Best Hindi Story: हाईवे का प्रेम- शिवांगी ने कैसे सिंदूरा का पर्दाफाश किया

Best Hindi Story: सिंदूरा शाह, बैंगलुरु शहर में रेस्तरां के बिजनैस में एक उभरता हुआ नाम था. वह एक महत्त्वाकांक्षी औरत थी और अन्य शहरों में भी रेस्तरां खोलना चाहती थी.

सिंदूरा एक बड़ी बिजनैस आइकोन बनना चाहती थी पर वह जानती थी कि मर्दों की बनाई इस दुनिया में मर्दों के बीच रह कर उन्हें पछाड़ना कितना कठिन है और इस के लिए सिर्फ मेहनत ही काफी नहीं है बल्कि उसे सफलता पाने के लिए उस के पास मौजूद हर चीज को इस्तेमाल करना आना चाहिए.

रेस्तरां के बिजनैस का गुर उसे अपने पिताजी से विरासत में मिला था, सिंदूरा ने उनके द्वारा दिए गए एकमात्र रेस्तरां को 2 और फिर 3 में तबदील किया था.सिंदूरा शाह 45 साल की अविवाहितमहिला थी. उस ने शादी क्यों नहीं करी इस का उत्तर कोई नहीं जानता सिवा सिंदूरा के.

शायदउसे उस के मन का कोई पुरुष मिला नहीं था.पर इस उम्र में भी सिंदूरा बहुत आकर्षक दिखती थी. उस की ताजगी और सुंदरता देख कर लोग हैरानी में पड़ जाते थे. गोरा रंग और गहरी काली आंखें तथा तीखी सी नाक.

अपने गोरे शरीर पर जब सिंदूरा स्लीवलैस ब्लाउज पहनती और साड़ी को नाभि प्रदर्शना ढंग से बांधती तो बहुत आकर्षक लगती.अपनी इस खूबसूरती को अपने व्यवसाय की प्रगति के लिए बखूबी इस्तेमाल करती थी सिंदूरा.

वह अगर साड़ी का पल्लू अपने कंधेपर सजाना जानती  तो उसे गिरा कर अपनेजिस्म को दिखा कर भरपूर फायदा भी उठाना जानती थी.सिंदूरा ठीक इसी रेस्तरां की तर्ज पर एक और रेस्तरां शहर से बाहर जाने वाले हाईवे पर खोलना चाहती थी और इस के लिए वह हाईवेपर जमीन खरीदने के लिए प्रयासरत थी पर हर बार उसे निराशा ही हाथ लगती थी क्योंकि इस एरिए का प्रौपर्टी डीलर शुभांग सिंह जमीन को बेचना नहीं चाहता था, सिंदूरा ने कई बार अपने आदमियों को शुभांग के पास भेजा पर कोईलाभ नहीं हुआ.

प्रौपर्टी डीलर जमीन के मुद्दे पर कोई बात नहीं करना चाहता था क्योंकि वह जानता था कि मौके की जमीन को जितना देरमें बेचा जाए उतनी ही कीमत बढ़ने का अवसर रहता है.जब सिंदूरा को और कोई रास्ता नहीं सूझ तब उस ने शुभांग से डाइरैक्ट मिल कर बात करने की बात सोची और एक दिन शुभांग के औफिस पहुंच गई.

शुभांग सिंह एक 38 वर्षीय विवाहित और काफी आकर्षक व्यक्ति था जो अपने औफिस में अपनी रिवौल्विंग चेयर पर बैठा हुआ काम कर रहा था. उस की आंखों पर चश्मा लगा हुआ था और उस ने अपने कंधे तक के लंबे बालों को ऊपर की ओर कस कर एक जूडे़ की शक्ल में बांधा हुआ था.

जिस तरह से उस ने सिंदूरा को ऊपर से नीचे तक घूरा था उस से सिंदूरा समझ गई कि वह खूबसूरती का पारखी है और उस का काम आसान होने वाला है.औपचारिक परिचय के बाद दोनों के बीच काम की बातचीत शुरू हुई पर सिंदूरा को झटका तब लगा जब शुभांग ने सिंदूरा को हाईवे वाली जमीन को बेचने से साफ मना कर दिया. सिंदूरा ने दोगुनी कीमत देने को कहा पर फिर भी शुभांग सिंह राजी नहीं हुआ.

सिंदूरा ने बहुत कोशिश करी पर शुभांग सिंह टस से मस नहीं हुआ. सिंदूरा हार कर अपने औफिस आ गई. उस ने कौफी मंगवाई और कुरसी पर बैठ कर सोचने लगी कि कैसे शुभांग सिंह से हाईवे वाली जमीन ली जाए, काम कठिन था और शुभांग भी अडि़यल मालूम होता है, पर थोड़ा दिमाग लगाने के बाद ही सिंदूरा को एक आइडिया आ ही गया.

शुभांग सिंह सोशल मीडिया पर अपने बिजनैस से संबंधित जानकारी अपलोड करता रहता था. सिंदूरा ने उस की सोशल मीडिया पोस्ट को लाइक और कमैंट करना शुरू कर दिया. उस के कमैंट्स तारीफ भरे और चुटकीलापन लिए होते थे.

इस के अलावा सिंदूरा ने शुभांग के व्हाट्सऐप नंबर पर गुड मौर्निंग और सुविचार जैसे मैसेज भी भेजने शुरू कर दिए जिन के बदले शुभांग सिंह भी कभीकभी रिप्लाई कर देता.एक रात शुभांग सिंह के मोबाइल पर सिंदूरा के नंबर से फोटोज की शक्ल में लगातार 3 मैसेज आए पर इस से पहले कि शुभांग उन्हें देख पाता, सिंदूरा ने वे मैसेज डिलीट कर दिए पर एक फोटो डिलीट न हो सका तो उस ने घबराए से स्वर में शुभांग को फोन किया कि उस के मोबाइल पर सिंदूरा की कुछ निजी तसवीरें फौरवर्ड हो गई हैं जिन में से 2 तो डिलीट हो गई हैं पर एक किसी तकनीकी दिक्कत के कारण डिलीट नहीं हो पा रही है इसलिए वह प्लीज उसे न देखे और बिना देखे ही डिलीट कर दे.

मगर बिना देखे तो कुछ डिलीट हो भी नहीं सकता और फिर मनुष्य का स्वभाव होता है कि जो काम उसे करने के लिए मना किया जाए उसे  वह अवश्य करता है. शुभांग सिंह भी कोई अपवाद नहीं था इसलिए उस ने फौरन अपने मोबाइल में सिंदूरा के भेजे गए मैसेज को देखा. उसे देख कर वह दंग रह गया. यह सिंदूरा की एक ऐसी तसवीर थी जिस में वह लाल रंग की बिकिनी पहने थी और उस का गोरा शरीर गजब ढा रहा था. शुभांग सिंह हुस्न का पारखी था.

वह कई लड़कियों के साथ हमबिस्तर हो चुका था इसलिए सिंदूरा की ऐसी तसवीर देख कर वह उस के जिस्म को चूमने के लिए उतावला हो गया और  सिंदूरा के साथ रात गुजारने का मौका ढूंढ़ने लगा.कुछ दिन और बीते. इस बीच सिंदूरा ने शुभांग को हाईवे वाली जमीन के लिए टटोला पर वह तस से टस नहीं हुआ. लेकिन आज शुभांग सिंह को वह मौका मिल ही गया जिस की उसे तलाश थी.

वे दोनों एक पार्टी में मिले और शुभांग सिंह ने पार्टी समाप्त होने के बाद सिंदूरा को अपनी बड़ी सी गाड़ी में लिफ्ट औफर करी जिसे सिंदूरा ने मुसकरा कर स्वीकार कर लिया और अपने ड्राइवर को आंख के इशारे से गाड़ी घर ले जाने को कह दिया.शुभांग सिंह और सिंदूरा दोनों शहर से बाहर बने शुभांग के फार्महाउस पर पहुचे. यह एक शानदार जगह थी.

चारों तरफ रातरानी के फूलों की महक फैली थी और रंगबिरंगी रोशनी से हरा लौन एक नए ही रंग में नजर आ रहा था. दूसरी तरफ पूल में भरा पानी और उस पानी पर तैरते हुए टिमटिमाते दीए अलग ही माहौल बना रहे थे. शुभांग और सिंदूरा बैडरूम में न जा कर वहीं लौन में फूस से बनी एक गोल झोंपड़ी में बैठ गए जहां पर महंगी शराब और गोश्त का इंतजाम पहले से ही था.

शुभांग ने गोश्त खाया और शराब भी पी जबकि सिंदूरा ने सिर्फ शराब पी और गोश्त खाने से परहेज किया.शराब पीते समय शुभांग सिंदूरा के भीगे हुए होंठों को चूम भी ले रहा था. धीरेधीरे सिंदूरा की आंखें नशीली हो गईं और शुभांग उस पर छाता चला गया. दोनों जोश में थे. शुभांग ने सिंदूरा के कपड़ों को उतारने में देर नहीं करी.

सिंदूरा ने पहले तो शरमाने का अभिनय किया पर बाद में वह खुद सहज हो गई. चालक सिंदूरा ने इस सारे दृश्य को अपने मोबाइल में कैद कर लिया ताकि शुभांग को ब्लैकमेल कर के हाईवे वाली जगह हासिल कर सके.आधे घंटे बाद कमरे में आया तूफान ठंडा पड़ चुका था.

सिंदूरा ने जीवन में पहली बार किसी पुरुष के साथ को जीया था. कितना अच्छा था यह क्षणभर का आनंद, पर जैसे ही इसे जीना चाहा यह छूटता सा गया और मन फिर दोबारा इसी क्षण की मांग करने लगा. इस समय सिंदूरा द बिजनैस वूमन कहीं खो गई थी और जो बिस्तर पर निढाल पड़ी थी वह एक औरत थी.सिंदूरा ने देखा कि शुभांग के लंबे बाल बिखरे हुए थे और उस की आंखें भी गहन तृप्ति के भाव से भरी हुई थीं.

यह ठीक वही पल था जब सिंदूरा के मन में शुभांग के प्रति प्रेम का अंकुर फूटा और उस ने कुछ सोचते हुए मोबाइल में शूट की गई क्लिप्स को एक मुसकराहट के साथ डिलीट कर दिया.‘‘अब मुझे घर जाना होगा नहीं तो बीवी घर से बाहर कर देगी,’’ शुभांग ने नाटकीयता दिखाते हुए कहा और कपड़े पहनने लगा. सिंदूरा मुसकरा कर रह गई.

अगली शाम सिंदूरा को फोन कर केशुभांग ने बताया कि उस की खूबसूरती और बिस्तर पर उस की परफौर्मैंस देख कर वह सिंदूरा को हाईवे वाली जगह उसे देने को तैयार है. अब वह रेस्तरां का अपना बिजनैस उस जगह पर कर सकती है.

सिंदूरा जगह मिल जाने से खुश थी. वह गर्व भी कर रही थी कि आज फिर उस की सुंदरता ने उस के बिजनैस में उस की मदद करी है.सिंदूरा ने अब तक शादी नहीं करी थी क्योंकि उसे उस का मनचाहा पुरुष नहीं मिला था और आज शुभांग के रूप में उसे एक ऐसा व्यक्ति मिला है जिस से वह सच में प्रेम करने लगी है पर उस से विवाह नहीं कर सकती क्योंकि शुभांग पहले से ही विवाहित है.

तो क्या हुआ? प्रेम एक तरफ है तो प्रेम का विवाह में बदल जाना दूसरी तरफ, वह शुभांग को प्रेम करती है और ऐसे ही प्रेम करती भी रहेगी.आज सिंदूरा का जन्मदिन था. शुभांग ने उस के घर पर एक बड़ा सा पीले फूलों का बुके भेजा और फिर शाम तक तो तमाम गिफ्ट्स भेजने का क्रम यों ही चलता रहा.

सच कहा जाए तो सिंदूरा को यह लड़कपन वाला प्यार जताने का तरीका बहुत अच्छा लग रहा था.वे दोनों शाम को एक होटल में मिले और एकदूसरे के साथ समय गुजारा. शुभांग ने सिंदूरा को यह भी बताया कि वह आज से 3 दिन बाद  काम के सिलसिले में थाईलैंड के लिए रवाना हो रहा है जहां पर कुछ दिन बिताएगा और उस ने सिंदूरा को भी साथ चलने का औफर दिया.

‘‘पर मैं सारा बिजनैस कैसे छोड़ कर जाऊं?’’ सिंदूरा ने असमर्थता दिखाते हुए कहा.मगर शुभांग ने उस की एक न चलने दी और उसे थाईलैंड चलने के लिए मना ही लिया. सिंदूरा फूले नहीं समा रही थी. किसी ने कितने अधिकार से उस से अपने साथ चलने को कहा.

वह कहा टाल न सकी और थाईलैंड जाने की तैयारी करने लगी. लगभग 4 हजार किलोमीटर का सफर तय कर के वे दोनों थाईलैंड के बैंकौक शहर पहुंच गए, दिन में आराम करने के बाद दोनों एक रेस्तरां में खाने पहुंचे. बैंकाक का मुख्य भोजन ‘पैड थाई नूडल्स’ है जिस में चिकन तथा अन्य मांस की अधिकता रहती है. वैसे भी बैंकौक में सिंदूरा ने नौनवैज स्ट्रीट फूड बहुत देखा था.

तभी उस के दिमाग में आइडिया आया कि क्यों न बैंकाक में एक शाकाहारी रेस्तरां खोला जाए जो भारतीयों और शाकाहारी लोगों को बहुत आकर्षित करेगा.सिंदूरा थाई नूडल्स का मजा लेतेलेते इस आइडिया के बारे में और विचार करने लगी.

इस बीच शुभांग फोन पर अपनी पत्नी से बात कररहा था.ऐसा लगता था कि उस की पत्नी शुभांग के बारे में कुछ ज्यादा ही चिंतित हो रही थी. शुभांग ने उसे समझयाबुझाया और फिर वह भी नूडल्स खाने में व्यस्त हो गया.खाने के बाद दोनों शौपिंग करने के लिए ‘एशियाटिक द रिवरफ्रंट’ नाम के विशाल मौल में गए, यह काफी बड़ा मौल है जिस में पचासों बुटीक और रेस्तरां हैं. सिंदूरा ने इतनी चकाचौंध और विविधताओं से भरा हुआ मौल पहले कभी नहीं देखा था.

यहां दोनों ने अपनी फुट मसाज कराई और स्पा भी लिया तथा जम कर शौपिंग भी करी. रात हो चली थी. दोनों थक कर चूर हो गए थे. इसलिए अपने होटल के कमरे में चले आए. सिंदूरा ने कमरे में आ कर मौल से खरीदी हुई नाइटी पहनी जिस के अंदर उस का गोरा बदन और भी मादक लगने लगा.शुभांग और सिंदूरा कमरे में अकेले थे.

दोनों के दिल एकदूसरे को देख कर धड़क उठे और दोनों ने एकदूसरे को आगोश में भर लिया. शुभांग के हाथ सिंदूरा के चिकने बदन पर फिसल रहे थे. दोनों एकदूसरे में डूब जाना चाहते थे पर जैसे ही शुभांग ने सिंदूरा के शरीर में प्रवेश करना चाहा, वह कराह उठा.

उसे दर्द हो रहा था. वह दर्द किडनी वाली जगह पर था. शुभांग परेशान हो गया और दर्द के मारे सिंदूरा से अलग हो गया और बिस्तर पर करवट बदलते हुए बेहोश हो गया. सिंदूरा ने तुरंत रूम सर्विस को कौल कर के मैडिकल सुविधा प्रदान करने की गुहार लगाई.

होटल मैनेजमैंट ने तुरंत ऐक्शन लिया और होटल में ही मौजूद एक डाक्टर को बुलाया जिस ने तुरंत शुभांग को अस्पताल के लिए रैफर किया और वह खुद भी साथ में अस्पताल गया.डाक्टरों ने शुभांग के खून के ढेर सारेटैस्ट किए और उस के यूरिन को भी जांचा.

जब रिपोर्ट आने पर उन्होंने सिंदूरा को बताया कि रिपोर्ट गंभीर है और शुभांग की किडनिया जवाब दे चुकी हैं. सिंदूरा बिलख पड़ी. जीवन के इतने वर्ष के बाद उसे किसी मनचाहे पुरुष का साथ मिला था, भले ही वह एक विवाहित पुरुष था पर सिंदूरा ने उसे प्रेम किया था, सच्चा प्रेम और आज जब वह अपने प्रेमी के साथ समय बिताने विदेश आई तब शुभांग की किडनियां खराब हो गईं और वह मौत के मुंह में जा रहा है.

तो क्या शुभांग उस का साथ छोड़ जाएगा? डाक्टर को शुभांग की जान बचाने के लिए एक किडनी की तलाश थी पर इतनी जल्दी किडनी की व्यवस्था अस्पताल में नहीं थी और डोनर मिलने में पता नहीं कितना समय लगता.‘‘तो आप मेरी किडनी ले लीजिए.

मैं शुभांग को किडनी डोनेट करने के लिए तैयार हूं.’’ ‘‘देखिए, आप अच्छी तरह से सोच लीजिए. यदि आप अपने पति को किडनी देना ही चाहती हैं तो हम आप के शरीर की कुछ जांच करने के बाद ही बता पाएंगे कि आप की किडनी शुभांग के लायक है भी या नहीं,’’ डाक्टरों ने कहा. डाक्टरों के मुंह से शुभांग को उस के पति के रूप में बुलाया जाना सिंदूरा को बहुत अच्छा लगा था.सिंदूरा की भावनाएं प्रबल होती जा रही थीं. वह किसी भी हालत में शुभांग को नहीं खोना चाहती थी.

उस ने झट से अपने सारे टैस्ट करा लिए. सारी रिपोर्ट्स नौर्मल आईं. डाक्टर ने उसे यह भी बताया कि उस की किडनी शुभांग को सूट कर जाएगी और वे आराम से उस की किडनी ट्रांसप्लांट कर सकते हैं. एक सुकून की सांस ली थी सिंदूरा ने.

किडनी सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट हो गई थी और आज 1 हफ्ता हो गया था और किडनी शुभांग के शरीर में सही तरीके से काम भी कर रही थी. सिंदूरा और शुभांग दोनों एक ही कमरे में पास के बैड पर थे.

सिंदूरा की हालत में तेजी से सुधार आ रहा था जबकि शुभांग को अभी भी काफी देखरेख की आवश्यकता थी. तभी नर्स ने आ कर बताया कि भारत से कोई महिला शुभांग सिंह से मिलना चाहती है.भारत से आई महिला का नाम सुन कर दोनों चौंक गए थे. आखिर वह कौन हो सकता है? जब वह महिला सामने लाई गई तो और कोई नहीं बल्कि शुभांग की पतनी रूही थी.

अपनी पत्नी को थाईलैंड में देख कर शुभांग बुरी तरह चौंक गया.‘‘रूही तुम यहां कैसे?’’ पर रूही ने जवाब देने की बजाय सवालों की ?ाड़ी लगा दी, ‘‘तुम्हें क्या हो गया? अगर तुम्हें कुछ समस्या थी तो तुम ने अपनी पत्नी को बताने की भी जरूरत नहीं समझ… एक फोन तो कर सकते थे? शुभांग मैं तुम्हारी पत्नी हूं, कोई गैर नहीं.’’

उस की व्यग्रता और प्रेम समझते हुएशुभांग मुसकरा उठा और बदले में उस ने सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘मेरी किडनी में भयंकर दर्द हुआ और मैं बेहोश हो गया. फिर क्या हुआ मुझे कुछ नहीं पता. उस के बाद जब मेरी आंख खुली तब मेरा औपरेशन हो चुका था और मुझे एक नई किडनी लगा दी गई थी,’’ शुभांग ने मुसकराते हुए उत्तर दिया. ‘‘पर तुम अचानक इतनी दूर यहां कैसे आईं?’’ रूही थोड़ा नौर्मल हुई तो उस ने बताया कि जब कई दिनों तक शुभांग का नंबर घंटीबजने के बाद भी नहीं उठा तब रूही ने शुभांग द्वारा चैकइन करने के समय भेजी गई होटलकी लोकेशन के अनुसार होटल के रिसैप्शनसे शुभांग सिंह का नाम पूछ कर जानकारीहासिल करी.

उन्होंने बताया कि इस नाम के मरीजकी हालत अचानक बिगड़ गई थी जिस के पश्चात उन्हें अस्पताल में भरती कराया गया है और वे किडनी की समस्या से जूझ रहे हैं. इतनी खबर पाते ही रूही वहां से थाईलैंड के लिए निकल पड़ी.‘‘पर अचानक तुम्हारे लिए किडनी की व्यवस्था कैसी हुई? आई मीन किस ने डोनेट की?’’ रूही ने पूछा.पहले तो शुभांग ने सबकुछ छिपाना चाहा पर शायद अब उस की गुंजाइश नहीं बची थी. अत: उस ने बताया कि वह और सिंदूरा एकसाथ काम करते हैं और वह सिंदूरा के ही साथ थाईलैंड आया था और दोनों एक ही होटल में रुके थे.

तभी यह हादसा हुआ. सिंदूरा ने मुझे अपनी किडनी डोनेट कर के मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है.‘‘आगे मुझे कुछ जानने की जरूरत नहीं है. होटल के रिकौर्ड में सिंदूरा का नाम तुम ने अपनी पत्नी के नाम पर दर्ज कराया है,’’ रूही के स्वर में एक दर्द और कसैलापन था.

शुभांग कुछ न बोल सका. अब बारीसिंदूरा के बोलने की थी. बोली, ‘‘मैं क्या करती मैं इस उम्र में आ कर तुम्हारे पति से प्रेम करबैठी और जब मैं ने दिल दे ही दिया तो भला किडनी दे कर जान बचाने में क्यों चूंकती? हां, हम थोड़ी देर के लिए बहक जरूर गए थे, पर यकीन मानो मेरा शुभांग के प्रति प्रेम एकदम निस्वार्थ है.’’ रूही अजीब स्थिति में थी.

एक तरफ तो उसे सिंदूरा में अपनी सौतन नजर आ रही थी, एक ऐसी औरत जिस ने उस के पति के साथ बिस्तर पर रात बिताई है और दूसरी तरफ सिंदूरा में उस के पति की जान बचाने वाली औरत भी दिख रही थी जिस ने अपनी किडनी देने का निर्णय कर के उस के सुहाग की रक्षा करी है. बेचैनी रूही के मन में थी तो सिंदूरा के मन में भी और इस बेचैनी को खत्म करने का जिम्मा रूही ने ही उठाया.

बोली, ‘‘मैं तुम्हारी बहुत शुक्रगुजार हूं जो तुम ने मेरे पति की जान बचाई और मेरे लिए यह स्थिति भी बहुत विचित्र है कि तुम शुभांग से प्रेम करती हो, पर वे मेरा पति हैं.

मैं उन्हें तुम्हारे साथ किसी हालत में नहीं बांट सकती और मैं तुम्हारे और शुभांग के प्रेम को भी परवान चढ़ने नहीं देना चाहती, पर तुम ने मेरे पति की जान बचाई है इसलिए तुम उन के साथ एक हैल्दी रिलेशन रख सकती हो और वह रिलेशन है दोस्ती का. तुम मेरे पति की अच्छी दोस्त बन कर रह सकती हो.

उन से जब चाहे मिल सकती हो और मिलने घर भी आ सकती हो,’’ कह कर रूही ने सिंदूरा का हाथ अपने हाथों में ले लिया.सिंदूरा की आंखें नम हो चली थीं. रूही के चेहरे पर तनाव और मुसकराहट का मेलजोल दिख रहा था.शुभांग यह सब देख और सुन कर चकित हो रहा था.

उस के सामने 2 स्त्रियां थीं जिन में एक उस की पत्नी थी और दूसरी वह महिला थी जिस ने उस से प्रेम किया था.आज शुभांग अपनेआप को एक हाईवे पर खड़ा हुआ पा रहा था जहां चारों ओर कोई ट्रैफिक नहीं था, कोई शोर भी नहीं था बल्कि प्रेम ही प्रेम था, रिश्तों का अजबगजब प्रेम,हाईवे का प्रेम.

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Best Romantic Story: प्रेम की उदास गाथा

Best Romantic Story: चपरासी एक स्लिप दे गया था. जब उस की निगाहें उस पर पड़ीं तो वह चौंक गया, ‘क्या वे ही होंगे जिन के बारे में वह सोच रहा है.’ उसे कुछ असमंजस सा हुआ. उस ने खिड़की से झांक कर देखने का प्रयास किया पर वहां से उसे कुछ नजर नहीं आया. वह अपनी सीट से उठा. उसे यों इस तरह उठता देख औफिस के कर्मचारी भी अपनीअपनी सीट से उठ खड़े हुए. वह तेजी से दरवाजे की ओर लपका. सामने रखी एक बैंच पर एक बुजुर्ग बैठे थे और शायद उस के बुलाने की प्रतीक्षा कर रहे थे.

हालांकि वह उन्हें पहचान नहीं पा रहा था पर उसे जाने क्यों भरोसा सा हो गया था कि यह रामलाल काका ही होंगे. वह सालों से उन से मिला नहीं था. जब वह बहुत छोटा था तब पिताजी ने परिचय कराया था…

‘अक्षत, ये रामलालजी हैं. कहानियां और कविताएं वगैरह लिखते हैं और एक प्राइवेट स्कूल में गणित पढ़ाते हैं.’

मुझे आश्चर्य हुआ था कि भला गणित के शिक्षक कहानियां और कविताएं कैसे लिख सकते हैं. मैं ने उन्हें देखा. गोरा, गोल चेहरा, लंबा और बलिष्ठ शरीर, चेहरे पर तेज.

‘तुम इन से गणित पढ़ सकते हो,’ कहते हुए पिताजी ने काका की ओर देखा था जैसे स्वीकृति लेना चाह रहे हों. उन्होंने सहमति में केवल अपना सिर हिला दिया था. मेरे पिताजी मनसुख और रामलाल काका बचपन के मित्र थे. दोनों ने साथसाथ कालेज तक की पढ़ाई की थी. पढ़ाई के बाद मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में आ गए पर रामलाल काका प्रतिभाशाली होने के बाद भी नौकरी नहीं पा सके थे.

उन्हें एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापन का कार्य कर अपनी रोजीरोटी चलानी पड़ रही थी. वे गणित के बहुत अच्छे शिक्षक थे. उन के द्वारा पढ़ाया गया कोई भी छात्र गणित में कभी फेल नहीं होता था, यह बात मु?ो बाद में पता चली.

मैं इंजीनियर बनना चाहता था. इस कारण पिताजी के मना करने के बाद भी मैं ने गणित विषय ले लिया था पर कक्षाएं प्रारंभ होते ही मुझे लगने लगा था कि यह चुनाव मेरा गलत था. मुझे गणित समझ में आ ही नहीं रहा था. इस के लिए मैं क्लास के शिक्षक को दोषी मान सकता था. वे जो समझते मेरे ऊपर से निकल जाता.

तीसरी सैमेस्टर परीक्षा में जब मुझे गणित में बहुत कम अंक मिले तो मैं उदास हो गया. मुझे यों उदास देख कर एक दिन पिताजी ने प्यार से मुझे से पूछ ही लिया, वैसे तो मैं उन्हें कुछ भी बताना ही नहीं चाह रहा था क्योंकि उन्होंने तो मुझे मना किया था पर उन के प्यार से पूछने से मैं अपनी पीड़ा व्यक्त करने से नहीं रह सका.

पिताजी ने धैर्य के साथ सारी बात समझे और मुसकराते हुए रामलाल काका से गणित पढ़ने की सलाह दे दी. पिताजी मुझे खुद ले कर काका के पास आए थे. रामलाल काका ट्यूशन कभी नहीं पढ़ाते थे, इस कारण ही तो मुझे उन के पास जाने में हिचक हो रही थी पर वे पिताजी के बचपन के मित्र थे, यह जान कर मुझे भरोसा था कि वे मुझे मना नहीं करेंगे. हुआ भी ऐसा ही. मैं रोज उन के घर पढ़ने जाने लगा.

मेरे जीवन में चमत्कारी परिवर्तन दूसरे तो महसूस कर ही रहे थे, मैं स्वयं भी महसूस करने लगा था. मेरा बहुत सारा समय अब काका के घर में ही गुजरने लगा था. मैं उन के परिवार का एक हिस्सा बन गया था. उन्होंने शादी नहीं की थी, इस कारण वे अकेले ही रहते थे. स्वयं खाना बनाते और घर के सारे काम करते. काका से मैं गणित की बारीकियां तो सीख ही रहा था, साथ ही, जीवन की बारीकियों को भी सीखने का अवसर मुझे मिल रहा था.

काका बहुत ही सुलझे हुए इंसान थे. ‘न काहू से दोस्ती और न काहू से बैर’ की कहावत का जीवंत प्रमाण थे वे. शायद इसी कारण समाज में उन की बहुत इज्जत भी थी. लोग उन्हें बहुत प्यार करते थे और सम्मान भी देते थे. उन की दिनचर्या बहुत सीमित थी. वे स्कूल के अलावा घर से केवल शाम को ही निकलते थे, सब्जी वगैरह लेने. इस के अलावा वे पूरे समय घर पर ही रहते थे. वे अकसर कहानियां या कविता लिखते नजर आते.

‘काका इन कहानियों के लिखने से समाज नहीं बदलता. आप कुछ और लिखा करिए,’ एक दिन मैं बोल पड़ा.

‘मैं समाज को बदलने के लिए और उन्हें सिखाने के लिए कहानियां नहीं लिखता हूं. मैं अपने सुख के लिए कहानियां लिखता हूं. किसी को पसंद आए या न आए.’

मैं चुप हो जाता. पहले मैं सोचता था कि यह मेरा विषय नहीं है, इसलिए न तो मैं उन की लिखी कहानी पढ़ता और न ही उन में रुचि लेता पर कहते हैं न कि संगत का असर आखिर पड़ ही जाता है, इसलिए मुझे भी पड़ गया. एक दिन जब काका सब्जी लेने बाजार गए थे, मैं बोर हो रहा था. मैं ने यों ही उन की अधूरी कहानी उठा ली और पढ़ता चला गया था.

कहानी मुझे कुछकुछ उन के जीवन परिचय का बोध कराती सी महसूस हुई थी. वह एक प्रणय गाथा थी. किन्ही कारणों से नायिका की शादी कहीं और हो जाती है. नायक शादी नहीं करता. चूंकि कहानी अधूरी थी, इसलिए आगे का विवरण जानने के लिए मेरी उत्सुकता बढ़ गई थी.

मैं ने यह जाहिर नहीं होने दिया था कि मैं ने कहानी को पढ़ा है. काकाजी की यह कहानी 2-3 दिनों में पूरी हो गई थी. अवसर निकाल कर मैं ने शेष भाग पढ़ा था.

नायिका की एक संतान है. वह विधवा हो जाती है. उस का बेटा उच्च शिक्षा ले कर अमेरिका चला जाता है. यहां नायिका अकेली रह जाती है. उस के परिवार के लोग उस पर अत्याचार करते हैं और उसे घर से निकाल देते हैं. वह एक वृद्धाश्रम में रहने लगती है. कहानी अभी भी अधूरी सी ही लगी पर काकाजी ने कहानी में जिस तरह की वेदना का समावेश किया था उसे पढ़ने वाले की आंखें नम हुए बगैर नहीं रह पाती थीं. आंखें तो मेरी भी नम हो गई थीं. यह शब्दों का ही चमत्कार नहीं हो सकता था, शायद आपबीती थी. तभी तो इतना बेहतर लेखन हो पाया था. मैं ने काकाजी को बता दिया था कि मैं ने उन की कहानी को पढ़ा है और कुछ प्रश्न मेरे दिमाग में घूम रहे हैं. काकाजी नाखुश नहीं हुए थे.

‘देखो, कहानी समसामयिक है, इसलिए तुम्हारे प्रश्नों का जवाब देना जरूरी नहीं है. पर तुम्हारी जिज्ञासा को दबाना भी उचित नहीं है, इसलिए पूछ सकते हो,’ काकाजी के चेहरे पर हलकी सी वेदना दिखाई दे रही थी.

‘कहानी पढ़ कर मुझे लगा कि शायद आप इन घटनाक्रम के गवाह हैं.’ वे मौन रहे.

‘इस कहानी के नायक में आप की छवि नजर आ रही है, ऐसा सोचना मेरी गलती है,’ मैं ने काकाजी के चेहरे की ओर नजर गड़ा ली थी. उन के चेहरे पर अतीत में खो जाने के भाव नजर आने लगे थे मानो वे अपने जीवन के अतीत के पन्ने उलट रहे हों.

काकाजी ने गहरी सांस ली थी, ‘वैसे तो मैं तुम को बोल सकता हूं कि यह सही नहीं है, पर मैं ऐसा नहीं बोलूंगा. तुम ने कहानी को वाकई ध्यान से पढ़ा है, इस कारण ही यह प्रश्न तुम्हारे ध्यान में आया. हां, यह सच है. कहानी का बहुत सारा भाग मेरा अपना ही है.’

‘नायक और नायिका भी?’

‘हां…’ हम दोनों मौन हो गए थे.

काकाजी ने उस दिन फिर और कोई बात नहीं की. दूसरे दिन मैं ने ही बात छेड़ी थी, ‘‘वह कहानी प्रकाशन के लिए भेज दी क्या?’’

‘नहीं, वह प्रकाशन के लिए नहीं लिखी,’ उन्होंने संक्षिप्त सा जबाब दिया था.

‘काकाजी, आप ने उन के कारण ही शादी नहीं की क्या?’ वे मौन बने रहे.

‘पर इस से नुकसान तो आप का ही हुआ न,’ मैं आज उन का अतीत जान लेना चाहता था.

‘प्यार में नुकसान और फायदा नहीं देखा जाता, बेटा.’

‘जिस जीवन को आप बेहतर ढंग से जी सकते थे, वह तो अधूरा ही रह गया न और इधर नायिका का जीवन बहुत अच्छा भले ही न रहा हो पर आप के जीवन से अच्छा रहा,’’ वे मौन बने रहे.

‘‘मेरे जीवन का निर्णय मैं ने लिया है. उसे तराजू में तोल कर नहीं देखा जा सकता,’ काकाजी की आंखों में आंसू की बूंदें नजर आने लगी थीं.

हम ने फिर और कोई बात नहीं की पर अब चूंकि बातों का सिलसिला शुरू हो गया था, इस कारण काकाजी ने टुकड़ोंटुकड़ों में मुझे सारी दास्तां सुना दी थी.

कालेज के दिनों उन के प्यार का सिलसिला प्रारंभ हुआ था. रेणू नाम था उस का. सांवली रंगत पर मनमोहक छवि, बड़ीबड़ी आंखें और काले व लंबे घने बाल. पढ़ने में भी बहुत होशियार. उन्होंने ही उस से पहले बात की थी. उन्हें कुछ नोट्स की जरूरत थी और वे सिर्फ रेणू के पास थे. काकाजी अभावों में पढ़ाई कर रहे थे. किताबें खरीदने की गुंजाइश नहीं थी.

उन्हें नोट्स चाहिए थे ताकि वे उसे ही पढ़ कर परीक्षा की तैयारी कर सकें. साथियों का मानना था कि रेणू बेहद घमंडी लड़की है और वह उन्हें नोट्स नहीं देगी. निराश तो वे भी थे पर उन के पास इस के अलावा और कोई विकल्प था भी नहीं. उन्होंने डरतेडरते रेणू से नोट्स देने का अनुरोध किया था. रेणू ने बगैर किसी आनाकानी के उन्हें नोट्स दे भी दिए थे. उन्हें और उन के साथियों को वाकई आश्चर्य हुआ था. रेणू शायद उन की आवश्यकताओं से परिचित थी, इस कारण वह उन्हें पुस्तकों से ले कर कौपीपेन तक की मदद करने लगी थी. संपर्क बढ़ा और प्यार की कसमों पर आ गया.

काकाजी तो अकेले जीव थे. उन के न तो कोई आगे था और न पीछे. उन्होंने जब अपनी आंखें खोली थीं तो केवल मां को ही पाया था. मां भी ज्यादा दिन उन का साथ नहीं निभा सकीं और एक दिन उन की मृत्यु हो गई. काकाजी अकेले रह गए. काकाजी का अनाथ होना उन के प्यार के लिए भारी पड़ गया. रेणू के पिताजी ने रेणू के भारी विरोध के बावजूद उस की शादी कहीं और करा दी. रेणू के दूर चले जाने के बाद काकाजी के जीवन का महकता फलसफा खत्म हो गया था .

काकाजी गांव वापस आ गए और नए सिरे से अपनी दिनचर्या को बनाने में जुट गए. कहानी सुनातेसुनाते कई बार काकाजी फूटफूट कर रोए थे. मैं ने उन को बच्चों जैसा रोते देखा था. शायद वे बहुत दिनों से अपने दर्द को अपने सीने में समेटे थे. मैं ने उन को जी भर रोने दिया था. इस के बाद हमारे बीच इस विषय को ले कर फिर कभी कोई बात नहीं हुई.

मैं उन के पास नियमित गणित पढ़ने जाता और वे पूरी मेहनत के साथ मुझे पढ़ाते भी. उन की पढ़ाई के कारण मेरा गणित बहुत अच्छा हो गया था. उन्होंने मुझे इंग्लिश विषय की पढ़ाई भी कराई.

काकाजी की मदद से मेरा इंजीनियर बनने का स्वप्न पूरा हो गया था पर मैं ज्यादा दिन इंजीनियर न रह कर आईएएस में सलैक्ट हो गया और कलैक्टर बन कर यहां पदस्थ हो गया था. लगभग 10 सालों का समय यों ही व्यतीत हो गया था. इन सालों में मैं काकाजी से फिर नहीं मिल पाया था. मैं 1-2 बार जब भी गांव गया, काकाजी से मिलने का प्रयास किया. पर काकाजी गांव में नहीं मिले.

कलैक्टर का पदभार ग्रहण करने के पहले भी मैं गांव गया था. तभी पता चला था कि काकाजी तो कहीं गए हैं और तब से यहां लौटे ही नहीं. उन के घर पर ताला पड़ा है. गांव के लोग नहीं जानते थे कि आखिर काकाजी चले कहां गए. आज जब अचानक उन की स्लिप चपरासी ले कर आया तो गुम हो चुका पूरा परिदृश्य सामने आ खड़ा हुआ. औफिस के बाहर मिलने आने वालों के लिए लगी बैंच पर वे बैठे थे, सिर झुकाए और कुछ सोचते हुए से.

मैं पूरी तरह तय नहीं कर पा रहा था पर मुझे लग रहा था कि वे ही हैं. बैंच पर और भी कुछ लोग बैठे थे जो मुझ से मिलने की प्रतीक्षा कर रहे थे. मुझे इस तरह भाग कर आता देख सभी चौंक गए थे. बैंच पर बैठे लोग उठ खड़े हुए पर काकाजी यों ही बैठे रहे. उन का ध्यान इस ओर नहीं था.

मैं ने ही आवाज लगाई थी, ‘‘काकाजी…’’ वे चौंक गए. उन्होंने यहांवहां देखा भी पर समझ नहीं पाए कि आवाज कौन लगा रहा है. बाकी लोगों को खड़ा हुआ देख कर वे भी खड़े हो गए. उन्होंने मुझे देखा अवश्य पर वे पहचान नहीं पाए थे.

मैं ने फिर से आवाज लगाई, ‘‘काकाजी,’’ उन की निगाह सीधे मुझ से जा टकराई. यह तो तय हो चुका था कि वे काकाजी ही थे. मैं ने दौड़ कर उन को अपनी बांहों में भर लिया था.

‘‘काकाजी, नहीं पहचाना? मैं मनसुखजी का बेटा. आप ने मुझे गणित पढ़ाई थी, ‘‘काकाजी के चेहरे पर पहचान के भाव उभर आए थे.

‘‘अरे अक्षत,’’ अब की बार उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया था.

औफिस के रिटायररूम के सोफे पर वे इत्मीनान के साथ बैठे थे और मैं सामने वाली कुरसी पर बैठा हुआ उन के चेहरे के भावों को पढ़ने का प्रयास कर रहा था. चपरासी के हाथों से पानी ले कर वे एक ही घूंट में पी गए थे.

‘‘आप यहां कैसे, काकाजी?’’

‘‘तुम, यहां के कलैक्टर हो? जब नाम सुना था तब कुछ पहचाना सा जरूर लगा था पर तुम तो इंजीनियर…’’

‘‘हां, बन गया था. आप ने ही तो मुझे बनवाया था. फिर आईएएस में सिलैक्शन हो गया और मैं कलैक्टर बन गया.’’ उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में ले लिया.

‘‘आप यहां कैसे, मैं ने तो आप को गांव में कितना ढूंढ़ा?’’

‘‘मैं यहां आ गया था. रेणू को मेरी जरूरत थी,’’ उन्होंने कुछ सकुचाते हुए बोला था.

मेरे दिमाग में काकाजी की कहानी की नायिका ‘रेणू’ सामने आ गई. उन्होंने ही बोला, ‘‘रेणू को उस के परिवार के लोग सता रहे थे. मैं ने बताया था न?’’

‘‘हां, पर यह तो बहुत पुरानी बात है.’’

‘‘वह अकेली पड़ गई थी. उसे एक सहारा चाहिए था.’’

‘‘उन्होंने आप को बुलाया था?’’

‘‘नहीं, मैं खुद ही आ गया था.’’

‘‘यों इस तरह गांव में किसी को बताए बगैर?’’

‘‘सोचा था कि उस की समस्या दूर कर के जल्दी लोट जाऊंगा पर…’’

‘‘क्या आप उस के साथ ही रह रहे हैं?’’

‘‘नहीं, मैं ने यहां एक कमरा ले लिया है.’’

‘‘और… वो… उन्हें भी तो घर से निकाल दिया था…’’

दरअसल, मेरे दिमाग में ढेरों प्रश्न आजा रहे थे.

‘‘हां, वह वृद्धाश्रम में रह रही है.’’

‘‘अच्छा…’’

‘‘यहां अदालत में उन का केस चल रहा है.’’

वे मुझे आप कहने लगे थे, शायद उन्हें याद आया कि मैं यहां का कलैक्टर हूं.

‘‘काकाजी, यह ‘आप’ क्यों लगा रहे

हैं, आप?’’

‘‘वह… बेटा, अब तुम इतने बड़े पद पर हो…’’

‘‘तो?’’

‘‘देखो अक्षत, रेणू का केस सुलझा दो. यह मेरे ऊपर तुम्हारा बड़ा एहसान होगा,’’ कहतेकहते काकाजी ने मेरे सामने हाथ जोड़ लिए.

कमरे में पूरी तरह निस्तब्धता छा चुकी थी. काकाजी की आंखों से आंसू बह रहे थे. वे रेणू के लिए दुखी थे. वह रेणू जिस के कारण काकाजी ने विवाह तक नहीं किया था और सारी उम्र यों ही अकेले गुजार दी थी. मैं ने काकाजी को ध्यान से देखा. वे इन

10 सालों में कुछ ज्यादा ही बूढ़े हो गए थे. चेहरे की लालिमा जा चुकी थी उस पर उदासी ने स्थायी डेरा जमा लिया था. बाल सफेद हो चुके थे और बोलने में हांफने भी लगे थे.

 

औफिस के कोने में लगे कैक्टस के पौधे को वे बड़े ध्यान से देख रहे थे और मैं उन्हें. उन का सारा जीवन रेणू के लिए समर्पित हो चुका था. आज भी वे रेणू के लिए ही संघर्ष कर रहे थे.

‘‘काकाजी, मैं केस की फाइल पढ़ं ूगा और जल्दी ही फैसला दे दूंगा,’’ मैं उन्हें झूठा आश्वासन नहीं देना चाह रहा था.

‘‘केस तो तुम को मालूम ही है न, मैं ने बताया था, ’’काकाजी ने आशाभरी निगाहों से मुझे देखा.

‘‘हां, आप ने बताया था पर फाइल देखनी पड़ेगी तब ही तो कुछ समझ पाऊंगा न,’’ मैं उन के चेहरे की बेबसी को पढ़ रहा था पर मैं भी मजबूर था. यों बगैर केस को पढ़े कुछ कह नहीं पा रहा था.

काकाजी के चेहरे पर भाव आजा रहे थे. मुझ से मिलने के बाद उन्हें उम्मीद हो गई थी कि रेणू के केस का फैसला आज ही हो जाएगा और वह उन के पक्ष में ही रहेगा पर मेरी ओर से ऐसा कोई आश्वासन न मिल पाने से वे फिर से हताश नजर आने लगे थे.

‘‘काकाजी, आप भरोसा रखें, मैं बहुत जल्दी फाइल देख लूंगा,’’ मैं उन्हें आश्वस्त करना चाह रहा था.

 

काकाजी थके कदमों से बाहर चले गए थे. वे 2-3 दिन बाद मुझे मेरे औफिस के सामने बैठे दिखे थे. चपरासी को भेज कर मैं ने उन्हें अंदर बुला लिया था. उन के चेहरे पर उदासी साफ झलक रही थी. काम की व्यस्तता के कारण फाइल नहीं देख पाया था. मैं मौन रहा. चपरासी ने चाय का प्याला उन की ओर बढ़ा दिया, ‘‘काकाजी, कुछ खाएंगे क्या?’’ मैं  उन से बोल नहीं पा रहा था कि मैं फाइल नहीं देख पाया हूं पर काकाजी समझ गए थे. वे बगैर कुछ बोले औफिस से निकल गए थे.

फाइल का पूरा अध्ययन मैं ने कर लिया था. यह तो समझ में आ ही गया था कि रेणूजी के साथ अन्याय हुआ है पर फाइल में लगे कागज रेणूजी के खिलाफ थे. दरअसल, रेणू को उन के पिताजी ने एक मकान शादी के समय दिया था. शादी के बाद जब तक हालात अच्छे रहते आए तब तक रेणू ने कभी उस मकान के बारे में जानने और समझने की जरूरत नहीं समझ. उन के पति यह बता दिया था कि उसे किराए पर उठा रखा है पर जब रेणू की अपने ससुराल में अनबन हो गई और उन्हें अपने पति का घर छोड़ना पड़ा तब अपने पिताजी द्वारा दिए गए मकान का ध्यान आया.

उन्होंने अपने पति से अपना मकान मांगा ताकि वे रह सकें पर उन्होंने साफ इनकार कर दिया. रेणू ने मकान में कब्जा दिलाए जाने के लिए एक आवेदन कलैक्टर की कोर्ट में लगा दिया. रेणू को नहीं मालूम था कि उन के पति ने वह मकान अपने नाम करा लिया है. कागजों और दस्तावेजों के विपरीत जा कर मैं फैसला दे नहीं सकता था. मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं काकाजी से क्या बोलूंगा.

वृद्धाश्राम के एक कार्यक्रम में मैं ने पहली बार रेणूजी को देखा था. आश्रम की ओर से पुष्पगुच्छ भेंट किया था उन्होंने मुझे. तब तक तो मैं समझ नहीं पाया था कि यही रेणूजी हैं पर कार्यक्रम के बाद जब मैं लौटने लगा था तो गेट पर काकाजी ने हाथ दे कर मेरी गाड़ी को रोका था. उन के साथ रेणूजी भी थीं. ‘‘अक्षत, मैं और रेणू गांव जा रहे हैं. हम ने फैसला कर लिया है कि हम दोनों वहीं साथ में रहेंगे,’’ काकाजी के बूढ़े चेहरे पर लालिमा नजर आ रही थी. मैं ने रेणूजी को पहली बार नख से सिर तक देखा था. बुजुर्गियत से ज्यादा उन के चेहरे पर परेशानी के निशान थे पर वे बहुत खूबसूरत रही होंगी, यह साफ झलक रहा था.

‘‘सुनो बेटा, अब हमें तुम्हारे फैसले से भी कुछ लेनादेना नहीं है. जो लगे, वह कर देना.’’ उन्होंने रेणू का हाथ अपने हाथों में ले लिया था.

‘‘तुम ने मेरी अधूरी कहानी पढ़ी थी न. वह आज पूरी हुई,’’ काकाजी के कदमों में नौजवानों जैसी फुरती दिखाई दे रही थी. काकाजी के ओ?ाल होते ही मेरी निगाह आश्रम के गेट पर कांटों के बीच खिले गुलाब पर जा टिकी.

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Dreame Mova K10 Pro: घर की सफाई में एक संपूर्ण क्रांति

Dreame Mova K10 Pro: हमारे घरों की सफाई पुराने समय में जहाँ झाड़ू और पोछे से होती थी उस की जगह अब आकर्षक, स्मार्ट मशीनों ने ले लिया है. ये सफाई के झंझटों को कम करती हैं. इस में सबसे आगे है ड्रीम मोवा K10 प्रो जो एक स्मार्ट वेट और ड्राई वैक्यूम क्लीनर है. अपनी अत्याधुनिक सक्शन पावर, स्मार्ट डर्ट डिटेक्शन तकनीक और स्वचालित डिजाइन के साथ K10 प्रो सिर्फ़ एक वैक्यूम क्लीनर नहीं है बल्कि यह घर की सफाई में एक संपूर्ण क्रांति है.

शक्तिशाली वैक्यूमिंग, बहुमुखी सफाई

ड्रीम मोवा K10 प्रो 120,000 RPM मोटर से लैस है जो 15,000 Pa तक की सक्शन पावर प्रदान करता है. यह धूल, गंदगी, टुकड़ों और यहाँ तक कि सबसे ज़िद्दी मलबे को भी कुशलता से समेट लेता है. यह शक्तिशाली मोटर आपके घर के हर कोने को बेदाग बनाए रखने में मदद करती है जबकि स्मार्ट डर्ट डिटेक्शन तकनीक समझदारी से गंदगी के प्रकार और मात्रा की पहचान करती है.

चाहे रात के खाने के बाद जल्दी सफाई हो, बारिश के बाद कीचड़ भरे पैरों के निशान हों या लिविंग रूम में बिखरे पालतू जानवरों के बाल हों, K10 Pro आसानी से इनका ध्यान रखता है. यह डिवाइस गीली और सूखी सफाई के बीच सहजता से बदलाव करता ह जिससे उपयोगकर्ता एक ही बार में वैक्यूम और पोछा लगा सकते हैं – जिससे समय और ऊर्जा दोनों की बचत होती है. यह दोहरी कार्यक्षमता मोवा K10 Pro को व्यस्त, आधुनिक घरों के लिए एक जरूरी उपकरण बनाती है.

सटीक सफाई के लिए विशेष सुविधाएँ

इसका डिजाइन किनारों और कोनों में 6 मिमी तक की सटीक सफाई सुनिश्चित करता है ताकि कोई गंदगी या अवशेष पीछे न छूटे. ट्विन स्क्रैपर सिस्टम इसके प्रदर्शन को और बेहतर बनाता है: आगे वाला स्क्रैपर बालों की उलझनों को सुलझाने और गंदगी को कुशलता से हटाने का काम करता है जबकि पीछे वाला रबर स्क्रैपर पानी के अवशेषों को कम करता है जिससे फर्श बेदाग और दाग-धब्बों से मुक्त रहता है.

यह अनोखा सिस्टम सुनिश्चित करता है कि बाल रोलर्स को जाम न करें जो कि ज्यादातर वैक्यूम क्लीनर्स की एक आम समस्या है.

लंबा रन टाइम और बड़ी क्षमता

ड्रीम मोवा K10 प्रो अपनी श्रेणी के सबसे बड़े स्वच्छ पानी के टैंकों में से एक – 890 मिलीलीटर – के साथ आता है. यह पर्याप्त क्षमता रीफिलिंग की आवृत्ति को कम करती है और बाधारहित सफाई अनुभव सुनिश्चित करती है. चाहे आप एक छोटे से अपार्टमेंट की सफाई कर रहे हों या बड़े घर की आप अपना काम एक ही बार में पूरा कर सकते हैं.

इस क्षमता को एक 7 × 2400mAh बैटरी पैक शक्ति प्रदान करता है जो लंबे समय तक चलने वाला रन टाइम और विश्वसनीय प्रदर्शन प्रदान करता है. ऑटो मोड में K10 Pro एक बार चार्ज करने पर 200 वर्ग मीटर तक की सतह को 30 मिनट तक कुशलतापूर्वक साफ कर सकता है जिस से गीली और सूखी दोनों तरह की गंदगी साफ हो जाती है. इसका मतलब है ज्यादा सफाई और कम इंतज़ार जो इसे गहरी सफाई के लिए एक बेहतरीन साथी बनाता है.

हल्का लेकिन मजबूत सफाई: सेल्फ-प्रोपेल्ड पावर ट्रैक्शन

सिर्फ़ 3.8 किलोग्राम वज़न के साथ मोवा K10 Pro हल्के वजन और मजबूत परफॉर्मेंस का बेहतरीन संगम है. इसे कमरों के बीच ले जाने से लेकर ऊपर ले जाने तक सफाई को आसान बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है. अपने कॉम्पैक्ट डिजाइन के बावजूद K10 Pro में 540 RPM क्लीनिंग मोटर के साथ ज़बरदस्त पावर है जो बिना किसी परेशानी के गीली और सूखी दोनों तरह की गंदगी को साफ कर देती है.

इसकी इस्तेमाल में आसानी के लिए सेल्फ-प्रोपेल्ड पावर ट्रैक्शन सिस्टम भी है. यह सफाई से जुड़े शारीरिक तनाव को कम करता है जिससे सफाई प्रक्रिया तेज़ और आसान हो जाती है. एर्गोनॉमिक हैंडल और लचीला स्विवेल डिज़ाइन गतिशीलता को और बेहतर बनाता है. एक्सप्रेसिववॉइस प्रॉम्प्ट और रीयल-टाइम इंटरैक्शन

एक्सप्रेसिव वॉइस प्रॉम्प्ट और रीयल-टाइम इंटरैक्शन

ड्रीम मोवा K10 प्रो सिर्फ़ सफ़ाई ही नहीं करता बल्कि संचार भी करता है. इस डिवाइस में ऑडिबल वॉइस प्रॉम्प्ट हैं जो उपयोगकर्ताओं को सफाई प्रक्रिया के दौरान मार्गदर्शन करते हैं, रीयल-टाइम अपडेट और रिमाइंडर प्रदान करते हैं. चाहे बैटरी कम होने का अलर्ट हो, टैंक फुल होने की सूचना हो या मोड बदलने की पुष्टि हो K10 प्रो आपको हर कदम पर सूचित रखता है.

इसके साथ ही एक आकर्षक एलईडी डिस्प्ले भी है जो बैटरी की स्थिति, सफाई मोड और रखरखाव अलर्ट जैसी ज़रूरी जानकारी प्रदान करता है. ये स्मार्ट फीचर मिल कर एक सहज सफ़ाई अनुभव प्रदान करते हैं ताकि आप ज़रूरी चीज़ों पर ध्यान केंद्रित कर सकें जबकि आपका K10 प्रो बाकी काम संभाल लेगा.

बिक्री के बाद सेवाएँ और वारंटी

Mova K10 Pro एक साल की वारंटी के साथ आता है. बिक्री के बाद सहायता टीम भी उपलब्ध है जो सुबह 9:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक (सोमवार-शनिवार) और सुबह 10:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक (रविवार) उपलब्ध है. कंपनी पिक-अप और ड्रॉप के साथ-साथ ऑन-साइट मरम्मत सेवाएं भी प्रदान करती है जो वर्तमान में भारत भर के 165 से अधिक शहरों में उपलब्ध हैं. वर्चुअल डेमो भी उपलब्ध हैं. ऑनलाइन प्रदर्शनों के माध्यम से ग्राहक अपने ड्रीमी उपकरणों को सेटअप और उपयोग करना सीख सकते हैं.

उपलब्धता और अनुभव क्षेत्र

ड्रीम मोवा K10 प्रो वेट एंड ड्राई वैक्यूम क्लीनर की कीमत ₹19,999 है और यह अमेज़न इंडिया और देश भर के क्रोमा स्टोर्स पर उपलब्ध है.

Dreame Mova K10 Pro

Kapil Sharma कलर्स पर लौटे और लाफ्टर शेप्स का बने हिस्सा

Kapil Sharma: वह पल आ चुका है, जो स्क्रीन पर किसी प्यारी सी याद की तरह लौटता महसूस होता है, जो एक झटके में माहौल खुशनुमा कर दे.

कपिल शर्मा कलर्स पर अपनी बहुप्रतीक्षित ‘घर वापसी’ के लिए पूरी तरह तैयार हैं. वही मंच जिस ने कभी उन्हें देशभर में स्टार बनाया था.

लंबी प्रतीक्षा

पूरे 11 साल बाद, टीवी के मनोरंजन सितारे ‘लाफ्टर शेफ अनलिमिटेड ऐंटरटेनमेंट’ में एक शानदार और बेहद चर्चित कमबैक करने जा रहे हैं. सीजन 3 पहले से ही अपने मसालेदार टैंपरिंग, हंसीमजाक और डिनरटेनमेंट के तड़के से धमाल मचा रहा हैं और अब कपिल की ऐंट्री के साथ स्क्रीन पर वही खास चार्म लौटने वाला है, जिसे सिर्फ वे ही ला सकते हैं.

कमबैक

इस कमबैक की मिठास तब और बढ़ जाती है, जब उन के साथ लौट रही है उन की आइकोनिक तिकड़ी कृष्णा अभिषेक और भारती सिंह, जिन के साथ मिल कर कभी कपिल ने भारतीय कौमेडी जगत पर राज किया था.

तीनों की बेफिक्र नोकझोंक, नैचुरल कौमिक तालमेल और अनफिल्टर्ड मस्ती अब एक बार फिर स्क्रीन पर जादू बिखेरने को तैयार है. इस बार लाफ्टर शेफ्स के उस किचन में जहां मसाले उड़ते हैं, सब्जियां तेजी से कटती हैं और हर पल कौमेडी से भरपूर अफरातफरी देखने को मिलती है.

नया सेटअप

कपिल पहली बार कलर्स के अपने किचन फैमिली ड्रामा में रचतेबसते नजर आएंगे, एक बिलकुल नया सेटअप, लेकिन कपिल की स्पौंटेनियस, फ्री-फ्लोइंग कौमेडी स्टाइल के लिए एकदम परफैक्ट मंच. जब प्रतियोगी जलतीउबलती कड़ाही, टफ प्रेप और मजेदार कुकिंग मुसीबतों के बीच दौड़तेभागते दिखेंगे.

कपिल अपनी सिग्नैचर पंचलाइंस, चटकदार टाइमिंग और शरारती ऊर्जा से हर सीन में तड़का लगाएंगे और हर मोमेंट को प्योर ऐंटरटेनमेंट बना देंगे.

दर्शकों के लिए यह एक ऐसी ट्रीट होने वाली है, जिस में होगी पुरानी यादों की खुशबू और कपिल के चुटीले वन लाइनर्स की भरपूर सर्विंग.

तो तैयार हो जाइए ‘लाफ्टर शेफ्स अनलिमिटेड ऐंटरटेनमेंट सीजन 3’  हर शनिवार और रविवार रात 9:00 बजे सिर्फ कलर्स पर.

Kapil Sharma

Big Boss Winner: गौरव खन्ना बने विनर, जानें क्या थी उनकी स्ट्रैटजी

Big Boss Winner: कलर्स चैनल का सबसे प्रसिद्ध रियलिटी शो बिग बौस पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध है, हर साल हिंदुस्तान के कोने-कोने से कई प्रतिभावान प्रतियोगी इस शो का हिस्सा बनते हैं, और इस शो की वजह से ग्लैमर इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाते हैं.

इस बार भी बिग बौस 19 काफी चर्चा में रहा खास तौर पर इसलिए कि इस बार के बिग बौस में लड़ाईझगड़े से ज्यादा कौमेडी, इमोशंस और दोस्ती का रिश्ता ज्यादा चर्चा में रहा.

पिछले कई सीजन से बिग बौस में वही दिखता और बिकता था जो लड़ाई झगड़ा करता है, गाली गलौज करता है ताकि वह चर्चा में बना रहे और आखिर तक दिखे लेकिन इस बार बिग बौस के इतिहास में कुछ अलग हुआ.

इस बार बिग बौस का हिस्सा बने गौरव खन्ना जो पिछले 20 सालों से टीवी इंडस्ट्री का चेहरा है, और टीवी के प्रसिद्ध सीरियल अनुपमा, सीआईडी, यह प्यार ना होगा कम जैसे कई प्रसिद्ध सीरियल में काम कर चुके हैं. हाल ही में मास्टर शेफ में जीत भी हासिल कर चुके हैं. जब बिग बौस में उनकी एंट्री हुई तो कई लोगों ने उनको बिग बौस के प्रतियोगी के लायक ही नहीं समझा, क्योंकि गौरव खन्ना शांत स्वभाव के हैं किसी से लड़ना झगड़ना उनको पसंद नहीं था, वह तभी बोलते थे जब जरूरत होती थी, ऐसे में कई लोगों का मानना था कि वह लंबे समय तक इस शो में नहीं टिक पाएंगे, लेकिन सभी को गलत साबित करके गौरव खन्ना ने मास्टरमाइंड के साथ ना सिर्फ बिग बौस 19 की जीत हासिल की , बल्कि गौरव खन्ना ने साबित किया कि बिना लड़ाई झगड़ा किए दिमाग से खेल कर भी जीत हासिल की जा सकती है.

गौरव खन्ना ने अपने मास्टरमाइंड के साथ ना सिर्फ बिग बौस की ट्रॉफी अपने नाम की बल्कि इसके साथ 50 लाख का इनाम भी जीता. इसके साथ ही गौरव खन्ना से प्रभावित शो के होस्ट सलमान खान ने गौरव खन्ना को अपनी फिल्म में काम देने का ऑफर भी दिया. इसके साथ ही गौरव खन्ना बिग बौस 19 के फाइनल में फरहाना भट्ट को हराकर होस्ट सलमान खान के हाथों से जीत का ताज पहनकर बिग बौस 19 के विनर घोषित हुए.

Women Objectification: क्या औरतों का काम सिर्फ सुंदर दिखना है?

Women Objectification: ‘मैं तो तंदूरी मुर्गी हूं यार, गटका ले सैंया अल्कोहल से…’ ‘तू बोतल है अजूल की…’ ‘लौलीपौप लागेलू…’ ऐसे जैये सैकड़ों गाने आप को मिल जाएंगे जहां औरतों को खानेपीने की चीज से जोड़ा गया हो. कभी रोमांटिक अंदाज में, कभी मजाकिया तो कभी आइटम सौंग स्टाइल में. हमारे समाज में औरतों को बचपन से ही एक खास नजरिए से देखा जाता है. चाहे वह परिवार हो, स्कूल हो या फिर मीडिया, हर जगह औरतों को एक ढांचे में फिट करने की कोशिश की जाती है.

बौलीवुड के गाने हों, टीवी विज्ञापन हों या फिर सोशल मीडिया हर जगह औरतों को अकसर एक चीज की तरह पेश किया जाता है जो या तो खूबसूरत या सैक्सी होनी चाहिए या फिर किसी मर्द के सपनों को पूरा करने वाली. इसे ही औब्जैक्टिफिकेशन कहते हैं यानी औरतों को इंसान कम और औब्जैक्ट ज्यादा सम?ा जाता है.

जब औरतों की बात आती है, तो उन्हें अकसर उन की खूबसूरती, उन के शरीर या उन की सैक्सुअल अपील के आधार पर जज किया जाता है. उन की बुद्धि, भावनाएं या इच्छाएं माने नहीं रखतीं. बौलीवुड और विज्ञापनों में यह ट्रेंड सालों से चला आ रहा है. औरतों की खानेपीने की चीजों से तुलना की जाती है जैसे तंदूरी मुर्गी या अजूल की बोतल.

बौलीवुड गानों में औरतों का औब्जैक्टिफिकेशन

फैविकोल से: इस गाने के बोल ‘मैं तो तंदूरी मुर्गी हूं यार, गटका ले सैंया अल्कोहल से…’ न सिर्फ औरत को खाने की चीज (तंदूरी मुर्गी) से तुलना करते हैं बल्कि उसे एक ऐसी चीज के तौर पर भी पेश करते हैं जो मर्दों के लिए उपभोग करने के लिए हैं. गाने में करीना का डांस और उन के कपड़े इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि वह सिर्फ मर्दों की नजरों को आकर्षित करें.

लौलीपौप लागेलू:

‘‘तू लगावेलू जब लिपस्टिक,

हिलेला आरा डिस्ट्रिक्ट,

जिला टौप लागेलू, हो जिला टौप लागेलू…’’

बोल में कमरिया करे लपालप, लौलीपौप लागेलू’ कह कर औरत की कमर को ऐसी चीज बताया गया है, जो लहराती है और मर्दों को लुभाती है. ये औरत को एक टेस्टी औब्जैक्ट बताता है.

लैला मैं लैला: इस गाने में सनी लियोनी को एक बार डांसर के तौर पर दिखाया गया है. गाने के बोल और सनी का डांस इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह सिर्फ मर्दों की नजरों के लिए एक आइटम बन जाए.

इन गानों में एक बात कौमन है कि औरत को सिर्फ उस की खूबसूरती, डांस या सैक्स अपील के लिए दिखाया जाता है. ये गाने औरत को एक ऐसी चीज बनाते हैं जो मर्दों के लिए देखने और मजा लेने के लिए हैं.

टीवी विज्ञापनों में औरतों का औब्जैक्टिफिकेशन

टीवी विज्ञापन भी इस मामले में पीछे नहीं हैं. चाहे वे डियोड्रैंट के ऐड हों, शैंपू केया फिर मोटरसाइकिल के, औरतों को अकसर एक सैक्सी औब्जैक्ट के तौर पर दिखाया जाता है जैसे-

डियोड्रैंट विज्ञापन (ऐक्स, वाइल्ड स्टोन आदि)

डियोड्रैंट के ज्यादातर विज्ञापनों में एक पैटर्न होता है कि एक लड़का डियो लगाता है और अचानक सारी लड़कियां उस की तरफ खिंची चली आती हैं. इन ऐड्स में औरतों को सिर्फ एक ऐसी चीज के तौर पर दिखाया जाता है जो मर्दों की खुशबू से कंट्रोल हो सकती हैं.

शैंपू और ब्यूटी प्रोडक्ट्स के विज्ञापन

शैंपू या क्रीम के विज्ञापनों में औरतों को हमेशा लंबे, चमकदार बालों या गोरी त्वचा के साथ दिखाया जाता है. डव या क्लीनिक प्लस जैसे ब्रैंड्स के ऐड में औरत को सिर्फ उस की खूबसूरती के लिए जज किया जाता है. अगर उस के बाल चमकदार नहीं तो वह अच्छी औरत नहीं. इन ऐड्स में यह मैसेज दिया जाता है कि औरत का काम है खूबसूरत दिखना और अगर वह ऐसा नहीं कर पाती तो वह नाकाम है.

मोटरसाइकिल और कार के विज्ञापन

कई बार मोटरसाइकिल या कार के विज्ञापनों में औरतों को सिर्फ एक ऐक्सैसरी की तरह दिखाया जाता है जैसे मोटरसाइकिल के कुछ पुराने ऐड में एक लड़के को बाइक चलाते दिखाया जाता है और उस के पीछे एक सैक्सी लड़की बैठी होती है. यहां औरत का रोल सिर्फ इतना है कि वह बाइक की कूलनैस को और बढ़ाए.

बचपन से शुरू हो जाता है यह खेल

बचपन से ही लड़कियों से कहा जाता है, ‘गोरी है तो शादी जल्दी हो जाएगी,’ ‘लड़की पतली होनी चाहिए, मोटी नहीं,’ ‘बहू ऐसी हो जो देखने में अच्छी लगे.’

जब औरतें बारबार यह देखती हैं कि उन की वैल्यू सिर्फ उन की खूबसूरती या सैक्स अपील में है तो वे खुद को उसी नजरिए से देखने लगती हैं. इस से उन के आत्मविश्वास पर असर पड़ता है. वे सोचने लगती हैं कि अगर वे खूबसूरत नहीं हैं तो उन की कोई वैल्यू नहीं है. ये गाने और विज्ञापन मर्दों के दिमाग में भी एक गलत छवि बनाते हैं. वे औरतों को सिर्फ एक औब्जैक्ट की तरह देखने लगते हैं न कि एक इंसान की तरह.

जैंडर स्टीरियोटाइप्स को बढ़ावा

औब्जैक्टिफिकेशन जैंडर स्टीरियोटाइप्स को और मजबूत करता है. औरतों को हमेशा खूबसूरत, सैक्सी या आकर्षक होना चाहिए जबकि मर्दों को पावरफुल और कंट्रोलिंग. ये स्टीरियोटाइप्स समाज में असमानता को और बढ़ाते हैं.

जब औरतों को सिर्फ एक सैक्सुअल औब्जैक्ट के तौर पर दिखाया जाता है तो यह यौन हिंसा को बढ़ावा देता है. मर्दों के दिमाग में यह बैठ जाता है कि औरतें उन के उपभोग करने की चीज है.

औरतों के अपने सपने हैं, अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं और अपनी पहचान है. लेकिन समाज का एक बड़ा हिस्सा उन्हें बारबार एक औब्जैक्ट में बदल देता है.

औरतों का औब्जैक्टिफिकेशन एक गहरी सामाजिक समस्या है जो बौलीवुड के गानों और टीवी विज्ञापनों में साफ दिखती है. यह न सिर्फ औरतों की छवि को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि समाज में जैंडर असमानता को भी बढ़ाता है.

Women Objectification

Grihshobha Inspire Awards से सम्मानित हुईं खास महिला हस्तियां

Grihshobha Inspire Awards: गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड में ऐसी महिला हस्तियों को सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने समाज को एक नया रास्ता दिखाया, महिलाओं के हक के लिए आवाज उठाई या फिर अपने काम से विश्व परिदृश्य में भारत का परचम लहराया. वैसी हिम्मती महिलाएं जिन्होंने अपने सामने आने वाली सभी मुश्किलों को पार कर एक नई राह बनाई. 25 मार्च को दिल्ली में इस के सफलतापूर्वक आयोजन के बाद अब नंबर था बैंगलुरु में इस के आयोजन का.

बैंगलुरु में गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड्स 2025 का आयोजन 3 नवंबर, 2025 को बैंगलुरु इंटरनैशनल सैंटर में किया गया, जिस में उन असाधारण महिलाओं को सम्मानित किया जिन्होंने अपने क्षेत्र में स्थाई प्रभाव डाला है. इस समारोह में लोक कला, शासन, सार्वजनिक नीति, सामाजिक प्रभाव, व्यवसाय, एसटीईएम, औटोमोटिव और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में निर्भीक, अग्रणी, परिवर्तनकारी और खास उपलब्धि हासिल करने वाली महिलाओं को सम्मानित किया गया.

प्रसिद्ध अभिनेत्री उर्वशी को मनोरंजन के माध्यम से सशक्तीकरण- आइकन के रूप में सम्मानित किया गया. उन्हें 750 से अधिक फिल्मों में उन के मजबूत और जटिल किरदारों के लिए और उन के बहुमुखी प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया. डा. कामिनी राव को एडिटर्स चौइस पुरस्कार से सम्मानित किया गया जिन्होंने चिकित्सा क्षेत्र में अग्रणी नेतृत्व और महिलाओं के स्वास्थ्य की उन्नति के लिए काम किया है. डा. सुनीता कृष्णन को सामाजिक प्रभाव आइकन के रूप में सम्मानित किया गया जिन्होंने न्याय, पुनर्वास और गरिमा के लिए अथक लड़ाई लड़ी और हजारों लोगों को तस्करी और यौन शोषण से बचाया है.

निगार शाजी को एसटीईएम आइकन के रूप में सम्मानित किया गया. आईएसआरओ के आदित्य- एल 1 मिशन की परियोजना निदेशक के रूप में निगार ने अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की बढ़ती नेतृत्व क्षमता का उदाहरण दिया है. अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कार विजेताओं में अभिनेत्री पार्वती थिरुवोथु जो अपने निर्भीक किरदारों के लिए जानी जाती हैं, को मनोरंजन के माध्यम से सशक्तीकरण के रूप में सम्मानित किया गया. जम्मा मल्लारी को ओग्गु कथा और अन्य मूल कला रूपों को संरक्षित और बढ़ावा देने के लिए अपने जीवन को समर्पित करने के लिए लोक कथा आइकन के रूप में सम्मानित किया गया. खेलों की दुनिया में भारत की पहली ओलिंपियन फेंसर सी.ए. भवानी देवी को सीमाओं से परे नई पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए स्पोर्ट्स अचीवर के रूप में सम्मानित किया गया और भारत की पहली मोटरस्पोर्ट विश्व चैंपियन ऐश्वर्या पिस्से को औटोमोटिव अचीवर के रूप में सम्मानित किया गया.

व्यवसाय जगत में हरकी की संस्थापक और सीईओ नेहा बगारिया को महिलाओं की कार्यबल भागीदारी के परिदृश्य को बदलने के लिए व्यवसाय अचीवर के रूप में सम्मानित किया गया और अपर्णा त्यागराजन को भारत की समृद्ध हैंडलूम विरासत को एक वैश्विक आंदोलन का रूप देने के लिए संपादक की पसंद पुरस्कार से सम्मानित किया गया. कीर्ति जयकुमार को एक सामाजिक प्रभाव अचीवर के रूप में सम्मानित किया गया. दिनाज वर्वतवाला और धिव्या विक्रम को डिजिटल कंटैंट क्रिएटर्स के रूप में सम्मानित किया गया. इस समारोह में यशोदा प्रकाश कोट्टुकाथिरा को मनोरंजन के माध्यम से सशक्तीकरण के रूप में सम्मानित किया गया.

दिल्ली प्रैस के प्रमुख संपादक और प्रकाशक परेश नाथ ने कहा, ‘‘गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड्स बैंगलुरु, विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने वाली महिला नेताओं को पहचानने और पुरस्कृत करने का हमारा प्रयास है. ये पुरस्कार उन लोगों को ट्रिब्यूट हैं जो और्डिनरी से संतुष्ट नहीं हैं, जो रचनात्मकता और साहस के साथ मानदंडों को चुनौती देते हैं और भविष्य को आकार देते हैं. ये पुरस्कार हमें याद दिलाते हैं कि सच्चा नेतृत्व उन लोगों के शांत लेकिन परिवर्तनकारी प्रभाव में है जो शक्ति के सामने सच बोलने और ईमानदारी से नेतृत्व करने का साहस करते हैं.’’

इस समारोह की मुख्य अतिथि मधु नटराज थीं जो एक पुरस्कार विजेता कोरियोग्राफर और आर्टप्रन्योर हैं. उन्होंने अपने प्रेरणादायक शब्दों से विजेताओं की उपलब्धियों और योगदान का सम्मान किया और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया. इस समारोह में प्रदर्शन करने वाली अनन्य गौर थीं जो एक कलाकार, संगीतकार, शोधकर्ता और वृत्तचित्र निर्माता हैं. उन की गायकी ने लोगों के दिलों को छू लिया. गृहशोभा, दिल्ली प्रैस द्वारा प्रकाशित, भारत की सब से अधिक पढ़ी जाने वाली हिंदी महिला पत्रिका है जिस के

1 मिलियन से अधिक पाठक हैं. 8 भाषाओं (हिंदी, मराठी, गुजराती, कन्नड़, तमिल, मलयालम, तेलुगु और बंगला) में प्रकाशित गृहशोभा होम मैनेजमैंट, फैशन, सौंदर्य, कुकरी, स्वास्थ्य और संबंधों पर कहानियों और लेखों का एक आकर्षक संग्रह है.

दिल्ली प्रैस भारत के सब से डाइवर्सिफाइड मैगजीन पब्लिशिंग हाउसेज में से एक है. इस के पब्लिकेशंस के पोर्टफोलियो में फैमिली औरिएंटेड, राजनीतिक और सामान्य हित पत्रिकाएं शामिल हैं, साथ ही महिलाओं, बच्चों और ग्रामीण लोगों के लिए पत्रिकाएं भी शामिल हैं. कुल 10 भाषाओं में 36 पत्रिकाओं के साथ दिल्ली प्रैस पूरे देश में अपनी मजबूत पहुंच रखता है.

Grihshobha Inspire Awards

Fictional Story: सूना संसार- सुनंदा आज किस रूप में विनय के सामने थी

Fictional Story: सुनंदा एयरपोर्ट पहुंच चुकी थी. लगेज बैल्ट पर अपना बैग आने का इंतजार करती हुई सोचने लगी, आज इतने सालों बाद लखनऊ आना ही पड़ा और जीवन की किताब का वह पन्ना, जो वह लखनऊ से मुंबई जाते हुए फाड़ कर फेंक गई थी, हवा के झोंके से उड़ आए पत्ते की तरह फिर उस के आंचल में आ पड़ा है. 5 साल बाद वह लखनऊ की जमीन पर कदम रखेगी, जहां से निकलते हुए उस ने सोचा था कि वह यहां कभी नहीं आएगी.

उसे इस बात का तो यकीन था कि बाहर उसे लेने विनय जरूर आया होगा. कैसा लगेगा इतने सालों बाद एकदूसरे को देख कर? कितना प्यार करता था उसे, कैसे जी पाया होगा वह उस के बिना? वह भी क्या करती, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं, अपनी भावनाओं को कैसे दबाती? विनय ने कैसे खुद को संभाला होगा, उस के बिखरे व्यक्तित्व को देख क्या सुनंदा को अपराधबोध नहीं होगा?

अपना बैग ले कर सुनंदा एयरपोर्ट से बाहर निकली, विनय ने उसे देख कर हाथ हिलाया. हायहैलो के बाद उस के हाथ से बैग ले कर विनय ने पूछा, ‘‘कैसी हो?’’

सुनंदा ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, वह बहुत स्मार्ट और फ्रैश नजर आ रहा था. बोली, ‘‘मैं ठीक हूं, तुम कैसे हो.’’

विनय ने मुसकरा कर कहा, ‘‘ठीक हूं.’’

सुनंदा ने चलतेचलते उसे बताया, ‘‘कल यहां मेरी एक मीटिंग है. सोचा, यहां आने पर तुम से मिल लेना चाहिए. बस, तुम्हारा नंबर मिलाया, वही नंबर था तो बात हो गई. और सुनाओ, लाइफ कैसी चल रही है?’’

‘‘बढि़या,’’ फिर पूछा, ‘‘जाना कहां है तुम्हें?’’

सुनंदा चौंकी, फिर बोली, ‘‘होटल क्लार्क्स अवध में मेरा रूम बुक है.’’

विनय ने पूछा, ‘‘टैक्सी से जाना चाहोगी या मैं छोड़ दूं?’’

सुनंदा मुसकराई, ‘‘यह भी कोई पूछने की बात है?’’

विनय ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की तो सुनंदा ने पूछा, ‘‘गाड़ी कब ली?’’

‘‘2 साल हुए.’’ उस के बराबर वाली सीट पर बैठ कर 5 साल पुराना समय सुनंदा की आंखों के आगे घूम गया. तब उस के स्कूटर पर बैठ कर वह उस के साथ कितना घूमी थी. विनय की कमर में हाथ डाल कर वह बैठती और वह धीरे से गरदन घुमा कर उस के गाल पर किस करता, तो वह टोकती थी, ‘‘आगे देखो, कहीं ऐक्सीडैंट न हो जाए.’’ विनय हंस कर कहता, ‘‘तो क्या हुआ, तुम्हें प्यार करतेकरते ही मरूंगा न, क्या बुरा है.’’

और आज वही विनय उसे कितना अजनबी लग रहा था. अचानक सुनंदा का कलेजा सुलगने लगा. शायद विनय बहुत नाराज होगा उस से. कितना सरलसहज जीवन था, जो विनय के आगोश में सुरक्षित सा था, पर महत्त्वाकांक्षाएं उछालें मार रही थीं. गृहस्थी की जिम्मेदारी भी कुछ ज्यादा नहीं थी, तब भी वह उस बंधन से मुक्ति मांग बैठी थी. रास्ते भर विनय औपचारिक बातें करता रहा. विनय ने होटल आने पर गाड़ी रोकी और कहा, ‘‘तुम्हारे पास मेरा फोन नंबर है ही, कोई जरूरत हो तो बताना. और हां, कब जाना है वापस?’’

‘‘परसों की फ्लाइट है, कल मीटिंग से फ्री होते ही फोन करूंगी, तब जरूर आ जाना.’’

‘‘नहीं, अभी चलता हूं, कल आऊंगा,’’ कह कर विनय चला गया.

सुनंदा अपने रूम में पहुंच कर फ्रैश हुई, फिर लैपटौप निकाला और अगले दिन की मीटिंग की तैयारी करने लगी.

एम.बी.ए. के बाद एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छे पद पर काम करना उस का सपना था और उस का वह सपना पूरा हो गया था. घरगृहस्थी उसे हमेशा बंधन लगती थी. उस ने सब से मुक्ति पा ली थी. विवाह के बाद एम.बी.ए. करने में विनय ने उसे भरपूर सहयोग दिया था. विनय की मां ने उस का पढ़ने का शौक देखते हुए घर की कोई जिम्मेदारी उस पर नहीं डाली थी और जब सुनंदा को एम.बी.ए. करते ही मुंबई में जौब का औफर मिला, तो उस ने सोचने में एक पल नहीं लगाया था. विनय लखनऊ छोड़ नहीं सकता था, उस ने सुनंदा को बहुत समझाया कि तुम योग्य हो, तुम्हें लखनऊ में ही और अवसर मिल सकते हैं, लेकिन सुनंदा को अपनी आत्मनिर्भरता और महत्त्वाकांक्षाओं को तिलांजलि देने की बात सोच कर ही घुटन होने लगती थी और जब सुनंदा को विनय और जौब में कोई तालमेल बनता नहीं दिखा, तो उस ने सब रिश्ते एक झटके में तोड़ कर विनय से तलाक की मांग कर दी थी.

विनय ने उसे बहुत समझाया था, लेकिन सुनंदा किसी तरह यह अवसर छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी और वह तलाक ले कर ही मानी थी. मुंबई आ कर वह अपने कैरियर में ऐसी व्यस्त हुई कि जीवन में आए खालीपन को भी भूल गई. उसे जितना मिलता, वह उस से संतुष्ट न होती. अधिक से अधिक पाने के लिए वह हर तरह से संघर्ष कर के अब उच्च पद पर आसीन थी. कुछ दिन वह कंपनी के फ्लैट में रही. अब उस ने अपना फ्लैट भी खरीद लिया था. अब उस के पास सारी सुविधाओं से युक्त घर था, गाड़ी थी, नौकर थे.

मेरठ में उस के मायके में सब उस से नाराज थे और विनय के मातापिता तो उस के तलाक के 1 वर्ष बाद ही जीवित नहीं रहे थे. इन सालों में वह कभी मेरठ भी नहीं गई थी. बस समय मिलने पर कभीकभी फोन कर लिया करती थी.

अगले दिन मीटिंग से फ्री होने पर उस ने विनय को फोन किया और मिलने के लिए बुलाया.

विनय ने कहा, ‘‘शाम को आ जाऊंगा..’’

सुनंदा तैयार हो कर उस का इंतजार करने लगी. सोफे पर बैठ कर आंखें मूंद कर अपने खयालों में गुम हो गई… इतने सालों में उस ने अपने दिलोदिमाग पर काबू तो पा लिया था काम की धुन में अपने को डुबो कर खुश रहने का दिखावा भी कर लेती थी, लेकिन प्यार भरा मन समुद्र सा उफनता रहता था. अपना सब कुछ लुटा कर खाली हो जाने को, किसी को अपनी चाहत में पूरी तरह भिगो देने को.

आज विनय को देख कर फिर दीवानी हो गई थी. उसे देखते ही उस के खयालों में खो गई थी. सोचती रही, क्या विनय भी उस के साथ के लिए बेचैन होगा. अगर हां, तो वह विनय से अपने व्यवहार के लिए माफी मांग लेगी. एक बार फिर उस के साथ जीवन शुरू करेगी. विनय उसे जरूर माफ कर देगा. वह उस से बहुत प्यार करता था. बहुत रह ली अकेली, चंचल नदी सागर में समा कर ही शांत होती है. सालों से पुरुषस्पर्श को तरस रहा उस का नारीमन भी आज अपना सर्वस्व त्याग कर आत्मोत्सर्ग कर शांत हो जाने को मचल उठा, विनय के साथ बीते पुराने दिनरात याद करतेकरते मिस्री की तरह कुछ मीठामीठा उस के होंठों तक आया और विनय के चेहरे को हाथों में भर चूमने की चाह से ही माथे पर पसीने की बूंदें आ गईं. वह अपनी मनोदशा पर हंस दी.

तभी डोरबैल बजी. सुनंदा ने लपक कर दरवाजा खोला और हैरान खड़ी रह गई. विनय एक लड़की के कंधे पर हाथ रख कर खड़ा था. लड़की की गोद में एक छोटा सा लगभग 2 साल का बच्चा था. विनय ने मुसकराते हुए परिचय करवाया, ‘‘यह नीता है मेरी पत्नी और हमारा बेटा राहुल और ये…’’

नीता मुसकराई, ‘‘आप के बारे में सब जानती हूं.’’

सुनंदा के चेहरे पर एक साया सा लहरा गया. उन्हें अंदर आने का इशारा करते हुए जबरन मुसकराई. उन्हें बैठने के लिए कह कर, उन से पूछ कर कौफी का और्डर दिया. बच्चा विनय की गोद में ही बैठा रहा.

सुनंदा स्वयं पर नियंत्रण रखती हुई बातें करती रही. बहुत ही मिलनसार, हंसमुख स्वभाव की नीता हंसतीबोलती रही. बीते समय की कोई बात किसी ने नहीं की. करीब 1 घंटा तीनों बैठे रहे. जाते समय नीता ने ही कहा, ‘‘अगली बार भी आएं तो मिल कर जाइएगा, अच्छा लगा आप से मिल कर.’’

उन के जाने के बाद सुनंदा बैड पर ढह सी गई. उस की आंखों के कोनों से आंसू ढलक पड़े. जिन चीजों को आधार बना कर उस ने अपने भविष्य को गढ़ा था, उन से यदि वह सुखी रह सकती, तो आज रोती ही क्यों? आज विनय का बसा हुआ सुखसंसार देखा तो लगा कि वह हार गई. अपनी सारी महत्त्वाकांक्षांओं को पूरा करने के बाद भी हार गई वह. क्या हो गया यह सब? वह हमेशा बहुत ऊंचा उड़ने की सोचती रही, विनय का प्यार, विनय की बच्चे के लिए चाह, घरगृहस्थी के कामकाज, विनय की रुचि, शौक, पसंदनापसंद सब में उसे सहभागी होना चाहिए था. तभी पनपता वह प्यार, जो उस ने नीता की आंखों में लबालब देख लिया था. वही प्यार, जो वह सुनंदा को देना चाहता था, पर अब वह पूरी तरह नीता को समर्पित है.

हां, यह प्यार ही तो है, जिसे वह ठुकरा कर चली गई थी. यही तो वह सिलसिला है, जो आगे चल कर एक सुखीसफल लंबे वैवाहिक जीवन की नींव बनता है. उस ने तो नींव रखी ही नहीं थी और अब तो ध्वस्त अवशेषों पर आंसू ही बहाने हैं. क्या पाया उस ने और क्या खो दिया? यश, नाम, रुपया, आजादी जैसे बड़े शब्द वह प्राप्ति के पलड़े में रख सकती है. पर दूसरे पलड़े में एक सुंदर घर, प्यार करने वाला पति, एक हंसतामुसकराता बच्चा आ कर बैठ जाता है, तो वह पलड़ा इतना भारी होता चला जाता है कि जमीन छूने लगता है. दूसरे पलड़े के शून्य में झूलने का एहसास बहुत कड़वा लग रहा है.

Fictional Story

Long Story in Hindi: प्रतियोगिता

Long Story in Hindi: रोज की तरह आज भी शैली सुबहसुबह सोसाइटी के पार्क में टहलने के लिए पहुंची. 32 साल की शैली खुले बालों में आकर्षक लगती थी. रंग भले ही सांवला था मगर चेहरे पर आत्मविश्वास और चमक की वजह से उस का व्यक्तित्व काफी आकर्षक नजर आता था. वह एक सिंगल स्मार्ट लड़की थी और एक कंपनी में काफी ऊंचे पद पर काम करती थी. उसे अपने सपनों से प्यार था. शैली करीब 3 महीने पहले ही इस सोसाइटी में आई थी.

खुद को फिट और हैल्दी बनाए रखने के लिए वह हर संभव प्रयास करती. हैल्दी खाना और हैल्दी लाइफ़स्टाइल अपनाती. रोज सुबह वॉक पर निकलती तो शाम में डांस क्लास के लिए जाती. आज ठंड ज्यादा थी सो उस ने वार्मर के ऊपर एक स्वेटर भी पहन रखा था. टहलतेटहलते उस की नजरें किसी को ढूंढ रही थीं. रोज की तरह आज वह लड़का उसे कहीं नजर नहीं आ रहा था जो सामने वाली फ्लैट में रहता था और रोज इसी वक्त टहलने के लिए आता था. टीशर्ट के ऊपर पतली सी जैकेट और स्लीपर्स में भी वह लड़का शैली को काफी स्मार्ट नजर आता था.

अभी दोनों अजनबी थे. इसलिए बस एकदूसरे को निगाह भर कर देखते और आगे बढ़ जाते. इधर कुछ दिनों से दोनों के बीच हल्की सी मुस्कान का आदानप्रदान भी होने लगा था. आज उस लड़के को न देख कर शैली थोड़ी अचंभित थी क्योंकि मौसम कैसा भी हो, कुहासे की चादर फैली हो या फिर बारिश हो कर चुकी हो, वह लड़का जरूर आता था. अगले दो दिनों तक शैली को वह नजर नहीं आया तो शैली उस के लिए थोड़ी चिंतित हो गई. कोई रिश्ता न होते हुए भी उस लड़के के लिए वह एक अपनापन सा महसूस करने लगी थी. वह सोचने लगी कि हो सकता है उस के घर में कोई बीमार हो या वह कहीं गया हुआ हो.

तीसरे दिन जब वह लड़का दिखा तो शैली एकदम से उस के करीब पहुँच गई और पूछा,” आप कई दिनों से दिख नहीं रहे थे, सब ठीक तो है?”

“कई दिनों से कहां, केवल 2 दिन ही तो… ”

“हां वही कह रही थी. सब ठीक है न? ”

“यस एवरीथिंग इज फाइन. थैंक यू…  वैसे आज मुझे पता चला कि आप मुझे औब्जर्व भी करती हैं,” चमकीली आंखों से देखते हुए उस ने कहा.

“अरे नहीं वह तो रोज देखती थी न..,” शैली शरमा गई.

” एक्चुअली मेरे नौकर की बेटी बीमार थी. उसी के इलाज के चक्कर में हॉस्पिटलबाजी में लगा था,” उस लड़के ने बताया.

“आप अपने नौकर की बेटी के लिए भी इतनी तकलीफ उठाते हैं?” आश्चर्य से शैली ने पूछा.

” क्यों नहीं आखिर वह भी हमारे परिवार की सदस्य जैसी ही तो है.”

“नाइस. आप के घर में और कौनकौन है?”

“बस अपनी मां के साथ रहता हूं. पत्नी से तलाक हुए 3 साल हो चुके हैं. .., ” कहते हुए उस लड़के ने परिचय के लिए हाथ बढ़ाया.

शैली ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,” मैं यहां अकेली ही रहती हूं, अब तक शादी नहीं की है. मेरा नाम शैली है और आप का?”

” माईसेल्फ रोहित. नाइस टू मीट यू.”

इस के बाद काफी समय तक दोनों वाक करने के साथ ही बातें करते रहे. आधे घंटे की वाक पूरी करतेकरते दोनों के बीच अच्छीखासी दोस्ती हो गई. मोबाइल नंबर का आदानप्रदान भी हो गया. अब दोनों फोन पर भी एकदूसरे से कनेक्टेड रहने लगे. धीरेधीरे दोनों की जानपहचान गहरी दोस्ती में बदल गई. दोनों को ही एकदूसरे का साथ बहुत पसंद आने लगा. दोनों फिटनेस फ्रीक होने के साथ स्ट्रांग मेंटल स्टेटस वाले लोग थे. दूसरों की परवाह न करना, अपने काम से काम रखना, रिश्तों को अहमियत देना और काम के साथसाथ स्टाइल में जीवन जीना. जीवन के प्रति दोनों की ही सोच एक जैसी थी. वे काफी समय साथ बिताने लगे. वक्त इसी तरह गुजरता जा रहा था.

इधर उन दोनों की दोस्ती सोसाइटी में बहुत से लोगों को नागवार गुजर रही थी. खासकर रोहित की पड़ोसन माला बहुत अपसेट थी. उस की कभी कभार शैली से भी बातचीत हो जाती थी. उस दिन भी शैली घर लौट रही थी तो रास्ते में वह मिल गई.

फॉर्मल बातचीत के बाद माला शुरू हो गई,” यार मैं ने कितनी कोशिश की कि रोहित मुझ से पट जाए. उस के लिए क्याक्या नहीं किया. कभी उस की पसंद का खाना बना कर उस के घर ले गई तो कभी उस के लिए अपने बालों की स्मूथनिंग कराई. कभी उसे रिझाने के लिए एक से बेहतर एक कपड़े खरीदे तो कभी उस के पीछे अपना पूरा दिन बर्बाद किया. मगर उस ने कभी मेरी तरफ ढंग से देखा भी नहीं. देख जरा कितनी खूबसूरत हूं मैं. कॉलेज में सब मुझे मिस ब्यूटी कहते थे. एक बात और जानती है, उस की तरह मैं भी राजपूत हूं. उबलता हुआ खून है हम दोनों का. मगर देख न मेरा तो चक्कर ही नहीं चल सका. अब तू बता, तूने ऐसी कौन सी घुट्टी पिला दी उसे जो वह….”

जो वह ..? क्या मतलब है तुम्हारा?”

“मतलब तुम दोनों के बीच इलूइलू की शुरुआत कैसे हुई? ”

“देखिए इलूविलू मैं नहीं जानती. मैं बस इतना जानती हूं कि वह मेरा दोस्त बन चुका है और हमेशा रहेगा. इस से ज्यादा न मैं जानती हूं न तुम से या किसी और से सुनना या बात करना चाहती हूं,”  टका सा जवाब दे कर शैली अपने फ्लैट में घुस गई.

शैली के जाते ही पड़ोस की रीमा आंटी माला के पास आ गई. माला गुस्से में बोली,” आंटी तेवर तो देखो इस के. सोसाइटी में आए दिन ही कितने बीते हैं और इस चालाक लोमड़ी ने रोहित को अपने जाल में फंसा लिया.”

“बहुत ऊंचा दांव खेला है इस लड़की ने. सोचा होगा कि इस उम्र में कुंवारे कहां मिलेंगे. चलो तलाकशुदा को ही पकड़ लिया जाए और तलाकशुदा जब रोहित जैसा हो तो कहना ही क्या. धनदौलत की कमी नहीं. देखने में भी किसी चार्मिंग हीरो से कम नहीं लगता. मैं ने तो अपनी नेहा के लिए इस से कितनी बार बात करनी चाही पर यह हमेशा ऐसा नादान बन जाता है जैसे कुछ समझ ही न रहा हो.”

“नेहा कौन आंटी, आप की भतीजी?”

“हां वही. जब भी मेरे घर आती है तो रोहित की ही बातें करती रहती है. रोहित के घर भी जाती है, उस की मां से भी अच्छी फ्रेंडशिप कर ली है, पर वह उसे भाव ही नहीं देता.”

“आंटी नेहा तो अभी बच्ची है. आप उस के लिए कोई और लड़का देख लीजिये. मैं तो अपनी बात कर रही थी. बताओ मुझ में क्या कमी है?” माला ने पूछा.

“सही कह रही है माला. मेरे लिए तो जैसे नेहा है वैसी ही तू है. मेरी नेहा न सही वह तुझ से ही शादी कर ले तो भी मैं खुश हो जाउंगी. फूल सी बच्ची है तू भी पर आजकल तेरी शक्ल पर 12 क्यों बजे रहते हैं? कई दिनों से ब्यूटी पार्लर नहीं गई क्या?” रीमा आंटी ने माला को गौर से देखते हुए कहा.

“हां आंटी आप सच कह रही हो. कल ही पार्लर जा कर आती हूं. अपना लुक बिल्कुल ही बदल डालूंगी फिर देखूंगी रोहित कैसे मुझे छोड़ कर किसी और पर नजर भी डालता है?”

“सही है. मैं भी अपनी नेहा के लिए लेटेस्ट फैशन के कुछ कपड़े और ज्वेलरी लाने जाने वाली हूं,” आँख मारते हुए आंटी ने कहा तो दोनों हंस पड़ी.

शैली और रोहित को साथ देख कर इन की तरह कुछ और लोगों के सीने पर भी सांप लोटने लगे थे. शैली के बगल में रहने वाली देवलीना आंटी को अपने बेटे के लिए शैली बहुत पसंद थी. जॉब करने वाली इतनी कॉन्फिडेंट और खूबसूरत लड़की को ही वह अपनी बहू बनाना चाहती थी. शैली दिखने में आकर्षक होने के साथसाथ एक कमाऊ लड़की भी थी. जब कि उन के इकलौते बेटे पीयूष का बिज़नेस ठीक नहीं चल रहा था. जाहिर था कि अगर शैली उन के घर में आ जाती तो सब कुछ चमक जाता. इसी चक्कर में पिछले 2 महीने से उन्होंने अपने बेटे के लुक पर मेहनत करनी शुरू कर दी थी. उन के बेटे का पेट थोड़ा निकला हुआ था. वह एक्सरसाइज वगैरह से दूर भागता था जब कि शैली को उन्होंने जिम जाते और मॉर्निंग वॉक करते देखा था.

देवलीना आंटी ने बेटे को जिम भेजना शुरू कर दिया था ताकि वह भी आकर्षक नजर आए. इस बीच शैली और रोहित को साथ मॉर्निंग वाक करते देख आंटी के मन में कंपटीशन की भावना बढ़ने लगी.

सुबह 7 बजे भी बेटे को सोता देख कर उन्होंने उस की चादर खींची और चिल्लाती हुई बोली,” रोहित जानबूझ कर शैली के साथ वॉक करने लगा है ताकि उस के करीब आ सके और एक तू है…  तू क्या कर रहा है ? चादर तान कर सो रहा है? चल उठ और पता कर कि शैली जिम करने किस समय जाती है. कल से तुझे भी उसी समय जिम जाना होगा.”

बेटे ने भुनभुनाते हुए चादर फिर से ओढ़ ली और बोला,” यार मम्मी मुझे नहीं जाना जिमविम.”

“समय रहते चेत जा लड़के. ऐसी लड़की घर की बहू बन कर आ गई तो पैसों की कमी नहीं रहेगी. तेरा बिजनेस तो सही चलता नहीं है, कम से कम बहू तो कमाऊ ले आ. चल उठ मैं ने कोई बहाना नहीं सुनना. खुद तो बात आगे बढ़ा नहीं पाता बस उसे देख कर दांत भर निकाल देता है. कभी यह कोशिश नहीं करता कि कैसे उसे अपने प्यार में पागल किया जाए.”

” ओह मम्मी, प्यार ज़बरदस्ती नहीं किया जाता. जिस से होना होगा हो जाएगा.”

” तो क्या बुढ़ापे में प्यार होगा और शादी भी बुढ़ापे में करेगा?”

” मम्मी अरैंज मैरिज कर लूंगा. डोंट वरी. मुझे सोने दो,” उनींदी आवाज़ में पियूष ने कहा और करवट बदल कर सो गया.

आंटी को गुस्सा आ गया. इस बार उन्होंने एक गिलास पानी उस के मुंह पर उड़ेल दिया और चिल्लाईं,” चल उठ और जिम हो कर आ. चल जा… ”

शैली को रोहित के साथ देख कर ऐसी हालत केवल देवलीना आंटी की ही नहीं थी बल्कि कुछ और लोग भी थे जो शैली को अपनी बहू या बीवी बनाने के सपने देख रहे थे. उन के दिल में भी रोहित को ले कर प्रतियोगिता की भावना घर करने लगी थी. सब अपनेअपने तरीके से इस प्रतियोगिता को जीतने की कोशिश में लग गए.

निलय मित्तल तो शैली के घर ही पहुंच गए. शैली का निलय जी से सिर्फ इतना ही परिचय था कि वह इसी सोसाइटी में रहते हैं और किसी कंपनी में मैनेजर हैं. उन्हें अपने घर देख कर शैली चकित थी.

चाय वगैरह पूछने के बाद शैली ने आने की वजह पूछी तो निलय मित्तल बड़े प्यार से शैली से कहने लगे, “बेटा तू जिस कंपनी में  है उस में मेरा दोस्त भी काम करता है. उस ने तेरे बारे में एक बार बताया था. इतनी कम उम्र में तूने कंपनी में अपनी खास जगह बना ली है. मेरा बेटा विकास भी इसी फील्ड में है. तभी मैं ने सोचा कि तुम दोनों की दोस्ती करा दूँ. वैसे तो दोनों ऑफिस चले जाते हो सो एकदूसरे से मिल नहीं पाते. मगर यह तुझे कभी भी आतेजाते देखता है तो तारीफ करता है. मेरी वाइफ भी तुझे पसंद करती और जानती है हम भी इलाहाबाद के वैश्य परिवार से ताल्लुक रखते हैं. हम भी महाराजा अग्रसेन के वंशज हैं. तेरे घर के बुजुर्ग हमारे परिवार को जरूर जानते होंगे”

” जी अंकल हो सकता है. मुझे आप से और विकास से मिल कर अच्छा लगा. कभी जरूरत पड़ी तो मैं विकास को जरूर याद करूंगी.”

” अरे बेटा कभी जरूरत पड़ी की क्या बात है ? हम एक ही जगह से हैं, तुम दोनों एक ही फील्ड के हो, एक ही जाति के भी हो. आपस में मिलते रहा करो. समझ रही है न बेटी? मेरा विकास तो बहुत शर्मीला है. तुझे ही बात करनी होगी. स्विमिंग पूल के बगल वाली बिल्डिंग के पांचवें फ्लोर पर हम रहते हैं. मैं तो कहता हूं आज रात तू हमारे यहां खाने पर आ जा.”

” जी अंकल बिल्कुल मैं ख्याल रखूंगी मगर खाने पर नहीं आ पाऊंगी क्योंकि मुझे आज ऑफिस में देर हो जाएगी. अच्छा अंकल मुझे अभी ऑफिस के लिए निकलना होगा. आप बताइए चायकॉफी कुछ बना दूं ?” शैली ने पीछा छुड़ाने की गरज से कहा.

” अरे नहीं बेटा. बस तुझ से ही मिलने आए थे.”

शैली की बिल्डिंग के सब से ऊपरी फ्लोर पर रहने वाले गुप्ता जी भी एक दिन लिफ्ट में मिल गए. वह शैली से पूछने लगे, “तुम इलाहाबाद की हो न.”

“जी,” शैली ने जवाब दिया.

“मेरा दोस्त भी उधर का ही है और वह भी बनिया ही है . उस के बेटे की फोटो दिखाता हूं. यह देख कितना स्मार्ट है. तुझे बहुत पसंद करता है,” गुप्ता जी ने मौका देखते ही निशाना साधने की कोशिश की थी.

“अरे यह तो सूरज है. मैं जब बास्केटबॉल खेलने जाती हूं तो एक कोने में खड़े रह कर मुझे देखता रहता है. जिम जाती हूं तब भी नजर आता है और ऑफिस जाते समय भी…” शैली ने उसे पहचानते हुए कहा.

“तू गौर करती है न इस पर, असल में यह बस तुझे नजर भर कर देखने को ही तेरा पीछा करता है. दिल का बहुत अच्छा है बस बोल नहीं पाता.”

“पर अंकल मैं तो इसे स्टॉकर समझ कर पुलिस में देने वाली थी. ”

“अरे बेटा यह कैसी बात कर रही है? यह तो बस इस का प्यार है,” गुप्ता जी ने समझाने के अंदाज़ में कहा.

“बहुत अजीब प्यार है अंकल. इसे कहिए थोड़ा ग्रूम करे,” कह कर हंसी छिपाती शैली वहां से निकल गई.

इस तरह शैली और रोहित की दोस्ती ने सोसायटी के बहुत सारे लोगों के दिलों में दर्द पैदा कर दिया था. शैली और रोहित इन लोगों के बारे में एकदूसरे को बता कर खूब हंसते. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन की दोस्ती इतने लोगों के दिलोदिमाग में खलबली मचा देगी. दोनों एकदूसरे का साथ एंजॉय करते. अब वे सोसाइटी के बाहर भी एकदूसरे से मिलने लगे थे. धीरेधीरे उन के बीच की दोस्ती प्यार में तब्दील होने लगी. दोनों काबिल थे. एकदूसरे को पसंद करते थे. रोहित की मां को भी इस रिश्ते से कोई गुरेज नहीं था.

उस दिल शैली का जन्मदिन था. रोहित ने तय किया था कि वह इस बार शैली को बर्थडे पर सरप्राइज देगा. इस के लिए उस ने एक रिसोर्ट बुक कराया. शानदार तरीके से उस का बर्थडे मनाया. रात 12 बजे केक काटा गया.

उस रात रोहित ने प्यार से शैली से पूछा,” आज के दिन तुम मुझ से जो भी मांगोगी मैं उसे पूरा करूंगा. बताओ तुम्हें मुझ से क्या चाहिए?”

“रियली ?”

“यस ”

“तो फिर ठीक है. मुझे आज कुछ लोगों की आंखों का सपना छीन कर उसे अपना बनाना है.”

“मतलब ?”

” मतलब जिन की आंखों में तुम्हें या मुझे ले कर सपने सजते रहते हैं उन्हें उन के सपनों से हमेशा के लिए दूर करना है. उन सपनों को अपनी आंखों में सजाना है यानी तुम्हें अपना बनाना है,” एक अलग ही अंदाज में शैली ने कहा और मुस्कुरा उठी.

रोहित को जैसे ही बात समझ में आई तो उस ने शैली को अपनी बाहों में भर लिया और उसी अंदाज में बोला,” तो ठीक है सपनों को नया अंजाम देते हैं. इस रिश्ते को प्यारा सा नाम देते हैं. ”

दोनों की आँखों में उमंग भरी एक नई जिंदगी की मस्ती घुल गई और दोनों एकदूसरे में खो गए. एक महीने के अंदर शादी कर शैली रोहित की बन गई और इस के साथ ही बहुतों के सपने एक झटके में टूट गए.

Long Story in Hindi

Hindi Drama Story: पासवर्ड- क्या आगे बढ़ पाया प्रकाश और श्रुति का रिश्ता

Hindi Drama Story: लिफ्ट की साफसफाई चल रही थी, इसलिए प्रकाश तीसरी मंजिल पर स्थित अपने फ्लैट में जाने के लिए सीढि़यां चढ़ने लगा. वह 2-4 सीढि़यां चढ़ा ही था कि उसे लगा उस के पीछे कोई आ रहा है.

उस ने पलट कर देखा तो उस के पीछे एक लड़की सीढि़यां चढ़ रही थी. उस ने उसे देखा तो उस की नजर उस के चेहरे से फिसल कर कहीं और ही मुड़ गई. उसे यह अनुभव पहली नजर में ही नहीं बल्कि उस ने जब भी लड़की को देखा, तबतब हुआ था. पता नहीं उस के चेहरे में ऐसा क्या था कि वह जब भी दिखाई दे जाती, अनायास प्रकाश की आंखें उस की ओर चली जाती थीं. मगर टिकी नहीं रहती थीं. क्या यह उस के आकर्षण की वजह से था. लेकिन उसे लगता था, आकर्षण के अलावा भी उस में कुछ और था.

सहज आत्मविश्वास और हर किसी के प्रति अवहेलना का भाव. अपने आकर्षक होने की सहज अनुभूति और मिलीजुली मासूमियत. जैसे उसे इस बात का गहरा अहसास हो कि वह युवा है, पर उसे इस का अहसास न हो कि जवानी क्या है. उस के चेहरे का खोजता हुआ भाव उस की सुंदरता को और बढ़ा देता था. उस की आंखों से ऐसा लगता था, जैसे वह बाहर कम अपने अंदर ज्यादा देखती है. चुस्त जींस और चुस्त टौप, मानो उस ने अपनी नजरों से नहीं, दूसरों की नजरों से प्रकाश की ओर देखा हो.

उस के बड़ेबड़े बालों और सुंदर चेहरे की बड़ीबड़ी आंखों के अलावा प्रकाश की नजर फिसल कर जहां मुड़ी थी, वह उसी में खो गया था, जिस की वजह से उस की चाल धीमी हो गई थी. पर उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा था. वह उसी तरह तेजी से सीढि़यां चढ़ती हुई उस के बगल से निकल गई.

प्रकाश को लगा, अब उसे भी चाल बढ़ानी होगी. क्योंकि अब वह यह देखे बिना नहीं रह सकता था कि वह किस फ्लैट में जाती है.यह जानने के लिए प्रकाश ने अपनी चाल बढ़ा दी. वह उसी तीसरी मंजिल पर पहुंच कर रुक गई, जहां प्रकाश को जाना था. वह फ्लैट नंबर था 303. प्रकाश का फ्लैट नंबर 301 था. वह लड़की सामने वाले फ्लैट में आई है, यह जान कर उसे बहुत खुशी हुई. पर यह कौन है, क्योंकि उस फ्लैट में प्रकाश ने उसे आज पहली बार देखा था.

उसे लगा, कोई रिश्तेदार होगी, किसी काम से आई होगी. वह प्रकाश के मन को भा गई थी, इसलिए एक बार और देखने के लोभ में उस ने अपने फ्लैट का मुख्य दरवाजा खुला छोड़ दिया. इस में वक्त ने उस का साथ यह दिया कि उस दिन उस के फ्लैट में कोई नहीं था. सभी एक शादी में गए हुए थे. प्रकाश दरवाजे के बाहर नजरें टिकाए बेचैनी से ताक रहा था कि वह बाहर निकले ताकि वह उसे एक नजर देख ले.

घंटों बीत गए, पर वह नहीं निकली. वह टकटकी लगाए उस के फ्लैट का दरवाजा ताकता रहा. धीरेधीरे वह निराश होने लगा.

पर शाम होते ही फ्लैट का दरवाजा खुला. प्रकाश के शरीर में जैसे जान आ गई. एक बार उसे और देखने के लिए वह फुरती से उठा और बाहर आ गया. तब तक वह लिफ्ट में घुस गई थी. प्रकाश ने फटाफट दरवाजा लौक किया और लिफ्ट के चक्कर में न पड़ कर तेजी से सीढि़यां उतरने लगा. उस के ग्राउंड फ्लोर पर पहुंचने के साथ ही लिफ्ट भी नीचे पहुंच गई थी. लिफ्ट का दरवाजा खोल कर वह बाहर निकली और सामने सड़क की ओर चल पड़ी.

लड़की के रेशम जैसे काले लंबे बाल, सुडौल देह, वह लड़की सुंदर ही नहीं प्रकाश को अद्भुत भी लगी. उस की चाल गजब की थी. उसे देख कर कोई भी उस के प्रेम में पड़ सकता था. प्रकाश की नजर उस पर से हट नहीं रही थी. वह मेनरोड पार कर के सामने दुकान पर पहुंच गई. अब प्रकाश उसे सामने से मन भर कर देखना चाहता था. इसलिए वह वहीं सोसाइटी के गेट पर खड़ा रहा. उसे सामने से आता देख वह खो गया.

इस के बाद तो क्रम सा बन गया. प्रकाश उस के आगेपीछे चक्कर लगाने लगा. इसी के साथ उस ने लड़की के बारे में एकएक जानकारी जुटा ली. उस का नाम श्रुति था. उस के सामने वाले फ्लैट में उस की मौसी रहती थीं. वह मौसी के यहां रह कर बीटेक की अपनी पढ़ाई कर रही थी. इस के पहले वह हौस्टल में रह कर पढ़ रही थी. वहां कोई बवाल हो गया था, जिस की वजह से वह मौसी के यहां रहने आ गई थी.

प्रकाश ने उस से बात करने की कोशिश शुरू कर दी. पर उस की बातों का वह छोटा सा जवाब दे कर उसे टाल देती थी. फिर भी वह उस के पीछे पड़ा रहा. प्रकाश अकसर देखता, वह उस के फ्लैट के दरवाजे के पास खड़ी हो कर अपने मोबाइल में कुछ करती रहती थी. ऐसे में जब प्रकाश से उस का सामना होता तो धीरे से मुसकरा देती. इस से प्रकाश को लगा कि शायद वह उसे पसंद करने लगी है. पर क्यों, यह उसे पता नहीं था.

पर एक दिन जब प्रकाश ने अपने ओपन वाईफाई में पासवर्ड सेट कर दिया तो सच्चाई का पता चल गया. उस के पासवर्ड सेट करने के बाद जब वह बाहर निकला तो वह उस की ओर बढ़ी. उसे अपनी ओर आते देख प्रकाश के दिल की धड़कन बढ़ गई. शरीर में रोमांच सा हुआ.

प्रकाश के पास आ कर उस ने अपनी आवाज में शहद सी मिठास लाते हुए कहा, ‘‘आप अपने वाईफाई का पासवर्ड दे देंगे क्या?’’

‘‘क्यों नहीं, श्योर. लाइए, मैं आप के मोबाइल में कनेक्ट कर देता हूं.’’

श्रुति ने मोबाइल दिया, तो प्रकाश ने कांपते हाथों से वाईफाई का पासवर्ड सेट कर दिया. उस ने थैंक्स कहते हुए उस का मोबाइल नंबर मांगा तो प्रकाश ने फटाफट अपना नंबर सेव करा दिया. प्रकाश ने उस का नंबर मांगा तो उस ने भी बेहिचक अपना नंबर बता दिया. प्रकाश को उस का नाम पता था, फिर भी बात को आगे बढ़ाने के लिए उस ने उस का नाम पूछा.

‘‘मेरा नाम श्रुति है.’’ कह कर वह चली गई.

नंबर मिलने के बाद प्रकाश वाट्सऐप पर गुडमौर्निंग और गुडनाइट के मैसेज भेजने लगा. श्रुति की ओर से बराबर जवाब भी आता था. अकसर जानबूझ कर प्रकाश पासवर्ड बदल देता था. श्रुति का तुरंत फोन आ जाता था. कभीकभार वह वाट्सऐप पर मैसेज कर के पूछ लेती थी. एक दिन पासवर्ड बदल कर जैसे ही प्रकाश बाहर निकला, श्रुति सामने आ गई. उस ने पासवर्ड पूछा तो जवाब में प्रकाश ने कहा, ‘‘आई लव यू.’’

गुस्सा हो कर श्रुति ने कहा, ‘‘मैं वाईफाई का पासवर्ड पूछ रही हूं और तुम ‘आई लव यू’ कह रहे हो. तुम इस तरह की बात करोगे, मैं ने कभी सोचा भी नहीं था.’’

इस के अलावा भी श्रुति ने बहुत कुछ कहा. प्रकाश जवाब में जो कुछ कहना चाहता था, वह उसे सुनने को तैयार ही नहीं थी. अपनी बात कह कर वह पैर पटकती हुई चली गई. प्रकाश ने वाट्सऐप पर रिक्वेस्ट की, पर उस ने मैसेज खोल कर देखा ही नहीं. अंत में प्रकाश ने टेक्स्ट मैसेज भेजा कि ‘आई लव यू’ मैं ने तुम्हें नहीं कहा, वह तो वाईफाई का पासवर्ड है.

अगले दिन श्रुति मिली तो उस ने कहा, ‘‘तुम ने ऐसा जानबूझ कर किया था न? ऐसा कर के मुझे परेशान किया. तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. तुम्हें बता दूं कि मुझे ऐसी बातों में रुचि नहीं है.’’

‘‘अगर किसी को किसी से पहली नजर में प्यार हो जाए तो…’’ प्रकाश ने कहा.

‘‘और दूसरी नजर में ब्रेकअप हो जाए तो…’’ जवाब में श्रुति ने कहा.

‘‘यह तुम्हारा वहम है.’’

‘‘और प्रेम हो जाए यह?’’ श्रुति ने कहा.

‘‘यह मेरा अनुभव है. किस से हुआ है प्रेम?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘मैं यह नहीं बताऊंगी. पर हुआ है, यह निश्चित है.’’

‘‘क्यों नहीं बता सकती?’’ प्रकाश ने सवाल कर दिया.

‘‘अगर वह मांगे तो जीवन ही नहीं, सांसें भी दे दूं,‘‘ श्रुति ने कहा, ‘‘तुम ने कभी किसी से प्यार किया है या सिर्फ वाईफाई का पासवर्ड ही ‘आई लव यू’ रखा है?’’

‘‘किया है न, तभी तो  ‘आई लव यू’ पासवर्ड रखा है. सीधेसीधे कहने की हिम्मत नहीं पड़ी तो पासवर्ड के बहाने कह दिया. अब तुम कहो, उस दिन तो तुम ने बहुत कुछ कह दिया. उस से तो..’’

‘‘मुझे अच्छे तो तुम भी लगते थे, पर तब तक इस बारे में कुछ सोचा नहीं था. पर जब सोचा तो लगा कि तुम ने यह पासवर्ड सेट करने के बजाय सच में ‘आई लव यू’ कहा होता तो…’’ श्रुति ने कहा.

उस की बात बीच में ही काट कर प्रकाश ने कहा, ‘‘तो क्या तुम भी..?’’

‘‘हां, पर अब यह पासवर्ड किसी दूसरी लड़की को मत बताना.’’ श्रुति ने कहा.

इसी के साथ दोनों हंस पड़े.

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