Serial Story: उड़ान (भाग-1)

घर्रघर्र की आवाज करती बस कच्ची सड़क पर बढ़ती जा रही थी. उस में बैठी अरुणा हिचकोले खाती बाहर का दृश्य एकटक देख रही थी. नारियल के पेड़ों के झुंड, कौफी के बागान, अमराइयां, सुपारी के पेड़, लहलहाते धान के खेत, चारों तरफ हरियाली और प्रकृति का नैसर्गिक सौंदर्य देख कर अरुणा की आंखें भर आईं.

बचपन में यही सफर वह बैलगाड़ी में तय करती थी. उस के गांव तिरुपुर में तब बस और मोटरें नहीं चलती थीं. आसपास के गांवों तक लोग बैलगाड़ी में ही आयाजाया करते थे.

अरुणा की आंखें शून्य में जा टंगीं. वह अतीत की यादों में खो गई.

वह अभी 16 साल की थी कि उस के मातापिता ने उस का ब्याह तय कर दिया. उस ने बहुत नानुकुर की पर उस की एक न चली. उस का मन आगे पढ़ने का था पर पिता बोले, ‘आगे पढ़ कर क्या करना है, वही चूल्हाचक्की न. बस, बहुत हो गया.’

इस बात की जानकारी जब उस के चाचा गोविंद को हुई तो वे शहर से दौड़े चले आए.

‘अन्ना, यह क्या करते हो? इतनी छोटी उम्र में बेटी की शादी?’

‘अरे, मेरा बस चलता तो इसे छुटपन में ही ब्याह देता,’ कृष्णस्वामी बोले, ‘लड़की रजस्वला हो उस से पहले उस का विवाह होना कल्याणकारी होता है. ऐसे ही विवाह को  ‘गौरी कल्याणम’ कहा जाता है और इसे बहुत श्रेष्ठ माना जाता है.’

‘लेकिन आजकल ये सब कौन करता है. अरुणा को आगे पढ़ने दीजिए.’

‘देखो गोविंद, बेटी को आगे पढ़ाने का मतलब है उसे शहर भेजना, क्योंकि हमारे गांव में कालेज तो है नहीं.’

‘इसे मेरे पास बेंगलुरु भेज दीजिए.’

‘नहीं, तुम्हारा अपना परिवार है.

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तुम उस को देखो. अरुणा मेरी जिम्मेदारी है. उस के लिए अच्छा घरवर ढूंढ़ लिया है. और फिर अरुणा ठिकाने से लगेगी तभी न उस की छोटी बहनों के लिए रास्ता खुलेगा.’

शादी के 1 वर्ष बाद ही अरुणा के पति की एक ट्रेन दुर्घटना में मृत्यु हो गई. उस के ससुराल वालों का तो उस पर कहर ही टूट पड़ा, ‘अरे, कैसी सत्यानाशी, कुलक्षणी लड़की निकली यह जो आते ही हमारे बेटे को खा गई. हमें नहीं चाहिए यह मनहूस कुलनाशिनी,’ ससुराल में उस का जीना दूभर कर दिया गया.

पिता उसे ससुराल से घर ले आए.

‘तू फिक्र न कर मेरी बच्ची,’ उन्होंने उसे दिलासा दिया था, ‘जब तक

मांबाप का साया तेरे सिर पर है, तुझे किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं. हम हैं न तेरी सरपरस्ती के लिए.’

‘हां अक्का,’ छोटे भाई राघव ने आश्वासन दिया, ‘मैं और केशव भी हैं जो आजन्म तुम्हें संभालेंगे.’

लेकिन क्या इन खोखले शब्दों से उस के आंसू थमने वाले थे? मांबाप का संरक्षण था, पर साथ ही बंदिशें भी थीं. उसे अपना भविष्य अंधकारमय नजर आता था.

पिता कृष्णस्वामी के धर्मगुरु स्वामी अनंताचार्य घर आए. पूरा घर हाथ जोड़े उन के स्वागत में लग गया.

‘यजमान, तुम्हारी बेटी के बारे में सुना, बड़ा दुख हुआ. पर होनी को कौन टाल सकता है. अब तुम लोगों को चाहिए कि बिटिया को धैर्य बंधाओ. पिछले जन्म के कर्मों की सजा इस जन्म में मिल रही है. इस जन्म में नेमधरम से रहेगी तभी अगला जन्म संवरेगा. हां, तो बिटिया के केशकर्तन कब करवा रहे हो?’

कृष्णस्वामी भारी सोच में पड़ गए. बेटी का उदास चेहरा, सूना माथा और  गला देख कर ही उन का कलेजा मुंह को आता था. उस के केश उतारे जाने की कल्पना से वे थर्रा गए.

अरुणा ने सुना तो वह बिलखबिलख कर रोने लगी, ‘पिताजी, मेरे केश मत उतरवाओ. मैं यह सह नहीं पाऊंगी.’

उस के लिए यही क्या कम था कि भरी जवानी में वैधव्य दुख भोग रही थी. पति के मरते ही उस की चूडि़यां तोड़ दी गई थीं. मंगलसूत्र गले से उतार लिया गया था. उसे सादे कपड़े पहनने के लिए बाध्य कर दिया गया था. माथे से सुहाग का चिह्न पोंछ दिया गया था सौंदर्य प्रसाधन, आमोदप्रमोद सब वर्जित हो गए. जब उस की सखीसहेलियां शादीब्याह में बनठन कर अठखेलियां करतीं तो वह उपेक्षित सी घर में मुंह लपेट कर पड़ी रहती.

उस के गोविंद चाचा जब शहर से गांव आए तो देखा कि सारा घर शोक में डूबा हुआ था.

‘यह क्या अन्ना, हमारे धर्मशास्त्रों में लिखा है कि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता बसते हैं. लेकिन तुम्हारे घर की स्त्रियों की दयनीय दशा देखी नहीं जाती. एक तरफ भाभी रो रही हैं. बेटी अलग अपने गम में घुलती जा रही है और तुम हो कि उन की ओर से बिलकुल उदासीन हो.’

‘मैं क्या करूं गोविंद, मुझे तो कुछ सूझता नहीं है,’ कृष्णस्वामी ने बुझे हुए स्वर में कहा.

‘तुम अब अरुणा को मेरे जिम्मे छोड़ दो. मैं उसे शहर ले जाऊंगा. उसे कालेज में भरती कराऊंगा. बिटिया वहीं पढ़ाई करेगी.’

‘लेकिन…’

‘अब लेकिनवेकिन नहीं. मैं तुम्हारी एक न सुनूंगा.’

मांबाप ने भारी मन से अरुणा को विदा किया. सौ हिदायतें दीं. घर में थी तो बात और थी. वे उस के ऊपर कड़ा नियंत्रण रखते. पगपग पर टोकाटाकी करते. जवान लड़की के कहीं कदम बहक न जाएं, इस बात का उन्हें हमेशा डर लगा रहता.

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अरुणा के चाचा उसे बेंगलुरु ले कर चले गए. उसे कालेज में दाखिला दिला दिया.

इस दौरान एक दिन अरुणा की मुलाकात श्रीकांत से हुई. वह पास के कालेज में पढ़ता था. सुदर्शन और मेधावी था. लड़कियां उस के पीछे दीवानी थीं. पर उस ने सब को छोड़ अरुणा को चुना था. वे चोरीछिपे मिलने लगे.

एक दिन श्रीकांत बोला, ‘तुम ने उडुपी कृष्णभवन का मसाला डोसा खाया है कभी?’

‘नहीं.’

‘चलो, आज चलते हैं.’

‘नहीं बाबा, तुम्हारे साथ रेस्तरां गई और किसी ने देख लिया तो?’

‘देख ले, हमारी बला से. कोई हमारा क्या कर लेगा? हम दोनों तो शादी करने वाले हैं.’

‘शादी,’ उस का मुंह खुला का खुला रह गया, ‘श्रीकांत, यह तुम क्या कह रहे हो? क्या तुम जानते नहीं कि मैं विधवा हूं?’

‘जानता हूं. पर वह तुम्हारा गुजरा हुआ कल था. मैं तुम्हारा आने वाला कल हूं.’

उस के प्यार की भनक आखिर एक दिन घरवालों को लग ही गई. उस दिन घर में एक तूफान आ गया था.

‘विधवा का पुनर्विवाह,’ पिताजी गरजे थे, ‘असंभव. अरे पगली, तू उस देश में जन्मी है जहां स्त्रियां पति की चिता पर सहगमन करती थीं. हमारे वंश में न कभी ऐसा हुआ न कभी होगा. हम लोग ऐसेवैसे नहीं हैं. हम उच्च कोटि के ब्राह्मण हैं. मेरे दादा मैसूर महाराजा के राजपुरोहित थे. सभी काम नेमधरम से करते थे तब कहीं जा कर राजकाज संभालते थे. और तुझे मेरी मां की याद है?’

‘हां,’ उस ने अस्फुट स्वर में कहा.

अरुणा को अपनी दादी भलीभांति याद हैं. 20 साल की आयु में विधवा हुईं. घुटा हुआ सिर, एकवसना, एक जून खाना.

8 गज की तांत की साड़ी में अपना तन और सिर ढकतीं. हमेशा नेमधरम से रहतीं. वे सांध्य बेला में मंदिर जाना नहीं भूलतीं. एक दिन मंदिर में ही एक खंभे के सहारे बैठेबैठे, प्रवचन सुनते हुए उन के प्राणपखेरू उड़ गए थे.

आगे पढ़ें- लेकिन जैसे अरुणा का मन अंदर से चीख उठा था…

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Serial Story: उड़ान (भाग-2)

लेकिन जैसे अरुणा का मन अंदर से चीख उठा था, ‘वह जमाना और था’. उसे इस बात का ज्ञान था कि वह आज के युग की नारी है, उस में सोचनेसमझने की शक्ति है, वह अपना भलाबुरा जानती है. वह नियति के आगे सिर कैसे झुका दे. वह कैसे एक अज्ञात मनुष्य के नाम की माला जपते हुए अपने बचेखुचे दिन गुजार दे.

माना कि वह पुरुष उस का पति था. अग्नि को साक्षी मान कर उस ने उस के साथ सात फेरे लिए थे. पर था तो वह उस के लिए एक अजनबी ही. यह जानते हुए कि यही विधि का विधान है, वह मन मार कर नहीं रह सकती. उस का मन विद्रोह करना चाहता है.

उसे अपने हिस्से की धूप चाहिए. उसे वे सभी खुशियां, वे सभी नेमतें चाहिए जिन पर उस का जन्मसिद्ध अधिकार हैं. उसे एक जीवनसाथी चाहिए, एक सहचर जिस के साथ वह अपना सुखदुख बांट सके. जिस पर अपना प्यार लुटा सके, जिस पर वह अपना अधिकार जमा सके, उसे चाहिए एक नीड़ जहां बच्चों का कलरव गूंजे.

वह यह सब अपने मातापिता से कहना चाहती थी. पर उस के मांबाप पुरातनपंथी थे, रूढि़वादी थे, संकीर्ण विचारों वाले परले सिरे के अंधविश्वासी थे. पिता उग्र स्वभाव के थे जिन के सामने उस की जबान न खुलती थी. मां पिता की हां में हां मिलातीं. वे उस की सुनने को तैयार ही न थे. श्रीकांत का उन्होंने जम कर विरोध किया.

‘देख अरुणा, हम तुझे बताए देते हैं, इस लड़के से ब्याह का विचार त्याग दे. हमारे जीतेजी यह मुमकिन नहीं. हमें बिरादरी से बाहर कर दिया जाएगा. जाने कहां का आवारा, लफंगा तुझे अपने जाल में फंसाना चाहता है. हम ठहरे ब्राह्मण, वह नीच जाति का. मैं कहे देता हूं, यदि तू ने उस छोकरे से ब्याह करने की जिद ठानी तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगा. मैं अपनी बात का धनी हूं. इस से पहले कि कुल पर आंच आए या कोई हम पर उंगली उठाए, हम मर जाएंगे. मैं कुएं में छलांग लगा दूंगा या आमरण अनशन करूंगा.’

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अरुणा सहम गई. मांबाप के प्रति विद्रोह करने की उस में हिम्मत न थी. उस ने श्रीकांत के प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

स्वामी अनंताचार्य घर आए. उन्होंने अरुणा के बारे में सुना.

‘देख वत्स, इसीलिए मैं कहता था कि बिटिया के केश उतरवा दो. विधवाओं के लिए यह नियम मनुस्मृति में लिखा गया है. लेकिन उस वक्त तुम ने मेरी बात नहीं मानी. अब देख लिया न परिणाम? तुम्हारी बेटी का  रूप व घनी केशराशि देख कर ऋषिमुनियों के मन भी डोल जाएं, मनुष्य की बिसात ही क्या?’

उन्होंने अरुणा से कहा, ‘बेटी, अब ईश्वर में लौ लगाओ. रोज मंदिर जाओ. भगवत सेवा करो. वही मुक्तिमार्ग है.’

कुछ रोज तो वह मंदिर जाती रही पर सांसारिक मोहमाया न त्याग सकी. मंदिर में भी उस का मन भटकता रहता था. आंखें प्रतिमा पर टिकी रहतीं पर मन में श्रीकांत की छवि बसी थी. कानों में स्वामीजी के प्रवचन गूंजते और वह श्रीकांत के खयालों में खोई रहती.

समय सरकता रहा. उस के भाईबहन अपनेअपने परिवार को ले कर मगन थे. मातापिता का देहांत हो चुका था. अरुणा ने पढ़ाई पूरी कर के अपने ही कालेज में व्याख्याता की नौकरी कर ली थी. पठनपाठन में उस का मन लग गया था. किताबें ही उस की मित्र थीं. पर कभीकभी उस का एकाकी जीवन उसे सालता था.

बस अचानक एक झटके से रुकी और अरुणा वर्तमान में लौट आई. उस का गांव आ गया था. उस के भाई व भाभी ने उस का स्वागत किया.

‘‘आओ अक्का, अब तो वापस शहर नहीं जाओगी न?’’ राघव ने उस के हाथ से बैग लेते हुए कहा.

‘‘नहीं, नौकरी से रिटायर हो चुकी हूं. मैं काम करकर के थक गई थी. अब यहीं शांति से रहूंगी.’’

‘‘अच्छा किया, मुझे भी आप की मदद की जरूरत है,’’ नागमणि बोली, ‘‘आप तो जानती हैं कि श्रीधर की शादी तय हो गई है. उस की तैयारी करनी है. जया के भी पांव भारी हैं. वह भी जचकी के लिए आने वाली है. आप को ही सब करनाकराना है.’’

‘‘तुम सब कुछ मुझ पर छोड़ दो, भाभी. मैं संभाल लूंगी.’’

वह बड़े उत्साह से शादी की तैयारी में लग गई. वधू के लिए गहने गढ़वाना, मेहमानों के लिए पकवान बनाना, रंगोली सजाना आदि ढेरों काम थे.

बहू बिदा हो कर आई थी. घर में गांव की स्त्रियों का जमघट लगा हुआ था.

वरवधू द्वाराचार के लिए खड़े थे.

‘‘अरे भई, आरती कहां है? कोई तो आरती उतारो,’’ किसी ने गुहार लगाई.

अरुणा ने सुना तो थाल उठा कर दौड़ी.

नागमणि ने झटके से उस के हाथ से थाली छीन ली, ‘‘यह क्या कर रही हैं अक्का? आप को कुछ होश है कि नहीं? यह काम सुहागिनों का है. आप की तो छाया भी नववधू पर नहीं पड़नी चाहिए. अपशकुन होगा.’’

अरुणा पर घड़ों पानी पड़ गया. कुछ क्षणों के लिए वह भूल बैठी थी कि वह विधवा है. शुभ अवसरों पर उसे ओट में रहना चाहिए. उसे याद आया कि घर में जब भी पिता बाहर निकलते और वह उन के सामने पड़ जाती तो वे उलटे पैरों लौट आते और थोड़ी देर बैठ कर पानी पी कर फिर निकलते.

शहर में लोग इन बातों की परवा नहीं करते थे, पर गांव की बात और थी. यहां लोग अभी भी कुसंस्कारों में जकड़े हुए थे. लीक पीटते जा रहे थे.

कुछ दिनों बाद नागमणि ने फिर

उस के रहनसहन पर आपत्ति खड़ी कर दी.

‘‘अक्का, आप रसोईघर और पूजाघर में न जाया करें.’’

‘‘क्यों भला?’’

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‘‘स्वामी अनंताचार्यजी कह रहे थे कि आप ने विधवा हो कर भी केशकर्तन नहीं कराए जो हमारे शास्त्रों के विरुद्ध है और आप को अशुद्ध माना जा रहा है.’’

अरुणा के हृदय पर भारी चोट लगी. इतने सालों बाद यह कैसी प्रताड़ना? अभी भी उस के आचार पर लोगों की निगाहें गड़ी हैं. जीवन के संध्याकाल में इस दौर से भी गुजरना होगा, यह उस ने सोचा न था. उसे अपने ही लोगों ने अछूत की तरह जीने पर मजबूर कर दिया था. पगपग पर लांछन, पगपग पर तिरस्कार.

आगे पढ़ें- आखिर एक दिन उस का मन इतना विरक्त हुआ कि उस ने…

#lockdown: गरमियों में घर पर ऐसे रखें हेल्थ का ख्याल

गरमी का मौसम हेल्थ से जुड़ी बहुत सी परेशानियां लेकर आता है.आजकल वैसे भी सब लोग लाक डाउन के चलते घर में रहने को मजबूर हैं. ज़्यादातर लोग समझ नहीं पा रहे के इस  समय अपने आहार और जीवनशैली में किस तरह बदलाव लाएं.  इन दिनों के मौसम के साथ जीवनशैली में भी ज़रूरी बदलाव लाने चाहिए. क्योंकि हमारा शरीर बदलते मौसम के लिए संवेदनशील होता है. इन गर्मियों के मौसम के भी अपने फायदे हैं.

गर्मियों के फल और सब्ज़ियां पोषक पदार्थों- जैसे फाइटोन्यूट्रिएन्ट्स और एंटीऔक्सीडेन्ट से भरपूर होती हैं, जो एजिंग की प्रक्रिया को धीमा करती हैं, शरीर को कैंसर जैसी बीमारियों से बचाती हैं, ब्लड प्रेशर को नियन्त्रित और दिल को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करती हैं. आइए मौसम को ध्यान में रखते हुए अपने शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए अपनी जीवनशैली में कुछ सकारात्मक बदलाव लाएं.

बैरीज़ और नारियल पानी

रसबैरी, स्ट्रौबैरी, मलबैरी और इण्डियन बैरी में विटामिन सी भरपूर मात्रा में होता है, जो टिश्यूज़ यानि उतकों की मरम्मत करता है. इनके एंटीऔक्सीडेन्ट गुण प्रदूषण से सुरक्षित रखते हैं. स्ट्रौबैरी में विटामिन सी ज़्यादा मात्रा में होता है, इसके अलावा इनमें मौजूद फोलेट दिल की बीमारियों की संभावना को कम करता है. गर्मियों में मौसम में खूब नारियल पनी पीएं. इसमें कैलोरीज़ नहीं होती और यह प्राकृतिक एंटीऔक्सीडेन्ट है. कोला और सोडा जैसे पेय के बजाए नारियल पानी का सेवन करें और फ़र्क देखें.

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अपने आप को फूड पौइज़निंग से बचा कर रखें

गर्मियों के मौसम में फूड पौइज़निंग एक आम समसया है. इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि  बचा हुआ बासा खाना न खाएं, क्योंकि इस मौसम में खाना जल्दी खराब होता है. प्रदूषित पानी के सेवन से बचें. इसके बावजूद गैस्ट्रोएंट्राइटिस के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.

मेवों के बजाए प्याज़ और योगहर्ट का सेवन करें

मेवों में तेल और कार्बोहाइड्रेट अधिक मात्रा में होता है, जो शरीर की गर्मी बढ़ाते हैं. इसलिए गर्मियों में मेवों का सेवन न करें. इसके बजाए कच्चे प्याज़ में प्रोटीन, सोडियम, पोटेशियम, सैल्युलोज़, एक फिक्स और एक असेन्शियल औयल, 80 फीसदी से ज़्यादा पानी होता है. इन्हें खाने से भूख बढ़ती है, पाचन में सुधार आता है, शरीर का इलेक्ट्रोलाईट संतुलन बना रहता है. योगहर्ट के सेवन से आहार नाल में अच्छे बैक्टीरिया पनपते हैं, जो शरीर को ठंडा रखते हैं और पाचन में सुधार लाते हैं. अगर आपको इसका स्वाद पसंद नहीं है तो आप छाछ का सेवन कर सकते हैं.

डॉ. पी वेंकट कृष्णन, इंटरनल मेडिसिन, पारस अस्पताल गुड़गांव

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#lockdown: बच्चों के लिए बनाएं चाकलेटी ब्रेड रोल

आज हम आपको ब्रैड और चौकलेट का कौम्बिनेशन करके कैसे रोल बनाएं, इसकी खास रेसिपी बताएंगे.

हमें चाहिए

4 ब्रेड स्लाइस

2 टी स्पून कोको पाउडर

1 टेबल स्पून कटी मेवा

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1 टी स्पून पिसी शकर

1 टी स्पून मलाई

1 टी स्पून नारियल बुरादा या काजू पाउडर

1 टी स्पून घी.

विधि-ब्रेड स्लाइस को मिक्सी में बारीक पीस लें. अब इसमें कोको पाउडर, कटी मेवा, पिसी शकर और मलाई अच्छी मरह मिलाएं. हाथों में चिकनाई लगाकर तैयार मिश्रण के रोल बनाएं और नारियल बुरादा में लपेटकर सर्व करें.

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नोट-कोको पाउडर के स्थान पर आप डार्क चाकलेट या चाकलेटी सॉस तथा मलाई के स्थान पर मिल्कमेड या घर पर तैयार कंडेस्ट मिल्क आदि घर में जो भी उपलब्ध हो उनका भी प्रयोग किया जा सकता है.

#lockdown: ये हैं पत्नी का गुस्सा शांत करने के 5 जबरदस्त टिप्स

शादी के बाद लोगों की जिंदगी में कई बदलाव आते हैं और इसी के साथ ही कई जिम्मेदारियां भी आती हैं. पति हो या पत्नी दोनों को अपने रिश्ते को बनाए रखने के लिए कई बातों का ख्याल रखना पड़ता हैं. पति-पत्नी का रिश्ता नोंक-झोंक का रिश्ता होता हैं, जिसमें कभीकभार पति को पत्नी की नाराजगी भी झेलनी पड़ती हैं.

ऐसे में पति को समझदारी दिखाते हुए समय रहते पत्नी का गुस्सा शांत करने की जरूरत होती हैं, नहीं तो यह बड़ी लड़ाई बन सकती हैं. इसलिए आज हम आपके लिए कुछ टिप्स लेकर आए हैं कि किस तरह से आप अपनी पत्नी का गुस्सा शांत कर सकते हैं.

1. कभी-कभी पत्नी को दें आराम

घर संभालना भी कोई आसान काम नहीं है,सारा दिन परिवार की देखभाल करने के बाद पत्नी थक जाती है. कभी-कभी उसे इन कामों से छुट्टी दें क्योंकि सबको खुश करने के चक्कर में हो सकता है वह चिड़चिडी हो गई हो. आप पत्नी का ध्यान रखेंगे तो उसकी आदत भी ठीक होनी शुरू हो जाएगी.

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2. जानें नराजगी के पीछे की वजह

पत्नी अगर गुस्से में है तो पहले खुद से सवाल करें कि कहीं इसके पीछे आपकी कोई गलती तो नहीं. उसके बाद उससे कारण पूछें. इसके पीछे की वजह जायज लगती है तो उससे बैठकर बात करें. गलती अगर आपकी है तो उसे शांत करने के लिए सॉरी बोल दें. गुस्सा शांत होने पर उसे समझाएं कि बात-बात पर नराज होने सही नहीं है.

3. बच्चों की लें मदद

आप पत्नी को हैंडल करने के लिए बच्चों का सहारा भी ले सकते हैं. जब पत्नी गुस्से में हो तो बच्चों की तरफ ज्यादा ध्यान दें. बच्चे आसापास होंगे तो वह ऊंची आवाज में आपसे कोई भी नहीं कहेंगी. अपनी बीवी का मूड ठीक करने के लिए उसे घर से बाहर ले जाएं.

4. पत्नी के साथ समय बिताएं

अपनी पत्नी का मूड ठीक करने के लिए आप उनके साथ समय बिताएं. उनसे बात करें, हो सकता है उसके गुस्से के पीछे की वजह आपकी पत्नी का समय न देना हो.

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5. कभी-कभी पत्नी की अनदेखी करें

वाइफ को हैंडल करने का तरीका खोज रहे हैं तो कभी-कभी उसे इग्नोर भी करें. इससे उसका गुस्सा जल्दी शांत हो जाएगा और वह बाद में समझ पाएगी कि वह बेवजह आप पर गुस्सा कर रही है.

19 दिन 19 टिप्स: फैशन के मामले में ‘नायरा’ से कम नहीं उनकी औफस्क्रीन छोटी बहन शीतल

स्टार प्लस के सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में नायरा के रोल में शिवागी जोशी फैंस का दिल जीत चुकी हैं. आज वह घर-घर में एक बड़ा नाम बन गई हैं. शिवांगी की फोटोज और वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती हैं. वहीं अगर उनकी फैमिली की बात करें तो शिवांगी की बहन भी फैशन के मामले में कम नही हैं. शीतल जोशी बहन शिवांगी की तरह फैशन का ख्याल रखती हैं. आज हम शीतल के कुछ लेटेस्ट फैशन ट्रेंड के बारे में बताएंगे, जिसे आप शादी से लेकर आउटिंग सभी में ट्राय कर सकती हैं. आइए आपको दिखाते हैं उनकी खास फोटोज…

1. औफिस या पार्टी के लिए परफेक्ट है शीतल की ये ड्रेस

अगर आप पार्टी या औफिस के लिए कुछ नया ट्राय करने का सोच रही हैं तो शीतल की तरह सिंपल ब्लैक ड्रेस के साथ ब्लैक हील्स जरूर ट्राय करें ये आपके लुक को ट्रेंडी लुक देगा. वहीं अगर आप की भी कोई बहन है तो आप इस ड्रेस को अपनी सिस्टर के लुक से मैच करके पहन सकती हैं.

 

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2. पार्टी के लिए परफेक्ट है शीतल का ये गाउन

 

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आजकल गाउन ट्रेंड में हैं. अघर आप भी गाउन ट्राय करना चाहते हैं तो शीतल की ये ड्रेस आपके लिए परफेक्ट है. शादी या किसी पार्टी के लिए ये आपके लिए बेस्ट औप्शन रहेगा.

3. बहन की तरह लहंगे के ट्रेंड में भी नहीं हैं पीछे शीतल

 

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लहंगे की बात आए तो नायरा का नाम सबसे फेमस है. नायरा यानी शिवांगी अपने शो में कई अलग-अलग तरह की लहंगे में नजर आ चुकी हैं. वहीं बहन से लहंगे ट्राय करने के मामले में शीतल कैसे पीछे रह सकती हैं. शीतल का ये गोल्डन और ब्लैक का लहंगा कौम्बिनेशन शादी के लिए परफेक्ट औप्शन है.

4. शीतल की ये सिंपल ड्रेस है घूमने के लिए परफेक्ट

 

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आजकल ड्रेसेस का फैशन ट्रेंड में है. वहीं शर्ट ड्रेसेस की बात करें तो लोग आजकल ये फैशन अक्सर फौलो करते हुए दिखते हैं, जिसमें टीवी एक्ट्रेस से लेकर उनके रिलेटिव भी शामिल है. शीतल भी यैलो कलर की शर्ट ड्रेस में कमाल की लग रही हैं.

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फंदा: भाग-1

पूरे कमरे में बहता खून और खून से सनी लाशें… मासूम बच्चे, बडे़, सब किसी अपने के ही हाथों अपनी जिंदगी गंवा चुके थे. ऊपर जाने वाली सीढि़यों पर भी खून से सने जूतों के निशान, दीवारों पर, सीढि़यों पर, हर तरफ खून के छींटे. कठोर से कठोर दिल वाले पुलिस वालों ने भी ऊपर जा कर देखा तो घबराहट से उन की भी कंपकंपी छूट गई. ऊपर भी लाशें और मां के ही दुपट्टे से गले में फांसी का फंदा लगा झूलता हसन.

मुंबई में ठाणे के इस मुसलिम बहुल इलाके कासारवडावली में छोटीछोटी सड़कों के दोनों तरफ दुकानें थीं. बीचबीच में लोगों के दोमंजिला तिमंजिला खुले मकान. माहौल पूरी तरह से पुराने जमाने के आम मुसलिम परिवारों के महल्ले जैसा ही था. लड़कियां, औरतें बुरके में ही बाहर आतीजाती थीं. लोग आर्थिक दृष्टि से संपन्न थे, पर उन का रहनसहन, लड़कियों की पढ़ाईलिखाई जमाने के हिसाब से आगे नहीं बढ़ पाई थी. लड़के तो पढ़लिख कर फिर भी अच्छे ओहदे पा चुके थे, पर इस इलाके की लड़कियां आज भी थोड़ाबहुत पढ़लिख कर घर तक ही सीमित थीं.

शौकत अली और आयशा बेगम की3 बेटियां थीं- सना, रूबी और हिबा. तीनों बेटियों की उम्र में 2-2 साल का अंतर था. रूबी मानसिक रूप से अस्वस्थ थी. सब से छोटी हिबा से 5 साल छोटा था हसन, आयशा उस पर दिनरात कुरबान होती थीं. अब तक नीचे 2 बैडरूम थे. आयशा ने अब हसन के लिए पहली मंजिल पर एक आरामदायक कमरा बनवा दिया था. हसन की हर सुविधा का ध्यान रखते हुए आयशा ने हर चीज का प्रबंध कर दिया था.

रूबी तो स्कूल जा नहीं पाई थी. सना और हिबा को आयशा बेगम ने 10वीं क्लास तक ही पढ़ने की छूट दी थी. शौकत अली ने बेटियों को पढ़ाना चाहा तो आयशा उन पर ही बरस पड़ी थीं, ‘‘क्या करना है इन्हें पढ़ कर? शादी हो ही जाएगी जल्दी. बस, हसन को पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाना है. हमारे बुढ़ापे का सहारा है वह.’’

हसन की हर बात आयशा हर हाल में पूरा करती थीं. हसन इस बात का खूब फायदा उठाने लगा था. शौकत एक प्राइवेट फर्म में काम करते थे. उन की तनख्वाह इतनी तो थी ही कि घर का गुजारा अच्छी तरह हो जाता.

रूबी बहुत इलाज के बाद भी ठीक नहीं हो पाई थी. वह साफ नहीं बोल पाती थी. इशारे से अपनी बात समझाती थी. समझती तो कुछकुछ थी पर उस का चलने, उठनेबैठने पर अपना नियंत्रण नहीं था. किसी को उस के आसपास रहना होता था. हसन जानबूझ कर उसे तंग करता था.

हसन जैसेजैसे बड़ा हो रहा था, उस की बातें, उस का स्वभाव, उस के हावभाव, तौरतरीके किसी अच्छे लड़के की तरह नहीं थे. उस की किसी भी गलती पर उसे टोकने पर आयशा उस की ढाल बन जाती थीं.

घर के पास एक दरगाह थी. वहीं एक कोने में दिन में एक जमाल बाबा बैठा करता था. वहीं एक कमरे में रात में रहता भी था. उन के पास झाड़फूंक करवाने वालों की भीड़ लगी रहती थी. आयशा को भी उस पर बड़ा भरोसा था. हसन जहां बीमार पड़ता, आयशा झट से उसे बाबा के पास ले जाती थीं.

एक दिन आयशा ने उस से कहा, ‘‘बाबा, हसन को कुछ दीनधर्म की बातें बताओ… आप के कदमों में इसे महजब की जानकारी की राह मिल जाए तो हम सब का भी भला हो जाएगा.’’

अब हसन अकसर बाबा के पास बैठने लगा था. उस के दोस्त कम होते जा रहे थे. वह अपनेआप में ही खोया रहने लगा था. आयशा बेटे को शांत देख कर खुश होती थीं. उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि उन के बेटे के अंदर कैसेकैसे बीज अपनी जड़ें जमा रहे हैं.

शौकत को हसन के बाबा के पास बैठ कर समय बिताने के बारे में पता चला तो उन्होंने डांटा, ‘‘उस के पास बैठ कर क्यों टाइम खराब करते हो? बैठ कर पढ़ाई करो, मेहनत करो.’’

जवाब आयशा ने दिया, ‘‘कैसे बाप हो तुम? पढ़ाई के साथसाथ तुम्हारा बेटा दीनधर्म की राह पर चल रहा है… इस बात से तुम्हें खुश होना चाहिए… बेचारे बाबा मजहब के बारे में ही तो बताते हैं.’’

बस यहीं शौकत चुप हो जाते थे, क्योंकि आम इनसान की तरह उन के दिल में भी धर्म का बड़ा खौफ था.

कुछ साल और बीत गए. सना के रिश्ते आने शुरू हुए तो आयशा को पहली बार बेटियों के निकाह की फिक्र हुई. उन्होंने हसन से इस विषय पर बात की तो उस ने जवाब दिया, ‘‘अम्मी, मेरी आप की बेटियों की जिंदगी में कोई दिलचस्पी नहीं है. अब्बू की चहेती हैं, वे ही जानें. मुझे और भी काम हैं.’’

शौकत यह सुन कर हैरान रह गए. फिर बोले, ‘‘शाबाश बेटा, यही उम्मीद थी तुम से… आयशा, सुन लिया?’’

आयशा को तो अपने कानों पर विश्वासही नहीं हुआ. बोलीं, ‘‘हसन, अपनी बहनों के बारे में ये कैसी बातें कर रहे हो? तुम्हारी कितनी देखभाल की है उन्होंने? कितना प्यार दिया है तुम्हें?’’

‘‘तो मैं क्या करूं? यह उन का फर्ज था, मुझ से यह आम सी बातें मत करो, मैं इस दुनिया में कुछ अलग करने आया हूं. मुझे इन छोटीछोटी बातों में मत खींचो,’’ कह कर वह पैर पटकते हुए चला गया.

शौकत ने अपनी बेगम को देखा. लाड़ले बेटे के बिगड़े तेवर देख कर पहली बार आयशा के चेहरे का रंग उड़ा देखा तो शौकत को तरस आ गया. फिर धीरे से बोले, ‘‘दुखी मत हो, यह सब तुम्हारे जरूरत से ज्यादा लाड़प्यार का नतीजा है.’’

आयशा गुमसुम खड़ी थीं. महसूस हो गया था कि कहीं तो कुछ गलत है. पर क्या, यह समझ नहीं आ रहा था.

कुछ ही दूर स्थित ‘भिवंडी’ से सना के लिए रशीद का रिश्ता आया. वह बैंक में कार्यरत था. शौकत को शांत, सभ्य रशीद सना के लिए बिलकुल उचित लगा. रशीद के मातापिता को भी सना पसंद आई.

निकाह की तारीख तय होते ही घर में जोरशोर से तैयारी शुरू हो गई. पर हसन को किसी बात से कोई मतलब नहीं था.

अब सना हसन में कुछ बदलाव देख रही थी. जब एक दिन सना दोपहर में आराम कर रही थी, तो हसन आ कर उस के पास लेट गया. सना ने हैरानी से पूछा, ‘‘क्या हुआ हसन? कुछ चाहिए?’’

‘‘नहीं. ऐसे भी तो अपनी बाजी के पास लेट सकता हूं न.’’

सना मुसकरा दी. सोचा अब भाई का दिल शायद यह महसूस कर रहा हो कि बड़ी बहन ससुराल चली जाएगी.

फिर अचानक हसन उठ कर बैठ गया. उस के घुटने पर हाथ रख कर इधरउधर की बातें करता रहा. पहले तो सना भाई की बातें ध्यान से सुनती रही, फिर अचानक जब हसन का घुटने पर रखा हाथ इधरउधर घूमने लगा तो सना को धक्का सा लगा. वह उठ बैठी. थी तो औरत ही और यह तो हर औरत के अंदर गजब का एहसास होता है कि वह होश संभालते ही अच्छेबुरे स्पर्श का फर्क समझने लगती है. उसे पल भर खुद को संभालने में लग गया कि छोटा भाई उसे कैसे छू रहा है, मन तो हुआ एक थप्पड़ लगा दे. वह उठ कर जाने लगी तो हसन ने कहा, ‘‘कहां जा रही हो बाजी, बैठो न.’’

‘‘नहीं, अम्मी ने कुछ जरूरी काम बताए थे, वे करने हैं.’’

हसन ने उसे अजीब नजरों से देखा तो सना को अपना वहम साफसाफ सच लगा. उस के बाद कई बार ऐसा हुआ कि सना को हसन जबतब कहीं भी छू कर बात करने लगा, जबकि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था. सना मन ही मन बहुत परेशान रहने लगी कि किस से कहे? कहना चाहिए भी या नहीं? कहीं यह मन का वहम ही न हो… जिस भाई को गोद में खिलाया, उस के बारे में ऐसा सोचना भी दिल को बहुत तकलीफ पहुंचा रहा था.

हसन को सना के पास मंडराता देख आयशा बेगम मुसकरा कर कहतीं, ‘‘देख, भाई है न. अब तेरे ससुराल जाने की बात सोच कर परेशान होता घूम रहा है.’’

सना हर बार कुछ जवाब न दे कर कुछ परेशान सी दिखती. आखिर एक दिन हिबा ने अकेले में पूछ ही लिया, ‘‘बाजी, आजकल कुछ परेशान सी दिख रही हैं. बताओ न?’’

आयशा का सारा ध्यान हसन पर ही रहता था. मां की इस उपेक्षा को दोनों बहनों ने बराबर महसूस किया था. इन बातों ने दोनों बहनों को, बहनों के साथ, हमराज, सहेली बना दिया था. अत: सना धीरे से बोली, ‘‘हिबा, आजकल हसन की हरकतें अच्छी नहीं लग रही हैं.’’

हिबा चौंकी, ‘‘बाजी, क्या आप ने भी कुछ महसूस किया? हसन अजीब सा व्यवहार करता है न?’’

सना हैरान हुई, ‘‘तुझे भी कुछ कहा है क्या?’’

‘‘हां, बाजी, पहले तो ऐसा नहीं करता था. अब जब भी अकेली होती हूं, कभी भी, कहीं भी, इधरउधर की बातें करता हुआ यहांवहां छूता रहता है. उस की हरकतें कुछ ठीक नहीं लग रही हैं. आप के निकाह की तैयारी चल रही है, इसलिए मैं आप को यह सब बता कर परेशान नहीं करना चाह रही थी. रूबी के सामने ये बातें कर भी नहीं सकती थी… बेचारी कुछ समझ भी लेगी तो घबरा जाएगी.’’

‘‘हिबा, मुझे तो लगा मैं ही कुछ गलत तो नहीं सोच रही. चल, अम्मी से बताते हैं.’’

‘‘अम्मी यकीन करेंगी?’’

‘‘मुश्किल तो है पर बताना जरूरी है.’’

हसन कालेज गया हुआ था. आयशा बेगम उस का कमरा ठीक करने ऊपर गई हुई थीं. रूबी नीचे सो रही थी. सना और हिबा ऊपर चली गईं.

दोनों को साथ और गंभीर देख कर आयशा चौंकी. पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘आप से जरूरी बात करनी है अम्मी.’’

‘‘बोलो.’’

सना ने बात शुरू की, ‘‘अम्मी,

आजकल हसन का हमारे साथ व्यवहार ठीक नहीं है.’’

‘‘क्या कह रही हो… आजकल तो हर समय तुम लोगों के आगेपीछे घूमता है… तुम्हें तो खुश होना चाहिए.’’

‘‘नहीं अम्मी, कुछ गलत हरकतें हैं उस की… हमें यहांवहां छूने की कोशिश करता है.’’

आयशा बेगम को जैसे एक धक्का सा लगा. धम्म से वहीं बैड पर बैठ गईं. मुश्किल से आवाज निकली जैसे खुद को तसल्ली दे रही हों, ‘‘नहीं बेटा, भाई है तुम्हारा. आजकल के खराब माहौल की बातें सुन कर वहम हो गया होगा तुम्हें.’’

नीचे से रूबी की आवाज आई तो तीनों नीचे उतर आईं.

अब हसन की हरकतों पर आयशा ने ध्यान देना शुरू किया, तो उन्हें बेटियों की बात ठीक लगी. हसन जानबूझ कर कभी उन के गले में हाथ डाल देता तो कभी कमर में, तो कभी गाल छूता. पहले ऐसा नहीं था.

क्या करें, शौहर को बताएं? नहीं, वे उन से नहीं कहेंगी, शादी का घर है. आयशा बेगम सोच में पड़ गईं कि अगर शौहर को बताया तो बेकार में तनाव का माहौल हो जाएगा.

अत: चुप रहना ही मुनासिब समझा. फिर जब तक हसन घर में रहता, वे साए की तरह उस पर निगाह रखने लगीं.

कई बार हसन चिल्ला पड़ता, ‘‘क्यों मेरे पीछेपीछे घूमती रहती हैं आप… मैं क्या कोई बच्चा हूं.’’

‘‘मेरे लिए तो बच्चे ही रहोगे.’’

इसी बीच सना का रशीद से निकाह हो गया. सना के जाने के बाद हिबा अकेलेपन का शिकार होने लगी. घर के कामों में, रूबी की देखभाल में दिन तो बीत जाता पर रात को बहन की याद आंखें नम कर जाती.

हसन घर के बाहर शांत, सभ्य लड़का था पर घर के अंदर वह एक आवारा, बदतमीज लड़के की तरह हरकतें करता था. हिबा उस से बहुत दूरदूर रहने की कोशिश करने लगी थी. शौकत अली जितनी देर घर पर रहते, वह उन के आसपास ही रहती थी.

हसन के कालेज जाने पर जैसे सब चैन की सांस लेते. उस का जमाल बाबा के पास बैठना जारी था. जमाल बाबा से हसन के बारे में पूछताछ करने का मतलब था बात का बतंगड़ बनाना. हसन मजहब के बारे में खूब लंबीचौड़ी बातें करने लगा था. बाहर वालों को लगता था कि कितना अमनपसंद, मजहबी लड़का है पर सच सिर्फ घर वाले जानते थे.

सना की कोशिशों से हिबा के भी रिश्ते आने लगे थे. सना को बहुत अच्छी ससुराल मिली. रशीद और उस के अम्मीअब्बू सना के साथ बहुत ही प्यार से रहते थे. सना का जीवन अचानक बहुत खुशियों से भर उठा था पर मन ही मन उसे अपनी बहनों की बहुत चिंता रहती थी. फोन पर सब से बात भी होती रहती थी. उस का जब मन होता मिलने भी चली आती थी. रूबी तो उसे देखते ही उस से ऐसे लिपटती थी जैसे कोई छोटी बच्ची अपनी मां से लिपट जाती है.

सना ने हिबा से फोन पर ही ढकेछिपे शब्दों में पूछा, ‘‘हिबा, कोई परेशानी तो नहीं है?’’

‘‘बाजी, सब वैसा ही है जैसा आप के सामने था, कोई फर्क नहीं पड़ा है.’’

‘‘मैं जल्दी तुम्हारे लिए अच्छा लड़का ढूंढ़ूंगी, हिबा.’’

‘‘पर बाजी, हमारे बाद रूबी कैसे रहेगी?’’

‘‘देखते हैं… हिबा, कुछ तो करना पड़ेगा.’’

रशीद के ही एक रिश्तेदार जहांगीर से हिबा की शादी हो गई तो सना खुशी से चहक उठी. जहांगीर प्रोफैसर था. सना की कोशिशें रंग लाई थीं.

सना मायके आई हुई थी. उस ने आयशा से कहा, ‘‘अम्मी, रूबी के लिए मैं ने अपने यहां काम करने वाली फायजा काकी की बेटी निगहत से बात कर ली है. वह तलाकशुदा है, सुबह से शाम तक रूबी की देखभाल करेगी. रात को काकी के पास घर चली जाएगी. उस के 2 बच्चे हैं, कभीकभी जरूरत पड़ने पर वह दिन में भी बच्चों को देखने जाया करेगी. रात को आप रूबी के साथ सो जाया करो. ठीक है न अम्मी?’’

हिबा का निकाह जहांगीर से हो गया. उसे भी एक अच्छा जीवनसाथी मिल गया था. बेटियों को खुश और संतुष्ट देख कर आयशा का मन भी हलका हो गया था. शौकत अली भी खुश थे.

हसन ने किसी तरह बी.कौम. पूरा कर एक प्राइवेट फर्म में नौकरी कर ली, तो सब ने चैन की सांस ली. वह अब दिन में औफिस रहता. पर शाम को बाबा से मिलने का समय निकाल ही लेता था. जमाल बाबा ने जीवन में उसे अंधविश्वासों को पीछे छोड़ आगे बढ़ने केnबजाय अपनी बातों से इतना गुमराह कर दिया था कि वह अब अपनेआप को बहुत खास, खुदा का बंदा समझने लगा था, जो सब बुराइयों को मिटाने आया है, वह कुछ भी कर सकता है, उसे किसी से डरने की जरूरत नहीं है. आयशा ने जो अच्छी मजहबी बातें सीखने के लिए उसे बाबा के सुपुर्द किया था, इन बातों का असर भविष्य में क्या होगा, उन्हें इस का अंदाजा नहीं था.

हसन का नौकरी में मन नहीं लग रहा था. एक दिन वह बाबा के पास पहुंचा. वहां काफी लोग लाइन में लगे थे. बाबा आंखें मूंद कर कह रहा था, ‘‘दुनिया दुखों से भरी है, इनसान अपने कर्मों का फल भोगता है. दुनिया में ऐसी कोई तकलीफ नहीं जो दूर न की जा सके. तुम मेरी पनाह में आए हो तो मुझ पर भरोसा रखो. कुदरत ने हर चीज की 2 सूरतें बनाई हैं… कांटे हैं तो फूल भी हैं, धूप है तो छांव भी है… शैतान है तो खुदा भी है, उसी खुदा की इच्छा से मैं तुम्हारे पास आया हूं… ऊपर बैठा वह देख रहा है… मुझ से कुछ न छिपाओ, सब कुछ कह दो, अपने दिल में कुछ न रखो, डरो मत.’’

विश्वास के बाजार में बैठे बाबा के चेहरे के पीछे एक और चेहरा था. कहने को तो बाबा अपने हाथ में कोई पैसा नहीं पकड़ता था, पर उस के सामने एक कपड़ा बिछा रहता था, जिस की जितनी मरजी होती, उस पर उतना रख कर चला जाता था. उस के पास धीरेधीरे इतना पैसा जमा हो चुका था कि दूसरे शहर में उस का अपना घर था, पत्नी थी, 3 बच्चे थे. जब भी वह अपने शहर जाता, सब यही समझते बाबा तो सिद्धपुरुष है, अपनी किसी विद्या की खोज में गया है… उस के घर वाले समझते थे कि बाबा दूसरे शहर में कोई नौकरी कर रहा है. कुल मिला कर मूर्ख लोगों की कृपा से बाबा अच्छी जिंदगी गुजार रहा था.

हसन भी उस की चादर पर अच्छेखासे रुपए रख जाता था. बाबा के हिसाब से उस के  सभी शागिर्दों में हसन सब से मूर्ख शागिर्द था, जो भी बाबा कहता हसन के लिए वह फरमान है. यह बाबा जान चुका था.

बाबा ने आंखें खोलीं. देखा, हसन उदास, चुपचाप बैठा है. फिर जल्दीजल्दी बाकी लोगों पर झाड़फूंक का काम निबटाया. फिर पूछा, ‘‘हसन मियां, क्यों परेशान हो?’’

‘‘मेरा नौकरी में मन नहीं लग रहा है, बाबा.’’

‘‘तो छोड़ दो.’’

‘‘फिर क्या करूं?’’

‘‘अपना काम कर लो. तुम में तो हुनर ही हुनर है. तुम्हें किसी की नौकरी की क्या जरूरत है?’’

‘‘पर इतना पैसा कहां है मेरे पास?’’

‘‘तुम्हारे अब्बू हैं, बहनें हैं, बहनोई हैं, सब तुम्हारी मदद करेंगे. तुम ही तो इकलौते बेटे हो घर के.’’

बात हसन के दिमाग में बैठ गई. अब हसन ने सोचा कि पहले बहनों को खुश रखना पड़ेगा. उन के दिल से अपने लिए गुस्सा निकालना पड़ेगा. इस में समय लगेगा पर करना तो पड़ेगा ही. अत: उस ने घर पर कुछ समय देना शुरू किया. सना और हिबा से फोन पर हालचाल लेने लगा. दोनों हैरान तो होतीं पर इस बदलाव का कारण समझ नहीं पाईं. हसन रशीद और जहांगीर से भी दोस्ताना संबंध बनाने लगा. सना और हिबा ने फोन पर आपस में बात की. सना ने कहा, ‘‘हसन कुछ बदल गया है.’’

‘‘हां, बहुत ज्यादा बदल गया है, पर अचानक क्यों?’’

‘‘हो सकता है उम्र के साथसाथ अपनी हरकतों पर पछतावा हो, अब शर्मिंदा हो.’’

‘‘अगर ऐसा है तो ठीक है, देर आयद, दुरुस्त आयद.’’

कुछ साल और बीत गए. सना के 2 बेटे और 1 बेटी और हिबा के भी 2 बेटियां और

1 बेटा हो चुका था.

हसन की शादी की भी बात शुरू हो चुकी थी. सब की सलाह के बाद सुंदर जोया घर की बहू बन कर आ गई. जोया के आने से हसन की जिंदगी में कुछ बदलाव हुआ पर दिमाग से बिजनैस का भूत नहीं उतरा.

इसी खयाल को अंजाम देते हुए उस ने अपने दिमाग में एक योजना बना कर सना और हिबा को फोन कर के शनिवार को सुबह आने के लिए कहा.

जोया ने आते ही सब का दिल जीत लिया था. हसन जोया के साथ अच्छा व्यवहार रखता था. अब उस का बातबात में गुस्सा करना कम हो गया था. शौकत अली और आयशा खुश थीं कि उन के सब बच्चे जीवन में राजीखुशी आगे बढ़ रहे हैं.

हसन का बाबा के पास बैठना कम तो हुआ था पर अब भी समय मिलते ही उस के पास पहुंच जाता था.

हसन के दिमाग में जो चल रहा था उस का अंदाजा भी किसी को नहीं था. वह जो बाहर से दिखाई देता था अंदर से बिलकुल उस के उलट था. उस की सोच से अनजान दोनों बहनें शनिवार को सुबह आ गईं. सुबह से ही जोया के साथ मिल कर हसन ने सब के लिए शानदार लंच तैयार किया. सब साथ खाने बैठे तो घर में अलग ही रौनक थी. बच्चे तो मिल कर खूब मस्ती करने लगे तो हसन ने कहा, ‘‘जाओ बच्चो, सब ऊपर खेलो.’’

फिर हसन ने कहा, ‘‘मैं ने सोचा है अब हर शनिवार को हम सब लंच और डिनर साथ किया करेंगे,’’ कह हसन हंसा तो सना और हिबा भी हंस पड़ीं.

रशीद ने छेड़ा, ‘‘मतलब मुझे और जहांगीर को छोड़ कर सब यहीं रहेंगे रात भर… ठीक है भई, जैसी तुम्हारी मरजी.’’

कुछ महीने और बीते. जोया ने बेटे को जन्म दिया जिस का नाम शान रखा. शान की पैदाइश पर भी भाईबहनों ने मिल कर खूब जश्न मनाया, खूब दावतें हुईं. अब तो दोनों बहनें और उन के परिवार शनिवार की दावत का इंतजार करते थे. शनिवार, रविवार घर में भाईबहनों का प्यार देख शौकत अली और आयशा के दिल को चैन आ जाता था.

एक शनिवार और आया. हमेशा की तरह सब ने साथ बैठ कर डिनर किया. बच्चे आपस में मस्ती कर रहे थे. हसन काफी चुप और गंभीर था.

सना ने पूछा, ‘‘हसन, क्या कुछ हुआ है? परेशान हो?’’

‘‘कुछ नहीं, बाजी.’’

हिबा ने भी टोका, ‘‘कुछ बात तो है.’’

शौकत और आयशा भी वहीं बैठे थे. बहुत पूछने पर हसन ने बहुत गंभीरतापूर्वक कहा, ‘‘बाजी, मुझे कुछ रुपयों की जरूरत है. मैं अपना बिजनैस करना चाहता हूं.’’

‘‘तुम तो अच्छी भली नौकरी कर रहे हो, बिजनैस क्यों?’’

‘‘मैं नौकरी छोड़ने वाला हूं… मुझे पैसों की सख्त जरूरत है… समझ नहीं आ रहा कहां से इंतजाम करूं.’’

शौकत ने डांट दिया, ‘‘बिजनैस का आइडिया बिलकुल बेकार है. हम आम नौकरी करने वाले लोग हैं. इतना पैसा कहां से आएगा और अगर उधार लिया तो चुकाएगा कैसे?

कब? कौन देगा पैसा? बेकार की बात है यह, जितनी पढ़ाई तुम ने की है उस हिसाब से तुम्हें नौकरी ठीक ही मिली है. चुपचाप मन से इसे ही करते रहो.’’

‘‘अब्बू, मैं सब चुका दूंगा. मैं ने अच्छी तरह से सोच लिया है,’’ कह कर हसन माथे पर हाथ रख कर दुखी हो कर बैठ गया.

आयशा से बेटे के चेहरे की उदासी देखी नहीं गई. इतनी मुश्किल से तो बेटा खुश रहने लगा था, घर में उस के खुश रहने से ही कितना बदलाव आ गया था. अत: प्यार से हसन के सिर पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘पर बेटा, यह खयाल छोड़ ही दो, हमारे पास इतना पैसा कहां है?’’

हिबा ने पूछा, ‘‘कितना चाहिए?’’

‘‘25-30 लाख.’’

‘‘क्या?’’ सब चौंक पड़े.

‘‘इतना कहां से आएगा हसन?’’ सना ने परेशान होते हुए कहा.

जोया चुपचाप हैरान सी बैठी थी. अपने शौहर को वह आज तक समझ नहीं पाई थी. उस के दिमाग में कुछ चलता रहता था पर क्या, वह अंदाजा नहीं लगा पाती थी. कभी वह कुछ कहता था, तो कभी कुछ. कभी वह बड़ीबड़ी मजहबी बातें करता था, कभी एक लालची, मक्कार की तरह व्यवहार करता था.

हसन ने कहा, ‘‘जोया के पास जितने भी जेवर हैं, उन्हें बेच भी दूं तो काम नहीं होगा. बाजी, आप लोग मुझे कुछ रकम उधार दे दो. मैं बहुत जल्दी चुका दूंगा,’’ सना जो हैरान सी थी, बोली, ‘‘हसन, हम कहां से लाएं?’’

‘‘आप रशीद भाई से बात करो न, उन का तो अच्छा बिजनैस है. वे तो मुझे आराम से लोन दे सकते हैं.’’

हिबा ने कहा, ‘‘हसन, मेरे लिए तो यह नामुमकिन है. 2-2 ननदें हैं, जहांगीर अकेले हैं. उन्हीं पर सारी जिम्मेदारी है. उन दोनों के निकाह का भी सोचना है.’’

‘‘तो आप मुझे अपने गहने दे दो.’’

हिबा चौंकी, ‘‘यह क्या कह रहे हो हसन. गहने कैसे दे दूं?’’

‘‘बाजी, पहली बार आप के भाई ने आप से कुछ मांगा है. मैं सब वापस दे दूंगा, वादा करता हूं. आप लोग समझ नहीं रही हैं, अगर आप लोगों ने मेरी मदद नहीं की तो बहुत बुरा होगा.’’

शौकत अली ने हसन को टोका, ‘‘हसन, यह बेकार का फुतूर अपने दिमाग से इसी समय निकाल दो. बहनों से उधार ले कर बिजनैस करोगे? ऐसी क्या आफत आई है… घर की बेटियों को इस परेशानी में डालने की कोई जरूरत नहीं है.’’

हसन को गुस्सा आ गया, ‘‘आप को हमेशा बेटियों की ही चिंता रही है. आप मेरे लिए तो कुछ करना ही नहीं चाहते. बेटियां ही आप के लिए सब कुछ हैं,’’ कह कर हसन पैर पटकते हुए घर से बाहर चला गया.

 – क्रमश:

कुछ दिनों से मुझे बहुत अधिक व्हाइट डिस्चार्ज हो रहा है, मैं क्या करूं?

सवाल-

  मेरी उम्र 25 साल है और मुझे कोई बीमारी नहीं है. लेकिन पिछले कुछ दिनों से मुझे बहुत अधिक व्हाइट डिस्चार्ज हो रहा है. मुझे समझ नहीं आ रहा ऐसा क्यों हो रहा है. क्या कोई चिंता करने वाली बात हैं?

जवाब-

महिलाओं को वैजाइनल डिस्चार्ज होना आम बात है. इससे यह पता चलता है की बौडी के अंदर मौजूद ग्लैंड अच्छी तरह काम कर रहे हैं और हार्मोन्स बनने की प्रक्रिया भी नॉर्मल तरीके से चल रही है.

गायनोकोलौजिस्ट डौक्टर सुषमा के अनुसार व्हाइट डिस्चार्ज होने के कई कारण है जैसे –

  • शारीरक बदलाव- कई बार शारीरिक बदलाव के कारण भी व्हाइट डिस्चार्ज होता है.
  • पीरियड्स से पहले – पीरियड्स के पहले व्हाइट डिस्चार्ज लगातर होना नॉर्मल है.
  • प्रेगनेंसी- प्रेगनेंसी के दौरान हल्की गंध के साथ सफेद पानी का आना नौर्मल है. प्रेगनेंसी के दौरान महिला के बौडी में हार्मोनल बदलाव होते रहते है इसलिए कई बार व्हाइट डिस्चार्ज अधिक भी हो सकता है.
  • टैंशन लेना- कई बार महिलाएं तनाव का शिकार हो जाती है जिससे उनकी सेहत पर नकारात्मक असर पड़ने लगता है. टेंशन बौडी में हार्मोन्स का संतुलन बिगाड़ देता है. जिसकी वजह से वैजाइनल डिस्चार्ज होना शुरू हो जाता है.

यह सभी कारण बौडी या हार्मोनल बदलाव के कारण होते है जो जल्दी ही ठीक हो जाता है. लेकिन व्हाइट डिस्चार्ज अधिक मात्रा में होने पर चिंता का विषय बन जाता है. डौक्टर सुषमा बताती है, “ वैजाइनल डिस्चार्ज चिंता का विषय तब बनता है जब डिस्चार्ज में बदलाव दिखाई दें. बदलाव कई तरह के हो सकते है जैसे-

  • डिस्चार्ज का रंग बदलना- यदि आपके डिस्चार्ज का रंफ सफेद के बजाय हल्का पीला या लाल हो गया है और उसमे से दुर्गंध भी आने लगी है तो आपको इंफेक्शन हो सकता है. डौक्टर सुषमा बताती है यह इंफेक्शन फंगल, बैक्टेरियल या सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसिज की वजह से भी हो सकती है.
  • जलन व खुजली- यदि आपको ज्यादा डिस्चार्ज के साथ जलन और खुजली भी होती है तो इसका मतलब है की आप किसी इंफेक्शन का शिकार हो गए है ऐसे में आपको जल्द से जल्द डौक्टर से संपर्क करना चाहिए.
  • कपड़े खराब होना- अगर डिस्चार्ज से आपके कपड़े खराब हो जाते है, आपको बहुत ज्यादा गीला महसूस होता है तो यह चिंता की बात है ऐसे में आपको तुरंत डौक्टर से दिखवाना चाहिए.
  • प्राइवेट पार्ट में दर्द होना – यदि आपको व्हाइट डिस्चार्ज भी हो रहा है और साथ ही प्राइवेट पार्ट में दर्द भी ऐसे में आप डौक्टर से जरूर सलह लें.

अधिक व्हाइट डिस्चार्ज इंफेक्शन के कारण होता है इसलिए अपने प्राइवेट पार्ट की साफ सफाई रखना बहुत जरूरी है. कभी भी प्राइवेट पार्ट पर साबुन या शैम्पू का इस्तेमाल न करें क्योंकि इससे स्किन का पीएच लेवल बादल सकता है. हमेशा प्राइवेट पार्ट को वॉश करने के लिए गरम पानी या वैजिनल वॉश का इस्तेमाल करें.

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फंदा: भाग-3

इसी बीच जोया ने बेटी को जन्म दिया. सब खुश हुए पर हसन से किसी ने कोई बात नहीं की. शौकत, सना और हिबा ने रूबी की बात जानने के बाद हसन से बात बिलकुल बंद कर दी थी. आयशा उस से थोड़ी बहुत बात कर लेती थीं. उस के खाने, कपड़े की देखभाल वही कर रही थीं.

एक दिन सना ने फोन पर हिबा से कहा, ‘‘मैं ऐसे भाई की कोई मदद नहीं करूंगी, मैं उस से अपना पूरा पैसा वापस मांगूंगी. बहन की आबरू से खिलवाड़ करने वाले भाई से मेरा कोई मतलब नहीं है.’’

हिबा ने कहा, ‘‘आप ठीक कह रही हैं. नफरत हो गई है हसन से, इस ने हम बहनों को हमेशा ही बुरी नजर से देखा है, जोया जैसी सुघड़ बीवी है, सब ने हमेशा उस की हर बात मानी है, मैं भी मांग लूंगी अपने गहने वापस… मुझे भी नहीं करनी उस की मदद… जोया को भी नहीं बता पाएंगे उस की करतूत, बेचारी को धक्का लगेगा.’’

‘‘कल ही हसन से बात करने चलते हैं.’’

‘‘ठीक है.’’

सना रशीद को और हिबा अपनी ननदों को बच्चों का ध्यान रखने के लिए कह कर मायके पहुंचीं. उन्होंने आयशा से हसन के बारे में पहले ही पूछ लिया था. वह घर पर ही था. 4 बज रहे थे. वह सो रहा था. उन की आवाज से हसन की नींद खुल गई. उस ने नीचे से आ रही आवाजों पर ध्यान दिया. समझ गया कुछ बात होने वाली है. सना ने जोर से हसन को आवाज दी, तो वह नीचे आ कर अक्खड़ लहजे में बोला, ‘‘क्या है, बाजी?’’

‘‘मत कहो हमें बाजी… हम नहीं हैं तुम्हारी बहनें. तुम जैसे भाई पर हमें शर्म आती है.’’

हसन दोनों को गुस्से से घूरने लगा.

सना ने कहा, ‘‘मुझे अपने पैसे वापस चाहिए, मुझे तुम्हारी कोई मदद नहीं करनी है.’’

हिबा ने भी फटकार लगाई, ‘‘मुझे भी अपने गहने अभी वापस चाहिए.’’

इस स्थिति का तो हसन ने अंदाजा ही नहीं लगाया था. उस ने सोचा था अभी चिल्लाएंगी, ताने मारेंगी और चली जाएंगी, वे अपनी रकम वापस मांग लेंगी इस का तो अंदाजा ही नहीं था. अत: उस ने अपने सुर फौरन बदले, ‘‘मुझे माफ कर दो मुझ से गलती हो गई. मैं बहुत शर्मिंदा हूं.’’

‘‘नहीं हसन, इस गुनाह की कोई माफी नहीं.’’

तभी वहीं बैठी रूबी हसन से डर कर आवाजें निकालने लगीं. सना से रूबी की हालत देखी नहीं गई. उस ने हसन को एक थप्पड़ लगा दिया, ‘‘देख रहे हो बेशर्म. क्या हालत कर दी इस की, नफरत है हमें तुम से.’’

हसन का गुस्से के मारे बुरा हाल हो गया. पर इस समय हालात उस के काबू में नहीं थे. अत: उस ने नरमी से कहा, ‘‘मैं कल जोया को लेने जा रहा हूं. आप सब की रकम बहुत जल्दी वापस कर दूंगा,’’ कह कर हसन ऊपर चला गया.

जोया के नाम का सहारा ले कर उस ने उन लोगों के गुस्से को चालाकी से ठंडा करने की कोशिश की थी… अपनी मां और बहनों को वह इतना तो जानता ही था कि वे सब जोया को बहुत प्यार करते हैं और उसे कभी दुखी नहीं देखना चाहेंगे. इसलिए रूबी के साथ की गई उस की हरकत को कोई जोया को नहीं बताएगा, इस बात की उसे पूरी गारंटी थी.

सना और हिबा चली गईं. हसन अपनी चालाकियों पर मुसकराता हुआ जोया को लेने जाने की तैयारी करने लगा. अगली सुबह जल्दी निकल गया.

शाम को वह जोया, शान और नन्ही सी बेटी जिस का नाम जोया ने हसन की इच्छा

पर ही माहिरा रखा था, ले कर आ गया. नन्ही माहिरा को शौकत अली और आयशा ने गोद में ले कर खूब प्यार किया. रूबी जोया को देखते ही हसन की तरफ कुछ इशारे कर के बताने लगी तो आयशा ने रूबी को शांत कर दिया.

जोया और बच्चों के आते ही घर में हर समय छायी रहने वाली मनहूसियत कुछ कम हुई पर जोया ने महसूस किया कि कोई हसन से बात नहीं कर रहा है, उस ने एकांत में हसन से पूछा भी, ‘‘कुछ हुआ है क्या मेरे पीछे? सब चुप से हैं.’’

हसन ने हंसते हुए कहा, ‘‘अरे, कुछ नहीं. मैं जरा नए बिजनैस में बिजी था न… काम के प्रैशर में अब्बूअम्मी से ठीक से बात नहीं की, बाहर ज्यादा रहा तो वे नाराज हो गए. अब तुम लोग आ गए हो तो सब ठीक हो जाएगा. जल्दी बाजी लोगों को फोन कर के सब की दावत का इंतजाम करो, बहुत दिन हो गए हैं न.’’

जोया ने मुसकरा कर ‘हां’ में सिर हिलाया.

हसन सीधा बाबा के पास पहुंचा और बहनों के पैसे वापस मांगने के बारे में बताया. बाबा चौंका. फिर बहुत देर तक खूब उलटीसीधी बातें कर के उस ने हसन का बहुत खतरनाक तरीके से ब्रेनवौश किया. रहीसही कसर मजहबी बातों, अफशा की तनहा जिंदगी और खुदा और जन्नत के नाम पर उस की लच्छेदार बातें सुन कर हसन जब बाबा के पास से उठा तो वह कोई और ही हसन था. अपनेआप को बिलकुल अलग महसूस करने वाला खुदा का खास बंदा जो हर अपनेपराए की बुराई खत्म कर उन्हें जन्नत भेजने के लिए आया था. शैतानी दिमाग पर एक अजीब सा सुकून था.

हसन ने बहनों को फोन जोया से ही करवाया. वह जानता था कि बहनें जोया का मन रखने जरूर आएंगी. जोया के कहने पर शनिवार को सना और हिबा अपने बच्चों के साथ आ गईं, हसन से तो सना और हिबा ने बात ही नहीं की. दोनों जोया और उन के बच्चों से ही बातें करती रहीं. नन्ही माहिरा को देख कर सब के चेहरे खिल गए थे, फूल सी माहिरा को सना और हिबा ने खूब प्यार किया, उस के लिए लाए कपड़े और खिलौने दिए.

हसन हमेशा की तरह किचन में व्यस्त जोया का हाथ बंटाने लगा. काम में और बच्चों में व्यस्त होने के कारण जोया ने भाईबहनों के बीच पसरे सन्नाटे को महसूस नहीं किया.

शौकत अली और आयशा जब बाहर से घर लौटे तो हसन ने जोया के साथ मिल कर शानदार डिनर लगवाया. सब हमेशा की तरह साथ खाने बैठे. रूबी सना और हिबा के बीच दुबकी बैठी हुई थी. वह हसन से डरने लगी थी. जोया को रूबी का यह डर महसूस न हो, यह सोच कर वह सब के बच्चों में ही खेलता रहा.

शौकत और आयशा जो हसन की हरकतों से अंदर ही अंदर टूट चुके थे, किसी तरह जोया का चेहरा देख कर अपनेआप को सामान्य दिखाने की कोशिश कर रहे थे. 10 बजे तक सब का डिनर खत्म हुआ. सना और हिबा, जोया के साथ मिल कर बरतन समेटने में मदद करने लगीं. 12 बजे तक बच्चे हंगामा करते रहे.

फिर हसन ने कहा, ‘‘आप सब बातें करें, मैं आप सब के लिए शरबत बना कर लाता हूं.’’

जोया ने शौहर को प्यार भरी नजरों से देखा. सना, हिबा और बाकी लोगों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की ताकि जोया को कोई बात दुख न पहुंचाए. वह बेहद अच्छी इनसान है, यह सोच कर सब ने अपना गुस्सा अपने मन में ही रख लिया था.

हसन ने बेहद सावधानी से अपनी पैंट की जेब से निकाल कर बाबा का दिया एक पाउडर शरबत में मिलाया और ट्रे में रख कर सब को 1-1 गिलास सर्व किया.

उस ने खुद नहीं पिया तो जोया ने पूछा, ‘‘आप नहीं पीएंगे?’’

‘‘अभी नहीं, पेट बहुत भरा है. थोड़ी देर बाद.’’

हसन सब के शरबत पीने के बाद सब गिलास उठा कर ले भी खुद गया, आधे घंटे के बाद सब को तेज नींद आने लगी. जिस को जहां जगह मिली, लेटता गया. शौकत, रूबी, सना के तीनों बच्चे, हिबा और उस के तीनों बच्चे, शान ड्राइंगरूम में ही लेट गए. माहिरा सना की गोद में ही थी. आयशा व सना को जोया ऊपर ले गई. सब बहुत गहरी नींद में सोते चले गए.

हसन ने धीरे से मेन गेट और घर का हर दरवाजा, खिड़की अंदर से बंद कर ली. फिर इत्मीनान से बेखौफ हो कर गहरी नींद में सोए हुए सब से पहले शौकत, फिर हिबा, फिर रूबी, फिर हिबा के तीनों बच्चों, सना के तीनों बच्चों, अपने बेटे शान, सब की गरदन की नसें एक तेज धार वाले चाकू, जो उस ने एक कसाई से खरीदा था, से काटता चला गया. जो अविश्वसनीय था, वह घट चुका था. हसन पूरी तरह शैतान बन चुका था.

फिर हसन ऊपर की तरफ बढ़ा. उस ने वहां सब से पहले जोया और फिर अपनी 2 महीने की फूल सी बेटी माहिरा की गरदन पर भी चाकू चला दिया. हसन के हाथ जरा भी न कांपे. फिर उस ने सना की गरदन की नसें भी काट दीं, पर अचानक बेहोश सना की तेज दर्द से आंख खुल गई.

हसन हंसा, ‘‘चल तू अब अपनी आंखों से सब देख ले मरने से पहले. अब तुझे सब से बाद में मारूंगा.’’

गले की कटी नस से बेइंतहा बहते खून के कारण दर्द में भी सना की तेज चीख निकल गई. वह उठने की कोशिश करते हुए हसन को रोकने की कोशिश करने लगी.

चीख की आवाज से आयशा ने भी आंखें खोल दीं. गरदन घुमा कर जोया और माहिरा के शरीर से खून बहता देखा तो चीख पड़ीं, ‘‘यह क्या किया, हसन?’’

‘‘अभी मेरा काम खत्म नहीं हुआ है, आप और आप की बेटी जिंदा है अभी.’’

आयशा ने घबरा कर हाथ जोड़े, ‘‘नहीं बेटा, मेरी बेटी को छोड़ दे.’’

‘‘नहीं, मैं सब को मार दूंगा, मैं आप सब को इस दुनिया की बुराइयों से दूर भेज रहा हूं, हम अब जन्नत में मिलेंगे.’’

‘‘बाकी सब कहां हैं?’’

‘‘मैं ने सब को मार दिया.’’

आयशा जोर से बिलख उठी. हसन के पैरों में सिर रख दिया, ‘‘नहीं बेटा, मैं तेरी मां हूं, यह गुनाह मत कर, हसन.’’

हसन ने आयशा को एक धक्का दिया. अभी तक बेहोशी की हालत में तो थी हीं. अत: वे गिर पड़ीं. हसन ने पल भर की देर किए बिना मां का गला भी काट दिया. फिर सना की तरफ मुड़ा, ‘‘तुझे भी नहीं छोड़ूंगा.’’

सना हसन को धक्का दे कर किचन की तरफ भागी और दरवाजा बंद करने की कोशिश करने लगी. हसन ने उस के पेट में चाकू घोंप दिया. पर सना आखिरी दम लगा कर किसी तरह हसन को धक्का दे कर किचन का दरवाजा अंदर से बंद करने में कामयाब हो गई. बहतेखून में, टूटती सांसों के साथ उस ने जोरजोर से एक गिलास से ग्रिल बजाई. हसन दरवाजा तोड़ने की कोशिश कर रहा था पर कामयाब नहीं हो पा रहा था.

आवाज सुन कर साथ वाले पड़ोसी अफजल की नींद खुल गई, उन्होंने झांका तो सना की बचाओबचाओ की आवाज सुनाई दी. अफजल ने भाग कर दूसरे पड़ोसी सुलतान बेग का दरवाजा खटखटाया. सब इकट्ठा हो कर किचन की तरफ भागे.

सना भयंकर दर्द से चिल्लाते हुए, कराहते हुए बता रही थी, ‘‘हसन ने सब को मार दिया है. वह मुझे भी मार देगा.’’

यह सुनते ही किसी ने पुलिस को फोन कर दिया. सना खून से लथपथ थी. 3-4 लोगों ने ग्रिल तोड़ कर सना को बाहर निकाला. भीड़ बढ़ती जा रही थी. रात के सन्नाटे में इतनी आवाजों से लोग उठते चले गए थे.

सना इतनी देर में जिंदगी की जंग हार गई. एक पड़ोसिन की गोद में ही उस ने आखिरी सांस ली. सब के रोंगटे खड़े हो गए. हसन अंदर से सब सुन रहा था. सब को सच पता चल चुका था. बाहर पुलिस की गाड़ी आने की आवाज सुनाई देने लगी.

हसन ने अफशा के साथ भागने की योजना बना रखी थी पर सना के बाहर निकलने पर पूरी योजना पर पानी फिर गया था.

पुलिस ने बाहर से दरवाजा खोलने के लिए कहा पर हसन ने दरवाजा नहीं खोला. फिर जहां से सना को बाहर निकाला गया था वहां एक पुलिसकर्मी ने घुस कर दरवाजे, खिड़की खोले. पुलिस अंदर घुसी, कुछ लोग भी हिम्मत कर के अंदर आ गए. अंदर का नजारा देख सख्त से सख्त दिल भी कांप गया. किसी ने भी कभी ऐसा मंजर नहीं देखा था.

हर तरफ खून से सनी लाशें, बच्चे, बड़े सब किसी अपने के ही हाथ अपनी जिंदगी गंवा चुके थे. ऊपर जा कर देखा तो सब की सांसें रुक गईं. ऊपर भी लाशें और मां के ही दुपट्टे से गले में फांसी का फंदा लगा झूलता हसन.

उसे फौरन नीचे उतारा गया पर अब कोई सांस बाकी नहीं थी. यह फंदा सिर्फ मां के दुपट्टे का नहीं था, यह फंदा था बचपन से ही बेटे होने के दंभ का, धार्मिक अंधविश्वासों की दिलोदिमाग पर छा जाने वाली जड़ों, दौलत के लालच का और चरित्रहीनता का.

काफी भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी. आवाजें दरगाह तक भी पहुंचीं तो जमाल बाबा भी जिस तेजी से भीड़ के पीछे आ कर मामले को समझने की कोशिश कर रहा था उसी तेजी से पीछे हट कर गायब हो चुका था.

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