लौन : हरा भरा गलीचा

आधुनिक युग में जहां एक ओर घर की आंतरिक बनावट व साजसज्जा का ध्यान रखा जाता है वहीं दूसरी ओर घर के चारों ओर खाली पड़ी जमीन या आंगन को आकर्षक बनाया जाता है. घर के बाहर का बगीचा आजकल आउटडोर लिविंगरूम कहलाता है. इस लिविंगरूम का फर्श यदि एक जीवंत हराभरा गलीचा हो तो घर की शोभा ही अनोखी बन जाती है. जी हां, हम जिस हरेभरे गलीचे की बात कर रहे हैं वह और कुछ नहीं बल्कि लौन है.

लौन एक हरे कैनवस की भांति होता है जिस के ऊपर आप रुचि के अनुसार रंग बिखेर सकते हैं. आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने भी यह स्वीकारा है कि हमारे आसपास पेड़पौधों व हरियाली का मानव मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. सुबहशाम लौन पर नंगे पांव चलने से प्राकृतिक रूप से ऐक्यूप्रैशर होता है और आंखों को भी शीतलता प्राप्त होती है. अन्य पौधों के मुकाबले लौन की विशेषता यह है कि यह वर्षभर हराभरा रहने के साथ बगीचे का स्थायी अंग बन जाता है, जिसे बारबार लगाने की आवश्यकता नहीं होती. आइए, लौन लगाने व उस की देखभाल करने की जानकारी लें.

घास का चुनाव : घास का चुनाव करते समय वातावरण, तापमान, आर्द्रता इत्यादि की जानकारी अवश्य लें. गरम स्थानों पर उगाई जाने वाली घास जहां गरम, आर्द्र मौसम को सहन कर सकती है वहीं ठंडे स्थानों पर लगाई जाने वाली घास अत्यंत कम तापमान (कभीकभी 0 डिग्री सैंटीग्रेड से नीचे) व पाले की मार को सहन करने की क्षमता रखती है. अगर भूमि काफी है तो दूब घास यानी साइनोडोन डैक्टाइलोन की उन्नत किस्मों का प्रयोग करें. छोटे लौन में गद्देदार घास, कोरियन घास यानी जौयशिया जैपोनिका का प्रयोग कर सकते हैं.

इसी प्रकार ठंडे इलाकों में जहां तापमान शून्य से कम चला जाता है और पाले की मार भी अधिक होती है वहां बंगाल बैंट यानी एगरोस्टिस की विभिन्न प्रजातियां बहुत अच्छा गलीचा बनाती हैं. कैंटकी ब्लू घास यानी पोआ प्रेटेंसिस व राई घास यानी लोलियम पेरेनि भी ठंडे क्षेत्रों में उपयुक्त पाई गई हैं.

जमीन की तैयारी : लौन लगाने के लिए धूपदार जगह का चुनाव करें. एक बार लौन लगाने पर वह वर्षों तक आप के आंगन की खूबसूरती बढ़ाएगा, इसलिए जमीन की तैयारी पर अधिक ध्यान देना आवश्यक है. चूंकि घास जमीन की सतह पर चारों ओर फैलती है और जड़ें बहुत गहरी नहीं जातीं इसलिए ऊपरी 10-12 इंच की मिट्टी का भुरभुरा होना जरूरी है. इस मिट्टी को भली प्रकार छान लें और कंकड़ पत्थर निकाल दें. अब मिश्रण तैयार करें. इस में 2 भाग छनी हुई मिट्टी, 1 भाग छनी हुई रेत व 1 भाग छनी हुई गोबर की खाद मिलाएं. इस मिश्रण को 15-20 दिन तक धूप लगाएं व 2 दिन के अंतराल पर उलटपलट करें. मिश्रण को गीला कर के पौलिथीन शीट से इस प्रकार ढकें कि हवा कहीं से भी अंदर न जा सके. इसे 25-30 दिन तक बिना छेड़े रहने दें, पौलिथीन से मिश्रण का तापमान बढ़ेगा और कीट, बीमारियां व खरपतवार के बीज नष्ट हो जाएंगे. इस प्रकार तैयार किया गया मिश्रण आदर्श लौन लगाने के लिए सर्वोत्तम है. अब इस मिश्रण को समान सतह बना कर फैलाएं. मिश्रण फैलाते समय ग्रेडिएंट का ध्यान रखना आवश्यक है ताकि पानी निकासी का उचित प्रबंधन हो. वैसे तो लौन समतल भूमि पर बनाया जाता है परंतु इसे और अधिक आकर्षक बनाने के लिए छोटेछोटे टीले यानी पहाड़ भी बनाए जा सकते हैं.

लौन लगाने का समय : शुष्क व गरम इलाकों में बरसात के आरंभ में लौन लगाएं. इस में घास के पौधे शुरुआती जड़ें अच्छी तरह पकड़ेंगे और वातावरण में नमी की मात्रा अधिक होने से घास का फैलाव भी शीघ्रता से होगा. ठंडे इलाकों में लौन फरवरी, मार्च, जुलाई, अगस्त या सितंबर, अक्तूबर में भी लगाया जा सकता है. यद्यपि अगर सिंचाई करने की पर्याप्त सुविधा हो तो सर्द महीनों को छोड़ कर लगभग पूरे वर्ष लौन लगा सकते हैं.

लौन कैसे लगाएं : लौन लगाने के 2 प्रमुख तरीके हैं, बीज से व पौध से. जब लौन बीज से लगाना चाहें तो  बीज की मात्रा का ज्ञान होना चाहिए. घास की कुछ प्रजातियों के बीज अत्यंत छोटे होते हैं ऐसे बीजों को समान मात्रा में रेत में मिला कर बोया जाता है. इस में लौन को कई बराबर भागों में विभाजित करें. फिर उस में बीज बराबर हिस्सों में छिड़काव विधि द्वारा डालें. इस से पूरे लौन में बराबर बीज डलेगा. बीज डालने के बाद उस के ऊपर लौन मिश्रण की 0.5 से 1.0 सैंटीमीटर ऊंची सतह बिछाएं. लौन के ऊपर बीज डाल कर सीधे सिंचाई न करें. इस पर जूट या बोरी या सूखी घास बिछा कर फौआरे से सिंचाई करें.

बीज बोने के बाद मिश्रण में नमी खत्म न होने दें, आवश्यकतानुसार फौआरे या स्प्रिंकलर से पानी दें. लगभग 12-15 दिन बाद जब बीज उगना शुरू हो जाए तो जूट हटा दें. बहुत बड़ा लौन हो तो बिना जूट से ढके केवल स्प्रिंकलर से भी पानी दे सकते हैं. पौध से लौन लगाने के लिए पहले नर्सरी में पौध तैयार की जाती है, फिर जड़दार घास को लगाया जाता है. यह तरीका बड़े लौन के लिए ठीक नहीं है.

लौन लगाने के और भी कई तरीके हैं परंतु सब से आधुनिकतम तरीका है टर्फिंग. इस में लौन विभिन्न आकार के टुकड़ों (टाइलों) में बनाबनाया उपलब्ध रहता है. सब से पहले लौन का मिश्रण मनचाहे आकार में बिछा लें. अब इस भूमि को नाप कर, इसी के आकार का टुकड़ा नर्सरी से ले आएं. यदि लौन का आकार बड़ा है तो घास टाइलों के रूप में (1×1 फुट) कटवा कर लाएं. इन टाइलों को ईंटों की चिनाई की तरह भूमि पर बिछाएं. लौन को खूब पानी दें. इस प्रकार की लौन घास लगभग सभी नर्सरियों में 90-150 रुपए प्रति किलोग्राम के मूल्य पर उपलब्ध रहती है. यह लौन लगाने का सब से आसान व शीघ्रतम तरीका है. इस तरह आप रातोंरात घर के आंगन में हराभरा लौन लगा सकते हैं. इसे इंस्टैंट लैंडस्केपिंग भी कहा जाता है.

लौन की देखभाल : खूबसूरत लौन बगीचे की जान और घर की शान है. यदि लौन की घास ऊंचीनीची, ज्यादा बढ़ी या खरपतवार से भरपूर है तो बगिया की सुंदरता नष्ट हो जाती है. लौन को खूबसूरत बनाए रखने के लिए इन बातों का खयाल रखें :

मोइंग (घास काटना) : घास की सतह को समतल व हराभरा रखने के लिए घास को समयसमय पर काटना आवश्यक है. मोइंग करने से घास में नई कोंपलें (टिलरिंग) निकलती हैं, जिस से लौन घना बनता है और शीघ्रता से एक हरे गलीचे की तरह फैलता है. मोइंग करते समय घास की ऊंचाई 5-7 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. अधिक छोटी करने पर घास की जड़ें कमजोर पड़ सकती हैं और घास पर तीव्र धूप व पाले का असर भी जल्द पड़ता है. मोइंग कितने समय के अंतराल पर करें, यह घास के स्वभाव और उस के उगने की क्षमता पर निर्भर करता है. छोटे लौन के लिए हाथ से चलने वाला मोअर इस्तेमाल करें.

रोलिंग : लौन में समतल हरियाली प्राप्त करने के लिए रोलिंग करना जरूरी है. रोलिंग का काम बरसात का मौसम शुरू होने पर शुरू करें. रोलिंग में घास के तने, जो जमीन से ऊपर उठे हों, को रोलर के दबाव से मिट्टी के नजदीक पहुंचा दिया जाता है. घास की गांठों से नई जड़ें निकलती हैं जिस से घास के बीच की खाली जमीन भर जाती है और घास समान रूप से पूरे लौन को ढक लेती है.

सिंचाई : नए लगाए लौन में तब तक सिंचाई करें जब तक जड़ें मिट्टी न पकड़ लें. वैसे सालभर आमतौर पर तापमान और वातावरण की नमी के अनुसार सिंचाई करें. जब लौन अपनी जड़ें पकड़ ले तब लौन में समुचित पानी दें और उस के बाद सिंचाई के अंतराल को बढ़ा दें. दूसरी सिंचाई तभी करें जब लौन की मिट्टी में सूखने के आसार नजर आने लगें. ऐसा करने से घास की जड़ें गहराई तक जाएंगी और मजबूत बनेंगी, गहरी जड़ें लौन को वातावरण के दुष्प्रभावों  से बचाने के साथसाथ घास को बारंबार मोइंग सहन करने की ममता भी प्रदान करती हैं.

खाद व उर्वरक : लौन में हरियाली कायम रखने के लिए पोषक तत्त्वों में से नाइट्रोजन सब से जरूरी है. इस के लिए रासायनिक खादों में 15 भाग अमोनियम सल्फेट, 5 भाग सुपर फास्फेट व 2 भाग पोटैशियम सल्फेट का मिश्रण बनाएं. अब इस मिश्रण को 2.5 किलोग्राम प्रति 100 वर्ग मीटर की दर से लौन में छिड़काव विधि द्वारा वर्ष में 2 बार डालें. खाद डालने के बाद लौन की जम कर सिंचाई करें, ताकि ये रसायन मिट्टी में चले जाएं और जड़ों तक पोषक तत्त्व पहुंच जाएं.

खरपतवार उन्मूलन : लौन में खरपतवार का होना उस की सुंदरता को नष्ट करता है. अगर लौन मिश्रण को अच्छी प्रकार स्टरिलाइज किया गया हो तो यह ज्यादा परेशानी का कारण नहीं बनता. छोटे लौन में खुरपी से खरपतवार को जड़सहित निकाल फेंकें. चौड़े पत्ते वाले खरपतवार के लिए रासायनिक स्प्रे का प्रयोग किया जा सकता है.

कीट व बीमारियां : आमतौर पर लौन में कीट व बीमारियों का प्रकोप बहुत कम देखने को मिलता है. यद्यपि कोई बीमारी अगर लौन में नजर आए तो उस का सावधानी से निरीक्षण करें. कई बार खराब जल निकासी के कारण भी लौन में समस्या आती है. ऐसा होने पर जल निकासी का प्रबंध करें. फफूंद की समस्या आने पर लौन में डाइथेनन (2 लिटर पानी) व बाविस्टिन (1 ग्रा./लिटर पानी) के घोल से ड्रैचिंग करें, यानी मग में डाल कर घास पर डालें. घास में रस्ट की समस्या आने पर प्रोपिकोनाजोल का स्प्रे करें.

जड़ों को छेदने वाले ग्रब्ज या कीटों की रोकथाम के लिए क्लोरपाइरेफास (2 मिली./लिटर पानी) की डै्रचिंग करें. वैसे तो आंगन में एक हराभरा लौन सब की नजर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है लेकिन अगर इस के साथसाथ छोटे अलंकृत पौधे या वस्तुएं सजाएं तो इस का आकर्षण कई गुना हो जाता है. यदि लौन से हो कर घर का प्रवेशद्वार पड़ता है तो लौन में रास्ता बनाएं ताकि लौन पर लोग न चलें. बाजार में अलगअलग प्रकार के पेवर उपलब्ध हैं जिन का बखूबी प्रयोग किया जा सकता है. गोल पत्थर के पेवर आप के लौन को जापानी आभास देंगे. लौन के एक कोने में छोटी रौकरी, फौआरा या झरना इत्यादि आप के लैंडस्केप को जीवंत कर देगा. किसी कोने में रखा बर्ड बाथ व पेड़ों की शाखों पर बर्ड नैस्ट आप के प्रकृति प्रेम को उजागर करेगा.

शाहिद को रहता है इनकी तारीफ का इंतजार

अभिनेता शाहिद कपूर भले ही अपने कई बेहतरीन किरदारों के लिए वाहवाही हासिल कर चुके हैं लेकिन उनका कहना है कि उन्हें हमेशा अपने पिता एवं दिग्गज अभिनेता पंकज कपूर से मिलने वाली तारीफ का इंतजार रहता है.

शाहिद कपूर ने कहा कि वह (पंकज कपूर) कला (फिल्म) को लेकर काफी ईमानदार हैं और वह ऐसे ही किसी की भी तारीफ नहीं करते. इसलिए मुझे हमेशा उनसे मिलने वाली तारीफ का इंतजार रहता है. मैं काफी खुश हूं कि उन्हें ‘रंगून’ में मेरा काम पसंद आया है.

शाहिद ने बताया कि निर्देशक विशाल भारद्वाज ने उनके पिता पंकज कपूर के लिए एक विशेष स्क्रीनिंग का आयोजन किया था. ‘कमीने’ और ‘हैदर’ के बाद शाहिद और विशाल की एक साथ यह तीसरी फिल्म है. फिल्म में कंगना रनौत और सैफ अली खान भी हैं.

मेवाड़ की शान : कुम्भलगढ़ किला

हमारा देश आज किसानों का देश कहलाता है, पर एक वक्त था जब हमारा देश कारीगरों का देश था. यहां की कारीगरी और सोने पर ही तो विदेशी मुग्ध हो गए थे. वो आए और देश के टुकड़े-टुकड़े कर के चले गए. बाकी रह गईं तो बस कुछ टूटी फूटी निशानियां. इनमें से कुछ को तो संरक्षित कर लिया गया है पर कुछ अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. इन्हीं संरक्षित निशानियों में से एक है कुम्भलगढ़ किला. राजपूत अपनी आन बान शान और देश पर मर मिटने की भावना के लिए जाने जाते हैं और राजपूती आन बान शान का प्रतीक है कुम्भलगढ़ किला. चित्तौड़गढ़ किले के बाद यह राजस्थान का दूसरा सबसे विशाल किला है.

उदयपुर से 82 किमी की दूरी पर बसा यह किला मेवाड़ के कई राजाओं का घर था. समय समय पर यहां मेवाड़ के कई राजाओं ने वास किया था. दस्तावेजों की कमी के कारण इस किले के शुरुआती इतिहास के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस स्थान पर राजा सम्प्रति ने किले का निर्माण करवाया था, पर इसके बाद के इतिहास के बारे में कोई खास जानकारी उपलब्ध नहीं है.

द ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया

चीन के पास दुनिया की सबसे लंबी दीवार होगी, पर भारत में विश्व की दूसरी सबसे लंबी दीवार है. यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में भी कुम्भलगढ़ किले का नाम शामिल है. महाराणा कुम्भा ने 15वीं शताब्दी में इस किले को राजा सम्प्रति द्वारा बनाए गए दुर्ग के अवशेषों पर बनवाया था. यह समुद्रतल से 1100 फीट की ऊंचाई पर अरावली पर्वत श्रेणियों पर बना है. 19वीं सदी तक इसका विस्तार किया गया.19वीं शताब्दी के दौरान महाराणा फतेह सिंह ने इसकी मरम्मत करवाई. कुम्भलगढ़ किले की दीवार 36 किमी लंबी है.

इतिहास में अलग पहचान

इतिहास की कुछ किताबों में लिखा गया है कि इस किले की दीवार पर साथ साथ(साइड बाई साइड) 8 घोड़े दौड़ सकते थे. पर हकीकत तो अतीत में ही दफन हो गई है. इस किले का शौर्य बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देता है. उदयपुर के संस्थापक राजा उदय सिंह को बचपन में यहीं छुपाया गया था. इतिहासकारों के अनुसार मेवाड़ के वीर महाराणा प्रताप का जन्म भी इसी किले में हुआ था.

मेवाड़ की शान

राणा कुम्भा ने मेवाड़ की सुरक्षा के लिए 84 किले बनवाए थे, इन्हीं में से एक है कुम्भलगढ़ किला. महाराणा कुम्भा ने इन 84 किलों में 32 के नक्शे खुद बनाए थे. राणा कुम्भा का राज्य रणथंभोर से ग्वालियर तक फैला हुआ था. अपने राज्य की सुरक्षा के लिए उन्होंने 84 किले बनवाए थे. इन किलों में सबसे विशाल कुम्भलगढ़ का किला है. यह किला मेवाड़ की शान की गवाही देता है.

इस किले के 7 प्रवेश द्वार हैं. किले से अरावली पर्वत श्रेणियों की खूबसूरती भी देखी जा सकती है.

सिर्फ एक बार हुआ था सफल आक्रमण…

कुम्भलगढ़ किले पर सिर्फ एक बार सफल आक्रमण हुआ था. जब मुगल शासक अकबर, राजा मान सिंह और मारवाड़ के राजा उदय सिंह ने साथ मिलकर आक्रमण किया था. किले में पीने का पानी खत्म हो गया था, ऐसे में किले के फाटक खोलने पड़े और आक्रमणकारियों को किले में घुसने का मौका मिल गया.

गौरतलब है कि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि कुम्भलगढ़ किले पर कभी सफल आक्रमण नहीं किया गया.

किले के अंदर हैं कई मंदिर

किले के अंदर 360 से अधिक मंदिर हैं, इनमें से अधिकतर जैन मंदिर हैं और कुछ हिन्दू देवी-देवताओं के मंदिर है. शायद इसलिए भी यह किला संरक्षित किया गया हो, कौन जाने?

किले से जुड़ी एक कहानी ऐसी भी…

जैसा कि सर्वविदित है, हर किले के पीछे कई कहानियां होती हैं. ऐसी ही एक कहानी कुम्भलगढ़ किले से भी जुड़ी हुई है. महाराणा कुम्भा किले की दीवार बनाने में बार बार असफल हो रहे थे. बहुत सोच विचार करने के बाद भी कोई रास्ता नहीं निकल रहा था. एक दिन एक संत वहां से गुजर रहे थे. उन्होंने राजा को एक सुझाव दिया. संत ने कहा कि जब कोई मानव स्वेच्छा से अपनी बलि देगा, तभी किले का काम आगे बढ़ेगा. समस्या यह थी कि स्वेच्छा से कौन सा इंसान अपनी बलि देगा? तब संत ने ही कहा कि वो इस शुभ कार्य के लिए प्राण देने को तैयार हैं. उन्होंने चलने की आज्ञा मांगी और राजा से कहा कि जहां वो रुके वहीं उनकी बलि दी जाए. 36 किमी चलने के बाद संत रुक गए और उनकी बलि दे दी गई. जहां उनका सर गिरा वहां एक मंदिर बनवाया गया और जहां उनका शरीर गिरा वहीं से दीवार बनाई गई. यह कहानी बहुत प्रचलित है, पर कहानियों में कितनी सच्चाई होती है यह सब जानते हैं.

कुम्भलगढ़ नेशनल पार्क

किले के चारों तरफ कुम्भलगढ़ नेशनल पार्क है. इस नेशनल पार्क में कई पशुओं-पक्षियों और पेड़-पौधों को संरक्षित कर रखा गया है. तेंदुए और चीते के लिए यह नेशनल पार्क मशहूर है.

बादल महल है चर्चित

किले के अंदर बना है बादल महल. इस महल के छत से अरावली के 13 शिखरों के खूबसूरत नजारें देखे जा सकते हैं. इन शिखरों ने सालों से इस किले की रक्षा की है.

लाइट एंड साउंड शो

कुम्भलगढ़ किले में हर शाम को लाइट एंड साउंड शो दिखाया जाता है. इस शो में किले के इतिहास के बारे में बताया जाता है.

कैसे पहुंचे कुम्भलगढ़ किला?

कुम्भलगढ़ किला उदयपुर से 82 किमी की दूरी पर है. उदयपुर से टैक्सी बुक करके कुम्भलगढ़ किले तक पहुंचा जा सकता है.

कब जाएं?

इतिहास को बयां करता यह किला हफ्ते के सातों दिन खुला रहता है. इतिहास के इस पहलू को महसूस करने के लिए भागती दौड़ती जिन्दगी से वक्त निकालकर यहां जरूर जाना चाहिए.

बर्थडे स्पेशल: कुछ ऐसी थी अमृता की जिंदगी

अमृता सिंह हिंदी सिनेमा और टेलिविजन की सफल अभिनेत्रीयों में से हैं. अमृता सिंह की पहली डेब्यू फिल्म “बेताब” साल 1983 में रिलीज हुई थी. इसके अलावा और भी कई फिल्में है, जिसके कारण अमृता सिंह ने बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री में अपनी मुकाम हासिल की जैसे मर्द (1985), नाम (1986), खुदगर्ज (1987), इलाका (1989), तूफान (1989) आदि.

प्रारंभिक जीवन

अमृता सिंह का जन्म 9 फरवरी 1958 को एक शिख परिवार में हुआ था और इनकी मां का नाम रुखशाना सुल्तान है, जो की एक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. इनके पिता का नाम शिविन्दर सिंह, जो एक आर्मी ऑफिसर थे. अमृता ने अपनी स्कूल की पढ़ाई मॉडर्न स्कूल दिल्ली से की है.

अमृता सिंह ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत साल 1983 की हिंदी फिल्म “बेताब” से किया था, इस फिल्म में इनके अपोजिट लीड रोल में सन्नी देओल थे और यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल साबित हुई थी. अमृता सिंह ने साल 1985 में अमिताभ बच्चन के साथ मर्द में काम किया और यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी हिट फिल्म साबित हुई. इन्होंने ज्यादातर फिल्में बॉलीवुड अभिनेता सन्नी देओल, संजय दत्त, अनिल कपूर और अमिताभ बच्चन के साथ की है.

अमृता ने अपने जीवन में रोमैंटिक, एक्शन, ड्रामा फिल्मों के अलावा कुछ ऐसी फिल्में भी की है जिनमें उन्होंने खलनायक की भूमिका अदा की है जैसे “राजू बन गया जेंटलमैन”(1992) और “आइना”(1993). इसके अलावा अमृता ने बहुत सारी फिल्में की हैं जैसे “शहीद”, “शूटआउट एट लोखंडवाला”, “कलयुग” और “दस कहानियां” जैसी फिल्में.

अमृता सिंह का निजी जीवन

अमृता सिंह की निजी जीवन की बात करे तो इन्होंने बॉलीवुड फिल्म अभिनेता सैफ अली खान से साल 1991 में शादी की और इन दोनों के दो बच्चे हुए सारा अली खान और इब्राहिम अली खान. इन दोनों ने शादी के 13 साल बाद साल 2004 में तलाक ले लिया. उसके बाद सैफ अली खान ने बॉलीवुड फिल्म अभिनेत्री करीना कपूर से शादी कर लिया.

अमृता सिंह की फिल्में

बॉलीवुड फिल्म अभिनेत्री अमृता सिंह ने अपने फिल्मी करियर  में बहुत सारी बॉलीवुड हिंदी फिल्में की जैसे बेताब (1983), मर्द (1985), चमेली की शादी (1986), नाम (1986), खुदगर्ज (1987), तमाचा (1988), वारिस (1988), अग्नी (1988), गलियों का बादशाह (1989), इलाका (1989), बटवारा (1989), तूफान (1989), जादूगर (1989), वीरू दादा (1990), क्रोध (1990), धरम संकट (1991), अकेला (1991), राजू बन गया जेंटलमैन (1992), सूर्यवंशी (1992), रंग (1993), कलयुग (2005), शूटआउट एट लोखंडवाला (2007), कजरारे (2011), औरंगजेब (2013), और 2 स्टेट्स.

धारावाहिक में भी किया काम

अमृता ने 2005 में स्टार प्लस के सीरियल ‘काव्यांजली’ में भी काम किया है.

ऑवार्ड

1994 में अमृता सिंह को फिल्म ‘आइना’ के लिए फिल्म फेयर ऑवार्ड से नावाजा गया था. 2005 में धारावाहिक काव्यांजली के लिए इंडियन टेली ऑवार्ड और 2006 में पसंदीदा खलनायक के लिए स्टार परिवार ऑवार्ड मिला था.

किसी हीरो को पसंद नहीं थी ये हीरोइन

60 और 70 के दशक में एक हीरोइन फिल्म इंडस्ट्री में तेजी से कदम जमाने की कोशिश में लगी थी, लेकिन कोई भी हीरो उसके साथ काम करना नहीं चाहता था. लेकिन वक्त का पहिया फिर ऐसा बदला कि हर हीरो इस हीरोइन के साथ काम करने किए जद्दोजहद करने लगा. ये हीरोइन थी हुस्न और खूबसूरती की मल्लिका मुमताज, जिनकी मनमोहक मुस्कान और खिलखिलाहट ने सभी को अपना दीवाना बना दिया था.

आज भी मुमताज के लाखो दीवाने हैं. ना सिर्फ उनकी खूबसूरती के चर्चे आम थे बल्कि जिस अदायगी और स्टाइल के साथ वो साड़ी पहनती थीं, लोग उसके भी कायल थे. बावजूद इसके कोई हीरो मुमताज के साथ काम नहीं करना चाहता था.

दरअसल मुमताज ने 12 साल की बेहद छोटी उम्र में ही फिल्मों में काम करना शुरु कर दिया था. कम उम्र होने की वजह से कोई भी निर्माता-निर्देशक यहां तक कि हीरो भी उन्हें लीड हीरोइन के तौर पर फिल्मों में नहीं लेना चाहता था. यही वजह रही कि मुमताज को शुरुआती दिनों में कई फिल्मों में एक साइड एक्ट्रेस का रोल करना पड़ा.

लेकिन इन साइड किरदारों में भी मुमताज को नोटिस किया गया. मुमताज को लगा कि अब उनके दिन फिरेंगे और मुख्यधारा की फिल्मों में काम मिलेगा, हीरो के साथ रोमांस करने का मौका मिला. पर हुआ उल्टा. मुमताज की जद्दोजहद जारी रही और थक-हारकर उन्हें बी-ग्रेड फिल्मों का सहारा लेना पड़ा. इस दौरान उन्होंने 16 एक्शन फिल्में कीं जिनमें उनकी जोड़ी दारा सिंह के साथ बनी. इन दोनों की जोड़ी लोगों को काफी पसंद आई और उनकी 10 फिल्में हिट रहीं. इन एक्शन फिल्मों की बदौलत मुमताज की छवि एक स्टंट हीरोइन की बन गई.

फिर आया वो दौर जब मुमताज ने ए-ग्रेड की फिल्मों का रूख किया. मुमताज ए-ग्रेड की फिल्म पाने के लिए हाथ-पैर मार रहीं थीं पर कोई भी उनके साथ काम करने के लिए तैयार नहीं था. यहां तक कि उस दौर के सुपरस्टार रहे धर्मेंद्र और शशि कपूर ने भी मुमताज के साथ काम करने से मना कर दिया. उनका तर्क था कि वो एक स्टंट हीरोइन के साथ काम नहीं करेंगे.

मतलब साफ था कि मुमताज का सुनहरा सफर अभी शुरु नहीं हुआ था और फिर मुमताज अपनी लड़ाई में जुट गईं. उन्होंने फिर ए-ग्रेड की फिल्मों में सपोर्टिंग रोल ही करने शुरु कर दिए. ‘काजल’, ‘खानदान’, ‘मेरे सनम’ और ‘पत्थर के सनम’ जैसी कई ऐसी ए-ग्रेड फिल्में रहीं जिनमें मुमताज का साइड किरदार था. आखिरकार उन्हें फिल्म ‘आराधना’ में राजेश खन्ना के साथ मुख्य हीरोइन का किरदार मिला. फिल्म हिट हुई, दोनों की जोड़ी भी ब्लॉकबस्टर साबित हुई. बस यहीं से मुमताज का सुनहरा सफरनामा शुरु हो गया.

इसके बाद राजेश खन्ना के साथ मुमताज की दो और फिल्में आईं जो सुपरहिट साबित हुईं. इन फिल्मों के बाद तो मुमताज अपने दौर की सबसे ज्यादा मेहनताना पाने वाली हीरोइन बन गईं और फिर जो सुनहरा दौर शुरु हुआ वो सभी के लिए मिसाल बन गया.

लेकिन 12 साल तक फिल्मों में काम करने के बाद मुमताज ने फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया और शादी करके 1974 में लंदन जाकर बस गईं. उनका चार्म और खूबसूरती आज भी देखने लायक है.

चॉकलेट डे स्पेशल : रम ट्रफल

फरवरी का महीना आते ही सभी पर प्यार का खुमार छा जाता है. खासकर युवाओं के लिए तो यह महीना किसी त्योहार से कम नहीं होता. 7 से 14 फरवरी तक वैलेंटाइन वीक के तौर पर मनाया जाता है. इसी वीक में एक दिन चॉकलेट डे भी है. 9 फरवरी चॉकलेट डे के रूप में मनाया जाता है.

चॉकलेट डे के हिसाब से रम ट्रफल बेस्ट रेसिपी है. यह एक कॉन्टिनेंटल डेजर्ट है. अगर आपके पार्टनर मीठा खाने के शौकीन हैं तो यह ट्रफल उन्हें जरूर पसंद आएगा.

ढ़ेर सारा चॉकलेट और थोड़ी सी रम से बनी ये रम ट्रफल निश्चय ही आपके पार्टनर को आपके करीब लाएगा और आपके रिश्ते में मिठास घोल देगा. जानिए रम ट्रफल बनाने की विधि.

सामग्री

कप पिघली हुइ डार्क चॉकलेट

2 अंडे

¼ कप आइसिंग शुगर

4-5 चम्‍मच पिघला बटर

1-2 चम्‍मच रम

1 चम्‍मच क्रीम

किसा हुआ नायिल

विधि

एक कटोरे में अंडा, बटर, रम और दोगुनी क्रीम डाल कर अच्‍छी तरह से फेंट लें. इस मिश्रण को पिघले हुए चॉकलेट के साथ मिला दीजिये.

अगर यह चॉकलेट पिघली हुई ना लगे तब आप उसे दुबारा गरम कर के पिघला सकती हैं. इसे एक बर्तन में डाल कर एक पानी से भरे पैन के अंदर रख दीजिये और गैस की आंच को धीमा कर दीजिये.

इस मिश्रण को धीरे-धीरे चलाइये जिससे अंडे का मिश्रण इसके साथ मिल जाए. अब धीरे से आइसिंग शुगर डालिये और देखती रहिये कि कहीं चॉकलेट मिश्रण में गठ्ठे ना पड़ रहे हों.

जब शुगर अच्‍छी तरह से मिक्‍स हो जाए तब उसमें रम की 1-2 बूंद डाल दीजिए और गैस से उतार कर ठंडा होने के लिये रख दीजिये.

अब इनकी छोटी-छोटी बॉल्‍स बना लीजिये और ऊपर से नारियल और चॉकलेट चिप से गार्निश कर दीजिये.

तैयार है आपका यमी रम ट्रफल, जिसे खाकर आपके पार्टनर खुश हो जाएंगे.

गुलाबी निखार से पार्टनर को करें इम्प्रेस

फरवरी को प्‍यार का महीना कहते हैं. खासतौर से युवाओं के लिए तो फरवरी का पूरा महीना किसी त्‍यौहारी महीने से कम नहीं होता. 7 फरवरी से 14 फरवरी तक कोई न कोई खास दिन जरूर मनाया जाता है.

इस वैलेंटाइन वीक आप गुलाबी निखार चाहती हैं तो ये टिप्‍स आपके काम आ सकते हैं..

1. गुलाबी निखार चाहिए तो चेहरे पर सेब और पपीते का गूदा लगाएं. इससे चेहरे पर मौजूद अनचाहे दाग-धब्बे दूर हो जाएंगे.

2. समय कम है तो झटपट निखार के लिए चेहरे पर नींबू, हल्दी और बेसन का पेस्ट लगाएं. चेहरा निखरा-निखरा नजर आएगा.

3. त्‍वचा ऑयली है तो मुलतानी मिट्टी में गुलाब जल मिलाकर लगाने से भी गुलाबी निखार मिलता है.

4. खूबसूरत दिखने के लिए नींद पूरी करें. नींद पूरी नहीं होगी तो आप बीमार नजर आएंगी.

5. खूब पानी पीएं क्‍योंकि शरीर में पानी की कमी होगी तो चेहरे पर खिंचाव नजर आएगा.

जब दिखना हो खूबसूरत..

क्या आपको इस बात की जानकारी है कि साबुन और फेसवॉश में कई ऐसे रासायनिक तत्व मौजूद होते हैं जो आपकी त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं. आप अपना चेहरा साफ करने के लिए फेसवॉश या फिर साबुन का इस्तेमाल करते हैं तो इनमें मौजूद रासायनिक तत्व आपकी स्किन को साफ तो कर देंते हैं लेकिन इससे आपकी त्वचा रूखी और बेजान भी हो जाती है. अगर आप इनका इस्तेमाल कर रोज़ नहाती हैं और मुंह भी धोती हैं ताकि आपका चेहरा साफ और सुंदर नज़र आए, तो हम आपको बता देना चाहते हैं कि इनके बहुत ज्यादा इस्तेमाल से जल्दी झुर्रियां पड़ जाती हैं.

अप्राकृतिक चीजों का प्रयोग आपके स्किन से नेचुरल ऑयल को सोख लेते हैं, जिससे त्वचा और बेजान नजर आने लगती है. ऐसे में चेहरे को साफ करने के लिए आपको घरेलू उपाय अपनाने चाहिए. इनके इस्तेमाल से चेहरे की सफाई तो हो ही जाती है साथ ही त्वचा से जुड़ी कई समस्याएं भी दूर हो जाती हैं.

आप चाहते हैं कि आपका चेहरा कभी खराब न हो तो आपको नीचे दिए इन 5 चीजों का इस्तेमाल करना शुरू कर देना चाहिए :

दूध

हम आपको बताना चाहते हैं कि स्किन की सफाई के लिए कच्चे दूध का इस्तेमाल करना बहुत ही बहुत ही बेहतर होता है. आपकी त्वचा में मौजूद डेड स्किन को कच्चा दूध साफ तो कर ही देता है, साथ ही यह आपकी त्वचा की नमी को भी बरकरार रखने में मदद करता है. यह नेचुरल क्लींजर का काम बखूबी निभाता है.

चीनी

चीनी एक मीठा पदार्थ है. चीनी आपकी स्किन को बहुत अच्छे से साफ करता है. इसका इस्तेमाल करने के लिए आपको घर में रखी चीनी को महीन-महीन पीस लेना चाहिए और और फिर इससे चेहरे की सफाई करनी चाहिए. चीनी भी डेड स्किन को साफ करने में मदद करती है. आप चीनी में एलोवेरा को मिलाकर भी चेहरे पर लगा सकते हैं, इस तरीके से भी चेहरे की सफाई की जा सकती है.

नारियल तेल

बालों को लंबा और घना करने में मदद करने वाला नारियल तेल आपकी स्किन को मजबूत बनाने का काम भी करता है. नारियल तेल से अपनी त्वचा की मसाज करना बहुत फायदेमंद होता है. इसका रोजाना इस्तेमाल करने से आपके स्किन की नमी हमेशा बनी रहती है और चेहरे के रोम छिद्रों में मौजूद गंदगी भी साफ हो जाती है.

शहद

शहद का इस्तेमाल तो कई तरीकों से भिन्न भिन्न प्रयोगों के लिए किया जाता है. इसका इस्तेमाल स्किन से रिलेटेड प्रॉब्लम के लिए भी किया जाता है. शहद के इस्तेमाल से त्वचा संबंधी कई समस्याएं भी दूर हो जाती हैं. ये आपकी स्किन की नेचुरल नमी को खोने से बचाता है. साथ ही यह त्वचा को अंदर तक साफ करता है. शहद का सही इस्तेमाल करने के लिए, शहद की कुछ बूंदें हाथ में लेकर उससे चेहरे पर लगाकर अच्छे से मसाज करें, कुछ देर इसे एसे ही छोड़ दें. फिर उसके बाद चेहरे को कुनकुने पानी से धो डालें.

पपीता

पपीता के फल में मौजूद कैरोटेनॉएड्स और विटामिन, हमेशा से नेचुरल क्लींजर की तरह काम करता आया है. इसको लगाने से स्किन में बहुत निखार आता है. पपीते के कुछ टुकड़ों को अगर शहद के साथ मिलाकर हल्के हाथों से चेहरे पर लगाया जाए या मसाज करें तो चेहरा एक दम साफ होकर दमकने लगता है.

जवानों को मिले सही माहौल

देश सेवाऔर सुरक्षा में लगे एक सैनिक के फेसबुक पर आए वीडियो, जिस में उस ने अपने खानेपीने और रहनसहन की पोल खोल डाली है, से हड़कंप मच गया है. अभी कुछ दिन पहले सैनिकों का नाम ले कर देशसेवा की दुहाई देने वाली सरकार को सांप सूंघ गया है कि वह अपने उन जवानों के साथ कैसा व्यवहार करती है, जिन के नाम पर वह नोटबंदी की कतारों में खड़े लोगों को दुत्कार रही थी.

देश की सेना के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें अकसर आती रहती हैं और बहुत जवान खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर लेते हैं, क्योंकि उन के अफसर उन्हें सही सुविधाएं नहीं देते. जब भी भरती होती है, भरती केंद्रों पर हजारों की भीड़ उमड़ जाती है, क्योंकि सेना की नौकरी आज भी सुरक्षित व कमाऊ मानी जाती है. सेना में अनुशासन और कड़ी मेहनत होती है पर जवान उसे सहने को तैयार हैं पर इस का मतलब यह नहीं कि उन के साथ मनमाना व्यवहार किया जाए.

हमारे यहां युवाओं को खासतौर पर गांवों के युवाओं को हर जगह हांका जाता है. उसी का नतीजा है कि या वे आधीअधूरी पढ़ाई कर पाते हैं या फिर बेकाबू और उद्दंड बन जाते हैं. सेना में जाने पर भी उन में वह सोच और बैलेंस नहीं पैदा होता जो युवाओं में होना चाहिए. उन के जोश और कुछ करने की इच्छा को दफन कर दिया जाता है.

सेना में सारा खेल युवाओं का होता है. उन्हीं के बल पर सेनाएं चौकन्नी रहती हैं. उबाऊ दिन और डरावनी रातों में यदि गुस्सा रहे तो सैनिकों का मानसिक बैलेंस बिगड़ ही जाएगा. उन्हें सुविधाएं न दो पर जीने का साधन तो देना ही होगा. हमारे यहां का निकम्मापन सेना में भी घुसा पड़ा है जो इस बीएसएफ के जवान ने फेसबुक पर  पोस्ट किया गया है. ऐसी नौबत आना ही गलत है और चाहे सेना हो, सरकारी या प्राइवेट नौकरियां हों, जवानों को सही माहौल मिले यह जरूरी है.

देश की तरक्की के लिए जरूरी है कि युवावर्ग शांत रहे और अपनी शक्ति गुस्सा प्रकट करने में नहीं, क्रिएटिविटी दिखाने में लगाए. यदि लोग युवाओं को अनुशासन के नाम पर दबाएंगे तो देश में कुछ नया नहीं होगा, कुछ प्रगति नहीं होगी.

शाहरुख, सलमान और अक्षय पार लगाएंगे मुस्तफा की नैय्या!

ये तो यह साफ हो चुका है कि सोशल मीडिया या ट्वीटर पर फिल्म के प्रमोशन का फिल्म के बाक्स आफिस के आंकड़ों पर कोई असर नहीं होता है. इसके बावजूद भेड़चाल का शिकार बॉलीवुड, हर फिल्म के प्रदर्शन से पहले उस फिल्म को लेकर बॉलीवुड के बड़े बड़े कलाकार अपनी प्रतिक्रियाओं से ट्वीटर व सोशल मीडिया को भर देते हैं. इसके बावजूद फिल्में असफल हो जाती हैं.

यह एक कटु सत्य है. कुछ माह पहले राखी सावंत की फिल्म ‘‘कहानी एक जूली की’’ के प्रदर्शन से पहले शाहरुख खान व गोविंदा सहित कई दिग्गज फिल्म व टीवी कलाकारों ने राखी सावंत और उनकी फिल्म को प्रमोट करने के लिए काफी कुछ सोशल मीडिया पर कहा था. राखी सावंत ने अपनी फिल्म के समर्थन में इन हस्तियों के समर्थन वाले वीडियो भी सोशल मीडिया पर डाले थे. इसके बावजूद राखी सावंत की फिल्म ‘‘कहानी एक जूली की’’ ने बाक्स आफिस पर पानी तक नहीं मांगा. मगर इस बात से कोई भी सबक लेने को तैयार नहीं है.

अब बॉलीवुड के मशहूर निर्देशक अब्बास मस्तान जोड़ी के, अब्बास बर्मावाला अपने बेटे मुस्तफा को अपनी फिल्म ‘‘मशीन’’ से लौंच कर रहे हैं. मुस्तफा की फिल्म ‘‘मशीन’’ आगामी 24 मार्च को प्रदर्शित होनी है. इसके लिए अब्बास मस्तान के निर्देशन में काम कर चुके शाहरुख खान, सलमान खान और अक्षय कुमार ने सोशल मीडिया पर मुस्तफा को प्रमोट करने की जिम्मेदारी संभाल ली है. मजेदार बात यह है कि कुछ दिन पहले शाहरुख खान और सलमान खान ने एक अवार्ड समारोह के स्टेज पर मुस्तफा का स्वागत करते हुए गाना गाया था ‘‘मुस्तफा मुस्तफा हम हैं तुम्हारे मुस्तफा..’’ इससे आम दशर्क के मन में मुस्तफा और उनकी फिल्म ‘‘मशीन’’के प्रति कितनी उत्सुकता जगी है यह तो अभी तक पता नहीं चल सका है.

मगर अब यह तीनों कलाकार सोशल मीडिया पर मुस्तफा को प्रमोट करने में लगे हुए हैं. कुछ दिन पहले ही सलमान खान ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट में मुस्तफा की फिल्म ‘‘मशीन’’ का पोस्टर भी डाला था. सूत्रों का दावा है कि यह तीनों स्टार आगे भी मुस्तफा को प्रमोट करते हुए नजर आने वाले हैं. सूत्र तो यहां तक बता रहे हैं कि अक्षय कुमार ने तो फिल्म ‘‘मशीन’’ में एक कैमियो भी किया है.

अब देखना है कि इन तीनों दिग्गज कलाकारों द्वारा ‘मशीन’ को प्रमोट किए जाने का बाक्स आफिस पर क्या असर निकलकर आता है. वैसे इन सभी को चंद दिन पहले फिल्म ‘दंगल’ की सफलता की पार्टी में विधु विनोद चोपड़ा के दिए गए बयान पर गौर फरमाना चाहिए. विधु विनोद चोपड़ा ने फिल्म ‘‘दंगल’’ की सफलता का श्रेय आमिर खान को देने की बजाय फिल्म के कथानक को देते हुए कहा है ‘‘हर फिल्म अपने कथानक व प्रस्तुतिकरण से सफल होती है, कलाकारों के नाम सें नहीं.’’ यानि कि यदि मुस्तफा की फिल्म ‘‘मशीन’’ की कहानी अच्छी होने के अलावा फिल्म बनी भी अच्छी होगी और मुस्तफा ने अच्छा अभिनय किया होगा, तब ही इसे सफलता मिलेगी.

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