किचन की चिमनी खरीदने से पहले जान लें ये 6 बातें

घरों में किचन एक ऐसा स्थान होता है जहां महिलाओं का अधिक से अधिक समय व्यतीत होता है. अक्सर ऐसा होता है कि जब आप खाना बनाती हैं, तो छौंक की वजह से परिवार के सदस्य खांसने लगते हैं, क्योंकि मसाले के छौंक की खुशबू नाक में चढ़ जाती है या कभी सब्जी जल जाने पर अथवा पराठे बनाते समय किचन में जो धुआं होता है वह पूरे घर में घुटन पैदा कर देता है. ऐसे में आप किचन में वैंटीलेशन हेतु चिमनी लगवा सकती हैं. वैसे आजकल बाजार में कई तरह की चिमनियां मिलती हैं, लेकिन सही चिमनी का चयन कर पाना मुश्किल होता है. आईए जानते हैं कि आपके किचन में किस तरह की चिमनी होनी चाहिए.

जानें चिमनी के प्रकार

चिमनी खरीदने से पूर्व यह जान लेना जरूरी है कि चिमनियां 2 प्रकार की होती हैं- डक्टिंग चिमनी और डक्टलैस चिमनी.

1. डक्टिंग चिमनी

इस चिमनी में पीवीसी पाइप्स के जरीए धुआं और गैस रसोई के बाहर निकल जाती है. इन चिमनियों की खासीयत यह होती है कि इन में मैश और बफल फिल्टर लगा होता है, जो भोजन पकाते वक्त धुएं के साथ उड़ने वाली चिकनाहट को भी सोख लेता है. लेकिन ये चिमनियां बड़ी रसोई के लिए होती हैं. इन में लगने वाले पीवीसी पाइप की सैटिंग के लिए अतिरिक्त जगह की आवश्यकता होती है. यदि रसोई बड़ी हो तब ही इस चिमनी का चुनाव करें. वैसे बाजार में फ्लैक्सिबल डक्ट वाली चिमनियां भी उपलब्ध हैं, जिन के डक्ट को जरूरत के हिसाब से लगाया और निकाला जा सकता है. ऐसी चिमनियां छोटी रसोई में भी लगाई जा सकती हैं.

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2. डक्टलैस चिमनी

फैन और मोटर वाली चिमनी में ग्रीस फिल्टर लगे होते हैं, जिन से धुआं निकल कर चारकोल फिल्टर में जाता है. जहां ग्रीस फिल्टर चिकनाहट सोखने की क्षमता रखता है, वहीं चारकोल फिल्टर मसालों की महक को सोख कर रसोई को फ्रैश बनाए रखता है. लेकिन यह चिमनी रसोई की गरमाहट को खत्म नहीं कर पाती है और फिर इस में लगे चारकोल फिल्टर को भी समयसमय पर बदलवाना पड़ता है.

3. आधुनिक चिमनी

पहले के समय में चिमनी अलग हुआ करती थी जैसे- डायरेक्ट बटन वाली या फिर पुश बटन वाली. लेकिन, आजकल बाजारों में गैस सेंसर वाली चिमनी ज्यादा चल रही हैं. यदि किसी वजह आपकी गैस लिक भी हो रही हो, तो यह चिमनी औटोमैटिक स्टार्ट हो जाती हैं और गैस निकल जाने के बाद औफ भी हो जाती है. इसलिए यह चिमनी आज ज्यादा चलन में हैं.

4. किचन का आकार

चिमनी को किचन में लगाने के लिए किचन का आकार बड़ा होना चाहिए. यदि आपके किचन का आकार बड़ा हैं तो ज्यादा सक्शन पावर वाली चिमनी लगाना ठीक रहेगा. चमनी को लगाते वक्त यह ध्यान रखें कि वह आपके गैस चूल्हे से ढ़ाई फिट की ऊंचाई पर हो.

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5. चिमनी की देखभाल

किचन में व्यंजनों को फ्राई करने या तड़का लगाने से निकलने वाले धुएं से चिमनी काफी चिपचिपी हो जाती है, तो ऐसे में आप चिमनी को साफ करने के लिए कास्टिक सोडे का इस्तेमाल करें. इसके अलावा आप अपनी चिमनी को धोने के लिए हार्श डिटर्जेंट का इस्तेमाल ना करें.

6. यह भी रखें ध्यान

कोई भी चिमनी की कीमत उसकी वारंटी पर निर्भर करती हैं. वैसे तो बाजारों में हर रेंज की चिमनी मिलती हैं. जिसे कस्टमर अपने बजट के अनुसार खरीदता हैं.

12 टिप्स: बालों को दें कौंबिंग केयर  

अगर आप बालों की देखभाल में कौंबिंग की अहमियत को भूल रही हैं तो संभल जाएं, क्योंकि बालों के लिए औयलिंग, शैंपू, कंडीशनिंग ही काफी नहीं हैं. काले, घने, सुंदर, सुलझे-सुलझे बालों के लिए नियमित कंघी करना भी बहुत जरूरी है. आइए, जानें कि कंघी किस तरह बालों को सुंदर बनाती है:

1. जब बालों को कंघी करते हैं तो त्वचा में छिपी औयल ग्लैंड्स सक्रिय हो जाती हैं और औयल बालों में प्रवाहित होने लगता है. इसीलिए जैसेजैसे कंघी करते जाते हैं बालों की चमक और सौफ्टनैस बढ़ती जाती है.

2. कौंबिंग से बाल सुलझेसुलझे रहते हैं. अगर काफी समय तक कंघी न की जाए तो बाल उलझने लगते हैं और उलझन बढ़ने से उन के टूटने का खतरा बढ़ जाता है. अगर थोड़ा सा उलझने पर ही बालों को सुलझा लिया जाए तो वे टूटने और झड़ने से बच जाएंगे.

3. कंघी करने से बालों के रोमछिद्र खुल जाते हैं. इस से उन्हें औक्सीजन मिलती है और ब्लड सर्कुलेशन सही रहता है, जिस से वे नैचुरली कंडीशनिंग किए लगते हैं.

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रखें इन बातों का भी ध्यान

4. कभी गीले बालों में कंघी न करें. गीले बालों में कंघी करने से उन की जड़ें कमजोर होने लगती हैं, जिस से उन के टूटने व झड़ने का खतरा बढ़ जाता है. अगर गीले बालों में कंघी करनी ही हो तो इस के लिए लकड़ी की कंघी इस्तेमाल करें. प्लास्टिक की कंघी के बजाय लकड़ी की कंघी बेहतर रहती है.

5. अगर बाल ज्यादा उलझे हैं तो जल्दीजल्दी कंघी न करें. पहले उंगलियों की मदद से धीरेधीरे उलझन निकालें, फिर मोटे दांतों वाली कंघी से बालों को आहिस्ताआहिस्ता सुलझाएं. तेजी से सुलझाने की कोशिश में बाल टूटने लगते हैं और खिंचने की वजह से उन की जड़ों को भी नुकसान पहुंचता है.

6. ज्यादा कंघी करना भी बालों की सेहत के लिए ठीक नहीं. इसलिए दिन में 2-3 बार ही कंघी करना काफी है.

7. कंघी को हमेशा साफसुथरा रखें. गंदी कंघी से बालों के अंदर गंदगी जाएगी, जिस से उन में डैंड्रफ होने का खतरा बढ़ जाता है. गंदगी से बालों के रोमछिद्र बंद होने से उन्हें औक्सीजन नहीं मिलेगी, जिस से उन के डैमेज होने का खतरा बढ़ जाता है.

8.  अगर बालों में कोई हेयर मास्क, हिना, क्रीम या कुछ और लगाया है तो उस वक्त उन्हें बिना कंघी किए रहने दें, क्योंकि ऐसे में वे सुलझाने पर भी नहीं सुलझेंगे उलटा डैमेज होंगे.

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9. बालों को हमेशा आगे की ओर ले कर कंघी करें. इस से कंघी करना आसान होता है और यह तरीका बालों के लिए सुरक्षित भी है.

10. सोने से पहले बालों की कौंबिंग, ब्रशिंग की आदत डालें पर इस के बाद उन्हें ज्यादा टाइट न बांधें, ढीली चोटी गूंथ लें. अगर बाल छोटे हैं तो खुले भी छोड़े जा सकते हैं.

11. शैंपू करने से पहले कौंबिंग करें और फिर बालों को सुखाने के लिए उन्हें तौलिए से लपेट दें. उलझे बालों की समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी.

12. यदि बालों में वेव्स ज्यादा हैं तो उन में  कंघी करने से पहले पैडल ब्रश का इस्तेमाल करें. पैडल ब्रश ऐसा लें जिस के ब्रिसल्स प्लास्टिक के हों और उन के बीच गैप भी थोड़ा ज्यादा हो.

2 साल पहले मोच आने से सर्दियों में मेरे पैर में दर्द रहता है, मै क्या करूं?

सवाल-

मेरी उम्र 25 साल है. 2 साल पहले मेरे पैर में मोच आ गई थी, जो कुछ दिनों में ठीक भी हो गई. लेकिन ठंड के मौसम में मु झे उसी जगह पर दर्द होता है, जिस के कारण चलने में तकलीफ होती है. यह दर्द कैसे ठीक होगा?

जवाब-

कई बार मोच देखने में हलकी लगती है, लेकिन अंदर से वह काफी गंभीर होती है. आप की बात से साफ जाहिर होता है कि आप के पैर में अंदरूनी चोट है, जो ठीक नहीं हुई है. ठंड में हड्डियां और जोड़ कमजोर पड़ जाते हैं, जिस से हड्डियों की समस्याएं होती हैं और फिर दर्द होने लगती है. चोट ठंड से प्रभावित होती है, जिस से दर्द होता है. आप की समस्या सामान्य नहीं है, इसलिए इसे तुरंत मैडिकल ट्रीटमैंट की आवश्यकता है. दर्द से छुटकारा पाने के लिए हड्डी के किसी अच्छे डाक्टर से संपर्क करें. इस के अलावा दर्द वाली जगह की सिंकाई करें. उसे ठंड से बचा कर रखने में दर्द से राहत मिलेगी.

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फरीदाबाद, हरियाणा के एशियन इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंसैस के सीनियर कंसल्टैंट और और्थोपैडिक्स विभाग के प्रमुख डा. मृणाल शर्मा का कहना है कि युवतियों को समस्याओं पर गौर करना चाहिए ताकि वे स्वस्थ जिंदगी जी सकें.

मीनोपौज की मार

आमतौर पर दुनियाभर में महिलाओं को मीनोपौज 45 से 55 वर्ष की उम्र में होता है, लेकिन हाल ही में द इंस्टिट्यूट फौर सोशल ऐंड इकोनौमिक चेंज के सर्वे से पता चला है कि करीब 4 फीसदी भारतीय महिलाओं को मीनोपौज 29 से 34 साल की उम्र में ही हो जाता है, वहीं जीवनशैली मेें बदलाव के चलते 35 से 39 साल के बीच की महिलाओं का आंकड़ा 8 फीसदी है.

एस्ट्रोजन हार्मोन महिलापुरुष दोनों में पाया जाता है और यह हड्डियों को बनाने वाले औस्टियोब्लास्ट कोशिकाओं की गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. मीनोपौज के दौरान महिलाओं का एस्ट्रोजन स्तर गिर जाता है, जिस से औस्टियोब्लास्ट कोशिकाएं प्रभावित होती हैं. इस से महिलाओं की हड्डियां कमजोर होने लगती हैं.

शरीर में एस्ट्रोजन की कमी से कैल्शियम सोखने की क्षमता कम हो जाती है और हड्डियों का घनत्व गिरने लगता है. इस से महिलाओं को औस्टियोपोरोसिस और औस्टियोआर्थ्राइटिस जैसी हड्डियों से जुड़ी बीमारियां होने की आशंका बढ़ जाती है.

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दीपिका और शोएब से सीखें Couple Fashion Tips

सीरियल ‘कहां हम कहां तुम’ (Kahan Hum Kahan Tum) में इन दिनों नजर आ रहीं एक्ट्रेस दीपिका कक्कड़ (Dipika Kakkar) ने हाल ही में पति शोएब इब्राहिंम संग शादी की एनिवर्सरी सेलिब्रेट की है, जिसकी फोटोज सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. दीपिका और शोएब की जोड़ी फैंस और उनका फैशन फैंस को काफी पसंद आता है. आज हम आपको कपल फैशन के बारे में बताएंगे, जिसे आप वेडिंग सीजन से लेकर पार्टी तक ट्राय कर सकते हैं. आइए आपको दिखाते हैं कपल फैशन के कुछ औप्शन…

1. दीपिका का हस्बैंड शोएब के साथ मैचिंग कौम्बिनेशन है परफेक्ट

दीपिका का हस्बैंड शोएब के कपड़ों के साथ मैचिंग टच देने का कौम्बिनेशन बेहद अच्छा है. अगर आप भी अपने फैशन को हस्बैंड के साथ मैच करना चाहती हैं तो दीपिका की तरह वाइट कौम्बिनेशन वाला सूट ट्राय करें. ये आपके लुक को परफेक्ट बनाने में मदद करेगा.

 

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inka saath hi meri khushi❤️

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2. पीले कलर को ऐसे बनाएं कपल कौम्बिनेशन

 

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When i have you by my side my world is brighter coz u are my Sunshine! P.S: I Love You @shoaib2087 #happyme #blessed

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अगर आप आउटिंग या कहीं घूमने के लिए कपल कौम्बिनेशन का सोच रही हैं तो दीपिका और शोएब का ये यैलो कौम्बिनेशन परफेक्ट औप्शन है. येलो टीशर्ट के साथ शोएब का यैलो जैकेट का कौम्बिनेशन परफेक्ट है.

3. वेडिंग सीजन में ट्राय करें दीपिका और शोएब का रेड कौम्बिनेशन

 

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A picture says a thousand words… this one is saying just one… LOVE ❤️!!! #throwback #khimsardunes

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अगर आप वेडिंग सीजन में कुछ नया और परफेक्ट कपल कौम्बिनेशन ट्राय करना चाहती हैं तो दीपिका और शोएब का रेड कौम्बिनेशन आपके लिए परफेक्ट औप्शन है. दीपिका की तरह अनारकली सूट के साथ शोएब की रेड जैकेट परफेक्ट कौम्बिनेशन है.

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4. पार्टी के लिए ट्राय करें ये कपल फैशन

अगर आप किसी पार्टी में नया और परफेक्ट कपल कौम्बिनेशन चाहती हैं तो दीपिका की तरह लौंग ड्रेस के साथ शोएब की मैचिंग टीशर्ट कौम्बिनेशन परफेक्ट औप्शन है. ये आपके कपल लुक को परफेक्ट दिखाने में मदद करेगा.

आखिर गरीब इतने तकनीक विरोधी क्यों हैं ?

अगर इतिहास उठाकर देखें तो भारत में गरीब लोग हमेशा से बेहद यथास्थिवादी  या दूसरे शब्दों में तकनीकी विरोधी रहे हैं. आजादी के बाद जब हथकरघों की जगह पॉवर लूम लगाए गए तो इसका सबसे ज्यादा विरोध मिलों के उन मजदूरों द्वारा किया गया,जो बेहद अमानवीय परिस्थितियों में शरीर के चकनाचूर हो जाने की हद तक काम किया करते थे,वह भी बहुत कम मजदूरी के लिए.मिलों के मालिक उन्हें समझाते थे कि पॉवर लूम से उन्हीं की आय बढ़ेगी,उन्हें कम मेहनत करनी पड़ेगी,उनका स्वास्थ्य बेहतर रहेगा,उनकी ज्यादा कमाई होगी वगैरह वगैरह. लेकिन ये तमाम फायदे की बातें उन्हें लुभा नहीं पाती थीं.उन दिनों इस तकनीक के विरोध के लिए मजदूरों ने नेहरू की सरकार को जनविरोधी सरकार तक कहा था.

इसी तरह साल 1985 के बाद देश में जब राजीव गांधी ने कम्प्यूटराइजेशन शुरू किया तो पूरे देश में इसका विरोध हुआ.ठीक इसी तरह जैसे इन दिनों लेनदेन की तमाम नई तकनीकों के साथ तालमेल बिठाने के बैंकों के तमाम आग्रहों का आम लोग विरोध करते हैं.सरकार की तमाम चाहत के बावजूद भी अगर देश में कैश का इस्तेमाल कम नहीं हो रहा तो उसके पीछे तकनीक के साथ असहज आम भारतीय मन ही है.नई सड़कों से लेकर बुलेट ट्रेन तक का विरोध भी इसीलिए हो रहा है.सवाल है आखिर देश में हाशिये के लोग इस कदर तकनीक विरोधी क्यों  हैं? खासकर तब,जब तमाम सरकारें,तकनीकी विशेषज्ञ और ओहदेदार लोग यानी अफसरशाह दिन रात यही कह रहे हों कि नई तकनीक गरीब लोगों का जीवन आसान करती है,उन्हें समृद्धि और सफलता की मुख्यधारा में लाती है.

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पांच साल पहले साल 2015 में डिजिटल इंडिया सप्ताह की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इससे उन 9 बड़े फायदों को गिनवाया था, जो डिजिटल तकनीक से आम लोगों को होने वाले थे.इन फायदों में ई-गवर्नेंस से लेकर इंफ़ोर्मेशन फ़ॉर ऑल जैसी चीजें थीं.मगर इन दावों और आश्वासनों के बावजूद गरीब लोग तकनीक से डरे डरे ही रहते हैं ? सवाल है क्या गरीब लोग अपना हित अनहित नहीं समझते ? क्या गरीब लोग अपने ही दुश्मन हैं ? ऐसा नहीं है.वास्तव में तकनीक से इस खौफ का कारण है इसके कटु अनुभव.विशेषज्ञ कुछ भी कहें,राजनेता कुछ भी आश्वासन दें,लेकिन सच्चाई यही है कि तकनीक हमेशा से गरीब विरोधी रही है. ऑक्सफेम की 2017-18 की रिपोर्ट देखिये तो पता चलता है कि जिस डिजिटल तकनीक के बारे में अब भी कहा जा रहा है कि यह गरीबों की कायापलट कर देगी,उसी डिजिटल तकनीक के 2 दशकों के अपने व्योहारिक साम्राज्य में अमीरों और गरीबों के बीच इतिहास की सबसे बड़ी खाईं निर्मित की है.

साल 2017-18 में दुनिया के महज 8 सबसे अमीर लोगों के पास धरती की 50 फीसदी सबसे गरीब लोगों की आबादी के बराबर की सम्पत्ति थी यानी 8 बनाम 3.5 अरब का मामला था.इन 8 लोगों में से 5 लोग इसी डिजिटल तकनीक द्वारा बनाये गए सम्पत्ति के शहंशाह हैं. भारत में भी यही हाल है.हमारे यहां भी डिजिटल तकनीक की बदौलत जहां सबसे रईस एक प्रतिशत आबादी की संपत्ति में सालाना 46 फीसद की बढ़ोत्तरी हुई है,वहीं सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी की संपत्ति सिर्फ 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है .ऑक्सफैम इंटरनैशनल की  रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2019 में देश के टॉप एक प्रतिशत अमीर हर दिन 2200 करोड़ कमाते थे.जबकि सबसे गरीब लोगों के लिए आज भी हर दिन 2 डॉलर या 150 रूपये कमाने भी आसान नहीं हैं. साल 2018 में ऑक्सफैम की ही एक रिपोर्ट से यह सच सामने आया कि भारत के एक प्रतिशत अमीरों के पास देश की 73 प्रतिशत संपत्ति है.

क्या इन तमाम सच्चाइयों के बावजूद हम यह मान सकते हैं कि तकनीक का फायदा सबको एक जैसा मिलता है ? तकनीक यूँ तो सबके लिये एक जैसी होती है लेकिन इसमें एक जटिल किस्म का वर्गीय भेदभाव भी नत्थी होता है. दरअसल एक ही समय में किसी तकनीक के कई रूप चलन में होते हैं.उच्च तकनीक हमेशा प्रीवेलेज्ड क्लास के पास ही होती है और तकनीक के सारे लाभ भी इसी उच्च तकनीक के साथ नत्थी होते हैं.अपनी मेहनत मशक्कत से जब तक आदमी किसी तकनीक के बुनियादी ढाँचे तक पहुँचता है तो पता चलता है कि वह तो वहाँ से बहुत आगे जा चुकी है.साथ ही यह भी मालूम होता है कि तकनीक से होने वाले  फायदे भी आगे पंहुच चुके हैं.उदाहरण के लिए जब आम लोगों की मोबाइल फोन तक पंहुच हुई तब तक आम मोबाइल खिलौना हो चुका था और उससे होने वाले तमाम फायदे स्मार्ट मोबाइल के पास शिफ्ट हो गए थे.

जब कुछ सालों में आम आदमी ने किसी तरह से अपनी पंहुच इस स्मार्ट फोन तक बनाई तो पता चला कि मोबाइल के तमाम फायदे तो 4 जी वाले मोबाइल  नेटवर्क के पास पहुँच गए हैं और 4 जी नेटवर्क साधारण स्मार्ट फोन में नहीं चलता.मतलब तकनीक की चूहा दौड़ में आम आदमी हमेशा पीछे रहता है.एक उदाहरण देखिये कहने को डिजिटल टिकटिंग की सुविधा सबके लिए है लेकिन क्या आपको पता है इसके चलते आम लोगों के लिए इन दिनों आरक्षित सीटें मिलना 1 दशक पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा जटिल हो गया है ? जी हां ऐसा इसलिए है क्योंकि अब रेलवे के पास आम लोगों के लिए आरक्षित टिकटें नाममात्र की बचती हैं.ज्यादातर डिजिटल टिकटें उच्च तकनीकी क्षमताओं के स्वामी यानी फास्ट नेटवर्क वाले पहले ही ले उड़ते हैं.

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मतलब यह कि तकनीक ने आम लोगों की आरक्षित टिकटों में हिस्सेदारी को बढ़ाया नहीं उलटे घटा दिया है.इस कारण तकनीक के इस युग में आम लोगों के लिए रेल यात्रा पहले से कहीं ज्यादा नारकीय हो चुकी है.चूँकि तकनीक का बाहरी आवरण लोकतांत्रिक दिखता है.लगता है यह किसी किस्म का वर्गीय भेद नहीं जानती.इस भ्रम से तकनीक का बौद्धिक तबका कभी उस तरह से विरोध नहीं करता जैसे शोषण के दूसरे अवयवों का होता है.तकनीक से आम आदमी को होने वाले नुकसानों के चलते राजनेता जरूर इसकी मजम्मत करते हैं,लेकिन तब जब वह सत्ता में नहीं होते.सत्ता में आते ही वह भी तकनीक के प्रति वैसी  ही आशक्ति प्रदर्शित करते हैं जैसे पिछली सरकार ने प्रदर्शित किया होता है.इसलिए सरकारें बदलती हैं लेकिन तकनीक की पक्षधरता बनी रहती है और इसकी आड़ में यह गरीबों का अमीरों के लिए शोषण करती रहती है.

अटूट बंधन: भाग-4

विशू ने देखा, छत पर अनगिनत दरारें, कहींकहीं तो दरार इतनी चौड़ी कि धूप का कतरा नीचे आ रहा है. साथ वाले कमरे की तो आधी छत ही गिर गई है. उस के ऊपर खुला आकाश. सिहर उठा वह, वहां बैठ बाबा अध्ययन किया करते थे, दूसरे कोने में उस के पढ़ने की मेज थी.

‘‘अम्मा, छत तो कभी भी गिर सकती है.’’

‘‘हां बेटा, पर करें क्या? दीनू को लाला की चीनी मिल में काम मिला था. 10वीं भी पास न कर पाया. बल्कि मुन्नी की बुद्धि अच्छी है, 10वां पास कर लिया. सोचा था, थोड़ाथोड़ा जोड़ छत की मरम्मत करवा लेंगे पर एक ट्रक ने टक्कर मार दी, आधा पैर काटना पड़ा. बैसाखी पर चलता है वह अब. नौकरी चली गई तो दानेदाने को तरस गए. तब बहू और मुन्नी ने सलाह कर चाय की दुकान खोली. उस से रूखासूखा ही सही, दो रोटी शाम को मिल जाती हैं.’’

स्तब्ध हो गया. उस किशोरी सी बहू के प्रति मन में आदर भर उठा. इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद पति को दुत्कार उस से पल्ला नहीं झाड़ा, उस के साथ रही, उस को, उस के परिवार को सहारा दिया.

अपनी छोटी सी सीमित क्षमता के अनुसार और रीमा? इतनी बड़ी नौकरी, इतनी संपन्नता, उसी का ही दिया इतना सुख, आराम, संपन्नता में जरा सा अंतराल आएगा, सोच कर ही इतनी गुस्से में आ गई कि पति को ताने देते नहीं हिचकी. और यह छोटी सी निर्धन अनपढ़ लड़की.

मुन्नी पानी ले आई. नल का ताजा पानी. वर्षों से मिनरल वाटर छोड़ सादा पानी नहीं पीता है विशू. पर आज निश्चिंत हो कर नल का पानी पी गया और लगा बहुत देर से प्यासा था.

‘‘दीनू है कहां?’’

‘‘चौधरी के बेटे ने सड़क पर पैट्रोल पंप खोला है, तेल भराने जो गाडि़यां आती हैं उन में से कोईकोई सफाई भी करवाते हैं तो उस ने दीनू को लगा दिया है. कभीकभी 30-40 रुपए कमा लेता है, कभीकभी एकदम खाली हाथ. बेटा, तू हाथमुंह धो ले. मुन्नी ताजे पानी से बालटी भर दे. धुला तौलिया निकाल दे.’’

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‘‘अम्मा, सड़क पर गाड़ी खड़ी है. मैं अंदर ले आता हूं.’’

निर्मला की आंखें फटी की फटी रह गईं, ‘‘तू गाड़ी लाया है.’’

‘‘हां, अम्मा.’’

आत्मग्लानि और अपराधबोध से विशू का मन भारी हो रहा था. आज लग रहा है कि उस दिन वह गलत था, बाबा कहते थे, ‘धनवान बनो या न बनो पर बच्चा, इंसान बनो, आदमी धन नहीं मन से बड़ा होना चाहिए.’ पर उन के दिए सारे संस्कारों को ठेंगा दिखा कर उस ने उस उपदेश को कभी न अपनाया. अपना स्वार्थ तो पूरा हो ही गया.

तभी वह सजग हुआ, सोचा, अरे, उस के पास अपना बचा ही क्या है, एक नाम और नाम के पीछे जुड़ा सरनेम ‘तिवारी’ छोड़ सारे अभ्यास, आत्मजन, घरद्वार, यहां तक कि सोच भी तो रीमा की है. उस के मम्मीपापा, उन के उपदेश, रीमा के भाईबहन, उस की आदतें, उठनाबैठना, समाज में परिचय तक रीमा का दिया है, रीमा का पति, मिस्टर सिन्हा का दामाद, गौतम साहब का जीजा.

पंडित केशवदास तिवारी का तो कोई अस्तित्व ही नहीं रहा क्योंकि अपने सुपुत्र विश्वनाथ तिवारी ने स्वयं अपना अस्तित्व खो दिया. मिस्टर सिन्हा का दामाद, रीमा का पति नाम से ही तो जाना जाता है तो फिर पंडितजी का नाम चलेगा कैसे?

विशू ने गाड़ी ला कर खड़ी की. निर्मला ने आ कर गाड़ी को बड़ी ही सावधानी से छुआ, मुख पर गर्व का उजाला, ‘‘तेरे बाबा देख कर कितना खुश होते रे, मुन्ना.’’

अचानक ही विशू को लगा कि क्या होता अगर वह कैरियर के पीछे ऐसे सांस बंद कर न दौड़ता. बाबा सदा कहते थे सहज, सरल व आदरणीय बने रहने के लिए. पर उस ने तो स्वयं ही अपने जीवन को जटिल, इतना तनावपूर्ण बना लिया. वह मेधावी था, शिक्षा पूरी कर कोई नौकरी कर लेता, काम पर जाता फिर अपने आंगन में अपने प्रियजनों के बीच लौट खापी कर चैन की नींद सो जाता, खेतों की हरियाली, कोयल की कूक और माटी की सुगंध की चादर ओढ़. पर नहीं, उस ने जो दौड़ शुरू की है दूसरों को पीछे छोड़ आगे और आगे जा कर आकाश छूने की, उस में कोई विरामचिह्न है ही नहीं. बस, सांस रोक कर दौड़ते रहो, दौड़ते रहो, गिर गए तो मर गए. दूसरे लोग तुम को रौंद आगे निकल जाएंगे.

आज इस निर्धन, थकेहारे परिवार को देख एक नए संसार की खोज मिली उस को. यहां पलपल जीवित रहने की लड़ाई लड़ते हुए भी ये लोग कितने सुखी हैं, कितनी शांति है आम की घनी छाया के नीचे, एकदूसरे के प्रति कितना लगाव है. कोई भी बुरा समय आए तो कैसे सब मिलजुल कर उस को मार भगाने को एकजुट हो जाते हैं. उस के जीवन में संपन्नता के साथ वह सबकुछ, सारी सफलताएं हैं जो आज के तथाकथित उच्चाकांक्षी लोगों का सपना हैं पर आज रीमा ने आंखों में उंगली डाल दिखा दिया कि उस के प्रति समर्पण किसी का भी नहीं.

‘‘चल बेटा, खाना खा ले. थोड़ा आराम कर के जाना. दिन रहते ही घर लौटना, समय ठीक नहीं. दीनू लौट कर दुखी होगा कि भैया से भेंट नहीं हुई.’’

एकएक शब्दों में उस मां, जिसे वह सौतेली मानता था, का स्नेह, ममता और संतान की चिंता देख विशू अंदर तक भीग उठा.

‘‘मैं नहीं जा रहा. कई दिनों की छुट्टी ले कर आया हूं. घर में रहूंगा.’’

बुरी तरह चौंकी निर्मला, ‘‘क्या, अरे रहेगा कहां? देख रहा है घरद्वार की दशा, कहां सोएगा, कहां उठेगाबैठेगा और नहानाधोना?’’

‘‘तुम लोग कैसे करते हो?’’

‘‘पागल मत बन. हमारी बात मान और…’’

‘‘क्यों? क्या मैं कोई आसमान से उतर कर आया हूं?’’

हंस पड़ी निर्मला. विशू ने देखा इतना आंधीतूफान झेल कर भी निर्मला की हंसी में आज भी वही शुद्ध पवित्र हृदय झांकता है, वही मीठी सहज सरल हंसी, ‘‘कर लो बात. तेरा घरद्वार है, रहेगा क्यों नहीं? पर तेरे रहने लायक भी तो हो.’’

‘‘तभी तो रहना है मुझे…इस को रहने लायक बनाने के लिए.’’

‘‘क्या कह रहा है तू?’’

‘‘अम्मा, नासमझ था जो अपनी जड़ अपने हाथों काट गया था. पर मजबूत जड़ काट कर भी नहीं कटती. एक टुकड़ा भी रह जाए तो पेड़ फिर से लहलहा उठता है. अम्मा, मैं समझ गया हूं कि मैं आज तक सोने के हिरन के पीछे दौड़ता रहा जो लुभाता जरूर है पर किसी का भी अपना नहीं होता. बस, तुम मुझे वह करने दो जो मुझे करना है.’’

‘‘वह क्या है, लल्ला?’’

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‘‘इस मकान को मजबूत, पक्का घर बनाना है, 3 कमरे, 1 हाल, बिजली, पानी की व्यवस्था, रसोई, बाथरूम की सुविधा और आज से चाय की दुकान बंद. पंडितजी की बहूबेटी सड़क चलते लोगों को चाय बेचेंगी, यह तो बड़ी लज्जा की बात है. वहां एक बहुत बड़ी परचून की दुकान होगी. एक नौकर होगा, दीनू उस में बैठेगा.’’

‘‘पर वह तो… बहुत पैसों का…’’

‘‘अम्मा, याद है तुम बचपन में कहती थीं कि तेरा बेटा लाखों का नहीं करोड़ों का है. तुम पैसों की चिंता क्यों करती हो. मैं हूं तो.’’

रो पड़ी निर्मला, ‘‘मेरे बच्चे…’’

‘‘चलो अम्मा, रोटी खिलाओ, भूख लगी है.’’

मन एकदम नीले आकाश में जलहीन छोटेछोटे बादलों के टुकड़ों जैसा हलका हो गया. उसे चिंता नहीं इस समय पर्स में 35 हजार रुपए पड़े ही हैं, काम शुरू करने में परेशानी नहीं होगी. बीमा के 20 लाख रुपए हैं ही. उसे पता है कि वह 1 हफ्ता भी खाली नहीं बैठेगा. दूसरे लोगों की नजर वर्षों से उस पर है. उस की योग्यता और काम की निष्ठा से सब ललचाए बैठे हैं.

देश और विदेश की कंपनियों के कर्णधार, कई औफर इस समय भी उस के हाथ में हैं. बस, स्वीकार करने की देर है और वह करेगा भी. पर इस बार देश नहीं विदेश में ही जाने का मन बना लिया है. जहां रीमा की परछाईं भी नहीं हो. घर के ऊपर अपने लिए एक बड़ा सा पोर्शन बना लेगा जहां से हरेहरे खेत, गाती कोयल, आम के बाग और गांव के किनारेकिनारे बहती यमुना नदी दिखाई पड़ेगी.

एक बार जिस पेड़ की जड़ काट कर गया था, उस की जड़ के बचे हुए टुकड़े से पेड़ फिर लहलहाता वटवृक्ष बन गया है. अब दोबारा से उस जड़ को नहीं काटेगा. वर्ष में एक बार मां, भाईबहन के पास अवश्य आएगा.

बहुत दिनों बाद लौकी की सब्जी, चूल्हे की आंच में सिंकी गोलमटोल करारीकरारी रोटी पेट भर खा कर वह मूंज की बनी चारपाई पर दरी और साफ धुली चादर के बिछौने पर पड़ते ही सो गया. बहुत दिनों बाद गहरी, मीठी नींद आई है उसे.

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अटूट बंधन: भाग-2

‘‘माफी मांगूंगा, मैं?’’

‘‘अरे, यह बस फौर्मेलिटी है. दो शब्द कह देने में क्या जाता है? उम्र में पिता समान हैं और मालिक हैं.’’

‘‘कभी नहीं…’’

पंडितजी का खून जाग उठा विशू की धमनियों में. वह पंडितजी जो आज भी न्याय, निष्ठा, सदाचार, सपाटबयानी व सत्यवचन के लिए जाने जाते हैं, उन की प्रथम संतान, इतना नहीं गिर सकती.

‘‘प्रश्न ही नहीं उठता माफी मांगने का. गलत वे हैं, मैं नहीं. माफी उन को मुझ से मांगनी चाहिए.’’

फिर से जल उठी रीमा, ‘‘तो तुम त्यागपत्र वापस नहीं लोगे, माफी नहीं मांगोगे?’’

‘‘नहीं, कभी नहीं…’’

‘‘ठीक,’’ अनपढ़ गंवार महिलाओं की तरह मुंह बिदका कर रीमा चीखी, ‘‘तो अब मजे करो, बीवी की रोटी तोड़ो, उस की कमाई पर मौजमस्ती करो.’’

विशू का मुंह खुला का खुला रह गया. क्या स्वार्थ का नग्न रूप देख रहा है वह. पहले तो यही रीमा प्रेम में समर्पण, त्याग और मधुरता की बात करती थी पर उस के स्वार्थ पर चोट लगते ही क्या रूपांतरण हो गया. विशू की नजरों में सब से सुंदर मुख आज कितना भयंकर और कुरूप हो उठा है. वह अपलक उसे देखता रहा.

क्रोध में भुनभुनाती रीमा तैयार हुई. डट कर नाश्ता किया, गैराज से अपनी गाड़ी निकाल औफिस चली गई. अब लंच में लौटेगी बच्चों को स्कूल से ले कर 2 बजे. 3 बजे फिर जा कर फिर लौटेगी 5 बजे. रोज का यही रुटीन है उस का.

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रीमा के जाने के बाद एक अलसाई अंगड़ाई ले विशू उठ बैठा. घड़ी ठीक 10 बजा रही थी. चलो, अब पूरे 4 घंटे हैं उस के हाथ में सोचविचार कर निर्णय लेने को. फ्रैश हो कर आते ही संतो ने ताजी चाय ला कर स्टूल पर रखी. उस ने चाय पी. रीमा से पूरी तरह मोहभंग हो चुका है. आज वह स्वयं समझा गई उस का रिश्ता बस स्वार्थ का रिश्ता है. इन्हीं सब उलझनों में फंसा वह अतीत में खो गया.

अपने पिता को वह कभीकभी आर्थिक चिंता करते देखता था तब निर्मला यानी सौतेली मां कभी डांट कभी प्यार जता उन को साहस जुटाती थी कि चिंता क्यों करते हो जी, सब समस्या का हल हो जाएगा. कभी भी आर्थिक दुर्बलता को ले कर पिता को ताने देते या व्यंग्य करते नहीं सुना. न ही कभी अपने लिए कुछ मांग करते.

अपनी मां की तो स्मृति भी नहीं है मन में, डेढ़ वर्ष की उम्र से ही उस ने निर्मला को अपनी मां ही जाना है और निर्मला ने भी उसे पलकों पर पाला है. दीनू से बढ़ कर प्यार किया है. उस का भी तो बाबा से वही रिश्ता था जो रीमा का उस के साथ है. फिर निर्मला हर संकट में बाबा के साथ रही, साहस जुटाया, मेहनत कर के सहयोग दिया और रीमा ने आज…उस की रोटी का एक कौर भी नहीं खाया अभी, फिर भी अपनी कमाई का ताना दे गई.

पति के मानसम्मान का कोई मूल्य नहीं, जो उसे पूरी तरह मिट्टी में मिलाने, माफी मंगवाने ले जा रही थी, उस झूठे और बेईमान जालान के पास. उस ने उस के आत्मसम्मान की प्रशंसा नहीं की. एक बार भी साहस नहीं बढ़ाया कि ठीक किया, चिंता क्यों करते हो, मेरी नौकरी तो है ही. दूसरी नौकरी मिलने तक मैं सब संभाल लूंगी. वाह, क्या कहने उच्च समाज की अति उच्च पद पर कार्यरत पत्नी की.

आज रीमा ने 13 वर्ष से पति से सारे सुख, सामाजिक प्रतिष्ठा, सम्मान, अपने हर शौक की पूर्ति, आराम, विलास का जीवन सबकुछ एक झटके में उठा कर फेंक दिया, अपनी जरा सी असुविधा की कल्पना मात्र से. एक बार भी नहीं सोचा कि पति के पास कितनी योग्यता है, कितना अनुभव है, और अपने क्षेत्र में कितना नाम है. वह दो दिन भी नहीं बैठेगा. दसियों कंपनी मालिक हाथ फैलाए बैठे हैं उसे खींच लेने के लिए, देश ही नहीं विदेशों में भी. और उस की सब से प्रिय पत्नी उस की तुलना कर गई डोनेशन वाले सड़कछाप एमबीए लोगों के साथ. बस, अब और नहीं. पार्लर ने जो सुंदर मुख दिया है रीमा को वह मुखौटा हटा कर उस के अंदर का भयानक स्वार्थी, क्रूर मुख स्वयं ही दिखा गई है वह आज. उस का सारा मोह भंग हो चुका है.

अपने ही प्रोफैसर की बेटी रीमा को पाने के लिए वह स्वयं कितना स्वार्थी बन गया था, आज उस बात का उसे अनुभव हुआ. एमबीए के खर्चे के लिए उस निर्धन परिवार के मुंह की रोटी 5 बीघा खेत तक बिकवा दिया.

पिता पर दबाव डाला. अपने 2 छोटेछोटे बच्चों की चिंता कर के भी सौतेली मां निर्मला ने एक बार भी बाबा को नहीं रोका. और उस ने इन 13 वर्षों में उधर पलट कर भी नहीं देखा क्योंकि उसे बहाना मिल गया था. जब नौकरी पा कर बाबा को सहायता करने का समय आया तब सब से पहले रीमा से शादी कर के अपने परिवार से पल्ला झाड़ने का बहाना खोजने लगा और मिल भी गया.

निष्ठावान स्वात्तिक ब्राह्मण पंडितजी ने ठाकुर की बेटी को अपने घर की बहू के रूप में नहीं स्वीकारा और वह खुश हो रिश्ता तोड़ आया. असल में उस के अंतरमन में भय था, आशंका थी कि इस निर्धन परिवार से जुड़ा रहा तो कमाई का कुछ हिस्सा अवश्य ही चला जाएगा इस परिवार के हिस्से. जब कि पिता छोड़ औरों से उस का खून का रिश्ता है ही नहीं. और पिता के प्रति भी क्या दायित्व निभाया.

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दिल्ली से 40 मिनट या 1 घंटे का रास्ता है फूलपुर गांव का. ‘फूलपुर’ वह भी हाईवे के किनारे. गांव के चौधरी का बेटा महेंद्र मोटर साइकिल ले कर आया था उसे लेने. गेट पर ही मिल गया. एक जरूरी मीटिंग थी, इस के बाद ही प्रमोशन की घोषणा होने वाली थी. रीमा औफिस न जा कर घर में ही सांस रोके बैठी थी. वह औफिस ही निकल रहा था कि महेंद्र ने पकड़ा.

‘विशू, जल्दी चल पंडितजी नहीं रहे. अभी अरथी नहीं उठी, तू जाएगा तब उठेगी.’

उस के दिमाग में प्रमोशन की मीटिंग चल रही थी. इस समय यह झूठझमेला. खीज कर बोला, ‘दीनू है तो.’

मुंह खुल गया था महेंद्र का, ‘क्या कह रहा है, तू बड़ा बेटा है और तेरे पिता थे वे…’

‘देख, मेरे जीवन का प्रश्न है. आज मैं नहीं जा सकता, जरूरी काम है. आ जाऊंगा. तू जा.’

महेंद्र के खुले हुए मुंह के सामने वह औफिस चला गया था. 8 वर्ष पुरानी बात हो गई.

आगे पढ़ें- विशू ने निर्णय ले लिया और…

दीपिका ने पति के साथ ऐसे मनाई 2nd Wedding Anniversary, वायरल हुआ Video

सीरियल ‘कहां हम कहां तुम’ (Kahan Hum Kahan Tum) में नजर आने वाली सोनाक्षी यानी दीपिका कक्कड़ (Dipika Kakkar)  की पति शोएब इब्राहिम (Shoaib Ibrahim) संग शादी को हाल ही में 2 साल पूरे हो गए हैं. ‘ससुराल सिमर का’ सीरियल से दीपिका (Shoaib Ibrahim) की लव स्टोरी की शुरूआत फैंस के कारण शादी में बदल गई. वहीं अपनी शादी की दूसरी सालगिरह के मौके पर दीपिका (Shoaib Ibrahim) ने एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर की है. आइए आपको दिखाते हैं दीपिका का पति शोएब (Shoaib Ibrahim)  के लिए खास मैसेज…

ऐसे मनाया वेडिंग एनिवर्सरी का सेलिब्रेशन

दीपिका ने अपनी वेडिंग एनिवर्सरी सेलिब्रेशन की वीडियो शेयर की, जिसमें दीपिका पति शोएब के संग केक काटते हुए नजर आ रही हैं. सामने आए इस वीडियो में दीपिका और शोएब एक दूसरे के साथ बेहद खुश नजर आए. साथ ही दीपिका और शोएब ने जब केक काटा तो बैकग्राउंड में ‘तुम्हें क्या बताऊ के तुम मेरे क्या हो…’ गाना भी बजा.

 

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❤️ @shoaib2087

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ये भी पढ़ें- Death Anniversary: आखिर क्यों अमिताभ बच्चन ने श्रीदेवी के पास भिजवाया था फूलों से भरा ट्रक?

ऐसे हुई थी प्यार की शुरूआत

दरअसल, दीपिका कक्कड़ (Dipika Kakkar) और शोएब इब्राहिम (Shoaib Ibrahim) की लव स्टोरी की शुरूआत सीरियल ‘ससुराल सिमर का’ (Sasural Simar Kaa) के सेट से शुरू हुई थी, जिसमें दीपिका और शोएब पति और पत्नी के किरदार में नजर आए थे. फैंस को दोनों की ये जोड़ी बेहद पसंद आई थी. इसी बीच शो के सेट से दोनों के अफेयर की खबरें आने लगी थीं, जिसके बाद दीपिका ने पति से अलग होने का फैसला लिया था.

दीपिका का ऐसे ख्याल रखते हैं शोएब

 

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Happy valentines day Mrs.Ibrahim ❤️

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एक्टर शोएब (Shoaib Ibrahim) इब्राहिम वाइफ दीपिका पर अपनी जान लुटाते हैं, जिसका सबूत सोशल मीडिया पर वायरल फोटोज हैं. शोएब अक्सर अपनी वाइफ दीपिका संग क्वौलिटी टाइम बिताते हुए नजर आते हैं. वहीं चाहे परिस्थितियां कैसी भी हो. शोएब और दीपिका कक्कड़ एक-दूसरे का हमेशा साथ देते है, जिससे इनका प्यार मजबूत होता है. साथ ही वह एक दूसरे को अक्सर सरप्राइज देकर चौंकाते रहते हैं.

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tere pyaar me mai marjaawaan ❤️❤️❤️ @shoaib2087

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बता दें, दीपिका कक्कड़ (Dipika Kakkar) की ये दूसरी शादी है. दीपिका ने अपने पहले पति को तलाक देने के बाद शोएब इब्राहिम से निकाह किया था, जिसकी फोटोज सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई थीं.

Death Anniversary: आखिर क्यों अमिताभ बच्चन ने श्रीदेवी के पास भिजवाया था फूलों से भरा ट्रक?

54 वर्ष की उम्र में इस संसार को अलविदा कह देने वालीं बौलीवुड की पहली महिला सुपरस्टार श्रीदेवी (Sridevi) की यह दूसरी Death Anniversary है. श्रीदेवी का मानना रहा है कि वह तो इत्तफाकन अभिनेत्री बनीं. यूं तो श्रीदेवी चार वर्ष की उम्र में एक फिल्म में बाल कलाकार के रूप में नजर आई थीं तब उन्हें कला या अभिनय की कोई समझ नहीं थी. पर सही मायनों में उनका अभिनय करियर 13 वर्ष की उम्र में तमिल फिल्म ‘‘मुंदूर मुदीच’’ से शुरू हुआ था. 13 वर्ष की उम्र में इस फिल्म में उनका किरदार वयस्क लड़की का था. जबकि बौलीवुड में इन्होंने 1975 में फिल्म ‘‘जूली’’ में बाल कलाकार के रूप में काम करते हुए कदम रखा था. ऐसे ही कईं ट्विस्ट से भरपूर थी श्रीदेवी की जर्नी. आइए आपको बताते हैं उनके फिल्मी दुनिया से जुड़े उनके सफर के कहानी…

तमिल फिल्म से की थी करियर की शुरूआत

1976 में तेरह वर्ष की उम्र में तमिल फिल्म ‘‘मुंदूर मुदीच’’ से लेकर 7 जुलाई 2017 को प्रदर्शित हिंदी फिल्म ‘‘मौम’’ तक श्रीदेवी ने 300 फिल्मों में अभिनय किया था. उनके करियर की अंतिम और 301 वीं फिल्म ‘‘जीरो’’ होगी. आनंद एल राय निर्देशित इस फिल्म में शाहरुख खान के साथ श्रीदेवी ने मेहमान कलाकार के रूप में अभिनय किया है, यह फिल्म 21 दिसंबर 2018 को प्रदर्शित होगी.

 

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My angel ?

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1976 से अब तक के अपने करियर में श्रीदेवी ने अपने दमदार अभिनय से फिल्मकारों, कलाकारों को ही नहीं, बल्कि अपने प्रशंसकों को इस कदर दीवाना बना रखा था कि हर कोई उनके साथ काम करने को लालायित रहता था. पुरूष प्रधान बौलीवुड में श्रीदेवी एकमात्र ऐसी अदाकारा रही हैं, जिनके बल पर फिल्में बौक्स औफिस पर धन कमाया करती थी.

 

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श्रीदेवी अपनी शर्तों पर करतीं थीं काम

श्रीदेवी हमेशा अपनी शर्तों पर काम किया करती थीं. बौलीवुड में नारी शक्ति का परचम लहराने वाली श्रीदेवी के लिए खास तौर पर किरदार लिखे जाते थें. यदि श्रीदेवी को अपना किरदार व फिल्म की कहानी न पसंद आए, तो वह उस फिल्म का औफर ठुकरा देती थीं. इतना ही नहीं श्रीदेवी हमेशा इस बात का ख्याल रखती थीं कि वह जिस फिल्म में अभिनय करें, उस फिल्म में उनका किरदार फिल्म के हीरो से कमतर न हो. इसी के चलते श्रीदेवी ने अमिताभ बच्चन के साथ भी कई फिल्में करने से इंकार कर दिया था, जबकि यह वह दौर था जब हर हीरोईन अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म का हिस्सा बनना अपना सौभाग्य समझती थी. कहा जाता है कि अमिताभ बच्चन स्वयं श्रीदेवी के साथ काम करने को लालायित थें. इसी के चलते अमिताभ बच्चन ने श्रीदेवी के पास फूलों से भरा हुआ ट्रक भिजवाया था.

 

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अमिताभ बच्चन के साथ दोहरी भूमिका निभाने वाली एकमात्र अदाकारा

बहरहाल, बाद में श्रीदेवी ने अमिताभ बच्चन के साथ सबसे पहले फिल्म “इंकलाब’’ की. उसके बाद ‘‘खुदा गवाह’’ और ‘आखिरी रास्ता’ जैसी कुछ फिल्में की. मगर इन फिल्मों में श्रीदेवी के किरदार ही हावी रहें. इतना ही नहीं श्रीदेवी पहली अदाकारा थीं, जिन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘‘खुदा गवाह’’ में दोहरी भूमिका निभायी थीं. अन्यथा अमिताभ बच्चन की किसी भी फिल्म में किसी हीरोईन को दोहरी भूमिका निभाने का अवसर कभी नहीं मिला. मजेदार बात यह थी कि फिल्म ‘खुदा गवाह’ में श्रीदेवी ने अफगानी अंदाज वाली हिंदी में संवाद अदायगी कर लोगों को आश्चर्य चकित किया था.

श्रीदेवी के लिए रेखा ने डब किए थे संवाद

सिनेमा भाषा का मोहताज नहीं होता. इस बात को श्रीदेवी की फिल्मों से भी समझा जा सकता है. श्रीदेवी को तमिल व तेलगू भाषा ही आती थी, मगर वह लंबे समय तक हिंदी फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा दिखाती रहीं. हिंदी फिल्मों में उनके संवाद नाज डब किया करती थीं. फिल्म ‘आखिरी रास्ता’ में श्रीदेवी के संवादों को अभिनेत्री रेखा ने डब किया था. पर श्री देवी ने हिंदी भाषा सीखना शुरू कर दिया था.

 

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Happy Father’s Day to the most loving and giving father in the world❤

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‘‘चांदनी’’ में पहली बार खुद संवाद डब किए

14 सितंबर 1989 को प्रदर्शित यश चोपड़ा की फिल्म ‘‘चांदनी’’ से श्रीदेवी का अलग रूप लोगों के सामने आया. यह पहली फिल्म थी, जिसमें श्री देवी ने अपने संवाद खुद डब किए थें और इस फिल्म में पहली बार उन्होंने गाना भी गाया था. फिल्म ‘‘चांदनी” ने बौक्स औफिस पर सफलता के कई नए रिकार्ड स्थापित किए थें. मजेदार बात यह है कि यश चोपड़ा पहले फिल्म ‘‘चांदनी’’ अभिनेत्री रेखा को लेकर बनाना चाहते थें. पर हालात कुछ ऐसे बने कि उन्होंने ‘चांदनी’ के साथ श्रीदेवी को जोड़ा और उसके बाद वह भी श्रीदेवी के अभिनय के कायल हो गए थें. उसके बाद फिल्म ‘‘सदमा’’ में भी श्रीदेवी ने गाना गाया था.

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क्यों अहम हैं ‘‘सदमा’’ और ‘‘लम्हे’’

श्रीदेवी के करियर की सफलतम फिल्मों में ‘सदमा’ और ‘लम्हे’ इन दोनों फिल्मों का विशेष महत्व है. 8 जुलाई 1983 को प्रदर्शित फिल्म ‘‘सदमा’’ में श्रीदेवी ने कमल हासन के साथ अभिनय करते हुए एक विक्षिप्त लड़की नेहलता मल्होत्रा उर्फ रश्मी का किरदार निभाया था. कहानी के अनुसार एक दुर्घटना में रश्मी के सिर पर चोट लग जाती है, उनकी याद्दाश्त खो जाती है और वह चार वर्ष की बच्ची की तरह व्यवहार करने लगती हैं. इसमें कमल हासन उन्हे लोरी गा कर सुनाते थें. जबकि 22 नवंबर को प्रदर्शित यश चोपड़ा निर्मित फिल्म ‘‘लम्हे’’ अपने समय से काफी आगे व हिंदुस्तानी परंपराओं को तोड़ने वाली फिल्म थी, जिसमें श्री देवी ने दोहरी भूमिका निभायी थी.

 

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When a woman is challenged…here’s presenting the first look of MOM #MOMfirstlook

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पहली वैनिटी वैन

इन दिनों अमिताभ बच्चन व शाहरुख खान से लेकर तमाम बड़े कलाकारों के पास अपनी वैनिटी वैन है. शूटिंग के दौरान लगभग हर कलाकार, निर्माता से वैनिटी वैन की मांग करता है. मगर श्रीदेवी पहली अदाकारा थीं, जिनके पास अपनी वैनिटी वैन थी.

Death Anniversary: आखिर क्यों श्रीदेवी को नापसंद करते थे अर्जुन कपूर?

बौलीवुड एक्ट्रेस श्रीदेवी की 24 फरवरी यानी आज दूसरी Death Anniversary है. दुबई में अचानक मौत के बाद श्रीदेवी अपनी मौत से जुड़े कई सवाल छोड़ गईं, जिसका सबसे ज्यादा असर उनके परिवार और पति बोनी कपूर पर पड़ा था. आज हम आपको श्रीदेवी की मौत के बाद उनकी पर्सनल लाइफ से जुड़ी बातों के बारे में बताएंगे.

पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में रही हैं श्रीदेवी

दरअसल, श्रीदेवी की निजी जिंदगी हमेशा से ही विवादों में रही है इसकी वजह उनके पति बोनी कपूर की पहली पत्नी और उनके बच्चें हैं, क्योंकि उनके पति बोनी कपूर जब भी अपनी पहली पत्नी या उनके बच्चों से मिलते थे तो श्रीदेवी चिढ़ती थीं. शादी के बीस सालों बाद भी श्रीदेवी के मन में फंसी फांस कभी नहीं निकल पाई. कई बातों पर वो सामान्य नहीं हो पाईं. वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म स्तंभकार भारती ए. प्रधान ने करीब दो साल पहले अपने एक कौलम में इस बात का खुलासा किया था. उन्होंने अपने कौलम में लिखा कि किस तरह बोनी को श्रीदेवी के गुस्से का सामना करना पड़ा, जब वह पहली पत्नी मोना कपूर की मां और जानी मानी फिल्म निर्माता सत्ती शौरी के अंतिम संस्कार और प्रार्थना सभा में गए.

 

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नहीं भूल पाईं थीं सत्ती के उस व्यवहार को

श्रीदेवी 1996 में सत्ती शौरी द्वारा उनसे किए गए व्यवहार को इतने सालों बाद भी भूल नहीं पाईं थीं. उस समय तक बोनी और मोना पति-पत्नी थे और श्रीदेवी दूसरी महिला. तब तक बोनी और श्रीदेवी के नजदीकियों की खबरें आने लगी थीं. तभी ये भी खबरें आईं कि वो गर्भवती हैं. बोनी की पहली बीवी मोना को इससे झटका लगा. उन्होंने चुपचाप खुद ब खुद बोनी से दूरियां बना लीं. लेकिन ये बात मोना की मां सत्ती शौरी को चुभ चुकी थी.

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एक रोज जब सत्ती को यह मालूम हुआ कि बोनी-श्रीदेवी के साथ मुंबई के एक फाइव स्टार होटल में मौजूद हैं तो वहां पहुंचकर उन्होंने जमकर हंगामा खड़ा कर दिया. उन्होंने श्रीदेवी के पेट पर मारने की कोशिश की थी, जिसके कुछ महीनों बाद श्रीदेवी ने अपनी पहली बेटी जान्हवी को जन्म दिया. सत्ती शौरी द्वारा उनसे किए गए व्यवहार को सालों बाद भी श्रीदेवी कभी भूल नहीं पाईं थीं.

 

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Missing Janu?❤️

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बोनी का वहां जाना उन्हें अच्छा नहीं लगा

जब बोनी की पहली पत्नी मोना की मां सत्ती शौरी का निधन हुआ तो पूरा कपूर परिवार अंतिम संस्कार में पहुंचा. बोनी भी इसमें गए. पति का वहां जाना श्रीदेवी को अच्छा नहीं लगा. जिसके बाद उन्हें श्रीदेवी के गुस्से का शिकार भी होना पड़ा था.

मोना के अंतिम दर्शन के लिए बस वही नहीं गईं

 

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वहीं जानी मानी लेखिका और कौलमिस्ट शोभा डे ने हाल में लिखा, “जब मोना कपूर (बोनी की पहली पत्नी और अर्जुन कपूर की मां) का निधन हुआ तो हर कोई उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचा. मगर श्रीदेवी नदारद थीं. उनकी दोनों बेटियां भी अंतिम दर्शन में शामिल नहीं हुई थीं. जबकि एक जमाने में मोना और उनके बीच अच्छी दोस्ती थी.”

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तब काफी नाराज हो गईं थीं श्रीदेवी

खबरों के अनुसार, एक बार बोनी पहली पत्नी से मिलने के बाद अपने दोनों बच्चों अर्जुन और अंशुला को लेकर पिकनिक पर चले गए थे, जिसके कारण बोनी के लौटने पर श्रीदेवी उनसे काफी नाराज हुई थीं. शायद यही कसक अब तक अर्जुन कपूर के दिल में रह गई. वहीं अर्जुन कपूर ने एक बार टीवी पर साफ कहा था कि श्रीदेवी से उनके रिश्ते कभी सामान्य नहीं होंगे. वे केवल मेरे पिता की बीवी हैं और कुछ नहीं. हालांकि श्रीदेवी की मौत की खबर सुनते ही वे अपनी बहनों से मिलने पहुंच गए थे.

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