिखा के कंधों पर डाल दी थी.

उस ने सभी तसवीरों में से एक तसवीर छांट कर, अभय को जबरदस्ती लड़की देखने भेज दिया. अभय ने लौट कर बतलाया कि लड़की के सामने के दांत काफी उभरे, चौड़ेचौड़े लग रहे थे. हंसने पर पूरी बत्तीसी बाहर आ जाती थी.

2 जगह दिनेश को भेजा. वह दोनों लड़कियां भी पसंद नहीं आईं. फिर दोचार जगह शिखा भी अभय व दिनेश को साथ ले कर लड़की देख आई. पर जो बात तसवीरों में थी, वह लड़कियों में नहीं थी.

तसवीरों व प्रमाणपत्रों के आधार पर कोई लड़की कैसे पसंद की जा सकती थी? झुंझला कर शिखा ने तसवीरें वापस भेज दीं. अकारण जगहजगह लड़की देखने जा कर लड़की वालों को परेशान करना उचित नहीं था. अपना वक्त भी बरबाद होता?था. घर में अकेले बच्चे भी दुखी हो जाते?थे.

शिखा को लड़की पसंद करने का काम पहाड़ पर चढ़ने जैसा लग रहा था. फिर भी लड़की तो पसंद करनी ही थी. इकलौते देवर के गले में कोई ऐसीवैसी थोड़े ही बांधी जा सकती थी?

एक दिन एक सज्जन अपनी भांजी का रिश्ता ले कर आए. एक सीधीसादी तसवीर, बस. न प्रमाणपत्रों की गठरी न प्रशंसा के पुल और न दहेज का लालच.

लड़की इसी शहर में डाक्टरी पढ़ रही थी. लड़की डाक्टरी पढ़ती है, सुन कर दिनेश भी दिलचस्पी लेने लगा. अभय से पूछा तो उस ने वही वाक्य दोहरा दिया, ‘‘लड़की?भाभी की पसंद की होनी चाहिए.’’

दिनेश व शिखा लड़की देखने चले गए. शिल्पी ने अपने व्यवहार, सुघड़ता व भोलेपन से दोनों का मन मोह लिया. दिनेश के इशारे पर शिखा शिल्पी को अंगूठी भेंट कर रिश्ता पक्का कर आई.

सूचना पा कर अन्य शहर में रहने वाले शिल्पी के पिता, सौतेली मां, सौतेले भाईबहन आ गए. सादे समारोह में विवाह संपन्न हो गया.

शिल्पी का मधुर स्वभाव व अच्छा व्यवहार देख कर अभय शिखा की प्रशंसा करता रहता, ‘‘मैं जानता था, भाभी मेरे लिए लाखों में एक छांट कर लाएंगी. शिल्पी मेरी उम्मीदों से बढ़ कर है.’’

शिखा खुश थी. देवर ने उस का मान तो रखा ही, सराहना भी की.

अभय जब से चिकित्सा के क्षेत्र में आया था तभी से निजी नर्सिंग होम खोलने का सपना देखता रहता था. अब शिल्पी के आ जाने से उस की यह इच्छा और बलवती हो उठी थी. घर में 2 डाक्टर हो गए. अपना नर्सिंग होम होता तो प्रतिभा दिखलाने के अधिक अवसर मिलते. अधिक लाभ उठाया जा सकता था.

लेकिन नर्सिंग होम दूर की चीज थी. दिनेश के पास इतने भी रुपए नहीं थे कि इकलौते भाई के लिए कोई अच्छा सा दवाखाना खुलवा दे. न उस की पहुंच कहीं ऊपर तक थी कि अभय को नौकरी दिलवा पाता.

किसी अच्छी सिफारिश के अभाव में काफी भागदौड़ कर के भी अभय किसी अस्पताल में नौकरी नहीं पा सका तो उस ने एक किराए की दुकान ले कर प्रैक्टिस शुरू कर दी.

अनुभव व आवश्यक डाक्टरी उपकरण पास में न होने के कारण अभय का चिकित्सालय कम चलता था. जो आमदनी होती वह दुकान का किराया, कंपाउंडर की तनख्वाह व स्कूटर के पेट्रोल में खर्च हो जाती थी. इतनी बचत नहीं थी कि वह कुछ रुपए घर में दे पाता.

शिल्पी ने पढ़ाई पूरी की. नौकरी पाने का प्रयास किया तो उस की नौकरी एक स्थानीय अस्पताल में लग गई.

शिल्पी ने अपना पहला वेतन ला कर शिखा के हाथ में रखा तो शिखा ने नम्रता से इनकार कर दिया, ‘‘क्या यह अच्छा लगता है कि घर की बहू से खानेरहने के पैसे लिए जाएं? तुम इस घर की बहू हो. तुम्हें घर में रहनेखाने का पूरा अधिकार है.’’

अभय ने भी शिल्पी के वेतन को हाथ नहीं लगाया. भारी स्वर में बोला, ‘‘पत्नी की कमाई खा कर क्या मैं मर्दों की जमात में सिर नीचा कर लूं? कायदे से तो मुझे तुम्हारा खर्च उठाना चाहिए था.’’

दिनेश ने शिल्पी को समझाया, ‘‘देखो बहू, तुम बचपन से अपने मामा के घर में पली हो. उन्होंने तुम्हारे पालनपोषण, शिक्षा आदि का भार उठाया है. तुम्हारे मामा की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है. अपने वेतन से तुम्हें उन की सहायता करनी चाहिए.’’

‘‘लेकिन भैया, मेरा इस घर के लिए भी तो कुछ फर्ज है?’’ उलझन में पड़ी शिल्पी ने पूछा.

‘‘इस घर के खर्चे की चिंता मत करो. मैं इतना तो कमा लेता हूं, जिस से सब का खानापीना चलता रहे.’’

दिनेश ने शिल्पी के नाम से बैंक में खाता खुलवा दिया और कह दिया, ‘‘जो रुपए बचें वे नर्सिंग होम बनवाने के लिए जमा करती जाओ.’’

धीरेधीरे अभय की डाक्टरी चल निकली. उस ने घर में रुपए देने चाहे तो दिनेश ने मना कर दिया. अभय को अपने लिए नर्सिंग होम कोठी बनवाने व कार खरीदने के लिए भी तो रुपए चाहिए. डाक्टर हो कर इस पुराने छोटे से घर में रहेगा तो लोग क्या कहेंगे. अभी से रुपए जोड़ना शुरू करेगा तो वर्षों में जुड़ पाएंगे.

शिल्पी की तरह फिर अभय ने भी चुप लगा ली. दोनों पतिपत्नी कभीकभार कुछ नाश्ते का सामान, फल, सब्जी वगैरा खरीद कर ले आते थे.

शिल्पी के पांव भारी हुए तो शिखा ने उसे सुबह का नाश्ता बनाने से भी रोक दिया. अस्पताल में तो सुबह से शाम तक मरीजों से सिर मारना ही पड़ता है. घर में तो आराम मिल जाए.

शिल्पी मां बनी तो शिखा ने उस के बेटे डब्बू को पालने का पूरा भार अपने कंधों पर ले लिया. वह डब्बू के पोतड़े भी हंसीखुशी धोती थी.

शिल्पी व अभय दोनों ने डब्बू की देखरेख के लिए कोई आया रखने की पेशकश की तो शिखा ने मना कर दिया. क्या यह उचित लगता है कि उस के रहते डब्बू आया की गोद में पले? नवजात शिशु के लालनपालन के लिए आया पर विश्वास भी तो नहीं किया जा सकता. जरा सी असावधानी शिशु के लिए जानलेवा बन सकती है.

शिल्पी 2 माह के डब्बू को जेठानी की गोद में सौंप कर निश्चिंत हो कर पुन: अस्पताल जाने लगी.

शिखा के तीनों बच्चे हर वक्त डब्बू के इर्दगिर्द मंडराते रहते. डब्बू सभी के हाथों का खिलौना बन गया था. दिनेश भी रात को दुकान से आ कर डब्बू को उछालउछाल कर खूब हंसाता और अपने पूरे दिन की थकावट भूल जाता था.

अब तक अभय अपनी डाक्टरी में इतना अधिक व्यस्त हो चुका था कि अपने बेटे को गोद में ले कर पुचकारनेदुलारने का वक्त भी नहीं निकाल पाता था.

शिखा का बड़ा बेटा गौरव 3 वर्ष से लगातार इंजीनियरिंग की प्रतियोगिता में बैठता आ रहा था. गौरव की योग्यता देख कर सभी को उस के प्रतियोगिता में आ जाने की उम्मीद थी. पर पता नहीं क्यों गौरव को इस बार भी असफलता ही मिली.

तीसरी बार असफल हो कर गौरव पूरी तरह से निराश हो उठा. इंजीनियर बनने की इच्छा पूरी होने के आसार नजर नहीं आए तो गौरव का मन क्षुब्ध हो उठा. पढ़ाई से जी उचटने लगा.

गौरव को दुखी देख कर शिखा व दिनेश का मन भी बेचैन रहने लगा. दोनों वर्षों से बेटे को इंजीनियर बनाने के सपने देखते आए थे.

लेकिन सपने क्या आसानी से सच हुआ करते हैं? घर में आर्थिक अभाव हो तो छोटेछोटे खर्चे भी पहाड़ मालूम पड़ने लगते हैं.

गौरव के एक मित्र ने चंदा दे कर किसी इंजीनियरिंग कालिज में दाखिला करा देने का प्रस्ताव रखा तो पहली बार दिनेश को अपनी आर्थिक अक्षमता का बोध हुआ.

कहां से लाए वह 30-35 हजार रुपए? फिर गौरव की पढ़ाई और छात्रावास का खर्चा. कैसे पूरा कर सकेगा वह?

दोनों बेटियां भी तो विवाह योग्य होती जा रही थीं और घर का दिनप्रतिदिन बढ़ता हुआ हजारों का खर्चा.

गौरव ने पहले तो चंदा दे कर दाखिला लेने से इनकार कर दिया. उस की नजरों में चंदा देना रिश्वत देने के समान था.

लेकिन जब उस ने अपने मित्रों को चंदा दे कर, दाखिला लेते देखा तो वह तैयार हो गया.

दिनेश ने जब शिखा को बतलाया कि वह गौरव की पढ़ाई का खर्चा उठाने में असमर्थ है तो चिंता के कारण शिखा की भूखप्यास मिट गई. उस ने पहली बार पति के सामने जबान खोली, ‘‘जब भाई को डाक्टरी पढ़ाई थी, तब उस का हजारों का खर्च भारी नहीं लगा था. आज मेरे बेटे की पढ़ाई बोझ लगने लगी है.’’

‘‘गौरव अकेला तुम्हारा ही नहीं, मेरा भी तो बेटा है, शिखा. मेरी बात समझने की कोशिश करो. जब अभय पढ़ रहा था तब घर में अधिक खर्चा नहीं था. मेरी दुकान में उस वक्त अधिक आमदनी हुआ करती थी,’’ दिनेश के स्वर में विवशता थी.

‘‘तो अभय से मांग लो. उस की डाक्टरी तो अब खूब चलने लगी है.’’

‘‘अभय के पास इस वक्त इतने रुपए नहीं होंगे. कुछ दिन पहले उस ने नए डाक्टरी उपकरण खरीदे हैं, दुकान का फर्नीचर बनवाया है.’’

‘‘शिल्पी से मांग लो.’’

‘‘मुझे किसी से कुछ मांगना अच्छा नहीं लगता, शिखा. शिल्पी क्या सोचेगी? जेठजेठानी दो वक्त का साधारण भोजन खिलाते हैं और बदले में हजारों रुपए मांग रहे हैं. हो सकता?है नाराज हो कर वह अलग घर में रहना शुरू कर दे.’’

‘‘तुम्हें दूसरों की चिंता अधिक है. अपने इकलौते बेटे का बिलकुल खयाल नहीं है. आखिर गौरव की पढ़ाई का क्या होगा?’’

दिनेश के पास शिखा की बात का कोई उत्तर नहीं था.

आक्रोश से भरी शिखा अंदर ही अंदर गीली लकड़ी की भांति सुलगती. उस के मन में बारबार एक ही विचार पनप रहा था. क्या अभय व शिल्पी का कोई फर्ज नहीं है? दोनों अपनेअपने पैरों पर खड़े हैं. आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं. क्या अपना खुद का खर्चा भी नहीं उठा सकते?

उसे अपने ऊपर भी बेहद क्रोध आ रहा था. उस की अक्ल पर पत्थर पड़ गए थे जब उस ने शिल्पी को घर में खर्चा देने से रोक दिया था?

सिर्फ एक ही बार तो रोका था. शिल्पी ने दोबारा खर्चा देने की पेशकश क्यों नहीं की? वह घर की स्थिति से अनजान तो नहीं है. रुपयों की कमी के कारण त्योहारों पर भी बच्चों के कपड़े नहीं बन पाते. वर्षों से शिखा मामूली साडि़यों में गुजारा कर रही है. क्या शिल्पी को यह सब दिखाई नहीं देता?

शिखा के जी में आ रहा था, शिल्पी को खूब खरीखोटी सुना कर मन की भड़ास निकाल ले. रूठ कर शिल्पी अलग हो जाएगी तो हो जाए. साथ में रह कर ही वह किसी का क्या भला कर रही है. कभी यह भी नहीं सोचती, जेठानी को थकान लग रही होगी. चाय बना कर पिला दे. थोड़ाबहुत घर के कामों में हाथ बंटा दे. आते ही बिस्तर पर पसर जाती है.

अभय ही कौन सा दूध का धुला है? घर के खर्चे का बोझ हलका करना चाहता तो क्या कोई उस का हाथ पकड़ लेता? सिर्फ झूठमूठ का खर्चा देने का नाटक किया था. परंतु डब्बू का?भोला चेहरा देखते ही शिखा के विचार बदल गए. मांबाप के स्वार्थ की सजा डब्बू को क्यों मिले?

अगर अभय, शिल्पी अलग रहने लगे तो यह मासूम नौकरों का मुहताज बन जाएगा. इस की परवरिश कैसे हो पाएगी? जैसे गौरव उस का बेटा है, वैसे डब्बू भी है. शिल्पी ने उसे जन्म दिया है तो क्या हुआ. ममता, स्नेह, दुलार दे कर तो वह ही पाल रही है.

शिखा ने देवरदेवरानी को इस बारे में अनभिज्ञ रखना ही उचित समझा. अकारण घर में कलह हो या वे दोनों कुछ गलत अर्थ लगा बैठें इसलिए उस ने रुपयों की कमी की या गौरव की पढ़ाई की किसी प्रकार की चर्चा घर में नहीं की.

लेकिन रुपयों की कमी की वजह से गौरव के मन को ठेस पहुंचाना भी उचित नहीं था. उत्साह भंग हो जाने से महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति न हो पाने के कारण गौरव का मानसिक संतुलन भी बिगड़ सकता था.

शिखा को अपने दोचार सोने के आभूषणों का खयाल हो आया. आभूषण बेटे से अधिक कीमती थोड़े ही थे? बेटे की खुशियों के लिए शिखा अपना जीवन तक बलिदान करने को तत्पर थी. फिर बेजान आभूषण क्या माने रखते थे?

वह घर में सब से छिपा कर आभूषण बेच रुपए ले आई. चंदे का, किराए का, इंतजाम तो हो ही चुका था. गौरव के मासिक खर्चे की इतनी फिक्र नहीं थी. जिस तरह से पेट काट कर अभय को डाक्टर बनाया था उसी प्रकार गौरव की पढ़ाई चल सकती थी.

शिखा तरहतरह की गुडि़या बनाने में पारंगत थी. घर के कामों से अवकाश पा कर व वक्त का सदुपयोग कर आसानी से वह 200-300 रुपए महावार कमा सकती थी.

दिनेश चकित रह गया. शिखा के पास इतना रुपया कहां से आ गया? हकीकत जानने, समझने का वक्त नहीं था. गौरव के जाने में सिर्फ एक दिन का वक्त ही तो बाकी बचा था.

बड़े उत्साह से शिखा गौरव के साथ रखने के लिए मठरी, पापड़ी तल रही थी. बेटे से लंबे अर्से तक अलग रहने के खयाल से उस की आंखें बारबार भर आती थीं. दोनों बेटियां भी बारबार आंखें पोंछ रही थीं.

शिल्पी आज कुछ देर से घर लौटी. बड़ी परेशान, गंभीर लग रही थी. आते ही सिर थाम कर कुरसी पर बैठ गई.

कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई? शिखा का दिल आशंकाओं से धड़क उठा. उस ने प्रतिदिन की भांति चाय बना कर शिल्पी को दी तो वह फूट पड़ी, ‘‘भाभी, तुम मुझे कब तक पराया समझती रहोगी? क्या मैं इस घर की बहू नहीं हूं?’’

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘भाभी, घर में रुपए की कमी थी तो अभय से या मुझ से क्यों नहीं कहा? चुपचाप बाजार जा कर अपने आभूषण क्यों बेच दिए?’’

शिखा घबरा गई. आभूषण बेचने की बात कानों में पड़ने से कहीं गौरव इंजीनियरिंग पढ़ने का इरादा न बदल डाले. उस ने शीघ्रता से कमरे का दरवाजा बंद कर लिया. फिर शिल्पी से चुप हो जाने का आग्रह करने लगी.

शिल्पा कहे जा रही?थी, ‘‘यह तो अच्छा हुआ, वह सर्राफ मामाजी का परिचित था. वह आप को जानता था. उस ने मामाजी से यह बात बतला दी. मामाजी घबराए हुए अस्पताल में मेरे पास पहुंचे, मुझे खूब लताड़ा. ऊंचनीच समझाई कि मैं बहुत लापरवाह हूं, घर का ध्यान नहीं रखती, जेठजेठानी को सता रही हूं, घर में डाक्टर बहू लाने का उन्हें क्या लाभ रहा. मुझे माफ कर दो भाभी. सचमुच मुझ से बहुत भारी भूल हो चुकी है.’’

शिल्पी की आंखों से पश्चात्ताप के आंसू बहने लगे थे. ‘‘अरेअरे, यह क्या करती है? बच्चों की तरह रोने बैठ गई. थकीहारी आई है, ले चाय पी, ठंडी हुई जा रही है,’’ शिखा द्रवित हो कर शिल्पी के आंसू पोंछने लगी.

‘‘मैं आप के सभी आभूषण वापस ले आई हूं, भाभी. मेरे खाते में जितने रुपए जमा थे वे भी निकाल कर ले आई हूं. आप ने कभी कुछ नहीं मांगा, न कभी रुपए लिए. मामाजी ने भी मुझ से कोई आर्थिक सहायता स्वीकार नहीं की. उलटे डांट पिलाई. बताओ भाभी, आखिर मैं इन रुपयों का क्या करूं?’’

‘‘इतने ढेर सारे रुपए निकाल कर ले आई. यह क्या नादानी की तू ने? रास्ते में कोई गुंडा पर्स पार कर देता तो? इन रुपयों को वापस बैंक में जमा कर आना. तुम दोनों को नर्सिंग होम और अपनी कोठी भी तो बनवानी है. मेरे आभूषण ले आई, तेरा यह एहसान ही क्या कम है, मेरे ऊपर?’’

‘‘भाभी, पराएपन की बातें करोगी तो मैं फिर से रोना शुरू कर दूंगी. जिस तरह से डब्बू आप का बेटा है, क्या गौरव मेरा बेटा नहीं है? गौरव को लिखानेपढ़ाने की जिम्मेदारी मेरी है, आप की नहीं.’’

एहसानों के भार से शिखा का सिर झुका जा रहा था. वह भरे गले से बोली, ‘‘तुम्हें भी तो रुपए चाहिए. अपने गाढ़े परिश्रम की कमाई हमारे ऊपर खर्च कर डालोगी तो तुम्हारी कोठी कैसे बनेगी? यह गंदा महल्ला, पुराना मकान किसी डाक्टर के रहने के योग्य कहां है?’’

‘‘आप को छोड़ कर हम कहीं नहीं जाएंगे, भाभी. हमारा मन नहीं लगेगा. डब्बू भी आप के बिना नहीं रह पाएगा. अगर कभी कोठी बनेगी तो सभी के लिए बनेगी. सब इकट्ठे रहेंगे.’’

शिखा को लगा, इस पुराने मकान की दीवारें अब और अधिक मजबूत हो उठी हैं. उस ने शिल्पी को समझने में बहुत बड़ी भूल की थी.

अगर वह सहनशीलता से काम न ले कर शिल्पी से तकरार कर बैठती तो? वर्षों से एकसूत्र में बंधा परिवार तिनकेतिनके हो कर बिखर जाता.

पर शिखा के धैर्य, संयम व गुणवती शिल्पी की बुद्धिमता, साथ ही दोनों के आपसी प्यार ने सुख के नए संसार का सृजन कर डाला.

Interesting Hindi Stories : ओमा – क्या लीसा भारत आ पाई

Interesting Hindi Stories : ओमा का यह नित्य का नियम बन गया था. दोपहर के 2 बजते ही वे घर के बाहर पड़ी आराम कुरसी पर आ कर बैठ जातीं. वजह, यह लीसा के आने का समय होता.

5 साल की लीसा किंडरगार्टन से छुट्टी होते ही पीठ पर स्कूल बैग लादे तेज कदमों से घर की ओर चल पड़ती. कुछ दूरी तक तो उस की सहेलियां साथसाथ चलतीं, फिर वे अपनेअपने घरों की ओर मुड़ जातीं.

लीसा का घर सब से आखिर में आता. डेढ़ किलोमीटर चल कर आने में लीसा को एक या दो बार अपनी पानी की बोतल से 2-3 घूंट पानी पीना पड़ता. उस के पैरों की गति तब बढ़ जाती जब उसे सौ मीटर दूर से अपना घर दिखाई देने लगता.

तीनमंजिला मकान के बीच वाले तल्ले में लीसा अपने पापा व मम्मा के साथ रहती है. नीचे वाले तल्ले में ओमा रहती हैं (जरमनी में ग्रैंड मदर को ओमा कहते हैं) और सब से ऊपर वाली मंजिल में रूबिया आंटी व मोहम्मद अंकल रहते हैं.

ओमा इस मकान की मालकिन की मां हैं. मकान मालकिन, जिन्हें सभी किराएदार ‘लैंड लेडी’ कह कर संबोधित करते हैं, इस तीनमंजिला मकान से 3 घर छोड़ कर चौथे मकान में रहती हैं.

80 साल की ओमा यहां अकेली रहती हैं. जरमनी में 80 साल के वृद्ध महिलापुरुष उतने ही स्वस्थ दिखते हैं जितने भारत में 60-65 के. वे अपने सभी काम खुद करती हैं. वैसे भी, इस देश में घरेलू नौकर जैसी कोई व्यवस्था नहीं है.

सूरज निकलने के पहले ओमा रोजाना उठती हैं और दिन की शुरुआत अपने बगीचे की साफसफाई से करती हैं. वे चुनचुन कर मुर झाई पत्तियों को पौधों से अलग करतीं, खुरपी से पौधों की जड़ों के आसपास की मिट्टी को उथलपुथल करतीं और अंत में एकएक पौधे को सींचतीं.

सुबह के 8 बजते ही वे अपनी साइकिल उठातीं और 2 किलोमीटर दूर बेकरी से ताजी ब्रैड व अंडे लातीं. इस देश में साइकिल 3 साल के छोटे से बच्चे से ले कर 90-95 साल तक के बुड्ढे सभी चलाते हैं.

साढ़े 11 बजे से साढ़े 12 बजे तक का दोपहर वाला समय उन का पार्क में चहलकदमी में गुजरता. पार्क से आ कर वे लंच लेतीं, फिर लीसा के आने के इंतजार में बाहर आ कर कुरसी पर बैठ जाती हैं.

लीसा के पापा अर्नव और मम्मा चित्रा 10 वर्ष पहले जरमनी आए थे. उन्हें उन की भारतीय कंपनी की ओर से एक साल के प्रशिक्षण कार्यक्रम में बेंगलुरु से वोल्डार्फ भेजा गया था, तब उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन के टैलेंट को देखते हुए जरमन कंपनी उन्हें यहीं रख लेगी.

चित्रा और अर्नव ने भी अन्य भारतीयों की तरह शहर में रहने के बजाय दूर गांव में रहना पसंद किया. इस की मुख्य वजह शहर की तुलना में गांव में आधे किराए में अच्छा मकान मिल जाना तो था ही, साथ ही साथ गांव का शांत व स्वच्छ पर्यावरण भी था.

वैसे यहां के गांव भी शहरों की तरह सर्वसुविधा संपन्न हैं. व्यवस्थित रूप से आकर्षक बसाहट, स्वच्छ व चिकनी सड़कें, चौबीसों घंटे शुद्ध ठंडा व गरम पानी, चारों तरफ हरियाली और उत्तम ड्रेनेज सिस्टम. कितनी भी तेज बारिश हो, न तो कभी पानी भरेगा और न ही कभी बिजली जाएगी.

हारेनबर्ग नाम के इस गांव में किंडरगार्टन के अतिरिक्त 8वीं जमात तक का स्कूल, छोटा सा अस्पताल, खेल का मैदान, जिम्नेजियम और 2 बड़े सुपर मार्केट हैं, जिन में जरूरत की सभी चीजें मिल जाती हैं.

हारेनबर्ग की दोनों दिशाओं में 10-12 किलोमीटर की दूरी पर 2 छोटे शहर हैं, जहां अच्छी मार्केट, बड़ा अस्पताल, सैलून व पैट्रोल पंप हैं.

चित्रा और अर्नव को अभी जरमन नागरिकता नहीं मिली है. लीसा को जन्म लेते ही यहां की नागरिकता मिल चुकी है. जिले के मेयर लीसा के लिए स्वयं उपहार ले कर बधाई देने घर आए थे. यहां

की प्रथा है, जरमन शिशु के जन्म होने  पर उस की नागरिकता संबंधी समस्त औपचारिकताएं तत्क्षण पूरी हो जाती हैं और उस जिले के मेयर को सूचित किया जाता है, फिर मेयर स्वयं उपहार के साथ शिशु से मिलने आते हैं.

लीसा के जन्म के समय ओमा और लैंड लेडी ने चित्रा की वैसी ही सेवा की थी, जैसी एक मां अपनी बेटी की गर्भावस्था के दौरान करती है.

इस देश में अगर किसी बाहरी व्यक्ति को किसी परेशानी का सामना करना होता है तो वह है, यहां की डाइश भाषा. सभी जरमन डाइश में ही बात करना पसंद करते हैं. चित्रा और अर्नव ने शुरुआती परेशानी के बाद जल्दी ही डाइश भाषा की कोचिंग लेनी शुरू कर दी थी. नतीजा रहा कि वे अब तीनों स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं और डाइश बोलने लगे हैं. लीसा अभी है तो 5 साल की, पर वह डाइश, अंगरेजी और हिंदी तीनों भाषाएं अच्छी तरह से बोल लेती है.

किंडरगार्टन से लौट कर आने पर वह ओमा की टीचर बन जाती है और ओमा बन जाती हैं किंडरगार्टन की स्टूडैंट. ओमा जानबू झ कर गलतियां करती हैं, ताकि लीसा से प्यारभरी डांट खा सकें.

ओमा की फ्रिज में वे सभी तरह की आइसक्रीम और जूस रखे होते हैं जो लीसा को पसंद हैं.

किंडरगार्टन से लौटने पर लीसा जैसे ही घर के पास पहुंचने को होती, ओमा को बाहर इंतजार करते बैठे देख, मुसकराते हुए दौड़ लगाती और पीठ से बैग उतार कर ओमा की गोदी में फेंक, सीधे उन की रसोई में घुस जाती. फिर अपनी मनपसंद आइसक्रीम फ्रिज से निकाल कर डाइनिंग टेबल पर आ कर खाने बैठ जाती.

ओमा लीसा के आने के पहले ही डाइनिंग टेबल पर सारे व्यंजन सजा कर रख देती हैं. लीसा या तो औमलेट या अपनी पसंद का कोई अन्य आइटम खाती, फिर अपनी सहेलियों के बारे में ओमा को विस्तार से बताना शुरू कर देती. शाम 4 बजे तक लीसा की धमाचौकड़ी चलती जब तक चित्रा औफिस से नहीं आ जाती. चित्रा की कार पोर्च में पार्क होते ही लीसा अपना बैग उठा कर अपने घर की सीढि़यां चढ़ने लगती.

ओमा का यह समय आराम करने का होता. शाम को वे या तो घूमने निकलतीं या फिर अपने बगीचे में बैठ कर सामने खेल रहे बच्चों को निहारती रहती हैं. जब कभी लीसा की सहेलियां खेलने के लिए नहीं आतीं, तब लीसा के साथ उस के पापा अर्नव खेल रहे होते हैं.

ओमा को शायद खाली बैठना पसंद ही नहीं था. वे बगीचे में बैठीं या तो स्वेटर बुन रही होतीं या मोजे बना रही होतीं. उन्होंने लीसा के लिए अनेक रंगबिरंगे स्वेटर और मोजे बना कर चित्रा को दिए हैं.

चित्राअर्नव की शादी की सालगिरह पर उन्होंने क्रोशिया से खूबसूरत मेज कवर बना कर चित्रा को भेंट किया था. केक बनाने में तो वे माहिर हैं. सप्ताह में 2-3 दिन उन के बनाए हुए स्वादिष्ठ केक चित्रा और अर्नव को भी खाने को मिलते हैं. ओमा और लीसा की जुगलबंदी देख लैंड लेडी कहती हैं, जरूर इन दोनों का कोई छिपा रिश्ता होगा. चित्रा को वे दिन नहीं भूलते जब 3 माह पहले अगस्त के महीने में लीसा बीमार पड़ी थी. इतना तेज बुखार था कि उस का पूरा बदन जल रहा था. ओमा भी बहुत चिंतित थीं.

एक दिन एक विशेषज्ञ डाक्टर से लीसा की हालत बयान कर उन के दिए लिक्विड को ले कर ओमा आई थीं. उस लिक्विड को लीसा के माथे पर देर तक वे लगाती रही थीं. उस दवा ने असर दिखाया और अगले दिन लीसा ठीक हो चली थी.

नवंबर माह के तीसरे सप्ताह में इस बार यहां का तापमान माइनस में पहुंचने लगा था. बर्फबारी भी शुरू हो गई थी. औरों की तरह चित्रा और अर्नव ने भी अपनीअपनी कारों के समर टायर बदलवा कर विंटर टायर लगवा लिए थे.

यूरोपियन देशों में बर्फ गिरने के पहले टायर बदलना अनिवार्य होता है. सर्दी के लिए अलग टायर होते हैं जो बर्फ पर फिसलन रोकते हैं.

इधर ओमा ने अभी से क्रिसमस की तैयारियां शुरू कर दी थीं. इस बार उन्होंने लीसा के लिए कुछ सरप्राइज सोच रखा था. क्रिसमस पर पूरा हारेनबर्ग सज कर तैयार हो जाता है ठीक उसी तरह जैसे दीवाली पर भारत के शहर सज जाते हैं.

लीसा भी क्रिसमस को ले कर बेहद उत्साहित है. किंडरगार्टन के सारे बच्चे अब क्रिसमस की ही बातें करते हैं. अर्नव और चित्रा अगले रविवार को क्रिसमस मेला देखने जाने की योजना बना ही रहे थे, तभी चित्रा के पास मां का फोन आया. भाई की शादी की खुशखबरी थी. मां ने बड़े प्यार से आग्रह किया था कि यदि वे लोग जल्दी पहुंच सकें तो सभी तैयारियों में बड़ी मदद मिल जाएगी.

चित्रा और अर्नव ने देर तक सलाहमशवरा उपरांत भारत यात्रा को अंतिम रूप दिया. एक माह की यात्रा में 15 दिन चित्रा को मां के पास भोपाल में रहना था और बाकी के 15 दिन ससुराल में.

लीसा उदास थी, क्योंकि उस का क्रिसमस सैलिब्रेशन छूट रहा था. ओमा भी निरुत्साहित हो गईं, उन की प्रिय लीसा एक माह के लिए उन से दूर जा रही थी.

भोपाल पहुंच कर चित्रा भाई की शादी की तैयारियों में जीजान से लग गई.

जलवायु परिवर्तन का सब से अधिक असर बच्चों पर पड़ता है, उन्हें नई जगह के वातावरण से सामंजस्य बनाने में समय लगता है. लीसा को अगले सप्ताह ही सर्दीजुकाम के साथ बुखार आ गया. जरमनी में होते तो वहां डाक्टर बच्चों को तुरंत कोई दवा नहीं देते, 3 दिन तक इंतजार करने को कहते हैं. बुखार ज्यादा बढे़ तो ठंडे पानी की पट्टी रखने को कहते हैं. पर यहां उस की नानी परेशान हो उठीं.

चित्रा ने मां को आश्वस्त किया. चित्रा अपने साथ पैरासिटामोल दवा ले कर आई थी, किंतु अर्नव ने एक दिन और इंतजार करने को कहा. चित्रा की मां का देसी उपचार में विश्वास था, सो वे काढ़ा बना कर ले आईं. लीसा ने किसी तरह एक घूंट गटका, फिर उसे और पिलाना मुश्किल हो गया.

देररात लीसा सपने में जोर से चीखी, फिर बैठ कर रोने लगी. चित्रा और अर्नव भी उठ कर बैठ गए.

चित्रा ने जब लीसा को सीने से लगाते हुए प्यार किया, तब उस का सिसकना बंद हुआ. लीसा पसीने से भीगी हुई थी, पर उस का बुखार उतर चुका था. कुछ देर बाद चित्रा ने लीसा से प्यार से पूछा, ‘‘लीसा, तुम कोई सपना देख रही थीं? सपने में ऐसा क्या देखा कि इतनी जोर से चीखीं?’’

‘‘मैं और ओमा जंगल में जा रहे थे, तभी एक टाइगर आ गया. टाइगर मेरे ऊपर  झपटा, तो मु झे बचाने के लिए बीच में ओमा आ गईं. तभी टाइगर उन का एक हाथ मुंह में दबा कर ले गया और उन के कटे हुए हाथ से खून बह रहा था.’’

‘‘तुम ने कल टाइगर वाला कोई टीवी सीरियल देखा था क्या?’’

‘‘हां, पर उस में 2 टाइगर आपस में फाइट कर रहे थे.’’

‘‘चलो, कोई बात नहीं, सपना था. ओमा बिलकुल ठीक हैं, कल वीडियोकौल पर तुम्हारी बात भी करा देंगे. मैं दूसरे कपड़े लाती हूं, इन्हें बदल देते हैं, पसीने से भीग गए हैं.’’

अगले दिन लीसा ने जिद पकड़ ली कि उसे ओमा से बात करनी है. चित्रा ने ओमा को कई बार फोन लगाया, पर हर बार उन का मोबाइल स्विच औफ बता रहा था. अर्नव ने चित्रा से कहा, ‘‘मैं मोहम्मद को फोन लगाता हूं, वह नीचे जा कर ओमा से बात करा देगा.’’

मोहम्मद ने फोन पर बताया कि वह अपने देश तुर्की आया हुआ है और उसे ओमा के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

चित्रा ने कहा, ‘‘मैं लैंड लेडी को फोन लगाती हूं. हो सकता है, ओमा अपनी बेटी के यहां गई हों.’’

लैंड लेडी ने जो बताया, उस से चित्रा की चीख निकल गई.

‘‘चित्रा, बड़ी दुखद सूचना है, ओमा घरेन के सिटी अस्पताल में एडमिट हैं. 2 दिन पहले रात में उन्होंने कोई सपना देखा था कि लीसा दरवाजे पर खड़ी उन्हें आवाज दे रही है. वे हड़बड़ा कर उठीं तो लड़खड़ा कर गिर पड़ीं. उन का बायां हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया है. आवाज भी साफ नहीं निकल रही है. लीसा को बारबार याद कर रही हैं. डाक्टर ने बोला है, ठीक हो जाएंगी, पर कुछ माह लगेंगे.’’

चित्रा ने लीसा को सिर्फ यही बताया कि ओमा अभी वीडियोकौल पर नहीं आ सकतीं, उन की तबीयत ठीक नहीं है, डाक्टर ने आराम करने को कहा है.

एक माह बाद जब चित्रा और अर्नव लीसा के साथ वापस जरमनी पहुंचे, तो लीसा ओमा से मिलने की खुशियोंभरी कल्पना में डूबी हुई थी. फ्रैंकफर्ट हवाईअड्डे से बाहर निकल कर कार में बैठते ही उसे लग रहा था कि काश, कुछ ऐसा हो जाए कि उस की कार उड़ कर ओमा के पास पहुंच जाए.

उधर, ओमा की दुनिया पूरी तरह उलटपुलट हो चुकी थी. कभी खाली न बैठने वाली ओमा अब व्हीलचेयर पर गुमसुम सी बैठी रहतीं. उन के साथ अब चौबीसों घंटे केयरटेकर रोमानियन महिला डोरोथी रहती.

डोरोथी ओमा के सारे काम करती, उन्हें उठानेबिठाने से ले कर खाना खिलाने, सुलाने तक के. एक प्रकार से ओमा अब डोरोथी पर ही पूरी तरह से निर्भर थीं.

चित्रा के कार से उतरने के पहले ही लीसा दौड़ कर ओमा के बंद दरवाजे को खटखटा रही थी. डोरोथी ने जब दरवाजा खोला, तो लीसा उसे देख कर वहीं ठिठक गई. तब तक चित्रा ने वहां पहुंच कर डोरोथी को पूरी बात सम झाई.

अंदर बिस्तर पर लेटी ओमा को देख लीसा मुसकराई तो ओमा के होंठों पर भी मुस्कान  झलकी व उन के मुख से अस्पष्ट सी आवाज निकली, ‘‘ली…सू…’’ और आंखों से आंसू बह चले.

चित्रा ने अपनी हथेली से उन के आंसू पोंछे और लीसा का हाथ उन के हाथ में पकड़ा दिया.

Hindi Folk Tales : प्रतिष्ठा की पराजय – क्या थी रमादेवी की जिद

Hindi Folk Tales : पूरा घर ही रमादेवी को अस्तव्यस्त महसूस हो रहा है. सोफे के कुशन बिखरे हुए, दीवान की चादर एक कोने से काफी नीची खिंची हुई मुड़ीतुड़ी और फर्श पर खुशबू व पिंकू के खिलौने बिखरे हुए थे. काम वाली महरी नहीं आई, इसीलिए घर की ऐसी हालत बनी हुई थी. वैसे, उन का दिल तो चाह रहा था कि उठ कर सब कुछ व्यवस्थित कर दें, लेकिन यह घुटने का दर्द…उफ, किसी दुश्मन को भी यह बीमारी न लगे. हड़बड़ाती सी सुलभा औफिस जाने के लिए तैयार हो कर आई. सामान सहेजते हुए वह निर्देश भी देती जा रही थी, ‘‘मांजी, खुशबू को दूधभात खिला दिया है और पिंकू को दूध पिला कर सुला दिया है. उसे याद से 3-3 घंटे बाद दूध दे देना. आया आज छुट्टी पर है. सब्जी मैं ने बना दी है, फुलके बना लेना. अब मुझे समय नहीं है.’’

हवा की गति से सुलभा कमरे से बाहर चली गई और पति आलोक के साथ अपने दफ्तर की ओर रवाना हो गई. रमादेवी सबकुछ देखतीसुनती ही रह गईं. बोलने का अधिकार तो वह स्वयं ही अपनी जिद के कारण खो चुकी थीं. सच, वे कितनी बड़ी भूल कर बैठीं. अपनी झूठी शान के लिए लोगों पर प्रभाव डालने के प्रयास में उन्होंने कितना गलत निर्णय ले लिया. विचारों के भंवर में डूबतीउतराती वे पिंकू के रोने की आवाज सुन कर चौंकीं. पलंग से उतरने की प्रक्रिया में ही उन्हें 2-3 मिनट लग गए. घुटने को पकड़ कर शेष टांग को दूसरे हाथ से धीरेधीरे मलते हुए वे पैर को जमीन पर रखतीं. बहुत दर्द होता था, कभीकभी तो हलकी सी चीख भी निकल जाती. पैर घसीटते हुए वे पिंकू के पास पहुंचीं. कहना चाहती थीं, ‘अरे, राजा बेटा, इतनी जल्दी उठ गया?’ लेकिन दर्द से परेशान खीजती हुई बोल पड़ीं, ‘‘मरदूद कहीं का, जरा आराम नहीं लेने देता, सारा दिन इस की ही सेवाटहल में लगे रहो.’’

पिंकू, दादी की गोद में बैठ कर हंसनेकिलकने लगा तो रमादेवी को अपने कहे शब्दोें पर ग्लानि हो आई, ‘इस बेचारी नन्ही जान का क्या कुसूर. दोष तो मेरा ही है. मेरे ही कारण बहू अपने नन्हे बच्चों को रोता छोड़ नौकरी पर जाती है. मेरी ही तो जिद थी.’ अपनी इकलौती संतान आलोक  की रमादेवी ने बहुत अच्छी परवरिश की थी. मांबाप के प्रोत्साहन से सफलता की सीढि़यां चढ़ते हुए इंजीनियरिंग की डिगरी प्राप्त  की थी. जल्दी ही उसे एक प्रतिष्ठित कंपनी में अच्छे पद पर नौकरी मिल गई थी. आलोक की शादी के लिए रमादेवी ने जो सपने बुने थे उन में से एक यह भी था कि वह नौकरी करने वाली बहू लाएंगी. जब पति ने तर्क रखा कि उन्हें आर्थिक समस्या तो है नहीं, फिर बहू से नौकरी क्यों करवाई जाए, तो वे उत्साह से बोली थीं, ‘आप को मालूम नहीं, नौकरी करने वालों का बड़ा रोब रहता है. अपने महल्ले की सुमित्रा की बहू नौकरी करती है. सभी उसे तथा उस की सास को इतना सम्मान देते हैं मानो उन की बराबरी का हमारे महल्ले में कोई हो ही न.’

‘लेकिन उन की तो आर्थिक स्थिति कमजोर है. सुमित्रा के पति भी नहीं हैं तथा उन के बेटे की कमाई भी इतनी नहीं कि परिवार का खर्च आसानी से चलाया जा सके. मजबूरन आर्थिक सहायता के लिए उन की बहू नौकरी करती है. दोहरे कर्तव्यों के बोझ से वह बेचारी कितना थक जाती होगी. उस की कर्तव्यपरायणता के कारण ही सब उस की तारीफ करते हैं,’  पति ने समझाया था. ‘यह आप का खयाल है. मैं कुछ और ही सोचती हूं. हमारे खानदान में किसी की भी बहू नौकरीपेशा नहीं है. सोचो जरा, सभी पर हमारी धाक जमेगी कि हम कितने खुले विचारों वाले हैं, आधुनिक हैं, बहू पर कोई बंधन नहीं लगाते. इस का रोब लोगों पर पड़ेगा.’

‘तुम्हारी मति मारी गई है. लोगों पर रोब जमाने की धुन में अपने घर को कलह, तनाव का मैदान बना लें? सोचो, अगर बहू सारा दिन बाहर रहेगी तो तुम्हें उसे लाने का क्या फायदा होगा? न वह तुम्हारे साथ बैठ कर ठीक से हंसबोल सकेगी और न घर के कामों में मदद कर सकेगी,’ पति ने फिर से समझाने की कोशिश की. ‘घर के काम के लिए नौकरानी रख लेंगे. रही बात हंसनेबोलने की, तो शाम 6 बजे से रात तक क्या कम समय होता है?’

‘तुम से तो बहस करना ही व्यर्थ है’, कह कर पति चुप हो गए. आलोक के लिए लड़कियां देखने की प्रक्रिया जारी थी. रमादेवी ने कई अच्छी, शिक्षित लड़कियों को अस्वीकार कर दिया क्योंकि वे नौकरी नहीं करती थीं. आरंभ से ही घर में रमादेवी का दबदबा था, इसलिए पति व पुत्र उन के हर प्रस्ताव को मानने में ही अपनी खैर समझते थे. संयोग से जीवन बीमा कंपनी में कार्यरत सुलभा सभी को पसंद आ गई. रमादेवी को तो मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई. खूबसूरत, कुलीन घर की बेटी और फिर अच्छी नौकरी पर लगी हुई. आननफानन बात पक्की कर दी गई. खूब धूमधाम से शादी हुई. सुलभा ने महीनेभर की छुट्टियां ली थीं. नवदंपती शादी के बाद 15 दिनों के लिए मधुमास मनाने पहाड़ों पर चले गए.

घर लौटने पर एक दिन रमादेवी ने कहा, ‘सुलभा, पहली तारीख से तुम अपनी ड्यूटी शुरू कर लो,’ उन के आदेश से सभी चौंक गए. सभी का विचार था, वे अपनी जिद भूल चुकी होंगी, लेकिन उन का सोचना गलत निकला. ‘मांजी, आप को तकलीफ होगी. मैं सवेरे 10 बजे से शाम 6 बजे तक बाहर रहूंगी. घर का सारा काम…आप के अब आराम के दिन हैं. मैं आप की सेवा करना चाहती हूं,’ पति के सुझाए विचार सुलभा ने व्यक्त कर दिए. आलोक व पिता ने सोचा, अब रमादेवी अपनी जिद छोड़ निर्णय बदल लेंगी लेकिन जब उन्होंने उन का उत्तर सुना तो मन मार कर रह गए. वे बोलीं, ‘बहू, तुम मेरी तकलीफ की चिंता मत करो. मैं घर के सारे कार्यों के लिए नौकरानी का प्रबंध कर लूंगी. तुम बेफिक्र हो कर नौकरी करो. आजकल तो अच्छी नौकरी प्रतिष्ठा का प्रतीक है. हमारा भी तो मान बढ़ेगा.’

सभी को हथियार डालने पड़े थे. सुलभा पूर्ववत नौकरी पर जाने लगी थी. ‘सुलभा, कमाल है. इतने संपन्न घराने में ब्याह होने के बाद भी तुझे नौकरी की जरूरत है, समझ नहीं आता,’ औफिस में एक दिन वीणा ने कहा. ‘हां भई, अब तो नौकरी का चक्कर छोड़ो और अपने मियां तथा सासससुर की सेवा करो. इकलौती बहू हो,’ कल्पना ने भी मजाक किया. जब सुलभा ने उन्हें असलियत बताई तो वे हैरानी से एकदूसरे का मुंह ताकने लगीं कि अजीब सनकी सास है. लेकिन प्रत्यक्ष में वीणा बोली, ‘हाय सुलभा, तेरी सास तो बड़ी दिलेर है, जो सारी जिम्मेदारियां स्वयं उठा कर तुझे 8 घंटे के लिए आजाद कर देती है.’

‘हां, इस के तो मजे हैं…न खाना बनाना, न घर के कामों की चखचख. शान से औफिस आओ और घरवालों पर रोब जमाओ.’ लेकिन सुलभा को उन की बातों से कोई प्रसन्नता नहीं हुई. न चाहते हुए भी उसे मजबूरी में यह नौकरी करनी पड़ रही थी. शाम को थकहार कर जब वह लौटती तो दिल करता कि कुछ देर पलंग पर लेट कर आराम करे लेकिन संकोच के मारे ऐसा न कर पाती कि सास, पति क्या सोचेंगे? शादी से पहले वक्त काटने के लिए वह नौकरी करती थी. घर लौटते ही मां चाय की प्याली व कुछ नाश्ते से उस की दिनभर की थकान दूर कर देती थीं. कुछ देर आराम करने के पश्चात वह किसी भी सहेली के घर गपशप  के लिए चली जाती थी. मां ही सारी रसोई संभालती थी. लेकिन मायके तथा ससुराल के रीतिरिवाजों, कार्यप्रणाली वगैरा में काफी फर्क होता है, यहां तो 8 बजे ही रात का खाना भी खा लिया जाता था, सो रसोई में मदद करना जरूरी था.

शादी से पहले सुलभा का विचार था कि संपन्न घराने में तो उस से नौकरी करवाने का प्रश्न ही नहीं उठेगा. फिर वह अपने सारे शौक पूरे करेगी, घर को अपनी पसंद के अनुसार सजाएगी, बगीचे को संवारेगी, अपने चित्रकारी के शौक को उभारेगी. पति व सासससुर की सेवा करेगी. एक आदर्श पत्नी और बहू बन कर रहेगी. लेकिन यहां तो उसे किसी भी शौक को पूरा करने का समय ही नहीं मिलता था, फिर धीरेधीरे नौकरी की मजबूरी एक आदत सी बनती चली गई. खुशबू के जन्म के समय कंपनी की

ओर से 3 महीने की छुट्टियां मिली थीं, सुलभा का जी चाहता रहा कि मांजी कहें, ‘अब नौकरी को छोड़ो अपनी गृहस्थी को संभालो.’ लेकिन उस की आस दिल में ही रह गई, जब रमादेवी ने घोषणा की, ‘खुशबू के लिए आया का प्रबंध कर दिया है, वैसे मैं भी सारा दिन उस के पास ही रहूंगी.’ दिन सरकते गए. बेशक खुशबू  के लिए आया रखी गई थी, लेकिन उसे संभालती तो रमादेवी स्वयं ही थीं. आया तो उसे नहलाधुला, दूध पिला, घर का ऊपरी काम कर देती थी.

पोती को हर समय उठाए रमादेवी इधरउधर डोलती रहतीं. महल्ले में घूमघूम कर सब पर रोब डालतीं, ‘मेरी बहू तो हर पहली को 2 हजार रुपए मेरे हाथों में सौंप देती है. हम ने तो उसे बेटी की तरह पूरी सुखसुविधाएं और आजादी दे रखी है. आखिर बहू भी किसी की बेटी होती है. हम भी उसे क्यों न बेटी मानें?’ खुशबू के नामकरण के अवसर पर एक बड़ी पार्टी का आयोजन किया गया था, जिस में शहर के प्रतिष्ठित लोगों के साथसाथ समाज, बिरादरी, महल्ले के तथा सुलभा के सहकर्मियों को भी आमंत्रित किया गया. रमादेवी समारोह में पूरी तरह से इस प्रयास में लगी रहीं कि उन की बहू की अच्छी नौकरी से अधिकाधिक लोग प्रभावित हों और उन का रोब बढ़े. सुलभा अब नौकरीपेशा जीवन की अभ्यस्त हो गई थी, बल्कि अब उसे नौकरी करना अच्छा लगने लगा था, क्योंकि सुबहशाम खाने का पूरा काम मांजी व आया मिल कर कर लेती थीं. घर लौटने पर चाय पी कर वह खुशबू के साथ मन बहलाव करती. उसे दुलारती, तोतली भाषा में उस से बतियाती, अपनी ममता उस पर लुटाती. घर में खुशबू एक खिलौना थी, जिस से सारे सदस्य अपना मन बहलाते.

2 वर्ष पश्चात पिंकू का जन्म हुआ तो जैसे घर दोगुनी खुशियों से आलोकित हो उठा. रमादेवी तो जैसे निहाल हो उठीं. पहले पोती और अब पोता, उन की मनोकामनाएं पूर्ण हो गई थीं. जैसे संसारभर की खुशियां सिमट कर उन के दामन में आ गई हों. सुलभा के औफिस जाने पर अब वे पोते को गोद में ले कर, खुशबू की उंगली पकड़ घूमतीं. उन्हें खिलातीपिलातीं, बतियातीं. कुछ उम्र का तकाजा और कुछ शारीरिक थकान, अधिक काम की वजह से अब रमादेवी जल्दी थकने लगीं. एक दिन दोनों बच्चों को लिए सीढि़यां उतर रही थीं कि पैर फिसल गया. यह तो गनीमत रही कि बच्चों को ज्यादा चोट नहीं आई, लेकिन उस दिन से उन के घुटने का दर्द ठीक नहीं हुआ. हर तरह की दवा ली, मालिश की, सेंक किया, लेकिन दर्द बना ही रहा. अब तो बच्चों को संभालना भी मुश्किल सा हो गया. आया आती तो थी लेकिन अपनी मनमरजी से ही कार्य करती थी. कभी पिंकू भूख से बिलबिलाता तो दूध ही नदारद होता. कभी खुशबू की खिचड़ी की मांग होती और आया आगे दलिया रख छुट्टी कर जाती. बच्चे चीखतेचिल्लाते तो रमादेवी स्वयं उठ कर उन्हें खिलाना चाहतीं लेकिन घुटने के दर्द से कराह कर फिर बैठ जातीं.

जिस दिन घर के काम के लिए महरी भी न आती उस दिन तो पूरा घर ही अस्तव्यस्त हो जाता. आया तो मुश्किल से बच्चों का ही काम निबटाती थी. उस की मिन्नतें कर के थोड़ाबहुत काम वे करवा लेतीं. शेष तो सुलभा को ही करना पड़ता. रमादेवी अब अकसर सोचतीं, ‘बहू बेचारी भी क्याक्या करे. दफ्तर संभाले, बच्चों की देखरेख या नौकरी करे?’ रमादेवी ने सोचा, अगर पति या बेटा कहे अथवा बहू खुद ही नौकरी छोड़ने की बात करे तो वे फौरन तैयार हो जाएंगी. लेकिन कोई इस प्रश्न को उठाता ही नहीं. शायद उन की परीक्षा ले रहे हैं या उन की जिद, झूठी प्रतिष्ठा का परिणाम उन्हें दिखाना चाहते थे. अब उन्हें स्वयं की भूल महसूस हो रही थीं. सुलभा के बच्चों की परवरिश ठीक ढंग से नहीं हो रही है, यह भी वे समझ रही थीं. मां के होते भी बच्चे उस का पूरा स्नेह, दुलार नहीं पा रहे थे. उस के औफिस से लौटने पर पिंकू अकसर सोया हुआ मिलता. खुशबू भी आया के साथ कहीं घुमने या बगीचे में गई होती. यह तो एक तरह से अन्याय था. बच्चों के प्रति मां को अपने कर्तव्यों से विमुख कराना अपराध ही तो था.

नहीं, अब और अन्याय वे नहीं होने देंगी. उन की तानाशाही के कारण ही सभी सदस्य चुपचाप अपने मानसिक तनावों में ही जबरन घुटघुट कर जी रहे हैं. उन के सामने कोई कुछ नहीं प्रकट करता, लेकिन वे इतने समय तक कैसे नहीं समझ पाईं? अचानक औफिस से लौटती सुलभा का कुम्हलाया चेहरा आंखों के सामने घूम गया. बेचारी को व्यर्थ ही नौकरी के जंजाल में फंसा दिया. यही तो उस के हंसनेखेलने के दिन हैं, लेकिन उन्होंने उसे बेकार के मानसिक तनावों में उलझा दिया. रमादेवी ने निर्णय ले लिया कि अब वे अपनी झूठी प्रतिष्ठा, रोबदाब को तिलांजलि देंगी. शाम सुलभा के औफिस से लौटने पर कह देंगी, ‘अब अपना घर, बच्चे संभालो. नौकरी की कोई आवश्यकता नहीं है.’ उन के निर्णय से सभी को आश्चर्य तो होगा ही, साथ ही शायद सभी सोचेंगे, वे हार गई हैं, उन का निर्णय गलत था. लेकिन इस हार से उन्हें कोई अफसोस या ग्लानि नहीं होगी, क्योंकि इस हार से सभी को लाभ होगा, उन्हें खुद भी.

Latest Hindi Stories : शक की निगाह – नीरा की बेटी ने क्या किया था

 Latest Hindi Stories : शाम को औफिस से घर आया तो पत्नी का उतरा हुआ चेहरा देख कर कुछ न कुछ गड़बड़ होने का अंदेशा हो गया. बिना कुछ पूछे मैं हाथमुंह धोने के लिए बाथरूम में चला गया. वापस आया तो नीरा चाय ले कर बैठी मेरा इंतजार कर रही थी. चाय के कप के साथ ही मैं ने अपनी प्रश्नवाचक निगाह उस के चेहरे पर टिका दी. प्रश्न स्पष्ट था, ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘सामने वाले फ्लैट को रामवीर सहायजी ने स्टूडैंट्स को किराए पर दे दिया है,’’ नीरा के स्वर में झल्लाहट और रोष दोनों ही टपक रहे थे. ‘‘यह तो बहुत ही अच्छा हुआ. इतने महीने से फ्लैट खाली पड़ा हुआ था, अब चहलपहल रहेगी. वैसे भी जहां स्टूडैंट्स रहते हैं वहां चौबीसों घंटे रौनक रहती है. न कभी रात होती है न कभी दिन. एक सोता है तो दूसरा जागता है. पर तुम इतना परेशान क्यों हो रही हो?’’ मैं ने पूछा तो नीरा बिफर पड़ी, ‘‘तुम आदमियों का दिमाग तो जैसे घुटने में रहता है. आजकल के लड़के पढ़ाई के नाम पर घरों से दूर रह कर क्याक्या गुल खिलाते रहते हैं, क्या कभी सुना नहीं? मांबाप सोचते हैं उन का बेटा दिनरात एक कर के पढ़ाई में लगा होगा जबकि लड़के उन के पैसों पर गुलछर्रे उड़ाते रहते हैं.’’

‘‘मुझे समझ नहीं आ रहा नीरा, बच्चे किसी और के हैं, पैसे किसी और के हैं, पर परेशान तुम हो रही हो. आखिर वजह क्या है, साफसाफ बताओ.’’ ‘‘तुम्हारी तो, जब तक साफसाफ न बताओ तब तक, कोई बात समझ में ही नहीं आती. अपने घर में 3-3 जवान होती बेटियां हैं. हम दोनों पतिपत्नी सुबह ही औफिस निकल जाते हैं और घर के ठीक सामने जवान होते लड़के आ कर बस गए. चिंता न करूं तो क्या करूं?’’ ‘‘देखो नीरा, वे लड़के पराए हैं पर बेटियां तो अपनी हैं. उन्हें तो हम ने अच्छे संस्कार दिए हैं. फिर उन लड़कों के बारे में बिना कुछ जानेसमझे गलत धारणा बनाना भी ठीक नहीं है. अब चिंता छोड़ो और जाओ, अपना काम करो,’’ कह कर मैं पेपर पढ़ने लगा.

‘‘देखोजी, जवान लड़केलड़कियां आग और फूस के समान होते हैं. आसपास रहेंगे तो कभी भी आग पकड़ लेने का अंदेशा बना रहता है. तुम या तो सहायजी से कहो कि लड़कों के बजाय किसी परिवार वाले को घर दे दें, या तुम ही कोई दूसरा घर देखो. हमें नहीं रहना अब यहां.’’ सोते वक्त भी नीरा घर बदलने पर विचार करने की हिदायत देने लगी. मुझे आंखकान खुले रखने और लड़कों को मुंह न लगाने को कह कर नीरा तो सो गई पर मैं सोचने लगा कि क्या सचमुच बात इतनी चिंता करने लायक है जितनी नीरा कर रही है. यह सच है कि आजकल अच्छेबुरे दोनों तरह के लोग होते हैं पर बिना किसी से मिले, समझे उस के बारे में यह धारणा बना लेना कि वे बुरे ही हैं और यहां पढ़ने नहीं गुलछर्रे उड़ाने आए हैं, सरासर गलत है. फिर वे भले ही पराए हैं पर हमें अपनी बेटियों पर तो विश्वास करना ही चाहिए. आखिर उन्हें तो हम ने ही संस्कार दिए हैं.

फिर भी मैं कल उन लड़कों से मिलूंगा और निर्णय पर पहुंचूंगा कि हमें आगे उन के साथ किस तरह का संबंध बना कर रखना है. दूसरे दिन रविवार था, मैं ने जानबूझ कर बाहर का दरवाजा खुला छोड़ दिया और वहीं कुरसी डाल कर पेपर पढ़ने बैठ गया. उन लड़कों को अपने काम से अंदरबाहर आतेजाते देखता रहा. इस दौरान उन्होंने एक बार भी अनायास घर में ताकझांक करने की कोशिश नहीं की. जब मेरी नजर एक लड़के से मिली तो उस ने ‘अंकल नमस्ते’ कह कर मेरा अभिवादन किया, तो मैं ने भी मौका हाथ से जाने न दिया, ‘‘अरे बच्चो आओ, हमारे साथ एकएक कप चाय पीओ, इसी बहाने हम लोग एकदूसरे के बारे में भी जानसमझ लें.’’ मैं ने नीरा से पूछे बगैर ही उन लड़कों को चाय पीने के लिए बुला लिया.

मुझे पता था नीरा को यह बिलकुल नागवार गुजरा होगा कि मैं ने उन लड़कों को घर में ही बुला लिया. इसीलिए मैं ने नीरा को कोई औपचारिक सूचना देने के बजाय चुपचाप पेपर पढ़ते रहने में ही अपनी भलाई समझी. इस बात का विश्वास भी था कि लड़कों के आने पर चाय के साथ कुछ नाश्ता भी ले कर अपनेआप ही आ जाएगी नीरा. हुआ भी वही. एकएक कर के पांचों लड़के अंकल नमस्ते कहते हुए आ कर बैठ गए. थोड़ी ही देर में नीरा भी चाय की ट्रे ले कर आ गई. मुझे आश्चर्य भी हुआ देख कर कि सुबह के नाश्ते में बनाया हुआ पोहा पांचों लड़कों के बीच बांट दिया था नीरा ने. हम ने उन से बातोंबातों में उन के पूरे खानदान की जानकारी हासिल कर ली. और होनीअनहोनी पर तुरंत संपर्क कर सकूं इस का हवाला दे कर मैं ने उन पांचों के घरों का पता और फोन नंबर भी नोट कर लिए.

उसी समय उन के सामने ही एकएक के घर फोन मिला कर मैं ने बात भी कर ली. मेरे इस आश्वासन से कि मैं उन के बच्चों का एक अभिभावक की तरह खयाल रखूंगा, वे लोग बहुत ही आभारी होने लगे. सभी से बात कर के मैं पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि बच्चे संस्कारी व सुशिक्षित घरों के हैं और यहां पर सचमुच प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने ही आए हैं. कुछ आश्वस्त तो नीरा भी हुई पर पता नहीं पिता की तुलना में मां बच्चों के प्रति ज्यादा शंकालु होती हैं या पिता से ज्यादा बच्चों को प्यार करती हैं कि हर वक्त उन की सुरक्षा को ले कर चिंतित रहती हैं. नीरा ने बेटियों पर कई तरह की बंदिशें लगा डालीं, जैसे जोरजोर से ठहाके न लगाओ, अनायास बालकनी में न खड़ी हो, बाहर का सिर्फ जाली वाला ही नहीं लकड़ी वाला दरवाजा भी हमेशा बंद रखा करो आदि.

समय के साथसाथ सबकुछ सामान्य ढंग से चलता रहा. लड़के घर पर कम ही रहते. सारा दिन कोचिंग सैंटर में होते. घर आते तो सो जाते और फिर रात को जग कर पढ़ाई करते. हमारे जीवन में तथा हमारी दिनचर्या में उन के होने, न होने का कोई फर्क नहीं पड़ा. हां, कुछ तकनीकी बातों जैसे इंटरनैट, मोबाइल आदि की खास समस्याओं के लिए हम उन पर निर्भर हो गए थे और वे भी आम पड़ोसियों की तरह कभीकभार चायपत्ती, चीनी या 1-2 आलूटमाटर के लेनदेन से ज्यादा और कुछ दखलंदाजी नहीं करते. कल को हमारा छोटा सा बेटा बड़ा होगा और वह भी कहीं न कहीं पढ़ने या नौकरी करने बाहर जाएगा ही, तब कोई उस के साथ अच्छी तरह पेश आए, हम यही चाहेंगे, इसीलिए मैं उन लड़कों के साथ और भी अच्छी तरह व्यवहार करता.

मेरे अलावा नीरा की भी शंका उन लड़कों के प्रति कम हो ही रही थी कि एक दिन रात के 2 बजे घर में कुछ हलचल सी सुनाई दी तो मैं और नीरा घबरा कर अपने कमरे से बाहर निकले. देखा तो हमारी बड़ी और छोटी बेटियां घबराई हुई सी खड़ी थीं. बाहर का दरवाजा खुला था और सामने वाले फ्लैट में भी कुछ असामान्य सी हलचल दिख रही थी. ‘‘क्या हुआ? तुम दोनों इतनी घबराई हुई क्यों हो और स्नेहा और सौरभ कहां हैं?’’ हम दोनों ने एकसाथ ही सारे सवाल पूछ डाले. ‘‘मां, पापा, सौरभ तो सो रहा है पर स्नेहा घर में नहीं है. मैं अभी वाशरूम जाने के लिए उठी तो देखा दरवाजा खुला है, और स्नेहा नहीं है.’’ हमारे तो पैरों तले से जमीन ही खिसक गई, ‘‘दिखा ही दिया इन शरीफजादों ने अपना रंग,’’ कह कर नीरा सोफे पर निढाल पड़ गई. मैं दौड़ता हुआ बाहर की ओर भागा. लड़कों के फ्लैट का दरवाजा भी खुला हुआ था. मैं अपने वश में नहीं रह गया था. चीखते हुए मैं उन के घर में घुस गया. पांचों में से 3 लड़के सामने ही खड़े थे और वे खुद भी परेशान लग रहे थे. ‘‘विनय और राहुल कहां हैं?’’ मैं ने चीखते हुए पूछा. ‘‘जी, अंकल, वे अभीअभी गए हैं, बस आते ही होंगे,’’ वे तीनों एकसाथ बोल पड़े. ‘‘कहां ले कर गए हैं वे मेरी बेटी को? मुझे जल्दी बताओ वरना मैं तुम सब को पुलिस के हवाले कर दूंगा,’’ मैं अपना आपा खोता जा रहा था. ‘‘अंकल, वे स्नेहा को ले कर नहीं गए हैं, आप को गलतफहमी हो रही है.’’ ‘‘गलतफहमी हो रही है? अगर वे स्नेहा को ले कर नहीं गए हैं तो तुम्हें कैसे पता कि स्नेहा कहीं गई है? हम ने तो नहीं बताया तुम्हें कि स्नेहा घर में नहीं है.’’

जिन लड़कों को मैं अपनी पत्नी की इच्छा के विरुद्ध जा कर मानसम्मान और स्नेह दे रहा था उन्होंने आज मेरे मुंह पर ऐसी कालिख पोत दी, सोच कर मेरा आत्मनियंत्रण समाप्त होता गया और मैं ने पास पड़ा बैट उठा कर उन के ऊपर बरसाना शुरू कर दिया. अचानक उन लड़कों के तेवर बदल गए. उन्होंने मेरे हाथ से बैट छीन कर फेंक दिया. ‘‘अंकल, अभी तक हम आप के आदरवश चुप थे. आप के सम्मान की खातिर हमारा दोस्त अपनी जान की परवा किए बिना ही इस समय यहां से गया हुआ है और आप उस पर ही शक कर रहे हैं? हमें ही दोषी ठहरा रहे हैं? आंटी ने हमेशा हमें ही शक की निगाह से देखा पर कभी अपनी बेटियों पर भी निगरानी रखी? अगर निगरानी रखी होती तो यह दिन नहीं आता. स्नेहा विनय या राहुल के साथ नहीं भागी है, बल्कि किसी और के साथ गई है, पर आप चिंता न कीजिए. विनय और राहुल उसे वापस ले कर आते ही होंगे.’’

उन की बात सुन कर मैं असमंजस में पड़ गया कि ये सच बोल रहे हैं या झूठ. पर तभी पीछे से नीरा दहाड़ी, ‘‘इन की झूठी बातों में मत आइए. ये सब इन की साजिश का हिस्सा है. ये हमें ऐसे ही उलझा कर तब तक रखना चाहते हैं जब तक वेदोनों स्नेहा को ले कर दूर न निकल जाएं. आप तुरंत पुलिस को फोन लगाइए वरना हम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएंगे,’’ नीरा जोरजोर रोए जा रही थी. ‘‘प्लीज अंकल, आप हमारी बात पर यकीन कीजिए. पुलिस को बुला लेंगे तो बात सभी को पता चल जाएगी. स्नेहा तो बदनाम होगी ही, आप सब का भी घर से निकलना मुश्किल हो जाएगा. आप बस थोड़ी देर हमारी बात का यकीन कीजिए. अगर 10 मिनट तक वे स्नेहा को ले कर वापस नहीं आ जाते हैं तो आप को जो दिल आए करिएगा. पर अभी बस हमारी इस बात का यकीन करिए कि राहुल और विनय स्नेहा को भगा कर नहीं ले गए हैं बल्कि उसे किसी और के साथ इस समय जाता देख वापस ले आने के लिए गए हैं.’’

हालांकि मेरी सोचनेसमझने की शक्ति पूरी तरह खत्म हो चुकी थी फिर भी उन लड़कों की बात पर यकीन कर कुछ देर इंतजार कर लेने में ही मैं ने भलाई समझी. पुलिस के आने से सिवा बदनामी और बात के बतंगड़ के अलावा और कुछ हासिल नहीं होना था. मैं घड़ी देखता, चहलकदमी करने लगा.

नीरा और बच्चे अंदरबाहर करते रहे. ‘‘अंकल, आप सब को पता है कि हम सब रात को जग कर पढ़ाई करते हैं. पिछले कई दिनों से हम स्नेहा को अपनी बालकनी में धीरेधीरे फोन पर बात करते हुए देखते थे पर हम ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. ‘‘इधर 2-3 दिनों से 2 लड़कों को रात को बिल्ंिडग के आसपास चक्कर लगाते देख हमें कुछ शक हो रहा था. हम आप से बात करें या न करें, और आप हमारी बातों का यकीन करेंगे या नहीं, हम सब आपस में यह विचारविमर्श कर ही रहे थे कि अचानक जब विनय चाय पीने के लिए बालकनी में निकला तो उसे नीचे 2 लड़कों के साथ एक लड़की दिखी. उस ने ध्यान से देखा तो वह स्नेहा ही लगी. विनय चाय का कप अंदर रख कर तुरंत उन के पीछे भागा. जाते वक्त सिर्फ इतना ही बोला, ‘शायद स्नेहा कहीं जा रही है, मैं उसे ले कर आता हूं,’ उसे अकेला जाता देख राहुल भी पीछेपीछे भागा. चूंकि सबकुछ अस्पष्ट था, वह स्नेहा ही है या कोई और थी? यह भी पक्का नहीं था, इसलिए हम आप को जगा कर क्या बताएं, बताएं या नहीं, यह सोच ही रहे थे कि आप सब स्वयं जग गए.

‘‘अंकल, आप लोगों ने इस अनजान शहर में हमें जितना स्नेह और संरक्षण दिया है उस के बदले में हमें अपनी जान की बाजी लगा कर भी आप लोगों के सम्मान की रक्षा करनी पड़े तो कम है. हमें पता है कि स्नेहा का कोई बड़ा भाई नहीं है, ऐसे में बड़े भाई का कर्तव्य हमें ही निभाना है.’’ उन की बातें पूरी भी नहीं हुई थीं कि राहुल और विनय वापस आ गए. उन के साथ डरीसहमी सी स्नेहा भी खड़ी थी. विनय ने उस का हाथ जोर से पकड़ रखा था, ‘‘अंकल, स्नेहा किसी सड़कछाप के साथ जा रही थी कहीं, मैं ने आज इसे न जाने कितने चांटे मारे हैं. मुझे माफ कर दीजिएगा. मैं अपने पर नियंत्रण न रख सका. जो पिता अनजान, अपरिचित बच्चों पर इतना प्यार न्योछावर करता हो उस पिता की बेटी ने उन के मुंह पर कालिख पोतने से पहले जरा भी न सोचा. बस, यही सोच कर मैं अपना आपा खो बैठा था. मुझे अफसोस है तो बस इस बात का कि इस की हरकतों पर शक होते ही मैं ने एक बड़े भाई की भूमिका अदा करने में देर कर दी. अगर मैं ने उसी वक्त इसे थप्पड़ मार दिया होता तो आज न यह इतनी बड़ी गलती करती और न आप लोगों को शर्मिंदा करती.’’

उन लड़कों को धन्यवाद, शुक्रिया कहने के लिए न तो हमारे पास शब्द थे न ही जबान. हम स्नेहा को सहीसलामत ले कर घर में आ गए. दिनचर्या धीरेधीरे फिर सामान्य होने लगी. सबकुछ पूर्ववत चलने लगा. बदलाव बस इतना आया कि नीरा अब उन लड़कों के बजाय अपनी बेटियों को शक की निगाह से देखने लगी. पहले उन लड़कों से सामना हो, वह नहीं चाहती थी और अब उन का सामना कैसे करेगी, यह सोच कर परेशान रहने लगी.

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