Drama Story: कर्णफूल- क्यों अपनी ही बहन पर शक करने लगी अलीना

Drama Story: जब मैं अपने कमरे के बाहर निकली तो अन्नामां अम्मी के पास बैठी उन्हें नाश्ता करा रही थीं. वह कहने लगीं, ‘‘मलीहा बेटी, बीबी की तबीयत ठीक नहीं हैं. इन्होंने नाश्ता नहीं किया, बस चाय पी है.’’

मैं जल्दी से अम्मी के कमरे में गई. वह कल से कमजोर लग रही थीं. पेट में दर्द भी बता रही थीं. मैं ने अन्नामां से कहा, ‘‘अम्मी के बाल बना कर उन्हें जल्द से तैयार कर दो, मैं गाड़ी गेट पर लगाती हूं.’’

अम्मी को ले कर हम दोनों अस्पताल पहुंचे. जांच में पता चला कि हार्टअटैक का झटका था. उन का इलाज शुरू हो गया. इस खबर ने जैसे मेरी जान ही निकाल दी थी. लेकिन यदि मैं ही हिम्मत हार जाती तो ये काम कौन संभालता? मैं ने अपने दर्द को छिपा कर खुद को कंट्रोल किया. उस वक्त पापा बहुत याद आए.

वह बहुत मोहब्बत करने वाले, परिवार के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति थे. एक एक्सीडेंट में उन का इंतकाल हो गया था. घर में मुझ से बड़़ी बहन अलीना थीं, जिन की शादी हैदराबाद में हुई थी. उन का 3 साल का एक बेटा था. मैं ने उन्हें फोन कर के खबर दे देना जरूरी समझा, ताकि बाद में शिकायत न करें.

मैं आईसीयू में गई, डाक्टरों ने मुझे काफी तसल्ली दी, ‘‘इंजेक्शन दे दिए गए हैं, इलाज चल रहा है, खतरे की कोई बात नहीं है. अभी दवाओं का असर है, सो गई हैं. इन के लिए आराम जरूरी है. इन्हें डिस्टर्ब न करें.’’

मैं ने बाहर आ कर अन्नामां को घर भेज दिया और खुद वेटिंगरूम में जा कर एक कोने में बैठ गई. वेटिंगरूम काफी खाली था. सोफे पर आराम से बैठ कर मैं ने अलीना बाजी को फोन मिलाया. मेरी आवाज सुन कर उन्होंने रूखे अंदाज में सलाम का जवाब दिया.मैं ने अपने गम समेटते हुए आंसू पी कर अम्मी के बारे में बताया तो सुन कर वह परेशान हो गईं. फिर कहा, ‘‘मैं जल्द पहुंचने की कोशिश करती हूं.’’

मुझे तसल्ली का एक शब्द कहे बिना उन्होंने फोन कट कर दिया. मेरे दिल को झटका सा लगा. अलीना मेरी वही बहन थीं, जो मुझे बेइंतहा प्यार करती थीं. मेरी जरा सी उदासी पर दुनिया के जतन कर डालती थीं. इतनी चाहत, इतनी मोहब्बत के बाद इतनी बेरुखी… मेरी आंखें आंसुओं से भर आईं.

पापा की मौत के थोड़े दिनों बाद ही मुझ पर कयामत सी टूट पड़ी थी. पापा ने बहुत देखभाल कर मेरी शादी एक अच्छे खानदान में करवाई थी. शादी हुई भी खूब शानदार थी. बड़े अरमानों से ससुराल गई. मैं ने एमबीए किया था और एक अच्छी कंपनी में जौब कर रही थी. जौब के बारे में शादी के पहले ही बात हो गई थी.

उन्हें मेरे जौब पर कोई ऐतराज नहीं था. ससुराल वाले मिडिल क्लास के थे, उन की 2 बेटियां थीं, जिन की शादी होनी थी. इसलिए नौकरी वाली बहू का अच्छा स्वागत हुआ. मेरी सास अच्छे मिजाज की थीं और मुझ से काफी अच्छा व्यवहार करती थीं.

कभीकभी नादिर की बातों में कौंप्लेक्स झलकता था. आखिर 2-3 महीने के बाद उन का असली रंग खुल कर सामने आ गया. उन के दिल में नएनए शक पनपने लगे. नादिर को लगता कि मैं उस से बेवफाई कर रही हूं. जराजरा सी बात पर नाराज हो जाता, झगड़ना शुरू कर देता.

इसे मैं उस का कौंप्लेक्स समझ कर टालती रहती, निबाहती रही. लेकिन एक दिन तो हद ही हो गई. उस ने मुझे मेरे बौस के साथ एक मीटिंग में जाते देख लिया. शाम को घर लौटी तो हंगामा खड़ा कर दिया. मुझ पर बेवफाई व बदकिरदारी का इलजाम लगा कर गंदेगंदे ताने मारे.

कई लोगों के साथ मेरे ताल्लुक जोड़ दिए. ऐसे वाहियात इलजाम सुन कर मैं गुस्से से पागल हो गई. आखिर मैं ने एक फैसला कर लिया कि यहां की इस बेइज्जती से जुदाई बेहतर है.

मैं ने सख्त लहजे में कहा, ‘‘नादिर, अगर आप का रवैया इतना तौहीन वाला रहा तो फिर मेरा आप के साथ रहना मुश्किल है. आप को अपने लगाए बेहूदा इलजामों की सच्चाई साबित करनी पड़ेगी. एक पाक दामन औरत पर आप ऐसे इलजाम नहीं लगा सकते.’’

मम्मीपापा ने भी समझाने की कोशिश की, लेकिन वह गुस्से से उफनते हुए बोला, ‘‘मुझे कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है, सब जानता हूं मैं. तुम जैसी आवारा औरतों को घर में नहीं रखा जा सकता. मुझे बदचलन औरतों से नफरत है. मैं खुद ऐसी औरत के साथ नहीं रह सकता. मैं तुझे तलाक देता हूं, तलाक…तलाक…तलाक.’’

और कुछ पलों में ही सब कुछ खत्म हो गया. मैं अम्मी के पास आ गई. सुन कर उन पर तो जैसे आसमान टूट पड़ा. मेरे चरित्र पर चोट पड़ी थी. मुझ पर लांछन लगाए गए थे. मैं ने धीरेधीरे खुद को संभाल लिया. क्योंकि मैं कुसूरवार नहीं थी. यह मेरी इज्जत और अस्मिता की लड़ाई थी.

20-25 दिन की छुट्टी करने के बाद मैं ने जौब पर जाना शुरू कर दिया. मैं संभल तो गई, पर खामोशी व उदासी मेरे साथी बन गए. अम्मी मेरा बेहद खयाल रखती थीं. अलीना आपी भी आ गईं. हर तरह से मुझे ढांढस बंधातीं. वह काफी दिन रुकीं. जिंदगी अपने रूटीन से गुजरने लगी.

अलीना आपी ने इस विपत्ति से निकलने में बड़ी मदद की. मैं काफी हद तक सामान्य हो गई थी. उस दिन छुट्टी थी, अम्मी ने दो पुराने गावतकिए निकाले और कहा, ‘‘ये तकिए काफी सख्त हो गए हैं. इन में नई रुई भर देते हैं.’’

मैं ने पुरानी रुई निकाल कर नीचे डाल दी. फिर मैं ने और अलीना आपी ने रुई तख्त पर रखी. हम दोनों रुई साफ कर रहे थे और तोड़ते भी जा रहे थे. अम्मी उसी वक्त कमरे से आ कर हमारे पास बैठ गईं. उन के हाथ में एक प्यारी सी चांदी की डिबिया थी. अम्मी ने खोल कर दिखाई, उस में बेपनाह खूबसूरत एक जोड़ी जड़ाऊ कर्णफूल थे. उन पर बड़ी खूबसूरती से पन्ना और रूबी जड़े हुए थे. इतनी चमक और महीन कारीगरी थी कि हम देखते रह गए.

आलीना आपी की आंखें कर्णफूलों की तरह जगमगाने लगीं. उन्होंने बेचैनी से पूछा, ‘‘अम्मी ये किसके हैं?’’

अम्मी बताने लगीं, ‘‘बेटा, ये तुम्हारी दादी के हैं, उन्होंने मुझ से खुश हो कर मुझे ये कर्णफूल और माथे का जड़ाऊ झूमर दिया था. माथे का झूमर तो मैं ने अलीना की शादी पर उसे दे दिया था. अब ये कर्णफूल हैं, इन्हें मैं मलीहा को देना चाहती हूं. दादी की यादगार निशानियां तुम दोनों बहनों के पास रहेंगी, ठीक है न.’’

अलीना आपी के चेहरे का रंग एकदम फीका पड़ गया. उन्हें जेवरों का शौक जुनून की हद तक था, खास कर के एंटीक ज्वैलरी की तो जैसे वह दीवानी थीं. वह थोड़े गुस्से से कहने लगीं, ‘‘अम्मी, आप ने ज्यादती की, खूबसूरत और बेमिसाल चीज आपने मलीहा के लिए रख दी. मैं बड़ी हूं, आप को कर्णफूल मुझे देने चाहिए थे. ये आप ने मेरे साथ ज्यादती की है.’’

अम्मी ने समझाया, ‘‘बेटी, तुम बड़ी हो, इसलिए तुम्हें कुंदन का सेट अलग से दिया था, साथ में दादी का झूमर और सोने का एक सेट भी दिया था. जबकि मलीहा को मैं ने सोने का एक ही सेट दिया था. इस के अलावा एक हैदराबादी मोती का सेट था. उसे मैं ने कर्णफूल भी उस वक्त नहीं दिए थे, अब दे रही हूं. तुम खुद सोच कर बताओ कि क्या गलत किया मैं ने?’’

अलीना आपी अपनी ही बात कहती रहीं. अम्मी के बहुत समझाने पर कहने लगीं,  ‘‘अच्छा, मैं दादी वाला झूमर मलीहा को दे दूंगी, तब आप ये कर्णफूल मुझे दे दीजिएगा. मैं अगली बार आऊंगी तो झूमर ले कर आऊंगी और कर्णफूल ले जाऊंगी.’’

अम्मी ने बेबसी से मेरी तरफ देखा. मेरे सामने अजीब दोराहा था, बहन की मोहब्बत या कर्णफूल. मैं ने दिल की बात मान कर कहा, ‘‘ठीक है आपी, अगली बार झूमर मुझे दे देना और आप ये कर्णफूल ले जाना.’’

अम्मी को यह बात पसंद नहीं आई, पर क्या करतीं, चुप रहीं. अभी ये बातें चल ही रहीं थीं कि घंटी बजी. अम्मी ने जल्दी से कर्णफूल और डिबिया तकिए के नीचे रख दी.

पड़ोस की आंटी कश्मीरी सूट वाले को ले कर आई थीं. सब सूट व शाल वगैरह देखने लगे. हम ने 2-3 सूट लिए. उन के जाने के बाद अम्मी ने कर्णफूल वाली चांदी की डिबिया निकाल कर देते हुए कहा, ‘‘जाओ मलीहा, इसे संभाल कर अलमारी में रख दो.’’

मैं डिबिया रख कर आई. उस के बाद हम ने जल्दीजल्दी तकिए के गिलाफ में रुई भर दी. फिर उन्हें सिल कर तैयार किया और कवर चढ़ा दिए. 3-4 दिनों बाद अलीना आपी चली गईं. जातेजाते वह मुझे याद करा गईं, ‘‘मलीहा, अगली बार मैं कर्णफूल ले कर जाऊंगी, भूलना मत.’’

दिन अपने अंदाज में गुजर रहे थे. चाचाचाची और उन के बच्चे एक शादी में शामिल होने आए. वे लोग 5-6 दिन रहे, घर में खूब रौनक रही. खूब घूमेंफिरे. मेरी चाची अम्मी को कम ही पसंद करती थीं, क्योंकि मेरी अम्मी दादी की चहेली बहू थीं. अपनी खास चीजें भी उन्होंने अम्मी को ही दी थीं. चाची की दोनों बेटियों से मेरी खूब बनती थी, हम ने खूब एंजौय किया.

नादिर की मम्मी 2-3 बार आईं. बहुत माफी मांगी, बहुत कोशिश की कि किसी तरह इस मसले का कोई हल निकल जाए. पर जब आत्मा और चरित्र पर चोट पड़ती है तो औरत बरदाश्त नहीं कर पाती. मैं ने किसी भी तरह के समझौते से साफ इनकार कर दिया.

अलीना बाजी के बेटे की सालगिरह फरवरी में थी. उन्होंने फोन कर के कहा कि वह अपने बेटे अशर की सालगिरह नानी के घर मनाएंगी. मैं और अम्मी बहुत खुश हुए. बडे़ उत्साह से पूरे घर को ब्राइट कलर से पेंट करवाया. कुछ नया फर्नीचर भी लिया. एक हफ्ते बाद अलीना आपी अपने शौहर समर के साथ आ गईं. घर के डेकोरेशन को देख कर वह बहुत खुश हुईं.

सालगिरह के दिन सुबह से ही सब काम शुरू हो गए. दोस्तोंरिश्तेदारों सब को बुलाया. मैं और अम्मी नाश्ते के बाद इंतजाम के बारे में बातें करने लगे. खाना और केक बाहर से आर्डर पर बनवाया था. उसी वक्त अलीना आपी आईं और अम्मी से कहने लगीं, ‘‘अम्मी, ये लीजिए झूमर संभाल कर रख लीजिए और मुझे वे कर्णफूल दे दीजिए. आज मैं अशर की सालगिरह में पहनूंगी.’’

अम्मी ने मुझ से कहा, ‘‘जाओ मलीहा, वह डिबिया निकाल कर ले आओ.’’ मैं ने डिबिया ला कर अम्मी के हाथ पर रख दी. आपी ने बड़ी बेसब्री से डिबिया उठा कर खोली. लेकिन डिबिया खुलते ही वह चीख पड़ीं, ‘‘अम्मी कर्णफूल तो इस में नहीं है.’’

अम्मी ने झपट कर डिबिया उन के हाथ से ले ली. वाकई डिबिया खाली थी. अम्मी एकदम हैरान सी रह गईं. मेरे तो जैसे हाथोंपैरों की जान ही निकल गई. अलीना आपी की आंखों में आंसू आ गए थे. उन्होंने मुझे शक भरी नजरों से देखा तो मुझे लगा कि काश धरती फट जाए और मैं उस में समा जाऊं.

अलीना आपी गुस्से में जा कर अपने कमरे में लेट गईं. मैं ने और अम्मी ने अलमारी का कोनाकोना छान मारा, पर कहीं भी कर्णफूल नहीं मिले. अजब पहेली थी. मैं ने अपने हाथ से डिबिया अलमारी में रखी थी. उस के बाद कभी निकाली भी नहीं थी. फिर कर्णफूल कहां गए?

एक बार ख्याल आया कि कुछ दिनों पहले चाचाचाची आए थे और चाची दादी के जेवरों की वजह से अम्मी से बहुत जलती थीं. क्योंकि सब कीमती चीजें उन्होंने अम्मी को दी थीं. कहीं उन्होंने ही तो मौका देख कर नहीं निकाल लिए कर्णफूल. मैं ने अम्मी से कहा तो वह कहने लगीं, ‘‘मुझे नहीं लगता कि वह ऐसा कर सकती हैं.’’

फिर मेरा ध्यान घर पेंट करने वालों की तरफ गया. उन लोगों ने 3-4 दिन काम किया था. संभव है, भूल से कभी अलमारी खुली रह गई हो और उन्हें हाथ साफ करने का मौका मिल गया हो. अम्मी कहने लगीं, ‘‘नहीं बेटा, बिना देखे बिना सुबूत किसी पर इलजाम लगाना गलत है. जो चीज जानी थी, चली गई. बेवजह किसी पर इलजाम लगा कर गुनहगार क्यों बनें.’’

सालगिरह का दिन बेरंग हो गया. किसी का दिल दिमाग ठिकाने पर नहीं था. अलीना आपी के पति समर भाई ने सिचुएशन संभाली, प्रोग्राम ठीकठाक हो गया. दूसरे दिन अलीना ने जाने की तैयारी शुरू कर दी. अम्मी ने हर तरह से समझाया, कई तरह की दलीलें दीं, समर भाई ने भी समझाया, पर वह रुकने के लिए तैयार नहीं हुईं. मैं ने उन्हें कसम खा कर यकीन दिलाना चाहा, ‘‘मैं बेकुसूर हूं, कर्णफूल गायब होने के पीछे मेरा कोई हाथ नहीं है.’’

लेकिन उन्हें किसी बात पर यकीन नहीं आया. उन के चेहरे पर छले जाने के भाव साफ देखे जा सकते थे. शाम को वह चली गईं तो पूरे घर में एक बेमन सी उदासी पसर गईं. मेरे दिल पर अजब सा बोझ था. मैं अलीना आपी से शर्मिंदा भी थी कि अपना वादा निभा न सकी.

पिछले 2 सालों में अलीना आपी सिर्फ 2 बार अम्मी से मिलने आईं, वह भी 2-3 दिनों के लिए. आती तो मुझ से तो बात ही नहीं करती थीं. मैं ने बहन के साथ एक अच्छी दोस्त भी खो दी थी. बारबार सफाई देना फिजूल था. खामोशी ही शायद मेरी बेगुनाही की जुबां बन जाए. यह सोच कर मैं ने चुप्पी साध ली. वक्त बड़े से बड़ा जख्म भर देता है. शायद ये गम भी हलका पड़ जाए.

मामूली सी आहट पर मैं ने सिर उठा कर देखा, नर्स खड़ी थी. वह कहने लगी, ‘‘पेशेंट आप से मिलना चाहती हैं.’’

मैं अतीत की दुनिया से बाहर आ गई. मुंह धो कर मैं अम्मी के पास आईसीयू में पहुंच गई. अम्मी काफी बेहतर थीं. मुझे देख कर उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट आ गईं. वह मुझे समझाने लगीं, ‘‘बेटी, परेशान न हो, इस तरह के उतारचढ़ाव तो जिंदगी में आते ही रहते हैं. उन का हिम्मत से मुकाबला कर के ही हराया जा सकता है.’’

मैं ने उन्हें हल्का सा नाश्ता कराया. डाक्टरों ने कहा, ‘‘इन की हालत काफी ठीक है. आज रूम में शिफ्ट कर देंगे. 2-4 दिन में छुट्टी दे दी जाएगी. हां, दवाई और परहेज का बहुत खयाल रखना पड़ेगा. ऐसी कोई बात न हो, जिस से इन्हें स्ट्रेस पहुंचे.’’

शाम तक अलीना आपी भी आ गईं. मुझ से बस सलामदुआ हुई. वह अम्मी के पास रुकीं. मैं घर आ गई. 3 दिनों बाद अम्मी भी घर आ गई. अब उन की तबीयत अच्छी थी. हम उन्हें खुश रखने की भरसक कोशिश करते रहे. एक हफ्ता तो अम्मी को देखने आने वालों में गुजर गया.

मैं ने औफिस जौइन कर लिया. अम्मी के बहुत इसरार पर आपी कुछ दिन रुकने को राजी हो गईं. जिंदगी सुकून से गुजरने लगी. अब अम्मी हलकेफुलके काम कर लेती थीं. अलीना आपी और उन के बेटे की वजह से घर में अच्छी रौनक थी.उस दिन छुट्टी थी, मैं घर की सफाई में जुट गई. अम्मी कहने लगीं, ‘‘बेटा, गाव तकिए फिर बहुत सख्त हो गए हैं. एक बार खोल कर रुई तोड़ कर भर दो.’’

अन्नामां तकिए उठा लाईं और उन्हें खोलने लगीं. फिर मैं और अन्नामां रुई, तोड़ने लगीं. कुछ सख्त सी चीज हाथ को लगीं तो मैं ने झुक कर नीचे देखा. मेरी सांस जैसे थम गईं. दोनों कर्णफूल रुई के ढेर में पड़े थे. होश जरा ठिकाने आए तो मैं ने कहा, ‘‘देखिए अम्मी ये रहे कर्णफूल.’’

आपी ने कर्णफूल उठा लिए और अम्मी के हाथ पर रख दिए. अम्मी का चेहरा खुशी से चमक उठा. जब दिल को यकीन आ गया कि कर्णफूल मिल गए और खुशी थोड़ी कंट्रोल में आई तो आपी बोलीं, ‘‘ये कर्णफूल यहां कैसे?’’

अम्मी सोच में पड़ गईं. फिर रुक कर कहने लगीं, ‘‘मुझे याद आया अलीना, उस दिन भी तुम लोग तकिए की रुई तोड़ रहीं थीं. तभी मैं कर्णफूल निकाल कर लाई थी. हम उन्हें देख ही रहे थे, तभी घंटी बजी थी. मैं जल्दी से कर्णफूल डिबिया में रखने गई, पर हड़बड़ी में घबरा कर डिबिया के बजाय रुई में रख दिए और डिबिया तकिए के पीछे रख दी थी.

‘‘कर्णफूल रुई में दब कर छिप गए. कश्मीरी शाल वाले के जाने के बाद डिबिया तो मैं ने अलमारी में रखवा दी, लेकिन कर्णफूल रुई  में दब कर रुई के साथ तकिए में भर गए. मलीहा ने तकिए सिले और कवर चढ़ा कर रख दिए. हम समझते रहे कि कर्णफूल डिबिया में अलमारी में रखे हैं. जब अशर की सालगिरह के दिन अलीना ने तुम से कर्णफूल मांगे तो पता चला कि उस में कर्णफूल है ही नहीं. अलीना तुम ने सारा इलजाम मलीहा पर लगा दिया.’’

अम्मी ने अपनी बात खत्म कर के एक गहरी सांस छोड़ी. अलीना के चेहरे पर फछतावा था. दुख और शर्मिंदगी से उन की आंखें भर आईं. वह दोनों हाथ जोड़ कर मेरे सामने खडी हो गईं. रुंधे गले से कहने लगीं, ‘‘मेरी बहन मुझे माफ कर दो. बिना सोचेसमझे तुम पर दोष लगा दिया. पूरे 2 साल तुम से नाराजगी में बिता दिए. मेरी गुडि़या, मेरी गलती माफ कर दो.’’

मैं तो वैसे भी प्यारमोहब्बत को तरसी हुई थी. जिंदगी के रेगिस्तान में खड़ी हुई थी. मेरे लिए चाहत की एक बूंद अमृत के समान थी. मैं आपी से लिपट कर रो पड़ी. आंसुओं से दिल में फैली नफरत व जलन की गर्द धुल गई. अम्मी कहने लगीं, ‘‘अलीना, मैं ने तुम्हें पहले भी समझाया था कि मलीहा पर शक न करो. वह कभी भी तुम से छीन कर कर्णफूल नहीं लेगी. उस का दिल तुम्हारी चाहत से भरा है. वह कभी तुम से छल नहीं करेगी.’’

आपी बोलीं, ‘‘अम्मी, आप की बात सही है, पर एक मिनट मेरी जगह खुद को रख कर सोचिए, मुझे एंटिक ज्वैलरी का दीवानगी की हद तक शौक है. ये कर्णफूल बेशकीमती एंटिक पीस हैं, मुझे मिलने चाहिए. पर आप ने मलीहा को दे दिए. मुझे लगा कि मेरी इल्तजा सुन कर वह मान गई, फिर उस की नीयत बदल गई. उस की चीज थी, उस ने गायब कर दी, ऐसा सोचना मेरी खुदगर्जी थी, गलती थी. इस की सजा के तौर पर मैं इन कर्णफूल का मोह छोड़ती हूं. इन पर मलीहा का ही हक है.’’

मैं जल्दी से आपी से लिपट कर बोली, ‘‘ये कर्णफूल आप के पहनने से मुझे जो खुशी होगी, वह खुद के पहनने से नहीं होगी. ये आप के हैं, आप ही लेंगी.’’

अम्मी ने भी समझाया, ‘‘बेटा जब मलीहा इतनी मिन्नत कर रही है तो मान जाओ, मोहब्बत के रिश्तों के बीच दीवार नहीं आनी चाहिए. रिश्ते फूलों की तरह नाजुक होते हैं, नफरत व शक की धूप उन्हें झुलसा देती है, फिर खुद टूट कर बिखर जाते हैं.’’

मैं ने खुलूसे दिल से आपी के कानों में कर्णफूल पहना दिए. सारा माहौल मोहब्बत की खुशबू से महक उठा.???

Drama Story

Women Investment Plan: एसआईपी में भी बढ़ रही है महिलाओं की रूचि

Women Investment Plan: महिलाएं पारंपरिक तौर पर अपनी बचत अपने पास घर में ही रखने के लिए जानी जाती हैं क्यूंकि ए माना जाता है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाएं निवेश कम करती हैं. लेकिन अब इसमें बदलाव देखने को मिल रहा है. वह अब बचत के साथ बढ़त पर भी ध्यान दे रही हैं. भारत में म्यूचुअल फंड में महिला निवेशकों का एयूएम मार्च 2019 में 4.59 लाख करोड़ रुपए से दोगुना होकर मार्च 2024 में 11.25 लाख करोड़ रुपए हो गया है.

एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (Amfi) और क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, व्यक्तिगत निवेशकों के कुल म्यूचुअल फंड संपत्ति (AUM) में महिलाओं की हिस्सेदारी एक-तिहाई (33%) है, जबकि कुल निवेशकों में उनकी संख्या केवल 24% है. रिपोर्ट में बताया गया है कि महिलाएं आमतौर पर पुरुषों की तुलना में ज्यादा रकम निवेश करती हैं, इसलिए उनकी हिस्सेदारी कुल AUM में ज्यादा है. पिछले पाँच सालों में महिलाओं का म्यूचुअल फंड में निवेश तेजी से बढ़ा है.

रिपोर्ट कहती है कि महिलाओं की आर्थिक आजादी और जागरूकता बढ़ रही है. मार्च 2025 तक कुल 5.34 करोड़ यूनिक निवेशक थे, जिनमें से 26% (1.38 करोड़ महिलाएं थीं. ए मार्च 2024 के 24.2% से अधिक है. साक्षरता दरों में बढ़ोतरी और वर्कप्लेस में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने उनके आर्थिक योगदान को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इस कारण महिलाएं अब निवेश की दुनिया में एक प्रमुख भागीदार के रूप में उभर रही हैं और बढ़ती जरूरतों के साथ महिलाएं अब एसआईपी म्यूचुअल फंड में छोटी छोटी बचत से निवेश कर रही हैं.

दरअसल, वैसे तो गोल्ड के दाम बहुत बढ़ रहें हैं. लेकिन गोल्ड खरीदना और उसे बेचना बहुत जोखिम का काम है. उसमे हेरा फेरी के बहुत चांस हैं. अगर आपके पास थोड़े से पैसे हैं, बहुत ज्यादा नहीं है, तो म्यूचुअल फंड में रखना ही सही है. फिक्स डिपाजिट में जो मिलता है उसका लम्बा चौड़ा return नहीं है. लेकिन अगर आप शेयर बाजार में डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट करोगे तो वो हर एक के बस्का नहीं है. म्यूचुअल फंड वाले बहुत सारा काम खुद से कर देते हैं थोड़े से पैसे लेकर. बाकि निवेश की अपेक्षा म्यूचुअल फंड की थोड़ी जानकारी रखें तो निवेश सुरक्षित हैं. शुरू शुरू में कागजी कार्रवाही से घबराएं नहीं और खुद करें, पति पर ना छोड़े. आप खुद कर सकती हो. पति और बच्चों के सामने ये करें उनसे छिपाएं नहीं. लेकिन उन पर डिपेंड नहीं होना खुद करें. एक साधारण औरत भी ए कर सकती है. आइए जाने कैसे करें.

म्यूचुअल फंड कैटगरी चुनने से पहले किन बातों का धयान रखें

KYC पेपर्स को पूरा करें

यदि आपने नो योर कस्टमर (केवाईसी) प्रक्रिया पूरी नहीं की है, तो आप म्यूचुअल फंड में नहीं निवेश कर सकते. किसी भी म्यूचुअल फंड में निवेश से पहले, आपको अपना KYC पूरा करना होगा. आप किसी वित्तीय सलाहकार या डिस्ट्रिब्यूटर की मदद से या ऑनलाइन KYC कर सकती हैं.

सबसे पहले फंड चुनें

आपको पहले चुनना होगा की आप किस प्रकार के फंड में निवेश करना चाहते हैं. ये फंड भी कई तरह के होते हैं जैसे कि-

इक्विटी फंड-  लंबी अवधि में धन कमाने के लिए यह अच्छा विकल्प है. इक्विटी फंड तभी चुने जाने चाहिए जब आप ज़्यादा जोखिम उठाने को तैयार हों और इसकी समय सीमा 5 वर्ष से अधिक हो.

डेट फंड-  ए ज़्यादा सुरक्षित होते हैं और पूंजी की सुरक्षा पर ध्यान देते हैं. इसलिए यदि आप कम जोखिम लेना चाहते हैं, तो आपको डेट फंड में निवेश करना चाहिए.

हाइब्रिड फंड–  ए इक्विटी और डेट फंड का मिश्रण होते हैं, जो जोखिम और रिटर्न को संतुलित करते हैं. अगर आप मध्यम जोखिम उठा सकते हैं, तो आप हाइब्रिड फंड में निवेश कर सकते हैं. ध्यान दें, सभी म्यूचुअल फंड यहां तक ​​कि डेट फंड में भी कुछ जोखिम होता है. अब ए आपको तय करना है कि आपको किस तरह के फंड में निवेश करना है.

पोर्टफोलियो भी देखें

यह भी देखें कि वह म्यूचुअल फंड है, ज़्यादा जोखिम के साथ छोटी कंपनियों में निवेश कर ज़्यादा लाभ कमा रहा है? आपको ए भी देखना चाहिए कि वो म्यूचुअल फंड  किसी एक क्षेत्र में अपना पैसा लगा रहा है या अलग-अलग में? ए भी देखें कि कितना पैसा इक्विटी में लगाया गया है और कितना डेट में?

नेट बैंकिंग के लिए नामांकन करें

सभी म्यूचुअल फंड खरीदों के लिए इंटरनेट बैंकिंग आवश्यक है. म्यूचुअल फंड में निवेश करने के लिए डेबिट कार्ड और चेक का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन नेट बैंकिंग इसे करने का एक सरल, तेज़, और सुरक्षित तरीका है.

किस प्लेटफार्म से निवेश करना चाहते हैं

अब आप यह तय करें कि आप खुद ही ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म, म्यूच्यूअल फंड हाउस की वेबसाइट से निवेश करना चाहती हैं या फिर किसी वित्तीय सलाहकार की मदद से निवेश करना चाहती हैं. इसके बाद उसके बारे में पूरी जानकारी लें और आगे बढ़ें. इसके बाद आप तय करें कि आप म्यूचुअल फंड में आप लंपसम इन्वेस्टमेंट करना चाहते हैं या एसआईपी के जरिए करना चाहते हैं.

म्यूचुअल फंड में एसआईपी क्या है? महिलाओं की इसमें रूचि क्यूँ  बढ़ रही है?

SIP एक तरीका है जिससे आप म्युचूअल फंड में नियमित रूप से कम धन राशि के साथ भी निवेश कर सकते हैं. इसका मतलब होता है सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान. यह महिलाओं के लिए एक बेहतरीन विकल्प है क्यूंकि अगर आप हर दिन 50 रुपए बचा लेती हैं, तो ए एक महीने का 1500 रुपए बन जाता है. अब इन 1500 रुपए से आप एसआईपी के माध्यम से म्यूचुअल फंड में निवेश कर सकती हैं.

इस प्रक्रिया में, पहले आप अपने पसंदीदा म्यूचुअल फंड का चयन करते हैं. फिर आप अपने निवेश के लिए निवेश करने की राशि और निवेश के अंतराल का चयन करते हैं. आपके द्वारा चुने गए समय पर आपके द्वारा तय की गई राशि आपके खाते से काट ली जाएगी और स्वचालित रूप से फंड में निवेश कर दी जाएगी.

इसकी मदद से आप मात्र 500 रुपए से भी म्युचूअल फंड में निवेश कर सकते हैं, इसीलिए पिछले कुछ समय से इसकी लोकप्रियता बढ़ने लगी है और महिलायें इसे काफी पसंद कर रही हैं.

महिलाएं कैसे करें एसआईपी में निवेश

पहले अपने लिए सही म्युचूअल फंड का चयन करें जिसके लिए बेहतर होगा आप थोड़ी रिसर्च करें.

आपको म्युचूअल फंड निवेश के लिए अकाउंट खोलना होगा जो कि आप कोटक महिंद्रा बैंक के साथ ऑनलाइन भी खोल सकते हैं.

ऑनलाइन आवेदन फ़ॉर्म में अपनी जानकारी भरें और ज़रूरी दसतावेज़ अपलोड करें, फिर आपकी डिटेल्स और दस्तावेज़ वेरिफ़ाई होने के बाद आपका अकाउंट खुल जाएगा.

उसमें आपने जो फंड चुना है उसकी SIP आप, प्लान की राशि, और समय चुनने के बाद ऑटोमैटिक पेमेंट सेट करके कर सकते हैं और फिर हर महीने आपके अकाउंट से निवेश होता रहेगा.

निवेश करने के बाद आपको अपने SIP की ग्रोथ को हमेशा ट्रैक करते रहना चाहिए.

Women Investment Plan

Attention Seeker: जब आपका वास्ता अटेंशन सीकर से पड़े, तो क्या करें

Attention Seeker: अपने आसपास आपको बहुत से लोग ऐसे मिलेंगे जिन्हें हर वक्त खुद के बारे में बात करना पसंद होता है. वे चाहते हैं हम जो कह रहे हैं उसे लोग धयान से सुने और समझें। हमारी बातों पर तवज्जों दें हम पर अटेंशन दें. लेकिन जब ये चाहत हद से ज्यादा बढ़ जाएँ तो उस व्यक्ति को अटेंशन सीकर का नाम दे दिया जाता है. अटेंशन सीकिंग बिहेवियर के शिकार लोगों से डील करना बहुत मुश्किल होता है. ऐसे लोग हर पल, हर घड़ी हर किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं और इसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. लेकिन ऐसे लोग किसी मुसीबत से काम नहीं होते हैं. हर कोई इनके पास खड़ा होने और बात करने से बचता है. आइये जाने कैसे डील करें इन लोगों से.

अटेंशन सीकर के सामने से हट जाना सबसे अच्छा जवाब है

जब अटेंशन सीकर अपनी वाहवाही करने लगे, तो उस वक्त उसकी बातों से पककर इरिटेट होने से अच्छा है उन्हें बीच में ही रोककर बोले सॉरी मैं अभी 2 मिनट में आया फोन सुनकर और 15 मिनट तक आये ही नहीं वो इसका सबसे अच्छा जवाब है. एक आध बार आप ऐसा करेंगे तो अटेंशन सीकर खुद ही समझ जाएगा कि आप उसे क्या मैसेज देना चाहते हैं. ऐसा करके आपने आपने बिन कुछ कहे सब कह दिया.

खुलकर बात करें

बहुत बर्दाश्त कर लिया. क्यूँ ना अब एक दिन उनसे आमने सामने बैठकर बात कर ही ली जाये. उन्हें बिना झिझके सारी बात बताएं कि किस तरह उनके अटेंशन सीकर वाले व्यहार से सब लोगों को परेशानी हैं और लोग उनसे बचने लगे हैं. उन्हें कहें कि भले ही आपको बुरा लगे लेकिन मैं आपका वेलविशर होने के नाते यह बता रहा हूँ ताकि आप अपनी आदत को बदल सकें. एक अच्छा दोस्त होने के नाते उन्हें यह आदत बदलने में मदद भी करें.

इगनोर करें

उनकी पकाऊ बातों को इगनोर करना एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है. जितना ज्यादा आप उन पर और उनकी बातों पर तवज्जों देंगें उतना ही ज्यादा वे आपसे चेप होंगे और अपनी ख़ुदपसन्दी के किस्से सुनाएंगे. इसलिए जब वे अपने किस्से सुनाने शुरू करें तो उनकी बात बीच में ही काटकर कुछ और टॉपिक छेड़ दें.

अटेंशन सीकर को ना दें बढ़ावा

जब एक पार्टनर अटेंशन सीकर होता है तो ऐसे में दूसरा पार्टनर उसे खुश करने के लिए अपना पूरा फोकस सिर्फ उस पर ही रखता है। जबकि वास्तव में यह व्यवहार स्वीकार्य नहीं है. एक वक्त के बाद आप खुद को मेंटली काफी परेशान महसूस करेंगे। इसलिए, बेहतर होगा कि आप अपने रिश्ते में कुछ हेल्दी बाउंड्री सेट करें। उन्हें यह बताएं कि उनका कौन सा व्यवहार रिश्ते के लिए ठीक नहीं है। इससे रिलेशन को बैलेंस करना काफी आसान होगा।

अटेंशन सीकर व्यक्ति की आप चापलूसी ना करें

एक अंटेशन सीकर व्यक्ति की खास बात यह होती है कि वे अपने गुणों से भलीभांति परिचित हैं. वे जानते हैं कि वे हैंडसम और इंटलीजेंट हैं। लेकिन उन्हें फील गुड तब होता है जब सामने वाले को उनके इन गुणों के बारे में पता हो. इसके लिए वे अपने आसपास के लोगों को अपनी योग्यता के बारे में हमेशा शो ऑफ करना चाहते हैं, बल्कि वे तारीफ और प्रशंसा भी सुनना चाहते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके अंदर छिपी असुरक्षाएं होती हैं और जब कोई उनकी प्रशंसा करता है तो इससे उनका ईगो बूस्ट अप होता है। लेकिन आप उनके इस जाल में ना फंसे. अगर आपको उनकी कोई बात अच्छी लग भी रही है तो उसे उनके सामने ना कहें वरना उन्हें चने के झाड़ पर चढ़ाने वाले आप खुद ही होंगे.

अटेंशन सीकर के विक्टिम कार्ड में ना फंसे

अटेंशन सीकर लोग हमेशा दूसरों की सहानभूति हासिल करना चाहते हैं. वे अपने दोस्तों व आसपास के लोगों के साथ कई तरह के झूठ बोलकर खुद को विक्टिम दिखाने की कोशिश करते हैं। वास्तव में यह उनका तरीका होता है दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का। इसलिए आप उनकी इस तरह के बातों में ना आएं क्यूंकि सच्चाई क्या है ये तो आप खुद भी जानते हैं.

मनोचिकित्सक की सलाह भी ले सकते हैं

यदि अटेंशन सीकर्स का व्यवहार कंट्रोल में न हो और समस्या ज़्यादा गंभीर हो जाए, तो साइकोथेरेपिस्ट की मदद लेनी चाहिए. इसका इलाज बेहद चैलेंजिंग होता है. इसमें जो बिहैवियर होता है, पीड़‍ित को महसूस ही नहीं होता कि उनके पार्ट में कोई गड़बड़ी है. उनके मूड में उतार चढ़ाव, रिश्ते खराब होते हैं. इसमें जो मेन ट्रीटमेंट होता है, वो है कॉग्न‍िट‍िव ब‍िहैविरल थेरेपी. इसमें हमलोग सोचने समझने के तरीके पर काम करते हैं. व्यक्त‍ि की कॉग्न‍िटिव इरर को पहचानते हैं, फिर 20 से 25 सेशन में उसे सुधारने का प्रयास करते हैं.

साथ ही साथ परिवार वालों की काउंसिलिंग करते हैं, उन्हें भी थेरेपी देते हैं कि वो उन्हे.कोई संज्ञा देने या जज करने से बचे. अटेंशन सीकर लोगों के पैरेंट्स अगर छोटी उम्र से ही बच्चों को ख़ुद से प्यार और अपना सम्मान करना सिखाएं, उनका आत्मविश्‍वास बढ़ाने की कोशिश करें, तो बड़े होने पर उनमें अटेंशन पाने की चाह या यूं कहें कि अटेंशन की भूख नहीं रहेगी। इसके बारे में उनके पेरेंट्स से भी बात की जाती है.

साइकोलॉजिस्ट ऐसे व्यक्तियों को डांस, म्यूज़िक, पेंटिंग, क्रिएटिव राइटिंग जैसे एक्सप्रेसिव आर्ट में शामिल होने की सलाह देते हैं. इनके ज़रिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करने से उन्हें ख़ुशी का अनुभव होता है और उनकी आंतरिक शक्ति बढ़ती है. धीरे धीरे उनके व्यवहार में काफी बदलाव आता है.

अटेंशन सीकर से जो काम की बात मिल सके ले लो

अटेंशन सीकर व्यक्ति जहाँ पकाऊ होता है वहां इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता उसको बहुत सारे चीजे मालूम भी होती हैं. वो बेवकूफ नहीं है वो वास्तव में बाकियों से थोड़ा सा ज्यादा अकल्मन्द होता है. उसे बहुत सारी चीजे मालूम है और बहुत से चीजों के बारे में वह बखान ज्यादा करता है. लेकिन उसे फिर भी मालूम बहुत होता है. इसलिए उससे जो काम की बात मिल सके ले लो. किसी से भी क्यां लेना बुरा है है कुछ सीखने को मिल रहा है तो सीख लें. लेकिन उसकी भी एक सीमा तय कर लें.

Attention Seeker

Long Boho Skirt: नए साल में नया स्टाइल

Long Boho Skirt: लौंग बोहो स्कर्ट बोहेमियन स्टाइल की लंबी, ढीलीढाली और बहुत आरामदायक स्कर्ट होती है जिस की लंबाई टखनों तक या फिर फ्लोर तक की होती है. कभी 70 के दशक की पहचान रही और 2000 के दशक की ईट गर्ल स्टाइल का हिस्सा रही लंबी बोहो स्कर्ट ने एक बार फिर वापसी की है. यह एक आउटफिट ही नहीं बल्कि फ्री स्पिरेडटेड, कंफर्टेबल और बहुत ही खूबसूरत फैशन मूड है जो आप को भीड़ में भी सब से अलग बना देता है.

लौंग बोहो स्कर्ट में एक एफर्टलेस फ्लो होता है जो हर बौडी टाइप पर खूबसूरत लगता है. इस की सब से बड़ी खूबी यह है कि यह आप को आराम के साथसाथ स्टाइल भी प्रदान करती है. आमतौर पर लिनेन, कौटन और रेयान जैसे फ्लोई फैब्रिक में बनाई जानी वाली इस स्कर्ट की खासियत है कि इसे किसी भी उम्र की महिला वार्डरोब का हिस्सा बना सकती है.

औफिस, कैफे डेट, वीकेंड, ट्रैवल या किसी भी शादी में आप खुद को फ्यूजन लुक देना चाहते हैं तो लौंग बोहो स्कर्ट इस के लिए एकदम परफैक्ट है.

स्टाइल करें कुछ इस तरह

विंटर शीक स्टाइल : फिटेड टर्टल नेक टौप, फ्लोई बोहो स्कर्ट के साथ नी हाई बूट्स पहन कर आप विंटर शीक लुक दे सकती हैं. आप चाहें तो इस के साथ लंबा वूल कोट या लैदर जैकेट पेयर कर के लुक को और अधिक उभार सकती हैं.

मौडर्न मिनमलिस्ट स्टाइल : सौलिड कलर की बोहो स्कर्ट को क्रिस्प व्हाइट शर्ट या बौडी हगिंग निट स्वेटर के साथ पहनें. यह स्टाइल औफिस से ले कर केजुअल ब्रंच तक परफैक्ट रहता है.

क्लासिक बोहेमियन स्टाइल : यदि आप खुद को परफैक्ट बोहेमियन लुक देना चाहती हैं तो प्रिंटेड स्कर्ट के साथ लूज ब्लाउज, लेयर्ड ज्वैलरी और सुएट बैग कैरी करें. लुक में आप एकदम ढीलाढाला ओवरसाइज कार्डिगन पेयर कर सकती हैं.

पार्टी रेडी ग्लो स्टाइल : शिमरी या मेटालिक ऐक्सैंट बोहो स्कर्ट को सिल्की टैंक टौप और लंबे ईयरिंग्स के साथ पहनें. इस के साथ आप हील्ड बूट्स भी पहन सकती हैं.

ट्रेंडी स्टाइल : क्रौप या औफ शोल्डर लूज टौप के साथ आप सिंपल बोहो स्कर्ट कैरी कर के परफैक्ट ट्रेंडी लुक पा सकती हैं.

ये भी करें प्रयोग

-बोहो स्कर्ट पहनते समय स्कर्ट के नीचे शौर्ट्स या स्टौकिंग्स अवश्य पहनें ताकि बैठने पर शरीर का हिस्सा न दिखें.

-बोहो स्कर्ट को लंबे कुरते के साथ पहन कर आप खुद को किसी भी अवसर पर इंडो वैस्टर्न स्टाइल दे सकती हैं. साधारण लुक के लिए सिंपल स्कर्ट और कुरता और पार्टी फंक्शन के लिए हैवी स्कर्ट और कुरते को चुनें.

-अधिक सर्दी में इस के ऊपर आप एक लौंग कोट पहनें या फिर शौल कैरी करें.

-आप सिल्क, कौटन और सिंथेटिक साड़ियों से भी प्लीटेड बोहो स्कर्ट बनवा सकती हैं. ओरव और कलियों वाली स्कर्ट की जगह ढेर सारी छोटीछोटी प्लेट्स डलवा कर आप मनचाही बोहो स्कर्ट बनवाएं.

-आप कोई भी फ्लोई फैब्रिक खरीद कर मनचाहे रंग और डिजाइन में स्कर्ट बनवा सकती हैं.

-बोहो स्कर्ट के साथ बूट्स और गले में स्कार्फ लपेट कर आप खुद को स्टाइलिश लुक दे सकती हैं.

-हैवी ज्वैलरी के स्थान पर सिंपल मगर स्टाइलिश ज्वैलरी पहनें. बोहो स्कर्ट पर लेयर्ड ज्वैलरी बहुत फबती हैं.

Long Boho Skirt

Indians Leaving Foreign: देशप्रेम नहीं, सिक्के का दूसरा पहलू कुछ और

Indians Leaving Foreign: पिछले 5 साल से स्वीडन में रह रहे अंकुर त्यागी ने वहां की सुखसुविधाओं वाली जिंदगी छोड़ कर वापस भारत लौटने का फैसला किया है. सोशल मीडिया प्लेटफौर्म ऐक्स पर एक वायरल थ्रेड में उन्होंने बताया कि विदेश में साफ हवा और हाई सैलरी तो है, लेकिन वहां ‘अकेलापन’ बहुत गहरा है.

अंकुर के मुताबिक, स्वीडन में लोग बहुत निजी हैं और वहां दोस्तों के साथ कोई सामाजिक जुड़ाव नहीं है.​ उन्हें शहर के प्रदूषण (एक्यूआई) की कोई परवाह नहीं है. उन्होंने कहा कि उन्हें अब प्रदूषण से ज्यादा दोस्तों और परिवार के प्यार वाली ‘असली औक्सीजन’ की जरूरत है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई वजह यही है या फिर कोई और बात है, जिस की वजह से यूरोप और अमेरिका से बड़ी संख्या में लोग अपने देश लौट रहे हैं?

इस की पड़ताल की, तो पता लगा कि कुछ लोगों को देशप्रेम की भावना जरूर वापस ला सकती है लेकिन अधिकतर इस की वजह कुछ और ही है.

कई यूरोपियन देश चाहते हैं कि उन का देश छोड़ दिया जाए

कुछ साल पहले आप ने खबरों में पढ़ा होगा कि इटली विदेशियों को वहां के गांवों में बसने के लिए मुफ्त में बंगले दे रहा था लेकिन यहां बात उलटी है. स्वीडन में बड़ी संख्या में विदेशी रहते हैं. अब वह इन की संख्या को कम करना चाहता है, लिहाजा उस की नई नीति यही कह रही है कि अप्रवासियो, देश छोड़ो और उस के बदले लाखों रुपए की मोटी रकम ले लो.

सितंबर, 2024 में देश में नई नीति घोषित हुई थी, जिस में यह कहा गया है कि अगर विदेशी स्वीडन छोड़ते हैं तो उन्हें 3,50,000 क्रोनर (करीब ₹28.5 लाख) दिया जाएगा.

हालांकि यूरोप में ऐसा करने वाला स्वीडन अकेला देश नहीं है. कई यूरोपीय देश यह काम कर रहे हैं. हालांकि इन की राशि में काफी अंतर है. डेनमार्क, फ्रांस, जरमनी जैसे देश चाहते हैं कि उन का देश छोड़ दिया जाए.

वर्क परमिट के नियमों में सख्ती भी भारतीयों के आने की बड़ी वजह

स्वीडन की वर्तमान सरकार (जिसे कंजर्वेटिव और दक्षिणपंथी दलों का समर्थन प्राप्त है) ने हाल ही में वर्क परमिट के लिए न्यूनतम वेतन की सीमा को बहुत बढ़ा दिया है.

यह विशेषरूप से मध्यम आय वाले प्रवासियों के लिए चुनौतीपूर्ण है. स्वीडन की कंजर्वेटिव सरकार का मानना है कि केवल वही लोग देश में आएं जो आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हों. केवल ‘हाई-स्किल्ड’ (बेहद कुशल) लोग ही स्वीडन आएं. कम वेतन वाली नौकरियों के लिए वे बाहरी लोगों को हतोत्साहित कर रहे हैं.

उन का मानना है कि वे ही लोग स्वीडन आएं, जो वहां की अर्थव्यवस्था में योगदान दे सकें. इस से कई भारतीय प्रोफैशनल्स, जो मध्यम स्तर के वेतन पर वहां काम कर रहे थे, उन के लिए वीजा रिन्यू कराना मुश्किल हो गया है. यही वजह है कि वे लोग भारत वापस लौट रहे हैं.

स्वीडन डेमोक्रेट्स (एसडी) और नीतिगत बदलाव भी वजह है

स्वीडन लंबे समय तक अपनी उदारवादी छवि के लिए जाना जाता था, लेकिन अब वहां की राजनीति स्वीडन फर्स्ट की तरफ मुड़ गई है. पहले स्वीडन अपने यहां आने वाले हर प्रवासी का दिल खोल कर स्वागत करता था. लेकिन वहां की कंजर्वेटिव पार्टियों का तर्क है कि प्रवासी लोग स्वीडिश संस्कृति और भाषा को नहीं अपना रहे हैं, जिस से समाज में अलगाव पैदा हो रहा है.

इन्हें लगता है कि बाहर से आने वाले लोग उन की स्थानीय भाषा को प्रभावित करेंगे. इस से उन की परंपराएं बदल जाएंगी. समाज का ढांचा बदल जाएगा. इसलिए अब वे भारतीयों के साथ सख्त हो गए हैं और नहीं चाहते कि भारतीय यहां रहें. इस तरह ‘स्वीडन डेमोक्रेट्स’ का राजनीति में प्रभाव बढ़ा और इस से अश्वेत लोगों की मुश्किलें भी.

नस्लवाद या भेदभाव से भारतीय परायापन महसूस करता है

हर इंसान ऐसे समाज में रहना चाहता है जहां उसे अपनापन महसूस हो. लेकिन अगर हम विदेश की बात करें तो चाहे वह यूरोप हो या अमेरिका वहां अपने लोगों को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है. वहां यदि आप के नाम में ‘सिंह’, ‘खान’ या कोई विदेशी नाम है, तो स्वीडिश नाम वाले व्यक्ति की तुलना में आप को इंटरव्यू के लिए बुलाए जाने की संभावना बहुत कम हो जाती है. कई भारतीय और अश्वेत प्रवासी शिकायत करते हैं कि अपार्टमेंट किराए पर लेते समय मकानमालिक स्वीडिश लोगों को प्राथमिकता देते हैं.

अब वहां नस्लवादी बयानबाजी यानि हेट स्पीच आम होती जा रही है. सोशल मीडिया पर प्रवासियों को देश की समस्याओं (जैसे क्राइम या बेरोजगारी) के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है. अश्वेत लोगों को अकसर सुरक्षा के नाम पर पुलिस द्वारा ज्यादा टोकारोका जाता है. जब किसी दूसरे देश में नस्लवाद या भेदभाव जैसी घटनाएं होती हैं, तो व्यक्ति की अपनी सांस्कृतिक पहचान और भी मजबूत हो जाती है और वह अपने देश की ओर खिंचा चला आता है.

चर्च नहीं चाहता अश्वेत लोग यहां रहें

हर जगह धर्म की तूती बोलती है. धर्म का जाल कुछ इस तरह अपने शिकंजे में कस लेता है कि फिर चाहे भारतीयों का जाना वहां उन के लिए अच्छा ही क्यों न हो. पूरे यूरोप और अमेरिका में लोग कहते हैं कि हमारे यहां गोरों से ज्यादा काले लोग हो गए हैं. हम गोरे ही यहां राज करेंगे चाहे हमें कम पैसा मिलें. हमें ज्यादा काम करना पड़े तो भी हमें कोई दिक्कत नहीं है. जैसेकि अमेरिका ने कहा कि चाइना का सामान ही हमारे देश में आएगा, भले महंगा पड़े तो भी कोई दिक्कत नहीं है. ट्रंप का जो टैरिफ है वह कम नहीं हुआ और लोगों ने सामान कम खरीदा. लेकिन लोगों ने विरोध नहीं किया.

गोरों को अब यह एहसास हो रहा है कि हमारे देश की नौकरियां सिर्फ हमारे लिए है, कोई बाहर वाला आ कर इस का लाभ क्यों ले. भले ही इस से हमें नुकसान ही क्यों न हों.

ये सारी पट्टी वहां की आम जनता को चर्च ने पढ़ाई है. कम पैसों में उन्हें अच्छे कर्मचारी भले ही न मिल रहे हों लेकिन धर्म ने मना कर दिया तो वे अपनी अर्थव्यवस्था को भी ताक पर लगा देते हैं. यही हाल यूरोप, स्वीडन, अमेरिका की अन्य जगहों पर भी है.

वहां के पादरियों को लगता है कि ‘स्वीडन का चर्च’ केवल स्वीडिश संस्कृति, परंपरा और विरासत का केंद्र होना चाहिए. उन्हें लगता है कि चर्च प्रवासियों या अश्वेत लोगों की मदद क्यों करे. इस से स्वीडन की मूल पहचान खतरे में पड़ रही है.

चर्च का काम काम दुनियाभर के शरणार्थियों की मदद करना नहीं, बल्कि स्वीडन की पुरानी परंपराओं और श्वेत नौर्डिक पहचान को बचाना है. इसलिए, वे ऐसे इमिग्रेशन का विरोध करते हैं जो स्वीडन की जनसांख्यिकी (डेमोग्राफिक्स) को बदल दे.

जब दीवाली पर स्वीडन में रह रहे भारतीय दीए जलाते हैं तो यह उन्हें अपनी संस्कृति के लिए खतरा लगता है. उन्हें डर है कि यदि बाहर से आने वाले लोग (चाहे वे ईसाई ही क्यों न हों) अपनी अलग संस्कृति साथ लाएंगे, तो स्वीडन का पारंपरिक स्वरूप खत्म हो जाएगा.यही वजह है कि वे वहां की जनता को बरगलाते हैं और इस का असर अब वहां दिखने लगा है. यही वजह है भारतीय अब विदेशों से भारत आ रहे हैं.

कट्टरपंथी चर्च समूह अब खुल कर श्वेत राष्ट्रवाद (व्हाइट नेशनलिज्म) की विचारधारा का समर्थन करने लगे हैं.

चर्च चाहता है कि स्वीडन एक व्हाइट क्रिश्चियन नेशन बना रहे. उन के लिए अश्वेत लोग, चाहे वे ईसाई ही क्यों न हों, उन के ‘सांस्कृतिक ढांचे’ में फिट नहीं बैठते.

उन्हें लगता है कि बाहर से आने वाले अश्वेत और अन्य प्रवासी लोगों की जनसंख्या बढ़ जाएगी और ‘श्वेत ईसाई’ लोग अपने ही देश में अल्पसंख्यक बन जाएंगे. इसलिए, चर्च चाहता है कि केवल श्वेत पहचान को ही वहां की असली पहचान माना जाए. जब इन देशों में भारतीयों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं होता तो कई बार उन के आत्मसम्मान को इतनी ठेस लगती है कि वे वापस आने का सोच लेते हैं.

भारत में हाउस हैल्प आसानी से मिल रही

विदेश में खाना बनाने, बर्तन धोने, सफाई करने और कपड़े धोने जैसे काम आप को खुद ही करने पड़ते हैं. अगर आप किसी को सफाई के लिए बुलाते हैं, तो वह $20-$50 (करीब ₹1,700 – ₹4,200) प्रति घंटा तक चार्ज कर सकते हैं. यह रोजाना मुमकिन नहीं है.

आप बाहर हाउसमेड की कल्पना नहीं कर सकते. लेकिन भारत में आप को 15-18 हजार में 24 घंटे की मेड मिल जाएगी. यहां खाना बनाने के लिए, गाड़ी ड्राइव करने के लिए, माली के काम के लिए यानि हर काम के लिए हैल्प मिल जाएगी लेकिन विदेशों में ऐसा नहीं है. वहां हर काम खुद करना पड़ता है, जिस से लोगों को काफी परेशानी होती है. विदेश में रहने वाले लोगों को भारत की ‘बाई और रसोइया’ सब से ज्यादा याद आते हैं और इस वजह से भी वे लौट आते हैं.

रिटायरमैंट की लाइफ का मजा भारत में ही है

बढ़ती उम्र में घरबाहर के सब काम करना उन के लिए सजा हो जाती है और ऐसे में उन्हें अपने देश की याद आती है. रिटायरमैंट के बाद घुटनों या कमरदर्द के साथ खुद झाड़ूपोंछा करना या भारी सामान उठाना मुश्किल होता है. भारत में घरेलू सहायक इस बोझ को उठा लेते हैं.

दवाइयों से ले कर राशन तक, सबकुछ एक फोन या ऐप पर घर आ जाता है. भारत में आप किसी भी बड़े डाक्टर या स्पैशलिस्ट से बिना हफ्तों इंतजार किए मिल सकते हैं. अब भारत के बड़े शहरों में होम हेल्थकेयर की सुविधा बढ़ गई है, जहां नर्स या फिजियोथेरैपिस्ट घर आ कर इलाज करते हैं.

विदेशों में (विशेषकर पश्चिमी देशों में) जीवन काफी व्यस्त और व्यक्तिगत होता है. भारत के त्योहार, शोरशराबा और पड़ोसियों के साथ मेलजोल की कमी वहां खलती है. इसलिए भी लोग वापस आना चाहते हैं.

पैसा कमा लिया अब लौट चलते हैं

अगर आप की पैंशन या बचत डालर या पाउंड में है, तो भारत में आप बहुत ही लग्जरी जीवन जी सकते हैं. जो पैसा विदेश में सिर्फ बुनियादी जरूरतों में खत्म हो जाता है, भारत में उसी पैसे से आप यात्राएं कर सकते हैं और एक बड़ा घर खरीद सकते हैं.

सच तो यह है कि इन लौटने वालों का देशप्रेम से कुछ लेनादेना नहीं है. ये स्वार्थी लोग सिर्फ अपने मतलब के लिए यहां आ रहे हैं और पक्का है कि फिर बातबात में भारतीय गंदगी का रोना रोएंगे पर करेंगे कुछ नहीं. यही इन का कड़वा सच है.

Indians Leaving Foreign

Hair Botox: ट्रीटमैंट जो बालों को दें नई जान

Hair Botox: अगर आप भी फ्रीजी, डैमेज्ड या रूखे बालों से परेशान हैं, तो हेयर बोटोक्स सब से ट्रेंडिंग और सेफ हेयर ट्रीटमैंट माना जा रहा है. यह बालों को अंदर से रिपेयर कर उन्हें मुलायम, चमकदार और स्मूद लुक देता है.

हेयर बोटोक्स क्या है

यह एक डीप कंडीशनिंग और स्मूदनिंग ट्रीटमैंट है, जिस में विटामिन, अमीनो एसिड, कोलेजन और प्रोटीन का खास मिश्रण लगाया जाता है. यह बालों के टूटे हिस्सों को भर कर उन्हें चिकना और हैल्दी बनाता है.

किस के लिए बैस्ट है

-हेयर बोटोक्स उन लोगों के लिए बेहद प्रभावी है, जिन के बाल

बेहद रूखे और फ्रिजी रहते हैं.

-स्ट्रैटनिंग/कलरिंग से डैमेज हो चुके हैं.

-टूटते और दोमुंहे हो रहे हैं.

-बहुत ज्यादा उलझते हैं.

-इस का परिणाम हर हेयर टाइप पर अच्छा आता है.

ट्रीटमैंट

बालों की डीप क्लीनिंग : शैंपू से बालों को अच्छी तरह साफ किया जाता है ताकि प्रोडक्ट्स अच्छे से सेट हो सकें.

-बोटोक्स क्रीम अप्लाई की जाती है.

-बालों के हर सैक्शन पर क्रीमी मास्क लगाया जाता है, जिसे कुछ देर छोड़ा जाता है.

-स्टीम या हीट दी जाती है ताकि प्रोडक्ट्स बालों में गहराई तक पहुंचें.

रिंस और ब्लो ड्राई

अंत में हलका रिंस कर बालों को ब्लो ड्राई और फ्लैट आयरन से सील किया जाता है.

हेयर बोटोक्स से फायदे

-बाल बनते हैं स्मूद, सिल्की और चमकदार.

-फ्रीज 70–80% तक कम.

-टूटना और स्पिलिट ऐंड्स घटते हैं.

-हेयर कलर लंबे समय तक टिकता है.

-बालों का वौल्यूम बना रहता है.

क्या हेयर बोटोक्स सुरक्षित है

हां, यह केराटिन की तरह फौर्मेल्डिहाइड पर आधारित नहीं होता. ज्यादातर ब्रैंड फौर्मेल्डिहाइड फ्री होते हैं, इसलिए इसे सुरक्षित ट्रीटमैंट माना जाता है.

फिर भी सैंसिटिव स्कैल्प या प्रैगनैंसी में ऐक्सपर्ट से सलाह लेनी चाहिए.

ट्रीटमैंट का असर

सही केयर के साथ हेयर बोटोक्स का प्रभाव 2 से 4 महीने तक बना रह सकता है.

ट्रीटमैंट के बाद बालों की देखभाल

-सल्फेट फ्री शैंपू और कंडीशनर का इस्तेमाल करें.

-बारबार हीट का प्रयोग न करें.

-हफ्ते में 1–2 बार हेयर मास्क लगाएं.

-क्लोरीन/खारे पानी से बालों को प्रोटेक्ट करें.

हेयर बोटोक्स उन लोगों के लिए बेहतरीन विकल्प है, जो बिना स्ट्रेटनिंग कराए अपने बालों को नैचुरल, स्मूद और हैल्दी लुक देना चाहते हैं. यह एक सुरक्षित और लंबे समय तक चलने वाला समाधान है, जो बालों को फिर से जीवंत बना देता है.

Hair Botox

Rekha: ऐवरग्रीन ब्यूटी क्वीन रेखा, रौयल फोटोशूट में मौडर्न ट्विस्ट

Rekha: बौलीवुड की ऐवरग्रीन ब्यूटी रेखा का जलवा 71 की उम्र में भी अभी तक कायम है. रेखा हर बार की तरह एक बार फिर अपने लुक और स्टाइल से छा गई हैं. इस फोटोशूट ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बौलीवुड की यह लीजेंड समय के साथ और ज्यादा खूबसूरत होती जा रही हैं.

डिजाइनर रैड साड़ी

हाल ही में फेमस डिजाइनर मनीष मल्होत्रा ने अपने इंस्टाग्राम पर रेखा की 9 फोटोज वाला कारोसेल पोस्ट शेयर किया है. इस पोस्ट में रेखा मनीष मल्होत्रा की स्पैशल एमएम साड़ी में दिख रही हैं. इस में रेखा ने रैड कलर की सिल्क साड़ी के साथ वैलवेट ट्यूनिक और वैलवेट बटुआ कैरी किया हुआ है.

वायरल पोस्ट पर कमैंट्स

रेखा का यह पोस्ट रिलीज होते ही वायरल हो गया और हजारों लाइक्स व कमेंट्स बटोर चुका है. फैंस रेखा के हौट लुक को देख कर उन की ब्यूटी पर फिदा हो रहे हैं. बढ़ती उम्र में भी रेखा का फेस ग्लो और ग्रेस देख कर लोग आश्चर्य में हैं.

कमाल के ऐक्सप्रेशंस

इस फोटोशूट में रेखा के पोज और ऐक्सप्रेशंस कमाल के हैं. रेखा ने रैड कलर की सिल्क साड़ी को अपने  स्टाइल में ग्रेसफुल तरीके से कैरी किया है. विंटर सीजन में साड़ी के साथ मैचिंग वैलवेट ट्यूनिक उन के इस लुक को रौयल टच दे रहा है.

ग्लोइंग बेस मेकअप

अगर बात करें इस रैड साड़ी के साथ मेकअप की तो रेखा ने फेस पर सौफ्ट ग्लोइंग बेस के साथ गोल्डन आईशैडो, परफैक्ट आईलाइनर और बोल्ड कलर की रैड लिपस्टिक, रैड नेल पेंट लगाई हुई है. बंधे हुए बालों में रैड हेयर बैंड लगाया हुआ है.

क्लासिक लुक में मौडर्न ट्विस्ट

रेखा ने स्टाइल स्टेटमैंट के लिए कुछ फोटोज में ग्रीन टिंटेड सनग्लासेस के साथ गजब का पोज दिया है, जो क्लासिक लुक में मौडर्न ट्विस्ट जोड़ता है.

इस के साथ ही हैवी गोल्ड ज्वैलरी, जिस में स्टेटमैंट नैकलेस, झुमके, कंगन और रिंग्स शामिल थे. साथ में मैचिंग वैलवेट बटुआ भी लिया हुआ है.

समय के साथ रेखा की बढ़ती खूबसूरती

रेखा इन फोटोज में यंग ऐक्ट्रैस को भी मात दे रही हैं. समय के साथ रेखा की खूबसूरती और भी निखरती जा रही है. उन का यही स्टाइल, ग्रेस और कौन्फिडेंस बौलीवुड में उन्हें हमेशा सब से अलग पहचान देते रहे हैं.

Rekha

Long Story: अपनाअपना नजरिया

Long Story: पिछले हफ्ते ही मिलिंद का चेन्नई वाली एडवरटाइजिंग एजेंसी की ब्रांच से नई दिल्ली वाली ब्रांच में ट्रांसफर किया गया था. बचपन से ही मिलिंद चेन्नई में अपने मामा के पास ज्यादा रहा था इसलिए उस की हिंदी भाषा पर ज्यादा पकड़ नहीं थी. दिल्ली में जब औफिस में अदिति से नजदीकियां बढ़ीं तो वह कई बार मजाक में उस की हिंदी सुधारती रहती थी.

जल्द ही दोनों की दोस्ती प्रेमपथ पर चलने लगी और दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. कंपनी में दोनों ही सेल्स डिपार्टमैंट में ऐग्जिक्यूटिव थे पर जल्द ही अदिति की रीजनल मैनेजर की पोस्ट पर प्रमोशन हो गई.

हालांकि मिलिंद को इस बात से रती भर भी फर्क नहीं पड़ा था परंतु औफिस में उस के दोस्त और अन्य स्टाफ उस की पीठ पीछे इस बात पर मुंह दबाए हंसना अपना हक सम?ाते थे और मिलिंद को समयसमय पर यह एहसास दिलवाना भूलते नहीं थे कि शादी से पहले ही अब तो अदिति से मिलने की उस की इजाजत लेनी पड़ती है तो शादी के बाद तो उसे जोरू का गुलाम बनने से कोई नहीं रोक सकता.

उन सब की ये बातें मिलिंद एक कान से सुनता था और दूसरे से निकाल देता था. दीवाली की छुट्टियों में उस ने अपने मातापिता को इंदौर से बुलवा लिया और अदिति के मातापिता से मिलवाया.

दोनों के ही मातापिता ने थोड़ी नानुकुर के बाद इस रिश्ते को मंजूरी दे दी. दिसंबर के मध्य में विवाह हुआ तो दोनों नववर्ष की संध्या हनीमून मनाने के बाद वापस लौटे.

जिंदगी रोजमर्रा के ढर्रे पर चलने लगी तो कुछ ही महीनों बाद दोनों के परिवारों में दोनों की सासू मांओं ने अदिति से चुहल करना शुरू कर दिया और कोई गुड न्यूज सुनाओ, खुशखबरी कब दे रही हो? तुम दोनों के बीच सब ठीक तो है? पहले तो अदिति ने इन बातों पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी बल्कि इन बातों को सुन कर हंस दिया करती थी पर साल बीतते न बीतते यही बातें अब तानेबाजी में बदलने लगी थीं.

अदिति पर पद की जिम्मेदारियां अधिक थीं और मिलिंद भी तरक्की चाहता था. हालफिलहाल उसे 1-2 अन्य कंपनियों में भी इंटरव्यू देना था. अत: अभी दोनों ही अपनेअपने कैरियर को ले कर व्यस्त थे इसलिए उन्होंने अभी अभिभावक बनने के फैसले को टाला हुआ था परंतु यह बात उन के परिवार वाले न सम?ा रहे थे और न ही समझना चाहते थे.

मिलिंद की बहन जब कनाडा से भारत आई तो मिलिंद की मां के साथ वह कुछ दिनों के लिए मिलिंद के घर भी रहने आई.

‘‘अरे मम्मी, मन्नू तो कब का औफिस से आ कर कमरे में पड़ा है और तुम्हारी बहुरानी अभी तक नदारद है, लगता है भाई ने कुछ ज्यादा ही छूट दे रखी है.’’

‘‘भाई क्या करेगा तेरा, औफिस में भी उस से नीचे काम करता है. हम दोनों भी इंदौर वाला घर किराए पर चढ़ा कर दिल्ली वाले फ्लैट में आ गए कि अब तो इस बच्ची से सेवाभाव पा कर बाकी की जिंदगी आराम से गुजारेंगे पर इन दोनों ने तो अपना अलग ही फ्लैट ले लिया. यह तो तू आई है तो मैं कुछ दिन यहां रहने चली आई वरना तो इस घर में बहू होने के बाद भी खुद ही रसोई में खटना होगा यह सोच कर हम तो यहां रहने आते ही नहीं हैं.’’

‘‘ठीक ही कहती हो मम्मी, मन्नू भी न जाने कैसे आप के हाथ का स्वाद भूल कर यहां कच्चापक्का खा रहा है.’’

मिलिंद की आंख खुल चुकी थी और कानों में उसे रश्मि और मां की बातें अच्छी तरह से सुनाई दे रही थीं. वह बाहर आया और बोला, ‘‘दीदी, कैसी बातें कर रही हो. आप समझ सकती हो कि जब हम दोनों ही नौकरीपेशा है तो घर के कामों में बाहर वालों की मदद तो लेनी होगी न और वैसे भी श्यामा खाना बहुत अच्छा बनाती है और घर का भी काफी अच्छे से ध्यान रखती है. आजकल ऐसी हैल्पर मिलती कहां है.’’

‘‘अब अगर इतनी ही वकालत कर रहा है अपने रिश्ते की तो यह भी बता कि अब तक तेरी बीवी घर क्यों नहीं आई? तू तो उस से पहले का आया हुआ है?’’ आशा तुनक कर बोली.

‘‘उफ मम्मी, जरूरी मीटिंग है, नए प्रोजैक्ट की डैडलाइन सिर पर है, सभी काम में लगे हुए हैं मु?ो भी रुकना था पर सिर इतनी जोर से फट रहा था कि चाह कर भी रुकने की हालत नहीं थी मेरी. अब सोच रहा हूं कि अगर मैं भी औफिस में ही रहता तो ज्यादा अच्छा रहता.’’

‘‘चलो मम्मी, इतनी आजादी तो विदेश में नहीं जितनी यहां देख रही हूं, पर हमें क्या, भविष्य में खुद ही पछताएगा. आज अदिति को कुछ नहीं कह रहा न. कल देखना इस के सिर पर सवार होगी वह.’’

‘‘तभी तो बच्चा भी नहीं कर रही. वह क्या होता है रश्मि आजकल की लड़कियों में कि हमारी फिगर न खराब हो जाए, यही सोच इस की मैडम ने भी पाल रखी होगी.’’

‘‘कोई बात नहीं है मम्मी, बच्चे का पालनपोषण सही तरीके से करने के लिए सिर्फ सही टाइम का वेट है हम दोनों को,’’ मिलिंद चाह कर भी यह बात कभी अपने परिवार वालों को नहीं सम?ा पाता.

‘‘हां, हम ने तो जैसे बच्चे बेवक्त ही पैदा कर दिए. ये सही वक्तजैसी बातें बस आजकल की पीढ़ी के चोंचले भर हैं.’’

‘‘अब मम्मी आप की सोच कैसे बदलू मैं,’’ इतना कह कर मिलिंद वापस अपने कमरे में चला गया.

15 दिन बाद आशा और रश्मि चले गए तो लगभग सप्ताह भर बाद अदिति की मां सुधा और छोटा भाई वरुण 4-5 दिनों के लिए रहने आए.

‘‘अदिति, तू अपने पैसों का हिसाब तो अच्छे से रखती है न, कहीं प्रेम विवाह के चक्कर में अपने दोनों हाथ मत खाली कर लेना, सुधा ने अपनी शिक्षा का पिटारा खोला.

‘‘अरे मम्मी, दीदी को तो आप कुछ भी सम?ाना रहने ही दो, इन्हें सम?ा कर आप अपना टाइम ही बरबाद कर रही हो,’’ वरुण चिप्स चबाता हुआ बोला.

‘‘ऐसा क्यों कहता है. हम नहीं समझाएंगे तो कौन समझाएगा इसे?’’

‘‘इसलिए कह रहा हूं कि पिछले महीने जब मैं ने दीदी से अपने लिए क्रिकेट किट और खंडाला ट्रिप के लिए पैसे मांगे तो इन्होंने साफ मना कर दिया. कहा कि इस महीने कार की आखिरी ईएमआई भरनी है तो पैसे अगले महीने ले लेना पर देख लो उस अगले महीने को 3 महीने बीत चुके हैं अभी तक दीदी ने पैसों के दर्शन भी नहीं करवाए.’’

‘‘हां भई, बेटी को यों ही पराया धन नहीं कहते. पराई भी हो गई और धन भी परायों को ही सौंप रही है,’’ सुधा का ताना सुन कर अदिति का मन कसैला हो उठा.

‘‘मम्मी, ये कैसी बातें कर रही हो? मेरा अपना पति, मेरे ससुराल वाले मेरे लिए पराए कैसे हो सकते हैं? वे भी मेरे लिए उतने ही अपने हैं जितने आप लोग. मुझे कोई दिक्कत नहीं है वरुण को कुछ भी दिलवाने में पर ईएमआई भरनी जरूरी थी और उस के बाद आप जानती हैं कि मिलिंद के पापा की हार्ट सर्जरी हुई थी और कुछ पैसा उन्हें घर के ऊपर लगाने के लिए भी चाहिए था.’’

‘‘हां तो सारी जिम्मेदारियां तू ही निभा, मिलिंद के मातापिता हैं तो क्या उस का उन के प्रति कोई फर्ज नहीं है और रश्मि, उस के पास पैसों की क्या कमी है. वहां बैठी डौलर कमा रही है और यहां कुछ मदद नहीं होती उस से अपने मांबाप की,’’ सुधा तमतमाए स्वर में बोली.

‘‘मम्मी, उन्होंने ने भी मिलिंद के लिए बहुत किया है और अपने मम्मीपापा के लिए भी करती हैं. जबान की थोड़ी कड़वी जरूर हैं पर मैं यह नहीं भूल सकती कि हमारी शादी के लिए उन्होंने ही मम्मीपापा को मनाया था और मम्मी, शादी में यह तेरामेरा नहीं होता बल्कि विवाह तो वह खूबसूरत नैनों की जोड़ी होती है जो साथ ही भोर का सवेरा देखती हैं और एकसाथ ही सपनों में खोती हैं, एक के बिना दूसरा अधूरा रहता है सदा और क्या मुझे यह याद दिलवाने की जरूरत है कि 7 महीने पहले जब जीजाजी की कंपनी से उन की छंटनी कर दी गई थी तब मिलिंद ने कितनी भागदौड़ कर के उन की दूसरी नौकरी लगवाई थी और दीदी के लाडले का स्कूल में एडमिशन करवाया था?

रही बात रश्मि दीदी की तो अगर इस बार किसी कारणवश वे मदद नहीं कर सकीं तो क्या हम भी मम्मीपापा की तरफ से मुंह मोड लें?’’

‘‘चल वरुण, कल ही घर वापस चलते हैं, अपनी ही औलाद दूसरों का पक्ष ले रही है.’’

अदिति ने भी लैपटौप बंद किया और आंखें मूंद कर सिर पीछे सोफे पर टिका दिया.

आखिरकार मिलिंद की मेहनत रंग लाई. अपने वर्षों के अनुभव और बेहतरीन इंटरव्यू के कारण वह जल्द ही एक नामी कंपनी में मैनेजर बना दिया गया. उस की जौब को 6 महीने हुए थे कि एक दिन उसे औफिस में अदिति का फोन आया.

‘‘हैलो अदिति क्या बात है, घबराई हुई सी क्यों बोल रही हो?’’ मिलिंद उस की भर्राई सी आवाज सुन कर बेचैन हो उठा.

उस दिन अदिति अपनी गर्भ की जांच की रिपोर्ट्स ले कर हौस्पिटल गई थी. वहां उस की सहेली किरण गाइनेकोलौजिस्ट के पद पर नियुक्त हुई थी.

मिलिंद जब तक हौस्पिटल पहुंच नहीं गया वह पूरा रास्ता असहज ही रहा.

डाक्टर के कैबिन में पहुंचा तो उस ने देखा कि अदिति की आंखें भरी हुई थीं और चेहरा मुरझाया हुआ था. मिलिंद को देखते ही उस की रुलाई फूट पड़ी. किसी तरह से मिलिंद ने उसे संभाला और किरण से सारी बात पूछी.

अदिति की फैलोपियन ट्यूब्स बिलकुल खराब हो चुकी थीं जिस वजह से उस का मां बनना अब नामुमकिन था. जब मिलिंद को यह बात पता चली तो वह भी एकबारगी भीतर तक हिल गया पर सब से पहले इस वक्त उसे अदिति को संभालना था इसलिए अपना मन पत्थर समान मजबूत कर लिया था उस ने.

‘‘पर आजकल तो आईवीएफ की मदद से महिलाएं बच्चा पैदा करने में सफल होती हैं न,’’ मिलिंद ने किरण से पूछा.

‘‘हां, आजकल यह काफी नौर्मल है पर अदिति के केस में एक और प्रौब्लम है और वह यह है कि अदिति के पीरियड्स कभी रैग्युलर नहीं रहे और पीसीओडी की वजह से अदिति को ओव्यूलेशन भी नहीं होता.

‘‘ओव्यूलेशन क्या होता है?’’ मिलिंद ने पूछा.

‘‘महिलाओं के शरीर में हर महीने ओवरी से अंडे निकलते हैं जोकि अदिति के केस में नहीं हो रहा.’’

‘‘तो फिर अब क्या हो सकता है?’’

‘‘फिलहाल तुम दोनों इस विषय पर ज्यादा कुछ मत सोचो, कुछ वक्त गुजरने दो, मैं अदिति से मिलती रहूंगी,’’ किरण ने बहुत प्यार और अपनेपन से दोनों को दिलासा दिया.

गाड़ी में घर वापस जाते हुए अदिति के चेहरे पर मायूसी ही मायूसी थी. मिलिंद उसे इस तरह से देख नहीं पा रहा था.

अगले दिन सुधा अदिति से मिलने आई, ‘‘मैं ने तुझे समझाया था न कि अपनी नौकरी के चक्कर में कोई फैमिली प्लानिंग मत करना पर तूने कभी घर वालों की सुनी है? अब कल को मिलिंद का मन तु?ा से भर गया तो?’’

‘‘मम्मी,’’ चीख सी पड़ी अदिति, ‘‘आप जानती भी हैं कि आप क्या कह रही हैं?’’

‘‘हां, अच्छी तरह से जानती समझती हूं कि मैं क्या कह रही हूं. पहले जैसे हालात अब नहीं हैं. जब मिलिंद कुछ नहीं था तब तो तेरे आगेपीछे घूमघूम कर तुझ से शादी कर ली और अब तो मिलिंद भी मैनेजर है, तेरे फ्लैट, तेरी गाड़ी सब की किश्तें पूरी हो चुकी हैं और अब तू मां बन नहीं सकती तो तुझ से पीछा छुड़वाने में उसे कौन सी देर लगेगी?’’

‘‘पर मिलिंद को ऐसा करने की क्या

जरूरत है? बहुत प्यार करता है वह मुझे,’’ सुधा की बातों ने अदिति का मन बिलकुल अशांत कर दिया.

‘‘यह प्यारव्यार सब हवा हो जाएगा जब उस के घर वाले बच्चे के लिए शोर मचाएंगे, तेरी सासननद से तो वैसे ही कुछ खास नहीं बनती.’’

‘‘तो पसंद तो आप लोग भी मिलिंद को नहीं करते,’’ अदिति धीमे स्वर में बोली.

‘‘कुछ कहा क्या तूने?’’ सुधा ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं मम्मी.’’

इधर मिलिंद अपनी मम्मी से मिलने आया था.

‘‘अब आगे की सोच मन्न, हमें भी मरने से पहले तेरी औलाद देखनी है,’’ आशा अपनी आवाज में मिठास घोलते हुई बोली.

‘‘अब मम्मी जो हो रहा है उस में हम दोनों का तो कोई फाल्ट नहीं है.’’

‘‘कैसी बातें कर रहा है, तुझ में क्या कमी है, कमी तो अदिति में है, तू तो उसे छोड़ दे,’’ आशा तुनक कर बोली.

‘‘अच्छा, फिर उसे छोड़ कर क्या करूं?’’ मिलिंद सब समझते हुए भी आशा से सुनना चाहता था.

‘‘देख यह बात इतनी छोटी नहीं है कि जितना तू इसे इतने हलके में ले रहा है, अपने भविष्य का सोच, क्या तू पापा नहीं बनना चाहता? दूसरी शादी का सोच,’’ आशा जैसे एक ही सांस में यह बोल गई.

यह सुन कर मिलिंद ने कुछ पल आशा को देखा और फिर बोला, ‘‘और अगर कमी मु?ा में होती तो भी क्या आप अदिति को यही एडवाइज देतीं?’’

आशा ने कोई जवाब नहीं दिया

‘‘मम्मी, मैं तो आप के पास आया था कि आप हमारे पास कुछ दिनों के लिए रहने आए, पिछली बार रश्मि दीदी की कुछ बातों की वजह से सब का मूड कुछ बुझ सा गया था. आप और अदिति की मम्मी उसे कुछ हौसला दें क्योंकि इस वक्त उसे प्यार और अपनेपन की बेहद जरूरत है पर आप तो बिलकुल अलग बात कर रही हैं,’’ मिलिंद के स्वर में गुस्सा नहीं दुख झलक रहा था. वह उठ कर जाने को हुआ तो तभी उस के पापा उसे दरवाजे पर मिले.

‘‘अरे मन्नू कितने दिनों बाद आया है, आ बैठ तो सही, जा कहां रहा है,’’ सुनील उसे देख कर खुशी से बोले.

‘‘बस पापा, आज थोड़ी जल्दी है, मैं आता हूं 1-2 दिन में फिर,’’ मिलिंद उदास स्वर में बोलता हुआ घर से बाहर निकल गया.

‘‘कोई अपनी सम?ादारी भरी बात तो

नहीं कर दी अदिति के लिए?’’ सुनील ने आशा से पूछा.

‘‘लो मैं ने भला क्या कहा होगा यही न कि तू दूसरी शादी के बारे में सोच, अब इस में क्या गलत है? क्या अपने बच्चे का भला भी न सोचे एक मां,’’ यह कह कर आशा बिना कुछ सुनील से सुने वहां से उठ कर चली गईं.

सुनील का आशा की बातों पर कोई ध्यान नहीं था. वे बस एक ठंडी सांस ले कर रह गए. मिलिंद घर आया तो अदिति का चेहरा देख कर ही भांप गया कि सवेरे अदिति की मम्मी आई हुई थीं और यह यहां भी उस की गलतफहमी ही साबित हुई कि उन्होंने भी अदिति को प्यार से कुछ सम?ाया होगा, उस से उस के दिल की बातें सुनी होंगी, कुछ उसे दिलासा दिया होगा. जरूर आज उसे हताश करने वाली बातें कर के गई होंगी.

‘‘क्या कहा मम्मी ने? क्यों उदास हो उन की बातें सोचसोच कर?’’  मिलिंद ने उस का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा.

अदिति ने एक पल को चौंक कर उस की तरफ देखा. मिलिंद ने आंखों के हावभाव से ही उस से दोबारा पूछा.

‘‘उन्होंने कहा कि अब तुम मु?ो छोड़ कर दूसरी शादी कर लोगे,’’ इतना कह कर वह रोने लग गई.

यह सुन कर मिलिंद ठहाका लगा कर हंस पड़ा, ‘‘देखो, मु?ो नहीं पता था कि मम्मी वह क्या कहते हैं अंतर्यामी भी हैं.’’

‘‘क्या मतलब, क्या कहना चाह रहे हो?’’ अदिति उलझे से स्वर में बोली.

‘‘मतलब सच में मेरी मम्मी मेरी दूसरी शादी करवाना चाह रही हैं.’’

यह सुन कर तो अदिति और जोर से रोने लग गई.

‘‘और सुनो, मम्मी ने तो लड़की भी देख ली है,’’ मिलिंद पूरी तरह से अदिति के साथ आज मजाक के मूड में था.

‘‘हांहां कर लो, अब तुम्हारा दिल जो भर गया है मु?ा से,’’ कह कर अदिति उस के पास से उठ कर जाने लगी.

‘‘अरेअरे, कहां जा रही हो,’’ मिलिंद ने उस की बांह खींच कर अपने करीब कर लिया.

‘‘अच्छा, अब रोना बंद करो, सुनो अदिति, तुम्हारी मैंटली और फिजिकली सेहत खराब हो इस कीमत पर मम्मीपापा बनना मेरा सपना नहीं है, बच्चे के लिए और भी औप्शंस हैं, हम आईवीएफ ट्राई कर सकते हैं. हम बच्चा गोद

ले सकते हैं, सब ठीक हो जाएगा बस तुम थोड़ा धैर्य रखो.’’

‘‘पर हम दोनों के घर वाले, क्या वे लोग भी…’’ अदिति कुछ आशंकित सी हो कर बोली.

अदिति की बात बीच में ही काट कर मिलिंद बोला, ‘‘देखो अदिति वे अपने हिसाब से लाइफ को देखते हैं. यह चीज हम सिर्फ बदलने की कोशिश कर सकते हैं पर इस में हम पूरी तरह कामयाब होंगे या नहीं इस की गारंटी नहीं है और आखिर में हमें भी अपनी लाइफ अपने तरीके से जीने का हक है, लाइफ के लिए यह मेरा पेस्पैक्टिव है मतलब परिशेप है समझ,’’ मिलिंद ने प्यार से उस का चेहरा पकड़ कर कहा.

‘‘परिशेप नहीं परिप्रेक्ष्य,’’ अदिति ने हंसते हुए कहा.

‘‘टीचरजी,’’ मिलिंद भी अपने कान पकड़ कर हंस दिया.

‘‘वैसे नजरिया भी कहा जा सकता है,’’ अब अदिति भी खिले स्वर में बोली.

‘‘बिलकुल, अपनीअपनी सोच,

अपनाअपना नजरिया,’’ मिलिंद अब हर प्रकार से संतुष्ट था.

Long Story

Drama Story: दो भूत- उर्मिल से तालमेल क्या बैठा पाई अम्माजी

लेखिका- सरोज गोयल

Drama Story: मेरी निगाह कलैंडर की ओर गई तो मैं एकदम चौंक पड़ी…तो आज 10 तारीख है. उर्मिल से मिले पूरा एक महीना हो गया है. कहां तो हफ्ते में जब तक चार बार एकदूसरे से नहीं मिल लेती थीं, चैन ही नहीं पड़ता था, कहां इस बार पूरा एक महीना बीत गया. घड़ी पर निगाह दौड़ाई तो देखा कि अभी 11 ही बजे हैं और आज तो पति भी दफ्तर से देर से लौटेंगे. सोचा क्यों न आज उर्मिल के यहां ही हो आऊं. अगर वह तैयार हो तो बाजार जा कर कुछ खरीदारी भी कर ली जाए. बाजार उर्मिल के घर से पास ही है. बस, यह सोच कर मैं घर में ताला लगा कर चल पड़ी. उर्मिल के यहां पहुंच कर घंटी बजाई तो दरवाजा उसी ने खोला. मुझे देखते ही वह मेरे गले से लिपट गई और शिकायतभरे लहजे में बोली, ‘‘तुझे इतने दिनों बाद मेरी सुध आई?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘मैं तो आखिर चली भी आई पर तू तो जैसे मुझे भूल ही गई.’’

‘‘तुम तो मेरी मजबूरियां जानती ही हो.’’

‘‘अच्छा भई, छोड़ इस किस्से को. अब क्या बाहर ही खड़ा रखेगी?’’

‘‘खड़ा तो रखती, पर खैर, अब आ गई है तो आ बैठ.’’

‘‘अच्छा, क्या पिएगी, चाय या कौफी?’’ उस ने कमरे में पहुंच कर कहा.

‘‘कुछ भी पिला दे. तेरे हाथ की तो दोनों ही चीजें मुझे पसंद हैं.’’

‘‘बहूरानी, कौन आया है?’’ तभी अंदर से आवाज आई.

‘‘उर्मिल, कौन है अंदर? अम्माजी आई हुई हैं क्या? फिर मैं उन के ही पास चल कर बैठती हूं. तू अपनी चाय या कौफी वहीं ले आना.’’

अंदर पहुंच कर मैं ने अम्माजी को प्रणाम किया और पूछा, ‘‘तबीयत कैसी है अब आप की?’’

‘‘बस, तबीयत तो ऐसी ही चलती रहती है, चक्कर आते हैं. भूख नहीं लगती.’’

‘‘डाक्टर क्या कहते हैं?’’

‘‘डाक्टर क्या कहेंगे. कहते हैं आप दवाएं बहुत खाती हैं. आप को कोई बीमारी नहीं है. तुम्हीं देखो अब रमा, दवाओं के बल पर तो चल भी रही हूं, नहीं तो पलंग से ही लग जाती,’’ यह कह कर वे सेब काटने लगीं.

‘‘सेब काटते हुए आप का हाथ कांप रहा है. लाइए, मैं काट दूं.’’

‘‘नहीं, मैं ही काट लूंगी. रोज ही काटती हूं.’’

‘‘क्यों, क्या उर्मिल काट कर नहीं देती?’’

‘‘तभी उर्मिल ट्रे में चाय व कुछ नमकीन ले कर आ गई और बोली, ‘‘यह उर्मिल का नाम क्यों लिया जा रहा था?’’

‘‘उर्मिल, यह क्या बात है? अम्माजी का हाथ कांप रहा है और तुम इन्हें एक सेब भी काट कर नहीं दे सकतीं?’’

‘‘रमा, तू चाय पी चुपचाप. अम्माजी ने एक सेब काट लिया तो क्या हो गया.’’

‘‘हांहां, बहू, मैं ही काट लूंगी. तुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है,’’ तनाव के कारण अम्माजी की सांस फूल गई थी.

मैं उर्मिल को दूसरे कमरे में ले गई और बोली, ‘‘उर्मिल, तुझे क्या हो गया है?’’

‘‘छोड़ भी इस किस्से को? जल्दी चाय खत्म कर, फिर बाजार चलें,’’ उर्मिल हंसती हुई बोली.

मैं ठगी सी उसे देखती रह गई. क्या यह वही उर्मिल है जो 2 वर्ष पूर्व रातदिन सास का खयाल रखती थी, उन का एकएक काम करती थी, एकएक चीज उन को पलंग पर हाथ में थमाती थी. अगर कभी अम्माजी कहतीं भी, ‘अरी बहू, थोड़ा काम मुझे भी करने दिया कर,’ तो हंस कर कहती, ‘नहीं, अम्माजी, मैं किस लिए हूं? आप के तो अब आराम करने के दिन हैं.’

तभी उर्मिल ने मुझे झिंझोड़ दिया, ‘‘अरे, कहां खो गई तू? चल, अब चलें.’’

‘‘हां.’’

‘‘और हां, तू खाना भी यहां खाना. अम्माजी बना लेंगी.’’

मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, ‘‘उर्मिल, तुझे हो क्या गया है?’’

‘‘कुछ नहीं, अम्माजी बना लेंगी. इस में बुरा क्या है?’’

‘‘नहीं, उर्मिल, चल दोनों मिल कर सब्जीदाल बना लेते हैं और अम्माजी के लिए रोटियां भी बना कर रख देते हैं. जरा सी देर में खाना बन जाएगा.’’

‘‘सब्जी बन गई है, दालरोटी अम्माजी बना लेंगी, जब उन्हें खानी होगी.’’

‘‘हांहां, मैं बना लूंगी. तुम दोनों जाओ,’’ अम्माजी भी वहीं आ गई थीं.

‘‘पर अम्माजी, आप की तबीयत ठीक नहीं लग रही है, हाथ भी कांप रहे हैं,’’ मैं किसी भी प्रकार अपने मन को नहीं समझा पा रही थी.

‘‘बेटी, अब पहले का समय तो रहा नहीं जब सासें राज करती थीं. बस, पलंग पर बैठना और हुक्म चलाना. बहुएं आगेपीछे चक्कर लगाती थीं. अब तो इस का काम न करूं तो दोवक्त का खाना भी न मिले,’’ अम्माजी एक लंबी सांस ले कर बोलीं.

‘‘अरे, अब चल भी, रमा. अम्माजी, मैं ने कुकर में दाल डाल दी है. आटा भी तैयार कर के रख दिया है.’’

बाजार जाते समय मेरे विचार फिर अतीत में दौड़ने लगे. बैंक उर्मिल के घर के पास ही था. एक सुबह अम्माजी ने कहा, ‘मैं बैंक जा कर रुपए जमा कर ले आती हूं.’

‘नहीं अम्माजी, आप कहां जाएंगी, मैं चली जाऊंगी,’ उर्मिल ने कहा था.

‘नहीं, तुम कहां जाओगी? अभी तो अस्पताल जा रही हो.’

‘कोई बात नहीं, अस्पताल का काम कर के चली जाऊंगी.’

और फिर उर्मिल ने अम्माजी को नहीं जाने दिया था. पहले वह अस्पताल गई जो दूसरी ओर था और फिर बैंक. भागतीदौड़ती सारा काम कर के लौटी तो उस की सांस फूल आई थी. पर उर्मिल न जाने किस मिट्टी की बनी हुई थी कि कभी खीझ या थकान के चिह्न उस के चेहरे पर आते ही न थे.

उर्मिल की भागदौड़ देख कर एक दिन जीजाजी ने भी कहा था,

‘भई, थोड़ा काम मां को भी कर लेने दिया करो. सारा दिन बैठे रहने से तो उन की तबीयत और खराब होगी और खाली रहने से तबीयत ऊबेगी भी.’

इस पर उर्मिल उन से झगड़ पड़ी थी, ‘आप भी क्या बात करते हैं? अब इन की कोई उम्र है काम करने की? अब तो इन से तभी काम लेना चाहिए जब हमारे लिए मजबूरी हो.’

बेचारे जीजाजी चुप हो गए थे और फिर कभी सासबहू के बीच में नहीं बोले.  मैं इन्हीं विचारों में खोई थी कि उर्मिल ने कहा, ‘‘लो, बाजार आ गया.’’ यह सुन कर मैं विचारों से बाहर आई.

बाजार में हम दोनों ने मिल कर खरीदारी की. सूरज सिर पर चढ़ आया था. पसीने की बूंदें माथे पर झलक आई थीं. दोनों आटो कर के घर पहुंचीं. अम्माजी ने सारा खाना तैयार कर के मेज पर लगा रखा था. 2 थालियां भी लगा रखी थीं. मेरा दिल भर आया.

अम्माजी बोलीं, ‘‘तुम लोग हाथ धो कर खाना खा लो. बहुत देर हो गई है.’’

‘‘अम्माजी, आप?’’  मैं ने कहा.

‘‘मैं ने खा लिया है. तुम लोग खाओ, मैं गरमगरम रोटियां सेंक कर लाती हूं.’’

मैं अम्माजी के स्नेहभरे चेहरे को देखती रही और खाना खाती रही. पता नहीं अम्माजी की गरम रोटियों के कारण या भूख बहुत लग आने के कारण खाना बहुत स्वादिष्ठ लगा. खाना खा कर अम्माजी को स्वादिष्ठ खाने के लिए धन्यवाद दे कर मैं अपने घर लौट आई.

कुछ दिनों बाद एक दिन जब मैं उर्मिल के घर पहुंची तो दरवाजा थोड़ा सा खुला था. मैं धीरे से अंदर घुसी और उर्मिल को आवाज लगाने ही वाली थी कि उस की व अम्माजी की मिलीजुली आवाज सुन कर चौंक पड़ी. मैं वहीं ओट में खड़ी हो कर सुनने लगी.

‘‘सुनो, बहू, तुम्हारी लेडीज क्लब की मीटिंग तो मंगलवार को ही हुआ करती है न? तू बहुत दिनों से उस में गई नहीं.’’

‘‘पर समय ही कहां मिलता है, अम्माजी?’’

‘‘तो ऐसा कर, तू आज हो आ. आज भी मंगलवार ही है न?’’

‘‘हां, अम्माजी, पर मैं न जा सकूंगी. अभी तो काम पड़ा है. खाना भी बनाना है.’’

‘‘उस की चिंता न कर. मुझे बता दे, क्याक्या बनेगा.’’

‘‘अम्माजी, आप सारा खाना कैसे बना पाएंगी? वैसे ही आप की तबीयत ठीक नहीं रहती है.’’

‘‘बहू, तू क्या मुझे हमेशा बुढि़या और बीमार ही बनाए रखेगी?’’

‘‘अम्माजी मैं…मैं…तो…’’

‘‘हां, तू. मुझे इधर कई दिनों से लग रहा है कि कुछ न करना ही मेरी सब से बड़ी बीमारी है, और सारे दिन पड़ेपड़े कुढ़ना मेरा बुढ़ापा. जब मैं कुछ काम में लग जाती हूं तो मुझे लगता है मेरी बीमारी ठीक हो गई है और बुढ़ापा कोसों दूर चला गया है.’’

‘‘अम्माजी, यह आप कह रही हैं?’’ उर्मिल को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ.

‘‘हां, मैं. इधर कुछ दिनों से तू ने देखा नहीं कि मेरी तबीयत कितनी सुधर गई है. तू चिंता न कर. मैं बिलकुल ठीक हूं. तुझे जहां जाना है जा. आज शाम को सुधीर के साथ किसी पार्टी में भी जाना है न? मेरी वजह से कार्यक्रम स्थगित मत करना. यहां का सब काम मैं देख लूंगी.’’

‘‘ओह अम्माजी,’’  उर्मिल अम्माजी से लिपट गई और रो पड़ी.

‘‘यह क्या, पगली, रोती क्यों है?’’ अम्माजी ने उसे थपथपाते हुए कहा.

‘‘अम्माजी, मेरे कान कब से यह सुनने को तरस रहे थे कि आप बूढ़ी नहीं हैं और काम कर सकती हैं. मैं ने इस बीच आप से जो कठोर व्यवहार किया, उस के लिए क्षमा चाहती हूं.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. चल जा, जल्दी उठ. क्लब की मीटिंग का समय हो रहा है.’’

‘‘अम्माजी, अब तो नहीं जाऊंगी आज. हां, आज बाजार हो आती हूं. बच्चों की किताबें और सुधीर के लिए शर्ट लेनी है.’’

‘‘तो बाजार ही हो आ. रमा को भी फोन कर देती तो दोनों मिल कर चली जातीं.’’

‘‘अम्माजी, प्रणाम. आप ने याद किया और रमा हाजिर है.’’

‘‘अरी, तू कब से यहां खड़ी थी?’’

‘‘अभी, बस 2 मिनट पहले आई थी.’’

‘‘तो छिप कर हमारी बातें सुन रही थी, चोर कहीं की.’’

‘‘क्या करती? तुम सासबहू की बातचीत ही इतनी दिलचस्प थी कि अपने को रोकना जरूरी लगा.’’

‘‘तुम दोनों बैठो, मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ अम्माजी रसोई की ओर बढ़ गईं.

मैं अपने को रोक न पाई. उर्मिल से पूछ ही बैठी, ‘‘यह सब क्या हो रहा था? मेरी समझ में तो कुछ नहीं आया. यह माफी कैसी मांगी जा रही थी?’’

‘‘रमा, याद है, उस दिन, तू मुझ से बारबार मेरे बदले हुए व्यवहार का कारण पूछ रही थी. बात यह है रमा, अम्माजी के सिर पर दो भूत सवार थे. उन्हें उतारने के लिए मुझे नाटक करना पड़ा.’’

‘‘दो भूत? नाटक? यह सब क्या है? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा. पहेलियां न बुझा, साफसाफ बता.’’

‘‘बता तो रही हूं, तू उतावली क्यों है? अम्माजी के सिर पर चढ़ा पहला भूत था उन का यह समझ लेना कि बहू आ गई है, उस का कर्तव्य है कि वह प्राणपण से सास की सेवा और देखभाल करे, और सास होने के नाते उन का अधिकार है दिनभर बैठे रहना और हुक्म चलाना. अम्माजी अच्छीभली चलफिर रही होती थीं तो भी अपने इन विचारों के कारण चायदूध का समय होते ही बिस्तर पर जा लेटतीं ताकि मैं सारी चीजें उन्हें बिस्तर पर ही ले जा कर दूं. उन के जूठे बरतन मैं ही उठा कर रखती थी. मेरे द्वारा बरतन उठाते ही वे फिर उठ बैठती थीं और इधरउधर चहलकदमी करने लगती थीं.’’

‘‘अच्छा, दूसरा भूत कौन सा था?’’

‘‘दूसरा भूत था हरदम बीमार रहने का. उन के दिमाग में घुस गया था कि हर समय उन को कुछ न कुछ हुआ रहता है और कोई उन की परवा नहीं करता. डाक्टर भी जाने कैसे लापरवाह हो गए हैं. न जाने कैसी दवाइयां देते हैं, फायदा ही नहीं करतीं.’’

‘‘भई, इस उम्र में कुछ न कुछ तो लगा ही रहता है. अम्माजी दुबली भी तो हो गई हैं,’’ मैं कुछ शिकायती लहजे में बोली.

‘‘मैं इस से कब इनकार करती हूं, पर यह तो प्रकृति का नियम है. उम्र के साथसाथ शक्ति भी कम होती जाती है. मुझे ही देख, कालेज के दिनों में जितनी भागदौड़ कर लेती थी उतनी अब नहीं कर सकती, और जितनी अब कर लेती हूं उतनी कुछ समय बाद न कर सकूंगी. पर इस का यह अर्थ तो नहीं कि हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाऊं,’’ उर्मिल ने मुझे समझाते हुए कहा.

‘‘अम्माजी की सब से बड़ी बीमारी है निष्क्रियता. उन के मस्तिष्क में बैठ गया था कि वे हर समय बीमार रहती हैं, कुछ नहीं कर सकतीं. अगर मैं अम्माजी की इस भावना को बना रहने देती तो मैं उन की सब से बड़ी दुश्मन होती. आदमी कामकाज में लगा रहे तो अपने दुखदर्द भूल जाता है और शरीर में रक्त का संचार बढ़ता है, जिस से वह स्वस्थ अनुभव करता है, और फिर व्यस्त रहने से चिड़चिड़ाता भी नहीं रहता.’’

मुझे अचानक हंसी आ गई. ‘‘ले भई, तू ने तो डाक्टरी, फिलौसफी सब झाड़ डाली.’’

‘‘तू चाहे जो कह ले, असली बात तो यही है. अम्माजी को अपने दो भूतों के दायरे से निकालने का एक ही उपाय था कि…’’

‘‘तू उन की अवहेलना करे, उन्हें गुस्सा दिलाए जिस से चिढ़ कर वे काम करें और अपनी शक्ति को पहचानें. यही न?’’  मैं ने वाक्य पूरा कर दिया.

‘‘हां, तू ने ठीक समझा. यद्यपि गुस्सा और उत्तेजना शरीर और हृदय के लिए हानिकारक समझे जाते हैं पर कभीकभी इन का होना भी मनुष्य के रक्तसंचार को गति देने के लिए आवश्यक है. एकदम ठंडे मनुष्य का तो रक्त भी ठंडा हो जाता है. बस, यही सोच कर मैं अम्माजी को जानबूझ कर उत्तेजित करती थी.’’

‘‘कहती तो तू ठीक है.’’

‘‘तू मेरे नानाजी से तो मिली है न?’’

‘‘हां, शादी से पहले मिली थी एक बार.’’

‘‘जानती है, कुछ दिनों में वे 95 वर्ष के हो जाएंगे. आज भी वे कचहरी जाते हैं. जितना कर पाते हैं, काम करते हैं. कई बार रातरातभर अध्ययन भी करते हैं. अब भी दोनों समय घूमने जाते हैं.’’

‘‘इस उम्र में भी?’’  मुझे आश्चर्य हो रहा था.

‘‘हां, उन की व्यस्तता ही आज भी उन्हें चुस्त रखे हुए है. भले ही वे बीमार से रहते हैं, फिर भी उन्होंने उम्र से हार नहीं मानी है.’’

मैं ने आंख भर कर अपनी इस सहेली को देखा जिस की हर टेढ़ी बात में भी कोई न कोई अच्छी बात छिपी रहती है. ‘‘अच्छा एक बात तो बता, क्या जीजाजी को पता था? उन्हें अपनी मां के प्रति तेरा यह रूखा व्यवहार चुभा नहीं?’’

‘‘उन्होंने एकदो बार कहा, पर मैं ने उन्हें यह कह कर चुप करा दिया कि यह सासबहू का मामला है, आप बीच में न ही बोलें तो अच्छा है.’’

मैं चाय पीते समय कभी हर्ष और आत्मसंतोष से दमकते अम्माजी के चेहरे को देख रही थी, कभी उर्मिल को. आज फिर एक बार उस का बदला रूप देख कर पिछले माह की उर्मिल से तालमेल बैठाने का प्रयत्न कर रही थी.

Drama Story

Hindi Fictional Story: किट्टी की किटकिट

Hindi Fictional Story: अब यह गुजरे जमाने की बात हो गई है जब किट्टी पार्टियां केवल अमीर घरों की महिलाओं का शौक होती थीं. आजकल महानगरों में ही नहीं वरन छोटेछोटे शहरों में भी किट्टी पार्टियां आयोजित की जाती हैं और मध्यवर्गीय परिवारों की गृहिणियां भी पूरे जोशखरोश के साथ इन पार्टियों में शिरकत कर के गौरवान्वित महसूस करती हैं.

अमूमन इन पार्टियों का समय लगभग 11 से 1 बजे के बीच रखा जाता है जब पतिदेव औफिस और बालगोपाल स्कूल जा चुके होते हैं. उस समय घर पर गृहस्वामिनी का निर्विघ्न एवं एकछत्र राज होता है. हर छोटेबड़े शहर में चाहे कोई महल्ला हो, सोसायटी हो, मल्टी स्टोरी बिल्डिंग हो, इन पार्टियों का दौर किसी न किसी रूप में चलता रहा है.

इन पार्टियों की खासीयत यह होती है कि टाइमपास के साथसाथ ये मनोरंजन का भी अच्छा जरीया होती हैं जहां, गृहिणियां गप्पें लड़ाने के साथसाथ हंसीठिठोली भी करती हैं और एकदूसरे के कपड़ों व साजशृंगार का बेहद बारीकी से निरीक्षण भी करती हैं. किट्टी पार्टियों की मैंबरानों में सब से महत्त्वपूर्ण बात यह होती है कि सब से सुंदर एवं परफैक्ट दिखने की गलाकाट होड़ चलती रहती है, जिस का असर बेचारे मियांजी की जेब को सहना पड़ता है.

मैचिंग पर्स, मैचिंग ज्वैलरी और सैंडल की जरूरत तो हर किट्टी में लाजिम है. ऐतराज जताने की हिम्मत बेचारे पति में कहां होती है. यदि उस ने भूल से भी श्रीमतीजी से यह पूछने की गुस्ताखी कर दी कि क्यों हर महीने फालतू खर्चा करती हो, तो अनेक तर्क प्रस्तुत कर दिए जाते हैं जैसे मिसेज चोपड़ा तो हर किट्टी में अलगअलग डायमंड और प्लैटिनम के गहने पहन कर आती हैं. मैं तो किफायत में आर्टिफिशियल ज्वैलरी से ही काम चला लेती हूं. यदि मैं सुंदर दिखती हूं, अच्छा पहनती हूं तो सोसायटी में तुम्हारी ही इज्जत बढ़ती है. इन तर्कों के आगे बहस करने का जोखिम पतिदेव उठा नहीं पाते और बात को वहीं खत्म करने में बुद्धिमानी समझते हैं.

किट्टी पार्टियों में पैसों का लेनदेन भी जोर पकड़ता जा रहा है. पहले जहां किट्टी पार्टियां क्व500 से ले कर क्व1000 तक की होती थीं, वहीं आजकल इन में जमा होने वाली राशि क्व2 हजार से ले कर क्व10 हजार तक हो गई है.

श्रीमतीजी हर महीने पतिदेव से यह कह कर किट्टी के नाम पर पैसे वसूल लेती हैं कि तुम्हारे पैसे कहीं भागे थोड़े जा रहे हैं. जब मेरी किट्टी पड़ेगी तो सारे पैसे वापस घर ही तो आने हैं. मगर यह सच ही है कि कथनी एवं करनी में बड़ा अंतर होता है.

जब किट्टी के पैसे श्रीमतीजी के हाथ लगते हैं तो सालों से दबी तमन्नाएं अंगड़ाइयां लेने लगती हैं. उन के मनमस्तिष्क में अनेक इच्छाएं जाग्रत हो जाती हैं जैसे इस बार डायमंड या गोल्ड फेशियल कराऊंगी सालों से फू्रट फेशियल से ही काम चलाया है. बच्चों  की बोतल स्टील वाली ले लेती हूं. पानी देर तक ठंडा रहता है. अगली किट्टी में पहनने के लिए एक प्लाजो वाला सूट सिलवा लेती हूं. लेटैस्ट ट्रैंड है, पायलें पुरानी हो गई हैं कुछ पैसे डाल कर नई ले लेती हूं.

वे एक शातिर मैनेजर की तरह धीरेधीरे अपनी योजनाओं का क्रियान्वयन भी कर लेती हैं. अगर कभी नई बोतल देख पतिदेव ने पूछ लिया कि यह कब ली तो उस के जवाब में कड़ा तर्क कि बच्चों की सुविधाओं में मैं कंजूसी कभी नहीं करूंगी. अपना काम मैं चाहे जैसे भी चला लूं. इन ठोस तर्कों के आगे श्रीमानजी निरुत्तर हो जाते हैं.

आजकल किट्टी पार्टियां कई प्रकार की होने लगी हैं जैसे सुंदरकांड की किट्टी पार्टी जिस में मंडली इकट्ठा हो कर भजनकीर्तन के बाद ठोस प्रसाद ग्रहण करती है, हंसीठिठोली करती है और फिर एकदूसरे से बिदा लेती है.

अमीर तबके की महिलाएं तो थीम किट्टी करती हैं जैसे सावन में हरियाली जिस में हरे वस्त्र, आभूषण पहनने अनिवार्य हैं या जाड़ों में क्रिसमस थीम जहां लाल एवं श्वेत वस्त्रधारी मैंबरान का स्वागत सैंटाक्लाज करता है या फिर वैलेंटाइन थीम, ब्लैक ऐंड व्हाइट किट्टी या विवाह की थीम भी रखी जाती है जहां मैंबरानों के लिए अपनी शादी के दिनों में प्रयोग किए वस्त्र या आभूषण पहनने जरूरी होते हैं.

किट्टी की मैंबरान भी कई प्रकार की होती हैं जैसे अगर अर्ली कमिंग पर गिफ्ट है और किट्टी शुरू होने का निर्धारित समय 12 बजे है तो वे गिफ्ट के आकर्षण में बंधीं अपनेआप को समय की पाबंद दिखाते हुए तभी डोरबैल बजा देती हैं, जब 12 बजने में अभी 25 मिनट बाकी होते हैं. उधर बेचारी मेजबान अभी एक ही आंख में लाइनर लगा पाती है. वह मन ही मन कुढ़ती पर चेहरे पर झूठी मुसकान लिए आगंतुकों को बैठा कर अधूरा मेकअप पूरा करती है.

वहीं दूसरी प्रकार की किट्टी मेजबान ऐसी होती है कि वह अपनी पूरी ऊर्जा, समय और पैसा किट्टी से पहले इस बात में व्यय करती है कि उस की मेजबानी सर्वश्रेष्ठ हो. वह किट्टी से पहले परदे, कुशनकवर तो लगाती ही है, साथ ही बजट की परवाह किए बगैर 4-5 व्यंजन भी पार्टी में परोसती है ताकि हर मैंबरान मुक्त कंठ से उस की मेजबानी की प्रशंसा करे और वह खुशी के मारे फूलफूल कुप्पा होती रहे.

किट्टी पार्टी की कुछ सदस्य तो भाग्यशाली सिद्ध हो चुकी होती हैं कि चाहे जो भी हो तंबोला में वे खूब पैसे जीतती हैं. इस के विपरीत कुछ सदस्य तो जोशीली मुद्रा के साथ गेम्स जीतने के लिए जान की बाजी लगाने से गुरेज नहीं करती हैं. उन्हें हर हाल में गेम जीतना ही होता है. भले उन का मेकअप बिगड़ जाए, बाल खराब हो जाएं. अगर उस दिन भाग्य ने उन का साथ नहीं दिया तो झल्लाहट और खिसियाहट में किसी न किसी सहेली से उन का झगड़ा जरूर हो जाता है.

किट्टी में कुछ नजाकत एवं नफासत वाली मैंबरान भी होती हैं, जिन का उद्देश्य गेम जीतना कतई नहीं होता, वे संपूर्ण सजगता एवं सौम्यता से अपनी साड़ी का पल्लू, नैनों के काजल, मसकारा का खयाल रखते हुए गेम खेलने की औपचारिकता पूरी करती हैं.

एक अन्य प्रकार की मैंबरान ऐसी होती हैं जो गेम से पूर्व ही अपना रक्तचाप बढ़ा लेती हैं. उन का पेट बगैर कपालभाति के फूलनेपिचकने लगता है. वे स्वभावत: डरपोक किस्म की होती हैं जो अपनी पारी से पहले लघुशंका का निवारण करने जरूर जाती हैं. पता नहीं क्यों उन्हें ऐसा लगता है कि कहां फंस गईं. खेलकूद उन के बस का नहीं है. वे हार कर भी राहत की सांस लेती हैं यह सोच कर कि चलो उन की पारी निकल गई. बला टली.

जहां कुछ मेजबान जबरदस्त दिलदार होती हैं वहीं कुछ परले दर्जे की कंजूस जो कम से कम बजट में किट्टी निबटा देती हैं. इस प्रकार की मैंबरान गिफ्ट भी सोचसमझ कर चुनती हैं ताकि रुपयों की ज्यादा से ज्यादा बचत हो सके.

किट्टी पार्टी के दौरान ज्यादातर कुछ प्रौढ़ एवं जागरूक महिलाएं विचार रखती हैं कि अगली बार से खाने और मौजमस्ती के साथसाथ कुछ रचानात्मक एवं सृजनात्मक कल्याणकारी योजनाएं भी रखी जाएं, पर ये बातें सब की सहमति के बावजूद अगली किट्टी में हवाहवाई हो जाती हैं.

किट्टी पार्टी कुछ बहुओं के लिए अपनी सासों को महिलामंडित करने का एक मौका भी होता है जो वे घर में नहीं कर पातीं. वहीं कुछ सासों के लिए बहुओं की मीनमेख निकालने का भी मौका होता है. कुछ तो इतनी समर्पित किट्टी मैंबरान होती हैं कि चाहे कोई भी बाधा आ जाए काम वाली छुट्टी कर जाए, बच्चों की तबीयत खराब हो वे उन्हें बुखार की दवा दे कर भी किट्टी में जरूर उपस्थित होती हैं.

किट्टी पार्टियों का एक दूसरा संजीदा पहलू यह भी है कि भारतीय गृहिणियां किट्टी के माध्यम से ही थोड़ी देर के लिए स्वयं से रूबरू होती हैं और उस के बाद वे नई ऊर्जा, नवउत्साह के साथ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करती हैं.

भारतीय मध्यवर्गीय समाज की मानसिकता के अनुसार किट्टी पार्टियों को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता. जो महिलाएं किट्टी पार्टियां करती हैं उन्हें ज्यादातर स्वच्छंद एवं उच्शृंखल महिलाओं की श्रेणी में रखा जाता है, क्योंकि चाहे वे परिवार के लिए कितनी भी समर्पित रहें, परंतु यदि वे स्वयं के मनोरंजन हेतु कहीं सम्मिलित होती हैं, तो समाज उन्हें कठघरे में खड़ा करता है, हेय दृष्टि से देखता है, मेरे विचार से यह गलत है.

भारतीय गृहिणियां ताउम्र सुबह से शाम तक साल के बारहों महीने सिर्फ अपने घरपरिवार और बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा से पूर्ण करती हैं. उन का इतना हक तो बनता ही है कि जीवन के कुछ पल स्वयं के लिए बिना किसी आत्मग्लानि के व्यतीत करें और समाज उन के नितांत पलों को प्रश्नवाचक दृष्टि से न देखे. अंत में मैं इन पंक्तियों के साथ किट्टी की किटकिट को विराम देती हूं-

व्यतीत करना चाहती हूं,

सिर्फ एक दिन खुद के लिए,

जिस में न जिम्मेदारियों का दायित्व हो,

न कर्तव्यों का परायण,

न कार्यक्षेत्र का अवलोकन हो,

न मजबूरियों का समायन,

बस मैं,

मेरे पल,

मेरी चाहतें और

मेरा संबल,

मन का खाऊं,

मन का पहनूं,

शाम पड़े सखियों से गपशप,

फिर से जीना चाहती हूं,

एकसाथ में बचपन यौवन,

काश, मिले वो लमहे मुझे,

एक दिन अगर जी पाती हूं.

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