जब खरीदें किचन चिमनी

भारतीय व्यंजनों में तड़के का ज्यादा इस्तेमाल होता है. इस के अलावा फ्राई करना, ग्रिल करना, खाने में मसालों का प्रयोग भी होता रहता है. ऐसी स्थिति में एक सही चिमनी ही रसोई से धुआं और गंध आसानी से निकाल सकती है.

आजकल बाजार में कई तरह की चिमनियां बिकती हैं, जिन में से सही चिमनी का चयन करना मुश्किल होता है. इस बारे में मुंबई की ‘मेग्लियो’ शॉप के चिमनी डीलर लक्ष्मण पुरोहित, जो एक दशक से भी अधिक समय से चिमनी बेच रहे हैं, उनका कहना है कि चिमनी की बनावट में पहले से काफी सुधार आया है. इस के 2 विकल्प ग्राहकों को ज्यादा आकर्षित करते हैं. इन विकल्पों की खूबियां इस प्रकार हैं.

– पहले विकल्प में धुआं बाहर फेंकने के लिए पाइप का प्रयोग किया जाता है.

– दूसरे में चिमनी को डक्ट से जोड़ने की जरूरत नहीं होती. इस के अंदर लगा कार्बन फिल्टर धुआं, तेल और गंध सोख लेता है और शुद्ध हवा को वापस रसोईघर में छोड़ता है. इस में समस्या यह आती है कि कार्बन में तेल जल्दी चिपक जाता है और इसे जल्दी-जल्दी साफ करना पड़ता है.

दोनों तरह की चिमनियां प्रयोग में लाई जा सकती हैं, लेकिन डक्ट वाली चिमनी ज्यादा अच्छी होती है. इस में भी अगर डक्ट की पाइप ज्यादा मुड़ी या काफी लंबी हो, तो चिमनी से हवा बाहर निकलने में समय लगता है. डक्ट के लिए जगह की जरूरत होती है, इसलिए अगर आप के किचन में जगह है, तो डक्ट वाली चिमनी लगाएं. जगह की कमी हो, तो कार्बन फिल्टर वाली चिमनी सही रहेगी.

आधुनिक चिमनी

पहले चिमनी का आकार अलग होता था. ज्यादातर चिमनियां पुश बटन और डायरेक्ट बटन द्वारा चलती थीं. आजकल बाजार में डिजिटल गैस सैंसर वाली चिमनी भी आने लगी है, जिस में यदि गैस किसी कारणवश लीक करती है, तो चिमनी ऑटोमैटिक चालू हो जाती है और गैस के निकल जाने के बाद बंद भी हो जाती है. यह चिमनी आजकल ज्यादा प्रयोग में लाई जा रही है.

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चिमनी की सक्शन पावर का ध्यान

इस के अलावा चिमनी की सक्शन पावर का भी ध्यान रखें, क्योंकि यह जितना ज्यादा होती है, रसोई उतनी ही गंध और धुएं रहित होती है. यह क्षमता चिमनी में 500 मीटर क्यूबिक प्रति घंटा से 1,200 मीटर क्यूबिक प्रति घंटा होती है. इस में 900 मीटर क्यूबिक प्रति घंटा से 1,000 मीटर प्रति घंटा सक्शन पावर वाली चिमनी है.

किचन का आकार

चिमनी लगाने की प्रक्रिया में किचन के आकार की बड़ी भूमिका है. यदि किचन बड़ा है, तो ज्यादा सक्शन पावर वाली चिमनी लगाना ठीक रहता है. एक अनुमान के अनुसार किचन की चिमनी को 1 घंटे में 10 गुना शुद्ध हवा से भरने की जरूरत होती है. इसलिए चिमनी चुनने से पहले किचन की वॉल्यूम को 10 से गुणा करने के बाद जो क्षेत्रफल आए, उतनी ही सक्शन पावर वाली चिमनी किचन में लगाना सही होता है. इसे गैस चूल्हे से ढाई फीट की ऊंचाई पर लगाना ठीक रहता है.

यह भी ध्यान रखें

1 साल से 5 साल के अलावा लाइफटाइम गारंटी वाली चिमनी भी मिलती है. चिमनी की कीमत भी उस की वारंटी पर निर्भर होती है. चिमनी की कीमत कुछ हजार से ले कर लाखों तक होती है, जिसे ग्राहक अपने बजट के हिसाब से खरीदता है. एक अच्छी चिमनी 10 से 15 साल आसानी से काम कर सकती है.

चिमनी की देखभाल

– वैसे तो चिमनी की सफाई उस की उपयोगिता के आधार पर की जाती है, लेकिन यदि आप साधारण खाना बनाती हैं, तो 15 दिन बाद उस के फिल्टर को डिटर्जैंट मिले गरम पानी से अच्छी तरह धो कर, सुखा कर लगा दें. इस से फिल्टर की जाली साफ हो जाती है.

– चिमनी अगर अधिक चिपचिपी हो गई है और डिटर्जेंट पानी से साफ नहीं हो रही है, तो सोडियम हाइड्रो ऑक्साइड या कास्टिक सोडे से धोएं.

– कुछ फिल्टर ऐसे भी होते है जिन्हें धोया नहीं जा सकता. ऐसे में 4 से 5 महीने बाद उसे बदलना पड़ता है.

– कभी भी हार्श डिटर्जेंट से फिल्टर को न धोएं.

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जरूरी है मैंस्ट्रुअल हाइजीन

पीरियड्स यानी माहवारी महिला के शरीर में होने वाली एक सामान्य प्रक्रिया होती है. फिर भी इस बारे में अधिकांश महिलाओं को सही जानकारी नहीं होती है और कुछ महिलाएं इस बारे में बात करने में भी संकोच महसूस करती हैं. इस कारण वे पीरियड्स में हाइजीन से सम झौता कर के खुद की हैल्थ के साथ खिलवाड़ करती हैं, जो सही नहीं है.

‘ससटैनेबल सैनिटेशन ऐंड वाटर मैनेजमैंट नामक संस्था के अनुसार, दुनियाभर में 52% महिलाएं रिप्रोडक्टिव ऐज में हैं, लेकिन बहुत कम महिलाएं ही पीरियड्स के दौरान हाइजीन का ध्यान रखती हैं, जो काफी चौंकाने वाली बात है.

आज मैंस्ट्रुअल हाइजीन को बनाए रखने के लिए मार्केट में सैनिटरी पैड, टैंपोंस, मैंस्ट्रुअल कप आदि सबकुछ उपलब्ध है, फिर भी भारत में आज भी 80% महिलाएं इन का उपयोग नहीं करती हैं, बल्कि इन की जगह पुराने तरीके जैसे पुराने कपड़े, पत्तियां आदि का इस्तेमाल करती हैं, जो उन के लिए जानलेवा भी साबित हो सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में सालों से चली आ रही दकियानूसी प्रथाऐ मैंस्ट्रुअल हाइजीन के सामने सब से बड़ा रोड़ा हैं.

क्यों जरूरी है मैंस्ट्रुअल हाइजीन

यूटीआई के खतरे को करे कम

अकसर जब भी महिलाएं लंबे समय तक गंदे, गीले कपड़े या फिर गंदे सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं, तो वहां पैदा हुई नमी के कारण बैक्टीरिया को पनपने के लिए अनुकूल वातावरण मिल जाता है, जो यूरिनरी ट्रैक्ट इंफैक्शन का कारण बनता है. पैड या कपड़े में नमी के कारण उस में माइक्रोब्स जैसे इ कोली, कैंडिडा ऐल्बीकंस पैदा हो जाते हैं, जिन के परिणामस्वरूप पेशाब करने में जलन, पेट के निचले हिस्से में दर्द, बुखार, यहां तक कि बौडी में दर्द की समस्या भी हो सकती है. इन से बचने के लिए हर 4 घंटे में पैड को बदलना चाहिए. साथ ही जब भी पैड को बदलें तब साफ पानी से उस जगह को जरूर साफ करें. ऐसा करने से महिला खुद को इंफैक्शन से बचा पाएगी.

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स्किन रैशेज से बचाव

स्किन पर रैशेज होने का मुख्य कारण स्किन हाइजीन का ध्यान नहीं रखना होता है. ऐसा अकसर तब होता हैजब पैड या कपड़ा गीला हो जाता है और आप उसे नहीं बदलतीं, जिस के कारण वैजाइना में इन्फैक्शन होने से स्किन इरिटेशन के कारण जांघों पर रैशेज पड़ जाते हैं. जिन में जलन, खुजली होने लगती है.

इन से आप हाइजीन का ध्यान रख कर बच सकती हैं.

एक रिसर्च के अनुसार, पैड में इस्तेमाल की गई ऐडहैसिव के कारण भी रैशेज की समस्या होती है. यह एक तरह की ग्लू होती है, जो पैड की बैक साइड पर लगाई जाती है, ताकि पैड अंडरवियर के साथ चिपक जाए, साथ ही कुछ पैड में खुशबू का भी इस्तेमाल किया जाता है.

मगर जिन महिलाओं की स्किन बहुत सैंसिटिव होती है, उन्हें इस के कारण भी रैशेज की समस्या हो जाती है. इसलिए जल्दीजल्दी सैनिटरी पैड चेंज करने के साथसाथ बायोडिग्रेडेबल पैड का ही इस्तेमाल करें. क्योंकि यह फाइबर से बना होने के कारण स्किन को किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है. जबकि अन्य 90% पैड्स प्लास्टिक और क्लोरीन ग्लीच वुड पल्प से बने होने के साथ उन में कैमिकल्स का बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है, जो स्किन को नुकसान पहुंचाने का ही काम करते हैं. इसलिए हाइजीन के लिए बायोडिग्रेडेबल पैड्स बैस्ट हैं.

रिप्रोडक्टिव हैल्थ को रखें मैंटेन

हर महिला के जीवन में मां बनने का अनुभव सब से बेहतरीन अनुभव होता है और इस सुख से कोई भी महिला वंचित नहीं रहना चाहती है. ऐसे में अगर पीरियड्स के दौरान साफसफाई का ध्यान नहीं रखा जाता तो यह सीधेसीधे उन की रिप्रोडक्टिव हैल्थ को नुकसान पहुंचाने का ही काम करता है, क्योंकि अगर इस दौरान गंदे पैड, कपड़े का इस्तेमाल किया या समय पर नहीं बदला जाता तो इन्फैक्शन होने से यह हमारे गुप्तांग तक पहुंच कर इनर लेयर को प्रभावित कर देता है, जिस से यूटरस की दीवार, ओवरीज चाहिए, यहां तक कि ट्यूब भी खराब हो सकती है. इसलिए हमेशा साफसफाई का खास ध्यान रखें.

सर्वाइकल कैंसर से बचाव

यह सर्विक्स का यानी गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर होता है. यह कैंसर ह्यूमन पैपीलोमा वायरस की वजह से होता है. यह वायरस सैक्स के दौरान या फिर पीरियड्स के दौरान हाइजीन का ध्यान नहीं रखने की वजह से भी होता है. इसलिए पीरियड्स के दौरान स्वच्छताका खास ध्यान रखें. पैड को जल्दीजल्दी बदलें, पैड चेंज करने के बाद हाथों को जरूर साफ करें. इस से काफी हद तक आप सर्वाइकल कैंसर से बच पाएंगी.

स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि भारत में हर साल सर्वाइकल कैंसर से होने वाली मौतों के लगभग 60 हजार मामले सामने आते हैं, जिन में से दोतिहाई मामले पीरियड्स में स्वच्छता न रखने की वजह से होते हैं. इसलिए मैंस्ट्रुअल हाइजीन का खास ध्यान रखना चाहिए और इस दौरान कपड़े आदि के प्रयोग से बचना चाहिए.

आप को रखे कौन्फिडैंट भी

जब भी हम पीरियड्स के दौरान कपड़े बगैरा का इस्तेमाल करती हैं तो हर समय यही डर सताता रहता है कि कहीं कपड़ा खराब न हो जाए. उठनेबैठने में भी दिक्कत होती है. लेकिन जब पैड, टैंपोन का इस्तेमाल करते हैं और उन्हें समयसमय पर बदलती रहती हैं तो उस से न सिर्फ खुद की हाइजीन का ध्यान रखती हैं, बल्कि इस से कौन्फिडैंस भी बढ़ता है, क्योंकि कपड़े खराब होने की टैंशन जो नहीं होती.

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पैड और टैंपोन के इस्तेमाल का समय

पी सेफ की सहसंस्थापक श्रीजना बगारिया बताती हैं कि लाइट और हैवी फ्लो के लिए पैड्स भी विभिन्न आकारों में आते हैं. ऐसे में पैड या टैंपोन कितनी देर में बदलना चाहिए यह इस पर निर्भर करता है कि आप के पीरियड्स में निकलने वाले ब्लड का फ्लो कितना हलका या कितना तेज है. बात करें इसे बदलने के समय की तो कम से कम 3-4 घंटे बाद पैड को बदलना चाहिए. वहीं टैंपोन को बदलने का वक्त 4-6 घंटे होता है.

इस बात को ले कर चिंतित न रहें कि टैंपोन वैजाइना के अंदर ही न फंस जाए, क्योंकि ऐसा नहीं होता. टैंपोन में एक छोर से जुड़ा स्ट्रिंग होता है, जो शरीर के बाहर ही रहता है और किसी भी टैंपून को हटाने के लिए उस का इस्तेमाल होता है. इसलिए ये काफी सेफ है. बस खुद की हाइजीन के साथ कोई सम झौता न करें.

बच्चों के लिए बनाएं टेस्टी और हेल्दी व्हीट पास्ता

पास्‍ता एक ऐसी डिश है जिसे हर कोई खाना पसंद करता है. बच्‍चे ही नहीं बड़े भी इसे बहुत शौक से खाना पसंद करते हैं. लेकिन क्‍या हो जब टेस्‍ट के साथ पौष्टिकता भी मिल जाएं. जी हां आज हम आपको हेल्‍दी गेंहू पास्‍ता की रेसिपी बनाना सीखाएंगे.

आइये जानते हैं इसे बनाने की रेसिपी.

सामग्री

दो कप होल व्हीट पास्ता

5 लहसुन की कली

3 सूखी लाल मिर्च

2 कप टोमेटो पल्प

1 टमाटर बारीक कटा हुआ

2 चुटकी इटालियन सीजनिंग

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तुलसी की पत्तियां

1 चम्मच कुकिंग ऑयल

नमक स्वादानुसार

काली मिर्च पाउडर

विधि

एक पैन में तेल गर्म करें और इसमें कूटी हुई लहसुन, लाल मिर्च और इटैलियन सीजनिंग डालें. जब लहसुन सुनहरे रंग की हो जाए तो इसमें कटे हुए टमाटर डालें और पकाएं.

थोड़ी देर पकाने के बाद इसमें टोमेटो पल्प डालें और फिर इसमें पास्ता मिलाकर इसे चलायें. पैन में पूरा पानी भर दें जिसमें पास्ता पूरी तरह समां जाए.

अब इसमें नमक डाल दें और फिर तेज आंच पर कुछ देर पकने दें. जब पानी उबलने लगे तो थोड़ी थोड़ी देर पर चमचे की मदद से इसे चलाते रहें जिससे पास्ता चिपके नहीं.

इस बात का ध्यान रखें कि पास्ता का पानी पैन में ही रहना चाहिए क्योंकि ये पास्ता बेस की तरह काम करेगा. अब आंच बंद कर दें और ऊपर से तुलसी की कुछ पत्तियां डालकर सजाएं.

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आप चाहें तो काली मिर्च पाउडर भी छिड़क सकते हैं. जिन्हें चीज पसंद है वो अब इसमें ऊपर से चीज डाल सकते हैं. बस आपका लजीज पास्ता पूरी तरह तैयार है.

दिमाग को कुंद करने की मंशा

इंगलिश की एक सलाह है, ‘कैच देम यंग’ यानी उन्हें तभी अपना बना लो जब वे छोटे हों. बुनियाद में सारे धर्म यही करते हैं और बच्चे के जन्म के कुछ दिनों बाद ही उसे धर्म का अनुयायी बिना उस की इजाजत के बना लिया जाता है. अब चूंकि मातापिता भी इसी प्रक्रिया से गुजरे होते हैं, उन्हें इस में कोई आपत्ति नजर नहीं आती और वे खुशीखुशी अपने छोटे से बच्चे के भविष्य की सारी स्वतंत्रताएं धर्म को दान कर देते हैं.

यही शिक्षा के साथ किया जाता है. जैसेजैसे बच्चा बड़ा होता है उस में उस का अपना विवेक जागता है. अपने स्वतंत्र निर्णय लेने की इच्छा होती है, हर  झूठसच को परखने की कोशिश करता है, धर्म के पांव लड़खड़ाने लगते हैं और तरहतरह के प्रपंच रचे जाते हैं कि बढ़ते बच्चे को काबू में रखा जाए और हर समाज की 95% जनता इस फंदे में कैद हो जाती है.

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तानाशाह भी इसी का इस्तेमाल करते हैं और शिक्षा ऐसी देने की कोशिश करते हैं कि तानाशाह के विरुद्ध कोई कुछ सोच न सके. पहले तो सदियों तक  कुछ पढ़ने को नहीं था, केवल बोले गए शब्दों का बोलबाला था. पर 500 सालों से मुद्रित शब्दों के कारण सोचविचार में क्रांति आई है क्योंकि धर्म या तानाशाह के शब्द ही अंतिम सत्य नहीं हैं. यह परखने के विचार कागज पर साकार हो कर घूमने लगे और जो भी इन छपे शब्दों को पढ़ सकता था वह अपने विचारों को नए तरीके से ढाल सकता था. पिछले 500 सालों में जो प्रगति दुनिया ने की है वह इन कागजी घोड़ों के कारण की है, जिन्होंने धर्म की सत्ता को हिलाया, तानाशाहों को समाप्त किया. इस से लोकतंत्र तो साकार हो गया, साथ में नई तकनीक, नए विज्ञान, नए तथ्यों और सब से बड़ी बात नई स्वतंत्रताओं को भी जन्म मिला.

धर्म को यह खला है, बहुत खला है, पर धर्म की सत्ता बहुत मजबूत है और उस ने फिर कागजों पर छपे शब्दों पर फिल्टर लगाए हैं और उसे ही प्रचारकों के हाथों परोसा है. ये प्रचारक ही धर्म के मुख्य सैनिक हैं और यही लूट में हिस्सा भी बांटते हैं.

भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी प्रयास का एक कदम है, जिस में उद्देश्य तर्क और परीक्षण को हटा कर बच्चों को पहली कक्षा से संस्कृति व धरोहर के नाम पर समाज को 2000 साल पहले ले जाने की साजिश रची गई है.

इस नीति के हर पृष्ठ पर कहीं न कहीं यही छिपा है कि हर छात्र एकलव्य की तरह है जिसे गुरु द्रोणाचार्य की तरह के मौडर्न गुरुओं को अपना दिमाग अर्पित कर देना चाहिए.

बच्चे कहां, कितने साल तक, कितनी फीस दे कर पढ़ें, यह बात बहुत छोटी है. मुख्य बात यह है कि पढ़ाने वाले कौन हैं और वे क्या पढ़ाएंगे. इस शिक्षा नीति में कम से कम यह तो स्पष्ट है कि शब्दजाल ऐसा बुना गया है कि इस में अकेला रास्ता पुरातनकाल के गहरे अंधकार की ओर ले जाता है. जहां बारबार यह कहा जाए कि ज्ञान तो था हमारे पास, हमारे वेदों में है, शास्त्रों में है, परंपराओं में, रीतिरिवाजों में है, वहां जेनेटिक्स, अंतरिक्ष की खोज, फिजिक्स के पार्टिकल विश्लेषण, बायोटैक को कौन पूछेगा.

हमारे देश के प्रतिद्वंद्वी देशों के लिए यह नई शिक्षा नीति एक सोने की खान साबित होगी. पुराने जाले लगी, पौराणिक, पाखंडभरी शिक्षा के छिपे उद्देश्य, धर्मप्रचारकों की बातों को अंतिम सत्य मानना जिसे नहीं आएगा वह विदेशों की ओर भागेगा. देश का टैलेंट वैसे भी लगातार बाहर जा रहा था, अब और बड़ी संख्या में जाएगा.

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दूसरी ओर देश में पुरातनपंथी कूढ़मगज, अतार्किक पाखंड समर्थकों की बड़ी जमात पैदा होगी. हमारा शत्रु बना चीन इस नीति से खुश होगा क्योंकि वहां तानाशाही और कम्युनिज्म के बावजूद महान चीनी सभ्यता का ढोल नहीं पीटा जाता है.

अफ्रीका, दक्षिणपूर्व एशिया, यूरोप, अमेरिका को तो लाभ होगा ही, इसलामी कट्टर कहे जाने वाले देश भी राहत की सांस लेंगे कि भारत अब 150 से 170 करोड़ लोगों का एक मुरदा देश बनने वाला है जहां ऊंचे मंदिर बनेंगे, नदियों के किनारों पर तीर्थ विकसित होंगे. आयुर्वेद, वैदिक विज्ञान, वैदिक वास्तुकला के नाम पर कंगूरों और शिखरों वाले भवन बनेंगे और उन में पूजापाठी ठस दिमाग वाले गुलाम होंगे जो विश्वामित्र के कहने पर मारीच पर तीर चलाना शुरू कर देंगे, बिना जांचेपरखे कि दुश्मन कौन है, कैसा है और उसे क्यों मारा जा रहा है. गुरु का आदेश अंतिम होगा. यह नीति को पढ़ने पर साफ चाहे न दिखे पर नई शिक्षा नीति का सार यही है कि एक पूरे जीवंत समाज को गंगा में डुबो दो.

मैट्रो मेरी जान: रफ्तार से चलती जिंदगी की कहानी

मैट्रो का दरवाजा खुला. भीड़ के साथ बासू भी अंदर हो गया. वह सवा 9 बजे से मैट्रो स्टेशन पर खड़ा था. स्टेशन पर आने के बाद बासू ने 4 टे्रनें इसलिए निकाल दीं क्योंकि उन में भीड़ अधिक थी. उस ने इस ट्रेन में हर हालत में घुसने का इरादा कर लिया. इतने बड़े रेले के एकसाथ घुसने से लोगों को परेशानी हुई. एक यात्री ने आने वाली भीड़ से परेशान होते हुए कहा, ‘‘अरे, कहां आ रहे हो भाईसाहब? यहां जगह नहीं है.’’

दरअसल दरवाजे से दूर खड़े लोगों को धक्का लग रहा था. ‘‘भाईसाहब, थोड़ाथोड़ा अंदर हो जाइए. अंदर काफी जगह है,’’ कोच में सब से बाद में चढ़ने वाले एक व्यक्ति ने कहा. वह दरवाजे पर लटका हुआ था.

‘‘हां हां, यहां तो प्लाट कट रहे हैं. तू भी ले ले भाई,’’ अंदर से कोई बोल पड़ा. यह व्यंग्य उस व्यक्ति की समझ में नहीं आया. उस ने कहने वाले का चेहरा देखने का प्रयास किया पर भीड़ में पता न चला.

‘‘क्या मतलब है आप का? मैं समझा नहीं,’’ उस ने भी हवा में मतलब समझने का प्रयास किया.

‘‘जब समझ में नहीं आता तो समझने की तकलीफ क्यों करता है?’’ फिर कहीं से आवाज आई.

पहले वाले ने फिर सिर उठा कर जवाब देने वाले को देखने का प्रयास किया पर मैट्रो की भीड़ ने उस का दूसरा प्रयास भी विफल कर दिया. उसे थोड़ा गुस्सा आ गया.

‘‘कौन हैं आप? कैसे बोल रहे हैं?’’ उस ने गुस्से से कहा.

‘‘क्यों भाई, आई कार्ड दिखाऊं के?’’ जवाब भी उतने ही जोश में दिया गया.

‘‘ला दिखा,’’ उस ने भी कह दिया.

‘‘तू कोई लाट साहब है जो मेरा आई कार्ड देखेगा?’’ वह भी बड़ा ढीठ था.

इस के साथ ही वाक्युद्ध शुरू हो गया. कोई किसी को देख नहीं पा रहा था. गालीगलौज का दौर पूरे शबाब पर आ कर मारपीट में तब्दील होने वाला था कि लोगों ने दोनों अदृश्य लड़कों के बीच में पड़ कर युद्ध विराम करवा दिया. इतने में पहले वाले का स्टेशन आ गया. वह बड़बड़ाता हुआ स्टेशन पर उतर गया. इस के साथ ही सारा मामला खत्म हो गया. अभी टे्रन थोड़ी दूर ही चली होगी कि एकाएक धीमी हुई और रुक गई. इस के साथ ही घोषणा होने लगी :

‘इस यात्रा में थोड़ा विलंब होगा. आप को हुई असुविधा के लिए खेद है.’ इस पर यात्रियों के चेहरे बिगड़ने लगे.

‘‘ओ…फ्…फो….या…र…व्हाट नानसेंस.’’

‘‘यार…यह तो रोजरोज की बात हो गई.’’

‘‘हर स्टेशन पर खड़ी हो जाती है.’’

‘‘आजकल रोज औफिस देर से पहुंचता हूं. बौस बहुत नाराज रहता है. उस को क्या पता कि मैट्रो की हालत क्या हो रही है,’’ एक ने अपनी परेशानी बताई.

‘‘एक दिन बौस को मैट्रो में ले आओ. उस को भी पता चल जाएगा,’’ इस मुफ्त की सलाह के साथ ही एक जोर का ठहाका लगा. किसी ने हंसतेहंसते कहा, ‘‘श्रीधरन को भी ले आओ. उसे भी इस रूट की हालत पता चल जाएगी.’’ और इसी के साथ सुझावों की झड़ी लग गई.

‘‘भाई साहब, जब तक कोच नहीं बढ़ेंगे तब तक समस्या नहीं सुलझेगी,’’ एक ने कहा.

‘‘मेरे खयाल में फ्रीक्वेंसी बढ़ानी चाहिए,’’ एक महिला ने बहुमूल्य सुझाव दिया.

‘‘फ्रीक्वेंसी बढ़ाने से कुछ नहीं होगा. कोच ही बढ़ाने चाहिए.’’

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इस के साथ ही मैट्रो चल पड़ी. लोग चुप हो गए. थोड़ी देर में ही मैट्रो ने सीटी बजाते हुए स्टेशन मेें प्रवेश किया. चढ़ने वाले कतारबद्ध खड़े थे. दरवाजा खुलते ही लोग बाड़े में बंद भेड़बकरियों की तरह अपनेअपने गंतव्य की ओर भागे. इस तेजी से कुछ लोगों का मन  खिन्न हो उठा. ‘‘एक जमाना हुआ करता था. लोग फुरसत के क्षणों को बेहतरीन ढंग से बिताने के लिए कनाट प्लेस आया करते थे. गेलार्ड रेस्टोरैंट और शिवाजी स्टेडियम के पास बना कौफी हाउस तो कनाट प्लेस की जान और शान हुआ करते थे. कौफी हाउस में बुद्धजीवियों का जमघट रहता था. लंबेलंबे बहस मुबाहिसे चलते रहते थे. किसी को जल्दी नहीं,’’ एक व्यक्ति ने कनाट प्लेस के इतिहास की झलक दिखाई.

‘‘अरे, अपनीअपनी विचारधारा और मान्यताओं के हिसाब से जीनेमरने वाले लोग तर्कवितर्क की रणभूमि में जब अपनेअपने अस्त्रशस्त्र के साथ उतरते थे तो बेचारी निरीह जनता कौतूहल से मूकदर्शक बनी देखती, सुनती रहती थी. इस बौद्धिक युद्ध में आराम तो कतई हराम था. युद्धविराम तभी होता था जब मुद्दे का कोई हल निकल आता था. वक्त की कोई बाधा न थी.’’ दूसरे ने कनाट प्लेस का बौद्धिक पक्ष उजागर किया.

दूर खड़े एक सज्जन बड़ी देर से सबकुछ सुन रहे थे. वह भी बहती गंगा में हाथ धोने का लोभ संवरण नहीं कर पाए. उन के अंदर का कलाकार बाहर आ कर कहने लगा, ‘‘कई कलाकार, साहित्यकार और रचनाशील प्रकृति के हुनरमंद लोग हाथ में कौफी ले कर अधखुली पुतलियों को घुमाते हुए शरीर की बाधा को लांघ जाते थे. किसी और दुनिया में विचरण करतेकरते कालजयी कृतियों को जन्म दे डालते थे.’’

बासू के पास इस से ज्यादा सुनने का वक्त न था. वह तेजी से उतरा. भीड़ के रेले के साथ लगभग भागते हुए नीचे केंद्रीय सचिवालय-जहांगीरपुरी मैट्रो रेल लाइन पर पहुंच गया. गनीमत थी कि यहां की लाइन छोटी थी. 2 मिनट में ट्रेन आ गई. दरवाजा खुला. एक रेला तेजी से निकला. ज्यादातर लोग एस्केलेटर की ओर भागे. दरवाजे से भीड़ छटते ही वह तेजी से ट्रेन में घुस गया. अगला स्टेशन पटेल चौक था. स्टेशन आते ही वह उतरा और तेजी से सीढि़यों की ओर भागा. यहां पर ‘इफ यू वांट टू स्टे फिट, यूज स्टेअर्स’ लिखा हुआ था. परंतु लोग उन का उपयोग स्वेच्छा से नहीं, अपितु मजबूरी में कर रहे थे क्योंकि एस्केलेटर पर भारी भीड़ थी. उस ने जल्दीजल्दी कदम बढ़ाने शुरू किए. यातायात की चिल्लपों के साथसाथ चलते हुए वह अपने दफ्तर के सामने आ गया. यहां पर हड़बड़ी में असावधानी से सड़क पार करना अपनी मौत को दावत देने जैसा ही था. पता नहीं कब कौन सा वाहन आप की मौत का सामान बन जाए. उस ने सड़क पर दोनों ओर देखा और तेजी से सड़क पार करने लगा.

शाम को औफिस से निकलने के बाद जब वह राजीव चौक पहुंचा तो वहां का नजारा देख कर दंग रह गया. पूरा स्टेशन कुंभ मेले में तब्दील हो चुका था. जिधर देखो सिर ही सिर. यों तो लाइनें लगी हुई थीं. लाइनों में लगे पढ़ेलिखे, नौकरीपेशा और जागरूक नागरिक थे. पर जैसे ही ट्रेन आती, सारी तमीजतहजीब गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाती.

लाइन मेें खड़े कुछ लोग बेचारे शराफत के पुतले बन कर चींटी की गति से आगे बढ़ रहे थे. उधर ‘बी प्रैक्टीकल, टैंशन लेने का नहीं, देने का है’ टाइप के लोग इस लोचेलफड़े में पड़ने को तैयार नहीं थे. वे लाइन की परवा किए बगैर सीधे ट्रेन में चढ़ रहे थे. इस पुनीत कार्य में महिला सशक्तीकरण से सशक्त हुई महिलाएं भी कतई पीछे न थीं. तमीज, तहजीब और कायदेकानून से चलने वाले लोग यों भी आज के जमाने में निरीह और बेचारे ही सिद्ध हो रहे हैं. अपने देश में विदेशों की कानून व्यवस्था की तारीफ के पुल बांधने वालों की कमी नहीं है. देश में इस के पालनहार गिनती के हैं. तुर्रा यह कि इस देश में वे लोग भी नियमकानून का पालन नहीं करते जो कई वर्ष विदेशों में रह कर आते हैं. जो वहां मौजूद सुविधाओं के बारे में बिना रुके बोलते रहते हैं.

एक दिन उसे मैट्रो कोच में कहीं से एक महिला की तेज आवाज सुनाई दी. वह किसी आदमी से मुखातिब थी, ‘‘आप जरा ठीक से खड़े होइए,’’ उस ने गर्जना की. ‘‘भीड़ इतनी है. क्या करें?’’ उस आदमी ने सच में दूर होने की कोशिश करते हुए कहा. पर कुछ अधिक नहीं कर पाया तो बोला, ‘‘अगर इतनी समस्या है तो आप टैक्सी क्यों नहीं कर लेतीं? यहां तो ऐसा ही होता है,’’ उस ने सचाई बताने की कोशिश की.

‘‘शटअप, इडियट.’’

पुरुष के कुछ कहने से पहले ही स्टेशन आ गया. महिला को वहीं उतरना था, सो वह उतर गई. पुरुष कसमसा कर रह गया. किसी महिला पीडि़त व्यक्ति ने उस की पीड़ा बांटते हुए कहा, ‘छोड़ो भाईसाहब, जमाना इन्हीं का है. बड़ी बदतमीज हो गई हैं ये,’’ उस के इस वाक्य से उस के जख्मों पर मरहम लग गया. वह ‘और नहीं तो क्या?’ कह कर शांत हो गया.

तभी सीट पर बैठी एक महिला ने अपने आसपास नजर दौड़ाई. वह उतरना चाह रही थी. सो उस ने रास्ते में खड़े लगभग 65 साल के आदमी से पूछा, ‘‘आप कहां उतरेंगे?’’ इस प्रश्न के लिए वह सज्जन तैयार नहीं थे. सो वह अचकचा गए. उन्हें अपनी निजता पर किया गया यह हमला कतई पसंद नहीं आया. सो उन्होंने प्रश्न के मंतव्य पर गौर न करते हुए जवाबी मिसाइल दाग दी.

‘‘व्हाई शुड आई टैल यू?’’

यह सुन कर महिला स्तब्ध रह गई और वह चुपचाप अपने स्टेशन पर उतर गई. वह सज्जन भी शांत हो अपने स्टेशन पर उतर गए. तभी किसी ने बताया, ‘‘दरअसल मैट्रो के लगातार विस्तार ने जहां एक ओर सुविधाएं दी हैं वहीं दूसरी ओर कुछ समस्याएं भी उत्पन्न कर दी हैं.’’ एक दिन बासू सुबह कुछ जल्दी निकला. उस ने देखा कि डब्बे के बीच में कालेज के कुछ विद्यार्थियों का झुंड खड़ा है. उन के युवा होने की खुशबू पूरे कोच में फैल रही थी. लड़कियां तितलियों की मानिंद और लड़के उन्मुक्त पंछियों की तरह मानो खुले आकाश में विचरण कर रहे हों. हंसी के ठहाके गूंज रहे थे. तभी एक लड़की ने लड़के से पूछा, ‘‘ओए प्रिंस, तेरी प्रैक्टीकल की फाइल कंपलीट हो गई?’’

‘‘तू अब पूछ रही है. वह तो मैं ने कब की कंपलीट कर के सबमिट भी करा दी.’’

‘‘चल, झूठा कहीं का,’’ यह कहने के साथ ही उस लड़की ने उस के गाल पर एक प्यार भरी चपत भी जड़ दी. मानो यह प्यारे से झूठ की प्यारी सी सजा हो.

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‘‘मैं झूठ नहीं बोल रहा. तू रवि से पूछ ले,’’ लड़के ने फिर झूठ बोला.

‘‘ओए, उस से क्या पूछूं. वह तो है ही एक नंबर का झूठा,’’ यह कहने के साथ ही उस ने रवि की पीठ पर भी एक हलकी सी चपत रख दी.

‘‘ओए, नैंसी…क्या कर रही है. मुझे क्यों मार रही है? मैं ने क्या किया है?’’ रवि ने प्यार भरी झिड़की दी.

‘‘ओए, तू ही सब का गुरु है,’’ अब स्वीटी ने उस के गाल पर हलकी चपत मारते हुए कहा.

‘‘यार, तू भी शुरू हो गई,’’ उस ने स्वीटी की तरफ दिलकश नजरों से देखते हुए कहा.

‘‘इस पुनीत से पूछते हैं. इस ने अब तक क्या किया है?’’ अब दीपिका ने नैंसी और स्वीटी की ओर देखते हुए कहा.

‘‘यार, क्या बताऊं, मेरा तो बहुत बुरा हाल है. मैं ने तो अब तक फाइल भी नहीं बनाई,’’ पुनीत ने मायूसी से कहा.

‘‘ओ हो हो…इस बेचारे का क्या होगा,’’ दीपिका ने अफसोस जताने का अभिनय करते हुए कहा.

‘‘यूनिवर्सिटी आ गई. चलो उतरो,’’ नैंसी ने प्रिंस को लगभग आगे की ओर धकेलते हुए कहा.

इस के साथ ही वे हंसते हुए उतर गए. उन के जाते ही ऐसा लगा मानो चहचहाते पंछियों का कोई झुंड पेड़ से उड़ कर मुक्त गगन में विचरण करने चला गया हो. एक दिन एक अधेड़ युवक और एक  युवती कोच को जोड़ने वाले ज्वाइंट  पर खड़े अपनी बातों में मशगूल थे. एक स्टेशन पर अचानक कुछ लड़कियां और कुछ स्त्रियां कपड़े, बरतनों की पोटली लिए उन के करीब आ धमकीं. वे पोटलियां इधरउधर फैला कर वहीं बैठ गईं. इस प्रयास में पोटली पास खड़े युवक की पैंट से टकरा गई.

‘‘अरे, तुझे दिखाई नहीं देता क्या?’’ युवक ने नाराज होते हुए कहा.

‘‘ऐसा क्या कर दिया जो बोल रहा है?’’ स्त्री उस की ओर देखते हुए बोली.

‘‘पोटली मार कर मेरी पैंट खराब कर दी और पूछ रही है कि क्या कर दिया?’’ उस ने गुस्से से देखते हुए कहा.

‘‘तो क्या हो गया? चढ़नेउतरने में ऐसा ही होता है.’’

‘‘ऐसा कैसे होता है? पोटली ले कर चलते हो. दूसरों के कपड़े खराब करते रहते हो.’’

‘‘ओए, ज्यादा बकवास न कर. मैट्रो तेरे बाप की नहीं है.’’

इस के बाद वह युवक भी गुस्से में कुछ और कहना चाहता था पर तभी किसी नेक आदमी ने नेक सलाह दी, ‘‘अरे, भाई साहब, किस के मुंह लग रहे हो? इन से आप जीत नहीं सकते. समझदार लोग बेवकूफों के मुंह नहीं लगा करते.’’ अपनेआप को समझदार सुनने के बाद वह आदमी चुप हो गया. हां, उस ने इतना अवश्य किया कि वहां से हट कर दूर खड़ा हो गया. नए साल के नए दिन जब बासू ट्रेन में चढ़ा तो अजब वाकया पेश आ रहा था. बहुत सारे लोग कान पर मोबाइल लगाए बातों में मशगूल हो रहे थे. अपनीअपनी धुन में मस्त. एक सज्जन कान से मोबाइल लगाए चिल्ला कर कुछ इस तरह बधाई दे रहे थे, ‘‘नहीं यार, मैं हैप्पी न्यू ईयर कह रहा हूं.’’ वहीं दूसरे सज्जन कुछ गुस्से में किसी को फोन पर धमका  रहे थे, ‘‘अबे तू पागल है. इतनी बात हो गई और तुझे हैप्पी न्यू ईयर की पड़ी है. कुछ सोचता भी है या नहीं…’’

एक अन्य सज्जन मोबाइल पर कुछ झल्ला रहे थे, ‘‘चिल्ला क्यों रहा है. मैं कोई बहरा हूं? तेरी गलती है. पहले बताना चाहिए था.’’

‘‘कितनी बार बता चुका हूं? पर तुझे सुनाई ही नहीं देता,’’ ये कोई और सज्जन थे जो फोन पर किसी को डांट रहे थे.

एक सज्जन सिर हिला कर किसी की बात से सहमत होते हुए बोल रहे थे, ‘‘हां हां, चाची 60 की हैं, साली 16 की.’’

‘‘तू ऐसा कर 60 वाली रहने दे और 16 वाली 100 भेज दे,’ उन के बगल में खड़े सज्जन फोन पर स्टील प्लेट्स का आर्डर दे रहे थे.

एक सज्जन फोन पर कुछ यों बोल रहे थे, ‘‘यार, बाहरवाली से ही इतना परेशान हो जाता हूं कि घरवाली की चिंता कौन करे?’’ तो उन्हीं के पास खड़े एक अन्य सज्जन किसी को इस तरह सांत्वना दे रहे थे, ‘‘यार, तू उस की टैंशन मत ले. उसे मैं संभाल लूंगा.’’ एक लड़का अपनी गर्लफ्रैंड से कुछ नोट्स लेने के लिए बड़ी देर से उस की चिरौरी कर रहा था. अचानक उस की आवाज तेज हो गई, ‘‘यार, इतनी देर से मांग रहा हूं, दे दे ना.’’

वहीं एक कोने में कंधा टिकाए खड़ी लड़की हंसते हुए अपने बौयफ्रैंड को यह कह कर नचा रही थी, ‘‘यार, जब देखो तब कुछ न कुछ मांगते रहते हो. मेहनत करो. कब तक मांगते रहोगे?’’ तभी दरवाजे के पास एक ग्रुप आ कर खड़ा हो गया. इस में 2 लड़के और 2 लड़कियां थीं. उन की बातचीत से लग रहा था कि वे डेटिंग पर जा रहे हैं. उन में से एक लड़का फोन पर बड़ी देर से किसी से हंसहंस कर बात कर रहा था. उस के पास खड़ी लड़की काफी परेशान हो रही थी. जब उस से न रहा गया तो वह बोल पड़ी, ‘‘ओए, हम भी हैं. भूल गया क्या?’’

काफी इंतजार करने के बाद जब उस ने फोन बंद किया तो लड़की ने हाथ बढ़ा कर उस का सेल फोन छीनने की कोशिश की. फोन स्विच औफ हो गया. लड़का भाव खा गया, ‘‘क्या यार, सोमी तू भी कमाल है. बात भी नहीं करने दी,’’ उस ने गुस्से से कहा.

‘‘हम यहां बेवकूफ हैं,’’ सोमी ने जवाब में कहा, ‘‘तू हमें अवौइड कर के इतनी देर से उस से बातें कर रहा है और हम से कह रहा है कि 2 मिनट सब्र नहीं कर सकती.’’

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‘‘लीव इट यार,’’ दूसरा लड़का जो काफी देर से शांत था, अब बोल पड़ा.

‘‘व्हाई लीव इट? सोमी सही कह रही है,’’ दूसरी लड़की ने सोमी का पक्ष लिया.

‘‘ओके. आई नो. पर बात को खत्म करो यार,’’ रोमी ने कहा.

‘‘मैं ने बहुत बार कहा पर यह नहीं माना. ज्यादा स्मार्ट समझता है अपने को,’’ सोमी ने कहा.

‘‘टैनी, मैं साफसाफ कह रही हूं. अगर तुझे वह पसंद है तो तू उसी के साथ जा पर यह नहीं होगा कि तू डेटिंग पर मेरे साथ जा रहा है और मजे किसी और के साथ कर रहा है. ऐसा नहीं चलेगा.’’

‘‘यार, तेरी प्रौब्लम क्या है? तू क्या करेगी,’’ वह भी भाव खाने लगा.

‘‘मैं तेरा फोन तोड़ डालूंगी.’’

‘‘ले तोड़,’’ यह कहने के साथ ही वह फिर फोन मिलाने लगा.

इस पर सोमी आपा खो बैठी. उस ने हाथ बढ़ा कर फोन छीनना चाहा. लड़के ने फोन जोर से पकड़ लिया. दोनोें के बीच छीनाझपटी में फोन मैट्रो के फर्श पर गिर कर टूट गया. दोनों के चेहरे तमतमा गए. तकरार में डेटिंग की मस्ती खत्म हो चुकी थी. इसलिए डेटिंग को वेटिंग बना चारों अगले स्टेशन पर उतर गए. तभी एक सज्जन के फोन की घंटी बज उठी, ‘‘हैलो…हैलो…’’

‘‘मैं हरी बोल रहा हूं,’’ दूसरी ओर से आवाज आई.

‘‘हां हरी, बोलो. क्या बात है?’’ उन्होंने पान की गिलौरी चबाते हुए कहा.

‘‘बाबा के क्या हालचाल हैं? पापा कह रहे हैं कि आज शाम को बाबा के घर जाएंगे,’’ दूसरी ओर से आवाज आई.

इस पर उन्होंने पान चबाते हुए जवाब दिया, ‘‘बाबा तो अजमेर गए.’’ तभी मैट्रो राजीव चौक में प्रवेश करने लगी. अंडरग्राउंड होेने से यहां कभीकभी फोन का नेटवर्क काम नहीं करता, सो उन के लाख चिल्लाने का कोई फायदा नहीं हुआ. नेटवर्क फेल हो गया और मैट्रो सीटी बजाती हुई तेजी से आगे बढ़ी जा रही थी.

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जब सहेली के साथ पकड़ा जाए प्रेमी

आशा और सुरेश का एक साल पहले अफेयर शुरू हुआ था. आशा ने सुरेश के साथ जीनेमरने की जाने कितनी कसमें खाईं, साथ रहने के सपने देखे लेकिन उस के ये सपने तब धराशायी हो गए जब एक दिन वह अपने रूम में कालेज से जल्दी आ गई और दरवाजा खोलते ही अपनी रूममेट और सब से अच्छी सहेली रोमा को अपने ही बौयफ्रैंड सुरेश के साथ हमबिस्तर पाया. यह उस की वही सहेली थी जो इन दोनों के प्यार की गवाह थी और उन के बीच होने वाली हर छोटीबड़ी बात जानती थी. यह सिर्फ आशा की ही कहानी नहीं है बल्कि यह अकसर सुनने में आता है कि एक सहेली ने दूसरी सहेली के बौयफ्रैंड को छीन लिया या अपना बना लिया.

वैसे तो ऐसा करना गलत है, लेकिन अगर ऐसा हो भी गया है तो रोनेधोने से काम नहीं चलेगा, बल्कि समझदारी से काम लेते हुए इस सिचुएशन को हैंडल करने की जरूरत है. आइए, जानें इस सिचुएशन से कैसे निकलें बाहर :

प्रेमी की असलियत सामने आई

यह तो अच्छी बात है कि प्रेमी की पोल आप के सामने जल्दी ही खुल गई वरना ये सब आप के घर में पता चल जाता तब आप उन की नजरों में भी गिर जातीं. अभी तो बात सहेली के सामने ही है और वह भी कोई आप की सगी नहीं है बल्कि उस ने तो आप की पीठ पीछे वार किया है, आप के प्रेमी को अपना बना कर. अच्छा हुआ, उस के करैक्टर के बारे में पहले ही पता चल गया. जो लड़का आप की सहेली पर बुरी नजर रख सकता है कल वह आप की बहन के साथ क्या करता, आप सोच भी नहीं सकतीं.

सहेली भी धोखेबाज निकली

वह सहेली चाहे बरसों से आप की कितनी भी अच्छी दोस्त क्यों न रही हो, लेकिन अब आप के साथ उस ने जो किया उस के बाद आप की जिंदगी में उस की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. ऐसी दोस्त बनाने से अच्छा है आप अकेली ही रह लें.

जिंदगी का बड़ा सबक सीख लिया

इस रिलेशनशिप से आप जिंदगी का गहरा सबक लें. अब आप आगे जो भी कदम उठाएंगी सोचसमझ कर ही उठाएंगी. यह गम लंबे समय तक तंग करेगा लेकिन आप को इस से लड़ कर बाहर आने की हिम्मत लानी होगी, इस से आप को जीवन में आए दुखों से लड़ने की ताकत मिलेगी.

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पढ़ाई पर ध्यान लगाएं

इस हादसे से आप अपना एक नुकसान कर चुकी हैं, अब पढ़ाई में पिछड़ कर दूसरा नुकसान न करें. अपने जीवन में सब से ज्यादा अहमियत पढ़ाई को ही दें, इस से अपनी स्टै्रंथ बना लें और ध्यान से पढ़ाई करने में जुट जाएं.

आप बदनाम होने से बच गईं

प्रेमी की फितरत ही धोखा देने की थी, तभी तो उस ने आप को चीट किया. एक तरह से देखा जाए तो अच्छा ही हुआ. ऐसे दोगले इंसान से आप को जल्दी छुटकारा मिल गया, वह भी अपना कोई नुकसान किए बिना. वह लड़का सही नहीं था. हो सकता है कि वह आगे चल कर आप को ब्लैकमेलिंग आदि के जाल में फंसाने की कोशिश करता. ऐसे लोगों से दूर होना ही बेहतर है.

ध्यान दें

परदे में रहने दो

जी हां, हर बात सहेली को बताई जाए यह जरूरी तो नहीं. अपने और प्रेमी के बीच की बातों को सहेली के साथ डिसकस करना ठीक नहीं. फिर चाहे वह कितनी भी अच्छी क्यों न हो या कितनी ही गहरी मित्र क्यों न हो. आप की बातों और प्रेमी की इतनी तारीफ से हो सकता है कि सहेली का मन पलट जाए और वह प्रेमी की तरफ आकर्षित हो कर उसे फंसाने में लग जाए. ऐसे में प्रेमी के साथसाथ सहेली से भी आप को हाथ धोना पड़ सकता है.

ब्रेकअप का रोना न रोती रहें

जिन लोगों को इस रिलेशनशिप के बारे में पता था उन्हें हर बार यही बात कह कर न पकाएं. आप दुनिया में पहली नहीं हैं जिस का ब्रेकअप हुआ है, ऐसा कर के आप खुद को हंसी और बेचारगी का पात्र बना लेंगी. यह आप का गम है और इसे अकेले ही भूलना होगा.

विश्वास करना न छोड़ें

माना यह थोड़ा मुश्किल है, लेकिन अगर एक सहेली ने पीठ पीछे धोखा दिया है तो इस का मतलब यह कतई नहीं है कि आप अपनी सारी सहेलियों से मुंह मोड़ कर अकेली हो जाएंगी. अपनी बाकी सहेलियों के टच में रहें.

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बच के रहना रे बाबा

आप ने किसी एक से नहीं बल्कि अपने दो अजीजों से धोखा खाया है. इस का मतलब चूक कहीं न कहीं आप से भी हुई है,

जो आप ने अपनी जिंदगी में ऐेसे प्रेमी और सहेली को जगह दी इसलिए इस से सीख लें व जांचपरख कर ही किसी से रिलेशन बनाएं.

किसी भी युवक को बौयफै्रंड बनाने से पहले उस के बारे में अच्छी तरह से तहकीकात कर लें. अगर थोड़ा भी शक हो तो उस के साथ रिलेशनशिप बनाने की जरूरत नहीं है.

फेशियल के बाद ये काम न करें वरना हो सकता है चेहरे पर रिएक्शन!

किसी भी पार्टी में जाना हो या कोई फंक्शन हो तो आप सबसे पहले पार्लर जाती हैं और फेशियल करवाती हैं. पार्लर में आपकी स्किन और रंग के हिसाब से कई तरह के फेशियल किए जाते हैं. माना जाता है 30 की उम्र के बाद आप को महीने में एक बार तो फेशियल करवाना ही चाहिए. लेकिन अब कम उम्र में  लड़कियां भी महीने में कम से कम एक बार तो फेशियल करवा ही लेती हैं. फेशियल करवाने से आपकी स्किन की टैनिंग तो हटती ही है इसके अलावा स्किन भी अच्छी रहती है.

लेकिन क्या आप जानती हैं फेशियल करने के बाद आपको कुछ काम बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, वरना फेशियल का रिएक्शन भी हो सकता है. जी हां, लोगों को इस बारे में कम जानकारी होती है कि फेशियल करवाने के कम से कम एक हफ्ते बाद तक कुछ ऐसी चीजें है जिनसे आपको बचना चाहिए लेकिन लोग अक्सर ये गलती कर बैठते हैं. जिसका नतीजा ये होता है कि कभी-कभी चेहरे पर उसका रिएक्शन भी हो जाता है. आइए बताते है, फेसियल करवाने के बाद आपको क्या नहीं करना चाहिए.

धूप में ना जाएं–  फेशियल करवाने के तुंरत  बाद भूलकर भी धूप में ना जाएं वरना चेहरे पर इसका रिएक्शन हो सकता है. अगर आपको बाहर जाना बहुत ही जरूरी है तो चेहरे पर कपड़ा बांधकर जाएं.

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फेशियल करवाने के 4 घंटे तक मुंह ना धोए– फेशियल करवाने के बाद कम से कम 4 घंटे तक तो  साबुन से भूलकर भी मुंह ना धोएं. अगर चेहरा साफ करना है तो पानी की हल्की छीटें मारकर पोछ लें लेकिन साबुन का इस्तेमाल ना करें.

थ्रेडिंग ना करवाएं– फेशियल करवाने के बाद थ्रेडिंग नहीं करवानी चाहिए. दरअसल फेशियल करवना के बाद स्किन बहुत सौफ्ट हो जाती है जिससे थ्रेडिंग करवाते समय कट लगने के चांसेज ज्यादा हो जाते हैं. इसलिए अगर आपको थ्रेडिंग और फेशियल दोनों चीजें करवानी हैं तो पहले थ्रेडिंग करवाएं उसके बाद फेशियल.

फेस मास्क ना लगाएं– जब भी फेशियल करवाएं उसके एक  बाद एक हफ्ते तक किसी भी तरह मास्क चेहरे पर ना लगाएं इससे फेशियल ग्लो खत्म हो जाता है.

वैक्सिंग ना करवाएं– फेशियल करवाने के बाद चेहरे पर कभी वेक्सिंग नहीं करवानी चाहिए. क्योंकि फेशियल करवाने के बाद त्वचा मुलायम हो जाती है जिसके बाद वैक्सिंग करवाने से त्वचा छिल सकती है.

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कम से कम तीन दिन तक स्क्रब ना करें– फेशियल कराने के बाद कम से कम तीन दिन तक चेहरे पर स्क्रब नहीं करना चाहिए. फेशियल कराने के बात वैसे ही आपकी स्किन साफ और सेंसिटिव हो जाती है जिसके बाद जल्दी स्क्रब करने से चेहरे पर दाने हो सकते हैं या चेहरा छिल सकता है.

क्षितिज ने पुकारा: क्या पति की जिद के आगे झुक गई नंदिनी?

Serial Story: क्षितिज ने पुकारा (भाग-2)

अब तक आप ने पढ़ा:

 दिल की कोमल नंदिनी थिएटर आर्टिस्ट थी. नंदिनी का थिएटर में काम करना पति रूपेश को पसंद नहीं था. एक दिन रिहर्सल के दौरान देर हो गई. घर जाने के लिए बस नहीं मिली तो उस के साथ काम करने वाला प्रीतम अपने स्कूटर पर उसे घर तक छोड़ने गया. घर पर उस का पति रूपेश गुस्से से भरा बैठा उस का इंतजार कर रहा था, जिस ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. रूपेश उसे बहुत कष्ट देता था. सास की मृत्यु के बाद घर में बूआ सास की हुकूमत चलती थी, जिस की खुद की जिंदगी काफी संघर्ष से बीती थी.

अभाव में पलीबढ़ी जिंदगी से बूआ सास हमेशा नकारात्मक सोच ही रखती थीं, जिस का प्रतिबिंब पति रूपेश पर भी गहरा पड़ा था.

– अब आगे पढ़ें

ज्योत्सना की खिलीखिली अनुभूतियां कितनी ही रातें नंदिनी को आसमान की सैर करा देती थीं, मगर आज रिसते दर्द पर शूल सा चुभ रहा था यह चांद. भूखीप्यासी वह तंद्राच्छन्न होने लगी ही थी कि अचानक लड़ाकू सैनिक सा रूपेश कमरे में आ धमका. बत्ती जला दी उस ने. वितृष्णा और प्रतिशोध से धधकते रूपेश को नंदिनी की शीलहीनता और कृतध्नता ही दिखाई देने लगी थी.

टूटी, तड़पती नंदिनी उठ कर बिस्तर पर बैठ गई.

‘‘महारानी इधर आराम फरमा रही हैं… यह नहीं कि देखे बूआ सास और पति को क्या दिक्कतें हैं? बहुत सह ली मैं ने तुम्हारी मनमानी… बूआ ने सही चेताया है… ब्राह्मण परिवार की बहू को पराए मर्दों के साथ हजारों लोगों के सामने नौटंकी कराना हमारी बिरादरी में नहीं सुहाता. हमारे घर बेटी है. कभी बेटी की फिक्र भी करती हो? तुम्हारे 4-5 हजार रुपयों से हमें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला… सोच लो वरना चली जाना हमेशा के लिए.’’

रूपेश ने नंदिनी के थिएटर के प्रेम पर, उस के काम पर दफन की आखिरी मिट्टी डाल दी थी.

थिएटर का काम अब फायदे वाला नहीं रह गया. इस में खर्चे तो बहुत पर कला के कद्रदान कम हो गए हैं. ऐसे में थिएटर में काम करने वालों को बहुत कम पैसे दिए जाते हैं. जो पुराने कलाकार हैं, जो कला के प्रति समर्पित हैं, उन्हें अपने फायदे का त्याग करना पड़ता है.

औडिटोरियम, लाइट्स, स्टेज सज्जा, वस्त्र सज्जा, साउंड इफैक्ट, स्पैशल इफैक्ट पर हर स्टेज शो के लिए कम से कम क्व30-40 हजार का खर्चा बैठता ही है और वह भी कम पैमाने के नाटक के लिए. ऊपर से प्रचार और विज्ञापन का खर्चा अलग से.

ऐसे में शुभंकर दा या प्रीतम जैसे लोग अपना पैसा तो लगाते ही हैं, बाहर से भी मदद का जुगाड़ करते हैं. उन के समर्पण को देखते हुए नंदिनी जैसे कलाकार जो सिर्फ अपना थोड़ा समय और थोड़ी सी कला ही दे सकते हैं कैसे उन के साथ पैसे के लिए जिद करें?

अपने परिवार की ओछी सोच के आगे अगर नंदिनी जैसे लोग हार मान लें तो थिएटर जैसा रचनात्मक क्षेत्र लुप्तप्राय हो जाए.

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नंदिनी निढाल सी बिस्तर पर पड़ी रही. रूपेश नीचे जा चुका था. सुबह के 5 बज रहे थे. नंदिनी बिस्तर समेट नहाधो आई. फिर वेणु को उठाया,

सोई निबटा कर वेणु को स्कूल बस तक छोड़ आई. आ कर सब को नाश्ता कराया. किसी ने उस से नहीं पूछा. वह खा नहीं पाई. घर के बाकी काम निबटाती रही.

रूपेश के औफिस जाने से पहले जिस का फोन आया, उस से वह बहुत उत्साहित हो कर बातें करने लगा.

नंदिनी के पास इतना अधिकार नहीं रह गया था कि वह रूपेश से कुछ पूछ सके. फोन रख कर जैसाकि हमेशा बात करता था एक बौस की तरह अभी भी उसी अंदाज में नंदिनी से बोला, ‘‘ये रुपए पकड़ो, बाजार से जो भी इच्छा लगे ले आना. बढि़या व्यंजन बना कर रखना. शाम को मेरा दोस्त नयन और उस की पत्नी शहाना आ रहे हैं. कहीं जाने की गलती न करना वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’ यह कहीं का मतलब थिएटर ही था.

पत्नी से बात करना रूपेश ने कभी सीखा ही नहीं. अत: नंदिनी ने भी अपनी जिंदगी के अभावों से समझौता कर लिया था.

मगर कल तक उस के नाटक का आखिरी रिहर्सल था. परसों से शो. कोलकाता के 2 हौल्स में टिकट बिकने को दिए गए थे. अब यह धोखा नंदिनी कैसे करे?

शाम को घर का माहौल काफी बदला सा था. करीने से सजे घर में महंगे डिजाइनर सैटों की साजसज्जा के बीच सलीके से सजी नंदिनी इतने शोर के बीच बड़ी शांत सी थी. शहाना शोरगुल के बीच भी नंदिनी पर नजर रखे थी. वेणु को भी वह काफी कटाकटा सा पा रही थी. कौफी का कप हाथ में लिए शहाना नंदिनी के पास जा पहुंची. फिर उस का हाथ पकड़ते हुए बोली, ‘‘चलो कहीं घूम आती हैं. अभी तो शाम के 6 ही बजे हैं… खाना 10 बजे से पहले खाएंगे नहीं.’’

‘‘आप कहें तो मेरी पसंदीदी जगह चलें?’’

‘‘नंदिनी मुझे तुम आप न कहो. चलो, चलें.’’

शहाना नंदिनी को ले पति बिरादरी के पास पहुंच चुकी थी. उन की बातें सुन नंदिनी अवाक रह गई. नयन भी तो पुरुष हैं, पति हैं, यह कैसे संभव हो पाया.

नयन कह रहे थे, ‘‘इतना ही नहीं शहाना अपनी साल भर की बेटी को मेरी मां के घर राजोरी गार्डन छोड़ती, तब डांस ऐकैडेमी जा कर डांस के गुर सीखती. हफ्ते में 3 दिन उसे ग्रेटर नोएडा से आनाजाना पड़ता… बहुत संघर्ष कर के उस ने अपने डांस के शौक को बचाया है. यह इस के संघर्ष का फल है कि कल कोलकाता के टाउनहौल में इस की एकल प्रस्तुति है. मैं बहुत गर्वित हूं शहाना पर.’’

‘‘अरे नयन, तुम ज्यादा बोल रहे हो… ये सब तुम्हारे बिना बिलकुल संभव नहीं होता. अगर तुम घर में मेरी गैरमौजूदगी में घर को न संभालते तो मैं कहां आगे बढ़ पाती? सासूमां ने भी बेटी को संभालने के लिए कभी मना नहीं किया.’’

‘‘एक स्त्री के लिए घर और अपने शौक दोनों को एकसाथ संभालना कितना मुश्किल भरा काम है, मैं ही समझ सकती हूं. नौकरी एक बार में छोड़ी जा सकती है, पर कला, हुनर और जनून से मुंह मोड़ना नामुमकिन है. लेखन, नाटक, गायन, नृत्य क्षेत्र बेहद समर्पण मांगते हैं. ऐसे में एक समझदार, स्नेही और निस्वार्थ पति के संरक्षण में ही विवाहित स्त्री का शौक फूलफल सकता है,’’ कह शहाना थोड़ी रुक कर फिर बोली, ‘‘रूपेश भाई साहब हम घूमने जा रहे हैं. नंदिनी भी साथ जा रही हैं,’’ भाई साहब.

‘‘हांहां, क्यों नहीं?’’

पति के इस उदारवाद के पीछे की मानसिकता भी नंदिनी से छिपी नहीं थी. रूपेश अपनी छवि को ले कर दूसरों के सामने बहुत सचेत रहता था. उसे अभिनय का सहारा लेना पड़ता.

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ये भी विडंबना ही है. अन्य के चरित्र चित्रण में नंदिनी ने स्वयं को वास्तव में कभी नहीं खोया, लेकिन स्वयं के चरित्र में रूपेश को अन्य को धारण करना पड़ता है, खुद को छिपाना पड़ता है. नंदिनी शहाना को टौलीगंज के ड्रामा स्कूल ले गई.

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Serial Story: क्षितिज ने पुकारा (भाग-3)

‘‘अरे वाह, यह हमारा मनपसंद इलाका है. बंगाल के चलचित्र महानायक उत्तम कुमार का कर्मस्थान.’’

‘‘तुम्हें पसंद आएगा, मैं जानती थी.’’

‘‘तुम यहां किसी को जानती हो?’’

ड्रामा स्कूल में प्रवेश करते हुए नंदिनी शहाना से मुखातिब हुई, ‘‘यह ड्रामा स्कूल शुभंकर दा का है… मैं यहां सदस्य हूं.’’

‘‘तुम? तुम तो बड़ी सीधी सी बेजबान कोमलांगिनी, शरमीली, गृहवधू हो.’’

‘‘चलो, अंदर चलो,’’ नंदिनी ने मृदु स्वरमें कहा.

शुभंकर की टीम को नंदिनी का आगमन स्वयं कला की देवी के आविर्भाव सा प्रतीत हुआ.

इधरउधर बैठे टीम के सदस्य अपनेअपने रोल की प्रैक्टिस कर रहे थे. नंदिनी का रोल ही आधार चरित्र था. उस के बिना नाटक कर पाना असंभव था. नंदिनी को देख सभी बड़े खुश हुए, मगर नंदिनी कल की चिंता में बेचैन थी.

शुभंकर दा ने नंदिनी की बेचैनी को भांप लिया. आज शुभंकर दा की पत्नी अनुभा भाभी भी यहां थीं. जब से इन का बेटा अमेरिका गया था नौकरी के लिए, अनुभा भाभी कोई न कोई नया कुछ पकवान बना कर यहीं ले आती.  शुभंकर दा ने जब नंदिनी से बेचैनी का कारण पूछा तो उस की आंखों से आंसू बहने लगे.

अनुभा भाभी ने उसे अपने पास बैठाया. शहाना और टीम के सभी सदस्य भी पास आ गए, जब नंदिनी के संघर्ष का सच खुला तो शहाना अवाक रह गई कि इतनी जिल्लतें, इतनी धमकियां, दुर्व्यवहार झेलते हुए भी वह घर और अपने शौक के जनून दोनों के साथ न्याय कैसे कर पा रही हैं?

शहाना ने कहा, ‘‘नंदिनी तुम अब सब कुछ मुझ पर छोड़ दो. तुम्हारे शो का टाइम 8 बजे से है और मेरा शाम 4 से 6 बजे तक… सब ठीक हो जाएगा,’’ और फिर घर लौट आईं.रात को शहाना ने नयन को ऐसी जादुई खुशबू सुंघाई कि नयन ने कहा, ‘‘बस देखती जाओ.’’

सुबह होते ही नयन ने कहा, ‘‘यार मैं सोफे में धंस कर बंद दरवाजे के अंदर सुबह के सूरज को खोना नहीं चाहता. चल बाहर सैर को चलें.’’

दोनों पास के बगीचे की तरफ निकल गए. चलतेचलते नयन ने कहा, ‘‘यार रूपेश तुम्हारी बिरादरी में तो अकसर बीवियां गुणी होती हैं. घरगृहस्थी और पतिसेवा के अलावा भी उन की जिंदगी के कुछ मकसद होते हैं… नंदिनी भाभी क्या कुछ नहीं करतीं?’’

‘‘अरे छोड़ न तू भी क्या ले कर बैठ गया?’’

‘‘क्यों इस बात में क्या बुराई है?’’

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‘‘बुराई है… न मुझे और न ही बूआ को यह रास आता कि औरतें घर संभालने के अलावा भी कुछ करें और अगर करें तो इतना पैसा कमाएं कि उन का घर से बाहर निकलना परिवार वालों को भा जाए.’’

‘‘यार बुरा मत मानना. तुम लोगों की इन्हीं छोटी सोचों की वजह से पीढि़यां बस घिसट रही हैं. वास्तविक उन्नति नहीं हो पा रही है.’’

‘‘स्वार्थ, अहंकार, ईर्ष्या, जिद के वश में हो कर तुम लोग जो भी नियम बनाते हो उसे पत्नी पर थोप देते हो.’’

‘‘यार रूपेश तेरी सोच से 3 दशक पुरानी बू आ रही है. तेरी बूआ से बातें कर के लगा कि उन्होंने अपनी पूरी सोच तुझ में स्थानांतरित कर दी है. तू तो हमारी पीढ़ी का लगता ही नहीं.’’

‘‘अच्छा.’’

‘‘और क्या… बापदादों सा अकड़ू, तर्कहीन, निर्दयी… क्या खाख आधुनिक है तू? नए आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल से स्वयं को आधुनिक नहीं बना सकते दोस्त… विचारों के बंद दरवाजे से सूरज लौट रहा है… बूआ की छोड़ रूपेश… उन्हें जो न मिला वह शायद उन के हिस्से में न था. तू अपना पारिवारिक जीवन क्यों नष्ट कर रहा है? बूआ की हर बात से प्रेरित हो कर तुम अपनी बेटी और पत्नी के साथ क्यों दुखद रवैया अपनाते हो?’’

वैसे तो जिद्दी लोगों का कायापलट जल्दी नहीं होता, फिर भी रूपेश ने सोचना शुरू कर दिया. बूआ सारा दिन टीवी सीरियलों के चालाक पात्रों से सीख लेती रहती हैं. अत: वे घर में ही जमी रहीं.

6 बजे शहाना का सफल शो खत्म होने के बाद शहाना और नंदिनी हौल पहुंची. शहाना कोलकाता के थिएटर के प्रति अपनी गहरी रुचि बता कर सभी को यहां ले आई थी. सभी अंदर गए तो नंदिनी ग्रीनरूम चली गई.

रूपेश की आंखें बारबार नंदिनी को ढूंढ़ रही थीं. नाटक शुरू होने पर रूपेश को भ्रम होने लगा कि क्या यह नंदिनी है… हां वही है.

मंच पर पूरी साजसज्जा में अदाकारा नंदिनी को देख वह हैरान था. इतनी डांट, अपमान यहां तक कि शारीरिक यातना के बाद भी जिस की जबान तक नहीं फूटती थी वह कब इतने लंबे डायलौग याद करती होगी? वह तो मानसिक पीड़ा में पेपर भी नहीं पढ़ सकता… कितनी प्रतिभाशाली है यह? उसे इतनी खीज और ईर्ष्या क्यों हो रही है? वह अपने सवालों में उलझ कर दीवाना सा होने लगा.

उस की अब तक की भावना उस के बाहर जाने, मर्दों के साथ गुलछर्रे उड़ाने की काल्पनिक सोच पर ही आधारित थी.

बगल में बैठे नयन ने अचानक उस की बाजू पर अपना हाथ रखा. फिर कहा, ‘‘दोस्त, मैं समझ रहा हूं कि तुम विचलित हो… तुम्हारे लिए अपनी पुरानी सोचों पर विजय पाना कठिन है. मगर तुम पिंजरे में घुट कर मर रहे हो. प्रकृति ने जिसे जो गुण दिया है, उसे विकसित होने के पूरे मौके दो.’’

‘‘वेणु को भी नया सवेरा दो. क्या तुम ने नंदिनी को स्त्री होने की सजा देने का ठेका ले रखा है? वक्त रहते बदल जाओ नहीं तो वक्त की मार पड़ेगी.’’

रात बिस्तर पर चांदनी फिर आई. दोनों के बीच आज शांति की एक झीनी सी दीवार थी, लेकिन रूपेश का उद्वेलित मन पुरुष के कवच में सिमटा ही रह गया, पर चांदनी नंदिनी को महीनों बाद सुकून की नींद दे गई थी.

सुबह शहाना और नयन के जाने के बाद रूपेश भी औफिस निकलने को हुआ.

नंदिनी से दोपहर के खाने का डब्बा पकड़ते हुए रूपेश ने कहा, ‘‘शाम को थिएटर से आते वक्त सब्जियां ले आना. मेरी मीटिंग है… देर हो जाएगी लौटने में. और हां, कल थिएटर नहीं जाना, शोरूम चलेंगे स्कूटी देखने… थिएटर से वापसी में औटो का झंझट ही न रहे तो बेहतर.’’

पुरुष का पति बनना आज पृथ्वी की सब से मीठी घटना लग रही थी. नंदिनी की आंखों से विह्वल प्रेम की मीठी बयार जहां संकोच की दीवार लांघ रूपेश की नजरों से जा टकराई, रूपेश की नजरों ने प्रेयसी के होंठों का लावण्य भरा स्पर्श किया.

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नि:शब्द अनुभूतियों के आलिंगन में बंधी नंदिनी आज ज्योत्सना भरी उसी रात का बेसब्री से इंतजार करने लगी. हो भी क्यों न. यह तो धरती और आसमां का वह मिलन होगा जहां दायरे खत्म हो जाएंगे… क्षुद्र सीमाओं का असीम में विलय हो जाएगा.

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