लेखक- राजीव रोहित
‘‘मुझे छुट्टी चाहिए,’’ जयंती ने लता से कहा.
‘‘क्यों? अभी हाल ही में तो छुट्टी पर गई थी,’’ लता ने हैरान हो कर जयंती की तरफ देखते हुए कहा.
‘‘अरे यार, उत्सव मनाना है,’’ जयंती ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘उत्सव…’’ लता हैरान हो गई.
‘‘हां मेरी यार उत्सव यानी त्योहार…’’
‘‘वह तो ठीक है लेकिन अभीअभी तो लोड़ी गई न?’’
‘‘और भी उत्सव हैं यार…’’ जयंती ने गंभीर स्वर में कहा.
‘‘अच्छा जरा मैं भी तो सुनूं. नया उत्सव कौन सा है?’’
‘‘है तो पर सोच रही हूं कि उत्सव का उल्लेख छुट्टी के आवेदनपत्र में करूं या नहीं,’’ जयंती थोड़ी गंभीर हो गई.
‘‘अब व्यक्तिगत स्तर पर जो चाहे हम उत्सव मना लें तो कोई क्या कर लेगा. लिख दे न जो भी कारण है,’’ लता ने उस की तरफ देखते हुए कहा.
‘‘कारण तो ऐसा है मेरी जान के उसे पढ़ कर हंगामा हो जाए.’’
‘‘बहनजी, ऐसा भी क्या कारण है?’’ लता ने उस की बांह में चिकोटी काटते हुए कहा.
‘‘है एक विशेष कारण. चल तुझे बता ही दूं,’’ जयंती ने शोख अंदाज में कहा.
‘‘जल्दी बोल, मैं मरी जा रही हूं.’’
‘‘तो दिल थाम कर सुन, मैं अपनी तलाक की सालगिरह मनाना चाहती हूं,’’ जयंती ने गंभीर स्वर में कहा.
‘‘क्या कह रही है तू?’’ लता जैसे उछल पड़ी. उस की आंखों में जबरदस्त कुतूहल उभरा.
‘‘हां यार, लोग शादी की सालगिरह मनाते हैं मैं तलाक की मनाना चाहती हूं तो इस में बुराई क्या है?’’
‘‘बिलकुल सही बात है. इस फरवरी की
14 तारीख को यानी वैलेंटाइनडे के दिन 1 वर्ष पूरा हो जाएंगे. है न जयंती?’’ लता भी गंभीर हो गई.
‘‘अरे वाह. तुम्हें तो याद है. हां यार, पूरे
1 वर्ष तक यातनाएं झेलती रही. अब अपार शांति,’’ जयंती की आंखों में नमी थी.
लता अच्छी तरह जानती थी कि जयंती को इस तलाक के लिए कितनी पीड़ा
?ोलनी पड़ी थी.
‘‘हां यार, ऐसे ही मन में आया कि लोग सिर्फ शादी की. जन्मदिन की ही खुशियां मनाते हैं. तलाक की भी खुशी क्यों नहीं मनानी चाहिये. स्त्री और पुरुष दोनों मनाएं. तुम्हें क्या लगता है?’’ जयंती ने फिर कहा.
‘‘बात तो सही कह रही हो तुम. आखिर स्त्री हो या पुरुष दोनों ही तो यातनाओं से गुजरते हैं,’’ लता ने सहमति प्रदान की.
‘‘जो हम पर है गुजरी हम ही जानते हैं,’’ जयंती अनायास गुनगुना उठी.
‘‘हां यार. अच्छा मेरी जान घर वालों को बताया?’’
‘‘पता नहीं उन की प्रतिक्रिया क्या होगी? मांबाबा का तो पता नहीं लेकिन मुझे मालूम है, एक आदमी मुझे पूरा समर्थन देगा, इस जश्न में मेरा बढ़चढ़ कर साथ देगा.’’
‘‘कौन है वह?’’
‘‘सगे तो नहीं पर सगों से बढ़ कर हैं सुशांत भैया. मेरी बड़ी मौसी के एकमात्र सुपुत्र. अविवाहित रहने का प्रण कर रखा है अन्यथा मैं एक बार तुम से जरूर कहती कि किसी और को जीवनसाथी बनाने से पहले एक बार सुशांत भाई से मिल लो,’’ जयंती ने कहा.
‘‘धत्, वैसे मेरा खयाल है कि घर वालों को भी अपनी बेटी की खुशी में शामिल होना चाहिए,’’ लता ने अपना मत प्रकट किया.
‘‘तुम्हें भी आना होगा, मेरा साथ दोगी न? जयंती ने पूछा.
‘‘जरूर साथ दूंगी,’’ लता ने उस के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा.
‘‘तुम्हारे घरवालों को तो कोई समस्या
नहीं होगी?’’
‘‘बिलकुल नहीं. बेफिक्र रहो.’’
‘‘घबराओ मत, ज्यादा भागदौड़ नहीं करनी होगी. उन्हीं डैकोरेटर वालों को बुलाऊंगी जो हमारी शादी में आए थे,’’ यह कहते हुए जयंती ने एक जोरदार ठहाका लगाया.
‘‘उन को भी हैरानी होगी.’’
‘‘वह तो पूरी दुनिया को होगी और इस में हरज ही क्या है? जिन्होंने एक बार घर बसाने के लिए शमियाना लगाया था वेअब उस घर से मुक्ति पाने के लिए शामियाना लगाएंगे.’’
‘‘तुम भी यार अनोखी चीज हो.’’
‘‘इस में क्या शक?’’
‘‘अच्छा यह सब तो ठीक है आवेदन पत्र लिखा क्या? उस खड़ूस से छुट्टी भी तो मंजूर करानी है.’’
‘‘हां यार, अच्छा हुआ याद दिलाया. मौड्यूल खोलती हूं.’’
‘‘कारण क्या लिखोगी?’’
‘‘व्यक्तिगत काम ही लिखूंगी. खड़ूस अमन कुछ ज्यादा ही पूछताछ करेगा तो बताना ही पड़ेगा,’’ जयंती ने आवेदनपत्र मौड्युल में पंजीकृत करते हुए कहा, ‘‘अमनजी तो निकल गए जयंती.’’
‘‘अरे, अब तो कल ही दिया जा सकता है. औफिस बंद होने का समय भी तो हो गया है. हमें भी निकलना चाहिए,’’ जयंती ने कंप्यूटर शटडाउन की प्रक्रिया पूरी करते हुए कहा.
‘‘हां, चलना चाहिए.’’
दोनों औफिस से बाहर आ गईं. दोनों चर्चगेट की तरफ चल पड़ीं. चाल में बहुत तेजी नहीं थी लेकिन उन के आसपास चलने वाले लोग बड़ी तेजी से चल रहे थे जैसे उन की जिंदगी का मकसद केवल ट्रेन पकड़ना रह गया हो.
‘‘तेज चलने की इच्छा नहीं होती?’’ लता ने चलतेचलते पूछ लिया?
‘‘तेज चलने की सजा भुगत चुकी हूं. अब और नहीं.’’
‘‘तेज चलने की सजा… सजा… सम?ा नहीं?’’
‘‘शादी में बहुत जल्दी मचाई थी न,’’
जयंती हंसी.
‘‘ओह, सम?ा. मगर मैं तो ट्रेन पकड़ने के लिए जो तेजी दिखाते हैं उस की बात कर रही थी.’’
‘‘चर्चगेट आ गया.’’
‘‘हम चर्चगेट आ गए बहनजी. चर्चगेट तो अपनी जगह है.’’
दोनों हंस पड़ीं. ट्रेन प्लेटफौर्म में लग चुकी थी. दोनों रोज की तरह सामान्य डब्बे
में बैठ गईं. वे महिला डब्बे में नहीं बैठती थीं. रोज के आनेजाने वाले पुरुष यात्री उन्हें पहचान गए थे. शुरूशुरू में वे नाकभौं सिकोड़ते थे. यह स्वाभाविक भी था. आखिर महिलाओं के लिए विशेष डब्बे तो हर लोकल ट्रेन में लगते ही थे. उन्हें यह महसूस होता था कि ये दोनों लड़कियां सामान्य डब्बे में बैठ कर जैसे पुरुषों का हक मारती हैं. आगे चल कर धीरेधीरे सभी यात्री उन की उपस्थिति के अभ्यस्त हो गए थे. कई बार उन के देर से आने पर बैठने की जगह भी दे देते.
‘‘यात्री वाहनों में महिलाओं के लिए विशेष स्थान की शुरुआत का इतिहास किसी को पता नहीं. सभ्यता बदलने के क्रम में शायद पुरुषों की बुरी नजरों से महिलाओं को बचाने के लिए यह व्यवस्था शुरू की गई होगी,’’ लता ने कहा.
‘‘हो सकता है,’’ जयंती ने हामी भरी.
‘‘कल तो तेरी छुट्टी का हंगामा है.’’
‘‘आगे भी तो हंगामा ही है,’’ जयंती ने एक जोरदार ठहाका लगाया.
इस बीच ट्रेन चल पड़ी. इधरउधर की बातों से सफर कट गया. पहले लता का स्टेशन सांताक्रूज आया. वह उतर गई.
‘‘कल मिलेंगे,’’ लता ने हाथ हिलाया.
जयंती ने भी हाथ हिला कर उसे विदा किया.
जयंती और लता केंद्र सरकार के एक सार्वजनिक उपक्रम में 7 वर्षों से पदस्थापित थे. दोनों ने एक ही साथ इस दफ्तर में नियुक्ति पाई थी. हमउम्र होने के कारण जल्द ही दोनों में दोस्ती गहरी हो गई थी. लता ने अभी तक विवाह नहीं किया था, जबकि जयंती नौकरी में नियुक्त होने से कुछ दिन पहले ही घर वालों से विद्रोह करते हुए प्रेम विवाह तो रचा लिया था. किंतु शादी के कुछ ही दिनों बाद पति से उस की अनबन शुरू हो गई थी. परिणाम तलाक के रूप में सामने आया. जयंती इस तलाक से इतनी खुश थी कि उस ने हरजाना लेना भी स्वीकार नहीं किया था.
पिछले साल ही जयंती की 14 फरवरी को तलाक की अपील अंतत: मंजूर हुई
थी. उस के शब्दों में कहा जाए तो उसे मुक्ति मिली थी. 1 साल बीतने को था. अगले सप्ताह शुक्रवार को यानी 14 फरवरी को उस के तलाक का 1 साल पूरा हो रहा था. जयंती इस मौके को एक उत्सव में बदलना चाहती थी.
लता हैरान थी. अपने पूरे जीवन में उस ने एक भी स्त्री या पुरुष नहीं देखा था जिस ने तलाक की खुशी मनाई हो. उस ने यह सोचने की भी जरूरत नहीं सम?ा कि दुनिया क्या कहेगी? उस के रिश्तेदार क्या कहेंगे? क्या उसे गलत नजरों से नहीं देखा जाएगा? यहां तक कि उसे चरित्रहीन भी समझा जा सकता है. जयंती आजादखयाल की है. वह इस तलाक से इतनी खुश है तो उसे जश्न मनाने का पूरापूरा अधिकार है. कल औफिस वालों की प्रतिक्रिया देखने लायक होगी. वह जयंती के साथ है. हर कदम पर उस का साथ देगी. घर वालों को अभी कुछ नहीं बताना ही बेहतर होगा.
दूसरे दिन दोनों औफिस आईं. दोपहर के भोजन के बाद जयंती अपनी अर्जी ले कर अमनजी के सामने उपस्थित हुई.
‘‘सर, मु?ो अगले सप्ताह 10 से 14 फरवरी तक 5 दिनों की छुट्टी चाहिए,’’ जयंती ने अपना आवेदन विभाग के अध्यक्ष अमनजी के सामने रखते हुए कहा.
अमनजी ने आवेदनपत्र हाथ में लिया और पूरी तरह पढ़ने के पश्चात उन्होंने एक नजर जयंती पर डाली. पूछा, ‘‘घरेलू कार्य?’’
‘‘जी सर.’’
‘‘पूछ सकता हूं क्या है?’’
‘‘एक पारिवारिक कार्यक्रम है.’’
‘‘जन्मदिन… शादी…?’’
‘‘नहीं सर,’’ जयंती ने उत्तर दिया.
‘‘सिर्फ 5 दिन? आगे तो नहीं बढ़ाओगी?’’
‘‘हो भी सकता है. ज्यादा संभव है कि ऐसा नहीं होगा.’’
‘‘अभी हाल ही में तो लंबी छुट्टी पर गई थी?’’
‘‘काम तो कभी भी निकल सकता है न सर,’’ जयंती उस के सवालों पर झुंझला रही थी.
‘‘मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था. छुट्टी लेना तो सरकारी कर्मचारियों का हक है,’’ अमनजी ने मुसकराते हुए कहा और आवेदनपत्र पर हस्ताक्षर कर दिए.
जयंती ने राहत की सांस ली.
‘‘सर, आप भी आइए. मुझे अच्छा लगेगा.’’
जयंती ने कनखियों से लता की तरफ देखते हुए कहा तो लता मुसकराए बगैर न रह सकी.
‘‘अच्छा, कोई खास मौका है?’’ अमनजी ने कुतूहलता दर्शाई.
‘‘हां सर. इस महीने की 14 तारीख को मेरे तलाक को 1 साल हो जाएगा. उस की सालगिरह है,’’ जयंती ने मुसकराते हुए थोड़ा तेज स्वर में कहा ताकि सभी सुन लें.
चारों तरफ एक सन्नाटा सा छा गया. अमनजी स्तब्ध हो गए. उन के आसपास बैठे सारे
लोगों का भी यही हाल था. सभी हैरान थे. हमेशा शांत रहने वाली यह लड़की ऐसा भी कर सकती है?
‘‘बाकायदा सभी को निमंत्रित करूंगी. हमारा कार्यालय एक परिवार है न तो सभी का एकदूसरे की खुशी में शामिल होना लाजिम है,’’ जयंती ने मुसकराते हुए कहा.
अमनजी समेत विभाग के सारे कर्मचारी हैरान थे. इस प्रकार का भी आमंत्रण मिलेगा ऐसा वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे. वे क्या जो भी सुनेगा वह हैरान हो जाएगा.
‘‘आप गंभीर हैं?’’ अमनजी ने गले की खुश्की साफ करते हुए पूछा.
‘‘बिलकुल सर. कोई भ्रम नहीं है. आप भी भ्रम न पालें. मैं तलाक की सालगिरह का ही आमंत्रण दे रही हूं वैलेंटाइनडे का नहीं. आमंत्रण कार्ड बना रही हूं. औफिस के व्हाट्सगु्रप में डाल दूंगी,’’ जयंती के स्वर में आत्मविश्वास ?ालक रहा था.
‘‘अच्छा.’’ अमन सर ने मरी हुई आवाज में कहा.
जयंती अपनी जगह पर आ कर बैठ गई.
‘‘यार, औफिस में तो बोल दिया. सब को दावत दे दी. अब घर वालों को समझाना पड़ेगा खासतौर पर मां को समझाना बेहद मुश्किल है. पुराने जमाने की हैं न,’’ जयंती ने लता से कहा.
‘‘मैं भी इस मुश्किल में फंसने वाली हूं,’’ लता ने कहा.
‘‘क्यों तुम्हें क्या हुआ?’’
‘‘मुझे भी तो बताना पडे़गा न घर में कि मैं अपनी प्यारी सहेली के तलाक की वर्षगांठ मनाने जा रही हूं.’’
‘‘देख भई, अब दोस्त के लिए इतना तो करना पड़ेगा.’’
‘‘वह तो है. चिंता न कर मैं संभाल लूंगी.’’
‘‘यह हुई न बात,’’ जयंती ने खुश हो कर कहा.
‘‘कल मैं होटल, खानेपीने, डैकोरेटर्स सब ठीक कर लूंगी. उत्सव शानदार होना चाहिए.’’
‘‘बिलकुल होना चाहिए.’’
दूसरे दिन जयंती सब से पहले एक मध्यवर्गीय लेकिन बड़ा होटल
‘स्वागत’ का हाल बुक करने होटल गई.
‘‘मुझे आप के होटल में 14 फरवरी के लिए इवेंट हौल बुक करना है,’’ जयंती ने होटल प्रबंधक से कहा.
‘‘जी मैडम. शादी या जन्मदिन? हां समझा. 14 फरवरी अर्थात् वैलेंटाइन डे.’’
‘‘बिलकुल नहीं. वैसे यह बताना जरूरी
है क्या?’’
‘‘जी जरूरी तो नहीं. बस यह था कि हमारी तरफ से फंक्शन के हिसाब से कुछ डैकोरेशन की व्यवस्था हो जाती. आप अपनी तरफ से डैकोरेशन कराने वाली हैं तो कोई बात नहीं.’’
‘‘जी हां. आप की तरफ से केवल एक छोटा सा औरकैस्ट्रा का इंतजाम हो जाए. केवल खुशी के गीत गाने हैं. बस काफी है. वैसे यह बता दूं कि यह मेरी तलाक की सालगिरह है और वह भी पहली,’’ जयंती ने हंस कर कहा.
होटल प्रबंधक और रिसैप्सन पर बैठी कर्मचारी का मुंह खुला का खुला रह गया.
‘‘एक बात और है,’’ जयंती ने मुसकराते
हुए कहा.
‘‘जी बताइए.’’
‘‘मेरी शादी का समारोह भी इसी होटल के इवेंट हौल में हुआ था.’’
‘‘हांजी, मैं आप को देख कर याद करने की कोशिश कर रहा था. याद आ गया,’’ होटल प्रबंधक ने कहा.
जयंती ने 5 हजार रुपए पेशगी के तौर पर दिए और रसीद ले कर निकल गई.
होटल प्रबंधक यह जान कर हैरान हो गया कि यह लड़की अपने तलाक की पहली सालगिरह मना रही है. वह रिसैप्शनिस्ट से कहे बिना नहीं रह सका, ‘‘क्या जमाना इतना आगे बढ़ गया है?’’
‘‘यस सर,’’ रिसैप्शनिस्ट ने हंसते हुए कहा.
‘‘तुम्हारी शादी हो गई?’’
‘‘जी सर और फिलहाल मेरा अगले कई सालों तक तलाक लेने का कोई इरादा नहीं है..’’
‘‘अगर कभी लेना चाहो तो उस की सालगिरह जरूर मनाना.’’
‘‘शुभशुभ बोलो सर. आप की हो गई?’’
‘‘क्या, शादी या तलाक?’’ उस ने हंसते
हुए कहा.
‘‘जो भी हुआ हो?’’
‘‘10 महीने पहले तलाक हुआ है,’’ उस ने गंभीरता से कहा.
रिसैप्शनिस्ट बेचारी चुप हो गई. आगे बात करना या कुछ पूछना जरूरी नहीं लगा.
‘‘इस लड़की की पार्टी देख लेता हूं. फिर मैं भी सोचूंगा,’’ यह कह कर वह लाउंज की तरफ निकल गया.
अब सभी को उस समारोह की प्रतीक्षा थी. शहर के सभी स्थानीय हिंदी और
अंगरेजी अखबारों में जयंती ने अपनी एक तसवीर के साथ विज्ञापन प्रकाशित कराया था, ‘‘मैं अपनी वैवाहिक जीवन से मुक्ति की सालगिरह का समारोह 14 फरवरी को मना रही हूं. सभी मित्रों और संबंधियों की हार्दिक आभारी हूं, जिन्होंने बुरे समय में मेरा साथ दिया. इस समारोह में आप की उपस्थिति मेरे लिए बेहद जरूरी है. आप सभी सादर आमंत्रित हैं.’’
जयंती के इस आयोजन से घर वाले न खुश हो पा रहे थे और न नाराजगी दर्शा पा रहे थे.
‘‘जयंती, आखिर सार्वजनिक रूप से हमारे खानदान का तमाशा बना कर तुम्हें क्या मिलेगा?’’ मां ने अपनी नाराजगी दर्शाई.
‘‘उस ने मेरी जिंदगी का तमाशा बना दिया वह कुछ भी नहीं?’’
‘‘सम?ा सकती हूं लेकिन तुम्हारा यह समारोह तलाक के बजाय फिर से तुम्हारी शादी का होता तो ज्यादा अच्छा लगता,’’ मां ने गंभीर स्वर में कहा.
‘‘उस का तो पता नहीं लेकिन एक बात तो निश्चित है मां, फिलहाल मैं दोबारा शादी करने की सोच भी नहीं रही हूं,’’ जयंती ने कहा.
‘‘क्यों नहीं करेगी? क्या जिंदगीभर कुंआरी रहोगी?’’ मां के स्वर में नाराजगी झलक रही थी.
‘‘क्या लड़कियां कुंआरी रहने का फैसला नहीं कर सकतीं?’’
‘‘हां कर सकती हैं लेकिन ऐसे फैसले करने की एक उम्र होती है और तुम्हारी उम्र ही क्या हुई है?’’
‘‘ठीक है. तुम्हारी बात सही
है. लेकिन फिलहाल तो मैं यह तलाक का जश्न मनाना चाहती हूं. बाकी बाते बाद में करेंगे.’’
‘‘हमारे रिश्तेदार हम पर हंस रहे हैं जयंती,’’ मां का स्वर रोंआसा था.
‘‘उन का और काम ही क्या है? दूसरों की बरबादी पर हंसना और फिर जब सब ठीक होने लगे तो फिर दुनियाभर में खुश रहने का नाटक करने में कोई कसर नहीं छोड़ना. मैं जब तलाक का मुकदमा लड़ रही थी तब तो सुशांत भैया के सिवा साथ देने के लिए कोई सामने नहीं आया था.’’
मां चुप हो गईं. यह सच भी था. जयंती ने अपने भूतपूर्व पति परेश से छुटकारा पाने के लिए सारी लड़ाई अकेले लड़ी थी. सिर्फ उन के भाई का बेटा सुशांत ही ऐसा शख्स था जो जयंती के साथ पूरे मुकदमे के दौरान रहा था.
सुशांत एक कालेज में प्रोफैसर था. जयंती और सुशांत दोनों बचपन से एकदूसरे के प्रति असीम स्नेह रखते थे. जयंती को उस ने हमेशा अपने पैरो पर खड़ा होने के लिए प्रेरित किया था. परेश से शादी के फैसले पर वह अवश्य जयंती से नाराज हुआ था. परेश के बारे में वह अच्छी तरह जानता था कि वह किस किस्म का इंसान है. उस ने जयंती को यह बात सम?ाने की काफी कोशिश की थी कि परेश उस के लायक बिलकुल नहीं है. वह ऐयाश किस्म का इंसान है.
शीतल ने सुशांत की बात नहीं मानी थी. उस समय वह परेश के प्रेम में पड़ी थी. उस ने किसी की बात पर विश्वास नहीं किया था. किसी की भी नहीं सुनी थी.
आज फिर सुशांत उस के साथ खड़ा था. तलाक के इस समारोह में शामिल होने के लिए आ गया था.
सुशांत को देख कर जयंती खुद को रोक न सकी. वह सुशांत के गले लग गई,
‘‘भैया, मु?ो मालूम था आप जरूर आएंगे,’’ और फिर जयंती रोने लगी.
‘‘रो क्यों रही हो जयंती? भाई को देख कर खुश नहीं हुई?’’ सुशांत का भी गला भर आया था.
‘‘ऐसी बात नहीं है भैया. ये तो खुशी के आंसू हैं,’’ जयंती ने आंसू पोछते हुए कहा.
‘‘ये कौन हैं?’’ लता की तरफ देखते हुए सुशांत ने पूछा.
‘‘भैया, यह लता है. मेरी सहकर्मी, मेरी सब से अच्छी दोस्त. हर कदम पर मेरा साथ देने वाली. सच तो यह है कि आप और लता मेरे साथ न होते तो मैं यह समारोह मनाने की सोच भी नहीं सकती थी,’’ जयंती ने कहा.
‘‘लता, ये हैं मेरे सुशांत भैया. भाई से कहीं ज्यादा मेरे मित्र, मेरे दार्शनिक, मेरे पथप्रदर्शक.’’
‘‘नमस्ते सुशांतजी. जयंती आप की बहुत तारीफ करती रहती है.’’
‘‘यह तो बस ऐसे ही,’’ सुशांत झेंप गया.
‘‘तारीफ के लायक अगर कोई है तो फिर उस की तारीफ होनी ही चाहिए,’’ लता ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘हां… हां… क्यों नहीं,’’ जयंती ने हामी भरी.
‘‘अब आगे क्याक्या करना है?’’ सुशांत
ने पूछा.
‘‘डैकोरेटर वाले को बुलाया है,’’ जयंती
ने बताया.
‘‘डैकोरेटर?’’
‘‘हां, वैसी ही सजावट होनी चाहिए जैसी शादी के समय हुई थी.’’
इस बीच मां अंदर आईं, ‘‘अच्छा हुआ तुम आ गए सुशांत बेटा.’’
‘‘प्रणाम बूआ.’’
‘‘खुश रहो बेटा. तुम ही जरा सम?ाओ इसे.’’
‘‘बूआ मैं?’’
‘‘तुम से तो बाद में बात करूंगी. अभी तुम्हारे पापा जयंती से बात करेंगे.’’
इस बीच उन का मोबाइल बज उठा, ‘‘हां भैया. सुशांत भी आ गया है. जयंती भी इधर ही है,’’ मां ने फोन पर कहा.
‘‘जयंती, अपने मामाजी से बात करो,’’ मां ने फोन जयंती को पकड़ा दिया.
उस के मामाजी दीनदयाल बाबू पूरे परिवार में बड़े अनुशासनप्रिय माने जाते थे. सभी छोटेबड़े उन से डरते भी थे और उन का सम्मान भी करते थे. वे जयंती से बहुत प्यार करते थे. लेकिन सालगिरह वाली बात सुन कर बेहद नाराज थे.
जयंती ने डरतेडरते फोन उठाया. बोली, ‘‘प्रणाम मामाजी.’’
‘‘यह मैं क्या सुन रहा हूं जयंती?’’
एक पल के लिए जयंती सोच में पड़ गई. क्या उत्तर दे पर उत्तर तो देना ही था.
बोली, ‘‘मां ने जो बताया. सच है मामाजी.’’
‘‘वही तो मैं पूछ रहा हूं. चल क्या रहा है?’’ मामा जैसे एकदम से गरज कर तुरंत बरस पड़ना चाहते थे.
‘‘मामाजी, मेरे मन में आया कि जब शादी का जश्न मनाया जा सकता है तो तलाक का क्यों नहीं मनाया जाए?’’ जयंती ने पूरे आत्मविश्वास से कहा.
‘‘दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा?’’
‘‘नहीं मामाजी, बस मन को लगा कि ऐसा भी करना चाहिए तो कर रही हूं,’’ जयंती ने डरते हुए कहा.
‘‘बस यही सुनना बाकी रह गया था. हमारे खानदान में ऐसी ऊलजलूल हरकतें कोई नहीं करता है.’’
‘‘मामाजी, मैं तो आप के खानदान की नहीं हूं,’’ जयंती ने हंसते हुए कहा.
‘‘ क्या बकती हो. दे अपनी मां को फोन. अब मैं तुम से बात ही नहीं करूंगा,’’ मामा का पारा चढ़ गया.
जयंती ने फोन मां को दे दिया. मां फोन पर बातें करने लगीं. बात खत्म होने के बाद उन के चेहरे पर असमंजस का भाव था, ‘‘मामाजी को नाराज कर दिया न? मुझ पर बरस रहे थे. कह रहे थे कि सुशांत को तुरंत वापस भेज दो.’’
‘‘सुशांत भैया को जाने थोड़े दूंगी. चाहे जो हो जाए.’’
सुशांत भी मुसकराया, ‘‘पापा को जानता हूं मैं. थोड़ी देर में ही उन का गुस्सा
शांत हो जाएगा. जयंती को मानते भी तो बहुत हैं.’’
‘‘देखना, मामाजी को यहां आने के लिए मना लूंगी.’’
इस बीच मां के फोन की घंटी फिर बजी.
‘‘इस बार बड़े पापा का फोन है. वे भी मु?ो ही सुनाएंगे,’’ मां डर रही थीं.
‘‘फोन तो उठा लो,’’ जयंती ने मुसकराते
हुए कहा.
‘‘भैया, प्रणाम,’’ मां ने फोन उठा कर कहा.
‘‘जयंती कहां है?’’ एक रोबदार आवाज गूंजी.
‘‘जी भैया,’’ मां ने डरते हुए कहा.
‘‘फोन स्पीकर पर रख. मैं उस से सीधे बात नहीं करूंगा.’’
‘‘जी भैया,’’ मां ने यह कहते हुए फोन स्पीकर पर कर दिया.
‘‘तुम सब ध्यान से सुनो. जयंती खासतौर पर सुने.’’
‘‘जी बड़े मामा.’’
‘‘हमारे खानदान में एक तो पहली बार किसी की शादी टूटी है ऊपर से तुम इस की सालगिरह मना रही हो. हम सभी के लिए कितने शर्म की बात है.’’
‘‘प्रणाम बड़े पापा,’’ जयंती ने कहा.
‘‘प्रणाम गया चूल्हे में. पहले यह बताओ कि तुम यह पागलपन छोड़ोगी या नहीं?’’
‘‘मैं पागल नहीं हूं बड़े पापा,’’ जयंती ने ठंडे स्वर में कहा.
‘‘चुप बेशर्म, ताऊजी से जबान लड़ाती है,’’ मां गुस्से में आ गईं.
‘‘यह पागलपन नहीं तो और क्या है? तलाक की सालगिरह कौन मनाता है बिटिया? मैं ने तो अपने पूरे जीवन में नहीं सुना.’’
‘‘उस जंगली से मुक्त हो कर मैं बहुत खुश हूं बड़े पापाजी.’’
‘‘लेकिन बिटिया?’’ बड़े पापा यानी रंगनाथजी भी जैसे निरुत्तर हो गए हों.
‘‘ मेरा एक प्रश्न है बड़े पापा?’’
‘‘बोलो,’’ रंगनाथजी की आवाज की तीव्रता थोड़ी धीमी हो गई थी.
‘‘आदमी को अपनी जिंदगी में सब से बड़ी खुशी मिल जाए तो क्या उसे जश्न नहीं मनाना चाहिए?’’ जयंती की आवाज थोड़ी गीली हो गई थी.
‘‘बात तो सही है बिटिया लेकिन….’’
‘‘उस ने मुझे बहुत प्रताडि़त किया था बड़े पापा. मेरी जिंदगी नर्क बना दी थी,’’ यह कहते हुए जयंती फूटफूट कर रो पड़ी.
वहां सन्नाटा छा गया. कोई कुछ नहीं बोल पा रहा था. रंगनाथजी भी दूसरी तरफ जैसे मौन हो गए थे.
जयंती रोती जा रही थी.
‘‘क्या मुझे खुशियां मनाने का अधिकार नहीं है बड़े पापा?’’ जयंती ने रोते हुए पूछा.
‘‘बिटिया, अपनी आजादी का जश्न मना ले. मैं अब नहीं रोकूंगा. मेरे लिए तेरी खुशी से बढ़ कर और कुछ भी नहीं है. अब कोई तुझे कुछ नहीं कहेगा. तुम्हारी खुशी में शामिल होने मैं भी आऊंगा. अब खुश?’’ रंगनाथजी की आवाज में प्यारदुलार सब झलक रहा था.
‘‘बड़े पापा…’’ यह बोल कर जयंती और भी तेज रोने लगी.
‘‘बहू, उस का रोना बंद कराओ. हम सब उस की खुशी में शामिल होंगे,’’ रंगनाथजी ने मां से कहा.
‘‘मेरे भैया भी नाराज हो रहे थे,’’ मां ने कहा.
‘‘उस साले को तो मैं समझाऊंगा,’’ रंगनाथजी ने हंस कर कहा.
वातावरण एकदम हलका हो गया.
मां ने जयंती के आंसू पोंछे. बोली, ‘‘अब तो मेरा मन भी हलका हो गया. घर में सब से बड़े पापाजी साथ हैं तो अब हम सब तेरे साथ हैं.’’
इस बीच जयंती के मोबाइल की घंटी बजी, ‘पता नहीं अब कौन है?’ यह सोचते हुए
जयंती ने फोन रिसीव किया, ‘‘हेलो.’’
‘‘जी मैं चांदनी डैकोरेटर्स से बोल रहा हूं.’’
‘‘हां जी. देखिए 14 फरवरी को होटल ‘स्वागत’ में एक हौल बुक किया है. एक छोटा सा फंक्शन है.’’
‘‘जी. जन्मदिन का फंक्शन है?’’
‘‘नहीं.’’
‘‘ फिर वैलेंटाइनडे?’’
‘‘तलाक की सालगिरह है. लेकिन सजावट में कोई कमी नहीं होनी चाहिए.’’
दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया.
‘‘क्या हुआ? जयंती ने पूछा.
‘‘जी अच्छा. मेरे आदमी पहुंच जाएंगे,’’ डैकोरेटर वाले ने कहा.
सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. 14 फरवरी को होटल ‘स्वागत’ का हौल पूरी तरह सज कर तैयार था. यह शाम का समय था. लगभग 5 बजने वाले थे. हौल में एक स्टेज बनाया गया था, जिस के पीछे एक बैनर बनाया गया था. बैनर के बीच में बड़ी खूबसूरती से ‘जश्ने आजादी’ लिखा हुआ था. उस के नीचे दूसरी पंक्ति में ‘तलाक सालगिरह’ और अंतिम पंक्ति में जयंती का नाम लिखा हुआ था.
हौल की बाईं तरफ औरकैस्ट्रा का छोटा सा दल था. निर्देश के अनुसार केवल खुशी के गीत गाए जा रहे थे.
सारे मेहमान और रिश्तेदार आ गए थे. जयंती के औफिस से अमनजी और अन्य सहकर्मी आए थे. ‘कृपया कोई उपहार न लाएं.’ वह पहले ही कार्ड पर बड़ेबड़े अक्षरों में छपा चुकी थी. वैसे मेहमान उल?ान में थे कि तलाक की सालगिरह पर आखिर उपहार क्या दिया जाए? जयंती के निवेदन ने उन की समस्या दूर कर दी थी. यही वजह थी कि कोई भी उपहार ले कर नहीं आया था.
सुशांत और लता सब का स्वागत कर रहे थे. अचानक बाहर से कुछ शोर की आवाजें आने लगी. होटल का मैनेजर अंदर आया.
बड़े पापा ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’
‘‘साहब, बाहर कोई परेश साहब हैं. अंदर आने की जिद कर रहे हैं. जयंती मैडम ने उन का नाम लिख कर हमें दिया था कि इस नाम के आदमी को अंदर नहीं आने देना है,’’ मैनेजर ने बताया.
‘‘परेश साहब? रंगनाथजी परेशान हो गए. अरे, यह तो जयंती का पूर्व पति है.’’
‘‘आप ने क्या कहा?’’
‘‘जी मैं ने उन्हें बता दिया कि उन्हें अंदर आने की अनुमति नहीं है तो वे भड़क गए. कहने लगे कि वे मैडम के पति हैं.’’
‘‘चलो, मैं बात करता हूं,’’ रंगनाथजी ने कहा और फिर मैंनेजर के साथ बाहर आए. गेट पर जयंती का भूतपूर्व पति परेश ही खड़ा था.
‘‘तुम यहां क्यों आए हो?’’
‘‘रंगनाथजी, यह क्या हो रहा है? आप की बेटी ने तलाक का तमाशा बना दिया है.’’
रंगनाथजी का मन कर रहा था कि उसे कस कर 2 तमाचे लगाएं. आज नाम ले कर बुला रहा है कमीना. तलाक से पहले तक ‘बड़े पापा’ कहते हुए नहीं थकता था.
‘‘देखो भाई, सब से पहले तो तुम शांत हो जाओ. इतना हंगामा क्यों कर रहे हो? तुम्हारे और जयंती के बीच अब तो कोई रिश्ता भी नहीं है.’’
‘‘मैं जयंती से मिलना चाहता हूं.’’
‘‘परेशजी, कोई लाभ नहीं होगा. बेहतर होगा कि आप यहां से चुपचाप चले जाएं.’’
‘‘वरना क्या करोगे?’’
‘‘सीधे पुलिस बुलाऊंगा.’’
‘‘आप बुला ही लो.’’
इस बीच उन्हें पता नहीं चला कि सुशांत यह सब देख कर हौल के अंदर चला गया था और जयंती को सब कुछ बताया तो वह भड़क उठी. फिर उस ने पुलिस को फोन लगाया. पुलिस वालों ने तुरंत पहुंचने की बात कही.
इस बीच परेश और रंगनाथजी के बीच जारी बहस अपनी चरम सीमा पर थी. जयंती भी वहां आ गई थी.
‘‘यहां आने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुम्हें किस ने बुलाया?’’ जयंती ने गुस्से में कहा.
‘‘मु?ो हिम्मत पैदा करने की जरूरत नहीं और तुम ने जो सोशल मीडिया में ढिंढोरा पीट रखा है न तो मु?ो क्या पूरी दुनिया को पता चलना ही था.’’
‘‘तुम्हारी समस्या क्या है?’’ रंगनाथजी ने पूछा.
‘‘तलाक की सालगिरह कौन मनाता है? लेकिन नहीं मैडम तो सालगिरह मनाएंगी. वाह…’’ परेश गुस्से में बक रहा था.
पुलिस वहां पहुंच चुकी थी. इंस्पैक्टर परेश को एक किनारे ले गया. पूछा,
‘‘क्यों भई, क्या तमाशा चल रहा है? इस फंक्शन में तुम्हें बुलाया ही नहीं गया तो फिर क्यों आए हो?’’
‘‘सर, वह मेरी पत्नी है. पिछले साल ही हमारा तलाक हुआ.’’
‘‘तलाक हो गया तो फिर पत्नी कैसे हो गई? मुकदमा चल ही रहा है क्या?’’
‘‘नहीं सर. वह तो खत्म हो गया है.’’
इंस्पैक्टर ने एक तमाचा परेश के गालों पर रसीद करते हुए कहा, ‘‘अबे बदमाश, फिर वह तेरी पत्नी कैसे हुई? चल निकल यहां से.’’
‘‘सर, वह तलाक की सालगिरह मना रही है. चारों तरफ मेरी थूथू हो रही है.’’
‘‘वह तो अब मुक्त है. अब वह जन्मदिन मनाए या फिर तलाक की सालगिरह, तुम्हें इस से क्या फर्क पड़ता है? उसे चैन से जीने दो.’’
‘‘सर, मेरी बदनामी हो रही है.’’
‘‘भई, अब कुछ ज्यादा हो रहा है. तू यहां से जाएगा या नहीं या फिर घसीटते हुए थाने ले जाऊं?’’
परेश सहम गया. उस ने वहां से जाने में ही भलाई सम?ा.
इस बीच सब ने देखा कि कुछ गाडि़यों का काफिला वहां आ कर रुका.
सब से आगे की गाड़ी में विधायक का स्टिकर लगा हुआ था. यह स्वरूप कृष्ण थे. ये जयंती के मौसाजी थे. पड़ोस के जिले के विधायक थे. सत्ताधारी दल के थे. वहां उपस्थित पुलिस बल सावधान हो गया.
विधायकजी कार से उतर कर सीधे हौल में चले गए. रंगनाथजी ने उन का स्वागत किया.
‘‘नमस्ते भाई साहब, अच्छा हुआ इस खुशी के मौके पर आप आ गए. बिटिया को आशीर्वाद दीजिए कि उस का भावी जीवन सुखपूर्वक बीते.’’
विधायकजी भड़क गए, ‘‘सब से पहले यह बताइए कि
यह तलाक की वर्षगांठ मनाने का आइडिया किस के मन में आया?’’
‘‘यह आइडिया नहीं मौसाजी बस सोचसमझ कर ही मना रही हूं,’’ जयंती ने रंगनाथजी के उत्तर देने से पहले ही ठंडे स्वर में उत्तर दिया.
‘‘अच्छा. सोचसम?ा कर मना रही हो? वाह, तुम ने आने वाले समय के बारे में जरा भी नहीं सोचा. जरा भी नहीं सोचा कि मेरे विपक्षी इसे मुद्दा बना लेंगे. सब हंस रहे हैं कि नेताजी की भतीजी तलाक लेने की खुशी मना रही है. कितना नाम रोशन कर रही है हमारी रानी बिटिया.’’
‘‘आप इतना गुस्सा क्यों कर रहे हैं स्वरूपजी?’’ रंगनाथजी ने उन्हें शांत करने की कोशिश की.
स्वरूपजी और भी भड़क गए, ‘‘आप ने भी नहीं मना किया. आप की बुद्धि कहां चरने गई थी? इस की दोबारा शादी हो पाएगी कभी आप सभी ने सोचा?’’
जयंती से अब रहा नहीं गया. बोली, ‘‘मौसाजी, क्षमा करें. मैं केवल अपनी खुशी की सालगिरह मना रही हूं. मुक्ति पाने की खुशी. इस तलाक से मैं बेहद खुश हूं. रही बात मेरी दूसरी शादी की तो मु?ो भविष्य की चिंता नहीं करनी है. किसी लड़की के जीवन का क्या सिर्फ शादी ही एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए? आप के राजनीतिक कैरियर पर आंच आ रही है तो कह दीजिए कि मैं आप की कोई नहीं हूं. विरोधियों का मुंह बंद करना बहुत आसान होगा,’’ जयंती के स्वर में विद्रोह ?ालक रहा था.
स्वरूपजी का सारा गुस्सा जैसे ठंडा पड़ गया. उन्हें जयंती से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी.
‘‘मनाओ भई खुशी. चलो ठीक है.’’
‘‘ये नए जमाने के बच्चे हैं स्वरूपजी. जरा सम?िए,’’ रंगनाथजी ने स्वरूपजी को कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए कहा.
‘‘उस साले को जेल क्यों नहीं भिजवाया?’’
‘‘जयंती नहीं चाहती थी.’’
‘‘अच्छा,’’ स्वरूपजी अब पूरी तरह शांत हो गए थे.
मामाजी भी सपरिवार पधार चुके थे.
जयंती को यह सब देख कर बहुत अच्छा लग रहा था. आखिर घर के सभी छोटेबड़े सदस्य मान गए थे. अब यह एक सामान्य आयोजन जैसा लग रहा था.
जयंती स्टेज पर लगाई गई एक ऊंची कुरसी पर बैठी थी. उस ने साउंड सिस्टम वाले को एक माइक लाने का इशारा किया.
‘‘मैं आप सभी से कुछ कहना चाहती हूं,’’
‘‘हां बिटिया, बोलो,’’ रंगनाथजी ने उस का उत्साह बढ़ाया.
‘‘आदरणीय मेरी मां, ताऊजी, मामाजी, मौसाजी, सुशांत भैया, लता और उपस्थित गणमान्य अतिथियो, आप सभी हैरान होंगे कि मैं ने आप को अपनी तलाक की सालगिरह के मौके पर क्यों बुलाया है? इस की एकमात्र वजह यह है कि इस तलाक से मुझे बेहद खुशी मिली है. हालांकि यह प्रेम विवाह था जो दोनों के घर वालों की सहमति से अरेंज्ड में बदल गया था लेकिन शादी के मात्र 2 महीने के बाद ही मेरी यातानाओं का दौर शुरू हो गया था. मेरे पति सहित उस के परिवार के सभी लोगों ने अपने रंग दिखाने शुरु कर दिए. मेरी सैलरी मेरे अकाउंट से निकाल ली जाती थी. मुझे उस से महीने के खर्च के लिए अपने ही पैसों की भीख मांगनी पड़ती थी. विरोध करने पर मुझे असहनीय शारीरिक यातनाएं दी जाती थीं. मु?ा से मेरी मरजी के खिलाफ जबरदस्ती अप्राकृतिक संबंध स्थापित करने की कोशिश की जाती थी. मैं विरोध करती थी तो वह मुझे बुरी तरह मारतापीटता था. यही वजह थी कि मैं ने तलाक लेने का आखिरी निर्णय लिया वरना किसी भी लड़की को शादी के बाद तलाक लेने का कोई शौक नहीं होता है. आज मैं बेहद खुश हूं. मुझे सब से बड़ी खुशी इस बात की है कि मेरे घर के सभी छोटेबड़े सदस्य मेरे इस आयोजन में शामिल हुए. मेरा यह मानना है कि किसी भी आयोजन की रूपरेखा में अगर खुशी कहीं छिपी हुई नजर आ रही हो तो उस आयोजन से दूर नहीं रहना चाहिए मनाना ही चाहिए.’’
तालियों का शोर गूंज उठा. अब तक खाने की टेबलें भी सज गई थीं.
‘‘आप लोग खाना शुरू करें,’’ जयंती ने घड़ी देख कर कहा.
शाम के 7 बजने वाले थे. कई अतिथियों को वापस अपने घर भी लौटना था. सब ने खाना शुरू कर दिया.
‘‘यह भी एक अनोखा अनुभव है,’’ जयंती के बड़े पापा ने जयंती के मामा से कहा.
‘‘अब बच्चों की जिद के आगे क्या कर सकते हैं? जयंती के मामाजी ने उत्तर दिया.
‘‘जयंती ने सही कहा कि खुशी का कोई भी कारण हो उत्सव मनाना तो बनता है,’’ जयंती के औफिस से आए हुए अमनजी ने कहा.
जयंती जानती थी कि कल सोशल मीडिया में उस का यह आयोजन छा जाने
वाला है. लेकिन वह अच्छी तरह जानती है कि उस ने यह आयोजन किसी प्रकार का प्रचार पाने के लिए नहीं किया है. यह निश्चित था कि कई लोग उस की आलोचना करेंगे. एक से बढ़ कर एक ओछी टिप्पणियां भी सुनने और पढ़ने को मिलेंगी लेकिन एक बात तो सभी को माननी पड़ेगी कि जन्मतिथि, विवाह तिथि और पुण्य तिथि की सालगिरह के साथसाथ तलाक की सालगिरह भी मनाई जा सकती है. यह आजाद देश है. जिसे जो भी समारोह मनाना है वह जरूर मनाए. कोई नहीं रोक सकता है. वे भी नहीं जो जराजरा सी बात पर संस्कृति की रक्षा की हिंसापूर्ण दुहाई देते रहते हैं.
वह तो हर साल मनाएगी. हां, अगर कोई उसे अच्छी तरह जानने वाला साथी मिल जाए तो हो सकता है यह आयोजन रुक जाए.
‘किसी भी संभावना से परे जयंती को वर्तमान में जीने की आदत है,’ जयंती ने अपनेआप से कहा. उस ने देखा कि सभी खुश हैं. सुशांत, लता और अन्य सभी रिश्तेदार एक पंजाबी गाने पर नृत्य कर रहे थे. समारोह का रंग अपनी चरम सीमा पर था. जयंती भी उन में शामिल हो गई.
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