फंदा: भाग-2

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मुंबई के मुसलिम बहुल इलाके में शौकत अली अपनी पत्नी आयशा व 4 बच्चों सना, रूबी, हिबा व बेटे हसन के साथ हंसीखुशी रह रहे थे. हसन के बड़ा होने पर उस की मां आयशा चाहती थीं कि हसन पास के ही एक जमाल बाबा के पास जा कर ज्ञानधर्म की बातें सीखे. तंत्रमंत्र के नाम पर जमाल लोगों को गुमराह करता था और खूब धन ऐंठता था. हसन रोज शाम को उस बाबा के पास बैठने लगा. धीरेधीरे उस के व्यवहार में बदलाव आने लगा. उस ने अपनी सगी बहन तक पर कुदृष्टी रखनी शुरू कर दी थी. बहनें शादी के बाद ससुराल चली गईं तो हसन की शादी भी हो गई. अब वह नौकरी छोड़ कर बिजनैस करना चाहता था और इस के लिए उस ने अपने घर वालों के साथसाथ बहनों पर भी दबाव बनाना शुरू कर दिया और गहनों तक की डिमांड कर दी.

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उस रात सब चिंता में डूबे सोने चले गए. सना और हिबा की नींद उड़ गई थी. हिबा ने पूछ ही लिया, ‘‘बाजी, क्या सोच रही हो? हसन ने तो बड़ी मुश्किल में डाल दिया. मैं उसे अपने जेवर नहीं दे सकती… पर न दिए तो वह पहले की तरह हंगामा करेगा, क्या करें.’’

‘‘कुछ समझ नहीं आ रहा. अम्मी की शक्ल देख कर मन कररहा है कि कुछ इंतजाम कर ही दें… अब्बू ने मना तो किया है पर मैं रशीद से इस बारे में बात जरूर करूंगी.’’

अगले दिन नियमानुसार रशीद और जहांगीर आए, हसन कुछ उखड़ाउखड़ा सा था. दोनों के बारबार पूछने पर भी हसन गंभीर ही बना रहा. बस हां हूं में ही जवाब देता रहा. सना और हिबा ने उन्हें आगे कुछ न पूछने का इशारा किया तो फिर वे चुप रहे.

दोनों बहनें अपनेअपने परिवार के साथ अपनेअपने घर चली गईं तो शौकत ने हसन को बुलाया, ‘‘बेटा, यह गलती मत करो, अच्छीभली नौकरी है, बिजनैस के लिए न पैसा है न अनुभव. इस चक्कर में मत पड़ो.’’

हसन गुर्राया, ‘‘मैं फैसला कर चुका हूं और आप सब को मेरी मदद करनी ही पड़ेगी वरना…’’ कह हसन गुस्से में चला गया.

बेटे के तेवर देख कर वहां खड़ी आयशा का सिर चकरा गया.

हसन अब 35 साल का हो रहा था. बाबा के इशारे पर कुछ भी कर सकता था. अपने सब शागिर्दों में बाबा को सब से मूर्ख और हठधर्मी हसन ही लगा था.

शौकत के मना करतेकरते भी आयशा बेगम ने बेटे की ममता में बेटियों के आगे अपनी झोली फैला ही दी.

सना ने रशीद से बात की तो वह थोड़ा सोचने लगा. फिर कहा, ‘‘बहुत ज्यादा तो नहीं पर किसी तरह बिजनैस से 8-10 लाख ही निकाल कर दे पाऊंगा, तुम्हारा भाई है… कितना प्यार करता है सब को. कितनी इज्जत से बुलाता है. ऐसे भाई की जरूरत के समय पीछे हटना भी ठीक नहीं होगा. उस से बात कर के बता देना कि मैं इतनी ही मदद कर पाऊंगा.’’

शौहर की दरियादिली पर सना का दिल भर आया. भीगी आंखों से रशीद को शुक्रिया कहा तो उस ने सना का कंधा थपथपा दिया.

सना ने फोन पर हिबा को रशीद का फैसला बताया तो उस ने कहा, ‘‘मैं ने भी जहांगीर से बात की. कैश तो हम नहीं दे पाएंगे, पर अपने थोड़े गहने दे दूंगी. जहांगीर का भी यही कहना है कि अपनों का साथ तो देना ही चाहिए.’’

सना और हिबा एकसाथ मायके पहुंचीं. हसन घर पर ही था. शौकत अली औफिस में थे. जोया, शान सब दोनों को देख कर खुश हुए.

सना ने रशीद की बात दोहराई तो हसन मुसकराया, ‘‘रशीद भाई बहुत अच्छे हैं, मैं यह रकम जल्दी लौटा दूंगा.’’

हिबा ने भी गहनों का डब्बा उस के हाथ में रख दिया. हसन ने फौरन खोल कर चैक किया. बोला, ‘‘यही बहुत है,’’ फिर आयशा से बोला, ‘‘अम्मी, मैं तो अब बिजनैस की तैयारी करूंगा. सोच रहा हूं जोया को 3-4 महीनों के लिए उस के मायके भेज दूं.’’

जोया गर्भवती थी. हसन ने अब तक इस बारे में उस से बात भी नहीं की थी. वह हैरान हुई. कहने लगी, ‘‘अरे, अचानक आप ने यह कैसा प्रोग्राम बना लिया? मुझ से पूछा भी नहीं?’’

‘‘तुम से क्या पूछना, मायके चली जाओ वहां थोड़ा आराम कर लो. डिलीवरी के बाद आ जाना.’’

जोया ने आयशा की तरफ देखा तो वे बोलीं, ‘‘हां, चली जाओ. यहां तो तुम्हें आराम मिलने से रहा. फिर तुम्हें गए हुए भी बहुत दिन हो गए हैं.’’

जोया ने ‘हां’ में सिर हिला दिया. वह मन ही मन हैरान थी कि कैसा शौहर है यह. न बीवी से पूछा, न सलाह ली.

2 दिन बाद ही हसन जोया को उस के मायके छोड़ आया. अब हसन का घर आनेजाने का कोई टाइम नहीं था. दिन भर वह इधरउधर घूमता, बाबा के पास बैठता.

बहनों से उधार लेने की बात उस ने बाबा को बताई, तो बाबा ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए बहुत कुछ करना चाहता हूं, तुम यहां से थोड़ी दूर एक कमरा किराए पर ले लो. मैं वहां अपने तंत्रमंत्र की शक्ति से तुम्हारे अच्छे भविष्य के लिए बहुत कुछ कर सकता हूं. यहां और लोगों की मौजूदगी में तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पाऊंगा. मैं अपनी ताकतों का इस्तेमाल तुम्हारे जैसे नेक बंदे के लिए कर सकता हूं.’’

‘‘पर मैं बहनों को यह रकम लौटाऊंगा कैसे? आप के कहने पर मैं ने नौकरी भी छोड़ दी है. मैं अब क्या काम करूंगा?’’

‘‘फिलहाल तो बहनों के पैसों से अपना खर्चा चलाते रहो. मैं अपने तंत्रमंत्र के बल पर तुम्हें जल्दी अमीर आदमी बना दूंगा.’’

हसन ने कुछ दूरी पर एक कमरे का फ्लैट किराए पर ले लिया. बाबा को इस बात

पर खुश देख कर हसन को लगा कि उस ने कोई बहुत बड़ा काम कर दिया है. अब वह बाबा के निर्देशानुसार उस खाली फ्लैट में जरूरी चीजें रखता रहा.

शौकत अली ने ठंडे दिमाग से बहुत सोचासमझा कि बेटा कहीं पैसे की कमी से परेशान तो नहीं हो रहा है. उन्होंने हसन को अपने पास बुलाया. कहा, ‘‘हसन, तुम क्या काम सोच रहे हो?’’

‘‘अभी तो कुछ नहीं… बाबा ने बताया है कि मैं बिजनैस में बहुत तरक्की करूंगा, इसलिए नौकरी मैं ने छोड़ दी थी.’’

‘‘तुम ने बाबा की बात सुन कर नौकरी छोड़ी है?’’ शौकत अली को गुस्सा आ गया.

‘‘हां, अब्बू. अब बिजनैस क्या करूं. यही सोच रहा हूं. वैसे प्रौपर्टी डीलिंग का काम मुझे अच्छा लगता है. आप तो कभी मेरी मदद ही नहीं करते.’’

शौकत ने खुद पर काबू रखते हुए शांत ढंग से कहा, ‘‘फिर कुछ सोचते हैं. आजकल हमारी जमीन के आसपास इतने कौंप्लैक्स, सोसायटी बनने लगी हैं. इस से हमारी जमीन की कीमत भी बढ़ रही है… इस सिलसिले में कोशिश कर के देख लो. किसी बिल्डर से बात कर के देख लो… पहले थोड़ी जमीन के लिए ही बात कर के देखना.’’

हसन को तो अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ. उस के दिमाग में तो जमीन का खयाल ही नहीं आया था. तुरंत बोला, ‘‘सच?’’

फिर हसन ने कुछ लोगों से बात कर अपनी थोड़ी सी जमीन बेच दी. बदले में मिली मोटी रकम से उस की तबीयत खुश हो गई.

शौकत अली ने कहा, ‘‘अब इस पैसे से किसी अच्छे बिजनैस की शुरुआत कर सकते हो.’’

इतना मोटा पैसा हाथ में आएगा, यह तो हसन ने कभी सोचा भी नहीं था. फौरन जा कर बाबा को बताया तो जैसे बाबा की मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई.

ऊपरी तौर पर उदास चेहरा बना कर बैठ गया बाबा. हसन ने पूछा, ‘‘क्या हुआ बाबा?’’

‘‘कुछ नहीं. एक बड़ी परेशानी ने आ घेरा है. खुदा भी पता नहीं अपने नेकबंदों का क्याक्या इम्तिहान लेता है.’’

‘‘क्या हुआ, बाबा?’’

‘‘हमारे गांव की एक बेवा औरत है. उस की एक जवान बेटी है. दोनों का कोई नहीं है. ससुराल वालों ने निकाल दिया है. बेचारी औरतें कहां जाएं? मेरा तो कोई ठिकाना नहीं है… और किस से कहूं उन का दुख… आजकल कौन समझता है किसी का दुखदर्द.’’

हसन चुपचाप बाबा का चेहरा देखता रहा.

बाबा फिर बोला, ‘‘आज तो वे मेरे कमरे पर आ गई हैं पर मैं उन्हें ज्यादा देर नहीं रख सकता. मैं ठहरा बैरागी, फकीर आदमी.’’

हसन को बाबा की बात पर बहुत दुख हुआ कि कितनी दया है उस के दिल में सब के लिए. फिर बोला, ‘‘बाबा, मेरे लिए कोई हुक्म?’’

‘‘बस, एक ठिकाना हो जाए तो मांबेटी जी लेंगी… तुम्हारी नजर में है कोई ऐसी जगह? किसी का कोई मकान?’’

हसन कुछ देर सोचता रहा. फिर बोला, ‘‘बाबा, अभी तो वही कमरा है जो आप ने अपने तंत्रमंत्र के कार्यों के लिए सोचा है… पर वहां तो आप को एकांत चाहिए न. और तो अभी कुछ समझ नहीं आ रहा है.’’

‘‘ठीक है, फिलहाल वहीं इंतजाम कर देते हैं मांबेटी का… थोड़े दिनों में कहीं और भेज देंगे. उस कमरे की चाबी मुझे दे दो, मैं आज ही मांबेटी को वहां ले जाता हूं.’’

हसन ने उसी समय घर से चाबी ला कर बाबा को दे दी. घर में अभी तक किसी को हसन के किराए के फ्लैट लेने की जानकारी नहीं थी.

अपने मूर्ख शागिर्द से बाबा को यही उम्मीद थी. वह औरत सायरा सचमुच बेवा थी, जिसे उस की चरित्रहीनता के कारण ससुराल वालों ने निकाल दिया था. बाबा और सायरा के सालों से प्रेमसंबंध थे. वह अब इधरउधर रिश्तेदारों के घर भटकने के बाद अचानक बाबा के पास ही आ गई थी.

बाबा ने उसी दिन सायरा और उस की बेटी अफशा को उस फ्लैट में पहुंचा दिया. अफशा थोड़ी पढ़ीलिखी थी पर मां की तरह ही पुरुषोंको रिझाने में माहिर.

अफशा को जब बाबा ने हसन से मिलवाया तो हसन खूबसूरत परी सी अफशा को देखता रह गया. सायरा पुरुषों की इस नजर से खूब वाकिफ थी. उस ने हसन की नजरों में अपने और अफशा का सुनहरा भविष्य देख लिया.

हसन जब चला गया तो दोनों मांबेटी खुल कर हंसी. सायरा ने कहा, ‘‘लो, संभालो इस हसन को अब. कुछ दिनों के लिए जिंदगी कुछ तो आसान होगी.’’

अफशा भी हंसी, ‘‘लग तो सही आदमी रहा था. बेचारा देखता ही रह गया.’’

‘‘हां, हमारे लिए तो सही आदमी ही था,’’ दोनों ने ठहाका लगाया.

बाबा अब मौका मिलते ही कमरे पर पहुंच जाते. सायरा के साथ वक्त बिताते. हसन अफशा की तरफ झुकता चला गया. उस ने उसे एक फोन भी ले दिया और कहा, ‘‘किसी भी चीज की जरूरत हो तो फोन कर देना.’’

हसन के आने की खबर होते ही सायरा घर से बाहर चली जाती. अफशा कोई भी बहाना कर देती थी, कभी काम ढूंढ़ने जाने का, तो कभी डाक्टर के पास जाने का.

एक दिन हसन ने अफशा के हाथ में अच्छीखासी मोटी रकम देते हुए कहा, ‘‘तुम्हें और तुम्हारी अम्मी को कभी परेशान होने की जरूरत नहीं है. मैं तुम लोगों का हमेशा ध्यान रखूंगा.’’

अफशा ने पूरे लटकेझटकों के साथ हसन को अपनी अदाओं का दीवाना बना लिया था.

एक बेटे का पिता, दूसरी भावी संतान के लिए मायके गई जोया को भूल वह अफशा की जुल्फों में बहकता चला गया. दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. घर वालों को उस की किसी हरकत की खबर नहीं थी.

एक दिन सना दोपहर में मायके आई तो आयशा घर का कुछ सामान लेने बाहर गई हुई थीं. हसन भी नहीं था. शौकत अली तो शाम तक ही आते थे. सना ने रूबी को गले से लगा कर खूब प्यार किया. हसन आ गया तो निगहत सब के लिए चाय बनाने चली गई. हसन को देख कर रूबी ने सना का हाथ जोर से पकड़ लिया. वह मुंह से अस्पष्ट आवाजें निकालते हुए सना से लिपट कर रोने लगी. रूबी बेचैन थी, डरी हुई थी. उस के हावभाव देख कर सना चौंक गई. रूबी कुछ अजीब सी आवाजें निकालती रही.

हसन ने सना को दुआसलाम किया, फिर रूबी को क्रोधित नजरों से देखा और ऊपर चला गया.

रूबी के सिर पर हाथ फेरते हुए सना ने पूछा, ‘‘क्या हुआ रूबी?’’

रूबी ने हसन की तरफ कुछ इशारे किए. सना के दिल को एक झटका सा लगा. पूछा, ‘‘हसन ने कुछ कहा?’’

रूबी ने ‘हां’ में सिर हिलाते हुए अपने शरीर पर कई जगह इशारे किए तो सना सब कुछ समझ गई और फिर गुस्से से सुलग उठी.

सना के सामने बात साफ थी कि भाई ने अपनी बीमार बहन का बलात्कार किया. सना का चेहरा गुस्से से तमतमा गया. उस ने तभी हिबा को फोन कर सब कुछ बताया और तुरंत आने को कहा.

आयशा और हिबा घर में लगभग एकसाथ ही घुसीं. हिबा का तमतमाया चेहरा देख कर आयशा हैरान हुईं, ‘‘क्या हुआ बेटा, इतने गुस्से में क्यों दिख रही हो?’’

हिबा ने उन के हाथ से सामान ले कर टेबल पर रखते हुए कहा, ‘‘आप हमारे कमरे में आएं, बाजी भी आई हैं.’’ आयशा सीधे कमरे में गईं. सना का चेहरा देख कर समझ गईं कि मामला गंभीर है. पूछा, ‘‘क्या हुआ सना? तुम लोग इतने गुस्से में क्यों हो?’’

सना ने तमतमाए चेहरे से बताना शुरू किया, ‘‘शर्म आ रही है हसन को भाई कहते हुए… आप को पता है उस ने क्या किया है?’’

आयशा चौंकी, ‘‘क्या किया उस ने?’’

‘‘उस ने अपनी बीमार, मजबूर, बड़ी बहन का बलात्कार किया है अम्मी,’’ कहते कहते क्रोध के आवेग में सना रो पड़ी.

आयशा को यह झटका इतना तेज लगा कि वे पत्थर के बुत की तरह खड़ी रह गईं. तभी तीनों को बाहर कुछ आहट सुनाई दी. तीनों ने पलट कर देखा तो हसन को बाहर जाते पाया. तीनों समझ गईं कि हसन ने पूरी बातें सुन ली हैं… वह जान गया है कि उस की पोल खुल चुकी है.

आयशा ने कहा, ‘‘शर्म आ रही है मुझे अपने ऊपर कि मैं अपनी बच्ची का ध्यान नहीं रख पाई.’’

शौकत अली औफिस से आए तो बेटियों को देख कर खिल उठे. दोनों के सिर पर हमेशा की तरह हाथ रख कर प्यार किया तो दोनों उन के गले लग कर सिसक उठीं.

वे चौंके. पूछा, ‘‘क्या हुआ बेटा, तुम लोग ठीक तो हो न? तुम्हारी ससुराल में सब ठीक तो हैं न?’’

सना ने रोते हुए कहा, ‘‘अब्बू, हम दोनों तो ठीक हैं पर रूबी…’’ और सना फिर रो पड़ी तो उन्होंने सोती हुई रूबी पर नजर डाली. फिर हिबा और आयशा को देखा तो वे दोनों भी रो रही थीं.

आयशा ने शौकत अली को इशारे से बाहर चलने के लिए कहा. बाहर आ कर आयशा बेगम ने रूबी के साथ हुए हादसे की

बात बताई. सुनते ही शौकत अली का खून खौल उठा, ‘‘कहां है वह? मैं उसे अब घर से निकाल कर ही रहूंगा… अब वह किसी भी हालत में इस घर में नहीं रहेगा.’’

आयशा ने उन्हें निगहत की मौजूदगी का एहसास करवाया तो वे अंदर बेटियों के पास गए और कहा, ‘‘तुम लोग बिलकुल परेशान न हों. उसे इस की सजा जरूर मिलेगी.’’

रशीद और जहांगीर के फोन आ रहे थे. अत: दोनों बहनें फिर आने की कह कर चली गईं.

जब से जोया गई थी, निगहत घर के काफी काम भी करने लगी थी. रूबी जब सोती

तो वह घर के कई काम निबटा देती थी. रूबी के जागने पर सिर्फ उस के साथ रहना ही उस का काम था. ‘यह हरकत हसन ने कब और कैसे करने की हिम्मत की होगी’, शौकत और आयशा सिर पकड़े यही बात सोच रहे थे.

हसन के लिए यह इतना मुश्किल भी नहीं रहा था. जब आयशा किसी काम से बाहर जाती थी, हसन किसी भी बहाने से, कुछ भी लेने के लिए निगहत को भी बाहर भेज देता था. निगहत भी बेफिक्र हो कर रूबी को भाई के पास छोड़ चली जाती थी, तब हसन रूबी के साथ बलात्कार करता था और चाकू दिखा कर उसे बहुत डरा धमका कर चुप रहने के लिए कहता था. उस के डर, उस के हावभाव देख कर आयशा चौंकती तो थीं पर इस का कारण उस की मानसिक अस्वस्थता ही समझी थीं. फिर रूबी हमेशा बहनों के ही ज्यादा करीब रही थी. अत: वह मां से अपना डर, अपना दर्द बता ही नहीं पाई.

उस रात किसी से खाना नहीं खाया गया. हसन रात 10 बजे घर वापस आया. रूबी सो रही थी. निगहत जा चुकी थी. शौकत ने उसे डांट कर बुलाया तो वह समझ गया कि उस से क्या कहा जाएगा. मांबहनों की पूरी बात सुन कर ही वह घर से निकला था. उस की करतूतों का पर्दाफाश हो चुका है, यह वह जानता था, फिर भी बेशर्मी से पिता के सामने आ डटा. पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

शौकत अली ने कहा, ‘‘हुआ क्या है, तुम्हें पता है? तुम इस घर से अभी इसी वक्त निकल जाओ. हमें तुम्हारे जैसे बेहया बेटे की जरूरत नहीं है.’’

‘‘मैं क्यों निकलूं? यह मेरा भी घर है, मुझे इस घर से कोई नहीं निकाल सकता. समझे आप?’’

आयशा ने एक थप्पड़ उस के मुंह पर मारा, ‘‘हसन, अभी निकल जाओ घर से. इस से ज्यादा तुम्हारी बेशर्मी अब नहीं देख सकते. जबान लड़ा रहे हो अब्बू से?’’

‘‘वह आप को देखनी पड़ेगी,’’ फिर अपनी जेब से एक चाकू निकाल कर दिखा कर बोला, ‘‘मैं आप सब को मार दूंगा एक दिन… मैं आप सब से नफरत करता हूं.’’

शौकत और आयशा को बेटे की इस हरकत ने जैसे पत्थर बना दिया. उन्हें अपनी आंखों, कानों पर यकीन ही नहीं हुआ.

शौकत अली ने गंभीर आवाज में कहा, ‘‘हसन, तुम ने जो किया उस की सजा तुम्हें जरूर मिलेगी. मुझ से अब कभी कोई उम्मीद न करना.’’

‘‘वह तो आप को करनी पड़ेगी वरना जो अंजाम होगा उस का आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते.’’

‘‘होने दो, तुम अकेले ही मेरी औलाद नहीं हो. अब मैं सब कुछ बेटियों में बांट दूंगा, मेरे लिए तुम आज से मर गए हो.’’

‘‘यह तो आप भूल ही जाएं, यह नामुमकिन है.’’

‘‘तुम ने जो कर्म किया है अब उस की सजा भुगतने के लिए तैयार रहो.’’

‘‘मैं नहीं, आप तैयार रहना, अपनी बेटियों को तो आप कुछ भी नहीं दे पाएंगे, सब मेरा है, मैं बेटा हूं इस घर का, हर चीज पर सिर्फ मेरा हक है,’’ कह हसन अपने रूम में चला गया और जोर से दरवाजा बंद कर लिया.

हसन अब अपना काफी समय अफशा के साथ ही बिताने लगा. अभी जेब में पैसे काफी थे. बाबा उस के बिजनैस की कामयाबी के लिए मनचाही रकम मांगता रहता था. कई बार हसन अफशा के पास आता तो बाबा उसे वहीं कुछ तंत्रमंत्र की चीजें करता दिखता तो वह खुश हो जाता.

आयशा काफी दिन तो उस से बहुत नाराज रहीं, फिर बेटे के मोह ने जोर मारा तो उस की गलतियां भूलने की कोशिश करने लगीं.

सना और हिबा उस की गैरहाजिरी में ही सब से मिल कर चली जाती थीं. रूबी के साथ हुआ हादसा भुलाने लायक तो नहीं था, पर समय का भी अपना एक तरीका होता है, कुछ बातों को छोड़ आगे बढ़ने का तरीका.

रूबी को संभला हुआ देख सब ने राहत की सांस ली पर भाई ने किस तरह बहन की आबरू से खिलवाड़ किया है यह बात सब को बड़ी तकलीफ देती थी. दोनों अपनेअपने शौहर को भी यह बात नहीं बता पाई थीं.

आगे पढ़ें- इसी बीच जोया ने बेटी को जन्म दिया. सब खुश हुए पर…

Lockdown 2.0: लॉकडाउन के साइड इफैक्ट्स, चौपट अर्थव्यवस्था

मोदी सरकार के रुख की वजह से आम बीमारियों से मरने वाले लोगों की भले ही संख्या कहीं अधिक हो चाहे आदमी कोरोनावायरस से ना आम बीमारियों से जरूर मर जाएगा.

असल में पूरी मेडिकल व्यवस्था पूरे देश में ठप कर दी गई है. सबसे बड़ी समस्या है कि अस्पतालों तक पहुंचने के लिए आम जनता के पास कोई साधन नहीं है.

एक साधारण आदमी इन जानलेवा बीमारियों से बचने के लिए जब तक अस्पताल पहुंच पाएगा .तब तक भयावह स्थिति में पहुंच चुका होगा.

एक बार की तरह मोदी सरकार के द्वारा हड़बड़ी में लिया फैसला लोगों की मुसीबत का कारण बन चुका है.

पहले जनता कर्फ्यू ,उसके बाद 21 दिन का लॉक बंदी और अब 3 मई तक का टोटल बंद.एक ऐसा मुद्दा है जिस पर खुलकर कोई बात नहीं करना चाहता. कभी-कभी तो ऐसा मालूम होता है कि और सब बीमारियां भी हमारी सरकार के जैसे इस नोबल वायरस से डर गयीं हों.

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सबसे ज्यादा प्रभावित कौन

इस लॉक बंदी के चक्कर में सबसे ज्यादा प्रभावित गरीबी रेखा के नीचे जीवन व्यापन करने वाला तबका है. जो रोज कमाता था और रोज खाता था .आज उसके भूखे मरने की नौबत आ चुकी है. भले ही बहुत सी राज्य सरकारें अपने राज्यों की आबादी के लिए मुफ्त राशन व्यवस्था कर रही हो ,या उन्हें कुछ नकद राशि मुहैया करा रही हो,जैसा कि केंद्र सरकार ने घोषणा भी की थी .लेकिन क्या वाकई जरूरतमंदों को राहत पहुंच पा रही है? कहीं यह महज घोषणा ही तो नहीं? भले ही मनरेगा योजना हो या प्रधानमंत्री किसान योजना ;हम सब जानते हैं इन योजनाओं की हकीकत! ना तो जरूरतमंद को पैसा ही पहुंच पाता है और ना ही राशन. बिल्कुल कोढ़ में खाज जैसी स्थिति है कि सभी वर्ग के ,आधार से अकाउंट लिंक होने की वजह से अधिकांश लोगों को तो इन योजनाओं का लाभ ही नहीं मिल पाता.

चौपट अर्थव्यवस्था

गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोग तो भुख मरी की ओर धकेल दिए जा चुके हैं.जो लोग सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल चलकर अपने गावों की ओर आए हैं, वहां उनके ठहरने की व्यवस्था नहीं है. खाने के साधन नहीं है.

लगभग 45 दिन से पूरे देश में कारोबार बंद होने से अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है. या कहे कि पूरी अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है और इसका सबसे ज्यादा असर इस गरीब वर्ग पर है.

पहले ही देश आर्थिक संकट से गुजर रहा था अब भयानक दौर है उससे भी ज्यादा बुरा हाल किसानों का है जिनकी रबी की फसल खेतों में तैयार खड़ी है. उन विचारों की स्थिति बड़ी विकट हो चुकी है. नाही फसल ऐसे में कट सकती है और ना ही उसका पूरा मूल मिल पाएगा पूरे देश में यातायात संकट के साथ-साथ अब तो खाद्य संकट भी पैदा हो चुका है.यदि फसलें नष्ट हो जाती हैं तो ऐसी स्थिति की गंभीरता को आप सब अच्छी तरह से समझ सकते हैं.पहले आर्थिक संकट के कुछ और कारण थे लेकिन इस तरह से पांच से छह हफ्तों के लिए पूरे देश का बंद पहली बार हुआ है.

मानसिक स्थिति पर असर

इस लॉक बंदी का हमारे समाज के ताने बाने और सभी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ा है .जिसके गंभीर परिणाम सामने आने लगे हैं. दरअसल इसकी एक वजह संघवाद और उपभोक्तावाद द्वारा पैदा किया गया माहौल है. लोग इस कोविड-19 वायरस से लड़ने के लिए मोर्चे पर लोगों को दुत्कार रहे हैं यह शायद उसी संघवाद महौल का परिणाम है.संघी फासीवाद और पूंजीपतियों को हो सकता है, इस लॉक डाउन से कुछ ना बिगड़े. लेकिन इसकी भारी कीमत कृषक वर्ग ,मजदूर वर्ग और मध्यम वर्ग को चुकानी पड़ेगी.

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lockdown: Mika Singh के साथ टाइम बिता रही हैं ये तलाकशुदा टीवी एक्ट्रेस, फैंस ने किया ट्रोल तो दिया ये जवाब

बौलीवुड के फेमस सिंगर मीका सिंह (Mika Singh) अक्सर अपने गानों के साथ-साथ पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में रहते हैं. इन दिनों मीका सिंह (Mika Singh सीरियल ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ फेम टीवी एक्ट्रेस चाहत खन्ना (Chahatt Khanna) के साथ डेटिंग की खबरों को लेकर छाए हुए हैं. हाल ही में lockdown के बीच दोनों क्वौलिटी टाइम बिताते नजर आए, जिसे लेकर फैंस ने एक्ट्रेस चाहत खन्ना को ट्रोल करना शुरू कर दिया है. वहीं अब एक्ट्रेस ने ट्रोलर्स को करारा जवाब दिया है. आइए आपको बताते हैं मीका से रिलेशन को लेरप एक्ट्रेस ने क्या कहा….

सोशल मीडिया पर वायरल हुईं फोटोज

टीवी एक्ट्रेस चाहत खन्ना  ने मीका सिंह के साथ कुछ फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर की थीं, जिसमें एक्ट्रेस और सिंगर मीका संग बेहद रोमांटिग अंदाज में नजर आए. वहीं इन फोटोज के साथ चाहत खन्ना ने कैप्शन में लिखा ‘लॉकडाउन में चलो किसी का क्वारंटाइन बनते हैं… हम दोनों ने इसी लिए एक दूसरे को ढूंढा… मैं इससे काफी काफी खुश हूं. दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर शेयर की गई फोटोज पर फैंस ने कंमेट्स करना शुरू कर दिया और एक्ट्रेस को ट्रोल करना शुरू कर दिया.

 

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Lets be someone’s quarantine, Glad we found each other in this lockdown #quarantinelove ❤️🌈 @mikasingh #learningmusic

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एक्ट्रेस ने दिया ये जवाब

 

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Twinning with 🖤 @mikasingh #quarantinelove #love #chahattkhanna

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एक्ट्रेस चाहत खन्ना ने मीका सिंह के साथ अफेयर की खबरों का खंडन करते हुए बताया कि ये दरअसल प्रमोशन का एक पार्ट है. हम दोनों मिलकर म्यूजिक वीडियो का प्रमोशन कर रहे थे. मैं बहुत जल्द मीका के साथ एक म्यूजिक वीडियो में नजर आने वाली हूं. इस म्यूजिक वीडियो का नाम ‘क्वारंटाइन लव’ है. यहीं वजह थी कि हम दोनों ने फोटो शेयर करते हुए कैप्शन लिखा.

 

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आपको बता दें, चाहत खन्ना और मीका सिंह एक दूसरे के पड़ोसी हैं. वहीं, चाहत खन्ना की पर्सनल लाइफ की बात करें तो साल 2018 में ही चाहत ने अपने पति फरहान मिर्जा से तलाक लिया था. लेकिन इसी बीच वह अपनी प्रैग्नेंसी को लेकर भी सुर्खियों में छाई थी. दरअसल चाहत खन्ना एक बच्चे की मां भी है, जो तलाक के बाद उनके साथ ही रहता है.

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#lockdown: कोरोनावायरस ले डूबा है बौलीवुड का बिजनेस, भविष्य और स्टाइल

कोरोना वायरस का संक्रमण एक ऐसी त्रासदी है, जैसी आक्रामक त्रासदी दुनिया ने पिछले पांच सौ सालों में पहले कभी नहीं देखी. ऐसा नहीं है कि कोरोना वायरस के संक्रमण के पहले दुनिया में महामारियां नहीं आयीं, लेकिन अब के पहले दुनिया में जितनी भी महामारियां आयी हैं, उनका कुछ निश्चित क्षेत्रों में ही असर हुआ है. मसलन ज्यादातर महामारियां बड़े पैमाने पर आम लोगों की जानभर लेती रहती हैं. लेकिन कोरोना महामारी ऐसी है जो न सिर्फ बड़े पैमाने पर लोगों को मार रही है बल्कि अब तक के तमाज जीवन जीने के ढंग पर सवालिया निशान लगा रही है और हमारी तमाम उपलब्धियों को अर्थहीन कर रही है या फिर उन्हें पूरी तरह से बदलने के लिए इशारा कर रही है. कहने का मतलब यह कि जब कोरोना महामारी दुनिया से जायेगी, तब तक दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी होगी और फिर लौटकर वैसी नहीं होगी, जैसी कोरोना संक्रमण के पहले थी.

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोरोना के संक्रमण से पूरी दुनिया में 1 लाख 5 हजार लोगों की मौत हो चुकी थी साथ ही करीब 16 लाख 50 हजार लोग पीड़ित थे, जिसका मतलब है कि अगर आज की तारीख में भी यह त्रासदी कहीं ठहर जाये तो भी इसके जाने के बाद इससे मरने वालों की गिनती 2 लाख के ऊपर पहुंचेगी. बहरहाल जहां तक महामारियों में लोगों के मरने की संख्या का सवाल है तो निश्चित रूप से पहले इससे भी कहीं ज्यादा लोग मरते रहे हैं, लेकिन जहां तक विभिन्न क्षेत्रों में इसके भयानक असर का सवाल है तो अब के पहले किसी भी महामारी का ऐसा असर किसी क्षेत्र में नहीं हुआ, जैसा असर फिलहाल कोरोना का दिख रहा है.

 

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बाॅलीवुड के फिल्मोद्योग को ही लें, अब के पहले की तमाम त्रासदियों ने कभी बाॅलीवुड को इस कदर नहीं झकझोरा जैसा कोरोना ने झकझोर दिया है. कोरोना के कहर ने बाॅलीवुड को पांच तरीके से झकझोरा है. सबसे पहले तो इसने उन बहुप्रतीक्षित फिल्मों का दिल तोड़ा है, जिन्होंने साल 2020 की पहली तिमाही में कमायी का इतिहास रचने का मंसूबा बना रखा था. जनवरी 2020 से मार्च 2020 के दूसरे सप्ताह तक जो बहुप्रतीक्षित फिल्में रिलीज हुई, उनमें एक बागी-3 को छोड़ दें, जिसने 109 करोड़ रुपये का बिजनेस किया तो तमाम दूसरी फिल्मों को अपनी लागत निकालना भी संभव नहीं हुआ. ‘लव आजकल’ जैसी फिल्म जिसके बारे में कहा जा रहा था कि 500 करोड़ रुपये का बिजनेस करेगी, वह 50 करोड़ रुपये का भी नहीं कर पायी. इरफान खान की बीमारी से लौटने के बाद उनके प्रशंसकों द्वारा बेसब्री से इंतजार की जा रही फिल्म ‘अंग्रेजी मीडियम’ भी अपनी लागत नहीं निकाल पायी, जबकि इसे भी 200 करोड़ रुपये तक बिजनेस करने वाली फिल्म माना जा रहा था.

एक आयुष्मान खुराना की ‘शुभमंगल ज्यादा सावधान’ ही ऐसी फिल्म रही जिसने इस तिमाही में अपनी 40 करोड़ रुपये की लागत के मुकाबले 62 करोड़ रुपये का बिजनेस करके 22 करोड़ रुपये का लाभ कमाया वरना कामयाब जैसी फिल्म तो तमाम प्रचार, प्रसार के बावजूद 2 करोड़ रुपये का बिजनेस भी बहुत मुश्किल से कर पायी, जबकि इस फिल्म को मीडिया में 5 में से 4.5 स्टार की रेटिंग मिली हुई थी. फिल्म में संजय मिश्रा, दीपक डोबरियाल तथा ईशा तलवार जैसे चेहरे थे, जिसका मतलब था कि फिल्म भरपूर मनोरंजन करने वाली होगी. ‘थप्पड़’ के आने के पहले भी उसकी खूब हवा बांधी गई थी, लेकिन फिल्म 30 करोड़ रुपये का बिजनेस भी नहीं कर पायी जबकि माना जा रहा है इसे बनाने में 75 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं.

 

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Cutie #taimuralikhan with dad #SaifAliKhan ❤❤❤❤😜 #happyeaster

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लेकिन यह कोई अकेला क्षेत्र नहीं है जिसे कोरोना संकट ने बहुत ज्यादा प्रभावित किया है. कोरोना के कहर के चलते न सिर्फ फिल्मों की बड़े पैमाने पर शूटिंग कैंसिल हुई बल्कि हर साल गर्मियों में होने वाले फिल्म सितारों के विदेशी टूर भी करीब करीब सब कैंसिल हो गये हैं. हर साल गर्मियों में बाॅलीवुड के चर्चित सितारे यूरोप और अमरीका के टूर पर जाते हैं. जहां वे खुद तो करोड़ों रुपये कमाते ही हैं, उनके बदौलत इंडस्ट्री के सैकड़ों लोगों को अच्छाखासा रोजगार मिलता है और कमायी होती है. एक अनुमान के मुताबिक हर साल बाॅलीवुड के सितारे गर्मियों के इस विदेशी टूर से 300 से 400 करोड़ रुपये की कमायी करते है, जो इस साल घटकर शून्य हो गई है. कमायी तो हुई ही नहीं साथ ही जो इन टूर के चलते बड़ी संख्या में लोगों को हिंदुस्तान की लू के थपेड़ों से राहत मिल जाती थी, वह भी इस साल नहीं होने वाला. क्योंकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक एक भी टूर शिड्यूल नहीं था और न ही इसकी कोई उम्मीद है.

 

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Here’s another fun banter of Karan Johar with his kids. #lockdownwiththejohars

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कोरोना वायरस का एक और बड़ा असर तमाम आने वाली फिल्मों की रिलीज पर पड़ा है. जो फिल्में आमतौर पर फरवरी के अंत या मार्च के दूसरे तीसरे सप्ताह में रिलीज होनी थी, उन सबकी रिलीज डेट अनिश्चितकाल के लिए बढ़ गई है. ‘लालसिंह चड्ढा’, ‘बह्मास्त्र’, ‘1983’, ‘जर्सी’, ‘राधे’ और ‘तख्त’ जैसी फिल्में कब रिलीज होंगी, फिलहाल इसका ठोस अनुमान किसी के पास नहीं है और जब रिलीज भी होगी तो क्या दर्शक उन्हें देखने आयेंगे, यह भी तय नहीं है. हां, इस त्रासदी ने फिल्मी सितारों को एक मायने में राहत दी है कि उनकी छोटी से छोटी गतिविधियों पर बाज की तरह आंख रखने वाले पपराजियों का इन दिनों कहीं दूर दूर तक अता पता नहीं चलता यानी ऐसे स्वतंत्र फोटोग्राफर जो हमेशा फिल्मी सितारों की एक्सक्लूसिव तस्वीरेें उतारने के फेर में सितारों के आगे पीछे मंडराया करते थे, अब वे पता नहीं कहां छिप गये हैं. कुल मिलाकर देखा जाए तो बाॅलीवुड की कोरोना संक्रमण ने कमर तोड़ दी है. अव्वल तो बहुत मुश्किल है कि अगले कुछ सालों तक फिल्म इंडस्ट्री फिर से पुराने ढर्रे पर लौट पाये, लेकिन जब लौटेगी तो भी वह पुरानी जैसी तो कतई नहीं होगी. कोरोना ने एक ऐसे उद्योग का समूचा रूप रंग बदलने के संकेत दे दिये हैं, जिस उद्योग पर कभी किसी का बस नहीं चलता था.

#lockdown: …ताकि वर्क फ्रौम होम मजबूरी नहीं, बने आपकी मजबूती

जीवन जीने के तौर तरीकों में क्रांतियां कई तरीकों से होती हैं. कभी देखादेखी, कभी सुनियोजित अनुकरण से और कभी परिस्थितियों के कारण. 1987-88 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटर को कामकाज का हिस्सा बनाने के लिए बहुत लड़ाई लड़ी थी. ट्रेड यूनियनों से लेकर आम कामगारों द्वारा उन्हें और उनकी सरकार को उन दिनों दफ्तरों में कंप्यूटर की घुसपैठ कराने वाले खलनायक के रूप में चिन्हित किया जाता था. लेकिन 20 साल बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी की उस कंप्यूटर क्रांति ने देश की अर्थव्यवस्था का नक्शा बदल दिया. भारतीय युवाओं की यह कंप्यूटरी क्षमता ही थी, जिसके कारण 21वीं सदी में भारत दुनिया की मानव संसाधन सम्पदा का हब बनकर उभरा. आज हर साल देश में 73 अरब डालर से भी ज्यादा जो विदेशी मुद्रा भारतीय कामगारों द्वारा लायी जा रही है, उसमें सबसे बड़ा योगदान कंप्यूटर में पारंगत भारतीयों का ही है.

करीब 30 साल बाद आज फिर भारत एक नयी तरह की कामकाजी क्रांति की दहलीज पर खड़ा है. कामकाज की यह नयी शैली है, ‘वर्क फ्राम होम’. भले अचानक बड़े पैमाने पर देश में इसका आगमन कोरोना त्रासदी के चलते हुआ हो, लेकिन अगर यह कोरोना संकट न भी आया होता तो भी अगले कुछ सालों में इसे अपनी जगह बनानी ही थी. यह अलग बात है कि तब यह धीरे-धीरे अपनी जगह बनाता, लेकिन आज एक झटके में हिंदुस्तान के करीब 10 से 12 करोड़ विभिन्न क्षेत्रों के कामगार इस समय वर्क फ्राम होम कर रहे हैं. इनमें चाहे वे बड़े प्रोफेशनल, सीईओ हों या फिर साधारण क्लर्क या सामान्य डाटा विजुलाइजर. कोरोना वायरस के विश्वव्यापी संक्रमण ने अचानक जिस शब्द को सबसे ज्यादा लोकप्रिय बनाया है, वह यही शब्द है- वर्क फ्राम होम. भले अभी ज्यादातर भारतीय इसके आदी न हुए हो, लेकिन एक साधारण अनुमान है कि हर दिन करीब 2000 करोड़ रुपये का काम इन दिनों घर में बैठे लोगों द्वारा किया जा रहा है. लेकिन यह वास्तव में ई-कामर्स की बहुत बड़ी दुनिया एक बहुत मामूली सा हिस्सा है.

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आज हर साल दुनिया में 4.88 ट्रिलियन डालर का कारोबार ई-कामर्स के जरिये होता है. एक ट्रिलियन 1 लाख करोड़ का होता है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था में ई-कामर्स की कितनी बड़ी भूमिका है. ई-कामर्स के लिए बड़े बड़े गगनचुंबी दफ्तरों की जरूरत नहीं पड़ती, इसे आप दुनिया के किसी कोने में बैठे हुए, चाहे तो वह आपका घर हो, चाहे समुद्र का किनारा, चाहे पार्क या हरे भरे खेतों के बीच मेड़. आप ई-कामर्स कहीं से भी कर सकते हैं. दूसरे शब्दों में ई-कामर्स में वर्क फ्राम होम की सबसे सहज स्थितियां पैदा की हैं. जहां तक भारत में सालाना ई-कामर्स के टर्नआउट की बात है तो साल 2015 में वह 24 बिलियन डालर था, जो अब करीब 54 बिलियन डालर के आसपास है.

कहने का मतलब यह कि दुनिया का बड़े पैमाने पर कारोबार ई-कामर्स में बदल गया है, इस स्थिति में वर्क फ्राम होम एक अनिवार्य कामकाजी शैली के रूप में उभरी है. भले इसने हमारे यहां अभी एक त्रासदी के चलते जगह बनायी हो, लेकिन अगर दुनिया में कोरोना जैसी त्रासदी न आती और भारत उससे इस तरह प्रभावित न होता तो भी कुछ सालों में यही स्थिति होनी थी. कहने का मतलब यह कि भले वर्क फ्राम होम इन दिनों कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते भारतीय कामकाजी जीवन का अभिन्न हिस्सा बना हो, लेकिन अब यह लौटकर वापस नहीं जाने वाला. हां, जब कोरोना का संकट पूरी तरह से खत्म होगा तो एक बार इसके मौजूदा दायरे में तात्कालिक रूप से तो थोड़ी कमी आयेगी, लेकिन जल्द ही यह कमी दुगने वेग से अपना आकार बढ़ा लेगी. वर्क फ्राम होम किसी भी वजह से हमारी कामकाजी जिंदगी का हिस्सा बना हो, लेकिन अब यह स्थायी हिस्सा बन चुका है.

चूंकि फिलहाल एक त्रासदी के चलते वर्क फ्राम होम हम सब भारतीयों की जिंदगी का हिस्सा बन गया है, लेकिन जैसे ही यह त्रासदी कम होगी, तो आज के तौरतरीकों वाला वर्क फ्राम होम नहीं रहेगा बल्कि जल्द ही वह अपने बेहतर नतीजे और परफोर्मेंस की तरफ बढ़ेगा. क्योंकि कोरोना त्रासदी के बाद लोग मजबूरी में वर्क फ्राम होम नहीं करेंगे बल्कि अपने कामकाजी क्षमताओं को मजबूती देने के लिए लोग वर्क फ्राम होम का चुनाव करेंगे. यकीन मानिये कोरोना संकट खत्म होने के बाद भी वर्क फ्राम होम की कल्चर नहीं जाने वाली. अब यह हिंदुस्तान में एक स्थायी वर्किंग कल्चर के रूप में रहने वाली है. सवाल है आने वाले दिनों में जब वर्क फ्राम होम की यह संस्कृति स्थायी कामकाजी संस्कृति बनने जा रही है तो क्यों न हम इस संकट के समय जबकि वर्क फ्राम होम हमारी मजबूरी है, इसे इस तरह से जाने और सीखें कि भविष्य में वर्क फ्राम होम हमारी मजबूरी नहीं मजबूती बन जाए.

वैसे तो जब तक हमारे यहां वर्क फ्राम होम की सुविधा नहीं थी, तब तक यह सुविधा बहुत रोमांचक लगती थी. हम सब जो इसकी जटिलता से परिचित नहीं थे, यही लगता था कि अगर हमें रोज रोज दफ्तर जाने की बाध्यता न हो तो हमारे पास न सिर्फ अपने काम के लिए समय ज्यादा होगा बल्कि कई और औपचारिकताओं से मुक्त होने के चलते हमारे पास कहीं ज्यादा क्वालिटी परफोर्मेंस का अवसर होगा. लेकिन अब चूंकि बड़े पैमाने पर अचानक वर्क फ्राम होम की सुविधा हमें मिल गई है तो हम यह महसूस करने लगे है कि अब तक हम वर्क फ्राम होम की जिन बातों को लेकर खुश होते थे, वे उतनी ही खुशदायक बातें नहीं हैं.

बहरहाल कहने का मतलब यह है कि घर से कामकाज करने का मतलब यह कतई नहीं है कि आप पर परफोर्मेंस का कोई तनाव व दबाव नहीं होगा और न यह कि आप किसी भी तरह से काम कर सकते हैं (मसलन वर्क फ्राम होम का कई लोग मतलब यह निकालते हैं कि चाहे तो हम कच्छा बनियान में और अपने बेडरूम में लेटे हुए काम कर सकते हैं, जो कि सही नहीं है). इस सबके बावजूद अगर हम कुछ सजगताओं को बरतें तो वर्क फ्राम होम सचमुच हमारे लिए आनंदायक भी हो सकता है, ज्यादा संतुष्टदायक भी हो सकता है और सामान्य परर्फोर्मेंस से ज्यादा हम परफोर्मेंस भी दे सकते हैं. बशर्ते इसके लिए हम

कुछ ये तरीके अपनाएं-

– हम नियमित और अनुशासित ढंग से अपने कामकाज की वैसे ही शुरुआत करें जैसे पारंपरिक दफ्तर में करते हैं.

– इसके लिए हमें सामान्य रूप से दफ्तर जाने के अनुसार ही सुबह जल्दी उठना चाहिए, उसी तरह तैयार होना चाहिए जिस तरह हम दफ्तर के लिए तैयार होते हैं और हमने घर में जिस जगह अपने काम के लिए टेबल चेयर लगायी है, वहां उसी तरीके से बैठकर काम करना चाहिए.

– वर्क फ्राम होम का मतलब यह नहीं है कि सुबह देर तक सोएं फिर घंटों तक चाय पीते हुए अखबार पढ़ें और बाद में देर हो जाने के नाम पर बिना नहाये धोये, बिना नियमित दफ्तरी कपड़े पहने, अपने कुर्सी में आ धंसे और काम शुरु कर दें.

– न सिर्फ हमें अपनी नियमित दिनचर्या की शुरुआत दफ्तर में करने वाले काम की तरह से करनी चाहिए बल्कि हमें दफ्तर की ही तरह हर दिन एक तय जगह में जो कि साफ सुथरी हो, भरपूर प्रकाश वहां आता हो और शोर शराबा या दूसरों द्वारा डिस्टर्ब न किया जा सकता हो. ऐसी जगह से काम करना चाहिए.

– हमें हर दिन सुबह अपने आपको बास की तरह टारगेट देना चाहिए और कर्मचारी की तरह उस टारगेट को पूरा करने के लिए जी जान लगा देना चाहिए.

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– हर दिन उतनी ही देर तक काम करना चाहिए,जितनी देर तक दफ्तर में काम करते हैं, न उससे बहुत कम और न उससे बहुत ज्यादा.

– इसके साथ ही अगर हम अपने वर्क फ्राम होम के परफोर्मेंस को बढ़ाना चाहते हैं तो हमें उन तमाम जरूरी उपकरणों की भी व्यवस्था करनी चाहिए, जिन्हें वर्क फ्राम होम का इंफ्रास्ट्रक्चर कहते हैं. मसलन तेज रफ्तार वाईफाई, उच्च क्षमता का वेब कैम, हाटस्पोट, एक्सर्टनल की-बोर्ड, सेंसर वाला माउस तथा हैड फोन ताकि हम अपने लैपटाप या डेस्कटाप में बिना बाधित हुए काम कर सकें.

अगर इन तमाम जरूरतों को हम पूरा करते हैं तो कोई शक नहीं है कि हम वर्क फ्राम होम में दफ्तर जाने से ज्यादा और क्वालिटी का काम कर पाएंगे.

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अगर आप अपनी फैमिली के लिए चौकलेट की कुछ रेसिपी ट्राय करने की सोच रही हैं तो आज हम आपको चौकलेट की कुछ रेसिपी बताएंगे…

हमें चाहिए

1 कप डार्क चाकलेट

1 कप मिल्क चाकलेट

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घर में उपलब्ध बिस्किट संतरा, काजू, अखरोट, बादाम और चेरी

8-10 टूथपिक.

विधि-डार्क चाकलेट और लाइट चाकलेट को माइक्रोबेव में 1-1 मिनट पर चलाते हुए पिघलाकर अच्छी तरह चलाएं. अब फ्रिज में बर्फ जमाने वाली ट्रे में एक चम्मच से पिघली चाकलेट डालें. उपर से टूटे बिस्किट, संतरे के टुकड़े और मेवा में से जो भी आपके पास उपलब्ध हैं उन्हें डालकर साइड में टूथपिक लगाकर फ्रिज में आधा घंटे के लिए सेट होने रख दें. आधे घंटे बाद निकालकर सर्व करें.

नोट-यदि आपके पास माइक्रोबेव नहीं है तो एक कड़ाही में पानी गर्म करें, बीच में एक प्लेट या स्टैण्ड रखें. अब एक कटोरे में दोनों चाकलेट डालकर इस स्टैण्ड पर रखें लगातार चलाते हुए पूरी तरह एकसार होने तक चलाएं.

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इंटरसिटी एक्सप्रैस: भाग-3

आज घर में बड़ी रौनक थी. प्रेम की प्यारी बिटिया अनुभा का ब्याह जो था. पूरा घर दुलहन की तरह सजा था. प्रेम ने भव्य पंडाल लगवाया था. शहर से ही शहनाई वालों और कैटरिंग वालों की व्यवस्था की थी. बरात शाम को शहर से आने वाली थी. बरात के रास्ते पर भव्य स्वागत द्वार लगाए गए थे. फूलों की महक ने पूरे महल्ले को महका दिया था. सुबह से ही मंगल ध्वनि माहौल को सुमधुर बना रही थी. प्रेम सारी तैयारियों से संतुष्ट था. हफ्ते भर से शादी की भागदौड़ में लगा हुआ था, इसलिए थकान के मारे उस का शरीर टूट रहा था. थोड़ा दम लेने के लिए वह पंडाल के एक कोने में पड़ी कुरसी पर पसर गया, तो एक फ्लैशबैक फिर उस की आंखों के सामने घूम गया. मधु के साथ इंटरसिटी ऐक्सप्रैस में आना. फिर मधु का दूर जाना और फिर मिलना. अनुभा का बचपन, उस की किलकारियां. अनुभा की शादी होने का वक्त आया तो बिटिया की विदाई के बारे में सोचसोच कर प्रेम की रुलाई थामे न थमती थी. प्रेम ने अपना चेहरा हाथों से ढक लिया. तभी उस के कानों ने कुछ सुना. कोई किसी को बता रहा था कि अनुभा का असली पिता प्रेम न हो कर दीपक है. प्रेम तो अनुभा का सौतेला पिता है. प्रेम ने बाएं मुड़ कर देखा, तो मधु का पहला पति दीपक सजेधजे कपड़ों में लोगों से बात कर रहा था. इसे यहां किस ने बुलाया? सोचते हुए प्रेम क्रोध के कारण कांपने लगा. तभी उस ने देखा कि दीपक मधु के पास चला गया. प्रेम ने मधु के चेहरे को गौर से देखा. उसे लगा कि आज मधु के चेहरे पर अपने तलाकशुदा पति दीपक के लिए पहले जैसी घृणा नहीं थी. क्या मधु ने ही आज दीपक को यहां बुलाया है? यह सोचते हुए प्रेम का दिल बैठ गया. दीपक के साथ खड़ा आदमी शायद सभी मेहमानों को यही बता रहा होगा कि अनुभा का असली पिता दीपक है.

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प्रेम पंडाल की ओट में बैठा दुनिया का सब से गरीब आदमी हो गया. सौतेला शब्द उसे कांटों की तरह चुभ रहा था. पहली बार उसे जीवन का यथार्थ अनुभव हुआ. सही तो है, है तो वह सौतेला पिता ही… उस की आंखों में व्यथा की पीड़ा उभर आई. उस ने पंडाल के उस कोने से देखा कि शादी की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. सब लोग अपने में व्यस्त हैं और अब किसी को भी उस की जरूरत नहीं है. प्रेम आहिस्ता से उठा और भारी कदमों से बाहर की ओर चल दिया. कई लोगों ने उसे टोका परंतु प्रेम जैसे अपनी ही दुनिया में था. ‘कन्या के पिता को बुलाइए,’ शादी करा रहे पंडित ने कहा तो दीपक दांत निकाले आगे की ओर आ गया. अनुभा ने घूंघट की ओट से दीपक को देखा तो वह चौंक उठी. ‘‘हरगिज नहीं,’’ अनुभा गरजी, ‘‘तुम मेरे पिता नहीं हो.’’ दीपक बेशर्मी से हंसते हुए बोला, ‘‘बिटिया, मां ने बताया नहीं कि मैं ही तुम्हारा…’’ दीपक का वाक्य समाप्त होने से पहले ही अनुभा अपनी जगह पर खड़ी हो गई. ‘‘बब्बा,’’ उस ने जोर से आवाज लगाई पर कोई उत्तर न पा कर विवाह स्थल से आगे निकल आई. मधु और अन्य लोगों ने अनुभा को रोका और प्रेम की खोजखबर ली जाने लगी. एक दरबान ने बताया कि उस ने प्रेम को पंडाल से बाहर जाते हुए देखा है. मधु और अनुभा एकदूसरे को देखने लगे. मन के तारों ने एकदूसरे की व्यथा को ताड़ने में देरी नहीं की. दीपक ने कुछ कहने की कोशिश की पर अनुभा और फिर मधु ने दीपक को विवाह स्थल से बाहर जाने का आदेश दिया. दीपक ने देखा कि कुछ लोग आस्तीन चढ़ाए उस के पीछे खड़े हो गए हैं, तो उस ने रुखसत होने में ही खैरियत समझी.

अनुभा ने अपना सुर्ख लहंगा संभाला और पंडाल के बाहर दौड़ चली. मधु भी अनुभा के पीछेपीछे ‘अनुभा…अनुभा’ आवाज लगाते हुए दौड़ पड़ी. फिर तो जैसे पूरा कुनबा ही दौड़ चला. दलहन के शृंगार में सजी अनुभा तेजी से रास्ते पर दौड़ रही थी. उस के पीछे मधु और बाकी मेहमान, नौकरचाकर सब दौड़ रहे थे. अनुभा बस दौड़ी चली जा रही थी. उसे पता था कि उस के बब्बा कहां होंगे. बब्बा, उस के प्यारे बब्बा, केवल उस के बब्बा. स्टेशन करीब आया तो उस ने देखा कि प्लेटफौमर्न नंबर 1 पर इंटरसिटी ऐक्सप्रैस आने को थी. डिस्प्ले बोर्ड ने डब्बों की पोजिशन दिखाना शुरू कर दिया था और यात्रियों की भीड़ ट्रेन की प्रतीक्षा कर रही थी. इसी प्लेटफौर्म के एक कोने में एक बूढ़ा आदमी अपने घुटनों में सिर छिपाए बैठा था. अचानक उसे लगा कि उसे कोई पुकार रहा है. भला कौन है उस का जो उसे पुकारेगा? सोच कर उस ने धीरेधीरे अपना सिर ऊपर उठाया तो देखा कि सामने अनुभा व मधु थीं. बूढ़े व्यक्ति ने सपना समझ कर अपनी आंखें बंद कर लीं.

भागती हुई अनुभा बब्बा के पैरों में गिर पड़ी, ‘‘बब्बा, कहां चले गए थे मुझे अकेला छोड़ कर…?’’ अनुभा रोते हुए बोली, ‘‘आप ही मेरे पिता हैं, चाहे कोई कुछ भी कहे.’’ प्रेम अपनेआप को समेटते हुए थरथराती आवाज में बोला, ‘‘बिट्टो, मैं तेरा पिता नहीं हूं.’’ अनुभा, प्रेम के चेहरे को अपने हाथों में लेते हुए बोली, ‘‘बब्बा, मन का नाता एक दिन में नहीं मिटता. और फिर आप का और मेरा तो जन्मों का नाता है.’’ प्रेम और कुछ कहने को हुए, लेकिन अनुभा ने प्रेम के होंठों पर हाथ रख दिया. मधु भी हांफते हुए कह उठी, ‘‘भला कोई ऐसे जाता है. बेटी की शादी को बीच में छोड़ कर… आप के सिवा हमारा और है कौन इस दुनिया में?’’ प्रेम ने मधु की ओर देखा, जो उस के आंसुओं ने प्रेम के सारे शिकवों को बहा दिया. मधु के पीछेपीछे आए सारे लोग थोड़ी दूर रह कर यह नजारा देख रहे थे. तभी इंटरसिटी ऐक्सप्रैस का इंजन बिलकुल अनुभा और प्रेम के पास आ कर रुका. दुलहन के रूप में अनुभा को देख कर ट्रेन के ड्राइवर ने नीचे उतर कर अनुभा के सिर पर अपना हाथ रख दिया और बोला, ‘‘कितनी बड़ी हो गई बिटिया, अभी कल की ही बात है जब बब्बा की गोद में बैठी हम सब को टाटा किया करती थी.’’ ड्राइवर की बातों ने सब की आंखों को और भी नम कर दिया. इंजन ने हौर्न दिया तो ड्राइवर पुन: इंजन पर चढ़ गया. इंटरसिटी ऐक्सप्रैस फिर कुछ जिंदगियों में हलचल मचा कर चल दी थी. ट्रेन के अंदर से यात्री और प्लेटफौर्म पर अनुभा, मधु और प्रेम हाथ हिला रहे थे. माहौल फिर खुशगवार हो रहा था.

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सावधान! किराना स्टोर बन सकते हैं कोरोना कहर के सारथी

जिस समय मैं ये पंक्तियां लिख रही हूं हिंदुस्तान में लाॅकडाउन का 19वां दिन चल रहा है. लेकिन यह तालाबंदी अकेले हिंदुस्तान में नहीं है, करीब-करीब आधी से ज्यादा दुनिया इन दिनों तालाबंदी का शिकार है. इसके पीछे एक ही मकसद है कि किसी तरीके से कोरोना के कहर का दुष्चक्र टूट जाए. कोरोना की एक बार श्रृंखला टूटे तो फिर से सामान्य जिंदगी लौटे. यूं तो तालाबंदी एक अच्छा जरिया है, सोशल डिस्टेंसिंग का. लेकिन कहीं पर अज्ञानता के चलते और कहीं पर मजबूरी के चलते तालाबंदी वैसी नहीं हो पा रही, जैसी होनी चाहिए या जिस तरह की तालाबंदी से हम कोरोना के कहर को धूमिल करने की उम्मीद कर सकते हैं.

दरअसल तालाबंदी को कमजोर करने में सिर्फ हमारे योजनाबद्ध षड़यंत्र ही नहीं शामिल, हमारी नासमझ और जीवन जीने के बेफिक्र तरीके भी इसमें मददगार हैं. मसलन हिंदुस्तान में मुहल्लों के किराना स्टोरों को लें. हम आम हिंदुस्तानियों के खरीद फरोख्त का जो अब तक का स्वभाव रहा है, वह न सिर्फ बहुत बेफिक्र बल्कि अनुशासनहीन भी रहा है. चूंकि इन दिनों अधिकांश हिंदुस्तानी लाॅकडाउन और कफर््यू के चलते घरों के अंदर हैं. लोग बस जरूरी चीजों की खरीदारी के लिए ही बाहर निकलते हैं, इन्हीं जरूरी चीजों में राशन, दवाईयां, दूध और सब्जियां शामिल हैं. दुनिया के दूसरे देशों में तो ये सब चीजें भी ग्राहकों के दरवाजे तक पहुंचायी जा रही हैं. लेकिन हिंदुस्तान में अभी भी जहां कर्फ्यू नहीं लगा, सिर्फ लाॅकडाउन है वहां ये तमाम चीजें लोगों को खुद दुकानों से लेने जाना पड़ रहा है.

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यही वो गतिविधियां हैं जहां तालाबंदी और कर्फ्यू भी बेअसर हो सकता है. क्योंकि हम आम हिंदुस्तानी सोशल डिस्टेंसिंग को ईमानदारी से पालन नहीं करते. दरअसल हमारे पास इस तरह की आदत का पहले से कोई ठोस इतिहास नहीं है. हिंदुस्तान में करीब 1 करोड़ 2 लाख छोटे मोटे रोजमर्रा की जरूरी चीजें बेचने वाले स्टोर हैं, जिन्हें हम किराना स्टोर या जनरल स्टोर के नाम से जानते हैं. इनकी परिभाषा ये है कि इनमें आमतौर पर खाने पीने और रोजमर्रा के घरेलू इस्तेमाल की चीजें मिलती हैं. आमतौर पर 100 में करीब 97 फीसदी इनके मालिक और यहां काम करने वाले कर्मचारी एक ही होते हैं यानी ये सब एक ही घर के लोग होते हैं. कुछ छोटे किराना स्टोर में एक से दो और थोड़े से बड़े स्टोर में दो से ज्यादा कर्मचारी होते हैं. इन मुहल्लों में मौजूद किराना स्टोर्स का न सिर्फ ग्राहकों के साथ डील करने का तरीका, घरेलू और परिचितों जैसा होता है बल्कि ग्राहकों के साथ सामान देने और पैसे देने में भी ये जरा सी औपचारिकता का बर्ताव नहीं करते.

यह स्थिति भले बाकी समय के लिए भारतीय समाज के गहरे अपनत्व और अनौपचारिकता का बयान करे, लेकिन फिलहाल तो इस तरह का व्यवहार भारत में कोरोना संक्रमण के खतरनाक हो जाने का सबब बन सकता है. इसके कई ठोस कारण हैं. दरअसल हमारे मुहल्ले के किराना स्टोरों में तमाम चेतावनी के बावजूद भी सामान देने वाले और सामान लेने वाले के बीच चार पांच फिट का फासला नहीं रहता, जैसा फासला रखने की इन दिनों हर संभव तरीके से हिदायत दी जाती है. चूंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से 10 मिनट के दौरान ही कई सौ लोग इस वायरस से पीड़ित हो सकते हैं यानी उन तक वायरस का संक्रमण हो सकता है. इसलिए हिंदुस्तान में हर मुहल्ले में मौजूद इन किराना स्टोरों के कामकाज के तौर तरीके पर न सिर्फ सख्ती से सोशल डिस्टेंसिंग के फार्मूले को अपनाये जाने की जरूरत है बल्कि किराना स्टोर के लोगों और ग्राहकों के बीच के व्यवहार को भी बदले जाने की जरूरत है.
जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं कि भारत में किराना स्टोरों का बहुत सघन जाल है. लगभग हिदुस्तान की 99.99 फीसदी आबादी इन किराना स्टोरों की जद में आती है. हर आम भारतीय सामान्य दिनों में औसतन एक महीने में 10 बार किसी किराना स्टोर जाता है. यहां तक कि जो लोग तमाम सामान महीनेभर का इकट्ठा लेते हैं, वो भी किसी न किसी काम के चलते कई बार किराना स्टोर जाते रहते हैं. इन दिनों चूंकि बार बार आशंका पैदा हो रही है कि पता नहीं कितने दिनों तक तालाबंदी की आंख मिचैली जारी रहेगी, इसलिए लोग डरकर जल्दी जल्दी किराना स्टोर पहुंच रहे हैं. यूं तो किराना स्टोर में ग्राहकों के साथ कैसे डील किया जाये, सरकारों की तरफ से इसकी कई एडवाइजरी जारी हुई हैं. लेकिन रातोंरात लोगों की जीवनशैली और उनके व्यवहार के तरीकों में बदलाव नहीं होता. यही वजह है कि तमाम चेतावनियों के बावजूद लोग किराना स्टोरों में जरूरी सोशल डिस्टेंस नहीं बना पा रहे.

आमतौर पर किराना स्टोरों में उसका मालिक ही सौदा देता है और वही कैशियर की भूमिका भी अदा करता है. बिल अदा करने की प्रक्रिया में ग्राहक और किराना स्टोर के मालिक के बीच फासला बहुत कम रह जाता है. चूंकि ऐसा व्यक्ति हर किसी के दिये गये रुपयों को हाथ से गिनकर सुनिश्चित करता है कि वो सही हैं या नहीं. इस क्रम में वह न सिर्फ रुपयों को उलट पलटकर हाथ लगाता है बल्कि अपने ग्राहक के भी हाथों के साथ उसका जाने अंजाने स्पर्श हो ही जाता है. ऐसे में अगर कोई भी ग्राहक जिसे कोरोना का संक्रमण हो और खुद उसे भी पता न हो जिसके नतीजे के रूप में यह किराना स्टोर के मालिक को लग जाये तो फिर वह अकेले ही दर्जनों क्या सैकड़ों लोगाों को संक्रमित कर सकता है. इसलिए न सिर्फ किराना स्टोर में सख्ती से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाना चाहिए बल्कि इन दिनों गांव में लगने वाले सप्ताहिक बाजारों में भी बहुत सावधानी बरती जानी चाहिए.

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शहरों में चूंकि पुलिस लगातार गश्त लगा रही है, इसलिए शहर मे ंलोग पुलिस के डर से फिर भी थोड़ा बहुत सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन भी करते हैं, गांव में यह बिल्कुल नहीं हो पा रही. ऐसी कई रिपोर्टें पिछले दिनों अलग अलग इलाकों से मीडिया की सुर्खियां बनी हैं. बहरहाल किराना स्टोर भारत में कोराना फैलाने के सबसे बड़े केंद्र बनकर न उभरें इसलिए किराना स्टोर वालों को यह करना चाहिए कि वे अपने स्टोर के बाहर एक घड़ा, बाल्टी या लेटर बाॅक्स रखें और लोगों से कहें कि वे अपनी जरूरत के सामान की लिस्ट बनाकर और उसमें अपना फोन नंबर लिखकर डाल दें और अपने घर जाएं. जैसे ही किसी का सौदा निकालकर इकट्ठा किया जायेगा तो उन्हें फोन किया जायेगा कि वे अपनी चीजें आकर ले जाएं. इससे ग्राहकों को दुकान के बाहर खड़े रहने या भीड़ लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. साथ ही साथ जब किसी को फोन करके कहा जायेगा कि वो अपना सौदा ले जाएं तो उन्हें उसी समय यह भी बता दिया जायेगा कि इतने का बिल है तो सौदा लेने वाला व्यक्ति बिल के पूरे पैसे बनाकर लायेगा और चेंज का भी चक्कर नहीं रहेगा. लेकिन अगर चेंज पैसे नहीं होंगे तो भी ग्राहक से कहा जाना चाहिए कि वो कितने का नोट लेकर आयेगा, उसी के हिसाब से पहले से ही पैसे की व्यवस्था करके रखंे. कहने का मतलब इतना है कि जो किराना स्टोरा कोरोना संक्रमण फैलने के सबसे नजदीकी स्रोत हो सकते हैं, उनसे सजग होकर ही बचना होगा.

इंटरसिटी एक्सप्रैस

प्रयास: भाग-2

उन्होंने मुझे अपनी बांहों में भरते हुए कहा, ‘‘हमारे लिए यह सब से बड़ी खुशी की बात है, श्रेया. इस बात पर तो मिठाई होनी चाहिए भई,’’ और फिर मेरा माथा चूम लिया. उस रात काफी वक्त के बाद अपने रिश्ते की गरमाहट मुझे महसूस हुई. उस रात पार्थ कुछ अलग थे, रोजाना की तरह रूखे नहीं थे.

मुझे तो लगा था कि पार्थ यह खबर सुन कर खुश नहीं होंगे. हर दूसरे दिन वे पैसे की तंगी का रोना रोते थे, जबकि हम दोनों की जरूरत से ज्यादा पैसा ही घर में आ रहा था. उन की इस परेशानी का कारण मुझे समझ नहीं आता था. उस पर घर में नए सदस्य के आने की बात मुझे उन्हें और अधिक परेशान करने वाली लगी. लेकिन पार्थ की प्रतिक्रिया से मैं खुश थी, बहुत खुश.

ऐसा लगता था कि पार्थ बदल गए हैं. रोज मेरे लिए नएनए उपहार लाते. चैकअप के लिए डाक्टर के पास ले जाते, मेरे खानेपीने का वे खुद खयाल रखते. औफिस के लिए लेट हो जाना भी उन्हें नहीं अखरता. मुझे नाश्ता करा कर दवा दे कर ही औफिस निकलते थे. अकसर मेरी और अपनी मां से मेरी सेहत को ले कर सलाह लेते.

मेरे लिए यह सब नया था, सुखद भी. पार्थ ऐसे भी हो सकते हैं, मैं ने कभी सोचा नहीं था. उन का उत्साह देख कर मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता.

‘‘मुझे तुम्हारी तरह एक प्यारी सी लड़की चाहिए,’’ एक रात पार्थ ने मेरे बालों में उंगलियां घुमाते हुए कहा.

‘‘लेकिन मुझे तो लड़का चाहिए ताकि ससुराल में पति का रोब न झेलना पड़े,’’ मैं ने उन्हें छेड़ते हुए कहा.

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‘‘अच्छा… और अगर वह घरजमाई बन बैठा तो?’’ पार्थ के इतना कहते ही हम दोनों खिलखिला कर हंस पड़े.

‘‘मजाक तक ठीक है पार्थ, लेकिन मांजी तो बेटा ही चाहेंगी न?’’ मैं ने थोड़ी गंभीरता से पूछा.

‘‘तुम मां की चिंता न करो. उन्होंने ही तो मुझ से कहा है कि उन्हें पोती ही चाहिए.’’

दरअसल, मांजी अपने स्वामी के आदेशों का पालन कर रही थीं. स्वामी का कहना था कि लड़की होने से पार्थ को तरक्की मिलेगी. इस स्वामी के पास 1-2 बार मांजी मुझे भी ले कर गई थीं. मुझे तो वह हर बाबा की तरह ढोंगी ही लगा. उस का ध्यान भगवान में कम, अपनी शिष्याओं में ज्यादा लगा रहता था. वहां का माहौल भी मुझे कुछ अजीब लगा. लेकिन मांजी की आस्था को देखते हुए मैं ने कुछ नहीं कहा.

घर के हर छोटेबड़े काम से पहले स्वामी से पूछना इस घर की रीत थी. अब जब स्वामी ने कह दिया कि घर में बेटी ही आनी चाहिए, मांबेटा दोनों दोहराते रहते. मांजी मेरी डिलिवरी के 3 महीने पहले ही आ गई थीं. उन्हें ज्यादा तकलीफ न हो, इसलिए मैं कुछ दिनों के लिए मायके जाने की सोच रही थी पर पार्थ ने मना कर दिया.

‘‘तुम्हारे बिना मैं कैसे रहूंगा श्रेया?’’ उन्होंने कहा.

अब मुझे मांबेटे के व्यवहार पर कुछ शक सा होने लगा. मेरा यह शक कुछ ही दिन बाद सही भी साबित हुआ.

‘‘ये सितारे किसलिए पार्थ?’’ पूरा 1 घंटा मुझे इंतजार कराने के बाद यह सरप्राइज दिया था पार्थ ने.

‘‘श्रुति के लिए और किस के लिए जान,’’ श्रुति नाम पसंद किया था पार्थ ने हमारी होने वाली बेटी के लिए.

‘‘और श्रुति की जगह प्रयास हुआ तो?’’ मैं ने फिर चुटकी लेते हुए कहा.

‘‘हो ही नहीं सकता. स्वामी ने कहा है तो बेटी ही होगी,’’ मैं ने उन की बात सुन कर अविश्वास से सिर हिलाया, ‘‘और हां स्वामी से याद आया कि कल हम सब को उस के आश्रम जाना है. उस ने तुम्हें अपना आशीर्वाद देने बुलाया है,’’ उन्होंने कहा.

मैं चुपचाप लेट गई. मेरे लिए इस हालत में सफर करना बहुत मुश्किल था. स्वामी का आश्रम घर से 50 किलोमीटर दूर था और इतनी देर तक कार में बैठे रहना मेरे बस का नहीं था. पार्थ और उन की मां से बहस करना बेकार था. मेरी कोई भी दलील उन के आगे नहीं चलने वाली थी.

अगले दिन सुबह 9 बजे हम आश्रम पहुंच गए. ऐसा लग रहा था जैसे किसी जश्न की तैयारी थी.

‘‘स्वामी ने आज हमारे लिए खास पूजा की तैयारी की है,’’ मांजी ने बताया.

कुछ ही देर में हवनपूजा शुरू हो गई. इतनी तड़कभड़क मुझे नौटंकी लग रही थी. पता नहीं पार्थ से कितने पैसे ठगे होंगे इस ढोंगी ने. पार्थ तो समझदार हैं न. लेकिन नहीं, जो मां ने कह दिया वह काम आंखें मूंद कर करते जाना है.

पूजा खत्म होने के बाद स्वामी ने सभी को चरणामृत और प्रसाद दिया. उस के बाद उस के प्रवचन शुरू हो गए. उन बोझिल प्रवचनों से मुझे नींद आने लगी.

मैं पार्थ को जब यह बताने लगी तो मांजी बीच में ही बोल पड़ीं, ‘‘नींद आ रही है तो यहीं आराम कर लो न, बहुत शांति है यहां.’’

‘‘नहीं मांजी, मैं घर जा कर आराम कर लूंगी,’’ मैं ने संकोच से कहा.

‘‘अरे, ऐसे वक्त में सेहत के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहिए. मैं अभी स्वामी से कह कर इंतजाम करवाती हूं.’’

5 मिनट में ही स्वामी की 2 शिष्याएं मुझे विश्रामकक्ष की ओर ले चलीं. कमरे में बिलकुल अंधेरा था. बिस्तर पर लेटते ही कब नींद आ गई पता ही नहीं चला. जब नींद खुली तो सिर भारी लग रहा था. कमरे में मेरे अलावा और कोई नहीं था. मैं ने हलके से आवाज दे कर पार्थ को बुलाया. शायद वे कमरे के बाहर ही खड़े थे, आवाज सुनते ही आ गए.

अभी हम आश्रम से कुछ ही मीटर की दूरी पर आए थे कि मेरे पेट में जोर का दर्द उठा. मुझे बेचैनी हो रही थी. पार्थ के चेहरे पर जहां परेशानी थी, वहीं मांजी मुझे धैर्य बंधाने की कोशिश कर रही थीं. मुझे खुद से ज्यादा अपने बच्चे की चिंता हो रही थी.

कब अस्पताल पहुंचे, उस के बाद क्या हुआ, मुझे कुछ याद नहीं. जब होश आया तो खुद को अस्पताल के बिस्तर पर पाया.

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शाम को मांजी मुझ से मिलने आईं. लेकिन मेरी नजरें पार्थ को ढूंढ़ रही थीं.

‘‘वह किसी काम में फंस गया है. कल सुबह आएगा तुम से मिलने,’’ मांजी ने झिझकते हुए कहा.

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