Shehnaaz Gill ने 6 महीने में घटाया 55 किलो वजन, जानें एक्ट्रेस का Weight Loss सीक्रेट

Shehnaaz Gill : पंजाब की कैटरीना कैफ कहलाने वाली मौडल एक्ट्रेस शहनाज गिल जिनको कलर्स के शो बिग बौस 13 में बतौर प्रतियोगी मोटे होने की वजह से बहुत बार मजाक का पात्र बनना पड़ा था और कई सारे प्रतियोगियों ने न सिर्फ उनका मोटापे का मजाक उड़ाया बल्कि उनको कई बार रिजेक्ट भी किया, उसके बाद लौकडाउन हो गया और लौकडाउन के दौरान शहनाज गिल ने करीबन 55 किलो वजन घटाया उसके लिए ना तो उन्होंने कोई पतले होने के लिए दवाई ली और ना ही कोई सर्जरी कराई सीधेसाधे तरीके से सही खाना, योग और एक्सरसाइज के जरिए शहनाज गिल ने अपना काफी वजन कम करके एक मिसाल कायम की. शहनाज गिल खुद बता रही हैं कैसे उन्होंने सही तरीके से हेल्दी डाइट के साथ अपना वजन कम कर लिया जिसमें भोजन के अलावा स्ट्रेस मैनेजमेंट , भरपूर नींद, पौजिटिव सोच,के साथ फिटनेस जर्नी में सब कुछ शामिल है.

 

शहनाज के अनुसार अगर आप ठान लो तो कोई भी चीज मुश्किल नहीं है , शुरुआत से ही मैं बहुत खाने की शौकीन थी और बिंदास जिंदगी जीने में विश्वास रखती थी, लेकिन एक समय ऐसा आया कि मैंने पतले होने का निर्णय लिया , उसके बाद मैं पूरी तरह से इस लक्ष्य में जुड़ गई, मैं अपनी सुबह की शुरुआत हल्दी मिले गर्म पानी  और चाय के साथ करती हूं . सुबह हल्दी पानी पीने से पूरी बौडी का डिटौक्स हो जाता है. इसके बाद मैं एक घंटा योग करती हूं और मेडिटेशन करती हूं जिससे दिमाग और मन शांत रहता है  और शरीर फिट और स्ट्रेचेबल बन जाता है.

 

नाश्ते में मै हल्का फुल्का इडली डोसा, मूंग दाल या मूंग का चीला, या पोहा जिसमें बहुत सारी सब्जियां ऐड करती हूं नाश्ते में यही सब खाती हूं, लंच में अंकुरित अनाज , एक घी से लगी हुई रोटी, ताजा सलाद, मनपसंद दाल खाती हूं शाम के टाइम मखाना घी में भून कर खाती हूं और डिनर में सूप दही और खिचड़ी खाती हूं. इसके अलावा जब भी मन करता है तो डांस या वॉकिंग खुली हवा में करती हूं , जिससे मन बहुत अच्छा हो जाता है पॉजिटिव फीलिंग महसूस होती है. यही सब करके मैंने अपना वजन बिना किसी दवाई या सर्जरी के नॉर्मल कर लिया है , जिसके बाद मुझे बहुत अच्छा लगता है , मेरे अंदर आत्मविश्वास भी पैदा हो गया है कि मुझ में अब कोई कमी नहीं है , हालांकि पहले भी मैं सुंदर थी लेकिन मेरे में आत्मविश्वास की बहुत कमी थी जो अब पूरी तरह से आ गई है.

Meri Bitiya : प्यारी सी बिटिया केशवी

Meri Bitiya : केशवी… यथा नाम तथा रूप… कमर तक लहराते बाल. गेहुआं रंग, तीखे नैननक्श. छरहरी काया और आवाज तो मानो वीणा झंकृत होती हो. मंदिम स्वर कुछ सांचे तो कुदरत तराश कर ही बनाती है.

‘‘मैं आई कम इन सर,’’ धीमा सा, डरा सा स्वर, सहसा कक्षा में गूंजा.

‘‘यस कम इन… लेकिन तुम लेट कैसे हो गई और तुम्हें पहले कभी देखा भी नहीं?’’ सर की आवाज के साथ सारी कक्षा का ध्यान उस मनमोहक चेहरे पर था.

‘‘वह सर मेरा न्यू एडमिशन है और मुझे सही समय का पता नहीं था इसलिए आने में देरी हो गई,’’ केशवी का कंपित स्वर सुन कर बच्चों की दबी हंसी मानो गुंजित हो रही हो.

‘‘बैठ जाओ आगे से समय का ध्यान रखना,’’ सर ने सीट की तरफ इशारा करते हुए कहा और उपस्थिति लेने में मशगूल हो गए.

बच्चों को तो मानो कुतूहल का विषय मिल गया हो. मानो उस का ऐक्स रे ही निकाल रहे हो. उपस्थिति के बाद जब सर ने पढ़ाना शुरू किया तो भला आज कहां किसी को समझ में आने वाला था. एक नया अध्याय जो क्लास में आ गया था. जब तक उस की तहकीकात नहीं हो जाती कहां चैन आने वाला था? किशोर मन बड़ा जिज्ञासु होता. अधूरा ज्ञान अधूरा मन. जिस में संभावनाओं की अनंत डगर… ऐसा लग रहा था आज पीरियड खत्म ही नहीं हो रहा. शायद चपरासी घंटी बजाना भूल गया? जैसे ही घंटी बजे और केशवी का नाम तो पूछ ही लें.

इंतजार की घडि़यां समाप्त हुईं और सर ने प्रस्थान किया. इस से पहले कि दूसरे सर का आगमन हो कुछ तहकीकात तो कर ही लेते हैं. कुछ किशोर चंचलाएं फुरती से उठ कर उस के पास पहुंचीं और पता होने के बाद भी उस का नाम पूछने लगीं.

‘‘कहां से आई हो तुम?’’ एक लड़की ने पूछा.

‘‘मैं… मैं गुना से आई हूं, मेरे पापा का ट्रांसफर हुआ है.’’

मानो केशवी की पुलिस पूछताछ हो रही हो, ‘‘कल से समय से आना. स्कूल का समय 7 बजे का है,’’ कुछ और हिदायतें भी सुनाई दे रही थीं.

इतने में कक्षा में नए सर का आगमन हो गया और किशोर मन का कुतूहल शांत नहीं हो पाया.

ऐसे ही पीरियड पूरी हो गई और कुछ ज्यादा जिज्ञासु बच्चों की कुछ जिज्ञासा भी शांत हो गई. धीरेधीरे दिन निकलने लगे और केशवी भी क्लास के रंग में ढल गई.

एक दिन अचानक केशवी मेरी सीट पर बैठ गई और धीरे से उस ने मेरा नाम पूछा.

चूंकि मुझे पता था कि सब उस से नाम ही पूछते हैं इसलिए मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारा नाम बहुत प्यारा है, क्या मैं तुम्हें केशू पुकार सकती हूं?’’

उस ने कहा, ‘‘हां… हां क्यों नहीं. मुझे घर में केशू ही बुलाते हैं.’’

अच्छा… तुम्हारे घर में कौनकौन हैं?’’ मैं ने उस से पूछा.

‘‘मेरी मम्मी, पापा 2 बहनें और 1 भाई है.’’

उस की मधुर आवाज मानो कोयल कूहूक रही हो. लेकिन स्वर इतना धीमा कि अपने कानों पर ही संदेह होने लगे. खैर, बातचीत आगे बढ़ाते हुए मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हारे पापा क्या करते हैं?’’

‘‘मेरे पापा बैंक में हैं. उन का ट्रांसफर हुआ है,’’ केशू ने कहा.

‘‘पता है इस क्लास में मुझे तुम सब से अच्छी लगीं. मैं तुम्हें ही देखती रहती हूं और तुम से दोस्ती करने की कब से इच्छुक हूं.’’

उस के धीमे स्वर से मुझे अपनी तारीफ के शब्द बहुत स्पष्ट सुनाई दे रहे थे. पता नहीं प्रशंसा हम सब की जन्मजात क्यों कमजोरी होती है. प्रशंसा से हमारी इंद्रियां भी सचेत हो जाती हैं.

‘‘अच्छा,’’ मैं ने गर्वित मुसकान के साथ कहा, ‘‘अरे ऐसा कुछ नहीं तुम भी बहुत प्यारी हो.’’

‘‘बोर्ड का ऐग्जाम है तुम्हें कोई परेशानी आए तो मुझ से पूछ सकती हो,’’ मैं ने दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए उस से कहा.

अब नित्य का यह क्रम बन गया और हम दोनों की दोस्ती प्रगाढ़ होती गई.

दोस्ती का आलिंगन भी तब ही होता है जब कुछ समानताएं होती हैं और धीरेधीरे हम दोनों कब एकदूसरी से सारी बातें करने लगे पता ही नहीं चला. कैरियर … फिर विवाह और जाने कितने भविष्य के कैनवास. जिन पर मन मुताबिक रंग भरने लगे. ऐसे ही बातों में मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम लव मैरिज करोगी या अरेंज्ड मैरिज?’’

‘‘लव मैरिज? न बाबा यह मेरे बस का रोग नहीं. मैं तो अपने पापा के राजकुमार के साथ ही खुश हूं,’’ केशू ने कहा.

‘‘सही कह रही है. तेरी हिम्मत तो नाम बताने की भी नहीं. लव भी कैसे करेगी… हां बाल के केश और चेहरा जरूर किसी को दीवाना बना सकता है. लेकिन जब वह तुम्हारी आवाज सुनेगा न तो उसे संदेह ही हो जाएगा. लड़की बोलती भी है या नहीं,’’ मैं ने उस की चुटकी लेते हुए कहा.

‘‘हठ पगली लववव मैं नहीं करने वाली,’’ केशू ने कहा.

एक संकोची स्वभाव की सौंदर्य से भरपूर किशोरी है जिस के पापा का हाल ही में स्थानांतरण हुआ है, उस की नए विद्यालय में एक सखी बनती है जिस से वह अपना सब साझा करती है. अब आगे मार्च का महीना है. पूरे सहपाठी जोश से पढ़ाई में लगे हुए हैं. पढ़ाई में सामान्य केशू भी अपनी पूरी ताकत से जुटी हुई है. चूंकि 12वीं कक्षा का ऐग्जाम है इसलिए अथक प्रयास है कि अच्छे अंक अर्जित किए जाएं.

मैं और केशू अकसर साथ पढ़ाई करते थे. साथ ही भावी योजनाएं भी बनाते थे. बोर्ड की परीक्षा में हम दोनों ने ही अच्छे अंक अर्जित किए और भविष्य की ऊंची उड़ानों के साथ महाविद्यालय में दाखिला लिया.

महाविद्यालय, शैक्षणिक जीवन का दूसरा व अंतिम पड़ाव. जहां भविष्य की उड़ान के साथसाथ आंखों में रंगीन सपने भी तैरते हैं. सब की एक अंतरंग ख्वाहिश कि काश कोई सपनोंका सौदागर मिल जाए. प्यार, एक एहसास जिस को सब महसूस तो करना ही चाहते हैं, प्यार की कशिश ही ऐसी होती है. यह बात अलग है कि प्यार हर किसी के हिस्से में नहीं होता.

कालेज में हम गर्ल्स का गु्रप अकसर हंसीठिठोली करता रहता था. उसी में केशू जो हंसने में माहिर थी और उस की उस निश्छल हंसी पर कब समीर फिदा हो गया, पता ही नहीं चला.

कहते हैं इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. लैब में एक दिन समीर ने केशू से मिलने को कहा. केशू में मानो काटो तो खून नहीं. बिना जवाब दिए केशू का चेहरा गुलाबी हो गया. उस के बाद दोनों में कोई बात नहीं हुई.

मूक मिलन का सिलसिला कक्षा में चलता रहा और हम द्वितीय वर्ष में प्रवेश कर गए. एक दिन मैं और केशू कालेज जा रहे थे तो समीर रास्ते में दिखा.

मैं ने केशू की चुटकी लेते हुए कहा कि तुम दोनों की लव स्टोरी कहां तक पहुंची? गानेबाने हुए कि नहीं. उस ने कहा कि कौन सी लव स्टोरी. कोई प्यार नहीं है मेरा तो…

मैं ने कहा कि झूठ मत बोलो. तुम न कहो तो क्या है तुम्हारा गुलाबी चेहरा सब कह रहा है. सचसच बताओ तुम्हें भी पसंद है न समीर?

उस ने मुसकराते हुए कहा कि हां बुरा भी नहीं. लेकिन मैं प्यार के चक्कर में पड़ने वाली नहीं. मेरे लिए तो मेरे पापा ही राजकुमार ढूंढ़ेंगे.

धीरेधीरे समीर का आकर्षण बढ़ता जा रहा था और केशू का संकोची स्वभाव दोनों के मिलने में बाध्य बन रहा था.

एक दिन समीर ने मु?ो एक कागज केशू को देने को कहा. जानते हुए भी मेरा किशोर मन कहां उसे पढ़े बिना रह सकता था. फिर मैं ने वह केशू को दे दिया. मैं ने केशू से कहा, ‘‘अब तो हां कर दे.’’

वह शरमाते हुए बोली, ‘‘नहीं, मुझे नहीं मिलना.’’

मगर उस के चेहरे का रंग बता रहा था कि वह भी समीर को पसंद करने लगी है.

प्यार पाना हर किसी को अच्छा लगता है लेकिन उस में आगे बढ़ना साहस का ही काम है. पहली बात तो प्यार के खरेपन को पहचानना, फिर जमाने से रूबरू होना. केशू जैसी अनेक लड़कियों की चाहतें पलकों में ही दफन हो जाती हैं, उन्हें लफ्ज ही नहीं मिल पाते.

समीर पढ़ने में तेज था, साथ ही अच्छे घर का लड़का भी था. केशू की सौम्यता उस को भा गई थी. चूंकि केशू शरमीले स्वभाव की थी इसलिए समीर भी आगे नहीं बढ़ पा रहा था. वह पढ़ाई में भी केशू की सहायता करता था और दोनों में थोड़ी नजदीकी हो गई.

एक दिन समीर ने केशू से कह ही दिया कि मैं तुम्हें पसंद करता हूं और जीवनभर इस रिश्ते को कायम रखना चाहता हूं.

केशू जवाब तो नहीं दे पाई लेकिन उस रात नींद उस की आंखों से कोसों दूर रही. रातभर इस कशमकश में रही कि समीर को क्या जवाब दे. दिल तो हां कहना चाहता था लेकिन संस्कार विवश कर रहे थे कि घर में कैसे बताएगी.

कहते हैं कुछ फैसले अपनेआप हो जाते हैं. हम अपनेआप को उलझाए रखते हैं और उन का हल स्वत: निकल आता है.

ऐसा ही हुआ. प्यार के रंग में रंगी केशू सुबह उठी तो पापा के स्थानांतरण ने मानो सारे प्रश्नपत्र ही हल कर दिए हों… जिंदगी हमारे सामने प्रश्नपत्र तो रखती ही है. कुछ प्रश्न अनिवार्य भी होते हैं लेकिन उन के हल भी स्वत: उत्तरित होते हैं. लेकिन जब फैसला लेना होता है तो हम अपनी पूरी योग्यता लगा देते हैं. ऐसे ही सुनहरी सपनों और संस्कारों के बीच पलती केशवी को अपने झंझावात से मुक्ति मिल गई और इश्क का सूफियाना रंग एक पल में फीका पड़ गया.

परिवर्तन संसार का नियम हैं… इस परिवर्तनशील संसार में स्थैत्व बनाना हमारी नियति. केशू के पापा के स्थानांतरण के साथ केशू की भी नई जिंदगी शुरू हो गई.

ग्वालियर शहर में नया महाविद्यालय, नए लोग. नए चेहरों में केशू की निगाहें अकसर समीर को ढूंढ़ती रहती थीं.

केशू के पापा ने केशू की बहन का विवाह निर्धारित कर दिया. विवाह की तैयारियों में पूरा परिवार जुट गया. केशू भी अपने जीजू से मिलने के लिए बेहद उत्साहित थी.

समीर अपने कैरियर को ले कर गंभीर हो गया था. वह कई प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया. विवाह की खरीदारी में व्यस्त केशू को एक दिन समीर जैसा चेहरा दिखाई दिया. उस के कदम ठिठक गए और वह उस के नजदीक आने का प्रयास करने लगी. अचानक उस के मुंह से निकल गया, ‘‘समीर तुम?’’

‘‘हां केशू… तुम कैसी हो?’’

समीर की आवाज सुन कर केशू मानो उसे रिकौर्ड करना चाहती हो.

‘‘मगर तुम कैसे हो?’’ बस वह इतना ही पूछ पाई.

तभी उस के पापा उसे बुलाने आ गए.

रात भर केशू की आंखों में समीर का चेहरा घूमता रहा. मन को रक्स के लिए आजाद छोड़ते हुए केशू बहन के विवाह की तैयारियों में जुट गई.

विवाह होते ही बहन अपनी ससुराल में रम गई और नवविवाह की अठखेलियों का लुत्फ केशू अपनी बहन से बड़े चाव से सुनती और मन ही मन अपने भावी राजकुमार को भी देखती.

समय तो ठहरता ही नहीं. अपनी गति से चलता है और धीरेधीरे केशू को अपने विवाह के चर्चे भी घर में सुनाई देने लगे.

पता नहीं क्यों विवाह का स्वप्न आंखों में चमक ला ही देता है. जीवन का एक रंगीन ख्वाब जो बिना तालीम के ही महसूस होने लगता है. ऐसे ही राजकुमार के सपने देखती केशू ने अपने पिता को उस की मां से बात करते हुए सुना था. एक पल को केशू की आंखों में समीर का भी चेहरा सामने आ रहा था. लेकिन सारी चाहतें कहां पूरी होती हैं, यह सोचते हुए केशू अपने पापा की बातों को ध्यान से सुन रही थी. पास ही के शहर ?ांसी का रहने वाला परिवार था.

‘‘2 भाई और 1 बहन है. लंबीचौड़ी जमीनजायदाद है, नौकरी की तो उन को जरूरत ही नहीं. हमारी केशू राज करेगी. लड़का देखने में भी अच्छा है, पढ़ालिखा भी अच्छा है,’’ पापा को कहते सुना केशू ने, ‘‘रईस लोग हैं इसलिए हमें थोड़ा पैसा अच्छा लगाना पड़ेगा पर हमारी केशू अच्छे घर में चली जाएगी.’’

केशू के पापा फिर पैसों की जुगाड़ बताने लगे. केशू की मां भी अपनी बेटी को रानी बनते देखने लगी और धीरेधीरे बात आगे बढ़ने लगी.

‘‘सोमवार को केशू को देखने आ रहे हैं,’’ एक दिन केशू को पापा की आवाज सुनाई दी.

कंपित हृदय से केशू अपने भावी राजकुमार का डीलडौल सोचने लगी और अपनेआप को तैयार भी करने लगी.

मेरा और केशू का संबंध सिर्फ खतों का रह गया था तो कभीकभी हम दोनों एकदूसरे की कुशलता पूछ लिया करते थे.

धीरेधीरे सोमवार आ गया और सुबह से ही केशू को दिखाने की तैयारियां जोरों पर थीं.

घर का कोनाकोना करीने से व्यवस्थित था. रसोई से अनेक व्यंजनों की महक आ रही थी.

घंटी बजी और प्रतीक्षित मेहमान आ गए. पूरा घर उन की खिदमत में लग गया, फिर केशू को भी बुलाया गया. सहमी सी केशू सब के सामने आ कर बैठ गई. औपचारिक प्रश्नों के बाद केशू और भावी राजकुमार को साथ समय बिताने को कहा.

कंपित हृदय से केशू ने जब लड़के से बात की तो केशू को उस की बातों में प्यार की महक न आ कर दंभ की बूआ रही थी. लेकिन वह छोटी सी मुलाकात से किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई.

मेहमानों के जाने के बाद सब ने एकदूसरे की राय जाननी चाही और सब से अहम केशू की राय, जिस में केशू, कशमकश में थी.

‘‘पापा ने देखा है तो अच्छा ही होगा और मैं कहां किसी को समझ पाती हूं,’’ खयालों में डूबी केशू के मन में विचारों का मंथन चल रहा था. एक खयाल आ रहा था दौलत अपनी जगह है और जीवनसाथी अपनी जगह…हां के लिए अपनेआप को तैयार तो कर रही थी लेकिन पूर्णतया हां भी नहीं कर पा रही थी. अनकही चाहत की कशिश लिए केशू ने अपने मन को समझाया कि जिंदगी लंबी है, क्या पता फिर मुलाकात हो जाए.

कालेज में हौट न्यूज बना केशू का स्थानांतरण समीर के कानो तक भी पहुंच गया और अपनी बेबसी का इजहार न कर सका.

देखते ही देखते केशू के जाने का समय नजदीक आ गया और उस के लिए हम सब ने एक विदाई पार्टी भी दी, जिस में समीर भी आया मानो उस के चेहरे का नूर ही चला गया हो. भारी मन से सब ने फोटो लिए गिफ्ट भी दिए और केशू को विदाई दी.

समीर ने बस इतना कहां, ‘‘जहां भी रहो खुश रहो, याद करती रहना,’’ छलकती आंखों से समीर ने केशू को विदा किया.

एक हां से जीवन का फैसला बहुत मुश्किल ही होता है, इसीलिए कहा जाता है विवाह तो लौटरी है. ऐसी ही जद्दोजहद में उलझ केशू का मन. एक तरफ तो भविष्य की उड़ान भर रहा था तो दूसरी ओर लड़के के व्यवहार से थोड़ा आशंकित भी था. लेकिन कुछ फैसले हमारे नहीं होते. हम तो निमित्त मात्र होते हैं और पूरी इबारत लिखी होती है.

केशू ने पापा के चुनाव को निस्संदेह देखते हुए विवाह के लिए हां कर दी. दबा सा एक मलाल जबतब समीर  के लिए आंखों में तैर जाता था. लेकिन हम मध्यवर्गीय लोगों के ख्वाब कहां मुकम्मल होते हैं. यह सोचते हुए केशू भविष्य के रंगीन सपनों में खो गई.

समीर ने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया था. ग्रैजुएशन के बाद उस ने कंपीटिटिव ऐग्जाम की तैयारी में अपनी जान लगा दी. उस की मेहनत रंग लाई और उस ने उच्च पद हासिल कर लिया. लंबे अरसे के बाद केशू के पास खत आया मानो उस को उस का राजकुमार मिल गया हो. उस ने लिखा देख में अपने पापा के ढूंढे़ राजकुमार के साथ ही विवाह करने जा रही हूं और साथ ही उस ने विवाह के लिए आमंत्रणपत्र भी भेजा था.

रंगीन भावी योजनाओं के बीच केशू को अपने मंगेतर का व्यवहार कभीकभी व्यथित कर देता था लेकिन वह सोचती मैं अपने प्यार से सब सही कर दूंगी.

बेशक प्यार में बहुत ताकत होती है. वह इंसान को बदल भी देता है. मगर प्रेम का बीज होता है जब. जिस हृदय की मिट्टी गीली होगी प्रेम का अंकुर वहीं स्फुटित होगा. कुछ हृदय बंजर ही होते हैं वहां प्रेम की आशा ही निरर्थक है.

धीरेधीरे विवाह की तिथि भी नजदीक आती जा रही थी और केशू और उस का परिवार अपनी चादर से ज्यादा पैर फैला रहा था. बिटिया के सुनहरे भविष्य के लिए केशू के पापा ने लोन भी लिया कि बड़े लोगों से रिश्ता जोड़ा है तो विवाह उन के अनुरूप ही होना चाहिए.

अपनी प्रिय सखी के विवाह आमंत्रण को मैं भी नहीं ठुकरा पाई और बिना बताए ही ग्वालियर पहुंच गई. केशू की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने कहा कि मुझे पूरी उम्मीद थी तुम जरूर आओगी. धीरेधीरे अपनी ससुराल के ऐशोआराम का भी बखान करने लगी. हम भारतीय नारी होती ही ऐसी हैं. उन्हें मायके मैं ससुराल के गुणगान और ससुराल में मायके के गुणगान करना अच्छा लगता है.

मेहंदी की रस्म हुई जिस में केशू के हाथों पर उस के भावी पति का नाम सुनील भी लिखा गया. सूर्ख रंग मेहंदी का देख कर मैं ने केशू से कहा कि जीजू तो बहुत प्यार करेंगे तुम्हें… तुम्हारी मेहंदी का रंग बता रहा है. करेंगे क्यों नहीं हमारी सखी है ही इतनी प्यारी. और विवाह की खुशियां गूंजने लगीं. शादी बहुत भव्य स्तर की लग रही थी और उतनी ही खूबसूरत दुलहन. अच्छा खानापीना, सबकुछ उच्चस्तरीय और 7 फेरों के बंधन में बंध गई केशू.

डोली में बैठी केशू अपने मांबाप से विदा होते हुए बहुत रोई और अपने भाई को तो छोड़ना ही नहीं चाह रही थी. नई गाड़ी में साजन के साथ हम सब को छोड़ कर विदा हो गई केशू.

बहुत पैसे वाले लोग हैं. केशू राज करेगी. रिश्तेदारों का विश्लेषण शुरू हो गया. मैं ने भी अपनी सखी के जाने के बाद विदा होना उचित समझ.

आलिशान बंगला और सुंदर सजावट मानो खूबसूरती माहौल के कणकण में व्याप्त हो.

दैहिक सौंदर्य बेशक नैसर्गिक होता है और समय से वह धूमिल भी होता है लेकिन विवाह के समय तो सौंदर्य न केवल एक पैमाना होता है वरन खूबसूरत दूल्हा या दुलहन एक आकर्षण का केंद्र तो होते ही हैं. ऐसी ही खूबसूरत वधू सब की नजरों का केंद्र बनी हुई थी.

रस्मोरिवाज के बाद अंतत: वह घड़ी भी आ गई जब स्त्री अपना संपूर्ण अस्तित्व एक अजनबी को सौंप देती है. जिस अस्मत की हिफाजत वह सालों से करती है विवाह उसी समर्पण की स्वीकृति है.

शर्म से लाल केशू और उस के लंबे केश मानो उस के सौंदर्य में चार चांद लगा रहे हों और फिर दोनों के मिलन की बेला थकी हुई केशू प्यार की प्रतीक्षा में शर्म से छुईमुई हो रही थी.

सुहाग सेज पर बैठी केशू… मध्यम रोशनी. कमरे की भव्य सजावट मानो वातावरण में असीम सुकून घुला हो. बैठेबैठे यों ही इस सुकून में मन को रक्स के लिए आजाद छोड़ते हुए कब आंख लग गई पता ही नहीं चला.

‘‘समीर तुम?’’

‘‘हां, मैं केशू…’’ समीर की आवाज से केशू चौंक गई.

‘‘जिस को शिद्दत से चाहो वह मिल ही जाता है,’’ कहते हुए समीर ने केशू को बांहों में भर लिया. छुईमुई सी केशू मानो पिघल ही जाएगी.

समीर ने केशू के बालों को सहलाते हुए प्यार की निशानी गुलाब उस के सुंदर बालों में लगा दिए. दोनों एकदूसरे की बांहों में खो गए.

अपने अस्तित्व का समर्पण आसान नहीं होता और समर्पण के बिना स्त्री की पूर्णता भी नहीं होती. जैसे नदिया सागर में जा कर मिलती है वैसे ही स्त्री भी पुरुष के समागम में ही पूर्ण होती है. पुरुष जो प्रकृति से ही बलिष्ठ है और स्त्री प्रकृति से कोमल. तो वह एक सशक्त बाहुबल चाहती है जिस को वह अपना वजूद सौंप सके. ऐसे ही बाहुबल की चाहत में केशवी की तंद्रा टूटी और वह तन और मन दोनों से तरबतर हो गई. मैं यह क्या सोच रही हूं. मुझे समीर के बारे में खयाल में भी नहीं सोचना चाहिए. मुझे सुनील को अपनेआप को समर्पित करना है और अचानक उस की नजर घड़ी पर पड़ी. रात्रि के 3 बज चुके थे सुनील अब तक नहीं आए? आशंकाओं से घिरा उस का मन अचानक आहट सुनता है तो अपनेआप को संभालती केशू जैसे धड़कनों को भी सुना देगी.

रात के अंधेरे में ही मन की तहें खुलती हैं. कायनात के रोशन उजाले तो दिमाग को रोशन करते हैं. रात्रि यों तो स्याह होती है लेकिन जीवन पल्लवन इस स्याह रात्रि में ही होता है, मन मिले या न मिले तन के मिलन की यही बेला है. ऐसी बेला की आस में बैठी केशू को जब सुनील की गंध महसूस हुई तो भयभीत केशु मानो चीख पड़ेगी.

सुनील ने शराब पी रखी थी और उस ने केशू के मन को पढ़ना उचित नहीं सम?ा और सिर्फ तन को अनावरत कर वह केशू का पति बन गया.

बेसुध केशू की कब नींद लग गई उसे होश ही नहीं रहा.

बदहवास केशू सुबह उठी तो अपनेआप को व्यवस्थित करने लगी. अपनेआप पर गुस्सा आ रहा था कि ससुराल में पहला दिन और इतनी लेट? नींद को भी आज ही लगना था, सोच रही थी और जल्दबाजी में उस के हाथ से पानी का गिलास फैल गया. बेसुध पड़े सुनील को कुछ पता ही नहीं चला लेकिन डरीसहमी केशू ने पहले पानी समेटा फिर कमरे से बाहर जाने लगी. इतने में एक फ्लौवर पौट गिर गया और तेज आवाज हुई. सकपकाई कैशू ने पौट को सही किया और सुनील की ओर देखा. लेकिन सुनील तो गहरी नींद में था.

केशू ने घड़ी की ओर देखा सुबह के 9 बज चुके थे. केशू अपनी साड़ी और बाल संवार रही थी. इतने में दरवाजे की ठकठक ने केशू की सांसों को और तेज कर दिया. सोच रही थी, सब लोग मेरे लिए क्या सोच रहे होंगे. नवविवाहिता का ससुराल वालों से सामंजय वैवाहिक जीवन की महत्त्वपूर्ण कड़ी होता है और ऐसे में यदि शुरुआत ही सही नहीं हो तो स्थिति मुश्किल हो जाती है.

संस्कारी केशू रिश्तों को दिलों से बांधना चाहती थी लेकिन न चाहते हुए भी उस से गलती हो रही थी. उस ने जल्दी से अपना आंचल संभाला और केश बांधते हुए दरवाजे की ओर बढ़ने लगी सोच रही थी काश, सुनील उसे आ कर बांहों में भर ले और वह उस के आगोश में खो जाए. लेकिन सारी चाहते कहां पूरी होती हैं और बढ़ती सांस और बढ़ते कदम से केशू ने दरवाजा खोला.

नवविवाहिता केशवी देर से सोने के कारण सुबह उठने में भी लेट हो गई. ससुराल में पहला दिन और देर से उठना उस को अपनेआप में लज्जित कर रहा था. उस के कमरे का दरवाजा बजा तो वह बौखलाई सी बाहर आई. बाहर ननद सीमा को खड़े देख कर कुछ बोलती उस के पहले ही सीमा का व्यंग्यात्मक स्वर सुनाई दिया, ‘‘भाभी सुबह हो गई है. क्या भैया ने रातभर सोने नहीं दिया जो अब तक नहीं उठीं?’’

‘‘नहींनहीं वे मुझे,’’ लज्जा से गठरी बनी केशु संयत कंठ से मृदुता से बोली. फिर उस ने नई ससुराल में चुप रहना ही उचित समझो.

कमरे से आगे आई तो सासूमां ने थोड़े सख्त स्वर में कहा, ‘‘हम लोग जल्दी उठते हैं.’’

‘‘जी मम्मीजी,’’ केशू ने कंपित स्वर में कहा.

‘‘अरे बहू का आज पहला ही दिन है उसे चाय तो पिला देते,’’ ससुरजी के स्नेहसिंचित स्वर ने केशू की धड़कनों को कुछ राहत दी.

कहते हैं स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है. पता नहीं क्यों वह उन कसौटियों पर अपनी बहू को भी परखना चाहती है जो उस ने स्वयं पास की होती हैं.

केशू ने अपनेआप को संयत करते हुए घर के लोग व कुछ मेहमानों से बातचीत की. वह बारबार अपने कमरे के द्वार की ओर देख रही थी कि सुनील उठ कर आ जाए.

करीब 12 बजे सुनील उठ कर कमरे से बाहर आया. आते ही उसे चाय दी गई. मां ने बड़े प्यार से बेटे को नाश्ता कराया. नवविवाहिता केशू कनखियों से अपने पति को देख रही थी. एक आस मन में कि सुनील उस के पास आएगा लेकिन कहते हैं न प्रेम नम हृदय में ही अंकुरित होता है. रिश्तों की बुनियाद हमेशा प्रेम ही होती है चाहे वह कैसा ही पाषाण हृदय हो जब प्रेम का अंकुरण हृदय में स्फुटित होता है तो जीवन को नए आयाम देता है. ऐसी नववधू प्रेम की आस लिए अपने घर वालों और पति के प्रेम में सिंचित हो जाना चाहती है.

मेहमानों के आवागमन में दिन बीता और हर किसी ने केशू के रूपसौंदर्य की प्रशंसा की. सभी ने नवदंपती को भरभर के आशीर्वाद दिए. ऐसे ही पहर बीतते गए और रात्रि भोजन का समय आ गया. केशू रात्रि भोजन के समय सुनील को तलाश रही थी लेकिन वह नजर नहीं आया.

नवविवाहिता केशू अपने पति के इंतजार में पलक पावड़े बिछा कर बैठी थी. जैसे ही सुनील के आने की आहट हुई वह चौकस हो गई. इंतजार की घडियां समाप्त हुईं और सुनील उस के शयनकक्ष में आया. वह अपना तन और मन दोनों समर्पित करना चाहती थी. सुनील के मन को भी पढ़ना चाहती थी लेकिन उस की सोच के विपरीत सुनील उस से औपचारिक बात कर के उस का पति बन जाता है. मानो केशवी के सारे सपनों पर पानी फिर गया हो. केशू जीवनसाथी के रूप में ऐसा साथी चाहती थी जो कुछ अपनी कहे और कुछ केशू की सुने. रात्रि के अंधकार में दोनों के मन की परतें खुलें लेकिन सारी चाहतें कहां मुकम्मल होती हैं.

केशू उच्च घराने की वधू तो बन गई थी लेकिन उस के ख्वाबों का शहजादा शायद नहीं मिला था. प्रात: जल्दी स्नान कर के वह कमरे से बाहर आ गई थी. वह कल की गलती को दोहराना नहीं चाहती थी. करीब सभी मेहमान घर से विदा हो गए थे. उस की ननद को उस का समान जमवाने की जिम्मेदारी दी गई थी. ननद ने जब भाभी की साड़ी देखी तो मुंह बना बर बोली, ‘‘भाभी, इतने लाइट शेड हम नहीं पहनते. आगे से शोख रंग खरीदना.’’

केशू मानो अपनेआप को दोष दे रही हो. फिर उस ने सासूमां को उस की मां के यहां से आई साड़ी दी तो सास का मुंह देख कर केशू तो पानीपानी हो गई,

‘‘अपनी मां को कहना ऐसी साड़ी मैं नहीं पहनती हूं.’’

केशू ने वह साड़ी तुरंत अपने समान में रख ली.

विवाह स्त्री के जीवन की नई शुरुआत होता है. यदि दोनों पक्षों का मेल न हो तो विवाहिता के लिए एक चुनौती हो जाती है. ऐसे में यदि पति का प्यार मिल जाए तो वह एक बूटी का काम करता है लेकिन इस प्यार से महरूम केशू का दम घुटने लगा था और वह जल्द से जल्द अपने मायके जाना चाहती थी.

अगले दिन उस का भाई और उस के मामा, बूआ के लड़के उसे लेने आ गए. केशू का मन मानो उड़ान भर रहा हो और वह जल्द से जल्द यहां से जाना चाहती थी.

आलीशान घर में अपनी बहन को देख कर उस के भाई भी खूब खुश नजर आ रहे थे. केशू के मायके जाने का समय भी आ गया और वह सुनील को देख रही थी. फिर सुनील नजर आया और उस ने हलकी सी मुसकान के साथ सुनील को देखा और फिर चल दी अपने भाइयों के साथ.

मायके जा कर केशू अपनी मां के गले मिली और उस की बेतहाशा रुलाई फूट पड़ी.

‘‘अरे पगली आज के समय में कोई ऐसे रोता है क्या?’’ उस के पापा ने उस के सिर पर स्नेहसिंचित हाथ फेरा.

मां की अनुभवी आंखें कुछ भांप गई थीं. भाई ने दीदी के आलीशान बंगले की तारीफ करते हुए कुछ माहौल को हलका करने की कोशिश की.

सांझ पड़े केशू कि सखियां उस से मिलने आईं और उस से मसखरी करते हुए उस के और जीजाजी के मध्य हुई बातचीत पूछने लगीं. लेकिन केशू और सुनील के बीच गिनेचुने ही संवाद हुए थे इसलिए केशू ने बात को टाल दिया.

केशू की बहन ने भी केशू से पूछा, ‘‘कैसी लगी हमारी बहना को ससुराल और पतिदेव?’’

केशू ने कहा, ‘‘सब अच्छा है.’’

मगर केशू का उदास चेहरा किसी से भी छिपा नहीं था.

‘‘दामादजी कल लेने आ रहे हैं,’’ केशू के पापा ने केशू की मम्मी से कहा और केशू की विदाई की तैयारी के साथ ही दामादजी के स्वागत की तैयारी भी जोरों से घर में होने लगी.

केशू का चेहरा सफेद पड़ रहा था. मां की अनुभवी आंखें समझ गई थीं कि दामादजी के आने का समाचार सुन कर केशू के चेहरे की तो रौनक बढ़नी चाहिए लेकिन केशू का चेहरा उदास क्यों? उन्होंने बेटी को कलेजे से लगा कर पूछा, ‘‘बिटिया सब ठीक तो है?’’

केशू की रुलाई फूट पड़ी, ‘‘हां मां, सब ठीक है.’’

‘‘बेटी थोड़ीबहुत उन्नीसबीस तो हर घर में होती है तुझे ही दोनों कुलों की लाज रखनी है. ससुराल और मायके दोनों का सेतू है तू,’’ मां ने हिदायत भरे स्वर में कहा.

सुनील आ गया और उस का ससुराल में भव्य स्वागत किया गया. महंगे तोहफों के साथ केशू और सुनील को विदा किया गया.

केशवी मायके से विदा हो कर ससुराल में आ गई. सुनील का अजीब व्यवहार उसे परेशान कर रहा था. ससुराल में आ कर सासूमां भी उस के मायके से आए हुए समान में मीनमेख निकालने लगी तो केशू और  सहमी सी हो जाती है. ससुरजी का स्नेहसिंचित हाथ मानो रेगिस्तान में पानी की बूंद सा प्रतीत होता. ननद भी केशू की हमउम्र हो कर भी एक दूरी ही बनाए रखती थी.

रात्रि के नीरव पहर में केशू, निशिकर की ज्योत्सना में सुनील से घंटों बतियाना चाहती थी लेकिन सुनील का देर रात तक आना और कम बात करना केशू को बेचैन कर देता था.

विवाह सौंदर्य को निखार देता है लेकिन केशू दिनबदिन सूखती जा रही थी. एक दिन केशू सुबह उठने का प्रयास कर रही थी लेकिन उस का शरीर साथ नहीं दे रहा था, उसे बुखार महसूस हुआ. थर्मामीटर से नापा तो उसे तेज बुखार था, उस ने सुनील को जगाया लेकिन सुनील की बेरुखी बुखार से ज्यादा उस के मन की तपन बढ़ा गई. कुछ मरहम प्यार का, बीमार तन और मन दोनों को ठीक कर देता है लेकिन उपेक्षा ज्वर की तीव्रता को बढ़ा भी देती है.

कुछ समय बाद सासूमां केशू के कमरे में आई. थोड़ी देर रुक कर बोली, ‘‘सुनील इसे इस के मायके भेज दो. इस के मायके वाले ही इस का इलाज करवाएंगे.’’

सासूमां के शब्द सुन कर केशू के पैरों तले की जमीन खिसक गई. अविरल अश्रुधारा बहने लगी. रोतेरोते कब उस की आंख लग गई पता ही नहीं चला.

रात में सुनील कमरे में आया और बोला, ‘‘कल तुम्हें तुम्हारी मां के यहां छोड़ आता हूं.’’

सुन कर केशू ने कहा, ‘‘क्यों?’’

सुनील ने कहा, ‘‘वहीं तुम्हारा इलाज हो जाएगा और वहीं देखभाल भी हो जाएगी.’’

तीर की तरह लगने वाले शब्द केशू के अंतर्मन को भेद गए. वह सोच रही थी इस घर में वापस कदम रखना ही नहीं. वह रातभर सो नहीं सकी.

देर तक सोने वाला सुनील अल सुबह उठ गया और केशू को साथ ले जाने की तैयारी करने लगा. सासूमां के उलहानो से आहत केशू का मन सुनील के व्यवहार से तारतार हो गया.

केशू को यों अचानक आया देख केशू की मां आश्चर्यचकित हो गई. केशू की बेतहाशा रुलाई फूट पड़ी. सुनील की उपस्थिति ने संवादों को रोक रखा था लेकिन भावों का अविरल प्रवाह बह चुका था. भावहीन सुनील कुछ समय पश्चात वहां से रवाना हो गया.

केशू ने अपने मन का ज्वार हलका किया. तन के ज्वर से ज्यादा उस के मन का ज्वार ज्यादा उफान ले रहा था. पूरे घर में मानो सन्नाटा पसर गया होे.

हम भारतीय बेशक संस्कारों को आत्मसात किए हुए हैं लेकिन कहींकहीं हम इन्हें थोपना भी चाहते हैं खासकर समाज का डर हमारे लिए हमारे अपनो से बढ़ कर है. हम अपनी बेशकीमती वस्तु भी समाज की खातिर दांव पर लगा देते हैं.

केशू को उस के मांबाप ने यही सम?ाया, ‘‘बेटा, कुछ कमी हर घर में होती है. हम

तुम्हारा इलाज करवाएंगे. तुम ठीक हो जाओगी

तो वहीं जाना.’’

डाक्टर को दिखाया. केशू को बुखार के साथ पता चला वह गर्भ से है.

कहते हैं कुछ बंधन हम छोड़ भी नहीं सकते और उन्हें निभा भी नहीं सकते. केशू स्वयं के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थी. ऐसे में दूसरी जान का आ जाना उसे बेहद पीड़ादायक लग रहा था.

केशू स्वस्थ हुई तो उसे उस के भाई के साथ उस की ससुराल में भेजा गया. उम्मीद पर कायनात कायम है. केशू ने सोचा मेरा नहीं तो नए मेहमान के आगमन से मुझे इस घर में स्थान मिल जाएगा.

भावहीन सुनील को नए मेहमान के आगमन की कोई खुशी नहीं हुई. सिसकियां लेता केशू का मन उस बच्चे को ही दुनिया में नहीं लाना चाहता था लेकिन जन्म और मृत्यु तो जीवन के अटल सत्य हैं. धीरेधीरे सासूमां का शासन बढ़ता ही जा रहा था. सुनील की उपेक्षा भी केशू से छिपी नहीं थी. केशू का इस घर में दम घुटने लगा था. वह किसी भी कीमत में मायके जाना चाहती थी. वह अपना और अपने आने वाले बच्चे को भविष्य दांव पर नहीं लगाना चाहती थी.

गर्भवती केशू अपने भाई के साथ अपनी ससुराल आ गई. वहां जब अपने पति सुनील को यह खबर सुनाई तो सुनील की बेरुखी केशू को और आहत कर देती है. उस की सास ने उस के आने के बाद कामवाली को भी हटा दिया. केशू की गर्भावस्था ऊपर से घर का काम और सब की बेरुखी केशू को अंदर तक ?ाक?ोर देती है. उस के सारे सपने कहीं खो गए. वह यहां रहना ही नहीं चाहती थी. घर का सारा काम करतेकरते वह थक जाती थी, वह सोचती थी सुनील एक आवरण ले कर जन्मा है. भावहीन आवरण जिस में प्यार का कोई स्थान नहीं. हम दोनों संग रहित साथी हैं जिस में दोनों निर्निमेष नत नयनों से साथ रात्रि बिता देते हैं.

एक दिन बरसात में रात्रि को बारिश हुई और निशीकर ने दर्शन दिए. उस यामिनी को देखने केशू ?ारोखे के पास जा बैठी. बारिश की सुगंध और ?ांगुरों की ध्वनि ने उस के मनोराज्य में एक प्रकार की अराजकता व्याप्त कर दी. वह सोच रही थी आज सुनील से फैसला करवा कर रहेगी. उस ने सुनील को उठाया उस समय सुनील निद्रालोक की सैर कर रहा था.

केशू ने कहा, ‘‘मैं यहां अब और नहीं रह सकती मेरा दम घुटता है यहां. आप मु?ो अपने होने वाले बच्चे की खातिर ही मुझे मेरे मायके छोड़ आओ.’’

सुनील ने कहा, ‘‘सुबह मां से बात करेंगे,’’ और वह सो गया.

चिरगमन के लिए प्रतीक्षित केशु भोर होने की प्रतीक्षा में रातभर सो नहीं पाई केशू सुबह के नित्यप्रति कार्य कर रही थी लेकिन उसे अपनी तबीयत सही नहीं लग रही थी. उस ने अपनी सासूमां से कहा तो उन्होंने कहा, ‘‘ऐसी तबीयत तो इस समय में यों ही चलती रहती है.’’

थोड़ी देर बाद केशु का बदन बुखार से तपने लगा तो उस ने सुनील से कहा. फिर केशु की सासूमां आई और बोली, ‘‘इस के इलाज के पैसे इस के मायके से मंगवा लो और कहो कि वे अपनी बेटी को ले जाएं. यहां कौन इस की सेवा करेगा.’’

केशू मानो चीख दे कर कहने को आतुर कि मायके से मेरे इलाज के पैसे क्यों आएंगे? लेकिन वह कुछ विद्रोह न कर सकी. सुनील की मूक सहमती उस का दर्द दोगुना कर रही थी.

फिर सुनील ने अपनी मां से केशु के जाने की बात की तो मां ने कहा, ‘‘इस को अभी छोड़ आओ. इस के मायके वाले ही इस का इलाज करवा लेंगे और वे ही इस की डिलिवरी करवा देंगे.’’

सुनील तो मानो रिमोट कंट्रोल रोबोट हो जिस का रिमोट मां के हाथ था. वह केशु को छेड़ने जाने की तैयारी करने लगा.

बुखार से तपन और तारतार हुआ केशू का मन अपनेआप को पूरा टूटा हुआ महसूस हो रहा था. उस का दिमाग शून्य हो गया और वह सुनील के साथ चल पड़ी.

मायके पहुंचते ही केशू को यों अचानक आया देख केशू की मां का मन आशंकाओं से घिर गया. वह कुछ न बोलते हुए स्थिति को भांप गई थी.

सुनील के जाने के बाद केशु ने सारा हाल कह सुनाया और कहा, ‘‘मैं उस घर में नहीं जाना चाहती.’’

मां ने आलिंगन कर के बेटी को समझाया कि कोई राह निकालेंगे.

समय अपनी गति से जा रहा था केशू का अधीर मन एक प्रतीक्षा में कि सुनील लेने आएगा. लेकिन वह नहीं आया और केशु के मां बनने का समय भी आ गया.

कुछ एहसास दिलों के होते हैं. नि:शब्द का नाद होता है जिसे हम सांसारिक सुख कहते हैं. इसीलिए ब्रह्मांड में संतानोत्पत्ति का कार्य स्त्रीपुरुष के संयोजन से ही किया है लेकिन जब केशु ने अपने समीप सुनील को नहीं पाया तो उस की मां बनने की सारी खुशी काफूर हो गई.

‘‘बेटा हुआ है,’’ दर्द की अनंत गहराई को महसूस कर के जब उस ने सुना तो केशू के चेहरे पर सौंदर्यमयी मुसकान आ गई.

नवजात का आलिंगन सूखी भूमि पर अमृत की मानिंद प्रतीत होता है.

सुनील और उस की मां बेटे को देखने आए. केशु उन के साथ जाना चाहती थी लेकिन जब दूरियां होती हैं संवादहीनता भी आ जाती है और कहनेसुनने का जरीया भी खत्म हो जाता है.

बेटे का नाम सृजन रखा था केशू ने. वह उस के साथ ही अपनी जिंदगी सृजित करना चाहती थी. 2 महीने का हो गया था सृजन तो केशू के मांबाप ने केशु को ससुराल भेजना मुनासिब सम?ा. हालांकि केशू वहां नहीं जाना चाहती थी. लेकिन वह वहां भी नहीं रहना चाहती थी.

फोन करने पर भी जब सुनील  नहीं आया तो केशू ने सुनील से अलग हो जाना बेहतर समझ लेकिन उस के पापा एक आखिरी सुलह करवाने के लिए अपनी बेटी को साथ ले गए.

केशू बोझिल मन से अपने पापा के साथ अपनी ससुराल चली गई. अपने बेटे की खातिर वह जीवन से समझौता करना चाहती थी. वह अपने शुष्क हृदय को ममता से तृप्त करना चाहती थी. उस के पापा उसे ससुराल छोड़ आए.

इतने बड़े घर में शादी होने के बावजूद केशू सारा काम हाथ से करती. नन्हा सृजन रोता रहता सासननद दोनोें केशू के काम में हाथ नहीं बंटातीं न ही नन्हे सृजन को लेतीं. सुनील की उदासीनता केशू की तकलीफ को असहनीय कर देती थी.

एक दिन सृजन की तबीयत खराब हो गई. केशू ने अपनी सासूमां को बताया तो बोली, ‘‘सृजन के इलाज के लिए अपने मायके चली जाओ वो ही इस का खर्चा भी उठा लेंगे.’’

आहत केशू का मन सिसकियां भर रहा था. उस ने कहा, ‘‘यह इस घर का वारिस है तो इस का इलाज भी यहीं होना चाहिए.’’

इस पर उस की सासूमां ने कहा, ‘‘बहुत जवान चलती है सुनील इस को अभी इस के घर छोड़ कर आओ.’’

केशू ने कहा, ‘‘मेरा घर तो यही है.’’

सुनील बोला, ‘‘नहीं तुम अपने घर ही रहो. अभी चलो,’’ और सुनील केशू को ले गया.

मायके पहुंच कर केशू ने अपने मांबाप से कहा, ‘‘मैं कभी उस घर में कदम नहीं रखूंगी. मेरा तलाक करवा दो.’’ केशू के पापा ने अब यही  बेहतर समझा और वकील से बात की.

जिंदगी कभी ऐसे मोड़ पर ले आती है कि हमें कड़े फैसले लेने ही पड़ते हैं. ऐसे ही मंझधार में खड़ी केशू को समाज की अवहेलना के साथ यहां भी सुनील की बेरुखी से भुगतना पड़ा. सुनील तलाक देने को भी तैयार नहीं था और रहना उस के साथ संभव नहीं था.

संकोची केशवी ने हिम्मत से काम लेते हुए तलाक का फैसला अटल रखा. केस लड़ती रही और उस ने एक स्कूल में नौकरी भी जौइन कर ली. नन्हा सृजन अपनी नानी के पास रह जाता. केशू स्कूल चली जाती.

करीब 1 साल केशू का केस चला और अंतत: फैसला केशू के पक्ष में हुआ और सुनील का तलाक हो गया.

केशवी अपने बेटे के सहारे जीवन जीना चाहती थी. उस की नीरस जिंदगी में वही आशा की किरण था. कहते हैं यह समाज भी हमें जीने न देता. केशू के पास अभी भी कोई भी रिश्ता ले कर आ जाता मानो केशू कोई बेनाम चिट्ठी हो जिसे हरकोई पढ़ना चाहता हो. केशू ने साफ इनकार कर दिया कि वह अकेले ही जीवन जीना चाहती है. उसे दोबारा शादी नहीं करनी.

एक दिन केशवी बाजार गई. वहां उसे एक चेहरा परिचित सा लगा लेकिन उस ने नजरअंदाज कर दिया. फिर एक परिचित आवाज आई, ‘‘केशु तुम?’’

अचानक समीर की आवाज सुन कर केशू की धड़कनें तेज हो गईं वह उस से बचना चाहती थी लेकिन उस की आवाज ने उस के दिल के तारों को ?ांकृत कर दिया. वह सहमी सी बोली, ‘‘हां में केशू.’’

‘‘तुम बहुत बदल गई हो सब ठीक तो है?’’ समीर ने पूछा तो केशू मानो वहां से भाग ही जाना चाहती थी. लेकिन उस ने औपचारिकता दिखाते हुए कहा कि हां सब ठीक है और वह जाने लगी तो समीर ने उस का फोन नंबर मांगा. नंबर दे कर केशू वहां से चल दी. उस ने समीर की खैरियत भी नहीं पूछी और वहां से भाग ली. घर आ कर वह सामान्य होने का प्रयास कर रही थी लेकिन रहरह कर उस के जेहन में समीर का चेहरा घूम रहा था.

समय का पहिया घूम रहा था. केशू का सुबह का समय स्कूल में और शाम सृजन के साथ व्यतीत हो जाती थी लेकिन एक खामोशी सी जिंदगी में पसार गई थी. वह सृजन के भविष्य को सुरक्षित करना चाहती थी.

एक दिन शाम को फोन की घंटी बजी. उधर से आवाज आई, ‘‘हेलो केशू, मैं समीर. तुम से मिलना चाहता हूं. प्लीज मना मत कहना. संडे को किसी कैफे में मिलते हैं.’’

केशू ने कहा, ‘‘मुझे नहीं मिलना किसी से.’’

समीर ने कहा, ‘‘एक बार मिल लो. मैं इंतजार करूंगा.’’

केशू ने फोन रख दिया. लेकिन कुछ लमहे ऐसे होते हैं जिंदगी के जो जब भी मिलते हैं हलचल पैदा कर देते हैं.

केशू उस फूल के समान हो गई जिस पर भ्रमर आ बैठा हो, वह उस भ्रमर को बुलाना भी चाहती है और उसे ही वह उड़ा भी रही है.

रविवार का दिन था सुबह फोन की घंटी बजी तो जैसे केशू के दिल की वीणा झंकृत हो गई हो. एक प्रतीक्षित फोन जिस की केशू उम्मीद कर ही रही थी.

‘‘मैं समीर, तुम शाम को आ रही हो न कैफे में.’’

केशू ने कहा, ‘‘हां.’’

कभीकभी दिल के जज्बात दिमाग पर प्रभावी हो जाते हैं. अत: बिना समय गंवाय केशू ने स्वीकृति दे दी.

जख्म कितना भी गहरा हो. दिल कब तक अपने अंतस की अंतर्मुखी बातें खुद में छिपाए रहता? केशू ने समीर से मिलना ही बेहतर समझा.

एक अरसे के बाद केशू ने अपनेआप को दर्पण में निहारा. फिर करीने से तैयार हो कर बेटे को अपनी मां को देते हुए कहा, ‘‘मां, मुझे अपनी फ्रैंड से मिलने जाना है.’’

‘‘ठीक है बेटा,’’ मां ने कहा.

दोनों नियत समय पर आ गए. समीर ने कौफी और्डर की. फिर पूछा, ‘‘कैसी चल रही है तुम्हारी मैरिड लाइफ?’’

केशू ने कहा, ‘‘सब खत्म हो गया. मेरी लाइफ में तो एक बेटा है. अब सबकुछ वही है.’’

‘‘कुछ डिटेल में बताओगी? मैं जानना चाहता हूं?’’ समीर ने कहा.

‘‘मैं अतीत को भूल जाना चाहती हूं. वर्तमान मैं ने तुम्हें बता दिया है. तुम बताओ अपनी लाइफ के बारे में?’’

‘‘शादी नहीं की,’’ समीर ने संक्षिप्त उत्तर दिया.

‘‘क्यों?’’ केशू ने हैरानी से पूछा.

‘‘प्यार अनंत है. फिर दिल जिसे चाहे, दिल को जो भा जाए, फिर चाहे लाख समरंगी, समरूपी चीजें हों पर दिल किसी अन्य को चाहता ही नहीं है.

‘‘लंबे समय से अकेलेपन की आज जा कर समाधि टूटी जब तुम्हारे द्वार पर आज दिल ने दस्तक दी है. मैं तुम से विवाह करना चाहता हूं. तुम स्वीकार करो या अस्वीकार. मरजी तुम्हारी है.’’

‘‘कैसी बात करते हो समीर. मैं तलाकशुदा, समाज से अवहेलित तुम इतने बड़े अफसर और कुंआरे… तुम्हारे लिए तो लड़कियों की कतार लग जाएगी,’’ फिर मैं ने कहा न कि मेरा भविष्य तो मेरा बेटा है. तुम्हें नए सिरे से अपनी वैवाहिक जिंदगी शुरू करनी चाहिए. तुम मेरे साथ अपना भविष्य क्यों खराब करना चाहते हो?’’ केशू ने लंबी सांस भरते हुए कहा.

‘‘बात दिलों की है, नि:शब्द के नाद की है, अनंत की अनंत से पुकार है. इस में मैं कर भी क्या सकता हूं?

‘‘मानता हूं और सम?ाता भी हूं कि तुम्हारा शादी का अनुभव अच्छा नहीं रहा. लेकिन जिंदगी रुकने का नाम तो नहीं. एक नई शुरुआत करनी ही पड़ती है. हर काली रात के बाद उजली सुबह आती है. एक नूतन सवेरा तुम्हारे सामने बांहें फैला कर खड़ा है. मेरे दिल के दरवाजे तुम्हारे लिए सदैव प्रतीक्षारत रहेंगे,’’ समीर ने कहा.

‘‘मुझे समय चाहिए. मैं अतीत, वर्तमान और भविष्य में सामंजस्य नहीं बैठा पा रही हूं. मैं सृजन का भविष्य दांव पर नहीं लगा सकती,’’ केशू ने कहा.

‘‘सृजन आज से मेरा बेटा है. मैं उसे किसी तरह की परेशानी नहीं होने दूंगा. तुम विश्वस्त रहो केशू.’’ समीर ने केशू का हाथ पकड़ लिया. वह उन हाथों को हमेशा के लिए अपने हाथों में लेना चाहता था.

‘‘मुझे कुछ समय चाहिए,’’ कह कर केशवी ने समीर से विदा ले ली.

समीर आंखों से ओझल होने तक उसे देखता रहा.

घर आ कर केशू ने सब से पहले नन्हे सृजन को गले से लगाया और वह बहुत जोरजार से रोने लगी. वह सोच रही थी कि ममता बेमानी नहीं हो सकती. वह अपनी खुशी की खातिर सृजन का भविष्य दांव पर नहीं लगा सकती. कशमकश में पलता केशू का मन और मन के कई हिस्से हुए जा रहे थे. एक तरफ ममता का आंचल, एक तरफ समाज और एक तरफ मृदु समीर का आर्द्र स्पर्श जो उसे पुकारता है. समीर का अनंत प्यार. अनंत इंतजार. छू लेता है केशू का मन. इसी ऊहापोह में उस की नींद लग जाती है.

सुबह जब नींद खुलती है तो फिर वही कुरुक्षेत्र बना उस का मन. सब पहलुओं को विचारने लगा. उस के अंतस की आवाज आई कि समाज को तो मुझे दरकिनार कर ही देना चाहिए बल्कि मुझे एक सुरक्षाकवच मिलेगा. सृजन को भी एक पूर्णता मिलेगी. सुनील जैसे व्यक्ति के लिए क्या अफसोस जैसे अपनी कटी पूंछ के लिए नहीं रोती गोधिका, जानती है नियत है उस का पुन: बढ़ जाना. ऐसे ही मुझे सारे असमंजस त्याग कर समीर को हां कह देनी चाहिए.

नित्यप्रति के काम निबटा कर केशू स्कूल चली गई. वहां भी उस का मन एक बेचैनी महसूस करता रहा. शाम को जब घर लौट कर आई तो उस ने सोचा अपने मांपिताजी से बात कर ली जाए.

संकोची केशू ने हिम्मत जुटा कर सारी बात अपने मांपिताजी को बताई तो मां ने कहा, ‘‘बेटा, समीर हमारी बिरादरी का भी नहीं तो लोग क्या कहेंगे. तुम्हारा एक फैसला हमारे परिवार की इज्जत धूमिल कर देगा.’’

मगर केशू के पिता केशू का अकेलापन महसूस कर रहे रहे. वे केशू की आंखों में समीर के लिए प्यार भी देख रहे थे. अत: उन्होंने कहा, ‘‘जो लड़का केशू को इतना प्यार करता है, जिस ने शादी ही नहीं कि वह हमारी केशू को जान से ज्यादा प्यार करेगा.’’

फिर थोड़ी देर रुक कर उन्होंने केशू की मां से कहा, ‘‘रही बिरादरी की बात तो सुनील हमारे समाज का ही लड़का है फिर भी उस ने रिश्तों को नहीं समझा रिश्ते और प्यार किसी जाति से नहीं बंधे. वे तो हर इंसान का अपना व्यक्तित्व है. हमें देर न करते हुए अपनी केशवी का हाथ समीर के हाथों में सौंप देना चाहिए.’’

केशवी की मां को भी यह बात कुछ सही लगी. फिर कहा, ‘‘सृजन का क्या होगा?’’

तब केशू नू कहा, ‘‘समीर ने कहा है सृजन आज से उस का ही बेटा है.’’

सुन कर केशवी की मां का मन खुशी से प्रफुल्लित हो गया. वो अपनी बेटी की वीरान जिंदगी में बहार देखना चाहती थी.

अगले दिल सुबह केशवी के पापा समीर से मिलने गए. समीर की सौम्यता और व्यावहारिकता केशू के पिता के दिल को छू गई. उन्होंने कहा, ‘‘समीर, मैं अपनी केशू का हाथ आप के हाथों में सौंपना चाहता हूं.’’

समीर ने कहा, ‘‘आज मेरी चिर प्रतीक्षा खत्म हुई. केशू और सृजन आज से मेरे जीवन का हिस्सा हैं.’’

केशू के पापा ने घर लौट कर सब को खुशखबरी सुनाई. लंबी उदासी के बाद एक बार फिर घर में खुशी की लहर दौड़ गई.

सादगीपूर्ण तरीके से दोनों का विवाह हुआ. नन्हा सृजन भी विवाह का हिस्सा था.

सुहाग सेज पर बैठी केशू समीर को अपने पास पा कर छुईमुई हुई जा रही थी.

समीर ने कहा, ‘‘अपने नाम के अक्षर पहन में तुम्हारा आलिंगन करता हूं. तुम्हारे बिना मेरा जीवन क्षितिज की भांति था जिस का कोई अस्तित्व नहीं. तुम्हें पा कर आज मुकम्मल हुआ हूं मैं.’’

केशवी ने कहा, ‘‘काश, हम पहले मिल पाते.’’

समीर ने कहा, ‘‘अतीत का कोई मलाल न करो. कब किस को मिलना है यह हम तय नहीं करते. कुछ कम कुदरत अपने हाथ में ही रखती है.’’

केशवी जैसे अपनी पूर्णता को प्राप्त कर गई हो.

Social Story : मिसेज चोपड़ा मीडिया और न्यूज

Social Story : लंबा कद, गोरा रंग, सलीके से   बंधा हुआ जूड़ा, कलफ लगी बढि़या सूती साड़ी और साड़ी के रंग से मेल खाते गहने पहने मिसेज चोपड़ा पूरे दफ्तर में अलग ही दिखती थीं. मैं जिस दफ्तर में काम करती थी वहां काम कम ही होता था. यों समझ लीजिए, अकसर लोग गरमगरम चाय और गरमागरम बहस से टाइम पास करते थे. कुछ ही दिनों में दफ्तर का यह माहौल देखदेख कर मेरा धैर्य जवाब दे गया.

मैं ने अपने एन.जी.ओ. के कोआर्डिनेटर से एक दिन बातों ही बातों में पूछ लिया, ‘‘यह मिसेज चोपड़ा मुझे आफिस में सब से अलग दिखती हैं, यह कैसा काम करती हैं. मैं अभी नई हूं इसलिए इन के बारे में ज्यादा जानती नहीं हूं.’’

सामने बैठे मिस्टर शर्मा बोले, ‘‘यह यहां पी.आर.ओ. के पद पर हैं. पब्लिक और प्रेस से डीलिंग करना ही इन का काम है. यह किसी मजबूरी में नौकरी नहीं कर रही हैं. मिसेज चोपड़ा जैसी हाइक्लास सोसाइटी की औरतें जब अपनी किटी पार्टियों से बोर हो जाती हैं और उन्हें अपना समय बिताना होता है तो वे किसी एन.जी.ओ. से जुड़ जाती हैं. समय भी बीत जाता है, नाम भी मिल जाता है. मिसेज चोपड़ा भी इसी रंग में रंगी हैं.’’

मैं थोड़ी देर में अपनी जगह पर वापस आ कर काम में जुट गई. चूंकि मेरे ऊपर अपनी विधवा मां की जिम्मेदारी थी इसलिए मैं अपना काम बड़ी ईमानदारी से करती थी. मैं कुछ दिनों से यह भी अनुभव कर रही थी कि मिसेज चोपड़ा मुझे पसंद नहीं करती हैं. मेरे हर काम में उन्हें सिर्फ कमी ही नजर आती थी.

मिसेज चोपड़ा ने धीरेधीरे मुझे सताना शुरू कर दिया. मेरी किसी भी रिपोर्ट को रद्द कर देतीं और फिर से नए ढंग से बनाने को कहतीं. कभी आफिस के काम से हटा कर फील्ड वर्क पर लगा देतीं तो कभी अचानक फील्ड वर्क से आफिस भेज देतीं.

एक दिन उन्होंने मुझ से पूछ ही लिया, ‘‘मिस बेला, आप इतना कम क्यों बोलती हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैडम, ऐसा तो नहीं है. बस, मैं बोलने से ज्यादा काम करना पसंद करती हूं. फिर हम जो काम कर रहे हैं अगर उस में हम अपने बारे में ही सोचेंगे तो दूसरों के दुख कब शेयर करेंगे.’’

वह अचानक बौस के ढंग में बोलीं, ‘‘मिस बेला, इस केस की डिटेल्स पढि़ए. नेहा के घर वालों का बयान लीजिए और गवाहों से बात कीजिए. पुलिस से भी मिलिए. आजकल बहुत कंपीटीशन है. मैं मीडिया से बात कर के रखती हूं. हम पहले केस सुलझा लेंगे तो हमारा नाम होगा. हमारी बढि़या न्यूज तैयार होगी.’’

मैं सिर झुकाए बोली, ‘‘किसी के दुख पर सफलता की सीढ़ी लगाना अच्छा तो नहीं लगता, मैडम.’’

उन की नजरें मुझ पर जम गईं. अच्छा स्टेटस, पैसा और अच्छे संबंध यही दुनिया में जीने के उन के सिद्धांत थे.

मैं अपने गु्रप के साथ घटनास्थल पर जाने को निकल गई. वह एक बौस की तरह मेरे साथ थीं. मैं ने नेहा के घर वालों से बहुत से सवाल पूछे. नेहा को उस के ससुराल वालों ने जला कर मार दिया था. नशे की हालत में उस के पति ने उस पर तेल छिड़क कर आग लगा दी थी. मिसेज चोपड़ा बहुत खुश थीं कि अगर मीडिया यह न्यूज अच्छी तरह से पेश करता है तो उन का बहुत नाम होगा. उन्होंने प्रेस कान्फ्रेंस बुला कर मीडिया में इस मामले पर हलचल मचा दी.

उन की इस हरकत से मैं बहुत बेचैन थी. अपनी उस बेचैनी को कम करने के लिए मैं उन के केबिन में जा कर फट पड़ी, ‘‘मैडम, इस प्रेस कान्फ्रेंस से नेहा को क्या फायदा पहुंच रहा है? उस की मौत को भुना कर हमें क्या मिलेगा?’’

मेरे अंदर सवालों का ढेर लगा था. उन्हें मुझ पर गुस्सा आ गया, ‘‘मिस बेला, आप को क्या लगता है कि हमारी संस्था सिर्फ नाम कमाने के लिए दूसरों के दुख अपने पास जमा करती है? क्या हम उन के लिए कुछ नहीं करते? अगर किसी की मदद के साथ मीडिया वाले हमें भी कैमरे के सामने ला कर न्यूज बना देते हैं तो इस में बुरा क्या है?’’

मैं ने अपनी आवाज को संतुलित करते हुए जवाब दिया, ‘‘मैडम, हम क्या करते रहे हैं महिलाओं के लिए? जो बात सिर्फ घर वाले जानते हैं हम उन्हें सब के सामने ला कर दुखी लोगों को और दुखी कर देते हैं. थोड़ी सी जबानी सहानुभूति या कभीकभी कुछ आर्थिक सहायता. हमारी संस्था औरत को कभीकभी एक तमाशा बना देती है. मीडिया को तो खबरें ही चाहिए. मैडम, मैं यहां नौकरी नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘हां, यही अच्छा रहेगा. जहां काम में रुचि न हो वहां इनसान को काम नहीं करना चाहिए. आप जा सकती हैं.’’

मैं अपना बैग उठा कर आफिस से बाहर आ गई. मैं हर उस नौकरी को बुरा समझती हूं जिस में किसी के दुख को भुनाया जाता है.

मैं ने कुछ दिन बाद एक स्कूल में नौकरी ज्वाइन कर ली लेकिन मिसेज चोपड़ा और उन की संस्था के बारे में मुझे खबर मिलती रहती थी. नेहा का केस उन्होंने सुलझा लिया था, उन की संस्था की धूम मची हुई थी.

जीवन अपने ढर्रे पर चल रहा था कि एक दिन अचानक सुबह उठने पर पेपर पढ़ा तो रोंगटे खडे़ हो गए. मिसेज चोपड़ा की बेटी आकृति के साथ कुछ दरिंदों ने रेप किया था. वह अपने कालिज से घर आ रही थी कि सुनसान सड़क पर कुछ लड़के कार में उसे उठा कर ले गए थे.

इस खबर को पढ़ने के बाद मैं अपने को वहां जा कर उन से मिलने से रोक नहीं पाई. उन के घर पहुंची तो वह मासूम सी लड़की कमरे में बंद थी और बारबार बेहोश हो रही थी. बहुत ही हृदयविदारक दृश्य था. पूरा स्टाफ वहां था. सब को आकृति पर तरस आ रहा था. मिसेज चोपड़ा का विलाप दिल को चीर रहा था. चोपड़ा साहब विदेश में थे. उन मांबेटी से सब को सहानुभूति हो रही थी. कुछ देर वहां ठहर कर मैं वापस घर आ गई लेकिन अगले दिन भी उन दुखियारी मांबेटी के पास कुछ देर बैठने के लिए मैं गई. फिर कई दिनों तक रोज ही जाती रही. सब को आकृति के सामान्य होने का इंतजार था.

एक दिन अचानक एक प्रसिद्ध एन.जी.ओ. की महिलाएं मीडिया के साथ मिसेज चोपड़ा के घर पहुंच गईं. हर तरफ कैमरे की रोशनियां और उन की बेटी का रोना, मिसेज चोपड़ा बारबार उन लोगों से जाने की प्रार्थना करते हुए सिसक उठीं, लेकिन संस्था की महिलाएं, हाथ में पेपर, पैन लिए मीडिया के लोग, मांबेटी से सवाल पर सवाल पूछे जा रहे थे और अपनी संस्था की शान में कमेंट भी किए जा रहे थे कि हम आप की बेटी को न्याय दिलवाएंगे. मैडम, आप तो खुद एक संस्था चलाती थीं. आज आप आम आदमी की जगह खड़ी हैं. आप को कैसा लग रहा है? मैडम, आप कुछ जवाब दें. आप इस केस में क्या कहना चाहेंगी.

मिसेज चोपड़ा ने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन उन के शब्द अंदर ही रह गए और वे गिर पड़ीं.

आफिस के कुछ लोगों के साथ मैं उन को अस्पताल ले गई. आकृति को मैं ने अपनी मां के पास भेज दिया. मिसेज चोपड़ा को हार्टअटैक पड़ा था. उन की देखरेख मैं ने एक दोस्त की तरह की, क्योंकि मेरी मां ने मुझे यही सिखाया था. उन के दिए गए संस्कार मेरे अंदर खून बन कर बहते थे. स्कूल से मैं ने छुट्टियां ली हुई थीं. मिसेज चोपड़ा जब तक अस्पताल से घर आने लायक हुईं हम एक अच्छे दोस्त बन चुके थे.

घर आ कर वह अपने काम में व्यस्त हो गईं और मैं अपने में. जीवन निर्बाध गति से चल रहा था. एक दिन मैं ने टेलीविजन चलाया तो मिसेज चोपड़ा अपने साक्षात्कार में कह रही थीं, ‘‘अगर हम किसी बहन या बेटी की इज्जत करते हैं तो क्या हमें उस को हजारों लोगों के सामने खड़ा कर देना चाहिए. हमें यदि किसी की मदद करनी है तो क्या हम चुपचाप नहीं कर सकते. मैं एक नई संस्था बना रही हूं जिस का मीडिया से बहुत ही कम लेनादेना होगा. हम चुपचाप दुखी जनता के आंसू पोंछेंगे.’’

आज मुझे लगा कि मिसेज चोपड़ा ने अब जो रास्ता चुना है वह सही है. मुझे उन की इस बदलीहुई सोच पर खुशी हुई और मैं उन को इस नए कदम के लिए शुभकामनाएं देने को फोन मिलाने लगी, साथ ही मुझे उन को यह भी बताना था कि मैं उन की नई संस्था में काम करने आ रही हूं.

Hindi Moral Tales : शब्दचित्र – क्या था नीतू का सपना

Hindi Moral Tales : सुबह 6 बजे का अलार्म पूरी ईमानदारी से बज कर बंद हो गया. वह एक सपने या थकान पर कोई असर नहीं छोड़ पाया. ठंडी हवाएं चल रही हैं. पक्षी अपने भोजन की तलाश में निकल पड़े हैं.

तभी मां नीतू के कमरे में घुसते ही बोलीं, ‘‘इसे देखो, 7 बजने को हैं और अभी तक सो रही है. रात को तो बड़ीबड़ी बातें करती है, अलार्म लगा कर सोती हूं. कल तो जल्दी उठ जाऊंगी, मगर रोज सुबह इस की बातें यों ही धरी रह जाती हैं.’’ मां बड़बड़ाए जा रही थीं.

अचानक ही मां की नजर नीतू के चेहरे पर पड़ी, यह भी क्या करे, सुबह 9 बजे निकलने के बाद औफिस से आतेआते शाम के 8 बज जाते हैं. कितना काम करती है. एक पल मां ने यह सब सोचा, फिर नीतू को जगाने लगीं.

‘‘नीतू, ओ नीतू, उठ जा. औफिस नहीं जाना क्या तुझे?’’

‘‘‘हुं… सोने दो न मां,’’ नीतू ने करवट बदलते हुए कहा.

‘‘अरे नीतू बेटा, उठ ना… देख 7 बज चुके हैं,’’ मां ने फिर से उठाने का प्रयास किया.

‘‘क्या…7 बज गए?’’ यह कहती

वह जल्दी से उठी और आश्चर्य से पूछने लगी, ‘‘उस ने तो सुबह 6 बजे का अलार्म लगाया था?’’

‘‘अब यह सब छोड़ और जा, जा कर तैयार हो ले,’’ मां ने नीतू का बिस्तर समेटते हुए जवाब दिया.

नीतू को आज भी औफिस पहुंचने में देर हो गई थी. सब की नजरों से बच कर वह अपनी डैस्क पर जा पहुंची. मगर रीता ने उसे देख ही लिया. 5 मिनट बाद वह उस के सामने आ धमकी. कहानियों से भरे पत्र उस की डैस्क पर पटक कर कहने लगी, ‘‘ये ले, इन 5 लैटर्स के स्कैच बनाने हैं आज तुझे लंच तक. मैम ने मुझ से कहा था कि मैं तुझे बता दूं.’’

‘‘पर यार, आधे दिन में 5 स्कैच कैसे कंप्लीट कर पाऊंगी मैं?’’

‘‘यह तेरी सिरदर्दी है. इस में मैं क्या कर सकती हूं. और, वैसे भी मैम का हुक्म है,’’ कह कर रीता अपनी डैस्क पर चली गई.

बचपन से ही अपनी आंखों में पेंटर बनने का सपना लिए नीतू अब जा कर उसे पूरा कर पाई है. जब वह स्कूल में थी, तब कौपियों के पीछे के पन्नों पर ड्राइंग किया करती थी, मगर अब एक मैगजीन में हिंदी कहानियों के चित्रांकन का काम करती है.

अपनी चेयर को आगे खिसका कर वह आराम से बैठी और बुझेमन से एक पत्र उठा कर पढ़ने लगी. वह जब भी चित्रांकन करती, उस से पहले कहानी को अच्छी तरह पढ़ती थी  ताकि पात्रों में जान डाल सके.

2 कहानियों के पढ़ने में ही घड़ी ने एक बजा दिया. जब उस की नजर घड़ी पर पड़ी, तो वह थोड़ी परेशान हो गई.

वह सोचने लगी, अरे, लंच होने में सिर्फ एक घंटा ही बचा है और अभी तक 2 ही कहानियां पूरी हुई हैं. कैसे भी 3 तो पूरी कर ही लेगी.  और वह फिर से अपने काम में लग गई.

लंच भी हो गया. उस ने 3 कहानियों का चित्रांकन कर दिया था. वह खाना खाती जा रही थी और सोचती जा रही थी कि बाकी दोनों भी 4 बजे तक पूरा कर देगी. साथ ही,  उस के मन में यह डर था कि कहीं मैम पांचों स्कैच अभी न मांग लें.

खाना खा कर नीतू मैम को देखने उन के केबिन की ओर गई, परंतु उसे मैम न दिखीं.

रीता से पूछने पर पता चला कि मैम किसी जरूरी काम से अपने घर गई हैं.

इतना सुनते ही उस की जान में जान आई. लंच समाप्त हो गया.

नीतू अपनी डैस्क पर जा पहुंची. अगली कहानी छोटी होने की वजह से उस ने जल्दी ही निबटा दी. अब आखिरी कहानी बची है, यह सोचते हुए उस ने 5वां पत्र उठाया और पढ़ने लगी.

‘प्रशांत शर्मा’ इतना पढ़ते ही उस के मन से काम का बोझ मानो गायब हो गया. वह अपने हाथ की उंगलियों के पोर पत्र पर लिखे नाम पर घुमाने लगी. उस की आंखें, बस, नाम पर ही टिकी रहीं. देखते ही देखते वह अतीत में खोने लगी.

तब उस की उम्र 15 साल की रही होगी. 9वीं क्लास में थी. घर से स्कूल जाते हुए वह इतना खुश हो कर जाती थी जैसे आसमान में उड़ने जा रही हो.

मम्मीपापा की इकलौती बेटी थी वह. सो, मुरादें पूरी होना लाजिमी थीं. पढ़ने में होशियार होने के साथसाथ वह क्लास की प्रतिनिधि भी थी.

दूसरी ओर प्रशांत था. नाम के एकदम विपरीत. कभी न शांत रहने वाला लड़का. क्लास में शोर होने का कारण और मुख्य जड़ था वह ही. पढ़ाई तो वह नाममात्र ही करता था. क्या यह वही प्रशांत है?

दिल की धड़कन जोरों से धड़कने लगी. तुरंत उस ने पत्र को पलटा और ध्यान से हैंडराइटिंग को देखने लगी. बस, चंद सैकंड में ही उस ने पता लगा लिया कि यह उस की ही हैंडराइटिंग है.

फिर से अतीत में लौट गई वह. सालभर पहले तो गुस्सा आता था उसे, पर न जाने क्यों धीरेधीरे यह गुस्सा कम होने लगा था उस के प्रति. जब भी वह इंटरवल में खाना खा कर चित्र बनाती, तो अचानक ही पीछे से आ कर वह उस की कौपी ले भागता था. कभी मन करता था कि 2 घूंसे मुंह पर टिका दे, मगर हर बार वह मन मार कर रह जाती.

रोज की तरह एक दिन इंटरवल में वह चित्र बना रही थी, तभी क्लास के बाहर से भागता हुआ प्रशांत उस के पास आया. वह समझ गई कि कोई न कोई शरारत कर के भाग आया है, तभी उस के पीछे दिनेश, जो उस की ही क्लास में पढ़ता था, वह भी वहां आ पहुंचा और उस ने लकड़ी वाला डस्टर उठा कर प्रशांत की ओर फेंकना चाहा. उस ने वह डस्टर प्रशांत को निशाना बना कर फेंका. उस ने आव देखा न ताव, प्रशांत को बचाने के लिए अपनी कौपी सीधे डस्टर की दिशा में फेंकी, जो डस्टर से जा टकराई. प्रशांत को बचा कर वह दिनेश को पीटने गई, पर वह भाग गया.

‘अरे, आज तू ने मुझे बचाया, मुझे…’ प्रशांत आश्चर्य से बोला.

‘हां, तो क्या हो गया?’ उस ने जवाब दिया.

अचानक प्रशांत मुड़ा और अपने बैग से एक नया विज्ञान का रजिस्टर ला कर उसे देते हुए बोला, ‘यह ले, आज से तू चित्र इस में बनाना. वैसे भी, मुझे बचाते हुए तेरी कौपी घायल हो गई है.’

उस ने रजिस्टर लेने से मना कर दिया.

‘अरे ले ले, पहले भी तो मैं तुझे

कई बार परेशान कर चुका हूं, पर अब से नहीं करूंगा.’

जब उस ने ज्यादा जोर दिया, तो उस ने रजिस्टर ले लिया, जो आज भी उस के पास रखा है.

ऐसे ही एक दिन जब उसे स्कूल में बुखार आ गया, तो तुरंत वह टीचर के

पास गया और उसे घर ले जाने की अनुमति मांग आया.

टीचर के हामी भरते ही वह उस का बैग उठा कर घर तक छोड़ने गया.

वहीं, शाम को वह उस का हाल जानने उस के घर फिर चला आया. उस की इतनी परवा करता है वह, यह देख कर उस का उस से लगाव बढ़ गया था. साथ ही, वह यह भी समझ गई थी कि कहीं न कहीं वह भी उसे पसंद करता है.

पर 10 सालों में वह एक बार भी उस से नहीं मिला. दिल्ली जैसे बड़े शहर में न जाने कहां खो गया.

‘‘रीता, इस की एक कौपी कर के मेरे कैबिन में भिजवाओ जल्दी,’’ अचला मैम की आवाज कानों में पड़ने से उस की तंद्रा टूटी.

मैम आ गई थीं. अपने कैबिन में जातेजाते मैम ने उसे देखा और पूछ बैठीं, ‘‘हां, वो पांचों कहानियों के स्कैचेज तैयार कर लिए तुम ने?’’

‘‘बस, एक बाकी है मैम,’’ उस ने चेयर से उठते हुए जवाब दिया.

‘‘गुड, वह भी जल्दी से तैयार कर के मेरे पास भिजवा देना. ओके.’’

‘‘ओके मैम,’’ कह कर नीतू चेयर पर बैठी और फटाफट प्रशांत की लिखी कहानी पढ़ने लगी.

10 मिनट पढ़ने के बाद जल्दी से उस ने स्कैच बनाया और मैम को दे आई.

औफिस का टाइम भी लगभग पूरा हो चला था. शाम 6 बजे औफिस से निकल कर नीतू बस का इंतजार करने लगी. कुछ ही देर में बस भी आ गई. वह बस में चढ़ी, इधरउधर नजर घुमाई तो देखा कि बस में ज्यादा भीड़ नहीं थी. गिनेचुने लोग ही थे.

कंडक्टर से टिकट ले कर वह खिड़की वाली सीट पर जा बैठी और बाहर की ओर दुकानों को निहारने लगी.

अचानक बस अगले स्टौप पर रुकी, फिर चल दी.

‘‘हां भाई, बताइए?’’

बस के इंजन के नीचे दबी कंडक्टर की आवाज मेरे कानों में पड़ी.

‘‘करोल बाग एक,’’ पीछे से किसी ने जवाब दिया.

लगभग एक घंटा तो लगेगा. अभी इतना सोच कर वह पर्स से मोबाइल और इयरफोन निकालने लगी कि अचानक कोई आ कर उस की बगल में बैठ गया.

उसे देखने के लिए उस ने अपनी गरदन घुमाई, तो बस देखती ही रह गई. वह खुशी से चिल्लाती हुई बोली, ‘‘प्रशांत, तुम!’’

प्रशांत ने घबरा कर उस की ओर देखा. ‘‘अरे, नीतू, इतने सालों बाद. कैसी हो?’’ और वह सवाल पर सवाल करने लगा.

‘‘मैं अच्छी हूं. तुम कैसे हो?’’ नीतू ने जवाब दे कर प्रश्न किया. उसे इतनी खुशी हो रही थी कि वह सोचने लगी कि अब यह बस 2 घंटे भी ले ले, तो भी कोई बात नहीं.

‘‘मैं ठीक हूं. और बताओ, क्या करती हो आजकल?’’

‘‘वही, जो स्कूल के इंटरवल में

करती थी.’’

‘‘अच्छा, वह चित्रों की दुनिया.’’

‘‘हां, चित्रों की दुनिया ही मेरा सपना. और मैं ने अपना वही सपना अब पूरा कर लिया है.’’

‘‘सपना, कौन सा? अच्छी स्कैचिंग करने का.’’

‘‘हां, स्कैचिंग करतेकरते मैं एक दिन अलंकार मैगजीन में इंटरव्यू दे आई थी. बस, उन्होंने रख लिया मुझे.’’

‘‘बधाई हो, कोई तो सफल हुआ.’’

‘‘और तुम क्या करते हो? जौब लगी या नहीं?’’

‘‘जौब तो नहीं लगी, हां, एक प्राइवेट कंपनी में जाता हूं.’’

तभी प्रशांत को कुछ याद आता है, ‘‘एक मिनट, क्या बताया तुम ने, अभी कौन सी मैगजीन?’’

‘‘अलंकार मैगजीन,’’ नीतू ने बताया.

‘‘अरे, उस में तो…’’

नीतू उस की बात बीच में ही काटती हुई बोली, ‘‘कहानी भेजी थी. और संयोग से वह कहानी मैं आज ही पढ़ कर आई हूं, स्कैच बनाने के साथसाथ.’’

‘‘पर, तुम्हें कैसे पता चला कि वह कहानी मैं ने ही भेजी थी. नाम तो कइयों के मिलते हैं.’’

‘‘सिंपल, तुम्हारी हैंडराइटिंग से.’’

‘‘क्या? मेरी हैंडराइटिंग से, तो

क्या तुम्हें मेरी हैंडराइटिंग भी याद है

अब तक.’’

‘‘हां, मिस्टर प्रशांत.’’

‘‘ओह, फिर तो अब तुम पूरे दिन चित्र बनाती होगी और कोई डिस्टर्ब भी न करता होगा मेरी तरह. है न?’’

‘‘हां, वह तो है.’’

‘‘देख ले, सब जनता हूं न मैं?’’

‘‘लेकिन, तुम एक बात नहीं जानते प्रशांत.’’

‘‘कौन सी बात?’’

बारबार मुझे स्कूल की बातें याद आ रही थीं. मैं ने सोचा कि बता देती हूं. क्या पता, फिर ऊपर वाला ऐसा मौका दे या न दे, यह सोच कर नीतू बोल पड़ी, ‘‘प्रशांत, मैं तुम्हें पसंद करती हूं.’’

‘‘क्या…?’’ प्रशांत ऐसे चौंका जैसे उसे कुछ पता ही न हो.

‘‘तब से जब हम स्कूल में पढ़ते थे और मैं यह भी जानती हूं कि तुम भी मुझे पसंद करते हो. करते हो न?’’

प्रशांत ने शरमाते हुए हां में अपनी गरदन हिलाई.

तभी बस एक स्टाप पर रुकी. हम खामोश हो कर एकदूसरे को देखने लगे.

‘‘तेरी शादी नहीं हुई अभी तक?’’ प्रशांत ने प्रश्न किया.

‘‘नहीं. और तुम्हारी?’’

‘‘नहीं.’’

न जाने क्यों मेरा मन भर आया और मैं ने बोलना बंद कर दिया.

‘‘क्या हुआ नीतू? तुम चुप क्यों हो गईं?’’

‘‘प्रशांत, शायद मेरी जिंदगी में तुम हो ही नहीं, क्योंकि कल मेरी एंगेजमैंट है और तुम इतने सालों बाद आज

मिले हो.’’

इतना सुनते ही प्रशांत का गला भर आया. वह बस, इतना ही बोला, ‘‘क्या,

कल ही.’’

दोनों एक झटके में ही उदास हो गए.

कुछ देर खामोशी छाई रही.

‘‘कोई बात नहीं नीतू. प्यार का रंग कहीं न कहीं मौजूद रहता है हमेशा,’’ प्रशांत ने रुंधे मन से कहा.

‘‘मतलब?’’ नीतू ने पूछा.

‘‘मतलब यह कि हम चाहे साथ रहें न रहें, तुम्हारे चित्र और मेरे शब्द तो साथ रहेंगे न हमेशा कहीं न कहीं,’’ प्रशांत हलकी सी मुसकान भरते हुए बोला.

‘‘मुझे नहीं पता था प्रशांत कि तुम इतने समझदार भी हो सकते हो.’’

तभी कंडक्टर की आवाज सुनाई दी, ‘‘पंजाबी बाग.’’

‘‘ओके प्रशांत, मेरा स्टौप आ गया है. अब चलती हूं. बायबाय.’’

‘‘बाय,’’ प्रशांत ने भी अलविदा कहा.

वह बस से उतरी और जब तक आंखों से ओझल न हो गए, तब तक दोनों एकदूसरे को देखते रहे.

Famous Hindi Stories : आशीर्वाद – कैसा था नीलम की कहानी का अंजाम

Famous Hindi Stories :  कभीकभी अपनी चिंताओं के बीच नीलम सोचती, ‘यदि आलोक जैसा साथी, उसे मिल गया तो उस की चिंताएं कम हो जाएंगी.’

नीलम ने आलोक के लिए चाय ला कर मेज पर रख दी और चुपचाप मेज के पास पड़ी कुरसी पर बैठ केतली से प्याले में चाय डालने लगी. आलोक ने नीलम के झुके हुए मुख पर दृष्टि डाली. लगता था, वह अभीअभी रो कर उठी है. आलोक रोजाना ही नीलम को उदास देखता है. वैसे नीलम रोती बहुत कम है. वह समझता है कि नीलम के रोने का कारण क्या हो सकता है, इसलिए उस ने पूछ कर नीलम को दोबारा रुलाना ठीक नहीं समझा. उस ने कोमल स्वर में पूछा, ‘‘मां और पिताजी ने चाय पी ली?’’

‘‘नहीं,’’ नीलम के स्वर में हलका सा कंपन था.

‘‘क्यों?’’

‘‘मांजी कहती हैं कि उन्हें इस कदर थकावट महसूस हो रही है कि चाय पीने के लिए बैठ नहीं सकतीं और पिताजी को चाय नुकसान करती है.’’

‘‘तो पिताजी को दूध दे देतीं.’’

‘‘ले गई थी, किंतु उन्होंने कहा कि दूध उन्हें हजम नहीं होता.’’

आलोक चाय का प्याला हाथ में ले कर मातापिता के कमरे की ओर जाने लगा तो नीलम धीरे से बोली, ‘‘पहले आप चाय पी लेते. तब तक उन की थकान भी कुछ कम हो जाती.’’

‘‘तुम पियो. मेरे इंतजार में मत बैठी रहना. मां को चाय पिला कर अभी आता हूं.’’

नीलम ने चाय नहीं पी. गोद में हाथ रखे खिड़की से बाहर देखती रही. काश, वह भी हवा में उड़ते बादलों की तरह स्वतंत्र और चिंतारहित होती.

नीलम के पिता एक सफल डाक्टर थे. पर उन की सब से बड़ी कमजोरी यह थी कि वे किसी को कष्ट में नहीं देख सकते थे. जब भी कोई निर्धनबीमार उन के पास आता तो वे उस से फीस का जिक्र तक नहीं करते, बल्कि उलटे उसे फल व दवाइयों के लिए कुछ पैसे अपने पास से दे देते. परिणाम यह हुआ कि वे जितना काम व मेहनत करते थे उतना धन संचित नहीं कर पाए. फिर उन की लंबी बीमारी चली, जो थोड़ाबहुत धन था वह खत्म हो गया.

उन की मृत्यु के बाद सिर्फ एक मकान के अलावा और कोई संपत्ति नहीं बची थी. सब से बड़ी बहन होने के नाते नीलम ने घर का भार संभालना अपना कर्तव्य समझा. उस ने एक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी कर ली. छोटी बहन पूनम मैडिकल कालेज में चौथे साल में थी और भाई अनुनय बीए द्वितीय वर्ष में.

आलोक ने जब नीलम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो उस ने साफ इनकार कर दिया था. उस का कहना था कि जब तक पूनम पढ़ाई पूरी कर के कमाने लायक नहीं हो जाती, तब तक वह विवाह की बात सोच भी नहीं सकती. इस पर आलोक ने आश्वासन दिया था कि विवाह में वह कुछ खर्च न होने देगा और विवाह के पश्चात भी नीलम अपना वेतन घर में देने के लिए स्वतंत्र होगी. आलोक का यह तर्क था कि वह एक मित्र के नाते उस के परिवार के प्रति सबकुछ नहीं कर सकता जो परिवार का सदस्य बन जाने के पश्चात कर सकेगा.

यह तर्क नीलम को भी ठीक लगा था. कभीकभी अपनी चिंताओं के बीच वह खुद को बहुत ही अकेला व असहाय सा पाती थी. उस ने सोचा यदि उसे आलोक जैसा साथी, जो उस की भावनाओं को अच्छी तरह समझता है, मिल गया तो उस की चिंताएं कम हो जाएंगी. फिर भी नीलम की आशंका थी कि अकेली संतान होने के कारण आलोक से उस के मातापिता को बहुत सी आशाएं होंगी और इसलिए शायद उन्हें दहेजरहित लड़की को अपनी बहू बनाने में आपत्ति हो सकती है, पर आलोक ने इस बात को भी टाल दिया था. उस का कहना था कि उस के मातापिता उसे इतना अधिक प्यार करते हैं कि उस की इच्छा के सामने वे दहेज जैसी बात पर सोचेंगे भी नहीं.

आलोक के पिता प्रबोध राय एक साधारण औफिस असिस्टैंट की हैसियत से ऊपर न उठ सके थे. आलोक उन की आशाओं से बहुत अधिक उन्नति कर गया था. घर के रहनसहन का स्तर भी ऊंचा उठ गया था. आलोक सोचता था कि उस के मातापिता उस की अर्जित आय से ही इतने अधिक संतुष्ट हैं कि नीलम के वेतन की आवश्यकता अनुभव नहीं करेंगे. यही उस की भूल थी, जिसे वह अब समझ पाया था. उस के मातापिता ने पुत्र का विवाह बिना दहेज लिए केवल इसलिए किया था कि बहू अपने वेतन से वह कमी पूरी कर देगी. जब उन की वह आशा पूरी नहीं हुई तो वे क्षुब्ध हो उठे. उन्हें इस भावना ने जकड़ लिया कि उन्हें धोखा दिया गया.

आलोक कमरे में पहुंचा तो उस की मां सुमित्रा अपने पलंग पर लेटी हुई थीं. प्रबोध राय पास ही पड़ी कुरसी पर बैठे समाचारपत्र देख रहे थे. आलोक बोला, ‘‘मां, नीलम कह रही थी कि आप थकान महसूस कर रही हैं. चाय पी लीजिए, थकान कुछ कम हो जाएगी.’’

‘‘रहने दे बेटा, चाय के लिए मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है.’’

‘‘तो बताइए फिर क्या लेंगी? नीलम पिताजी के लिए मौसमी का रस निकाल रही है, आप के लिए भी निकाल देगी.’’

‘‘रहने दे, मैं रस नहीं पिऊंगी. मैं तेरी मां हूं. क्या मुझे अच्छा लगता है कि मैं अपने खर्चे बढ़ाबढ़ा कर तेरे ऊपर बोझ बन जाऊं? क्या करूं, उम्र से मजबूर हूं. अब काम नहीं होता.’’

‘‘तो फिर क्यों नहीं नीलम को रोटी बनाने देतीं? वह तो कहती है कि सुबह आप दोनों के लिए पूरा भोजन बना कर स्कूल जा सकती है.’’

‘‘कैसी बातें कर रहा है, आलोक?

7 बजे का पका खाना 12 बजे तक बासी नहीं हो जाएगा? तू ने कभी अपने पिताजी को ठंडा फुलका खाते देखा है?’’ फिर एक ठंडी सांस ले मां बोलीं, ‘‘मांबाप पुत्र का विवाह कितने अरमानों से करते हैं. घर में बहू आएगी, रौनक होगी. शरीर को आराम मिलेगा,’’ फिर एक और लंबी सांस छोड़ कर बोलीं, ‘‘खैर, इस में किसी का क्या दोष? अपनाअपना समय है. श्यामसुंदर लाल 25 लाख रुपए नकद और एक कार देने का वादा कर रहे थे.’’

‘‘कैसी बातें करती हो, मां? जो लड़की इतनी रकम ले कर आती वह क्या आप को रस निकाल कर देती? कार में उसे फिल्में दिखाने और शौपिंग कराने में ही मेरा आधे से ज्यादा वेतन स्वाहा हो जाता. ऊपर से उस के उलाहने सुनने को मिलते कि उस के मायके में तो इतने नौकरचाकर काम करते थे. और मां, यदि मेरा विवाह अभी हुआ ही न होता तो क्या होता? यदि नीलम कुछ लाई नहीं, तो वह अपने ऊपर खर्च भी तो कुछ नहीं कराती. तुम से इतनी बार मैं ने कहा है कि नौकर रख लो, पर तुम्हें तो नौकर के हाथ का खाना ही पसंद नहीं. अब तुम ही बताओ कि यह समस्या कैसे हल हो?’’

सुमित्रा के पास जो समाधान था, वह उस के बिना बताए भी आलोक जानता था, सो, वह चुप रही. आलोक ही फिर बोला, ‘‘थोड़े दिन और धीरज रखो, मां, पूनम ने आखिरी वर्ष की परीक्षा दे दी है. अब उस का खर्च तो समाप्त हो ही जाएगा. अनुनय भी 1-2 वर्ष में योग्य हो जाएगा और उस के साथ नीलम का उस का उत्तरदायित्व भी खत्म हो जाएगा. वह नौकरी छोड़ देगी.’’

‘‘अरे, एक बार नौकरी कर के कौन छोड़ता है? फिर वह इसलिए धन

जमा करती रहेगी कि बहन का विवाह करना है.’’

आलोक हंस कर बोला, ‘‘इतने दूर की चिंता आप क्यों करती हैं मां? पूनम डाक्टर बन कर स्वयं अपने विवाह के लिए बहुत धन जुटा लेगी.’’

‘‘मुझे तो तेरी ही चिंता है. तेरे अकेले के ऊपर इतना बोझ है. मुझे तो छोड़ो, इन्हें तो फल इत्यादि मिलने ही चाहिए, नहीं तो शरीर कैसे चलेगा?’’

तभी नीलम 2 गिलासों में मौसमी का जूस ले कर कमरे में आई. आलोक हंस कर बोला, ‘‘देखो मां, तुम तो केवल पिताजी की आवश्यकता की बात कह रही थीं, नीलम तो तुम्हारे लिए भी जूस ले आई है. अब पी लो. नीलम ने इतने स्नेह से निकाला है. नहीं पिओगी तो उस का दिल दुखेगा.’’

इस प्रकार की घटनाएं अकसर होती रहतीं. मां का जितना असंतोष बढ़ता जाता है, आलोक का पत्नी के प्रति उतना ही मान और अनुराग. विवाह के पश्चात नीलम ने एक बार भी सुना कर नहीं कहा कि आलोक ने उसे जो आश्वासन दिए थे वे निराधार थे. उस ने कभी यह नहीं कहा कि आलोक के मातापिता की तरह उस के मातापिता ने भी उसे योग्य बनाने में उतना ही धन खर्च किया था. तब क्या उस का उन के प्रति इतना भी कर्तव्य नहीं है कि वह अपने बहनभाई को योग्य बनाने में सहायता करे. वह तो अपने सासससुर को संतुष्ट करने में किसी प्रकार की कसर नहीं छोड़ती. स्कूल से आते ही घरगृहस्थी के कार्यों में उलझ जाती है.

कभी उस ने पति से कोई स्त्रीसुलभ मांग नहीं की. अपने मायके से जो साडि़यां लाई थी, अब भी उन्हें ही पहनती, पर उस के माथे पर शिकन तक नहीं आती थी. नीलम ने सरलता से परिस्थितियों से समझौता कर लिया था, उसे देख आलोक उस से काफी प्रभावित था. यही बात वह अपने मातापिता को समझाने का प्रयत्न करता था, किंतु वे तो जैसे समझना ही नहीं चाहते थे. वे घर के खर्चों को ले कर घर में एक अशांत वातावरण बनाए रखते, केवल इसलिए कि वे बहू को यह बतलाना चाहते थे कि वह अपने बहनभाई के ऊपर जो धन खर्च करती है वह उन के अधिकार का अपहरण है.

नीलम स्कूल के लिए तैयार हो रही थी. उसे सास की पुकार सुनाई दी तो बाहर निकल आई. पड़ोस के 2 लड़कों ने उन्हें बताया कि प्रबोध राय जब अपने नियम के अनुसार सुबह की सैर के बाद घर लौट रहे थे, तब एक स्कूटर वाला उन्हें धक्का दे कर भाग निकला और वे सड़क पर गिरे पड़े हैं. नीलम तुरंत घटनास्थल पर पहुंची. ससुर बेहोश पड़े थे. नीलम कुछ लोगों की सहायता से उन्हें उठा कर घर लाई.

उस ने जल्दी से पूनम को फोन किया, पूनम ने कहा कि वे चिंता न करें, वह जल्दी ही एंबुलेंस ले कर आ रही है. नीलम ने छुट्टी के लिए स्कूल फोन कर दिया और घर आ कर अस्पताल के लिए जरूरी सामान रखने लगी. तभी पूनम आ गई. जितनी तत्कालीन चिकित्सा करना संभव था, उस ने की और उन्हें अस्पताल ले गई.

पूनम अपने स्वभाव व व्यवहार के कारण पूरे अस्पताल में सर्वप्रिय थी. यह जान कर कि उस का कोई निकट संबंधी अस्पताल में भरती होने आया है, उस के मित्रों और संबंधित डाक्टरों ने सब प्रबंध कर दिए.

घबराहट के कारण सुमित्रा को लग रहा था कि वह शक्तिरहित होती जा रही है. सारे अस्पताल में एक हलचल सी मची हुई थी. वह कभी सोच भी नहीं सकती थी कि कभी उस के रिटायर्ड पति को इस प्रकार का विशेष इलाज उपलब्ध हो सकेगा. बीचबीच में नीलम आ कर सास को धीरज बंधाने का प्रयत्न करती.

आलोक औफिस के कार्य से कहीं बाहर गया हुआ था. नीलम ने उसे भी  इस घटना की सूचना दे दी. अनुनय समाचार पाते ही तुरंत आ गया था. दवाइयों के लिए भागदौड़ वही कर रहा था. मदद के लिए उस के एक मित्र ने उसे अपनी कार दे दी थी.

5-6 घंटे बाद प्रबोध राय कमरे में लाए गए. पूनम ने बारबार नीलम की सास को तसल्ली दी कि प्रबोध राय जल्दी ही ठीक हो जाएंगे. वातावरण में एक ठहराव सा आ गया था. सुमित्रा ने कमरे में चारों ओर देखा. अस्पताल में इतना अच्छा कमरा तो काफी महंगा पड़ेगा. जब उस ने अपनी शंका व्यक्त की तब अनुनय बोला, ‘‘मांजी, आप 2 बेटों की मां हो कर खर्च की चिंता क्यों करती हैं? मेरे होते यदि आप को किसी प्रकार का कष्ट हो तो मैं बेटा होने का अधिकार कैसे पाऊंगा?’’

नीलम हंस कर बोली, ‘‘मांजी, आज इस ने पिताजी को अपना रक्त दिया है न, इसीलिए यह बढ़बढ़ कर आप का बेटा होने का दावा कर रहा है.’’

यह सुन सुमित्रा की आंखें छलछला आईं. वे सोच रही थीं कि यदि नीलम ने बहन की पढ़ाई में सहायता न की होती तो क्या आज पूनम डाक्टर होती और क्या उस के पति को ये सुविधाएं मिल पातीं, श्यामसुंदर लाल का पुत्र क्या अपनी बहन को दहेज के बाद उस के ससुर को खून देने की बात सोचता?

प्रबोध राय जब घर आए, तब तक सुमित्रा की मनोस्थिति बिलकुल बदल चुकी थी और सारी कमजोरी भी गायब हो चुकी थी. रात को पति को जल्दी भोजन करा कर वे नीलम के लिए कार्डीगन बुन रही थीं. तभी उन्हें अनुनय के आने की आवाज सुनाई दी. प्रसन्नता से उन का मुख उज्ज्वल हो उठा. अनुनय ने एक डब्बा ला कर उन के पैरों के पास रख दिया और पूछने पर बोला, ‘‘मांजी, मैं ने एक पार्टटाइम जौब कर लिया है. पहला वेतन मिला तो आप से आशीर्वाद लेने चला आया.’’

यह सुन कर सुमित्रा चकित रह गईं. वे रुष्ट हो कर बोलीं, ‘‘क्या तेरा दिमाग खराब हुआ है? पढ़ना नहीं है, जो पार्टटाइम जौब करेगा?’’

‘‘पढ़ाई में इस से कुछ अंतर नहीं पड़ता, मां. बेशक अब आवारागर्दी का समय नहीं मिलता.’’

‘‘मैं तेरी बात नहीं मानूंगी. जब तक तू नौकरी छोड़ने का वादा नहीं करेगा, मैं इस डब्बे को हाथ भी नहीं लगाऊंगी.’’

‘‘और मांजी, आप तो जीजाजी से भी ज्यादा धमकियां दे रही हैं. चलिए, मैं ने आप की बात मान ली. अब शीघ्र डब्बा खोलिए,’’ अनुनय ने आतुरता से कहा.

डब्बा खोला तो सुमित्रा स्तब्ध रह गईं और डबडबाई आंखों से बोलीं, ‘‘पगले, मैं बुढि़या यह साड़ी पहनूंगी? अपनी जीजी को देता न?’’

‘‘पहले मां, फिर बहन. अच्छा मांजी, अब जल्दी से आशीर्वाद दे दो,’’ और अनुनय ने सुमित्रा का हाथ अपने सिर पर रख लिया. सुमित्रा हंसे बिना न रह सकीं, ‘‘तू तो बड़ा शातिर है,  आशीर्वाद लेने के लिए भी रिश्वत देता है. तुम सब भाईबहन सदा प्रसन्न रहो और दूसरों को प्रसन्न रखो, मैं तो कामना करती हूं.’’

Best Hindi Stories : सांझ पड़े घर आना

Best Hindi Stories  : उसकी मेरे औफिस में नईनई नियुक्ति हुई थी. हमारी कंपनी का हैड औफिस बैंगलुरु में था और मैं यहां की ब्रांच मैनेजर थी. औफिस में कोई और केबिन खाली नहीं था, इसलिए मैं ने उसे अपने कमरे के बाहर वाले केबिन में जगह दे दी. उस का नाम नीलिमा था. क्योंकि उस का केबिन मेरे केबिन के बिलकुल बाहर था, इसलिए मैं उसे आतेजाते

देख सकती थी. मैं जब भी अपने औफिस में आती, उसे हमेशा फाइलों या कंप्यूटर में उलझा पाती. उस का औफिस में सब से पहले पहुंचना और देर तक काम करते रहना मुझे और भी हैरान करने लगा. एक दिन मेरे पूछने पर उस ने बताया कि पति और बेटा जल्दी चले जाते हैं, इसलिए वह भी जल्दी चली आती है. फिर सुबहसुबह ट्रैफिक भी ज्यादा नहीं रहता.

वह रिजर्व तो नहीं थी, पर मिलनसार भी नहीं थी. कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो आंखों को बांध लेते हैं. उस का मेकअप भी एकदम नपातुला होता. वह अधिकतर गोल गले की कुरती ही पहनती. कानों में छोटे बुंदे, मैचिंग बिंदी और नाममात्र का सिंदूर लगाती. इधर मैं कंपनी की ब्रांच मैनेजर होने के नाते स्वयं के प्रति बहुत ही संजीदा थी. दिन में जब तक 3-4 बार वाशरूम में जा कर स्वयं को देख नहीं लेती, मुझे चैन ही नहीं पड़ता. परंतु उस की सादगी के सामने मेरा सारा वजूद कभीकभी फीका सा पड़ने लगता.

लंच ब्रेक में मैं ने अकसर उसे चाय के साथ ब्रैडबटर या और कोई हलका नाश्ता करते पाया. एक दिन मैं ने उस से पूछा तो कहने लगी, ‘‘हम लोग नाश्ता इतना हैवी कर लेते हैं कि लंच की जरूरत ही महसूस नहीं होती. पर कभीकभी मैं लंच भी करती हूं. शायद आप ने ध्यान नहीं दिया होगा. वैसे भी मेरे पति उमेश और बेटे मयंक को तरहतरह के व्यंजन खाने पसंद हैं.’’ ‘‘वाह,’’ कह कर मैं ने उसे बैठने का

इशारा किया, ‘‘फिर कभी हमें भी तो खिलाइए कुछ नया.’’ इसी बीच मेरा फोन बज उठा तो मैं अपने केबिन में आ गई.

एक दिन वह सचमुच बड़ा सा टिफिन ले कर आ गई. भरवां कचौरी, आलू की सब्जी और बूंदी का रायता. न केवल मेरे लिए बल्कि सारे स्टाफ के लिए. इतना कुछ देख कर मैं ने कहा, ‘‘लगता है कल शाम से ही इस की तैयारी में लग गई होगी.’’

वह मुसकराने लगी. फिर बोली, ‘‘मुझे खाना बनाने और खिलाने का बहुत शौक है. यहां तक कि हमारी कालोनी में कोई भी पार्टी होती है तो सारी डिशेज मैं ही बनाती हूं.’’ नीलिमा को हमारी कंपनी में काम करते हुए 6 महीने हो गए थे. न कभी वह लेट हुई और न जाने की जल्दी करती. घर से तरहतरह का खाना या नाश्ता लाने का सिलसिला भी निरंतर चलता रहा. कई बार मैं ने उसे औफिस के बाद भी काम करते देखा. यहां तक कि वह अपने आधीन काम करने वालों की मीटिंग भी शाम 6 बजे के बाद ही करती. उस का मानना था कि औफिस के बाद मन भी थोड़ा शांत रहता है और बाहर से फोन भी नहीं आते.

एक दिन मैं ने उसे दोपहर के बाद अपने केबिन में बुलाया. मेरे लिए फुरसत से बात करने का समय दोपहर के बाद ही होता था. सुबह मैं सब को काम बांट देती थी. हमारी कंपनी बाहर से प्लास्टिक के खिलौने आयात करती और डिस्ट्रीब्यूटर्स को भेज देती थी. हमारी ब्रांच का काम और्डर ले कर हैड औफिस को भेजने तक ही सीमित था. नीलिमा ने बड़ी शालीनता से मेरे केबिन का दरवाजा खटखटा भीतर आने की इजाजत मांगी. मैं कुछ पुरानी फाइलें देख रही थी. उसे बुलाया और सामने वाली कुरसी पर बैठने का इशारा किया. मैं ने फाइलें बंद कीं और चपरासी को बुला कर किसी के अंदर न आने की हिदायत दे दी.

नीलिमा आप को हमारे यहां काम करते हुए 6 महीने से ज्यादा का समय हो गया. कंपनी के नियमानुसार आप का प्रोबेशन पीरियड समाप्त हो चुका है. यहां आप को कोई परेशानी तो नहीं? काम तो आपने ठीक से समझ ही लिया है. स्टाफ से किसी प्रकार की कोई शिकायत हो तो बताओ. ‘‘मैम, न मुझे यहां कोई परेशानी है और न ही किसी से कोई शिकायत. यदि आप को मेरे व्यवहार में कोई कमी लगे तो बता दीजिए. मैं खुद को सुधार लूंगी… मैं आप के जितना पढ़ीलिखी तो नहीं पर इतना जरूर विश्वास दिलाती हूं कि मैं अपने काम के प्रति समर्पित रहूंगी. यदि पिछली कंपनी बंद न हुई होती तो पूरे 10 साल एक ही कंपनी में काम करते हो जाते,’’ कह कर वह खामोश हो गई. उस की बातों में बड़ा ठहराव और विनम्रता थी.

‘‘जो भी हो, तुम्हें अपने परिवार की भी सपोर्ट है. तभी तो मन लगा कर काम कर सकती हो. ऐसा सभी के साथ नहीं होता है.’’ मैं ने थोड़े रोंआसे स्वर में कहा. वह मुझे देखती रही जैसे चेहरे के भाव

पढ़ रही हो. मैं ने बात बदल कर कहा, ‘‘अच्छा मैं ने आप को यहां इसलिए बुलाया है कि अगला पूरा हफ्ता मैं छुट्टी पर रहूंगी. हो सकता है 1-2 दिन ज्यादा भी लग जाएं. मुझे उम्मीद है आप को कोई ज्यादा परेशानी नहीं होगी. मेरा मोबाइल चालू रहेगा.’’

‘‘कहीं बाहर जा रही हैं आप?’’ उस ने ऐसे पूछा जैसे मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. मैं ने कहा, ‘‘नहीं, रहूंगी तो यहीं… कोर्ट की आखिरी तारीख है. शायद मेरा तलाक मंजूर हो जाए. फिर मैं कुछ दिन सुकून से रहना चाहती हूं.’’

‘‘तलाक?’’ कह जैसे वह अपनी सीट से उछली हो. ‘‘हां.’’

‘‘इस उम्र में तलाक?’’ वह कहने लगी, ‘‘सौरी मैम मुझे पूछना तो नहीं चाहिए पर…’’

‘‘तलाक की भी कोई उम्र होती है? सदियों से मैं रिश्ता ढोती आई हूं. बेटी यूके में पढ़ने गई तो वहीं की हो कर रह गई. मेरे पति और मेरी कभी बनी ही नहीं और अब तो बात यहां तक आ गई है कि खाना भी बाहर से ही आता है. मैं थक गई यह सब निभातेनिभाते… और जब से बेटी ने वहीं रहने का निर्णय लिया है, हमारे बीच का वह पुल भी टूट गया,’’ कहतेकहते मेरी आंखों में आंसू आ गए.

वह धीरे से अपनी सीट से उठी और मेरी साड़ी के पल्लू से मेरे आंसू पोंछने लगी.

फिर सामने पड़े गिलास से मुझे पानी पिलाया और मेरी पीठ पर स्नेह भरा हाथ रख दिया. बहुत देर तक वह यों ही खड़ी रही. अचानक गमगीन होते माहौल को सामान्य करने के लिए मैं ने 2-3 लंबी सांसें लीं और फिर अपनी थर्मस से चाय ले कर 2 कपों में डाल दी.

उस ने चाय का घूंट भरते हुए धीरेधीरे कहना शुरू किया, ‘‘मैम, मैं तो आप से बहुत छोटी हूं. मैं आप के बारे में न कुछ जानती हूं और न ही जानना चाहती हूं. पर इतना जरूर कह सकती हूं कि कुछ गलतियां आप की भी रही होंगी… पर हमें अपनी गलती का एहसास नहीं होता. हमारा अहं जो सामने आ जाता है. हो सकता है आप को तलाक मिल भी जाए… आप स्वतंत्रता चाहती हैं, वह भी मिल जाएगी, पर फिर क्या करेंगी आप?’’ ‘‘सुकून तो मिलेगा न… जिंदगी अपने ढंग से जिऊंगी.’’

‘‘अपने ढंग से जिंदगी तो आज भी जी रही हैं आप… इंडिपैंडैंट हैं अपना काम करने के लिए… एक प्रतिष्ठित कंपनी की बौस हैं… फिर…’’ कह कर वह चुप हो गई. उस की भाषा तल्ख पर शिष्ट थी. मैं एकदम सकपका गई. वह बेबाक बोलती जा रही थी. मैं ने झल्ला कर तेज स्वर में पूछा, ‘‘मैं समझ नहीं पा रही हूं तुम मेरी वकालत कर रही हो, मुझ से तर्कवितर्क कर रही हो, मेरा हौंसला बढ़ा रही हो या पुन: नर्क में धकेल रही हो.’’

‘‘मैम,’’ वह धीरे से पुन: शिष्ट भाषा में बोली, ‘‘एक अकेली औरत के लिए, वह भी तलाकशुदा के लिए अकेले जिंदगी काटना कितना मुश्किल होता है, यह कैसे बताऊं आप को…’’ ‘‘पहले आप के पास पति से खुशियां बांटने का मकसद रहा होगा, फिर बेटी और उस की पढ़ाई का मकसद. फिर लड़ कर अलग होने का मकसद और अब जब सब झंझटों से मुक्ति मिल जाएगी तो क्या मकसद रह जाएगा? आगे एक अकेली वीरान जिंदगी रह जाएगी…’’ कह कर

वह चुप हो गई और प्रश्नसूचक निगाहों से मुझे देखती रही. फिर बोली, ‘‘मैम, आप कल सुबह यह सोच कर उठना कि आप स्वतंत्र हो गई हैं पर आप के आसपास कोई नहीं है. न सुख बांटने को न दुख बांटने को. न कोई लड़ने के लिए न झगड़ने के लिए. फिर आप देखना सब सुखसुविधाओं के बाद भी आप अपनेआप को अकेला ही पाएंगी.’’

मैं समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या कहना चाहती है. मेरे चेहरे पर कई रंग आ रहे थे, परंतु एक बात तो ठीक थी कि तलाक के बाद अगला कदम क्या होगा. यह मैं ने कभी ठीक से सोचा न था. ‘‘मैम, मैं अब चलती हूं. बाहर कई लोग मेरा इंतजार कर रहे हैं… जाने से पहले एक बार फिर से सलाह दूंगी कि इस तलाक को बचा लीजिए,’’ कह वह वहां से चली गई.

उस के जाने के बाद पुन: उस की बातों ने सोचने पर मजबूर कर दिया. मेरी सोच का दायरा अभी तक केवल तलाक तक सीमित था…उस के बाद व्हाट नैक्स्ट? उस पूरी रात मैं ठीक से सो नहीं पाई. सुबहसुबह कामवाली बालकनी में चाय रख

कर चली गई. मैं ने सामने वाली कुरसी खींच कर टांगें पसारीं और फिर भूत के गर्भ में चली गई. किसी ने ठीक ही कहा था कि या तो हम

भूत में जीते हैं या फिर भविष्य में. वर्तमान में जीने के लिए मैं तब घर वालों से लड़ती रही और आज उस से अलग होने के लिए. पापा को मनाने के लिए इस के बारे में झूठसच का सहारा लेती रही, उस की जौब और शिक्षा के बारे में तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करती रही और आज उस पर उलटेसीधे लांछन लगा कर तलाक ले रही हूं.

तब उस का तेजतर्रार स्वभाव और खुल कर बोलना मुझे प्रभावित करता था और अब वही चुभने लगा है. तब उस का साधारण कपड़े पहनना और सादगी से रहना मेरे मन को भाता था और अब वही सब मेरी सोसाइटी में मुझे नीचा दिखाने की चाल नजर आता है. तब भी उस की जौब और वेतन मुझ से कम थी और आज भी है. ‘‘ऐसा भी नहीं है कि पिछले 25 साल हमने लड़तेझगड़ते गुजारे हों. कुछ सुकून और प्यारभरे पल भी साथसाथ जरूर गुजारे होंगे. पहाड़ों, नदियों और समुद्री किनारों के बीच हम ने गृहस्थ की नींव भी रखी होगी. अपनी बेटी को बड़े होते भी देखा होगा और उस के भविष्य के सपने भी संजोए होंगे. फिर आखिर गलती हुई कहां?’’ मैं सोचती रही गई.

अपनी भूलीबिसरी यादों के अंधेरे गलियारों में मुझे इस तनाव का सिरा पकड़ में

नहीं आ रहा था. जहां तक मुझे याद आता है मैं बेटी को 12वीं कक्षा के बाद यूके भेजना चाहती थी और मेरे पति यहीं भारत में पढ़ाना चाहते थे. शायद उन की यह मंशा थी कि बेटी नजरों के सामने रहेगी. मगर मैं उस का भविष्य विदेशी धरती पर खोज रही थी? और अंतत: मैं ने उसे अपने पैसों और रुतबे के दम पर बाहर भेज दिया. बेटी का मन भी बाहर जाने का नहीं था. पर मैं जो ठान लेती करती. इस से मेरे पति को कहीं भीतर तक चोट लगी और वह और भी उग्र हो गए. फिर कई दिनों तक हमारे बीच अबोला पसर गया. हमारे बीच की खाई फैलती गई. कभी वह देर से आता तो कभी नहीं भी आता. मैं ने कभी इस बात की परवाह नहीं की और अंत में वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था. बेटी विदेश क्या गई बस वहीं की हो गई. फिर वहीं पर एक विदेशी लड़के से शादी कर ली. कोई इजाजत नहीं बस निर्णय… मेरी तरह.

उस रात हमारा जम कर झगड़ा हुआ. उस का गुस्सा जायज था. मैं झुकना नहीं जानती थी. न जीवन में झुकी हूं और न ही झुकूंगी…वही सब मेरी बेटी ने भी सीखा और किया. नतीजा तलाक पर आ गया. मैं ने ताना दिया था कि इस घर के लिए तुम ने किया ही क्या है. तुम्हारी तनख्वाह से तो घर का किराया भी नहीं दिया जाता… तुम्हारे भरोसे रहती तो जीवन घुटघुट कर जीना पड़ता. और इतना सुनना था कि वह गुस्से में घर छोड़ कर चला गया. अब सब कुछ खत्म हो गया था. मैं ने उस पर कई झूठे इलजाम लगाए, जिन से उस का बच पाना संभव नहीं था. मैं ने एक लंबी लड़ाई लड़ी थी और अब उस का अंतिम फैसला कल आना था. उस के बाद सब कुछ खत्म. परंतु नीलिमा ने इस बीच एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया जो मेरे कलेजे में बर्फ बन कर जम गया.

पर अभी भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ था, होने वाला था. बस मेरे कोर्ट में हाजिरी लगाने भर की देरी थी. मेरे पास आज भी 2 रास्ते खुले थे. एक रास्ता कोर्ट जाता था और दूसरा उस के घर की तरफ, जहां वह मुझ से अलग हो कर चला गया था. कोर्ट जाना आसान था और उस के घर की तरफ जाने का साहस शायद मुझ में नहीं था. मैं ने कोर्ट में उसे इतना बेईज्जत किया, ऐसेऐसे लांछन लगाए कि वह शायद ही मुझे माफ करता. मैं अब भी ठीक से निर्णय नहीं ले पा रही थी. हार कर मैं ने पुन: नीलिमा से मिलने का फैसला किया जिस ने मेरे शांत होते जीवन में पुन: उथलपुथल मचा दी थी. मैं उस दोराहे से अब निकलना चाहती थी. मैं ने कई बार उसे आज फोन किया, परंतु उस का फोन लगातार बंद मिलता रहा.

आज रविवार था. अत: सुबहसुबह वह घर पर मिल ही जाएगी, सोच मैं उसे मिलने चली गई. मेरे पास स्टाफ के घर का पता और मोबाइल नंबर हमेशा रहता था ताकि किसी आपातकालीन समय में उन से संपर्क कर सकूं. वह एक तीनमंजिला मकान में रहती थी. ‘‘मैम, आप?’’ मुझे देखते ही वह एकदम सकपका गई? ‘‘सब ठीक तो है न?’’

‘‘सब कुछ ठीक नहीं है,’’ मैं बड़ी उदासी से बोली. वह मेरे चेहरे पर परेशानी के भाव देख रही थी. मैं बिफर कर बोली, ‘‘तुम्हारी कल की बातों ने मुझे भीतर तक झकझोर कर रख दिया है.’’

वह हतप्रभ सी मेरे चेहरे की तरफ देखती रही.

‘‘क्या मैं कुछ देर के लिए अंदर आ सकती हूं?’’

‘‘हां मैम,’’ कह कर वह दरवाजे के सामने से हट गई, ‘‘आइए न.’’ ‘‘सौरी, मैं तुम्हें बिना बताए आ गई. मैं क्या करती. लगातार तुम्हारा फोन ट्राई कर रही थी पर स्विचऔफ आता रहा. मुझ से रहा नहीं गया तो मैं आ गई,’’ कहतेकहते मैं बैठ गई.

ड्राइंगरूम के नाम पर केवल 4 कुरसियां और एक राउंड टेबल, कोने में अलमारी और कंप्यूटर रखा था. घर में एकदम खामोशी थी. वह मुझे वहां बैठा कर बोली, ‘‘मैं चेंज कर के आती हूं.’’

थोड़ी देर में वह एक ट्रे में चाय और थोड़ा नमकीन रख कर ले आई और सामने की कुरसी पर बैठ गई. हम दोनों ही शांत बैठी रहीं. मुझे बात करने का सिरा पकड़ में नहीं आ रहा था. चुप्पी तोड़ते हुए मैं ने कहा, ‘‘मैं ने सुबहसुबह आप लोगों को डिस्टर्ब किया. सौरी… आप का पति और बेटा कहीं बाहर गए हैं क्या? बड़ी खामोशी है.’’

वह मुझे ऐसे देखने लगी जैसे मैं ने कोई गलत बात पूछ ली हो. फिर नजरें नीची कर के बोली, ‘‘मैम, न मेरा कोई पति है न बेटा. मुझे पता नहीं था कि मेरा यह राज इतनी जल्दी खुल जाएगा,’’ कह कर वह मायूस हो गई. मैं हैरानी से उस की तरफ देखने लगी. मेरे पास शब्द नहीं थे कि अगला सवाल क्या पूछूं. मैं तो अपनी समस्या का हल ढूंढ़ने आई थी और यहां तो… फिर भी हिम्मत कर के पूछा, तो क्या तुम्हारी शादी नहीं हुई?

‘‘हुई थी मगर 6 महीने बाद ही मेरे पति एक हादसे में गुजर गए. एक मध्यवर्गीय लड़की, जिस के भाई ने बड़ी कठिनाई से विदा किया हो और ससुराल ने निकाल दिया हो, उस का वजूद क्या हो सकता है,’’ कहतेकहते उस की आवाज टूट गई. चेहरा पीला पड़ गया मानो वही इस हालात की दोषी हो. ‘‘जवान अकेली लड़की का होना कितना कष्टदायी होता है, यह मुझ से बेहतर और कौन जान सकता है… हर समय घूरती नजरों का सामना करना पड़ता है…’’

‘‘तो फिर तुम ने दोबारा शादी क्यों नहीं की?’’ ‘‘कोशिश तो की थी पर कोई मन का नहीं मिला. अपनी जिंदगी के फैसले हम खुद नहीं करते, बल्कि बहुत सी स्थितियां करती हैं.

‘‘अकेली लड़की को न कोई घर देने को तैयार है न पेइंग गैस्ट रखना चाहता है. मेरी जिंदगी के हालात बहुत बुरे हो चुके थे. हार कर मैं ने ‘मिसेज खन्ना’ लिबास ओढ़ लिया. कोई पूछता है तो कह देती हूं पति दूसरे शहर में काम करते हैं. हर साल 2 साल में घर बदलना पड़ता है. और कभीकभी तो 6 महीने में ही, क्योंकि पति नाम की वस्तु मैं खरीद कर तो ला नहीं सकती. आप से भी मैं ने झूठ बोला था. पार्टियां, कचौरियां, बच्चे सब झूठ था. अब आप चाहे रखें चाहे निकालें…’’ कह कर वह नजरें झुकाए रोने लगी. मेरे पास कोई शब्द नहीं था.

‘‘बड़ा मुश्किल है मैडम अकेले रहना… यह इतना आसान नहीं है जितना आप समझती हैं… भले ही आप कितनी भी सामर्थ्यवान हों, कितना भी पढ़ीलिखी हों, समाज में कैसा भी रुतबा क्यों न हो… आप दुनिया से तो लड़ सकती हैं पर अपनेआप से नहीं. तभी तो मैं ने कहा था कि आप अपनी जिंदगी से समझौता कर लीजिए.’’

मेरा तो सारा वजूद ही डगमगाने लगा. मुझे जहां से जिंदगी शुरू करनी थी, वह सच तो मेरे सामने खड़ा था. अब इस के बाद मेरे लिए निर्णय लेना और भी आसान हो गया. मेरे लिए यहां बैठने का अब कोई औचित्य भी नहीं था. जब आगे का रास्ता मालूम न हो तो पीछे लौटना ही पड़ता है. मैं भरे मन से उठ कर जाने लगी तो नीलिमा ने पूछा, ‘‘मैम, आप ने बताया नहीं आप क्यों

आई थीं.’’ ‘‘नहीं बस यों ही,’’ मैं ने डबडबाती आंखों से उसे देखा

वह बुझे मन से पूछने लगी, ‘‘आप ने बताया नहीं मैं कल से काम पर आऊं या…’’ और हाथ जोड़ दिए. पता नहीं उस एक लमहे में क्या हुआ कि

मैं उस की सादगी और मजबूरी पर बुरी तरह रो पड़ी. न मेरे पास कोई शब्द सहानुभूति का था और न ही सांत्वना का. इन शब्दों से ऊपर भी शब्द होते तो आज कम पड़ जाते. एक क्षण के लिए काठ की मूर्ति की तरह मेरे कदम जड़ हो गए. मैं अपने घर आ कर बहुत रोई. पता नहीं उस के लिए या अपने अहं के लिए… और कितनी बार रोई. शाम होतेहोते मैं ने बेहद विनम्रता से अपने पति को फोन किया और साथ रहने की प्रार्थना की. बहुत अनुनयविनय की. शायद मेरे ऐसे व्यवहार पर पति को तरस आ गया और वह मान गए.

और हां, जिस ने मुझे तबाही से बचा लिया, उसे मैं ने एक अलग फ्लैट ले कर दे दिया. अब वह ‘मिसेज खन्ना’ का लिबास नहीं ओढ़ती. नीलिमा और सिर्फ नीलिमा. उस के मुझ पर बहुत एहसान हैं. चुका तो सकती नहीं पर भूलूंगी भी नहीं.

Story In Hindi : चित और पट

Story In Hindi : आधी रात को नीरा की आंख खुली तो विपिन को खिड़की से झांकते पाया.

‘‘अब क्या हुआ? मैं ने कहा था न कि वक्तबेवक्त की कौल्स अटैंड न किया करें. अब जिस ने कौल की वह तो तुम्हें अपनी प्रौब्लम ट्रांसफर कर आराम से सो गया होगा… अब तुम जागो,’’ नीरा गुस्से से बोलीं.

‘‘तुम सो जाओ प्रिय… मैं जरा लौन में टहल कर आता हूं.’’

‘‘अब इतनी रात में लौन में टहल कर क्या नींद आएगी? इधर आओ, मैं हैडमसाज कर देती हूं. तुरंत नींद आ जाएगी.’’

थोड़ी देर बाद विपिन तो सो गए, पर नीरा की नींद उड़ चुकी थी. विपिन की इन्हीं आदतों से वे दुखी रहती थीं. कितनी कोशिश करती थीं कि घर में तनाव की स्थिति पैदा न हो. घरेलू कार्यों के अलावा बैंकिंग, शौपिंग, रिश्तेदारी आदि सभी मोरचों पर अकेले जूझती रहतीं. गृहस्थी के शुरुआती दौर में प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर घर में आर्थिक योगदान भी किया. विपिन का हर  2-3 साल में ट्रांसफर होने के कारण उन्हें हमेशा अपनी जौब छोड़नी पड़ी. उन्होंने अपनी तरक्की की न सोच कर घर के हितों को सर्वोपरि रखा. आज जब बच्चे भी अपनीअपनी जौब में व्यस्त हो गए हैं, तो विपिन घर के प्रति और भी बेफिक्र हो गए हैं. अब ज्यादा से ज्यादा वक्त समाजसेवा को देने लगे हैं… और अनजाने में ही नीरा की अनदेखी करने लगे हैं.  हर वक्त दिमाग में दूसरों की परेशानियों का टोकरा उठाए घूमते रहते. रमेशजी की बेटी  का विवाह बिना दहेज के कैसे संपन्न होगा, दिनेश के निकम्मे बेटे की नौकरी कब लगेगी, उस के पिता दिनरात घरबाहर अकेले खटते रहते हैं, शराबी पड़ोसी जो दिनरात अपनी बीवी से पी कर झगड़ा करता है उसे कैसे नशामुक्ति केंद्र ले जाया जाए आदिआदि.

नीरा समझासमझा कर थक जातीं कि क्या तुम समाजसुधारक हो? अरे, जो मदद मांगे उसी की किया करो… सब के पीछे क्यों भागते हो? मगर विपिन पर कोई असर न पड़ता.

‘‘नीरा, आज का क्या प्रोग्राम है?’’ यह वर्तिका थी. नए शहर की नई मित्र. ‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘तो फिर सुन हम दोनों फिल्म देखने चलेंगी आज,’’ कह वर्तिका ने फोन काट दिया.

वर्तिका कितनी जिंदादिल है. उसी की हमउम्र पर कुंआरी, ऊंचे ओहदे पर. मगर जमीन से जुड़ी, सादगीपसंद. एक दिन कालोनी के पार्क में मौर्निंग वाक करते समय फोन नंबरों का आदानप्रदान भी हो गया.

फिल्म देखने के बाद भी नीरा चुपचाप  सी थीं.

‘‘भाई साहब से झगड़ा हो गया है क्या?’’ वर्तिका ने छेड़ा.

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है… तू नहीं समझ पाएगी,’’ नीरा ने टालना चाहा.

‘‘क्योंकि मेरी शादी नहीं हुई है, इसलिए कह रही हो… अरे, मर्दों से तो मेरा रोज ही पाला पड़ता है. इन की फितरत को मैं खूब समझती हूं.’’

‘‘अरे, तुम तो सीरियस हो गई मेरी प्रगतिशील मैडम… ऐसा कुछ भी नहीं है. दरअसल, मैं विपिन की तनाव उधार लेने की आदत से परेशान हूं… उन्हें कभी किसी के लिए अस्पताल जाना होता है, कभी किसी की औफिस वर्क में मदद करनी होती है,’’ नीरा उसे विस्तार से बताती चली गईं.

‘‘अच्छा एक बात बताओ कि क्या विवाह के शुरुआती दिनों से ही विपिन ऐसे हैं या फिर अब ऐसे हुए?’’ कौफी शौप में बैठते हुए वर्तिका ने पूछा.

‘‘शादी के 10-15 साल तो घरेलू जिम्मेदारियां ही इतनी अधिक थीं. बच्चे छोटे थे, किंतु जैसेजैसे बच्चे अपने पैरों पर खड़े होते गए, विपिन की जिम्मेदारियां कम होती गईं. अब तो विवाह के 26 वर्ष बीत चुके हैं. बच्चे भी अलग शहरों में हैं. अब तो इन्हें घर से बाहर रहने के  10 बहाने आते हैं,’’ नीरा उकता कर बोलीं.

‘‘तुम्हारे आपसी संबंधों पर इस का असर तो नहीं पड़ रहा है?’’ वर्तिका ने पूछा.

‘‘मैं ने पहले इस विषय पर नहीं सोचा था. मगर अब लगता है कि हमारे संबंधों के बीच भी परदा सा खिंच गया है.’’

‘‘तो मैडम, अपने बीच का परदा उठा कर खिड़कियों में सजाओ… अपने संबंध सामान्य करो… उन्हें इतनी फुरसत ही क्यों देती हो कि वे इधरउधर उलझे रहें,’’ वर्तिका दार्शनिकों की तरह बोली.

‘‘तुम ठीक कहती हो. अब यह कर के भी देखती हूं,’’ और फिर नीरा शरारत से मुसकराईं तो वर्तिका भी हंस पड़ी.

आज विपिन को घर कुछ ज्यादा ही साफ व सजा नजर आया. बैडरूम में भी ताजे गुलाबों का गुलदस्ता सजा मिला. ‘आज नीरा का जन्मदिन तो नहीं या फिर किसी बेटे का?’ विपिन ने सोचा पर कोई कारण न मिला तो रसोई की तरफ बढ़ गए. वहां उन्हें नीरा सजीधजी उन की मनपसंद डिशेज तैयार करती मिलीं.

‘‘क्या बात है प्रिय, बड़े अच्छे मूड में दिख रही हो आज?’’ विपिन नीरा के पीछे खड़े हो बोले.

‘‘अजी, ये सब आप की और अपनी खुशी के लिए कर रही हूं… कहा जाता है कि बड़ीबड़ी खुशियों की तलाश में छोटीछोटी खुशियों को नहीं भूल जाना चाहिए.’’

‘‘अच्छा तो यह बात है… आई एम इंप्रैस्ड.’’  रात नीरा ने गुलाबी रंग का साटन का गाउन निकाला और स्नानघर में घुस गईं.  ‘‘तुम नहा रही हो… देखो मुझे रोहित ने बुलाया है. मैं एकाध घंटे में लौट आऊंगा,’’ विपिन ने जोर से स्नानघर का दरवाजा खटका कर कहा.

नीरा ने एक झटके में दरवाजा खोल दिया. वे विपिन को अपनी अदा दिखा कर रोकने के मूड में थीं. मगर विपिन अपनी धुन में बाय कर चलते बने.  2 घंटे इंतजार के बाद नीरा का सब्र का बांध टूट गया. वे अपनी बेकद्री पर फूटफूट कर रो पड़ीं. आज उन्हें महसूस हुआ जैसे उन की अहमियत अब विपिन की जिंदगी में कुछ भी नहीं रह गई है.

दूसरे दिन नीरा का उखड़ा मूड देख कर जब विपिन को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो उन्होंने रात में नीरा को अपनी बांहों में भर कर सारी कसक दूर करने की ठान ली. मगर आक्रोषित नीरा उन की बांहें झटक कर बोलीं, ‘‘हर वक्त तुम्हारी मरजी नहीं चलेगी.’’

विपिन सोचते ही रह गए कि खुद ही आमंत्रण देती हो और फिर खुद ही झटक देती हो, औरतों का यह तिरियाचरित्तर कोई नहीं समझ सकता.

उधर पीठ पलट कर लेटी नीरा की आंखें डबडबाई हुई थीं. वे सोच रही थीं कि क्या वे सिर्फ हांड़मांस की पुतला भर हैं… उन के अंदर दिल नहीं है क्या? जब दिल ही घायल हो, तो तन से क्या सुख मिलेगा?

2 महीने के बाद वर्तिका और नीरा फिर उसी कौफी शौप में बैठी थीं. ‘‘नीरा, तुम्हारी हालत देख कर तो यह नहीं लग रहा है कि तुम्हारी जिंदगी में कोई बदलाव आया है. तुम ने शायद मेरे सुझाव पर अमल नहीं किया.’’

‘‘सब किया, लेकिन लगता है विपिन नहीं सुधरने वाले. वे अपने पुराने ढर्रे पर  लौट गए हैं. कभी अस्पताल, कभी औफिस का बहाना, लेटलतीफी, फोन पर लगे रहना, समाजसेवा के नाम पर देर रात लौटना… मुझे तो अपनी जिंदगी में अब तनाव ही तनाव दिखने लगा है. बच्चे बड़े हो गए हैं. उन की अपनी व्यस्तताएं हैं और पति की अपनी, सिर्फ एक मैं ही बिलकुल बेकार हो गई हूं, जिस की किसी को भी जरूरत नहीं रह गई है,’’ नीरा के मन का गुबार फूट पड़ा.

‘‘मुझे देख, मेरे पास न तो पति हैं और न ही बच्चे?’’ वर्तिका बोल पड़ी.

‘‘पर तेरे जीवन का लक्ष्य तो है… औफिस में तो तेरे मातहत पुरुष भी हैं, जो तेरे इशारों पर काम करते हैं. मुझे तो घर पर काम वालियों की भी चिरौरी करनी पड़ती है,’’ नीरा रोंआसी हो उठी.

‘‘अच्छा दुखी न हो. सुन एक उपाय बताती हूं. उसे करने पर विपिन तेरे पीछेपीछे भागने लगेंगे.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब एकदम साफ है. तू ने अपने घर को इतना व्यवस्थित और सुविधायुक्त कर रखा है कि विपिन घर और तेरे प्रति अपनी जिम्मेदारियों से निश्चिंत हैं और अपना वक्त दूसरों के संग बांटते हैं… तेरे लिए सोचते हैं कि घर की मुरगी है जब चाहे हलाल कर लो.’’

‘‘मेरी समझ में कुछ नहीं आया,’’ नीरा उलझन में पड़ कर बोलीं.

‘‘तो बस इतना समझ ले विपिन को तनाव लेना पसंद है, तो तू ही उन्हें तनाव देना शुरू कर दे… तब वे तेरे पीछे भागने लगेंगे.’’

‘‘सच में?’’

‘‘एकदम सच.’’

‘‘तो फिर यही सही,’’ कह नीरा ने एक बार फिर से अपनी गृहस्थी की गाड़ी को पटरी पर लाने को कमर कस ली.

‘‘सुनो, यह 105 नंबर वाले दिनेशजी हैं न उन की पत्नी तो विवाह के 5 वर्ष बाद ही गुजर गई थीं, फिर भी उन्होंने अपनी पत्नी के गम में दूसरी शादी नहीं की. अपनी इकलौती औलाद को सीने से लगाए दिन काट लिए. अब देखो न बेटा भी हायर ऐजुकेशन के लिए विदेश चला गया.’’

‘‘उफ, तुम्हें कब से कालोनीवासियों की खबरें मिलने लगीं… तुम तो अपनी ही गृहस्थी में मग्न रहती हो,’’ विपिन को नीरा के मुख से यह बात सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ.

‘‘अरे, कल घर आए थे न उत्सव पार्टी का निमंत्रण देने. मैं ने भी चाय औफर कर दी. देर तक बैठे रहे… अपनी बीवी और बेटे को बहुत मिस कर रहे थे.’’

‘‘ज्यादा मुंह न लगाना. ये विधुर बड़े काइयां होते हैं. एक आंख से अपनी बीवी का रोना रोते हैं और दूसरी से दूसरे की बीवी को ताड़ते हैं.’’

‘‘तुम पुरुष होते ही ऐसे हो… दूसरे मर्द की तारीफ सुन ही नहीं सकते. कितने सरल हृदय के हैं वे. बेचारे तुम्हारी ही उम्र के होंगे, पर देखो अपने को कितना मैंटेन कर रखा है. एकदम युवा लगते हैं.’’

‘‘तुम कुछ ज्यादा ही फिदा तो नहीं हो रही हो उन पर… अच्छा छोड़ो, मेरा टिफिन दो फटाफट. मैं लेट हो रहा हूं. और हां हो सकता है आज मैं घर देर से आऊं.’’

‘‘तो इस में नई बात क्या है?’’ नीरा ने चिढ़ कर कहा, तो विपिन सोच में पड़ गए.

शाम को जल्दी पर घर पहुंच कर उन्होंने नीरा को चौंका दिया, ‘‘अरे, मैडम इतना सजधज कर कहां जाने की तैयारी हो रही है?’’

‘‘यों ही जरा पार्क का एक चक्कर लगाने की सोच रही थी. वहां सभी से मुलाकात भी हो जाती है और कालोनी के हालचाल भी मिल जाते हैं.’’ विपिन हाथमुंह धोने गए तो नीरा ने उन का मोबाइल चैक किया कि आज जल्दी आने का कोई सुराग मिल जाए. पर ऐसा कुछ नहीं मिला.

‘‘आज क्या खिलाने वाली हो नीरा? बहुत दिन हुए तुम ने दालकचौरी नहीं बनाई.’’

‘‘शुक्र है, तुम्हें कुछ घर की भी याद है,’’ नीरा के चेहरे पर उदासी थी.

‘‘यहां आओ नीरा, मेरे पास बैठो. तुम ने पूछा ही नहीं कि आज मैं जल्दी घर कैसे आ

गया जबकि मैं ने बोला था कि मैं देरी से आऊंगा याद है?’’

‘‘हां, मुझे सब याद है. पर पूछा नहीं तुम से.’’

‘‘मैं अपने सहकर्मी रोहित के साथ हर दिन कहीं न कहीं व्यस्त हो जाता था… आज सुबह उस ने बताया कि उस की पत्नी अवसाद में आ गई थी जिस पर उस ने ध्यान ही नहीं दिया था. कल रात वह अचानक चक्कर खा कर गिर पड़ी, तो अस्पताल ले कर भागा. वहीं पता चला कि स्त्रियों में मेनोपौज के बाद ऐसा दौर आता है जब उन की उचित देखभाल न हो तो वे डिप्रैशन में भी चली जाती हैं. डाक्टर का कहना है कि कुछ महिलाओं में अति भावुकता व अपने परिवार में पकड़ बनाए रखने की आदत होती है और उम्र के इस पड़ाव में जब पति और बच्चे इग्नोर करने लगते हैं तो वे बहुत हर्ट हो जाती हैं. अत: ऐसे समय में उन के पौष्टिक भोजन व स्वास्थ्य का खयाल रखना चाहिए वरना वे डिप्रैशन में जा सकती हैं.’’

‘‘मुझे क्यों बता रहे हो?’’ नीरा पलट  कर बोलीं.

‘‘सीधी सी बात है मैं तुम्हें समय देना चाहता हूं ताकि तुम खुद को उपेक्षित महसूस न करो. तुम भी तो उम्र के इसी दौर से गुजर रही हो. अब शाम का वक्त तुम्हारे नाम… हम साथ मिल कर सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया करेंगे.’’

‘‘स्वार्थी कहीं के. आप ने सोचा कहीं मेरी बीवी भी मैंटल केस न बन जाए. इसी डर से परेशान हो कर ऐसा कह रहे हो न? मैं सब समझ गई.’’

‘‘अरे, यह क्या बात हुई? चित भी मेरी और पट भी… अपने मन के काम करूं तो भी मैं ही बुरा हूं और तुम्हारे मन का करूं तो भी मेरा ही स्वार्थ दिखता है तुम्हें.’’

विपिन का उतरा चेहरा देख नीरा मुसकरा उठीं.

Hindi Love Stories : अभी न जाओ छोड़ कर

Hindi Love Stories : अमितके मित्र और कुलीग मोहित के बेटे की बर्थडे पार्टी थी. हमें रात के 8 बजे उन के घर पहुंचना था, किंतु 7 बजने वाले थे और अमित अभी तक औफिस से नहीं आए थे. मैं तैयार हो कर उन का इंतजार कर रही थी. आखिकार मुझ से रहा नहीं गया. मैं ने उन के औफिस फोन किया तो पता चला कि अमित 5 बजे औफिस से चले गए थे. मुझे चिंता हुई. मैं ने मोबाइल पर फोन मिलाया. अमित की आवाज आई, ‘‘रितु, मैं अभी औफिस में मीटिंग में बिजी हूं. थोड़ी देर में पहुंच रहा हूं.’’

मुझे बुरा लगा. अमित मुझ से झूठ बोल रहे थे. हो सकता है कि अपने फ्रैंड्स के साथ हों या फिर मोहित के बेटे के लिए कोई उपहार लेने गए हों. थोड़ी देर बाद अमित आ गए और बोले, ‘‘आज औफिस में बहुत थक गया. शाम को बौस ने मीटिंग बुला ली. किंतु सच कहूं, तुम्हें देखते ही सारी थकान मिट गई. आज बहुत सुंदर लग रही हो. चलो, पार्टी में चलते हैं.’’

मेरा मन बुझ गया, किंतु मैं ने चेहरे के भावों से जाहिर नहीं होने दिया. पार्टी में पहुंचे, तो केक कट चुका था. मेहमान डिनर कर रहे थे.हमें देख मोहित ने उलाहना दिया, ‘‘हद होती है यार, इतनी देर में आए हो. हम लोग कब से राह देख रहे थे.’’

मैं तपाक से बोली, ‘‘औफिस में मीटिंग थी. आप को तो पता ही होगा. इसीलिए देर हो गई.’’

मैं ने देखा, मोहित की ओर देखते हुए अमित ?ोंप रहे थे. खाने की प्लेट उठाते हुए मैं ने मोहित को इन से कहते सुना, ‘‘यह मीटिंग का क्या चक्कर है? तू तो 5 बजे ही औफिस से निकल गया था.’’

‘‘कुछ नहीं यार, थोड़ी देर के लिए उस से मिलने चला गया था.’’

‘‘देख अमित, तू विवाहित है. ज्यादा चक्कर में मत पड़. छोड़ उसे उस के हाल पर और रितु पर ध्यान दे.’’

मेरा मन धक से रह गया. यह क्या माजरा है और मोहित किसे छोड़ने की बात कर रहा था. घर पहुंच कर मैं उस पूरी रात सो न सकी थी. उस के बाद भी 2-3 बार ऐसा हुआ कि अमित मीटिंग का बहाना बना कर देर से घर आए, जबकि औफिस से पता चला था कि कोई मीटिंग नहीं थी.

अब तक सम?ाती थी कि अमित एक परफैक्ट हसबैंड हैं. उन में वे सभी

गुण हैं, जो एक लड़की अपने पति में चाहती है. किंतु अब लग रहा था, अमित को मैं जानती ही कितना हूं.

कुछ ही दिन तो बीते हैं, विवाह हुए. विवाह के 2 दिन बाद हम दोनों हनीमून के लिए दार्जिलिंग चले गए थे. वहां से लौट कर सप्ताह भर दिल्ली अपनी ससुराल में रह कर अमित के साथ पुणे आ गई. यहां जिंदगी धीरेधीरे अपने रूटीन पर आ गई. अमित सुबह औफिस के लिए निकल जाते और मैं घर को सजानेसंवारने में लग जाती. शाम को अकसर हम दोनों कहीं घूमने चल देते. कुल मिला कर मैं खुश थी. किंतु इन दिनों मेरे दिल में हलचल मची हुई थी कि ऐसा क्या है, जो अमित मुझ से छिपा रहे हैं.

मैं ने सोचा यों परेशान होने से कुछ हासिल नहीं होगा. मुझे बुद्धिमानी से स्वयं पता करना होगा, आखिर बात क्या है. कहीं अमित मेरे चेहरे के भावों से मन की बात समझ न जाएं, इस के लिए उन के सामने सहज रहने का अभिनय करना होगा.

अब रोज सुबह जब अमित बाथरूम में होते, मैं उन का मोबाइल चैक करती. एक दिन एक मैसेज पर मेरी नजर अटक गई. बैंक से मैसेज था. अमित के अकाउंट से क्व1 लाख निकाले गए थे. इतनी बड़ी रकम उन्होंने किसे दी और क्यों, यह सवाल मु?ो परेशान करने लगा. अमित के घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी, इसलिए वहां देने का तो सवाल ही नहीं था. अब जितना समय वे घर में रहते, मैं चौकस रहती.

फिर एक रात खाना बनाते समय मुझे लगा, अमित कमरे में फोन पर किसी से धीरेधीरे बातें कर रहे हैं. मैं आंच बंद कर दबे पांव दरवाजे के पीछे जा खड़ी हुई और कान लगा कर सुनने लगी.

वे मोहित से कह रहे थे, ‘‘नयना को रुपए दे दिए हैं. तू चिंता मत कर यार. रितु को कुछ पता नहीं चलेगा. वह तो स्वयं में ही मस्त रहती है.’’

मैं ने एक गहरी सांस भरी और वहां से हट गई. रात में अमित ने मुझे अपनी बांहों में समेटना चाहा तो इच्छा हुई, उन का हाथ ?ाटक दूं. चेहरे पर बनावटी मुसकान का आवरण ओढ़े आखिर कब तक मैं उन के ?ाठे प्यार के नाटक में उन का साथ देती रहूंगी. अपने सम्मान को मार कर कब तक इस धोखेबाज इंसान को अपनी भावनाओं से खिलवाड़ करने दूंगी. किंतु मैं ने क्रोध में उफनती भावनाओं पर काबू पाया. सब्र से काम ले कर ही अपने मकसद में कामयाब हो सकती थी और अमित के झूठ को पकड़ सकती थी.

जल्द ही मुझे सफलता मिली. उस रोज सुबह नाश्ता करते हुए अमित बोले, ‘‘रितु, मुझे शाम को औफिस से लौटने में देर हो जाएगी. बौस के साथ मीटिंग है. तुम चाय पी लेना.’’

मेरा चेहरा उतर गया. आज सुबह इन का मोबाइल चैक करना भी भूल गई थी. तभी संयोग से दिल्ली से मेरी सास का फोन आ गया. अमित ने उन से बात की फिर बोले, ‘‘लो, मां, तुम से बात करना चाहती हैं.’’

मैं मोबाइल ले कर बालकनी में चली गई. मां से बातें करतेकरते मोबाइल का इनबौक्स चैक किया. एक मैसेज को देख कर मेरा दिल डूबने लगा. लिखा था, ‘आज शाम 6 बजे ग्लैक्सी मौल के कौफीहाउस में मिलो- नयना.’ यह नयना वही थी, जिसे अमित ने रुपए दिए थे. बात कर के मैं ने खामोशी से फोन उन्हें दे दिया.रोज की तरह जाते हुए अमित ने मेरे माथे पर चुंबन दिया तो मेरा मन वितृष्णा से भर

उठा. उन का स्पर्श भी अब मुझे पराया लग रहा था. कौन है यह नयना? क्या रिश्ता है उस का अमित से? क्या उन का नयना के साथ अफेयर चल रहा है? शायद यही सच था, तभी तो मुझ से झूठ बोल कर वे उस से मिल रहे थे. सारा दिन मैं वेदना के भंवर में डूबतीउतराती रही. एक अजीब सी बेचैनी, अनजाने भय से मैं छटपटाती रही. रहरह कर नजरें घड़ी की ओर उठ रही थीं. शाम के

5 बजते ही मैं ग्लैक्सी मौल की ओर चल दी. मैं अमित को रंगे हाथों पकड़ कर इस लुकाछिपी के खेल को समाप्त कर देना चाहती थी. ग्लैक्सी मौल के कौफीहाउस में पहुंचतेपहुंचते 6 बज गए. इधरउधर नजर डाली तो सब से पीछे कोने की मेज पर अमित एक खूबसूरत लड़की के साथ बैठे दिखे.

मैं कुछ सोच कर दृढ़ कदमों से उन की ओर बढ़ी. अमित नजरें  झुकाए कुछ पेपर्स पढ़ने में व्यस्त थे. मैं उन की मेज के पास जा कर खड़ी हो गई. ज्योंही उन की नजर मुझ पर पड़ी, वे बुरी तरह हड़बड़ा गए, ‘‘रितु, तुम यहां?’’ वे हैरानी से बोले.

मैं ने उन की आंखों में देख कर कहा, ‘‘अपनी फ्रैंड के साथ मौल में आई थी. आप को यहां देखा तो चली आई,’’ कह कर मैं वहां से चल दी. अमित पीछे से पुकारते ही रह गए.

मैं मन में पीड़ा का गुबार दबाए घर पहुंची और पलंग पर गिर कर फूटफूट कर रो पड़ी. दिल में हाहाकार मचा हुआ था. समझ नहीं आ रहा था क्या करूं. जब मन कुछ हलका हुआ तो उठ कर अटैची में कपड़े रखने लगी. अमित ने मेरे भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था. अब मु?ो क्या कदम उठाना चाहिए, यह फैसला लेना मुमकिन नहीं था कि तभी घंटी बजी. अमित आ गए थे. वे बेहद गंभीर थे. उन्होंने एक नजर अटैची में रखे कपड़ों पर डाली और फिर मेरा हाथ पकड़ कर बोले, ‘‘यह क्या कर रही हो रितु? कहां जा रही हो?’’

मैं ने गुस्से में उन का हाथ झटक दिया और बोली, ‘‘अमित, आप ने क्या समझा था, आप मुझे धोखा देते रहेंगे और मुझे कुछ पता नहीं चलेगा? मैं काफी दिन पहले जान गई थी कि औफिस की मीटिंग के नाम पर आप कहीं और जाते हैं. मैं इस मौके की तलाश में थी कि आप का झूठ आप के सामने ला सकूं. आप का नयना से अफेयर था तो मुझ से शादी क्यों की?’’

‘‘मेरा उस से अफेयर नहीं है रितु.’’

‘‘झूठ कह रहे हैं आप… तभी तो मुPसे झूठ बोल कर उस से मिलते हैं. उसे रुपए देते हैं.’’

अमित ने हैरानी से मुPs देखा तो मैं बोली, ‘‘अमित, मैं कोई बेबस, निरीह लड़की नहीं जो पति की बेवफाई पर आंसू बहाती रहूं. मैं पढ़ीलिखी साहसी लड़की हूं. अपनी जिंदगी खराब नहीं होने दूंगी. फिलहाल मैं अपने घर जा रही हूं.’’

मैं ने अटैची उठानी चाही तो अमित ने मेरी बांह थाम ली. भर्राए स्वर में बोले, ‘‘बात सुन लो, फिर जो चाहो सजा देना. रितु, नयना का मुझ से नहीं, मेरे बड़े भाई आलोक से अफेयर था. घर में सभी को इस बात का पता था. वह बेझिझक हमारे घर आया करती थी. मैं तो उसे भाभी कहता था. नयना के मांबाप नहीं हैं. बड़े भाईभाभी हैं. सब की रजामंदी से भैया और नयना की सगाई कर दी गई.

शादी की तिथि 3 महीने बाद तय हुई थी. घर में जोरशोर से शादी की तैयारी चल रही थी, तभी कंपनी की ओर से एक प्रोजैक्ट के सिलसिले में भैया को अमेरिका जाने को कहा गया. मां और पिताजी चाहते थे, जाने से पहले दोनों की शादी कर दी जाए ताकि भैया नयना को ले कर अमेरिका चले जाएं किंतु भैया नहीं माने. उन का कहना था, 6 माह बाद लौट कर आराम से अपनी जिंदगी शुरू करेंगे. नयना को प्रतीक्षा करने के लिए कह कर आलोक भैया चले गए. किसी तरह 6 माह कटे, किंतु भैया नहीं लौटे. फिर 1 साल बीततेबीतते भैया ने कंपनी बदल ली और वहीं पर बसे एक भारतीय परिवार की लड़की से शादी कर ली.

‘‘नयना के भाई ने पिताजी को बहुत बुराभला कहा. किंतु वे बेचारे शर्मिंदा होने के सिवा क्या करते? और नयना वह तो बिलकुल खामोश हो गई थी. उस के बाद नयना के बारे में हमें कुछ पता नहीं चला. बी.टैक करने के बाद जौब के लिए मैं पूना आ गया. तुम से शादी हुई. हनीमून से लौट कर एक संडे घर का सामान लेने मार्केट गया था. वहीं नयना मुझे मिल गई. उस के साथ उस का 2 साल का बेटा भी था.

‘‘रितु, उस दिन नयना ने अपने बारे में मुझे जो कुछ बताया वह बहुत दुखद था.

आलोक से धोखा खाने के बाद उस की शादी हुई और 3 साल के अंदर ही अत्यधिक शराब पीने के कारण पति की मौत हो गई. ससुराल वालों ने उसे घर से निकाल दिया. 2 साल के बेटे को साथ लिए नयना मायके आई. किंतु वहां भी भाईभाभी उसे बोझ समझते हैं. रितु उस की इस दुर्दशा का जिम्मेदार मेरा मन आलोक भैया को मान रहा था. इस नाते मैं ने उस की मदद करने का निश्चय किया. चाहता था, उसे कहीं अच्छी जौब मिल जाए और उस के बेटे का अच्छे स्कूल में दाखिला हो जाए. इस सिलसिले में कई बार उस से मिलना हुआ. उसे 1 लाख रुपए भी दिए जो उस ने इसी शर्त पर स्वीकारे हैं कि वह उन्हें वापस कर देगी. रितु, मैं ने जो कुछ भी किया, इंसानियत के नाते किया. तुम चाहो तो मोहित से पूछ लो. उसे सब पता है.’’

‘‘मैं जानती हूं, मोहित को पता है सिर्फ मु?ो ही आप ने पराया बना दिया. क्या मु?ा पर आप को तनिक भी विश्वास नहीं था?’’

‘‘दरअसल, मेरे मन में संकोच था. तुम घर में नईनई आई थीं. मैं ने सोचा, भैया के विश्वासघात से तुम्हारे मन में उन के प्रति सम्मान कम हो जाएगा. तुम क्या सोचोगी कि कैसे परिवार से मेरा नाता जुड़ा है.’’

कुछ क्षण खामोश रह कर मैं बोली, ‘‘यदि ऐसा व्यवहार मैं ने आप के साथ किया होता तो क्या आप खुशीखुशी मुझे माफ कर देते? पतिपत्नी का रिश्ता आपसी विश्वास पर टिका होता है. आप ने यह क्यों नहीं सोचा कि दूसरों

के प्रति सम्मान की भावना बनाए रखने के लिए आप अपनी पत्नी को धोखा दे रहे हैं? अपने रिश्ते की नींव को कमजोर कर रहे हैं? छोटीछोटी बातें ही पतिपत्नी को करीब लाती हैं और छोटीछोटी बातों से ही रिश्ता दरकने लगता है.’’

‘‘मुझे माफ कर दो रितु, जो चाहो सजा दे दो, किंतु मुझे छोड़ कर मत जाओ. तुम कहोगी तो मैं नयना की मदद नहीं करूंगा.’’

‘‘मैं इतनी संवेदनाशून्य नहीं और न ही मेरा दिल इतना छोटा है. अमित, नयना को सपोर्ट करने की आप की भावना का मैं सम्मान करती हूं और हमेशा आप के साथ हूं, किंतु आप को मुझ से एक वादा करना होगा. आप भविष्य में कभी मुझ से कुछ छिपाएंगे नहीं.’’

‘‘मैं वादा करता हूं रितु, मैं कभी तुम से कुछ नहीं छिपाऊंगा. सदैव तुम्हारी भावनाओं की कद्र करूंगा,’’

भावविह्वल हो अमित ने मुझे अपनी बांहों के घेरे में ले लिया. आज उन का यह स्नेहिल स्पर्श मुझे बहुत अपना सा लगा.

Family Story : कागज के चंद टुकड़ों का मुहताज रिश्ता

Family Story: 2 साल तक रोहिणी की शादी के लिए लड़का तलाश करने के बाद जब नमित के पापा ने मनचाहा दहेज देने के लिए रोहिणी के पापा द्वारा हामी भरे जाने पर शादी के लिए हां की, तो एक बेटी के मजबूर पिता के रूप में रोहिणी के पिता रमेश बेहद खुश हुए.

अपनी समझदार व खुद्दार बेटी रोहिणी की शादी नमित के साथ कर के रमेश अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री समझ कर पत्नी के साथ गंगा स्नान को निकल गए इन सब बातों से बेखबर कि उधर ससुराल में उन की लाड़ली को लोगों की कैसी प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ रहा है.

शादी में चेहरेमोहरे पर लोगों द्वारा छींटाकशी तो आम बात है, लेकिन जब पति भी अपनी पत्नी के रंगरूप से संतुष्ट न हो, तो पत्नी के लिए लोगों के शब्दबाणों का सामना करना बड़ा मुश्किल हो जाता है.

रोहिणी सोच से बेहद मजबूत किस्म की लड़की थी. तानोंउलाहनों को धीरेधीरे नजरअंदाज करते हुए उस ने घर की जिम्मेदारी बखूबी संभाल ली थी.

कुछ महीने बाद, शादी के पहले, शिक्षक के लिए दी गई प्रतियोगिता परीक्षा का रिजल्ट आया, जिस में रोहिणी का चयन हुआ और रोहिणी एक शिक्षक बनने की दिशा में आगे बढ़ गई.

इस खुशखबरी और रोहिणी के अच्छे व्यवहार से उस के प्रति घर वालों का नजरिया बदलने लगा था. नमित भी अब रोहिणी से खुश रहने लगा था. पैसा अपने अंदर किसी के प्रति किसी का नजरिया बदलवाने का खूबसूरत माद्दा रखता है. यही अब उस घर में दृष्टिगोचर हो रहा था.

शादी के 5 साल पूरे होने को थे और रोहिणी की गोद अभी तक सूनी थी. यह बात अब आसपास और परिवार के लोगों को खटकने लगी थी, तो नमित तक भी यह खटकन पहुंचनी ही थी.

शुरू में नमित ने मां को समझाने की कोशिश की, पर दादी शब्द सुनने की उम्मीद ने एक बेटे के समझाते हुए शब्दों के सामने अपना पलड़ा भारी रखा और नमित की मां इस जिद पर अड़ी रहीं कि अब तो उन्हें एक पोता चाहिए ही चाहिए.

कहते हैं कि अगर किसी बात को बारबार सुनाया जाए, तो वही बात हमारे लिए सचाई सी बन जाती है, ठीक उसी तरह लोगों द्वारा रोहिणी के मां न बनने की बात सुनतेसुनते नमित को लगने लगा कि अब रोहिणी को मां बनना ही चाहिए और उस के दिमाग पर भी पिता बनने की ख्वाहिश गहराई से हावी होने लगी. उस ने रोहिणी से बात की और उसे चैकअप के लिए ले गया.

रोहिणी की रिपोर्ट नौर्मल आई, इस के बावजूद काफी कोशिश के बाद भी वह पिता नहीं बन सका. अब रोहिणी भी नमित पर दबाव डालने लगी कि उस की सभी रिपोर्ट नौर्मल हैं, तो एक बार उसे भी चैकअप करवा लेना चाहिए, लेकिन नमित ने उस की बात नहीं मानी. वह अपना चैकअप नहीं करवाना चाहता था, क्योंकि उस के अनुसार उस में कोई कमी हो ही नहीं सकती थी.

मां चाहती थीं कि नमित रोहिणी को तलाक दे कर दूसरी शादी कर ले. वह खुल कर तो मां की बात का समर्थन नहीं कर रहा था, पर उस के अंतर्मन को कहीं न कहीं अपनी मां का कहना सही लग रहा था. एक पति पर पिता बनने की ख्वाहिश पूरी तरह हावी हो चुकी थी.

धीरेधीरे उम्मीद की किरण लुप्त सी होने लगी थी. अब उस घर में सब चुपचुप से रहने लगे थे. खासकर रोहिणी के प्रति सभी का व्यवहार कटाकटा सा था. घर वालों के रूखे व्यवहार ने रोहिणी को भी काफी चिड़चिड़ा बना दिया था.

एक दिन नमित ने रोहिणी को समझाने की कोशिश की, ‘‘देखो रोहिणी, वंश चलाने के लिए एक वारिस की जरूरत होती है और मुझे नहीं लगता कि अब तुम इस घर को कोई वारिस दे पाओगी. इसलिए तुम तलाक के कागजात पर साइन कर दो.

‘‘और यकीन रखो, तलाक के बाद भी हमारा रिश्ता पहले जैसा ही रहेगा. हमारा रिश्ता कागज के चंद टुकड़ों का मुहताज कभी नहीं होगा. भले ही हम कानूनी रूप से पतिपत्नी नहीं रहेंगे, पर मेरे दिल में हमेशा तुम ही रहोगी.’

‘‘नाम के लिए कागज पर मेरी पत्नी, मेरे साथ काम कर रही रोजी होगी, परंतु उस से शादी का मेरा मकसद बस औलाद प्राप्ति होगा. तुम्हें बिना तलाक दिए भी मैं उस से शादी कर सकता हूं, पर तुम तो जानती हो कि हम दोनों की सरकारी नौकरी है और बिना तलाक शादी करना मुझे परेशानी में डाल कर मेरी नौकरी को खतरे में डाल सकता है.’’

‘‘तुम अपना चैकअप क्यों नहीं करवाते हो, नमित. मुझे लगता है कि कमी तुम में ही है. एक बात कहूं, तुम निहायत ही दोगले इंसान हो, शरीफ बने इस चेहरे के पीछे एक बेहद घटिया और कायर इंसान छिपा है.

‘‘कान खोल कर सुन लो, मैं तुम्हें किसी शर्त पर तलाक नहीं दूंगी. तुम्हें जो करना हो, कर लो. सारी परेशानियों को सहते हुए मैं इसी परिवार में रह

कर तुम सब के दिए कष्टों को सह

कर तुम्हारे ही साथ अपने बैडरूम

में रहूंगी.’’

‘‘नहीं, मुझ में कोई कमी नहीं हो सकती, और तलाक तो तुम्हें देना ही होगा. मुझे इस खानदान के लिए वारिस चाहिए, चाहे वह तुम से मिले या किसी और से.

‘‘अगर तुम सीधेसीधे तलाक के पेपर पर हस्ताक्षर नहीं करती हो, तो मैं तुम पर मेरे परिवार वालों को परेशान करने और बदचलनी का आरोप लगाऊंगा,’’ नमित के शब्दों का अंदाज बदल चुका था.

कुछ दिनों बाद नमित ने कोर्ट में रोहिणी पर इलजाम लगाते हुए तलाक की अर्जी दाखिल कर दी.

अब रोहिणी बिलकुल चुप सी रहने लगी थी, लेकिन तलाक मिलने तक अपने बैडरूम पर कब्जा नहीं छोड़ने के अपने फैसले पर अडिग थी.

2 महीने बाद ही उसे पता चला कि वह मां बनने वाली है. यह खबर मिलते ही नमित ने तलाक की दी हुई अर्जी वापस ले ली.

उस के अगले ही दिन रोहिणी अपना बैग पैक कर के मायके चली गई. सारी बातें सुन कर मातापिता ने समझाने की कोशिश की कि जब सबकुछ ठीक

हो रहा है, तो इस तरह की जिद सही नहीं है.

‘‘अगर आप लोगों को मेरा आप के साथ रहना पसंद नहीं है, तो मैं जल्दी ही कहीं और रूम ले कर रहने चली जाऊंगी. आप लोगों पर ज्यादा दिन बोझ बन कर नहीं रहूंगी.’’

बेटी से इस तरह की बातें सुन कर दोनों चुप हो गए.

अगले दिन शाम को घंटी बजने पर रोहिणी ने दरवाजा खोला सामने नमित था. बिना जवाब की प्रतीक्षा किए वह अंदर आ कर सोफे पर बैठ गया, तब तक रोहिणी के मातापिता भी आ चुके थे.

बात की शुरुआत नमित ने की, ‘‘रोहिणी हमारी गोद में जल्दी ही एक खूबसूरत संतान आने वाली है, तो तुम अब यह सब क्यों कर रही हो.

‘‘जब मैं ने तुम्हें तलाक देना चाहा था, तब तो तुम किसी भी शर्त पर तलाक देने को तैयार नहीं थीं, फिर अब क्या हुआ. अब जब सबकुछ सही हो रहा है, सब ठीक होने जा रहा है, तो इस तरह की जिद का क्या औचित्य?’’

‘‘नमित, तुम्हें क्या लगता है, यह बच्चा तुम्हारा है? तो मैं तुम्हें यह साफसाफ बता दूं कि यह बच्चा तुम्हारा नहीं, मेरे कलीग सुभाष का है, जो इस तलाक के बाद जल्दी ही मुझ से शादी करने वाला है.

‘‘तुम ने मुझ पर चरित्रहीनता के झूठे आरोप लगाए थे न, मैं ने तुम्हारे लगाए हर उस आरोप को सच कर के दिखा दिया. और साथ ही, यह भी दिखा दिया कि मुझ में कोई कमी नहीं, कमी तुम में है. तुम एक अधूरे मर्द हो जो अपनी कमी से पनपी कुंठा अब तक अपनी पत्नी पर उड़ेलते रहे. विश्वास न हो तो जा कर अपना चैकअप करवाओ और फिर जितनी चाहे उतनी शादियां करो.

‘‘तुम्हारे घर में तुम्हारी मां और बहन द्वारा दिए गए उन सारे जख्मों को मैं भुला देती, अगर बस तुम ने मेरा साथ दिया होता. औरत को बच्चे पैदा करने की मशीन मानने वाले तुम जैसे मर्द, मेरे तलाक नहीं देने के उस फैसले को मेरी एक अदद छत पाने की लालसा समझते रहे और मैं उसी छत के नीचे रह कर अपने ऊपर होते अत्याचारों की आंच पर तपती चली गई, अंदर से मजबूत होती चली गई. ऐसे में मुझे सहारा मिला सुभाष के कंधों का और उस ने एक सच्चा मर्द बन कर, सही मानो में मुझे औरत बनने का मौका दिया.

‘‘अब तुम्हारे द्वारा लगाए गए उन झूठे आरोपों को मैं सच्चा साबित कर के तुम से तलाक लूंगी और तुम्हें मुक्त करूंगी इस अनचाहे रिश्ते से, तुम्हें अपनी मरजी से शादी करने के लिए, जो तुम्हारे खानदान को तुम से वारिस दे सके जो मैं तुम्हें नहीं दे पाई.

‘‘अब तुम जा सकते हो. कोर्ट में मिलेंगे,’’ बिना नमित के उत्तर की प्रतीक्षा किए रोहिणी उठ कर अपने कमरे में चली गई.

Best Hindi Story : जो बीत गई सो बात गई

Best Hindi Story :  अपनेमोबाइल फोन की स्क्रीन पर नंबर देखते ही वसंत उठ खड़ा हुआ. बोला, ‘‘नंदिता, तुम बैठो, वे लोग आ गए हैं, मैं अभी मिल कर आया. तुम तब तक सूप खत्म करो. बस, मैं अभी आया,’’ कह कर वसंत जल्दी से चला गया. उसे अपने बिजनैस के सिलसिले में कुछ लोगों से मिलना था. वह नंदिता को भी अपने साथ ले आया था.

वे दोनों ताज होटल में खिड़की के पास बैठे थे. सामने गेटवे औफ इंडिया और पीछे लहराता गहरा समुद्र, दूर गहरे पानी में खड़े विशाल जहाज और उन का टिमटिमाता प्रकाश. अपना सूप पीतेपीते नंदिता ने यों ही इधरउधर गरदन घुमाई तो सामने नजर पड़ते ही चम्मच उस के हाथ से छूट गया. उसे सिर्फ अपना दिल धड़कता महसूस हो रहा था और विशाल, वह भी तो अकेला बैठा उसे ही देख रहा था. नंदिता को यों लगा जैसे पूरी दुनिया में कोई नहीं सिवा उन दोनों के.

नंदिता किसी तरह हिम्मत कर के विशाल की मेज तक पहुंची और फिर स्वयं को सहज करती हुई बोली, ‘‘तुम यहां कैसे?’’

‘‘मैं 1 साल से मुंबई में ही हूं.’’

‘‘कहां रह रहे हो?’’

‘‘मुलुंड.’’

नंदिता ने इधरउधर देखते हुए जल्दी से कहा, ‘‘मैं तुम से फिर मिलना चाहती हूं, जल्दी से अपना नंबर दे दो.’’

‘‘अब क्यों मिलना चाहती हो?’’ विशाल ने सपाट स्वर में पूछा.

नंदिता ने उसे उदास आंखों से देखा, ‘‘अभी नंबर दो, बाद में बात करूंगी,’’ और फिर विशाल से नंबर ले कर वह फिर मिलेंगे, कहती हुई अपनी जगह आ कर बैठ गई.

विशाल भी शायद किसी की प्रतीक्षा में था. नंदिता ने देखा, कोई उस से मिलने आ गया था और वसंत भी आ गया था. बैठते ही चहका, ‘‘नंदिता, तुम्हें अकेले बैठना पड़ा सौरी. चलो, अब खाना खाते हैं.’’

पति से बात करते हुए नंदिता चोरीचोरी विशाल पर नजर डालती रही और सोचती रही अच्छा है, जो आंखों की भाषा पढ़ना मुश्किल है वरना बहुत से रहस्य खुल जाएं. नंदिता ने नोट किया विशाल ने उस पर फिर नजर नहीं डाली थी या फिर हो सकता है वह ध्यान न दे पाई हो.

आज 5 साल बाद विशाल को देख पुरानी यादें ताजा हो गई थीं. लेकिन वसंत के सामने स्वयं को सहज रखने के लिए नंदिता को काफी प्रयत्न करना पड़ा.

वे दोनों घर लौटे तो आया उन की 3 वर्षीय बेटी रिंकी को सुला चुकी थी. वसंत की मम्मी भी उन के साथ ही रहती थीं. वसंत के पिता का कुछ ही अरसा पहले देहांत हो गया था.

उमा देवी का समय रिंकी के साथ अच्छा कट जाता था और नंदिता के भी उन के साथ मधुर संबंध थे.

वसंत भी सोने लेट गया. नंदिता आंखें बंद किए लेटी रही. उस की आंखों के कोनों से आंसू निकल कर तकिए में समाते रहे. उस ने आंखें खोलीं. आंसुओं की मोटी तह आंखों में जमी थी. अतीत की बगिया से मन के आंगन में मुट्ठी भर फूल बिखेर गई विशाल की याद जिस के प्यार में कभी उस का रोमरोम पुलकित हो उठता था.

नंदिता को वे दिन याद आए जब वह अपनी सहेली रीना के घर उस के भाई विशाल से मिलती तो उन की खामोश आंखें बहुत कुछ कह जाती थीं. वे अपने मन में उपज रही प्यार की कोपलों को छिपा न सके थे और एक दिन उन्होंने एकदूसरे के सामने अपने प्रेम का इजहार कर दिया था.

लेकिन जब वसंत के मातापिता ने लखनऊ में एक विवाह में नंदिता को देखा तो देखते ही पसंद कर लिया और जब वसंत का रिश्ता आया तो आम मध्यवर्गीय नंदिता के मातापिता सुदर्शन, सफल, धनी बिजनैसमैन वसंत के रिश्ते को इनकार नहीं कर सके. उस समय नौकरी की तलाश में भटक रहे विशाल के पक्ष में नंदिता भी घर में कुछ कह नहीं पाई.

उस का वसंत से विवाह हो गया. फिर विशाल का सामना उस से नहीं हुआ, क्योंकि वह फिर मुंबई आ गई थी. रीना से भी उस का संपर्क टूट चुका था और आज 5 साल बाद विशाल को देख कर उस की सोई हुई चाहत फिर से अंगड़ाइयां लेने लगी थी.

नंदिता ने देखा वसंत और रिंकी गहरी नींद में हैं, वह चुपचाप उठी, धीरे से बाहर आ कर उस ने विशाल को फोन मिलाया. घंटी बजती रही, फिर नींद में डूबा एक नारी स्वर सुनाई दिया, ‘‘हैलो.’’

नंदिता ने चौंक कर फोन बंद कर दिया. क्या विशाल की पत्नी थी? हां, पत्नी ही होगी. नंदिता अनमनी सी हो गई. अब वह विशाल को कैसे मिल पाएगी, यह सोचते हुए वह वापस बिस्तर पर आ कर लेट गई. लेटते ही विशाल उस की जागी आंखों के सामने साकार हो उठा और बहुत चाह कर भी वह उस छवि को अपने मस्तिष्क से दूर न कर पाई.

वसंत के साथ इतना समय बिताने पर भी नंदिता अब भी रात में नींद में विशाल को सपने में देखती थी कि वह उस की ओर दौड़ी चली जा रही है. उस के बाद खुले आकाश के नीचे चांदनी में नहाते हुए सारी रात वे दोनों आलिंगनबद्ध रहते. उन्हें देख प्रकृति भी स्तब्ध हो जाती. फिर उस की तंद्रा भंग हो जाती और आंखें खुलने पर वसंत उस के बराबर में होते और वह विशाल को याद करते हुए बाकी रात बिता देती.

आज तो विशाल को सामने देख कर नंदिता और बेचैन हो गई थी.

अगले दिन वसंत औफिस चला गया और रिंकी स्कूल. उमा देवी अपने कमरे में बैठी टीवी देख रही थीं. नंदिता ने फिर विशाल को फोन मिलाया. इस बार विशाल ने ही उठाया, पूछा, ‘‘क्या रात भी तुम ने फोन किया था?’’

‘‘हां, किस ने उठाया था?’’

‘‘मेरी पत्नी नीता ने.’’

पल भर को चुप रही नंदिता, फिर बोली, ‘‘विवाह कब किया?’’

‘‘2 साल पहले.’’

‘‘विशाल, मुझे अपने औफिस का पता दो, मैं तुम से मिलना चाहती हूं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘यह तुम मुझ से पूछ रहे हो?’’

‘‘हां, अब क्या जरूरत है मिलने की?’’

‘‘विशाल, मैं हमेशा तुम्हें याद करती रही हूं, कभी नहीं भूली हूं. प्लीज, विशाल, मुझ से मिलो. तुम से बहुत सी बातें करनी हैं.’’

विशाल ने उसे अपने औफिस का पता बता दिया. नंदिता नहाधो कर तैयार हुई. घर में 2 मेड थीं, एक घर के काम करती थी और दूसरी रिंकी को संभालती थी. घर में पैसे की कमी तो थी नहीं, सारी सुखसुविधाएं उसे प्राप्त थीं. उमा देवी को उस ने बताया कि उस की एक पुरानी सहेली मुंबई आई हुई है. वह उस से मिलने जा रही है. नंदिता ने ड्राइवर को गाड़ी निकालने के लिए कहा. एक गाड़ी वसंत ले जाता था. एक गाड़ी और ड्राइवर वसंत ने नंदिता की सुविधा के लिए रखा हुआ था. नंदिता को विशाल के औफिस मुलुंड में जाना था. जो उस के घर बांद्रा से डेढ़ घंटे की दूरी पर था.

नंदिता सीट पर सिर टिका कर सोच में गुम थी. वह सोच रही थी कि उस के पास सब कुछ तो है, फिर वह अपने जीवन से पूर्णरूप से संतुष्ट व प्रसन्न क्यों नहीं है? उस ने हमेशा विशाल को याद किया. अब तो जीवन ऐसे ही बिताना है यही सोच कर मन को समझा लिया था. लेकिन अब उसे देखते ही उस के स्थिर जीवन में हलचल मच गई थी.

नंदिता को चपरासी ने विशाल के कैबिन में पहुंचा दिया. नंदिता उस के आकर्षक व्यक्तित्व को अपलक देखती रही. विशाल ने भी नंदिता पर एक गंभीर, औपचारिक नजर डाली. वह आज भी सुंदर और संतुलित देहयष्टि की स्वामिनी थी.

विशाल ने उसे बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘कहो नंदिता, क्यों मिलना था मुझ से?’’

नंदिता ने बेचैनी से कहा, ‘‘विशाल, तुम ने यहां आने के बाद मुझ से मिलने की कोशिश भी नहीं की?’’

‘‘मैं मिलना नहीं चाहता था और अब तुम भी आगे मिलने की मत सोचना. अब हमारे रास्ते बदल चुके हैं, अब उन्हीं पुरानी बातों को करने का कोई मतलब नहीं है. खैर, बताओ, तुम्हारे परिवार में कौनकौन है?’’ विशाल ने हलके मूड में पूछा.

नंदिता ने अनमने ढंग से बताया और पूछने लगी, ‘‘विशाल, क्या तुम सच में मुझ से मिलना नहीं चाहते?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘क्या तुम मुझ से बहुत नाराज हो?’’

‘‘नंदिता, मैं चाहता हूं तुम अपने परिवार में खुश रहो अब.’’

‘‘विशाल, सच कहती हूं, वसंत से विवाह तो कर लिया पर मैं कहां खुश रह पाई तुम्हारे बिना. मन हर समय बेचैन और व्याकुल ही तो रहा है. हर पल अनमनी और निर्विकार भाव से ही तो जीती रही. इतने सालों के वैवाहिक जीवन में मैं तुम्हें कभी नहीं भूली. मैं वसंत को कभी उस प्रकार प्रेम कर ही नहीं सकी जैसा पत्नी के दिल में पति के प्रति होना आवश्यक है. ऐसा भी नहीं कि वसंत मुझे चाहते नहीं हैं या मेरा ध्यान नहीं रखते पर न जाने क्यों मेरे मन में उन के लिए वह प्यार, वह तड़प, वह आकर्षण कभी जन्म ही नहीं ले सका, जो तुम्हारे लिए था. मैं ने अपने मन को साधने का बहुत प्रयास किया पर असफल रही. मैं उन की हर जरूरत का ध्यान रखती हूं, उन की चिंता भी रहती है और वे मेरे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण भी हैं, लेकिन तुम्हारे लिए जो…’’

उसे बीच में ही टोक कर विशाल ने कहा, ‘‘बस करो नंदिता, अब इन बातों का कोई फायदा नहीं है, तुम घर जाओ.’’

‘‘नहीं, विशाल, मेरी बात तो सुन लो.’’

विशाल असहज सा हो कर उठ खड़ा हुआ, ‘‘नंदिता, मुझे कहीं जरूरी काम से जाना है.’’

‘‘चलो, मैं छोड़ देती हूं.’’

‘‘नहीं, मैं चला जाऊंगा.’’

‘‘चलो न विशाल, इस बहाने कुछ देर साथ रह लेंगे.’’

‘‘नहीं नंदिता, तुम जाओ, मुझे देर हो रही है, मैं चलता हूं,’’ कह कर विशाल कैबिन से निकल गया.

नंदिता बेचैन सी घर लौट आई. उस का किसी काम में मन नहीं लगा. नंदिता के अंदर कुछ टूट गया था, वह अपने लिए जिस प्यार और चाहत को विशाल की आंखों में देखना चाहती थी, उस का नामोनिशान भी विशाल की आंखों में दूरदूर तक नहीं था. वह सब भूल गया था, नई डगर पर चल पड़ा था.

नंदिता की हमेशा से इच्छा थी कि काश, एक बार विशाल मिल जाए और आज वह मिल गया, लेकिन अजनबीपन से और उसे इस मिलने पर कष्ट हो रहा था.

शाम को वसंत आया तो उस ने नंदिता की बेचैनी नोट की. पूछा, ‘‘तबीयत तो ठीक है?’’

नंदिता ने बस ‘हां’ में सिर हिला दिया. रिंकी से भी अनमने ढंग से बात करती रही.

वसंत ने फिर कहा, ‘‘चलो, बाहर घूम आते हैं.’’

‘‘अभी नहीं,’’ कह कर वह चुपचाप लेट गई. सोच रही थी आज उसे क्या हो गया है, आज इतनी बेचैनी क्यों? मन में अटपटे विचार आने लगे. मन और शरीर में कोई मेल ही नहीं रहा. मन अनजान राहों पर भटकने लगा था. वसंत नंदिता का हर तरह से ध्यान रखता, उसे घूमनेफिरने की पूरी छूट थी.

अपने काम की व्यस्तता और भागदौड़ के बीच भी वह नंदिता की हर सुविधा का ध्यान रखता. लेकिन नंदिता का मन कहीं नहीं लग रहा था. उस के मन में एक अजीब सा वीरानापन भर रहा था.

कुछ दिन बाद नंदिता ने फिर विशाल को फोन कर मिलने की बात की. विशाल ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि वह उस से मिलना नहीं चाहता. नंदिता ने सोचा विशाल को नाराज होने का अधिकार है, जल्द ही वह उसे मना लेगी.

फिर एक दिन वह अचानक उस के औफिस के नीचे खड़ी हो कर उस का इंतजार करने लगी.

विशाल आया तो नंदिता को देख कर चौंक गया, वह गंभीर बना रहा. बोला, ‘‘अचानक यहां कैसे?’’

नंदिता ने कहा, ‘‘विशाल, कभीकभी तो हम मिल ही सकते हैं. इस में क्या बुराई है?’’

‘‘नहीं नंदिता, अब सब कुछ खत्म हो चुका है. तुम ने यह कैसे सोच लिया कि मेरा जीवन तुम्हारे अनुसार चलेगा. पहले बिना यह सोचे कि मेरा क्या होगा, चुपचाप विवाह कर लिया और आज जब मुझे भूल नहीं पाई तो मेरे जीवन में वापस आना चाहती हो. तुम्हारे लिए दूसरों की इच्छाएं, भावनाएं, मेरा स्वाभिमान, सम्मान सब महत्त्वहीन है. नहीं नंदिता, मैं और नीता अपने जीवन से बेहद खुश हैं, तुम अपने परिवार में खुश रहो.’’

‘‘विशाल, क्या हम कहीं बैठ कर बात कर सकते हैं?’’

‘‘मुझे नीता के साथ कहीं जाना है, वह आती ही होगी.’’

‘‘उस के साथ फिर कभी चले जाना, मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही थी, प्लीज…’’

नंदिता की बात खत्म होने से पहले ही पीछे से एक नारी स्वर उभरा, ‘‘फिर कभी क्यों, आज क्यों नहीं, मैं अपना परिचय खुद देती हूं, मैं हूं नीता, विशाल की पत्नी.’’

नंदिता हड़बड़ा गई. एक सुंदर, आकर्षक युवती सामने मुसकराती हुई खड़ी थी. नंदिता के मुंह से निकला, ‘‘मैं नंदिता, मैं…’’

नीता ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘जानती हूं, विशाल ने मुझे आप के बारे में सब बता रखा है.’’

नंदिता पहले चौंकी, फिर सहज होने का प्रयत्न करती हुई बोली, ‘‘ठीक है, आप लोग अभी कहीं जा रहे हैं, फिर मिलते हैं.’’

नीता ने गंभीरतापूर्वक कहा, ‘‘नहीं नंदिता, हम फिर मिलना नहीं चाहेंगे और अच्छा होगा कि आप भी एक औरत का, एक पत्नी का, एक मां का स्वाभिमान, संस्कारों और कर्तव्यों का मान रखो. जो कुछ भी था उसे अब भूल जाओ. जो बीत गया, वह कभी वापस नहीं आ सकता, गुडबाय,’’ कहते हुए नीता आगे बढ़ी तो अब तक चुपचाप खड़े विशाल ने भी उस के पीछे कदम बढ़ा दिए.

नंदिता वहीं खड़ी की खड़ी रह गई. फिर थके कदमों से गाड़ी में बैठी तो ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी.

वह अपने विचारों के आरोहअवरोह में चढ़तीउतरती रही. सोच रही थी जिस की छवि उस ने कभी अपने मन से धूमिल नहीं होने दी, उसी ने अपने जीवनप्रवाह में समयानुकूल संतुलन बनाते हुए अपने व्यस्त जीवन से उसे पूर्णतया निकाल फेंका था.

जिस रिश्ते को कभी जीवन में कोई नाम न मिल सका, उस से चिपके रहने के बदले विशाल को जीवन की सार्थकता आगे बढ़ने में ही लगी, जो उचित भी था जबकि वह आज तक उसी टूटे बिखरे रिश्ते से चिपकी थी जहां से वह विशाल से 5 साल पहले अलग हुई थी.

नंदिता अपना विश्लेषण कर रही थी, आखिरकार वह क्यों भटक रही है, उसे किस चीज की कमी है? एक सुसंस्कृत, शिक्षित और योग्य पति है जो अच्छा पिता भी है और अच्छा इंसान भी. प्यारी बेटी है, घर है, समाज में इज्जत है. सब कुछ तो है उस के पास फिर वह खुश क्यों नहीं रह सकती?

घर पहुंचतेपहुंचते नंदिता समझ चुकी थी कि वह एक मृग की भांति कस्तूरी की खुशबू बाहर तलाश रही थी, लेकिन वह तो सदा से उस के ही पास थी.

घर आने तक वह असीम शांति का अनुभव कर रही थी. अब उस के मन और मस्तिष्क में कोई दुविधा नहीं थी. उसे लगा जीवन का सफर भी कितना अजीब है, कितना कुछ घटित हो जाता है अचानक.

कभी खुशी गम में बदल जाती है तो कभी गम के बीच से खुशियों का सोता फूट पड़ता है. गाड़ी से उतरने तक उस के मन की सारी गांठें खुल गई थीं. उसे बच्चन की लिखी ‘जो बीत गई सो बात गई…’ पंक्ति अचानक याद हो आई.

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