New Year Resolution: कलर्स के ऐक्टर्स ने अपने 2026 के संकल्प बताए

New Year Resolution: कलर्स के ‘मन्नत हर खुशी पाने की’ की आयशा सिंह ने बताया, “जैसे कि हम 2025 को अलविदा कह रहे हैं, शुक्रगुजार होने के लिए बहुत कुछ है. दर्शकों ने ‘मन्नत हर खुशी पाने की’ को बहुत प्यार दिया है और यह मेरे लिए बहुत मायने रखता है. मैं इस बात को ले कर उत्साहित हूँ कि लीप के बाद के ट्रैक में दर्शकों को और क्याक्या शौक और ट्विस्ट आने वाले हैं. जहां औनस्क्रीन मन्नत अपने मां वाले दौर में आ गई है, वहीं मैं पर्सनली पहले से कहीं ज्यादा अपने सेल्फ केयर वाले दौर में हूं.”

वे कहते हैं,”मुझे लगता है कि हम सभी को अपने लिए समय देना चाहिए और अपनी फिजिकल और मैंटल हैल्थ पर ध्यान देना चाहिए. उम्मीद है कि 2026 में हम जिंदगी की छोटीछोटी खुशियों को अपनाएंगे और बड़ी पिक्चर पर भी फोकस रखेंगे. मैं सभी को नए साल की बहुतबहुत शुभकामनाएं देती हूं.”

कलर्स के ‘मंगल लक्ष्मी’ में मंगल का किरदार निभाने वाली दीपिका सिंह ने बताया, “यह साल मेरी जिंदगी का एक असली टर्निंग पौइंट जैसा लगता है, जिस में ऐसे पल आए जिन्हें मैं हमेशा याद रखूंगी. ‘मंगल लक्ष्मी’ को मिले अपार प्यार से मुझे बहुत हिम्मत मिली है और इस रोल के लिए दादासाहेब फाल्के अवार्ड मिलना एक ऐसा मील का पत्थर है, जिसे मैं हमेशा गर्व से याद रखूंगी. यह एक ऐसा साल भी था जिस ने मुझे सच में परखा और मजबूत बनाया.

वे कहती हैं,”मुझे डेंगू हो गया था, फिर भी मैं सिर्फ 2 दिन बाद शूटिंग पर लौट आई और 1 हफ्ते तक 8-8 घंटे काम किया. मेरे प्रोड्यूसर बहुत अच्छे थे कि उन्होंने मेरे लिए लिमिटेड घंटे तय किए. मैं ने एसपी रजा सर से रिक्वेस्ट की कि वे मंगल की कहानी में कोई बदलाव न करें, उन्हें भरोसा दिलाया कि मैं आऊंगी, और मैं आई. उसी हिम्मत ने मुझे जार्जिया शैड्यूल में भी साथ दिया, जहां मैं ने वहां माइनस टैंपरेचर में लगातार 4 दिन काम किया. जार्जिया में शूटिंग ने दर्शकों के लिए मंगल के किरदार को निभाने में एक नया आयाम जोड़ा. फराह खान मैम के साथ स्क्रीन शेयर करना एक और यादगार पल था.

उन के साथ काम करने से मुझे अपने काम में नई सोच और प्रेरणा मिली. जैसे ही मैं नए साल में कदम रख रही हूं, मैं संतुष्टि और आत्मविश्वास के साथ ऐसा कर रही हूं, यह जानते हुए कि दर्शक और फैंस मेरे साथ हैं. मैं यह देखने के लिए उत्सुक हूं कि ‘मंगल लक्ष्मी’ आगे कहां जाती है और दर्शक उस की यात्रा को कैसे देखते रहते हैं. वर्तमान पल का आनंद लें, एकदूसरे का खयाल रखें और परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं. माफ करें, भूल जाएं और आगे बढ़ें. यही मेरा मंत्र है. सभी को खुशी, तरक्की और यादगार पलों से भरे साल की शुभकामनाएं.

कलर्स के ‘सहर होने को है’ में माहिद का रोल निभाने वाले पार्थ समथान कहते हैं,“नए साल से पहले कुछ नया करने का मेरा सफर ‘सहर होने को है’ के साथ पहले ही शुरू हो चुका था. माहिद ने मुझे जानीपहचानी चीजों से हट कर एक ऐसे किरदार में ढलने का मौका दिया जो आम हीरो जैसा नहीं है. वह एक ऐसा हीरो है जिस में कमियां हैं, जो अपना रास्ता ढूंढ़ रहा है और यही बात मुझे उस की तरफ खींचती है. माहिद का किरदार निभाना बहुत ताजगी भरा रहा.”

वे कहते हैं,”सेट पर हर दिन ऐसा लगता है जैसे मुझे कुछ ऐसा खोजने का मौका मिल रहा है जिसे मैं ने पहले कभी स्क्रीन पर नहीं दिखाया. जो बात सच में दिल को छू लेने वाली है, वह यह है कि दर्शक इस बदलाव को अपनाने में कितने खुले दिलवाले और उदार रहे हैं. एक ऐक्टर के तौर पर माहिद के प्रति उन की दया और सहानुभूति मेरे लिए बहुत मायने रखती है. जैसे ही मैं नए साल में कदम रख रहा हूं, मेरा एकमात्र संकल्प है कि दर्शकों ने मुझे जो प्यार दिया है, उसे वापस दूं.

मैं सभी को कुछ नया करने, रिस्क लेने और चुनौतियों से आगे बढ़ने की हिम्मत की शुभकामनाएं देता हूं.

सभी को बहुतबहुत हैप्पी और पौजिटिव 2026 की शुभकामनाएं.

कलर्स के ‘लाफ्टर शेफ्स अनलिमिटेड एंटरटेनमेंट’ की ईशा सिंह कहती हैं, “साल का अंत मेरे लिए हर मायने में कलरफुल रहा है. ‘लाफ्टर शेफ्स अनलिमिटेड एंटरटेनमेंट’ और ‘नागिन 7’ का हिस्सा होने से यह पक्का हो गया है कि मैं साल का अंत शानदार तरीके से कर रही हूं. ‘लाफ्टर शेफ्स’ की शूटिंग मेरे हफ्ते का सब से खास हिस्सा है. सेट पर ऐनर्जी बहुत जबरदस्त होती है. पूरी टीम इतना जोश लाती है कि हर शूट पर हंसी की थेरैपी जैसा लगता है. जो बात मुझे सब से ज्यादा हैरान करती है, वह यह है कि मैं खुद कुकिंग को कितना ऐंजौय कर रही हूं. मैं ने कभी नहीं सोचा था कि मैं नए साल में डिशेज बनाते हुए कुक औफ का सामना करते हुए और इतने जोश के साथ चुनौतियों को अपनाते हुए आगे बढूंगी.”

वे कहती हैं,”दर्शकों का प्यार बहुत ज्यादा और मोटिवेट करने वाला रहा है और यह मुझे अपना बैस्ट देने के लिए प्रेरित करता है. मैं 2026 के कुक औफ में हिस्सा लेने और ‘डिनर टेनमेंट’ का अपना वर्जन पेश करने के लिए उत्साहित हूं. जैसे ही साल बदलेगा, उम्मीद है कि जिन लोगों का समय मुश्किल रहा है, उन्हें आने वाले दिनों में शांति, खुशी और एक नई शुरुआत मिलें.

कलर्स के ‘लाफ्टर शेफ्स अनलिमिटेड एंटरटेनमेंट’ से करण कुंद्रा कहते हैं, “यह साल कई मायनों में खास रहा है. लाफ्टर शेफ्स को वापस आते और दर्शकों का दिल जीतते देखना मेरे साल का सब से खास पल रहा है. और मुझे पूरी टीम पर बहुत गर्व है. सब से अप्रत्याशित खुशियों में से एक तेजा के साथ खाना बनाना और उस की किचन पर्सनैलिटी के बारे में जानना रहा है. सच कहूं तो यह भविष्य के लिए हर हफ्ते की रिहर्सल जैसा लगता है. इस शो में कुछ भी बनावटी नहीं लगता. हम बहस करते हैं, घबराते हैं, एकदूसरे पर हंसते हैं और किसी तरह समय खत्म होने से ठीक पहले डिश बना लेते हैं. इसी ईमानदारी ने लोगों को जोड़ा है और मुझे लगता है कि दर्शक इसे महसूस करते हैं.”

वे कहते हैं,”इस शो के किचन में शरारत करने वाले लोग मुझे सब से अजीब बातों पर हंसाते हैं और मुझे उम्मीद है कि 2026 में भी दर्शक ऐसा ही करते रहेंगे और भी मजे, और भी जीत के लिए और भी जश्न मनाने के कई कारण हैं. सभी को नए साल की बहुतबहुत शुभकामनाएं.”

कलर्स के ‘बिंदी’ में दयानंद का किरदार निभाने वाले मानव गोहिल कहते हैं,“नया साल मुझे थोड़ा रुकने और 2025 की भागदौड़ पर बहुत कृतज्ञता के साथ सोचने का मौका देता है. मैं 2026 का स्वागत शोरशराबे से दूर अपनी पत्नी और बेटी के साथ समय बिता कर और वर्तमान में रहने के सुकून को महसूस करते हुए करना चाहता हूं. प्रोफेशनली ‘बिंदी’ मेरे लिए 2025 का एक अहम हिस्सा रहा है. दयानंद एक जटिल किरदार है और उसे निभाने से मुझे दर्शकों के साथ अपना रिश्ता मजबूत करने का मौका मिला. जैसे ही कहानी लीप के बाद के पड़ाव में पहुंचती है, दर्शक हैरान करने वाले ट्विस्ट और बदलते रिश्ते देख सकते हैं और मैं चाहता हूं कि वे देखें कि दयानंद का सफर आगे कहां जाता है. मैं कामना करता हूं कि 2026 खुशियों से भरा हो, जिस में वादे, मकसद और ऐसी कहानियां हों जिन का इंतजार किया जा सके.

New Year Resolution

Body Shaming है खतरनाक, मैंटल हेल्थ को कर देती है बर्बाद

Body Shaming: ‘अरे देखो यह लड़की कितनी मोटी है…’ इस लड़के के बूब्स तो लड़कियों जैसे हैं…’ कितनी काली है यह. इस पर तो कोई रंग अच्छा ही नहीं लगता होगा…’ देखो, गिट्ठी चली आ रही है. ऐसा लग रहा है मानो छोटी हाइट की कोई गठरी चली आ रही है…’ किसी पर इस तरह के कमेंट्स कर के उस का अपमान करना और उसे दुख पहुंचाना ही बौडी शेमिंग है. इस बौडी शेमिंग की वजह से कई बार लोग डिप्रैशन तक का शिकार हो जाते हैं.

हाल ही में हुमा कुरैशी और सोनाक्षी सिन्हा की एक फिल्म आई थी, जिस का नाम था ‘डबल एक्सएल.’ इस फिल्म में बहुत अच्छे से यह दिखाया गया था कि कैसे लड़कियों को कदमकदम पर बौडी शेमिंग का शिकार होना पड़ता है. इस से पहले बौडी शेमिंग के खिलाफ एक अभियान भी चला था, जिस में बड़े से बड़े सिलेब्स ने भी भाग लिया था. इस के आलावा भी आएदिन ऐसी खबरें आती रहती हैं जहां बौडी शेमिंग के चलते पीड़ित डिप्रैशन का शिकार हो जाते हैं और आत्महत्या तक कर बैठते हैं.

बौडी शमिंग का शिकार हुए लोग

केस 1 : जून, 2025 में हमीरपुर में एक शिक्षिका ने मोटापे के कारण खुदकुशी कर ली. 90 किलोग्राम वजन और लगातार मजाक उड़ाए जाने से वह डिप्रैशन में थी. सुसाइड नोट में उस ने अपने दर्द का इजहार किया. उस ने खुद को आग लगा कर जान दे दी. लेकिन इस हादसे से पहले वह एक सुसाइड नोट छोड़ गई, जिस में सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि टूटती दिलों की चीखें थीं.

साल्वी का वजन करीब 90 किलोग्राम था, जबकि उस की लंबाई मात्र 5 फीट. चलनेफिरने में कठिनाई, समाज की तिरछी निगाहें और हर मोड़ पर मजाक का शिकार होना… ये सब उस की मानसिक हालत को धीरेधीरे गहरे डिप्रैशन की ओर ले जाने लगी.

परिजनों ने उसे मानसिक तनाव से बाहर लाने के लिए एक निजी स्कूल में पढ़ाने के लिए भेजा था. लेकिन वहां भी उस के मोटापे को ले कर मजाक उड़ाया गया. हर ताने और हंसी की चोट उस के आत्मविश्वास को चीरती रही. अंत में उस ने छत पर जा कर खुद को आग के हवाले कर दिया.

केस 2 : जम्मू कश्मीर के भुवन शर्मा को अपने बढ़े हुए वजन के लिए बहुत जिल्लत झेलनी पड़ी. उस के ब्रैस्ट शर्ट व टीशर्ट पहन कर भी साफ नजर आते थे. साथ पढ़ने वाले लड़के उसे ‘मैन बूब्स’ कह कर चिढ़ाते. किसी लड़की के आगे दोस्ती का हाथ बढ़ाता तो वह भी रिजैक्ट कर देती.

मोटापे के तानों से बचने के लिए भुवन ने सोशल मीडिया पर अपनी तसवीरें शेयर करना बंद कर दिया. फ्रैंड्स के साथ पार्टी में जाना छोड़ दिया. वह खुद को आईने में देखने से बचने लगा. उस का कौन्फिडेंस कम हो गया.

केस 3 : नोएडा की एक बैंक में काम करने वाली युवती ने बौडी शेमिंग और पर्सनल कमेंट्स से परेशान हो कर सुसाइड कर ली. आरोप है कि युवती के सहकर्मी उस की बौडी को ले कर भद्दे कमेंट्स करते थे. इस से युवती मानसिक रूप से परेशान हो गई और कई बार उसे डाक्टर के पास जाना पड़ा. कई बार परेशानी से नजात पाने के लिए दवाइयों का सहारा भी लेना पड़ा, लेकिन इन सब के बावजूद वह इन सब चीजों से उबर नहीं पाई.

लड़कियों की शादी में सुंदरता के पैमाने भी बड़ी वजह

महिलाओं को अकसर उन के रंगरूप के आधार पर महत्त्व दिया जाता है, जबकि पुरुषों की मस्कुलर या लंबे कद वाला होने के आधार पर प्रशंसा की जाती है. कई भारतीय घरों में लड़कियों को शादी के अच्छे रिश्ते के लिए वजन कम करने या गोरा होने का सुझाव दिया जाता है. काले रंग या अधिक वजन को आकर्षक नहीं समझा जाता, जोकि पूरी तरह गलत एवं भेदभावपूर्ण है. यही गलत मैसेज समाज में जाता है कि अगर सुंदर लड़की है तो उस के लिए हजार रिश्ते हैं और अगर कोई सुंदर नहीं है तो उस में कमी है. यह सरासर गलत है.

यह सोच को सामान्य बना देता है कि किसी के रूपरंग या आकार के आधार पर उसे आंका जाए. यदि हम लोगों को केवल सुंदरता या शरीर के आधार पर पुरस्कृत करते हैं या उन्हें आंकते हैं, तो इस से घमंड, अहंकार और दूसरों को छोटा समझने की भावना पैदा होती है, जो कि नैतिक रूप से दोषपूर्ण है. यही वजह है कि बौडी शेमिंग की घटनाएं  होती रहती हैं और इस से पीड़ित के मन पर बड़ा गहरा असर पङता है जो उस की जिंदगी तक बरबाद कर देता है. यह एक अपराध है.

बौडी शेमिंग का मनोवैज्ञानिक असर

बौडी शेमिंग का मनोवैज्ञानिक असर इतना गहरा होता है कि इस का शिकार व्यक्ति आत्मविश्वास खो देता है. अपने शरीर को ले कर लोगों के ताने उस व्यक्ति को इतना प्रभावित करते हैं कि वह किसी से मिलना नहीं चाहता. उसे अपने शरीर से नफरत होने लगती है. कई लोग डिप्रैशन का शिकार हो जाते हैं.

सोशल लाइफ खत्म हो जाती है

बौडी शेमिंग की वजह से पीड़ित बाहर आनेजाने से कतराने लगता है. वह लोगों से दोस्ती करने में डरता है. फैमिली फंक्शन हो या पार्टी, हर  जगह जाने से बचता है. उसे लगता है कि अगर वह बाहर जाएगा तो हर कोई उसे देख कर बात करेगा और उस पर लोग हंसेंगे.

गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड से रिजैक्शन

बौडी शेमिंग के शिकार लोग सिर्फ अनजान लोगो से ही परेशान नहीं होते हैं, बल्कि कई बार उन के अपने, बौयफ्रैंड या गर्लफ्रैंड उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं, जिस की वजह से वे पूरी तरह से टूट जाते हैं और उन्हें लगता है कि पूरी दुनिया गंदी है. कोई प्यार नहीं करता और कोई साथ ले कर नहीं चलना चाहता.

ऐनोरेक्सिया, बुलीमिया या बिंज इटिंग जैसी बीमारियों के शिकार हो सकते हैं

बौडी शेमिंग की स्थिति में निगेटिव बौडी इमेज की वजह से हम ऐनोरेक्सिया, बुलीमिया या बिंज इटिंग जैसी बीमारियों के शिकार हो सकते हैं. ऐनोरेक्सिया में वजन बढ़ने के डर की वजह से कम खाने लगता है. वहीं बुलीमिया में व्यक्ति वेट गेन से बचने के लिए खाने के बाद उलटी करता है. इस से शरीर में न्यूट्रिऐंट्स की कमी हो जाती है. कई लोगों को ज्यादा ऐक्सरसाइज करने की आदत लग सकती है.

बौडी शेमिंग की टिप्पणियां जैसे- “क्या तुम ने वजन घटाया है? तुम पहले से बेहतर दिख रहे हो,” इस तरह की आदतों को बढ़ावा दे सकती हैं और वजन घटाने की और कोशिश करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं.

बौडी डिस्मोर्फिक डिसऔर्डर (बीडीडी)

बौडी डिस्मोर्फिक डिसऔर्डर (बीडीडी) या बौडी डिस्मोर्फिया एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है जिस में व्यक्ति अपने रूपरंग में खामियों को ले कर बहुत समय बिताता है. इस में वे अपनी बौडी को ले कर बहुत सेंसिटिव हो जाते हैं. दिनभर वे कैसे अच्छे दिख सकते हैं, यही सोचते रहते हैं. शीशे के आगे खुद को घंटों निहारते हैं.

डिप्रैशन बढ़ता है

हर रोज बाहर वालों की उपेक्षा और तानों से तंग आ कर मानसिक तनाव इतना बढ़ जाता है कि व्यक्ति डिप्रैशन का शिकार हो जाता है.

कौन्फिडेंस जीरो हो जाना

इस वजह से विश्वास खोने लगता है. उन्हें लगता है कि वे कुछ भी करने लायक नहीं हैं. यहां तक की वे अपने स्कूल कालेज की पढ़ाई तक नहीं कर पाएंगे. जौब जौइन करने में उन्हें डर लगता है.

बौडी शेमिंग से कैसे बचें

हैल्दी शरीर का थैंक्स करें : अगर आप की हाइट कम है या आप मोटी/मोटे हैं, तो क्या हुआ. यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं है. कम से कम आप की हैल्थ तो सही है, आप बीमार तो नहीं हैं. आप के शरीर के सारे अंग सही तो हैं. उन लोगों का सोचिए जो देख नहीं सकते, बोल नहीं सकते, फिर भी वे जी रहे हैं.

पौजिटिव लोगों से करें दोस्ती : अगर आप के दोस्त छोटी सोच वाले होंगे तो इस का प्रभाव सीधा आप की मैंटल हैल्थ पर पड़ेगा. इसलिए हमेशा ऐसे लोगों से दोस्ती करें जो आप के टेलैंट से आप को आंके नकि आप की बौडी से क्योंकि दोस्तों के द्वारा बौडी शेमिंग करना ज्यादा परेशान करता है.

खुद को स्वीकार करें : चाहे आप मोटी हों, काली हों या छोटी हों, यह आप का शरीर है और अगर आप को इस से फर्क नहीं पड़ता तो सामने वाले को बोलने दीजिए जो बोल रहा है. आप इसे दिल पर न लें. अगर आप को खुद से कोई दिक्कत नहीं होगी तो आप का कौन्फिडेंस देख कर और लोग भी इस बारे में बात करना बंद कर देंगे.

अचीवमेंट्स की याद दिलाएं : ऐसी परिस्थिति में आप सामने वाले व्यक्ति को अपने द्वारा प्राप्त की गई उपलब्धियों के बारे में बताएं. इस से न केवल सामने वाले व्यक्ति को अपनी गलती का एहसास होगा बल्कि वह आगे कभी आप की बौडी शेमिंग नहीं कर पाएगा.

अगर आप का कोई दोस्त या करीबी इस दर्द से गुजर रहा है, तो ऐसे में आप उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकते हैं. उन्हें समझाइए कि उन के शरीर से ज्यादा महत्त्वपूर्ण उन का दिल है. उन्हें बताइए कि उन का असली सौंदर्य उन की सोच और आत्मविश्वास में छिपा है. बौडी पौजिटिव सोच को बढ़ावा दें. बच्चों की शारीरिक बनावट पर टिप्पणी करने से बचें. उन के अंदरूनी गुणों की सराहना करें. हर तरह के शरीर के प्रति सम्मान सिखाएं. लेकिन अगर फिर भी वह बौडी शेमिंग के असर से बच नही पा रहे हैं, तो आप को साइकिएट्रिस्ट या साइकोलोजिस्ट से संपर्क करना चाहिए. ऐक्सपर्ट ऐसी कंडीशन से उबरने में मदद कर सकते हैं और इस से उन का सैल्फ कौन्फिडेंस वापस पाने में आसानी हो सकेगी.

Body Shaming

Celebrity Kids: मजबूर और बेबस मां की ढाल बने उन के सैलिब्रिटीज बच्चे

Celebrity Kids: मां और बच्चे का रिश्ता एक ऐसा पवित्र रिश्ता है जिस में कोई मिलावट नहीं. एक बार बच्चा फिर भी मां के साथ स्वार्थ के चलते या बीवी के साथ प्यार के चलते बगावत कर ले या उस को अकेला छोड़ दे, लेकिन मां कभी भी अपने बच्चे को अकेला नहीं छोड़ती. खुद भले ही गीले में सो जाए लेकिन बच्चे को कभी गले में नहीं सोने देती, इस डर से कि कहीं उस की तबीयत न खराब हो जाए.

सिर्फ इंसान ही नहीं, जानवर मादा भी अपने बच्चे को सीने से चिपकाए रखती है. कहने का मतलब यह कि हर मां अपने बच्चों के लिए हमेशा चिंतित रहती है.

ऐसे तो मांबाप दोनों ही बच्चों की परवरिश बराबर से करते हैं, लेकिन पिता के मुकाबले बच्चों की नजरों में मां का दर्जा बहुत ऊंचा होता है, वह भी ऐसी मां जिस ने अकेली, अपने दम पर कई सारी तकलीफ झेल कर अपने बच्चों को पाला हो, पति की मार खा कर भी बच्चों का जीवन सुधारा और बनाया हो.

कई मांएं ऐसी भी होती हैं जो अपना पूरा जीवन दुख पा कर भी संघर्ष करती हुईं बच्चों की जिंदगी बनाने के लिए बिता देती हैं. कई बार पति की मार खाते हुए भी, पति का बुरा व्यवहार सहते हुए भी बच्चों की खातिर दूसरी शादी नहीं करतीं और सब सहते हुए अपने बच्चों को न सिर्फ बड़ा करती हैं, बल्कि उन को कामयाब इंसान भी बनाती हैं.

ऐसे बच्चे भी अपनी मां को हर खुशी देना चाहते हैं, जिन्होंने अकेले दम पर मेहनत कर के अपने बच्चों की न सिर्फ परवरिश की, बल्कि उन्हें बेहतर और कामयाब इंसान भी बनाया.

ग्लैमर वर्ल्ड और फिल्म इंडस्ट्री में कई ऐसे बच्चे हैं, जिन्हें अपनी मां पर गर्व है और अपनी सफलता का पूरा श्रेय वे अपनी मां को देते हैं.

ग्लैमर वर्ल्ड के स्टार्स और सैलिब्रिटीज जिन्हें अपनी मां पर गर्व है

हाल ही में आर्यन खान को अपनी वैब सीरीज ‘बेड्स औफ बौलीवुड’ के लिए जब पहला अवार्ड मिला तो उन्होंने अपना यह अवार्ड अपनी मां गौरी को सब के सामने समर्पित कर दिया.

इसी तरह राखी सावंत, जो मेलोड्रामा क्वीन मानी जाती हैं, अपनी मां के इलाज के लिए खुद को भी दांव पर लगा दिया था क्योंकि उन के पास अपनी मां की इलाज के लिए पैसे नहीं थे. राखी सावंत दुनिया के लिए भले ही जैसी भी हों लेकिन उन्होंने अपनी मां की मरते दम तक सेवा की. अपनी मां को हर खुशी देने की कोशिश की.

इसी तरह संजय लीला भंसाली और करण जौहर ने मां की खातिर शादी नहीं की और अपना पूरा जीवन मां को ही समर्पित कर दिया.

गोविंदा अपनी मां से इतना प्यार करते थे कि उन के पैर धो कर पीते थे. मां के पैर के पास ही बैठे रहते थे.

61 वर्षीय कुनिका ने अकेले दम पर अपने बेटों की परवरिश की और इसलिए आज उन के बेटे अपनी मां की खुशी के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं.

फरहाना भट्ट अपने पिता से नफरत करती हैं क्योंकि उन के पिता ने फरहाना की मां को उस वक्त छोड़ दिया था जब वे सिर्फ 3 साल की थीं.

इसी तरह अर्जुन कपूर अपनी मां से बेहद प्यार करते थे क्योंकि उन की मां ने अकेले दम पर कैंसर से लड़ते हुए अर्जुन और उन की बहन की परवरिश की थी.

स्टैंडअप कौमेडियन और टीवी होस्ट मुन्नवर फारूकी अपनी मां को याद कर के बहुत रोते हैं क्योंकि चंद पैसों के लिए कर्ज न उतार पाने की वजह से मुनव्वर की मां ने आत्महत्या कर ली थी. मुनव्वर को हमेशा इस बात का दुख है कि वह अपनी मरती मां के लिए कुछ नहीं कर पाए.

इसी तरह शाहरुख और सलमान खान भी अपनी मां को बहुत प्यार करते हैं क्योंकि जब उन के टेलैंट पर कोई विश्वास नहीं करता था, उस वक्त इन दोनों सुपरस्टारों की मां ने ही दोनों हीरोज- सलमान शाहरुख को यह कह कर प्रोत्साहित किया था कि सलमान शाहरुख एक दिन इतने कामयाब होंगे कि दुनिया उन के पीछे भागेगी.

इसी तरह सारा अली खान भी अपनी मां अमृता सिंह से बहुत प्यार करती हैं क्योंकि अमृता सिंह ने सिंगल मदर के रूप में सारा और इब्राहिम दोनों बच्चों की परवरिश की.

ऐसे ही कई सैलिब्रिटीज बच्चे हैं जिन्हें अपनी मां की तकलीफ और संघर्ष का एहसास है और वे अपनी मां के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं. ये सारे कामयाब सैलिब्रिटीज अपनी मां को हर खुशी देना चाहते हैं.

ऐसे में कहना गलत न होगा कि मां के बराबर कोई नहीं.

Celebrity Kids

Hindi Love Stories : बेपनाह मुहब्बत

Hindi Love Stories : बात उन दिनों की है जब मैं प्रोमोशन और ट्रांसफर पर पंजाब के नंगल शहर से चंडीगढ़ पहुंचा था. कंपनी ने मेरे लिए सैक्टर 8 में एक अच्छे मकान की व्यवस्था कर दी थी. मकान में कारपेट ग्रास का लौन था, खूबसूरत फूलों की क्यारियां थीं. नए मकान में पहुंचने पर सामने की कोठी से लगभग 30 वर्ष की महिला किरण मुझ से मिलने आई, ‘‘मुझे जब से पता चला था कि इस मकान में आप रहने आ रहे हैं तो आप से मिलने की बहुत उत्सुकता थी. आप का इस शहर में स्वागत है. मैं सामने वाली कोठी में अपने पति और 1 छोटी बच्ची राखी के साथ रहती हूं.’’ मैं खुश था कि कोई साथ तो मिला. मेरी पत्नी वीना गर्भवती होने के कारण अपने मायके नंगल में ही रुक गई थी.

मैं ने किरण को बताया, ‘‘मेरी पत्नी अभी नंगल में ही है. डिलिवरी के बाद चंडीगढ़ ले आऊंगा.’’ किरण थर्मस में चाय ले कर आई थी. चाय को 2 कपों में डालते हुए बोली, ‘‘आशा है आप को चाय पसंद आएगी. मैं चाय अच्छी बना लेती हूं. मेरे पति उमेश को मेरे हाथों की बनी चाय बहुत अच्छी लगती है,’’ यह कहते हुए वह जिस सोफे पर मैं बैठा था उसी पर मेरे पास बैठ गई, ‘‘कांतजी, मैं ने आप का नाम बाहर लगी नेमप्लेट पर पढ़ लिया है. बहुत सुंदर नाम है आप का. मैं औपचारिकता में बिलकुल यकीन नहीं रखती हूं, इसीलिए बिना किसी हिचकिचाहट के आप के साथ बैठ गई हूं. इस से अपनेपन का एहसास होता है. हम साथसाथ चाय पीते हैं और एकदूसरे के साथ जानपहचान बनाते हैं.’’

‘‘थैंक्यू. मुझे भी आप का इस बेबाक तरीके से आना अच्छा लगा. वीना भी आप से मिल कर बहुत खुश होगी,’’ मैं ने किरण की ओर निहारते हुए कहा. किरण जाने से पहले मुझे अपने घर आने का निमंत्रण दे गई, ‘‘कल रविवार है. उमेश घर पर ही होंगे. कल लंच हमारे साथ ही करिएगा.’’ मैं ने हामी भर दी. मुझे अपनी पत्नी की गैरमौजूदगी खल रही थी. इसलिए किरण के परिवार से मेलजोल ने सोने में सुहागा का काम किया. किरण भी मेरी मौजूदगी में बेहद खुश रहती थी.  दूसरे दिन लंच पर मेरा उमेश से परिचय हुआ. सीधे, सरल और मिलनसार स्वभाव के उमेश शीघ्र ही मेरे घनिष्ठ मित्र बन गए. उन के घर मैं उन की गैरमौजूदगी में भी आताजाता रहता. उन्हें इस बात पर कोई एतराज नहीं था. उन्हें मालूम था किरण ऐसी है ही. किरण अपने चंचल स्वभाव से किसी को भी खासकर अपने हमउम्र पुरुषों को आकर्षित कर लेती थी. सजनेसंवरने में वह काफी समय बिताती थी और परपुरुषों के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर उसे बहुत अच्छा लगता था. इस विषय में उमेश रूखे थे. तभी तो किरण के इतना सजनेसंवरने के बावजूद कभी उन के मुंह से उस के लिए तारीफ के शब्द नहीं निकल पाते थे. किरण को यह बहुत खलता था.

मैं ने किरण की इस कमजोरी का पूरा फायदा उठाया. जब भी वह शृंगार कर मेरे सामने आती मेरे मुंह से यह वाक्य अनायास ही फूट पड़ता, ‘‘बहुत सुंदर लग रही हो.’’

खुश हो कर वह थैंक्यू कहती, ‘‘बस, कांतजी ऐसे ही तारीफ करते रहना.’’ जब भी वह मेरे घर आती नई साड़ी में सजीसंवरी होती. उस के पास हर रंग की साडि़यां थीं. हर बार वह अच्छा पोज देती और मैं मुसकराते हुए मोबाइल में उस के विलक्षण रूप को कैद कर लेता. उस ने मुझ से वादा लिया था कि जब कई सारे फोटो शूट हो जाएं तो मैं उन सब की 1-1 कौपी उसे भेंट कर दूं. मैं ने मुसकरा कर हामी भर दी थी.

एक दिन किरण ने मांग की, ‘‘कांतजी, अपनी पत्नी वीना का फोटो दिखाएंगे?’’

मैं ने अपने मोबाइल पर वीना का फोटो दिखाया तो बोली, ‘‘हां, सुंदर है,’’ फिर कुछ क्षण रुक कर बोली, ‘‘लेकिन मुझ से थोड़ी कम.’’ मैं ने यह मानते हुए कहा, ‘‘हां, वह सीधी और सरल है. शृंगार तो बहुत कम करती है,’’ मैं ने नोट किया कि इस बात पर वह बहुत खुश हुई. मेरी कोठी में रामलाल नामक नौकर काम करता था. अकसर किरण दिन के समय मेरे घर आ कर रामलाल से सफाई का काम करवा देती थी. दिन का खाना मैं औफिस में ही खाता था. रामलाल द्वारा रात का खाना तैयार होने के बावजूद कई बार किरण अपने घर से खाना भिजवा देती थी. किरण ने अपने बेटी राखी के लिए आया रखी थी. मैं जब भी शाम के समय उस के घर फोन कर के जाता था वह आया को बाजार कुछ खरीदने के लिए भेज चुकी होती थी. उस का कहना था हम दोनों की प्राइवेसी बनी रहे तो अच्छा होगा. वैसे भी उमेश का मार्केट में कपड़ों का शोरूम था. वे सवेरे 9 बजे जा कर रात 8 बजे के बाद ही लौटते थे. मेरा किरण से मिलनाजुलना और काफी समय साथ बिताना आसान होता चला गया. जब भी मैं उस के घर पहुंचता वह मुख्यद्वार पर इंतजार करती मिलती. मेरे पहुंचते ही कभी वह मुझे ‘हग’ कर के प्यार करती तो कभी मैं उसे प्यार करने की पहल करता. संबंध प्रगाढ़ होने के बावजूद हम दोनों ने ही कभी मर्यादा के बाहर जा कर दैहिक संबंध बनाने की चेष्टा नहीं की. इस बात को शायद किरण ने भी भविष्य की संभावनाओं के लिए स्थगित कर रखा था. मेरी ओर से इस बात की उत्सुकता अवश्य थी, क्योंकि वीना की डिलिवरी में अभी समय बाकी था. पति द्वारा नजरअंदाज होने के कारण किरण मुझ से मित्रता बढ़ाने में जोरशोर से लगी थी. जब भी उसे कोई बहाना मेरे घर आने का मिलता था तो उसे कतई छोड़ती नहीं थी. वैसे भी मेरी सेवा के द्वारा मुझे लुभाने का प्रयत्न उस की ओर से जारी था.

मुझे अपनी कंपनी के कार की सुविधा प्राप्त थी. किरण के पति उमेश के पास बाइक थी. एक बार जब कार इस्तेमाल करने के लिए किरण ने अनुरोध किया तो मैं ने उसे साफ शब्दों में समझाया, ‘‘देखो मेरी अच्छी किरण मेरी बात को अन्यथा मत लेना. मैं अपनी औफिस की कार तुम्हें अकेले कहीं जाने के लिए नहीं दे पाऊंगा. हां, कभी जरूरी हुआ तो मैं तुम्हें कार में अपने साथ ले जाऊंगा.’’ वह शीघ्र ही मेरी बात समझ गई थी. दोबारा कभी उस ने कार के लिए अनुरोध नहीं किया. एक दिन शाम के समय जब मैं औफिस से लौटा तो मैं ने देखा ड्राइंगरूम में सैंट्रल टेबल  पर एक गुलदस्ता रखा था.

रामलाल से पूछने पर उस ने बताया कि किरण मेम साहब रख गई हैं. कह रही थीं साहब को अच्छा लगेगा. उन्हें बता देना कि मैं आई थी. मैं ने मोबाइल पर किरण को धन्यवाद कहा तो वह बोली, ‘‘कांतजी, जिस दिन आप गुलदस्ता उस टेबल पर रखा देखो समझ लेना मेरी तरफ से संकेत है कि उमेशजी को घर लौटने में देर लगेगी. आप बेफिक्र मेरे पास आ सकते हो.’’ थोड़ी देर में ही मैं किरण के पास पहुंच गया. हलके आसमानी रंग की साड़ी में वह बहुत सुंदर लग रही थी. खुली बांहों में भर कर स्वागत करते हुए मेरा हाथ पकड़ कर ड्राइंगरूम में सोफे तक ले गई, ‘‘कांत, मैं तुम्हें बता नहीं सकती कि जब से तुम से मित्रता हुई है मेरी खुशी कितनी बढ़ गई है.’’

‘‘तुम बहुत ब्यूटीफुल लग रही हो. लगता है आज तुम ने मेकअप में बहुत समय लगाया है. अगर मेकअप न भी करो तो भी तुम सुंदर लगती हो.’’

‘‘तारीफ करने की कला तो कोई तुम से सीखे. तुम तारीफ करते हुए बहुत अच्छे लगते हो. बैठो जब तक मैं चाय बना कर लाती हूं तुम टीवी पर कोई मनपसंद चैनल लगा लो,’’ कहते हुए उस ने रिमोट मुझे पकड़ा दिया. थोड़ी देर में वह ट्रे में 2 कप चाय और प्लेट में बिसकुट ले आई. फिर मेरे पास बैठ गई, ‘‘कांतजी, अब मैं आप को बता रही हूं कि उमेशजी दुकान के लिए माल लेने दिल्ली गए हैं. कल लौटेंगे. हमारे पास मौजमस्ती के लिए पर्याप्त समय है. जी भर कर मेरे पास रहिए और जो मन में इच्छा हो उसे पूरी कर लीजिए. मैं पूरा सहयोग दूंगी. मैं सच्चे दिल से आप से प्यार करती हूं’’

‘‘मैं आज सीरियस मूड में हूं और तुम्हें कुछ समझाना चाहता हूं. मैं शादीशुदा हूं. वीना मुझे बहुत प्यार करती है. और मैं नहीं चाहूंगा कि उमेश की गैरमौजूदगी का मैं फायदा उठाऊं. वे मेरे अच्छे दोस्त हैं. यह तो तुम्हारे प्यार का रिस्पौंस था जो मैं मित्रता की हद से बाहर तुम्हें कभीकभी ‘हग’ कर लेता था या तुम्हें ‘हग’  करने देता था. मेरी तुम्हें सलाह है, अब हमें खुद पर नियंत्रण लगा लेना चाहिए…’’

इस से पहले कि मैं अपनी बात पूरी कर पाती उलटे उस ने ही मुझे समझाना शुरू कर दिया, ‘‘कांतजी, बी प्रैक्टिकल. मैं आप और आप की पत्नी के बीच में आए बगैर भी तो प्यार कर सकती हूं. यदि हमारा संबंध गुप्त रहे तो हरज क्या है?’’ कहने को वह यह सब कह तो गई, फिर कुछ सोच कर मुसकराते हुए बोली, ‘‘आप मुझ से उम्र में काफी बड़े हो. मुझे अभी तक इस तरह समझाने वाला कोई नहीं मिला है. आप से मित्रता और प्यार मेरी जरूरत है. पत्नी का फर्ज मैं उमेशजी के साथ पूरी ईमानदारी से निभा रही हूं और निभाती रहूंगी, लेकिन उन से प्यार कभी नहीं हो पाया है. वे सीधेसरल अवश्य हैं, लेकिन प्यार करने के लिए न तो उन के पास समय है और न ही उन की सोच में प्यार का कोई महत्त्व है. सुखसुविधाओं के अलावा एक स्त्री को शारीरिक सुख की भी चाह होती है,’’ कहती हुई वह भावुक हो गई. आंखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली.

मैं ने उसे गले लगा कर पीठ थपथपाते हुए आश्वासन दिया, ‘‘मेरी मित्रता और प्यार जितना संभव होगा बना रहेगा.’’ वीना की डिलिवरी के समय मैं 1 सप्ताह की छुट्टी ले कर उस के मायके पहुंच गया. उस ने एक प्यारी सी गुडि़या को जन्म दिया. चंडीगढ़ लौट कर पुन: मैं अपने कामकाज में व्यस्त हो गया. किरण और मेरा एकदूसरे के घर आनाजाना पहले जैसा ही था. लगभग डेढ़ माह बाद वीना को उस का भाई चंडीगढ़ मेरे पास छोड़ गया. अभी वीना को देखभाल की जरूरत थी. किरण दिन के समय वीना के पास आ जाती थी और हर काम में उस की मदद करती थी. वीना को भी किरण बहुत अच्छी लगी, तो दोनों जल्दी ही पक्की सहेलियां बन गईं. किरण ने उसे बताया कि उस की शादी 20 की होतेहोते ही हो गई थी. पुरुषों के साथ संबंध में उसे कोई अनुभव नहीं था. उस ने वीना से मेरे बारे में बेबाक तरीके से कहा, ‘‘मुझे कांतजी बहुत अच्छे लगते हैं. कुदरत ने तुम्हारी जोड़ी बहुत अच्छी बनाई है. तुम सुंदर और सरल हो. वे भी प्यार पाने और देने के लिए जल्द ही लोगों की ओर आकर्षित हो जाते हैं…एक बात बताऊं वीना भाभी…कांत का दिल बहुत सहानुभूति और दूसरों की कद्र करने वाला है.’’

वीना ने संक्षेप में बस इतना ही कहा, ‘‘मेरे कर्म अच्छे थे जो वे मुझे मेरे जीवनसाथी के रूप में मिले.’’ वीना के साथ परिचय होने के बाद हम दोनों मित्र परिवारों में मिठाई और उपहारों के आदानप्रदान का सिलसिला शुरू हो चुका था. बर्थडे और शादी की सालगिरह हम दोनों परिवार एकसाथ एक उत्सव की भांति मनाते थे. कभी किरण हमारे घर आ कर किचन में वीना की खाना बनाने में सहायता करती तो कभी घर के सामान की झाड़पोंछ में उस की मदद करती. वह चाहती थी घर के कामकाज का बोझ वीना पर न पड़े. डिलिवरी के बाद धीरेधीरे वीना का स्वास्थ्य बेहतर होता जा रहा था. इस विषय में वह किरण की तारीफ उमेश के सामने करने से नहीं चूकती थी. एक दिन उमेश बोले, ‘‘किरण है ही ऐसी. सब की मदद करने में उसे बहुत खुशी मिलती है. हमेशा मुसकरा कर मदद करने का एहसान भी नहीं जताती है.’’ पहली बार उमेश के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर किरण की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने मुझ से कहा, ‘‘आज पहली बार उमेशजी ने मेरी तारीफ में कुछ शब्द कहे हैं, तो पार्टी तो बनती ही है. आज शाम की चाय हम लोग मेरे घर पर पीएंगे,’’ मैं मान गया.

एक दिन शाम के समय जब मैं औफिस से घर लौटा तो देखा ड्राइंगरूम में टेबल पर गुलदस्ता रखा था. वीना ने बताया, ‘‘किरण यह गुलदस्ता लाई थी. कह रही थी उस का मन मेरे साथ चाय पीने का था. अभी 1 घंटा पहले ही अपने घर गई है.’’ मैं किरण की सांकेतिक भाषा समझ गया. किरण मुझ से अपने घर में मिलना चाहती है. वीना के साथ चाय पीने के बाद मैं ने वीना से कहा, ‘‘मैं औफिस के काम से 1 घंटे के लिए बाहर जा रहा हूं. 7 बजे तक आऊंगा.’’  मैं किरण के घर पहुंचा तो देखा वह मुख्यद्वार पर मेरा इंतजार कर रही थी. बड़ी बेसब्री के साथ मुझे बांहों में भर कर मेरा स्वागत किया.

फिर मुसकराते हुए शरारती लहजे में बोली, ‘‘कांतजी, मैं ने आज बहुत दिनों बाद तुम्हें घर बुला ही लिया. उमेश किसी काम से शहर से बाहर गए हुए हैं. हमें एकांत में बिताने के लिए पर्याप्त समय मिला है. बैठो मैं कुछ बना कर लाती हूं फिर ढेर सारी बातें करेंगे, प्यार भी…’’ मैं गुमसुम बैठा था. मन में विचार था कहीं वीना के प्रति नाइंसाफी तो नहीं है, जो चोरीछिपे मैं किरण से मिलने आया हूं. फिर सोचा जब मैं कुछ गलत नहीं कर रहा हूं तो पछतावा कैसा? बेशक हम दोनों एकांत में हैं, लेकिन आज हम रोमांस का कोई कृत्य नहीं करेंगे. मैं इन खयालों में खोया था कि पता ही नहीं चला कि कब वह मेरा हाथ पकड़ कर अपने बैडरूम में ले गई. बैड पर मुझे बैठाते हुए बडे़ प्यार भरे शब्दों में बोली, ‘‘आज तुम्हें मेरे साथ सोने में कोई एतराज नहीं होना चाहिए.’’ मैं किंकर्तव्यविमूढ़ बिस्तर पर लेटा शून्य में देख रहा था. तभी किरण के मोबाइल पर फोन आया. उस ने अपने होंठों पर उंगली रख कर मुझे चुप रहने का इशारा किया, ‘‘वीना भाभी का फोन है.’’

‘‘किरण, कांत किसी काम से बाहर गए हैं. मैं उन की गैरमौजूदगी में बोर हो रही थी, इसलिए तुम से बात करने का मन किया,’’ वीना ने कहा.

जवाब में किरण बोली, ‘‘उमेशजी बाहर गए हुए हैं. मैं बस रात का खाना बनाने में व्यस्त थी.’’

‘‘ऐसा करो रात का खाना हमारे यहां ही खा लेना. कांत भी 8 बजे तक लौट आएंगे. थोड़ी गपशप भी हो जाएगी.’’

किरण खुश थी कि थोड़ा और वक्त कांत के साथ बिताने को मिल जाएगा. अत: उस ने हामी भर दी. किरण और मेरे नजरिए में आधारभूत फर्क यह था कि उसे प्यार के साथ दैहिक आनंद की तलाश थी जबकि मैं मन के मिलन का सुख चाहता था. वीना के साथ वैवाहिक सुख अपनी चरम सीमा तक मुझे उपलब्ध हो चुका था. वीना की बेपनाह मुहब्बत के चलते मेरे मन में यह विचार प्रबल हो रहा था कि मुझे किरण के दिल को कोई चोट नहीं पहुंचानी है. थोड़ा प्यार उसे भी दे दूं और वीना के प्रति ईमानदारी भी रहूं. इस में वीना का भी हित है, क्योंकि किरण वीना को बहुत चाहती. मेरे प्यार द्वारा किरण जितनी खुश होगी उतना ही वीना और किरण का संबंध गहरा होगा. अपने इस विचार पर क्षण भर को मुझे हंसी भी आई. एक दिन औफिस से घर आ कर मैं ने अनायास वीना को अपने बाहुपाश में ले कर चूम लिया. वीना के लिए यह अप्रत्याशित था. बोली, ‘‘क्या बात है, आज बहुत प्यार आ रहा है?’’

‘‘तुम ने फोन पर बताया था आज किरण तुम्हारे साथ काफी समय बिता कर शाम को गई है. तुम बहुत खुश दिखाई दे रही हो… मेरी पसंद की साड़ी पहन रखी है. मेकअप भी अच्छा किया है. तुम्हें इतना सुंदर देख कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है. ऐसे ही हर शाम को सजीसंवरी और प्रसन्न मूड में मिला करो,’’ मैं ने अपने बाहुपाश से उसे मुक्त करते हुए कहा. वीना भी बहुत खुश दिखाई दे रही थी. बोली, ‘‘इतनी तैयारी इसलिए की है कि आज हमारी शादी की सालगिरह है. शायद तुम भूल गए हो. मार्केट जा कर हम दोनों एकदूसरे के लिए गिफ्ट खरीदेंगे. वहीं चायकौफी भी पी लेंगे.’’

‘‘नहीं, मैं भूला नहीं था. मैं ने भी सोच रखा था कि कुछ ऐसा ही करेंगे. मार्केट जा कर कुछ सामान सैलिब्रेट करने के लिए ले आएंगे. किरण को फोन कर लो. अगर वह भी साथ चलना चाहे तो उसे भी साथ ले लेते हैं,’’ मैं ने कहा तो वीना ने तुरंत किरण को फोन कर दिया. तीनों ने रात का भोजन साथ बाहर कर के सालगिरह सैलिब्रेट की. अगले रविवार वीना ने डिनर पर उमेश और किरण को आमंत्रित करते हुए उमेशजी से फोन पर कहा, ‘‘उमेशजी, शादी की सालगिरह वाले दिन हम लोगों ने आप को बहुत मिस किया. वह कमी पूरी करने के लिए आज रात आप किरण के साथ हमारे घर डिनर के लिए आएंगे. हां, कोई गिफ्ट लाने की जरूरत नहीं है. किरण गिफ्ट दे चुकी है.’’ शाम को उमेशजी और किरण जल्दी ही मेरे घर पहुंच गए. पहले की तरह किरण मजैंटा साड़ी में पूरे मेकअप के साथ प्रसन्न मुद्रा में थी. वीना के सामने मैं ने उस की तारीफ करना उचित नहीं समझा. फिर भी किरण ने पूछ ही लिया, ‘‘मैं कैसी लग रही हूं इस साड़ी में?’’ मन नहीं था फिर भी दबे स्वर में मैं ने कहा, ‘‘अच्छी लग रही हो.’’

मेरे कुतूहल की सीमा नहीं थी जब दफ्तर से आने पर मैं ने वीना को एक सुंदर साड़ी में पूरे शृंगार के साथ देखा. इस विषय में मैं ने फिलहाल चुप रहना ही बेहतर समझा. उमेश और किरण के घर पहुंचने पर वीना ने कहा, ‘‘उमेशजी, आज का विशेष शृंगार मैं ने आप के लिए किया है, आशा है आप को मैं सुंदर लग रही हूं. बताइए न… मैं चाहती हूं दो शब्द आप मेरी तारीफ में कहें.’’ उमेशजी को यह सब अजीब लग रहा था. मगर वीना के अनुरोध को अनसुना करना भी ठीक न था. अत: बोले, ‘‘भाभी आप बिना मेकअप किए भी और मेकअप किए भी बहुत सुंदर लगती हैं.’’

‘‘बस यही तारीफ आप किरण की भी करने की आदत डाल लीजिए,’’ कह कर उस ने उमेश का हाथ पकड़ लिया और किचन की तरफ ले जाते हुए कहा, ‘‘देवरजी, मैं ने आप के लिए खीर बनाई है. आइए, उस का स्वाद चखाती हूं.’’ किरण और मैं मौन और आश्चर्यचकित हो यह देखते रहे. जब दोनों किचन से वापस आए तो सब ने एकसाथ खाना खाया. चलते समय वीना ने उमेश से बहुत आदर के साथ कहा, ‘‘उमेशजी, स्त्री प्यार की भूखी होती है. उसे प्यार की अभिव्यक्ति होने पर बहुत सुख मिलता है. व्यापार की समृद्धि अपनी जगह और पत्नीपरिवार का सुख अपनी जगह. मेरा कहना मानो आज से किरण की तारीफ करने की आदत डाल लो. आखिर कब तक कांतजी किरण की तारीफ करते रहेंगे. यह काम तो अब आप को ही करना होगा.’’

Best Hindi Story: सफर कुछ थम सा गया

Best Hindi Story: हाथों में पत्रों का पुलिंदा पकड़े बाबूजी बरामदे के एक छोर पर बिछे तख्त पर जा बैठे. यह उन की प्रिय जगह थी.

पास ही मोंढ़े पर बैठी मां बाबूजी के कुरतों के टूटे बटन टांक रही थीं. अभीअभी धोबी कपड़े दे कर गया था. ‘‘मुआ हर धुलाई में बटन तोड़ लाता है,’’ वे बुदबुदाईं.

फिर बाबूजी को पत्र पढ़ते देखा, तो आंखें कुरते पर टिकाए ही पूछ लिया, ‘‘बहुत चिट्ठियां आई हैं. कोई खास बात…?’’

एक चिट्ठी पढ़तेपढ़ते बाबूजी का चेहरा खिल उठा, ‘‘सुनती हो, लड़के वालों ने हां कर दी. उन्हें जया बहुत पसंद है.’’

मां बिजली की गति से हाथ का काम तिपाई पर पटक तख्त पर आ बैठीं, ‘‘फिर से तो कहो. नहीं, ऐसे नहीं, पूरा पढ़ कर सुनाओ.’’

पल भर में पूरे घर में खबर फैल गई कि लड़के वालों ने हां कर दी. जया दीदी की शादी होगी…

‘‘ओ जया, वहां क्यों छिपी खड़ी है? यहां आ,’’ भाईबहनों ने जया को घेर लिया.

मांबाबूजी की भरीपूरी गृहस्थी थी.

5 बेटियां, 3 बेटे. इन के अलावा उन के चचेरे, मौसेरे, फुफेरे भाईबहनों में से कोई न कोई आता ही रहता. यहां रह कर पढ़ने के लिए

2-3 बच्चे हमेशा रहते. बाबूजी की पुश्तैनी जमींदारी थी पर वे पढ़लिख कर नौकरी में लग गए थे. अंगरेजों के जमाने की अच्छी सरकारी नौकरी. इस से उन का समाज में रुतबा खुदबखुद बढ़ गया था. फिर अंगरेज चले गए पर सरकारी नौकरी तो थी और नौकरी की शान भी.

मांबाबूजी खुले विचारों के और बच्चों को ऊंची शिक्षा दिलाने के पक्ष में थे. बड़े बेटे और 2 बेटियों का तो विवाह हो चुका था. जया की एम.ए. की परीक्षा खत्म होते ही लड़के वाले देखने आ गए. सूरज फौज में कैप्टन पद पर डाक्टर था. ये वे दिन थे, जब विवाह के लिए वरदी वाले लड़कों की मांग सब से ज्यादा थी. कैप्टन सूरज, लंबा, स्मार्ट, प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला था.

शादी से 2 महीने पहले ही घर में उस की तैयारियां जोरशोर से होने लगीं. मां ने दोनों ब्याही बेटियों को महीना भर पहले बुला लिया. बेटाबहू तो यहां थे ही. घर में रौनक बढ़ गई. 15 दिन पहले ढोलक रख दी गई. तब तक छोटी मामी, एक चाची, ताई की बड़ी बहू आ चुकी थीं. रात को खानापीना निबटते ही महल्ले की महिलाएं आ जुटतीं. ढोलक की थाप, गूंजती स्वरलहरियां, घुंघरुओं की छमछम, रात 1-2 बजे तक गानाबजाना, हंसीठिठोली चलती.

सप्ताह भर पहले सब मेहमान आ गए. बाबूजी ने बच्चों के लीडर छोटे भाई के बेटे विशाल को बुला कर कहा, ‘‘सड़क से हवेली तक पहुंचने का रास्ता, हवेली और मंडप सजाने का जिम्मा तुम्हारा. क्रेप पेपर, चमकीला पेपर, गोंद वगैरह सब चीजें बाजार से ले आओ. बच्चों को साथ ले लो. बस, काम ऐसा करो कि देखने वाले देखते रह जाएं.’’

विशाल ने सब बच्चों को इकट्ठा किया. निचले तल्ले का एक कमरा वर्कशौप बना. कोई कागज काटता, कोई गोंद लगाता, तो कोई सुतली पर चिपकाता. विवाह के 2 दिन पहले सारी हवेली झिलमिला उठी.

‘‘मां, हम तो वरमाला कराएंगे,’’ दोनों बड़ी बेटियों ने मां को घेर लिया.

‘‘बेटी, यह कोई नया रिवाज है क्या? हमारे घर में आज तक नहीं हुआ. तुम दोनों के वक्त कहां हुआ था?’’

‘‘अब तो सब बड़े घरों में इस का

चलन हो गया है. इस में बुराई क्या है?

रौनक बढ़ जाती है. हम तो कराएंगे,’’ बड़ी बेटी ने कहा.

फिर मां ने बेटियों की बात मान ली तो जयमाला की रस्म हुई, जिसे सब ने खूब ऐंजौय किया.

सूरज की पोस्टिंग पुणे में थी. छुट्टियां खत्म होने पर वह जया को ले कर पुणे आ गया. स्टेशन पर सूरज का एक दोस्त जीप ले कर हाजिर था. औफिसर्स कालोनी के गेट के अंदर एक सिपाही ने जीप को रोकने का इशारा किया. रुकने पर उस ने सैल्यूट कर के सूरज से कहा, ‘‘सर, साहब ने आप को याद किया है. घर जाने से पहले उन से मिल लें.’’

सूरज ने सवालिया नजर से दोस्त की तरफ देखा और बोला, ‘‘जया…?’’

‘‘तुम भाभी की चिंता मत करो. मैं इन्हें घर ले जाता हूं.’’

सूरज चला गया. फिर थोड़ी देर बाद  जीप सूरज के घर के सामने रुकी.

‘‘आओ भाभी, गृहप्रवेश करो. चलो,

मैं ताला खोलता हूं. अरे, दरवाजा तो अंदर से बंद है.’’

दोस्त ने घंटी बजाई. दरवाजा खुला तो 25-26 साल की एक स्मार्ट महिला गोद में कुछ महीने के एक बच्चे को लिए खड़ी दिखी.

‘‘कहिए, किस से मिलना है?’’

दोस्त हैरान, जया भी परेशान.

‘‘आप? आप कौन हैं और यहां क्या कर रही हैं?’’ दोस्त की आवाज में उलझन थी.

‘‘कमाल है,’’ स्त्री ने नाटकीय अंदाज में कहा, ‘‘मैं अपने घर में हूं. बाहर से आप आए और सवाल मुझ से कर रहे हैं?’’

‘‘पर यह तो कैप्टन सूरज का घर है.’’

‘‘बिलकुल ठीक. यह सूरज का ही घर है. मैं उन की पत्नी हूं और यह हमारा बेटा. पर आप यह सब क्यों पूछ रहे हैं?’’

दोस्त ने जया की तरफ देखा. लगा, वह बेहोश हो कर गिरने वाली है. उस ने लपक कर जया को संभाला, ‘‘भाभी, संभालिए खुद को,’’ फिर उस महिला से कहा, ‘‘मैडम, कहीं कोई गलतफहमी है. सूरज तो शादी कर के अभी लौटा है. ये उस की पत्नी…’’

दोस्त की बात खत्म होने से पहले ही वह चिल्ला उठी, ‘‘सूरज अपनी आदत से बाज नहीं आया. फिर एक और शादी कर डाली. मैं कब तक सहूं, तंग आ गई हूं उस की इस आदत से…’’

जया को लगा धरती घूम रही है, दिल बैठा जा रहा है. ‘यह सूरज की पत्नी और उस का बच्चा, फिर मुझ से शादी क्यों की? इतना बड़ा धोखा? यहां कैसे रहूंगी? बाबूजी को फोन करूं…’ वह सोच में पड़ गई.

तभी एक जीप वहां आ कर रुकी. सूरज कूद कर बाहर आया. दोस्त और जया को बाहर खड़ा देख वह हैरान हुआ, ‘‘तुम दोनों इतनी देर से बाहर क्यों खड़े हो?’’

तभी उस की नजर जया पर पड़ी. चेहरा एकदम सफेद जैसे किसी ने शरीर का सारा खून निचोड़ लिया हो. वह लपक कर जया के पास पहुंचा. जया दोस्त का सहारा लिए 2 कदम पीछे हट गई.

‘‘जया…?’’ इसी समय उस की नजर घर के दरवाजे पर खड़ी महिला पर पड़ी.

वह उछल कर दरवाजे पर जा पहुंचा,

‘‘आप? आप यहां क्या कर रही हैं? ओ नो… आप ने अपना वार जया पर भी चला दिया?’’

औरत खिलखिला उठी.

थोड़ी देर बाद सभी लोग सूरज के ड्राइंगरूम में बैठे हंसहंस कर बातें कर रहे थे. वही महिला चाय व नाश्ता ले कर आई, ‘‘क्यों जया, अब तो नाराज नहीं हो? सौरी, बहुत धक्का लगा होगा.’’

इस फौजी कालोनी में यह एक रिवाज सा बन गया था. किसी भी अफसर की शादी हो, लोग नई बहू की रैगिंग जरूर करते थे. सूरज की पत्नी बनी सरला दीक्षित और रीना प्रकाश ऐसे कामों में माहिर थीं. कहीं पहली पत्नी बन, तो किसी को नए पति के उलटेसीधे कारनामे सुना ऐसी रैगिंग करती थीं कि नई बहू सारी उम्र नहीं भूल पाती थी. इस का एक फायदा यह होता था कि नई बहू के मन में नई जगह की झिझक खत्म हो जाती थी.

जया जल्द ही यहां की जिंदगी की अभ्यस्त हो गई. शनिवार की शाम क्लब जाना, रविवार को किसी के घर गैटटुगैदर. सूरज ने जया को अंगरेजी धुनों पर नृत्य करना भी सिखा दिया. सूरज और जया की जोड़ी जब डांसफ्लोर पर उतरती तो लोग देखते रह जाते. 5-6 महीने बीततेबीतते जया वहां की सांस्कृतिक गतिविधियों की सर्वेसर्वा बन गई. घरों में जया का उदाहरण दिया जाने लगा.

खुशहाल थी जया की जिंदगी. बेहद प्यार करने वाला पति. ऐक्टिव रहने के लिए असीमित अवसर. बड़े अफसरों की वह लाडली बेटी बन गई. कभीकभी उसे वह पहला दिन याद आता. सरला दीक्षित ने कमाल का अभिनय किया था. उस की तो जान ही निकल गई थी.

2 साल बाद नन्हे उदय का जन्म हुआ तो उस की खुशियां दोगुनी हो गईं. उदय एकदम सूरज का प्रतिरूप. मातृत्व की संतुष्टि ने जया की खूबसूरती को और बढ़ा दिया. सूरज कभीकभी मजाक करता, ‘‘मेम साहब, क्लब के काम, घर के काम और उदय के अलावा एक बंदा यह भी है, जो घर में रहता है. कुछ हमारा भी ध्यान…’’

जया कह उठती, ‘‘बताओ तो, तुम्हारी अनदेखी कब की? सूरज, बाकी सब बाद  में… मेरे दिल में पहला स्थान तो सिर्फ तुम्हारा है.’’

सूरज उसे बांहों में भींच कह उठता, ‘‘क्या मैं यह जानता नहीं?’’

उदय 4 साल का होने को आया. सूरज अकसर कहने लगा, ‘‘घर में तुम्हारे जैसी गुडि़या आनी चाहिए अब तो.’’

एक दिन घर में घुसते ही सूरज चहका, ‘‘भेलपूरी,’’ फिर सूंघते हुए किचन में चला आया, ‘‘जल्दी से चखा दो.’’

भेलपूरी सूरज की बहुत बड़ी कमजोरी थी. सुबह, दोपहर, शाम, रात भेलपूरी खाने को वह हमेशा तैयार रहता.

सूरज की आतुरता देख जया हंस दी, ‘‘डाक्टर हो, औरों को तो कहते हो बाहर से आए हो, पहले हाथमुंह धो लो फिर कुछ खाना और खुद गंदे हाथ चले आए.’’

सूरज ने जया के सामने जा कर मुंह खोल दिया, ‘‘तुम्हारे हाथ तो साफ हैं. तुम खिला दो.’’

‘‘तुम बच्चों से बढ़ कर हो,’’ हंसती जया ने चम्मच भर भेलपूरी उस के मुंह में डाल दी.

‘‘कमाल की बनी है. मेज पर लगाओ. मैं हाथमुंह धो कर अभी हाजिर हुआ.’’

‘‘एक प्लेट से मेरा क्या होगा. और दो भई,’’ मेज पर आते ही सूरज ने एक प्लेट फटाफट चट कर ली.

तभी फोन की घंटी टनटना उठी. फोन सुन सूरज गंभीर हो गया, ‘‘मुझे अभी जाना होगा. हमारा एक ट्रक दुर्घटनाग्रस्त हो गया. हमारे कुछ अफसर, कुछ जवान घायल हैं.’’

जया भेलपूरी की एक और प्लेट ले आई और सूरज की प्लेट में डालने लगी तो ‘‘जानू, अब तो आ कर ही खाऊंगा. मेरे लिए बचा कर रखना,’’ कह सूरज बाहर जीप में जा बैठा.

ट्रक दुर्घटना जया की जिंदगी की भयंकर दुर्घटना बन गई. फुल स्पीड से जीप भगाता सूरज एक मोड़ के दूसरी तरफ से आते ट्रक को नहीं देख सका. हैड औन भिडंत. जीप के परखचे उड़ गए. जीप में सवार चारों लोगों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

जया की पीड़ा शब्दों में बयां नहीं की जा सकती. वह 3 दिन बेहोश रही. घर मेहमानों से भर गया. पर चारों ओर मरघट सा सन्नाटा. घर ही क्यों, पूरी कालोनी स्तब्ध.

जया की ससुराल, मायके से लोग आए. उन्होंने जया से अपने साथ चलने की बात भी कही. लेकिन उस ने कहीं भी जाने से इनकार कर दिया. सासससुर कुछ दिन ठहर चले गए.

जया एकदम गुमसुम हो गई. बुत बन गई. बेटे उदय की बातों तक का जवाब नहीं. वह इस सचाई को बरदाश्त नहीं कर पा रही थी कि सूरज चला गया है, उसे अकेला छोड़. जीप की आवाज सुनते ही आंखें दरवाजे की ओर उठ जातीं.

इंसान चला जाता है पर पीछे कितने काम छोड़ जाता है. मृत्यु भी अपना हिसाब मांगती है. डैथ सर्टिफिकेट, पैंशन, बीमे का काम, दफ्तर के काम. जया ने सब कुछ ससुर पर छोड़ दिया. दफ्तर वालों ने पूरी मदद की. आननफानन सब फौर्मैलिटीज पूरी हो गईं.

इस वक्त 2 बातें एकसाथ हुईं, जिन्होंने जया को झंझोड़ कर चैतन्य कर दिया. सूरज के बीमे के क्व5 लाख का चैक जया के नाम से आया. जया ने अनमने भाव से दस्तखत कर ससुर को जमा कराने के लिए दे दिया.

एक दिन उस ने धीमी सी फुसफुसाहट सुनी, ‘‘बेटे को पालपोस कर हम ने बड़ा किया, ये 5 लाख बहू के कैसे हुए?’’ सास का स्वर था.

‘‘सरकारी नियम है. शादी के बाद हकदार पत्नी हो जाती है,’’ सास ने कहा.

‘‘बेटे की पत्नी हमारी बहू है. हम जैसा चाहेंगे, उसे वैसा करना होगा. जया हमारे साथ जाएगी. वहां देख लेंगे.’’

जया की सांस थम गई. एक झटके में उस की आंख खुल गई. ऐसी मन:स्थिति में उस ने उदय को अपने दोस्त से कहते सुना, ‘‘सब कहते हैं पापा मर गए. कभी नहीं आएंगे. मुझ से तो मेरी मम्मी भी छिन गईं… मुझ से बोलती नहीं, खेलती नहीं, प्यार भी नहीं करतीं. दादीजी कह रही थीं हमें अपने साथ ले जाएंगी. तब तो तू भी मुझ से छिन जाएगा…’’

पाषाण बनी जया फूटफूट कर रो पड़ी. उसे क्या हो गया था? अपने उदय के प्रति इतनी बेपरवाह कैसे हो गई? 4 साल के बच्चे पर क्या गुजर रही होगी? उस के पापा चले गए तो मुझे लगा मेरा दुख सब से बड़ा है. मैं बच्चे को भूल गई. यह तो मुरझा जाएगा.

उसी दिन एक बात और हुई. शाम को मेजर देशपांडे की मां जया से मिलने आईं. वे जया को बेटी समान मानती थीं. वे जया के कमरे में ही आ कर बैठीं. फिर इधरउधर की बातों के बाद बोलीं, ‘‘खबर है कि तुम सासससुर के साथ जा रही हो? मैं तुम्हारीकोई नहीं होती पर तुम से सगी बेटी सा स्नेह हो गया है, इसलिए कहती हूं वहां जा कर तुम और उदय क्या खुश रह सकोगे? सोच कर देखो, तुम्हारी जिंदगी की शक्ल क्या होगी? तुम खुल कर जी पाओगी? बच्चा भी मुरझा जाएगा.

‘‘तुम पढ़ीलिखी समझदार हो. पति चला गया, यह कड़वा सच है. पर क्या तुम में इतनी योग्यता नहीं है कि अपनी व बच्चे की जिंदगी संभाल सको? अभी पैसा तुम्हारा है, कल भी तुम्हारे पास रहेगा, यह भरोसा मत रखना. पैसा है तो कुछ काम भी शुरू कर सकती हो. काम करो, जिंदगी नए सिरे से शुरू करो.’’

जया ने सोचा, ‘दुख जीवन भर का है. उस से हार मान लेना कायरता है. सूरज ने हमेशा अपने फैसले खुद करने का मंत्र मुझे दिया. मुझे उदय की जिंदगी बनानी है. आज के बाद अपने फैसले मैं खुद करूंगी.’

4 साल बीत गए. जया खुश है. उस दिन उस ने हिम्मत से काम लिया. जया का नया आत्मविश्वासी रूप देख सासससुर दोनों हैरान थे. उन की मिन्नत, समझाना, उग्र रूप दिखाना सब बेकार गया. जया ने दोटूक फैसला सुना दिया कि वह यहीं रहेगी. सासससुर खूब भलाबुरा कह वहां से चले गए.

जया ने वहीं आर्मी स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया. इस से उसे घर भी नहीं छोड़ना पड़ा. जड़ों से उखड़ना न पड़े तो जीना आसान हो जाता है. अपने ही घर में रहते, अपने परिचित दोस्तों के साथ पढ़तेखेलते उदय पुराने चंचल रूप में लौट आया.

मेजर शांतनु देशपांडे ने उसे सूरज की कमी महसूस नहीं होने दी. स्कूल का होमवर्क, तैरना सिखाना, क्रिकेट के दांवपेच, शांतनु ने सब संभाला. उदय खिलने लगा. उदय को खुश देख जया के होंठों की हंसी भी लौटने लगी.

शाम का समय था. उदय खेलने चला गया था. जया बैठी जिंदगी के उतारचढ़ाव के बारे में सोच रही थी. जिंदगी में कब, कहां, क्या हो जाए, उसे क्या पहले जाना जा सकता है? मैं सूरज के बगैर जी पाऊंगी, सोच भी नहीं सकती थी. लेकिन जी तो रही हूं. छोटे उदय को मैं ने चलना सिखाया था. अब लगता है उस ने मुझे चलना सिखाया. देशपांडे ने सच कहा था जीवन को नष्ट करने का अधिकार मानव को नहीं है. इसे संभाल कर रखने में ही समझदारी है.

शुरू के दिनों को याद कर के जया आज भी सिहर उठी. वैधव्य का बोझ, कुछ करने का मन ही नहीं होता था. पर काम तो सभी करने थे. घर चलाना, उदय का स्कूल, स्कूल में पेरैंट टीचर मीटिंग, घर की छोटीबड़ी जिम्मेदारियां, कभी उदय बीमार तो कभी कोई और परेशानी. आई और शांतनु का सहारा न होता तो बहुत मुश्किल होती.

शांतनु का नाम याद आते ही मन में सवाल उठा, ‘पता नहीं उन्होंने अब तक शादी क्यों नहीं की? हो सकता है प्रेम में चोट खाई हो. आई से पूछूंगी.’

जया उठ कर अपने कमरे में चली आई पर उस का सोचना बंद नहीं हुआ. ‘मैं शांतनु पर कितनी निर्भर हो गई हूं, अनायास ही, बिना सोचेसमझे. वे भी आगे बढ़ सब संभाल लेते हैं. पिछले कुछ समय से उन के व्यवहार में हलकी सी मुलायमियत महसूस करने लगी हूं. ऐसा लगता है जैसे कोई मेरे जख्मों पर मरहम लगा रहा है. उदय का तो कोई काम अंकल के बिना पूरा नहीं होता. क्यों कर रहे हैं वे इतना सब?’

शाम को जया बगीचे में पानी दे रही थी. उदय साथसाथ सूखे पत्ते, सूखी घास निकालता जाता. अचानक वह जया की ओर देखने लगा.

‘‘ऐसे क्या देख रहा है? मेरे सिर पर क्या सींग उग आए हैं?’’

उदय उत्तेजित सा उठ कर खड़ा हो गया, ‘‘मम्मी, मुझे पापा चाहिए.’’

जया स्तब्ध रह गई. उस के कुछ कहने से पहले ही उदय कह उठा, ‘‘अब मैं शांतनु अंकल को अंकल नहीं पापा कहूंगा,’’ और फिर वह घर के भीतर चला गया.

उस रात जया सो नहीं पाई. उदय के मन में आम बच्चों की तरह पापा की कमी कितनी खटक रही है, क्या वह जानती नहीं. जब सूरज को खोया था उदय छोटा था, तो भी जो छवि उस के नन्हे से दिल पर अंकित थी, वह प्यार करने, हर बात का ध्यान रखने वाले पुरुष की थी. उस की बढ़ती उम्र की हर जरूरत का ध्यान शांतनु रख रहे थे. उन की भी वैसी ही छवि उदय के मन में घर करती जा रही थी.

आई और शांतनु भी यही चाहते हैं. इशारों में अपनी बात कई बार कह चुके हैं. वही कोई फैसला करने से बचती रही है.

क्या करूं? नई जिंदगी शुरू करना गलत तो नहीं. शांतनु एक अच्छे व सुलझे इंसान हैं.

उदय को बेहद चाहते हैं. आई और शांतनु दोनों मेरा अतीत जानते हैं. शादी के बाद जब यहां आई थी, तब से जानते हैं. अभी दोनों परिवार बिखरे, अधूरेअधूरे से हैं. मिल जाएं तो पूर्ण हो जाएंगे.

वसंतपंचमी के दिन आई ने जया व उदय को खाने पर बुलाया. उदय जल्दी मचा कर शाम को ही जया को ले वहां पहुंच गया. जया ने सोचा, जल्दी पहुंच मैं आई का हाथ बंटा दूंगी.

आई सब काम पहले से ही निबटा चुकी थीं. दोनों महिलाएं बाहर बरामदे में आ बैठीं. सामने लौन में उदय व शांतनु बैडमिंटन खेल रहे थे. खेल खत्म हुआ तो उदय भागता

बरामदे में चला आया और आते ही बोला, ‘‘मैं अंकल को पापा कह सकता हूं? बोलो

न मम्मी, प्लीज?’’

जया शर्म से पानीपानी. उठ कर एकदम घर के भीतर चली आई. पीछेपीछे आई भी आ गईं. जया को अपने कमरे में ला बैठाया.

‘‘बिटिया, जो बात हम मां बेटा न कह सके, उदय ने कह दी. शांतनु तुम्हें बहुत

चाहता है. तुम्हारे सामने सारी जिंदगी पड़ी है. उदय को भी पिता की जरूरत है और मुझे भी तो बहू चाहिए,’’ आई ने जया के दोनों हाथ पकड़ लिए, ‘‘मना मत करना.’’

जया के सामने नया संसार बांहें पसारे खड़ा था. उस ने लजा कर सिर झुका लिया. आई को जवाब मिल गया. उन्होंने अलमारी खोल सुनहरी साड़ी निकाल जया को ओढ़ा दी और डब्बे में से कंगन निकाल पहना दिए. जया मोम की गुडि़या सी बैठी थी.

उसी समय उदय अंदर आया. वहां का नजारा देख वह चकित रह गया. आई ने कहा, ‘‘कौन, उदय है न? जा तो बेटा, अपने पापा को बुला ला.’’

‘‘पापा,’’ खुशी से चिल्लाता उदय बाहर भागा.

जया की आंखें लाज से उठ नहीं रही थीं. आई ने शांतनु से कहा, ‘‘मैं ने अपने

लिए बहू ढूंढ़ ली है. ले, बहू को अंगूठी पहना दे.’’

शांतनु पलक झपकते सब समझ गया. यही तो वह चाह रहा था. मां से अंगूठी ले उस ने जया की कांपती उंगली में पहना दी.

‘‘पापा, अब आप मेरे पापा हैं. मैं आप को पापा कहूंगा,’’ कहता उदय लपक कर शांतनु के सीने से जा लगा.

Best Hindi Story

Drama Story: अलविदा: आखिर क्या चाहती थी पूजा

Drama Story: पूजा सुबह से गुमसुम बैठी थी. आज उस की छोटी बहन आरती दिल्ली से वापस लौट रही थी. उस को आरती के वापस आने की सूचना रात को ही मिल चुकी थी. साथ ही इस बात की भनक भी मिल गई थी कि लड़के ने आरती को पसंद कर लिया है और आरती ने भी अपने विवाह की स्वीकृति दे दी है. उस को लगा था कि इस स्वीकृति ने न केवल उस के साथ अन्याय ही किया?है, बल्कि उस के भविष्य को भी तहसनहस कर डाला है.

पूजा आरती से 4 वर्ष बड़ी?थी लेकिन आरती अपने स्वभाव, रूप एवं गुणों के कारण उस से कहीं बढ़ कर थी. वह एक स्कूल में अध्यापिका थी. विवाह में देरी होने के कारण पूजा का स्वभाव काफी चिड़चिड़ा हो गया था. हर किसी से लड़ाईझगड़ा करना उस की आदत बन चुकी थी. उन के पिता दोनों पुत्रियों के विवाह को ले कर अत्यंत चिंतित थे. इसलिए बड़े बेटों को भी उन्होंने विवाह की आज्ञा नहीं दी थी. उन्हें भय था कि पुत्र अपने विवाह के पश्चात युवा बहनों के विवाह में दिलचस्पी ही नहीं लेंगे.

पितापुत्र आएदिन अखबारों में पूजा के विवाह के लिए विज्ञापन देते रहते. कभी पूजा के मातापिता, कभी पूजा स्वयं लड़के को और कभी पूजा को लड़के वाले नापसंद कर जाते और बात वहीं की वहीं रह जाती. वर्ष दर वर्ष बीतते चले गए, लेकिन पूजा का विवाह तय नहीं हो पाया. वह अब पड़ोस में जा कर आरती की बुराइयां करने लगी थी. एक दिन पूजा सामने वाली उषा दीदी के घर जा कर रोने लगी, ‘‘दीदी, मेरे लिए जितने भी अच्छे रिश्ते आते हैं वे सब मुझे ठुकरा कर आरती को पसंद कर लेते हैं. इसीलिए मुझे आरती की शक्ल से भी नफरत हो गई है. मैं ने भी पक्का फैसला कर रखा है कि जब तक मेरा विवाह नहीं होगा, मैं आरती का विवाह भी नहीं होने दूंगी.’’

उषा दीदी पूजा को समझाने लगीं, ‘‘यदि तुम्हारे विवाह से पहले आरती का विवाह हो भी जाए तो क्या हर्ज है? शायद आरती की ससुराल की रिश्तेदारी में तुम्हारे लिए भी कोई अच्छा वर मिल जाए. ऐसे जिद कर के आरती का जीवन बरबाद करना उचित नहीं.’’ लेकिन पूजा का एक ही तर्क था, ‘जब मैं बरबाद हो रही हूं तो दूसरों को क्यों आबाद होने दूं.’ 2 वर्ष तक लाख जतन करने के बाद भी जब पूजा का विवाह निश्चित नहीं हुआ तो वह काफी हद तक निराश हो गई थी.

आरती अध्यापन कार्य करने के पश्चात शाम को घर पर भी ट्यूशन पढ़ा कर अपनेआप को व्यस्त रखती. पूजा सुबह से शाम तक मां के साथ घरगृहस्थी के कार्यों में उलझी रहती. वह यह भी भूल गई थी कि अधिक पकवान, चाटपकौड़ी खाने से उस का शरीर बेडौल होता जा रहा?था. लोग पूजा को देख कर हंसते तो वह कुढ़ कर कहती, ‘‘बाप की कमाई खा रही हूं, जलते हो तो जलो लेकिन मेरी सेहत पर कुछ भी असर नहीं पड़ेगा.’’ पिता ने हार कर अपने दोनों बड़े पुत्रों की शादियां कर दी?थीं. बड़े बेटे का एक मित्र मनोज उन के परिवार का बड़ा ही हितैषी?था. उस ने आरती से शादी करने के लिए अपने एक अधीनस्थ सहयोगी को राजी कर लिया था.

मनोज ने आरती के पिता से कहा, ‘‘चाचाजी, आप चाहें तो आरती का रिश्ता आज ही तय कर देते हैं.’’ पिता ने उत्तर दिया, ‘‘बेटा, आरती तुम्हारी अपनी बहन है. मैं कल ही किसी बहाने आरती को तुम्हारे साथ अंबाला भेज दूंगा.’’ चूंकि मनोज का परिवार भी अंबाला में रहता था, इसलिए आरती के बड़े भाई तथा मनोज के परिवार के लोगों ने ज्यादा शोर किए बगैर आरती के शगुन की रस्म अदा कर दी. विवाह की तारीख भी निश्चित कर दी. चंडीगढ़ में पूजा को इस संबंध में कुछ नहीं बताया गया था. घर में सारे कार्य गुप्त रूप से किए जा रहे थे, ताकि पूजा किसी प्रकार की अड़चन पैदा न कर सके.

अचानक एक दिन पूजा को एक पत्र बरामदे में पड़ा हुआ मिला. वह उत्सुकतावश पत्र को एक सांस में ही पढ़ गई. पत्र के अंत में लिखा था, ‘आरती की गोदभराई की रस्म के लिए हम लोग रविवार को 4 बजे पहुंच रहे हैं.’ पढ़ते ही पूजा के मन में जैसे हजारों बिच्छू डंक मार गए. उस से झूठ बोला गया कि अंबाला में मनोज के बच्चे की तबीयत ज्यादा खराब होने की वजह से आरती को वहां भेजा गया था. उसे लगा कि इस घर के सब लोग बहुत ही स्वार्थी हैं. उस ने पत्र से अंबाला का पता डायरी में लिखा और पत्र को फाड़ कर कूड़ेदान में फेंक दिया.

2 दिन के पश्चात लड़के के पिता के हाथ में एक चिट्ठी थी, जिस में लिखा था, ‘आरती मंगली लड़की है. यदि इस से आप ने पुत्र का विवाह किया तो लड़का शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होगा.’ पत्र पढ़ते ही उस परिवार में श्मशान जैसी खामोशी छा गई. वे लोग सीधे मनोज के घर पहुंच गए. लड़के के पिता गुस्से से बोले, ‘‘आप जानते थे कि लड़की मंगली है, फिर आप ने हमारे परिवार को ही बरबाद करने का क्यों निश्चय किया? मैं इस रिश्ते को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं कर सकता.’’

मनोज ने उन लोगों को समझाने का काफी प्रयत्न किया, लेकिन बिगड़ी बात संवर न सकी. चंडीगढ़ से पूजा के बड़े भाई को अंबाला बुला कर सारी स्थिति से अवगत कराया गया. पत्र देखने पर पता चला कि यह पूजा की लिखावट नहीं है. उस के पास तो अंबाला का पता ही नहीं था और न ही आरती के रिश्ते की बात की उसे कोई जानकारी थी. चंडीगढ़ आने पर बड़े भैया उदास एवं दुखी थे. पूजा से इस बात की चर्चा करना बेकार था. घर का वातावरण एक बार फिर खामोश हो चुका था.

उषा दीदी की बड़ी लड़की नीलू, पूजा से सिलाई सीखने आती थी. एक दिन कहने लगी, ‘‘पूजा दीदी, आप ने जो चिट्ठी किसी को बेवकूफ बनाने के लिए लिखवाई थी, उस का क्या हुआ?’’ आरती के कानों में इस बात की भनक पड़ गई और वह झटपट मां तथा?भाई को बताने भाग गई. 2 दिन पश्चात पूजा की मां ने उषा के घर जा कर नीलू से सारी बात उगलवा ली कि पूजा दीदी ने ही मनोज भाई साहब के रिश्तेदारों को तंग करने के लिए उस से चिट्ठी लिखवाई थी.

आरती और पूजा में बोलचाल बंद हो गई लेकिन फिर धीरेधीरे घर का वातावरण सामान्य हो गया. पूजा और आरती चुपचाप अपनेअपने कामों में लगी रहतीं. आरती स्कूल जाती और फिर शाम को ट्यूशन पढ़ाती. पूजा उसे अच्छ-अच्छे कपड़ोंजेवरों में देख कर कुढ़ती और फिर उस का गुस्सा उतरता अपनी भाभियों तथा बूढ़े पिता पर, ‘‘मैं पैदा ही तुम्हारी गुलामी करने के लिए हुई थी. क्यों नहीं रख लेते मेरे स्थान पर एक माई.’’ स्कूल की अध्यापिकाएं आरती को समझातीं, ‘‘अब भी समय है, यदि कोई लड़का तुम्हें पसंद कर ले तो तुम स्वयं ही कोशिश कर के विवाह कर लो.’’ आरती की एक सखी ने अपने ममेरे भाई के लिए उसे राजी कर लिया था और उस के साथ स्वयं दिल्ली जा कर उस का विवाह तय कर आई थी.

आरती की शादी की बात पूजा को बता दी गई थी. पूजा ने केवल एक ही शर्त रखी थी, ‘आरती की शादी में जितना खर्च होगा, उस से दोगुना धन मेरे नाम से बैंक में जमा कर दो ताकि मैं अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त हो जाऊं.’ विवाह का दिन नजदीक आता जा रहा था. बाहरी रूप से पूजा एकदम सामान्य दिखाई दे रही थी. पिता ने मोटी रकम पूजा के नाम बैंक में जमा करवा दी थी. आरती को उपहार देने के लिए पूजा ने अपने विवाह के लिए रखी हुई 2 बेहद सुंदर चादरें व गुड्डेगुडि़या का जोड़ा निकाल लिया था तथा छोटीमोटी अन्य कई कशीदाकारी की चीजें भी थीं. आरती के विवाह का दिन आ गया.

पूजा सुबह से ही भागदौड़ में लगी थी. घर मेहमानों से खचाखच भरा था, इसलिए दहेज के सामान का कमरा ऊपर की मंजिल पर निश्चित हुआ था और विदा से पूर्व दूल्हादुलहन उस में आराम भी कर सकते थे. उस कमरे की चाबी आरती की बड़ी भाभी को दे दी गई थी. पूजा ने सामान्य सा सूट पहन रखा था. उस की मां ने 2-3 बार गुस्से से उसे डांटा भी, ‘‘आज भी ढंग के कपड़े नहीं पहनने तो फिर 4 सूट बनवाने की जरूरत ही क्या थी?’’ पूजा ने पलट कर जवाब दिया, ‘‘अब सूट बदलने का क्या फायदा. मुझे कई काम निबटाने हैं.’’ मां बड़ी खुश हुईं कि इस के मन में कोई मलाल नहीं. बेचारी कितनी भागदौड़ कर रही?है.

पूजा अपने कमरे में बारबार आजा रही थी. भाभी समझ रही थीं कि शायद मां उसे ऊपर काम के लिए भेज रही हैं और आरती समझ रही थी कि शायद अधूरे काम पूरे कर रही है. दरअसल, पूजा अपने दहेज के लिए सहेज कर रखी हुई सब चीजों को छिपाछिपा कर बांध रही थी. यहां तक कि उस ने अपने जेवर भी डब्बों में बंद कर दिए थे. बरात आने में केवल 1 घंटा शेष रह गया था. आरती को मेकअप के लिए ब्यूटी पार्लर भेज दिया गया था और पूजा घर में ही अपनेआप को संवारने लगी थी. उस ने बढि़या सूट पहना और शृंगार इत्यादि कर के पंडाल में पहुंच गई. सब रिश्तेदारों से हंसहंस कर बतियाती रही. निश्चित समय पर बरात आई तो बड़े चाव से पूजा आरती को जयमाला के लिए मंच पर ले गई.

इस के पश्चात पूजा किसी बहाने से भाभी से चाबी ले कर पंडाल से खिसक गई. बरात ने खाना खा लिया तो घर के लोग भी खाना खाने में व्यस्त हो गए. अचानक बड़ी?भाभी को खयाल आया कि पूजा ने अभी खाना नहीं खाया. उसे बुलवाने किसी बच्चे को भेजा तो पता चला कि पूजा ऊपर वाला कमरा ठीक कर रही है. थोड़ी देर बाद आ जाएगी. काफी देर बाद भी पूजा नीचे नहीं उतरी तो मां स्वयं उसे बुलाने ऊपर पहुंच गईं. तब पूजा ने कहा, ‘‘मैं दूल्हा-दुल्हन का कमरा ठीक कर रही हूं. 5 मिनट का काम बाकी है.’’

मां और दूसरे लोग नीचे फेरों की तैयारी में व्यस्त हो गए. रात 1 बजे तक फेरे भी पूरे हो चुके थे, लेकिन पूजा नीचे नहीं आई थी. घर के लोग डर रहे थे कि बारबार बुलाने से शायद वह गुस्सा न कर बैठे और बात बाहर के लोगों में फैल जाए. इसलिए सभी अपनेआप को काबू में रखे हुए थे. दूल्हादुलहन को आराम करने के लिए भेजा जाने लगा तो भाभी ने सोचा कि पहले वह जा कर कमरा देख ले. जैसे ही भाभी ने दरवाजा खोला तो सामने बिस्तर पर फूल इत्यादि बिखरे पड़े थे. साथ ही एक लिफाफा भी रखा हुआ था. पत्र आरती के नाम था,

‘प्रिय आरती, मैं ने अपनी सभी प्यारी चीजें तुम्हारे विवाह के लिए बांध दी हैं. अपने पास कुछ भी नहीं रखा. पैसा भी पिताजी को लौटा रही हूं. केवल मैं अकेली ही जा रही हूं. पूजा.’ भाभी ने पत्र पढ़ लिया, लेकिन उसे किसी को भी नहीं दिखाया और वापस आ कर दूल्हादुलहन को आराम करने के लिए उस कमरे में ले गई. थोड़ी देर बाद अचानक ही आरती भाभी से पूछ बैठी, ‘‘भाभीजी, पूजा दिखाई नहीं दे रही. क्या सो गई है?’’ भाभी ने कहा, ‘‘हां, मैं ने ही सिरदर्द की गोली दे कर उसे अपने कमरे में भिजवा दिया है. थोड़ी देर बाद ऊपर आ जाएगी.’’

भाभी दौड़ कर पति के पास पहुंची और उन्हें छिपा कर पत्र दिखाया. पत्र पढ़ कर उन्हें पैरों तले की जमीन खिसकती नजर आने लगी. बड़े भैया सोचने लगे कि अगर मातापिता से बात की तो वे लोग घबरा कर कहीं शोर न मचा दें. अभी तो आरती की विदाई भी नहीं हुई. भैयाभाभी ने सलाह की कि विदा तक कोई बहाना बना कर इस बात को छिपाना ही होगा. विदाई की सभी रस्में पूरी की जा रही थीं कि मां ने 2-3 बार पूजा को आवाज लगाई, लेकिन भैया ने बात को संभाल लिया और मां चुप रह गईं. सुबह 8 बजे बरात विदा हो गई. आरती ने सब से गले मिलते हुए पूजा के बारे में पूछा तो भाभी ने कहा, ‘‘सो रही है. कल शाम को तेरे घर पार्टी में हम सब पहुंच ही रहे हैं. फिर मिल लेना.’’

बरात के विदा होने के बाद अधिकांश मेहमान भी जाने की तैयारी में व्यस्त हो गए. 10 बजे के लगभग बड़े भैया पिताजी को सही बात बताने का साहस जुटा ही रहे थे कि सामने वाली उषा दीदी का नौकर आया, ‘‘भाभीजी, मालकिन बुला रही हैं. जल्दी आइए.’’ भाभी तथा भैया दौड़ कर वहां पहुंचे. वहां उषा दीदी और उन के पति गुमसुम खड़े थे. पास ही जमीन पर कोई चीज ढकी पड़ी थी. उषा तो सदमे से बुत ही बनी खड़ी थी. उन के पति ने बताया कि नौकर छत पर कपड़े डालने आया तो पूजा को एक कोने में लेटा देख कर घबरा कर नीचे दौड़ा आया और उस ने बताया कि पूजा दीदी ऊपर सो रही?हैं लेकिन यहां आ कर कुछ और ही देखा.

बड़े भैया ने पूजा के ऊपर से चादर हटा दी. उस ने कोई जहरीली दवा खा कर आत्महत्या कर ली थी. समीप ही एक पत्र भी पड़ा हुआ था. लिखा था : ‘पिताजी जब तक आप के पास यह पत्र पहुंचेगा तब तक मैं बहुत दूर जा चुकी होंगी. आरती को तो आप ने केवल विदा ही किया है, लेकिन मैं आप को अलविदा कह रही हूं. मैं आरती के विवाह में सम्मिलित नहीं हुई, इसलिए मेरी विदाई में उसे न बुलाया जाए. आप की बेटी पूजा.’

मां-बाप और भाइयों को दुख था कि पूजा को पालने में उन से कहीं गलती हो गई थी, जिस से वह इतनी संवेदनशील और जिद्दी हो गई थी और अपनी छोटी बहन से ही जलने लगी थी. उन्हें लगा कि अगर वे कहीं सख्ती से पेश आते तो शायद बात इतनी न बिगड़ती. पूजा न केवल बहन से ही, बल्कि पूरे घर से ही कट गई थी. जिस लड़की ने जीते जी उन की शांति भंग कर रखी थी, उस ने मृत्यु के बाद भी कैसा अवसाद भर दिया था, उन सब के जीवन में.

Drama Story

Family Story: कशमकश- सीमा भाभी के चेहरे से मुस्कान क्यों गायब हो गई थी

Family Story: ‘‘वाहभई, मजा आ गया… भाभी के हाथों में तो जैसे जादू की छड़ी है… बस खाने पर घुमा देती हैं और खाने वाला समझ ही नहीं पाता कि खाना खाए या अपनी उंगलियां चाटे,’’ मयंक ने 2-4 कौर खाते ही हमेशा की तरह खाने की तारीफ शुरू कर दी तो रसोई में फुलके सेंकती सीमा भाभी के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई.

पास ही खड़ी महिमा के भीतर कुछ दरक सा गया, मगर उस ने हमेशा की तरह दर्द की उन किरचों को आंखों का रास्ता नहीं दिखाया, दिल में उतार लिया.

‘‘अरे भाभी, महिमा को भी कुछ बनाना सिखा दो न… रोजरोज की सादी रोटीसब्जी से हम ऊब गए… बच्चे तो हर तीसरे दिन होटल की तरफ भागते हैं,’’ मयंक ने अपनी बात आगे बढ़ाई तो लाख रोकने की कोशिशों के बावजूद महिमा की पलकें नम हो आईं.

इस के पास कहां इतना टाइम होता है जो रसोई में खपे… एक ही काम होगा… या तो कलम पकड़ लो या फिर चकलाबेलन… सीमा की चहक में छिपे व्यंग्यबाण महिमा को बेंध गए, मगर बात तो सच ही थी, भले कड़वी सही.

महिमा एक कामकाजी महिला है. सरकारी स्कूल में अध्यापिका महिमा को मलाल रहता है कि वह आम गृहिणियों की तरह अपने घर को वक्त नहीं दे पाती. ऐसा नहीं है कि उसे अच्छा खाना बनाना नहीं आता, मगर सुबह उस के पास टाइम नहीं होता और शाम को वह थक कर इतनी चूर हो चुकी होती है कि कुछ ऐक्स्ट्रा बनाने की सोच भी नहीं पाती.

महिमा सुबह 5 बजे उठती है. सब का नाश्ता, खाना बना कर 8 बजे तक स्कूल पहुंचती है. दोपहर 3 बजे तक स्कूल में व्यस्त रहती है. उस के बाद घर आतेआते इतनी थक जाती है कि यदि घंटाभर आराम न करे तो रात तक चिड़चिड़ाहट बनी रहती है. रात को रसोई समेटतेसमटते 11 बज जाते हैं. अगले दिन फिर वही दिनचर्या.

इतनी व्यस्तता के बाद महिमा चाह कर भी सप्ताह के 6 दिन पति या बच्चों की खाने, नाश्ते की फरमाइशें पूरी नहीं कर पाती. एक रविवार का दिन उसे छुट्टी के रूप में मिलता है, मगर यह एक दिन बाकी 6 दिनों पर भारी पड़ता है. सब से पहले तो वह खुद ही इस दिन थोड़ा देर से उठती. फिर सप्ताह भर के कल पर टलने वालेकाम भी इसी दिन निबटाने होते हैं. मिलनेजुलने वाले दोस्तरिश्तेदार भी इसी रविवार की बाट जोहते हैं. इस तरह रविवार का दिन मुट्ठी में से पानी की तरह फिसल जाता है.

क्या करे महिमा… अपनी ग्लानि मिटाने के लिए वह बच्चों को हर रविवार होटल में खाने की छूट दे देती है. धीरेधीरे बच्चों को भी इस आजादी और रूटीन की आदत सी हो गई है.

महिमा महसूस करती है कि उस का घर सीमा भाभी के घर की तरह हर वक्त सजासंवरा नहीं दिखता. घर के सामान पर धूलमिट्टी की परत भी दिख जाती है. कई बार छोटेछोटे मकड़ी के जाले भी नजर आ जाते हैं. इधरउधर बिखरे कपड़े और जूते तो रोज की बात है. लौबी में रखी डाइनिंगटेबल भी खाने के कम, बच्चों की किताबों, स्कूल बैग, हैलमेट आदि रखने के ज्यादा काम आती है.

कई बार जब महिमा झुंझला कर साफसफाई में जुट जाती है, तो बच्चे पूछ बैठते हैं, ‘‘आज अचानक यह सफाई का बुखार कैसे चढ़ गया? कोई आने वाला है क्या?’’ तब वह और भी खिसिया जाती.

हालांकि महिमा ने अपनी मदद के लिए कमला को रखा हुआ है, मगर वह उस के स्कूल जाने के बाद आती है, इसलिए जो जैसा कर जाती है उसी में संतुष्ट होना पड़ता है.

स्कूल में आत्मविश्वास से भरी दिखने वाली महिमा भीतर ही भीतर अपना आत्मविश्वास खोती जा रही थी. यदाकदा अपनी तुलना सीमा भाभी से करने लगती कि कितने आराम से रहती हैं सीमा भाभी. घर भी एकदम करीने से सजा हुआ… अच्छे खाने से पतिबच्चे भी खुश.

दिन में 2-3 घंटे एसी की ठंडी हवा में आराम… और एक मैं हूं…. चाहे हजारों रुपए महीना कमाती हूं… कभी अपने पैसे का रोब नहीं झाड़ती… जेठानी के सामने हमेशा देवरानी ही बनी रहती हूं… कभी भी रानी बनने का गरूर नहीं दिखाती… फिर भी मयंक ने कभी मेरी काबिलियत पर गर्व नहीं किया. बच्चे भी अपनी ताई के ही गुण गाते रहते हैं.

वैसे देखा जाए तो वे सब भी कहां गलत हैं. कहते हैं कि दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से हो कर गुजरता है. मगर मैं कहां इन दूरियों को तय कर पाई हूं… जल्दीजल्दी जो कुछ बना पाती हूं बस बना देती हूं. एक सा नाश्ता और खाना खाखा कर बेचारे ऊब जाते होंगे… कैसी मां और पत्नी हूं… अपने परिवार तक को खुश नहीं रख पाती… महिमा खुद को कोसने लगती और फिर अवसाद के दलदल में थोड़ा और गहरे धंस जाती.

क्या करूं? क्या इतनी मेहनत से लगी नौकरी छोड़ दूं? मगर अब यह सिर्फ नौकरी कहां रही… यह तो मेरी पहचान बन चुकी है. स्कूल के बच्चे जब मुझे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. उन के अभिभावक बच्चों के सामने मेरा उदाहरण देते हैं तो वे कितने गर्व के पल होते हैं… वह अनमोल खुशी को क्या सिर्फ इतनी सी बात के लिए गंवा दूं कि पति और बच्चों को उन का मनपसंद खाना खिला सकूं. महिमा अकसर खुद से ही सवालजवाब करने लगती, मगर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाती.

इसी बीच महिमा की स्कूल में गरमी की छुट्टियां हो गईं. उस ने तय कर लिया कि इन पूरी छुट्टियों में वह सब की शिकायतें दूर करने की कोशिश करेगी. सब का मनपसंद खाना बनाएगी. नईनई डिशेज बनाना सीखेगी… घर को एकदम साफसुथरा और सजा कर रखेगी…

छुट्टी का पहला दिन. नाश्ते में गरमगरम आलू के परांठे देखते ही सब के चेहरे खिल उठे. भूख से अधिक ही खा लिए सब ने. उन्हें संतुष्ट देख कर महिमा का दिल भी खुश हो गया. मयंक टिफिन ले कर औफिस निकल गया और बच्चे कोचिंग क्लास. महिमा घर को समेटने में जुट गई.

दोपहर ढलतेढलते पूरा घर चमक उठा. लगा मानो दीवाली आने वाली है. मयंक और बच्चे घर लौट आए. आते ही बच्चों ने अपनी किताबें और बैग व मयंक ने अपनी फाइलें और हैलमेट लापरवाही से डाइनिंगटेबल पर पटक दिया. महिमा का मूड उखड़ गया, मगर उस ने एक लंबी सास ली और सारा सामान यथास्थान पर रख कर डाइनिंगटेबल फिर से सैट कर दी.

महिमा ने रात के खाने में भी 2 मसालेदार सब्जियों के अलावा रायता और सूजी का हलवा भी बनाया. सजी डाइनिंगटेबल देख कर मयंक और बच्चे खुश हो गए. उन्हें खुश देख कर महिमा भी खुश हो उठी.

अब रोज यही होने लगा. नाश्ते में अकसर मैदा, बेसन, आलू और अधिक तेलमिर्च मसाले का इस्तेमाल होता था. रात में भी महिमा कई तरह के व्यंजन बनाती थी. अधिक वैरायटी बनाने के चक्कर में अकसर रात का खाना लेट हो जाता था और गरिष्ठ होने के कारण ठीक से हजम भी नहीं हो पाता था.

अभी 15 दिन भी नहीं बीते थे कि मयंक ने ऐसिडिटी की शिकायत की. रातभर खट्टी डकारों और सीने में जलन से परेशान रहा. सुबह डाक्टर को दिखाया तो उस ने सादे खाने और कई तरह के दूसरे परहेज बताने के साथसाथ क्व2 हजार का दवाओं का बिल थमा दिया.

दूसरी तरफ घर को साफसुथरा और व्यवस्थित रखने के प्रयास में बच्चों की आजादी छिनती जा रही थी. महिमा उन्हें हर वक्त टोकती रहती कि इस्तेमाल करने के बाद अपना सामान प्रौपर जगह पर रखें. मगर बरसों की आदत भला एक दिन में छूटती है और फिर वैसे भी अपना घर इसीलिए तो बनाया जाता है ताकि वहां अपनी मनमरजी से अपने तरीके से रहा जाए. मां की टोकाटाकी से बच्चे घर वाली फीलिंग के लिए तरसने लगे, क्योंकि घर अब होटल की तरह लगने लगा था.

घर को संवारने और सब को मनपसंद खाना खिलाने की कवायद में महिमा पूरा दिन उलझी रहने लगी. हर वक्त कोई न कोई नई डिश या नया आइडिया उस के दिमाग में पकता रहता. साफसफाई के लिए भी दिन भर परेशान होती, कभी कमला पर झल्लाती तो कभी बच्चों को टोकती. नतीजन, एक दिन रसोई में खड़ीखड़ी महिमा गश खा कर गिर पड़ी. मयंक ने उसे उठा कर बिस्तर में लिटाया. बेटे ने तुरंत डाक्टर को फोन किया.

चैकअप करने के बाद पता चला कि महिमा का बीपी बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है. डाक्टर ने आराम करने की सलाह के साथसाथ मसालेदार, ज्यादा घी व तेल वाले खाने से परहेज करने की सलाह दी. साथ ही लंबाचौड़ा बिल थमाया वह अलग.

‘‘सौरी मयंक मैं एक अच्छी पत्नी और मां की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकी,’’ महिमा ने मायूसी से कहा.

‘‘पगली यह तुम से किस ने कहा? तुम ने तो हमेशा अपनी जिम्मेदारियां पूरी शिद्दत के साथ निभाई है. मुझे गर्व है तुम पर,’’ मयंक ने उस का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

‘‘तो फिर वे हमेशा सीमा भाभी की तारीफें… वह सब क्या है?’’ महिमा ने संशय से पूछा.

‘‘अरे बावली, तुम भी गजब करती हो… पता नहीं किस आसमान तक अपनी सोच के घोड़े दौड़ा लेती हो,’’ मयंक ने ठहाका लगाते हुए कहा. महिमा अचरज के भाव लिए मुंह खोले उसे देख रही थी.

जब हमारी सगाई हुई थी उस के बाद से ही सीमा भाभी के व्यवहार में परिवर्तन नजर आने लगा था. उन्हें लगने लगा था कि नौकरीपेशा बहू आने के बाद घर में उन की अहमियत कम हो जाएगी. यह भी हो सकता है कि तुम उन पर अपने पैसे का रोब दिखाओ.

बातबात में उन की तारीफ करते हैं ताकि वे किसी हीनभावना से ग्रस्त न हो जाएं. मगर इस सारे गणित में अनजाने में ही सही, हम से तुम्हारा पक्ष नजरअंदाज होता रहा. हम सब तुम्हारे गुनाहगार हैं,’’ मयंक ने शर्मिंदा होते हुए अपने कान पकड़ लिए.

यह देख महिमा खिलखिला पड़ी, ‘‘तो अब सजा तो आप को मिलेगी ही… आप सब को अगले 20 दिन और इसी तरह का चटपटा और मसालेदार खाना खाना पड़ेगा.’’

‘‘न बाबा न… इतनी बड़ी सजा नहीं… हमें तो वही सादी रोटीसब्जी चाहिए ताकि हमारा पेट भी हैप्पी रहे और जेब भी. क्यों बच्चो?’’ मयंक ने नाटकीयता से कहा. अब तक बच्चे भी वहां आ चुके थे.

‘‘ठीक है, मगर सप्ताह में एक दिन तो होटल जाने दोगे और हमें अपनी मनपसंद डिशेज खाने दोगे न?’’ दोनों बच्चे एकसाथ चिल्लाए तो महिमा के होंठों पर भी मुसकराहट तैर गई.

Family Story

Hindi Story: प्रेम की टिमटिमाती लौ: अमन से दूर क्यों नहीं जा पा रही थी मायरा

Hindi Story: मायरा चाह कर भी अमन से दूरी खत्म नहीं कर पा रही थी. वे कहने को तो पतिपत्नी थे मगर अपने घर में भी अजनबियों की तरह रहने को मजबूर थे. आखिर क्यों

‘‘तुम चुपचाप अपनी तरफ सोना. खबरदार जो सीमा लांघने की कोशिश की,’’ मायरा ने अमन और अपने बीच एक तकिया रख दिया और पलट गई. वह अंदर ही अंदर गुस्से में जल रही थी. उसे अपनी औफिस वाली दोस्त पूजा की बातें याद आने लगीं.

पूजा के अनुसार मर्द अगर छोटेछोटे झगड़ों को सुल   झाने या प्यार जताने के लिए आगे न बढ़े तो सचेत हो जाना चाहिए कि उस के जीवन में कोई और है और किसी भी क्षण इस शादी के टूटने के लिए उसे मानसिक तौर पर तैयार रहना चाहिए. उस की ऊटपटांग बातों ने दिमाग को और प्रदूषित कर दिया. बस यहीं से मायरा के मन में शक का बीज पड़ गया और वह अमन के मोबाइल और मेल पर नजर रखने लगी.

नतीजा सामने था. फोन में अमन व रोमा की तसवीर साथ देख कर सवाल करने लगी तो    झगड़ा और बढ़ गया.

अमन भी देर रात तक करवटें बदलता रहा. नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. उसे पता था कि उस के परिवार का रहनसहन मायरा के लायक नहीं. उस की मां की सख्ती भी कुछ ज्यादा ही है. कोई भी पढ़ीलिखी लड़की बेवजह की जिल्लत क्यों सहेगी. तभी तो वह मायरा के साथ अलग रहने के लिए भी तैयार हो गया. वह इस बात पर कितनी खुश हो गई थी कि रोमा के साथ की इस तसवीर ने बीच में आ कर बेड़ा गर्क कर दिया, जबकि रोमा अमन के स्कूल के समय की दोस्त है. दोनों के बीच दोस्ती से ज्यादा तो कुछ भी नहीं फिर भी उस की बात पर    झगड़ कर मायरा ने आज फिर से मुंह फेर लिया.

बारिश की एक दोपहर में औफिस से निकलती हुई वह रास्ते में मिल गई. तभी पता लगा कि रोमा के पिता बीमार हैं और वह अकेली ही उन की देखभाल कर रही है. खुद ही अपनी परेशानियों में घिरी है जिस के बारे में अमन कुछ जानता भी नहीं था. पुराने दोस्तों के मिलने की खुशी अलग ही होती है. उस ने याद के लिए एक सैल्फी ले ली थी. अब वही तसवीर    झगड़े की वजह बन चुकी थी. अपने पक्ष में जितनी दलीलें दे रहा था, उतना ही फंसता जा रहा था. अपनी परेशान दोस्त को छोड़ भी नहीं पा रहा था. उस का जीवन चारों ओर से परेशानियों से घिरा

हुआ था. दफ्तर से घर लौटता तो मां के ताने सुनने पड़ते.

‘‘जा बेटा अपनी जिंदगी जी ले. बहन की शादी की तु   झे क्या चिंता? जन्म मैं ने दिया तो जिम्मेदारियां भी मेरी ही हैं.’’

‘‘मैं भी फ्रिक करता हूं मां, आप ऐसा न सोचें,’’ उन्हें दिलासे दे कर जब मायरा तक पहुंचता तो उस की शिकायतों का पिटारा खुल जाता. वह सम   झ ही नहीं पा रहा था कि जिंदगी में तारतम्य बैठाए तो कैसे कि सभी खुश रहें. जानता था कि शादी व प्यार, मानमनुहार से ही चलता है. पत्नी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण कोई भी नहीं पर प्यार जताने के लिए भी माहौल चाहिए. अपने मन को मिनटों में कैसे बदले? जिंदगी है सिनेमा तो नहीं जो स्विच औनऔफ करते ही दृश्य बदल दे. मन मसोस कर मायरा को देखना चाहा तो तकिया बीच में आ गया. जिंदगी बड़ी ही नीरस सी गुजर रही थी. क्या सोचा था और क्या पाया.

इधर मायरा का तकिया भी आंसुओं से भीग चुका था. बारबार यही खयाल आ रहा था कि अमन ने उस से शादी ही क्यों की अगर किसी और से प्यार करता था. फालतू में उस की जिंदगी खराब की. उस के औफिस की सहेलियां अकसर अपने पति की बातें करती नहीं थकती हैं. वीकैंड्स पर पति के साथ शौपिंग करती हैं. बाहर खाना खाती हैं और उस कि हिस्से में बस यही लिखा है, ‘‘मम्मीजी आज खाने में क्या बनेगा?’’

एक इस बात पर मायरा का मन बुरी तरह चिढ़ गया. उस की जिंदगी औफिस और रसोई के बीच जाया हो रही थी. उस का भी दिल करता कि अमन कभी तो कोई सरप्राइज दे. शुक्रवार को सीधे उस के औफिस आए और कम से कम एक शाम दोनों एकदूसरे के साथ गुजारें. शादी को 1 साल होने को आया पर मजाल कि अमन ने ऐसा कुछ किया या कभी कहा भी हो.

दोनों कभी करीब आए भी तो मायरा की इच्छा जाहिर करने के बाद. अब हर बार जिद्द कर अपनी बात क्यों मनवानी? अमन की ओर से कभी तो कोई इशारा हो जो यह दिखाए कि वह भी उस के प्यार में है. दिखने में तो वह इतनी खराब तो नहीं कि उसे छूने का जी ही न करे फिर भी अमन भूले से भी कभी पहल नहीं करता. वह कोई 16 साल

की कमसिन कुंआरी तो है नहीं कि सहमीसकुचाई सी रहे. जरूरतें उस की भी हैं. मन उस का भी मचलता है. अब इस के लिए भीख तो नहीं मांग सकती. अगर वह उस के साथ ठीक रहता तो शक न करती पर इन परिस्थितियों में वह क्या कोई भी लड़की व्याकुल हो सकती है.

आखिर वजह क्या है उस के प्रति इस उदासीनता की. यही सब

सोच कर उस के आंसू थमते न थे. कहां उस की सहेलियों की रोमानी जिंदगी और कहां उस की यह रोमांस के बिना सूनी सड़कों सी रेंगती रेगिस्तानी जिंदगी. कुछ भी हो जाए अब और न सहेगी. उसे और कुछ सम   झ में नहीं आया तो गुस्से में आ कर फिर से तकिया रख दिया.

दरअसल, मायरा बेहद संवेदनशील थी. उस की शादी के लिए एक से एक रिश्ते आए थे पर उसे हर जगह कोई न कोई कमी दिख जाती. किसी की लंबाई कम तो किसी का पद छोटा, सचाई तो यह थी कि वह बहुत महत्त्वाकांक्षी थी. महत्त्वाकांक्षा कोई गलत बात तो नहीं पर कभीकभी यह निराशाजनक स्थितियां पैदा कर देती है. जहां दूरदूर तक आशा की कोई रोशनी दिखाई नहीं देती इन दुख के क्षणों में उसे अपनी बड़ी बहन का ध्यान आया. क्यों न वह कुछ दिनों के लिए उन के पास चली जाए. सुबह होते ही अपना फैसला सुना दिया.

‘‘मैं सारी उम्र चारदीवारी में कैंद पक्षी की तरह नहीं जी सकती.’’

‘‘बस अपना सोच रही हो.’’

‘‘अपनी सुरक्षा पहले कर लूं. यहां पागल होने से अच्छा है दीदी के पास चली जाऊं.’’

‘‘नहींनहीं… ऐसा मत करो, मु   झे थोड़ा सा वक्त दो. दरअसल, मम्मी के मन में वहम है कि हम दोनों की नजदीकियां बढ़ीं तो बहन की शादी की बात दरकिनार हो जाएगी.’’

‘‘बेटी से इतना नेह कि बेटे की खुशी देखी नहीं जा रही फिर तो तुम्हें बहन की शादी करा कर ही अपनी शादी करनी

चाहिए थी.’’

‘‘हां कोशिश की थी मगर ढंग का रिश्ता भी तो मिलना चाहिए.’’

‘‘हां, तो ढूंढ़ो न, जब सारी जिम्मेदारियां निभा लोगे तब मु   झे लेने आना,’’ मायरा ने भी मन खोल कर रख दिया. वह किसी हाल में    झुकने को तैयार न थी. औफिस व घर के काम का बो   झ तो सह भी लेती अगर अमन के स्नेह का मरहम लगता.

अमन किंकर्तव्यविमूढ़ था. शायद वह अपने ही परिवार के व्यवहार से दुखी था. मां और बहन पहले ही उसे नहीं सम   झ रहे थे और अब मायरा भी कुछ सुनने को तैयार नहीं थी. उस ने बहुत हाथपांव जोड़े पर वह रुकने के लिए कतई राजी न हुई. सम   झ में नहीं आ रहा था कि करे तो क्या करे? वह अपने परिवार का इकलौता लड़का था. शादी के लिए छोटी बहन कुंआरी थी. माताजी की इच्छा थी कि पहले बेटी के हाथ पीले कर दें फिर बेटे की शादी हो. लड़के के लिए अच्छे परिवार का रिश्ता आया तो मना नहीं कर पाईं. बेटी की शादी धूमधाम से संपन्न करने के बाद ही बहू घर लाना चाहती थीं. उन के मन में एक ही डर व्याप्त था कि बहू उन के बेटे को अपने रंग में रंग न ले. इसलिए वे शादी टालना चाहती थीं मगर सगाई के कुछ ही दिनों बाद जब लड़की वाले शादी के लिए जोर देने लगे तो उन्होंने बड़े ही बेमन से रजामंदी दे दी. कहीं न कहीं वे बुरी तरह से खार खाए रहतीं. जबतब बहू की लगाम कसने की फिराक में लगी रहती थीं.

औफिस से घर आते ही एक प्याला चाय पूछने के बजाय खाने की फरमाइशों की    झड़ी लगा देतीं. बेचारी लड़की मरमर के सारे काम निबटाती. आराम करने जब अपने कमरे में आती तो पति के स्नेहिल स्पर्श तक के लिए तरस जाती.

क्या करती, कहां जाती. अपनी नाराजगी दिखाने से भी कुछ हासिल नहीं हो रहा था. उसे कुछ सम   झ में नहीं आ रहा था. अपना दुख घर वालों को बता कर परेशान नहीं करना चाहती थी. तभी चुपचाप अगली ही सुबह बड़ी बहन के घर आ गई. वह उसी शहर के दूसरे कोने में रहती थीं. पहले तो अचानक अकेली आई देख कर जीजाजी चौंक गए पर दीदी ने उस के उतरे चेहरे को देख कर कुछ भी पूछने से मना कर दिया.

इधर मायरा के जाने के बाद अमन बहुत अकेलापन महसूस कर रहा था. बारबार पिछली घटनाओं को जोड़ कर देखने पर भी उसे कुछ भी नजर नहीं आ रहा था. तब मजबूर हो कर उस ने जीजाजी के औफिस के नंबर पर फोन लगाया.

‘‘कमउम्र लड़की पर रसोई, औफिस

के साथसाथ परिवार के मानमर्यादा ढोने का बो   झ डाल दिया तुम ने. कुछ दिन तो आजाद परिंदों के समान जीते तब तुम्हें सम   झ में आता कि मायरा कितनी खुशमिजाज और प्यारी लड़की है.’’

‘‘जीजाजी एक मौका दिला दीजिए. मैं मायरा का दिल जीत लूंगा.’’

‘‘जो 1 साल में न कर पाए वह अब कैसे…?’’

‘‘मैं उस के औफिस के पास शिफ्ट

हो जाऊंगा.’’

‘‘इस बात के लिए तुम्हारे घरवाले तैयार हो जाएंगे?’’

‘‘मैं ने उन से बात कर ली है. अभी तो बहन साथ है तो अलग रह लेंगे बाद में सब को साथ ही रहना है. तब तक मायरा भी ऐडजस्ट कर लेगी. परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए मैं औफिस से पहले घर जाऊंगा और फिर मायरा के पास चला आऊंगा.

‘‘ठीक है मैं कुछ करता हूं. अगले हफ्ते मायरा के जन्मदिन की पार्टी रखी है. तुम चाहो तो आ कर अपनी बात कहने की कोशिश करना पर मु   झ से किसी किस्म की मदद की कोई उम्मीद मत रखना. आखिरी निर्णय मायरा का होगा. हम दोनों पतिपत्नी के    झगड़ों में नहीं पड़ना चाहते.’’

बड़ी मिन्नतों के बाद जीजाजी मान गए. उन की गिनती शहर के जानेमाने

प्रतिष्ठित व्यक्तियों में थी. वे चाहते तो अनाधिकार कुछ भी कह सकते थे परंतु उन्होंने न केवल मायरा को सहारा दिया बल्कि उस के ऊपर भी कोई आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं की. अब उसे सम   झ में आ रहा था कि उन दोनों के घर के वातावरण में कितना फर्क था. आजाद खयाल मायरा उस के घर के संकीर्ण माहौल में क्यों कुम्हला गई थी. खैर, वह बस इसी बात पर खुश था कि उसे मायरा को मनाने का मौका मिल गया.

मायरा अमन को याद कर सुबह से ही उदास थी. माना अमन से गुस्सा हो कर आई पर वह चाहता तो मना भी सकता था. न फोन न कोई मेल. जाने कैसा बेरुख आदमी है. पूजा ने जो कहा शायद वही सच है तभी तो वह भी हाथ पर हाथ धरे बैठ गया है. ऐसे व्यक्ति से क्या उम्मीद की जा सकती है.जो इंसान एक तकिया तक न लांघ सका वह अपनी मां की बात काट कर घर की दहलीज भला क्या लांघेगा.

यही सब सोच कर मन उद्वेलित था. इन बातों से बेखबर दीदी उस की पसंद का खाना बना रही थी. दोनों बहनों की उम्र में बहुत फर्क था. उन के बच्चे कालेज में पढ़ रहे थे. तभी तो दीदी ने अपने घर में उसे ऐसे रखा था जैसे कोई नन्हा बच्चा भटकता हुआ खेलने पहुंच जाता है और ममता की मारी गृहलक्ष्मी चौकलेट व खिलौने दे कर उसे प्रसन्न किया करती है. वह खुशीखुशी शाम के पार्टी की तैयारियां कर रही थी. यहां हर तरह की आजादी थी पर फिर भी मन में एक अजीब सा सूनापन था. कैसी हूक सी उठती थी और क्यों, उसे कुछ न सू   झ रहा था. खैर, जीजाजी ने उस के जन्मदिन की पार्टी में शहर के सभी अच्छे परिवारों को बुलाया था.

‘‘आज कोई पसंद आए तो बताना. शहर

के सभी हैंडसम नौजवानों को

बुलाया है.’’

‘‘अरे नहीं जीजाजी, अब कुछ भी मन नहीं करता.’’

‘‘इतना प्यार दिया अमन ने कि मन भर गया,’’ जीजाजी ने चुटकी ली तो वह एक    झूठा ठहाका लगा कर पलटी ही थी कि अनजाने वेश में एक जानीपहचानी सी आवाज ने हैप्पी बर्थडे कहा तो चौंक गई.

‘‘मे आई डांस विद यू?’’

कब उस के हाथों में हाथ दिया और कब नाचती हुई बांहों में समा गई उसे खुद ही पता नहीं चला. उस ने फुसफुसा कर जब कानों में ‘‘लव यू जान’’ कहा तो जैसे रेगिस्तान पर पहली ओस की बूंद सी ठंडक महसूस हुई. उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह वही शख्स है जिस के साथ उस ने एक छत के नीचे 1 साल गुजारा है. आज 1 घंटे के अंदर उस ने अपने बेबाक अंदाज से उस का दिल चुरा लिया.

दीदी और जीजाजी इन नवीन बदलावों से अनजान बनने की ऐक्टिंग कर रहे थे.

तभी अमन ने घुटनों के बल बैठ कर एक बार फिर से मायरा की आंखों में    झांकते हुए कहा, ‘‘क्या तुम मेरी बनोगी मायरा? अपने घर चलोगी?’’

मायरा यही तो चाहती थी. अमन के प्यार के इजहार से द्रवित हो गई. धीरे से हामी में सिर हिला दिया. अगली सुबह दोनों अपने घर में थे. बाहर ‘मायराअमन सदन’ लिखा था. हां. यह उन दोनों का घर था.

अमन आज जी भर कर प्यार करना चाहता था. ठीक है कि अभी तक उस ने परिवार को अपने प्यार के ऊपर प्राथमिकता दी थी तभी तो खुल कर कदम नहीं बढ़ा सका था. अपने प्यार का सलीके से इजहार तक नहीं कर पाया था. क्या करता आखिर? औफिस से सोच कर घर आता कि मायरा के साथ क्वालिटी टाइम बिताएगा पर मां के व्यंग्य और मायरा की नाराजगी से टूट जाता. बात करेगा तो बात बढ़ेगी और घर वालों को उन के बीच की दूरियों का पता लग जाएगा यही सोच कर मन मसोस कर रह जाता. बीवी को यह भी नहीं सम   झा पाता कि बेगम शादी की है आप से. पुराने इश्क में दम होता तो शादी करता ही क्यों? मैं तो खाली दिल और जज्बा ले कर जुड़ने आया था आप ही जुड़ न सकीं.

‘‘वाह जी वाह, उलटा चोर कोतवाल को डांटे? हम नहीं जुड़े या आप ने

बेरुखी दिखाई…’’ आज दोनों के मन में अपने संवाद चल रहे थे.

‘‘कुछ मत सोचो. सब भूल कर बस प्यार करो…’’ अमन की यह बात सुनते ही पति की गोद में पड़े लैपटौप यानी अपनी सौतन को हटा कर वह नजदीक आ गई.

सच, पतिपत्नी का रिश्ता बेहद अंतरंग होता है. सच कहूं तो कुदरत भी जोड़ों के बीच आना पसंद नहीं करती. दीएबाती के इस संबंध में अंदर ही अंदर प्रेम की अगन होती है जो 2 दिलों को रोशन करती है. फिर क्यों लोग उन के बीच    झगड़े की आग सुलगाते हैं? शायद लोगों के अंदर असुरक्षा की आग लपटें ले रही होती है. तभी तो प्रेम करने वाले उन्हें रास नहीं आते. बाहरी लोगों से तो फिर भी बचा जा सकता है पर नजदीकी रिश्तेदारों के लिए कोई क्या करे.

ऐसे दिलजलों की जलन की आग में न जाने कितने नवयुगल अकसर    झुलस जाते हैं. घर में ही समस्या सुल   झ जाए तो कोई अलग घर क्यों बसाए. कभीकभी आपसी आंधीतूफान से बचाने के लिए अलग आशियाना बनाना पड़ता है ताकि अपने प्रेम की टिमटिमाती लौ को बु   झने से बचाया जा सके. उसे हर हाल में जलाए रखना बस अपने ही बस में है. यही सोच कर दोनों ने फैसला लिया कि अब प्राथमिकता के आधार पर रिश्ते निभाए जाएंगे. तकिए ने अपना स्थान ले लिया था. उन के बीच उस के लिए कोई जगह शेष न रही.

Hindi Story

Emotional Story: बुलावा आएगा जरूर- भाग्यश्री का मायका

Emotional Story: तबीयत कैसी है मां?’’ दयनीय दृष्टि से देखती भाग्यश्री ने पूछा.

मां ने सिर हिला कर इशारा किया, ‘‘ठीक है.’’ कुछ पल मां जमीन की ओर देखती रही. अनायास आंखों से आंसू की  झड़ी  झड़ने लगी. सुस्त हाथों को धीरेधीरे ऊपर उठा कर अपने सिकुड़े कपोलों तक ले गई. आंसू पोंछ कर बोली, ‘‘प्रकृति की मरजी है बेटा.’’

परिवार के प्रति आक्रोश दबाती हुई भाग्यश्री ने कहा, ‘‘प्रकृति की मरजी कोई नहीं जानता, किंतु तुम्हारे लापरवाह बेटे को सभी जानते हैं और… और पिताजी की तानाशाही. दोनों के प्रति तुम्हारे समर्पित भाव का प्रतिदान तुम्हें यह मिला कि तुम दोनों की मानसिक चोट से आहत हो कर यहां तक  पहुंच गईं? जिंदगी जकड़ कर रखना चाहती है, लेकिन मौत तुम्हें अपनी ओर खींच रही है.’’

मां ने आहत स्वर में कहा, ‘‘क्या किया जाए, सब समय की बात है.’’

भाग्यश्री ने अपनी आर्द्र आंखों को पोंछ कर कहा, ‘‘दवा तो ठीक से ले रही हो न, कोई कमी तो नहीं है न?’’

पलभर मां चुप रही, फिर बोली, ‘‘नहीं, दवा तो लाता ही है.’’

‘‘कौन? बाबू?’’ भाग्यश्री ने पूछा.

‘‘और नहीं तो कौन, तुम्हारे पिताजी लाएंगे क्या, गोबर भी काम में आ जाता है, गोथठे के रूप में. लेकिन वे? इस से भी गएगुजरे हैं. वही ठीक रहते तो किस बात का रोना था?’’ कुछ आक्रोश में मां ने कहा.

भाग्यश्री सिर  झुका कर बातें सुनती रही.

‘‘और एक बेटा है, वह अपनेआप में लीन रहता है, कमरे में  झांक कर भी नहीं देखता. आने में देरी हो जाए, तो मन घबराता है. देरी का कारण पूछती हूं, तो बरस पड़ता है. घर में नहीं रहने पर इधर बाप की चिल्लाहट सुनो और आने पर कुछ पूछो, तो बेटे की  िझड़की सुनो. बस, ऐसे ही दिन काट रही हूं,’’ आंसू पोंछती हुई मां ने कहा, ‘‘हां, लेकिन सेवा तुम्हारे पिताजी करते हैं मूड ठीक रहा तो, ठीक नहीं तो चार बातें सुना कर ही सही, मगर करते हैं.’’

भाग्यश्री ने कई बार सोचा कि मां की सेवा के लिए एक आया रख दे, मगर इस में भी समस्याएं थीं. एक तो यह कि इस माहौल में आया रहेगी नहीं, हरवक्त तनाव की स्थिति, बापबेटे के बीच वाकयुद्ध, अशांति ही अशांति. स्वयं कुछ भी खा लें, मगर आया को तो ढंग से खिलाना पड़ेगा न. दूसरा यह कि भाग्यश्री की सहायता घरवाले स्वीकार करेंगे? इन सब कारणों से वह लाचार थी. वह मां के पास बैठी थी, तभी उस के पिताजी आए. औपचारिकतावश भाग्यश्री ने प्रणाम किया. फिर चुपचाप बैठी रही.

भाग्यश्री ने अपने पिताजी की ओर देखा. उन के चेहरे पर क्रोध का भाव था. निसंदेह वह भाग्यश्री के प्रति था.

पिछले 10 वर्षों में वह बहुत कम यहां आईर् थी. जब उस ने अपनी मरजी से शादी की, पिताजी ने उसे त्याग दिया. मां भी पिताजी का समर्थन करती, किंतु मां तो मां होती है. मां अपना मोह त्याग नहीं पाई थी. शादी भी एक संयोग था. स्नेहदीप के बिना जीवन अंधकारमय रहता है. प्रकाश की खोज करना हर व्यक्ति की प्रवृत्ति है.

व्यक्ति को यदि अपने परिवेश में स्नेह न मिले तो बूंदभर स्नेह की लालसा लिए उस की दृष्टि आकाश को निहारती है, शायद स्वाति बूंद उस पर गिर पड़े. जहां आशा बंधती है, वहां वह स्वयं भी बंध जाता है. भाग्यश्री के साथ भी ऐसी ही बात थी. नाम के विपरीत विधाता का लिखा. दोष किस का है- इस सर्वेक्षण का अब समय नहीं रहा, लेकिन एक ओर जहां भाग्यश्री का खूबसूरत न होना उस के बुरे समय का कारण बना, वहीं, दूसरी ओर पिता का गुस्सैल स्वभाव भी. कभी भी उन्होंने घर की परिस्थिति को देखा ही नहीं, बस, जो चाहिए, मिलना चाहिए अन्यथा घर सिर पर उठा लेते.

घर की विषम परिस्थितियों ने ही भाग्यश्री को सम झदार बना दिया. न कोई इच्छा, न शौक. बस, उदासीनता की चादर ओढ़ कर वह वर्तमान में जीती गई. परिश्रमी तो वह बचपन से ही थी. छोटे बच्चों को पढ़ा कर उस ने अपनी पढ़ाई पूरी की. उस का एक छोटा भाई था. बहुत मन्नत के बाद उस का जन्म हुआ था. इसलिए उसे पा कर मातापिता का दर्प आसमान छूने लगा था. पुत्र के प्रति आसक्ति और भाग्यश्री के प्रति विरक्ति यह इस घर की पहचान थी.

लेकिन, उसे अपने एकांत जीवन से कभी ऊब नहीं हुई, बल्कि अपने एकाकीपन को उस ने जीवन का पर्याय बना लिया था. कालांतर में हरदेव के आत्मीय संसर्ग के कारण उस के जीवन की दिशा ही नहीं बल्कि परिभाषा भी बदल गई. बहुत ही साधारण युवक था वह, लेकिन विचारउदात्त था. सादगी में विचित्र आकर्षण था.

भाग्यश्री न तो खूबसूरत थी, न पिता के पास रुपए थे और न ही वह सभ्य माहौल में पलीबढ़ी थी. किंतु पता नहीं, हरदेव ने उस के हृदय में कौन सा अमृतरस का स्रोत देखा, जिस के आजीवन पान के लिए वह परिणयसूत्र में बंध गया. हरदेव के मातापिता ने इस रिश्ते को सहर्ष स्वीकार किया. भाग्यश्री के मातापिता ने उस के सामने कोई आपत्ति जाहिर नहीं की, मगर पीठपीछे बहुत कोसा. यहां तक कि वे लोग न इस से मिलने आए, न ही उन्होंने इसे घर बुलाया. खुश रह कर भी भाग्यश्री मायके के संभावित दुखद माहौल से दुखी हो जाती. उपेक्षा के बाद भी वह अपने मायके के प्रति लगाव को जब्त नहीं कर पाती और यदाकदा मांपिताजी, भाई से मिलने आती, किंतु लौटती तो अपमान के आंसू ले कर.

कुछ माह बाद ही भाग्यश्री को मालूम हुआ कि उस की मां लकवे का शिकार हो गई है. घबरा कर वह मायके आई. अपाहिज मां उसे देख कर रोने लगी, मानो बेटी के प्रति जितना भी दुर्भाव था, वह बह रहा हो. किंतु, पिताजी की मुद्रा कठोर थी. मां अपनी व्यथा सुनाती रही, लेकिन पिताजी मौन थे. आर्थिक तंगी तो घर में पहले से ही थी, अब तो कंगाली में आटा भी गीला हो गया था. मां के पास वह कुछ देर बैठी रही, फिर बहुत साहस जोड़ कर, मां को रुपए दे कर कहने लगी, ‘इलाज में कमी न करना मां. मैं तुम्हारा इलाज कराऊंगी, तुम चिंता न करना.’

उस की बातों को सुनते ही पिताजी का मौन भंग हुआ. बहुत ही उपेक्षित ढंग से उन्होंने कहा, ‘हम लोग यहां जैसे भी हैं, ठीक हैं. तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है. मिट्टी में इज्जत मिला कर आई है जान बचाने.’ विकृत भाव चेहरे पर आच्छादित था. कुछ पल चुप रहे, फिर उन्होंने कहा, ‘तुम्हारे आने पर यह रोएगी ही, इसलिए न आओ तो अच्छा रहेगा.’

घर में उस की उपेक्षा नई बात नहीं थी. आंसूभरी आंखों से मां को देखती हुई उदासी के साथ वह लौट गई. मातापिता ने उसे त्याग दिया. मगर वह त्याग नहीं पाई थी. इस बार 5वीं बार वह सहमीसहमी मां के घर आई थी. इस बार न उसे उपेक्षा की चिंता थी, न पिताजी के क्रोध का भय था. और न आने पर संकोच. मां के दुख के आगे सभी मौन थे.

उसे याद आई. छोटे भाई के प्रति मातापिता का लगाव देख कर वह यही सम झ बैठी थी कि यह घर उस का नहीं. खिलौने आए तो उस भाई के लिए ही. उसे याद नहीं कि उस ने कभी खिलौने से खेला भी था. खीर बनी, तो पहले भाई ने ही खाई. उस के खाने के बाद ही उसे मिली. मां से पूछती, ‘हर बार उसी की सुनी जाती, मेरी बात क्यों नहीं? गलती अगर बाबू करे तो दोषी मैं ही हूं, क्यों?’

लापरवाही के साथ बड़े गर्व से मां कहती, ‘उस की बराबरी करोगी? वह बेटा है. मरने पर पिंडदान करेगा.’ मां के इस दुर्भाव को वह नहीं भूली. पति के घर में हर सुख होने के बाद भी वह अतीत से निकल नहीं पाई. बारबार उसे चुभन का एहसास होता रहा. लेकिन अब? मां की विवशता, लाचारी और कष्ट के सामने उस का अपना दुख तुच्छ था.

कुछ पल वह मां के पास बैठी रही. फिर बोली, ‘‘बाबू कहां है?’’ बचपन से ही, वह भाई को बाबू बोलती आई थी. यही उसे सिखाया गया था.

‘‘होगा अपने कमरे में,’’ विरक्तभाव से मां ने कहा.

भाग्यश्री कमरे में जा कर बाबू के पास बैठ गई. पत्थर पर फूल की क्यारी लगाने की लालसा में उसे कुछ पल अपलक देखती रही. फिर साहस समेट कर बोली, ‘‘आज तक इस घर ने मु झे कुछ नहीं दिया है. बहनबेटी को देना बड़ा पुण्य का काम होता है.’’

बाबू आश्चर्य से उसे देखने लगा, क्योंकि किसी से कुछ मांगना उस का स्वभाव नहीं था.

‘‘क्या कहती हो दीदी? क्या दूं,’’ बाबू ने पूछा.

‘‘मन का चैन,’’ याचक बन कर उस ने कहा.

बाबू चुप रहा. बाबू के चेहरे का भाव पढ़ कर उस ने आगे कहा, ‘‘देखो बाबू, हम दोनों यहीं पलेबढ़े. लेकिन, तुम्हें याद है? मांपिताजी का सारा ध्यान तुम्हीं पर रहता था. तुम्हीं उन के लिए सबकुछ हो. उन के विश्वास का मान रख लो. मु झे मेरे मन का चैन मिल जाएगा.’’ बोलतेबोलते उस का गला भर आया. कुछ रुक कर फिर बोली, ‘‘याद है न? मां तुम्हें छिप कर पैसा देती थीं जलेबियां खाने के लिए. मैं मांगती, तो कहतीं ‘इस की बराबरी करोगी? यह बेटा है, आजीवन मु झे देखेगा.’  और मैं चुप हो जाती. मां के इस प्रेम का मान रख लो बाबू. पहले उस के दुर्भाव पर दुख होता था और अब उस की विवशता पर. दुख मेरे समय में ही रहा.’’

‘‘तुम क्या कह रही हो, मैं सम झ नहीं पा रहा हूं,’’ कुछ खी झ कर बाबू ने कहा, ‘‘क्या कमी करता हूं? दवा, उचित खानापीना, सभी तो हो रहा है. क्या कमी है?’’

‘‘आत्मीयता की कमी है,’’ भाग्यश्री का संक्षिप्त उत्तर था. ‘चोर बोले जोर से’ यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है. खी झ कर बाबू बोला, ‘‘हांहां, मैं गलत हूं. मगर तुम ने कौन सी आत्मीयता दिखाई? आज भी कोई पूछता है कि भाग्यश्री कैसी है, तो लगता है कि व्यंग्य से पूछ रहा है.’’

बाबू की यह बात उसे चुभ गई. आंखें नम हो गईं. मगर धीरे से कहने लगी, ‘‘हां, मैं ने गलत काम किया है. तुम लोगों के सताने पर भी मैं ने आत्माहत्या नहीं की, बल्कि जिंदगी को तलाशा है, यही गलती हुई है न?’’

बाबू चुप रहा.

‘‘देखो बाबू,’’ भरे हुए कंठ से उस ने कहा, ‘‘बहस नहीं करो. मैं इतना ही जानती हूं कि मांपिताजी, मांपिताजी होते हैं. मैं ने इतना अन्याय सह कर भी मन मैला न किया. फिर तुम्हें क्या शिकायत है कि इन के दुखसुख में हाल भी न पूछो? दवा से ज्यादा सद्भाव का असर होता है.’’

‘‘कौन कहता है?’’ बात का रुख बदलते हुए बाबू ने कहा, ‘‘कौन शिकायत करता है? क्या नहीं करता? तुम्हें पता है सारी बातें? कौन सा ऐसा दिन है, जब पिताजी मु झे नहीं कोसते? एक सरकारी नौकरी न मिली कि नालायक, निकम्मा विशेषणों से अलंकृत करते रहते हैं. बीती बातों को उखाड़उखाड़ कर घर में कुहराम मचाए रहते हैं. घर की शांति भंग हो गई है.’’ वह अपने आंसू पोंछने लगा.

बात जब पिताजी पर आई, तो कमरे में आ कर चीखते हुए भाग्यश्री को बोलने लगे, ‘‘हमारे घर के मामले में तुम कौन हो बोलने वाली? कौन तुम्हें यहां की बातें बताता है? यह मेरा बेटा है, मैं इसे कुछ बोलूं तो तुम्हें क्या? यह हमें लात मारे, तुम्हें क्या मतलब?’’

बात कहां से कहां पहुंच गई. भाग्यश्री को भी क्रोध आ गया. वह कुछ बोली नहीं, बस, आक्रोश से अपने पिताजी को देखती रही. पिताजी का चीखना जारी था, ‘‘तुम अपने घर में खुश रहो. हमारे घर के मामले में तुम्हें बोलने का अधिकार नहीं है.’’

‘हमारा घर?

‘पिताजी का घर?

‘बाबू का घर? मेरा नहीं? हां, पहले भी तो नहीं था. और अब? शादी के बाद?’ भाग्यश्री मन में सोच रही थी.

पिताजी को बोलते देख, मां ने आवाज लगाई. भाग्यश्री मां के पास चली गई. मां ने रोते हुए कहा, ‘‘समय तो किसी का कोई बदल नहीं सकता न बेटा? मेरे समय में ही दुख लिखा है, इसलिए तो बापबेटे की मत मारी गई. आपस में भिड़ कर एकदूसरे का सिर फोड़ते रहते हैं. तुम बेकार मेरी चिंता करती हो. तुम्हें यहां कोई नहीं सराहता, फिर क्यों आती हो.’’ यह कहती हुई वह फूटफूट कर रो पड़ी.

पिताजी के प्रति उत्पन्न आक्रोश ममता में घुल गया. कुछ देर तक भाग्यश्री सिर नीचे किए बैठी रही. आंखों से आंसू बहते रहे. अचानक उठी और बाबू से बोली, ‘‘मां, मेरी भी है. इस की हालत में सुधार यदि नहीं हुआ, तो बलपूर्वक मैं अपने साथ ले जाऊंगी,’’ कहती हुई वह चली गई.

महल्ले में ही उस का मुंहबोला एक भाई था, कुंदन. वह बाबू का दोस्त भी था. उदास हो कर लौटती भाग्यश्री को देख कर वह उस के पीछे दौड़ा, ‘‘दीदी, ओ दीदी.’’

भाग्यश्री ने पीछे मुड़ कर देखा. बनावटी मुसकान अधरों पर बिखेर कर हालचाल पूछने लगी. उसे मालूम हुआ कि फिजियोथेरैपी द्वारा वह इलाज करने लगा है. उस की उदास आंखें चमक उठीं. याचनाभरी आवाज में कहा, ‘‘भाई, मेरी मां को भी देख लो.’’

‘‘चाचीजी को? हां, स्थिति ठीक नहीं है, यह सुना, लेकिन किसी ने मु झ से कहा ही नहीं,’’ कुंदन ने कहा.

‘‘मैं कह रही हूं न,’’ व्यग्र होते हुए भाग्यश्री ने कहा.

दो पल दोनों चुप रहे. कुछ सोच कर भाग्यश्री ने फिर कहा, ‘‘लेकिन भाई, यह बताना नहीं कि मैं ने तुम्हें भेजा है. नहीं तो मां का इलाज करवाने नहीं देंगे सब.’’

‘‘लेकिन, लेकिन क्या कहूंगा?’’

‘‘यही कि, बाबू के मित्र हो, इसलिए इंसानियतवश. और हां,’’ भाग्यश्री ने अपने बटुए में से एक हजार रुपया निकाल कर देते हुए कहा, ‘‘तुम मेरा पता लिख लो, मेरे घर आ कर ही अपना मेहनताना ले लेना.’’

कुंदन उसे देखता रहा. भाग्यश्री की आंखों में कृतज्ञता छाई थी, बोली, ‘‘भाई, तुम्हारा एहसान मैं याद रखूंगी. बस, मेरी मां को ठीक कर दो.’’

कुंदन सिर हिला कर कह रहा था, ‘‘ठीक है.’’

दो माह बाद वह फिर से मायके आई. हालांकि कुंदन से उसे मालूम हो गया था कि मां की स्थिति में बहुत सुधार है, फिर भी वह देखना चाहती थी. भाग्यश्री के मन में एक अज्ञात भय था. जैसे कोई किसी दूसरे के घर में प्रवेश कर रहा हो वह भी चोरीचोरी. जैसेजैसे घर निकट आ रहा था, उस के कदम की गति धीमी होती जा रही थी और हृदय की धड़कन बढ़ती जा रही थी.

वहां पहुंच कर उस ने बरामदे में  झांका. मां, पिताजी और बाबू तीनों बैठ कर चाय पी रहे थे. सभी प्रसन्न थे. आपस में बातें करते हुए हंस रहे थे. भाग्यश्री ने शायद ही कभी ऐसा दृश्य देखा होगा. भाग्यश्री वहीं ठहर गई. उस ने अपने भाई से ‘मन का चैन’ मांगा था, भाई ने उसे दे दिया. मायके से प्राप्त उपेक्षा, तो उस का दुख था ही, लेकिन यह ‘मन का चैन’ उस का सुख था.

‘ठीक ही है,’ उस ने सोचा, मैं तो इस घर के लिए कभी थी ही नहीं. फिर अपना स्थान क्यों ढूढ़ूं? आज मन का चैन मिला, इस से बड़ा मायके का उपहार क्या होगा. मन का चैन ले कर वह वहीं से लौट आई, बिन बुलाए कभी न जाने के लिए.

बाहर निकल कर नम आंखों से अपने मायके का घर देख रही थी. अनायास उस के अधरों पर वेदना के साथ एक मुसकान दौड़ आई. उंगली से इशारा करती हुई, भरे हुए कंठ से वह बुदबुदाई, ‘मुझे पता है पिताजी, एक दिन आप मु झे बुलाएंगे जरूर. मन का चैन पा कर वह प्रसन्न थी, किंतु मायके के विद्रोह से उस का अंतर्मन बिलख रहा था. उस ने मन से पूछा, ‘लेकिन कहां बुलाएंगे?’ मन ने उत्तर भी दे दिया, ‘जल्द ही बुलाएंगे.’

अपनी आंखों को पोंछती हुई वह एकाएक मुड़ी और अपने घर की ओर चल दी. मन में विश्वास था कि एक दिन बुलावा आएगा, हां, बुलावा आएगा जरूर.

Emotional Story

How to Handle Emotions: प्लानिंग कैंसिलेशन- कैसे हैंडल करें इमोशन

How to Handle Emotions: सौरभ एक तूफान के इंतजार में पिछले 5 दिनों से गुमसुम बैठा है. दरअसल, सौरभ अपनी बीवी श्वेता के साथ एक हौलिडे पर जा रहा था. लेकिन अचानक औफिस में बहुत जरूरी प्रोजैक्ट आने के चलते उसे अपना हौलिडे कैंसिल करना पड़ा.

सौरभ ने अचानक ट्रिप कैंसल करने पर कई बार श्वेता से माफी मांगी लेकिन श्वेता ने गुस्से में जो चुप्पी लगाई. आज 5 दिन हो गए उस की वह गहरी चुप्पी टूटी नहीं. श्वेता की चुप्पी सौरभ का मन कचोट तो रही ही है, साथ ही एक डर भी पैदा कर रही है कि कहीं एक दिन श्वेता की यह चुप्पी उन के रिश्ते पर बिजली की तरह न गिरे.

जब कभी भी ट्रिप प्लान चेंज या पोस्टपौन या कैंसिल हो जाए तो मन बहुत उदास होता है, गुस्सा भी आता है खासकर तब जब प्लान किसी छुट्टी पर जाने का हो और वह भी किसी अपने खास के साथ.

किसी भी प्लान के फ्लौप होने का दर्द पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को अधिक होता है क्योंकि वे अधिक इमोशनल होती हैं और इस वजह से उन की नाराजगी, गुस्सा या उखड़ापन अधिक नजर आता है और इन्हीं इमोशन के

चलते उन के मन में बहुत अजीबोगरीब खयाल आते हैं जैसे:

यह तो मेरी बेइज्जती है: कई बार पत्नियां अपने हौलिडे कैंसलेशन को इतना दिल से लगा लेती हैं कि उसे अपने मानसम्मान से भी जोड़ लेती हैं, जिस वजह से प्लान कैंसलेशन पर उन्हें अपनी बेइज्जती सी महसूस होती है.

विश्वास का खंडन: अब आप के पति ने कई वादों के बाद यह प्लान बनाया होता है तो जब वह हौलिडे प्लान चेंज या कैंसिल होता है तो उन पत्नियों को पतियों के किए वादों पर संदेह होता है और यह संदेह मन में विश्वासघात का बीज भी बो देता है. पत्नियों को यही लगता है कि पति सिर्फ झूठी बातें करता है. चाहे वह कितना सच क्यों न बोले, पत्नियों को पति की हर बात, हर फरियाद झूठी ही लगेगी.

उन की कोई अहमियत नहीं: हर पत्नी यही चाहती है कि उस का पति सब से पहले उसे ही अहमियत दे. चाहे कोई भी स्थितिपरिस्थिति हो उस का साथ निभाए और उसे ही ऊपर रखे. ऐसे में जब यों कोई स्थिति उत्पन्न होती है तो पत्नी को यही लगता है कि काम के आगे उस की कोई कदर नहीं.

मगर अगर यह गुस्सा या खेद पत्नी मन के अंदर ही दबा कर बैठ जाए तो उस का परिणाम अच्छा नहीं होता क्योंकि मन में दबी पीड़ा एक दिन एक तूफान की तरह उमड़ती है और फिर आपसी प्रेम और रिश्ते को खराब करती है. इसलिए बेहतर होगा कि अपने इमोशन पर काबू पाएं और ट्रिप प्लान में आए इस चेंज को हैंडल करें और वह ऐसे:

क्लीयर कंयुनिकेशन: चुप्पी धरने के बजाय अपने पार्टनर के साथ बैठ कर बातों और मुद्दों को क्लीयर करें. जो भी बात आप को बुरी लगी, आप को चुभी उस पर विस्तार से बिना एकदूसरे को दोषी माने खुल कर बातचीत करे

उन के कारण को भी समझें: माना आप का दिल दुखी है लेकिन यह भी समझें कि प्लान सिर्फ आप का ही नहीं, उन का भी तो खराब हुआ है. इसलिए उन की परेशानी को भी समझें. क्या कारण उभर आया, उसे जानें, उस की गंभीरता को समझें.

दिल नहीं बल्कि तर्क पर ध्यान दें: आप के पति जो भी कारण बता रहे हैं. उस कारण को सम?ाने का प्रयास करें न कि दिल दुखने के एवज में उन के हर तर्क को नकारें और उन की बात को मिथ्याचार समझें.

इमोशन पर काबू रखें: ऐसी स्थिति से मन बहुत व्याकुल और रुष्ठ होता है, जिस के चलते न भावनाओं पर काबू होता है और न जबान पर. ठेस पहुंचाने की इच्छा न रखते हुए भी मुंह से कुछ अपशब्द या तीखी भाषा निकल ही आती है. इसलिए अपने दिल और दिमाग को ठंडा रखें और अधिक इमोशनल न हों.

चेंज को स्वीकारें: जब प्लान रद्द हो ही चुका है तो उसे स्वीकार करें न कि एक हठी की तरह शिकायत करती रहीं. आप के जिद्द करने या गुस्सा दिखाने से प्लान वापस तो औन नहीं हो जाएगा, जो परिस्थिति अचानक उभरी है, वह अपनेआप ही तो नहीं सुलझ जाएगी. इसलिए अच्छा होगा कि इस बदलाव को सहजता से स्वीकारें और अगर अपने पति की आई परेशानी या कार्य में कुछ मदद कर सकती हैं तो करें. उन के साथ बैठ कर कोई रास्ता निकालें.

नया प्लान करें: बहुत बार देखा गया है कि एक बार प्लान कैंसिल या पोस्टपौन होने पर पत्नियां अगले प्लान के लिए पतियों का साथ नहीं देती. न अगला ट्रिप प्लान करती हैं और जाने को भी तैयार नहीं होती हैं. नहीं उन का यही कहना होता है कि तुम ने कैसे ट्रिप कैंसिल किया, अब जाओ. मैं अब कहीं जाऊंगी ही नहीं. उन का यह रोष, न जाने की जिद्द सही नहीं. माना आप के पति ने एक ट्रिप किसी कारणवश कैंसिल कर दिया, लहकिन ये भी देखिए कि उस की भरपाई के लिए वे अगले ट्रिप की प्लानिंग भी तो कर रहे हैं. इसलिए उन के प्रयास को व्यर्थ न करें बल्कि उन का साथ दें.

अनुमान या ओवर थिंकिंग से बचें: भले कोई समस्या हो या नहीं, महिलाओं को ओवर थिंकिंग करनी ही होती है. फालतू के अनुमान लगाना तो दिनभर किसी न किसी बहाने दिमाग में लगा ही रहता है और फिर अगर बात हौलिडे ट्रिप जैसी खास हो तो उस के कैंसलेशन पर तो बहुत से अनुमान का गुणाभाग होने लगता है जैसे ‘मेरा पति को मेरी कोई कदर नहीं,’ ‘मुझ से प्यार नहीं करते,’ ‘अचानक क्यों कैंसिल किया,’ ‘कहीं कोई दूसरा चक्कर तो नहीं,’ ‘सिर्फ अपने काम को महत्त्व देते हैं,’ ऐसे अनेक मनगढ़ंत कारण उन के दिमाग में दौड़ने लगते है और फिर यह मनगढ़ंत सोच दौड़तेदौड़ते जब दिमाग से मुंह के जरीए बाहर आती है तो आप के पति का दिल दुखाती है और रिश्ते में संदेह पैदा करती है.

ट्रिप पर जाने की उत्सुकता, तैयारी, शौपिंग लिस्ट और बहुत सी ट्रिप से जुड़ी आशाएं और इच्छाओं पर जब पानी फिरे तो मन तो दुखेगा ही, गुस्सा भी आएगा और यह जायज भी है. मगर अपने गुस्से में यह अनदेखा न करें कि आप जितनी ही उत्सुकता और इच्छा आप के पति की भी तो होगी इस ट्रिप की.

ट्रिप कैंसिल करने से उन का भी मन उदास हुआ होगा और जब कैंसलेशन की पहल उन्होंने ही किसी कारणवश की है तो उन्हें तो अपराधबोध अर्थात गिल्ट भी फील हो रहा होगा. इसलिए उन की माफी को खुले दिल से स्वीकार करें और अगले ट्रिप पर जाने को हां भी कहें अन्यथा आप के मनमुटाव से कहीं आप के रिश्ते में किसी प्रकार का असंतुलन न पैदा हो जाए.

How to Handle Emotions

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें