सितारों से सीखें इजहार-ए-इश्क

फरवरी का महीना आते ही प्यार की घटाएं छाने लगती है. सभी प्यार के रंग में रंग जाते हैं. युवाओं के लिए तो फरवरी का महीना किसी त्योहार से कम नहीं हेता है. युवा क्या, बच्चे, बुढ़े, जवान, फिल्म स्टार्स सभी इस महीने का बेसब्री से इंतजार करते हैं. और इसके पीछे वजह है वैलेंटाइन वीक का.

तो आइए जानते हैं उन सितारों के बारे में जिनके प्यार की चर्चा आज भी बॉलीवुड गलियारो में होती है. जानें किस कलाकार ने कैसे किया अपने प्यार का इजहार.

रितिक-सुजैन

बेशक रितिक और सुजैन आज अलग हो चुके हैं लेकिन दोनों की प्रेम कहानी काफी प्यारी है. सुजैन को एक साल तक डेट करने के बाद रितिक ने वैलेंटाइन डे के दिन उन्हें मुंबई के जुहू बीच पर प्रोपोज किया था.

शाहरुख-गौरी

किंग ऑफ रोमांस शाहरुख खान ने मुंबई के एक बीच पर गौरी से अपने प्यार का इजहार किया था. इस समय दोनों काफी दिनों बाद मिल रहे थे. इसलिए प्रोपोज करते ही शाहरुख और गौरी दोनों फूटफूट कर रोने लगे थें.

अभिषेक-ऐश्वर्या

अभिषेक के प्यार का इजहार बहुत ही अलग था. न्यू यॉर्क में फिल्म ‘गुरू’ के प्रीमियर के दौरान अभिषेक एश्वर्या को अपने कमरे के बालकोनी में ले गए और बोले क्या यह अच्छा नहीं होगा जब मैं और तुम शादी के बाद यहां एक साथ खड़े हों! सिर्फ इतना ही नहीं उन्होंने ऐश से यह भी पूछा कि क्या तुम मुझसे शादी करोगी.

फरदीन-नताशा

फरदीन और नताशा दोनों ही लंदन से अमेरिका जा रहे थे. तभी फरदीन ने बातों-बातों में नताशा से अपने प्यार का इजहार कर दिया जिसे नताशा मना नहीं कर पाई.

कुनाल-सोहा

कुनाल खेमु ने सोहा को पैरिस में एक सुंदर सी रिंग दे कर प्रोपोज किया था. आपको बता दें की दोनों एक दूसरे को काफी लंबे समय से डेट कर रहे थे.

आयुष्मान-ताहिरा

जब आयुष्मान और ताहिरा पंजाब यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन की पढ़ाई कर रहे थे। वे बहुत ही शर्मीले इंसान थे, इसके बावजूद उन्होंने ताहिरा को प्रोपोज करने के लिए एक माहौल तैयार किया। लाल गुलाबों की सजावट, बैकग्राउंड में संगीत की गूंज, वाइन की महक, इन सभी के बीच कैंडल लाइट डिनर के दौरान आयुष्मान ने ताहिरा से कहा, आई लव यू टू ताहिरा.

जरूरत के अनुसार करें म्युचुअल फंड का चुनाव

म्‍युचुअल फंड शेयर बाजार में निवेश का सबसे आसान और सुरक्षित जरिया माना जाता है. लेकिन म्‍युचुअल फंड में निवेश हमेशा फायदेमंद होगा ही, इसका भी कोई तय फॉर्मूला नहीं है. सैकड़ों फंड्स में से अपनी जरूरत और लक्ष्‍य के हिसाब से फंड चुनना, उनकी पर्फोर्मेंस ट्रैक करना आसान काम नहीं है.

वास्‍तव में स्कीम में निवेश करने से पहले निवेशकों को कई चीजें ध्यान में रखनी चाहिए. सबसे पहला फैक्टर चयन होता है. निवेशक अपना पैसा उस विशेष फंड में लगाएं जो उनकी जरूरतों को पूरा करती हो, ऐसा तभी हो सकता है जब उस विशेष प्रकार की स्कीम निवेश के लिए उपलब्ध हो. कई बार निवेश को पता नहीं लग पाता कि कौन सा फंड उसकी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है. यही ध्‍यान में रखते हुए सरिता टीम उन महत्‍वपूर्ण बिंदुओं को लेकर आई है. जिन्‍हें आपको निवेश से पहले जरूर ध्‍यान में रखना चाहिए.

अपनी जरूरत के अनुसार चुनें फंड की प्रकृति

मार्केट में सैकड़ों तरह के म्‍युचुअल फंड हैं. सभी की प्रकृति अलग अलग होती है. निवेशक कई बार सही फंड का चुनाव इसलिए नहीं कर पाता क्योंकि उसे फंड का बेसिक नेचर नहीं पता होता. इसलिए ओपन एंडिड फंड और क्लोस्ड एंडिड फंस के बीच का अंतर जानना जरूरी होता है. ओपन एंडिड फंड्स में कभी भी नए तरीके से निवेश कर सकते हैं और इसमें किसी भी प्रकार की रोक-टोक नहीं होती है कि किस तरह निवेश करें या फिर कब निवेश करें. वहीं दूसरी ओर क्लोस्ड एंडिड फंड्स में कई तरह की बंदिशें होती हैं जिसके कारण निवेशक कई बार निवेश नहीं कर पाता. क्लोज एंडिड फंड में एक विशेष समय के लिए ही निवेश कर सकते हैं.

लक्ष्‍य को ध्‍यान में रखकर चुनें समय अवधि

फिक्स्ड मैच्युरिटी प्लान की तरह कई विकल्प निवेश के समय अवधि से संबंधित भी होते है. ये डेट ओरियेंटिड म्युचुअल फंड्स होते है जिनमें स्कीम को एक निश्चित समय के लिए लॉन्च किया जाता है. फंड मैनेजर उन सिक्योरिटीज को खरीदता है जो स्कीम के साथ मैच्योर होती हैं ताकि अंतरिम पिरियड के दौरान ब्याज दर से संबंधित कोई जोखिम न हो.

इस तरह के फंड्स के लॉन्च को अक्सर टैक्स बेनिफिट्स के साथ गाइड किया जाता है जो इसके साथ आती हैं. पहले के समय में अगर इन फंड्स को तीन से ज्यादा वर्षों के लिए रखते थे तो इन्हें लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन की श्रेणी में रखा जाता था. नतीजतन, निवेशक को बाजार में ऐसी स्कीम्स नहीं मिलती थी जिनका मैच्योरिटी पीरियड तीन वर्षों से कम को हो. ऐसे में निवेशक अगर तीन वर्ष से कम की निवेश योजना बना रहा था तो उसके सामने ये बड़ी परेशानी हो जाती थी.

विभिन्‍न सेक्‍टर्स को करें पोर्टफोलियो में शामिल

म्युचुअल फंड्स बने हुए पोर्टफोलियो के आधार पर भी जोखिम उत्पन्न कर देता है. कई बार आपका पोर्टफोलियो में उस जैसा कुछ नहीं दिखता जो निवेशक चाहता था. ऐसा अलग अलग तरह के फंड्स के साथ होता है. खासकर के सेक्टर फंड्स जहां पर फंड्स की कोई एक विशेष कंपनी हो जैसे कि लार्ज कैप फंड जबकि निवेशक कुछ इस तरह के पोर्टफोलियो की उम्मीद कर रहा हो जहां लार्ग कैप, मिड कैप और कुछ अन्य वैरियेशन्स भी दिख रहे हों.

असफलता से बचने का आदित्य रॉय कपूर का फार्मूला

आदित्य रॉय कपूर का करियर आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहा है. जबकि तकदीर ने उन्हें बड़े बैनर के अलावा संजय लीला भंसाली, मोहित सूरी व अयान मुखर्जी जैसे नामी निर्देशकों के साथ काम करने का अवसर दिया. मगर ‘‘आशिकी 2’’ को छोड़कर उनके करियर में असफल फिल्मों की ही सूची है. ‘फितूर’ और ‘ओके जानू’ जैसी फिल्मों की असफलता के बाद बॉलीवुड में चर्चाएं गर्म हैं कि अब आदित्य रॉय कपूर क्या करेंगें? वास्तव में आदित्य रॉय कपूर के पास कोई फिल्म है ही नही. मगर आदित्य रॉय कपूर का दावा है कि वह बड़े बैनर की एक हल्की फुल्की रोमेंटिक फिल्म में अभिनय कर रहे हैं. पर आदित्य रॉय कपूर फिल्म का नाम या निर्माण कंपनी का नाम या निर्देशक का नाम भी बताने को तैयार नहीं है? इससे कहा जा सकता है कि आदित्य रॉय कपूर घर पर बैठे हैं, पर वह झूठ बोलकर भ्रम फैला रहे हैं.

तो वहीं कुछ जानकार मानते हैं कि आदित्य रॉय कपूर के भाई सिद्धार्थ रॉय कपूर ने डिजनी को अलविदा कहने के बाद अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी शुरू की है, जिसके तहत वह एक फिल्म का निर्माण कर रहे हैं, उसी फिल्म में आदित्य रॉय कपूर अभिनय करने वाले हैं. पर इसे कोई कबूल नहीं कर रहा है. यूं तो बॉलीवुड में आदित्य रॉय कपूर, उनके भाई सिद्धार्थ रॉय कपूर तथा उनकी भाभी विद्या बालन की काफी अच्छी ईमेज है. पर फिल्मों के लगातार असफलता के चलते आदित्य राय कपूर की अच्छी ईमेज उन्हें कब तक बचाएगी?

इस मसले पर जब हमने आदित्य रॉय कपूर से बात की, तो आदित्य रॉय कपूर ने कहा-‘‘मेरे करियर की शुरूआत असफल फिल्मों से ही हुई थी. मेरी कुछ फिल्में सफल व कुछ असफल हुई हैं. पर अब तक किसी ने भी यह नहीं कहा कि मैंने किसी फिल्म में अच्छा अभिनय नहीं किया. देखिए,एक वक्त वह था जब अक्षय कुमार की भी लगातार 14 फिल्में असफल हुई थीं. तो सफलता असफलता चलती रहती है. हां! आपकी कोई फिल्म या आपका कोई प्रोजेक्ट असफल होता है, उस वक्त बहुत कुछ आपके अपने नजरिए पर निर्भर करता है. आपके अंदर धैर्य होना चाहिए. सफलता असफलता हर किसी के साथ आती है.’’

आपने देखा शाहरुख की बेटी सुहाना का ये वीडियो

बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत थिएटर से की थी. वैसे तो किंग खान की एक्टिंग के तो लाखों दीवाने हैं लेकिन अगर आप उनकी बेटी सुहाना खान की एक्टिंग देखेंगे तो आप शाहरुख से ज्यादा सुहाना के फैन हो जाएंगे.

दरअसल, सुहाना की एक प्ले के दौरान की वीडियो सामने आई है, जिसमें वो सिन्ड्रेला बनी हुई हैं. इस वीडियो में प्ले के दौरान सुहाना की एक्टिंग को देख आप खुद शौक हो जाएंगे क्योंकि वो एक मंझी हुई एक्ट्रेस की तरह ही एक्टिंग करती दिख रही हैं. उनकी आवाज और उनका कॉन्फिडेंस आपको हैरान कर देगा.

फुटबॉल फील्ड और आईपीएल मैच के दौरान सुहाना की उपस्थिति देखकर लोगों को लगा कि उनमें खेल को प्रति ज्यादा उत्साह है.

लेकिन जिस तरह से सुहाना ने अपना यह रास्ता बदला है, एक्सप्रेशन बदले और अपनी शानदार एक्टिंग से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है, ऐसा लगता है कि यह खान भी एक्टिंग का एक खजाना ही है.

अब सुहाना क्या करेंगी ये तो वही जानती हैं, लेकिन उनकी एक्टिंग को देख ये तो साफ पता चलता है कि अगर वो इस इंडस्ट्री में आती हैं तो वो कमाल ही कर देंगी.

इस वैलेंटाइन आपको खास बनाएगा परफ्यूम

आजकल सारे कपल्स अपनी बॉडी को लेकर काफी सचेत रहते हैं. इस वैलेंटाइन आप भले कितने भी महंगे कपड़े पहन लें या कितने भी अच्छे से खुद को ड्रेस अप कर लें, लेकिन अगर आपके शरीर से खुशबू की जगह कोई भी अजब सी महक आएगी तो महंगे कपड़े, अच्छे ड्रेसेस सब बेकार हो जाता है और आपके पार्टनर आपके पास से गुजरना तक नहीं चाहेंगे फिर देखने की बात आप भूल जाइए.

परफ्यूम लगाने के भी कुछ खास नियम होते हैं. जिनकी जानकारी आमतौर पर सब को नहीं होती और यही वजह है कि परफ्यूम लगाने के कुछ घंटे बाद ही उसकी खुशबू फीकी पड़ने लगती है. ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि परफ्यूम जितना ज्यादा लगाया जाएगा,  उतना देर तक आपकी खुशबू बनी रहती है. तो हम आपको बता दें कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. परफ्यूम की खुशबू का उसकी क्वांटिटी से कोई लेना देना नहीं होता है. हां लेकिन परफ्यूम को लगाने के कुछ खास नियम होते हैं जो इस वैंलेनटाइन आपको जानने चाहिए.

आज गृहशोभा आपको बताने जा रही है कि आप कैसे परफ्यूम का सही इस्तेमाल करें ताकि खुशबू लंबे समय तक बनी रहे.

शरीर के अहम हिस्सों में परफ्यूम लगाऐं

अगर आप यह सोचती हैं कि आपके पूरे शरीर में परफ्यूम को छिड़क लेने से आपकी बॉडी लम्बे समय के लिए सुगंधित हो गई है तो आप गलत सोचते हैं. परफ्यूम को लगाने का बेस्ट ऑप्शन होता है कि इसे शरीर के उन हिस्सों पर लगाना चाहिए जो गरम रहती हैं, जैसे कि आपकी कलाई, कोहनी का अंदरुनी हिस्सा, कानों के पीछे और गर्दन पर, परफ्यूम का खासतौर पर इसका इस्तेमाल करें.

परफ्यूम से पहले मॉइश्चराइजर

अगर आपकी स्किन हमेशा ड्राई रहती है तो आपको बॉडी में परफ्यूम लगाने से पहले मॉइश्चराइजर को पूरे शरीर में लगाना चाहिए. इसकी जगह पर आप चाहें तो पेट्रोलियम जेली का भी इस्तेमाल कर सकती हैं. ऐसा करते ही आप देखेंगी कि परफ्यूम की खुशबू लंबे समय तक बनी रहती है.

परफ्यूम की जगह हो सही

परफ्यूम को रखने की भी जगह आपको स्पष्ट होनी चाहिए. अपने परफ्यूम को नमी या सीलन वाली जगह पर अपने से हमेशा बचें. आप निशिचत तौर पर चाहती होंगी कि आपकी परफ्यूम की खुशबू लंबे समय तक बनी रहे तो इसे भूलकर भी बाथरूम में न रखें. आपको बता दें कि नमी और गर्मी दोनों ही परफ्यूम की खुशबू को हल्का करने में सक्षम होती हैं तो इसीलिए परफ्यूम को हमेशा सूखी और ठंडी जगह पर ही रखें.

परफ्यूम को न रगड़े

कुछ लोग परफ्यूम को लगाने के बाद उसको रगड़ देते हैं. ऐसा करने से आपके परफ्यूम की खुशबू कुछ देर तो आपके ही साथ चिपकी रहेगी, लेकिन फिर गायब हो जाती है.

परफ्यूम की क्वालिटी

भूलकर भी क्वालिटी से समझौता न करें. अपने परफ्यूम की खुशबू देर तक बिखेरने के लिए क्वलिटी परफ्यूम ही खरीदें.

अपनी यात्रा को क्यों भूल जाती हैं आलिया भट्ट

महेश भट्ट की बेटी आलिया भट्ट ने अपने अभिनय करियर की शुरूआत ‘‘स्टूडेंट आफ द ईअर’’ से की थी, तब से वह दस फिल्में कर चुकी हैं. अब होली के अवसर पर उनकी ग्यारहवीं फिल्म प्रदर्शित होने वाली है, पर आलिया भट्ट का मानना है कि उनके अभिनय करियर की यह पहली फिल्म है.

जी हां आलिया भट्ट अपनी अभिनय यात्रा के सवाल पर कहती हैं, ‘‘मेरी कई फिल्मों का मजा दर्शक ले चुके हैं. मैंने वरूण धवन के साथ फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईअर’ के साथ करियर शुरू किया था. उसके बाद मैंने वरूण धवन के साथ ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनियां’ की और अब वरूण धवन के साथ मेरी तीसरी फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ होली के मौके पर आने वाली है. इसके बावजूद मैं इसे अपनी पहली फिल्म मानती हूं और इस फिल्म को लेकर काफी नर्वस भी हूं. मैं हमेशा भूल जाती हूं कि मेरी कोई यात्रा रही है. मुझे लगता है कि हमेशा ऐसा ही रहना चाहिए. इससे उत्साह बना रहता है. नयापन बना रहता है. और हम ज्यादा मेहनत के साथ काम करते हैं. मुझे लगता है कि दुल्हनिया की इमेज मुझ पर बहुत ज्यादा फिट बैठती है. इसलिए अब फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ से मुझे काफी उम्मीदे हैं.’’

फिल्म ‘‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’’ में आलिया भट्ट और वरूण धवन पर एक गीत ‘‘तम्मा तम्मा’’ फिल्माया गया है, जो कई साल पहले संजय दत्त और माधुरी दीक्षित पर फिल्माया गया था. इस गीत की चर्चा करते हुए आलिया भट्ट कहती हैं- ‘‘इस फिल्म में संजय दत्त व माधुरी दीक्षित के लोकप्रिय गीत ‘तम्मा तम्मा’ को पुनः नए सिरे से गढ़ा गया है. जिस पर हमने नृत्य किया है. हमारे लिए यह गौरव की बात रही. आपको पता होगा कि पुराने गीत लोगों को बहुत पसंद आते हैं. हम सभी पुराने गानों पर थिरकने लगते हैं. इस गीत को बहुत अच्छे तरीके से रीक्रिएट किया गया है. मुझे खुशी है कि मुझे इस गाने पर नृत्य करने का मौका मिला.’’

16 का प्यार, आकर्षण आधार

‘प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है…’ यह आम धारणा है पर यह प्यार नहीं आकर्षण होता है.

आमतौर पर पहली नजर में हमें किसी का चेहरा पसंद आ जाता है, किसी की आंखें पसंद आ जाती हैं या किसी का बात करने का स्टाइल पसंद आ जाता है या फिर किसी का व्यवहार. इसे पहली नजर का प्यार कहते हैं. स्कूल कालेज के दिनों में या कम उम्र में होने वाला यह प्यार ज्यादातर आकर्षण ही होता है.

आकर्षण ज्यादातर एक अस्थायी प्यार होता है, जो एकसाथ कई लोगों से हो सकता है. यह जरूरी नहीं कि हमें जिस के प्रति आकर्षण हो रहा है, उसे भी हमारे अंदर कोई बात पसंद आ जाए या फिर हम से प्यार हो जाए. थोड़ी बातचीत शुरू हो गई तो हम सामने वाले पर अपना हक समझने लगते हैं और यह जाने बिना कि उस की सोच हमारे बारे में क्या है, हम उस पर अधिकार जताते हैं, लेकिन यदि वह हमारी अपेक्षाओं पर खरा न उतरा तो बहुत जल्दी ही यह आकर्षण खत्म भी हो जाता है, या फिर एक जनून और जिद में बदल जाता है, जिस का नतीजा अच्छा नहीं होता. इसलिए यह जरूरी है कि प्यार और आकर्षण के फर्क को समझते हुए ही आगे बढ़ें.  

यह प्यार है या कुछ और : यह उम्र ऐसी होती है जिस में प्रेमीप्रेमिका को यह पता नहीं होता कि वे प्यार में हैं या फिर यह महज आकर्षण ही है. अपने इसी आकर्षण को प्यार मान कर वे आगे बढ़ने लगते हैं, लेकिन फिर जब एक साथी को एहसास हो जाता है कि यह प्यार नहीं था तो दोनों के लिए हजार मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं. इसलिए यह अटकले न लगाएं कि आप प्यार में हैं बल्कि अपने रिश्ते को समय दें और अपना ध्यान सिर्फ अपने कैरियर पर लगाएं.

जीवन भर का साथ नहीं है यह : कई लोग इस तरह की रिलेशनशिप को ले कर बहुत सीरियस हो जाते हैं और सोचने लगते हैं कि आज जो हमारा साथी है वह जीवन भर रहेगा, उम्र बढ़ने के साथसाथ मैच्योरिटी आती है और हमारे विचारों में आई परिपक्वता हमें इस बात का एहसास दिलाती है कि हमारे लिए क्या सही है और क्या नहीं. इसलिए हर परिस्थिति के लिए तैयार रहें.

सीरियस न हों : अगर आप अपने साथी को ले कर बहुत ज्यादा गंभीर हैं तो भी क्या कर लेंगे. अभी शादी तो कर नहीं सकते, लेकिन ये बातें सोचसोच कर अपना वक्त जरूर बरबाद कर लेंगे. इसलिए लड़की से दोस्ती हो गई है और वह आप को अच्छी लगने लगी है तो कोई बात नहीं, इस बारे में ज्यादा न सोचें कि कहीं आप उसे प्यार तो नहीं करते आदि बल्कि यह सोचें कि अभी मुझे उस के काबिल बनना है और अपना फोकस प्यार पर न कर के कैरियर पर करना है.

फिजिकल न हों : इस उम्र में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक है और फिजिकल आकर्षण के चलते किशोर जानकारी के अभाव में कुछ ऐसे कदम उठा लेते हैं जिस से बाद परेशानी खड़ी हो जाती है.

यह कैरियर बनाने का समय है : प्यार के झंझट में न ही पड़ें तो अच्छा है वरना बेकार की टैंशन तो होगी ही साथ ही घर में किसी को पता चल गया तो एक और बवाल से निबटने के लिए तैयार रहना होगा. 

वैसे भी यह समय कैरियर बनाने का है. ये सब करने के लिए तो पूरी उम्र पड़ी है, लेकिन अगर पढ़ाई में पिछड़े तो सब दोस्तों और भाईबहनों से पीछे रह जाएंगे और जिंदगी भर पछताने के सिवा कुछ नहीं बचेगा.                         

आकर्षण और प्यार में फर्क समझें

– प्रेम समय के साथ धीरेधीरे आगे बढ़ता है लेकिन आकर्षण अचानक पहली नजर में ही हो जाता है.

– आकर्षण तीव्र मगर थोड़़े समय के लिए होता है लेकिन प्यार होने में समय लगता है. 

– प्रेम में व्यक्ति पार्टनर को गुणअवगुणों के साथ स्वीकारता है लेकिन आकर्षण की स्थिति में उस की आइडियल इमेज दिमाग में रहती है.

– आकर्षण में किशोर अपनी रिलेशनशिप को रियल फीलिंग्स के बजाय कल्पना पर टिकाता है.

– आकर्षण में 2 लोग लवर्स हो सकते हैं लेकिन रियल फ्रैंड्स नहीं, जो एकदूसरे की भावनाओं को अच्छे से समझ सकें.

– आकर्षण में फिजिकल रिलेशनशिप पर ज्यादा जोर रहता है, उन के लिए इस का इंतजार करना मुश्किल ही नहीं असंभव होता है और ऐसे में वे अपनी सीमाएं पार कर जाते हैं.

 आकर्षण हो तो क्या करें

– आकर्षण में इतना न खो जाएं कि बाकी सब भूल जाएं. पढ़ाई और कैरियर की कीमत पर कुछ न करें. 

– अकेले मिलने से बचें. दोस्तों के ग्रुप में मिलें.

– अनजानी जगहों पर एकसाथ जाने से बचें. मिलना भी है तो पब्लिक प्लेस पर मिलें ताकि भावनाओं पर नियंत्रण रखा जा सके.

– दोस्त या पार्टनर की किसी भी गलत मांग या जिद को पूरा न करें.

नोटबदली से नोटबंदी

8 नवंबर, 2016 को शाम 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब ऐलान किया था कि रात 12 बजे के बाद 500 रुपए और 1,000 रुपए के नोट लीगल टैंडर नहीं रह जाएंगे और नए नोट मिलने शुरू हो जाएंगे, तो उन के कदम को विमुद्रीकरण कहा गया, जो गलत था. उन का मतलब उस समय केवल नोटबदली था ताकि जिस के पास पुराने नोटों का भंडार हो, जिसे सरकार कालाधन कहती है, बाहर इस तरह निकल सकें जैसे जहरीली गैस छोड़ने के बाद चूहे निकलते हैं. पर असल में, नोटबंदी ही हो गई.

चूहों की तरह नोट तो नहीं निकले पर जो निकले वे इस देश के नागरिक हैं जिन्हें लगातार बैंकों के बाहर कतारों में खड़ा होने की सजा दे दी गई. बेगुनाह लोगों, कुछ सौ ही नहीं बल्कि करोड़ों, को बारबार कतारों में घंटों खड़ा होने को मजबूर होना पड़ा. सरकार नोट बदलने का अपना वादा पूरा न कर पाई क्योंकि उतना पैसा सरकार के पास नहीं था जितना जनता को चाहिए था. सरकार ने जनता के नोट छीन लिए और लगता है अब लौटाने का उस का मन नहीं है.

वित्त मंत्री तो अब खुलेआम कहने लगे हैं कि जितने नोट वापस बैंकों में गए हैं, उतने मिलेंगे नहीं. यानी बैंकों में जमा धन अब सरकार का हो गया चाहे वह गरीब का है या अमीर का. चोरों, कालाबाजारियों, धन्ना सेठों का धन तो वह है ही नहीं, क्योंकि 8 नवंबर के बाद कोई भी ढाई लाख से ज्यादा जमा भी नहीं करा सकता था और जिस ने ज्यादा कराया उसे हिसाब देना पड़ा.

मतलब साफ है कि जो भी पैसा जमा हुआ है वह आम नागरिकों का है, गरीबों का, व्यापारियों का है, औरतों का है, युवाओं का है, मजदूरों का है. सरकार, जो हिंदू धर्म की चाबी घुमा कर जीत कर सत्ता में आई थी, सब से बड़ी डाकूचोर बन गई और जबरन अरबों दान में मिले रुपयों को जनकल्याण व गरीबउत्थान में खर्च करने की बातें कर रही है.

अफसोस यह है कि जनता का एक बहुत बड़ा अंश वैसे ही देवताओं की बेईमानियों, धूर्तताओं, पंडों की लूटखसोट, मंदिरों की बदइंतजामी, बाबाओं की चरित्रहीनता का आदी है और उसे इस बेईमानी में केवल नारे दिख रहे हैं कि सिर्फ 50 दिन रुको, 5 महीने रुको, 50 महीने रुको, सब ठीक हो जाएगा.

किसी भी समाज को गुलाम बनाने में सब बड़ी शर्त वहां के नागरिकों की ‘जो है जैसा है’ को मान लेने की है. भारत की जनता आज से नहीं, सदियों से इस की आदी है. उसे पुराणों के चमत्कारों के बारे में पता है पर इतिहास की घटनाओं का नहीं, जिन के कारण यह विशाल देश गुलाम रहा.

आज सरकार ने 1975 से 1979 तक की तरह पूरी जनता को गुलाम बना दिया है. कांग्रेस ने अभिव्यक्ति की आजादी छीनी थी. इस सरकार ने उस की मेहनत की कमाई छीन ली है क्योंकि सरकार के साथ समाज का संपन्न वर्ग है जो इस लूट का हिस्सेदार है. जनता के पास नए नोट न आने का मतलब है सरकार के टैक्सों में कमी और अमीरों के मुनाफों में वृद्घि. तभी हर दूसरे रोज कोई अंबानी, कोई रांका, कोई अग्रवाल नोटबंदी के साहसिक कदम का प्रमाण दे देता है. राजा के दरबार में तो चाटुकार होंगे ही, जो राजा की जय ही बोलेंगे.

जनता की बेचारगी

नोटबंदी के कारण देशभर के करोड़ों लोग दिनों नहीं, सप्ताहों तक अपने ही कमाए पैसे लेने के लिए बैंकों और एटीएमों के सामने कतारों में खड़े रहे पर कहीं लंबीचौड़ी विद्रोह की वारदातें नहीं हुईं. नरेंद्र मोदी चाहे उसे नोटबंदी पर सहमति कह लें पर यह असल में एक डरपोक, कमजोर, बिखरे, मंदबुद्घि, अंधविश्वासी, स्वार्थी और भाग्यवादी समाज का लक्षण है. यह समाज आज ही नहीं, सदियों से ऐसा ही रहा है और हमेशा मुट्ठीभर आकाओं के आगे देश की बहुसंख्या नतमस्तक होती रही है.

यह गुण भारतीय समाज में ही हो, ऐसा नहीं. कमोबेश हर देश, हर समाज ऐसा ही होता है. बड़ों का या ताकतवरों का हुक्म मानना हर समाज बचपन से सिखाता है. हर संकट का पहला मुकाबला संघर्ष नहीं, पलायन ही होता है. आदमी अपने ऊपर हुए अकारण आक्रमण का मुकाबला तब करता है जब उस के पास भागने की जगह न हो.

गांधी ने 1915 से ले कर 1947 तक भारत की स्वतंत्रता के लिए आंदोलन चलाए पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ देश की, तब की 30 करोड़, जनता कब एकसाथ जनविद्रोह में खड़ी हुई? इतिहासकार बताते हैं कि इस देश में कभी भी एकसाथ 20,000 से ज्यादा ब्रिटिश गोरे नहीं रहे पर वे 30 करोड़ लोगों को हांकने में सफल रहे थे. इस का अर्थ यह नहीं, कि लोग ब्रिटिश शासन का समर्थन करते थे. असल में न उन के पास हिम्मत थी ब्रिटिश आक्रमणकारियों के सामने खड़ा होने की, न जरूरत.

उस से पहले यही बात मुसलिम आक्रमणकारियों के साथ हुई. ऐसा ही शकों, हूणों, ग्रीकों के साथ भी हुआ. अपने हिंदू राजाओं के खिलाफ बगावत के सुबूत भी बहुत कम हैं.

रूस में जारों ने अपनी जनता पर खूब अत्याचार किए. उस के बाद 1917 में क्रांति हुई, लोग उठ खड़े हुए पर कितने दिनों के लिए और फिर क्या हुआ? रौमनौव डायनैस्टी का खूंखार राज 1613 से 1917 तक चला और उस के बाद जनक्रांति ने लेनिन, स्टालिन और ख्रुश्चेव जैसे तानाशाहों को जगह दे दी. माओत्से तुंग ने चीन से क्वांग डायनैस्टी का अंत किया पर उस के बाद माओ की पार्टी ज्यादा खूंखार साबित हुई. सर्वाधिक हत्याएं कराने वालों में स्टालिन, हिटलर, माओ शामिल हैं और किसी देश में भी जनाक्रोश के कारण तानाशाह नहीं गए.

जनता की शांति को जनता की सहमति न समझें, कमजोरी और लाचारी समझें. नोटबंदी ने रातोंरात हर घर को मुहताज बना दिया. भुखमरी तो नहीं हुई पर व्यर्थ की कतारों का जनसमर्थन हुआ, यह कहना गलत होगा. जनता का कोई भी हिस्सा कभी भी दूसरों की गलती के लिए खुद को दंड देने को तैयार न होगा. सरकार का फर्ज था कि वह कालेधन वालों को पकड़े पर उस ने गुनहगारों और शरीफों दोनों को एक कतार में खड़ा कर दिया और 50 दिन भी बीत गए, कुछ नहीं हुआ. जनता 50 दिन तो क्या, 50 साल और 500 सालों तक इंतजार करती रही है, इतिहास गवाह है.

भीरू हिंदू जनता तो वैसे भी कुंभों और मंदिरों में ही नहीं, फिल्मों के लिए भी लाइनों में लगती है, दारू की दुकान पर भी. फिर सरकारी फरमान का विरोध करेगी, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता. हां, देश का बुद्घिजीवी असमंजस में रहा और कालेधन वालों की टांगें कटेंगी, सोच कर खुश होता रहा और उसे उन टांगों की चिंता नहीं रही जो बैंकों के सामने खड़ी थीं. ज्यादा अफसोस और रंज की बात यह है कि सरकारी अनाचार ईर्ष्या की भेंट चढ़ गया.

फिल्मों के लिए इतनी मेहनत करते हैं कलाकार

इन दिनों रणबीर कपूर अपने एक नए ही अवतार में दिख रहे हैं, जिसे बस हर कोई देखता ही रह जाता है. रणबीर कपूर, संजय दत्त की बायोपिक के लिए काफी वजन बढ़ा चुके हैं और अभी भी उन्हे काफी वजन बढ़ाना है. रणवीर के अलावा भी बॉलीवुड के कई सारे स्टार्स ऐसे हैं, जिन्होने अपनी फिल्मों के लिए काफी वजन बढ़ाया भी है और घटाया भी है.

हम आज आपके लिए कुछ फिल्मों और उनके स्टार्स की लिस्ट ले कर आए हैं जिन्होंने फिल्म में अपने अपने रोल के लिए काफी ज्यादा वजन बढ़ाया और घटाया है.

सलमान खान

पिछले साल आई सलमान खान की फिल्म सुल्तान के लिए सलमान ने काफी वजन बढ़ाया था. आज की तारीख में सलमान फिर वजन कम कर वैसे ही नजर आने लगे हैं. वजन बढ़ाने और घटाने से ही वे फिल्म में बाद में रेसलर की तरह दिखते हैं. इतनी मेहनत का ही नतीजा था कि फिल्म की कमाई 300 करोड़ थी

आमिर खान

एक ताजा उदाहरण हैं आमिर खान हैं. आमिर ने फिल्म दंगल में जिस तरह से अपना वजन बढ़ाकर पहले 90 किलो किया और फिल्म के बाद 6 महीने में वे फिर वापस फिट भी हो गए. ऐसा तो सिर्फ और सिर्फ कोई बहित मेहनत करने वाला व्यक्ति ही कर सकता है. फिल्म की सफलता भी आप सबके सामने है. दंगल बॉलीवुड की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी.

जैकलीन फर्नांडिस

जैकलीन फर्नांडिस ने भी फिल्म किक के लिए अपना वजन काफी बढ़ाया था. ताकि वे सलमान खान के साथ जोड़ी में स्क्रीन पर अच्छी दिख सकें.

रणबीर कपूर

इस साल बनने वाली संजय दत्त की बायोपिक, जिसमें रणवीर संजय दत्त का किरदार निभाने वाले हैं, उन्होंने इस बायोपिक के लिए वजन बढ़ाना शुरू कर दिया है. मेहनत शुरु करते ही रणवीर कुछ अलग दिखने लगे हैं. अभी आगे रणबीर को और भी वजन बढ़ाना है तो आप सोच सकते हैं वो कैसे दिखेंने वाले हैं.

विद्या बालन

फिल्म द डर्टी पिक्चर के लिए अभिनेत्री विद्या बालन ने लगभग 14 किलो वजन बढ़ाया था और ये बात तो सभी जानते हैं कि फिर द डर्टी पिक्चर में विद्या ने जो किया वो किसी और एक्ट्रेस के बस की बात ही नहीं है.

गुजारिश

गुजारिश फिल्म भले ही फ्लॉप हुई हो लेकिन ऋतिक रोशन की एक्टिंग की हर किसी ने काफी तारीफ की. फिल्म में ऋतिक पाइरलाइज्ड थे और इसके लिए उन्होंने अच्छा खासा वजन बढ़ाया.

अभिषेक बच्चन

अभिषेक बच्चन के करियर की आज तक की सबसे बेहतरीन फिल्म गुरू के लिए अभिषेक बच्चन ने काफी मेहनत की थी. इस फिल्म में अभिषेक बच्चन हर उम्र के व्यक्ति के रोल में दिखे थे. फिल्म में उन्होंने बूढ़ा दिखने के लिए सबसे ज्यादा मेहनत की थी. इस रोल के लिए अभिशेक ने काफी वजन बढ़ाया था.

इमरान हाशमी

इमरान हाशमी भी एक शानदार अभिनेता हैं. इस बात में कोई शक नहीं है. उन्होंने कई फिल्मों में ये दिखा चुके हैं कि वे कितने अच्छे अभनेता हैं. फिल्म शंघाई के लिए इमरान हाशमी ने खुद पर बहुत मेहनत की थी. इस फिल्म में कई लोग उनकी प्रतिभा के कायल भी हुए.

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