नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर पूर्वोत्तर राज्य

पूर्वोत्तर राज्यों में कुदरती खूबसूरती सौगात बन कर बरसती है. यहां आ कर एक नए भारत के दर्शन होते हैं. आदिवासी जीवन, नृत्यसंगीत, लोककलाएं व परंपराओं से रूबरू होने के साथसाथ प्राकृतिक सुंदरता और सरल जीवनशैली भी यहां के खास आकर्षण हैं.

पूर्वोत्तर राज्यों की  खूबसूरती का जवाब नहीं. यहां के घने जंगल, हरेभरे मैदान, पर्वत शृंखलाएं सैलानियों को बहुत लुभाते हैं. सरल स्वभाव के पूर्वोत्तरवासी अपनी परंपराएं और संस्कृति आज भी कायम रखे हुए है. यहां आ कर ऐसा प्रतीत होता है कि मानो हम किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं. यहां के हर राज्य का अपना नृत्य व अपना संगीत है.

असम

यहां का सब से बड़ा आकर्षण कांजीरंगा नैशनल पार्क है. गैंडे, बाघ, बारहसिंगा, बाइसन, वनविलाव, हिरण, सुनहरा लंगूर, जंगली भैंस, गौर और रंगबिरंगे पक्षी इस नैशनल पार्क के आकर्षण हैं. बल्कि बर्ड वाचर्स के लिए तो कांजीरंगा बर्ड्स पैराडाइज है. पार्क में हर तरफ घने पेड़ों के अलावा एक खास किस्म की घास, जो हाथी घास कहलाती है, भी देखने को मिलती है. इस घास की खासीयत यह है कि इस की ऊंचाई आम पेड़ जितनी है. यहां की घास इतनी लंबी है कि इन के बीच हाथी भी छिप जाएं. इसी कारण यह घास हाथी घास कहलाती है. कांजीरंगा ऐलीफैंट सफारी के लिए ही अधिक जाना जाता है. यहां हर साल फरवरी में हाथी महोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. इस महोत्सव का मकसद सिर्फ पर्यटन को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि इस क्षेत्र में पाए जाने वाले एशियाई हाथियों का संरक्षण और उन्हें सुरक्षा प्रदान करना भी है.

कांजीरंगा में हाथी सफारी का मजा बागुड़ी, मिहीमुखी में लिया जा सकता है. हाथी की सवारी के लिए सब से जरूरी हिदायत यह दी जाती है कि पैर पूरी तरह से ढके होने चाहिए वरना यहां पाए जाने वाली हाथी घास से दिक्कत पेश आ सकती है. कांजीरंगा जाने का बेहतर समय नवंबर से ले कर अप्रैल तक है. यहां खुली जीप में या हाथी की सवारी कर पहुंचा जा सकता है. कांजीरंगा के पास ही नामेरी नैशनल पार्क है. यह रंगबिरंगी चिडि़यों और ईकोफिश्ंिग के लिए जाना जाता है. नामेरी पार्क हिमालयन पार्क के नाम से भी जाना जाता है.

यहां से 40 किलोमीटर की दूरी पर एक ऐतिहासिक खंडहर है. यह देखने में बड़ा अद्भुत है, लेकिन विडंबना यह है कि इस खंडहर के बारे में अभी तक ज्यादा पता नहीं चल पाया है. गुवाहाटी से 369 किलोमीटर की दूरी पर शिवसागर है. असम के चाय और तेल व प्राकृतिक गैस के लिए शिवसागर जिला प्रसिद्ध है. यहां एक  झील है. इसी  झील के चारों ओर बसा है. असम के अन्य दर्शनीय स्थलों में बोटैनिकल गार्डन, तारामंडल, ब्रह्मपुत्र पर सरायघाट पुल, बुरफुकना पार्क साइंस म्यूजियम और मानस नैशनल पार्क शामिल हैं.

भारत में सब से अधिक वर्षा के लिए जाना जाने वाला चेरापूंजी भी असम में ही है. यह बंगलादेश की सीमा पर है. पर्यटन के लिए सब से अच्छा समय अक्तूबर से मई तक है.

क्या खरीदें

खरीदारी के लिए यहां बांस के बने शोपीस से ले कर बहुत सारा सजावटी सामान है. इस के अलावा महिलाओं के पहनने के लिए मेखला है. यह थ्री पीस ड्रैस है. चोली और लुंगीनुमा मेखला असम का पारंपरिक पहनावा है. इस के साथ दुपट्टेनुमा एक आंचल, साड़ी के आंचल की तरह ओढ़ा जाता है.  

गुवाहाटी

गुवाहाटी असम का प्रमुख व्यापार केंद्र है. गुवाहाटी उत्तरपूर्व सीमांत रेलवे का मुख्यालय है. सड़क मार्ग से भी यह आसपास के राज्यों के अनेक शहरों शिलौंग, तेजपुर, सिलचर, अगरतला, डिब्रूगढ़, इंफाल आदि से जुड़ा हुआ है. यही कारण है यह पूर्वोत्तर का गेटवे कहलाता है.

ईटानगर

असम, मेघालय के रास्ते अरुणाचल की राजधानी ईटानगर पहुंचा जा सकता है. ईटानगर पहुंचने का दूसरा रास्ता है मालुकपोंग, जो असम के करीब है. यानी असम की यात्रा यहां पूरी हो सकती है, इस के आगे का रास्ता ईटानगर को जाता है.

ईटानगर के आकर्षणों में ईंटों का बना अरुणाचल फोर्ट है. इस के अलावा एक और आकर्षण है और वह है हिमालय के नीचे से हो कर बहती एक नदी जिसे स्थानीय आबादी गेकर सिन्यी के नाम से पुकारती है. जवाहर लाल नेहरू म्यूजियम, क्राफ्ट सैंटर, एंपोरियम ट्रेड सैंटर, चिडि़याघर और पुस्तकालय भी हैं.

टिपी और्किड सैंटर से 165 किलोमीटर की दूरी पर बोमडिला है जो खूबसूरत और्किड के फूलों के लिए विशेष रूप से जाना जाता है. यहां और्किड फूलों का एक सेंटर है, जो टिपी आर्किडोरियम के नाम से जाना जाता है. यहां 300 से भी अधिक विभिन्न प्रजातियों के और्किड के फूलों के पौधे देखने को मिल जाते हैं.

बोमडिला की ऊंचाई से हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां, विशेष रूप से गोरिचन और कांगटो की चोटियां खूबसूरत एहसास दिलाती हैं. यहां से 24 किलोमीटर की दूरी पर सास्सा में पेड़पौधों की एक सैंक्चुरी है. पहाड़ी नदी माकेंग में पर्यटक और एडवैंचर टूरिज्म के शौकीनों के लिए यहां वाइट वाटर राफ्टिंग का मजा कुछ और ही है. यहां नदी में फिशिंग का भी शौक पर्यटक पूरा करते हैं.

अरुणाचल के हरेक टूरिस्ट स्पौट के लिए बसें, टैक्सी, जीप और किराए पर हर तरह की कार मिल जाती हैं. ईटानगर अक्तूबर से ले कर मई के बीच कभी भी जाया जा सकता है. यहां सर्दी और गरमी दोनों ही मौसम में पर्यटन का अलग मजा है.          

त्रिपुरा

पूर्वोत्तर भारत में त्रिपुरा वह राज्य है जो राजेरजवाड़ों की धरती कहलाती है. दुनियाभर में हर जगह लोग प्रदूषण की मार  झेल रहे हैं जबकि त्रिपुरा को प्रदूषण विहीन राज्य माना जाता है. इस राज्य का बोलबाला यहां के खुशगवार और अनुकूल पर्यावरण के लिए भी है. त्रिपुरा पर्यटन के कई सारे आयाम हैं. सिपाहीजला, तृष्णा, गोमती, रोवा अभयारण्य और जामपुरी हिल जैसे यहां प्राकृतिक पर्यटन हैं. वहीं पुरातात्विक पर्यटन के लिए उनाकोटी, पीलक, देवतैमुरा (छवि मुरा), बौक्सनगर भुवनेश्वरी मंदिर आदि हैं. अगर वाटर टूरिज्म की बात की जाए तो रुद्रसार नीलमहल, अमरपुर डुमबूर, विशालगढ़ कमला सागर मौजूद हैं.

त्रिपुरा में ईको टूरिज्म के लिए कई ईको पार्क हैं. तेपानिया, कालापानिया, बारंपुरा, खुमलांग, जामपुरी आदि ईको पार्क हैं. पर्यटकों के लिए त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में सब से महत्त्वपूर्ण दर्शनीय स्थल जो है वह उज्जयंत पैलेस है. यह राजमहल एक वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. 3 गुंबज वाले इस दोमंजिले महल की ऊंचाई 86 फुट है. बेशकीमती लकड़ी की नक्काशीदार भीतरी छत व इस की दीवारें देखने लायक हैं. महल के बाहर मुगलकालीन शैली का बगीचा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है.

पर्यटकों के लिए दर्शनीय स्थलों में राजधानी अगरतला से 55 किलोमीटर की दूरी पर है रुद्धसागर नामक एक  झील. इस  झील के किनारे बसा है नीरमहल. इस महल का स्थापत्य मुगलकालीन है. ठंड के मौसम में यहां यायावर पक्षियों का जमघट लग जाता है. अगरतला से 178 किलोमीटर की दूरी पर उनकोटि है. यह जगह चट्टानों पर खुदाई कर के बनाई गई कलाकृतियों के लिए विख्यात है. पहाड़ों की ढलान पर यहां 7वीं और 9वीं शताब्दी के दौरान चट्टानों को काट कर, छील कर और खुदाई कर अनुपम कलाकृतियां बनाई गई हैं. ये कलाकृतियां विश्व- विख्यात हैं.

यहां 19 से भी अधिक आदिवासी जनजातियों का वास है. इसलिए त्रिपुरा को आदिवासी समुदायों की धरती भी माना जाता है. हालांकि मौजूदा समय में आदिवासी और गैर आदिवासी समुदाय यहां मिलजुल कर रहते हैं और एकदूसरे के पर्व-त्योहार भी मनाते हैं.

कैसे पहुंचें

हवाई रास्ते से अगरतला देशभर से जुड़ा हुआ है. ज्यादातर हवाई जहाज गुवाहाटी हो कर अगरतला पहुंचते हैं. ट्रेन के रास्ते गुवाहाटी से होते हुए अगरतला तक पहुंचा जा सकता है. सड़क के रास्ते कोलकाता से अगरतला की दूरी 1,645 किलोमीटर, गुवाहाटी से 587, शिलौंग से 487 और सिलचर से 250 किलोमीटर है. सड़क के रास्ते जाने के लिए लक्जरी कोच, निजी व सरकारी यातायात के साधन उपलब्ध हैं. पासपोर्ट और वीजा साथ ले कर चलें तो त्रिपुरा के रास्ते बंगलादेश भी घूमा जा सकता है.

सिक्किम

रेल मार्ग या सड़क मार्ग से सिक्किम जाया जा सकता है. रेलयात्री जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी, कलिंपोंग होते हुए जाते हैं, जबकि सड़क मार्ग तिस्ता नदी के किनारेकिनारे चलता है. तिस्ता सिक्किम की मुख्य नदी है. जलपाईगुड़ी से एक टैक्सी ले कर हम सिक्किम की राजधानी गंगटोक के लिए चल पड़े. तिस्ता की तरफ निगाह पड़ती तो उस का साफ, स्वच्छ सतत प्रवाहमान जल मनमोह लेता और जब वनश्री की ओर निगाह उठती तो उस की हरीतिमा चित्त चुरा लेती. प्रारंभ में शाल, सागौन, अश्वपत्र, आम, नीम के  झाड़ मिलते रहे और कुछ अधिक ऊंचाई पर चीड़, स्प्रूस, ओक, मैग्नोलिया आदि के वृक्ष मिलने लगे. हम 7 हजार फुट की ऊंचाई पर पहुंच गए थे, जिस से समशीतोष्ण कटिबंधीय वृक्षों की अधिकता दिखाई दे रही थी.

रंगपो शहर पश्चिम बंगाल व सिक्किम के सीमांत पर स्थित है. यहां ठंड अधिक होती है. फिर हम गंगटोक पहुंचे. वहां हनुमान टैंक घूमने गए. वहां से कंचनजंघा की तुषार मंडित, धवल चोटियां स्पष्ट दिखाई दे रही थीं.  अपूर्व अलौकिक दृश्य देखा. अहा, यहां प्रकृति प्रतिक्षण कितने रूप बदलती है. सूर्योदय के पूर्व कंचनजंघा अरुणिम आभा में रंगा था और जब सूर्य ने प्रथमतया उस की ओर अपनी सुनहरी किरणों से स्पर्श किया, उस का रंग और भी लाल हो गया.

धूप में कंचनजंघा की बर्फीली चोटियां स्वच्छ धवल चांदी की तरह चमक रही थीं. गंगटोक से थोड़ी ही दूर है जीवंती उपवन प्रकृति का मनोरम नजारा प्रस्तुत करता है यह उपवन. रूमटेक गुम्पा भी सिक्किम का एक प्रसिद्ध गुम्पा है. गंगटोक से 30 किलोमीटर दूर तक छोटी सी पहाड़ी की पृष्ठभूमि में इस का निर्माण किया गया है. यहां लामाओं को प्रशिक्षित किया जाता है. वहां का शांत और पवित्र वातावरण सुखद अनुभव देता है.

गंगटोक से पहले की सिक्किम की राजधानी गेजिंग से 15 किलोमीटर दूर पश्चिम में एक छोटा सा गांव है प्रेमयांची. यहां से अन्यत्र जाने के लिए अपने पैरों पर ही भरोसा रखना पड़ता है. 2,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित प्रेमयांची बौद्ध धर्म की नियंगमा शाखा का सब से बड़ा गुम्पा है. यहां के सभी लामा लाल टोपी पहनते हैं. इसे लाल टोपी धारी लामाओं का गुम्पा भी कहते हैं.

इस गुम्पा के अंदर ‘संग थी पाल्थी’ नाम की उत्कृष्ट कलाकृति प्रथम तल पर स्थापित है. इस कलाकृति से जीव की 7 अवस्थाओं का परिचय मिलता है. कक्ष की भीतरी दीवारों पर अनेक सुंदर चित्र निर्मित हैं, जो भारतीय बाम तंत्र से प्रभावित जान पड़ते हैं.

सेमतांग के पहाड़ों पर चाय के खूबसूरत बागान हैं. दूर से देखने पर लगता है जैसे हरी मखमली कालीन बिछा दी गई हो. यहां से सूर्यास्त का नजारा देखने लायक होता है. इस अद्वितीय दृश्य का लाभ लेने के लिए हमें वहां कुछ घंटों तक ठहरना पड़ा और जब सूर्य दूसरे लोक में गमन की तैयारी करने लगा तो हमारी आंखें उधर ही टंग गईं. सूर्यास्त का नजारा देखने लायक था.

सारा सिक्किम कंचनजंघा की आभा से मंडित प्रकृति सुंदरी के हरेभरे आंचल के साए में लिपटा हुआ है. चावल, बड़ी इलायची, चाय और नारंगी के बाग से वहां की धरती समृद्धि से भरपूर है. तिस्ता की घाटी अपनेआप में सौंदर्य व प्रेम के गीतों की संरचना सी है. यहां की वनस्पतियों में विविधता है. सब से बड़ी बात यह है कि औषधीय गुण वाले वृक्षों की वहां बहुतायत है.

तनु वेड्स मनु 3 से कंगना का पत्ता साफ

बॉलीवुड में अपने संजीदा अभिनय के लिए मशहूर कंगना रनौत तनु वेड्स मनु 3 में काम नहीं कर सकती हैं. बॉलीवुड में चर्चा है कि फिल्मकार ‘तनु वेड्स मनु’ सीरीज की तीसरी फिल्म बनाने जा रहे हैं. तनु वेडस मनु में कंगना रनौत ने मुख्य भूमिका निभायी थी. चर्चा है कि कंगना रनौत फिल्म के तीसरे संस्करण में काम नहीं कर रही हैं.

कंगना की जगह किसी और अभिनेत्री को कास्ट करने की बात कही जा रही है.  चर्चा यह भी है कि फिल्म के तीसरे संस्करण का निर्देशन आनंद राय नहीं करेंगे, बल्कि पहली दोनों फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखने वाले हिमांशु शर्मा निर्देशित करेंगे. हिमांशु ने फिल्म की कहानी का पहला ड्राफ्ट तैयार कर लिया है.

सूत्रों की मानें तो हिमांशु की सलाह पर ही इस बार कंगना का पत्ता साफ हुआ है. माना जा रहा है कि मार्च 2017 तक तक इस बारे में आधिकारिक घोषणा की जा सकती है.

गंदे जूतों को चमकायें मिनटों में

सफेद जूतें स्मार्ट लगते हैं, पर वे ज्यादा दिन तक सफेद नहीं रहते. उन पर गंदगी जमने लगती है. उन्हें साफ करने में भी मेहनत लगती है. वाशिंग मशीन के भरोसे जूतों को नहीं छोड़ा जा सकता. बच्चों के जूते तो और भी ज्यादा गंदे होते हैं. अब उनको खेलने-कूदने से तो रोका नहीं जा सकता और आपका काम बढ़ जाता है. पर इस आसान सी ट्रीक से आप मिनटों में सफेद जूतों को चमका सकती हैं.

इसके लिए आपको बस एक टूथब्रश, एक बाउल और किचन की कुछ सामग्रीयों की जरूरत पड़ेगी.

1. 1 टेबल स्पून बाइकार्बोनेट सोडा, आधा टेबल स्पून पानी, आधा टेबल स्पून हाईड्रोजन पेरोक्साइड को एक बाउल में मिलाकर पेस्ट तैयार कर लें.

2. जूतों से लेस निकालें. अब एक टूथब्रश की सहायता से पेस्ट को जूतों पर लगायें. लेस को बाउल में डाल दें ताकि बाउल में बचा हुआ पेस्ट उन पर लग जाए.

3. जूतों और लेस को धूप में 4-5 घंटों के लिए सूखा लें

4. डिटरजैंट से जूतों और लेस को धो लें. धूप में सुखायें

गंदे जूतें नए जूतों की तरह चमक उठेंगे.

10 साल बाद पर्दे पर फिर साथ आएंगे शाहरुख-सलमान

शाहरुख-सलमान अपने फैन्स को नए साल में खास तोहफा देने जा रहे हैं. शाहरुख खान और सलमान खान 10 साल बाद फिल्म में फिर साथ-साथ नजर आ सकते हैं. फैंस का दोनों को फिर से साथ देखने का सपना जल्द ही साकार होने वाला है.

सूत्रों के मुताबिक सुपरस्टार शाहरुख खान, सलमान खान की आने वाली फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ में कैमियो रोल में नजर आएंगे. अगर ऐसा हुआ तो 2007 के बाद इस साल दोनों किसी फिल्म में एकसाथ दिखेंगे. दस साल पहले शाहरुख और सलमान ‘ओम शांति ओम’ के एक गाने में डांस करते नजर आए थे.

इससे पहले शाहरुख और सलमान 3 फिल्मों में साथ काम कर चुके हैं. करण अर्जुन, कुछ कुछ होता है और हम तुम्हारे हैं सनम.

सूत्रों की मानें तो पहले शत्रुघ्न सिन्हा इस रोल को करने वाले थे. हालांकि, सलमान के जोर देने पर उनकी जगह शाहरुख को ले लिया गया. इस बारे में अभी कोई ऑफिशियल घोषणा नहीं की गई है लेकिन ऐसा होना लगभग पक्का है.

पासवर्ड की भूलभुलैया

राकेश सचान पूरे परिवार के साथ छुट्टियां मनाने के लिए औनलाइन टिकट बुक करा रहे थे कि ऐन मौके पर अपने वीजा कार्ड का पासवर्ड भूल गए. नतीजतन, सारी प्रक्रिया लगभग पूरी होने के बावजूद टिकटें बुक नहीं हो सकीं. हारकर उन्हें टिकटें बुक कराने के लिए रेलवे काउंटर पर जाना पड़ा लेकिन तब तक सीटें फुल हो चुकी थीं.

कुलवंत सिंह के साथ तो इस से भी बुरा तब हुआ जब वे अपना फेसबुक अकाउंट खोल रहे थे और अचानक पासवर्ड भूल गए. इस वजह से उन्हें एक जरूरी सूचना कई घंटों बाद मिल सकी जब उन्होंने आखिरकार अपने फेसबुक अकाउंट का पासवर्ड बदला.

आजकल की व्यस्त जीवनशैली में परेशान करने वाली ऐसी तकनीकी घटनाएं काफी आम हो गई हैं. एक साल पहले हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक मोबाइल, इंटरनैट, इंटरनैट बैंकिंग, एटीएम जैसी तमाम तकनीकी सुविधाओं का लाभ उठाने वाले हर 10 में से 3 लोग अपना पासवर्ड भूल जाने या उन के पासवर्ड सार्वजनिक या लीक हो जाने की समस्या से पीडि़त रहते हैं. एक पत्रिका ने अपने विश्वव्यापी सर्वेक्षण में पाया है कि तमाम तरह की तकनीकों का इस्तेमाल करने वाले लोगों में से 30 फीसदी लोग कभी न कभी अपना पासवर्ड भूल जाने की समस्या का सामना करते हैं.

तकनीकी बोझ

पासवर्ड आधुनिक जीवनशैली का एक तकनीकी बोझ है. दोढाई दशकों पहले लोग इस तरह के बोझों से मुक्त थे क्योंकि जिंदगी के सरोकार इतने मशीनी व तकनीक पर आधारित नहीं थे. लेकिन आज पासवर्ड जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं. इस कारण इन की कोई अनदेखी करने की नहीं सोच सकता खासकर ऐसे लोग जो प्लास्टिक मनी, मोबाइल बैंकिग, ईमेल, इंटरनैट जैसी सुविधाओं का हर समय इस्तेमाल करते हैं. आज सक्रिय जीवनशैली जीने वाला कोई व्यक्ति अमूमन 3 से 4 पासवर्ड हर समय ढोता है. लेकिन अगर जैनरेशन एक्स और वाई की बात करें तो यह तो औसतन 5 से 6 पासवर्ड से लैस रहती है. बड़े शहरों से ले कर छोटे और मझोले शहरों तक में रहने वाले लोग इस लत का शिकार हैं. हर गुजरते दिन के साथ लोग पासवर्ड्स के चक्रव्यूह में फंसने के लिए मजबूर होते जा रहे हैं. तमाम आधुनिक संचार साधनों मसलन ईमेल, इंटरनैट का तो बिना पासवर्ड इस्तेमाल संभव ही नहीं है. जिस तरह जिंदगी के सरोकारों में तकनीकी उपकरणों की भूमिका बढ़ती जा रही है, उसी रफ्तार से पासवर्ड्स का बोझ भी बढ़ता जा रहा है.

पासवर्ड और आप

पासवर्ड क्या है  वास्तव में पासवर्ड वह गुप्त तकनीकी चाबी है जिस की बदौलत आप साइबर दुनिया के अपने ठिकानों/खातों में प्रवेश कर सकते हैं. यह चाबी कोई और नहीं बनाता, आमतौर पर इसे आप खुद ही बनाते हैं. पासवर्ड कोईर् गुप्त शब्द या कैरेक्टर हो सकता है जो आप और आप की दुनिया के बीच उस विश्वसनीयता का सुबूत होता है जो यहां तक पहुंचने के लिए जरूरी होता है. इसी चाबी के जरिए आप साबित करते हैं कि आप वही हैं जिस का दावा कर रहे हैं और जब मशीनी तकनीक आप के उस दावे को सही पाती है तो आप की पूरी दुनिया आप के सामने खुली किताब की तरह आ धमकती है. कहने का मतलब यह है कि आप के बैंक में लाखों रुपए हों लेकिन इन रुपयों को आप एटीएम कार्ड के जरिए तब तक नहीं निकाल सकते जब तक मशीन द्वारा पूछे गए पासवर्ड को आप बता न सकें और उस पासवर्ड के जरिए मशीन आप की सत्यता को स्वीकार न कर ले.

पासवर्ड आज की जीवनशैली का एक ऐसा जरूरी माध्यम बन गया है जिस के बिना आप क्रैडिट और डैबिट कार्ड से शौपिंग नहीं कर सकते, रैस्टोरैंट में खाने के बाद बिल नहीं अदा कर सकते और सफर के लिए टिकट नहीं खरीद सकते. पासवर्ड हर जगह आप को, ‘आप’  साबित करता है.

आज की तारीख में पूरी दुनिया में अरबों की संख्या में पासवर्ड हैं. महानगरों में रहने वाला शायद ही कोई सक्रिय व्यक्ति हो जो अपने पास कई तरह के पासवर्ड न रखता हो. पासवर्ड सुरक्षा का तकनीकी उपाय है. यह आप को जहां एक तरफ सुविधाएं हासिल करने के लिए योग्य बनाता है वहीं दूसरी ओर आप की उस निजी दुनिया को उन लोगों से दूर रखता है जो इस का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं. एक अनुमान के मुताबिक, इस समय हिंदुस्तान में ही अकेले 4 से 5 अरब पासवर्ड मौजूद हैं जिन का हर दिन 40 करोड़ से ज्यादा लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है. सब से ज्यादा पासवर्ड ईमेल सुविधाओं, बैंकिंग सुविधाओं और मोबाइल व एटीएम के लिए इस्तेमाल होता है. पासवर्ड के बिना आजकल आप अपनी ही वैयक्तिक दुनिया में मनचाहे ढंग से विचरण नहीं कर सकते.

कैसे आया पासवर्ड

वैसे, पासवर्ड कोई बिलकुल नई खोज नहीं है. पासवर्ड या वाचवर्ड वास्तव में बहुत पुरानी व्यवस्था है जिस का इस्तेमाल प्राचीनकाल में रोमन सेनाओं को व्यवस्थित रखने के लिए किया जाता था. रात में जब रोमन सेनाएं अपने किसी अभियान के लिए मार्च करती थीं तो वे एक विशेष कोडवर्ड या पासवर्ड के जरिए ही अपने रास्ते में आने  वाली बाधाओं को दूर करती थीं. इसी के जरिए सैनिक शिविर खाली करते थे. इसी तरह किसी विशेष पासवर्ड के जरिए ही शिवाजी की सेनाएं मुगलों पर टूट पड़ने का आपस में संदेश प्रेषित करती थीं. पासवर्ड के जरिए ही अतीत में सेनाएं अपनी सुरक्षा, रखवाली और दुश्मन को जांचनेपरखने का काम करती रही हैं.

लेकिन आधुनिक जमाने में पासवर्ड का यह समाजशास्त्र बदल गया है. आज पासवर्ड सेनाओं या महज तकनीकी दुनिया तक ही सीमित नहीं रह गया बल्कि यह रोजमर्रा की जिंदगी की सुविधाओं को हासिल करने का एक तकनीकी उपाय बन गया है. आज पासवर्ड वह व्यवस्था है जिस के जरिए आप अपनी दुनिया को बहुत मोबाइल बना सकते हैं. दुनिया के किसी भी कोने में रहते हुए अपने बैंक अकाउंट का इस्तेमाल कर सकते हैं, पैसे निकाल सकते हैं,

जमा कर सकते हैं और यह जांच सकते हैं कि उस की वास्तविक स्थिति क्या है. पासवर्ड के जरिए ही आप एक तरफ जहां तकनीकी विकास का फायदा उठाते हैं, वहीं दूसरी तरफ इसी के जरिए ही आप इस जटिल दुनिया में अपनी सुरक्षा भी करते हैं.

अपराधियों की पहुंच

लोगों के निजी पासवर्ड तक घुसपैठ कर सकने वाले शातिर अपराधियों की संख्या दिनपरदिन बढ़ती जा रही है, जिस के चलते हर दिन पूरी दुनिया में औसतन 10 लाख पासवर्ड नए बनते हैं. शातिर अपराधी पारंपरिक ढंग से बनाए गए पासवर्डों को अपनी तेजतर्रार तकनीकी जानकारियों की बदौलत तोड़ डालते हैं और आप की दुनिया में घुस कर आप को आर्थिक व सामाजिक नुकसान पहुंचाते हैं. याद करिए डेढ़ दशक पहले का वह वाकेआ जब स्वीडन के एक किशोर लासे लुजान माइक्रोसौफ्ट के पासवर्ड को जान गया था और इस जानकारी के चलते उस ने कंप्यूटर जगत का पर्याय समझी जाने वाली इस कंपनी को कंपा दिया था. हालांकि लासे लुजान ने माइक्रोसौफ्ट को जरा भी नुकसान नहीं पहुंचाया था, न ही उस ने इसे किसी तरह के नुकसान पहुंचाने का इरादा ही जाहिर किया था. लेकिन अपनी इस हरकत के जरिए उस ने बिल गेट्स और पौल एलेन के माथे पर चिंताओं की लकीरें ला दी थीं.

सुरक्षा व्यवस्था का कोड

आज पासवर्ड बहुत नाजुक किस्म की हमेशा चितिंत करने वाली सुरक्षा व्यवस्था बन कर रह गई है. हिंदुस्तान में 10 करोड़ से ज्यादा लोग हर दिन इंटरनैट का इस्तेमाल करते हैं. 2 करोड़ से ज्यादा लोग सप्ताह में 1 से 3 दिन इंटरनैट के जरिए शौपिंग करते हैं. रैस्टोरैंट में खाना खाने और सफर के लिए टिकट खरीदने का काम भी चूंकि बड़े पैमाने पर प्लास्टिक मनी के जरिए संपन्न होता है, इसलिए हर पल करोड़ों लोगों की जिंदगी पासवर्ड के दायरे में रहती है.

देश में 8 करोड़ से ज्यादा लोग मोबाइल और इंटरनैट बैंकिंग का इस्तेमाल करते हैं तथा 40 करोड़ से ज्यादा लोग मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं. ये तमाम गतिविधियां बिना पासवर्ड के संभव ही नहीं हैं. यही कारण है कि आज महानगरों में रहने वाली युवा पीढ़ी एकसाथ 5 से 7 पासवर्ड का बोझ ढो रही है.

सवाल है ऐसी स्थिति में क्या पासवर्ड्स का यह चक्रव्यूह उन्हें परेशान भी करता है  उत्तर है, हां. जिस तरह से पासवर्ड्स की संख्या एक कामकाजी आधुनिक, तकनीकीप्रिय युवा के पास बढ़ रही है, उसी तरह पासवर्ड उन के लिए एक सिरदर्द भी बनता जा रहा है. 5-5 पासवर्ड अपने पास रखना और अलगअलग जगहों पर अलगअलग पासवर्ड्स का सफलतापूर्वक सही उपयोग सुनिश्चित करना आसान नहीं है. यही कारण है कि तमाम संचार सुविधाओं के केयर सैंटर्स में हर दिन पासवर्ड खो जाने और नया पासवर्ड बनाने के लिए फोन कौल्स की लाइन लगी रहती है.

पासवर्ड की दुनिया जितनी तेजी से विभिन्न तरह की सुविधाएं हमारे पास लाती है, उतनी ही तेजी से हमें उस खतरे के नजदीक ले जाती है जिस के हम पलक झपकते शिकार हो सकते हैं.

पासवर्ड तक कोई पहुंच न बना सके, इस के लिए हर कोई होशियारी बरतता है और विभिन्न तरह की तकनीकी सुविधाएं देने वाली कंपनियां लगातार लोगों को सजग भी करती हैं. वे समयसमय पर पासवर्ड को जटिल और दुर्लभ बनाने की कवायद भी करती रहती हैं. लेकिन अपराध की दुनिया में एक जुमला हमेशा से इस्तेमाल होता रहा है ‘पुलिस डालडाल तो चोर पांतपांत’ यानी अपराधी, तकनीकी सुविधाओं को सुरक्षित बनाने वालों से हमेशा चार कदम आगे रहते हैं. इसलिए पासवर्ड्स के इस्तेमाल में चाहे जितनी सजगता बरती जाए, कभी न कभी कोई न कोई गलती हो ही जाती है. तकनीक का यह चक्रव्यूह सबकुछ के बावजूद जटिल है.

बहरहाल, पासवर्ड की दुनिया जितने जादुई अंदाज में हमारे सामने सुविधाओं का पिटारा खोलती है, उतनी ही खतरनाक मुश्किलें भी खड़ी कर देती है. लेकिन चाहे फायदे के साथ नुकसान कितने भी हों, कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन के बिना हम जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते. ऐसी ही चीजें या सुविधाओं में पासवर्ड की सुविधा भी है. इसलिए भले यह समस्याओं का चक्रव्यूह हो, इस चक्रव्यूह से बचना कोई अक्लमंदी नहीं है बल्कि अभिमन्यु की तरह बेहतर यही है कि गर्भ में रहते हुए इसे भेदने की कला सीख लेनी चाहिए. लेकिन दूसरों के पासवर्ड भेदने की नहीं, बल्कि अपने पासवर्ड को सुरक्षित बनाए रखने की कला.         

कमजोर पासवर्ड, आसान शिकार

पासवर्ड कभी पूरी तरह से न्यूमेरिक यानी संख्या में होते हैं जैसे कि पर्सनल आइडैंटिफिकेशन नंबर या पिन नंबर जो आमतौर पर एटीएम और मोबाइल के लिए उपयोगी सैटिंग सुलभ कराते हैं तो कई बार ये संख्या और शब्दों के मेल से बनाए जाते हैं. कई बार ये संक्षिप्त होते हैं तो कई बार कुछ बड़े होते हैं. आमतौर पर लोग ऐसे अंकों, नामों या चीजों को पासवर्ड का रूप देना चाहते हैं जो उन के लिए याद करने में आसान हो और दूसरे के लिए जटिल. लेकिन दिक्कत यह होती है कि अकसर जो पासवर्ड उपयोगकर्ता के लिए आसान होता है, वही पासवर्ड हैकर के लिए भी आसान हो जाता है. नतीजतन, आसान पासवर्ड उपयोगकर्ता का सिरदर्द बन जाता है. यही कारण है कि आजकल वो तमाम सुविधाएं जो पासवर्ड के जरिए हासिल होती हैं, उन्हें उपलब्ध कराने वाली कंपनियां जोर डालती हैं कि आप का पासवर्ड आप के लिए सरल मगर दूसरे के लिए बेहद जटिल होना चाहिए. उदाहरण के लिए 3 संख्या वाले पासवर्ड को 7 संख्या वाले पासवर्ड के मुकाबले अनुमान लगाना ज्यादा आसान है. इस के अलावा व्यक्तिगत तथ्यों और ब्योरों पर आधारित पासवर्ड कहीं ज्यादा जटिल होता है. विशेषज्ञों का सुझाव है कि हमेशा ऐसे पासवर्ड विकसित किए जाने चाहिए जो आप की याददाश्त के लिए आसान और अपराधी के लिए बहुत मुश्किल हों.

पासवर्ड की उलझन से कैसे निबटें

पासवर्ड की उलझनें कई तरह की होती हैं. पहली उलझन अलगअलग कामों के लिए जरूरी अलगअलग पासवर्ड इस्तेमाल किए जाने की हो सकती है. मगर इस में दिक्कत यह आती है कि उन्हें याद रखना कठिन होता है और कहीं लिख कर स्टोर करने में खतरा इन के किसी और के हाथ में पड़ जाने का होता है. ऐसे में विशेषज्ञों की मानें तो अगर पासवर्ड की संख्या एक से ज्यादा हो तो उन्हें स्टोर करने के लिए एक फाइल बना लें और एक आसान पासवर्ड से उस फाइल को सुरक्षित रखें. सुरक्षित किए हुए पासवर्ड का बैकअप अपनी पैनड्राइव या डिस्क अथवा कौपी में ले लें जिस से एक से दूसरी जगह रखने के कारण इस के खो जाने की आशंका कम रहे. हालांकि औनलाइन पासवर्ड स्टोर करने का तरीका अभी काफी विवादास्पद है मगर एक अच्छा औनलाइन पासवर्ड मैनेजर चुन कर भी पासवर्ड को सुरक्षित रखा जा सकता है.

पासवर्ड का नाम अपने कुत्ते, प्रेमिका या पत्नी के नाम पर न रखें. अपनी जन्मतिथि, कार के नंबर या ड्राइविंग लाइसैंस का भी इस के लिए इस्तेमाल करने से बचें. क्योंकि पासवर्ड बनाने के ये अनुमानित तरीके हैं और इन अनुमानित तरीकों से बचना ही बेहतर है. वरना आसानी से आप हैकर के अनुमानजाल में फंस जाएंगे और इस से आप को आर्थिक व सामाजिक नुकसान उठाने पड़ सकते हैं.

पासवर्ड को हमेशा मिश्रित संख्याओं और शब्दों के अनुपात में बनाएं यानी इस में कुछ शब्द हों और कुछ संख्याएं. जिस के चलते तब तक किसी को यहां तक पहुंचना मुश्किल होगा जब आप खुद उसे नहीं बताएंगे. पासवर्ड बनाने का एक तरीका यह भी है कि आप किसी ऐसी चीज को पासवर्ड का रूप दें जिस की कल्पना ही न की जा सके. मसलन, बचपन में आप स्कूल जिस बस से जाते थे अगर उस बस का नंबर और रूट नंबर याद हो तो उस का इस्तेमाल करें. हैकर सोच भी नहीं सकता कि ऐसा भी पासवर्ड हो सकता है. अपने किसी पसंदीदा हीरो और उस की किसी खूबी को पासवर्ड की शक्ल में डाल सकते हैं और अनुमान लगाने वालों के लिए मुश्किल होगी.

दो हजार सतरा, लोकतंत्रों को खतरा

दुनियाभर के देशों में वर्ष 2011 में उठी क्रांति की ज्वाला अब ठंडी पड़ गई है. काहिरा के तहरीर चौक, दिल्ली के जंतरमंतर, न्यूयौर्क की वालस्ट्रीट जैसी जगहों पर आक्रोश में जो मुट्ठियां हवा में लहरा रही थीं अब वे तालियों में तबदील हो गई हैं. जिन भ्रष्ट, बेईमान, धार्मिक, सामंती, तानाशाही सोच के खिलाफ जो जनसैलाब उमड़ा था अब वहां गुस्सा नहीं, जयजयकार है. मानो बदलाव की आंधी में तमाम बुराइयों का सफाया हो गया है.

क्या दुनिया के देशों में शासकों की तानाशाही सोच और नीतियां बदल गई हैं  क्या उदार लोकतांत्रिक मूल्य, समानता, स्वतंत्रता स्थापित हो चुके हैं  जातीय, धार्मिक, नस्लीय, अमीरीगरीबी का भेदभाव व छुआछूत खत्म कर चुके हैं सामाजिक, राजनीतिक भ्रष्टाचार खत्म कर दिया गया है  बिलकुल नहीं. फिर भी दुनियाभर, खासतौर से विश्व के 2 सब से बड़े और पुराने लोकतंत्रों अमेरिका और भारत में जनता के बीच कहीं कोई गुस्सा नहीं दिखता.

दुनियाभर में चालाकी और चतुराई से अब धार्मिक, व्यापारिक राजनीतिक तानाशाही ताकतें लोकतंत्र का लबादा पहन कर नए रूप में जनता की हितैषी बन कर सामने आ रही हैं. निरंकुश निर्णय थोपे जा रहे हैं. नासमझ जनता भी इन्हें सिरमाथे पर बैठाने में पीछे नहीं है.

धार्मिक और सैनिक तानाशाह वाले देशों जैसे मिस्र में मोहम्मद मोरसी और मुसलिम ब्रदरहुड और उदार लोकतंत्रों जैसे भारत में भाजपा के नरेंद्र मोदी और अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंपप की जन लोेकप्रियता से साफ है कि  इन देशों की जनता 5-7 साल पहले जिस व्यवस्था के खिलाफ आक्रोशित थी, अब उसी व्यवस्था के हिमायती नेताओं को पलकों पर बिठा रही है.

निरंकुश शासक

रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, मिस्र जैसे देशों में कट्टर, संकीर्ण विचारधाराएं प्रबल हो रही हैं. विश्व को दिशा देने वाले महत्त्वपूर्ण कथित शक्तिशाली लोकतांत्रिक देशों में लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों, उद्देश्यों को ताक पर रख कर मनमाने, तानाशाहपूर्ण निर्णय लिए जा रहे हैं. अमेरिका, भारत, रूस में कहने को वोटों के जरिए सरकारें चुन कर आईं पर यहां उन राजनीतिक दलों या नेताओं की सरकारें हैं जिन का असल में लोकतंत्र में विश्वास नहीं रहा. धर्म, जाति, नस्ल के नाम पर इन की राजनीति चली. इन नेताओं की विचारधारा का क्रियान्वयन शासन और प्रशासन में दिख रहा है.

अमेरिका के चयनित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंपप के फैसलों में भी निरंकुशता की झलक दिखने लगी है. उन्हें अपरिपक्व और अराजक विचारों के रूप में मीडिया में पेश किया जा रहा है. उन के फैसलों की आलोचना हो रही है. देश की समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय वे ट्विटर पर अपने आलोचकों पर हमले करने में समय बरबाद कर रहे हैं.

ट्रंप ने एक्सा नमोबिल के सीईओ रेक्स टेलरसन को विदेश मंत्री पद पर नियुक्ति किया है. टेलरसन का ट्रंपप की तरह विदेशों में बड़ा कारोबार है. वे रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के मित्र भी हैं. अमेरिकी चुनावप्रचार के दौरान ट्रंपप और पुतिन की दोस्ती पर प्रश्न उठते ही रहे थे. पुतिन को हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ और ट्रंपप के अधिक करीब बताया गया था. 

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सुरक्षा सलाहकार के तौर पर जनरल माइकल फ्लिन को नियुक्त किया है. इन्हें कट्टर मुसलिम विरोधी, नस्लवादी और धार्मिक षड्यंत्रकारी के तौर पर जाना जाता है.

उन के द्वारा बनाए गए मुख्य रणनीतिकार स्टीव बैनन को गोरों से लगाव रखने वाला करार दिया जा रहा है. अटौर्नी जनरल नियुक्त किए जा रहे जेफ सेसंस के बारे में कहा जा रहा है कि वे अपनी नस्लीय सोच के लिए जाने जाते हैं. इस सोच के चलते उन्हें पिछली सरकारों ने जज नहीं बनाया था.

डोनाल्ड ट्रंप गरीब, मजदूर, वेतनभोगियों पर ऐसा मंत्री थोप रहे हैं जो न्यूनतम मजदूरी से जुड़े कानूनों का भारी विरोध करते रहे हैं. ये सब ट्रंपप के निजी तौर पर लिए गए फैसले हैं. हालांकि ‘अमेरिका इज बाई नैचर अ कंट्री औफ इमीग्रैंट्स’ कहलाता था पर अब ट्रंपप कह रहे हैं कि राष्ट्रपति पद संभालने के बाद उन का पहला आदेश आव्रजन को ले कर होगा.

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद ग्रहण करने से पहले ही एच 1 वीजा पर  काम शुरू कर दिया गया है. डिज्नी जैसी कंपनियों के खिलाफ कार्यवाही की जा रही है. इस कंपनी ने बड़़े पैमाने पर अमेरिकी लोगों की जगह भारतीयों व अन्य देशों के लोगों को नौकरियां दी थीं.

डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव जीतने के बाद यह भी कहा था, ‘मेरी सरकार एकदम सीधा नियम बनाएगी, अमेरिकियों की चीजें खरीदो और अमेरिकियों को काम दो. हमें अपनी कंपनियों से काफी प्यार है पर अगर वे देश से बाहर जाएंगी तो हम उन से प्रेम नहीं करेंगे.’ एक बार फिर अमेरिका कुएं का मेढक ही बनना चाह रहा है.

आव्रजन के नियम बदलने से भारतीय आईटी कंपनियों पर सीधा असर पड़ेगा. ट्रंपप ने चुनावों में अमेरिकी युवाओं से विदेशी कंपनियों से नौकरियां छीन कर उन्हें देने का वादा किया था.

उन के लिए 200 सालों में बनी संस्थाएं निरर्थक हैं. वे अपने बच्चों, पत्नी व पुराने अमीर साथियों के साथ देश को चलाने की तैयारी में हैं.

डोनाल्ड ट्रंपप की नीतियां अमेरिका में बड़े य% से बनाई गई लोकतंत्र की सोच को तोड़ने में लग गई हैं. उन की अलोकतांत्रिक विचारधारा चुनावप्रचार में ही दिख गई थी. उन्होंने आप्रवासियों को बाहर निकालने, मुसलमानों को शरण न देने, मसजिदों पर निगरानी रखने, अश्वेतों के साथ नस्लीय भेदभाव जारी रखने का संदेश दे दिया था. स्त्रियों के प्रति उन के विचार भी भारत के तुलसीदास की कुख्यात सोच ‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी; ये सब ताड़न के अधिकारी’ से प्रेरित आम कट्टर हिंदुओं की सोच से अलग नहीं हैं.

गर्भपात, समलैंगिक संबंध जैसे विषयों पर भी डोनाल्ड ट्रंपप चर्च और पोंगापंथी कैथोलिकों से सहमत दिखते हैं.

भेदभाव की व्यवस्था

सदियों से गुलाम रही पुन अमेरिका और भारत की जनता अपने नए शासकों की चिकनीचुपड़ी, मीठी बातों में अपना कल्याण देख रही है और सुनहरी कल्पनाओं में डूबी है. भले ही इन की नीतियां और फैसले गरीब, आम लोगों को रसातल में ले जाने वाले हों. इन देशों के धर्मभक्त लोगों में पंडेपुजारी, पादरी, मौलवी अपने अनुयायियों को ईश्वर, उस के अवतार राजा पर संदेह नहीं, सिर्फ आस्था रखने की बात प्रचारित करते आए हैं. लेकिन वहां उदार, तार्किक, बराबरी के हकदार, सरकार के सेवक समझने वाले तत्त्वों की पकड़ भी थी.

भारत और अमेरिका में पिछली 2 सदियों में जिस धार्मिक, सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ आंदोलनों और कानूनों के जरिए बदलाव के प्रयास हुए, अब वहां वापस वही व्यवस्था कायम करने वाली सोच और नीतियों की कवायद की जा रही है. बराबरी पर आ रहे समाज में अमेरिका में अब फिर से गोरों का वर्चस्व कायम करने की बात दबे शब्दों में बिना कहे थोपी जा रही है.

अमेरिका में करीब 250 सालों से श्वेतअश्वेत, यहूदीहिस्पैनिक भेदभाव चलता आया है. लेकिन लगातार इस भेदभाव के खिलाफ चले आंदोलनों का परिणाम था कि बराक ओबामा जैसे अश्वेत को अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर पहुंचने का अवसर मिला.

अमेरिका में 1950 से 1970 तक नस्लीय भेदभाव मिटाने, शिक्षा, रोजगार में समान अवसर देने के लिए कई कानून बनाए गए और सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम फैसले किए. पिछली डेढ़ शताब्दी से अमेरिका में लोकतंत्र की सोच मजबूत हो  रही थी पर अब डोनाल्ड ट्रंप और उन के कट्टर गोरे अमीरों व चर्च से प्रभावित संगठनों ने अमेरिका को वापस 18वीं सदी में धकेलने की तैयारी कर ली है.

अमेरिका हमेशा से दुनियाभर के सताए हुए लोगों को शरण देने में आगे रहा है. पिछले 8-10 दशकों में वहां आप्रवासियों के लिए चारों ओर से रास्ते खोल दिए गए थे. पर अब तानाशाह ट्रंपप मैक्सिको सीमा पर दीवार खड़ी करने का अपना संकल्प दोहरा रहे हैं. लोकतंत्र का प्रहरी अमेरिका दीवारें गिराने के बजाय खड़ी करने की बात कर रहा है.

संकीर्णता का वर्चस्व

दुनिया करीब आ रही थी. पिछली सदी के अंत तक विश्वभर के लोगों को एक व्यापक फलक दिखने लगा था. इंसान कहीं भी आजा सकता था, कहीं भी रह कर रोजगार, शिक्षा पा सकता था. अमेरिका में सिविल राइट ऐक्ट 1964 ला कर नस्ल, रंग, धर्म, लिंग या मूल राष्ट्रीयता के नाम पर भेदभाव करने पर प्रतिबंध लगाया गया. इस के बाद समानता, स्वतंत्रता, न्याय को ले कर कई और कानून बने. कालों को वोट का अधिकार नहीं था, संपत्ति केवल गोरों के पास होती थी उसी प्रकार कि जिस तरह भारत में शूद्रों को संपत्ति का अधिकार नहीं था, ब्राह्मण को यह हक हासिल था. 60 के दशक में होटलों, व्यापारियों और श्वेत कार ड्राइवरों द्वारा अश्वेतों को सेवा देने से इनकार करने का काफी चलन था. इसी दौरान मार्टिन लूथर किंग ने सुधार के लिए आंदोलन किए.

दूसरे विश्व युद्घ के बाद देश की आधी से ज्यादा अश्वेत आबादी दक्षिणी ग्रामीण क्षेत्रों के बजाय उत्तर और पश्चिम के औद्योगिक शहरों में रहने लगी थी. यह आबादी बेहतर रोजगार के अवसर, शिक्षा और कानूनी अलगाव से बचाव के लिए आ कर इधर बसने लगी थी. कानूनों के बाद भी सामाजिक तौर पर भेदभाव की व्यवस्था बनी रही.

भेदभाव वाली अमेरिकी सामाजिक व्यवस्था में पहले से ही गैर हिस्पैनिक गोरों की अपेक्षा काले ज्यादा गरीब हैं. गोरों के बजाय कालों की गरीबी दर दोगुनी है. बराबरी वाले कानूनों के बावजूद कालों के मुकाबले गोरों की संपत्ति बढ़ी है. ट्रंपप यह आर्थिक खाई अब और बढ़ाएंगे.

यहां 300 साल पहले आए यहूदियों को कुछ धार्मिक आजादी जरूर मिली पर जो ईसाईर् नहीं थे उन्हें वोटिंग का अधिकार नहीं था. बाद में यह प्रतिबंध हटाया गया. लेकिन भारत के विहिप, बजरंग दल, संघ की तरह अमेरिका में भी कई कट्टर हिंसक हेट गु्रप हैं जो गैर ईसाइयों पर हमले कर रहे हैं. गोरों के ये संगठन अब ताकतवर हो गए हैं. 

मोदी की नीतियों के प्रचारप्रसार और उन्हें आगे लाने में हिंदू संगठनों ने जिस तरह भूमिका निभाई, अमेरिका में ईसाई संगठनों ने जीसस के नाम पर, जीसस के सेवाकार्य के लिए और क्रिश्चियन वैल्यू के नाम पर अपने धर्म वालों को एकजुट करने का काम किया. कहा जा रहा है कि अब ये लोग भारत के हिंदू राष्ट्र की तर्ज पर अमेरिका में क्रिश्चियन नेशन की मांग करने लगेंगे.

उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन की तर्ज पर नए चयनित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में सामंती, शोषणकारी, भेदभाव वाले पोंगापंथी चर्च, कौर्पोरेटी वर्चस्व ला रहे हैं. 

वहीं, अमेरिका की तरह भारत में भी पुराने धार्मिक व सामाजिक विभाजन वाली व्यवस्था के प्रयास जारी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उन के अंधभक्त हिंदुत्व कौर्पोरेट सलाहकारों ने देश की आर्थिक व्यवस्था पर प्रहार किया है. इस से समाज 2 टुकड़ों में दिख रहा है. पहले कालाधन बाहर निकालने और फिर कैशलैस सोसाइटी के नाम पर मनमाने फैसले थोपे जा रहे हैं. एक तरफ पढ़ालिखा सवर्ण वर्ग है जिन के पास डैबिट, कै्रडिट कार्ड, इंटरनैट, मोबाइल बैंकिंग, लेनदेन के कई सारे ऐप्स हैं, दूसरी ओर दलित, पिछड़ा, गरीब, किसान, आदिवासी, मजदूर, छोटे दुकानदार हैं जो रोजमर्रा की मजदूरी से अपना पेट पाल रहे हैं. इन लोगों के पास बैंक खाता तक नहीं है, कार्ड और औनलाइन लेनदेन की बात तो दूर.

इस वर्ग के लिए नकदी लेनदेन अधिक सुविधाजनक रहा है पर सरकार तानाशाहपूर्ण डिजिटल लेनदेन लाद रही है. विमुद्रीकरण का फैसला मोदी ने तटस्थ अर्थशास्त्रियों की सलाह से नहीं, अपने चंद जीहुजूरियों के साथ लिया है. इस फैसले से गरीब प्रभावित हुआ है. अमीरों पर असर नहीं दिखता. कालाधन बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से बड़े पैमाने पर सफेद हो गया है. सारे लक्ष्य ध्वस्त हो गए हैं. नोटबंदी से आर्थिक अराजकता, उथलपुथल के अलावा कुछ नहीं हुआ. यह गैरलोकतांत्रिक निर्णय है.

उलटे, बैंकों में भ्रष्टाचार सामने आ रहा है. बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से मोदी के कालाधन बाहर निकालने की मुहिम पर पलीता लगा है. करोड़ोंअरबों की नई करैंसी आएदिन काले कारोबारियों के पास मिल रही है. बैंक अधिकारी पकड़े जा रहे हैं. बड़ी मात्रा में कालाधन सफेद हो चुका है. मोदी मंत्रिमंडल में जनता द्वारा ठुकरा दिए गए बिना जनाधार वाले ताकतवर मंत्री अरुण जेटली  का वित्त मंत्रालय और उन की इंटेलीजैंस संस्थाएं नाकाम नजर आ रही हैं.

समान नागरिक संहिता पर मोदी सरकार अड़ी है. यह उन कट्टर हिंदू संगठनों का दबाव है जिन्होंने मोदीमोदी के नारे लगाने के लिए अपनी फौज सोशल मीडिया और उन की हर रैली व कार्यक्रमों में झोंक रखी है.

भारत और अमेरिका दोनों की सरकारें कट्टर सोच वाले अलोकतांत्रिक फैसले कर रही हैं. ऐसे में भारत और अमेरिका को पाकिस्तान की कट्टर आतंकी सोच पर उंगली उठाने का हक नहीं रहेगा. अपनी अलोकतांत्रिक नीतियों और फैसलों की वजह से ये नेता एडोल्फ हिटलर, मुसोलिनी, जोसेफ स्टालिन, किम जोंग की कतार में दिखने लगेंगे.

उधर, रूस में पुतिन के शासन में लोकतांत्रिक इंडैक्स में गिरावट आई है. भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी हुई है. यूक्रेन, सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप बढ़ने से धार्मिक तनाव चरम पर पहुंच गया. यह पुतिन के धार्मिक प्रेम की वजह से है. पुतिन भी रूस में मोदी की तरह शिक्षा, मकान, स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्रों में सुधार का वादा कर सत्ता में आए थे पर वे रूसी और्थाेडौक्स चर्च के हुक्म के तलबगार बने दिखने लगे. 2012 में भारी जीत में गड़बड़ी के आरोप लगने पर उन के खिलाफ प्रदर्शन भी हुए. बदले में उन की यूनाइटेड रूस पार्टी के उन के समर्थकों ने रैलियां कीं.

पुतिन और उन के  धार्मिक कट्टर समर्थक संगठन समलैंगिकों के खिलाफ हैं. उन पर हमले होते रहते हैं. तनाव का असर वहां की जीडीपी पर भी पड़ा. 2015 में जीडीपी गिर गया.

असल में रूस में 1914 में चर्च का बड़ा वर्चस्व था. 1917 में रशियन एंपायर ध्वस्त होने के बाद लेनिन ने कई सुधार किए. सब से पहले चर्च और राज्य को अलगअलग घोषित किया गया.

वहां बुद्धिस्ट, ईस्टर्न और्थोडौक्स क्रिश्चियन, इसलाम और यहूदी परंपरागत धर्म रहे हैं पर इन के बीच कोई शांति नहीं रही. बाहर से आए ईसाइयों के अलग चर्च होने के बावजूद एक ही धर्म में झगड़े आज भी चल रहे हैं.

पुतिन ने ईसाइयत को संरक्षण दिया. स्कूलों में धर्म की पढ़ाई कराने की इजाजत दी. वे खुद और्थोडौक्स चर्च जाते रहे हैं.

क्रांति की दरकार

मिस्र में 2011 की गुलाबी क्रांति के बाद लोकतंत्र का मुखौटा लगा कर सत्ता में कट्टरपंथी दक्षिणपंथी मुसलिम ब्रदरहुड सत्ता में आया. इस से पहले 1990 के दौर में इसलामी कट्टरपंथी ग्रुप सक्रिय हो गए थे. हिंसा का दौर चला. आमलोग इन से आजिज आ गए. सत्ता में भ्रष्टाचार, सैन्य तानाशाही और मजहबी बंदिशों ने लोगों को बगावत करने पर मजबूर कर दिया और तहरीर चौक पर जनसैलाब उमड़ पड़ा. काहिरा में बड़े पैमाने पर क्रांति की शुरुआत हुई, प्रदर्शन हुए. मुबारक सरकार का तख्ता पलट दिया गया और उन्हें काहिरा छोड़ कर भागना पड़ा. मार्च में चुनाव हुए तो मोहम्मद मोरसी राष्ट्रपति चुने गए. दक्षिणपंथी मुसलिम ब्रदरहुड लोकतंत्र के नाम पर चुन कर सत्ता में आया पर नए कानूनों में यह दल सख्ती से इसलामिक परंपराएं लागू करने पर उतारू रहा. जुलाई 2013 में मोरसी को हटा दिया गया. देश एक बार फिर अनिश्चितता की ओर चला गया.

लोकतंत्रों का जन्मदाता ब्रिटेन भी इसी राह पर है. ब्रिक्सिट फैसला ब्रिटेन के अपने में ही सिमटने का सुबूत है. यह उदारता नहीं, संकीर्णता का प्रमाण है. जनमत संग्रह से ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन से अलग हुआ था. फैसला कैसे हुआ, यह आज भी अस्पष्ट है.

अमेरिका, यूरोप में समयसमय पर क्रांतियां होती रही हैं. इन से वहां सामाजिक, राजनीतिक बदलाव आए. अनेक वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, समाजसुधारकों ने समाजों में लोकतांत्रिक सोच विकसित करने के प्रयास किए, स्वतंत्रता, समानता पर जोर दिया.

भारत में 18वीं सदी से धार्मिक व्यवस्था के खिलाफ सुधार आंदोलन हुए. कानूनों के जरिए बराबरी के प्रयास हुए, इस का सकारात्मक असर दिखने लगा था पर अब असली उदार लोकतंत्र की जगह छद्म लोकतंत्र हावी हो रहा है. जहां धार्मिक संकीर्णता, भेदभाव, असमानता, गुलामी है जबकि स्वतंत्रता, न्याय नहीं है.

आज फिर जनता की आंखों पर परदा डाल दिया गया है ताकि उसे दिखाई न दे कि ये लोग उसी व्यवस्था के पहरेदार हैं जो जनता को लूटती है. दुनिया में बहुत चतुराई से लोकतंत्रों का तानाशाहीकरण किया जा रहा है और जनता को पता भी नहीं चल पा रहा है. जनता, उलटे, वाहवाही कर रही है. वाह, क्या चमत्कार है  कैसा जादू है   किस अफीम के नशे में झुमाया जा रहा है  वाह मोदी, वाह ट्रंपप, वाह पुतिन, वाह शी जिनपिंग.

अंधेरा कब तक

कोई भी सरकार और वहां का शासक अपनी नीतियों व कानूनों के माध्यम से मानवता, बराबरी, स्वतंत्रता, न्याय की एक संस्कृति विकसित करता है. अगर वह किसी खास धर्म, जाति, वर्ग, नस्ल को प्रश्रय देगा और औरों की उपेक्षा करेगा, दंडित करेगा तो ऐसी नीति दूसरे लोगों में आक्रोश जगाएगी.

लोकतंत्र के मूल स्वभाव में किसी तरह का भेदभाव नहीं है. लोकतंत्र में हर फैसले लोगों की सलाह या बहुमत से होते हैं. जनता के वोटों से लोकतंत्र में चुन कर आने वाला शासक अगर मनमरजी से निरंकुश फैसला करता है तो वह समाज और देश का भला नहीं, नष्ट करने वाला सिद्ध होता है.

विश्व में जनता से मिल रही शक्ति से दक्षिणपंथी ताकतें लोकतंत्र नहीं, तानाशाही कायम कर सकती हैं. ट्रंपप, मोदी, पुतिन जैसे नेता न केवल अपने देशों के लोगों के लिए, बल्कि विश्व के लिए भी संकट पैदा कर रहे हैं.

सदियों की धार्मिक बदहाली से बाहर निकलने का प्रयास कर रहे ये देश अब फिर से उसी दलदल में धंस रहे हैं. यह दुनियाभर के लिए खतरे का संदेश है. इतिहास से सीख न लेने वाला समाज और देश हमेशा दुखी रहता है. शिक्षा, सभ्यता, वैज्ञानिक तरक्की के बावजूद अमेरिका, भारत, रूस, फ्रांस जैसे अग्रणी देशों की सोच धर्मों की संकीर्ण सड़ीगली पगडंडियों की पिछलग्गू क्यों दिखाई दे रही हैं. इन में केवल अंधकार ही अंधकार है, प्रगति की रोशनी नहीं.

क्या जनता विश्व को एडोल्फ हिटलर, मुसोलिनी, स्टालिन, किम जोंग उन, डोनाल्ड ट्रंप, ब्लादिमीर पुतिन, नरेंद्र मोदी देती रहेगी  मार्टिन लूथर किंग, मुस्तफा कमाल पाशा को कौन चुनेगा.

स्किन के लिए फायदेमंद ऑलिव ऑयल

सर्दियों में ठंड और ड्राई क्लाइमेट होने की वजह से बॉडी में नेचुरल ऑयल कम हो जाता है और स्किन ड्राई हो जाती है. स्किन, लिप्स और बालों में डैंड्रफ की समस्या बढ़ जाती है. ऐसे में जरूरी हो जाता है, कुछ ऐसे उपाय अपनाना जो स्किन को फ्रेश और हेल्दी रख सकें. ऐसे में ऑलिव ऑयल आपके लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है.

ऑलिव ऑयल के फायदे

हाथों को सॉफ्ट बनाने के लिए ऑलिव ऑयल से मसाज करें.

दो मुंहे बालों से निजात पाने के लिए वीक में एक बार इस तेल को लगाएं.

अगर आपकी स्किन ड्राई है, तो एक अंडे को ऑलिव ऑयल में मिलाकर चेहरे पर लगाएं.

बॉडी मसाज के लिए चार चम्मच जैतून के तेल में दो चम्मच ऐरोमेटिक ऑयल मिलाएं.

सर पर डैंड्रफ है, तो जैतून के तेल को गर्म करें और रुई से सर पर लगाएं. हल्के हाथों से 5 मिनट मलें. जमा डैंड्रफ बालों से निकल जाएगी.

हार्ड स्किन जैसे, घुटनों, कोहनियों और फटे होंठों को ठीक रखने के लिए इस तेल की मसाज फायदेमंद होती है.

बालों की ड्राईनेस को खत्म करने में भी यह तेल बेहद फायदेमंद है.

मीठे में बनाये वॉलनट बौल्स

कुछ लोगों को खाने के बाद कुछ मीठा खाने की आदत होती है. बच्चों को भी मीठा बेहद पसंद है. घर पर बना कर रखें वॉलनट बौल्स. ताकि आप भी खुश और बच्चे भी खुश. हमें लिखना न भूलें, कि आपको ये रेसिपी कैसी लगी.

सामग्री

– 150 ग्राम अखरोट

– 100 ग्राम खोया

– 8-10 अखरोट अलग से

– 2 छोटे चम्मच पिस्ता बारीक कतरा

– 1/4 छोटा चम्मच छोटी इलायची चूर्ण

– 2 छोटे चम्मच देशी घी

– 100 ग्राम बूरा

– 1 छोटा चम्मच सोंठ पाउडर

विधि

अखरोट को घी में हलका भून कर दरदरा कूट लें. खोए को भी हलका भूनें. गरम में ही सोंठ पाउडर और सौंफ मिला दें. जब खोया ठंडा हो जाए तो इस में कुटे अखरोट, इलायची चूर्ण और बूरा मिला दें. थोड़ा-थोड़ा मिश्रण ले कर छोटेछोटे लड्डू बना कर बीच में कतरा पिस्ता व एक अखरोट चिपका दें. वॉलनट बौल्स तैयार हैं. 

व्यंजन सहयोग: नीरा कुमार

फिल्म रिव्यू: हरामखोर

बेसिर पैर की कहानी, बेतुका प्रेम संबंध, बेतुकी पटकथा और बेतुका निर्देशन यानी कि फिल्म ‘‘हरामखोर’’.फिल्मकार दावा कर रहे हैं कि यह फिल्म शिक्षक व छात्रा के बीच की प्रेम कहानी है, पर इसे शिक्षक व छात्रा के बीच हवस पर आधारित बोल्ड फिल्म कहना ज्यादा उचित होगा.

यह फिल्म एक चौदह वर्षीय लड़की और उसके शिक्षक के बीच प्रेम कहानी है. मगर पूरी फिल्म में फिल्म निर्देशक शिक्षक व छात्रा की प्रेम कहानी को स्थापित नहीं कर पाए, बल्कि यह प्रेम की बजाय महज वासना ही नजर आयी. निर्देशक व पटकथा की कमजोरी के चलते शिक्षक अर्थात श्याम महज सेक्स के हवसी नजर आते हैं.

फिल्म ‘‘हरामखोर’’ की कहानी के केंद्र में मध्यप्रदेश के एक गांव में अपने पुलिस अफसर पिता के साथ रह रही नौंवी कक्षा की छात्रा संध्या (श्वेता त्रिपाठी) और उसके शिक्षक श्याम सर (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) हैं. संध्या की मांबचपन में ही उसे छोड़कर चली गयी थी, श्याम सर ने अपनी छात्रा रही सुनीता (त्रिमाला अधिकारी) से हीशादी कर रखी है, पर उनकी कोई संतान नहीं है. श्याम सर स्कूल में पढ़ाने के साथ साथ अपने घर पर भी ट्यूशन लेते हैं. श्याम सर अपनी छात्राओं व छात्र छात्राओं की माताओं पर डोरे डालते रहते हैं. संध्या का सहपाठी कमल (बाल कलाकार इरफान खान) भी संध्या के संग शादी रचाने का सपना देख रहा है. उसके इस सपने को पूरा करने में मदद की बात संध्या व कमल का सहपाठी मिंटू (बाल कलाकार मो.समद) करता है. कमल व मिंटू, दोनों ही श्याम सर व संध्या की गतिविधियों पर नजर रखते हैं.

संध्या व श्याम सर के बीच भी प्रेम संबंध हैं. एक दिन संध्या के पिता अपनी प्रेमिका मीनू से मिलने जाते हैं, तब रात में डर का बहाना कर संध्या, श्याम सर के घर पहुंच जाती हैं. फिर श्याम सर के बेडरूम के दरवाजे को खिसका कर श्याम सर को अपनी पत्नी के साथ सेक्स संबंध बनाते हुए देखती है. श्याम सर भी देखते हैं कि संध्या उनके इस कृत्य को देख रही है. मगर श्याम सर जानकर भी अनजान बने रहते हुए अपनी पत्नी के साथ सेक्स सुख का आनंद लेते रहते हैं. फिर कुछ समय बाद श्याम सर, संध्या के पास जाकर उसके शरीर को हाथ लगाते हैं. दूसरे दिन स्कूल में संध्या उनसे पन बिजली के पास सुनसान इलाके में मिलने के लिए कहती है. जहां श्याम सर पहुंच कर संध्या के साथ अपनी हवस मिटाते हैं.

फिर यह सिलसिला चल पड़ता है. कभी कभी संध्या के पिता की गैरमौजूदगी में श्याम सर, संध्या के घर के अंदर ही उसके साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं. एक दिन संध्या कहती है कि इस बार उसका मासिक धर्म नहींहुआ. तो श्याम सर उसे शहर डाक्टर के पास ले जाते हैं, जहां संध्या के पिता की प्रेमिका मीनू नर्स  के रूप मेंमिल जाती है, जो कि संध्या का साथ देती है. इसके एवज में  अब मीनू, संध्या के घर रहने लगती है.

मीनू का साथ मिलने के बाद संध्या व श्याम सर के बीच का कुकृत्य ज्यादा तेज गति से चलने लगता है. पर एक दिन इसका पता श्याम सर की पत्नी सुनीता को लग जाता है. सुनीता घर छोड़कर चल देती है. श्याम सर,संध्या के घर जाकर उसे बुलाते हैं और उसे सुनसान जगह पर ले जाकर कहते हैं कि उसकी वजह से उनकी पत्नी चली गयी..इधर कमल व मिंटू, श्याम सर के घर में घुसकर खाते पीते, उधम मचाने के बाद श्याम सर के कुछ कपड़े चुराकर चले जाते हैं.

जब श्याम सर घर वापस लौटते हैं, तो उनकी पत्नी वापस आ चुकी होती हैं. अब श्याम सर को यह पता लगाना है कि उनके घर चोरी किसने की. एक दिन वह कमल व मिंटू को अपने कपड़ों में देख लेते हैं. गुस्से में वह कमल की हत्या कर देते हैं, यह देख मिंटू भी बड़ा पत्थर उठाकर श्याम सर के सिर पर मारता है. श्याम सर की भी मौत हो जाती है. खुद मिंटू, संध्या के घर जाकर बता देता है. यहीं से फिल्म खत्म.

16 दिन में फिल्मायी गयी फिल्म ‘‘हरामखोर’’ के लेखक व निर्देशक के तौर पर श्लोक शर्मा बहुत बुरी तरह से असफल रहे. यह फिल्म उनके अंदर की रचनात्मकता की बजाय उनके दिमागी दिवालियापन का चित्रण करती है. कई जगह तो लगता है कि उन्होंने बिना पटकथा के कुछ दृश्यों को फिल्माकर जोड़ दिया है. श्याम सर की पत्नी सुनीता को श्याम व संध्या के रिश्ते के बारे में कैसे पता चला? सुनीता वापस श्याम सर के ही पास क्यों आयी? श्याम सर व संध्या के बीच प्यार या चाहत कैसे पैदा हुई? श्याम सर का रवैया खौफनाक व भयावह है,मगर संध्या के मन में क्या चल रहा है, यह साफ नहीं होता. यानी कि शिक्षक व छात्रा की प्रेम कहानी स्थापित ही नहीं होती. यह तमाम अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिनका जवाब फिल्म में नहीं है. पिता व पुत्री का रिश्ता भी उभरा नहीं. यह खामी पूर्णरूपेण पटकथा लेखक व निर्देशक के दिमागी खालीपन का ही परिचायक है. कथा कथन में भी काफी त्रुटियां हैं. जिस तरह से फिल्म के दो अलग अलग धुरी के लोगों की मौत के साथ फिल्म खत्म की गयी, उससे भी पता चलता है कि निर्देशक की समझ में नही आ रहा था कि वह फिल्म का अंत किस मोड़ पर करें. बची कुची कसर फिल्म के एडीटर  ने फिल्म की एडीटिंग तितर बितर तरीके से कर फिल्म को चौपट कर दिया. पूरी फिल्म बोर करने के अलावा कुछ नहीं करती.

जहां तक अभिनय का सवाल है. तो नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अच्छी परफार्मेंस दी है, मगर उन्हे खुद को दोहराने से बचना चाहिए. फिल्म हरामखोर में श्याम सर के किरदार में उन्हे देखकर उनकी पुरानी फिल्मों के कई किरदारों के मैनेरिजम याद आ जाते हैं. ‘रमन राघव 2’ की ही तरह ‘हरामखोर’ में भी वह कई जगह बहुत खौफनाक लगते हैं. ‘हरामखोर’ के कई दृश्यों में नवाजुद्दीन ने ‘रमन राघव 2’ के अपने किरदार के ही मैनेरिज्म को दोहराया है. यदि नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अपनी अभिनय शैली पर ध्यान नहीं दिया, तो वह हर फिल्म में इसी तरह खुद को दोहराते नजर आएंगे. 14 वर्षीय छात्रा लड़की संध्या के किरदार में श्वेता त्रिपाठी ने ठीक ठाक अभिनय किया है.

एक घंटे 34 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हरामखोर’’ का निर्माण गुनीत मोंगा, अनुराग कश्यप, फिरोज अलामीर व अचिन जैन तथा निर्देशन श्लोक शर्मा ने किया है. फिल्म के संगीतकार जसलीन रायल तथा कलाकार हैं- नवाजुद्दीन सिद्दिकी, श्वेता त्रिपाठी, त्रिमाला अधिकारी, मा.इरफान खान, मा.मो.समद व अन्य.

कैलेंडर के लिए टॉपलेस हुईं दिशा पटानी

हर साल की तरह इस साल भी प्रसिद्ध फोटोग्राफर डब्‍बू रतनानी साल 2017 का नया कैलेंडर लेकर आ रहे हैं. लेकिन एक बार फिर डब्‍बू रतनानी के इस कैलेंडर ने आने से पहले ही सुर्खिंया बटोरनी शुरू कर दी है.

दरअसल, इस फोटोशूट में फिल्‍म ‘एम.एस. धोनी: द अनटोल्‍ड स्‍टोरी’ की एक्‍ट्रेस दिशा पटानी काफी हॉट अवतार में नजर आ रही हैं. डब्‍बू रतनानी के इस हर साल आने वाले कैलेंडर में हर साल ही बॉलीवुड के एक से एक स्‍टार शामिल होते हैं, लेकिन इस बार दिशा पटानी ने सारी चर्चा अपनी तरफ मोड़ ली है.

हर साल की तरह इस साल भी डब्‍बू रतनानी के इस फोटोशूट में एश्‍वर्या राय बच्‍चन, अनुष्‍का शर्मा, वरुण धवन, शाहरुख खान, अभिषेक बच्‍चन,  दिशा पटानी, सनी लियोनी, श्रद्धा कपूर, रणबीर सिंह, प्रियंका चोपड़ा जैसे कई सितारे नजर आने वाले हैं.

एक इंटरव्‍यू में दिशा ने बताया, ‘इस फोटो शूट में मेरा सिर्फ मेकअप में सहयोग है. मैं इस शूट में स्‍मोकी आई मेकअप और बालों को खुला और उड़ता हुआ चाहती थी. मुझे नहीं लगता कि मेकअप हमारी त्‍वचा के लिए अच्‍छा नहीं होता. हमें हमारी त्‍वचा को सांस लेते रहने देना चाहिए.’

अपने फोटोशूट के बारे में दिशा ने कहा कि यह डब्‍बू का कॉन्‍सेप्‍ट था और मैंने इसे सिर्फ उनके बताए अनुसार ही किया है. मैं पहली बार इस कैलेंडर का हिस्‍सा बन रही हूं और हम चाहते थे कि यह सबसे अलग दिखे.’ हालांकि दिशा ने अपने टॉपलेस होने पर सफाई देते हुए कहा है, ‘मैं टॉपलेस नहीं हूं. आपको कुछ नहीं दिखेगा, बस मेरी पीठ दिख रही है.’

बता दें कि दिशा पटानी जल्‍द ही जैकी चैन की फिल्‍म ‘कुंग फू योगा’ में भी नजर आने वाली हैं. इस फिल्‍म में एक्‍टर सोनू सूद भी नजर आएंगे. इस फिल्‍म की शूटिंग जयपुर और आइसलैंड में हुई है. दिशा के अलावा कई अन्‍य सितारे भी इस कैलेंडर में काफी स्‍टाइलिश और बेहद अलग लुक में दिख रहे हैं.

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