फेस्टिव सीजन के लिए परफेक्ट है ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ की ‘नई कीर्ति’ के लुक

सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ (Yeh Rishta Kya kehlata hai) में इन दिनों ‘कार्तिक’ और ‘नायरा’ के साथ-साथ ‘कीर्ति’ के ट्रैक पर भी जोर दिया जा रहा है. ‘कीर्ति’ के एक्स हस्बैंड के साथ नया ट्रैक फैंस को पसंद आ रहा है. वहीं मोहेना कुमारी की जगह लेने वाली एक्ट्रेस हर्षा खंडेपरकर (Harsha khandeparkar) भी फैंस को काफी पसंद आ रही हैं. कई सीरियलों में अपनी एक्टिंग से फैंस का दिल जीत चुकीं एक्ट्रेस हर्षा इन दिनों ‘कीर्ति’ के रोल में खुद को ढालने में लगी हुई हैं. लेकिन आज हम हर्षा की एक्टिंग या शो की नहीं बल्कि उनके फैशन की करेंगे.

‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में वह इन दिनों इंडियन लुक में नजर आ रही हैं, जो फेस्टिव सीजन के लिए परफेक्ट लुक है. आइए आपको दिखाते हैं ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ की ‘नई कीर्ति’ के फेस्टिव लुक की झलक….

1. शरारा लुक है परफेक्ट

इन दिनों शरारा लुक लोगों के बीच काफी पौपुलर है. बौलीवुड से लेकर टीवी एक्ट्रेसेस अक्सर शरारा फैशन कैरी करते हुए नजर आते हैं. हाल ही में हर्षा फ्लावर प्रिंट वाले शरारा लुक में नजर आई, जिसे आप फेस्टिव सीजन में आसानी से कैरी कर सकती हैं. इसके साथ आप मल्टी कलर ज्वैलरी कैरी कर सकती हैं.

 

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2. लहंगा है परफेक्ट

अगर आप लहंगे की शौकीन हैं तो हर्षा का ये लुक ट्राय करना ना भूलें, पीले कलर के सिंपल लहंगे के के साथ हैवी दुपट्टा और ग्रीन कलर के कौम्बिनेशन वाली ज्वैलरी आपके लिए परफेक्ट लुक है, जिसे आप फेस्टिव हो या वेडिंग हर सीजन में ट्राय कर सकती हैं.

3. प्लाजो लुक है परफेक्ट 

आजकल हर कोई कुर्ते के साथ प्लाजो कैरी कर रहा है. अगर आप भी प्लाजो पहनने की शौकीन हैं और कंफरटेबल लुक चाहती हैं तो हर्षा का ये शरारा लुक ट्राय करें. हैवी कुर्ते के साथ प्लेन प्लाजो लुक आपके लिए फेस्टिव सीजन में परफेक्ट औप्शन है.

4. हैवी शरारा के साथ सिंपल कुर्ता 

 

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अगर आप वेडिंग सीजन में कुछ नया ट्राय करना चाहती हैं तो हैवी शरारा के साथ प्लेन कुर्ता कौम्बिनेशन ट्राय करें. ये आपके लुक के लिए परफेक्ट कौम्बिनेशन है.

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5. गाउन है सभी का फेवरेट

वेडिंग हो फेस्टिव सीजन गाउन हर किसी का फेवरेट औप्शन होता है. अगर आप भी अपने लुक पर चार चांद लगाना चाहते हैं तो हैवी गाउन के साथ सिंपल ज्वैलरी कौम्बिनेशन ट्राय करें.

किस हद तक करें मदद

एक सवाल हमेशा चिंतन करने वालों को परेशान करता है कि  क्या इंसान मूलतया अच्छा प्राणी है जो परिवेश और परिस्थिति के वशीभूत हो, बुरा हो जाता है, या इंसान मूलतया बुरा प्राणी है जो मजबूरीवश अच्छाई का चोला धारण करता है? आखिर सच क्या है?

येल यूनिवर्सिटी की अगर मानें तो व्यक्ति मूलतया अच्छा प्राणी है जिस पर कई कारकों के काम करने से उस में परिवर्तन नजर आता है, जो कभी अच्छा तो कभी बुरा भी हो सकता है.

निभा के 2 बेटे आपस में किसी खिलौने के लिए लड़ रहे थे. टीवी पर एक कार्टून शो चल रहा था. शो में एक बच्चा एक डरावना कार्टून कैरेक्टर से बचने के लिए पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करता है, मगर बारबार गिरने को होता है. दोनों बच्चों की नजर जब उस पर पड़ी तो दोनों ही बच्चे मना रहे थे कि वह किसी तरह बच जाए. उन का खिलौने पर से ध्यान हट गया था. यह छोटा सा उदाहरण हम ने बच्चों का इसलिए दिया कि बचपना इंसान का शुरुआती दौर है और बच्चे अपने मूल स्वभाव में हैं. बच्चों पर किसी भी तरह के परिवेश और परिस्थितिजन्य प्रभाव के पहले की, यह विवेचना है.

जैसेजैसे बच्चा बड़ा होता जाता है उस में अपने आसपास के लोगों और परिस्थितियों का बड़ा प्रभाव पड़ने लगता है. इस प्रभाव के रहते हुए भी कई लोग अच्छे स्वरूप में रहते हैं, और दूसरों की सेवा व सहायता के लिए हमेशा तत्पर दिखते हैं. इन्हीं सेवाभावी तत्पर लोगों की जिंदगी में जब झांका गया तो सामने आया कि ये अपनी सेवा और सहायता के बाद ज्यादातर सेवा प्राप्त करने वालों से असंतुष्ट और दुखी थे. अधिकांश लोगों ने इन की सेवा और सहायता का नाजायज फायदा उठाया और इन का शोषण किया. कइयों ने इन के किए का एहसान मानना या जताना जरूरी नहीं समझा.

ऐसे में सेवा और निस्वार्थ सहायता करने वालों के लिए  भला क्या प्रेरणा रह जाती है. शांभवी और उस के पति संभव जिस कालोनी में रहते थे वह काफी समृद्ध लोगों का इलाका था. संभव को नाइट ड्यूटी करनी पड़ती और शांभवी घर पर ट्यूशन पढ़ाती जिस का समय सुबह 6 से 9 बजे का होता. पड़ोस में 75 साल के एक अंकल रहते थे. वे अकेले ही रहते थे.

एक सुबह उन की बाई शांभवी के पास खबर ले कर आई कि अंकल दरवाजा नहीं खोल रहे. चूंकि शांभवी पहले से ही उन का ध्यान रखा करती थी. वह अपने ट्यूशन के बच्चों की छुट्टी कर जल्द अंकल के घर गई. उस के पास अंकल के घर की एक चाबी रहती थी. उस से उस ने दरवाजा खोला. अंकल को पैरालिटिक हाल में पाया. संभव नाइट ड्यूटी कर के सो रहा था. उस का फोन बंद था. दौड़ते हुए वह घर आई. संभव को उठाया और अंकल को अच्छे अस्पताल में भरती कराया गया. छोटा बेटा दूर रहता था पर वह भी आ गया.

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छोटा बेटा तीसरे दिन से संभव को फोन कर के बारबार पैसे की किल्लत के बारे में बताने लगा. जबकि अंकल काफी समृद्ध थे. दोनों बेटे अच्छे जौब में होने के बावजूद अंकल ने अपना पुराना बंगला बेच दोनों बेटों को 40-40 लाख रुपए नकद दिए थे. उन की अपनी जमापूंजी, पैंशन सब थी, जिस में छोटा बेटा भी हिस्सेदार था. लड़के का कहना था कि पापा को डिस्चार्ज कराते वक्त फिक्स्ड डिपौजिट तुड़वानी पड़ेगी, जिस में नुकसान हो जाएगा. संभव अभी 70 हजार रुपए दे दे, वह बाद में वापस कर देगा.

छोटे बेटे ने अपनी ऐयाशी के लिए कई जगहों से उधार ले रखा था. एक जगह तो उस की इसी वजह से नौकरी भी चली गई थी. अब इन दोनों के लिए उसे न मना करते बनता, न इतने रुपए देते. अंकल का दिमाग सही ढंग से काम नहीं कर रहा था. दोनों लड़के अव्वल दरजे के धूर्त और स्वार्थी.

संभव अपराधभावना से घिर रहा था. यद्यपि संभव के लिए अभी इतने रुपए निकाल देना आसान न था, और दोनों बेटे इस भार को उठाने में सक्षम भी थे. इन का छोटा बेटा धर्म और आस्था के नाम पर कुछ महीने पहले ही नामी धार्मिक प्रतिष्ठानों में दानधर्म कर के काफी आशीष बटोर लाया था.

संभव को इस दुविधा से निकालने के लिए आखिर शांभवी को कड़ा फैसला लेना ही पड़ा. अंकल जब अपने घर आए और आया के सहारे रहने लगे, शांभवी उन की देखभाल करने जाती जरूर लेकिन उन के बेटों का फोन नंबर ब्लौक कर दिया.

आइए, कुछ मुख्य बिंदुओं को समझें ताकि किसी की सहायता कर हमें परेशानी न उठानी पड़े :

सेवा और दान में अंतर :   मनुष्य भौतिक वस्तुओं का दान कुछ न कुछ प्राप्ति की ही आशा में करता है, चाहे वह किसी गुरु महाराज या शक्तिशाली व्यक्ति की कृपा हो, पुण्य की आशा हो या अपने कर्मों को सुधार कर जिंदगी में सुख हासिल करने की कामना हो. अकसर धार्मिक दान ऐसे ही होते हैं.

धार्मिक दान प्राप्त करने वाले किसी संस्थान या व्यक्ति में भी अहंकार होता है. वह कृपा या आशीष बरसा कर दान देने वाले को धन्य कर के उच्च आसन पर पहुंचने की मानसिकता से ग्रस्त होते हैं.

दान देने वाला भी कृपा पाने का हक जताने में पीछे नहीं रहता. वहीं, दान लेने वाला अपने आप को कमतर सिद्ध होने से बचाने के लिए आशीष या कृपा देने का स्वांग जरूर रचता है.

मदद होती है निस्वार्थ  :  जब इंसान के अंदर प्रेमपूर्णभाव का अतिरेक होता है, वह स्वयं को छोड़ जरूरतमंद के बारे में सोचता है. कैसे उसे विपत्ति से निकाला जाए, कैसे उस की समस्या का समाधान किया जाए, ऐसे इंसान को यही चिंता रहती है. मदद से उसे कितना फायदा होगा या क्या नुकसान, यह विचार करने से पहले ही वह मदद के लिए हाथ बढ़ा चुका होता है.

नीरा को ही ले लें. वह मददगार स्वभाव की है, पर दिखावा नहीं करती. उस के औफिस के चपरासी की बीमारी से जब मौत हो गई तो वह उस की पत्नी व उस के बच्चे से मिलने उन के घर गई. उन की बुरी स्थिति देख वह अपने घर से अपने बच्चे की ड्रैस, पढ़ाई की सारी सामग्री, उस की जरूरत के कई सामान उसे दे आई. हर महीने बच्चे की स्कूल फीस भी देने लगी. यह सब देख उस स्त्री का शराबी भाई नीरा के प्रेमपूर्ण आचरण का फायदा उठाने लगा. वह जबतब उस के औफिस आ जाता और किसी न किसी बहाने उस से पैसे की मांग करता. वह ऊब कर जब उसे फटकारने लगी, तो वह औफिस से नीरा के घर लौटते वक्त उस का पीछा करने लगा. उसे अनापशनाप धमकाने लगा.  तंग आ कर नीरा ने चपरासी की बीवी से संपर्क साधना तो छोड़ा ही, घर में भी अपनी परेशानी बता कर अलग ही परेशान हो गई.

पति और सास ने उसे समझाइश दी कि दान ही करना था तो हमारे गुरुजी के आश्रम में दान करती. वे हम से खुश होते. हमें आशीष देते. हम से बताती तो तुम्हारे उस बच्चे को दे रही स्कूल फीस में हम भी कुछ मिला कर गुरुजी के आश्रम के बच्चों के लिए तोहफे ले लेते. इस से तुम्हारे पति को गुरुजी के आश्रम के रैनोवेशन का ठेका भी मिल जाता. अब समझने वाली बात यह है कि जब जरूरत चपरासी की बीवी को थी तो वह करोड़पति के आश्रम में दान कर के उस स्त्री की मदद कैसे करती जिसे उस वक्त मदद की दरकार थी. नीरा को भी क्या शांति मिलती? बिलकुल नहीं. हां, घरवालों को उस दान के बदले व्यक्तिगत फायदा जरूर हो जाता. गुरु की नजर में चढ़ कर विशेष कृपापात्र बनने की इच्छा और इस के लिए मौके टटोलना, दान देना व इस का फायदा उठाना, एक निस्वार्थ सहायता से काफी अलग है.

क्यों लोग किसी विशेष समूह का हिस्सा बन दान करते हैं :  धार्मिक समूह का हिस्सा बन दान करने के पीछे व्यक्ति का शक्तिशाली संस्थान या व्यक्ति से कृपालाभ की आंकाक्षा प्रधान होती है. समाज में और लोगों के सामने उन की धाक बनी रहे, जरूरत के वक्त उन का शक्तिपरीक्षण काम आ सके.

ऐसे संस्थान या गुरु दान और कृपा का विशेष संयोग पैदा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने से जोड़े रखते हैं ताकि वे स्वयं विलासितापूर्ण जीवन जिएं, ठाठ और दर्प से जिएं तथा लोगों की व्यक्तिगत सोच पर अपनी विशेष सोच व चिंतन को थोप सकें और समाज के पंख फैलाते दृष्टिकोणों को अपनी दकियानूसी सोचों के सीखचों में रोक सकें. मदद करें दूसरों की लेकिन स्वयं की मदद करते हुए :  ज्यादातर लोग एहसान ले कर या तो आसानी से भुला देते हैं, या मदद करने वाले का ही तरहतरह से शोषण करने लगते हैं.

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पार्थ जितना पढ़ने में अच्छा था उतना ही मददगार, सरल स्वभाव का. उस के छुटपन का दोस्त रंजन यह भलीभांति समझ चुका था. ऐसे तो पार्थ पढ़ाई आदि में उस की मदद किया ही करता, मगर तब भी वह रंजन के साथ खड़ा था जब रंजन के पिता को दिल का दौरा पड़ा. वह अपने सैमिस्टर के एग्जाम छोड़, अस्पताल की दौड़भाग में लगा रहा, उन्हें खून दिया, उन का जीवन बचाया. इधर, रंजन ने यारीदोस्ती के नाम पर पार्थ की नई बाइक को पथरीली, ऊबड़खाबड़ जमीन पर डेढ़ सौ किलोमीटर तक ऐसा दौड़ाया कि पार्थ को उस बाइक को ठीक करवाने में ढाई हजार रुपए खर्चने पड़े.

सीधासादा पार्थ रंजन से कह तो कुछ नहीं पाया लेकिन घरवालों ने पार्थ को ऐसी खरीखोटी सुनाई कि मदद के नाम पर उस की पूरी परिभाषा ही बदल गई.

मदद तो करें मगर मौकापरस्तों को पहचानें भी :  जीवन में सिर्फ स्वार्थी और आत्मकेंद्रित हो कर नहीं चला जा सकता. हम सामाजिक प्राणी हैं. हम दूसरों की मदद जरूर करें, वह भी इसलिए नहीं कि आगे हमें काम पड़ सकता है, बल्कि इसलिए कि वाकई मनुष्य स्वभाव से अच्छा प्राणी है. हां, मदद करते वक्त खुद का उन के द्वारा नाजायज फायदा न उठने दें. मदद दें, तो थोड़ी दूरी भी रखें और कुछ औपचारिकताएं भी. इस से सामने वाला कितना भी बेशर्म क्यों न हो, उसे अपनी सीमा का एहसास होता रहेगा. मदद करते वक्त अपनी क्षमता से बाहर न जाएं.

मदद लेने वाले के लिए गुजारिश

मदद की आवश्यकता किसी को भी पड़ सकती है. हम जब मदद लें तो सहायता करने वाले व्यक्ति का विशेष खयाल रखें, ताकि उसे कोई असुविधा न हो. जहां तक हो सके, कम से कम मदद लें और ज्यादा से ज्यादा एहसान मानें.  कभी किसी से सहायता की आवश्यकता पड़ ही जाए, तो लें अवश्य, लेकिन आप भी दूसरों की मदद को तत्पर रहें.

मदद लेना और मदद देना सामाजिक प्रक्रिया है. हमारे संतुलित और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार से हमारे सामाजिक रिश्ते मधुर और मजबूत बनते हैं. इस का खयाल अवश्य रखें.

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पिछले 2-3 वर्षों से मुझे कब्ज की शिकायत है?

सवाल-

मेरी उम्र 36 वर्ष है. मैं  सरकारी कार्यालय में क्लर्क हूं. पिछले 2-3 वर्षों से मुझे कब्ज की शिकायत है. बताएं क्या करूं?

जवाब

लगातार लंबे समय तक बैठे रहने से उदर गुहा दब जाती है, जिस से पाचन क्रिया धीमी पड़ जाता है और कब्ज का कारण बन जाती है. जो लोग रोज घंटों बैठे रहते हैं उन में आंतों की मूवमैंट भी नहीं होती है, जिस से आंतें अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पाती हैं. आंतों में पचे हुए भोजन की गति सामान्य न होना कब्ज का कारण बन जाता है. आप अपनी जौब तो बदल नहीं सकते, लेकिन अपनी आदतों में बदलाव जरूर ला सकते हैं. जंक

फू ड के बजाय संतुलित, पोषक और हलके भोजन का सेवन करें. 7-8 घंटे की नींद लें. खाने और सोने का समय निर्धारित कर लें, क्योंकि आप क्या खाते हैं और कितना सोते हैं, उस के साथ यह भी महत्त्वपूर्ण है कि आप कब खाते और सोते हैं. सप्ताह में कम से कम 150 मिनट अपना मनपसंद वर्कआउट करें. अनावश्यक तनाव न पालें.

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ज्यादा मसालेदार भोजन के सेवन से या ज्यादा समय तक भूखे रहने की वजह से अक्सर ही एसिडिटी की समस्या हो जाती है. एसिडिटी होने वजह से कई बार हम दवाइयों का सेवन करने लगते हैं और धीरे धीरे इसकी आदत सी पड़ जाती है. इन दवाईयों का हमेशा इस्तेमाल हमारी सेहत पर असर जालता है. ऐसे में बार-बार दवाइयों के सेवन से बेहतर है कि आप कुछ घरेलू नुस्खों का इस्तेमाल कर एसिडिटी से निजात पाएं. आज हम आपको कुछ ऐसे ही घरेलू उपायों के बारे में बताने वाले हैं.

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‘‘फिटनैस से आत्मविश्वास बढ़ता है’’: पद्मप्रिया

पद्मप्रिया

सैकंड रनरअप, मिसेज इंडिया यूनिवर्स

कहते हैं न कि जहां चाह वहां राह यानी जिस ने सच्चे मन व लगन से जो पाने की इच्छा रखी हो वह पूरी हो जाती है. अपनी मेहनत के दम पर पद्मप्रिया ने ‘मिसेस इंडिया यूनिवर्स’ प्रतियोगिता में सैकंड रनरअप का खिताब अपने नाम कर के न सिर्फ अपने परिवार का बल्कि अपने राज्य का भी नाम रोशन किया है. इस दौरान उन के सामने मुश्किलें भी आईं लेकिन उन के जनून ने उन्हें हारने नहीं दिया और उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया.

गृहशोभा का साथ आया काम

पद्मप्रिया का जन्म कर्नाटक के बैंगलुरु में हुआ. वहीं वे बड़ी हुईं और उन्होंने अपनी पढ़ाई की. उन के पिता डाक्टर हैं और मां होममेकर, जिन की प्रेरणा पद्मप्रिया के बहुत काम आई. उन के हौसले को पंख तब और मिले जब उन्होंने गृहशोभा का साथ पकड़ा. वे हाई स्कूल के दिनों से ही इस पत्रिका की फैन रही हैं. वे इस पत्रिका में प्रकाशित होने वाले फैशन पेजेस से बहुत प्रभावित थीं और मन ही मन ये ठान चुकीं थीं कि एक दिन वे भी इस में छपने वाली मौडल्स की तरह ही बनेंगी ताकि वे भी अपनी खास पहचान बना सकें.

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पहले बड़े मौके ने बढ़ाया हौसला

स्कूल के दिनों से ही मीडिया में नाम पाने की चाह के कारण जब उन्होंने ‘सिनेमा में महिला कलाकारों की जरूरत वाले विज्ञापन को देखा तो उन्होंने इस के लिए मशहूर कन्नड़ निर्देशक एन चंद्रशेखरजी से हीरोइन के रोल के लिए संपर्क किया. वे स्क्रीन टैस्ट में पास भी हो गईं. लेकिन निर्देशक की शर्त थी कि उन्हें शूट के लिए फोरेन लोकेशंस पर जाना पड़ेगा. इतने बड़े मौके को जिसे वे हाथ से नहीं जाने देना चाहती थीं, पेरैंट्स भी इस के लिए राजी हो गए. लेकिन जब सगेसंबंधियों ने सलाह दी कि अभी से फिल्म लाइन में जाने से हायर स्टडी चौपट हो सकती है तब पेरैंट्स ने उन की बात को तवज्जो देते हुए उन्हें इस औफर को ठुकराने को कहा और हायर स्टडी की खातिर उन्हें इस औफर को मना करना पड़ा. लेकिन मन में विश्वास था कि एक दिन कामयाबी जरूर मिलेगी.

वूमन टी बैग की तरह

पद्मप्रिया का मानना है, ‘‘वीमेन टी बैग की तरह होती है. वैवाहिक जीवन में बंधना मेरे लिए आसान न था, क्योंकि मैं मल्टी नैशनल कंपनी में सौटवेयर डैवलपर भी थी. लेकिन परिवार के सहयोग के कारण मैं अपनी प्रोफैशनल और पर्सनल लाइफ में बैलेंस बना पाई. अपनी फैमिली कंप्लीट होने के बाद मैं फैशन इंडस्ट्री के प्रति और ऐक्टिव हो गई, जिस कारण मु झे मुकाम हासिल करने में आसानी हुई.

छोटी शुरुवात ने दिलाई बड़ी पहचान

‘‘मैं धीरेधीरे लोकल फैशन शोज में भाग लेने के साथसाथ टीवी सीरियल्स और स्टेज परफौरर्मैंस भी देने लगी. फिर एक दिन मेरी नजर उस विज्ञापन पर पड़ी, जिस में विवाहित महिलाओं के लिए ‘मिसेस इंडिया यूनिवर्स फैशन शो’ में भाग लेने का मौका था. मन में प्रबल इच्छा थी कि इस प्रतियोगिता में भाग लूं और फि र मैं प्रथम चरण के औनलाइन औडिशन में सभी प्रश्नों के उत्तर देने में सफल हो गई. मेरी इसी सफलता ने मु झे गोवा फैशन शो में भाग लेने का मौका दिया.

मन में उत्साह भी और डर भी

‘‘यह प्रतियोगिता गोवा में आयोजित हुई. सभी चयनित प्रतिभागियों को 10 दिन पहले ही आयोजनस्थल पर पहुंचना था. सभी राज्यों से

1-1 प्रतियोगी था. 10 दिनों तक 2 अलगअलल राज्यों के प्रतियोगियों को एक रूम में ही रहना था और यही सब से बड़ी परीक्षा थी कि आपस में किस तरह तालमेल बैठा कर रहें. रोज हमें नई थीम दी जाती थी, जिसे हमें तैयार करना होता था. सैल्फ मेकमअप, ड्रैसिंग मेकओवर, विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों पर अलगअलग तरह से अपने हुनर का प्रदर्शन करना हमारे लिए एक बड़ा चैलेंज था.

‘‘आखिरी दिन यानी 10वां दिन हमारे फाइनल प्रदर्शन का दिन था. इस राउंड में 5-6 प्रतिभागी ही पहुंचे थे, जिन्हें अब सब से मुश्किल चैलेंज का मुकाबला करना था और इस में मैं ने ‘मिसेज इंडिया यूनिवर्स’ सैकंड रनरअप का खिताब अपने नाम कर ही लिया.

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फिटनैस का भी ध्यान रखें

‘‘मेरा उन सभी महिलाओं से जो इस तरह की प्रतियोगिताओं में भाग लेने की इच्छा रखती हैं यही कहना है कि वे अपनी फिटनैस का खासतौर पर ध्यान रखें. क्योंकि जब हम खुद को फिट रखते हैं तो हमारा कौन्फिडैंस काफी बढ़ जाता है. अपने आउटफिट्स का खास ध्यान रखें, क्योंकि इस तरह के फैशन शोज में इन पर काफी ध्यान दिया जाता है. कभी डरें नहीं बल्कि मौका मिलने पर इन प्रतियोगिताओं में पूरी हिम्मत से आगे बढ़ें.’’

कैसा हो संतुलित आहार

आमतौर पर लोगों को यह लगता है कि वे शारीरिक रूप से सक्रिय रह कर फिट रह सकते हैं. मगर सत्य यह है कि एक स्वस्थ शरीर के लिए शारीरिक रूप से सक्रिय रहने के साथसाथ पोषण युक्त व संतुलित आहार का सेवन भी जरूरी है. संतुलित आहार शरीर की इम्यूनिटी को मजबूत बनाता है, जो हर उम्र में बीमारियों से उबरने में मदद करती है. यदि हम संतुलित आहार का सेवन नहीं करते हैं तो इस से कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

इन्हीं में कोरोना का संक्रमण भी शामिल है, जिस से बचने के लिए डाइट का पौष्टिक और संतुलित होना आवश्यक है. हालांकि ऐसा कोई एक खास फूड मौजूद नहीं, जो शरीर को पूरा पोषण दे सके. ऐसे कई फूड्स हैं, जिन्हें अपने आहार में शामिल कर सभी जरूरी पोषक तत्त्वों की कमी को पूरा किया जा सकता है.

कुछ ऐसे ही खाद्यपदार्थों के सेवन से न सिर्फ शरीर को जरूरी पोषण मिलता है, बल्कि स्वस्थ भी रहते हैं.

आइए, जानते हैं एक बैलैंस्ड डाइट में क्या और कितनी मात्रा में शामिल होता है:

प्रोटीन: प्रोटीन शरीर की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है. दूध और दूध से बने खाद्यपदार्थों में प्रोटीन भरपूर मात्रा में मौजूद होता है. इस के अलावा दाल, मछली, अंडा, मटर, मूंगफली और चिकन में भी प्रोटीन भरपूर मात्रा में मौजूद होता है. एक व्यक्ति को हर दिन 56 ग्राम प्रोटीन का सेवन करना चाहिए.

कार्ब्स: कार्ब्स शरीर को ऊर्जा देने का काम करता है. यह 2 तरह का होता है, अच्छा और बुरा. अच्छे कार्ब्स में ब्राउन राइस, कम फैट वाला दूध, आलू, केला, गेहूं, बाजरा, ओट्स, दलिया, ज्वार आदि शामिल होते हैं. एक व्यक्ति को हर दिन 225 से 325 ग्राम कार्ब्स का सेवन करना चाहिए.

फैट: एक संतुलित आहार में फैट का होना भी जरूरी है. लेकिन ट्रांस फैट का सेवन स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है. फैट में मोनोअनसैचुरेटेड फैट और पौली अनसैचुरेटेड फैट इम्यूनिटी और हड्डियों मजबूत बनाते हैं. मूंगफली, जैतून, कैनोला, सूरजमुखी, सरसों, तिल या मछली के तेल में हैल्दी फैट पाया जाता है. हर दिन 44 से 77 ग्राम फैट का सेवन करना चाहिए.

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विटामिन: विटामिन कई तरह के होते हैं. हर विटामिन का शरीर के लिए अपना अलग फायदा होता है. हरी सब्जियों, दूध, डेयरी प्रोडक्ट्स, गाजर, ब्रोकली, सेब, तरबूज, पपीता, अमरूद आदि में विटामिन ए भरपूर मात्रा में मौजूद होता है. पालक, हरी सब्जियों और सोयाबीन तेल में विटामिन के मौजूद होता है. बींस, नट्स, अंडे, मछली और आलू में विटामिन बी6 पाया जाता है. मीट, चिकन, दूध, दही पनीर और अंडे में विटामिनट बी12 पाया जाता है. मछली, दूध, पनीर में विटामिन डी मौजूद होता है. इस के अलावा धूप विटामिन डी का सब से अच्छा स्रोत है. संतरा, नीबू, आंवला, अंगूर, कीनू, कटहल, पुदीना, टमाटर, अमरूद और पालक में विटामिन सी भरपूर मात्रा में पाया जाता है. एक दिन में 40 मिलीग्राम विटामिन सी का सेवन करना चाहिए.

कैल्सियम: यह हड्डियों को मजबूत बनाता है. दूध, दही, पनीर, घी, चीज, छाछ, हरी सब्जियों और फलों मे कैल्सियम भरपूर मात्रा में मौजूद होता है. एक दिन में 1000 से 1200 मिलीग्राम कैल्सियम का सेवन करना चाहिए.

फाइबर: फाइबर युक्त आहार का सेवन पाचनतंत्र के लिए आवश्यक होता है. रेशे वाली सब्जियां, ब्राउन ब्रैड, दाल, फल, गेहूं का आटा, सूखे मेवे, ओट्स, मटर और मक्का आदि में फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है. रोजाना लगभग 25 से 30 ग्राम फाइबर का सेवन करना चाहिए.

मिनरल्स: आयोडीन, आयरन, कैल्सियम व पोटैशियम आदि महत्त्वपूर्ण मिनरल्स होते हैं. केला, टमाटर, आलू, शकरकंद, हरी पत्तेदार सब्जियां, ब्रोकली, खट्टे फल, कम फैट वाला दूध, दही, अंडा, काजू, बादाम, फलियां, सेब, नमक आदि में मिनरल्स अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं. एक दिन में 2000 मिलीग्राम पोटैशियम, 1300 से 1500 मिलीग्राम सोडियम, 8 से 12 मिलीग्राम आयरन और 10 से 12 मिलीग्राम मैग्नीशियम का सेवन करना चाहिए.

क्या खाने से मिलता है बीमारियों से छुटकारा

कैंसर: कैंसर में हलदी का सेवन बेहद फायदेमंद होता है. इस में कई औषधीय गुण होते हैं, जो कैंसर से लड़ने में सहायक होते हैं. कैंसर के रोगी को हर दिन 500 से 1000 मिलीग्राम हलदी का सेवन करना चाहिए. खाने में स्वादानुसार हलदी, हलदी वाला दूध, हलदी के अचार आदि की मदद से इस मात्रा की भरपाई की जा सकती है. चूंकि हलदी शरीर की इम्यूनिटी को बढ़ाती है, इसलिए इस की मदद से शरीर कोरोना जैसी घातक बीमारियों से लड़ने में सक्षम रहता है.

औस्टियोपोरोसिस: औस्टियोपोरोसिस में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, जिस से फ्रैक्चर का खतरा बहुत ज्यादा रहता है. ऐसे में मरीज को कैल्सियम का सेवन करना चाहिए. औस्टियोपोरोसिस के मरीज को एक दिन में 1000 से 1500 मिलीग्राम कैल्सियम का सेवन करना चाहिए. इस के अलावा हर दिन सुबह धूप में कम से कम आधा घंटा बैठने से भी हड्डियां मजबूत बनती हैं.

सांस संबंधी समस्या: सांस संबंधी समस्याओं में विटामिन सी का सेवन बढ़ाने के लिए कहा जाता है. विटामिन सी इम्यूनिटी को मजबूत बना कर संक्रमण से लड़ने में सहायक होता है. हर दिन 1000 मिलीग्राम विटामिन सी का सेवन जरूरी होता है. इस के लिए हर दिन संतरा, पालक, आंवला, टमाटर, अमरूद, दूध, कटहल का सेवन कर इस की कमी को पूरा किया जा सकता है.

हृदय रोग: हृदय रोग में लहसुन खाने की सलाह दी जाती है. यह शरीर की इम्यूनिटी को मजबूत कर बीमारी से लड़ने में सहायक होता है. खाने में इसे शामिल करने के अलावा सुबह खाली पेट लहसुन की 2 कलियां पानी के साथ लेने से दिल की बीमारी में फायदा मिलता है.

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सर्दीजुकाम: बदलते मौसम में सर्दीजुकाम का होना आम बात है. ऐसे में तुलसी और अदरक का सेवन करने के लिए कहा जाता है. इस से इम्यूनिटी मजबूत होती है और सर्दीजुकाम से जल्द ही छुटकारा मिल जाता है. सुबह खाली पेट तुलसी की 5 पत्तियां खाएं. इस के अलावा तुलसी, अदरक का काढ़ा इस समस्या से जल्द राहत देता है.

-डा. बिमल छाजेड़, साओल हार्ट सैंटर 

मौन प्रेम: जब भावना को पता चली प्रसून की सचाई

Serial Story: मौन प्रेम (भाग-2)

पिछला भाग पढ़ने के लिए- मौन प्रेम: भाग-1

तभी एक लड़का मोटरसाइकिल को स्लो कर मेरे पास आ कर बोला, ‘‘उठा परदा, दिखा जलवा.’’

मैं ने जल्दी से साड़ी नीचे कर ली, पर मेरा पैर फिसल पड़ा और गिरने लगी. मगर इस के पहले कि मैं सड़क पर गिरती पीछे से किसी के हाथों ने मुझे संभाल लिया वरना मैं पूरी तरह कीचड़ से सन जाती. जब मैं पूरी तरह सहज हुई तो देखा वे हाथ प्रसून के थे.

इसी बीच मोटरसाइकिल वाले लड़के की बाइक कुछ दूर आगे जा कर स्लिप हुई और वह गिर पड़ा. उस के कपड़ों और चेहरे पर कीचड़ पुता था.

प्रसून ने जोर से कहा, ‘‘बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला.’’

वह लड़का उठा और गुस्से से हमें देखने लगा. प्रसून बोला, ‘‘ऐसे क्यों घूर रहा है. वह देख तेरे सामने जो ट्रक गया है उस के पीछे यही लिखा है.’’

इस बार मैं भी खुल कर हंस पड़ी थी. फिर पूछा, ‘‘आज आप पैदल चल रहे हैं? आप के दोस्त मधुर नहीं हैं?’’

‘‘नहीं, आज वह मेरे साथ नहीं आया है.’’

मैं ने प्रसून को हिस्टरी पेपर में उस की मदद के लिए धन्यवाद दिया. वह मेरे साथसाथ चौराहे तक गया. वहां मुझे रिकशा मिल गया. प्रसून अपने घर की तरफ चल पड़ा. उस के घर का पता मुझे अभी तक मालूम नहीं था न ही मैं ने जानने की जरूरत समझी या कोशिश की.

कुछ दिनों बाद कालेज लाइब्रेरी में प्रसून मुझे मिला. मैं ने गुड मौर्निंग कह कर पूछा, ‘‘आप कैसे हैं?’’

‘‘बिलकुल ठीक नहीं हूं और तुम कैसी हो? ओह सौरी, मेरा मतलब आप कैसी हैं?’’

‘‘इट्स ओक विद तुम, पर क्या हुआ आप को?’’

‘‘यह आपआप कब तक चलेगा हमारे बीच. आप मैं औपचारिकता है, वह अपनापन नहीं जो तुम में है. अगर अब मुझ से बात करनी है तो हम दोनों को आप छोड़ कर तुम पर आना पड़ेगा… समझ गईं?’’

‘‘समझ गईं नहीं, समझ गई,’’ और फिर हम दोनों हंस पड़े.

प्रसून बड़ा हंसमुख लड़का था. किसी ने उस के चेहरे पर उदासी नहीं देखी थी. पढ़नेलिखने में भी टौप था और उतना ही स्मार्ट भी. किसी भी लड़की या लड़के से बेखौफ, बेतकल्लुफ मिल कर बातें करता, हंसनाहंसाना उस की फितरत में था. किसी की नि:स्वार्थ मदद करने को हमेशा तैयार रहता. कालेज के फंक्शंस में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता. अनेक लड़के और लड़कियां उस के प्रशंसक थे और उस से नजदीकियां बढ़ाना चाहते थे. मैं भी उस की प्रशंसा सुन प्रभावित हुई और उस की ओर आकर्षित हुई. मेरे मन में उस के लिए एक मौन प्यार जाग उठा था.

हम दोनों अब लाइब्रेरी के अतिरिक्त कभी कैंटीन तो कभी मार्केट में मिलने लगे और कभी मूवी हौल में भी. पर बीच में कोई न कोई कबाब में हड्डी जरूर बनता. कभी मधुर तो कभी कोई अन्य लड़का या फिर लड़की.

उस की ओर से कभी प्यारमुहब्बत की बातें सुनने के लिए मैं तरस रही थी, प्रोपोज

करना तो बहुत दूर की बात थी.

फाइनल ईयर तक जातेजाते मैं ने अनुभव किया कि जब कभी वह एकांत में होता फोन पर किसी लड़की से बात करता होता. यह देख मुझे ईर्ष्या होती. 2-3 दिन की छुट्टियों में वह बिना बताए लापता हो जाता. कहां जाता, किसी को नहीं बताता था.

प्रसून कुछ अन्य विषयों में भी मेरी काफी सहायता करता. मुझे उस समय तक पता नहीं था कि कालेज में कुछ मनचली लड़कियां भी हैं जो पौकेट मनी के लिए मौजमस्ती करने से बाज नहीं आतीं.

एक बार ऐसी ही एक लड़की मंजुला मुझे कौफी पिलाने के लिए एक कैफेटेरिया में ले गई. उस कैफेटेरिया के ऊपर ही एक गैस्ट हाउस था. पर कौफी पीने के बाद मेरा सिर चकराने लगा और हलकीहलकी नींद सी आने लगी. मंजुला मुझे गैस्टहाउस में एक कमरे में ले गई और मुझे एक बैड पर लिटा दिया. कुछ देर आराम करने को कह बोली, ‘‘मैं थोड़ी देर में कोई दवा ले कर आती हूं.’’

इस के बाद जब मेरी आंखें खुलीं तो मैं ने देखा कि मेरे पास प्रसून और मधुर दोनों बैठे थे. मधुर ने कहा, ‘‘तुम्हें मंजुला के बारे में पता नहीं था? तुम उस के साथ कालेज से बाहर क्यों गई थीं?’’

‘‘मैं बस उसे कालेज का स्टूडैंट समझती थी और 2 पीरियड फ्री थे तो थोड़ी देर के लिए कौफी पीने चली गई उस के साथ.’’

‘‘अपने कालेज की कैंटीन में भी कौफी मिलती है या नहीं? फिर बाहर जाने का क्या मतलब था?’’

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‘‘मंजुला बोली कि कैंटीन में तो रोज ही पीते हैं. आज कौफी टाइम है, बाहर चल कर पीते हैं.’’

‘‘और तुम भोली बच्ची की तरह उस के पीछेपीछे चल दी. बेवकूफ लड़की,’’ उस ने डांटते हुए कहा.

प्रसून ने बीच में रोक कर कहा, ‘‘तुम भावना को क्यों इतना डांट रहे हो? उसे जब मंजुला के बारे कुछ पता नहीं है तो उस की क्या गलती है?’’

‘‘पर मंजुला के बारे में तुम लोग क्या कहना चाहते हो?’’

मधुर बोला, ‘‘मंजुला मौजमस्ती और पौकेटमनी के लिए खुद तो अपना चरित्र खो चुकी है और अब दूसरी लड़कियों के लिए दलाली करने लगी है. प्रसून उस कैफे की तरफ से गुजर रहा था और उस ने तुम्हें मंजुला के साथ अंदर जाते देखा तो उस ने तुरंत फोन कर मुझे भी यहां आने को कहा और स्वयं तुम्हें खोजते हुए ऊपर गैस्टहाउस तक पहुंचा. अगर थोड़ी भी देर होती तो तुम्हारी इज्जत मिट्टी में मिल गई होती.’’

‘‘उफ, मैं तो अपने कालेज की लड़कियों के बारे में ऐसा सोच भी नहीं सकती थी. तुम लोगों ने पुलिस में सूचना दी है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं तो देने जा रहा था, पर प्रसून ने मना किया, क्योंकि फिर तुम्हें बारबार पुलिस थाने और कोर्ट जाना पड़ता गवाही के लिए. फिर तुम जान सकती हो कि कुछ दिनों के लिए शहर में तुम ब्रेकिंग न्यूज का विषय रहती.’’

‘‘तो क्या मंजुला और उस बदमाश लड़के को यों ही छोड़ दिया जाए?’’

‘‘उस लड़के की अच्छी पिटाई की गई है. पता नहीं अच्छा किया या बुरा, पर 2-4 चांटे मैं ने मंजुला को भी जड़ दिए. प्रिंसिपल से उस की शिकायत कर दी है. शायद वह रैस्टीकेट हो जाए. वह लड़का तो अपने कालेज का नहीं था,’’ मधुर बोला.

‘‘पर मुझे तुम लोग यहां क्यों लाए हो? यह किस का घर है?’’

‘‘यह प्रसून का कमरा है. इस छोटे से कमरे में वह किराए पर रहता है. इस के बारे में बाद में बात करेंगे. अब तुम देर नहीं करो, शाम होने को है. तुम्हें घर छोड़ देते हैं.’’

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मैं कृतज्ञतापूर्ण नजरों से प्रसून को देख कर बोली, ‘‘तुम मेरे लिए आज मसीहा बन कर आए मैं तुम्हारे उपकार का बदला नहीं चुका पाऊंगी प्रसून,’’ बोल कर मैं उस का हाथ पकड़ कर रो पड़ी.

उन दोनों की मदद से मैं सहीसलामत घर लौट आई. उस दिन मेरे मन में प्रसून के लिए बहुत प्यार उमड़ आया पर प्रसून के बरताव से मैं नहीं समझ पा रही थी कि मेरे लिए उस के मन में क्या है.

आगे पढ़ें- मैं ने बीए कर लिया और प्रसून पीसीएस में कंपीट कर…

Serial Story: मौन प्रेम (भाग-3)

पिछला भाग पढ़ने के लिए- मौन प्रेम: भाग-2

समय बीतता जा रहा था. मैं ने बीए कर लिया और प्रसून पीसीएस में कंपीट कर चुका था. इस खुशी में प्रसून ने ट्रीट दिया. मैं और मधुर उस के साथ होटल में थे. हम तीनों में कोई भी ड्रिंक नहीं लेता था. उस दिन होटल के डाइनिंगहॉल में औरकैस्ट्रा के गायक ने बौलीवुड के रोमांटिक गानों से सब को प्रसन्न किया. उस का आखिरी गाना था, ‘‘किसी न किसी से कभी न कभी कहीं न कहीं दिल लगाना पड़ेगा…’’

मैं अब उन के बीच फ्रैंक हो चुकी थी. मैं ने प्रसून से पूछा, ‘‘तब तुम्हारा दिल किस पर आया है?’’

वह गंभीर हो गया और बोला, ‘‘मेरी छोड़ो, तुम बोलो शादी कब कर रही हो? अपनी शादी में मुझे बुलाना नहीं भूलना.’’

मुझे उस का जवाब सुन कर अच्छा नहीं लगा. मैं सोच रही थी कि शायद अब अच्छी नौकरी मिल जाने के बाद यह मेरे साथ घर बसाने की बात सोच रहा होगा. उस दिन के बाद तो प्रसून से मेरी कोई बात नहीं हुई. वह किसी दूसरे शहर में राज्य सरकार का बड़ा अफसर था. मेरे मातापिता मेरी शादी की बात भी चला रहे थे. मधुर इसी शहर में था और कभीकभी हमारी मुलाकात हो जाती थी.

एक दिन मधुर मिला. मैं ने उस से प्रसून के बारे में पूछा तो वह बोला, ‘‘वैसे तो प्रसून देखने में बहुत खुश और सदा मुसकराते रहता है पर वह एक अंतर्मुखी लड़का है. अपना दर्द दूसरों से नहीं बांटता है. मुझे भी अपनी पर्सनल जिंदगी के बारे में कुछ नहीं बताया है. पर अभी कुछ दिन पहले ही मुझे उस की हकीकत का पता चला है.’’

‘‘ऐसी कौन सी बात है?’’

‘‘कुछ दिन पहले मुझे उस ने अपने गांव में बुलाया था. मैं उस से मिलने उस के गांव गया पर वह तब तक शहर जा चुका था. मैं उस की बूढ़ी मां और उस की 5 साल की बेटी से मिला.’’

‘‘बेटी?’’

‘‘हां, उस की शादी तो 12वीं कक्षा में ही हो गई थी. उस के पिता नहीं थे और उस की अस्वस्थ मां की देखभाल के लिए कोई भरोसेमंद औरत घर में चाहिए थी. उस ने शादी की. कुछ दिनों तक सब ठीक रहा. उसे एक बच्ची भी हुई. फिर उस की पत्नी उसे और बच्ची को छोड़ कर भाग गई.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘जैसा कि प्रसून की मां ने कहा वह गांव में नहीं रहना चाहती थी उसे शहर में रहना था. प्रसून ने कहा था कि जब तक उसे शहर में नौकरी नहीं मिलती उसे गांव में ही रहना होगा. पर वह नहीं मानी और बेटी को छोड़ कर चली गई. सुना है बाद में उस ने शादी भी कर ली. प्रसून अब कुछ ही दिनों के अंदर अपनी मां और बेटी को शहर शिफ्ट कर रहा है?’’

मैं ने मन में सोचा कि इतनी बड़ी बात उस ने कभी किसी से शेयर नहीं की. करीब 1 सप्ताह बीता होगा बरसात का मौसम था. 3 दिनों से पूरे राज्य और पड़ोसी राज्य में बारिश हो रही थी. हर तरफ बाढ़ और अफरातफरी का माहौल था. टीवी न्यूज से पता चला कि बाढ़ में डैम के गेट खोलने के चलते प्रसून का गांव जलमग्न हो गया था.

मधुर ने मुझ से फोन कर कहा, उस की मां को बचाया न जा सका पर उस की बेटी शिविर में बीमार है. प्रसून वहां पहुंचने ही वाला है. मैं वहीं जा रहा हूं.

मैं ने बिना देर किए कहा, ‘‘मुझे भी साथ ले चलो, मैं भी चलूंगी.’’

‘‘वहां बहुत दिक्कत होगी तुम्हें.’’

‘‘ये बेकार की बातें हैं, तुम नहीं ले जा सकते तो मैं अकेली ही चली जाऊंगी.’’

‘‘अच्छा रुको, मैं आ रहा हूं.’’

‘‘मैं मधुर के साथ प्रसून के गांव आई. प्रसून 2 दिन बाद ही पहुंच सकता था, क्योंकि खुद वह जहां था वहां भी बाढ़ थी और बिना दूसरे को चार्ज दिए वह नहीं आ सकता था. मधुर ने उसे बता दिया था कि हम दोनों उस की बेटी के पास पहुंचने ही वाले हैं.

मैं शिविर में प्रसून की बेटी से मिली. उसे कौलरा हुआ था. मैं ने उस का नाम पूछा तो उस का छोटा सा जवाब था, ‘‘मिनी.’’ मैं ने उसे प्यार से गोद में ले लिया. वह मुझ से लिपट गई और बोली, ‘‘आप मेरी मम्मी हो न?’’

‘‘नहीं बेटे मम्मी तो नहीं, पर मम्मी जैसी ही हूं.’’मधुर मिनी और मेरा फोटो ले रहा था. मैं ने डाक्टर की सलाह के अनुसार मिनी के खानेपीने का इंतजाम किया. अब मिनी की स्थिति काफी सुधर चुकी थी. प्रसून भी आ गया. मुझे और मधुर को देख कर उसे खुशी और संतोष हुआ कि उस की बेटी सुरक्षित है.

मिनी दौड़ कर प्रसून के सीने से जा लगी और बोली ‘‘पापा, आप इतनी देर से क्यों आए. कहीं मैं मर जाती तो?’’

प्रसून ने उस के मुंह पर हाथ रख कर कहा, ‘‘ऐसा नहीं बोलते बेटा. तेरे बिना तो पापा भी जिंदा नहीं रह सकते हैं. तेरे ही लिए मधुर अंकल और भावना आंटी यहां आए हैं.’’

हम चारों 3 दिन तक वहां एकसाथ रहे. तब तक पानी भी बहुत कम हो गया और स्थिति बेहतर हो गई थी. मधुर बोला, ‘‘अब बाढ़ का असर भी करीबकरीब खत्म हो चला है. मिनी बिटिया भी ठीक हो गई है. अब मैं चलता हूं.’’

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मैं बोल उठी, ‘‘मैं चलता हूं, वाह क्या कमाल की बात करते हो. मुझे यहां तक लाने वाले तुम हो और यों ही छोड़ कर चले जाने को तैयार हो.’’

‘‘तुम यहां स्वेच्छा से आई थी, मेरे कहने से नहीं.’’

‘‘ठीक है, तुम जा सकते हो. मैं अकेली भी जा सकती हूं.’’

‘‘भावना, तुम बुरा मान गईं, मैं ने सोचा शायद तुम कुछ दिन और यहां रुकना चाहो.’’

मैं ने एक नजर प्रसून की तरफ देखा. वह बेटी को प्यार किए जा रहा था, उस ने नजर उठा कर मेरी तरफ देखा. पर उस की आंखों की भाषा में मेरे रुकने का कोई आशय नहीं था. मुझे अच्छा नहीं लगा. अत: मैं मधुर से बोली, ‘‘नहीं, अब मेरा यहां क्या काम. मैं भी चलती हूं.’’

मैं मधुर के साथ लौट आई. नौकरी लगने के बाद प्रसून अपने गांव की ज्यादातर जमीन बेच चुका था, जो थोड़ीबहुत संपत्ति बची थी उसे अपने चाचा के हवाले कर वह मिनी के साथ शहर आ गया.

एक दिन प्रसून ने मुझे एक वीडियो क्लिप और मैसेज फोन पर भेजा. उस वीडियो क्लिप को मधुर ने गांव में लिया था, जिस में मैं मिनी को समझा रही थी कि मैं उस की मम्मी जैसी ही हूं. मैसेज में लिखा गया था. ‘मिनी, तुम्हें बहुत याद करती है. क्या उस की मम्मी जैसी से सिर्फ मम्मी नहीं बन सकती हो? मैं तुम्हारे जवाब का इंतजार करूंगा. मैं ने तुम्हारे घर में पहले ही बात कर ली है, उम्मीद है तुम निराश नहीं करोगी.’’

प्रसून के मुंह से ऐसी बात सुनने का तो मैं इंतजार ही कर रही थी. अभी तक उस के मौन से मैं निराश हो चली थी. अब आस की किरण फूटने लगी. उस ने इस बात के लिए मिनी का सहारा क्यों लिया? खुद भी तो कह सकता था?मैं सोच रही थी. फिर भी मैं बेहद खुश थी. इतनी खुश कि मेरी आंखों से आंसू टपक पड़े. मैं ने प्रसून को टैक्स्ट किया, ‘मुझे इस दिन का बेसब्री से इंतजार था.’

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Serial Story: मौन प्रेम (भाग-1)

मेरा12वीं कक्षा का रिजल्ट आने वाला था. मुझे उम्मीद थी कि मैं अच्छे मार्क्स ले आऊंगी. इस के बाद मेरी इच्छा कालेज जौइन करने की थी. उस समय घर में दादी सब से बुजुर्ग सदस्या थीं और पापा भी उन का कहा हमेशा मानते थे.

जब मेरे कालेज जाने की चर्र्चा हुई तो दादी ने पापा से कहा, ‘‘और कितना पढ़ाओगे? अपनी बिरादरी में फिर लड़का मिलना मुश्किल हो जाएगा और अगर मिला भी तो उतना तिलक देने की हिम्मत है तुझ में?’’

‘‘मां, जब लड़की पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी तो तिलक नहीं देना पड़ेगा.’’

‘‘लड़कियां कितनी भी पढ़लिख जाएंअपने समाज में बिना तिलक की शादी तो मैं ने नहीं सुनी है.’’

‘‘तुम चिंता न करो मां… पोती का आगे पढ़ने का मन है… उसे आशीर्वाद दो कि अच्छे मार्क्स आएं… स्कौलरशिप मिल जाए तो उस की पढ़ाई पर खर्च भी नहीं आएगा.’’

‘‘ठीक है, अगर तेरी समझ में आगे पढ़ने से भावना बेटी का भला है तो पढ़ा. पर मेरी एक बात तुम लोगों को माननी होगी… कालेज में भावना को साड़ी पहननी होगी. स्कूल वाला सलवारकुरता, स्कर्टटौप या जींस में मैं भावना को कालेज नहीं जाने दूंगी,’’ दादी ने फरमान सुनाया.

‘‘ठीक है दादी, जींस नहीं पहनूंगी पर सलवारकुरते में क्या बुराई है? उस में भी तो पूरा शरीर ढका रहता है?’’

‘‘जो भी हो, अगर कालेज में पढ़ना है तो तुम्हें साड़ी पहननी होगी?’’

मेरा रिजल्ट आया. मुझे मार्क्स भी अच्छे मिले, पर इतने अच्छे नहीं कि स्कौलरशिप मिले. फिर भी अच्छे कालेज में दाखिला मिल गया. पर मेरा साड़ी पहन कर जाना अनिवार्य था. मम्मी ने मुझे साड़ी पहनना सिखाया और मेरे लिए उन्होंने 6 नई साडि़यां और उन से मैचिंग ब्लाउज व पेटीकोट भी बनवा दिए ताकि मैं रोज अलग साड़ी पहन सकूं.

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जुलाई मध्य से मेरी क्लासेज शुरू हुईं. नईर् किताबें और स्टडी मैटीरियल लेतेलेते जुलाई बीत गया पर इस साल सिलेबस में कुछ बदलाव हुआ थे, जिस के चलते इतिहास की एक किताब अभी मार्केट में उपलब्ध नहीं थी. प्रोफैसर अपने नोट्स से पढ़ाते थे. कभी 1-2 प्रिंटआउट किसी एक स्टूडैंट को देते थे और उस का फोटोकौपी कर हमें आपस में बांटनी होती थीं.

ऐसे कुछ नोट्स मेरे अलावा बहुतों को नहीं मिल सके थे और सितंबर में पहला टर्मिनल ऐग्जाम होना था. लाइब्रेरी में सिर्फ एक ही रिफरैंस बुक थी, जिसे हम घर ले जाने के लिए इशू नहीं करा सकते थे. वहीं बैठ कर पढ़नी होती थी. मैं जब भी लाइब्रेरी जाती उस किताब पर किसी न किसी का कब्जा होता.

एक दिन मैं उस किताब के लिए लाइब्रेरी गई. उस दिन भी वह किताब किसी ने पढ़ने के लिए इशू करा रखी थी. इत्तफाक से उस किताब पर मेरी नजर पड़ी. मेरी बगल में बैठे एक लड़के ने इशू करा कर टेबल पर रखी थी और वह खुद दूसरी किताब पढ़ रहा था. मैं ने हिम्मत कर उस से कहा, ‘‘ऐक्सक्यूज मी, अगर इस किताब को आप अभी नहीं पढ़ रहे हैं तो थोड़ी देर के लिए मुझे दे दें. मैं इस में से कुछ नोट कर वापस कर दूंगी.’’

उस ने किताब को मेरी तरफ सरकाते हुए कहा, ‘‘श्योर, आप इसे ले सकती हैं. वैसे हिस्टरी तो मेरा सब्जैक्ट भी नहीं है. मैं ने अपने एक फ्रैंड के लिए इशू कराई है. जब तक वह आएगा तब तक आप इसे पढ़ सकती हैं.’’

‘‘थैंक्स,’’ कह कर मैं ने किताब ले ली.

करीब 20 मिनट के अंदर एक  लड़का आया और बगल वाले लड़के से बोला, ‘‘प्रसून, तुम ने मेरी किताब इशू कराई है न?’’

‘‘मधुर, आ बैठ. किताब है, तू नहीं आया था तो मैं ने इन्हें दे दी है. थोड़ी देर मेंतुम्हें मिल जाएगी.’’

मैं अपना नोट्स लिखना बंद कर किताब उसे देने जाने लगी तभी प्रसून बोला, ‘‘अरे नहीं, आप कुछ देर और रख कर अपने नोट्स बना लें. है न मधुर?’’

मुझे अच्छा नहीं लग रहा था. 5 मिनट बाद मैं ने किताब प्रसून को लौटा दी.

वह बोला, ‘‘आप मेरे सैक्शन में तो नहीं हैं… क्या मैं आप का नाम जान सकता हूं?’’

‘‘मुझे भावना कहते हैं.’’

मैं उठ कर चलने लगी तो वह बोला, ‘‘मुझे लगता है कि आप को किताब से और नोट्स बनाने बाकी रह गए हैं. आप एक काम करें मुझे सिर्फ पेज नंबर बता दें. मैं आप को वे पन्ने दे सकता हूं.’’

‘‘तो आप क्या किताब में से उन पन्नों को फाड़ कर मुझे देंगे?’’

‘‘क्या मैं आप को ऐसा बेहूदा लड़का लगता हूं?’’

‘‘नहीं, मेरा मतलब वह नहीं था. सौरी, पर आप उन पन्नों को मुझे कैसे देंगे?’’

‘‘पहले आप अपना मोबाइल नंबर मुझे बताएं. फिर यह काम चुटकियों में हो जाएगा.’’

मुझे लगा कहीं मेरा फोन नंबर ले कर यह मुझे परेशान न करने लगे. अत: बोली, ‘‘नो थैंक्स.’’

तब दूसरे लड़के मधुर ने कहा, ‘‘भावनाजी, मैं समझ सकता हूं कि कोई भी लड़की किसी अनजान लड़के को अपना फोन नंबर नहीं देना चाहेगी, पर आप यकीन करें, प्रसून कोई ऐसावैसा लड़का नहीं है. यह तो उन पेजों का फोटो अपने मोबाइल से ले कर आप को मैसेज या व्हाटसऐप अथवा मेल कर सकता है. ऐसा इस ने क्लास की और लड़कियों के लिए भी किया है और उन लड़कियों से इस से ज्यादा कोई मतलब भी नहीं रहा इसे.’’

मैं कुछ देर सोचती रही, फिर अपनी नोटबुक से एक स्लिप फाड़ कर अपना फोन नंबर प्रसून को दे दिया.

वह बोला, ‘‘भावना, आप कहें तो मैं इन के प्रिंट निकाल कर आप को दे दूंगा.’’

‘‘नहीं, इतनी तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं है. आप बस व्हाइटऐप कर दें.’’

उसी रात प्रसून की व्हाट्सऐप पर रिक्वैस्ट आई जिसे मैं ने ऐक्सैप्ट किया और चंद

मिनटों के अंदर वे सारे पेज, जिन की मुझे जरूरत थी, मेरे पास आ गए. मैं ने प्रसून को ‘मैनीमैनी थैंक्स’ टैक्स्ट किया. उस दिन से उस के प्रति मेरे मन में अच्छी भावनाएं आने लगीं.

इस के बाद कुछ दिनों तक मेरी प्रसून या मधुर किसी से भेंट नहीं हुई. उन के सैक्शन भी अलग थे और प्रसून अकसर मधुर के स्कूटर से आता था. मैं कुछ दूर पैदल और कुछ दूर रिकशे से आतीजाती थी.

उस दिन मेरा हिस्टरी का पेपर था. सुबह से ही तेज बारिश हो रही थी. ऐग्जाम तो देना ही था. मैं किसी तरह रिकशे से कालेज गई, पर रिकशे पर भी भीगने से बच नहीं सकी थी. प्रसून की मदद से मेरा पेपर बहुत अच्छा गया. कालेज के गेट से निकली तो बारिश पूरी थमी नहीं थी, बूंदाबांदी हो रही थी.

उस दिन गेट पर कोई रिकशा नहीं मिला, क्योंकि उस दिन जिन्हें आमतौर पर जरूरत नहीं होती थी, भीगने से बचने के लिए वे भी रिकशा ले रहे थे.

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मैं सड़क पर एक किनारे धीरेधीरे चौराहे की ओर आगे बढ़ रही थी जहां से रिकशा मिलने की उम्मीद थी पर लगातार बारिश के चलते सड़क पर पानी जमा हो गया था. मुझे महसूस हुआ कि मेरे पीछेपीछे कोई चल रहा है, पर मैं ने मुड़ कर देखने की कोशिश नहीं की. साड़ी को भीगने से बचाने के लिए एक हाथ से थोड़ा ऊपर कर चल रही थी.

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शूटिंग करने से डरे ‘भाभी जी घर पर हैं’ के मनमोहन तिवारी, जानें क्या है मामला

कोरोनावायरस के कहर के बीच सभी टीवी शोज और फिल्मों की शूटिंग शुरू हो चुकी हैं. हालांकि स्टार्स ने शूटिंग नही करने का फैसला किया है. हाल ही में  ‘भाभी जी घर पर हैं’ सौम्या टंडन ने सीरियल को छोड़ने का फैसला किया था. इसी बीच सीरियल के एक और स्टार को शूटिंग करने से डर लग रहा है. आइए आपको बताते हैं कौन है वो शख्स…

मनमोहन तिवारी को लगा कोरोना से डर

सीरियल ‘भाभी जी घर पर हैं’ में मनमोहन तिवारी के किरदार में नजर आने वाले एक्टर रोहिताश गौर भी इन दिनों कोरोना वायरस के खौफ में काम कर रहे हैं. हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने खुलासा किया है कि वह किस तरह कोरोनावायरस के खौफ के बीच शूटिंग कर रहे हैं.

 

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Bhabhiji ghar par hai…,13th July se new episodes….Milte hain aap sabse

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शूटिंग के पहले दिन हुआ था ये हाल

 

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In an old episode

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इंटरव्यू के दौरान रोहिताश गौर ने कहा कि, ‘जब लॉकडाउन के बाद मैंने पहले दिन सेट पर शूटिंग शुरु की वो समय मेरे लिए काफी डरावना था. समय के साथ अब सब ठीक होने लगा है. सेट पर हर कोई सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ख्याल रख रहा है लेकिन मैं अब भी सेट पर खुश नहीं हूं. अब सेट पर वो मजेदार माहौल नहीं रहा है.’

मस्ती का माहौल हुआ गायब

 

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Saumya ji ke sath….. on d set….

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आगे रोहिताश गौर ने कहा कि, ‘पहले तो हम सब सेट पर जमकर मस्ती किया करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है. कई टीवी शोज के सेट पर कोरोना के केस निकल चुके हैं. जिसका असर हमारे सेट का माहौल पर भी पड़ा है. हमने इस बात का असर अपने शो पर नहीं पड़ने दिया है. हम सभी आज भी पूरी मेहनत के साथ सीरियल भाभी जी घर पर हैं की शूटिंग करते हैं. मुझे उम्मीद है कि जल्द ही सब कुछ पहले की तरह नॉर्मल हो जाएगा.’

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बता दें, इससे पहले सौम्या टंडन ने भी कोरोना के खौफ का जिक्र करते हुए अपनी परेशानी बताई थी, जिसके बाद उनके शो छोड़ने की बात सामने आई थीं. हालांकि खबरें हैं कि वह जल्द बिग बौस के नए सीजन में नजर आएंगी, लेकिन सौम्या टंडन ने इस बात को अफवाह बताया है.

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