Short Story: तलाक- कौनसी मुसीबत में फंस गई थी जाहिरा

Short Story: रात का सारा काम निबटा कर जब जाहिरा बिस्तर पर जा कर सोने की कोशिश कर रही थी, तभी उस के मोबाइल फोन की घंटी शोर करने लगी.

जाहिरा बड़बड़ाते हुए बिस्तर से उठी, ‘‘सारा दिन काम करते हुए बदन थक कर चूर हो जाता है. बेटा अलग परेशान करता है. ननद बैठीबैठी और्डर जमाती है… न दिन को चैन, न रात को आराम…’’ फिर वह मोबाइल फोन पर बोली, ‘‘हैलो, कौन?’’

‘मैं शादाब, तुम्हारा शौहर,’ उधर से आवाज आई.

‘‘जी…’’ कहते हुए जाहिरा खुशी से उछल पड़ी,

‘‘जी, कैसे हैं आप?’’

‘मैं ठीक हूं. मेरी बात ध्यान से सुनो. मैं तुम्हें तलाक दे रहा हूं. आज से मेरातुम्हारा मियांबीवी का रिश्ता खत्म. मैं यह बात अम्मी और खाला के सामने बोल रहा हूं. तुम आज से आजाद हो. मेरे घर में रहने का तुम्हें कोई हक नहीं है. बालिग होने पर मेरा बेटा मेरे पास आ जाएगा,’ कह कर शादाब ने मोबाइल फोन काट दिया.

‘‘सुनिए… सुनिए…’’ जाहिरा ने कई बार कहा, पर मोबाइल फोन बंद हो चुका था. जाहिरा ने नंबर मिला कर बात करनी चाही, पर शादाब का मोबाइल फोन बंद मिला. जाहिरा को अपने पैरों के नीचे की जमीन खिसकती नजर आई. आंसुओं की झड़ी लग गई. बिस्तर पर उस का एक साल का बेटा बेसुध सोया था. उसे देख कर जाहिदा के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे.

जाहिरा दौड़ीदौड़ी अपने ससुर हसन मियां के कमरे में पहुंची. उस की सास शादाब के पास दुबई में थीं. जाहिरा ने दरवाजे के बाहर से आवाज दी, ‘‘अब्बू, दरवाजा खोलिए…’’

‘‘क्या बात है? क्यों चीख रही है?’’ शादाब के अब्बू हसन मियां ने कहा.

‘‘अब्बू…’’ लड़खड़ाते हुए जाहिरा ने कहा ‘‘शादाब ने मुझे फोन पर तलाक दे दिया है,’’ इतना कह कर वह रो पड़ी.

‘‘तो मैं क्या करूं…? यह तुम मियांबीवी के बीच का मामला है. तुम जानो और तुम्हारा शौहर…’’ कह कर हसन मियां ने दरवाजा बंद कर लिया.

जाहिरा रोतेरोते अपने कमरे मेंआ गई. रात यों ही बीत गई. सुबह जाहिरा ने उठ कर देखा कि रसोईघर के दरवाजे पर ताला लटक रहा था. वह परेशान हो गई और पड़ोसियों को पूरी बात बताई. पर पड़ोसी हसन मियां के पक्ष में थे. वह मन मार कर लौट आई.

पड़ोस में रहने वाली विधवा चाची ने जाहिरा को समझाया, ‘‘बेटी, तू फिक्र न कर. मसजिद के हाफिज के पास जा. शायद, वहां इस मसले का कोई हल निकले.’’ उस इलाके की मसजिद के सारे खर्चे माली मदद से चलते थे. हसन मियां मसजिद के सदर थे.

हाफिज के पास जाहिरा की शिकायत बेकार साबित हुई. उन्होंने कहा कि शौहर ने तलाक दे दिया है, अब कुछ नहीं हो सकता. जाहिरा ने कहा, ‘‘हाफिज साहब, फोन पर दिया गया तलाक नाजायज है. मेरी कोई गलती नहीं है. न शौहर से कोई अनबन, अचानक मुझे तलाक…’’ कह कर वह रो पड़ी, ‘‘मेरी गोद में उन का ही बच्चा है. इस की परवरिश कैसे होगी? मेरा क्या कुसूर है?

‘‘शरीअत में ऐसा कुछ नहीं है. आप एक औरत पर जुल्म ढा रहे हैं. मर्द की हर बात अगर जायज है, तो औरत की भी जायज मानो.’’

जाहिरा मौलवी को खूब खरीखोटी सुना कर वापस आ गई और शौहर के खिलाफ कोर्ट में जाने का मन बना लिया.

घर आ कर जाहिरा ने देखा कि घर के बाहर दरवाजे पर ताला लटक रहा था. बिना कुछ कहे वह अपने बेटे को मायके ले कर आ गई. घर पर मांबाप को सारी बात बता कर उस ने तलाक के खिलाफ आवाज उठाने का मन बना लिया और फिर समाज के उन मुल्लाहाफिजों के खिलाफ मोरचा खोल दिया, जो शरीअत के नाम पर लोगों पर दबाव बनाते हैं.

‘‘देहात की गंवार औरत को तुम्हारे गले से बांध दिया था. कहां तुम पढ़ेलिखे खूबसूरत जवान, कहां वह देहातीगंवार… ज्वार के दाने में उड़द का बीज…’’ कह कर शादाब की खाला खिलखिला उठीं.

‘‘शादाब और रेहाना की जोड़ी लगती ठीक है. पढ़ीलिखी बीवी कम से कम अंगरेजी में बात तो कर सकेगी. क्यों आपा, ठीक कह रही हूं न मैं?’’

शादाब की खाला ने अपनी बेटी के कसीदे पढ़ने चालू किए. शादाब की मां ने भी उन की हां में हां मिलाई. शादाब की मां हमीदा बानो की छोटी बहन नूर अपनी बेटी रेहाना को ले कर पिछले 2 महीने से दुबई आई थीं. उन्हें 3 महीने का वीजा मिला था.

रेहाना एमए की छात्रा थी. वह अपने मांबाप की एकलौती औलाद थी, जिसे लाड़प्यार से पाला गया था चुलबुली, खूबसूरत रेहाना ने अपनी मां की शह पा कर शादाब पर डोरे डालने शुरू किए थे, यह जानते हुए भी कि वह शादीशुदा है.

‘‘पर अम्मी, शादाब तो एक बच्चे का बाप है. मैं उस से निकाह कैसे करूंगी?’’ रेहाना ने अपनी अम्मी से पूछा.

‘‘तू फिक्र मत कर. अगर शादाब तेरा शौहर बन गया, तो तू मजे करेगी. विदेश में रहेगी. तू हवाईजहाज से आनाजाना करेगी.

‘‘तू मालामाल हो जाएगी और हमारी गरीबी भी दूर हो जाएगी. बड़ी नौकरी है शादाब की. उस की जायदाद हमारी. तू किसी न किसी तरह उसे अपने वश में कर ले,’’ रेहाना की अम्मी ने समझाया. और फिर उन्होंने ऐसा जाल बिछाया कि उस में मांबेटा उलझ कर रह गए.

‘‘रेहाना, अम्मी कहां हैं?’’ एक दिन दफ्तर से लौट कर शादाब ने पूछा.

‘‘वे पड़ोस में गई हैं. देर रात तक लौटेंगी. वहां उन की दावत है. मेरी अम्मी भी साथ गई हैं.’’

‘‘तुम क्यों नहीं गईं?’’

‘‘आप की वजह से नहीं गई.’’

रेहाना चाय ले कर शादाब के कमरे में पहुंची, जहां वह लेटा हुआ था. आज रेहाना ने ऐसा सिंगार कर रखा था कि शादाब उसे देख कर सुधबुध खो बैठा. चाय दे कर वह उस के करीब बैठ गई. इत्र की भीनीभीनी खुशबू से महकती रेहाना ने रोमांस भरी बातें करना शुरू किया.

शादाब भी उस की बातों का लुत्फ लेने लगा. उस ने रेहाना को अपने सीने से लगाना चाहा, तो बगैर किसी डर के वह शादाब की बांहों में सिमट गई. फिर वे दोनों हवस के गहरे समुद्र में डुबकी लगाने लगे. जब जी भर गया, तो एकदूसरे को देख कर शरमा गए.

जब तक रेहाना वहां रही, शादाब उसे महंगे से महंगा सामान दिलाने लगा. जवानी के जोश में वह सबकुछ भूल गया. अब उसे सिर्फ रेहाना दिखती थी. वह अपनी बीवी को तलाक दे कर रेहाना को बीवी बनाने के सपने देखने लगा था.

वक्त तेजी से गुजर रहा था. रेहाना के वीजा की मीआद खत्म होने वाली थी. शादाब ने रेहाना से जल्द निकाह करने का वादा किया. रेहाना अपनी अम्मी के साथ दुबई में रहने के सपने संजोए भारत वापस आ गई. शादाब ने खाला से 2 महीने के अंदर रेहाना से निकाह करने की अपनी मंशा जाहिर की, तो खाला ने भी खुशीखुशी अपनी रजामंदी जाहिर की.

कुछ वक्त बीत जाने पर जाहिरा ने शहर की बड़ी मसजिद में शादाब के द्वारा दिए गए तलाक के बारे में शिकायत पेश की, जिस की सुनवाई आज होनी थी.

जाहिरा ने कमेटी के सामने, जहां काजी, आलिम, हाफिज, बड़ेबड़े मौलाना सदस्य थे, अपनी बात रखी. उन्होंने बड़े गौर से जाहिरा की फरियाद सुनी. इस से पहले शादाब को मांबाप के साथ कमेटी के सामने हाजिर होने की इत्तिला भेजी गई थी, पर वे नहीं आए.

अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने कमेटी पर दबाव डालना चाहा था. वे तकरीबन 6 महीने तक कमेटी को चकमा देते रहे थे, बारबार के बुलावे पर भी नहीं आए थे. इस बात को ध्यान में रख कर कमेटी ने कड़ा फैसला लिया और उन्हें जमात से बेदखल करने के साथ कानूनी कार्यवाही करने का फैसला लिया. आज मसजिद में काफी गहमागहमी थी. कावाही शुरू हुई. शादाब, उस के अब्बू व दूसरे रिश्तेदार हाजिर थे.

कमेटी के सदर ने शादाब से पूछा, ‘‘किस वजह से तुम ने अपनी बीवी जाहिरा को तलाक दिया है?’’ ‘‘इस के अंदर शहर में रहने की काबिलीयत नहीं है. यह पढ़ीलिखी भी नहीं है. अंगरेजी नहीं जानती है. इसे ढंग से खाना बनाना तक नहीं आता है.’’ ‘‘बेटी, तुम बताओ कि शादाब मियां जोकुछ कह रहे हैं, वह सही है या गलत?’’ सदर ने पूछा.

‘‘बिलकुल झूठ है. हमारी शादी को 3 साल हो गए हैं. मैं एक बच्चे की मां बन गई हूं. मैं इन की हर बात मानती हूं. मैं ने पूरी 7 जमात पढ़ी है. ‘‘इन के मांबाप व रिश्तेदार मुझे पसंद कर के लाए थे. हम ने भरपूर दहेज दिया था. अभी तक सब ठीकठाक चल रहा था, पर अचानक इन्होंने मुझे फोन पर तलाक दे दिया.’’

‘‘फोन पर तलाक…?’’ कमेटी के सभी सदस्य जाहिरा की यह बात सुन कर सकते में आ गए.

उन्होंने आपस में सोचविचार कर के फैसला दिया, ‘यह तलाक नाजायज है. न तलाक देने की ठोस वजह है, न ही तलाक आमनेसामने बैठ कर दिया गया है. एकतरफा तलाक जायज नहीं है.

‘शादाब मियां के तलाक को गैरकानूनी मान कर खारिज किया जाता है. जाहिरा आज भी उन की बीवी हैं. उन्हें अपनी बीवी को सारे हक देने पड़ेंगे. साथ में रखेंगे. कोई तकलीफ नहीं देंगे, वरना यह कमेटी इन पर तलाक के बहाने औरत पर जुल्म करने का मामला दायर करेगी…’ इतना फरमान सुना कर जमात उठ गई.

Short Story

Romantic Story: एक मुलाकात- क्या नेहा की बात समझ पाया अनुराग

लेखक- निर्मला सिंह

Romantic Story: नेहा ने होटल की बालकनी में कुरसी पर बैठ अभी चाय का पहला घूंट भरा ही था कि उस की आंखें खुली की खुली रह गईं. बगल वाले कमरे की बालकनी में एक पुरुष रेलिंग पकडे़ हुए खड़ा था जो पीछे से देखने में बिलकुल अनुराग जैसा लग रहा था. वही 5 फुट 8 इंच लंबाई, छरहरा गठा बदन.

नेहा सोचने लगी, ‘अनुराग कैसे हो सकता है. उस का यहां क्या काम होगा?’ विचारों के इस झंझावात को झटक कर नेहा शांत सड़क के उस पार झील में तैरती नावों को देखने लगी. दूसरे पल नेहा ने देखा कि झील की ओर देखना बंद कर वह व्यक्ति पलटा और कमरे में जाने के लिए जैसे ही मुड़ा कि नेहा को देख कर ठिठक गया और अब गौर से उसे देखने लगा.

‘‘अरे, अनुराग, तुम यहां कैसे?’’ नेहा के मुंह से अचानक ही बोल फूट पड़े और आंखें अनुराग पर जमी रहीं. अनुराग भी भौचक था, उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उस की नेहा इतने सालों बाद उसे इस तरह मिलेगी. वह भी उस शहर में जहां उन के जीवन में प्रथम पे्रम का अंकुर फूटा था.

दोनों अपनीअपनी बालकनी में खड़े अपलक एकदूसरे को देखते रहे. आंखों में आश्चर्य, दिल में अचानक मिलने का आनंद और खुशी, उस पर नैनीताल की ठंडी और मस्त हवा दोनों को ही अजीब सी चेतनता व स्फूर्ति से सराबोर कर रही थी.

अनुराग ने नेहा के प्रश्न का उत्तर मुसकराते हुए दिया, ‘‘अरे, यही बात तो मैं तुम से पूछ रहा हूं कि तुम 30 साल बाद अचानक नैनीताल में कैसे दिख रही हो?’’

उस समय दोनों एकदूसरे से मिल कर 30 साल के लंबे अंतराल को कुछ पल में ही पाट लेना चाहते थे. अत: अनुराग अपने कमरे के पीछे से ही नेहा के कमरे में चले आए. अनुराग को इस तरह अपने पास आता देख नेहा के दिल में खुशी की लहरें उठने लगीं. लंबेलंबे कदमों से चलते हुए नेहा अनुराग को बड़े सम्मान के साथ अपनी बालकनी में ले आई.

‘‘नेहा, इतने सालों बाद भी तुम वैसी ही सुंदर लग रही हो,’’ अनुराग उस के चेहरे को गौर से देखते हुए बोले, ‘‘सच, तुम बिलकुल भी नहीं बदली हो. हां, चेहरे पर थोड़ी परिपक्वता जरूर आ गई है और कुछ बाल सफेद हो गए हैं, बस.’’

‘‘अनुराग, मेरे पति आकाश भी यही कहते हैं. सुनो, तुम भी तो वैसे ही स्मार्ट और डायनैमिक लग रहे हो. लगता है, कोई बड़े अफसर बन गए हो.’’

‘‘नेहा, तुम ने ठीक ही पहचाना. मैं लखनऊ  में डी.आई.जी. के पद पर कार्यरत हूं. हलद्वानी किसी काम से आया था तो सोचा नैनीताल घूम लूं, पर यह बताओ कि तुम्हारा नैनीताल कैसे आना हुआ?’’

‘‘मैं यहां एक डिगरी कालिज में प्रैक्टिकल परीक्षा लेने आई हूं. वैसे मैं बरेली में हूं और वहां के एक डिगरी कालिज में रसायन शास्त्र की प्रोफेसर हूं. पति साथ नहीं आए तो मुझे अकेले आना पड़ा. अभी तक तो मेरा रुकने का इरादा नहीं था पर अब तुम मिले हो तो अपना कार्यक्रम तो बदलना ही पडे़गा. वैसे अनुराग, तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?’’

अनुराग ने हंसते हुए कहा, ‘‘नेहा, जिंदगी में सब कार्यक्रम धरे के धरे रह जाते हैं, वक्त जो चाहता है वही होता है. हम दोनों ने उस समय अपने जीवन के कितने कार्र्यक्रम बनाए थे पर आज देखो, एक भी हकीकत में नहीं बदल सका… नेहा, मैं आज तक यह समझ नहीं सका कि तुम्हारे पापा अचानक तुम्हारी पढ़ाई बीच में ही छुड़वा कर बरेली क्यों ले गए? तुम ने बी.एससी. फाइनल भी यहां से नहीं किया?’’

नेहा कुछ गंभीर हो कर बोली, ‘‘अनुराग, मेरे पापा उस उम्र में  ही मुझ से जीवन का लक्ष्य निर्धारित करवाना चाहते थे. वह नहीं चाहते थे कि पढ़ाई की उम्र में मैं प्रेम के चक्कर में पड़ूं और शादी कर के बच्चे पालने की मशीन बन जाऊं. बस, इसी कारण पापा मुझे बरेली ले गए और एम.एससी. करवाया, पीएच.डी. करवाई फिर शादी की. मेरे पति बरेली कालिज में ही गणित के विभागाध्यक्ष हैं.’’

‘‘नेहा, कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’

‘‘2 बेटे हैं. बड़ा बेटा इंगलैंड में डाक्टर है और वहीं अपने परिवार के साथ रहता है. दूसरा अमेरिका में इंजीनियर है. अब तो हम दोनों पतिपत्नी अकेले ही रहते हैं, पढ़ते हैं, पढ़ाते है.’’

‘‘अनुराग, अब तक मैं अपने बारे में ही बताए जा रही हूं, तुम भी अपने बारे में कुछ बताओ.’’

‘‘नेहा, तुम्हारी तरह ही मेरा भी पारिवारिक जीवन है. मेरे भी 2 बच्चे हैं. एक लड़का आई.ए.एस. अधिकारी है और दूसरा दिल्ली में एम्स में डाक्टर है. अब तो मैं और मेरी पत्नी अंशिका ही घर में रहते हैं.’’

इतना कह कर अनुराग गौर से नेहा को देखने लगा.

‘‘ऐसे क्या देख रहे हो अनुराग?’’ नेहा बोली, ‘‘अब सबकुछ समय की धारा के साथ बह गया है. जो प्रेम सत्य था, वही मन की कोठरी में संजो कर रखा है और उस पर ताला लगा लिया है.’’

‘‘नेहा…सच, तुम से अलग हो कर वर्षों तक मेरे अंतर्मन में उथलपुथल होती रही थी लेकिन धीरेधीरे मैं ने प्रेम को समझा जो ज्ञान है, निरपेक्ष है और स्वयं में निर्भर नहीं है.’’

‘‘अनुराग, तुम ठीक कह रहे हो,’’ नेहा बोली, ‘‘कभी भी सच्चे प्रेम में कोई लोभ, मोह और प्रतिदान नहीं होता है. यही कारण है कि हमारा सच्चा प्रेम मरा नहीं. आज भी हम एकदूसरे को चाहते हैं लेकिन देह के आकर्षण से मुक्त हो कर.’’

अनुराग कमरे में घुसते बादलों को पहले तो देखता रहा फिर उन्हें अपनी मुट्ठी में बंद करने लगा. यह देख नेहा हंस पड़ी और बोली, ‘‘यह क्या कर रहे हो बच्चों की तरह?’’

‘‘नेहा, तुम्हारी हंसी में आज भी वह खनक बरकरार है जो मुझे कभी जीने की पे्ररणा देती थी और जिस के बलबूते पर मैं आज तक हर मुश्किल जीतता रहा हूं.’’

नेहा थोड़ी देर तक शांत रही, फिर बेबाकी से बोल पड़ी, ‘‘अनुराग, इतनी तारीफ ठीक नहीं और वह भी पराई स्त्री की. चलो, कुछ और बात करो.’’

‘‘नेहा, एक कप चाय और पियोगी.’’

‘‘हां, चल जाएगी.’’

अनुराग ने कमरे से फोन किया तो कुछ ही देर में चाय आ गई. चाय के साथ खाने के लिए नेहा ने अपने साथ लाई हुई मठरियां निकालीं और दोनों खाने लगे. कुछ देर बाद बातों का सिलसिला बंद करते हुए अनुराग बोले, ‘‘अच्छा, चलो अब फ्लैट पर चलें.’’

नेहा तैयार हो कर जैसे ही बाहर निकली, कमरे में ताला लगाते हुए अनुराग उस की ओर अपलक देखने लगा. नेहा ने टोका, ‘‘अनुराग, गलत बात…मुझे घूर कर देखने की जरूरत नहीं है, फटाफट ताला लगाइए और चलिए.’’

उस ने ताला लगाया और फ्लैट की ओर चल दिया.

बातें करतेकरते दोनों तल्लीताल पार कर फ्लैट पर आ गए और उस ओर बढ़ गए जिधर झील के किनारे रेलिंग बनी हुई थी. दोनों रेलिंग के पास खड़े हो कर झील को देखते रहे.

कतार में तैर रही बतखों की ओर इशारा करते हुए अनुराग ने कहा, ‘‘देखो…देखो, नेहा, तुम ने भी कभी इसी तरह तैरते हुए बतखों को दाना डाला था जैसे ये लड़कियां डाल रही हैं और तब ठीक ऐसे ही तुम्हारे पास भी बतखें आ रही थीं, लेकिन तुम ने शायद उन को पकड़ने की कोशिश की थी…’’

‘‘हां अनुराग, ज्यों ही मैं बतख पकड़ने के लिए झुकी थी कि अचानक झील में गिर गई और तुम ने अपनी जान की परवा न कर मुझे बचा लिया था. तुम बहुत बहादुर हो अनुराग. तुम ने मुझे नया जीवन दिया और मैं तुम्हें बिना बताए ही नैनीताल छोड़ कर चली गई, इस का मुझे आज तक दुख है.’’

‘‘चलो, तुम्हें सबकुछ याद तो है,’’ अनुराग बोला, ‘‘इतने वर्षों से मैं तो यही सोच रहा था कि तुम ने जीवन की किताब से मेरा पन्ना ही फाड़ दिया है.’’

‘‘अनुराग, मेरे जीवन की हर सांस में तुम्हारी खुशबू है. कैसे भूल सकती हूं तुम्हें? हां, कर्तव्य कर्म के घेरे में जीवन इतना बंध जाता है कि चाहते हुए भी अतीत को किसी खिड़की से नहीं झांका जा सकता,’’  एक लंबी सांस लेते हुए नेहा बोली.

‘‘खैर, छोड़ो पुरानी बातों को, जख्म कुरेदने से रिसते ही रहते हैं और मैं ने  जख्मों पर वक्त का मरहम लगा लिया है,’’ अनुराग की गंभीर बातें सुन कर नेहा भी गंभीर हो गई.

‘यह अनुराग कुछ भी भूला नहीं है,’ नेहा मन में सोचने लगी, पुरुष हो कर भी इतना भावुक है. मुझे इसे समझाना पड़ेगा, इस के मन में बंधी गांठों को खोलना पडे़गा.’

नेहा पत्थर की बैंच पर बैठी कुछ समय के लिए शांत, मौन, बुत सी हो गई तो अनुराग ने छेड़ते हुए कहा, ‘‘क्या मेरी बातें बुरी लगीं? तुम तो बेहद गंभीर हो गईं. मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था नेहा. सौरी.’’

‘‘अनुराग, यौवनावस्था एक चंचल, तेज गति से बहने वाली नदी की तरह होती है. इस दौर में लड़केलड़कियों में गलतसही की परख कम होती है. अत: प्रेम के पागलपन में अंधे हो कर कई बार दोनों ऐसे गलत कदम उठा लेते हैं जिन्हें हमारा समाज अनुचित मानता है. और यह तो तुम जानते ही हो कि हम भी पढ़ाईलिखाई छोड़ कर

हर शनिवाररविवार खूब घूमतेफिरते थे. नैनीताल का वह कौन सा स्थान है जहां हम नहीं घूमे थे. यही नहीं जिस उद्देश्य के लिए हम मातापिता से दूर थे, वह भी भूल गए थे. यदि हम अलग न हुए होते तो यह सच है कि न तुम कुछ बन पाते और न मैं कुछ बन पाती,’’ कहते हुए नेहा के चेहरे पर अनुभवों के चिह्न अंकित हो गए.

‘‘हां, नेहा तुम बिलकुल ठीक कह रही हो. यदि कच्ची उम्र में हम ने शादी कर ली होती तो तुम बच्चे पालती रहतीं और मैं कहीं क्लर्क बन गया होता,’’ कह कर अनुराग उठ खड़ा हुआ.

नेहा भी उठ गई और दोनों फ्लैट से सड़क की ओर आ गए जो तल्लीताल की ओर जाती है. चारों ओर पहाडि़यां ही पहाडि़यां और बीच में झील किसी सजी हुई थाल सी लग रही थी.

नेहा और अनुराग के बीच कुछ पल के लिए बातों का सिलसिला थम गया था. दोनों चुपचाप चलते रहे. खामोशी को तोड़ते हुए अनुराग बोला, ‘‘अरे, नेहा, मैं तो यह पूछना भूल ही गया कि खाना तुम किस होटल में खाओगी?’’

‘‘भूल गए, मैं हमेशा एंबेसी होटल में ही खाती थी,’’ नेहा बोली.

अपनेअपने परिवार की बातें करते हुए दोनों चल रहे थे. जब दोनों होटल के सामने पहुंचे तो अनुराग नेहा का हाथ पकड़ कर सीढि़यां चढ़ने लगा.

‘‘यह क्या कर रहे हो, अनुराग. मैं स्वयं ही सीढि़यां चढ़ जाऊंगी. प्लीज, मेरा हाथ छोड़ दो, यह सब अब अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘सौरी,’’ कह कर अनुराग ने हाथ छोड़ दिया.

दोनों एक मेज पर आमनेसामने बैठ गए तो बैरा पानी के गिलास और मीनू रख गया.

खाने का आर्डर अनुराग ने ही दिया. खाना देख कर नेहा मुसकरा पड़ी और बोली, ‘‘अरे, तुम्हें तो याद है कि मैं क्या पसंद करती हूं, वही सब मंगाया है जो हम 25 साल पहले इसी तरह इसी होटल में बैठ कर खाते थे,’’ हंसती हुई नेहा बोली, ‘‘और इसी होटल में हमारा प्रेम पकड़ा गया था. खाना खाते समय ही पापा ने हमें देख लिया था. हो सकता है आज भी न जाने किस विद्यार्थी की आंखें हम लोगों को देख रही हों. तभी तो तुम्हारा हाथ पकड़ना मुझे अच्छा नहीं लगा. देखो, मैं एक प्रोफेसर हूं, मुझे अपना एक आदर्श रूप विद्यार्थियों के सामने पेश करना पड़ता है क्योंकि बातें अफवाहों का रूप ले लेती हैं और जीवन भर की सचरित्रता की तसवीर भद्दी हो जाती है.’’

मुसकरा कर अनुराग बोला, ‘‘तुम ठीक कहती हो नेहा, छोटीछोटी बातों का ध्यान रखना जरूरी है.’’

‘‘हां, अनुराग, हम जीवन में सुख तभी प्राप्त कर सकते हैं जब सच्चे प्यार, त्याग और विश्वास को आंचल में समेटे रखें, छोटीछोटी बातों पर सावधानी बरतें. अब देखो न, मेरे पति मुझे अपने से भी ज्यादा प्यार करते हैं क्योंकि मेरा अतीत और वर्तमान दोनों उन के सामने खुली किताब है. मैं ने शाम को ही आकाश को फोन पर सबकुछ बता दिया और वह निश्ंिचत हो गए वरना बहुत घबरा रहे थे.’’

बातों के साथसाथ खाने का सिलसिला खत्म हुआ तो अनुराग बैरे को बिल दे कर बाहर आ गए.

अनुराग और नेहा चुपचाप होटल की ओर चल रहे थे, लेकिन नेहा के दिमाग में उस समय भी कई सुंदर विचार फुदक रहे थे.  वह चौंकी तब जब अनुराग ने कहा, ‘‘अरे, होटल आ गया नेहा, तुम आगे कहां जा रही हो?’’

‘‘ओह, वैरी सौरी. मैं तो आगे ही बढ़ गई थी.’’

‘‘कुछ न कुछ सोच रही होगी शायद…’’

‘‘हां, एक नई कहानी का प्लाट दिमाग में घूम रहा था. दूसरे, नैनीताल की रात कितनी सुंदर होती है यह भी सोच रही थी.’’

‘‘अच्छा है, तुम अपने को व्यस्त रखती हो. साहित्य सृजन रचनात्मक क्रिया है, इस में सार्थकता और उद्देश्य के साथसाथ लक्ष्य भी होता है…’’ होटल की सीढि़यां चढ़ते हुए अनुराग बोला. बात को बीच में ही काटते हुए नेहा बोली, ‘‘यह सब लिखने की प्रेरणा आकाश देते हैं.’’

नेहा अपने कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर जाने लगी तो अनुराग ने पूछा, ‘‘क्या अभी से सो जाओगी? अभी तो 11 बजे हैं?’’

‘‘नहीं अनुराग, कल के लिए कुछ पढ़ना है. वैसे भी आज बातें बहुत कर लीं. अच्छी रही हम लोगों की मुलाकात, ओ. के. गुड नाइट, अनुराग.’’

और एक मीठी मुलाकात की महक बसाए दोनों अपनेअपने कमरों में चले गए.

नेहा अपने कमरे में पढ़ने में लीन हो गई लेकिन अनुराग एक बेचैनी सी महसूस कर रहा था कि वह जिस नेहा को एक असहाय, कमजोर नारी समझ रहा था वह आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की जीतीजागती प्रतिरूप है. एक वह है जो अपनी पत्नी में हमेशा नेहा का रूप देखने का प्रयास करता रहा. सदैव उद्वेलित, अव्यवस्थित रहा. काश, वह भी समझ लेता कि परिस्थितियों के साथ समझौते का नाम ही जीवन है. नेहा ने ठीक ही कहा था, ‘अनुराग, हमें किसी भी भावना का, किसी भी विचार का दमन नहीं करना चाहिए, वरन कुछ परिस्थितियों को अपने अनुकूल और कुछ स्वयं को उन के अनुकूल करना चाहिए तभी हमारे साथ रहने वाले सभी सुखी रहते हैं.’

Romantic Story

Family Story: दबी हुई परतें- क्यों दीदी से मिलकर हैरान रह गई वह

Family Story: हमारे संयुक्त परिवार में संजना दी सब से बड़ी थीं. बड़ी होने के साथ लीडरशिप की भावना उन में कूटकूट कर भरी थी. इसीलिए हम सब भाईबहन उन के आगेपीछे घूमते रहते थे और वे निर्देश देतीं कि अब क्या करना है. वे जो कह दें, वही हम सब के लिए एक आदर्श वाक्य होता था. सब से पहले उन्होंने साइकिल चलानी सीखी, फिर हम सब को एकएक कर के सिखाया. वैसे भी, चाहे खेल का मैदान हो या पढ़ाईलिखाई या स्कूल की अन्य गतिविधियां, दीदी सब में अव्वल ही रहती थीं. इसी वजह से हमेशा अपनी कक्षा की मौनीटर भी वही रहीं.

हां, घरेलू कामकाज जैसे खाना बनाना या सिलाईबुनाई में दीदी को जरा भी दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए उन की मां यानी मेरी ताईजी की डांट उन पर अकसर पड़ती रहती थी. पर इस डांटडपट का कोई असर उन पर होता नहीं था.

मुझ से तो 8-10 साल बड़ी थीं वे, इसीलिए मैं तो एक प्रकार से उन की चमची ही थी. मुझ से वे लाड़ भी बहुत करती थीं. कभीकभी तो मेरा होमवर्क तक कर देती थीं, कहतीं, ‘चल तू थक गई होगी रितु, तेरा क्लासवर्क मैं कर देती हूं, फिर तू भी खेलने चलना.’

बस, मैं तो निहाल हो जाती. इस बात की भी चिंता नहीं रहती कि स्कूल में टीचर, दीदी की हैंडराइटिंग देख कर मुझे डांटेगीं. पर उस उम्र में इतनी समझ भी कहां थी.

हंसतेखेलते हम भाईबहन बड़े हो रहे थे. दीदी तब कालेज में बीए कर रही थीं कि ताऊजी को उन के विवाह की फिक्र होने लगी. ताऊजी व दादाजी की इच्छा थी कि सही उम्र में विवाह हो जाना चाहिए. लड़कियों को अधिक पढ़ाने से क्या फायदा, फिर अभी इस उम्र में तो सब लड़कियां अच्छी लगती ही हैं, इसलिए लड़का भी आसानी से मिल जाएगा. वैसे, दीदी थी तो स्मार्ट पर रंग थोड़ा दबा होने की वजह से 2 जगहों से रिश्ते वापस हो चुके थे.

दीदी का मन अभी आगे पढ़ने का था. पर बड़ों के आगे उन की एक न चली. एक अच्छा वर देख कर दादाजी ने उन का संबंध तय कर ही दिया. सुनील जीजाजी अच्छी सरकारी नौकरी में थे. संपन्न परिवार था. बस, ताऊजी और दादाजी को और क्या चाहिए था.

दीदी बीए का इम्तिहान भी नहीं दे पाई थीं कि उन का विवाह हो गया. घर में पहली शादी थी तो खूब धूमधाम रही. गानाबजाना, दावतें सब चलीं और आखिरकार दीदी विदा हो गईं.

सब से अधिक दुख दीदी से बिछुड़ने का मुझे था. मैं जैसे एकदम अकेली हो गई थी. फिर कुछ दिनों बाद चाचा के बेटे रोहित को विदेश में स्कौलरशिप मिली थी बाहर जा कर पढ़ाई करने की, तो घर में एक बड़ा समारोह आयोजित किया गया. दीदी को भी ससुराल से लाने के लिए भैया को भेजा गया पर ससुराल वालों ने कह दिया कि ऐसे छोटेमोटे समारोह के लिए बहू को नहीं भेजेंगे और अभीअभी तो आई ही है.

हम लोग मायूस तो थे ही, ऊपर से भैया ने जो उन की ससुराल का वर्णन किया उस से और भी दुखी हो गए. अरे, हमारी संजना दी को ताऊजी ने पता नहीं कैसे घर में ब्याह दिया. हमारी दी जो फर्राटे से शहरभर में स्कूटर पर घूम आती थीं, वो वहां घूंघट में कैद हैं. इतना बड़ा घर, ढेर सारे लोग, मैं तो खुल कर दीदी से बात भी नहीं कर पाया.

अच्छा तो क्या सभी ससुरालें ऐसी ही होती हैं? मेरे सपनों को जैसे एक आघात लगा था. मैं तो सोच रही थी कि वहां ताईजी, मां जैसे डांटने वाले या टोकने वाले लोग तो होंगे नहीं, आराम से जीजाजी के साथ घूमतीफिरती होंगी. खूब मजे होंगे. मन हुआ कि जल्दी ही दीदी से मिलूं और पूछूं कि आप तो परदे, घूंघट सब के इतने खिलाफ थीं, इतने लैक्चर देती रहती थीं, अब क्या हुआ?

फिर कुछ ही दिनों बाद जीजाजी को किसी ट्रेनिंग के सिलसिले में महीनेभर के लिए बेंगलुरु जाना था तो दीदी जिद कर के मायके आ गई थीं.  मैं तो उन्हें देखते ही चौंक गई थी, इतनी दुबली और काली लगने लगी थीं.

मां ने तो कह भी दिया था, ‘अरे संजना बेटा, लड़कियां तो ससुराल जा कर अच्छी सेहत बना कर आती हैं. पर तुझे क्या हुआ?’ पर धीरेधीरे पता चला कि ससुराल वाले उन से खुश नहीं हैं. सास तो अकसर ताना देती रहती हैं कि पता नहीं कैसे मांबाप हैं इस के कि घर के कामकाज तक नहीं सिखाए, 4 लोगों का खाना तक नहीं बना सकती ये बहू, अब इस की पढ़ाई को क्या हम चाटें.

‘मां, मैं अब ससुराल नहीं जाऊंगी, मेरा वहां दम घुटता है. सास के साथ ये भी हरदम डांटते रहते हैं और मेरी कमियां निकालते हैं.’ एक दिन रोते हुए वे ताईजी से कह रही थीं तो मैं ने भी सुन लिया. पर ताईजी ने उलटा उन्हें ही डांटा. ‘पागल हो गई है क्या? ससुराल छोड़ कर यहां रहेगी, समाज में हमारी थूथू कराने आई है. अरे, हमें अभी अपनी और लड़कियां भी ब्याहनी है, कौन ब्याहेगा फिर रंजना और वंदना को, बता?’

इधर मां ने भी दीदी को समझाया, ‘देख बेटा, हम तो पहले ही कहते थे कि घर के कामकाज सीख ले. ससुराल में सब से पहले यही देखा जाता है. पर कोई बात नहीं, अभी कौन सी उम्र निकल गई है. अब सिखाए देते हैं. अच्छा खाना बनाएगी, सलीके से घर रखेगी तो सास भी खुश होगी और हमारे जमाईजी भी.’

दीदी के नानुकुर करने पर भी मां उन्हें जबरन चौके में ले जातीं और तरहतरह के व्यंजन, अचार आदि बनाने की शिक्षा देतीं. हम लोग सोचते ही रह जाते कि कब दीदी को समय मिलेगा और हम लोगों के साथ हंसेगी, खेलेंगी, बोलेंगी.

एक महीना कब निकल गया, मालूम ही नहीं पड़ा था. जीजाजी आ कर दीदी को विदा करा के ले गए. मैं फिर सोचती, पता नहीं हमारी दीदी के साथ ससुराल में कैसा सुलूक होता होगा. फिर पढ़ाई का बोझ दिनोंदिन बढ़ता गया और दीदी की यादें कुछ कम हो गईं.

2 वर्षों बाद भैया की शादी में दीदी और जीजाजी भी आए थे. पर अब दीदी का हुलिया ही बदल हुआ लगा. वैसे, सेहत पहले से बेहतर हो गई थी पर वे हर समय साड़ी में सिर ढके रहतीं?

‘‘दीदी, ये तुम्हारी ससुराल थोड़े ही है, जो चाहे, वह पहनो,’’ मुझ से रहा नहीं गया और कह दिया.

‘‘देख रितु, तेरे जीजाजी को जो पसंद है वही तो करना चाहिए न मुझे. अब अगर इन्हें पसंद है कि मैं साड़ी पहनूं, सिर ढक कर रहूं, तो वही सही.’’

‘‘अच्छा, इतनी आज्ञाकारिणी कब से हो गई हो?’’ मैं ने चिढ़ कर कहा.

‘‘होना पड़ता है बहना, घर की सुखशांति बनाए रखने के लिए अपनेआप को बदलना भी पड़ता है. ये सब बातें तुम तब समझोगी, जब तेरी शादी हो जाएगी,’’ कह कर दीदी ने बात बदल दी.

पर मैं देख रही थी कि दीदी हर समय जीजाजी के ही कामों में लगी रहतीं. उन के लिए अलग से चाय खुद बनातीं. खाना बनता तो गरम रोटी सिंकते ही पहले जीजाजी की थाली खुद ही लगा कर ले जातीं. कभी उन के लिए गरम नाश्ता बना रही होतीं तो कभी उन के कपड़े निकाल रही होतीं.

एक प्रकार से जैसे वे पति के प्रति पूर्ण समर्पित हो गई थीं. जीजाजी भी हर काम के लिए उन्हें ही आवाज देते.

‘‘संजू, मेरी फलां चीज कहां हैं, ये कहां है, वो कहां है.’’

मां, ताईजी तो बहुत खुश थीं कि हमारी संजना ने आखिरकार ससुराल में अपना स्थान बना ही लिया.

मैं अब अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई थी. 2 वर्षों के लिए जिद कर के होस्टल में रहने चली गई थी. बीच में दीदी मायके आई होंगी पर मेरा उन से मिलना हो नहीं पाया.

एक बार फिर छुट्टियों में मैं उन की ससुराल जा कर ही उन से मिली थी. अब तो दीदी के दोनों जेठों ने अलग घर बना लिए थे. सास बड़े जेठ के पास रहती थीं. इतने बड़े घर में दीदी, जीजाजी और उन के दोनों बच्चे ही थे.

‘‘दीदी, अब तो आप आराम से अपने हिसाब से जी सकती हो और अपने शौक भी पूरे कर सकती हो,’’ मैं ने उन्हें इस बार भी हरदम सिर ढके देख कर कह ही दिया.

‘‘देख रितु, मैं अब अच्छी तरह समझ गई हूं कि अगर मुझे इस घर में शांति बनाए रखनी है तो मुझे तेरे जीजाजी के हिसाब से ही अपनेआप को ढालना होगा. तभी ये मुझे से खुश रह सकते हैं. ये एक परंपरागत परिवार से जुडे़ रहे हैं तो जाहिर है कि सोच भी उसी प्रकार की है.’’

यह सच भी था कि दीदी ने अपनेआप को जीजाजी की रुचि के अनुसार ढाल लिया था. वैसे, घर में काफी नौकरचाकर थे पर चूंकि जीजाजी किसी के हाथ का बना खाना खाते नहीं थे इसलिए दीदी स्वयं ही दोनों समय का खाना यहां तक कि नाश्ता तक  स्वयं बनातीं. और तो और, पूरा घर भी जीजाजी की रुचि के अनुसार ही सजा हुआ था. घर में ढेरों पुस्तकें, कई महापुरुषों के फोटो हर कमरे में थे. अब तो आसपास के लोग भी इस जोड़े को आदर्श जोड़े का नाम देने लगे थे.

शादी के बाद मैं पति के साथ अमेरिका चली गई. देश की धरती से दूर. साल 2 साल में कभी कुछ दिनों के लिए भारत आती तो भी दीदी से कभी 2-4 दिनों के लिए ही मिलना हुआ और कभी नहीं.

हां, यह अवश्य था कि अगर मैं कभी अपने पति सुभाष की कोई शिकायत मां से करती तो वे फौरन कहतीं, ‘अपनी संजना दीदी को देख, कैसे बदला है उस ने अपनेआप को. कैसे सुनीलजी लट्टू हैं उन पर. अरे, तुझे तो सारी सुविधाएं मिली हुई हैं, आजादी के माहौल में रह रही है, फिर भी शिकायतें.’

मैं सोचती कि भले ही मैं अमेरिका में हूं पर पुरुष मानसिकता जो भारत में है वही इन की अमेरिका में भी है. अब मैं कहां तक अपनेआप को बदलूं. आखिर इन्हें भी तो कुछ बदलना चाहिए.

बस, ऐसे ही खट्टीमीठी यादों के साथ जिंदगी चल रही थी. फिर अचानक ही दुखद समाचार मिला सुनील जीजाजी के निधन का. मैं तो हतप्रभ रह गई. दीदी की शक्ल जैसे मेरी आंखों के सामने से हट ही नहीं पा रही थी. कैसे संभाला होगा उन्होंने अपनेआप को. वे तो पूरी तरह से पति की अनुगामिनी बन चुकी थीं. भारत में होती तो अभी उन के पास पहुंच जाती. फिर किसी प्रकार 6 महीने बाद आने का प्रोग्राम बना. सोचा कि पहले कोलकाता जाऊंगी दीदी के पास. बाद में भोपाल अपनी ससुराल और फिर ग्वालियर अपने मायके.

दीदी को फोन पर मैं ने अपने आने की सूचना भी दे दी और कह भी दिया था कि आप चिंता न करें, मैं टैक्सी ले कर घर पहुंच जाऊंगी. अब अकेले आनेजाने का अच्छा अभ्यास है मुझे.

‘ठीक है रितु,’ दीदी ने कहा था.

पर रास्तेभर मैं यही सोचती रही कि दीदी का सामना कैसे करूंगी. सांत्वना के तो शब्द ही नहीं मिल रहे थे मुझे. वे तो इतनी अधिक पति के प्रति समर्पित रही हैं कि क्या उन के बिना जी पाएंगी. जितना मैं सोचती उतना ही मन बेचैन होता रहा था.

पर कोलकाता एयरपोर्ट पर पहुंच कर तो मैं चौंक ही गई. दीदी खड़ी थीं. सामने ड्राइवर हेमराज के साथ और उन का रूप इतना बदला हुआ था. कहां मैं कल्पना कर रही थी कि वे साड़ी से सिर ढके उदास सी मिलेंगी पर यहां तो आकर्षक सलवार सूट में थीं. बाल करीने से पीछे बंधे हुए थे. माथे पर छोटी सी बिंदी भी थी. उम्र से 10 साल छोटी लग रही थीं.

‘‘दीदी, आप? आप क्यों आईं, मैं पहुंच जाती.’’

मैं कह ही रही थी कि हेमराज ने टोक दिया, ‘‘अरे, ये तो अकेली आ रही थीं, कार चलाना जो सीख लिया है. मैं तो जिद कर के साथ आया कि लंबा रास्ता है और रात का टाइम है.’’

‘‘अच्छा.’’

मुझे तो लग रहा था कि जैसे मैं दीदी से पिछड़ गई हूं. इतने साल अमेरिका में रह कर भी मुझे अभी तक गाड़ी चलाने में झिझक होती है और दीदी हैं…लग भी कितनी स्मार्ट रही हैं. रास्तेभर वे हंसतीबोलती रहीं, यहां तक कि जीजाजी के बारे में कोई खास बात नहीं की उन्होंने. मैं ने ही 2-4 बार जिक्र किया तो टाल गई थीं.

घर पहुंच कर मैं ने देखा कि अब तो पूरा घर दीदी की रुचि के अनुसार ही सजा हुआ है. उन की पसंद की पुस्तकें सामने शीशे की अलमारी में नजर आ रही थीं. कई संस्थाओं के फोटो भी लगे हुए थे. पता चला कि अब चूंकि पर्याप्त समय था उन के पास, इसलिए अब कई सामाजिक संस्थाओं से भी वे जुड़ गई थीं और अपनी पसंद के कार्य कर रही थीं.

अब तो खाना बनाने के लिए भी एक अलग नौकर सूरज था उन के पास. सुबह ब्रैकफास्ट में भी पूरी टेबल सजी रहती. फलजूस और कोई गरम नाश्ता. लंच में भी पूरी डाइट रहती थी. भले ही उन का अकेले का खाना बना हो पर वे पूरी रुचि और सुघड़ता से ही सब कार्य करवाती थीं. ड्राइवर रोज शाम को आ जाता. अगर कहीं मिलने नहीं भी जाना हो, तो वे खुद ड्राइविंग करतीं लेकिन ड्राइवर साथ रहता.

तात्पर्य यह कि वे अपने सभी शौक पूरे कर रही थीं. फिर भी अकेलापन तो था ही, इसीलिए मैं ने कह ही दिया, ‘‘दीदी, यहां इतने बड़े मकान में, इस महानगर में अकेली रह रही हो, बेटे के पास जमशेदपुर…’’

‘‘नहीं रितु, अब कुछ साल मरजी से, अपनी खुशी के लिए. अभी तक तो सब के हिसाब से जीती रही, अब

कुछ साल तो जिऊं अपने लिए, सिर्फ अपने लिए.’’

मैं अवाक हो कर उन का मुंह ताक रही थी.

Family Story

Advantage of Fake Relationships: झूठे प्यार की बड़ी खूबी

Advantage of Fake Relationships: ‘‘झूठा ही सही, पल भर के लिए कोई मुझे प्यार कर ले…’’ उस समय तो लोग हंसते थे लेकिन आज के जमाने में लगता है कि गीतकार तो कोई भविष्यवक्ता रहा होगा जो उस ने पहले ही देख लिया था कि आने वाले समय में सच्चे प्यार का बाजार बैठ जाएगा और नकली मुहब्बत सुपरहिट हो जाएगी.

आज हालत ये हैं कि दूध से ले कर लोकतंत्र तक सब मिलावटी है तो प्यार क्यों अपवाद होता? चुनावी भाषण से ले कर टीवी डिबेट तक, हर जगह झूठ का बोलबाला है. नेताओं का वादा, कंपनियों के विज्ञापन और प्रेमियों का इकरार- तीनों ही एक ही फैक्टरी के प्रोडक्ट लगते हैं, ‘‘यकीन करो, पर गारंटी मत मांगो.’’

झूठे प्यार की सब से बड़ी खूबी यह है कि इस में कोई जिम्मेदारी नहीं. जैसे सरकार की हर योजना सिर्फ कागजों में पूरी होती है, वैसे ही यह मुहब्बत सिर्फ मोबाइल स्क्रीन पर खिलतीमुरझाती रहती है.

न जवाबदेही, न पारिवारिक दबाव- बस 2 इमोजी, 3 हार्ट और 4 अच्छे शब्द और काम तमाम.

झूठा प्यार लोकतांत्रिक भी है. अमीरगरीब, जवानबूढ़े, सब की पहुंच में. जैसे सरकार ‘हर घर जल’ या ‘हर घर बिजली’ का नारा देती है वैसे ही सोशल मीडिया ने ‘हर दिल प्यार’ का स्कीम लागू कर दी है. अब चाहे कालोनी का चौकीदार हो या कौरपोरेट का सीईओ, सब की जेब में एक न एक वर्चुअल प्रेम कहानी जरूर मिल जाएगी.

सोशल मीडिया ने तो रिश्तों को डिस्काउंट सेल बना दिया है, ‘2 लाइक्स लो, 1 कमैंट फ्री पाओ.’

इंस्टा स्टोरी पर हार्ट आया तो दिन बन गया, न आया तो ‘नैटवर्क स्लो’ का बहाना तैयार है.

झूठा प्यार चाइनीज सामान जैसा है. कभी बरसों तक टिक जाए और कभी 2 दिन में फुस्स. फर्क इतना है कि चाइनीज सामान फेंकने पर दुख होता है, मगर झूठे प्यार के टूटने पर लोग तुरंत नया ऐप डाउनलोड कर लेते हैं.

और सच कहिए, यह झूठा प्यार भी बुरा नहीं है. भले ही आप घर में पुराने गाउन में बैठे हों लेकिन एक प्यारा मैसेज आते ही खुद को सिंडरेला महसूस करने लगती हैं. यह झूठा इश्क भले टिकाऊ न हो लेकिन इस का नशा डोपामिन से सीधा जुड़ा होता है.

अब जमाना बदल गया है. पहले लोग ‘दिल टूटने’ पर रोते थे, आज लोग ‘वाईफाई टूटने’ पर कराहते हैं. तो साथियो, यही निष्कर्ष है कि झूठ बोलिए, झूठ में जी लीजिए. सचझूठ की पड़ताल अब सिर्फ अदालतों और ईवीएम मशीनों के लिए छोड़ दीजिए.

प्यार चाहे नकली हो या असली, अगर दिल को अच्छा लगे तो वही है असली ‘मेक इन इंडिया’ वाला जनून.

Advantage of Fake Relationships

Pimple Treatment: पिंपल्स और उन के दाग दूर करने का कोई उपाय बताएं?

Pimple Treatment

मेरी उम्र 18 साल है. मैं जब भी पिंपल्स के दाग दूर करने के लिए मसूर की दाल का उबटन लगाती हूं तो फिर से कोई न कोई पिंपल निकल आता है. पिंपल्स और उन के दाग दूर करने का कोई उपाय बताएं?

आप की प्रौब्लम से लगता है कि आप की स्किन अति संवेदनशील है तभी बारबार आप के चेहरे पर दाने निकल आते हैं. आप उबटन का प्रयोग न करें. अकसर उबटन सूखने के बाद उसे मल कर छुड़ाने से स्किन के जिस भाग में नमी और तेल की जरूरत होती है, वहां से वे निकल जाते हैं. इसलिए प्र्रभावित स्थान पर नीम व तुलसी की पत्तियों का पैक लगाएं. आप चाहें तो ताजा पत्तियों को पीस कर घर पर भी यह पैक तैयार कर सकती हैं. ऐलोवेरायुक्त क्रीम का इस्तेमाल भी फायदेमंद साबित होगा. इस से मुंहासे कम होंगे और धीरेधीरे उन के दाग भी दूर हो जाएंगे.

और भी समस्याएं पढ़ेंः

मेरी उम्र 25 साल है. कुछ दिनों से आईब्रोज के बाल  झड़ रहे हैं. कृपया कोई ऐसा उपाय बताएं जिस से आईब्रोज के बाल  झड़ने बंद हो जाएं?

आप की आईब्रोज के बाल  झड़ने का कारण तनाव हो सकता है. दरअसल, ज्यादा टैंशन लेने से बाल  झड़ने लगते हैं. इसलिए तनाव लेना बंद करें. भोजन में जिंक, आयरन, विटामिन डी, विटामिन बी12 की कमी से भी आईब्रोज के बाल  झड़ने लगते हैं. अत: भोजन में इन्हें शामिल करें. जरूरत से ज्यादा प्लकिंग न करें. इस से भी आईब्रोज के बाल  झड़ने लगते हैं. बालों को  झड़ने से रोकने के लिए औलिव औयल से हलके हाथों से आईब्रोज की सर्कुलर मोशन में मसाज करें. 30 मिनट तक तेल लगा रहने दें. फिर कुनकुने पानी से चेहरा धो लें.

मेरी उम्र 19 साल है. मेरा रंग सांवला है और बाल काले. एक सहेली की सलाह पर बालों में बरगंडी कलर कराया. लेकिन उस से मेरा रंग काफी दबा लग रहा है. मु झे लगता है कि वह रंग मु झ पर जरा भी नहीं फब रहा है. कृपया बताएं कि बालों का यह रंग कैसे और कितनी जल्दी हट सकता है, साथ ही मेरे चेहरे और बालों पर कौन सा रंग ज्यादा फबेगा?

आप बालों के रंग को ले कर परेशान न हों. सब से पहले किसी अच्छे ब्यूटी क्लीनिक में जा कर बालों में नैचुरल कलर वाली डाई करवाएं और बालों की कंडीशनिंग सही तरीके से लें. हमेशा अच्छी क्वालिटी के शैंपू का ही इस्तेमाल करें ताकि बालों को नुकसान न पहुंचे. आप की सांवली रंगत पर वाइन और बालनट कलर अच्छे लगेंगे. कोई जरूरी नहीं है कि पूरे बालों को कलर कराया जाए. आप चाहें तो हेयर कलर्स से बालों की स्ट्रीकिंग भी ले सकती हैं.

मेरी उम्र 20 साल है. मेरे बाल बहुत औयली हैं. शैंपू करने के अगले ही दिन फिर औयली हो जाते हैं. मैं शैंपू करने से पहले बालों में नारियल तेल भी लगाती हूं. क्या मु झे तेल लगाना चाहिए?

आप की समस्या का कारण यह हो सकता है कि बालों में शैंपू करने से बालों का तेल अच्छी तरह न निकलता हो. बालों को पोषण देने के लिए तेल की जगह हेयर टौनिक लगाएं. इस से बाल हैल्दी रहेंगे और औयल कंट्रोल में रहेगा. औयल कंट्रोल करने के लिए अपने शैंपू में नीबू रस की कुछ बूंदें मिलाने के बाद उसे इस्तेमाल में लाएं. बाल धोने के बाद उन में स्कैल्प से 2-3 इंच छोड़ कर कंडीशनर लगाएं.

मैं 26 साल की हूं. मैं जब भी चेहरे पर कोई क्रीम लगाती हूं तो चेहरे पर व्हाइटहैड्स हो जाते हैं. कृपया उन्हें दूर करने का उपाय बताएं?

व्हाइटहैड्स स्किन के पोरों, तेल के रिसाव के साथसाथ गंदगी के जम जाने की वजह से उत्पन्न होते हैं. व्हाइटहैड्स स्किन की भीतरी परत में बनते हैं, जिसे प्रकाश आदि नहीं मिल पाता है और उस का रंग सफेद रहता है. हमारी स्किन में प्राकृतिक रूप से तेल मौजूद होता है, जो हमारी स्किन में नमी और मौइस्चर बनाए रखता है. अगर स्किन पर अधिक तेल मौजूद रहेगा तो उस से हमारी स्किन को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. कुछ क्रीमें ऐसी होती हैं, जो स्किन को और अधिक चिपचिपा बना देती हैं, जिस कारण स्किन पर मुंहासे होने लगते हैं. अगर आप की स्किन औयली है तो आप औयल फ्री क्रीम ही लगाएं. व्हाइटहैड्स दूर करने के लिए मेथी के पत्तों में पानी मिला कर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को चेहरे पर घिसें. खासतौर पर वहां जहां व्हाइटहैड्स हों. इस प्रक्रिया से व्हाइटहैड्स हट जाते हैं. पेस्ट सूखने के बाद चेहरे को कुनकुने पानी से धो लें.

Pimple Treatment

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New Year Recipes: नए साल की पार्टी के लिए ट्राई करें ये टेस्टी डिशेज

New Year Recipes

‘मैकरून लाइट स्नैक्स के तौर पर बैस्ट है.’

कोकोनट मैकरून

सामग्री

–  100 ग्राम नारियल का बुरादा

–  चुटकीभर बेकिंग पाउडर

–  चुटकीभर सोडा

–  50 ग्राम मैदा

–  40 ग्राम चीनी

–  15 ग्राम पिघला मक्खन

–  1-2 बड़े चम्मच दूध

–  1 बड़ा चम्मच नारियल का बुरादा गार्निशिंग के लिए

–  नमक स्वादानुसार.

विधि

एक बाउल में नारियल का बुरादा ले कर उस में बेकिंग पाउडर, सोडा और नमक मिला कर अच्छी तरह मिलाएं. फिर उस में मैदा, चीनी व मक्खन मिला कर तब तक चलाती रहें जब तक मिश्रण चूरे की तरह न हो जाए. अब इस में दूध मिला कर नर्म आटा गूंध कर लोइयां बनाएं और उन्हें ओवनप्रूफ ट्रे में रख थोड़ा सपाट करें. फिर पहले से गरम ओवन में 1500 सैंटीग्रेड पर 10 मिनट  बेक करें. मैकरून बन कर तैयार हैं. ऊपर से थोड़ा नारियल बुरक कर नारियल को हलका सुनहरा करने के लिए 2-3 मिनट और बेक करें. ठंडा कर सर्व करें.

‘बैल पेपर की स्टफिंग को यों बनाएं टेस्टी.’

स्टफ्ट मिनी बैल पेपर

सामग्री

–  1/2 कप चीज

–  1/2 कप पनीर

–  1 कप मिक्स वैजिटेबल

–  1 चम्मच चिली सौस

–  1 प्याज बारीक कटा

–  1 चम्मच लहसुन पेस्ट

–  2 चम्मच तेल

–  2 शिमलामिर्च

–  नमक स्वादानुसार.

विधि

स्टफिंग के लिए एक पैन में तेल गरम कर उस में प्याज डालें, फिर लहसुन और सारी सब्जियां डाल कर पकाएं. अब पनीर डाल कर मिक्स करें. अब चिली सौस और नमक डाल कर मिक्स करें और आंच बंद कर दें. स्टफिंग तैयार है. अब शिमलामिर्च को बीच से काट कर उस में स्टफिंग डाल चीज स्प्रैड करें. अब एक पैन में तेल गरम कर शिमलामिर्च ढक कर धीमी आंच पर 10 मिनट पका कर गरमगरम परोसें.

एगलैस वालनट ब्राउनी

सामग्री

–  15 ग्राम कोको पाउडर

–  15 ग्राम मैदा

–  5 ग्राम चौकलेट पाउडर

–  3 ग्राम बेकिंग पाउडर

–  100 ग्राम पिघला मक्खन

–  60 ग्राम चीनी

–  2-3 बूंदें वैनिला ऐसेंस

–  20 ग्राम अखरोट कटे

–  3-4 बड़े चम्मच दूध.

विधि

मैदे को छान कर उस में बेकिंग व कोको पाउडर मिलाएं. फिर मक्खन व चीनी डाल कर तब तक फेंटती रहें जब तक क्रीमी मिक्स्चर न बन जाए. अब ट्रे में चौकलेट पाउडर डाल कर फेंटें. फिर वैनिला ऐसेंस और मैदे के मिक्स्चर को मिला कर फेंटें. फिर दूध और अखरोट मिला कर फेंटें. अब चिकनाईर् लगी टे्र में डालें और पहले से गरम 1700 सैंटीग्रेड ओवन में 20 मिनट तक बेक कर सर्व करें.

New Year Recipes

Self Confidence: खुद की मेहनत और कर्म पर भरोसा क्यों करें, जरूर जानिए

Self Confidence: हमारे समाज में एक बहुत पुरानी आदत है हर छोटीबड़ी बात को किस्मत, लक और नसीब से जोड़ देना. अगर किसी को अचानक नौकरी मिल गई तो लोग कहते हैं क्या किस्मत वाला है. अगर किसी का ऐक्सीडैंट हो गया तो बोलेंगे नसीब खराब था और अगर किसी का बिजनैस चल निकला तो कहेंगे भाग्य साथ दे रहा है.

मगर क्या सच में हमारी जिंदगी केवल लक और किस्मत के भरोसे चलती है या फिर हम अपने कर्म, मेहनत और फैसलों से अपनी जिंदगी को बदलते हैं?

आजकल सोशल मीडिया पर भी ‘बर्नट टोस्ट थ्योरी’ जैसी बातें ट्रेंड कर रही हैं. इस का मतलब है कि अगर आप की ब्रैड टोस्ट जल गई और आप को उसे बनाने में 2 मिनट और लग गए तो हो सकता है आप उन 2 मिनटों की वजह से किसी हादसे से बच गए हों. यानी हर चीज को किस्मत और इशारों से जोड़ना.

सुनने में यह थ्योरी थोड़ी पौजिटिव लग सकती है लेकिन असलियत यह है कि यह सोच इंसान को कर्म की जगह किस्मत पर भरोसा करना सिखाती है और यही दिक्कत है.

किस्मत पर भरोसा क्यों खतरनाक है

मेहनत की अहमियत कम हो जाती है: जब हम हर चीज को लक से जोड़ देते हैं तो मेहनत का मूल्य कम हो जाता है. उदाहरण के लिए अगर कोई स्टूडैंट दिनरात पढ़ाई कर के अच्छे मार्क्स लाता है तो लोग कह देते हैं तेरी किस्मत अच्छी थी पेपर आसान आ गया, जबकि सच यह है कि उस ने मेहनत की थी और उसी मेहनत का रिजल्ट मिला.

जिम्मेदारी से भागने का बहाना: कई लोग अपनी असफलता को किस्मत के सिर डाल देते हैं जैसे मेरा बिजनैस किस्मत खराब होने की वजह से नहीं चला, जबकि हकीकत यह हो सकती है कि उस ने प्लानिंग ठीक से नहीं की मार्केटिंग कमजोर थी, या मेहनत आधीअधूरी थी. किस्मत को दोष दे कर इंसान अपनी गलतियों को छिपा देता है.

प्रगति की रफ्तार धीमी हो जाती है: अगर हमें भरोसा हो जाए कि सबकुछ पहले से तय है, तो हम क्यों मेहनत करेंगे? यही सोच हमें पीछे ले जाती है. महेंद्र सिंह धोनी का उदाहरण लीजिए.

अगर वे किस्मत पर भरोसा कर के बैठे रहते कि देखते हैं भाग्य क्या लिख कर लाया है तो शायद कभी इंडियन टीम तक न पहुंचते. उन्होंने रेलवे में टीटीई की नौकरी करते हुए भी मेहनत जारी रखी, प्रैक्टिस नहीं छोड़ी और अपने कर्म से आज क्रिकेट की दुनिया में लीजेंड बन गए.

बिजनैस में किस्मत बनाम कर्म: धीरूभाई अंबानी का नाम भी हम सब जानते हैं. अगर वे किस्मत का रोना रोते रहते कि गरीब घर में पैदा हुए हैं तो शायद पैट्रोल पंप पर काम करने से आगे न बढ़ पाते. लेकिन उन्होंने अपने कर्म से, अपने बिजनैस माइंड से और कड़ी मेहनत से इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया.

बर्नट टोस्ट थ्योरी

लोग मानते हैं कि अगर रास्ते में देरी हो गई, गाड़ी पंक्चर हो गई या टोस्ट जल गया तो यह किस्मत का खेल है और किसी अनहोनी से बचा लिया गया है.

यह सोचने में कोई हरज नहीं कि हर देरी के पीछे कोई बड़ा कारण हो सकता है लेकिन अगर हम हर चीज को ऐसे जोड़ने लगें तो धीरेधीरे मेहनत और जिम्मेदारी पर से भरोसा उठ जाता है.

मान लीजिए आप का रिजल्ट खराब आया. अब अगर आप कहें शायद यही मेरी किस्मत थी तो आप अपनी मेहनत की कमी, पढ़ाई का तरीका और प्लानिंग की गलतियां कभी नहीं देख पाएंगे

कर्म और किस्मत का असली रिश्ता

सच तो यह है कि किस्मत नाम की चीज पूरी तरह से ?ाठी नहीं है. कभीकभी मौके मिलना, सही समय पर सही जगह होना, यह सब भी माने रखता है. लेकिन अगर आप के पास मेहनत और कर्म की ताकत नहीं है तो किस्मत भी आप का साथ नहीं देगी

सोचिए, लौटरी टिकट खरीदने वाला हर इंसान करोड़पति क्यों नहीं बनता इसलिए कि किस्मत सब की नहीं खुलती. लेकिन अगर आप पढ़ाई करेंगे, स्किल सीखेंगे, मेहनत करेंगे तो बिना लौटरी भी अपनी लाइफ बना सकते हैं.

कर्म पर भरोसा करने के फायदे

आत्मविश्वास बढ़ता है: जब आप मेहनत पर भरोसा करते हैं तो आप की सोच पौजिटिव होती है.

जिम्मेदारी निभाना सीखते हैं: आप अपनी असफलताओं की वजह ढूंढ़ते हैं और उसे सुधारते हैं.

लक्ष्य हासिल होते हैं: मेहनत से हासिल की गई सफलता टिकाऊ होती है.

दूसरों के लिए प्रेरणा बनते हैं: जब लोग देखते हैं कि आप किस्मत नहीं कर्म पर भरोसा कर के सफल हुए हैं तो उन्हें भी सीख मिलती है.

लक और किस्मत जैसी बातें सुनने में अच्छी लगती हैं और कभीकभी हमें तसल्ली भी देती हैं लेकिन असल जिंदगी में हमें अपने कर्मों पर यकीन करना चाहिए.

‘बर्नट टोस्ट थ्योरी’ जैसी मान्यताएं केवल हमें अस्थाई सुकून देती हैं लेकिन आगे बढ़ने की असली ताकत हमारे कर्म, मेहनत और फैसले ही होते हैं.

तो अगली बार जब आप किसी असफलता को किस्मत पर डालने लगें तो रुकिए और खुद

से पूछिए कि क्या मैं ने अपने कर्म ईमानदारी से किए हैं?

Self Confidence

Entertainment Updates: फिल्मी गलियारों से ताजा हलचल

Entertainment Updates

अब ऐक्टिंग पर फोकस करेंगी तमन्ना

आइटम सौंग्स में अपनी धाक जमाने वाली तमन्ना भाटिया लंबे समय के बाद सीरियस रोल करती हुई नजर आने वाली हैं. खबरची बता रहे हैं कि तमन्ना वी शांताराम पर बन रही बायोपिक में जयश्री का किरदार निभाएंगी. शांताराम का किरदार सिद्धांत चतुर्वेदी निभा रहे हैं. यदि फिल्म अच्छी बन पड़ी तो तमन्ना बौलीवुड में छा जाएंगी और सिद्धांत के कैरियर को भी बूस्ट मिलेगा. वैसे तमन्ना के लिए यह किरदार काफी चैलेंजिंग होने वाला है क्योंकि शांताराम लीजेंड्री फिल्मकार के तौर पर जाने जाते हैं और उन की पत्नी जयश्री का भी इस में काफी योगदान रहा है.

इन्होंने किया अनन्या को रिप्लेस

अनन्या पांडे फिल्म ‘छूमंतर’ में नहीं दिखाई देंगी क्योंकि वे ओटीटी पर ‘काल मी बे’ के दूसरे सीजन में काम कर रही हैं. उन्हें लगता है कि यह वैब सीरीज फिल्म से ज्यादा पसंद की जाएगी. अनन्या की जगह ले रही हैं जानकी बोदीवाला जो इस से पहले फिल्म ‘शैतान’ में नजर आ चुकी हैं. इस के साथसाथ जानकी की झोली में ‘मर्दानी 3’ भी है. यदि दोनों ही फिल्में बौक्स औफिस पर चल पड़ीं तो इस गुजराती ऐक्ट्रैस की हिंदी फिल्मों में लाइफ सैट समझिए.

अवनीत के लिए बड़ी बात है

टीवी पर आने वाले धारावाहिक ‘अलादीन’ की छोटी सी अवनीत अब खासी बड़ी हो चुकी हैं और फिल्मों में भी अपनी जगह बना रही हैं. हाल ही में उन की फिल्म ‘लव इन वियतनाम’ को बैस्ट एशियन फिल्म की ट्रौफी मिली. यह अवनीत के कैरियर की बड़ी अचीवमैंट है. इस से पहले अवनीत ‘मर्दानी 2’ में भी बेहतरीन रोल निभा चुकी हैं. नैपो किड्स के अलावा यदि फिल्मकारों की नजर ऐसे टैलेंट पर भी पड़े तो बौलीवुड की तसवीर बदल सकती है.

सचिवजी की हो गई यह आरजे

पहले भी आरजे फिल्मों का हिस्सा बनते रहे हैं तो इस में कोई नई बात नहीं कि आरजे महवश भी इस दुनिया में कदम रख रही हैं. तो आप की यह फेमस आरजे ‘पंचायत’ सीरीज के नए सीजन में सचिवजी यानी जितेंद्र कुमार से इश्क लड़ाते हुए दिख सकती हैं. वैसे रीयल लाइफ में महवश क्रिकेटर युजवेंद्र चहल के वश में बताई जा रही हैं. खैर, वह उन की पर्सनल लाइफ है. हमें तो यह देखना है कि यह मौडर्न आरजे सिर्फ दमदार आवाज ही रखती है या फिर ऐक्टिंग का हुनर भी.

निमृत को मिला ओटीटी का सहारा

‘बिग बौस’ में नजर आने के बाद निमृत को ‘खतरों के खिलाड़ी’ में देखा गया. लेकिन इस के बाद वे कभी दिखीं तो कभी एकदम गायब हो गईं. शायद उन्हें ‘बिग बौस’ में दिखने का कुछ खास फायदा न हुआ हो. खैर, अब उन के डूबते कैरियर को ओटीटी का सहारा मिला है. खबरखोजी बता रहे हैं कि निमृत 8 ऐपिसोड वाली एक सीरीज की शूटिंग स्टार्ट करने वाली हैं, जिस में उन के साथ दिग्गज कलाकार संजय कपूर, शाहिर शेख और मौनी राय भी हैं. क्या बात है निमृत, बैक फुट पर जा कर सीधा सिक्सर मार दिया.

बिट्टू की तो निकल पड़ी

27 साल के पानीपत बौय अभय वर्मा ने फिल्म ‘मुंज्या’ में बिट्टू का किरदार क्या निभाया उन के कैरियर को मानो पंख लग गए. बिट्टू अब बड़ी फिल्में भी करने लगे हैं. उन की आने फिल्म ‘छूमंतर’ की चर्चा आजकल खबरचियों के बीच बहुत है. खबर तो यह भी है कि अभय किंग खान के ड्रीम प्रोजैक्ट ‘किंग’ में भी अहम किरदार निभाने वाले हैं. क्या बात है बिट्टू यानी अभय, आप की तो निकल पड़ी.

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Hookup Culture: आजादी या मुसीबत

Hookup Culture: आजकल रिलेशनशिप का मतलब बदल चुका है. अब कई लोग रिलेशनशिप में सिर्फ इमोशनल कनैक्शन ही नहीं बल्कि फिजिकल कनैक्शन भी तलाशने लगे हैं खासकर जेनजी यानी 1997-2012 के बीच पैदा हुई जैनरेशन के बीच हुकअप कल्चर आम बात हो गई है.

हुकअप का सीधा मतलब है बिना किसी बंधन, बिना किसी वादे बस फिजिकल रिलेशनशिप. यह किसी एक रात का हो सकता है या कुछ मुलाकातों तक चल सकता है. इस में प्यार, शादी या भविष्य जैसी बातें जरूरी नहीं होतीं. कई लोग इसे फन और नो स्ट्रिंग्स अटैच्ड रिलेशन कहते हैं.

क्या यह कल्चर वाकई सब के लिए आसान है? क्या लड़कियों और लड़कों के लिए इस का असर एकजैसा होता है? हुकअप कल्चर क्यों बढ़ रहा है?

सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप्स

टिंडर, बंबल, हिंज जैसे ऐप्स ने नए लोगों से मिलने और कैजुअल डेटिंग को बहुत आसान बना दिया है. अब किसी को पसंद करने के लिए कालेज, औफिस या पड़ोस पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. एक स्वाइप कर के आप किसी नए इंसान से जुड़ सकते हैं.

फियर औफ कमिटमैंट

आज के नौजवान शादी या सीरियस रिलेशनशिप में नहीं बंधना चाहते. कैरियर, स्टडी और फ्रीडम को पहले रखते हैं. ऐसे में हुकअप उन्हें आसान रास्ता लगता है.

फ्रीडम

लड़केलड़कियां दोनों ही ऐक्सपैरिमैंट करना चाहते हैं. पहले सैक्स को बड़ा टैबू माना जाता था लेकिन अब इसे पर्सनल चौइस समझ जाने लगा है. आजकल बहुत सी रिलेशनशिप ऐसी होती हैं जहां न कोई क्लीयरिटी है न कमिटमैंट. ऐसे में लोग कहते हैं कि हुकअप कम से कम साफसाफ है न प्यार का झंझट, न धोखे का डर.

इस में लड़कियां कहां फंस जाती हैं

अगर लड़का हुकअप करे तो उस के दोस्त कहते हैं, ‘‘वाह यार, मजा ले रहा है.’’ लेकिन वही काम लड़की करे तो तुरंत उस के चरित्र पर उंगली उठ जाती है. उसे इज्जत खोने वाली, चरित्रहीन या बिगड़ी हुई कह दिया जाता है.

दिल्ली की 22 साल की शर्वरी ने एक डेटिंग ऐप पर मिले लड़के से हुकअप किया. दोनों की मरजी से यह हुआ लेकिन बाद में वही लड़का अपने फ्रैंड्स के बीच उस की बातें फैलाने लगा. शर्वरी को लगा कि हम दोनों बराबरी से इस में शामिल थे, लेकिन बदनाम सिर्फ मैं हो रही हूं.

गर्ल्स के लिए ज्यादा रिस्क

हुकअप के बाद अगर प्रैगनैंसी, एसटीडी (सैक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज) या इमोशनल ट्रामा जैसी दिक्कत आती है तो इस का बोझ ज्यादा लड़की पर ही पड़ता है. लड़का अकसर कह देता है यह तुम्हारी प्रौब्लम है.

ऐसा ही कुछ हुआ मुंबई की पूजा के साथ. वह एक लड़के के साथ कैजुअल रिलेशन में थी. वह प्रैगनैंट हो गई. लड़के ने साफ कहा कि यह तुम्हारा फैसला है, मैं शादी या रिस्पौंसिबिलिटी नहीं ले सकता. नतीजा यह हुआ पूजा को अकेले मैडिकल अबौर्शन कराना पड़ा और उस दौरान समाज से अलग झेलनी पड़ी तानेबाजी.

इमोशनल जुड़ाव

कई बार लड़कियां कहती हैं कि हम हुकअप को सिर्फ फन के तौर पर ले रहे हैं. लेकिन सच यह है कि कई बार इमोशंस जुड़ ही जाते हैं. जब लड़का गायब हो जाता है (घोस्टिंग) तो लड़की अकेली रह जाती है. हुकअप कल्चर देखने में जितना कूल और बिंदास लगता है उतना है नहीं खासकर लड़कियों के लिए, यह एक ऐसी राह है जहां एक तरफ आजादी है तो दूसरी तरफ समाज की दोहरी मानसिकता.

फिजिकल और मैंटल हैल्थ रिस्क

हुकअप में कई बार सेफ्टी को नजरअंदाज कर दिया जाता है. अनप्रोटैक्टेड सैक्स से न सिर्फ प्रैगनैंसी का खतरा होता है बल्कि सैक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज का भी रिस्क रहता है.

इस के अलावा, बारबार हुकअप करने से लड़कियों में मैंटल हैल्थ इशू जैसे डिप्रैशन, ऐंग्जौइटी आदि का खतरा बढ़ जाता है खासकर जब उन्हें समाज की जजमैंटल नजरों का सामना करना पड़ता है.

जब लड़की अपने दोस्तों से इस बारे में बात करती है तो उसे जज किया जाता है. लोग कहते हैं, ‘‘तुझे तो पता था ये सब रिस्की है, फिर क्यों किया?’’

जेन जी के लाइफस्टाइल का हुकअप कल्चर बन चुका है. यह उन लोगों के लिए आसान और आजादी वाला रास्ता है जो शादी या लौंगटर्म कमिटमैंट से बचना चाहते हैं. लेकिन समाज की दोहरी सोच और लड़कियों पर डाले गए इज्जत के बोझ की वजह से यह उन के लिए मुश्किल बन जाता है.

Hookup Culture

Late-Comers: वेकेशन का मजा खराब करती है, देर से आने की आदत

Late-Comers: यहां बात सिर्फ आप के मजे की नहीं हो रही, बल्कि आप के साथ जो लोग टूर में ट्रेवल कर रहे हैं उन का भी मजा खराब होता है और आप को बेवजह दूसरों की घूरती आंखें और डांट सुननी पड़ती हैं वह अलग. यकीनन इस से आप का भी मूड औफ होता होगा.

जैसेकि अगर आप ने कहीं पर बस टूर लिया है और बस टूर में कहा कि अब हम यहां 3 बजे मिलते हैं तो आप आराम से 4 बजे चलते हुए आ रहे हैं और बाकी सब बैठे हैं. गाड़ी में आप का इंतजार कर रहे हैं, तो यह वाकई बहुत गलत बात है. अब वक्त आ गया है कि अपनी इस आदत को बदल डालिए क्योंकि जब हम किसी ग्रुप टूर या और्गेनाइज्ड ट्रिप का हिस्सा होते हैं, तो समय की पाबंदी न केवल शिष्टाचार है, बल्कि यह दूसरों के प्रति सम्मान भी है.

सब का समय खराब होना

अगर हरकोई इसी तरह लेट आएं, तो सब का समय खराब होगा. हरकोई जल्दीजल्दी तैयार हो कर आते हैं. जब वे आते हैं और देखते हैं कि किसी एक के लिए बस नहीं चल रही है, तो उन्हें लगता है कि बेकार ही हम ने जल्दी की. हम भी आराम से आते. इस का नतीजा यह होता है कि हरकोई लेट आने लगता है जिस से सारा समय जो घूमने का था वह इंतजार में ही निकल जाता है. इस वजह से लोग आप के साथ घूमने जाने से बचने लगेंगे और एक दिन आएगा जब आप को अकेले ही ट्रैवल करना पड़ेगा.

शैड्यूल बिगड़ जाता है

टूर में हर जगह पहुंचने और देखने का एक तय समय होता है. एक जगह की देरी से आगे के सारे पौइंट्स या तो छूट जाते हैं या वहां बहुत कम समय मिलता है. अकसर सब से खूबसूरत जगहें देखने के लिए एक निश्चित समय होता है (जैसे किसी म्यूजियम की ऐंट्री का आखिरी समय या किसी बोट राइड का स्लौट). शैड्यूल बिगड़ने पर अकसर उन मुख्य जगहों को लिस्ट से काटना पड़ता है, जिस के लिए आप ने भारी पैसे खर्च किए होते हैं.

यदि सुबह निकलने में 20 मिनट की देरी हुई, तो इस का मतलब है कि आप पहली साइट पर देर से पहुंचेंगे, वहां से देर से निकलेंगे और अंततः दोपहर का भोजन और शाम का होटल चेकइन भी देर से होगा. इस से सब को असुविधा होती है.

आर्थिक नुकसान भी होता है

अगर आप की देरी की वजह से कोई ट्रेन, फ्लाइट या पहले से बुक किया गया शो छूट जाता है, तो उस का आर्थिक बोझ पूरे ग्रुप या आयोजक पर पड़ता है. इस के आलावा कई जगह विदेशों में ऐसी होती हैं जहां पहले ही उस जगह को देखने का पेमेंट आप से ले लिया जाता है. लेकिन देर हो जाने की वजह से वह जगह आप देख ही नहीं पाते और पैसा वेस्ट हो जाता है. इस से सब का नुकसान होता है. कई बार तो जिस ने लेट किया होता है उसे ही सब की फीस भरने को कहा जाता है, जिस से ट्रिप में लड़ाईझगडे की संभावना बन जाती है.

गाइड और ड्राइवर पर दबाव

अगर आप ने किसी जगह को 5 दिन का टूर लिया होता है, तो उन्हें तय समय में ट्रिप पूरी करनी होती है, लेकिन देर हो जाने की वजह से कई जगह छूटने का डर होता है और बाकी लोग कंपनी में कंप्लेंट करते हैं कि आप ने पैसा तो लिया लेकिन सारी जगह नहीं दिखाई. इस से कंपनी की इमेज खराब होती है और उस का पूरा दबाव ड्राइवर और गाइड पर आता है, जिस से उन पर मानसिक दबाव बढ़ता है और सुरक्षा से समझौता होने का डर रहता है. फिर वे जल्दीजल्दी गाड़ी चलते हैं. इस से ऐक्सिडैंट का डर भी होता है और जो जगह देख रहे हैं उसे भी गाइड सही से नहीं दिखाता क्योंकि उसे अगली जगह भी कवर करनी पड़ती है.

 कानूनी और नियम संबंधी पाबंदियां

कई देशों या शहरों में पर्यटन स्थलों (जैसे म्यूजियम या महलों) के बंद होने का सख्त समय होता है. अगर ड्राइवर देर से पहुंचता है, तो ऐंट्री नहीं मिलती, जिस का दोष अकसर ड्राइवर या गाइड पर मढ़ा जाता है, जबकि गलती देर से आने वाले टूरिस्ट की होती है.

ड्यूटी आवर्स का कम हो जाना

ड्राइवरों के लिए ड्राइविंग के घंटों के सख्त नियम होते हैं. अत्यधिक देरी होने पर उन के आराम का समय कम हो जाता है, जिस से थकान  होती है और अगले दिन की यात्रा प्रभावित हो सकती है.

देश की छवि खराब होती है

हर पर्यटन स्थल के अपने नियम होते हैं (जैसे शोर न करना, कचरा न फैलाना या फोटो न खींचना). अनुशासन की कमी से देश और संस्कृति की छवि खराब होती है और कभीकभी जुरमाना भी भरना पड़ सकता है.

देर न हो इस के लिए क्या करें

बफर टाइम ले कर चलें. कहीं पहुंचने का टाइम अगर 8 बजे का है, तो आप उसे 7:30 का ही मानें और उसी के अनुसार अपनी तैयारी करें ताकि आप टाइम से पहुंचें. वैसे भी यह सुना ही होगा कि समय पर आना मतलब देर से आना है और समय से पहले आना ही वास्तव में समय पर आना है.

कहीं जाना है तो हैंडबैग भी रात को ही लगा कर रखें. यह न सोचें कि बाकि पैकिंग तो हो ही गई है यह तो सुबह भी हो जाएगा. सुबह इस काम को करने में देर ही होगी. उलटा आप अपने नहाने की कपडे, जूतेचप्पल भी सब एक जगह इकठा कर के रखें ताकि फटाफट सब हो जाए और कुछ भी ढूंढ़ने में टाइम वेस्ट न हो.

सिर्फ एक अलार्म पर भरोसा न करें. मोबाइल में 2 अलार्म लगाएं और यदि आप होटल में हैं, तो रिसैप्शन से ‘वेकअप कौल’ के लिए भी कहें.

ग्रुप के सदस्यों को जोड़ियों में बांट दें. हर व्यक्ति की जिम्मेदारी हो कि वह अपने साथी को देखे कि वह समय पर आया है या नहीं. इस से गाइड का काम आसान हो जाता है और कोई पीछे नहीं छूटता.

अगर आप को घूमने में टाइम का पता नहीं चलता है, तो आप गाइड से लौटने का टाइम पता करें और अपने फोन में रिमाइंडर लगा लें कि इस समय आप को बस तक वापस आना है. इस से देर नहीं होगी.

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