अंधविश्वास परोसते टीवी धारावाहिक

रजनी पिछले 7-8 महीनों से अपने पीहर में रह रही है. करीब 5 वर्ष पहले उस की शादी बड़ी धूमधाम से राजेश के साथ हुई थी. राजेश एक स्कूल में टीचर था तथा रजनी भी अंगरेजी में मास्टर की डिगरी ले चुकी थी. शादी के थोड़े समय बाद ही दोनों में मनमुटाव होने लगा. दोनों के ही घर वालों ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया, मगर वे झुकने को तैयार नहीं थे. एक दिन गुस्से में राजेश ने रजनी पर हाथ उठा दिया और उसी दिन अपमान की आग में सुलगती रजनी ने पति का घर छोड़ दिया. तब से वह अपने पीहर में ही रह रही है.

एक दिन रजनी की 7 वर्षीय भतीजी नेहा ने अपनी मां यानी रजनी की भाभी से कहा, ‘‘मां, बूआ संतोषी माता की पूजा क्यों नहीं करतीं? इस से उन के सारे दुख दूर हो जाएंगे.’’

यह सुन कर उस की मां को हैरानी हुई. उस ने जब पूछा कि तुम क्या जानती हो संतोषी माता के बारे में? बेटी ने बताया कि उस ने ऐंड टीवी पर एक सीरियल में देखा था, जिस में संतोषी माता अपनी पूजा करने वाली संतोषी की बहुत मदद करती हैं. अगर बूआ भी उन की पूजा करेंगी तो संतोषी माता जरूर कोई चमत्कार करेंगी और फूफाजी को सबक सिखाएंगी.

अंधविश्वासों का जाल

विज्ञान विषय की 16 वर्षीय छात्रा आंचल ने एक दिन अपनी मां से कहा कि अब से वह पीरियड्स के दौरान मंदिर नहीं जाएगी और रसोई के काम में भी हाथ नहीं लगाएगी. कारण पूछने पर उस ने बताया कि उस ने टीवी में एक सीरियल में देखा था कि ऐसा करने पर बहुत पाप लगता है और नरक में जाना पड़ता है. सुन कर उस की मां अवाक रह गई. सिर्फ नेहा और आंचल ही नहीं, कच्ची उम्र के बहुत से बच्चे टीवी सीरियलों द्वारा फैलाए जा रहे इन अंधविश्वासों के जाल में उलझे हुए हैं.

2013 में राजस्थान के गंगापुर सिटी में रहने वाले एक परिवार ने जोकि टीवी पर सिर्फ धार्मिक सीरियल ही देखा करता था, भगवान शिव से मिलने और स्वर्ग जाने की चाहत में जहर खा लिया और 8 में से 5 लोगों की मृत्यु हो गई.

आज के समय में टीवी मनोरंजन का सब से सस्ता और सहज उपलब्ध साधन है. घरघर के ड्राइंगरूम और बैडरूम में जगह बनाने वाले इस इडियट बौक्स से सब से ज्यादा लगाव महिलाओं और बच्चों का होता है. ऐसा नहीं है कि पुरुषों को इस से परहेज है, मगर वे अपनेआप को अधिकतर न्यूज और स्पोर्ट्स चैनल और ज्यादा हो तो बिजनैस चैनल तक ही सीमित रखते हैं. उन के पास टीवी देखने का वक्त भी कम ही होता है. मगर बच्चे और महिलाएं विशेषकर गृहिणियां इस की सब से ज्यादा शौकीन होती हैं.

महिलाओं में धर्म के प्रति आस्था भी अधिक देखी जाती है, इसलिए भी वे धार्मिक धारावाहिक देखना अधिक पसंद करती हैं. एक तरह से वे इसे घर बैठे गंगा स्नान करने जैसा मानती हैं यानी मनोरंजन का मनोरंजन और भक्ति की भक्ति. और बच्चे तो होते ही हैं जिज्ञासाओं से भरपूर. उन्हें तो फिक्शन और अनहोनी सी लगने वाली घटनाएं और अजीबोगरीब किरदार सदा से ही आकर्षित करते रहे हैं. बच्चों और महिला दर्शकों की अधिक संख्या के चलते ही टीवी चैनलों पर इस तरह के धारावाहिकों की बाढ़ सी आ गई है. चाहे वह लाइफ ओके चैनल का सीरियल ‘देवों के देव महादेव’ हो या फिर ऐंड टीवी पर दिखाया जाने वाला सीरियल ‘गंगा’ ये सभी बढ़चढ़ कर टीआरपी बटोर रहे हैं और किरदारों के चमत्कारिक और डरावने कारनामों के साथसाथ दर्शकों को हंसा और रुला भी रहे हैं.

टीआरपी बटोरने का गलत तरीका

सिर्फ धार्मिक सीरियल ही नहीं कई अन्य सीरियल भी अंधविश्वास परोसने में पीछे नहीं हैं. कलर्स टीवी पर एक धारावाहिक में एक इच्छाधारी नागिन को मौडर्न अवतार में बदला लेते दिखाया गया है. इसी तरह स्टार प्लस के धारावाहिक ‘मोहब्बतें’ में एक किरदार शगुन के भूत को दिखाया गया है, जो दूसरे किरदार इशिता को परेशान कर रहा है. पिछले दिनों जी टीवी पर एक धारावाहिक ‘कुबूल’ प्रसारित किया जा रहा था, जिस की पृष्ठभूमि में भोपाल के शाही घराने और वहां के नवाब को दिखाया गया था. अतिआधुनिक परिवेश वाले इस सीरियल में चुड़ैल, टोनेटोटके, काला जादू, बुरी आत्माएं, पिशाच और न जाने क्याक्या परोसा जाता था.

मानसिक शिकार होते लोग

कहने का तात्पर्य यह है कि इन सीरियलों को देख कर लगता है कि अंधविश्वास पिछड़े और अनपढ़ लोगों में ही नहीं होता, बल्कि पढ़ेलिखे, उच्च पद पर आसीन और सभी आधुनिक गैजेट्स इस्तेमाल करने वाले लोग भी समान मानसिक रूप से इस के शिकार होते हैं.

इस तरह के धारावाहिक देखदेख कर बड़े हो रहे बच्चों के बाल मन में ये घटनाएं और इन के किरदार अपनी स्थाई जड़े जमा लेते हैं और बड़े होने पर इन्हें कितनी भी दलीलें दे कर समझाया जाए, इन के अवचेतन मन में ये घटनाएं कहीं न कहीं छिपी रह ही जाती हैं.

आज लगभग हर छोटाबड़ा चैनल अपने दर्शकों को मनोरंजन के नाम पर अंधविश्वास परोस रहा है. बेशक चैनल का मकसद सिर्फ दर्शकों का मनोरंजन करना और अपनी लोकप्रियता बढ़ाना ही होता होगा, मगर जानेअनजाने इन के जाल में उलझते बच्चे अपनी राह से भटक रहे हैं.

कुछ दिन पहले अपने पड़ोस में रहने वाली 8वीं कक्षा की छात्रा ममता को सुबहसुबह मंदिर जाते हुए देखा तो यों ही पूछ लिया, ‘‘अरे तुम मंदिर से आ रही हो… स्कूल को देर नहीं हो रही?’ इस पर ममता कहने लगी, ‘‘क्या करूं? मम्मी की जिद है कि व्रत करूं या न करूं, मगर हर सोमवार को शिवजी के दर्शन अवश्य करूं. मेरे विरोध करने पर उन्होंने मुझे ‘देवों के देव महादेव’ सीरियल देखने को कहा जिस में वाकई में यह दिखाया गया है कि ऐसा करने से हर मनोकामना पूरी होती है.’’

अनहोनी की आशंका

अब बड़े होने पर चाहे ममता पढ़लिख कर कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, हर सोमवार को शिवजी के दर्शन वह अवश्य करेगी. चाहे मंदिर जा कर करे या फिर घर पर ही. अगर किसी कारण यह संभव न हो पाए तो उस के मन में हमेशा अनहोनी की आशंका बनी रहेगी.

विविधताओं से भरे और करीब सवा अरब की आबादी वाले हमारे देश में सिर्फ 33 हजार लोग ही नास्तिक हैं. 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार कुछ ही लोग ऐसे हैं जो भगवान को नहीं मानते. इस से पहले 2012 में जारी वैश्विक धार्मिकता सूचकांक के एक अनुमान के मुताबिक भारत में सिर्फ 3% लोग ही हैं जो ईश्वर में यकीन नहीं करते.

आस्था और अंधविश्वास के बीच की विभाजनरेखा बहुत ही महीन होती है. हम अनजाने ही इसे कब पार कर जाते हैं और कब यह आस्था हमारे अंधविश्वास में बदल जाती है हम खुद भी नहीं पहचान पाते.

टैलीविजन तो खुद ही विज्ञान की देन है, लेकिन यह टीवी 21वीं सदी के विज्ञान के पथ पर बढ़ते बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल कर उन्हें अंधविश्वास की ओर धकेल रहा है.

अंधश्रद्घा निर्मूलन समिति के डा. दिनेश मिश्रा के अनुसार, इन दिनों टीवी धारावाहिकों में डायन, नागनागिन, काला जादू और प्राचीन कुरीतियों से जुड़ी घटनाओं आदि को बहुतायत से दिखाया जा रहा है और इस के नकारात्मक प्र्रभाव भी सामने आ रहे हैं. यानी जिस तकनीक का इस्तेमाल अंधविश्वास दूर करने में किया जाना चाहिए उसी का उपयोग अंधविश्वास फैलाने के लिए किया जा रहा है.

किसी काम का नहीं कानून

विश्व भर में भारत के वैज्ञानिकों की एक खास पहचान है. लेकिन हमारे टीवी सीरियल आज भी जादूटोना और भूतप्रेतों से बाहर नहीं निकल पा रहे.

1988 में आए एक टीवी सीरियल ‘होनीअनहोनी’ को डीडी चैनल पर प्रसारित करने पर रोक लगा दी गई थी, क्योंकि इस में अंधविश्वास, भूतप्रेत जैसे कंटैंट दिखाए जा रहे थे. हालांकि बाद में कोर्ट ने इसे प्रसारित करने के आदेश दे दिए थे. ब्रौडकास्टिंग कंटैंट कंप्लेंट काउंसिल यानी बीसीसीसी पहले ही इस तरह के कंटैंट को प्रसारित करने वाले चैनलों को ऐडवाइजरी जारी कर चुका है और पिछले दिनों भी इस के चेयरमैन मुकुल मृदुल ने एक निर्देश जारी किया था, जिस के अनुसार बीते दिनों में काउंसिल को टीवी शोज में डायन, चुड़ैल, जादूटोना, अंधविश्वास जैसे सीन खासतौर पर महिलाओं को नैगेटिव रूप में अधिक दिखाए जाने की शिकायतें बहुत मिली हैं, इसलिए इन्हें बढ़ाचढ़ा कर न दिखाया जाए, साथ ही अगर स्टोरी लाइन के लिहाज से यह आवश्यक हो तो चैनल को टैलीकास्ट करते समय स्क्रोल चलाना होगा कि यह सब काल्पनिक है. फिर भी सवाल यह उठता है कि क्या बीसीसीसी केवल तभी कोई कदम उठाता है जब कोई शिकायत दर्ज हो? क्या खुद उस की नजर इन पर नहीं पड़ती?

बचने की जरूरत

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत सभी को बोलने और अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर कुछ भी दिखाने पर रोक लगनी ही चाहिए और विशेषकर तब जब मामला आने वाली पीढ़ी यानी कि बच्चों से जुड़ा हो.

साथ ही गृहिणियों को भी अपना कीमती समय इन धारावाहिकों को देखने में बरबाद न कर कुछ रचनात्मक करना चाहिए. अपने बच्चों के लिए भी यह उन की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे खुद भी अंधविश्वासों से दूर रहें और उन्हें भी दूर रखें. अच्छे मनोरंजक और ज्ञानवर्धक सीरियल ही देखें.

आप भी लड़ सकते हैं माइग्रेन से

अपनी डाइट और सेहत का आप कितना ख्याल रखते हैं. आजकल की दौड़ती-भागती जिंदगी में लोगों के पास इतना भी समय नहीं है कि वे खुद पर ध्यान दे सके, जिससे लोगों को अवसाद जैसी गहन समस्याऐं हो रही हैं. इतना ही नहीं, अव्यवस्थित जीवनशैली की वजह से आप माइग्रेन जैसी समस्या को भी न्यौता दे देते हैं. आज पूरी दुनिया में माइग्रेन से पीड़ित लोगों की तादात बढ़ते जा रही है.

सिर में बेवजह बार-बार दर्द होना ही, माइग्रेन है. माइग्रेन का अगर जल्दी से नहीं इलाज नहीं किया गया तो इससे आगे भयंकर बीमारी हो सकती है. हाल ही में एक रिसर्च में यह पाया गया है कि माइग्रेन का शिकार व्यक्ति यदि अपने पार्टनर के साथ शारीरिक संबंध बनाता है तो माइग्रेन की समस्या से निजात पाया जा सकता है.

प्रमुख लक्षण

कोई अजीब लक्षण माइग्रेन में नहीं देखे जाते. उल्टी आना, चक्कर आना और हमेशा थकान महसूस करना ही, इसके लक्षण हैं.

घरेलू उपाय 

बेहतर डाइट और कुछ खास घरेलू उपाय अपनाकर माइग्रेन से निजात पाया जा सकता है. आज हम आपको 6 तरह के फूड बताने जा रहे हैं, जिन्हें नियमित रूप से खाकर आप आसानी से माइग्रेन को रोक सकते हैं.

1. हरी पत्तेतदार सब्जिमयां
आपको हरी पत्तेदार सब्जियां खानी चाहिए. मैग्नीशियम माइग्रेन के दर्द के लिए बहुत कारगर है और पत्तेदार सब्जियों में पर्याप्त मात्रा में मैग्नीशि‍यम पाया जाता है. इनके अलावा अनाज, सी-फूड और गेंहूं में भी भरपूर मात्रा में मैग्नीशियम होता है, आप इनका भी सेवन कर सकते हैं.

2. दूध
दूध, कैल्शिजयम, प्रोटीन, विटामिन और लैक्टिक एसिड से भरपूर होता है. ये तीनों ही चीजें माइग्रेन में बहुत ही फायदेमंद होती हैं. कई दफा ऐसा भी होता है कि आपके दिमाग की नसें बिल्कुल सुस्त सी पड़ जाती हैं और फिर माइग्रेन का दर्द शुरू हो जाता है, ऐसे में दूध आपको एनर्जी भी देता है. यहां बस ये ध्यान रखने वाली बात है कि आप जो दूध पी रहे हैं वो फैट फ्री होना चाहिए.

3. रेड वाइन
सेहत सलाहकार कहते हैं कि रोज एक ग्लास रेड वाइन का सेवन करने से शरीर को एक घंटे किये गए व्यायाम, जितना फायदा मिलता है. रेड वाइन माइग्रेन के दर्द को दूर करने में सहायक होता है.

4. ब्रॉकली
ब्रॉकली मैग्नीशि‍यम, फाइबर्स और विटामिन सी का एक बेहतरीन स्रोत है. खुद को सेहतमंद रखने के लिए है नियमित रूप से ब्रॉकली खाना चाहिए. ब्रॉकली के सेवन से न केवल वजन नियंत्रण में रहता है बल्कि दिल की कई बीमारियों से लड़ने की भी ताकत मिलती है. माइग्रेन के इलाज में ब्रॉकली सहायक होता है.

5. मछली
अपर आप माइग्रेन के मरीज हैं और आप अगर आप मछली नहीं खाते तो अब खाना शुरू कर दें. ये बात तो हम हमेशा से पढ़ते आ रहे हैं कि मछली में ओमेगा 3 फैटी एसिड और विटामिन ई पाया जाता है. ये दोनों ही माइग्रेन के दर्द को कम करते हैं.

6. फायदेमंद कॉफी
अकसर देखा गया है कि सामान्य सी सिर दर्द में लोग चाय या कॉफी को पीना पसंद करते हैं. उसी तरह माइग्रेन में भी ये काफी मददगार है. माइग्रेन अटैक आने पर कॉफी पीने से राहत मिलती है.

इन सभी को अपनी फूड डाइट में शामिल करने के साथ-साथ आपको व्यायाम करना चाहिए. नींद पूरी लेना चाहिए और खाना समय पर खाना चाहिए.

वैलेंटाइन डे पर दिखना है खूबसूरत तो…

बेशक वैलेंटाइन डे के दिन आप रोज से कुछ अलग और हटकर नजर आना चाहती होंगी. ज्यादातर महिलाओं को लगता है कि मेकअप भर से उनकी खूबसूरती निखर जाएगी लेकिन ऐसा नहीं है. भले ही ऐसा करके आप कुछ देर के लिए ग्लैमरस और निखरी हुई नजर आएं लेकिन एक समय के बाद चेहरे की थकान साफ पता चलने लगती है.

ऐसे में कुछ उपाय अपनाकर आप नैचुरल तरीके से अपनी रंगत निखार सकती हैं और इस स्पेशल दिन को खास बना सकती हैं. ऐसे में वैलंटाइन डे से पहले ये उपाय अपनाएं और फर्क देखें.

1. रात को सोने से पहले चेहरे को अच्छी तरह साफ करके सोएं. मेकअप लगा हुआ चेहरा लेकर सोना आपकी रंगत फीकी कर सकता है.

2. क्लीनिंग के बाद टोनिंग की बारी आती है ताकि चेहरे में कसावट आए. वैसे तो बाजार में कई तरह के टोनर मौजूद हैं लेकिन आप चाहें तो नैचुरल चीजों को इस्तेमाल कर सकती हैं.

3. अगर आपकी त्वचा थकी-थकी लग रही है तो बर्फ के एक टुकड़े को कपड़े में लपेटकर चेहरे की मसाज करें. ऐसा करने से ताजगी आएगी.

4. अब कोई भी फेस पैक जो आपको सूट करता हो लगाएं. आप चाहें तो टमाटर या फिर पपीते का पैक लगा सकती हैं. इससे चेहरा नेचुरल तरीके से ब्लीच हो जाता है और उसमें निखार आता है. कुछ देर बाद चेहरा धो लें.

5. आंखें खूबसूरत नजर आएं, इसके लिए आंखों पर कोल्ड-वॉटर में डिप किए टी-बैग्स रखें.

6. अब चेहरे को तौलिए की मदद से हल्के हाथों से पोछ लें और मॉइश्चराइजर लगाएं.

वैलेंटाइन डे परिधान हो खास

वैलेंटाइन डे अपने प्रेमी के प्रति समर्पण और प्यार का प्रतीक है. ऐसे में दिल की बात सामने आती है और दिल का रंग लाल होता है इसलिए इस अवसर पर युवतियां लाल व औरेंज कलर के परिधान में दिखती हैं.

डिजाइनर श्रुति संचेती कहती हैं कि आप इस दिन कोई भी कलर पहनें, अच्छा दिखना चाहिए. जानिए कैसे परिधान पहनें वैलेंटाइन डे पर.

1. पार्टी हो या ईवनिंग डेट, ए लाइन ड्रैस, गाउन वगैरा अधिक आकर्षक लगती है. कलर हमेशा ब्राइट ही पहनें.

2. अगर इंडियन ट्रैडिशनल पहनना चाहती हैं तो अनारकली ड्रैस भी पहन सकती हैं. इस से आकर्षक लुक आता है.

3. साड़ी भी वैलेंटाइन डे पर अच्छी लगती है. आप रैड या मैरून कलर की साड़ी के साथ गोल्डन कलर  का स्लीवलैस ब्लाउज पहन सकती हैं.

4. वैलेंटाइन डे जाड़े में होता है इसलिए वैस्टर्न या ट्रैडिशनल वियर के साथ गोल्ड या ब्लैक जैकेट पहनें.

5. परिधान के साथ ऐक्सैसरीज भी माने रखती हैं. लाइट कलर की ड्रैस के साथ रैड कलर की ज्वैलरी या ब्लैक कलर की ऐक्सैसरीज फ्रैश लुक देती हैं.

6. अधिक ढीली या टाइट ड्रैस न पहनें. इस से आप पार्टी में डांस फ्लोर पर नहीं जा सकतीं.

7. ड्रैस के साथ हेयर लुक भी सौफ्ट होना चाहिए स्ट्रेट या कर्ली हेयर देनों ही इस दिन अच्छे लगते हैं.

8. वैलेंटाइन डे के दिन वैस्टर्न और इंडियन ड्रैस को मिक्स मैच कर दिया गया कौंटैंपररी लुक भी काफी पौपुलर है.

9. युवक इस दिन सेमी फॉर्मल वियर पहन सकते हैं, जिस में डार्क जींस, फौर्मल शर्ट के साथ अच्छा लुक देती हैं. कार्डिगन भी आजकल फैशन स्टेटमैंट बन चुका है.

10. साफ जूते पहनें, युवतियां अकसर युवकों के जूतों की ओर ध्यान देती हैं. ऐसे में गंदे जूते आप की पर्सनैलिटी पर दाग लगा सकते हैं.

11. अच्छी बैल्ट अवश्य पहनें, यह स्टाइल को पूरी तरह से बदल देती है.

12. खूबसूरत क्लासिक घड़ी आप की कलाई में अवश्य होनी चाहिए. इस से आप की पर्सनैलिटी अच्छी लगती है.

गृहवाटिका से खाद्य सुरक्षा

सब्जियां हमारे भोजन को स्वादिष्ठ, पौष्टिक और संतुलित बनाने में सहायक हैं. इन के माध्यम से शरीर को कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, खनिज लवण, आवश्यक अमीनोएसिड व विटामिन मिलते हैं. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने भोजन में लगभग 100 ग्राम पत्तेदार सब्जियां, 100 ग्राम जड़ वाली सब्जियां और 100 ग्राम दूसरी सब्जियां खानी चाहिए.

बाजार में उपलब्ध सब्जियां व फल आमतौर पर ताजे नहीं होते तथा महंगे भी होते हैं. साथ ही उन में मौजूद रोगाणुओं व हानिकारक रसायनों की मात्रा के कारण वे स्वास्थ्यकर भी नहीं होते. इसलिए बेहतर है कि खाने के लिए सब्जियों को अपने घर या घर के आसपास गृहवाटिका यानी किचन गार्डन में उगाएं जिस से खाद्य सुरक्षा के साथसाथ वाटिका में कार्य करने से घर के सदस्यों का व्यायाम भी हो जाए.

गृहवाटिका से कुछ हद तक सभी लोग जुड़ सकते हैं चाहे वे गांव में रहते हों या शहर में. बड़े शहरों में जहां पौधे उगाने के लिए जमीन की उपलब्धता नहीं है वहां भी कुछ चुनिंदा सब्जियों को गमलों व डब्बों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है. गांव में जहां जगह की कमी नहीं है, वहां सब्जियों के अलावा फल वाले पौधे जैसे पपीता, केला, नीबू, अंगूर, अमरूद, स्ट्राबैरी, रसभरी आदि भी आसानी से उगाए जा सकते हैं.

गृहवाटिका बनाते समय ध्यान रखें :

1. गृहवाटिका के लिए खुली धूप व हवादार छायारहित स्थान या घर के पीछे दक्षिण दिशा सर्वोत्तम होती है.

2. सिंचाई का प्रबंध अच्छा व स्रोत पास में होना चाहिए.

3. अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि इस के लिए उपयुक्त होती है. सड़ी हुई गोबर की खाद की सहायता से खराब भूमि को भी सुधार कर गृहवाटिका के योग्य बनाया जा सकता है.

4. गृहवाटिका का आकार व माप, स्थान की उपलब्धता, फल व सब्जियों की आवश्यकता और समय की उपलब्धता आदि पर निर्भर करता है. चौकोर आकार की गृहवाटिका सर्वोत्तम मानी जाती है.

5. अगर वाटिका खुली जगह में बना रहे हैं तो उस के चारों ओर लकड़ी, बांस आदि की बाड़ बनानी चाहिए.

6. जमीन की 10-15 सैंटीमीटर गहराई तक खुदाई करें व कंकड़पत्थर निकाल कर मिट्टी को भुरभुरा बना कर आवश्यकतानुसार क्यारियां बना लेनी चाहिए.

7. क्यारियों में सड़ी गोबर की खाद व जैविक खाद आदि का प्रयोग करना चाहिए.

8. सीधे बुआई की जाने वाली व नर्सरी द्वारा लगाई जाने वाली सब्जियों को लगाने से पूर्व जैव फफूंदनाशी व जैव कल्चर से उपचारित करने के बाद उचित दूरी पर बनी कतारों में बोना चाहिए.

9. क्यारियों में समयसमय पर सिंचाई व निराईगुड़ाई करते रहना चाहिए.

10. गृहवाटिका में कीट नियंत्रण व बीमारियों से बचाव के लिए रासायनिक दवाओं का कम से कम प्रयोग करना चाहिए. नीमयुक्त व जैविक दवाओं का ही प्रयोग करना चाहिए.

11. उपलब्ध जगह का अधिक से अधिक प्रयोग करने के लिए बेल वाली सब्जियां जैसे लौकी, तोरई, करेला, खीरा आदि को दीवार के साथ उगा कर छत या बाड़ के ऊपर ले जा सकते हैं.

12. जड़ वाली सब्जियां जैसे मूली, शलगम, गाजर व चुकंदर को गृहवाटिका की क्यारियों की मेड़ों के ऊपर बुआई कर के पैदा किया जा सकता है.

मौसमी फल व सब्जियां

ग्रीष्मकालीन सब्जियां : (बुआई का समय जनवरी से फरवरी) टमाटर, मिर्च, भिंडी, करेला, लौकी, खीरा, टिंडा, अरबी, तोरई, खरबूजा, तरबूज, लोबिया, ग्वार, चौलाई, बैगन, राजमा आदि.

वर्षाकालीन सब्जियां : (बुआई का समय–जून से जुलाई) टमाटर, बैगन, मिर्च, भिंडी, खीरा, लौकी, तोरई, करेला, कद्दू, लोबिया, बरसाती प्याज, अगेती फूलगोभी आदि.

शरदकालीन सब्जियां : (बुआई का समय–सितंबर से नवंबर) फूलगोभी, गाजर, मूली आलू, मटर, पालक, मेथी, धनिया, सौंफ, शलगम, पत्तागोभी, गांठगोभी, ब्रोकली, सलाद पत्ता, प्याज, लहसुन, बाकला, बथुआ, सरसोंसाग आदि.

उपरोक्त सब्जियों के अलावा गृहवाटिका में कुछ बहुवर्षीय पौधे या फलवृक्ष भी लगाने चाहिए, जैसे अमरूद, नीबू, अनार, केला, करौंदा, पपीता, अंगूर, करीपत्ता, सतावर आदि.

आवश्यक सामग्री

यंत्र : फावड़ा, खुरपी, फौआरा, दरांती, टोकरी, बालटी, सुतली, बांस या लकड़ी का डंडा, एक छोटा स्प्रेयर.

बीज : गृहवाटिका में कम जमीन के अंदर अधिक से अधिक उत्पादन देने वाले गुणवत्तायुक्त बीज या पौध को विश्वसनीय संस्था से खरीद कर प्रयोग करें.

पौधा : अधिकतर सब्जियों की पौध तैयार कर के बाद में रोपाई करते हैं. नर्सरी के अंदर स्वस्थ पौध तैयार कर के फिर उन की रोपाई कर या संस्था से पौध खरीद कर उन्हें गृहवाटिका में लगा कर सब्जियां उगाई जा सकती हैं.

जैविक व रासायनिक खाद : गोबर या कंपोस्ट खाद का प्रयोग ही गृहवाटिका के अंदर करना चाहिए. इन के उपयोग से पौष्टिक व सुरक्षित सब्जियां उगाई जा सकती हैं. परंतु कभीकभी अभाव की दशा व अधिक उत्पादन हेतु यूरिया, किसान खाद, सुपर फास्फेट, म्यूरेट औफ पोटाश की थोड़ी मात्रा की आवश्यकता होती है.

कीटनाशी व रोगरोधी दवाएं : गृहवाटिका के अंदर कीड़ों व बीमारियों का प्रकोप होता है तो ग्रसित पौधों के उस भाग को काट कर मिट्टी में दबा दें. प्रकोप होने पर जैविक कीटनाशी दवाओं का ही प्रयोग करें.

गृहवाटिका में छोटीछोटी क्यारियां बना कर और उन में सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद मिला कर क्यारियां समतल कर के उन में बीज की बुआई व पौध की रोपाई कर हलकी सिंचाई कर दें. आवश्यकतानुसार समयसमय पर सिंचाई व निराईगुड़ाई करते रहना चाहिए. बीचबीच में पौधों को सहारा देना चाहिए. सब्जियां तैयार होने के बाद उन की उचित अवस्था में तुड़ाई कर के उन्हें उपयोग करें. उचित प्रबंधन व देखभाल के साथ गृहवाटिका के अंदर ताजी, पौष्टिक व स्वादिष्ठ सब्जियां पैदा की जा सकती हैं जो परिवार के भोजन को अधिक पौष्टिक व संतुलित बना सकती हैं. इस प्रकार, गृहवाटिका हमारी खाद्य सुरक्षा का एक विकल्प भी है.

मुहब्बत का शिकायतनामा

युवतियों का शिकायतनामा

जब युवकों को हम से दोस्ती करनी होती है, तो वे आगेपीछे घूमते हैं, पर बाद में सारी अटैंशन व प्यार छूमंतर हो जाता है.

पहलेपहल तो आसमान से तारे तोड़ कर लाने को तैयार रहते हैं, प्यार निछावर करते हैं, पर बाद में कद्र नहीं करते.

एक बार दोस्ती हो जाने पर वे हम पर अपनी बातें व पसंदनापसंद तक थोपना शुरू कर देते हैं, यह पहनो, यह मत पहनो, यह क्यों खाती हो, मोटी हो रही हो आदि.

केयर हम उन की करते हैं, वे हमारी नहीं करते.

कहीं घूमने जाने को कहो तो आनाकानी करते हैं.

हमारी नई ड्रैस, फुटवियर या पर्स की कभी प्रशंसा नहीं करते, झूठी भी नहीं.

जब खुद का मिलने का मन हो तो जिद पर उतर आते हैं और बस हुक्म देना जानते हैं.

वे कभी टेक केयर शब्द का इस्तेमाल नहीं करते हैं.

हम उन की खुद से भी ज्यादा केयर करते हैं, जो उन्हें भी मालूम होता है कि हम उन्हें कितना चाहते हैं, पर वे कभी इजहार नहीं करते.

जब भी मिलने आते हैं खाली हाथ आते हैं, न कोई फूल न चौकलेट.

युवकों की सफाई

ऐसा नहीं है कि हम उन की परवा नहीं करते. हम भी उन की उतनी ही चिंता करते हैं, पर शो नहीं करते.

जब तक रोज 10-20 बार आई लव यू न कहो उन्हें लगता ही नहीं कि हम उन्हें प्यार करते हैं.

एक तरफ तो शिकायत रहती है कि हम उन पर ध्यान नहीं देते, पर जब उन्हें कम खाने अथवा ड्रैसेज के बारे में कोई सुझाव देते हैं, तो कहती हैं कि हुक्म चलाते हो.

केयर से उन का मतलब गुडनाइट, गुडमौर्निंग का मैसेज भेजने से होता है.

मिलने हेतु इतनी देर से आती हैं, मूड औफ हो जाता है.

वे झूठी प्रशंसा से भी खुश हो जाती हैं, जो हमें पसंद नहीं. हां, उन की ड्रैस आदि की हमें समझ नहीं होती.

प्यार में मिलना कितना जरूरी होता है यह तो बस प्रेमी ही जान सकते हैं.

विदा लेते समय प्यार से गाल छूने या हाथ दबाने का यही अर्थ है.

हम अपनी इस कमजोरी को उन से छिपा कर रखना चाहते हैं कि हम उन के बगैर कुछ नहीं या उन से दूर हो कर रह नहीं सकते.

हमारे प्यार को देखें चौकलेट व फूल समयसमय पर देते ही रहते हैं.

युवकों का शिकायतनामा

इजहार हो जाने के बाद वे हमें अपनी उंगलियों पर नचाना चाहती हैं.

अगर कोई बात काट दो या न मानो तो मुंह फुला कर बैठ जाती हैं, कईकई दिन तक फिर बात नहीं करतीं, उन की हर बात मानना हमारे लिए मानो अनिवार्य हो.

जब उन का मन होता है तभी मिलने का नाम लेती हैं वरना आनाकानी करती व बहाने बनाती हैं.

किसी दूसरी युवती या फ्रैंड से बात भी करो तो उन्हें परेशानी होने लगती है. वे हमें अपने पल्लू से बांधे रखना चाहती हैं.

प्यार करने के नाम पर उन्हें पेटदर्र्द शुरू हो जाता है.

अगर झगड़ा हो जाए और बातचीत भी बंद हो तब हमें जलाने में उन्हें बड़ा मजा आता है. जो बातें हम उन्हें मना करते हैं, तब वे जानबूझ कर वही करती हैं. मसलन, कालेज के किसी लोफर युवक से बातें करना या उस के साथ घूमना.

किसी दिन ज्यादा तव्वजो न दो तो ‘कोई और मिल गई है क्या?’ जैसे ताने देती हैं.

बिजी होने पर यदि फोन या मैसेज का रिप्लाई न करो तो झगड़ा होना तय समझो.

वे बस अपनी फीलिंग्स को ही महत्त्व देती हैं, हमें समझने की कोशिश नहीं करतीं.

फोन करो तो उठाती नहीं, ‘रात है, वीकैंड है’ जैसे बहाने उन के पास हमेशा तैयार रहते हैं.

युवतियों की सफाई

दरअसल, हम उन की केयर करती हैं, मसलन शेव न बढ़ाने देना आदि.

दरअसल, अपनी थोड़ी इंपोर्टैंस तो दिखानी ही पड़ती है. फिर रूठना तो युवतियों का अधिकार है और हमें मनाना उन की जिम्मेदारी.

ज्यादा मिलनेमिलाने से वह जोश नहीं रहता इसलिए थोड़ा गैप देती हैं ताकि उत्साह और मिलने की बेचैनी बनी रहे.

एक सीमा तक ही किसी युवती से मिलनामिलाना, बात करना ठीक रहता है, पर जब यह ओवर हो जाता है, तब हमें मुंह खोलना ही पड़ता है.

ये एक बार में ही प्यार की सारी डोज दे और ले लेना चाहते हैं, जो हम पसंद नहीं करतीं.

यही तो समय होता है यह जानने का कि वह हमारी कितनी परवा करता है. उस के चिढ़ने, हमें फौलो करने का मतलब है कि वह हम पर जान छिड़कता है. इसी जलानेचिढ़ाने में तो मजा है.

मिलने पर ऐसा दिखावा करते हैं मानो मिलने की बेचैनी सिर्फ हमें रहती है उन्हें नहीं. ध्यान ही नहीं देते हम पर.

फोन रिसीव न कर सकें तो कम से कम एक मैसेज तो डाल ही सकते हैं कि बिजी हूं. टौक टू यू लेटर.

ये कभी मन की बातें शेयर नहीं करते. कुछ जानना चाहो तो ‘लीव इट यार’ कह कर बात टाल जाते हैं.

इन का मन रात को ही बातें करने का अधिक होता है. परिवार वालों की मौजूदगी में यह कठिन होता है.

युवतियों हेतु टिप्स

युवतियों के लिए टिप्स, ताकि उन के बौयफ्रैंड के साथ हमेशा प्यारा भरा रिश्ता कायम रहे और वे हमेशा उन की बांहों में झूलती रहें :

– बौयफ्रैंड पर बंदिश लगाने के बजाय उसे आजाद घूमने दें, अगर आप का प्यार सच्चा और रिश्ता मजबूत है तो आप के बीच कोई नहीं आएगा, इसलिए अपने मन से इस डर को निकाल दें कि कहीं वह किसी और का न हो जाए.

– छोटीमोटी बातों को तूल न दें, अगर वह वास्तव में बिजी है या किसी परेशानी में घिरा है तो उस का साथ दें.

– दूर चली जाने अथवा रिश्ता तोड़ देने की धमकी दे कर अपनी हर जायजनाजायज बात उस पर थोपने की कोशिश न करें.

– उस के सामने बनावटीपन न दिखाएं. आप जैसी हैं वैसी ही बनी रहें.

– उस के सामने ओवरस्मार्ट बनने का प्रयास कर के उस की हर बात को बीच में ही न काटें.

– उस के सामने हर वक्त अपनी छोटीछोटी परेशानियों का रोना न रोएं इन्हें आप खुद सुलझाना सीखें, इस से आप का आत्मविश्वास बढ़ेगा.

– अगर वह आप को टेक केयर नहीं कहते हैं, तो आप इस की शुरुआत कर दें, कुछ दिन में वे आप को खुद टेक केयर कहने लगेंगे.

– किसी दूसरी युवती से बात करें, तो आप जलें नहीं, बल्कि बातचीत में शामिल हो कर उन के बीच अपनी उपस्थिति व बड़प्पन दर्ज करवाएं. इस से आप के पार्टनर को भी अच्छा फील होगा और वह भी आप से कोई बात नहीं छिपाएगा.

युवकों हेतु टिप्स

युवकों के लिए कुछ टिप्स, ताकि उन की गर्लफ्रैंड को भरोसा हो जाए कि आप भी उन की उतनी ही परवा व प्यार करते हैं, जितनी वे आप की :

–       युवतियां युवकों से बिलकुल अलग होती हैं, इसलिए उन्हें खास अटैंशन दें. उन की फीलिंग्स की हमेशा कद्र करें व उन्हें वैसा ही रिस्पौंस दें, जैसा वे आप से चाहती हैं.

–       उन की हर बात, ख्वाहिश व सलाह को इग्नोर न करें, अगर वे कहीं घूमने जाने अथवा ढेरों बातें करने के मूड में हैं तो उन्हें बीच में टोक कर या मना कर के उन का दिल न तोड़ें.

–       वे आप को प्यार करती हैं इस नाते आप से उन्हें कुछ उम्मीदें भी बंध जाती हैं. इसलिए उन्हें टेक केयर कहना कभी न भूलें, इस से उन्हें महसूस होता है कि आप उन की कितनी परवा करते हैं.

–       अगर गलती हुई है तो सौरी बोल कर मना लें. यदि गलती उन की भी हो, तो भी यह इंतजार न करें कि वे आप से माफी मांगें.

–       गर्लफ्रैंड की किसी भी समस्या को एक कान से सुन कर दूसरे से निकालने की आदत न बनाएं, बल्कि समाधान ढूंढ़ें.

– जो बातें उन्हें तकलीफ पहुंचाती हैं, उन्हें कभी न दोहराएं. भूल कर भी उन का मजाक न उड़ाएं.

–       अगर वे आप को अपनी नई ड्रैस, पर्स, सैंडिल या ईयररिंग्स दिखा कर तारीफ का इंतजार कर रही हैं, तो इन चीजों को दूर से देख कर ‘हां अच्छी है’ कह कर न टालें.

–       डेटिंग के बाद उन्हें घर, यदि घर नहीं जा सकते तो घर के निकट कहीं ड्रौप करें व फोन अथवा मैसेज कर के अवश्य पूछें कि वे सकुशल घर पहुंच गईं.

महिला डाक्टर की महत्ता

हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने एक शोध में पाया गया है कि आमतौर पर प्रौढ़ मरीजों को महिला डाक्टरों से ज्यादा अच्छा इलाज मिलता है. उन्हें गंभीर बीमारियों में भी अपेक्षाकृत कम बार अस्पताल आना पड़ता है और बीमारियों का अंत मृत्यु में कम होता है. चूंकि महिला और पुरुष डाक्टर एकसाथ पढ़ते हैं, उन की ट्रेनिंग एकसाथ होती है, वे एकसाथ अस्पतालों में काम करते हैं, इसलिए इस नतीजे ने शोध करने वालों को चौंकाया था.

हालांकि स्वास्थ्य सुधार का यह अंतर बहुत ज्यादा नहीं है पर इतना अवश्य साबित करता है कि महिला डाक्टर एक तो अपने कार्य के प्रति ज्यादा गंभीर होती हैं और साथ ही, मरीजों की समस्याओं को वे आसानी से समझ लेती हैं. अगर अमेरिका में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या से इस फर्क को देखा जाए तो 32 हजार जानें बच सकती थीं अगर सभी डाक्टर महिलाएं होतीं.

यह स्वाभाविक भी लगता है क्योंकि लाखों वर्षों से प्रकृति ने औरतों को ही शिशुओं के दुखदर्द को बिना कहे जानने की कला सिखा दी है और पहली बार मां बनने वाली औरत भी जानती है कि उस का बच्चा कब, क्यों परेशान है या क्या चाहता है.

पुरुष डाक्टर इस दंभ में रहते हैं कि जब तक उन से बताया न जाए, वे मरीज का दर्द समझने की कोशिश नहीं करेंगे. यही नहीं, महिला डाक्टर अपने काम में शौर्टकट रूट नहीं अपनातीं. यह शायद इसलिए है कि महिलाओं को खाना पकाने में शौर्टकट काम करने के दुर्गुणों का असर मालूम होता है. पुरुष आमतौर पर समूहों में काम करते हैं और एक की कमी को दूसरा ठीक कर देता है. पुरुष डाक्टर ज्यादा मैकेनिकल भी होते हैं, वे सोचते हैं कि इस दुनिया में हर पल संघर्ष होता ही है और मृत्यु कोई अचरज नहीं. इसी कारण हजारों सालों से युद्घ की कला का विकास पुरुषों ने किया है, औरतें तो युद्ध की शिकार होती हैं चाहे वे विजयी पक्ष की हों या पराजयी पक्ष की.

महिला डाक्टरों की जरूरत को सभी सरकारों को समझना चाहिए और उन के पेशे में उन्हें विशेष प्रोत्साहन देना चाहिए. यदि आरक्षण न भी दिया जाए तो उन्हें फीस में छूट, छुट्टियों, काम के घंटों में ढील आदि सुविधाएं दी जानी चाहिए. महिला डाक्टरों की जरूरत ज्यादातर यौनांग संबंधी बीमारियों में होती है, जबकि वे हर तरह की बीमारी में पुरुष डाक्टरों से बेहतर हैं.

तालिबान से भारत को खतरा

तालिबानियों को रूस, चीन व पाकिस्तान का सीमित समर्थन मिलने का मतलब है कि भारत के लिए आतंकवादियों से खतरा बढ़ना. मास्को में दिसंबर के अंत में तीनों देशों ने इस बारे में अनौपचारिक बातचीत की और कुछ हद तक तालिबानियों को अफगानिस्तान में डटे रहने की छूट दे दी है.

सीरिया और इराक में इसलामिक स्टेट के जिहादियों की हार से मुसलिम कट्टरपंथियों के हौसले कम नहीं हुए हैं और अब वे फिर से अफगानिस्तान में जमा होने लगे हैं. और काबुल की अमेरिका व भारत समर्थित सरकार मुंह देख रही है कि हवा किस ओर की है. काबुल में राज कर रहे 2 धड़ों में विवाद चल रहा है, तालिबान के नियंत्रण में अफगानिस्तान का जो हिस्सा है, वहां वह चैन से मनमरजी कर रहा है.

इस का अर्थ है कि भारत की आतंकवाद से निबटने की उम्मीदें और कम हो गई हैं. अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनेआप में खब्ती हैं और वे कब क्या फैसला लेंगे, इस का किसी को पता नहीं. उन्होंने चुनावों के दौरान यही कहा कि उन्हें अमेरिकियों से मतलब है, विश्व सिक्योरिटीमैन बनने की उन की कोई इच्छा नहीं.

अफगान तालिबानियों के लिए भारत का कश्मीर शहद का छत्ता है जिस के लालच में वे पाकिस्तान ही नहीं, पूरे मध्यएशिया के मुसलिम कट्टरपंथियों को आकर्षित कर उन्हें कश्मीर में उत्पात मचाने के लिए तैयार कर सकते हैं. भारत को तालिबानियों से निबटने के लिए अकेले ही तैयार होना होगा.

तालिबानियों का कट्टरपन और जिहादीपन ऐसा है कि हमारे लिए उन्हें कंट्रोल करना आसान नहीं है.

भारत की विदेश नीति हमेशा ढुलमुल रही है और उस में स्वार्थ कम, अंधभक्ति ज्यादा रही है. दुश्मन को साथी बनाना हमारे राजनीतिक दल जानते हैं, पर हमारा विदेश मंत्रालय नहीं.

फिल्म रिव्यू : जॉली एलएल बी 2

हास्य व्यंग्य से युक्त कोर्टरूम ड्रामा वाली फिल्म ‘‘जॉली एलएलबी 2’’ देखकर दर्शक को वास्तव में भारतीय अदालतों की कारवाही की याद आएगी. क्योंकि जिस तरह से भारतीय अदालतों में मुकदमे वर्षों तक घिसटते रहते हैं, उसी तरह यह फिल्म भी घिसटते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ती है. फिल्म में रोमांचक पलो का घोर अभाव है. कहानी में कोई नयापन नहीं है. कई फिल्मों से चीजें उठाकर पेश कर दी गयी हैं.

कहानी की शुरुआत लखनऊ में एक स्कूल के सामने से होती है, जहां लोगों और पुलिस का भी जमावड़ा है. स्कूल के अंदर कक्षाओं में बच्चे परीक्षा देने के लिए बैठे हैं, मगर सभी को प्रश्नपत्र का उत्तर लिखवाने वाले का इंतजार है. अंग्रेजी का पर्चा है. कुछ देर में स्कूल के बाहर वकील जगदीश्वर मिश्रा उर्फ जॉली (अक्षय कुमार) आकर पांच हजार रूपए लेकर माइक पर सवालों के जवाब लिखवा देता है. फिर वह अदालत पहुंचते हैं. पता चलता है कि वह फिलहाल वकील रिजवी के यहां मुंशी हैं, जिनके साथ कभी उनके पिता भी मुशी थे. पर जॉली को अपना खुद का चेंबर चाहिए, वकील बनना है. इसके लिए वह दुबे को को दस लाख रूपए देते हैं. इसी के चलते जॉली,हीना सिद्दिकी (सयानी गुप्ता) से कह देता है कि वकील रिजवी उसका मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हैं और दो लाख रूपए चाहिए. जॉली को चेंबर मिल जाता है, पर हीना को सच पता चलता है. वह अपने घर की छत से कूदकर आत्महत्या कर लेती है. अब आत्मग्लानि व अपराध बोध से ग्रसित जॉली, हीना का केस लड़ने का फैसला कर सारे कागजात का अध्ययन करता है.

जॉली घर के अंदर पत्नी के सामने चूहा बने रहते हैं. वह अपनी पत्नी पुष्पा पांडे (हुमा कुरेशी) को खुद ही जाम बनाकर पीने के लिए देते हैं. हीना की शादी के बीस घंटे बाद ही हीना के पति इकबाल कासिम (मानव कौल) का पुलिस इंस्पेटर सूर्यवीर सिंह (इनामुल हक) ने एनकाउंटर कर दिया था और उसे इकबाल कादिर नाम दिया था. उसी दिन हेड कांस्टेबल भदोरिया की भी हत्या सूर्यवीर ने की थी. सारे कागजात पढ़कर जॉली एक पीआईएल दाखिल करता है. जिसकी सुनवाई न्यायाधीश सुंदरलाल त्रिपाठी (सौरभ शुक्ला) की अदालत में शुरू होती है. सूर्यवीर की तरफ से वकील प्रमोद माथुर (अन्नू कपूर) मुकदमा लड़ते हैं. पहले ही दिन अदालत मेंजॉली की बातों से सूर्यवीर को खतरा महसूस होता है. फिर जब पता चलता है कि जॉली झांसी जाकर भदोरिया के बेटे को गवाही के लिए लेकर आएगा, तो जॉली पर गोली चल जाती है.

अस्पताल से निकलकर जॉली इसी मुकदमें पर काम शुरू करता है. माथुर चालाकी से भदौरिया के बेटे को झूठा साबित कर जॉली व भदोरिया के बेटे को झूठी गवाही देने के लिए सजा सुनवा देता है. जॉली का वकालत का लायसंस खत्म न हो, इसके लिए चार दिन के अंदर जॉली को खुद को निर्दोष साबित करना है. फिर पता चलता है कि इकबाल कासिम की शादी में कश्मीर का एक पुलिस वाला बट मौजूद था. जॉली कश्मीर जाते हैं, वहां से उस पुलिस वाले को लेकर आते हैं. अब बट की गवाही न होने पाए इसके लिए वकील प्रमोद माथुर चाल चलते हैं और अदालत में धरने पर बैठ जाते हैं. सिनेमाई स्वतंत्रता के कई घटनाक्रम घटते हैं. अदालत पूरी रात चलती है. रात के बारह बजे तारीख बदलते ही फिर कारवाही शुरू हो जाती है. अंत में आतंकवादी इकबाल कादिर को पुलिस लेकर आ जाती है. सच सब के सामने आ ही जाता है.

फिल्म ‘‘जॉली एलएलबी 2’’ में आतंकवाद, भ्रष्टाचार, सिस्टम की गड़बड़ी, पुलिस के नकली एनकांउटर सहित तमाम मुद्दे उठाए गए हैं. फिल्म की कहानी में दो हत्याओं के मुकदमे समानांतर चलते रहते हैं, मगर अक्षय कुमार की मौजूदगी और सुभाष कपूर ने इसे गंभीर फिल्म की बजाय हास्य फिल्म की रंगत देने के चक्कर में पूरी फिल्म का बंटाधार कर दिया. फिल्म में जिस तरह से जोक्स पिरोए गए हैं, उससे कहानी व मुद्दे गौण हो जाते हैं. पूरी तरह से मूल कथानक से भटकी हुई कमर्शियल फिल्म बनकर रह जाती है.

पटकथा लेखक के तौर पर सुभाष कपूर बुरी तरह से असफल रहे हैं. फिल्म में उन्होंने जबरन ह्यूमर थोपने की कोशिश की है. फिल्म का क्लाइमेक्स बड़ा अजीबोगरीब है. अचानक हत्यारा अदालत में आकर अपना जुर्म कबूल कर लेता है. मगर फिल्म हंसाने की बजाय बोर करती है.

जॉली की पत्नी पुष्पा के किरदार में हुमा कुरेशी हैं, मगर उनके किरदार को फिल्म में सही ढंग से उभारा ही नहीं गया. यदि यह कहा जाए कि निर्देशक ने एक बेहतरीन प्रतिभा को जाया किया है, तो कुछ भी गलत नहीं होगा. फिल्म में अक्षय कुमार ने अपने स्टार पावर के अलावा अपनी कामिक टाइमिंग व संवाद अदाएगी के मैनेरिजम से फिल्म को काफी कुछ संभाला है. लेखक निर्देशक सुभाष कपूर को याद रखना चाहिए कि फिल्में महज स्टार पावर के बल पर नहीं कथानक के बल पर चलती हैं. अन्नू कपूर के अभिनय की तारीफ करनी पड़ेगी. फिल्म में मानव कौल व निखिल द्विवेदी को भी जाया किया गया है. इन दोनों ने इस फिल्म में क्या सोचकर अभिनय किया, यह बात समझ से परे है.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘जॉली एलएलबी 2’’ का निर्माण ‘‘फाक्स स्टार स्टूडियो’’ ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक सुभाष कपूर, संगीतकार चिरंतन भट्ट, मंज म्यूजिक व मीत ब्रदर्स, कैमरामैन कमलजीत नेगी व कलाकार हैं – अक्षय कुमार, हुमा कुरेशी, सौरभ शुक्ला, अन्नू कपूर, मानव कौल, इनामुल हक,निखिल द्विवेदी, सयानी गुप्ता व अन्य.

पधारो म्हारे देस…

राजेरजवाड़ों और राजसी वैभव के तमाम किस्से समेटे सांस्कृतिक और आधुनिकता का संगम बन चुका राजस्थान अपने अद्भुत वास्तुशिल्प, मधुर लोकसंगीत और रंगबिरंगे पहनावे के लिए मशहूर है. यही वजह है कि विदेशी पर्यटक यहां बरबस ही खिंचे चले आते हैं.

राजाओं की धरती राजस्थान देशी और विदेशी घुमक्कड़ों के लिए बेहतरीन पर्यटन स्थल माना जाता है. यह राज्य अपनी संस्कृति, रंगबिरंगे पहनावे और खूबसूरत ऐतिहासिक इमारतों के लिए जाना जाता है.

यहां की पुरानी हवेलियां जो कभी राजेमहाराजों और राजकुमारियों का निवास हुआ करती थीं, उन्हें पर्यटकों के लिए लग्जरी होटलों में तबदील कर दिया गया है. इन में रह कर पर्यटक कुछ समय के लिए खुद को इस राजसी राज्य का राजा महसूस करने लगते हैं.

जैसलमेर

राजस्थान के पश्चिमी हिस्से में थार के रेगिस्तान के हृदयस्थल पर स्थित जैसलमेर देश के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है. अनुपम वास्तुशिल्प, मधुर लोकसंगीत, विपुल सांस्कृतिक व ऐतिहासिक विरासत को अपने में समाए जैसलमेर पर्यटकों के स्वागत के लिए सदैव तत्पर रहता है. यह झुलसाने वाली गरमी और जमा देने वाली ठंडी रेगिस्तानी जमीन के लिए जाना जाता है.

दर्शनीय स्थल

डेजर्ट कल्चर सैंटर व म्यूजियम : डैजर्ट कल्चर सैंटर व म्यूजियम राजस्थान की संपन्न संस्कृति को दर्शाता है. इस संग्रहालय में कई तरह के पारंपरिक  यंत्र, प्राचीन व मध्ययुग के सिक्के, खूबसूरत पारंपरिक टैक्सटाइल व बेशकीमती चीजों को संगृहीत किया गया है.

सलीम सिंह की हवेली : बेहतरीन शिल्पकला का नमूना दर्शाती यह हवेली जैसलमेर किले के निकट पहाड़ियों के पास स्थित है. इस की छत को मोर के डिजाइन में तैयार किया गया है जबकि हवेली के मुख्यद्वार पर एक  विशालकाय हाथी किसी द्वारपाल की भांति खड़ा है. हवेली के भीतर 38 बालकनी हैं. हवेली को सामने से देखने पर यह एक जहाज की तरह प्रतीत होती है, इसी कारण कई लोग इसे जहाजमहल भी कहते हैं.

पटवा हवेली : पटवा हवेली जैसलमेर में स्थित हवेलियों में अपना अलग ही स्थान रखती है. पत्थर से बनी इस हवेली की किनारियों को सुनहरे रंग से रंगा गया है. इस हवेली को पटवा भाइयों द्वारा 1800 व 1860 के मध्य बनवाया गया था, जो गहनों के व्यापारी थे. वर्तमान में इसे पटवा स्टाइल के फर्नीचर व साजसजावट से सजाया गया है जो पर्यटकों को पटवाओं के रहन सहन की झलक दिखाता है.

कैमल सफारी : जैसलमेर का यह वह स्थान है जहां पर देशीविदेशी पर्यटकों को राजस्थान की शाही सवारी यानी ऊंट पर सवारी करने का रोमांचकारी अनुभव होता है. ऊंट पर्यटकों को अपनी पीठ पर बिठा कर पास ही स्थित छोटेछोटे गांवों तक सैर के लिए ले जाता है, जहां पर्यटकों को राजस्थानी जीवनशैली के दर्शन होते हैं. वहीं ऊंट पर बैठ कर आप हवेलियों, मंदिरों व अन्य स्थानों तक भी जा सकते हैं, रास्ते में आप को लोकनृत्य व लोकसंगीत की झलकियां देखने को मिलेंगी.

कैसे जाएं

रेल मार्ग : जैसलमेर रेलमार्ग से देश के अधिकतर शहरों से जुड़ा हुआ है.

सड़क मार्ग : सड़क  मार्ग द्वारा जैसलमेर जाने के लिए निजी औपरेटर्स के वाहन और राजस्थान सरकार की डीलक्स बसें हर समय उपलब्ध रहती हैं.

हवाई मार्ग : जोधपुर, जयपुर, मुंबई और दिल्ली से जैसलमेर के लिए इंडियन एअरलाइंस की सीधी फ्लाइट मिलती हैं.

कब जाएं

अक्तूबर से फरवरी तक आप यहां ठंड और बारिश के मिलेजुले मौसम का आनंद उठा सकते हैं.

उदयपुर

अरावली पहाड़ी के निकट स्थित राजस्थान के सब से खूबसूरत शहर उदयपुर को झीलों का शहर भी कहा जाता है. यह अपनी प्रकृति और मानवीय रचनाओं से समृद्घ अपनी सुंदरता के लिए जाना जाता है. यहां की हवेलियों, महलों, झीलों और हरियाली को देख कर सैलानी उमंग से भर जाते हैं. मनमोहक और हरेभरे बगीचे, झीलें, नहरें, दूध की तरह सफेद संगमरमर के महल इस शहर को रोमांटिक बनाते हैं.

दर्शनीय स्थल

सिटी पैलेस : इस महल की स्थापना 16वीं सदी की शुरुआत में की गई थी. इसे बनाने में 22 राजाओं का योगदान रहा. शीशे और कांच के कार्य से निर्मित यह भव्य महल यूरोपीय व चीनी वास्तुकला का उम्दा नमूना पेश करता है. किले के भीतर गलियारों, मंडपों, प्रांगणों व बगीचों के समूह हैं. इस में कई बालकनियां और टावर भी हैं. पैलेस के मुख्य हिस्से को संग्रहालय का रूप दिया गया है जिस में पुरानी वस्तुओं को संरक्षित रखा गया है.

पिछौला झील : इस झील के बीच में जलमहल, जग मंदिर, जगनिवास का निर्माण हुआ है. इस खूबसूरत झील के सफेद पानी में पर्यटक नौका विहार का आनंद लेते हैं.

सहेलियों की बाड़ी : यह उदयपुर की रानियों व राजकुमारियों के आराम करने के लिए बनवाई गई थीं. इस विश्राम स्थल में कई सुंदर फौआरे लगे हुए हैं. यह चारों ओर से हरियाली से घिरी है.

फतेहसागर : यह झील एक नहर द्वारा पिछौला झील से जुड़ी हुई है. यह 3 तरफ से पहाड़ियों से घिरी है इस के बीच में नेहरू पार्क है. इस में एक खूबसूरत रेस्तरां बनाया गया है जहां पहुंचने के लिए झील के बीच में एक पुल का निर्माण किया गया है. इस रेस्तरां में आराम से बैठ कर पर्यटक विभिन्न व्यंजनों का स्वाद लेते हैं.

भारतीय लोककला मंडल : जिन लोगों को राजस्थान की पारंपरिक व ऐतिहासिक वस्तुएं देखने में रुचि है उन के लिए यह स्थान सब से उपयुक्त है. यहां राजस्थानी पहनावे, गहने, वाद्ययंत्र, कठपुतलियां, मुखौटे और उस समय की सुंदर चित्रकारी का दुर्लभ संग्रह है. विशेष रूप से बच्चे यहां हर रोज दिखाए जाने वाले कठपुतली नृत्य का जम कर आनंद लेते हैं.

कैसे जाएं

रेल मार्ग :  उदयपुर, दिल्ली, जयपुर, अजमेर व अहमदाबाद से रेलमार्ग से सीधे जुड़ा हुआ है.

सड़क मार्ग : उदयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर स्थित है. दिल्ली, आगरा, जयपुर, अजमेर, माउंट आबू, अहमदाबाद से उदयपुर के लिए सीधी बस सेवाएं हैं.

हवाई मार्ग : सब से नजदीकी हवाई अड्डा महाराणा प्रताप है. यह डबौक में है. जयपुर, जोधपुर, औरंगाबाद, दिल्ली तथा मुंबई से नियमित उड़ानें उपलब्ध हैं.

कब जाएं

यदि आप उदयपुर घूमने का प्लान बना रहे हैं तो यहां जाने का सब से अच्छा मौसम वर्षा ऋतु के बाद है, क्योंकि बारिश के बाद यहां की सुंदरता असाधारण हो जाती है. वैसे यहां घूमने का उपयुक्त समय सितंबर से अप्रैल तक है.

माउंट आबू

माउंट आबू ‘डेजर्ट स्टेट’ कहे जाने वाले राजस्थान का इकलौता हिल स्टेशन है जो गुजरात वालों के लिए वहां की हिल स्टेशन की कमी को भी पूरा करता है. दक्षिणी राजस्थान के सिरोही जिले में गुजरात की सीमा से सटा यह हिल स्टेशन 4 हजार फुट की ऊंचाई पर बसा हुआ है. इस की सुंदरता कश्मीर से कम नहीं आंकी जाती.

दर्शनीय स्थल

नक्की झील : राजस्थान के माउंट आबू में 3,937 फुट की ऊंचाई पर स्थित नक्की झील लगभग ढाई किलोमीटर के दायरे में फैली हुई कृत्रिम झील है. झील के आसपास हरीभरी वादियां, खजूर के वृक्षों की कतारें, पहाडि़यों से घिरी झील और झील के बीच आईलैंड किसी को भी मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी है. झील में बोटिंग करने का मजा भी लिया जा सकता है, जिस में पैडल बोट, शिकारा व फैमिली बोट का मजा उठा सकते हैं.

सनसैट पौइंट : शाम के समय सनसैट पौइंट से सूरज के ढलने का नजारा देखने के लिए सैकड़ों सैलानी यहां उमड़ पड़ते हैं. पर्यटक इस नजारे को अपने कैमरों में कैद कर के ले जाते हैं. इस पौइंट तक पैदल चल कर तो जाया ही जा सकता है. यदि आप पैदल नहीं चलना चाहते तो यहां पहुंचने के लिए ऊंट अथवा घोड़े की सवारी कर के पहुंच सकते हैं.

हनीमून पौइंट :  सनसैट पौइंट से 2 किलोमीटर दूर नवविवाहित जोड़ों के लिए हनीमून पौइंट है. यह ‘आंद्रा पौइंट’ के नाम से भी जाना जाता है. शाम के समय यहां नवविवाहित जोड़े होटलों के कमरों से निकल कर प्रकृति का आनंद उठाते हैं.

टौड रौक : यह मेढक के आकार की बनी एक चट्टान है जो नक्की झील से कुछ ही दूरी पर स्थित है. यह चट्टान सैलानियों, विशेष रूप से बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करती है. चट्टान इस तरह अपने स्थान पर टिकी है मानो यह अभी झील में कूद पड़ेगी, इसलिए यह पर्यटकों के लिए कुतूहल का केंद्र है.

म्यूजियम और आर्ट गैलरी : राजभवन परिसर में 1962 में गवर्नमैंट म्यूजियम स्थापित किया गया है ताकि इस क्षेत्र की पुरातात्विक संपदा को संरक्षित रखा जा सके.

गुरुशिखर : गुरुशिखर समुद्रतल से करीब 1,722 मीटर ऊंचा है. यह अरावली पर्वत की सब से ऊंची चोटी है. इस शिखर से नीचे और आसपास का नजारा देखना सैलानियों को अलग ही अनुभव देता है.

वन्यजीव अभयारण्य : राज्य सरकार द्वारा 228 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को 1960 में वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था. पशुपक्षियों को नजदीक से देखने की चाह रखने वाले लोगों के लिए यह जगह उत्तम है. यहां वानस्पतिक विविधता, वन्यजीव व स्थानीय प्रवासी पक्षी आदि देखे जा सकते हैं. पक्षियों की लगभग 250 और पौधों की 110 से अधिक प्रजातियां देखी जा सकती हैं. साथ ही तेंदुए, वाइल्ड बोर, सांभर, चिंकारा और लंगूर आप को उछलकूद करते दिख जाएंगे.

कैसे जाएं

हवाई मार्ग : निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर है, जो यहां से 185 किलोमीटर दूर है.

रेल मार्ग : नजदीकी रेलवे स्टेशन आबू रोड, 28 किलोमीटर की दूरी पर है जो अहमदाबाद, दिल्ली, जयपुर और जोधपुर से जुड़ा हुआ है.

सड़क मार्ग : माउंट आबू देश के सभी प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है.

कब जाएं

यहां फरवरी से जून व सितंबर से दिसंबर तक घूमना सब से उपयुक्त रहता है.

जयपुर

‘पिंक सिटी’ के नाम से मशहूर जयपुर राजस्थान की राजधानी है. जयपुर अपनी वास्तुकला के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. यहां कला, संस्कृति और सभ्यता का अनोखा संगम देखने को मिलता है.

दर्शनीय स्थल

हवामहल : यह शिल्पकला का उम्दा नमूना माना जाता है. यह जयपुर का सब से अनोखा स्मारक है.  इस में 152 खिड़कियां व जालीदार छज्जे हैं. अपनी कलात्मकता के लिए विख्यात हवामहल का निर्माण 18वीं सदी में राजा सवाई प्रताप सिंह द्वारा करवाया गया था. शहर के केंद्र में बना यह पांचमंजिला महल लाल और गुलाबी रंग, सैंड स्टोन से मिलजुल कर बना है. यहां से शहर का आकर्षक नजारा देखा जा सकता है.

सिटी पैलेस : शहर में स्थित सिटी पैलेस मुगल और राजस्थानी स्थापत्य कला का एक बेहतरीन नमूना है. पुराने शहर के दिल में स्थित सिटी पैलेस वृहद क्षेत्र में फैला हुआ  है. सिटी पैलेस के एक हिस्से में अब भी जयपुर का शाही परिवार रहता है. कई इमारतें, सुंदर बगीचे और गलियारे इस महल का हिस्सा हैं.

जलमहल : यह सवाई प्रताप सिंह द्वारा 1799 में बनवाया गया था. यह महल मान सागर झील के  बीचोंबीच स्थित है.

कैसे जाएं

वायु मार्ग : जयपुर के दक्षिण में स्थित सांगनेर एअरपोर्ट नजदीकी एअरपोर्ट है.

रेल मार्ग : जयपुर रेलवे स्टेशन भारत के प्रमुख रेलवे स्टेशनों से विभिन्न रेलगाडि़यों के माध्यम से जुड़ा हुआ है.

सड़क मार्ग : दिल्ली से राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से जयपुर पहुंचा जा सकता है जो 256 किलोमीटर की दूरी पर है. राजस्थान परिवहन निगम की बसें अनेक शहरों से जयपुर जाती हैं. दिल्ली से भी जयपुर के लिए सीधी बस सेवा है.

कब जाएं

जयपुर में मार्च से जून तक काफी गरमी रहती है. यहां घूमने का सब से उपयुक्त समय सितंबर से फरवरी है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें