Reel Culture: रील्स परियां रिझाने में वन हुनर में जीरो

Reel Culture: अकल बड़ी या भैस यह कहावत अब पुरानी हो चुकी है. आजकल एक नई कहावत ट्रेंड में है- अकल बड़ी या बौडी.

आज जहां एक ओर लड़कियां खेल, विज्ञान, मिलिटरी, टैक्नोलौजी, मैनेजमैंट जैसे क्षेत्रों में गहन अध्ययन कर ऊंचे मकाम हासिल कर रही हैं वहीं कुछ ऐसी भी हैं जो केवल अपने बदन को ऊंचाई हासिल करने का जरीया बना रही है और यह ऊंचाई कोई परिवार या देश का नाम रोशन करने की नहीं है बल्कि ओछेपन और नग्नता में आगे जाने की होढ़ है.

इस का एक बहुत बड़ा उदाहरण है सोशल मीडिया पर छाई हुई कुंठित सोच की हसीन परियां यानी खुद को रील क्रिएटर बोलने वाली लड़कियां. ये परियां न बुद्धिमान हैं और न ही बेफकूफ. ये वे हैं जो खुद को अतिचालाक समझ अपने ही बनाए भ्रम की रंगीन दुनिया में राज कर रही हैं. अपने जिस्म की नुमाइशबाजी में इतना खो चुकी हैं कि वे सहीगलत का तर्क भूल चुकी हैं. इन्हें केवल अपना बदन दिखा वाहवाही बटोरना बहुत बड़ी उपलब्धि लगती है.

यों जिस्म दिखाना आखिर इन्हें क्यों पसंद है, इस के कई कारण हैं जैसे:

कमाने में आसानी: दुनिया में जहां मेहनत कर कमाने में दिनरात जूते घिसने पड़ते हैं वहां केवल बदन दिखा कर ही पैसा बटोर लिया जाए तो क्या हरज है? इसी बात का सत्यापन आप को सोशल मीडिया पर, कुछ क्रिएटर के औनली फैन अकाउंट ऐंड सब्सक्रिप्शन को देख पता चल जाएगा जहां एक क्रिएटर अपने फैन के लिए औनली फैन अकाउंट बनाता और उस अकाउंट का सब्सक्रिप्शन ले फैन क्रिएटर की हर गंदगी देखने के पैसे देता है. औनली फैन अकाउंट पर क्रिएटर की ऐसी तसवीरें और रील्स होती हैं जिन्हें सोशल मीडिया के सोशल प्लेटफौर्म पर सार्वजानिक स्तर पर नहीं डालते. इन क्रिएटर्स लड़कियों को केवल ऐसी तसवीरों से इतना मुनाफा हो जाता है कि कोई और काम या नौकरी करने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

ऐसा नहीं है कि औनली फैन पर सिर्फ ऐसे ओछे क्रिएटर ही रहते है: औनली फैन के जरीए तो लाखों क्रिएटर असली कला, नौलेज, ऐजुकेशन, टिप्स ऐंड ट्रिक लोगों को सिखा भी रहे हैं और उस से पैसे भी कमा रहे हैं. लेकिन कुछ तो सोशल मीडिया के इस प्लेटफौर्म को केवल अपने ओछेपने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

फेमस होने के लिए: बहुत लड़कियां यह रास्ता अपनाती है. उन्हें लगता है कि जिस तरह एक ऐक्ट्रैस अपने बोल्ड फोटोज और रील्स से लोगों की वाहवाही लूट ले जाती है वही वाहवाही उन्हें भी मिलेगी. लेकिन होता कुछ और ही है. माना इन के अंगप्रदर्शन पर बहुत से लोगों ने वाहवाही की हो लेकिन उस तारीफ में और कुछ नहीं केवल हवस और ओछेपन की बू होती है.

खुद को अप्सरा समझने की भूल: इन लड़कियों व महिलाएं को लगता है ये कोई मेनका या उर्वशी हैं और स्क्रीन के दूसरे तरफ के लोग कोई ऋषि, जिन का तप एवं ध्यान इन्हें अपने सौंदर्य से भंग करना है. असल में तो भंग तो इन का अपना मनोबल है. जो अपना नकारापन अपने शरीर के पीछे छिपा, खुद को तीसमार खान समझ रही है. इन्हें कोई समझाए कि जो लोग सोशल मीडिया पर इन की अदाओं और आहों पर मरमिट रहे हैं. अगर उन लोगों को ये वास्तविक रूप में मिल जाए तो क्षणभर में इन का शरीर नोंच खा जाएंगे. फिर न तो ये खयाली अप्सरा रहेंगी और न ही जिंदा इंसान.

मोटी असामी पकड़ने की चाह: अपनी पोस्ट और रील्स के जरीए ये न केवल फेमस होना चाहती हैं बल्कि पुरुषों को अपनी ओर खींचना भी चाहती हैं. आप इस तरह की किसी भी हुस्नपरी का अकाउंट चैक करें आप को उस के 90% फौलोअर पुरुष ही मिलेंगे जो उस की हर रील पर बालटी भरभर के अपना प्यार उड़ेल रहे होंगे. इन में से कई अकल से पैदल उस का बौयफ्रैंड या पति बनने की इच्छा भी रखते होंगे और इन्हीं किसी में एक या कुछ को वह अपना साथी बना भी ले लेकिन चुनेगी उसे जो दिमाग से भले खाली हो लेकिन बैंकबैलेंस से भरपूर ताकि पूरा जीवन एक बेबीडौल बन पैसों की बारिश में खुद की पंपरिंग करा सके.

जो दिखता है वह बिकता है: यह विचारधारा मार्केटिंग का मूल मंत्र है लेकिन जब मार्केटिंग वस्तुओं की हो न कि इंसानी. लेकिन अपने स्वार्थ के लिए, चकाचौंध के लिए ये लड़कियां स्वयं को ही बाजार में उतारने को तैयार हैं या कहें उतार चुकी हैं. आज ये अपने अंगों को सोशल मीडिया पर दिखादिखा कर उन की तसवीरें और अपने अभद्र वीडियो बेच रही हैं.

फैशन या फिल्म इंडस्ट्री में काम पाने की चाह: इन लड़कियों को लगता है कि ऐसे बौडी ऐक्स्पोसिंग के जरीए उन्हें कोई फैशन मौडलिंग या फिल्म का औफर मिल जाएगा जोकि उन की बहुत बड़ी गलतफहमी है. भला कौन निर्माता या डिजाइनर उन लड़कियों को अपना आइकन बनाएगा जो किसी कला के दम पर नहीं बल्कि छिछोरी हरकतों के लिए जानी जाती हो.

ऐंपावरमैंट के नाम की धज्जियां: ये लड़कियां वूमन ऐंपावरमैंट के नाम पर गंदगी फैला रही हैं. जहां एक ओर ऐंपावरमैंट का असली अर्थ समझते हुए देश की कई बेटियां मिलिटरी में नाम रोशन कर रही है, स्पोर्ट्स में मैडल जीत रही हैं, साइंस और टैक्नोलौजी में आविष्कार कर रही हैं ये लड़कियां वूमन राइट्स और पावर का मजाक बनाए हुए हैं और यह मजाक केवल इन के लिए ही नहीं बल्कि समाज की बाकी लड़कियों के लिए भी भारी पड़ेगा. कल को इन्हीं लड़कियों के तर्क पर बहुत सी लड़कियों को आंका जा सकता है.

बराबरी करने के चलते नीचे गिरती जा रही हैं: अब इन लड़कियों को अगर कोई यह कहे कि लड़कियों को यह शोभा नहीं देता तो ये फट जवाब देंगी कि जब लड़के अपनी बौडी ऐक्स्पोज कर सकते हैं तो लड़कियां क्यों नहीं? आखिर फ्रीडम लड़कों को ही क्यों मिली है? अब इन्हें कोई सम?ाए कि यह फ्रीडम की नहीं बौडी स्ट्रक्चर और मैंटालिटी की बात है.

जहां लड़के अपने सिक्स पैक ऐब्स और बाइसैप्स दिखा रहे हैं, वहां ये लड़कियां अपनी जांघें और स्तन. अगर बौडी ऐक्स्पोजर की बराबरी करनी ही है तो वे क्यों नहीं अपनी बौडी बिल्डिंग और बौडी लिफ्टिंग के जरीए बौडी ऐक्स्पोज करतीं लेकिन नहीं उन्हें तो अपने गुप्त अंगों को गुप्त रखे बिना ही तारीफ लूटनी है जो वास्तविक रूप में कोई तारीफ नहीं बल्कि किसी आदमी की एक कामुक अभिव्यक्ति होती है.

दूसरी रही मैंटली की बात तो इन लड़कियों का पोस्ट और पोस्ट पर आए इन के फौलोअर के कमैंट्स इन की मानसिकता अच्छे से बता जाते हैं. इन की अधनंगी पोस्ट और रील पर लड़के तारीफ के पीछे अपनी कामुकता का बखान करते हैं. ये कमैंट्स साफतौर पर लोगों की गंदी सोच का साफ उदाहरण हैं. लेकिन फिर भी ये लड़कियां इसी बात की दुहाई देते नजर आएंगी कि लड़के करें तो कूल और वे करें तो बेशर्मी. उन्हें यह दिखता ही नहीं कि अगर लड़के अपनी कोई अश्लील तसवीर या रील डाल भी देते हैं तो उन्हें कोई वाहवाही नहीं मिलती बल्कि अधिकांश संख्या में वूमन यूजर ही उन की निंदा करती हैं.

बौडी ऐक्स्पोज की रेस में ये लड़कियां इनती समझ भी नहीं रखतीं कि सौंदर्य प्रदर्शन और नग्नता में बहुत भारी अंतर होता है.

भविष्य क्या है? अंधकार एवं तिरस्कार और कुछ नहीं. अपने पेशे से ये लड़कियां पहले ही सभ्य लोगों की नजरों में अपने लिए एक विश्वास और सम्मान खो चुकी होती हैं. तो इन के साथ कोई भी सम्मानित व्यक्ति उठनाबैठना तो चाहेगा नहीं और अगर कोई इन्हें एक बार मौका दे भी दे तो हमेशा एक शंका से घिरा रहेगा और यह शंका आगे जा कर न इन का घर बसने देगी और न परिवार बनने.

कल को ये शादी भी करती हैं तो हां लड़का कुछ दिन बड़े उत्साह में फिरता रहेगा कि क्या हसीन लड़की उसे मिली है. मगर कुछ दिन बाद ही यही लड़का अपने को कोसता दिखेगा भी क्योंकि लोगों की जगहंसाई और तानों को आप कितने दिन नजरअंदाज कर पाएंगे.

और कल को जब आप के बच्चे होंगे तो क्या वे अपनी मां का जलवा देख खुश होंगे या दोस्तों के बीच मजाक का पात्र बनेंगे? इन लड़कियों को दिखाई ही नहीं दे रहा कि अपने ऊलजलूल कामों से वे कोई नाम नहीं कमा रहीं बल्कि ऐसा शाप कमा रही हैं जो जीवनभर उन्हें पारिवारिक और सामाजिक असंतोष देगा.

चार दिन की जवानी और फिर रोता बुढ़ापा: ये लड़कियां कुछ ऐसा काम तो कर नहीं रहीं, जिस की पैंशन इन्हें बुढ़ापे में मिले. तो फिर जब इन का सौंदर्य से भरपूर शरीर सिर्फ हाड़मांस का पुतला रह जाएगा तो तब ये क्या करेंगी?

और बुढ़ापे तक क्यों जाएं: अरे इन का सौंदर्य तो बुढ़ापा आने से पहले ही इन का साथ छोड़ देगा. किसी भी यौवन की उम्र ज्यादा से ज्यादा 10 वर्ष की होती है. तो आज जो लड़की अपने 18-20 साल की उम्र में लोगों को रिझारिझा कर घटिया फेम और पैसे कमा रही है. 10 वर्ष बाद उसे एक 30 साल की महिला को देख इतने लोग आहें भरेंगे? अरे उस समय तो इस की जगह कई नई जवान लड़कियां इस के सोशल प्लेटफौर्म पर मौजूद होंगी जहां आज यह है. तो फिर एक जवान लड़की के आगे एक अधेड़ महिला को कौन देखेगा?

इन लड़कियों की दुकान तो बंद हो जाएगी और पैसा कमाने का रास्ता भी. तो उस समय ये क्या करेंगी क्योंकि इन में न कोई कौशल है और न कोई स्किल जो ये कोई और काम या रोजगार अपना कर जीवन जी सकें. जिस उम्र में इन्हें पढ़नालिखना चाहिए था, कोई स्किल सीखनी चाहिए थीं तब तो ये सब अपने सीने से पल्लू गिरा लोगों को नाच दिखा रही थीं और नाच से जो पैसा कमाया होगा, वह भी उड़ा चुकी होंगी क्योंकि बिना बुद्धि के तो भविष्य के लिए धन भी संचय नहीं किया जा सकता.

तो बुद्धि से किए जाने वाला काम तो इन्हें मिलेगा नहीं. तो ये करेंगी क्या? साफसफाई या चाकरी क्योंकि इन्हीं कामों में किसी विशेष कौशल व बुद्धिमत्ता की जरूरत नहीं होती. सिर्फ हाथों की रगडाई काम आती है. तो जिन हाथों को ये कोमल कलाई बना इतरा रही थीं, अब उन्हीं कलाइयों से घिसाई करेंगी.

जिस तन प्रदर्शन को वे एक वरदान समझने की भूल कर रही हैं वह असल में एक अभिशाप है. बहरहाल, इन्हें अभी पैसों के आकर्षण में सचाई दिख नहीं रही. मगर एक दिन यही आकर्षण इन के गले की ऐसी फांस बन जाएगा जो न इन्हें चैन की सांस लेने देगा और न सांस छोड़ने.

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Female Friendship: फीमेल फ्रैंड्स हैं तो लाइफ है

Female Friendship: सोचिए एक ऐसी दोस्त जो बिना कुछ कहे आप के चेहरे के ऐक्सप्रैशन से ही समझ जाए कि आप परेशान हैं, जो आप के साथ बैठ कर चुपचाप आइसक्रीम खा ले और बस इतना कहे, ‘‘मैं समझती हूं,’’ यही होती है एक फीमेल फ्रैंड. वह सिर्फ दोस्त नहीं होती, वह कभी बहन जैसी, कभी मां जैसी, कभी पार्टनर जैसी और कभी जस्ट एक हमराज बन जाती है. हम अकसर कहते हैं कि जिंदगी में एक अच्छा पार्टनर मिलना बहुत जरूरी है लेकिन उतनी ही जरूरत एक अच्छी फीमेल फ्रैंड की भी होती है. वह इमोशनली भी सपोर्ट करती है, समझती है, बिना जज किए सुनती है और कभीकभी वह सलाह देती है जो कोई और नहीं दे सकता.

जब कोई समझे बिना कहे वह होती है फीमेल फ्रैंड

फीमेल फ्रैंडशिप की सब से बड़ी खासीयत यही होती है कि उस में शब्दों की जरूरत नहीं होती. कई बार हम कुछ बोल भी नहीं पाते लेकिन हमारी फ्रैंड समझ जाती है कि हम अंदर से टूटे हुए हैं या खुश हैं. पहला उदाहरण मेघा और नूपुर की दोस्ती स्कूल के दिनों से थी. एक दिन मेघा औफिस से लौटते वक्त बहुत परेशान थी. बस में आंखों से आंसू बह रहे थे. वह कुछ बताना नहीं चाहती थी. नूपुर बस उस के घर आ गई. उस के फैवरिट मोमो ले कर और दोनों चुपचाप बालकनी में बैठ कर खाती रहीं. उस दिन मेघा को कोई सलाह नहीं चाहिए थी, सिर्फ एक साथ चाहिए था और वही नूपुर ने दिया बिना बोले, बिना पूछे.

सलाह जो दिल से आती है

फीमेल फ्रैंड्स की सलाह किताबों जैसी नहीं होती. वह आप की सिचुएशन को समझ कर आती है. चाहे ब्रेकअप हो, कैरियर का कन्फ्यूजन या घर वालों से टकराव एक फीमेल फ्रैंड अकसर प्रैक्टिकल और इमोशनल दोनों तरह की समझ रखती है. उस की सलाह में एक अपनापन होता है. वह आप को सहीगलत की जानकारी देने के साथसाथ आप की साइड भी लेती हैं. कई बार वह आप को आईना भी दिखा देती है लेकिन प्यार से.

बातें जो सब के सामने नहीं कह सकते वहां शेयरिंग का रिश्ता बनता है

कई बार हमारे मन में कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन्हें हम किसी और से नहीं कह सकते जैसे अपनी बौडी इमेज से जुड़ी बातें, पीरियड्स के अनुभव, रिलेशनशिप की डिटेल्स या फिर अपने डर. लेकिन एक फीमेल फ्रैंड के साथ ये बातें शेयर करना आसान हो जाता है. क्यों? क्योंकि वह खुद भी वह सब महसूस कर चुकी होती है या कर रही होती है, इसलिए उसे समझना नहीं पड़ता, वह समझती है.

कपड़े, लिपस्टिक, मूड सबकुछ शेयर होता है

फीमेल फ्रैंड्स की एक बहुत प्यारी बात यह होती है कि वह एकदूसरे के साथ कपड़े, मेकअप, मूड और म्यूजिक. सबकुछ शेयर करती है. एक ड्रैस जिसे आप ने बस एक बार पहना हो, आप की फ्रैंड उसे पार्टी में पहनती है तो आप को खुशी होती है. कभीकभी एक ही लिपस्टिक दोनों इस्तेमाल करती हैं, कभी बैग ऐक्सचेंज करती हैं. ये चीजें भले ही छोटी लगें लेकिन इन्हीं से रिश्तों की नींव मजबूत होती है.

मुश्किल वक्त में सब से पहले साथ देने वाली

जब पूरी दुनिया आप के खिलाफ हो, तब जो आप के पास खड़ी रहती है, वह सच्ची दोस्त होती है. फीमेल फ्रैंड्स इस मामले में बहुत भरोसेमंद होती हैं. चाहे ब्रेकअप हो, परिवार में लड़ाई हो या नौकरी में दिक्कत वह आप को अकेला महसूस नहीं होने देती. दूसरा उदाहरण रिया की शादी टूटने के बाद उस का आत्मविश्वास पूरी तरह खत्म हो गया था. घर वाले उसे लगातार दोष दे रहे थे. ऐसे में उस की बचपन की दोस्त सुरभि हर वीकैंड उस के साथ रहने आई. कभी उसे बाहर ले गई, कभी मनपसंद खाना बनाया और हमेशा याद दिलाती रही कि वह टूटी नहीं है, बस थकी हुई है. 1 महीने में रिया फिर से खुद को थोड़ाथोड़ा ठीक महसूस करने लगी.

उम्र के साथ बदलते रिश्ते पर दोस्ती वैसी ही रहती है

कई बार हमारी जिंदगी की दिशा बदल जाती है. कोई शादी कर लेता है, कोई विदेश चला जाता है, कोई मां बन जाती है. लेकिन अगर दोस्ती सच्ची है तो वह दूरी नहीं लाती बल्कि और मजबूत हो जाती है. फोन पर एक ‘तू ठीक है न?’ सुन कर ही दिन बन जाता है. वह दोस्त जो जानती है कि तुम कब चुप हो जाती हो और क्यों, वही असली दोस्त होती है. कोई जो तुम्हारे छोटेबड़े सपनों पर भी फर्क करे हरकोई आप को बड़े सपनों पर तो बधाई देता है लेकिन आप की फीमेल फ्रैंड उस दिन भी खुश होती है जब आप पहली बार अकेले मूवी देखने जाते हो या जब आप जौब इंटरव्यू में रिजैक्ट हो कर भी कौन्फिडैंट रहते हो. वह छोटीछोटी चीजों में आप की जीत देखती है और मन से आप के लिए खुश होती है.

कोई जो तुम्हारी इमेज या मेकअप के पीछे का असली ‘तुम’ जानता हो

आप कितने भी तैयार हो जाएं, सामने से लोग कहें वाऊ. लेकिन आप की दोस्त जानती है कि आप आज अंदर से खुश नहीं हो. वही दोस्त आप की आंखों में देख कर कहती है, ‘‘क्या हुआ, दिल भारी क्यों है?’’ ये कनैक्शन किसी मेकअप, किसी स्टाइल या किसी सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं आता. यह दिल से आता है.

वे बहसें जो रिश्ते और मजबूत करती हैं

कई बार हम अपनी दोस्तों से लड़ भी लेते हैं, नाराज हो जाते हैं, हदें पार कर जाते हैं लेकिन फिर भी वापस उसी दोस्त के पास जाते हैं क्योंकि हमें पता होता है कि उस दोस्त के बिना बात अधूरी लगेगी. यह रिश्ता कमजोर नहीं होता बल्कि लचीला होता है. खिंचता है लेकिन टूटता नहीं.

फीमेल फ्रैंड्स सिर्फ ‘गर्ल गैंग’ नहीं वे इमोशनल बैकबोन होती हैं

सोशल मीडिया पर हम अकसर गर्ल गैंग की तसवीरें देखते हैं- लाफ्टर, डांस, आउटिंग्स. लेकिन असली फ्रैंडशिप उस की पीछे की रातों में होती है, जब किसी की मम्मी बीमार होती है और दोस्त दुआ कर रही होती है या जब कोई किसी बुरे रिलेशन से बाहर आता है और दोस्त बस हर रात कौल पर उस का साथ देती है. निष्कर्ष: जिंदगी में एक अच्छी फीमेल फ्रैंड का होना मतलब है एक ऐसा रिश्ता जिस में कोई शर्त नहीं होती, कोई दिखावा नहीं होता और जहां आप जैसे हैं वैसे ही स्वीकार किए जाते हैं. वह दोस्त जरूरी नहीं कि हर दिन आप के साथ हो, लेकिन जब भी जरूरत हो वो सब से पहले आप के पास खड़ी मिलती है तो अगर आप के पास एक ऐसी फीमेल फ्रैंड है तो उसे आज ही कौल कर के कहिए, ‘‘तू बहुत जरूरी है मेरी लाइफ में.’’ और अगर अभी तक कोई ऐसी दोस्त नहीं है तो खुले दिल से दोस्ती निभाना शुरू कीजिए क्योंकि यह रिश्ता सिर्फ खूबसूरत ही नहीं, बहुत ज्यादा जरूरी भी है.

लड़कियों की दोस्ती में एक अलग ही जादू होता है: वे न तो फिल्मी लव स्टोरी जैसी होती है, न ही मोमबत्तियों वाली रोमांटिक फीलिंग लेकिन फिर भी उस में एक खास अपनापन, भरोसा और सुकून होता है और कई बार यह रिश्ता उन अधूरी लव स्टोरीज से कहीं ज्यादा गहरा होता है, जिन में हम उलझ जाते हैं. सच कहें तो जैसी मुहब्बत हमारी फीमेल फ्रैंड्स हम से करती हैं, वह असली स्टैंडर्ड है प्यार का.

रोमांटिक रिलेशनशिप्स को इन से सीखना चाहिए: और जब एक बार आप ने इस तरह का प्यार महसूस कर लिया, तो आप समझ जाते हैं कि अब इस से कम कुछ भी मंजूर नहीं. वे हमेशा साथ होती हैं चाहे कुछ भी हो जाए कभी गौर किया है कि आप की फ्रैंड्स को कैसे पता चल जाता है कि आप ठीक नहीं हैं? आप ने बस इतना कहा, ‘‘मैं ठीक हूं,’’ और वे एकदम अलर्ट हो जाती हैं. फिर चाहे वे 15 बार मैसेज करें, वीडियो कौल करें या आइसक्रीम और वह ड्रेस ले कर आप के दरवाजे पर पहुंच जाएं जो आप ने उन्हें 3 महीने पहले दी थी. उन्हें आप के ठीक होने का कोई इशारा नहीं चाहिए होता. वे बस आप के लिए होती हैं.

न कोई सवाल, न कोई शिकवा. सिर्फ सच्चा साथ और बिना शर्त का प्यार. यह रहा पूरे पैराग्राफ का सरल और भावनात्मक हिंदी अनुवाद आम बोलचाल की भाषा में. वे आप के रोने की भी जगह बनाती हैं और आप की चमकने की भी. आप की फीमेल फ्रैंड्स ने आप के हर रूप को देखा होता है. जब आप बिखरे होते हो, जब आप टूटे हुए होते हो, जब आप कन्फ्यूज होते हो, जब आप सब से ज्यादा कौन्फिडैंट और खूबसूरत लगते हो और जब आप जिंदगी में वाकई तरक्की कर रहे होते हो.

उन्हें पता होता है कब आप को चुपचाप सुनना है, कब आप को आईना दिखाना है और कब आप को बस गले लगा कर सब ठीक कर देना है. ऐसी इमोशनल समझदारी बहुत कम लोगों में होती है. यह तो कई रोमांटिक रिश्तों में भी नहीं मिलती. वे आप को सीमाएं और माफ करना सिखाती हैं.

लड़कियों की दोस्ती में हम सीखते हैं कि हैल्दी बौंडिंग कैसी होती है. कभीकभी ऐसा भी होता है कि आप कुछ दिन बात नहीं करते, कभी किसी बात पर नाराज हो जाते हैं या अलगअलग सोच रखते हैं लेकिन उस प्यार में कभी कमी नहीं आती. इस रिश्ते में ईमानदारी की भी जगह होती है और एकदूसरे को बेहतर बनने की भी. और जब चीजें थोड़ी उलझ जाती हैं क्योंकि कभीकभी ऐसा होता है तो इस दोस्ती में सुधार करने, दोबारा जुड़ने और आगे बढ़ने की पूरी गुंजाइश होती है. वे आप को आप की अहमियत याद दिलाती हैं.

फीमेल फ्रैंडशिप की शायद सब से ख़ूबसूरत बात यही होती है. आप की दोस्त कभी आप को खुद की वैल्यू भूलने नहीं देतीं. चाहे आप खुद ही खुद को कम समझ रहे हों, चाहे किसी हार्टब्रेक से गुजर रहे हों. वे आप को बाहर निकालती हैं. बताती हैं कि आप झठन जैसे रिश्तों के लायक नहीं हैं और जब आप अपने स्टैंडर्ड गिराने लगते हैं तो वही दोस्त आप को फिर से ऊपर उठाती हैं.

Female Friendship

Love Story in Hindi: प्यार का महीन धागा

Love Story in Hindi: एकदम सुबहसुबह मेरे मोबाइल पर एक मैसेज आया, ‘गुडमोर्निग छवि’ साथ में स्माइली वाली इमोजी भी थी. फिर तुरंत उस ने एक और मैसेज भेजा, ‘क्या हम मिल सकते हैं?’ मैं ने तुरंत उस के मैसेज पर ‘यस’ वाला अंगूठा दबाया और खुशी के मारे उछल पड़ी.

उस के मैसेज ने मेरे अंदर एक अजीब सा एहसास जगा दिया, मतलब, बहुत जानापहचाना सा, बहुत अपना सा, पता नहीं और क्या? उस के मैसेज को पढ़ कर मैं विस्मित थी और आनंदित भी. कहीं तो कोई महीन सा धागा जुड़ गया था प्यार का, हमारे बीच, जिसे मैं अपनी 2 बड़ीबड़ी आंखों से देख पा रही थी.

उस मैसेज को मैं ने कई बार पढ़ा. एक बार तो दिल बोला, कहीं यह मैसेज उस ने गलती से तो नहीं भेज दिया तुझे. ‘गलती से कैसे? देखो, उस ने मेरा नाम भी तो लिखा है, ‘छवि’. लेकिन मुझे खुद विश्वास नहीं हो रहा था उस ने मुझे… मुझे मैसेज भेजा.

करीब 6 महीने पहले मैं उस से उसी पार्क में मिली थी, जहां मैं रोज अपने हैरी मेरा कुत्ता, को ले कर वाक पर जाती हूं. लेकिन वह वाक नहीं करता था, दौड़ता था, अपने एक दोस्त के साथ. दोनों में रेस लगती कि कौन कितना तेज दौड़ सकता है. दौड़ने के बाद कुछ देर सुस्ता कर वह काफी देर तक ऐक्सरसाइज भी करता. वह लड़का लंबाचौड़ा तो था ही, स्मार्ट भी बहुत था. तभी तो मैं उसे देखते ही फिसल गई.

उस ने एएफसीएटी (एअरफोर्स कौमन एडमिशन टैस्ट) पास कर लिया है.

एसएसबी इंटरव्यू और मैडिकल टैस्ट में उत्तीर्ण होना बाकी है और उसी की तैयारी कर रहा है. ऐसा मैं ने उसे फोन पर किसी से बात करते सुना था. कह रहा था कि बचपन से उस ने फाइटर पायलट बनने का सपना देखा है, और वह बन कर रहेगा. उस का जनून देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा. लगा उसे जा कर शाबाशी दूं. लेकिन मैं तो उसे जानती तक नहीं. बस पार्क में दौड़ लगाते देखती रही हूं.

मेरे मामा भी फाइटर पायलट थे. बहुत ही हैंडसम थे वे. उन का रहनसहन और बात करने का तरीका बहुत हाई क्लास था. जब भी मैं मम्मीपापा के साथ नानी के घर जाती, तो मामा से कहती, ‘‘मैं भी बड़ी हो कर उन की तरह फाइटर पायलट बनूंगी और प्लेन उड़ाऊंगी.’’

इस पर मामा हंसते हुए कहते, ‘‘हां, जरूर बनना और प्लेन भी उड़ाना.’’

मेरे मामा मुझे बहुत प्यार करते थे. लेकिन एक रोज उन का प्लेन क्रेश हो गया जिस की वजह से उन की मौत हो गई. मामा के साथ दूसरे जो पायलट थे उन की भी मौत हो गई. दुख की बात तो यह थी कि 2 महीने बाद मामा की शादी होने वाली थी. खैर, मामा की मौत के साथसाथ मेरे सपने की भी मौत हो गई क्योंकि उन की मौत ने पापा को डरा दिया. अब वे नहीं चाहते थे कि मैं फाइटर पायलट बनूं. हर मातापिता चाहते हैं उन के बच्चे सुरक्षित रहें और मेरे मांपापा ने भी वही चाहा. लेकिन पापा को मैं यह बात सम?ाना चाहती थी कि मामा इसलिए नहीं मर गए कि वे ‘फाइटर पायलट थे बल्कि इसलिए मर गए कि उन्हें इतना ही जीना था.’

अभी अहमदाबाद में जो प्लेन क्रैश हुआ, उस प्लेन में सफर करने वाले यात्रियों के साथसाथ कई मैडिकल स्टूडैंट्स की भी जान चली गई. क्या उन मैडिकल स्टूडैंट्स ने सपने में भी सोचा होगा कि उन्हें ऐसी मौत मिलेगी? जिस वक्त वे खाना खा रहे होंगे, उन के ऊपर प्लेन आ गिरेगा और वे मर जाएंगे, नहीं न? फिर इंसान क्यों डरता रहता है? मौत समय और जगह बता कर थोड़े ही न आती है. उसे तो जब आना होता आ जाती है. लेकिन इंसान को लगता है ऐसा करते तो वैसा न होता. वैसे अब मेरे सपने बदल गए हैं. मैं आर्किटैक्चर की पढ़ाई कर रही हूं.

मगर यह भी सच है कि मुझे उस फाइटर पायलट से प्यार हो गया, जिस का नाम नीरव है और यह सपना कभी नहीं बदलने वाला. अब मुझे उस का नाम कैसे पता चला? तो जब वह अपने दोस्त के साथ पार्क में दौड़ लगा रहा था, तब उस के दोस्त ने उसे पीछे से आवाज दी थी, ‘‘नीरव, रुक जाओ यार.’’

और वह रुक कर पीछे मुड़ कर हंसा था. उस की हंसी इतनी मनमोहक थी कि मैं उसे देखती रह गई और मेरे हाथों से छूट कर हैरी मेरा कुत्ता भाग गया और मैं चिल्लाते हुए उस के पीछे भागी.

‘‘हैरी… स्टौप… हैरी स्टाप,’’ लेकिन वह शैतान कहां रुकने वाला था. पार्क के कई चक्कर लगाने के बाद भी जब वह मेरे हाथ में नहीं आया तो मैं हांफती हुए कमर पर हाथ रख एक तरफ खड़ी हो गई क्योंकि हैरी के पीछे भागतेभागते थक चुकी थी मैं. तभी देखा हैरी को गोद में लिए उसे पुचकारते हुए वह लड़का नीरव मेरी तरफ ही आ रहा है.

‘‘यह लीजिए, आप का हैरी. इस की डोर को कस कर पकड़ रखा करो ताकि दोबारा भागने न पाए. वैसे आप का हैरी बहुत ही प्यारा है,’’ मेरे हाथ में हैरी को सौंपते हुए अपनी मधुर मुसकान बिखेरते हुए वह फिर बोला, ‘‘कहीं सुना था कि कुत्तों को प्यार देने के लिए मनुष्य उन्हें नहीं चुनते बल्कि कुत्ते मनुष्य को चुनते हैं और उस के पास आते हैं.’’

‘‘हां, मैं ने भी सुना था कि जिन मनुष्यों को बेजबान जानवर प्रेम करते हैं, वे निश्चित तौर पर सुंदर लोग होते हैं,’’ मैं ने हैरी को प्यार से सहलाते हुए कहा, ‘‘भले ही यह हमारी तरह बोल नहीं सकता लेकिन प्रेम, भावनाएं व्यक्त करना जानता है.’’

मेरी बात पर उस ने मुझे गौर से देखा और फिर मुसकरा कर हाथ हिलाते हुए आगे

बढ़ गया. उस की इस मुसकराहट ने मेरे अंदर एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी जैसे लगा हर तरफ संगीत बज उठा हो.

‘एक बार, एक बार वह मुझे पलट कर देख ले तो समझ जाऊंगी कि वह भी मुझे पसंद करता है’ ऐसा मेरे दिल ने कहा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं उस ने मुझ पलट कर नहीं देखा. ‘कोई बात नहीं, लेकिन मैं तो उसे पसंद करती हूं न’ मैं ने अपने नन्हे से दिल को समझाया, तो वह बोल पड़ा, ‘वह किस जातिधर्म का है पता भी है तुम्हें?’ नहीं जानना मुझे कि वह कौन सी जाति और धर्म का है. सुना नहीं तुम ने, ‘प्रीत न जाने जातकुजात नींद न जाने टूटी खाट, भूख न जाने बासी भात और प्यास न जाने धोबीघाट. प्यार का तो एक ही धर्म और जाति है, प्यार.

मैं रोज समय से हैरी को ले कर पार्क पहुंच जाती. नीरव को देखते ही हैरी भाग कर उस के पास चला जाता और वह हैरी के रेशमी मुलायम  बालों से खेलते हुए उसे पुचकारता और फिर दोनों साथ में दौड़ लगाने लगते. कभी वह हैरी के पीछे भागता तो कभी हैरी उस के पीछे और मैं दोनों को देखदेख कर मुसकराती.

हैरी की एक आदत बहुत खराब है, जैसे ही उसे कोई कुतिया दिख जाती है उधर दौड़

लगा देता है. उस दिन भी यही हुआ, वह उस कुतिया के पीछे भागा तो सड़क के उस पार निकल गया.डर गई कि कहीं किसी गाड़ी के नीचे न आ जाए, इसलिए उस के पीछे भागी. मगर वह तो अपनी ही गति से भागा जा रहा था. लेकिन तभी बड़ी फुरती से नीरव उस के पीछे भागा और उसे पकड़ कर मु?ो सौंपते हुए बोला, ‘‘क्यों रे हैरी, लड़की को देखते ही लाइन मारने लगा तू?’’

‘‘थैंक यू सो मच. आप इसे पकड़ कर न लाते तो पता नहीं आज क्या हो जाता,’’ मैं उस का आभार प्रकट कर, झूठमूठ का हैरी पर गुस्सा करने लगी कि क्यों भाग गया? चल घर, आज मैं तुझे बताती हूं. शैतान कहीं का.

मुझे हैरी को यों डांटते देख वह हसा और बोला, ‘‘यह हमारी तरह इंसान नहीं है जो आप की नाराजगी का जबाव नाराजगी से दे सके. बेचारा, देखिए तो कैसे मुंह बना कर बैठा है.’’

हैरी के मुलायम बालों पर अपनी उंगलियां फिराते हुए वह ‘बाय’ बोल कर फिर अपने दोस्त के साथ दौड़ में शामिल हो गया और मैं उसे जाते देखती रही.

मैं हैरी को खींचते हुए पार्क की बैंच पर जा बैठी. लेकिन हैरी अपनी पूंछ हिलाहिला कर बारबार मुझे संकेत कर रहा था अब घर चलो. ‘‘हांहां, बस थोड़ी देर रुक जा, चलते हैं.’’ मेरी बात पर उस ने गुस्से में मुझे अपना दांत गड़ा दिया. यही करता है यह. जब भी इसे गुस्सा आता है या अपनी कोई बात मनवानी होती है, दांत गड़ा देता है. वैसे पापा के साथ मैं इसे हर महीने पशु चिकित्सालय ले कर जाती हूं ताकि इसे जरूरी टीके लगाए जा सकें.

पहले सुबह उठ कर पार्क आने में मुझे आलस होता था. पापा से कहती कि वे

हैरी को बाहर घुमा लाएं. लेकिन जब से नीरव से मिली हूं, नींद उड़ चुकी है मेरी. पागलों की तरह बिना अलार्म बजे उठ  जाती हूं और हैरी को ले कर पार्क पहुंच जाती हूं.

‘ओह, नीरव बिलकुल मेरे सपनों के राजकुमार जैसा है,’ मैं खुद में चहकती हुई बोली तो मेरे दिल ने कहा, ‘इतना जो उछल रही हो, क्या वह भी तुम्हें पसंद करता है? कहीं ऐसा न हो कि वह तुम्हारे सपनों का राजकुमार बन कर ही रह जाए,’ ‘कुछ भी मत बोलो’ मैं ने अपने दिल को फटकारा, ‘वह निश्चय ही मेरा होगा क्योंकि जब बुलंद इरादे और सच्ची लगन हो तो मंजिल के रास्ते खुदबखुद खुलते चले जाते हैं. क्यों हैरी सही कहा न मैं ने.’

और मेरी बात पर हमेशा की तरह उस ने अपनी पूंछ हिलाई.

हां, यह भी बात है कि वह मुझे पसंद करता है या नहीं, यह तो पता करना ही पड़ेगा, पर कैसे? क्या पूछूं उस से जा कर कि मैं उसे पसंद हूं या नहीं? नहींनहीं, क्या सोचेगा वह मेरे बारे में? तो फिर क्या करूं? उस का फोन नंबर मांग लूं क्या? लेकिन उस ने देने से मना कर दिया तो और फिर पूछेगा नहीं कि क्यों चाहिए मुझे उस का फोन नंबर? हां, उसे खत लिखूंगी मैं… अरे, तो क्या हो गया जो मोबाइल का जमाना आ गया तो खत की बात ही अलग है.

‘डाकिया डाक लाया… डाकिया डाक लाया…’ गाना आज भी दिल को छू जाता है. पहले के जमाने में 2 प्रेमी खत के जरीए ही तो अपने प्यार का इजहार किया करते थे. फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ में कैसे नायिका अपने प्रेमी को कबूतर के जरीए खत भिजवाती हुई गीत गाती है, ‘कबूतर जा जा जा… पहले प्यार की पहली चिट्टी… साजन को दे आ…’ और फिल्म ‘सरस्वती चंद्र’ में नायिका, ‘फूल तुझे भेजा है खत में… फूल नहीं मेरा दिल है…’ गा कर अपने प्रेम का इजहार करती है और खुद मेरे मम्मीपापा एकदूसरे को प्यार भरा खत भेजा करते थे.

मां ने ही मु?ो बताया था कि पापा हर संडे उन्हें घर के लैंडलाइन फोन पर फोन करते थे. लेकिन मां उन की बातों पर सिर्फ ‘हां, हूं’ में ही जवाब दे पाती थीं क्योंकि घर के सारे लोग वहां बैठे जो होते थे. फिर पापा और मां अपने प्यार का इजहार खतों के जरीए करने लगे.

तभी तो मैं भी खत के जरीए नीरव के सामने अपने प्यार का इजहार करूंगी. लेकिन मेरा प्यार भरा खत ले कर जाएगा कौन? अरे, मेरा शेरा, हैरी है न. यह पहुंचाएगा नीरव तक मेरा प्यार भरा खत.

‘‘क्यों हैरी, मेरा डाकिया बनेगा?’’ मेरी बात पर उस ने अपनी पूंछ हिलाई. मतलब करेगा.

‘‘शाबाश,’’ मैं ने हैरी को चूम लिया तो खुशी के मारे वह और तेजी से पूंछ हिलाने लगा.

मैं ने फटाफट एक प्यार भरा खत लिख डाला, साथ में अपना फोन नंबर भी चिपका दिया और हैरी के गले के पट्टे में अच्छे से टांग दिया ताकि नीरव को वह खत दिख जाए. फिर मैं खुद पार्क की एक बैंच पर जा कर बैठ गई. मैं दूर बैठी देख रही थी, रोज की तरह नीरव हैरी के साथ मस्ती कर रहा था. वापस घर आते समय जब मुझे हैरी के गले के पट्टे में वाह खत नहीं दिखा तो मैं खुशी से झूम उठी कि मेरा प्यार भरा खत नीरव तक पहुंच चुका है और अब वह मुझे जरूर फोन करेगा. पता चल जाएगा कि वह भी मुझे पसंद करता है या नहीं. लेकिन जब उस का कोई जवाब नहीं आया तो मैं परेशान हो उठी.

परेशान तो मेरा हैरी भी था क्योंकि बेचारे को 2 दिनों से पौटी नहीं हो रही

थी. कुछ खापी भी नहीं रहा था. मां से बोली तो उन्होंने कहा कि कुछ उलटासीधा खा लिया होगा इसलिए उसे पौटी नहीं हो रही है. हो जाएगी

तुम चिंता मत करो. ‘शायद हो सकता है’ मैं ने सोचा. लेकिन मेरा ध्यान तो फोन पर ही था कि अब नीरव का फोन आएगा, अब नीरव का फोन आएगा. उस के जवाब के इंतजार में मेरी आंखें पथरा गईं और फिर कब मुझे नींद आ गई पता ही नहीं चला. सुबह जब उठी तो देखा हैरी ने मेरे कमरे में पौटी कर दी थी.

‘‘छि: यह क्या किया तूने हैरी?’’ मैं ने अपनी नाक पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘यह इस की पौटी ऐसी सफेदसफेद क्यों है? हाय रे भुख्खड़, तूने मेरा प्रेम पत्र खा लिया. कितनी मुश्किल से लिखा था. यह मेरा पहला प्रेम पत्र था और तूने इसे खा लिया? तुझे शर्म नहीं आई कुत्ते,’’ मैं गुस्से में चीख पड़ी तो वह मुझ पर ?ापटा क्योंकि उसे कुत्ता सुनना बिलकुल पसंद नहीं.

‘‘अच्छाअच्छा सौरी हैरी महाराजजी,’’ मैं ने हाथ जोड़ कर उसे नमस्कार किया तो वह ‘कूंकूं’ कर लाड दिखाने लगा. लेकिन अब मैं क्या करूं, कुछ समझ नहीं आ रहा था.

तभी मेरे दिमाग में एक आइडिया आया और मैं मुसकरा उठी. उस दिन जब पार्क में नीरव से मिली तो उसे यह कह कर पास के स्नैक्स बार में ले गई कि आज हैरी का जन्म दिन है तो आज उस की तरफ से पार्टी.

‘‘ओ हैप्पी बर्थडे हैरी,’’ हैरी के रेशमी बालों को अपने हाथों से सहलाते हुए नीरव बोला, ‘‘कितने साल का हो गया तू?’’ बोल कर वह हंसा तो मु?ो भी हंसी आ गई. हम ने 2 कौफी और फ्रैंचफ्राई मंगवाया बस. जब पैसे देने की बारी आई तो नीरव ही देने लगा पर मैं ने उसे

देने नहीं दिए और खुद ही फोन से पेमैंट करने लगी. लेकिन यह क्या, मेरा तो नैट ही नहीं चल रहा था और पैसे मैं अपने पास रखती नहीं. तो क्या करूं अब?

मुझे परेशान देख नीरव समझते देर नहीं लगी और वह पैसे देने लगा तो मैं ने उस से वादा किया कि मैं उस के पैसे लौटा दूंगी और उसे लेने पड़ेंगे. मैं ने उस का फोन नंबर ले लिया ताकि उस के पैसे लौटा सकूं.

घर आ कर सब से पहले मैं ने नीरव के पैसे लौटाए और फिर विजयी मुसकान के साथ हैरी की तरफ देखा. उस का झूठा बर्थडे और फोन में नैट न होने का नाटक जो किया था मैं ने ताकि उस का फोन नंबर मिल सके. खैर, मैं अपने प्लान में कामयाब हो चुकी थी और अब इंतजार था उस के फोन आने का. लेकिन उस बात को हफ्ता बीत गया न तो उस ने एक ‘हाय’ भेजा और न ही हमारे बीच बातों का कोई आदानप्रदान ही हुआ.

इधर कई दिनों से नीरव पार्क में दौड़ने भी नहीं आ रहा था. करीब 20-22 दिन

बाद वह मुझे पार्क में दिखा तो मेरा दिल खुशी से झूम उठा. मैं कुछ कहती उस से पहले ही वह मेरे पास आ कर बोला कि वह अपने घर लखनऊ गया था, अपनी शादी के लिए लड़की देखने.

उस की बात सुन कर मेरा दिल रोते हुए गाने ही जा रहा था, ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया…’ कि तभी वह बोल पड़ा, ‘‘पर मैं ने इस शादी के लिए न बोल दिया क्योंकि मुझे जैसी लड़की चाहिए उस में वह बात नहीं थी.’’

उस की बातों ने मेरे दिल पर मरहम का काम किया और मैं मरतेमरते जी उठी.

‘‘वैसे आप को देख कर लगता है, आप ने मुझे बहुत मिस किया?’’

उस की बातों पर मैं सकुचा उठी.

‘‘जस्ट जोकिंग यार,’’ वह बेफिक्री से

हंसा. लेकिन यह बात सच है कि मैं ने उसे बहुत मिस किया.

तभी मां की तेज आवाज मुझे अतीत से बाहर खींच लाई.

‘‘हां, मां बोलो क्या है?’’

तो मां कहने लगीं कि मेरे लिए एक रिश्ता आया है.

‘‘तो मैं क्या करूं?’’ मैं चिढ़ते हुए बोली.

‘‘मैं क्या करूं मतलब? क्या तुझे शादी

नहीं करनी है?’’ मां ने भी उसी अंदाज में कहा.

‘‘नहीं, मुझे कोई शादी नहीं करनी.’’

‘‘क्या कहा, शादी नहीं करेगी? क्यों नहीं करनी?’’ मां ने मुझे घूरा.

‘‘बस ऐसे ही, म… मेरा मतलब है अभी मुझे जौब लेनी है फिर शादी के बारे में सोचूंगी.’’

‘‘कोई देख तो नहीं रखा है अपने लिए?’’ मां ने ताड़ते हुए कहा.

‘‘हां, मतलब नहीं, अरे, यार… जाओ यहां से आप,’’ मैं तिलमिला उठी,

कुछ सैकंड रुक कर मां, ‘‘यह लड़की भी न मेरी समझ से बाहर है,’’ बोल कर कमरे से बाहर निकल गईं.

‘मगर मैं क्या करूं क्योंकि नीरव तो… पता नहीं मैं उसे पसंद भी हूं या नहीं. अजीब लड़का है. अरे, कुछ बोलो तो सही कि मैं तुम्हें पसंद हूं या नहीं. इतना क्या भाव खा रहे हो. मुझ जैसी लड़की नहीं मिलेगी तुम्हें, बताए देती हूं. हुंह, जाने दो, अब मुझे भी तुम्हारे पीछे नहीं भागना,’ मैं खुद में ही भुनभुनाते हुए बोली. मां ने पलट कर मुझे देखा कि कहीं मैं पगला तो नहीं गई?

‘हां, पगला ही तो गई हूं, तभी तो सोतेजागते बस उसी के बारे में सोचती रहती हूं. तभी मुझे खयाल आया कि उस ने मुझे मैसेज कर मिलने बुलाया था.

मैं ने तुरंत उसे मैसेज किया ‘क्या आज हम मिल सकते हैं?’ उस ने तुरंत उत्तर दिया

‘ओके.’ मैं ने पूछा, ‘कहां?’ तो उधर से जवाब आया, ‘सिंधु भवन रोड, यांकी सिजलर’ रैस्टोरैंट में शाम के 4 बजे.’

‘ओके’ बोल कर मैं ने घड़ी की तरफ देखा. घड़ी अभी 2 बजा रही थी यानी 2 घंटे हैं अभी

4 बजने में. उस से मिलने के लिए पहले मैं ने खुद को मानसिक रूप से तैयार किया और फिर तैयार होने लगी. अलमारी से बहुत सारा टीशर्ट निकालने के बाद मुझे यह लाइट पर्पल कलर की टीशर्ट पसंद आई. इस के साथ ब्लैक जींस पहन ली. एक हाथ में ब्रेसलेट और दूसरे में घड़ी पहन ली. पर्स की कोई जरूरत नहीं थी क्योंकि मोबाइल में सबकुछ है. पैरों में सैंडल फंसाए और मां को यह बोल कर घर से निकल गई कि मैं अपनी दोस्त वैभवी से मिलने जा रही हूं थोड़ी देर में आ जाऊंगी.

पीछे से मां चिल्लाईं कि इतने कपड़े क्यों फैला दिए?

तब मैं ने पीछे मुड़ कर कहा, ‘‘सौरी मां, आ कर समेट दूंगी.’’

‘यांगी सिजलर’ रैस्टोरैंट में नीरव पहले से मेरा इंतजार कर रहा था. मुझे देखते ही खड़ा हो गया और खींच कर मेरे लिए कुरसी निकाली. कुछ सैकंड मुझे अपलक देखा और फिर वेटर को 2 कौफी लाने को कह कर हैरी के बारे में पूछने लगा. लेकिन अभी मेरा हैरी के बारे में बात करने में जरा भी इंटरैस्ट नहीं था. मैं चुप थी, कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि बात कहां से शुरू करूं? वैसे तो बहुत बकबक करती रहती हूं लेकिन आज पता नहीं उस के सामने घिग्घी क्यों बंध गई मेरी.

जिस नीरव से मिलने के लिए इतनी उतावली हो रही थी, उस से मिलते ही आज क्या हो गया मुझे कि शर्म से मरी जा रही हूं मैं? मुंह से एक बोल नहीं फूट रहा था. तभी वेटर 2 कप कौफी ले आया. कौफी का मग उस ने मेरी तरफ बढ़ाया तो मेरी आंखें उस की आंखों से जा लड़ीं और मैं ने शरमा कर अपनी नजरें नीची कर लीं. अजीब ही हूं मैं भी. मैं खुद पर खीज उठी.

‘‘तुम कैसी हो?’’ उस ने ही बात शुरू की.

नीरज के मुंह से ‘अपने लिए ‘आप’ की जगह ‘तुम’ संबोधन सुनना मधुर

संगीत जैसा लगा मुझे.

‘‘मैं ठीक हूं, आप कैसे हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अच्छा हूं. लेकिन तुम मुझे तुम बुलाओगी तो ज्यादा अच्छा लगेगा,’’ कौफी का घूंट भरते

हुए उस ने मु?ा से मेरी पढ़ाई और आगे का मेरा क्या प्लान है, सब पूछ लिया. अपने बारे में भी बता दिया. यह भी बताया कि उस का एएफसीएटी क्लीयर हो गया और अब वह ट्रेनिंग के लिए जाने वाला है. फिर वह कहने लगा कि फाइटर पायलट बनना उस का सपना था जो आज सच हो गया.

‘‘कौंग्रेट्स,’’ मैं ने उसे बधाई देते हुए कहा, ‘‘मेरे मामा भी फाइटर पायलट थे.’’

‘गुड’ बोलकर वह फिर कौफी का घूंट भरने लगा और यहांवहां की बातें करने लगा तो मुझे चिढ़ हो आई कि हम इस रैस्टोरैंट में करीब डेढ़ घंटे से बैठे हैं लेकिन अभी तक इस ने एक बार भी मुझे ‘आई लव यू’ नहीं बोला. आखिर क्या मकसद है मुझे यहां बुलाने का? मेरा दिल धीरेधीरे टूट रहा था, सच में.

‘‘मां इंतजार कर रही होंगी, मैं चलती हूं,’’ बोल कर मैं जाने के लिए मुड़ी ही कि

पीछे से उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘आई लव यू छवि. क्या तुम मेरी जिंदगी में

आना चाहोगी?’’

मैं ने पलट कर उसे आश्चर्य से देखा. लगा, कहीं यह कोई सपना तो नहीं है?

‘‘बोलो छवि, क्या तुम मुझ से शादी करोगी?’’ उस ने फिर वही बात दोहराई तो मैं अचेत से सचेत हो कर उसे देखने लगी. आज उस की आंखों में अलग ही चमक थी.

नीरव हंसते हुए फिर बोला, ‘‘पता है छवि, जब मैं ने तुम्हें पहली बार उस पार्क में देखा था न तभी मु?ो तुम से प्यार हो गया था. लेकिन अपने प्यार का इजहार इसलिए नहीं कर पाया क्योंकि उस वक्त मैं बेरोजगार था. लेकिन अब नहीं हूं. मैं ने शर्म से गरदन नीचे झुका ली और फिर धीरे से हां, कह कर रैस्टोरैंट से बाहर भाग आई.

घर आ कर मैं हैरी को गोद में उठा कर उसे चूमने लगी. खुशी के मारे लग रहा था नाचूंगाऊं क्या करूं क्योंकि आज मुझे मेरा प्यार जो मिल गया था.

मां ने मुझे झांक कर देखा और फिर

कमरे में आ कर बोलीं, ‘‘कौन है वह? नाम

क्या है उस का? करता क्या है?’’ एकसाथ इतने सारे सवाल सुन कर मैं झूठ नहीं बोल पाई और सब कुछ सचसच बता दिया. यह बात सुनते ही मां भड़क गईं कि लड़का यानी नीरव फाइटर पायलट है.

‘‘तो क्या हो गया मां. अरे नीरव को आप मामा से जोड़ कर क्यों देख रही हैं? क्या जो भी फाइटर पायलट बनते हैं जब मर ही जाते हैं? फिर देख लो मां, शादी तो मैं नीरव से ही करूंगी, भले पापा मानें न मानें,’’ बोल कर मैं कमरे से बाहर निकल आई. सोच लिया कि प्यार के इस महीन धागे को कभी टूटने नहीं दूंगी.

Love Story in Hindi

Hindi Long Story: एक सालगिरह ऐसी भी

लेखक- राजीव रोहित

‘‘मुझे छुट्टी चाहिए,’’ जयंती ने लता से कहा.

‘‘क्यों? अभी हाल ही में तो छुट्टी पर गई थी,’’ लता ने हैरान हो कर जयंती की तरफ देखते हुए कहा.

‘‘अरे यार, उत्सव मनाना है,’’ जयंती ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘उत्सव…’’ लता  हैरान हो गई.

‘‘हां मेरी यार उत्सव यानी त्योहार…’’

‘‘वह तो ठीक है लेकिन अभीअभी तो लोड़ी गई न?’’

‘‘और भी उत्सव हैं यार…’’ जयंती ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘अच्छा जरा मैं भी तो सुनूं. नया उत्सव कौन सा है?’’

‘‘है तो पर सोच रही हूं कि उत्सव का उल्लेख छुट्टी के आवेदनपत्र में करूं या नहीं,’’ जयंती थोड़ी गंभीर हो गई.

‘‘अब व्यक्तिगत स्तर पर जो चाहे हम उत्सव मना लें तो कोई क्या कर लेगा. लिख दे न जो भी कारण है,’’ लता ने उस की तरफ देखते हुए कहा.

‘‘कारण तो ऐसा है मेरी जान के उसे पढ़ कर हंगामा हो जाए.’’

‘‘बहनजी, ऐसा भी क्या कारण है?’’ लता ने उस की बांह में चिकोटी काटते हुए कहा.

‘‘है एक विशेष कारण. चल तुझे बता ही दूं,’’ जयंती ने शोख अंदाज में कहा.

‘‘जल्दी बोल, मैं मरी जा रही हूं.’’

‘‘तो दिल थाम कर सुन, मैं अपनी तलाक की सालगिरह मनाना चाहती हूं,’’ जयंती ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘क्या कह रही है तू?’’ लता जैसे उछल पड़ी. उस की आंखों में जबरदस्त कुतूहल उभरा.

‘‘हां यार, लोग शादी की सालगिरह मनाते हैं मैं तलाक की मनाना चाहती हूं तो इस में बुराई क्या है?’’

‘‘बिलकुल सही बात है. इस फरवरी की

14 तारीख को यानी वैलेंटाइनडे के दिन 1 वर्ष पूरा हो जाएंगे. है न जयंती?’’ लता भी गंभीर हो गई.

‘‘अरे वाह. तुम्हें तो याद है. हां यार, पूरे

1 वर्ष तक यातनाएं झेलती रही. अब अपार शांति,’’ जयंती की आंखों में नमी थी.

लता अच्छी तरह जानती थी कि जयंती को इस तलाक के लिए कितनी पीड़ा

?ोलनी पड़ी थी.

‘‘हां यार, ऐसे ही मन में आया कि लोग सिर्फ शादी की. जन्मदिन की ही खुशियां मनाते हैं. तलाक की भी खुशी क्यों नहीं मनानी चाहिये. स्त्री और पुरुष दोनों मनाएं. तुम्हें क्या लगता है?’’ जयंती ने फिर कहा.

‘‘बात तो सही कह रही हो तुम. आखिर स्त्री हो या पुरुष दोनों ही तो यातनाओं से गुजरते हैं,’’ लता ने सहमति प्रदान की.

‘‘जो हम पर है गुजरी हम ही जानते हैं,’’ जयंती अनायास गुनगुना उठी.

‘‘हां यार. अच्छा मेरी जान घर वालों को बताया?’’

‘‘पता नहीं उन की प्रतिक्रिया क्या होगी? मांबाबा का तो पता नहीं लेकिन मुझे मालूम है, एक आदमी मुझे पूरा समर्थन देगा, इस जश्न में मेरा बढ़चढ़ कर साथ देगा.’’

‘‘कौन है वह?’’

‘‘सगे तो नहीं पर सगों से बढ़ कर हैं सुशांत भैया. मेरी बड़ी मौसी के एकमात्र सुपुत्र. अविवाहित रहने का प्रण कर रखा है अन्यथा मैं एक बार तुम से जरूर कहती कि किसी और को जीवनसाथी बनाने से पहले एक बार सुशांत भाई से मिल लो,’’ जयंती ने कहा.

‘‘धत्, वैसे मेरा खयाल है कि घर वालों को भी अपनी बेटी की खुशी में शामिल होना चाहिए,’’ लता ने अपना मत प्रकट किया.

‘‘तुम्हें भी आना होगा, मेरा साथ दोगी न? जयंती ने पूछा.

‘‘जरूर साथ दूंगी,’’ लता ने उस के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा.

‘‘तुम्हारे घरवालों को तो कोई समस्या

नहीं होगी?’’

‘‘बिलकुल नहीं. बेफिक्र रहो.’’

‘‘घबराओ मत, ज्यादा भागदौड़ नहीं करनी होगी. उन्हीं डैकोरेटर वालों को बुलाऊंगी जो हमारी शादी में आए थे,’’ यह कहते हुए जयंती ने एक जोरदार ठहाका लगाया.

‘‘उन को भी हैरानी होगी.’’

‘‘वह तो पूरी दुनिया को होगी और इस में हरज ही क्या है? जिन्होंने एक बार घर बसाने के लिए शमियाना लगाया था वेअब उस घर से मुक्ति पाने के लिए शामियाना लगाएंगे.’’

‘‘तुम भी यार अनोखी चीज हो.’’

‘‘इस में क्या शक?’’

‘‘अच्छा यह सब तो ठीक है आवेदन पत्र लिखा क्या? उस खड़ूस से छुट्टी भी तो मंजूर करानी है.’’

‘‘हां यार, अच्छा हुआ याद दिलाया. मौड्यूल खोलती हूं.’’

‘‘कारण क्या लिखोगी?’’

‘‘व्यक्तिगत काम ही लिखूंगी. खड़ूस अमन कुछ ज्यादा ही पूछताछ करेगा तो बताना ही पड़ेगा,’’ जयंती ने आवेदनपत्र मौड्युल में पंजीकृत करते हुए कहा, ‘‘अमनजी तो निकल गए जयंती.’’

‘‘अरे, अब तो कल ही दिया जा सकता है. औफिस बंद होने का समय भी तो हो गया है. हमें भी निकलना चाहिए,’’ जयंती ने कंप्यूटर शटडाउन की प्रक्रिया पूरी करते हुए कहा.

‘‘हां, चलना चाहिए.’’

दोनों औफिस से बाहर आ गईं. दोनों चर्चगेट की तरफ चल पड़ीं. चाल में बहुत तेजी नहीं थी लेकिन उन के आसपास चलने वाले लोग बड़ी तेजी से चल रहे थे जैसे उन की जिंदगी का मकसद केवल ट्रेन पकड़ना रह गया हो.

‘‘तेज चलने की इच्छा नहीं होती?’’ लता ने चलतेचलते पूछ लिया?

‘‘तेज चलने की सजा भुगत चुकी हूं. अब और नहीं.’’

‘‘तेज चलने की सजा… सजा… सम?ा नहीं?’’

‘‘शादी में बहुत जल्दी मचाई थी न,’’

जयंती हंसी.

‘‘ओह, सम?ा. मगर मैं तो ट्रेन पकड़ने के लिए जो तेजी दिखाते हैं उस की बात कर रही थी.’’

‘‘चर्चगेट आ गया.’’

‘‘हम चर्चगेट आ गए बहनजी. चर्चगेट तो अपनी जगह है.’’

दोनों हंस पड़ीं. ट्रेन प्लेटफौर्म में लग चुकी थी. दोनों रोज की तरह सामान्य डब्बे

में बैठ गईं. वे महिला डब्बे में नहीं बैठती थीं. रोज के आनेजाने वाले पुरुष यात्री उन्हें पहचान गए थे. शुरूशुरू में वे नाकभौं सिकोड़ते थे. यह स्वाभाविक भी था. आखिर महिलाओं के लिए विशेष डब्बे तो हर लोकल ट्रेन में लगते ही थे. उन्हें यह महसूस होता था कि ये दोनों लड़कियां सामान्य डब्बे में बैठ कर जैसे पुरुषों का हक मारती हैं. आगे चल कर धीरेधीरे सभी यात्री उन की उपस्थिति के अभ्यस्त हो गए थे. कई बार उन के देर से आने पर बैठने की जगह भी दे देते.

‘‘यात्री वाहनों में महिलाओं के लिए विशेष स्थान की शुरुआत का इतिहास किसी को पता नहीं. सभ्यता बदलने के क्रम में शायद  पुरुषों की बुरी नजरों से महिलाओं को बचाने के लिए यह व्यवस्था शुरू की गई होगी,’’ लता ने कहा.

‘‘हो सकता है,’’ जयंती ने हामी भरी.

‘‘कल तो तेरी छुट्टी का हंगामा है.’’

‘‘आगे भी तो हंगामा ही है,’’ जयंती ने एक जोरदार ठहाका लगाया.

इस बीच ट्रेन चल पड़ी. इधरउधर की बातों से सफर कट गया. पहले लता का स्टेशन सांताक्रूज आया. वह उतर गई.

‘‘कल मिलेंगे,’’ लता ने हाथ हिलाया.

जयंती ने भी हाथ हिला कर उसे विदा किया.

जयंती और लता केंद्र सरकार के एक सार्वजनिक उपक्रम में 7 वर्षों से पदस्थापित थे. दोनों ने एक ही साथ इस दफ्तर में नियुक्ति पाई थी. हमउम्र होने के कारण जल्द ही दोनों में दोस्ती गहरी हो गई थी. लता ने अभी तक विवाह नहीं किया था, जबकि जयंती नौकरी में नियुक्त होने से कुछ दिन पहले ही घर वालों से विद्रोह करते हुए प्रेम विवाह तो रचा लिया था. किंतु शादी के कुछ ही दिनों बाद पति से उस की अनबन शुरू हो गई थी. परिणाम तलाक के रूप में सामने आया. जयंती इस तलाक से इतनी खुश थी कि उस ने हरजाना लेना भी स्वीकार नहीं किया था.

पिछले साल ही जयंती की 14 फरवरी को तलाक की अपील अंतत: मंजूर हुई

थी. उस के शब्दों में कहा जाए तो उसे मुक्ति मिली थी. 1 साल बीतने को था. अगले सप्ताह शुक्रवार को यानी 14 फरवरी को उस के तलाक का 1 साल पूरा हो रहा था. जयंती इस मौके को एक उत्सव में बदलना चाहती थी.

लता हैरान थी. अपने पूरे जीवन में उस ने एक भी स्त्री या पुरुष नहीं देखा था जिस ने तलाक की खुशी मनाई हो. उस ने यह सोचने की भी जरूरत नहीं सम?ा कि दुनिया क्या कहेगी? उस के रिश्तेदार क्या कहेंगे? क्या उसे गलत नजरों से नहीं देखा जाएगा? यहां तक कि उसे चरित्रहीन भी समझा जा सकता है. जयंती आजादखयाल की है. वह इस तलाक से इतनी खुश है तो उसे जश्न मनाने का पूरापूरा अधिकार है. कल औफिस वालों की प्रतिक्रिया देखने लायक होगी. वह जयंती के साथ है. हर कदम पर उस का साथ देगी. घर वालों को अभी कुछ नहीं बताना ही बेहतर होगा.

दूसरे दिन दोनों औफिस आईं. दोपहर के भोजन के बाद जयंती अपनी अर्जी ले कर अमनजी के सामने उपस्थित हुई.

‘‘सर, मु?ो अगले सप्ताह 10 से 14 फरवरी तक 5 दिनों की छुट्टी चाहिए,’’ जयंती ने अपना आवेदन विभाग के अध्यक्ष अमनजी के सामने रखते हुए कहा.

अमनजी ने आवेदनपत्र हाथ में लिया और पूरी तरह पढ़ने के पश्चात उन्होंने एक नजर जयंती पर डाली. पूछा, ‘‘घरेलू कार्य?’’

‘‘जी सर.’’

‘‘पूछ सकता हूं क्या है?’’

‘‘एक पारिवारिक कार्यक्रम है.’’

‘‘जन्मदिन… शादी…?’’

‘‘नहीं सर,’’ जयंती ने उत्तर दिया.

‘‘सिर्फ 5 दिन? आगे तो नहीं बढ़ाओगी?’’

‘‘हो भी सकता है. ज्यादा संभव है कि ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘अभी हाल ही में तो लंबी छुट्टी पर गई थी?’’

‘‘काम तो कभी भी निकल सकता है न सर,’’ जयंती उस के सवालों पर झुंझला रही थी.

‘‘मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था. छुट्टी लेना तो सरकारी कर्मचारियों का हक है,’’ अमनजी ने मुसकराते हुए कहा और आवेदनपत्र पर हस्ताक्षर कर दिए.

जयंती ने राहत की सांस ली.

‘‘सर, आप भी आइए. मुझे अच्छा लगेगा.’’

जयंती ने कनखियों से लता की तरफ देखते हुए कहा तो लता मुसकराए बगैर न रह सकी.

‘‘अच्छा, कोई खास मौका है?’’ अमनजी ने कुतूहलता दर्शाई.

‘‘हां सर. इस महीने की 14 तारीख को मेरे तलाक को 1 साल हो जाएगा. उस की सालगिरह है,’’ जयंती ने मुसकराते हुए थोड़ा तेज स्वर में कहा ताकि सभी सुन लें.

चारों तरफ एक सन्नाटा सा छा गया. अमनजी स्तब्ध हो गए. उन के आसपास बैठे सारे

लोगों का भी यही हाल था. सभी हैरान थे. हमेशा शांत रहने वाली यह लड़की ऐसा भी कर सकती है?

‘‘बाकायदा सभी को निमंत्रित करूंगी. हमारा कार्यालय एक परिवार है न तो सभी का एकदूसरे की खुशी में शामिल होना लाजिम है,’’ जयंती ने मुसकराते हुए कहा.

अमनजी समेत विभाग के सारे कर्मचारी हैरान थे. इस प्रकार का भी आमंत्रण मिलेगा ऐसा वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे. वे क्या जो भी सुनेगा वह हैरान हो जाएगा.

‘‘आप गंभीर हैं?’’ अमनजी ने गले की खुश्की साफ करते हुए पूछा.

‘‘बिलकुल सर. कोई भ्रम नहीं है. आप भी भ्रम न पालें. मैं तलाक की सालगिरह का ही आमंत्रण दे रही हूं वैलेंटाइनडे का नहीं. आमंत्रण कार्ड बना रही हूं. औफिस के व्हाट्सगु्रप में डाल दूंगी,’’ जयंती के स्वर में आत्मविश्वास ?ालक रहा था.

‘‘अच्छा.’’ अमन सर ने मरी हुई आवाज में कहा.

जयंती अपनी जगह पर आ कर बैठ गई.

‘‘यार, औफिस में तो बोल दिया. सब को दावत दे दी. अब घर वालों को समझाना पड़ेगा खासतौर पर मां को समझाना बेहद मुश्किल है. पुराने जमाने की हैं न,’’ जयंती ने लता से कहा.

‘‘मैं भी इस मुश्किल में फंसने वाली हूं,’’ लता ने कहा.

‘‘क्यों तुम्हें क्या हुआ?’’

‘‘मुझे भी तो बताना पडे़गा न घर में कि मैं अपनी प्यारी सहेली के तलाक की वर्षगांठ मनाने जा रही हूं.’’

‘‘देख भई, अब दोस्त के लिए इतना तो करना पड़ेगा.’’

‘‘वह तो है. चिंता न कर मैं संभाल लूंगी.’’

‘‘यह हुई न बात,’’ जयंती ने खुश हो कर कहा.

‘‘कल मैं होटल, खानेपीने, डैकोरेटर्स सब ठीक कर लूंगी. उत्सव शानदार होना चाहिए.’’

‘‘बिलकुल होना चाहिए.’’

दूसरे दिन जयंती सब से पहले एक मध्यवर्गीय लेकिन बड़ा होटल

‘स्वागत’ का हाल बुक करने होटल गई.

‘‘मुझे आप के होटल में 14 फरवरी के लिए इवेंट हौल बुक करना है,’’ जयंती ने होटल प्रबंधक से कहा.

‘‘जी मैडम. शादी या जन्मदिन? हां समझा. 14 फरवरी अर्थात् वैलेंटाइन डे.’’

‘‘बिलकुल नहीं. वैसे यह बताना जरूरी

है क्या?’’

‘‘जी जरूरी तो नहीं. बस यह था कि हमारी तरफ से फंक्शन के हिसाब से कुछ डैकोरेशन की व्यवस्था हो जाती. आप अपनी तरफ से डैकोरेशन कराने वाली हैं तो कोई बात नहीं.’’

‘‘जी हां. आप की तरफ से केवल एक छोटा सा औरकैस्ट्रा का इंतजाम हो जाए. केवल खुशी के गीत गाने हैं. बस काफी है. वैसे यह बता दूं कि यह मेरी तलाक की सालगिरह है और वह भी पहली,’’ जयंती ने हंस कर कहा.

होटल प्रबंधक और रिसैप्सन पर बैठी कर्मचारी का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘एक बात और है,’’ जयंती ने मुसकराते

हुए कहा.

‘‘जी बताइए.’’

‘‘मेरी शादी का समारोह भी इसी होटल के इवेंट हौल में हुआ था.’’

‘‘हांजी, मैं आप को देख कर याद करने की कोशिश कर रहा था. याद आ गया,’’ होटल प्रबंधक ने कहा.

जयंती ने 5 हजार रुपए पेशगी के तौर पर दिए और रसीद ले कर निकल गई.

होटल प्रबंधक यह जान कर हैरान हो गया कि यह लड़की अपने तलाक की पहली सालगिरह मना रही है. वह रिसैप्शनिस्ट से कहे बिना नहीं रह सका, ‘‘क्या जमाना इतना आगे बढ़ गया है?’’

‘‘यस सर,’’ रिसैप्शनिस्ट ने हंसते हुए कहा.

‘‘तुम्हारी शादी हो गई?’’

‘‘जी सर और फिलहाल मेरा अगले कई सालों तक तलाक लेने का कोई इरादा नहीं है..’’

‘‘अगर कभी लेना चाहो तो उस की सालगिरह जरूर मनाना.’’

‘‘शुभशुभ बोलो सर. आप की हो गई?’’

‘‘क्या, शादी या तलाक?’’ उस ने हंसते

हुए कहा.

‘‘जो भी हुआ हो?’’

‘‘10 महीने पहले तलाक हुआ है,’’ उस ने गंभीरता से कहा.

रिसैप्शनिस्ट बेचारी चुप हो गई. आगे बात करना या कुछ पूछना जरूरी नहीं लगा.

‘‘इस लड़की की पार्टी देख लेता हूं. फिर मैं भी सोचूंगा,’’ यह कह कर वह लाउंज की तरफ निकल गया.

अब सभी को उस समारोह की प्रतीक्षा थी. शहर के सभी स्थानीय हिंदी और

अंगरेजी अखबारों में जयंती ने अपनी एक तसवीर के साथ विज्ञापन प्रकाशित कराया था, ‘‘मैं अपनी वैवाहिक जीवन से मुक्ति की सालगिरह का समारोह 14 फरवरी को मना रही हूं. सभी मित्रों और संबंधियों की हार्दिक आभारी हूं, जिन्होंने बुरे समय में मेरा साथ दिया. इस समारोह में आप की उपस्थिति मेरे लिए बेहद जरूरी है. आप सभी सादर आमंत्रित हैं.’’

जयंती के इस आयोजन से घर वाले न खुश हो पा रहे थे और न नाराजगी दर्शा पा रहे थे.

‘‘जयंती, आखिर सार्वजनिक रूप से हमारे खानदान का तमाशा बना कर तुम्हें क्या मिलेगा?’’ मां ने अपनी नाराजगी दर्शाई.

‘‘उस ने मेरी जिंदगी का तमाशा बना दिया वह कुछ भी नहीं?’’

‘‘सम?ा सकती हूं लेकिन तुम्हारा यह समारोह तलाक के बजाय फिर से तुम्हारी शादी का होता तो ज्यादा अच्छा लगता,’’ मां ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘उस का तो पता नहीं लेकिन एक बात तो निश्चित है मां, फिलहाल मैं दोबारा शादी करने की सोच भी नहीं रही हूं,’’ जयंती ने कहा.

‘‘क्यों नहीं करेगी? क्या जिंदगीभर कुंआरी रहोगी?’’ मां के स्वर में नाराजगी झलक रही थी.

‘‘क्या लड़कियां कुंआरी रहने का फैसला नहीं कर सकतीं?’’

‘‘हां कर सकती हैं लेकिन ऐसे फैसले करने की एक उम्र होती है और तुम्हारी उम्र ही क्या हुई है?’’

‘‘ठीक है. तुम्हारी बात सही

है. लेकिन फिलहाल तो मैं यह तलाक का जश्न मनाना चाहती हूं. बाकी बाते बाद में करेंगे.’’

‘‘हमारे रिश्तेदार हम पर हंस रहे हैं जयंती,’’ मां का स्वर रोंआसा था.

‘‘उन का और काम  ही क्या है? दूसरों की बरबादी पर हंसना और फिर जब सब ठीक होने लगे तो फिर दुनियाभर में खुश रहने का नाटक करने में कोई कसर नहीं छोड़ना. मैं जब तलाक का मुकदमा लड़ रही थी तब तो सुशांत भैया के सिवा साथ देने के लिए कोई सामने नहीं आया था.’’

मां चुप हो गईं. यह सच भी था. जयंती ने अपने भूतपूर्व पति परेश से छुटकारा पाने के लिए सारी लड़ाई अकेले लड़ी थी. सिर्फ उन के भाई का बेटा सुशांत ही ऐसा शख्स था जो जयंती के साथ पूरे मुकदमे के दौरान रहा था.

सुशांत एक कालेज में प्रोफैसर था. जयंती और सुशांत दोनों बचपन से एकदूसरे के प्रति असीम स्नेह रखते थे. जयंती को उस ने हमेशा अपने पैरो पर खड़ा होने के लिए प्रेरित किया था. परेश से शादी के फैसले पर वह अवश्य जयंती से नाराज हुआ था. परेश के बारे में वह अच्छी तरह जानता था कि वह किस किस्म का इंसान है. उस ने जयंती को यह बात सम?ाने की काफी कोशिश की थी कि परेश उस के लायक बिलकुल नहीं है. वह ऐयाश किस्म का इंसान है.

शीतल ने सुशांत की बात नहीं मानी थी. उस समय वह परेश के प्रेम में पड़ी थी. उस ने किसी की बात पर विश्वास नहीं किया था. किसी की भी नहीं सुनी थी.

आज फिर सुशांत उस के साथ खड़ा था. तलाक के इस समारोह में शामिल होने के लिए आ गया था.

सुशांत को देख कर जयंती खुद को रोक न सकी. वह सुशांत के गले लग गई,

‘‘भैया, मु?ो मालूम था आप जरूर आएंगे,’’ और फिर जयंती रोने लगी.

‘‘रो क्यों रही हो जयंती? भाई को देख कर खुश नहीं हुई?’’ सुशांत का भी गला भर आया था.

‘‘ऐसी बात नहीं है भैया. ये तो खुशी के आंसू हैं,’’ जयंती ने आंसू पोछते हुए कहा.

‘‘ये कौन हैं?’’ लता की तरफ देखते हुए सुशांत ने पूछा.

‘‘भैया, यह लता है. मेरी सहकर्मी, मेरी सब से अच्छी दोस्त. हर कदम पर मेरा साथ देने वाली. सच तो यह है कि आप और लता मेरे साथ न होते तो मैं यह समारोह मनाने की सोच भी नहीं सकती थी,’’ जयंती ने कहा.

‘‘लता, ये हैं मेरे सुशांत भैया. भाई से कहीं ज्यादा मेरे मित्र, मेरे दार्शनिक, मेरे पथप्रदर्शक.’’

‘‘नमस्ते सुशांतजी. जयंती आप की बहुत तारीफ करती रहती है.’’

‘‘यह तो बस ऐसे ही,’’ सुशांत झेंप गया.

‘‘तारीफ के लायक अगर कोई है तो फिर उस की तारीफ होनी ही चाहिए,’’ लता ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘हां… हां… क्यों नहीं,’’ जयंती ने हामी भरी.

‘‘अब आगे क्याक्या करना है?’’ सुशांत

ने पूछा.

‘‘डैकोरेटर वाले को बुलाया है,’’ जयंती

ने बताया.

‘‘डैकोरेटर?’’

‘‘हां, वैसी ही सजावट होनी चाहिए जैसी शादी के समय हुई थी.’’

इस बीच मां अंदर आईं, ‘‘अच्छा हुआ तुम आ गए सुशांत बेटा.’’

‘‘प्रणाम बूआ.’’

‘‘खुश रहो बेटा. तुम ही जरा सम?ाओ इसे.’’

‘‘बूआ मैं?’’

‘‘तुम से तो बाद में बात करूंगी. अभी तुम्हारे पापा जयंती से बात करेंगे.’’

इस बीच उन का मोबाइल बज उठा, ‘‘हां भैया. सुशांत भी आ गया है. जयंती भी इधर ही है,’’ मां ने फोन पर कहा.

‘‘जयंती, अपने मामाजी से बात करो,’’ मां ने फोन जयंती को पकड़ा दिया.

उस के मामाजी दीनदयाल बाबू पूरे परिवार में बड़े अनुशासनप्रिय माने जाते थे. सभी छोटेबड़े उन से डरते भी थे और उन का सम्मान भी करते थे. वे जयंती से बहुत प्यार करते थे. लेकिन सालगिरह वाली बात सुन कर बेहद नाराज थे.

जयंती ने डरतेडरते फोन उठाया. बोली, ‘‘प्रणाम मामाजी.’’

‘‘यह मैं क्या सुन रहा हूं जयंती?’’

एक पल के लिए जयंती सोच में पड़ गई. क्या उत्तर दे पर उत्तर तो देना ही था.

बोली, ‘‘मां ने जो बताया. सच है मामाजी.’’

‘‘वही तो मैं पूछ रहा हूं. चल क्या रहा है?’’ मामा जैसे एकदम से गरज कर तुरंत बरस पड़ना चाहते थे.

‘‘मामाजी, मेरे मन में आया कि जब शादी का जश्न मनाया जा सकता है तो तलाक का क्यों नहीं मनाया जाए?’’ जयंती ने पूरे आत्मविश्वास से कहा.

‘‘दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा?’’

‘‘नहीं मामाजी, बस मन को लगा कि ऐसा भी करना चाहिए तो कर रही हूं,’’ जयंती ने डरते हुए कहा.

‘‘बस यही सुनना बाकी रह गया था. हमारे खानदान में ऐसी ऊलजलूल हरकतें कोई नहीं करता है.’’

‘‘मामाजी, मैं तो आप के खानदान की नहीं हूं,’’ जयंती ने हंसते हुए कहा.

‘‘ क्या बकती हो. दे अपनी मां को फोन. अब मैं तुम से बात ही नहीं करूंगा,’’ मामा का पारा चढ़ गया.

जयंती ने फोन मां को दे दिया. मां फोन पर बातें करने लगीं. बात खत्म होने के बाद उन के चेहरे पर असमंजस का भाव था, ‘‘मामाजी को नाराज कर दिया न? मुझ पर बरस रहे थे. कह रहे थे कि सुशांत को तुरंत वापस भेज दो.’’

‘‘सुशांत भैया को जाने थोड़े दूंगी. चाहे जो हो जाए.’’

सुशांत भी मुसकराया, ‘‘पापा को जानता हूं मैं. थोड़ी देर में ही उन का गुस्सा

शांत हो जाएगा. जयंती को मानते भी तो बहुत हैं.’’

‘‘देखना, मामाजी को यहां आने के लिए मना लूंगी.’’

इस बीच मां के फोन की घंटी फिर बजी.

‘‘इस बार बड़े पापा का फोन है. वे भी मु?ो ही सुनाएंगे,’’ मां डर रही थीं.

‘‘फोन तो उठा लो,’’ जयंती ने मुसकराते

हुए कहा.

‘‘भैया, प्रणाम,’’ मां ने फोन उठा कर कहा.

‘‘जयंती कहां है?’’ एक रोबदार आवाज गूंजी.

‘‘जी भैया,’’ मां ने डरते हुए कहा.

‘‘फोन स्पीकर पर रख. मैं उस से सीधे बात नहीं करूंगा.’’

‘‘जी भैया,’’ मां ने यह कहते हुए फोन स्पीकर पर कर दिया.

‘‘तुम सब ध्यान से सुनो. जयंती खासतौर पर सुने.’’

‘‘जी बड़े मामा.’’

‘‘हमारे खानदान में एक तो पहली बार किसी की शादी टूटी है ऊपर से तुम इस की सालगिरह मना रही हो. हम सभी के लिए कितने शर्म की बात है.’’

‘‘प्रणाम बड़े पापा,’’ जयंती ने कहा.

‘‘प्रणाम गया चूल्हे में. पहले यह बताओ कि तुम यह पागलपन छोड़ोगी या नहीं?’’

‘‘मैं पागल नहीं हूं बड़े पापा,’’ जयंती ने ठंडे स्वर में कहा.

‘‘चुप बेशर्म, ताऊजी से जबान लड़ाती है,’’ मां गुस्से में आ गईं.

‘‘यह पागलपन नहीं तो और क्या है? तलाक की सालगिरह कौन मनाता है बिटिया? मैं ने तो अपने पूरे जीवन में नहीं सुना.’’

‘‘उस जंगली से मुक्त हो कर मैं बहुत खुश हूं बड़े पापाजी.’’

‘‘लेकिन बिटिया?’’ बड़े पापा यानी रंगनाथजी भी जैसे निरुत्तर हो गए हों.

‘‘ मेरा एक प्रश्न है बड़े पापा?’’

‘‘बोलो,’’ रंगनाथजी की आवाज की तीव्रता थोड़ी धीमी हो गई थी.

‘‘आदमी को अपनी जिंदगी में सब से बड़ी खुशी मिल जाए तो क्या उसे जश्न नहीं मनाना चाहिए?’’ जयंती की आवाज थोड़ी गीली हो गई थी.

‘‘बात तो सही है बिटिया लेकिन….’’

‘‘उस ने मुझे बहुत प्रताडि़त किया था बड़े पापा. मेरी जिंदगी नर्क बना दी थी,’’ यह कहते हुए जयंती फूटफूट कर रो पड़ी.

वहां सन्नाटा छा गया. कोई कुछ नहीं बोल पा रहा था. रंगनाथजी भी दूसरी तरफ जैसे मौन हो गए थे.

जयंती रोती जा रही थी.

‘‘क्या मुझे खुशियां मनाने का अधिकार नहीं है बड़े पापा?’’ जयंती ने रोते हुए पूछा.

‘‘बिटिया, अपनी आजादी का जश्न मना ले. मैं अब नहीं रोकूंगा. मेरे लिए तेरी खुशी से बढ़ कर और कुछ भी नहीं है. अब कोई तुझे कुछ नहीं कहेगा. तुम्हारी खुशी में शामिल होने मैं भी आऊंगा. अब खुश?’’ रंगनाथजी की आवाज में प्यारदुलार सब झलक रहा था.

‘‘बड़े पापा…’’ यह बोल कर जयंती और भी तेज रोने लगी.

‘‘बहू, उस का रोना बंद कराओ. हम सब उस की खुशी में शामिल होंगे,’’ रंगनाथजी ने मां से कहा.

‘‘मेरे भैया भी नाराज हो रहे थे,’’ मां ने कहा.

‘‘उस साले को तो मैं समझाऊंगा,’’ रंगनाथजी ने हंस कर कहा.

वातावरण एकदम हलका हो गया.

मां ने जयंती के आंसू पोंछे. बोली, ‘‘अब तो मेरा मन भी हलका हो गया. घर में सब से बड़े पापाजी साथ हैं तो अब हम सब तेरे साथ हैं.’’

इस बीच जयंती के मोबाइल की घंटी बजी, ‘पता नहीं अब कौन है?’ यह सोचते हुए

जयंती ने फोन रिसीव किया, ‘‘हेलो.’’

‘‘जी मैं चांदनी डैकोरेटर्स से बोल रहा हूं.’’

‘‘हां जी. देखिए 14 फरवरी को होटल ‘स्वागत’ में एक हौल बुक किया है. एक छोटा सा फंक्शन है.’’

‘‘जी. जन्मदिन का फंक्शन है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘ फिर वैलेंटाइनडे?’’

‘‘तलाक की सालगिरह है. लेकिन सजावट में कोई कमी नहीं होनी चाहिए.’’

दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया.

‘‘क्या हुआ? जयंती ने पूछा.

‘‘जी अच्छा. मेरे आदमी पहुंच जाएंगे,’’ डैकोरेटर वाले ने कहा.

सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. 14 फरवरी को होटल ‘स्वागत’ का हौल पूरी तरह सज कर तैयार था. यह शाम का समय था. लगभग 5 बजने वाले थे. हौल में एक स्टेज बनाया गया था, जिस के पीछे एक बैनर बनाया गया था. बैनर के बीच में बड़ी खूबसूरती से ‘जश्ने आजादी’ लिखा हुआ था. उस के नीचे दूसरी पंक्ति में ‘तलाक सालगिरह’ और अंतिम पंक्ति में जयंती का नाम लिखा हुआ था.

हौल की बाईं तरफ औरकैस्ट्रा का छोटा सा दल था. निर्देश के अनुसार केवल खुशी के गीत गाए जा रहे थे.

सारे मेहमान और रिश्तेदार आ गए थे. जयंती के औफिस से अमनजी और अन्य सहकर्मी आए थे. ‘कृपया कोई उपहार न लाएं.’ वह पहले ही कार्ड पर बड़ेबड़े अक्षरों में छपा चुकी थी. वैसे मेहमान उल?ान में थे कि तलाक की सालगिरह पर आखिर उपहार क्या दिया जाए? जयंती के निवेदन ने उन की समस्या दूर कर दी थी. यही वजह थी कि कोई भी उपहार ले कर नहीं आया था.

सुशांत और लता सब का स्वागत कर रहे थे. अचानक बाहर से कुछ शोर की आवाजें आने लगी. होटल का मैनेजर अंदर आया.

बड़े पापा ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘साहब, बाहर कोई परेश साहब हैं. अंदर आने की जिद कर रहे हैं. जयंती मैडम ने उन का नाम लिख कर हमें दिया था कि इस नाम के आदमी को अंदर नहीं आने देना है,’’ मैनेजर ने बताया.

‘‘परेश साहब? रंगनाथजी परेशान हो गए. अरे, यह तो जयंती का पूर्व पति है.’’

‘‘आप ने क्या कहा?’’

‘‘जी मैं ने उन्हें बता दिया कि उन्हें अंदर आने की अनुमति नहीं है तो वे भड़क गए. कहने लगे कि वे मैडम के पति हैं.’’

‘‘चलो, मैं बात करता हूं,’’ रंगनाथजी ने कहा और फिर मैंनेजर के साथ बाहर आए. गेट पर जयंती का भूतपूर्व पति परेश ही खड़ा था.

‘‘तुम यहां क्यों आए हो?’’

‘‘रंगनाथजी, यह क्या हो रहा है? आप की बेटी ने तलाक का तमाशा बना दिया है.’’

रंगनाथजी का मन कर रहा था कि उसे कस कर 2 तमाचे लगाएं. आज नाम ले कर बुला रहा है कमीना. तलाक से पहले तक ‘बड़े पापा’ कहते हुए नहीं थकता था.

‘‘देखो भाई, सब से पहले तो तुम शांत हो जाओ. इतना हंगामा क्यों कर रहे हो? तुम्हारे और जयंती के बीच अब तो कोई रिश्ता भी नहीं है.’’

‘‘मैं जयंती से मिलना चाहता हूं.’’

‘‘परेशजी, कोई लाभ नहीं होगा. बेहतर होगा कि आप यहां से चुपचाप चले जाएं.’’

‘‘वरना क्या करोगे?’’

‘‘सीधे पुलिस बुलाऊंगा.’’

‘‘आप बुला ही लो.’’

इस बीच उन्हें पता नहीं चला कि सुशांत यह सब देख कर हौल के अंदर चला गया था और जयंती को सब कुछ बताया तो वह भड़क उठी. फिर उस ने पुलिस को फोन लगाया. पुलिस वालों ने तुरंत पहुंचने की बात कही.

इस बीच परेश और रंगनाथजी के बीच जारी बहस अपनी चरम सीमा पर थी. जयंती भी वहां आ गई थी.

‘‘यहां आने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुम्हें किस ने बुलाया?’’ जयंती ने गुस्से में कहा.

‘‘मु?ो हिम्मत पैदा करने की जरूरत नहीं और तुम ने जो सोशल मीडिया में ढिंढोरा पीट रखा है न तो मु?ो क्या पूरी दुनिया को पता चलना ही था.’’

‘‘तुम्हारी समस्या क्या है?’’ रंगनाथजी ने पूछा.

‘‘तलाक की सालगिरह कौन मनाता है? लेकिन नहीं मैडम तो सालगिरह मनाएंगी. वाह…’’ परेश गुस्से में बक रहा था.

पुलिस वहां पहुंच चुकी थी. इंस्पैक्टर परेश को एक किनारे ले गया. पूछा,

‘‘क्यों भई, क्या तमाशा चल रहा है? इस फंक्शन में तुम्हें बुलाया ही नहीं गया तो फिर क्यों आए हो?’’

‘‘सर, वह मेरी पत्नी है. पिछले साल ही हमारा तलाक हुआ.’’

‘‘तलाक हो गया तो फिर पत्नी कैसे हो गई? मुकदमा चल ही रहा है क्या?’’

‘‘नहीं सर. वह तो खत्म हो गया है.’’

इंस्पैक्टर ने एक तमाचा परेश के गालों पर रसीद करते हुए कहा, ‘‘अबे बदमाश, फिर वह तेरी पत्नी कैसे हुई? चल निकल यहां से.’’

‘‘सर, वह तलाक की सालगिरह मना रही है. चारों तरफ मेरी थूथू हो रही है.’’

‘‘वह तो अब मुक्त है. अब वह जन्मदिन मनाए या फिर तलाक की सालगिरह, तुम्हें इस से क्या फर्क पड़ता है? उसे चैन से जीने दो.’’

‘‘सर, मेरी बदनामी हो रही है.’’

‘‘भई, अब कुछ ज्यादा हो रहा है. तू यहां से जाएगा या नहीं या फिर घसीटते हुए थाने ले जाऊं?’’

परेश सहम गया. उस ने वहां से जाने में ही भलाई सम?ा.

इस बीच सब ने देखा कि कुछ गाडि़यों का काफिला वहां आ कर रुका.

सब से आगे की गाड़ी में विधायक का स्टिकर लगा हुआ था. यह स्वरूप कृष्ण थे. ये जयंती के मौसाजी थे. पड़ोस के जिले के विधायक थे. सत्ताधारी दल के थे. वहां उपस्थित पुलिस बल सावधान हो गया.

विधायकजी कार से उतर कर सीधे हौल में चले गए. रंगनाथजी ने उन का स्वागत किया.

‘‘नमस्ते भाई साहब, अच्छा हुआ इस खुशी के मौके पर आप आ गए. बिटिया को आशीर्वाद दीजिए कि उस का भावी जीवन सुखपूर्वक बीते.’’

विधायकजी भड़क गए, ‘‘सब से पहले यह बताइए कि

यह तलाक की वर्षगांठ मनाने का आइडिया किस के मन में आया?’’

‘‘यह आइडिया नहीं मौसाजी बस सोचसमझ कर ही मना रही हूं,’’ जयंती ने रंगनाथजी के उत्तर देने से पहले ही ठंडे स्वर में उत्तर दिया.

‘‘अच्छा. सोचसम?ा कर मना रही हो? वाह, तुम ने आने वाले समय के बारे में जरा भी नहीं सोचा. जरा भी नहीं सोचा कि मेरे विपक्षी इसे मुद्दा बना लेंगे. सब हंस रहे हैं कि नेताजी की भतीजी तलाक लेने की खुशी मना रही है. कितना नाम रोशन कर रही है हमारी रानी बिटिया.’’

‘‘आप इतना गुस्सा क्यों कर रहे हैं स्वरूपजी?’’ रंगनाथजी ने उन्हें शांत करने की कोशिश की.

स्वरूपजी और भी भड़क गए, ‘‘आप ने भी नहीं मना किया. आप की बुद्धि कहां चरने गई थी? इस की दोबारा शादी हो पाएगी कभी आप सभी ने सोचा?’’

जयंती से अब रहा नहीं गया. बोली, ‘‘मौसाजी, क्षमा करें. मैं केवल अपनी खुशी की सालगिरह मना रही हूं. मुक्ति पाने की खुशी. इस तलाक से मैं बेहद खुश हूं. रही बात मेरी दूसरी शादी की तो मु?ो भविष्य की चिंता नहीं करनी है. किसी लड़की के जीवन का क्या सिर्फ शादी ही एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए? आप के  राजनीतिक कैरियर पर आंच आ रही है तो कह दीजिए कि मैं आप की कोई नहीं हूं. विरोधियों का मुंह बंद करना बहुत आसान होगा,’’ जयंती के स्वर में विद्रोह ?ालक रहा था.

स्वरूपजी का सारा गुस्सा जैसे ठंडा पड़ गया. उन्हें जयंती से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी.

‘‘मनाओ भई खुशी. चलो ठीक है.’’

‘‘ये नए जमाने के बच्चे हैं स्वरूपजी. जरा सम?िए,’’ रंगनाथजी ने स्वरूपजी को कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए कहा.

‘‘उस साले को जेल क्यों नहीं भिजवाया?’’

‘‘जयंती नहीं चाहती थी.’’

‘‘अच्छा,’’ स्वरूपजी अब पूरी तरह शांत हो गए थे.

मामाजी भी सपरिवार पधार चुके थे.

जयंती को यह सब देख कर बहुत अच्छा लग रहा था. आखिर घर के सभी छोटेबड़े सदस्य मान गए थे. अब यह एक सामान्य आयोजन जैसा लग रहा था.

जयंती स्टेज पर लगाई गई एक ऊंची कुरसी पर बैठी थी. उस ने साउंड सिस्टम वाले को एक माइक लाने का इशारा किया.

‘‘मैं आप सभी से कुछ कहना चाहती हूं,’’

‘‘हां बिटिया, बोलो,’’ रंगनाथजी ने उस का उत्साह बढ़ाया.

‘‘आदरणीय मेरी मां, ताऊजी, मामाजी, मौसाजी, सुशांत भैया, लता और उपस्थित गणमान्य अतिथियो, आप सभी हैरान होंगे कि मैं ने आप को अपनी तलाक की सालगिरह के मौके पर क्यों बुलाया है? इस की एकमात्र वजह यह है कि इस तलाक से मुझे बेहद खुशी मिली है. हालांकि यह प्रेम विवाह था जो दोनों के घर वालों की सहमति से अरेंज्ड में बदल गया था लेकिन शादी के मात्र 2 महीने के बाद ही मेरी यातानाओं का दौर शुरू हो गया था. मेरे पति सहित उस के परिवार के सभी लोगों ने अपने रंग दिखाने शुरु कर दिए. मेरी सैलरी मेरे अकाउंट से निकाल ली जाती थी. मुझे उस से महीने के खर्च के लिए अपने ही पैसों की भीख मांगनी पड़ती थी. विरोध करने पर मुझे असहनीय शारीरिक यातनाएं दी जाती थीं. मु?ा से मेरी मरजी के खिलाफ जबरदस्ती अप्राकृतिक संबंध स्थापित करने की कोशिश की जाती थी. मैं विरोध करती थी तो वह मुझे बुरी तरह मारतापीटता था. यही वजह थी कि मैं ने तलाक लेने का आखिरी निर्णय लिया वरना किसी भी लड़की को शादी के बाद तलाक लेने का कोई शौक नहीं होता है. आज मैं बेहद खुश हूं. मुझे सब से बड़ी खुशी इस बात की है कि मेरे घर के सभी छोटेबड़े सदस्य मेरे इस आयोजन में शामिल हुए. मेरा यह मानना है कि किसी भी आयोजन की रूपरेखा में अगर खुशी कहीं छिपी हुई नजर आ रही हो तो उस आयोजन से दूर नहीं रहना चाहिए मनाना ही चाहिए.’’

तालियों का शोर गूंज उठा. अब तक खाने की टेबलें भी सज गई थीं.

‘‘आप लोग खाना शुरू करें,’’ जयंती ने घड़ी देख कर कहा.

शाम के 7 बजने वाले थे. कई अतिथियों को वापस अपने घर भी लौटना था. सब ने खाना शुरू कर दिया.

‘‘यह भी एक अनोखा अनुभव है,’’ जयंती के बड़े पापा ने जयंती के मामा से कहा.

‘‘अब बच्चों की जिद के आगे क्या कर सकते हैं? जयंती के मामाजी ने उत्तर दिया.

‘‘जयंती ने सही कहा कि खुशी का कोई भी कारण हो उत्सव मनाना तो बनता है,’’ जयंती के औफिस से आए हुए अमनजी ने कहा.

जयंती जानती थी कि कल सोशल मीडिया में उस का यह आयोजन छा जाने

वाला है. लेकिन वह अच्छी तरह जानती है कि उस ने यह आयोजन किसी प्रकार का प्रचार पाने के लिए नहीं किया है. यह निश्चित था कि कई लोग उस की आलोचना करेंगे. एक से बढ़ कर एक ओछी टिप्पणियां भी सुनने और पढ़ने को मिलेंगी लेकिन एक बात तो सभी को माननी पड़ेगी कि जन्मतिथि, विवाह तिथि और पुण्य तिथि की सालगिरह के साथसाथ तलाक की सालगिरह भी मनाई जा सकती है. यह आजाद देश है. जिसे जो भी समारोह मनाना है वह जरूर मनाए. कोई नहीं रोक सकता है. वे भी नहीं जो जराजरा सी बात पर संस्कृति की रक्षा की हिंसापूर्ण दुहाई देते रहते हैं.

वह तो हर साल मनाएगी. हां, अगर कोई उसे अच्छी तरह जानने वाला साथी मिल जाए तो हो सकता है यह आयोजन रुक जाए.

‘किसी भी संभावना से परे जयंती को वर्तमान में जीने की आदत है,’ जयंती ने अपनेआप से कहा. उस ने देखा कि सभी खुश हैं. सुशांत, लता और अन्य सभी रिश्तेदार एक पंजाबी गाने पर नृत्य कर रहे थे. समारोह का रंग अपनी चरम सीमा पर था. जयंती भी उन में शामिल हो गई.

Hindi Long Story

Romantic Story: नदी जो भीतर बहती रही

लेखक- पूजा अग्निहोत्री

Romantic Story: आदित्य और मीरा 5 साल से साथ रह रहे हैं. दोनों ने मिल कर अपने छोटे से घर को सपनों और हंसी से भर कर रखा है. कोई भी उन्हें देखे तो फख्र से भर जाए और कहे कि ऐसा ही प्रेम मेरे जीवन में भी आए. सुबह की चाय, साथ में टीवी देखते हुए राजनीतिक बहसें और किचन में रोटियां बेलते हुए की जाने वाली शरारतें सबकुछ इतना सहज है जैसे दोनों का साथ हमेशा के लिए तय हो.

मगर एक शाम जब किचन से ताजा रोटी की खुशबू उठ रही थी मीरा अचानक गुमसुम खड़ी थी. होंठ हिले पर शब्द निकल न सके. अंतत: सकुचाते हुए बोली, ‘‘आदि, सुनो तुम से कुछ कहना है. समझ नहीं पा रही कैसे कहूं.’’

आदित्य ने बेलन थामे मुसकरा कर उस की ओर देखा, फिर रोटी पलटते हुए सहज स्वर में बोला, ‘‘ऐसे ही कह दो, जैसे हर रात को मेरे माथे पर चुंबन जड़ते हुए गुड नाइट कहती हो.’’

मीरा की निगाहें जमीन पर टिक गईं. उसे शब्द भारी लगने लगे. वह सकुचाते हुए बोली, ‘‘मगर यह बात गुड नाइट जितनी आसान नहीं है आदि.’’

‘‘मेरे लिए तुम्हारी कही हर बात सुनना आसान है. बस तुम वह सब बिना किसी हिचकिचाहट कह दो डार्लिंग जो अभी कहना चाहती हो.’’

मीरा ने गहरी सांस ली, ‘‘आदि मैं अब तुम से प्रेम नहीं करती.’’

आदित्य का बेलन पर चलता हाथ कुछ पलों को रुक गया. चूल्हे पर फूली हुई रोटी सीधी करने से पहले आदित्य ने उसे ध्यान से देखा. लेकिन चेहरे पर कोई शिकन न आई. उस ने रोटी पर घी चुपड़ा, अपना काम उसी तल्लीनता से पूरा किया जैसा वह अमूमन करता है और शांत स्वर में मीरा के कंधे पर हाथ रख कर बोला, ‘‘ठीक है, इस में कोई बड़ी बात नहीं है. इतनी चिंता भी मत करो.’’

मीरा की आंखें छलक आईं. वह पुन: हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘दरअसल, मुझे किसी और से प्रेम हो गया है. मैं तुम्हें यों छोड़ने के लिए शर्मिंदा हूं, मैं तुम्हें धोखा दे रही हूं.’’

आदित्य उसे अपनी बांहों में भर पास की कुरसी पर बैठाते हुए बोला, ‘‘किस ने कहा कि तुम ने मुझे धोखा दिया? जब तक तुम मुझ से प्रेम करती थीं मेरे साथ रहीं. अब अगर किसी और से प्रेम है तो मेरे पास रहना ही असली धोखा होगा तुम्हारे लिए भी और मेरे लिए भी. वहीं जाओ, जहां तुम्हारा मन है,’’ यह कहते हुए उस की आंखें भर आईं.

मीरा भी फूट पड़ी. आंसुओं में भी दोनों के बीच एक अजीब सी शांति थी. उस ने आदित्य को आखिर बार गले लगाया और जब दरवाजे से बाहर निकली तो पीछे मुड़ कर देखा. आदित्य अब भी मुसकरा कर हाथ हिला रहा था.

मीरा के जाने के बाद आदित्य का जीवन बाहर से सामान्य दिखता रहा. वह अपनी नौकरी करता, किताबों में डूबा रहता, महल्ले के लोगों से हंस कर बातें करता परंतु अंदर कुछ रीता था, भीतर का घर एकदम खाली रहा. सुबह की चाय बना कर वह अब भी 2 कप में डालता और दूसरा खुद ही पी लेता. रोटियां बेलते समय कई बार होंठों पर मुसकान आ जाती जैसे अब भी कानों में आवाज गूंज रही हो कि ज्यादा घी मत लगाना. उस ने कभी किसी नए रिश्ते की तलाश नहीं की. कुछ लोगों ने पास आने की कोशिशें भी कीं, मगर आदित्य ने दिल के दरवाजे खामोश ही रखे. उस के लिए प्रेम कोई बदलने वाली चीज नहीं था बल्कि एक भरोसा था जो मीरा के जाने के बाद भी भीतर बहता रहा. लेकिन उस का जीवन शांत और अनुशासित रहा. अकेलापन जरूर था लेकिन उस ने मन में कड़वाहट कभी नहीं पाली.

दूसरी ओर मीरा ने अपने जीवन को नए ढंग से संवारने की कोशिश की. उस ने शहर बदला, नौकरी बदली और जीवन में कई नए चेहरे देखे. एक क्रिएटिव ऐजेंसी में सीनियर ब्रैंड मैनेजर के रूप में वह अब भी अपने काम में सफल थी. आत्मनिर्भर, आकर्षक और जीवन से भरी.

आदित्य भी अपने विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष बन चुका था. उस का दायरा बढ़ा था पर भीतर का खालीपन अब भी वहीं था जैसे किसी पुराने घर का एक कमरा अनछुआ रह गया हो.

मीरा के जीवन में कई रिश्ते आए. हर प्रेम की शुरुआत रोशनी से भरी होती. वादे, यात्राएं, देर रात की कौल और साझा योजनाएं. कुछ महीनों तक सबकुछ चमकता रहा लेकिन धीरेधीरे हर रिश्ता किसी न किसी अपेक्षा की दीवार से टकरा गया. किसी को उस के व्यस्त शैड्यूल से शिकायत थी, किसी को उस के स्वतंत्र स्वभाव से. कुछ रिश्तों ने उसे बांधना चाहा, कुछ ने उसे बदलना. अंत आतेआते अंधेरा छा जाता. झगड़े, आरोप और थके हुए संवाद.

हर बार जब कोई रिश्ता टूटा, मीरा को एक ही बात याद आती कि आदित्य ने तो मुझे विदा भी प्रेम से किया था. वह खुद से पूछती कि क्या प्रेम वही है जो साथ रखे या वह जो जाने दे?’’

धीरेधीरे मीरा को समझ आने लगा कि प्रेम का जाना भी उतनी ही सहजता से स्वीकार किया जाना चाहिए जितनी सहजता से उस का आना स्वीकार किया जाता है.

एक दिन मीरा ने अपनी सहकर्मी से कहा, ‘‘जानती हो, प्रेम अगर तुम्हें बांधने लगे तो वह प्रेम नहीं, असुरक्षा है. साथ रहने का अर्थ हर पल साथ रहना नहीं होता. कभीकभी सब से गहरा साथ वही होता है, जहां कोई दबाव नहीं, कोई बंधन नहीं.’’

सहकर्मी मुसकराई, ‘‘तुम्हारे आदित्य वाले प्रेम जैसी बातें लगती हैं.’’

मीरा ने चाय की चुसकी ली और बोली, ‘‘हां, शायद वही असली प्रेम था जो जुदाई में भी सहज रहा. प्रेम दरअसल किसी के साथ जीने का अभ्यास नहीं, किसी के बिना भी उसके अस्तित्व को महसूस करने की कला है.’’

इस भटकाव में 7-8 साल ऐसे ही बीत गए. भीतर की बेचैनी अब तर्क से परे हो चली थी. वह बाहर से सफल थी, भीतर से रिक्त.

रात को अपनी बालकनी में खड़ी मीरा ने सोचा, ‘शायद प्रेम वही नदी है जो भीतर बहती रहती है, चाहे हम कितनी ही दूर क्यों न निकल जाएं.’

अगले ही दिन मीरा ने पुराने शहर की ट्रेन पकड़ ली. न वह सहारा लेने जा रही थी, न माफी मांगने. बस यह देखने कि वह नदी अब भी बह रही है या नहीं.

शाम उतर रही थी जब मीरा ने उस परिचित गली में कदम रखा. वही नीम का पेड़, वही नीली दीवार, वही दरवाजा, जिस पर उसने कभी बिना सोचेसमझे चाबी घुमाई थी. अब हर कदम पर झिझक थी, हर सांस में अपराधबोध का हलका कंपन. उस ने दरवाजे की घंटी बजाई.

भीतर से आवाज आई, ‘‘कौन?’’

मीरा कुछ पल चुप रही, फिर बहुत धीमी आवाज में बोली, ‘‘मैं हूं मीरा.’’

अंदर थोड़ी हलचल हुई, फिर दरवाजा खुला. आदित्य सामने खड़ा था. आंखों पर मोटा चश्मा, बालों में हलकी सफेदी और होंठों पर वही पुरानी शांति.

आदित्य बस मुसकराया, जैसे कोई पुराना अध्याय अचानक खुद से खुल गया हो.

‘‘आओ, अंदर आओ,’’  उस ने सहज स्वर में कहा.

मीरा अंदर बढ़ी. वही घर, वही दीवारों पर टंगी तसवीरें. बस अब उन में धूल की एक पतली परत थी. किचन से चाय की महक आ रही थी.

आदित्य ने पूछा, ‘‘अभी भी शक्कर 1 ही चम्मच, न?’’

मीरा की आंखें भर आईं. उस ने सिर हिलाया और चाय का कप थामते हुए बोली, ‘‘इतने सालों में बहुत कुछ बदला आदि. बस तुम नहीं बदले.’’

‘‘शायद इसलिए कि मैं ने प्रेम को बदलने नहीं दिया,’’ आदित्य ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘कभीकभी जो चीज खो जाती है, वही हमें स्थिर रखती है.’’

कुछ देर दोनों चुप रहे. बाहर बारिश की बूंदें गिरने लगीं. मीरा बोली, ‘‘मैं ने बहुत कोशिश की आदि तुम्हारे बिना भी खुश रहने की, नए रिश्तों में सुकून खोजने की लेकिन हर बार लगा मैं किसी की परछाईं से प्रेम कर रही हूं. असल चेहरा तो कहीं पीछे रह गया.’’

आदित्य ने हलकी हंसी में कहा, ‘‘कभीकभी हम प्रेम को भूलने नहीं, प्रमाणित करने निकलते हैं और जब थक जाते हैं तो लौट आते हैं वहीं, जहां प्रेम बिना प्रमाण के भी सच्चा था.’’

मीरा ने आदित्य की ओर देखा, ‘‘क्या अब भी मुझे वैसे ही चाहते हो?’’

‘‘चाहत बदल नहीं जाती, मीरा. बस उस का रूप बदल जाता है,’’ आदित्य ने कहा.

‘‘पहले तुम्हारे साथ रहना चाहता था, अब बस तुम्हें शांति में देखना चाहता हूं.’’

मीरा की आंखें छलक आईं, ‘‘आदि, अगर अब कहूं कि मैं फिर से तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं तो?’’

आदित्य ने उस की ओर कदम बढ़ाया, उस की हथेली थामी और बोला, ‘‘रहना चाहो तो रहो, लेकिन किसी कमी को पूरा करने के लिए नहीं. प्रेम वहां से शुरू होता है जहां आवश्यकता समाप्त होती है. अगर अब लौटना तुम्हारा निर्णय है तो रहो ऐसे जैसे नदी अपने ही किनारे लौटती है. विनम्रता से, स्वाभाविक रूप से.’’

मीरा रो पड़ी, ‘‘मुझे लगता है, अब मैं प्रेम को समझ पाई हूं. वह कोई वादा नहीं बल्कि वह प्रवाह है जो भीतर बहता रहता है.’’

आदित्य ने धीरे से उस के बालों को सहलाया, ‘‘और जब वह बहना बंद कर दे तो साथ होना भी व्यर्थ हो जाता है. सच्चा साथ वही है, जहां प्रेम जिंदा रहे चाहे दूरी कितनी भी क्यों न हो.’’

दोनों एकदूसरे के करीब खड़े रहे बिना शब्दों के. सालों की नमी आंखों से बह चुकी थी. उस पल में कोई निर्णय नहीं था, बस एक स्वीकृति थी जैसे 2 नदियां एक बार फिर मिल कर समुद्र को छू लेने निकली हों.

चाय ठंडी हो चुकी थी पर कमरे में एक गुनगुनी खामोशी तैर रही थी.

मीरा ने धीरे से कहा, ‘‘अब कहीं नहीं जाऊंगी, आदि.’’

आदित्य मुसकराया, ‘‘जाना भी प्रेम का हिस्सा है, मीरा. बस इस बार अगर जाओ तो यह सोच कर कि मैं तुम्हारे भीतर ही हूं.’’

मीरा ने उस की बांहों में सिर रख दिया.

बाहर बारिश तेज हो चुकी थी और भीतर दोनों की आंखों से बहती नदियां एकदूसरे में समा रही थीं. थोड़ा मीठा, थोड़ा नमकीन ठीक जिंदगी की तरह.

Romantic Story

Best Hindi Story: परिवर्तन

Best Hindi Story: आज संजना और समीर की सगाई थी. शादी 8 महीने बाद दिसंबर में तय हुई थी. सगाई से शादी तक का वक्त दोनों के लिए बहुत अच्छा गुजरा था. कभी दोनों अपने चचेरे, ममेरे भाईबहनों के साथ पिकनिक मनाने तो कभी एकदूजे के पारिवारिक फंक्शन में जाते.

इन 8 महीनों में दोनों को ही एकदूसरे के व्यवहार से कोई शिकायत नहीं हुई. देखते ही देखते दोनों की धूमधाम से शादी हो गई. हनीमून मना कर लौटे तो दोनों ने अपनीअपनी दिनचर्या में ढलना शुरू कर दिया.

कंपनी की तरफ से समीर को फ्लैट मिला था. संजना ने उसे समीर के साथ बहुत प्यार से सजाया था. दोनों अकसर घर में कोई न कोई सामान लाते रहते थे. संजना कभी मैचिंग कुशन लाती तो समीर कमरे के हिसाब से कोई टेबल या ट्रौली देखता.

घर पूरा सज गया तो एक दिन दोनों ने अपनेअपने परिवार को डिनर पर बुलाया. सभी ने घर की खूब तारीफ की. दोनों के परिवार ज्यादा दूरी पर भी नहीं थे. समीर के मातापिता थे और संजना के पिता नहीं थे. उस के घर पर उस की मम्मी और छोटा भाई कार्तिक रहते थे.घर के सदस्य सम?ादार थे इसलिए जल्दीजल्दी इन दोनों के घर आ कर न ही कोई दखलंदाजी करते और न ही बेकार के सलाहमशवरे देते.

शादी का 1 साल बीततेबीतते संजना गर्भवती हो गई. समीर की बहन नेहा ने उन्हें

डाक्टर रमनीक से मिलने की सलाह दी.  वे नेहा की भी गायनेकोलौजिस्ट रही थीं. उन्होंने सब से पहले दोनों के कुछ बेहद जरूरी टैस्ट कराने की सलाह दी.

‘‘इतने टैस्ट किसलिए डाक्टर?’’

‘‘ये एचआईवी, हैपेटाइटिस बी, हैपेटाइटिस सी, थायराइड और थैलीसीमिया के टैस्ट हैं, प्रारंभिक जांच से कोई कौंप्लिकेशन होने पर सही गाइडैंस और दवाइयों से मांबच्चे दोनों को स्वस्थ रखा जा सकता है और संजना का 3 बार अल्ट्रासाउंड भी होगा और 9 महीने के दौरान मां को 2 इंजैक्शन भी लगेंगे.’’

‘‘3 बार अल्ट्रासाउंड क्यों? मैं ने तो सुना है कि बारबार इस तरह की जांच नहीं होनी चाहिए, बच्चे को खतरा हो सकता है,’’ संजना डरी सी बोली.

‘‘किस से सुना है?’’ रमनीकजी ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘पड़ोस में सुना था,’’ संजना हिचकिचाते हुए बोली.

‘‘बच्चे को खतरा होगा नहीं बल्कि बच्चे को खतरे से बचाया जा सकेगा. पहले अल्ट्रासाउंड में बच्चे की ग्रोथ, भ्रूण की स्थिति, बच्चा कहीं गर्भाशय के बाहर तो नहीं बन रहा, बच्चे जुड़वां तो नहीं हैं और डिलिवरी की तिथि तय करने के लिए होता है और दूसरा अल्ट्रासाउंड चौथे से 5वें महीने के बीच होता है यह देखने के लिए कि बच्चे की ग्रोथ सही तरीके से हो रही है न.

‘‘तीसरा अल्ट्रासाउंड 8वें से 9वें माह के दौरान होता है. अब तक बच्चे के सभी अंग बन चुके होते हैं, उस की शारीरिक संरचना में कोई जटिलता तो नहीं है यह देखने के लिए होता है. अब तो कोई शक नहीं है न?’’ रमनीकजी ने हंसते हुए कहा.

‘‘पर डाक्टर मुझे इंजैक्शन से बहुत डर लगता है, बहुत दर्द होगा, समीर बताओ न इन को मैं इंजैक्शन से कितना डरती हूं.’’

यह सुन कर समीर और रमनीकजी दोनों हंस पड़े.

‘‘अब बच्चे को मां ही जन्म देती है न इसलिए तुम्हें ही लगवाने होंगे वरना तुम्हारी जगह समीर को लगा देते,’’ रमनीकजी ने यह कह कर सभी को हंसा दिया.

‘‘ये 2 इंजैक्शन टीडी यानी डिप्थीरिया टौक्साइड्स और टीटी यानी टिटनस टौकसाइड के होते हैं. इस में पहला इंजैक्शन प्रैगनैंसी के 20 हफ्ते बाद और दूसरा इस के 1 महीने बाद लगाता है. इस से शिशु की डिप्थीरिया, टिटनस और काली खांसी से सुरक्षा होती है. मांएं तो बच्चों के क्याक्या कर जाती हैं तुम 2 इंजैक्शन नहीं लगवा सकतीं?’’ रमनीकजी मजाकिया लहजे में बोली.

‘‘अरे, अब तो 10 इंजैक्शन भी लगवा ले,’’ समीर भी खुल के हंसता हुआ बोला तो संजना ने झूठमूठ के गुस्से के साथ उसे देखा.

पतिपत्नी दोनों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. आने वाले मेहमान के लिए दोनों ने ढेर सारे सपने देख डाले. छोटेछोटे कपड़ों को देख कर संजना तो जैसे खुद बच्ची बन जाती. बहुत खुश रही वह शुरू के महीनों में. हालांकि चक्कर आना, जी मिचलाना ऐसी समस्याएं होती रहती थीं उसे पर समीर उस का काफी ध्यान रखता था.

मगर कभीकभी संजना को ऐसा महसूस होता कि उसे इतनी कमजोरी आ गई है कि बैड से उठना मुश्किल हो रहा है और जी घबरा रहा है. ऐसे में समीर नेहा को घर बुला लेता था. उन की और संजना की अच्छी जमती थी. उन के बच्चे बड़े हो चुके थे और उन्होंने घर में छोटा सा कुकिंग स्टूडियो बना रखा था. स्टूडैंट्स को उन को बनाया खाना बेहद पसंद था और वे खूब रुचि ले कर सीखते थे.

‘‘संजू, यह होता रहता है, तुम ऐसा किया करो कि खाना 3 बार की जगह 6-7 बार खाया करो. थोड़ाथोड़ा कर के खाओ. अपने बैड के पास रस्क जैसी चीजें रखा करो और बैड से ?ाटके से नहीं उठना. उठते ही नाश्ते से 20-25 मिनट पहले बिस्कुट और टोस्ट ले लिया करो. समय के साथ चक्कर और जी मिचलाना खत्म हो जाएगा.’’

नेहा कुछ चटपटा बना कर खिलाती तो संजना को बहुत अच्छा लगता. नेहा संजना को

समझाती रहती थी कि नीबू भी चाट सकती हो, कुछ खुशबूदार चीजें अपने पास रखा करो जैसे साबुन का रैपर या संतरा खाओ तो उस के छिलके सूंघने से उसे अच्छा लगेगा.

संजना तो बहुत हंसती थी पर नेहा की इन सलाहों से उसे बहुत आराम मिला. इन सब के साथ ही नेहा उसे यह सम?ाना नहीं भूली कि ज्यादा घीतेल में तली हुई चीजें नहीं खानी. गर्भ में शिशु मां से ही अपना खाना ग्रहण करता है तो इस का मतलब यह नहीं कि वह 2 जनों का खाना खाना शुरू कर दे बल्कि मां का आहार संतुलित और पोषक तत्त्वों से भरपूर होना चाहिए जो मां और शिशु दोनों के लिए ही फायदेमंद होगा.

5 महीने बाद जब संजना का पेट आकार लेने लगा तो वह खुद ही काफी देर अपनेआप को आईने में देखती रहती. पेट सहलाना उसे अच्छा लगता.पेट में शिशु की हलचल उसे और समीर को बहुत रोमांचित करती थी. धीरेधीरे संजना के व्यवहार में कुछ परिवर्तन सा आने लगा. खाने से दिल ऊबने लगा. कुछ विशेष खाने की चाहत होती तो जब तक वह मिल नहीं जाता किसी अन्य चीज को मुंह न लगाती.

बातबेबात गुस्सा कर जाती समीर पर. स्ट्रैच मार्क्स को देख कर चिढ़ जाती हालांकि समीर ने डाक्टर की सलाह पर उसे क्रीम ला कर दी थी पर संजना को ऐसा लगता जैसे शरीर की बनावट बहुत बुरी हो गई है. स्तन ढल से गए हैं, ध्यान देने के बावजूद पेट पर धारियां पड़ती ही जा रही हैं.

डाक्टर की सलाह पर व्यायाम करती तो दिल में डर भी पनपता रहता कि

इस से प्राकृतिक प्रसव में आसानी होगी पर उस ने तो फिल्मों में सदा ही मां को प्रसव वेदना में तड़पते हुए ही देखा है. उफ, क्या मैं इतना दर्द झेल पाऊंगी? मम्मी सांत्वना तो देती रहती हैं पर प्रसवपीड़ा तो मुझे ही झेलनी होगी.

इन्हीं सोचों के साथ रात को उस की नींद खुल जाती थी. साथ सोए समीर को देखती तो जगाने की जगह उलटेसीधे विचारों में गोते खाती रहती. कैसे आराम से सो रहा है और यहां मेरी हालत खराब हो रही है.

न उठा जा रहा है, न लेटा जा रहा है. डाक्टर ने जिस करवट ज्यादा लेटने को कहा है उस करवट तो मुझे नींद आती भी नहीं और पेट पर इतनी खुजली, कितना लोशन लगाऊं?

जैसेजैसे गर्भ बड़ा हो रहा था ब्लैडर पर दबाव पड़ रहा था. इस कारण से उसे बारबार मूत्र त्याग की इच्छा होती थी. ऐसी अवस्था में बारबार उठना उस के लिए कष्टदायक था. वह चिड़चिड़ी सी हो कर रोने लगती.

एक दिन संजना की सहेली सुहानी आई हुई थी तो उस ने बताया कि उसे इस हालत में खुश रहना चाहिए. पौजिटिव विचार ही उस के और उस के होने वाले बच्चे के लिए अच्छे साबित होंगे. मनपसंद संगीत सुने, अच्छी किताबें पढ़े. सवेरे मौर्निंग वाक पर जाए.

‘‘कुछ महिलाओं का गर्भावस्था का सफर तो यह सुनते हुए ही बीत जाता है कि बच्चे तो हम ने भी पैदा किए हैं पर इतना आराम, यह पति का पीछेपीछे भागना, ये नखरे उठाना, ये डाक्टरों के चोंचले कि यह व्यायाम करो, खुश रहो, यह सब तो हम ने नहीं किया. आजकल की लड़कियां तो ज्यादा ही नाजुक हैं कुछ. पहली ही दफा में ऐसी बेहाल हो रही हैं हम ने 4-4 बच्चे बिना किसी तकलीफ के पैदा कर डाले थे. अब बता, तू खुशकिस्मत है तुझे ये सब नहीं बल्कि तेरी भलाई के लिए अच्छी नसीहतें सुननी पड़ रही हैं इसलिए अच्छा सोच, सब अच्छा ही होगा.’’

‘‘हां यार, समीर की मम्मी बहुत अच्छी हैं. बीते दिनों आई थीं तो मेरा इतना खयाल रखा कि क्या बताऊं. कह रही थीं कि लड़का हो या लड़की यह माने नहीं रखता बस बच्चा स्वस्थ हो यह सब से बड़ी बात है.’’

संजना का 9वां महीना शुरू हो चुका था. एक रात अचानक उसे पेट में तेज दर्द उठा. वह कराहने लगी. उस की आवाज सुन कर समीर जल्दी उठ बैठा.

संजना की हालत देख कर समीर बहुत घबरा गया. उस ने जल्दी से आशाजी को उठाया. आशाजी ने तुरंत उसे हौस्पिटल चलने के लिए कहा. जब तक समीर ने गाड़ी दरवाजे के बाहर लगाई तब तक आशाजी ने संजना का पैक किया हुआ बैग भी ले लिया और संजना को सहारा दे कर बाहर भी ले लाई.

समीर ने जल्दी से संजना को पीछे की सीट पर बैठाया. संजना का सिर आशाजी की गोद में था. वे बराबर उसे हौसला दे रही थीं.

‘‘संजू, बस अभी हौस्पिटल पहुंच रहे हैं, सब ठीक हो जाएगा. मैं हूं न, बिलकुल नहीं डर, अभी बहनजी भी आ जाएंगी.’’

‘‘पर मम्मी, अभी तो डाक्टर ने जो डेट बताई थी उस में 10 दिन बाकी हैं, यह संजू की तबीयत अभी से क्यों बिगड़ रही है?’’ समीर वास्तव में बहुत घबरा गया था.

‘‘कई बार ऐसा हो जाता है, नियत तिथि से आगेपीछे दर्द उठ सकता है, अब तुम डरो मत, गाड़ी सावधानी से चलाओ.’’

हौस्पिटल पहुंचते ही संजना इमरजैंसी में पहुंचा दी गई. डाक्टर ने

तुरंत कुछ चैकअप किए.

‘‘समीर, डाक्टर रमनीक को बुला लिया गया है, वे बस आती ही होंगी.’’

‘‘संजना ठीक तो है न?’’

‘‘दरअसल बच्चा पेट में घूम गया है पर डरिए मत बच्चे के दिल की धड़कन सामान्य है.’’

तब तक कमलाजी भी कार्तिक और अपनी छोटी बहन सुनीता के साथ हौस्पिटल पहुंच गईं.

सारी बात सुनने के बाद सुनीता बोली, ‘‘अरे, ये सब डाक्टर बिल बड़ा करने के चक्कर में रहते हैं. ऐसे दर्द तो उठते ही रहते हैं. हम ने भी बच्चे पैदा किए हैं. ऐसे ही इन अंगरेजी डाक्टरों की सुनते तो सारा पैसा लुटा चुके होते. घर ले जा संजू को, पेट में गैस हो गई होगी, कुछ ही देर में ठीक हो जाएगी. कोई जरूरत नहीं है यहां रुकने की.’’

‘‘आप जैसे विचारों वालों की वजह से ही आज भी ना जाने कितने घरों में शिशु जन्मपूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हो रहें हैं. खैर, समीर संजना को अभी औपरेट करना होगा वरना केस कौंप्लिकेट हो सकता है, तुम पेपर्स साइन कर दो,’’ यह डाक्टर रमनीक थीं. उन्होंने एक उड़ती सी निगाह सुनीता पर डाली और तुरंत औपरेशन थिएटर में चली गईं.

औपरेशन में लगने वाला समय समीर पर सदियां बन कर गुजर रहा

था. तभी ओ.टी. का दरवाजा खुला और डाक्टर रमनीक अपनी बाहों में नन्हा फरिश्ता थामे बाहर आईं. सभी उन के पास चले आए.

‘‘बहुत बधाई हो समीर, बहुत प्यारी सी बेटी के पापा बन गए हो,’’ कहने के साथ ही उन्होंने बच्ची को समीर को थमाया.

अपनी नन्ही मासूम बेटी का चेहरा देख कर समीर की आंखें खुशी से छलक गईं.

‘‘मेरी नन्ही सी जान, हमारी जूही.’’

‘‘जीजू,कितनी प्यारी है, बिलकुल डौल जैसी और नाम तो बड़ा प्यारा रखा है, जूही,’’ कार्तिक खुशी से चहका.

आशाजी और कमलाजी भी बेहद खुश थीं.

घर लौटते समय सुनीता कमलाजी से बोलीं, ‘‘पहलेपहले तो बेटा होना चाहिए था.’’

कमलाजी ने चिढ़ कर सुनीता को देखा और कहा, ‘‘सुनीता, तुम कैसी बातें कर रही हो, आजकल कोई लड़कालड़की में भेदभाव करता है क्या? एक मां की गर्भयात्रा और प्रसव वेदना एक लड़की के लिए भी बिलकुल वैसी ही होती है जैसे एक लड़के के जन्म लेने पर और हौस्पिटल में यह तुम क्या बोलने लग गई थी… अरे, सिजेरियन मां और बच्चे की जान बचाने के लिए कुछ विशेष परिस्थितियों में लिया गया निर्णय होता है और साथ ही यह दंपती की व्यक्तिगत इच्छा होती है. इस में किसी को दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए सम?ा और सब से बड़ी बात हम खुद अपने मातापिता की 2 संतानें हैं और मैं पहली बड़ी लड़की हूं और इस तरह तुम्हारी लड़के की सोच के हिसाब से तो फिर हमारे मातापिता को मेरे जन्म के दुख के बाद तुम्हारे होने से भी बड़ी निराशा हुई होगी.’’

सुनीता बुरी तरह से मुंह बना कर चेहरा घुमा कर कार की खिड़की से बाहर देखने लगीं.

3 दिन बाद संजना घर आ गई. घर में संजना के साथ बच्ची की देखभाल के लिए 15 दिन बारीबारी से संजना और समीर की मांएं रुकेंगी, यह सोचा गया.

हफ्तेभर बाद संजना के टांके कट गए. उसे भार न उठाने, सावधानी से उठनेबैठने और कम से कम डेढ़ महीने तक सहवास न करने की सलाह दी गई.

एक दिन आशाजी जूही का स्पंज कर रही थीं तो संजना ने पूछा, ‘‘मम्मी, जूही की मालिश कब से शुरू होगी?’’

‘‘जब यह नाल अपनेआप टूट कर गिर जाएगी और सूख जाएगी न तब. तब तक तो इन का स्पंज ही होगा और बच्चे की मालिश के साथ मां के शरीर की मांसपेशियों को मजबूती देने के लिए मां की मालिश भी बहुत जरूरी होती है. मेरा तो सामान्य प्रसव था इसलिए 3 सप्ताह बाद शुरू हुई थी पर तुम्हरा तो सिजेरियन हुआ है न इसलिए कम से कम डेढ़ माह बाद करवाना ताकि टांकों वाली जगह पर कोई परेशानी न हो, अच्छा लो संभालो जूही को,’’ आशाजी ने बहुत प्यार से जूही को उस की गोद में रखा.

तभी कमलाजी और कार्तिक आ गए.

कुछ ही देर में संजना को ऐसा लगा कि जैसे उस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा. सब जूही के साथ ही व्यस्त हैं. पहले कैसे सब उस के आसपास ही मंडराते रहते थे और अब जैसे मैं किसी को दिख ही नहीं रही.

शाम को समीर घर आया तो आशाजी की गोद से ले कर जूही को पुचकारने लगा.

‘‘समीरजी, हम भी आप के सामने ही बैठे हैं, हमारा हालचाल भी पूछ लीजिए,’’ संजना ने जैसे ताना मारा.

‘‘अरे, रानी साहिबा के हालचाल तो ठीक ही हैं, सभी लोग सारा दिन उन का खूब खयाल करते होंगे, हमारी राजकुमारी बोर हो जाती होगी अकेली, थोड़ा सा खेल लें इस के साथ, क्यों जूहीजी, बोलो, बोलो…’’ समीर जूही के साथ ही खेलने लगा. संजना वहां से उठ कर चली गई.

लगभग 2 माह बाद समीर और संजना को एक पार्टी में जाना था. संजना ने सारी अलमारी ऊपरनीचे कर दी.

‘‘देखो न समीर, अपनी कोई भी ड्रैस मुझे फिट नहीं आ रही, कोई ड्रैस ऊपर से तंग हो गई है तो कोई कमर से नीचे नहीं उतर रही और मेरे बाल, पता है कितने झड़ने लगे हैं… पता नहीं क्या हो रहा है मेरे साथ?’’ संजना उदास स्वर में बोली.

‘‘संजू, अभी जूही को फीड करवाती हो न तुम इसलिए भी थोड़ा वजन ज्यादा है. कुछ वक्त बाद सही डाइट और ऐक्सरसाइज से तुम पहले जैसी हो जाओगी,’’ समीर ने बहुत प्यार से सम?ाया.

‘‘डाइट, ऐक्सरसाइज वक्त मिलेगा मुझे इस के लिए?  नींद तक तो पूरी हो नहीं पाती मेरी ठीक से, सारा दिन जूही के साथ उल?ा रहती हूं. रात में भी जग जाए तो फीड करवाओ, डायपर बदलो, तुम ने भी भला कितने दिन मेरा साथ दिया?’’ संजना बुरी तरह से बिलख पड़ी.

‘‘संजू, ऐसा नहीं है मैं जितना हो सकता है रात को भी जूही की संभालता हूं. अच्छा आज रात तुम अच्छे से सोओ, मैं जूही के साथ आज दूसरे कमरे में सोता हूं.’’

‘‘उस से क्या होगा, जग जाएगी तो मेरे ही पास लाओगे?’’

समीर हैरानी से संजना को देखे जा रहा था.

‘‘नहीं जाना मुझे किसी पार्टी में, न पहनने को कपड़े और न ही अब मूड रहा,’’ रोती हुई संजना कमरे से तेज कदमों से बाहर निकली तो कोने की टेबल से टकरा गई. उस पर सजा फ्लौवर पौट नीचे गिर कर चकनाचूर हो गया.

‘‘उफ, यह क्या हुआ, यह मैं ने कितने प्यार से मनाली से लिया था. समीर, देखो न…’’ संजना ने रोना शुरू कर दिया.

समीर संजना को समझा नहीं पा रहा था. वह जमीन पर ही बैठ कर रोए जा

रही थी. समीर ने उसे बांहों में भर लिया. न जाने कितनी ही देर वह उस की बांहों में वैसे ही बैठी रही.

इस के बाद 3-4 दिन तो संजना बेहद अनमनी सी रही. तब समीर उसे डाक्टर रमनीक के पास ले गया.

रमनीकजी ने संजना से थोड़ी देर बात की और फिर नर्स के साथ उसे और जूही को बाहर भेज दिया.

बाहर एक कोने में रंगबिरंगे खिलौने रखे हुए थे. संजना जूही को उन्हें दिखाने लगी.

‘‘देखो समीर, संजना डिलिवरी के बाद डिप्रैशन के दौर से गुजर रही है. इस की कई वजहें हो सकती हैं- नींद की कमी, थकावट, असुरक्षा की भावना, बच्चे के सभी कार्य खुद करने में खुद को असफल पाना.’’

रमनीकजी ने तब कुछ दवाएं लिख दीं और समीर को संजना को अवसाद की स्थिति से निकालने के कुछ उपाय बताए.

आने वाले दिनों में समीर ने आशाजी और कमलाजी से इस बारे में बात की और

उन्हें संजना की हालत से अवगत कराया.

कमलाजी ने कुछ दिन संजना के पास रुकने का फैसला किया.

‘‘अरे संजू, देख जूही अभी सो रही है, तू भी ?ापकी ले ले और रात के खाने की चिंता मत कर, मैं बना लूंगी.’’

‘‘मम्मी, अभी जग जाएगी और मैं सोई रही तो आप को तंग करेगी.’’

‘‘बच्चे तो रोते ही हैं, तू क्या कम रोती थी. रोएगी तो मेरे पास बहल कर चुप भी हो जाएगी. घबरा मत तेरी बेटी को तकलीफ नहीं होने दूंगी.’’

कमलाजी की बात सुन कर संजना झेपती हुई हंस दी, ‘‘क्या मम्मी, आप भी…’’

ऐसे ही कुछ दिन बीते तो कमलाजी मार्केट जा रही थीं.

‘‘संजू, ला तेरे जो कपड़े नाप में ठीक कराने हैं, मुझे दे दे. मैं दर्जी को देती आऊंगी.’’

2 दिन बाद संजना ने अपना पसंदीदा सूट पहना तो खूब खुश हुई.

समीर उसे अपने साथ सुबह की सैर पर भी ले जाता था. धीरेधीरे संजना का व्यवहार पहले की अपेक्षा बेहतर होने लगा. लगभग 5 महीने बाद सुहानी उस से मिलने आई.

‘‘सहेलियां क्या ऐसी होती हैं, जूही से मिलने अब आई है, इतने महीने बाद?’’

‘‘काम के सिलसिले में शहर से बाहर थी यार और यह जूही तो बहुत ही प्यारी है. इसे देखने से तो दिल ही नहीं भर रहा है, ये इस के छोटे से दांत, देख तो कैसे मेरी उंगली मुंह में लेना चाह रही है.’’

‘‘हर चीज मुंह में लेना चाहती है, इस का टीथर देती हूं.’’

कुछ ही देर में जूही सो गई. संजना कौफी बना लाई तो दोनों सहेलियां सोफे पर बैठ कर आराम से बातें करने लगीं.

‘‘और सुना, अब कैसा लग रहा है मां बन कर?’’

‘‘समीर और बाकी सभी के साथ ने मेरा सफर आरामदायक बना दिया सुहानी. प्रैगनैंसी में और डिलिवरी के बाद तो मेरा आत्मविश्वास जैसे खो सा गया था. ऐसा महसूस होता था जैसे मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है. शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से मैं टूट सी रही थी पर सभी के मार्गदर्शन और अपनेपन ने मु?ा में जैसे नई ताकत भर दी. एक नारी के जीवन में मां बनना कुदरत का सब से खूबसूरत परिवर्तन है जो नारी को एक नए रिश्ते में ढाल कर उसे एक नई दुनिया से परिचित कराता है जहां वह उलझाती भी है और सुलझाती भी है. बस शर्त है तो अपनों के साथ की, है न?’’

सुहानी मंत्रमुग्ध सी उसे देखे और सुने जा रही थी.

‘‘कौन कहेगा कि अभी तक मेरे साथ कालेज में पढ़ने वाली यह अल्हड़ सी लड़की आज ज्ञान का पिटारा खोल कर दादीमां बन जाएगी. धन्य हैं आप दादीमां,’’ सुहानी ने उस के आगे हाथ जोड़ने का उपक्रम किया तो उस की इस हरकत को देख कर संजना और सुहानी दोनों जोर से हंस पड़ी.

Best Hindi Story

Sad Story: सुविधा का प्यार

Sad Story: शाम का वक्त था. पार्क में बच्चे खेल रहे थे. छोटी सी अनुष्का झूले पर बैठी हंस रही थी और राहुल उसे धक्का दे रहा था. प्रिया दूर बैंच पर बैठी अपनी बेटी को मुसकराते हुए देख रही थी.

‘‘मम्मी, देखो अंकल कितना ऊंचा झुला रहे हैं,’’ अनुष्का ने खुशी से पुकारा.

प्रिया पास आई और बोली, ‘‘धन्यवाद राहुल, आप रोज अनुष्का के साथ खेलते हो. उसे बहुत अच्छा लगता है.’’

राहुल हलकी मुसकान के साथ बोला, ‘‘दरअसल, मुझे भी अच्छा लगता है. अकेला रहता हूं तो बच्चों की हंसी सुन कर दिल हलका हो जाता है. आप के पास तो अपना परिवार है.’’

धीरेधीरे दोनों के बीच बातें बढ़ने लगीं और एक दिन प्रिया ने अपने जीवन की हकीकत बताई, ‘‘राहुल, सच तो यह है कि मेरी जिंदगी आसान नहीं है. मेरे पति हमें छोड़ कर चले गए. तब से मैं अकेली ही इस घर और बेटी को संभाल रही हूं.’’

यह सुन कर राहुल ने सहानुभूति भरे अंदाज में कहा, ‘‘आप बहुत हिम्मत वाली हैं, प्रिया. एक औरत का अकेले घर संभालना आसान नहीं.’’

प्रिया की आंखें थोड़ी भीग गईं. बोली, ‘‘कभीकभी बहुत अकेलापन महसूस होता है. कोई साथी नहीं, कोई सहारा नहीं.’’

राहुल ने सिर हिलाया. फिर बोला, ‘‘जानती हो प्रिया मेरी हालत भी कुछ ऐसी ही है. आप तो शादी कर के गृहस्थी बसा चुकी थीं, भले ही बीच में ही सब छीन लिया पर मेरे जीवन में तो अभी तक शादी का सुख आया ही नहीं. मैं तो अभी तक अकेला ही भटक रहा हूं. कभीकभी लगता है मेरे हिस्से में ऐसे रहना ही लिखा है. मातापिता तो कब के गुजर चुके हैं. मैं भी बिलकुल अकेला हूं.’’

प्रिया ने सहानुभूति से उस की ओर देखा और कहा, ‘‘अकेलापन सचमुच कठिन होता है, राहुल. तभी तो मैं सम?ा सकती हूं कि तुम्हारा मन यहां हमारे साथ क्यों रमता है.’’

राहुल हलकी मुसकान के साथ बोला, ‘‘हां, शायद इसीलिए मुझे आप दोनों के साथ रहते हुए घर सा सुकून मिलता है.’’

‘‘और हमें तुम्हारे साथ,’’ प्रिया ने सिर झुकाते हुए कहा.

‘‘हांहां, अब तुम अकेली नहीं हो. मैं हूं न. किसी भी तरह की मदद की जरूरत हो तो बेहिचक बताइएगा. आखिर मित्र हैं और मित्र ही के काम आते हैं.’’

प्रिया को राहुल की बातों में सचाई नजर आई. उसे राहुल के रूप में एक सच्चा

जीवनसाथी नजर आने लगा था. उसे महसूस हो रहा था कि राहुल भी उसे उसी नजर से देखने लगा है.

प्रिया अब राहुल के साथ और भी वक्त बिताने लगी. पार्क के अलावा वे यदाकदा रैस्टोरैंट या कौफी हाउस में भी साथ नजर आने लगे. एकदूसरे से अपने घरपरिवार, कामकाज तथा अन्य बातें भी शेयर करने लगे. बातों ही बातों में राहुल को पता चला कि प्रिया का पति एक बैंक कर्मचारी था तथा स्वयं प्रिया एक अध्यापिका. दोनों ने मिल कर एक टू बीएचके फ्लैट भी ले लिया था मगर तभी अचानक एक दुर्घटना में प्रिया के पति की मृत्यु हो गई. यानी जीवन में सबकुछ होते हुए भी किसी की जरूरत थी.

प्रिया के जीवन की यह हकीकत जान कर राहुल प्रिया के और भी नजदीक आने लगा. अब उस ने प्रिया के घर भी आनाजाना शुरू कर दिया. बातों ही बातों में वह प्रिया के घर, उस के रहनसहन तथा उस के व्यवहार की प्रशंसा करने लगा. प्रिया को भी राहुल के साथ समय बिताना अच्छा लगता था.

एक दिन राहुल ने प्रिय से अपनी एक मुश्किल के बारे में बताते हुए कहा,

‘‘प्रिया, बहुत मुश्किल में पड़ गया हूं. जिस किराए के कमरे में रहता हूं उस के मकानमालिक ने कमरा खाली करने के लिए बोल दिया है. यह सब इतना अचानक हुआ कि मैं अपने लिए कुछ व्यवस्था भी नहीं कर पाया. अब जाऊं तो कहां जाऊं? होटल में ठहरने से तो पूरे महीने की सैलरी ही खत्म हो जाएगी. अगर आप को बुरा न लगे तो क्या मैं आप के घर के एक कमरे में कुछ दिनों तक रह सकता हूं? फिर मैं व्यवस्था कर लूंगा.’’

राहुल की यह बात अनुष्का ने भी सुन ली और वह उत्साहित होकर बोली, ‘‘हां मम्मी अंकल को हमारे पास रहने के लिए बोलो न. अंकल बहुत अच्छे हैं. वे मेरे साथ बहुत खेलते हैं. हमें बहुत मजा आएगा.’’

बेटी की बात सुन कर प्रिया थोड़ी चुप रही. फिर मुसकरा कर बोली, ‘‘अगर अनुष्का खुश है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं. लेकिन याद रहे, यह सिर्फ मदद है.’’

राहुल ने राहत की सांस ली, ‘‘आप का एहसान कभी नहीं भूलूंगा. सच कहूं तो शायद कुदरत ने ही मुझे आप दोनों तक पहुंचाया है.’’

राहुल प्रिया के घर के एक कमरे में रहने लगा. शुरूशुरू में तो वह औपचारिक था मगर धीरेधीरे वह घर का हिस्सा बन गया. कभी अनुष्का को पढ़ा देता, कभी प्रिया की बाजार में मदद करता. प्रिया का दिल भरने लगा कि शायद राहुल ही मेरा जीवनसाथी बन सकता है.

इस बीच राहुल ने 1-2 बार प्रिया को कमरे का किराया देने की कोशिश की परंतु अब

प्रिया ने यह कह कर लेने से मना कर दिया कि तुम्हारे यहां रहने से हमें भी बहुत सहारा रहा है फिर किराया किस बात का?

प्रिया की इन बातों ने घनिष्टता और बढ़ा दी. राहुल और भी अधिकारपूर्वक वहां रहने लगा. अब तो प्रिया राहुल से घर में ही खाने का आग्रह भी करने लगी. 1-2 बार तो राहुल ने आनाकानी की मगर एक बैचलर को और क्या चाहिए था? बनाबनाया खाना. वह भी बड़े प्रेम व आग्रह से. राहुल वहीं खाना भी खाने लगा. यहां तक कि वह अपने मनपसंद खाने की फरमाइश भी करने लगा. कुछ दिनों बाद घनिष्ठता इतनी बढ़ गई कि दोनों मिल कर घर संभालने लगे ऐसे मानो पतिपत्नी हों. घर का अधिकांश खर्च प्रिया ही उठा रही थी. राहुल यदाकदा कुछ छिटपुट खानेपीने का सामान ले आता था.

तीनों खुश थे. वक्त गुजर रहा था कि एक शाम प्रिया के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं.

राहुल ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, इतनी परेशान क्यों हो?’’

प्रिया ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘राहुल, यह घर किस्तों पर है. अगले महीनों की किस्तें भरना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है क्योंकि स्कूल वाले पूरी सैलरी नहीं दे रहे हैं. तुम तो जानते ही हो प्राइवेट स्कूलों में ऐसा ही होता है,’’ पर फिर अचानक राहुल की ओर मुंह कर के बोली, ‘‘परंतु अब मुझे क्या चिंता है. तुम मेरे साथ हो न. अब जब हम दोनों साथ रहते हैं तो क्यों न हम जिम्मेदारियां भी बांट लें. तुम किश्त भर दिया करो और बाकी घर का खर्च मैं संभाल लूंगी. इस तरह हम मिल कर सब संभाल सकते हैं.’’

राहुल का चेहरा पीला पड़ गया, ‘‘मतलब मुझे किस्तें भरनी होंगी?’’

‘‘हां राहुल,’’ प्रिया ने नर्म स्वर में कहा, ‘‘जिंदगी सिर्फ प्यारी बातें करने से नहीं चलती. जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं. अगर हम साथ हैं तो यह घर हमारा साझा सपना है न?’’

राहुल सकपका गया. वह धीरे से बोला, ‘‘तुम सही कह रही हो. इस विषय में कुछ तो सोचना ही पड़ेगा.’’

जब से प्रिया ने अपनी परेशानी बताई थी राहुल सोच में पड़ गया था कि क्या किया जाए और इसी सोच में उसे रातभर नींद नहीं आई.

सुबह होते ही फिर से वही दिनचर्या शुरू हो गई. प्रिया जल्दी उठ कर अपने स्कूल चली गई तथा अनुष्का अपने स्कूल. अकसर ऐसा ही होता था. वे दोनों राहुल के उठने से पहले ही अपनेअपने स्कूल चली जाती थीं उस के बाद राहुल अपने औफिस. यानी उन की दिन की पहली मुलाकात शाम को राहुल के औफिस से आने के बाद ही होती थी.

मगर उस शाम राहुल देर तक नहीं लौटा. प्रिया चिंतित हो गई. अनुष्का ने राहुल के साथ खेलने की रट लगा रखी थी, साथ ही यह भी ऐलान कर रखा था कि वह उस के साथ ही खाना खाएगी.

प्रिया बारबार राहुल का नंबर मिलाती, मगर हर बार वही ठंडी आवाज आती कि इस नंबर पर अभी बात नहीं हो सकती. वह बेचैन हो उठी. उस की बेचैनी तब और भी बढ़ गई जब राहुल देर रात तक भी नहीं लौटा.

आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं के बारे में सुन कर उस का मन किसी अनहोनी की आशंका से ही कांप रहा था. वह इसी उम्मीद में सो गई कि हो सकता है राहुल को औफिस में काम हो और वह देर रात तक लौटे.

मगर वह नहीं लौटा. अगले दिन भी और उस के अगले दिन भी. प्रिया बेहद चिंतित थी.

चौथे दिन प्रिया ने हिम्मत कर राहुल के दफ्तर फोन लगाया. यह नंबर उस ने राहुल से लिया था ताकि कभी कोई इमरजैंसी हो तो बात कर सके.

रिसैप्शन से जवाब मिला, ‘‘मैडम, हमारे यहां राहुल नाम का कोई

कर्मचारी नहीं है. आप शायद गलतफहमी में हैं.’’

प्रिया स्तब्ध रह गई. उसे कुछ आशंका हुई. घबरा कर वह राहुल के कमरे में गई तो यह देख कर सन्न रह गई कि अलमारी बिलकुल खाली थी. उस के साथसाथ राहुल का सूटकेस और बाकी जरूरी सामान गायब. वहां बस सन्नाटा था.

यह देख कर प्रिया आश्चर्यचकित रह गई. उसे बिलकुल समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक राहुल को सारा सामान ले कर जाने की क्या जरूरत पड़ गई. कोई जरूरी काम था तो कम से कम कह कर तो जाता, इतनी चिंता न होती.

एक दिन अचानक फोन बजा. स्क्रीन पर लिखा था, ‘‘राहुल.’’

प्रिया ने फोन उठाया. उधर राहुल ही था.

‘‘प्रिया, मुझे अचानक एक नए प्रोजैक्ट पर जाना पड़ा. बहुत जरूरी था. जानती हो तुम्हारे सो जाने के बाद यह फोन आया था. मुझे जल्दी से जल्दी पहुंचना था इसलिए तुरंत जाना पड़ा. सौरी मुझे कह कर जाना चाहिए था परंतु तुम सो रही थी और मैं तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था. सोचा बाद में बता दूंगा मगर नैटवर्क प्रौब्लम से मेरा फोन बंद हो गया.

‘‘मगर तुम हो कहां?’’ प्रिया की आवाज में बेचैनी, चिंता, घबराहट और आश्चर्य था.

‘‘तुम से बहुत दूर. इतनी दूर शायद मैं कभी वापस न आ सकूं. मेरा इंतजार मत करना.’’

उस की आवाज पहले जैसी ही नर्म थी, पर अब प्रिया को उस में अपनापन नहीं, दूरी महसूस हुई. वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन गला भर आया.

राहुल ने बिना रुके कहा, ‘‘प्रिया, शायद हमारा साथ इतने दिनों का ही था अलविदा.’’

प्रिया पर जैसे वज्रपात हुआ. उस ने आंखों में आंसू भर कर कहा, ‘‘लेकिन राहुल तुम तो कहते थे कि तुम्हें मु?ा से और अनुष्का से प्यार है? मैं तो सोच रही थी हम हमेशा साथ रहेंगे.’’

राहुल ने जैसे समझाते हुए कहा, ‘‘हां, लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई

हैं. उम्मीद है तुम सम?ागी.’’

मगर अब लाइन कट गई थी. प्रिया देर तक फोन हाथ में थामे बैठी रही. मगर अब सब स्पष्ट हो गया था. राहुल सिर्फ सुविधा और सहूलियत के लिए उस के घर आया था. जब तक मिल रही थी, तभी तक था.

जब एक दो दिन तक राहुल नहीं लौटा तो अनुष्का मासूमियत से पूछ बैठी, ‘‘मम्मी,

अंकल कहां गए? वे कब आएंगे?’’

प्रिया ने बेटी को गले लगा कर कहा, ‘‘शायद कभी नहीं. वह अपनी मासूम बेटी से और कुछ कह नहीं पाई. मगर उस का मन चीख कर कह रहा था कि उसे सबकुछ बता दे कि कुछ लोग इंसान से नहीं, उस की चीजों से प्यार करते हैं ताकि वह भी जान ले कि असली साथी वही होता है जो मुश्किलों में भी हमारे साथ खड़ा रहे और याद रखे कि रिश्तों की असली नींव भरोसा और जिम्मेदारी है. अगर रिश्ता सिर्फ स्वार्थ और सुविधा पर टिका हो तो उस का अंत टूटन और पछतावे में ही होता है.

उस रात प्रिया देर तक रोती रही. मगर आंसुओं के बीच उस ने ठान लिया कि अब कभी किसी को अपनी मासूमियत का फायदा नहीं उठाने दूंगी. भले ही जिंदगी अकेले क्यों न काटनी पड़े. मैं स्वयं मजबूत बनूंगी तथा अपनी बेटी को भी हर रूप से सशक्त बना कर अपनी जिंदगी अपने बलबूते पर जीने लायक बनाऊंगी.

Sad Story

Hindi Drama Story: माफ तो नहीं कर पाऊंगा

Hindi Drama Story: ‘‘प्रदीप आई एम सौरी, तुम्हारे दिल का हाल मैं समझ सकता हूं. पर क्या करूं नीता ने मेरे साथ रिलेशनशिप में रहना पसंद किया है?’’ शैलेंद्र ने कहा. ‘‘इस में सौरी जैसी कोई बात नहीं है. यह नीता का निर्णय है और उसे पूरा हक है अपनी जिंदगी का निर्णय लेने का,’’ प्रदीप ने कहा. शैलेंद्र को आश्चर्य तो हुआ पर उसे उस की बातों से काफी राहत भी मिली. शैलेंद्र उस का बहुत ही प्यारा दोस्त था. संयोग से दोनों ही नीता से बहुत प्यार करते थे और करीबी दोस्त होने के कारण दोनों एकदूसरे से अपने दिल की बात साझ भी करते थे. कभीकभी तीनों साथ समय बिताते थे.

दोनों ने नीता से अपनेअपने तरीके से अपने दिल की बात बताई थी. नीता ने प्रदीप की बात का कोई जवाब नहीं दिया था और शैलेंद्र से प्यार का इजहार किया था. शैलेंद्र खुश तो बहुत था पर इस बात को ले कर दुखी भी था कि प्रदीप के दिल पर क्या गुजरेगी. आज प्रदीप ने जब कहा कि उसे पूरा हक है निर्णय लेने का तो शैलेंद्र के दिल को काफी राहत मिली. इस के बाद शैलेंद्र और नीता का प्यार परवान चढ़ने लगा. शैलेंद्र और प्रदीप की दोस्ती भी पहले की तरह ही चलती रही. नीता शैलेंद्र के साथ तो थी ही, कभीकभी तीनों का साथसाथ प्रोग्राम बन जाता था. तीनों साथसाथ घूमते, खाते, मूवी देखते और ऐश करते थे. इसी बीच शैलेंद्र को औफिस के काम से हैदराबाद जाने का आदेश मिला. शैलेंद्र हैदराबाद चला गया.

वहां से वह रोज नीता से बातें करता था. कभीकभी वीडियो कौल भी कर लिया करता था. प्रदीप से भी बीचबीच में बातें होती रहती थीं. उसे 1 महीने तक हैदराबाद में रुकना था. इसी बीच नोएडा स्थित एक रिश्तेदार के यहां किसी समारोह में जाने का न्योता मिला. मन ही मन वह बहुत खुश था.सोचा था कि नीता से 1 महीने के बाद मिल पाएगा पर इस निमंत्रण के कारण पहले ही मिलने का मौका मिल गया था.पर उस के मन में एक आइडिया आया. वह बिना कोई सूचना दिए नीता के सामने जाने की योजना बना चुका था.

शुक्रवार को शाम में ही वह फ्लाइट से दिल्ली आ गया. आ कर अपने फ्लैट में रुका. दूसरे दिन सुबह नोएडा अपने रिश्तेदार के घर गया. समारोह में शामिल हो कर वह शाम को वापस अपने फ्लैट में वापस आ गया.अब वह सोच रहा था कि नीता को कहां बुलाए मिलने के लिए. हैदराबाद से वह नीता के लिए मोतियों की माला लाया था. जल्दबाजी में उसे पैक कराना भूल गया था. पहले गिफ्ट पैक करा लूं फिर नीता से बात करता हूं, उस ने सोचा. वह अपने फ्लैट से मोतियों की माला ले कर नीचे उतरा.

अपनी स्कूटी से वह दुकान की ओर गिफ्ट पैक कराने के लिए बढ़ा. इसी बीच उसने देखा नीता प्रदीप के साथ मोटरसाइकिल पर बैठी जा रही थी. वह बड़े ही रोमांटिक अंदाज में प्रदीप से चिपकी हुई थी. शैलेंद्र ने अपनी स्कूटी से प्रदीप की मोटरसाइकिल का पीछा किया. कुछ ही दूरी पर नौर्थ इंडिया मौल था. प्रदीप ने मोटरसाइकल पार्किंग में जा कर पार्क की और नीता के साथ मौल में प्रवेश कर गया. शैलेंद्र ने भी कुछ ही दूरी पर अपनी स्कूटी पार्क की और उन के पीछेपीछे चल दिया. वह इस बात का ध्यान रख रहा था कि प्रदीप और नीता उसे न देखें. प्रदीप और नीता सीधे तीसरे तल पर स्थित मल्टीप्लैक्स पहुंच कर टिकट ले अंदर चले गए. प्रदीप कुछ दूर खड़ा उन्हें अंदर जाते देखता रहा. उस की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि जिस नीता ने उस के साथ प्यार का इजहार किया है वह प्रदीप के साथ कैसे है.

साथ रहने और मूवी देखने से उसे कोई आपत्ति नहीं थी पर जिस तरह वह मोटरसाइकिल पर प्रदीप से चिपकी हुई थी और रास्ते में भी उस की बांहें पकड़ कर उस से चिपकी हुई थी उस से उसे दाल में कुछ काला लगा. शैलेंद्र ने तुरंत अपने मोबाइल से नीता को कौल किया. नीता कौल को रिसीव कर बोली, ‘‘हैलो, डार्लिंग.’’ ‘‘हैलो डार्लिंग. कैसी हो,’’ शैलेंद्र ने पूछा. ‘‘कैसी रहूंगी, मुझे अकेली छोड़ कर हैदराबाद की बिरयानी उड़ा रहे हो,’’ नीता शिकायत भरे लहजे में बोली. ‘‘अरे मुझे तो काम से आना पड़ा है वरना तुम्हें छोड़ कर मेरी आने की इच्छा नहीं हो रही थी,’’ शैलेंद्र ने कहा. ‘‘झूठ… झूठ… झूठ…’’ नीता ने अदा से कहा. ‘‘नहीं डार्लिंग. अब 2 सप्ताह की तो बात है फिर आता हूं न तुम्हारे पास. वैसे अभी क्या कर रही हो?’’ शैलेंद्र ने कहा. ‘‘घर में बैठ कर बोर हो रही हूं,’’ नीता ने ऐसे कहा मानो उस से कितना नाराज हो.

‘‘अरे बाबा नौर्थ इंडिया मौल तुम्हारे फ्लैट से कुछ ही दूरी पर है. अभी नई मूवी रिलीज हुई है. देख आती,’’ शैलेंद्र ने कहा. कुछ पलों के लिए सन्नाटा रहा. नीता ने कोई जवाब नहीं दिया. ‘‘क्या हुआ नीता, मेरी आवाज नहीं आ रही क्या?’’ शैलेंद्र ने पूछा. ‘‘हां बीच में आवाज ब्रेक हो रही थी. अकेले मूवी देखने में मजा नहीं आता,’’ नीता ने जवाब दिया. ‘‘अरे तो प्रदीप को साथ ले लेती,’’ शैलेंद्र ने कहा. ‘‘प्रदीप को तो तुम जानते ही हो. जब से मैं ने तुम्हारे साथ रहने का निर्णय लिया है वह मुझ से खफा है,’’ नीता ने कहा ‘‘अरे प्रदीप तुमसे खफा नहीं है. वह मानता है कि तुम्हें अपने जीवन का निर्णय लेने का हक है.

वह बहुत ही सुलझे मस्तिष्क वाला व्यक्ति है और कुछ भी हो है तो हमारा दोस्त ही,’’ शैलेंद्र ने कहा. ‘‘अच्छा शैलेंद्र, मैं थोड़ी देर बाद कौल करती हूं. एक इंपौर्टैंट कौल आ रही है,’’ नीता ने कहा और फोन डिसकनैक्ट कर दिया. अब शैलेंद्र समझ गया कि उस के साथ नीता और प्रदीप धोखा कर रहे हैं. वह मोतियों की माला पैक कराए बिना वापस चला गया. कहां वह सोच कर आया था कि नीता को सरप्राइज देगा कहां नीता ने उसे सरप्राइज दे दिया था. वह बहुत दुखी हो गया. चुपचाप अपने कमरे में लेटा रहा. 3 घंटे के बाद नीता का फोन आया.

उस के मन में विचार आया कि वह नीता को खूब खरीखोटी सुनाए पर संयम बरत कर रह गया. उस ने बिलकुल सामान्य हो कर नीता से बात की. वैसे उस के दिल में जो उथलपुथल मची थी उस के प्रभाव से वह रोमांटिक हो कर नीता से बातें नहीं कर पा रहा था. नीता ने उलाहना भी दिया, ‘‘लगता है हैदराबाद में किसी से दिल लग गया है, इसलिए अब पहले जैसी बातें नहीं करते.’’ क्या कहता शैलेंद्र. मन ही मन बोला कि जो छुरी तुम ने मेरी पीठ में घोंपी है उस के बाद पहले जैसी बातें कैसे करूं.’’ प्रदीप से उस की बात होती थी तो वह बिलकुल सामान्य तरीके से बात करता था. 2 सप्ताह के बाद शुक्रवार को काम समाप्त कर वह फिर वापस दिल्ली चला आया.

शनिवार का दिन था. उस ने प्रदीप को फोन लगाया. ‘‘हैलो, वापस आ गए?’’ प्रदीप ने पूछा. ‘‘हां आ गया. तुम से कुछ जरूरी बातें करनी है. आ जाओ. यहीं खाना भी खाएंगे,’’ शैलेंद्र ने कहा. ‘‘ठीक है. 1 बजे आता हूं,’’ प्रदीप ने कहा और फोन डिसकनैक्ट कर दिया. ठीक 1 बजे प्रदीप हाजिर हो गया. इस के पहले ही शैलेंद्र ने खाना बना कर तैयार कर दिया था. ‘‘चलो खाना खाते हैं, फिर बातें करते हैं,’’ शैलेंद्र ने कहा. ‘‘नीता नहीं आ रही क्या?’’ प्रदीप ने पूछा. ‘‘क्यों? नीता के बिना हम साथ में खाना नहीं खा सकते क्या?’’ शैलेंद्र ने पूछा. ‘‘खा क्यों नहीं सकते? मुझे लगा काफी दिनों के बाद तुम आए हो तो नीता को भी बुलाओगे,’’ प्रदीप ने अपनी बात रखी. ‘‘नीता का किसी और के साथ अफेयर चल रहा है,’’ शैलेंद्र ने कहा.

‘‘क्या बात कर रहे हो? किस के साथ?’’ प्रदीप चौंक गया. ‘‘यह नहीं पता पर उस के साथ वह नौर्थ इंडियन मौल में पिक्चर देखने गई थी. किसी ने मुझे बताया? छोड़ो ये बातें चलो खाना खाते हैं,’’ शैलेंद्र ने कहा. दोनों मिल कर खाना खाने लगे. प्रदीप असहज महसूस कर रहा था. ‘जिस ने शैलेंद्र को यह बात बताई होगी उस ने जरूर मेरे बारे में भी बताया होगा,’ वह सोच रहा था. ‘‘किसी के साथ मौल में पिक्चर देखने में क्या हरज है यार?’’ प्रदीप बोला. ‘‘पिक्चर देखने में कोई हरज नहीं है पर बताने वाला बता रहा था कि दोनों बाइक पर ऐसे चिपक कर आए थे जिस से लगता था दोनों के बीच कुछ है. वैसे नमक ठीक है खाने में?’’ शैलेंद्र ने पूछा. ‘‘नमक ठीक है,’’ प्रदीप बोला. ‘‘इतना नमक है कि खाने वाले को धोखा देने पर नमकहराम कहा जा सके?’’ शैलेंद्र ने पूछा. अब प्रदीप समझ गया कि शैलेंद्र को सब पता चल चुका है.

वह बोला, ‘‘देखो यार जब नीता ने तुम्हारे साथ रहने का निर्णय लिया था तो मैं ने कुछ नहीं कहा था. अब वह मेरे साथ रहने का निर्णय ले रही है तो तुम्हें भी कुछ नहीं कहना चाहिए. वैसे तुम्हारे पीठ पीछे यह सब हुआ इस के लिए आई एम सौरी, मुझे माफ कर दो.’’ ‘‘इस के लिए माफ तो नहीं कर पाऊंगा तुम्हें प्रदीप पर तुम मेरे बहुत पुराने और करीबी मित्र हो. मित्रता जारी रहेगी विश्वासघात के धब्बे के साथ. जिस तरह उस ने मेरे साथ रहने का निर्णय लिया था तो मैं ने तुम्हें बताया था उसी तरह तुम बता देते तो मुझे कोई शिकायत नहीं रहती. तुम मेरे दोस्त हो इसलिए तुम से शिकायत कर रहा हूं. नीता से मैं शिकायत भी नहीं करूंगा. बस तुम उसे बता देना,’’ शैलेंद्र ने कहा. प्रदीप सिर झुकाए खाना खा रहा था. खाना एकाएक उसे बहुत बेस्वाद लगने लगा था.

Hindi Drama Story

Shahzad Ali: संगीत में कोई जातपात और धर्म नहीं होता

Shahzad Ali: सूफी संगीत और बौलीवुड फिल्मों से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले सिंगर शाहजाद अली से आज हरकोई परिचित है क्योंकि फिल्म ‘धुरंधर’ का टाइटल सौंग ‘न तो कारवां की तलाश है…’ का रीमिक्स आज सब की जबान पर है और सभी उसे पसंद कर रहे हैं.

उन्होंने संगीत में पहचान ‘सुरक्षेत्र’ और ‘वौयस औफ इंडिया’ से बनाई. इस के बाद ‘कश्मीर फाइल्स’, ‘आंधी और आश्रम’ आदि कई फिल्मों के गाने गाए हैं. यहां तक पहुंचना आसान नहीं था क्योंकि उन का कोई भी परिचित इस क्षेत्र से नहीं है.

राजस्थान के निम्न मध्यवर्गीय परिवार से संबंध रखने वाले शाहजाद ने खास ‘गृहशोभा’ से बात की.

सफल होना नहीं आसान

शाहजाद ने 15 साल से मेहनत किया है, तब जा कर उन्हें बड़ी कामयाबी मिली है क्योंकि इंडस्ट्री में गौडफादर न रहने पर काम का मिलना आसान नहीं होता. अपनी जर्नी के बारे में उन का कहना है कि फिल्म ‘धुरंधर’ के गाने की पौपुलरिटी की वजह से मेरे आगे बढ़ने का रास्ता आसानी से खुल गया है. अभी बहुत सारी रिकोर्डिंग और शोज के औफर्स आने लगे हैं और मेरे कैरियर के लिए यह अच्छी बात है, जिस के लिए  मैंने 15 साल से कोशिश की है.

शुरुआती दौर

वे कहते है कि मैं 13 साल की उम्र में टीवी शो ‘सा रे गा मा पा लिटल चैंप’ के लिए राजस्थान के बीकानेर से मुंबई आया था. उस दौरान मैं यहीं शिफ्ट हो गया और काम के लिए संघर्ष शुरू कर दिया था. उस समय मैं ने मुंबई में छोटेछोटे रेस्तरां में प्रोग्राम करने शुरू कर दिए थे, जहां मुझे कुछ पैसे मिल जाते थे. यहीं से जर्नी शुरू हुई थी. उस के बाद एक शो ‘सुरक्षेत्र’ किया था, उस से मुझे इंडस्ट्री में ऐंट्री मिली.

उस समय मेरी उम्र 18 वर्ष थी. इस शो में काम करने की वजह से मेरा नाम हुआ. मुझे बाहर भी वैडिंग, कारपोरेट शोज में गाने का काम मिलने लगे और मैं कुछ पैसे कमाने लगा और फिर लाइफ अच्छी चलने लगी.

इस के बाद मैं ने कई संगीत निर्देशकों को फोन करने लगा. उन से मिलने की कोशिश करता रहा. वर्ष 2015 में मेरी मुलाकात संगीत निर्देशक विशाल ददलानी से हुई. उन्होंने मुझे फिल्म ‘एनएच सेवन’ में गाने का मौका दिया, जिस में नुसरत फतेह अली खान को ट्रिब्यूट किया गया था. उस के बाद मैं गीतकार कुमार से मिला और उन्होंने मुझे बहुत सारे गानों को गाने का मौका दिया.

वे कहते हैं कि वैब सीरीज ‘आश्रम’ का मुख्य गाना मैं ने गाया, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया. इस के बाद कई रिकोर्डिंग किए, जिस में ‘आर्टिकल 370’, ‘कश्मीर फाइल्स’ आदि कई फिल्में थीं, जिन के गाने चर्चित हुए. अब ‘धुरंधर’ फिल्म का गाना ‘न तो कारवां की तलाश है…’ चल रही है.

रीमिक्स गलत नहीं

रीमिक्स के बारे में शाहजाद का कहना है कि क्रिएटिविटी में हमेशा एक नई चीज ही यह जरूरी नहीं क्योंकि 60 से 70 साल पुराना गाना जिसे नई पीढ़ी ने नहीं सुनी हो उस में कुछ नया कर पेश किया जा सकता है, यह उन के लिए एक सम्मान है, जिसे हम सभी देना चाहते है. उन्होंने वह काम कर दिया है, जिसे दोबारा करना मुमकिन नहीं.

मिली प्रेरणा

संगीत में लगाव और मुंबई आने की प्रेरणा के बारे में शाहजाद का कहना है कि मेरे शहर से 2 लोग संदीप आचार्य और राजा हसन पौपुलर हुए हैं, जिन्हे मैं बचपन में टीवी पर देखता था. उन्होंने टीवी शो कर काफी नाम कमाया. उन्हें देख कर मुझ में प्रेरणा जागी और मैं इसे करने की ठान लिया. इस के अलावा मुझे मोहम्मद रफी, नुसरत फतेह अली खान और किशोर कुमार के गाने बहुत पसंद हैं. गजल में मेहंदी हसन खां को सुनना अच्छा लगता है.

परिवार का सहयोग

परिवार का सहयोग शाहजाद को हमेशा मिला है क्योंकि उन के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. वे कहते हैं कि कमाने वाला कोई नहीं था. जहां मैं रहता था, वहां कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं था. पिता को मैं ने मुंबई जाने की बात कही और यहां आ गया, मुश्किलें रहीं पर आज सफल भी हुआ. वित्तीय परेशनी रही, लेकिन मैं मीरा रोड में रहता था और वहां काफी रेस्तरां हुआ करते थे, जहां लोग खाना खाने जाते थे और उन्हें गजल सुनना पसंद था. वहां मैं अच्छा कमा लेता था, जिस से मेरी रोजीरोटी चल जाया करती थी. कम उम्र होने की वजह से लोग मेरे गानों को सुनते भी थे.

मैं ने संगीत की तालिम भी ली है. मेरे उस्ताद पहले अब्दुल सत्तार बियानी थे बाद में अब्दुल शकुर सुलेमानी से मैं ने संगीत की बारीकियां सीखी हैं. मेरा घराना बीकानेर है. मैं ने गाने के साथ पढ़ाई भी जारी रखा और पूरा किया क्योंकि शिक्षा से मेरे अंदर आत्मविश्वास हुआ, जिस की मुझे जरूरत थी. मुझे 14 साल की उम्र में कोई नौकरी मिलना संभव नहीं था. संगीत में ही मेरे लिए कुछ करना था क्योंकि यही मेरा पैशन रहा है.

शहजाद कहते हैं कि मेरे पिता शब्बीर अली भी आर्टिस्ट ही थे. उन के गले में थायराइड होने की वजह से वे अधिक मेहनत नहीं कर सकते थे.

कुछ भी आसान नहीं

फिल्मों में संगीत कम हो चुका है, ऐसे में प्लेबैक सिंगर के लिए बहुत कम औप्शन रहता है, लेकिन शाहजाद इसे चुनौती नहीं मानते. वे कहते हैं कि आज हर क्षेत्र में चुनौती है, कहीं भी कुछ भी आसान नहीं है क्योंकि मरने से अधिक मुश्किल जीना होता है यानि जिंदगी का नाम चुनौती है. मैं किसी भी चीज पर कभी शक नहीं करता. मैं मानता हूं कि जो व्यक्ति मेहनत करता है वह कभी भूखा नहीं सोता.

रहा संघर्ष

शाहजाद कहते हैं कि संघर्ष भी कई प्रकार के होते है कि जिस में शुरू में रोटी कमाने का संघर्ष बाद में जब कामयाबी मिलती है, तो उसे बचाने का संघर्ष होता है, जिसे करने में मजा आता है. पहले जब मैं काम की तलाश कर रहा था, तो बहुत मायूसी मिली है, काम नहीं मिला. वह मेरी सीख थी, जिस से हो कर मुझे गुजरना था. मुझे याद है कि कई बार मुझे स्टूडियो से बाहर निकाल दिया गया और कहा गया कि मैं गा नहीं सकता. आज वही मुझे बुला रहे हैं. मैं ने उसे दिल से कभी नहीं लिया और काम कर रहा हूं.

आगे की योजनाएं

शाहजाद कोई प्लानिंग नहीं करते क्योंकि कलाकार कोई प्लान नहीं कर सकता. उन्हे टीम के हिसाब से जाना पड़ता है. उन का ड्रीम है कि सूफी संगीत के साथ रौक को मिक्स कर दुनिया के सामने लाया जाए. न्यू जैनरेशन के लिए उन का कहना है कि गरीब हो या अमीर सब के पास आज सबकुछ प्राप्त है, वे काबिल हैं और सही लोग से अगर वे मिल सकते हैं, तो उन्हें कामयाबी मिलेगी. इस में यह ध्यान रखना है कि संगीत हमारा सबकुछ है और इसे कायम रखना हमारा फर्ज है. मेरे बड़े पिता राजकुमार डागर थे, वे रामलीला में राम बनते थे और उन्हें सब संवाद मुंह जबानी याद रहती थी. उन के इस चरित्र को गांववाले बहुत पसंद करते थे. संगीत में कोई जातपात या धर्म नहीं होता, सिर्फ सुरों की दुनिया होती है, जिसे हरकोई सुनना पसंद करता है.

Shahzad Ali

Tanya Mittal: बिग बॉस में प्रस्तुत किया डिजाइनर साड़ियां पहनने का चलन

Tanya Mittal: ग्लैमर वर्ल्ड में साड़ी पहनने को ले कर बहनजी वाला कौंसेप्ट प्रचलित है क्योंकि आज के समय में मौर्डन लड़कियां कम से कम कपड़े, बैकलेस, क्लीवेज दिखाने वाले मौडर्न ड्रैस पहनने को ले कर ज्यादा उत्सुक हैं और जो लोग यह कपड़े नहीं पहनते, पूरा शरीर ढंके हुए कपड़े पहनते हैं तो उन को बैकवर्ड और गंवार नाम से पुकारा जाता है। कुछ बड़े होटलों में तो साड़ी पहन कर होटल में प्रवेश करना भी बैन है.

सदाबहार साङी

ऐसे माहौल में जहां साड़ी को लगभग नकार दिया गया है, वहां ग्वालियर की रहने वाली तान्या मित्तल ने साड़ी पहन कर ‘बिग बॉस’ के घर में प्रवेश किया और पूरे 3 महीने के शो में सिर्फ साड़ियां ही पहनीं.

खबरों के अनुसार ‘बिग बॉस’ हाउस में वे 800 साड़ियां ले कर आई थीं और पूरी ‘बिग बॉस’ की जर्नी में तानिया मित्तल ने खूबसूरत और डिजाइनर साड़ियां ही पहनीं। जहां एक ओर 61 वर्षीय कुनिका वैस्टर्न आउटफिट और ऐक्सपोज करने वाली ड्रैस पहन रही थीं, वही तान्या मित्तल ने पूरी ज्वैलरी के साथ खूबसूरत साड़ियों का प्रदर्शन किया, जिस से आम लोग प्रभावित हुए और कई लोगों ने तान्या मित्तल की नकल करते हुए फंक्शंस में वैस्टर्न ड्रैस की बजाय राजशाही स्टाइल में साड़ी और ज्वैलरी पहनना शुरू किया.

इंडोवैस्टर्न फ्यूजन वाली साङियां

सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री की हीरोइन काजोल और कुछ अन्य हीरोइनों ने भी तानिया मित्तल की डिजाइनर साड़ियों की और उस से मैच करती हुई भारी ज्वैलरी की खासतौर पर सोशल मीडिया में तारीफ की. इतना ही नहीं, अपने सीरियल में सासबहु और खलनायिका तक को भारी ज्वैलरी और खूबसूरत साड़ियां पहनाने वाली टीवी क्वीन एकता कपूर ने तानिया की साड़ी पहनने के अंदाज से प्रभावित हो कर उन्हें एक सीरियल में काम करने तक का औफर कर दिया।

‘बिग बॉस’ के घर से बाहर आने के बाद भी तान्या मित्तल हर जगह साड़ी में ही नजर आ रही हैं, जिस का प्रभाव आम महिलाओं पर पड़ रहा है और कई सारी महिलाएं अब डिजाइनर गाउन के बजाय शादी फंक्शन में खूबसूरत साड़ियों के साथ न सिर्फ नजर आ रही हैं, बल्कि सोशल मीडिया पर रील्स बना कर इस की चर्चा भी कर रही हैं.

ऐसे में कहना गलत न होगा कि ‘बिग बॉस’ की प्रतियोगी तान्या मित्तल एक बार फिर खूबसूरत तरीके से साड़ी पहनने का चलन शुरू कर दिया है.

Tanya Mittal

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