दर्द जो नासूर बन जाता है

दिल्ली में हुए दंगे जिन्हें मुख्यतौर पर भारतीय जनता पार्टी के कपिल मिश्रा ने खुल्लमखुल्ला पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में उकसाया था, में ज्यादा नुकसान औरतों को हुआ जिन के बेटे, पति, पिता, घर, संपत्ति, वाहन नहीं रहे. आदमी आमतौर पर इस तरह के जोखिमों के लिए हर समय तैयार रहते हैं पर सभ्य समाज ने औरतों को अपनी सुरक्षा के मामले में ढीला कर दिया है.

जब दंगों में घर जलते हैं तो मां या पत्नी को ही अधिक चिंता होती है कि 4 घंटे बाद जब सब को भूख लगेगी, वह कहां से खाना लाएगी? जब रात होती है तो उसे चिंता होती है कि दूधमुंहे बच्चों से ले कर जवान लड़कियां कहां सोएंगी? औरतों को दंगों में मारे गए जने का दर्द देर तक भुगतना होता है- सालों तक, जीवन के अंत तक.

पैसा आताजाता रहता है, जानें भी बीमारी या दुर्घटनाओं में जाती हैं पर उस में बाकी दूसरे घर के सदस्य हाथ बंटा कर सांत्वना दे देते हैं. दंगे अचानक होते हैं, घर पर या सड़क पर अचानक बिना गुनाह के कोई मार डालता है, जला डालता है. जो यह कर रहा होता है वह जानवर से भी बदतर होता है, क्योंकि जानवर केवल अपनी सुरक्षा या खाने के लिए मारते हैं, दंगाई तो गिनते हैं कि उन्होंने 10 को मारा या 100 को, 10 गाडि़यां जलाईं या 100, 10 घरों को लूटा या 100 घरों को.

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दंगाई आमतौर पर जानते हैं कि वे भीड़ का हिस्सा होते हैं. अत: बच जाएंगे. दंगाइयों को सरकार पर भरोसा होता है कि वह उन्हें बचाएगी और शिकारों को ही दोषी करार देगी. यह तथ्य भी बहुत पीड़ा देता है.

औरतों की याद्दाश्त ज्यादा तेज होती है. यह प्राकृतिक गुण है, क्योंकि तभी वे छोटे बच्चों को जन्म दे सकती हैं, पाल सकती बाहरी खतरों का आदी होता है और दुश्मन से भी दोस्ती पालने की हिम्मत रखता है.

औरतें दंगों में बलात्कारों की शिकार भी होती हैं. सदियों से राजाओं ने यह छूट सैनिकों को दे रखी थी कि वे जीते गए इलाके में लूट भी मचाएं और औरतों का बलात्कार भी करें. दंगे लड़कियों को भगा ले जाने में सब से ज्यादा कारगर होते हैं.

अफसोस यह है कि यही औरतें दंगों के लिए मुख्यतया जिम्मेदार धर्म को पालपोस कर कंटीला पेड़ बनाए रखती हैं. वे अपने बच्चों को धर्म की अंधभक्त बनाती हैं. वे ही दूसरे धर्मों की आलोचना करती फिरती हैं. वे ही जाति, कुंडली, रीतिरिवाजों की बात करती हैं और वे ही अपने मर्दों को धर्मों के दुकानदारों तक ले जाती हैं.

दंगों के लिए जहां गुंडे जिम्मेदार हैं, उस से ज्यादा धर्म के साए में पलती गुंडों की मांएं भी जिम्मेदार हैं, जो दंगा कर के आने पर अपने बेटों, पति की आरती उतारती हैं.

इन दंगों के बाद कितनी हिंदू औरतों ने अपने दंगाई बेटों को घर में घुसने नहीं दिया? कितनों ने पतियों को छोड़ा? पति द्वारा एक थप्पड़ लगा देने पर तलाक मांगने वाली तापसी पन्नू की बहादुरी पर तालियां बजाने वाली औरतों की जमात कब कहां औरतों को लूटने, उन के घरों को जलाने पर उन को घर निकाला देती हैं?

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#coronavirus: आइये हम कोरोना थूकते है

लेखक-रंगनाथ द्विवेदी

हमारे देश के व्यंग्य साहित्य में थूकने पर लिखना कोई नया नही है, मुझसे पहले भी इस थूकने जैसे व्यंग्य के विषय पर लोग–“अपना बौद्धिक सत्यानाश कर चुके है, व्यंग्य का यही बौद्धिक सत्यानाश आज मुझे भी थूकने जैसे विषय पर व्यंग्य लिखने को ललचा रहा “. क्योंकि अगर मै इस थूकने पर नही लिखूंगा  तो निश्चित जानिए कि मेरे अंदर का व्यंग्यकार मुझे अगले जन्म में तुम भी इसी तरह “कोरोना थूकोगे ऐसा श्राप देगा”. इसलिए मै अपने दिल पर व्यंग्य रखकर शपथ लेता हूं कि–“मै कोरोना थूकता हूं व्यंग्य की वायरल बिधा जो तबलीगी जमात से उपजी है उन्हें मै अपने स्तर के विद्वान के तौर पर समर्पित करता हूं “.

हमारे इस देश में–“थूकने वाले भी दो कटेगरी के है एक तो सभ्य है, दुसरे असभ्य थूकने वाले है”. अब ये आप पर निर्भर है कि–“आइये हम कोरोना थूकते है” को आप इनमे से किस जमात में रखते है. हर देश और उसके राज्य में “थूकने का अपना एक इतिहास-भूगोल है, वैसे ही हमारे देश में भी थूकने का सबसे ज्यादा जनप्रिय इतिहास भूगोल है”. इसपे हमारे देश के “थूकने वाले अपने आप को थूकने का महापुरुष समझे और अपने थूकने पर गर्व करे”. ऐसा नही की सभी इतना ऐतिहासिक तरीके से थूकते है, कुछ बेचारे थूकने वाले यूँही बेमन से थूक देते है.

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हमारे इस देश में आपको यहां-वहा थूकने में सहायक तमाम खाद्य सामग्री छोटी-छोटी लकड़ी की गुमटी से लेकर दुकान में टंगे मिल जाएंगे इन खाद्य सामग्री को गुटखा कहते है. हमारे देश में अधिकांश थूकने वाले–“खैनी और गुटखा का बड़े चटखारे के साथ इसका वैज्ञानिक आनंद लेते है”. इनमे से कुछ एक राज्य ऐसे है जहाँ के कुछ जमातियो ने तो “आइये हम कोरोना थूकते है” कहकर और थूककर थूकने की आधुनिक व्यंग्य साहित्य का सीना ही 56 इंच का कर दिया. कुछ लोग कयास लगा रहे या कह रहे है कि ये “कोरोना वायरस थूकने वाला व्यंग्य पाकिस्तान के आतंकी व्यंग्यकार ने ईजाद किया है ये उसी की नकल कर कोरोना थूक रहे है.

लेकिन मै आपको यकीन दिलाता हूं कि–“आइये हम कोरोना थूकते है” ये मेरे स्वयं के व्यंग्य लेखन का एक भीषण बौद्धिक एक्सीडेंट है. इतना ही नही इस थूकने को हम “व्यंग्य साहित्य का आधुनिक काल भी कह सकते है “. अतः अभी तलक हम आप सभी ने बीना मतलब के बहुत थूका है, लेकिन प्लीज अब हम और आप अपने इस देश के विरुद्ध ना थूके.

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19 दिन 19 टिप्स: 14 साल में ही मौसी करीना की तरह स्टाइलिश हैं करिश्मा कपूर की बेटी समायरा

बौलीवुड में कपूर खानदान को हर कोई जानता है. एक्ट्रेस करीना कपूर (Kareena Kapoor) की एक्टिंग और फैशन किसी से छुपा नही है. वहीं बात जब उनकी फैमिली की आती है तो उनका भी जवाब नही है. बेबो यानी करीना कपूर (Kareena Kapoor) की भांजी समायरा इन दिनों सोशल मीडिया पर छाई हुई है. हाल ही में एक फैमिली फंक्शन में एक्ट्रेस करीना कपूर(Kareena Kapoor) , करिश्मा कपूर (Karisma Kapoor)अपनी बेटी संग पहुंची, जिसमें उनका लुक बेहद खूबसूरत था. आइए आपको दिखाते हैं मौसी करीना की तरफ समायरा के कुछ फैशनेबल लुक, जिसे आप भी ट्राय कर सकती हैं.

1. समायरा की ये ड्रेस है परफेक्ट

रेड कलर की लौंग ड्रेस आउटिंग या वेकेशन के लिए परफेक्ट औप्शन है. आप इसे वाइट शूज के साथ भी कौम्बिनेशन बना कर पहन सकते हैं. ये आपके लुक को ट्रेंडी बनाने में मदद करेगा.

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2. वेडिंग सीजन के लिए परफेक्ट है ये लुक

अगर आप वेडिंग सीजन के लिए परफेक्ट लुक चाहतीं हैं तो समायरा का ये सिंपल ब्लू लहंगा परफेक्ट औप्शन है. इसके साथ ब्लू कौम्बिनेशन के इयरिंग्स ट्राय कर सकती हैं. ये आपके लुक को एक अलग लुक देगा.

3. कौम्बिनेशन है परफेक्ट

 

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अगर आप वेडिंग सीजन में अपनी मां के साथ मिलकर कौम्बिनेशन ट्राय करना चाहती हैं तो करिश्मा कपूर और उनकी बेटी समायरा का ये कौम्बिनेशन लुक आपके लिए परफेक्ट औप्शन है.

4. पिंक लहंगा है परफेक्ट

वेडिंग सीजन में पिंक कलर अक्सर पौपुलर होता है. पिंक कलर आपके लुक को खूबसूरत लुक देने में मदद करता है. आप भी समायरा की तरफ अपनी मम्मी के साड़ी के कलर कौम्बिनेशन को ट्राय करते हुए पिंक कलर का लहंगा ट्राय करें.

काले अंडरआर्म्स के कारण मुझे शर्मिंदगी होती है, मै क्या करूं?

सवाल-

मेरी समस्या यह है कि थोड़ी भी गरमी महसूस होने या धूप में निकलने से मेरी बगलों में पसीना आने की समस्या शुरू हो जाती है. मेरी अंडरआर्म्स भी काफी डार्क है, जिस से मुझे काफी शर्मिंदगी महसूस होती है. बताएं मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब-

बगलों में पसीना आना और डार्क अंडरआर्म्स अकसर महिलाओं को परेशान करती हैं. इस परेशानी से बचने का सब से बेहतर तरीका है नीबू के रस और बेकिंग सोडा का प्रयोग. जहां नीबू के रस से आप की त्वचा का रंग हलका हो जाएगा, वहीं बेकिंग सोडे से ज्यादा पसीना आने की समस्या दूर हो जाएगी.

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चेहरे की रंगत निखारने के लिए आप कई तरह के क्रीम, लोशन और मास्क का इस्तेमाल करती हैं. लेकिन क्या आपने कभी अपने अंडरआर्म्स पर गौर किया है? समय की कमी के कारण आप रेजर यूज कर लेती हैं लेकिन रेजर यूज करने के साइड-इफेक्ट बहुत बाद में उनके सामने आते हैं. कुछ लोग हेयर-रीमूवल क्रीम  का भी इस्तेमाल करते हैं लेकिन इनमें भी मौजूद केमिकल्स भी स्क‍िन पर बुरा असर डालते हैं.

अगर आपको भी अंडरआर्म्स से जुड़ी ये परेशानी होती हैं तो इन घरेलू टिप्स को अपनाकर आप इससे छुटकारा पा सकती हैं.

  1. नारियल तेल

शरीर पर मौजूद हर तरह के दाग-धब्बों के लिए नारियल तेल लगाने की सलाह दी जाती है. नारियल तेल को आप चाहें तो कपूर के साथ मिलाकर भी लगा सकते हैं. इसमें मौइश्चराइज करने का गुण पाया जाता है.

2. आलू

आलू एक नेचुरल ब्लीच है. आलू को गोलाई में पतले-पतले स्लाइस में काट लें. इन स्लाइस से पांच से सात मिनट तक अंडरआर्म्स की मसाज करें. फिर ठंडे पानी से अंडरआर्म्स साफ कर लें. सप्ताह में दो से तीन बार करने से आपको फायदा होगा.

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4 टिप्स: समर शौर्टस फैशन करें ट्राय

गरमियों में हर किसी को घूमना पसंद है. आप वौटर पार्क और बीच यानी समुद्र के पास घूमना या ट्रैवल करना पसंद करते होंगे, जिसके लिए आप कम्फरटेबल कपड़े पहनना पसंद करते हैं और आप शौर्टस का फेवरेट हैं. तो आज हम आपको शौर्टस के कुछ स्टाइलिश कौम्बीनेशन के बारे में बताएंगे, जिससे आपको एक स्टाइलिश लुक के साथ-साथ कम्फर्ट भी मिलेगा.

1. रफ कट डेनिम शौर्टस के साथ शर्ट का कौम्बिनेशन

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अगर आप कहीं फौर्मल या मार्केट घूमने का प्लान बना रहीं हैं तो ये कौम्बिनेशन आपके लिए बेस्ट होगा. यह ड्रैसअप आपके लिए गरमी के लिए सबसे कम्फरटेबल आउटफिट साबित होगा.

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2. ब्लैक शौर्टस के साथ औफस्लीव टौप करें ट्राई

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अगर आपको किसी पार्टी में जाकर खुद को हौट दिखाना है तो ये ड्रैस आपके लिए बेस्ट औप्शन्स में से है. ये आपकी लाइट ब्राउन बौडी कलर के साथ परफेक्ट साबित होगी.

3. औफिस लुक के लिए भी अच्छा औप्शन है कलरफुल शौर्टस

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गरमियों मे यह जरूरी नहीं की आप घर से बाहर सिर्फ घूमने के लिए ही निकले. अगर आप वर्किंग वुमन हैं तो यह आपके लिए बेस्ट आउटफिट है. इसे आप किसी डेली औफिस जाने के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं.

4. कलर मैचिंग शौर्टस कर सकतीं हैं ट्राई

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अगर आपके पास कलरफुल ब्लेजर हैं तो आप उन्हें कलरफुल शौर्टस के साथ मैच करके पहन सकते हैं. कलरफुल शौर्टस को आप शूज के साथ मैच करके पहन सकती हैं. यह आपको मार्केट हो या औफिस, दोनों के लिए अच्छा और स्टाइलिश लुक होगा.

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यौन स्वास्थ्य: वैजाइनल ड्रायनेस और दर्द जैसे मुद्दों की न करें अनदेखी

वैजाइनल ड्राइनेस यानी योनिमार्ग का सूखा होने की समस्या, सभी आयुवर्ग की महिलाओं में हो सकती है, लेकिन रजोनिवृति के बाद तो यह समस्या हर महिला में आम हो गई है. यह अनुमान लगाया गया है कि समस्या पोस्टमेनोपॉजल महिलाओं के लगभग आधे हिस्से को प्रभावित करती है और उनमें से अधिकांश जो अपने लक्षणों के लिए इलाज की तलाश नहीं करते हैं, जिसमें न केवल सूखापन, बल्कि  इंटरकोर्स के दौरान जलन और दर्द भी शामिल है.

यह अन्य जीर्ण स्थितियों की तरह के जीवन की गुणवत्ता को कम कर सकता है. जबकि अन्य रजोनिवृत्ति के लक्षण, जैसे कि हॉट फ्लैशेज, आमतौर पर समय के साथ गिरावट आती है, योनि का सूखापन बना रहता है क्योंकि यह शारीरिक परिवर्तन से उत्पन्न होता है – विशेष रूप से एट्रोफी ऑफ टिश्यूज, जो एस्ट्रोजेन के नुकसान के कारण पतले, सूखने वाले और कम लचीले हो जाते हैं.

वैजाइनल ड्राइनेस के लक्षण

*    संभोग के दौरान ल्यूब्रिकेशन और दर्द का नुकसान मेनोपॉज के बाद, लुब्रिकेशन और दर्दनाक सेक्स समस्याओं में वृद्धि होती है. योनि के आसपास की त्वचा का पतला होना इसे और अधिक आसानी से क्षतिग्रस्त कर देता है. यह क्षति अक्सर सेक्स के दौरान हो सकती है, खासकर अगर लुब्रिकेशन खराब हो. यहां तक कि कोमल घर्षण से दर्द और असुविधा हो सकती है. दर्दनाक संभोग के कारण यौन इच्छा की हानि में बढ़ाने वाले प्रभावों को और अधिक कर सकते हैं.

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*    वैजाइना और वल्वा की उपस्थिति में परिवर्तन – योनि का अलग दिखना आम बात है क्योंकि इसके किनारे और पतले हो जाएंगे.

*    वैजाइनल डिस्चार्ज में परिवर्तन -महिला महिलाओं को भी अपने योनि स्राव में बदलाव देखने को मिलता है क्योंकि यह जलन के साथ अधिक बदबूदार और थोड़ी बदबूदार होती है. ये लक्षण चिंताजनक हो सकते हैं लेकिन वे केवल हार्मोनल परिवर्तनों के कारण होते हैं और कुछ और गंभीर होने के संकेत नहीं होते हैं.

*    भावनात्मक प्रभाव – वैजाइना का सूखापन महिलाओं को अलग महसूस करा सकता है. शरीर में परिवर्तन को स्वीकार करना मुश्किल हो सकता है और स्थिति के कारण होने वाले दर्द और परेशानी से आत्मविश्वास और यौन आत्मविश्वास में कमी हो सकती है.

कभी-कभी ये लक्षण भ्रम पैदा कर सकते हैं क्योंकि वे यौन संचारित रोगों या थ्रश(छालों) के लक्षणों के समान होते हैं. जैसा कि ये एक शर्मनाक समस्या है, कई महिलाएं इसे इस पीड़ा को सहन रखती हैं और यह उनके साथी के साथ सम्बन्धों पर एक बड़ा दबाव डाल सकता है, खासकर अगर महिलाएं अपने साथी को यह बताने में असमर्थ महसूस करती हैं कि उन्हें यौन गतिविधि में रुचि क्यों नहीं है.

 इलाज

यदि कोई महिला इन उपरोक्त लक्षणों का अनुभव कर रही है, तो उसका डॉक्टर के पास जाना ही उचित  है. कुछ स्किन रिलेटेड कंडीशन हैं जो समान लक्षणों का कारण हो सकती हैं, जैसे कि जननांगों पर पतली, धब्बेदार सफेद त्वचा, जिसके कारण श्लेष्मा होता है, श्लेष्मा से झिल्ली और शरीर के अन्य क्षेत्रों खुजली होती है .

कम आम तौर पर, एक ही लक्षण डिसप्लासिया नामक एक  स्थिति से उत्पन्न हो सकता है.

वैजाइनल यिस्ट इन्फेक्शन या दाद वायरस के कारण लक्षण भी वेजाइना सूखापन की तरह हो सकते हैं.

एक बार जब अन्य स्थितियों से इनकार कर दिया जाता है, तो डॉक्टर योनि के सूखापन के समाधान खोजने के लिए काम कर सकते हैं, चाहे वह एक वैजाइनल माॅस्चराइजर, वैजाइनल एस्ट्रोजन, या कोई अन्य उपचार शामिल हो.

चिकित्सक भी इंटरकोर्स के दौरान एक महिला को ल्युब्रिकेन्ट का उपयोग करने की सलाह दे सकते हैं या हार्मोन थेरेपी के अन्य रूपों की पेशकश कर सकते हैं.

अन्य उपचारों के अलावा, एक अच्छी स्किन की देखभाल वाली डाइट आपके वैजाइना के टिशू को हाइड्रेट करने में मदद कर सकती है, जिस तरह यह शरीर के अन्य क्षेत्रों पर शुष्क त्वचा की मदद कर सकता है.

वैजाइना के लिए नियमित लोशन की सिफारिश नहीं की जाती है, लेकिन एक नारियल तेल, या यहां तक कि जैतून का तेल मॉइस्चराइजर के रूप में आजमा सकते हैं. कुछ महिलाओं को रात में उपयोग करना आसान लगता है लेकिन इन सबके नियमित उपयोग से संक्रमण हो सकता है.

इसके अलावा, संभावित योनि इरिटेंट से सावधान रहें, जैसे कि मूत्र असंयम के लिए पैड. ये पैड त्वचा में सूजन ला सकते हैं, क्योंकि इसमें सुगंधित डिटर्जेंट और कुछ अंडरवियर फेब्रिक हो सकते हैं.

आमतौर पर, सूती अंडरवियर नियमित आधार पर पहनने के लिए सबसे अच्छा विकल्प है.

सुगंधित साबुन से बचें.

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एक मौन समस्या

वैजाइनल ड्राइनेस से संबंधित समस्याओं का सामना करने वाली महिलाओं की भारी संख्या के बावजूद, यह अभी भी एक मूक समस्या है कि बहुत सी महिलाएं अपने साथी, दोस्तों और यहां तक कि डॉक्टरों से बात करने में शर्मिंदगी महसूस करती हैं. इन समस्याओं के साथ केवल एक चैथाई महिलाएं वास्तव में उपचार चाहती हैं.

याद रखें, रजोनिवृत्ति के बाद की अवस्था में अपना जीवन व्यतीत करने वाली महिलाओं को यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वे रजोनिवृत्ति से पहले जीवन की गुणवत्ता बनाए रखें. वैजाइनल ड्राइनेस को बढ़ती उम्र के अपरिहार्य भाग के रूप में इलाज करने की आवश्यकता नहीं है – इसके बारे में कुछ किया जा सकता है. महिलाओं को अपनी समस्याओं को अपने जीवन के हिस्से के रूप में छोड़कर समाधान प्राप्त करने के लिए आना चाहिए.

लेखक डॉ संचिता दुबे, फीमेल इश्यू एक्सपर्ट्स, मदरहुड हॉस्पिटल नोएडा

इन बातों पर करेंगी अमल, तो मिसाल बन जाएगा सास बहू का रिश्ता

भावना दिल्ली की थीं, पर इटली में काम करती थीं. वहीं उन्होंने एक रैस्टोरैंट के मालिक से प्रेम विवाह किया. अब दोनों मिल कर अपना काम करते हैं. भावना कहती हैं, ‘‘मुझे शुरूशुरू में बड़ा अचरज हुआ जब पता चला कि यहां इटली में भी सासबहू की बातें भारत जैसी ही हैं. मैं काफी सांवली हूं जबकि मेरे पति आंद्रयै काफी गोरेचिट्टे, लंबेचौड़े और हैंडसम हैं. मेरी सास ने जब मुझे पहली बार देखा तो वे खुश नहीं थीं. अपने बेटे को उन्होंने समझाने की भरसक कोशिश की. उन का कहना था कि बहू ऐसी तो होनी चाहिए, जो आंखों को अच्छी लगे. तुम इतने मूर्ख होगे यह मुझे मालूम न था. जब इस के जैसे सांवले और नाटे बच्चे हमारे घर में घूमेंगे तो मैं उन्हें प्यार नहीं कर पाऊंगी. इस ने कोई काला जादू कर के तुम्हें फंसा तो नहीं लिया? तुम ढंग से सोच लो…

‘‘इत्तफाक से मेरे दोनों बच्चे प्यारे, सुंदर और उन लोगों जैसे हैं तो गाड़ी चल रही है. फिर भी मेरी सास ने अपने बेटे का मुझ से प्यार देख कर मुझे काफी तराशा और निखारा. जिम जौइन कराया. 10 किलो वजन कम कराया. हेयरस्टाइल और ऐसे ही तमाम नुसखों से मुझे निखारा. वे आज भी यानी शादी के 11 साल बाद भी मेरे प्रति मुस्तैद और चौकन्नी रहती हैं. वे देखती रहती हैं कि मैं पति का ध्यान रखती हूं कि नहीं. उस की कमाई फालतू तो नहीं उड़ाती और उन के पोतेपोतियों की परवरिश कैसी है वगैरह.

‘‘वहां भी नईपुरानी किसी भी उम्र की बहुएं मिलती हैं तो सास, ननद, देवर की खूब बातें करती हैं. वहां के पतियों की भी अपेक्षा रहती है कि उन के घर वालों का ध्यान रखा जाए.’’

लेनदेन भी है मुद्दा

ऐलियाना (बदला हुआ नाम) विदेश प्रसारण सेवा में हैं. वे कहती हैं, ‘‘मैं वैसे तो इंगलैंड की हूं पर इधर 4 साल से दिल्ली में हूं. मैं कई देशों में सेवाएं दे चुकी हूं और इस क्षेत्र से जुड़ी होने के कारण किसी भी देश के समाज को मुझे नजदीक से देखने का अवसर मिलता है. हालांकि भारत जैसी दहेज प्रथा विदेशों में नहीं है फिर भी वहां काफी लेनदेन है.

‘‘मेरी सास अपना स्टेटस खूब ऐंजौय करती है. मैं हिंदुस्तान में रहने के कारण कई बार वहां के त्योहार या स्पैशल डेज भूल जाती हूं, तो वे बाकायदा फोन या मेल के जरीए एतराज जताती हैं. वे मदर्स डे, क्रिसमस या ऐसे ही किसी मौके पर दिए जाने वाले उपहार खुद साथ चल कर खरीदना चाहती हैं. वहां भी बेटे द्वारा दिए गए उपहार की चर्चा आम बात है और बहू के कारण बेटे की नजरें बदल गई हैं, यह माना जाना भी आम है.

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‘‘मैं भारत से अपनी सास के लिए छोटीछोटी चीजें ले कर जाती हूं तो वे बच्चों की तरह चहक उठती हैं. ससुर भी घर में आनेजाने वालों को गर्व से बताते हैं कि ये चीजें उन की बहू ले कर आई है. वे मुझ से और मेरे पति से उम्मीद करती हैं कि हम क्रिसमस जैसे बड़े मौके पर पार्टी करें और इन के कजिन्स को भी उपहार दें. हर बहू की तरह मैं ने भी ससुराल वालों से अपनी सास के बहू रूप में बिताए समय की पड़ताल की तो जाना कि वे अपनी सास की काफी अच्छी बहू रही हैं. दोनों साथसाथ घूमनाफिरना, सिनेमा देखना, बाहर खाना ऐंजौय करती रही हैं. शायद इसीलिए वे मुझे भी ऐसी बहू के रूप में देखना चाहती हैं. पर मैं थोड़ी रिजर्व हूं जिस की कमी मेरे पति अपनी उदारता से पूरी करते हैं.’’

ऐलियाना की एक कुलीग ओलिविया कहती हैं, ‘‘बच्चे के बड़े हो जाने पर भी मां का दिल उसे बच्चा ही मानता रहता है. मेरी सास मुझ में अपना रूप खोजती हैं. वे चाहती हैं मैं उन के बेटे की देखरेख उन की तरह ही करूं. उन्हें यह अच्छा नहीं लगता कि उन का सुबह जल्दी उठने वाला बेटा मुझ से शादी के बाद देर से उठने वाला बन गया है. मैं ने पाया है कि सासबहू के रिश्ते में लेनदेन कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. मुद्दा भावनाओं का है कि आप किस तरह अपना प्यार जताते हो.

‘‘मैं कुर्ग, चिकमगलूर और ऐसे ही प्रसिद्ध जगहों की कौफीचाय वगैरह ले कर जाती हूं तो वे बागबाग हो जाती हैं. कई लोगों को वे ये चीजें बना कर पिलाती हैं. कई बार तो इन छोटी सी चीजों के लिए वे अपनी ओर से पार्टी रख लेती हैं. वे अपनी ओर से भी मुझे कभी खाली हाथ विदा नहीं करतीं. मैं अब समझ पाई हूं कि आप को प्यार जताना भी आना चाहिए. गिफ्ट तथा फोन आदि के जरीए उसे जल्दी व ज्यादा आसानी से जताया जा सकता है.’’

अपेक्षाएं भी खूब

अकसर सास चाहती है कि बहू उस से कुछ हुनर सीखे. मार्टिना अमेरिकन बहू हैं. वे कहती हैं, ‘‘मेरी सास मेरे मां बनने के बाद मेरी देखरेख के लिए आईं, तो उन्हें बच्चे को बौटल से दूध पिलाना नहीं रुचा. इसी तरह मेरा किचन में जा कर मनपसंद खाना खाना भी नहीं रुचा. इस कारण पति की और मेरी अनबन होने लगी. जब पति ने मेरा ध्यान इस ओर दिलाया कि 60 की उम्र में भी लोग मेरी मम्मी को 30 का समझते हैं, जिस का कारण उन का हुनरमंद होना ही है, तो मैं ने कुछ दिनों के लिए उन की बात मान ली. पर अगली बार मां बनने पर मैं ने अपनी मां को बुलाया. मेरे पति को दुख है कि मैं उन की मां को नहीं समझ पाई. साथ ही उम्र से पहले मैं अधेड़ दिखने लगी हूं.’’

दिल्ली के एक परिवार की नीदरलैंड की बहू केन्यूसी कहती हैं, ‘‘वहां तो सासें अपने बेटों से ही नहीं बहुओं से भी पर्सनल बातें पूछ लेती हैं. वहां भी सासससुर चाहते हैं कि उन का आदर व लिहाज किया जाए. दुखसुख के बारे में पूछा जाए. पोतेपोतियों को उन के पास छोड़ा जाए. उन के दूसरे बेटेबहू या बेटियों के प्रति भी प्यार रखा जाए. ‘पति का पैसा केवल मेरा है’ जैसी स्थितियां वहां भी झिकझिक व तलाक का कारण बनती हैं. अभी दुनिया भर में मंदी का दौर चला तो कई सासों ने बेटेबहुओं से अपने दूसरे बेटेबेटियों की मदद की अपेक्षाएं की. दूसरे देश, कल्चर और नस्ल की बहू आने पर भी वहां अपेक्षा की जाती है कि बहू उन के बेटे व उस के देश तथा कल्चर के अनुरूप ढले. उन के बेटे को ऐसा न करना पड़े. जब कभी मौका आए तो वह परिवार के और लोगों का भी सहयोग करे तथा उदारता का परिचय दे.’’

तुलना भी खूब

विदेशों में देवरानीजेठानी व बहूबेटी की तुलना भी खूब है. रेशम ने अपने ही कुलीग अमेरिकन युवक से शादी की. वे कहती हैं, ‘‘वहां 4 सासें मिलते ही बहुओं के लेनदेन तथा स्वागतसत्कार की तुलना करने लगती हैं. मेरी सास तो मुझ से मेरे मुंह पर ही कह देती हैं कि मैं सोचती थी कि भारतीय लड़की मेरा ज्यादा ध्यान रखेगी पर तुम्हारी तुलना में जरमन बहू ज्यादा अच्छी है. वह भले ही तुम्हारे जितना लेनादेना नहीं करती पर मुझे आदरमान देती है. जिंदगी के मेरे 70 सालों के अनुभव से लाभ उठाती है. कहीं जानेआने से पहले बताती है, शेयर करती है.

‘‘तब मैं ने सोचना शुरू किया कि दुनिया भर की मांएं एक जैसी हैं. अगर बेटों को बहू चुनने की और उस से छुटकारा पाने की आजादी है तो इस का मतलब यह नहीं कि वे मनमानी करते फिरें. वहां सासें बहुओं पर निगरानी रखती हैं कि उन का कहीं और अफेयर न हो जाए, वे उन के बेटों को ठग न लें, डाइवोर्स के मामलों में भी देवरानीजेठानी या आसपड़ोस के अच्छे रिश्तों का हवाला दे कर संबंधों को निभाने की कोशिशें करवाती हैं.’’ रशियन मूल की श्रीमती आला कहती हैं, ‘‘रशियन सासों को अभी भी बच्चों के पालने की पुरानी स्टाइल और नुसखों पर गर्व है. वे घरेलू बहू भी पसंद करती हैं और जरूरत पड़ने पर जितना हो सकता है बहुओं का घर भी संभालती हैं. इस कारण नई पीढ़ी की बहुओं और पुरानी पीढ़ी की सासों में बहस व द्वंद्व आदि आम हैं.’’

शोषण, दोहन तो नहीं

विदेशों में नौकर आसानी से नहीं मिलते. ऐसी स्थिति में काम को ले कर पतिपत्नी और घर के और लोगों में लड़ाइयां आम हैं. बच्चा होने पर बहुएं उम्मीद करती हैं कि सासें आ कर उन की सारसंभाल करें. सासों को लगता है कि बहू उन्हें केवल बेबी सीटर न समझे. अगर वे अपना घर छोड़ कर आएं तो अपने पति के साथ रहने खानेपीने व सोने की व्यवस्था भी आरामदायक हो. उन की सेवा का मोल भी बहू समझे. इसी तरह नौकरीशुदा बहू टूअर या किसी कारण से उन के पास बच्चा छोड़ जाए तो उन पर भरोसा करे. 2 पैसा भी हाथ पर रखे. उन के खर्चों और सुविधाओं का भी ध्यान रखें. दुनिया इस हाथ ले उस हाथ दे के सिद्धांत पर अच्छी चलती है. शोषणदोहन कर के कोई कितना ही खुश हो ले पर वह लंबी रेस का घोड़ा साबित नहीं हो सकता.

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भारत मूल के जरमन काउंसलर प्रभु कई देशों का भ्रमण कर चुके हैं और कई सासबहुओं को परामर्श दे चुके हैं. वे कहते हैं कि पति और बेटे पर प्रभुत्व जमाने की चाह सासबहू रिश्ते का मूल है. चाहे नकारात्मक स्थिति हो चाहे सकारात्मक कई बहुएं मांबेटे की सहज आत्मीयता को गलत रिश्ते का नाम दे देती हैं, तो कहींकहीं सासें बहू को बेटे को लूटने, ठगने वाली के रूप में देखती हैं. भावात्मक रिश्ते पूरी दुनिया में एक जैसे हैं. उन्हें समझदारी, सूझबूझ तथा प्यार से हैंडल करना आना चाहिए या सीखना चाहिए वरना इन के बीच पुरुष 2 पाटों के बीच पिसने जैसा महसूस करता है.

#lockdown: दही और पुदीने की सीक्रेट चटनी

पुदीना एक ऐसा पौधा है, जिसका उपयोग भारतीय रसोईघरों में मुख्य रूप से चटनी के रूप में किया जाता है.इसकी अनेक खूबियां हैं. यह भोजन को पचाने में तो कारगर है ही, पेट में होने वाले काफी रोगों के उपचार में भी उपयोगी साबित होता है.

पुदीने में मेंथोल, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन-ए, कॉपर, आयरन आदि पाये जाते हैं.पुदीना के पत्तों का सेवन कर उल्टी को रोका जा सकता है और पेट की गैस को भी दूर किया जा सकता है.यह जमे हुए कफ को बाहर निकालता है. वहीँ दूसरी ओर दही भी हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी होता है.इसका उपयोग हर घर में होता है.लेकिन क्या आपको पता है दही में कई प्रकार के पौष्टिक तत्व मौजूद होते हैं जिनको खाने से शरीर को फायदा होता है.दही में कैल्शियम, प्रोटीन, विटामिन पाया जाता है.दूध के मुकाबले दही सेहत के लिए ज्यादा फायदा करता है.दही में दूध की अपेक्षा ज्यादा मात्रा में कैल्शियम होता है.इसके अलावा दही में प्रोटीन, लैक्टोज, आयरन, फास्फोरस पाया जाता है.

खून के अंदर की वसा की मात्रा घटाने की क्षमता दही में होती है.इसलिये दही के सेवन से दिल के बीमारी की संभावना कम होती है और रक्तचाप भी नियंत्रण में रहता है. ज्यादातर लोगों को खाने के साथ चटनी खाना बहुत पसंद होता हैं या यूं कहें कि भारतीय थाली में चटनी की अपनी एक अलग ही जगह होती है.

दही और पुदीने का मेल बहुत अनोखा होता है .इससे बनी चटनी पेट के लिए काफी फायदेमंद होती है. यह आपकी पाचन क्रिया को दुरुस्तस रखती हैं और आपकी भूख बढ़ाती है. हम अक्सर रेस्टोरेंट या ढाबे में स्टार्टर के साथ इस चटनी को खाते है. पर हम समझ ही नहीं पाते की यह किस तरह से बनती है.आइये आज हम इस सीक्रेट चटनी को बनाने की विधी जानते हैं-

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हमें चाहिए-

पुदीने की पत्तियां-1 कप

हरे धनिया की पत्तियां-1/2 कप

हरी मिर्च-2

दही -1 ½

अदरक-1/2 इंच कटा हुआ

पिसा जीरा -1/2 छोटी चम्मच

काला नमक- ½ छोटी चम्मच

नमक स्वादानुसार

बनाने की विधि-

1-सबसे पहले मिक्सर जार में पुदीने की पत्तियां,हरा धनिया,हरी मिर्च ,अदरक और थोड़ा सा पानी डालकर बारीख पीस ले.

2-अब एक कटोरी में दही ,डाले फिर उसमे तैयार किया हुआ धनिया और पुदीने का पेस्ट डालें .

3-अब उसमे पिसा हुआ जीरा ,काला नमक और स्वादानुसार सफ़ेद नमक डालकर अच्छे से फेट ले.

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4-तैयार है दही और पुदीने की स्वादिष्ट चटनी.

5-इसको आप किसी भी स्नैक्स या स्टार्टर के साथ खा सकते है.

#lockdown: प्रवासी मजदूर आखिर क्यों बन गये हैं सरकारी रणनीति की कमजोर कड़ी?

21 दिन के भीतर दूसरी बार सरकार से यह बड़ी चूक हुई. एक बार फिर न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारें, ये अनुमान लगा पायीं कि प्रवासी मजदूर लाॅकडाउन-2 के बाद भी लाॅकडाउन-1 की तरह ही सरकार और व्यवस्था की परवाह किये बिना अपने घरों के लिए निकल पड़ेंगे. हालांकि इस बार प्रवासी मजूदरों को उम्मीद थी कि केंद्र और राज्य सरकारें उनकी परेशानियांे और 21 दिनों की बाडेबंदी के दौरान आयी मुश्किलों को समझेंगी तथा उन्हें उनके घर जाने का कोई बंदोबस्त करेंगी. भूल जाइये कि इस संबंध में किसी ने अफवाह उड़ायी थी. यह अफवाह का मसला नहीं था, वास्तव में देश के तमाम शहरो में अब भी 8 करोड़ से ज्यादा रह रहे दिहाड़ी मजदूरों की यह दिली ख्वाहिश थी कि सरकार उनकी मुश्किलों को समझेगी और उन्हें उनके घर तक पहुुंचाने का कोई सुरक्षित बंदोबस्त करेगी. लेकिन सरकार की तो दूर दूर यह प्राथमिकता में ही नहीं था, चाहे वह राज्यों की सरकारें हों या केंद्र की सरकार.

यही वजह है कि देश का मीडिया और मध्यवर्ग मजूदरों के इस तरह निकलकर सड़कों, स्टेशनों और बस अड्डों में पहुंच जाने से हैरान है. लेकिन यह हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए; क्योंकि दिल्ली जैसे शहर में जहां माना जा रहा है कि राज्य सरकार मजदूरों के खानेपीने की भरपूर व्यवस्था कर रही है, वहां भी अव्वल तो सैकड़ों शिकायते हैं कि जरूरतमंद लोगों को खाना नहीं मिल रहा. गैर जरूरतमंद लोग ही खाने को झटक देते हैं. दूसरी शिकायत यह भी है कि एक बार खाना पाने के लिए लोगों को डेढ़-डेढ़ दो-दो घंटे लाइन में लगना पड़ रहा है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जो लोग लाॅकडाउन की स्थिति में अपने घर नहीं जा पाये, वे लोग यहां रहते हुए किस तरह परेशानियों और उपेक्षा का शिकार हैं. शायद यही वह कारण है कि जैसे ही जरा सी उम्मीद बंधी कि सार्वजनिक परिवहन शुरु हो सकता है तो मजदूर सारी नाकेबंदी, बाड़ेबंदी तोड़कर बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और उन जगहों में पहुंच गये, जहां से उन्होंने उम्मीद की थी. कोई न कोई सवारी उन्हें अपने गांव तक जाने के लिए मिल जायेगी.

देश में सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से सबसे मजबूत माने जाने वाले शहरों, मुंबई, हैदराबाद, सूरत और कुछ हद तक बंग्लुरु में भी बड़ी संख्या में मजदूर घरों से सड़क पर निकल आये. वे मोदी जी के भाषण के पहले ही बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों में आ गये थे क्योंकि उन्हें हालत में अपने घर जाने की चाह थीं. लेकिन न तो लाॅकडाउन खुला और न ही उनके घर जाने की व्यवस्था हुई. उल्टे उन्हें तमाम परेशानियों और भूखे पेट सोने के बावजूद पुलिस की मार खानी पड़ी, अपमान सहना पड़ा और एक अनिश्चित दहशत में कैद हो जाना पड़ा. आप कह सकते हैं कि मीडिया में या सरकार की तरफ से आ रही हिदायतों में तो  जरा भी कोई ऐसा संकेत नहीं था कि लाॅकडाउन में छूट मिलेगी. फिर मजदूरों ने यह कैसे अनुमान लगाया. इसका जवाब यह है कि मजदूर न तो हमारी इस व्यवस्था के दायरे में है और न ही वो किसी तरह की सरकारी, गैरसरकारी कम्युनिकेशन व्यवस्था का भी हिस्सा हैं. यह हैरान करने वाली बात लग सकती है लेकिन सच्चाई यही है कि देश के करोड़ों मजदूर देश में रहते हुए भी उस मध्यवर्ग से बिल्कुल एक अलहदा और कटा हुआ जीवन जी रहे हैं, जिस मध्यवर्ग को अपने देश होने का गुमान है. मजदूर न तो इनसे कोई संपर्क करता है और न ही इनके द्वारा संपर्क किये जाने की कोई उम्मीद करता है.

यह हाहाकारी सामाजिक स्थिति है. भले हम इसे न जानते हों या जानकर भी इससे मुंह मोड़ रखा हो. कोरोना एक ऐसी भयावह सामाजिक स्थिति है, जब हिंदुस्तान में कैसे अलग अलग वर्ग अपने में सिमटकर रहता है, इसका खुलासा हो रहा है. लाॅकडाउन-1 के बाद सरकार ने और प्रशासन ने यह स्वीकारा था कि उसे मजदूरों की मनःस्थिति की भनक नहीं लगी थी. लेकिन वाकई अगर सरकार ने या प्रशासन ने लाॅकडाउन-1 के समय खुद से हुई गलतियों को गलती माना होता और यह सोचा होता कि मजदूरों का कभी कोई भावनात्मक और सामाजिक पक्ष है तो निश्चित रूप से उन्हें लाॅकडाउन-2 के पहले मजदूरों का ख्याल रहा होता. लेकिन सच्चाई यही है कि सरकार हो या प्रशासन वह मीडिया के सामने आम लोगों और मजदूरों के लिए भले घड़ियाली आंसू बहाते दिखते हों, लेकिन प्रवासी मजदूरों की उनके लिए कोई महत्ता नहीं है.

क्योंकि लाॅकडाउन-1 के बाद भी यही स्थिति थी कि प्रवासी मजदूर, चाहे जहां भी हों, उनके पास न काम था और न बचत. इसलिए इनका पेट भरना बड़ी चुनौती बन गई थी. गृह मंत्रालय ने सभी केंद्र शासित प्रदेशों व राज्यों से प्रवासी मजदूरों का कल्याण सुनिश्चित करने के लिए कहा है. इसके लिए एक केन्द्रीय कंट्रोल रूम भी स्थापित किया गया है जो प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को केंद्र, राज्यों व जिलों की संबंधित एजेंसीज तक पहुंचायेगा. चूंकि केवल सरकार व एनजीओ लम्बे समय तक प्रवासी मजदूरों को मुफ्त भोजन उपलब्ध नहीं करा सकते, इसलिए कॉर्पोरेट हाउसेस को इस काम में शामिल करने का प्रस्ताव है कि वह सीएसआर फंड इसमें इस्तेमाल करें. देश के 150 जिलों से अधिक में से मजदूर काम की तलाश में बाहर निकलते हैं. यह सिलसिला पिछले सौ वर्षों से चला आ रहा है. यह मुख्यतः उत्तर प्रदेश व बिहार के गरीब जिले हैं, लेकिन अब अधिक सम्पन्न क्षेत्रों से भी मजदूर बाहर निकलने लगे हैं. पहले इनकी दौड़ दिल्ली व आसपास के शहरी क्षेत्रों तक ही होती थी, फसल के सीजन में पंजाब व अन्य उत्तरी क्षेत्रों तक भी जाया जाता था, लेकिन अब यह भाषा की तंगी के बावजूद दक्षिण भारत के शहरों जैसे बंग्लुरु, चेन्नै व हैदराबाद भी जा रहे हैं.

केरल में भी 20 लाख से अधिक प्रवासी मजदूर काम कर रहे हैं, जो बिहार व उत्तर प्रदेश के हैं. केरल में प्रवासी मजदूरों की संख्या अधिक होने के दो मुख्य कारण हैं- एक, खाड़ी से आये पैसे की वजह से प्रवासी मजदूरों को अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा मेहनताना मिलता है. दूसरा यह कि केरल में साक्षरता दर शत प्रतिशत है और शिक्षित स्थानीय लोग मजदूरी जैसा ‘छोटा’ काम नहीं करना चाहते. उत्तर भारत के अशिक्षित प्रवासी इन कामों को करने के इच्छुक हैं. यही वजह है कि केरल में प्रवासी मजदूरों के लिए इस लॉकडाउन में सबसे ज्यादा कैंप हैं. वैसे कोविड-19 से सबसे ज्यादा ‘सर्कुलर माइग्रेशन’ प्रभावित हुआ है. ‘सर्कुलर माइग्रेशन’ भी लगभग सौ वर्षों से जारी है और इसका अर्थ यह है कि परिवार के वयस्क पुरुष काम की तलाश में बड़े शहरों में चले जाते, जहां वह हर प्रकार का काम करते हैं जैसे सिक्यूरिटी गार्ड, निर्माण मजदूर आदि.

चूंकि इन कामों की सीमित आय के कारण वह अपने परिवार के रहने का ठिकाना शहरों में नहीं कर सकते, इसलिए उनका परिवार पीछे गांव में ही रहता है, जिसे वह खर्चे के लिए पैसे भेजते रहते हैं. साल में कुछ सप्ताह या माह के लिए ये अपने परिवार के पास चले जाते हैं. काम और घर के बीच चक्कर लगाने का यह सिलसिला जीवनभर जारी रहता है, इसे ही ‘सर्कुलर माइग्रेशन’ कहते हैं. 2017 के आर्थिक सर्वे के अनुसार भारत में 10 करोड़ से अधिक ‘सर्कुलर प्रवासी’ हैं. अनुमान यह है कि कोरोना खतरा समाप्त होने पर ये ‘सर्कुलर प्रवासी’ वापस शहरों में आ जायेंगे. भारत में वैसे भी फसल कटाई के महीनों (अप्रैल व मई) में प्रवासी अपने गांव लौट जाते हैं. चूंकि अब हम अप्रैल के मध्य में हैं और यह प्रवासी शहर छोड़ चुके हैं, इसलिए उन्होंने इस वर्ष के लिए अपनी प्रवासी योजना बदल दी है. काफी अनिश्चितता है.

कोरोना से अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट होने जा रही है और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए प्रवासी मजदूरों की भूमिका महत्वपूर्ण है. इसलिए जरूरत है कि सरकार प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को तुरंत संबोधित करे. ग्रामीण भारत से मजदूर दो मुख्य कारणों से बाहर निकलते हैं- अपनी आर्थिक स्थिति बेहतर करने के लिए और अपने मूल स्थान की बदहाली से बचने के लिए. किसी भी देश के विकास व प्रगति के लिए प्रवास जरूरी है, लेकिन डिस्ट्रेस माइग्रेशन (अपनी जगह की बदहाल स्थिति के कारण प्रवास) को कम करने की जरूरत है. बहरहाल, इस समय दो काम बहुत जरूरी हैं- एक, दैनिक मजदूरों के लिए जो 21,000 कैंप हैं, उन्हें बंद कर दिया जाये. फंसे हुए छह लाख से अधिक प्रवासी मजदूर जब अपने घर लौटेंगे तभी उनमें फिर से काम पर लौटने का हौसला आयेगा. दूसरा यह कि प्रवासी मजदूरों के लिए चल कल्याण योजनाएं हों ताकि वह जहां काम पर जाएं वहीं उनको राशनकार्ड से फूड आदि मिल जाये, जो इस समय उनको सिर्फ रिहायश के मूल स्थान पर ही मिलता है.

लॉकडाउन-2 के पहले ही दिन जिस तरह एक बार फिर मुंबई, सूरत, हैदराबाद और कई दूसरे शहरों में मजदूरों का हुजूम अपने गांवों को जाने के लिए उमड़ा, उससे साफ है कि तमाम कोशिशों के बाद भी अभी तक प्रवासी मजदूर सरकारों पर चाहे वो राज्य की सरकारें हों या केंद्र की सरकार, यकीन नहीं कर पा रहे. आज भी मजदूर अपनी जान की कीमत पर भी अपने गांवों को जाने के लिए तैयार हैं. ऐसा क्यों हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि मजदूरों के दिल-दिमाग में यह बात बहुत गहरे तक धंसी हुई है कि चाहे वे कुछ भी कर लें, लेकिन शहरी मध्यवर्ग उनके प्रति कोई अपनत्व या लगाव नहीं रखता. सरकारें भी अपनी तमाम नीतियां और रणनीतियां खाते पीते मध्यवर्ग को ध्यान में रखकर ही बनाती है. यह बहुत बड़ी फांस है, यह फांस मजदूरों के दिल से तभी निकल सकती है, जब हम वाकई ईमानदारी से उनके प्रति अपनत्व दर्शाएं ही नहीं बल्कि वाकई में रखें.

’ये रिश्ता…’ फेम Mohena Kumari की शादी को हुए 6 महीने पूरे, शेयर किया शादी का वीडियो

स्टार प्लस के पौपुलर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ (Ye Rishta Kya Kehlata Hai) फेम एक्ट्रेस मोहेना कुमारी सिंह (Mohena Kumari Singh) की शादी को 6 महीने पूरे हो गए है. इस बीच वह अपने ससुराल में मस्ती और किस तरह अपनी जिंदगी जी रही हैं, इसकी फोटोज और वीडियो शेयर करके फैंस को दी. जो उन्हें काफी पसंद आती हैं. वहीं अब शादी के 6 महीने बाद मोहेना (Mohena Kumari Singh) ने अपने इंस्टाग्राम पर एक टीजर वीडियो शेयर किया है, जो फैंस को काफी पसंद आ रहा है. आइए आपको दिखाते हैं मोहेना की ये खास वीडियो….

वेडिंग टीजर वीडियो किया शेयर

 

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Six months ago was literally the biggest day of my life…a day full of nervousness, laughter , hugs & tears a lot of things changed, a lot of new things began. My family did so much for me and my happiness and gave me so much love.I will never be able to thank them enough. My new family supported me and took me in with so much love that I will be indebted with love for life. Thanks to all my friends who made it for my big day , I literally couldn’t do it without you’ll, love you guys so much. All our staff – my extended family- that was there working tirelessly day in and day out to make these days and this day especially , so wonderful for us.A big thank you to all the Premi’s of Manav Dharam @manavdharam who came from all over the world to celebrate our day with us thank you for all the love. And now for the one and only , the one who has been my pillar , my buddy , my partner in crimes and good deeds @suyeshrawat, my love, my everything. Thank you for sharing and cherishing the best moment of my life. I love you My Pati. So much ♥️ #happysixmonths #sumo #sumokishaadi Thanks for the Lovely Teaser @storiesbyjosephradhik Eagerly waiting for The Wedding Film 🎥🌸

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एक्ट्रेस मोहेना कुमारी (Mohena Kumari Singh) ने प्री वेडिंग से लेकर विदाई तक का एक वीडियो शेयर किया है. इसमें एक मिनट 19 सेकंड के ब्लैक एंड व्हाइट वीडियो को शेयर करते हुए मोहेना ने लिखा कि 6 महीने पहले मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन था. एक ऐसा दिन जिसमें मैं घबराई हुई थी, हंस रही थी, गले लग रही थी और आंखों से आंसू भी आ रहे थे. बहुत चीजें बदलने वाली थीं और कुछ नई चीजों की शुरुआत होने वाली थी. मेरे परिवार ने हमेशा मेरा साथ दिया. मुझे हमेशा खुश रखा और बहुत प्यार भी दिया. मैं उसका कर्ज कभी नहीं चुका पाऊंगी. इसके लिए मेरा उन्हें धन्यवाद करना भी कम ही होगा. मेरे नए परिवार ने भी मुझे उतना ही प्यार दिया. मैं अपने सभी दोस्तों का शुक्रिया करना चाहूंगी जो मेरी शादी में शामिल हुए. शायद मैं आप सभी के बिना यह नहीं कर पाती. सभी को प्यार.

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फैंस को मिलवाया फैमिली से

हाल ही में मोहेना ने अपने चैनल पर अपने ससुराल के सदस्यों से अपने फैंस को मिलवाया. वहीं फैंस को भी इन से मिलकर बेहद खुशी हुई और वह वीडियो वायरल हुई.

 

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💜 My Son turned Sweet Six 💜 Since we missed it earlier….we will celebrate today ! #bagelthebeagle

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बता दें, मोहेना की शादी 14 अक्टूबर को हरिद्वार में उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री और आध्यात्मिक गुरु सतपाल महाराज के छोटे बेटे सुयश रावत के साथ हुई थी, जिसमें उनके करीबी दोस्तों और परिवार वालों ने शिरकत की थी.  वहीं शादी के बाद मोहेना ने एक्टिंग की दुनिया से विदा लेने की बात भी कही थी, हालांकि वह फैंस को अपने अपडेट्स सोशल मीडिया के जरिए देती रहती हैं.

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