सना खान ने निर्देशक विशाल पंड्या को फांसा

विशाल पंड्या निर्देशित ईरोटिक फिल्म ‘‘वजह तुम हो’’ में जमकर जिस्म की नुमाइश व अति हॉट दृश्यों को अंजाम दे चुकी अदाकारा सना खान इन दिनों हवा में उड़ रही हैं. इसकी वाजिब वजहें हैं. एक तरफ उन्हे अक्षय कुमार के संग फिल्म ‘‘टायलेटःएक प्रेम कथा’’ में अभिनय करने का अवसर मिला है, तो दूसरी तरफ उन्हें निजी जीवन में जीवन साथी मिल गया है.

सूत्रों की माने तो फिल्म ‘‘वजह तुम हो’’ की शूटिंग के दौरान ही इस फिल्म के निर्देशक विशाल पंड्या के साथ सना खान का रोमांस शुरू हो गया था. सना खान के करीबी सूत्रों का दावा है कि यह दोनों इस कदर एक दूसरे के प्यार में पागल थे कि एक ही कार के अंदर दोनों एक दूसरे के सामने कपड़े तक बदल लेते थे. सना खान के अति करीबी यह भी दावा कर रहे हैं कि सना खान और विशाल पंड्या घंटों एक दूसरे के संग फोन पर बातें करते रहते हैं. इतना ही नहीं सना के खान के अति नजदीकी सूत्रों का दावा है कि विशाल पंड्या के ही कहने पर सना खान ने फिल्म ‘‘टायेलटः एक प्रेम कथा’’ में एक्सपोजर करने से साफ मना कर दिया.

मगर जब हमने सना खान से इस बारे में बात की, तो सना खान ने कहा-‘‘विशाल पंड्या मेरे अच्छे दोस्त हैं और बेहतरीन लेखक व निर्देशक हैं. मगर हमारे बीच प्यार वाला कोई मसला नहीं है. पर यह सच है कि मैं फिल्म ‘‘टायलेट एक प्रेम कथा’’ में अक्षय कुमार के संग छोटी सी भूमिका निभा रही हूं. इसमें मैंने फिर से पैर के तलवे तक अपने शरीर को ढंक कर रखा हुआ है. पूरी तरह से देसी लुक है. यह डिग्लैमरस किरदार है.’’

राज कुमार राव की खुशी

बालीवुड में शुरू से ही अलग तरह के किरदार निभाकर प्रशंसा बटोरते आ रहे अभिनेता राज कुमार राव इन दिनों काफी खुश हैं. उनकी खुशी का राज यह है कि उनकी फिल्म ‘‘न्यूटन’’, जिसमें उन्होंने शीर्ष भूमिका निभायी है, को ‘‘बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2017’’ में काफी पसंद किया गया. अमित वी मसूरकर निर्देशित फिल्म ‘‘न्यूटन’’ का प्रदर्शन ‘‘बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2017’’ में ‘‘इंटरनेशनल फोरम आफ न्यू सिनेमा’’ के तहत दस फरवरी को हुआ और लोगों ने खडे़ होकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ इस फिल्म की प्रशंसा की.

खुद राज कुमार राव कहते हैं-‘‘सच कहूं तो ‘बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2017’ में अपनी फिल्म ‘न्यूटन’ के वर्ल्ड प्रीमियर से पहले मैं दर्शकों के रिस्पांस को लेकर काफी नर्वस और इतने बड़े फिल्म समारोह का हिस्सा होने को लेकर उत्साहित था. मगर फिल्म का प्रीमियर होने के बाद बर्लिन के लोगों ने खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ हमारी फिल्म का स्वागत किया, इससे मेरा हौसला बढ़ा. मैं बड़ी विनम्रता से उनका आभारी हूं. अब मुझे अपने देश की जनता से मिलने वाले रिस्पांस का इंतजार है.’’

वैलेंटाइन डे के लिए मेकअप टिप्स

वैलेंटाइन डे पर अपने लुक को परफैक्ट आउटफिट और मेकअप के साथ कुछ इस तरह संवारें कि पार्टनर की नजर आप की खूबसूरती पर थम जाए. जानिए, मेकअप आर्टिस्ट क्रिस्टल फर्नांडिस के टिप्स : 

सैक्सी आंखें

आंखों को सैक्सी लुक देने के लिए स्मोकी आई मेकअप सब से बढि़या औप्शन है, इस के लिए ब्लैक शेड का आईशैडो, फिर ब्लैक आई लाइनर और आखिर में ब्लैक मस्कारा लगाएं. अगर आप की आंखें छोटी हैं तो पहले आंखों के इनर कौर्नर पर व्हाइट आईशैडो लगाएं. फिर आई लाइनर, आईशैडो से आई मेकअप को स्मोकी लुक दें.    

फ्लर्टी आईलैशेस

आईलैशेस को फ्लर्टी इफैक्ट देने के लिए आईशैडो और आई लाइनर लगाने के बाद फाइनल फिनिश के लिए आईलैशेस पर मस्कारा लगा कर कर्ल करें.  

आईकैची आईब्रोज

आकर्षक आईब्रोज के लिए पहले आईब्रोज को शेप में बना लें. फिर ब्राउन शेड का आईशैडो लगा कर आईब्रोज को सही और आकर्षक शेप दें. अगर आप चाहती हैं कि आप के आईब्रोज उठे हुए दिखाई दें तो आई मेकअप और आईब्रोज अच्छी तरह सैट हो जाने पर आइब्रो बोन पर हाईलाइटर अप्लाई करें.  

हौट पाउट

अपने लिप्स को हौट लुक देने के लिए बोल्ड शेड की लिपस्टिक का चुनाव करें, जैसे रैड, औरेंज आदि. आप रैड के बजाय एवरग्रीन पिंक शेड के डिफरैंट शेड्स का चुनाव भी कर सकती हैं. ग्लौसी के बजाय मैट टैक्स्चर वाली लिपस्टिक खरीदें. यह लौंग लास्टिंग होती है और इस का इफैक्ट भी काफी फ्रैश नजर आता है.

शाइनी फेस

शाइनी फेस के लिए चेहरे पर मौइश्चराइजर लगाने के बजाय शिमरी लोशन लगाएं. अगर आप का रंग सांवला है, तो बेस मेकअप के लिए गोल्डन पाउडर लगाएं, इस से चेहरा ग्लो करेगा. मेकअप कंपलीट करने के बाद चेहरे पर लिक्विड हाईलाइटर लगाना न भूलें. 

रोमांटिक हेयरस्टाइल

हेयरस्टाइल से आप अपनी पर्सनैलिटी को जैसा चाहें वैसा लुक दे सकती हैं, रोमांटिक लुक के लिए बालों को कर्ल करवाएं और ओपन कर्ल हेयर के साथ ऐंबेलिश्ड हैड बैंड, हेयर बो या बोहो बैंड लगाएं.  सैक्सी नजर आने के लिए मेसी अपडू, लो मेसी बन, सल्ट्री अपडू, क्लीन पोनी टेल जैसी हेयरस्टाइल लें.

गंदगी का आलम

गंदगी हमारे देश में लोगों के जीवन का इतना बड़ा हिस्सा बनी हुई है कि यहां साफसफाई को जीवन में दखल मान लिया जाता है. दिल्ली की जामिया कालोनी के पास के एक रिहायशी कौंप्लैक्स की औरतों ने खुद पैसा जमा कर, खुद मजदूरों के साथ मिल कर एक गली की सफाई कराई, तो वहां खड़ी होने वाली गाडि़यों के मालिकों और वहां रोज कूड़ा फेंकने वालों ने साफसफाई करने पर न सिर्फ झगड़ा किया, 2 सौ लोगों को जमा कर साफ की गई जगह को गंदा कर डाला.

गरीबी और गंदगी आमतौर पर साथ चलती हैं. दुनिया के सभी गरीब देश या अमीर देशों के गरीब इलाके गंदे ही रहते हैं. सड़कोंगलियों पर कूड़ा, टूटे शीशे, मैले मकान, बिखरे डब्बे, गंदभरी नालियां, बदबूदार माहौल आंखों को ही नहीं सुहाता, बल्कि वह बीमारियां भी पैदा करता है और लोग आमतौर पर आधाअधूरा काम करते हैं.

अब गंदगी गरीबी को पैदा करती है या इस का उलटा होती है, इस चकरघिन्नी में न पड़ कर समझा जाना चाहिए कि गरीबी हटाना आसान नहीं है, पर गंदगी हटाना बेहद आसान है. हमारे हिंदू धर्म में गंदगी को ही जाति के भेदभाव का तरीका बताया गया है, पर आज जब नीची जातियां, जिन में गरीब पिछड़े, दलित, गरीब मुसलिम व ईसाई शामिल हैं, गंदगी के खिलाफ मुहिम अपनी ओर से शुरू करें. सरकार ने तो 2 साल पहले स्वच्छ भारत का नाटक कर के छोड़ दिया था और अब नोटबंदी कर के गरीबों पर और गरीबी थोप दी है, पर सरकार या ऊंची जातियां और धर्म की जाति व्यवस्था का इस्तेमाल गंदगी थोपने के लिए नहीं कर सकतीं. गंदगी हटा कर गरीबी में शान से जीने लायक बनाया जा सकता है.

गंदगी हटाने के लिए बहुतकुछ नहीं करना होता. यह ठीक है कि हमारे देश में गंदगी फेंकने की जगहें आसानी से नहीं मिलतीं. गलियों और महल्लों से कूड़ा हटा कर ले जाना आसान नहीं है. पहले घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी मिल जाते थे, जो सस्ते में कूड़े को हटा देते थे. अब ट्रक लगाने पड़ते हैं, पर उन का इंतजाम करना और उन्हें चलाना मुश्किल है. शहरी निकायों, पंचायतों के पास ये हों तो भी मुश्किल से मिलते हैं, क्योंकि या तो खराब रहते हैं या चलाने वाले निकम्मे बने रहते हैं.

यह एक तरह से साजिश का हिस्सा है. शहरों की बात हो या कसबोंगांवों की, अमीर लोगों की इच्छा रहती है कि साफसफाई और गंदगी एक लाइन की तरह इस्तेमाल हो–जाति दिखाने की. गंदगी का मतलब है नीची जाति. अफसोस यह है कि बराबरी की मांग करने वाली नीची जातियां महात्मा गांधी की शुरू की गई सफाई का मतलब नहीं समझीं. महात्मा गांधी सफाई से जाति की खाई को पाटना चाहते थे, पर गंदगी में रहने को आदी हो गए नीची जातियों के लोगों ने गंदगी को तमगा बना कर सीने से लगा लिया, इसीलिए दिल्ली की मुसलिम गरीब बस्ती में सफाई को जाति व्यवस्था पर हमला समझ लिया.

समाज का पिछड़ों का ही एक वर्ग नहीं चाहता कि उन से निचले सफाई को अपनाने की जुर्रत करें.  

झगड़ा सपा का

ऐन चुनावों से पहले या यों कहिए कि चुनावों के दौरान उत्तर प्रदेश में राज कर रही समाजवादी पार्टी के घर में आपसी झगड़ा बापबेटे और चाचाओं का मसला तय हो या नहीं, यह दूसरों को फायदा जरूर पहुंचा देगा. बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के लिए यह झगड़ा जून की बरसात की तरह ठंडक देने वाला है.

बापबेटे में कहासुनी कोई नई बात नहीं है और दुनियाभर में होती रहती है और अकसर बेटे बाप से नाराज हो कर चले जाते हैं. जहां एक परिवार का धंधा होता है, वहां भी बेटे अपना हिस्सा छोड़ कर अलग काम शुरू कर देते हैं. अखिलेश यादव ने यदि मुलायम सिंह यादव से अलग होने की जिद ठान ली है, तो कोई खास बात नहीं है. चुनावों से पहले ही यह होता है, क्योंकि तभी एकदूसरे के बारे में जौहर दिखाने का मौका मिलता है. कुश्ती हजार आदमियों के सामने दंगल में की जाती है, घर की चारदीवारी में नहीं.

इस का नुकसान मुलायम सिंह परिवार को होगा या नहीं, यह कोई बड़ी बात नहीं. राजनीति में जो भी आता है, वह हार के लिए तैयार हो कर आता है. हर चुनाव में 5-10 लोगों में से एक को सीट मिलती है और हार कर बाकी फिर अगले चुनाव में लग जाते हैं. यह दुकानदारी नहीं है कि बाजार में 10 दुकानें साथसाथ चलती रहें, कुछ अच्छी, कुछ खराब.

हारने को तो समाजवादी पार्टी 2014 के लोकसभा चुनावों में ही हार गई थी, जब भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा की 80 में से 71 सीटें जीत ली थीं और समाजवादी पार्टी के लिए बस 5 सीटें छोड़ी थीं. इस घर के झगड़े के बाद अगर समाजवादी पार्टी की हालत कांग्रेस की जैसी हो जाए, तो भी नेताओं को फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जोड़तोड़ कर के वे राजनीति की कमाई पर जीते रहेंगे.

नुकसान असल में आम जनता को होगा. मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी के मनसूबों पर ब्रेक लगा रखा था. भारतीय जनता पार्टी सिर्फ राज ही नहीं करना चाहती, वह समाज को भी पीछे धकेलना चाहती है. भाजपा की नीतियों में अमीरों की जगह है, ऊंचों की जगह है, संतोंमहंतों की जगह है, सदियों से धर्म और शासकों के कुचलों की कोई जगह नहीं है.

समाजवादी पार्टी ने 5 साल में या उस से पहले बहुजन समाज पार्टी ने 5 साल में ऐसा कुछ किया हो, जिस से इन लोगों को नई रोशनी मिली हो, नहीं लगता, पर इन पर अत्याचार जरूर रुक गया. सत्ता केवल बहुत ऊंचों से पिछड़ों के हाथों में आ गई और सरकारी नौकरियों, छोटी दुकानदारी, गलीमहल्लों की लीडरी में पिछड़ों की भी पहुंच होने लगी थी. बात सरकारों की नीतियों की नहीं, माहौल की है. समाजवादी पार्टी अगर हारती है और बहुजन समाज पार्टी भी उस की जगह नहीं ले पाती तो एक बार फिर कांग्रेसीभाजपाई युग लौटेगा, जिस में ऊंचों की चलेगी. मुलायमअखिलेश कुश्ती में समाजवादी पार्टी की अगर हार होती है, तो आम गरीब जनता को भुगतना पड़ सकता है.

सुखद मरीचिका: भाग-1

लेखिका- सिंधु मुरली

रोज की तरह आज भी डा. शांतनु बहुत खुश नजर आ रहे थे. जब से अंजलि मरीज बन कर उन के अस्पताल में आई थी, उन्होंने अपने अंदर एक बदलाव महसूस किया था. लेकिन बहुत सोचने पर भी इस बदलाव के कारण को वे समझ नहीं पा रहे थे. यह जानते हुए भी कि अंजलि के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ है, वे खुद को उस की ओर खिंचने से रोक नहीं पा रहे थे. वर्षों पहले लिया गया उन का ब्रह्मचर्य का प्रण भी अब डगमगा रहा था.

ऐसा नहीं था कि उन के जीवन में कोई स्त्री आई ही नहीं थी या उन्होंने इस से पहले कोई रेप केस देखा ही नहीं था. लेकिन उन्होंने सभी से किनारा कर लिया था. उन स्त्रियों में से कुछ तो आज भी उन की अच्छी मित्र हैं.

लौस एंजिलिस जैसे आधुनिक शहर में रहते हुए भी उन्होंने योग और अध्यात्म से अपने शरीर और चरित्र को बाह्य सांसारिक सुखों से मुक्त कर लिया था, परंतु अपने बरसों से भटकते हुए मन पर अभी भी पूरी तरह नियंत्रण नहीं कर पाए थे.

मगर अंजलि से मिलने के बाद उन्होंने अपने मन पर पूर्णविराम अनुभव किया था. उन के चेहरे पर एक अद्भुत सी चमक आ गई थी. 42 की उम्र में यह परिवर्तन सिर्फ उन्होंने ही नहीं, उन की मां, मित्रों व अस्पताल के कर्मचारियों ने भी महसूस किया था.

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जानीपहचानी हस्ती होने के बावजूद डा. शांतनु हर पल सब की मदद को तैयार रहने वाले एक शांत और दयालु इंसान थे. मगर अचानक ही उन के व्यक्तित्व में आए इस सुखद परिवर्तन का राज कोई नहीं जान पाया था. उन के हंसने और बात करने के अंदाज में एक नई ऊर्जा का समावेश हुआ था.

‘‘योर कौफी सर,’’ सिस्टर एंजिल के स्वर ने डा. शांतनु को अंजलि के खयालों से आजाद किया.

‘‘हाय शांतनु,’’ डा. रेवती ने उन के कमरे में प्रवेश करते हुए कहा.

‘‘हाय. आओ बैठो,’’ शांतनु ने रेवती का अभिवादन किया और सिस्टर से एक कप कौफी और बनाने का निवेदन किया.

‘‘सो, हाउ इज योर पेशैंट नाउ?’’ उन्होंने जिज्ञासा भरी नजरों से रेवती से पूछा.

डा. रेवती ही अंजलि का केस हैंडल कर रही थीं. अंजलि के मानसिक तनाव की गंभीरता को भांप कर ही रेवती ने शांतनु से अंजलि की काउंसलिंग करने को कहा था.

‘‘शी इज रिकवरिंग नाउ. सब तुम्हारी मेहरबानी है, वरना पराए देश में कौन किस की इतनी मदद करता है. मगर तुम ठहरे शांतनु द ग्रेट,’’ रेवती ने हाथ जोड़ते हुए इस तरह कहा कि शांतनु मुसकराए बिना न रह सके.

‘‘और कितने दिन अंजलि को यहां रुकना होगा?’’ शांतनु ने पूछा.

‘‘एकडेढ़ हफ्ते बस,’’ कौफी का कप मेज पर रखते हुए रेवती बोली और, ‘‘ओके बौस, अब परसों मुलाकात होगी,’’ कहते हुए वह जाने को तैयार हो गई.

‘‘वीकेंड पर कहीं बाहर जा रही हो क्या?’’ शांतनु ने पूछा.

‘‘हां, बच्चों ने इस बार पिकनिक का प्रोग्राम बनाया है और निखिल भी तैयार हैं, तो जाना ही पड़ेगा,’’ सुस्त लहजे में रेवती बोली. फिर, ‘‘सब तुम्हारी कृपा है, वरना आज मैं भी चोट खाई लैला की तरह भटक रही होती. पर इस घरगृहस्थी के झंझट से तो आजाद होती,’’ रेवती ने नाटकीय अंदाज में कहा तो शांतनु खिलखिला कर हंस दिए.

‘‘पागल कहीं की,’’ रेवती को जाते देख शांतनु बुदबुदाए.

दरअसल रेवती भी उन लड़कियों की श्रेणी में आती है, जिन्होंने स्वयं ही शांतनु के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा था. परंतु लाख जतन कर के भी शांतनु के पत्थर दिल को पिघला नहीं पाई थी.

विवाह न करने के अडिग फैसले ने रेवती के दिल में निखिल के लिए जगह बना दी और इंटर्नशिप के बाद दोनों ने घर बसा लिया. शांतनु आज भी उन के हितैषी और मित्र बन कर उन के साथ थे.

‘‘सर, डाक्टर विल्सन इज कौलिंग यू,’’ एक जूनियर डाक्टर ने उन के कक्ष में झांकते हुए कहा तो वे अपनी खयाली दुनिया से बाहर आए.

‘‘सिस्टर, इन के खाने में नौनवेज कम कर दीजिए,’’ कुरसी खिसकाते हुए डा. शांतनु ने अंजलि की पल्स रेट चैक करते हुए सिस्टर जौन्स से मजाकिया लहजे में कहा तो अंजलि एक फीकी हंसी हंस दी.

सिस्टर जौन्स शांतनु को बहुत मानती थीं. उन के पति की मृत्यु के बाद शांतनु ने उन की हर तरह से मदद की थी, इसीलिए तो शांतनु के कहने पर उन्होंने अंजलि की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

डा. शांतनु, डा. रेवती, सिस्टर जौन्स आदि के प्यार और देखभाल ने ही इतने बड़े हादसे के बाद भी अंजलि को जिंदा रखा था. कितना रोईचिल्लाई थी अंजलि जब उसे आधेअधूरे वस्त्रों में यहां लाया गया था. उस के  शरीर पर जगहजगह नाखूनों के निशान थे. चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था और नीचे से लगातार खून बह रहा था.

‘मुझे मर जाने दो प्लीज,’ यही रट लगाए थी वह. रेवती ने उसे नींद का इंजैक्शन लगा दिया था और शांतनु से एक बार अंजलि से मिलने को कहा था.

रेवती जानती थी कि अंजलि जैसे कुछ भी अनिष्ट करने को तैयार मरीजों के लिए डा. शांतनु ही संजीवनीबूटी हैं. उन की आंखों का स्नेह, बातों की मधुरता ऐसे रोगियों में अजब सा जादू करती थी. उन के शब्दों में बहुत ताकत थी. उन से बातें कर रोगी स्वयं को बहुत हलका महसूस करता था. उस अस्पताल में और भी जानेमाने साइकोलौजिस्ट थे, परंतु डा. शांतनु का कोई सानी नहीं था.

प्रायश्चित्त की आग में जलने वाले डा. शांतनु को उन के जीवन की एक घटना ने जब इंसानियत की तरफ मोड़ा तो वे इंसानियत के स्तर से भी ऊंचे उठ गए.

पिता की मृत्यु के बाद हमेशा के लिए भारत छोड़ वे अपनी मां के पास लौस ऐंजिलिस आ गए और अपनी शेष पढ़ाई पूरी की. फिर अपनी कड़ी मेहनत से आंतरिक शक्ति को एकाग्र कर मन की सारी परतें खोल दीं और थोड़े ही समय में इस शहर के सब से प्रसिद्ध साइकोलौजिस्ट बन गए.

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उन्होंने तन, मन, धन से खुद को मानव सेवा में समर्पित कर दिया. लोगों का मानना था कि वे अपनी तरह के अकेले इंसान हैं. इस के बावजूद उन के मन में अभी भी एक बेचैनी थी.

जब पहली बार वे अंजलि से मिले तो उन्हें लगा जैसे किसी ने उन के मन की शांत नदी में एक बड़ा सा पत्थर फेंक दिया हो. फिर धीरेधीरे अंजलि उन के मन में गहरी उतरती चली गई. उस की हलकी भूरी आंखें जाने उन्हें क्या याद दिलाना चाह रही थीं.

बाद में अंजलि ने ही उन्हें बताया था कि वह फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के लिए यहां आई थी. उस की पढ़ाई खत्म हो चुकी थी और अगले महीने उसे भारत लौटना था.

हादसे की रात मिस्टर जोसेफ को, जिन के घर वह पेइंग गैस्ट के तौर पर रह रही थी, अचानक ही सपरिवार किसी करीबी रिश्तेदार की मृत्यु पर सियाटल जाना पड़ा. उसी रात मौका देख उन के नौकर ने अपने 2 साथियों के साथ अंजलि पर धावा बोल दिया. उन्होंने बारीबारी से उस के साथ बलात्कार किया और सुबह होने से पहले ही भाग गए.

सुबह 7 बजे जब अंजलि को होश आया उस ने फोन पर अपनी प्रिय सहेली जेनिल को सारी बात बताई. जेनिल फौरन अपने मातापिता के साथ वहां पहुंची और उसे अस्पताल पहुंचाया.

शांतनु की पहुंच से पुलिस ने भी केस को ज्यादा नहीं बढ़ाया. मिस्टर जोसेफ ने अंजलि की पैसों से मदद करनी चाही मगर अंजलि ने साफ इनकार कर दिया. उस ने अपनी बूआजी से पांव में फ्रैक्चर का बहाना कर पैसे मंगा लिए थे. बूआजी मुंबई में रहती थीं. वे दोनों ही एकदूसरे का सहारा थीं.

‘‘सर, आप मेरी कितनी मदद कर रहे हैं,’’ एक दिन अंजलि ने शांतनु से कहा.

‘‘यह तो मेरी ड्यूटी है,’’ शांतनु ने मुसकरा कर कहा.

‘‘ड्यूटी तो तुम पहले भी अच्छी कर लेते थे, पर इस ड्यूटी की शायद कोई खास वजह है,’’ अंजलि के कमरे से बाहर निकलते हुए कुहनी मारते हुए रेवती ने शांतनु से कहा.

‘क्या मैं अंजलि को चाहने लगा हूं?’

‘नहीं.’

‘तो फिर ऐसा क्या है जो मुझे बारबार उस की ओर खींच रहा है?’

‘पता नहीं.’

‘मेरी और उस की उम्र में कितना फर्क है.’

‘उस से कोई फर्क नहीं पड़ता है.’

एक रात शांतनु अपने शयनकक्ष में लेटे खुद से ही सवालजवाब कर रहे थे, परंतु किसी परिणाम तक नहीं पहुंचे.

उन का इस तरह अपनेआप में खोए रहना मां की आंखों से भी छिपा न था, परंतु उन्होंने बेटे से कुछ भी न पूछा था. जानती थीं कि कोई उत्तर नहीं मिलेगा.

बचपन में ही मातापिता को अलग होते देखा था 9 वर्षीय शांतनु ने. कोर्ट की आज्ञानुसार उसे अपने पिता के पास रहना था. मां रोतीबिलखती अपने कलेजे के टुकड़े नन्हे शांतनु को वहीं छोड़ कर अपने परिवार के पास लौस ऐंजिलिस आ गईं. मांबेटे के बीच की ये दूरियां उन के दोबारा साथ रहने के बावजूद भी नहीं भरी थीं.

शांतनु के पिता जानेमाने वकील थे. उन की व्यस्त जिंदगी ने बेटे को आजाद पंछी बना दिया था. किशोरावस्था में ही दोस्तों का जमघट, पार्टियां, मौजमस्ती यहां तक कि शराब पीना भी शांतनु की आदत में शुमार हो गया था.

बचपन से ही उस की इच्छा थी कि वह डाक्टर बने, परंतु कुशाग्र बुद्धि का होने के बावजूद बिगड़ी सोहबत निरंतर उसे पढ़ाई में पीछे ले गई.

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मैडिकल कालेज में पिता ने मोटी रकम दे कर बेटे का एडमिशन कराया. अब शांतनु अपने शहर अहमदाबाद को छोड़ कर विशाखापट्टनम आ गया.

यहां आ कर उस की आजादी को तो जैसे पंख ही लग गए. नए बिगड़ैल दोस्तों ने उसे अश्लील फिल्में देखने का आदी भी बना दिया. अब उस का मन स्त्री स्पर्श को व्याकुल रहता, मगर यह भावना उस ने कभी जाहिर नहीं होने दी.

‘‘बेटा, तबीयत ठीक नहीं लग रही तो आज छुट्टी ले लो,’’ एक दिन मां ने बुझे चेहरे को देख शांतनु से कहा.

‘‘नहीं मां, आज 2-3 वीआईपीज का अपौइंटमैंट है इसलिए जाना जरूरी है,’’ जूस का गिलास खाली करते हुए शांतनु बोले.

दरअसल, अंजलि से मिलने के बाद से जो आकर्षण वे उस की ओर महसूस कर रहे थे, वही अब पहेली बन उन की रातों की नींद उड़ा चुका था.

‘‘सिस्टर और कोई है बाहर?’’ शांतनु ने दीवार घड़ी देखते हुए पूछा.

‘‘नहीं सर, बाहर तो कोई नहीं है. हां, अंजलि मैडम आप से मिलना चाह रही थीं. उन्हें शाम का टाइम दे दूं?’’ उन की थकान देख सिस्टर ने पूछा.

‘‘नहीं, वैसे भी अब घर जाना है तो उस से मिलता हुआ जाऊंगा.’’ कह कर डा. शांतनु कुरसी से उठे. अंजलि से मिलने का कोई मौका वे गंवाना नहीं चाहते थे.

जब अंजलि के कमरे में उन्होंने प्रवेश किया तो जेनिल व उस के मातापिता को वहां पाया. उन के अभिवादन का जवाब दे कर वे अंजलि की ओर मुड़े.

‘‘कहो अंजलि, कैसे याद किया?’’ उन्होंने पास बैठते हुए पूछा.

‘‘सर, अब मैं यहां से जाना चाहती हूं,’’ उस ने गंभीरता से कहा.

‘‘हांहां जरूर, हम सब भी तो यही चाहते हैं ताकि जल्दी ही तुम अपनी पुरानी जिंदगी फिर से शुरू कर दो,’’ शांतनु ने उत्साह से भर कर कहा.

‘‘पुरानी जिंदगी तो शायद अब कभी नहीं…’’ कहतेकहते उस का स्वर भर्रा गया.

‘‘देखो अंजलि, हर प्रलय के बाद फिर से जीवन का आरंभ होता है. यही प्रकृति का नियम है. अगर तुम खुश रहना मन से चाहोगी, तभी खुश रह पाओगी. किसी और के कहने या चाहने से कुछ नहीं होगा,’’ शांतनु ने अंजलि की आंखों में झांक कर जिस आत्मविश्वास से यह बात कही, उस से अंजलि का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘कितनी गहराई है आप की बातों में. मैं खुशीखुशी जीने की पूरी कोशिश करूंगी,’’ अंजलि की आवाज में आज पहली बार आत्मविश्वास दिखा था.

‘‘हम अंजलि को अपने घर ले जाएंगे.’’ जेनिल के पिता बोले.

2 दिन बाद अंजलि जेनिल के साथ चली गई. भारत लौटने से पहले भी वह शांतनु के पास 2-3 बार काउंसलिंग के लिए आई.

‘‘सर, मुंबई से भी मैं आप के संपर्क में रहना चाहूंगी,’’ एयरपोर्ट पर भरी आंखों से अंजलि ने कहा तो शांतनु ने भी पलकें झपका कर जवाब दिया.

उस के जाने के बाद शांतनु को अपना मन संभालने में काफी वक्त लगा. फिर समय अपने वेग से चलने लगा.

– क्रमश:

प्रोड्यूसर नहीं तो फिल्म हुई पोस्टपोन

जब से अजय देवगन और मिलन लूथरिया के साथ आने की आयी थी, फैन्स काफी एक्साइटेड हैं. इसके बाद इस टीम को इमरान हाशमी ने भी जॉइन कर लिया और फैन्स की खुशी और बढ़ गई. और बस बादशाहो का इंतजार होने लगा. लेकिन अभी हाल ही में आई खबर इस फिल्म के पोस्टपोन होने के पूरे आसार बता रही है और बादशाहो के चाहने वालों को फिल्म के लिए काफी इंतजार करना पड़ सकता है. फिल्म के आगे बढ़ने का कारण है कि फिल्म के पास अच्छा लाइन प्रोड्यूसर नहीं है. अजय देवगन की बादशाहो का शेड्यूल शुरू तो हो गया है लेकिन खत्म नहीं हो रहा है. वहीं फिल्म की शूटिंग भी अच्छे से नहीं हो पा रही है. वैसे मिलन लूथरिया की फिल्म काफी स्मूथ रहती है. लेकिन इस बार कास्ट काफी परेशान है. फिल्म का पहला शेड्यूल बहुत ज्यादा खिंच चुका है और अब जाकर खत्म हुआ है. और माना जा रहा है कि अच्छा लाइन प्रोड्यूसर ना होने के कारण फिल्म का दूसरा शे़ड्यूल भी पोस्टपोन होगा.
ये तो तय है कि फिल्म समय पर रिलीज नहीं हो रही है. वैसे फिल्म को मई-जून में रिलीज होना था. लेकिन फिलहाल तो ऐसा कोई आसार नजर नहीं आ रहा है. फिल्म का केवल एक शेड्यूल पूरा हुआ है. वहीं अजय देवगन को गोलमाल 4 की शूटिंग भी शुरू करनी है क्योंकि फिल्म दीवाली पर रिलीज होगी. ऐसे में हो सकता है कि बादशाहो लटक जाए.
सनी लियोन ने बादशाहो के लिए एक आईटम नंबर शूट किया है. उनके साथ इस गाने में अजय देवगन नहीं है.
मिलन लूथरिया की बादशाहो अपनी ड्रीम टीम के साथ तैयार है. फिल्म की कास्ट और क्रू फाइनल हो चुकी है. फिल्म में अजय देवगन का साथ देंगे इमरान हाशमी, विद्युत जामवाल, इलियाना डीक्रूज़, ईशा गुप्ता और संजय मिश्रा. फिल्म 12 मई 2017 को रिलीज के लिए तैयार रहेगी.
फिल्म 1970 में लगी इमरजेंसी की कहानी है और महारानी गायत्री देवी का किरदार इसका अहम हिस्सा माना जा रहा है. महारानी गायत्री देवी जयपुर की तीसरी महारानी थीं और 70 की इमरजेंसी के पहले तीन बार कांग्रेस के कैंडिडेट को हरा चुकी थीं. उन्होंने इंदिरा गांधी का जमकर विरोध किया था.
इसके बाद इंदिरा गांधी ने आर्मी को निर्देश दिए थे कि जयपुर के महल की खुदाई कर वहां से गैर कानूनी हीरे जवाहरात बरामद किए जाएं. हालांकि ऐसा कुछ किसी को नहीं मिला.
ये अभियान इंदिरा गांधी के कहने पर तीन महीने तक चला था लेकिन सरकार के हाथ कुछ नहीं लगा. ये घटना राजस्थान के आमेर के पास जयगढ़ किले की है.
तीन दिन तक हाईवे बंद था और माना जा रहा था कि आर्मी के ट्रक में काफी सोना लदा था. इसी के बाद कहानी में अजय देवगन का किरदार मुख्य रूप से सामने आएगा.
फिल्म को मिलन लूथरिया डायरेक्ट करेंगे जो अजय को “कच्चे धागे” और “वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई” में डायरेक्ट कर चुके हैं. फिल्म की शुरूआत भी “कच्चे धागे” के दिन यानि 15 जनवरी को एक गाने की रिकॉर्डिंग के साथ हो चुकी है.
इसके पहले मिलन लूथरिया करीना कपूर को चोरी-चोरी और वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दोबारा के लिए मना चुके हैं. लेकिन स्क्रिप्ट बदलने के बाद भी बेबो को फिल्में पसंद नहीं आई.
फिल्म में विद्युत का किरदार निगेटिव होगा या पॉजिटिव इस पर फिलहाल संदेह है लेकिन उनका पैरेलल लीड फाइनल है. हो सकता है कि फिल्म के मेन विलेन विद्युत हों.

17 मार्च को सिनेमाघरों में आ रही है ‘ट्रेप्ड’

राजकुमार राव की फिल्म ‘ट्रैप्ड’ 17 मार्च को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. राजकुमार राव ने खुद ट्विटर पर फिल्म का आधिकारिक पोस्टर पोस्ट किया है और फिल्म के रिलीज होने की तारीख की घोषणा भी की. खबरों के अनुसार फिल्म का ट्रेलर भी जल्द ही रिलीज होने वाला है.

फिल्म लुटेरा के निर्देशक विक्रमादित्य मोटवानी द्वारा निर्देशित यह फिल्म, फैंटम फिल्म्स द्वारा निर्मित की जा रही है. इस फिल्म की एक खास बात और है कि इस फिल्म से विक्रमादित्य मोटवानी की बड़े पर्दे पर फिर वापसी हो रही है. साल 2013 में उनकी रोमांटिक फिल्म ‘लुटेरा’ आई थी.

फिल्म ‘ट्रैप्ड’ एक ऐसे शख्स की कहानी है जो बहुमंजिली इमारत में स्थित अपने घर में फंस जाता है और उसके पास यहां से बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होता है और न ही भोजन, पानी या बिजली की कोई व्यवस्थता होती है. इस फिल्म में राजकुमार राव, मुख्य भूमिका में है.

साल 2016 में हुए 18वें जियो मामी, मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर हुआ था, जिसके बाद लोगों की फिल्म को लेकर जबरदस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली थी.

..तो सासू मां को ही बना लिया बेस्ट फ्रेंड

यूं तो अक्षय कुमार, बॉलीवुड के उन सितारों में से एक हैं जिनकी दोस्‍ती लगभग सभी से काफी अच्‍छी है. लेकिन अगर सबसे अच्‍छी दोस्‍त की बात करें तो वो कोई और नहीं बल्कि उनकी सास यानी डिंपल कपाड़िया उनकी सबसे अच्‍छी दोस्‍त हैं. अक्षय कुमार हमेशा से ही अपने परिवार को काफी तवज्‍जो देते हैं.

अक्षय कुमार की फिल्‍म ‘जॉली एललएबी 2’ रिलीज हो गई है और इसके रिलीज के पहले अक्षय लाइव चैट के माध्‍यम से अपने फैन्‍स से रूबरू हुए. इस दौरान जब उनके एक फैन ने उनसे बॉलीवुड में सबसे अच्छे दोस्त के बारे में पूछा तो अक्षय बिना देरी के ही अपनी सास डिंपल कपाड़िया का नाम ले लिया.

अक्षय हांग कांग के अभिनेता जैकी चेन को सबसे बहादुर स्टंट अभिनेता मानते हैं. अक्षय ने अपनी पत्नी ट्विंकल खन्ना की लिखी किताब ‘मिसेज फनीबोन्स’ को अपनी पसंदीदा किताब बताया. अक्षय ने दोनों बच्चों के साथ पर्वतारोहण करना और इसके बाद घर में बने खाने के साथ पिकनिक मनाने को जीवन का सबसे खुशनुमा पल बताया.

उन्होंने छुट्टियां मनाने का पसंदीदा जगह केपटाउन बताया. बता दें कि हाल ही में नए साल की छुट्टियां मनाने अक्षय कुमार केपटाउन ही गए थे. यहां उनका एक घर भी है. अपने पसंदीदा खेल के बारे में बात करते हुए अक्षय ने क्रिकेट और बास्केटबॉल का नाम लिया.

रेगिस्तान के बीच बसा शहर : दुबई

विश्व मानचित्र पर दुबई की अहमियत एक ऐसे मुल्क के रूप में है जो एक ओर आधुनिकता का जामा ओढ़े हुए है तो दूसरी ओर अपनी प्राचीन संस्कृति व ऐतिहासिक धरोहरों को अपनेआप में समेटे हुए है. यही वजह है कि यह मुल्क आज पर्यटकों का पसंदीदा स्थल बन गया है.

हराभरा, आकर्षणों से भरपूर दुबई, जो कुछ सालों तक शून्यता से भर गया था, बेकारी की दर जहां दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी, लोग नौकरियां छोड़ कर वापस आ रहे थे, कई लोग अपनी गाड़ी में ही रात गुजारते थे, किसी को कुछ रुपए दे कर उस के घर में नहा धोकर फिर से अपने काम में लग जाते थे, वही दुबई आज फिर से शेख मोहम्मद साहब के अथक परिश्रम व दूरदर्शिता से बुलंदी पर पहुंच गया है. आज दुबई का हाल यह है कि वह अपने ही बनाए आंकड़ों को चुनौती दे कर आगे बढ़ रहा है. इस में कोई शक नहीं कि विश्वभर के लोगों का आकर्षण पहले भी दुबई था और आज भी है.

दर्शनीय स्थल

दुबई में आने वाले हर सैलानी को बर्फानी स्थल देख कर सुकून मिलता है. इमरेट्स औफ भौरा के अंदर के इस बर्फीले स्थल में पहुंच कर सैलानी को कुछ पल के लिए ऐसा महसूस होता है कि वह या तो कश्मीर के गुलमर्ग क्षेत्र में पहुंच गया है या फिर स्विट्जरलैंड. इस बर्फानी स्थल में जाने के लिए विशेष कपड़े, टोपी इत्यादि पहनने पड़ते हैं. वहां पर अकसर कई लोग छोटेमोटे कार्यक्रम जैसे जन्मदिन या छोटीमोटी पार्टी आदि भी करते हैं. स्केटिंग का लुत्फ भी वहां उठाया जाता है.

समुद्र में बने होटल बुर्ज अरब के 27वें फ्लोर पर जा कर सैलानी पूरे दुबई को देखने के साथसाथ वहां की साजसज्जा व विभिन्न कार्यक्रम देख कर आनंद महसूस करता है.

उम अल्क्वेन

उम अल्क्वेन में हर उम्र के लोगों के लिए खेल हैं. पानी में तरहतरह के खेलों का आनंद बच्चे, बूढ़े और जवान जीभर कर उठाते हैं. हर पानी के खेल में सिक्योरिटी वाले खड़े रहते हैं. इन खेलों में सलवारकुरता या साड़ी पहन कर जाना मना है. कोई भी सैलानी जिस्म से चिपकी टीशर्ट, जींस या हाफ पैंट पहन कर ही इन खेलों में शामिल हो सकता है.

आभूषणों की मंडी  : दुबई में आने वाले हर सैलानी को डेरा दुबई और गोल्ड सूक में सोने के आभूषणों की मंडी आकर्षित करती है. कई पर्यटक इसे देखते ही रह जाते हैं.

दुबई में आधुनिक से आधुनिक व कई देशों के बने डिजाइनों के आभूषण उपलब्ध हैं. अमेरिकी हो या अफगानी, बंगाली हो या राजस्थानी, यहां सभी को अपनी रुचि के अनुसार आभूषण मिल जाते हैं.

दुबई के सोने की विशेषता है कि सैलानी को खरा सोना निर्धारित दाम में मिलता है. वहां 22 कैरट का सोना एकदम 100 फीसदी 22 कैरट का होता है, कोई मिलावट नहीं होती जबकि अन्य देशों में सोने के साथ अमूमन तांबा या अन्य कोई धातु मिलाई जाती है.

दुबई में सोने के आभूषण खरीदते समय यदि सैलानी आभूषण की बनवाई पर मोलभाव करे तो उसे फायदा हो सकता है. हालांकि वहां मोलभाव का प्रचलन नहीं है फिर भी दुकानदार ग्राहक को बनवाई में थोड़ाबहुत कम कर देते हैं.

भव्य मौलों का शहर : दुबई में एक से एक बड़े और भव्य मौल हैं. ‘मौल औफ अमीरात’ सब से बड़ा मौल है. इस के अलावा बरजुमान, लैम्सी प्लाजा, बुर्ज खलीफा, अजमान आदि में अनेक भव्य मौल बने हुए हैं, जहां आप को दुनिया के हर ब्रैंड का कपड़ा व चीजें मिलेंगी, पुरुषों के सूट यों तो रेडीमेड मिल जाते हैं पर और्डर देने पर 3 घंटे में भी तैयार कर दिए जाते हैं. मेकअप का सामान हो या घरगृहस्थी का, घड़ी हो या चप्पल या फिर पर्स, हर ब्रैंड का सामान यहां मिलता है.

मौल्स के अतिरिक्त कुछ ऐसे बाजार भी हैं जहां सस्ता व हर तरह का सामान हर तबके का व्यक्ति खरीद सकता है. जैसे डेरा दुबई इलाके के ऊंट बाजार में बच्चों के कपड़े, खिलौने, महिलाओं के मेकअप का सामान, पर्स आदि सस्ते दामों में मिल जाते हैं. डेरा बाजार में कपड़ों का बाजार है जहां होलसेल और रिटेल दोनों दामों पर कपड़े मिलते हैं.

चाइनीज मार्केट में चीन का बना छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा हर तरह का सामान मिलता है, इन का मूल्य भी कम होता है. ‘केअरफोर’ यहां का बहुत बड़ा मौल है जहां खानापीना, कपड़ा, घर का सामान, घड़ी, सोना सभीकुछ मिलता है.

ओपन बस का मजा : दुबई में ‘ओपन बस’ में बैठ कर आप पूरे शहर के पर्यटन स्थल घूम सकते हैं. इस बस के कई स्टौप हैं. आप किसी भी पर्यटन स्थल पर उतर कर अच्छी तरह से घूम कर फिर दूसरी ‘ओपन बस’ ले कर दूसरे पर्यटन स्थल का आनंद ले सकते हैं. टिकट वही रहता है. एक दिन का टिकट दूसरे दिन भी चलता है. जितने पर्यटन स्थलों का विवरण टिकट में लिखा होता है.

यह बस बरजुमान, करामा से शुरू होती है. म्यूजियम, अमीरात, मोल, बुर्ज अरब होटल, अरब के पुराने मकान, सब से लंबी बिल्ंिडग, जुमेरा आदि कई स्थलों से घुमाते हुए ले जाती है.

दुबई में ट्रांसपोर्ट के लिए आप कार्ड भी बनवा सकते हैं. यह ट्रांसपोर्ट कार्ड, बस या मैट्रो दोनों में चल जाता है.

मछलियों की दुनिया : दुबई की सब से ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा देखने लायक है. वहां ऊपर जाने में टिकट लगता है. वहां के हर फ्लोर पर आकर्षण के कई केंद्र हैं. उस के साथ ही मछलियों का ऐसा म्यूजियम है जहां हर तरह की व कुछ विशेष आकर्षण से युक्त मछलियां हैं, जिन्हें देख कर बच्चे ही नहीं, बड़े भी आनंदित होते हैं.

बिना ड्राइवर मैट्रो : दुबई की मैट्रो बिना चालक के औटोमेटिक चलती है. पूरे शहर में मैट्रो का जाल बिछा हुआ है. इस का किराया भी साधारण है. एक डब्बा प्रथम श्रेणी का होता है जिस में थोड़ा ज्यादा किराया होता है. हवाई जहाज की शक्ल की यह मैट्रो आकर्षण के साथसाथ सैलानियों को आनंदित भी करती है.

बालू के पहाड़ों में रोमांचक सफारी : दुबई में सफारी डेजर्ट का भी अपना अलग रोमांच है. पजेरो जैसी गाडि़यों में ड्राइवर बालू के विशाल पहाड़ों पर सैलानियों को ले जाते हैं. 3-4 घंटे की इस सवारी के समय वहीं पर खानापीना व अरबी नृत्यांगनाओं का नृत्य देखते हैं. खाने के साथसाथ जाम के दौर का भी प्रबंध होता है. नृत्यांगना बैली डांस करती हैं. कई सैलानी भी इन के साथ नृत्य करते हैं.

समुद्र में नौका विहार : दुबई में रात में ज्यादातर बड़ीबड़ी बोटों को सजाया जाता है. इस पर कई सैलानी दूर समुद्र की सैर करने के साथसाथ वहीं खानापीना भी करते हैं. डांस आदि के कार्यक्रम भी चल रहे होते हैं. समुद्र में इस तरह की कई बोटें चल रही होती हैं जो बहुत आकर्षित करती हैं. कई लोग इन्हीं बोटों पर जन्मदिन की पार्टियां आदि भी आयोजित करते हैं.

खूबसूरत इमारतों का शहर : दुबई में एक से एक खूबसूरत इमारतें हैं. पहलेपहल यहां मकान या फ्लैट खरीदना सिर्फ बड़े आदमियों की मिल्कीयत थी लेकिन अब कुछ दाम कम हो जाने के कारण कई लोगों ने एक कमरे का फ्लैट या 2 बैडरूम फ्लैट खरीद रखे हैं, जिस के लिए उन को वीजा भी मिलता है.

कैसे जाएं : दुबई जाने के लिए  अमीरात एअर लाइंस तो हमेशा से वीजा देती रही है. अब अन्य एअर लाइंस ने भी देना शुरू किया है. इस के अतिरिक्त दिल्ली, मुंबई में ऐंबैसी से भी वीजा प्राप्त किया जा सकता है. कई ट्रैवल एजेंट भी टिकट और वीजा मुहैया करा देते हैं.

मौसम : दुबई का मौसम यों तो ठीक ही रहता है लेकिन गरमियों में जून से ले कर अगस्त के आखिर तक बहुत गरमी होती है. बाकी समय खुशगवार मौसम रहता है.

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