एक भारतीय की जिंदगी पर बनी हॉलीवुड फिल्म

बीते साल नवम्बर में यानि कि साल 2016 में यू.एस में रिलीज हुई फिल्‍म ‘लॉयन’, इस साल 24 फरवरी 2017 को भारत में रिलीज की जाने वाली है. हॉलीवुड फिल्‍म ‘लॉयन’ में रोल निभाने वाले भारतीय मूल के ब्रिटिश एक्टर देव पटेल को ऑस्कर के लिए नॉमिनेट किया गया है. ये फिल्म भारत के, मध्यप्रदेश के खंडवा में रहने वाले बच्चे सरू की जिंदगी पर आधारित है.

फिल्म की पूरी कहानी सरू ब्रायर्ली द्वारा लिखी गई, उनकी किताब ‘अ लॉन्ग वे होम’ (A Long Way Home) से ली गई है, जिसमें पांच साल का सरू (Saroo) भारत में एक ट्रेन में खो जाता है और अपने घर और परिवार से हजारों किलोमीटर दूर हो जाता है. वो कोलकाता में अपना जीवन बिल्कुल अकेले, भीख मांगते हुए बिताता है और बाद में एक ऑस्ट्रेलियाई जोड़े द्वारा अपना लिया जाता है.

पच्चीस साल बाद अपनी यादों के सहारे, अपनी अटूट दृढ़ इक्षाशक्ति के साथ और आज की क्रांतिकारी तकनीकों की मदद से अंत में सरू अपने परिवार को खोजने में सफल होता है.

खंडवा में भीख मांगने वाला सरू आज ऑस्ट्रेलिया का एक बड़ा बिजनेसमैन है. ये बात 1987 की है, सरू की उम्र उस समय 5 साल थी. आज सरू 30 साल का हो चुका है और उसका नाम भी बदलकर सारू ब्रायली हो गया है, ऑस्ट्रेलिया में रहने के बाद भी सरू के मन में अपने असली माता पिता और भाई बहन से मिलने की इच्छा हमेशा से ही बनी हुई थी.

अपने माता-पिता को ढूंढने के लिए सारू ने टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया, गूगल मैप सहित कई सोशल मीडिया ग्रुप्स की मदद ली और आखिरकार उसने अपने परिवार को ढूंढ ही निकाला. 12 फरवरी 2012 को सरू अपने माता पिता से मिलने खंडवा पहुंचा.

आज सरू को इस छोटी सी बात कि खुशी भी है कि उनके पास उनकी बचपन की एक पुरानी फोटो है. सूत्रों की मानें तो ऑस्ट्रेलिया में रहकर सरू अपनी मां का पूरा ध्यान रख रहे हैं. उन्होंने अपनी मां को हज के लिए 3 लाख रुपए भी भेजे हैं और अपनी मां के लिये खंडवा में ही चार लाख रुपए का घर भी खरीद लिया है.

यह फिल्म सरू के पूरे जीवन को प्रस्तुत करती है. इस पूरी फिल्म में यही दिखाया गया है कि सरू का जीवन किन किन कष्टों में बीता और कैसे बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी कर वो अस्ट्रेलिया का एक सफल बिजनेसमैन बना.

सरू ने अपने इस घर वापसी के संस्मरण को एक किताब की शक्ल दी, जिसका नाम A Long Way Home’ है और इस किताब पर ऑस्ट्रेलिया के मशहूर निर्देशक एंड्रू फ्रेजर ने सरू की रियल लाइफ पर आधारित फिल्म बना डाली. अभिनेता सन्नी और अभिनेता देव पटेल ने इस फिल्म में अभिनय किया है जो वाकई सराहनीय है.

‘हर राज्य की विलुप्त कला को अपनी साड़ियों में लाना चाहती हूं’

काम करने की कोई उम्र नहीं होती. जब मन बना लो, काम शुरू कर दो. कुछ ऐसा ही कर दिखाया है मुंबई की 60 वर्षीय डिजाइनर और उद्यमी चित्रलेखा दास ने. उन के ब्रैंड का नाम ‘सुजात्रा’ है. 8 सालों से उन्होंने भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व के तमाम देशों में अपने द्वारा डिजाइन की अलगअलग तरह की डिजाइनर साड़ियां, कुरते, दुपट्टे, शालें आदि तैयार कर अपनी एक अलग पहचान बनाई है. वे पुरानी और न पहनी जाने वाली साडि़यों को भी नया लुक देती हैं. इतना ही नहीं, इस काम के लिए उन्होंने काम करने वाली महिलाओं को ट्रैनिंग भी दी है ताकि उन की रोजी बढ़े. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद चित्रलेखा ने अपनी यह सृजनात्मक रुचि नहीं छोड़ी. उन के पति आर्मी में थे. उन का तबादला होता रहता था, इसलिए उन्हें विभिन्न जगहों की संस्कृति और कला से रूबरू होने का मौका मिलता रहा. इसी कला और अलगअलग संस्कृति को उन्होंने अपनी साडि़यों की डिजाइनों में उतारा. पेश हैं विनम्र स्वभाव की चित्रलेखा से बातचीत के अंश:

इस क्षेत्र में कैसे आना हुआ?

बचपन से ही मुझे क्रिएटिव काम करने में मजा आता था. उस समय मैं त्रिपुरा के अगरतला में रहती थी. शादीविवाह में मुझे हर कोई दुलहन को सजाने या फिर रंगोली बनाने के लिए बुला लेता था. उस समय ब्यूटीपार्लर नहीं थे. इसलिए मेरे द्वारा सजाई गई दुलहन काफी सराही जाती थी. वहां की कला मुझे बहुत आकर्षित करती थी. वहां की सुंदरता से मैं बहुत प्रभावित थी. वहीं से मेरी एस्थैटिक सैंस का विकास हुआ. मैं ने रविंद्र भारती से स्नातकोत्तर की है. मुझे संगीत का भी शौक है. पति के डिफैंस सर्विस में होने की वजह से शादी के बाद मैं उन के साथ पूरा देश घूमी. हर जगह की कला को मैं खुद में आत्मसात करती थी. ॉ

इस के अलावा मैं हर जगह की प्रदर्शनी को बारीकी से देखती थी. 5-6 घंटे वहां बिताती थी. वहां देश भर की कला को देख कर मैं मुग्ध हो जाती थी. चेन्नई रहने के दौरान मैं ने एक छोटा सा बुटीक घर में खोला, जहां मैं खुद डिजाइन कर खुद सिलती थी, क्योंकि तब दर्जी मेरे हिसाब से काम करने के लिए राजी नहीं होते थे. मुझे यह काम पसंद था, इसलिए रात भर डिजाइन बना कर कपड़े काट कर सिलती थी. इस में पति का पूरा सहयोग था. अगर कपड़ा खराब हो जाता था, तो वे कभी कुछ नहीं कहते थे. इस तरह काम की शुरुआत हुई.

कब लगा कि आप एक अच्छी डिजाइनर बन सकती हैं?

मेरे घर के पास एक व्यक्ति ऐक्सपोर्ट किए जाने वाले कपड़े बेचता था. मैं उस से अलगअलग रंगों के कपड़े खरीद कर लाती थी. धीरेधीरे उन कपड़ों को जोड़ कर मैं ने एक बैड कवर बनाया, जिसे अपनी पड़ोसिन को दिखाया. उस ने बड़ी तारीफ की. अगले दिन सुबह वे मेरे पास आईं और बोलीं कि वह बैड कवर उन्हें बेटी को गिफ्ट में देने के लिए चाहिए. मैं ने उन्हें दे दिया. उस से मुझे 150 रुपए मिले, जिस में मेरा लाभ भी शामिल था. मुझे बहुत खुशी हुई कि मेरी कलाकारी सब को पसंद आ रही है. मैं ने 700 रुपए की सिलाई मशीन खरीदी और काम शुरू कर दिया. यह मुश्किल नहीं था. मैं ने केवल सही रंगों का प्रयोग कर पैच वर्क के द्वारा बैड कवर बनाए. इस तरह मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मैं तरहतरह के मैटीरियल बना कर अपने दोस्तों और जानपहचान वालों को देने लगी.

क्या आप ने डिजाइनिंग का कोई कोर्स किया है?

शुरूशुरू में मैं पुणे आ कर घर पर संगीत की क्लास लिया करती थी. एक दिन मैं अपनी दोस्त के साथ एक शौप में गई. वहां मैं ने एक दुपट्टा देखा, जिस में काफी अच्छी पेंटिंग बनी थी. वहां से पेंटर सिद्धार्थ का नंबर ले कर मैं उन से मिली. वे जेजे स्कूल औफ आर्ट्स के पढ़े हुए थे. उन्होंने हमारे पुणे के लेडीज क्लब में आ कर 10 दिन का कोर्स करवाया. उन्होंने सहज तरीके से डिजाइन बनाने की तकनीक और कला बताई, यहीं से मेरी जिंदगी बदल गई. यही मेरी ट्रैनिंग थी, मुझे कलर कौंबिनेशन समझ में आ गया. दिनरात काम कर मैं ने इसे सीख लिया.

अधिकतर आप किस तरह की पोशाकें तैयार करती हैं?

मैं साड़ी अधिक बनाती हूं. मैं सब से पहले अलगअलग वैराइटी के प्लेन कपड़े मुंबई, कोलकाता और प्रदर्शनी आदि स्थानों से खरीदती हूं. इस के बाद उन में तरहतरह की पेंटिंग्स और अलगअलग रंग के कपड़े जोड़ कर एक नया लुक देती हूं. मैं हर राज्य की खास शैली को मिक्स कर बनाती हूं.

व्यवसाय में सब से अधिक समस्या कहां आती है?

किसी भी व्यवसाय में मार्केटिंग और मांग के अनुसार सामान की आपूर्ति आवश्यक है. मेरे पास लोगों की मांग तो है पर टेलरों की समस्या अधिक है. कोई भी टेलर अधिक दिनों तक नहीं टिकता. उन्हें काम सिखाने के बाद वे काम छोड़ कर दूसरी जगह चले जाते हैं. ऐसे में मैं ने अपने घर में काम करने वाली महिलाएं रखीं, उन्हें ट्रैंड किया. तब पाया कि उन्हें पुरुष टेलरों से कहीं अधिक समझ है. वे सिलती भी अच्छी हैं और उन की सोच भी अच्छी है. मैं ने उन्हें मशीनें भी खरीद कर दी हैं. उन में से कईर् तो अब डिजाइन, सिलाई, कटाई सब करती हैं. मैं बाद में देख लेती हूं. अपने घर काम करने वाली ये महिलाएं महीने में 10-12 हजार कमाती हैं.

आप के पहनावे की खासीयत क्या है?

मैं कलर कौंबिनेशन पर काम करती हूं. इस में मैं हर राज्य की कला और हैंडलूम, जो कपड़े पर बनाई जाती है, उसे मिला कर साड़ी में जोड़ती हूं, जिस में कलमकारी, इकत, तांत, चंदेरी, काथा, स्टिच आदि सभी मिलाती हूं. मसलन, कोलकाता के बौर्डर को इकत के साथ मिला कर नया रूप देती हूं. इस प्रकार हर साड़ी में अलगअलग राज्य की कला और टैक्स्चर देखने को मिलता है. आजकल हैंडलूम का प्रचलन बहुत है. उस पर मैं कारीगरी अधिक करती हूं. अब मेरे काम में मेरा छोटा बेटा वेद प्रकाश दास भी जुड़ चुका है. इस काम में मेरी बहुओं की भी काफी प्रेरणा है. इसीलिए उन के नाम सुष्मिता, सुजाता और मेरा नाम चित्रलेखा सब को जोड़ कर मैं ने अपना बैं्रड ‘सुजात्रा’ बनाया है. इस काम में क्लौथ मर्चेंट मंगेश का भी काफी सहयोग रहा.

खुद को कैसे अपडेट करती हैं और आगे क्या प्लानिंग है?

अभी मैं राज्यों की विलुप्त होती जा रही कला को साडि़यों में लाने की कोशिश कर रही हूं. आजकल मैं मध्य प्रदेश की ‘गोंड’ आदिवासी कला पर काम कर रही हूं. वहां के कारीगरों को बुला कर उन्हें काम समझा कर वापस भेजती हूं. हर बार वे 20-25 हजार कमा कर जाते हैं. इस से पहले मैं ने गुजरात की अजरक, चंदेरी और कोलकाता की बाटिक प्रिंट पर काम किया था. आगे भी सभी राज्यों की कला पर काम करूंगी.

कभी लगा कि यह व्यवसाय आप को और पहले शुरू कर देना चाहिए था? और  गृहशोभा के जरीये क्या मैसेज महिलाओं को देना चाहती हैं?

कभीकभी लगता है कि उम्र अधिक हो चुकी हैं पर मैं उस पर ध्यान नहीं देती, क्योंकि मेरा मन अभी भी यंग है. गृहशोभा के माध्यम से मैं घर पर रहने वाली महिलाओं से कहना चाहती हूं कि अकेली न बैठें. बाहर निकलें और अपने हिसाब से कुछ करें. 99% महिलाएं मेरी उम्र में अकेली हो जाती हैं. लेकिन मेरे साथ हर दिन कोई नया जुड़ता है, जो मुझे प्रेरित करता है.

मिसाल हैं ये शादियां

विवाह शब्द का अर्थ है जिम्मेदारी उठाना, लेकिन लोग इसे समझने के बजाय विवाह की परंपरा को निभाने और जरूरत से ज्यादा खर्च कर वाहवाही बटोरने में जुटे रहते हैं. ऐसा नहीं है कि मंगलसूत्र बांधने पर ही स्त्रीपुरुष के बीच पतिपत्नी का रिश्ता बनता है. यह भी नहीं कि वरवधू का संबंध लाखों खर्च करने पर ही गहरा होता है. लेकिन आज विवाह में पानी की तरह पैसा बहाना और परंपराओं को एक से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाना फैशन जैसा हो गया है.

आइए, आप को कुछ ऐसे कपल्स के बारे में बताते हैं, जिन्होंने हिंदू रीतिरिवाज को नकार कर विवाह का दूसरा विकल्प अपनाया है और कम से कम खर्च कर सामाजिक उपदेश दिया है:

किसानों और विद्यार्थियों की जिंदगी संवारी

अभय देवरे और प्रीति कुंभारे: अभय देवरे और प्रीति कुंभारे इन दिनों मीडिया में छाए वे नाम हैं जिन की शादी में सगेसंबंधी और सहकर्मी नहीं, बल्कि गरीब किसान और पढ़ाई से वंचित मासूम बच्चे शामिल हुए. ज्यादातर लोग धूमधाम से शादी करना चाहते हैं, पर पैसों की वजह से वे ऐसा नहीं कर पाते. लेकिन अमरावती (महाराष्ट्र) के सहायक आयकर आयुक्त अभय देवरे और आईडीबीआई बैंक में सहायक प्रबंधक प्रीति कुंभारे ने पैसा होते हुए भी सामान्य तरीके से शादी की. ये दोनों शादी की ठाटबाट से अपना मानसम्मान नहीं बढ़ाना चाहते थे, बल्कि इन की इच्छा उन्हीं पैसों से दूसरों का जीवन संवारने की थी. इसलिए इस जोड़े ने अपने विवाह में होने वाला संभावित खर्च (करीब 3 लाख) गरीब किसानों और विद्यार्थियों के नाम कर दिया. दोनों ने महाराष्ट्र के यवतमाल और अमरावती जिलों में आत्महत्या करने वाले 10 किसानों को 20-20 हजार और जरूरतमंद विद्यार्थियों को 20 हजार का सहयोग और ग्राम पुस्तकालयों को 52 हजार दिए ताकि वे विद्यार्थियों के लिए किताबें आदि खरीद सकें.

असमानता का विरोध किया

कुंदा प्रमिला नीलकंठ और अनिल सावंत: आज भले कई महिलाएं फैशन के नाम पर मंगलसूत्र और सिंदूर नहीं लगाती हैं, लेकिन 59 वर्षीय डा. कुंदा प्रमिला एक ऐसी महिला हैं, जिन्होंने 34 साल पहले गुलामी का प्रतीक कह कर इस का त्याग कर दिया था, जिस से उन के अपनों ने उन का जम कर विरोध किया. 1987 में अनिल सावंत से कोर्ट मैरिज करने वाली कुंदा कहती हैं, ‘‘शुरू से सोशल मूवमैंट से जुड़ी थी. मेरे अनुसार सुहागन के सोलहशृंगार जैसे मंगलसूत्र, सिंदूर, बिछिया आदि असमानता का प्रतीक रहे हैं. अगर स्त्रीपुरुष दोनों समान हैं तो शादी होने के बाद ये प्रतीक सिर्फ महिलाओं के हिस्से ही क्यों आते हैं, पुरुष इन्हें क्यों नहीं मानते? इसी तरह हिंदू परंपरा के अनुसार शादी के दिन लाल जोड़ा और पीले (सोने) रंग का गहना पहनना जरूरी है, लेकिन मैं ने इस का पालन न करते हुए शादी के दिन सफेद रंग की साधारण सी कौटन की साड़ी पहनी थी. आज हमारी शादी को कई साल हो गए हैं. हम दोनों अपने वैवाहिक जीवन से काफी खुश हैं. अगर वाकई में शादी की परंपराओं को निभाना जरूरी होता है तो आज हम एकदूसरे के साथ न होते.’’

सत्यशोधक पद्धति से शादी की

डा. भारत पाटणकर और गेल आमवडट: 1976 में विदेशी महिला गेल आमवडट के साथ सत्यशोधक पद्धति से विवाह करने वाले डा. भारत पाटणकर कहते हैं, ‘‘मेरे अनुसार हिंदू विवाह पद्धति कई असमानताओं और आर्थिक शोषण पर आधरित है, इसलिए मैं ने अपनी शादी महात्मा जोतिबा फुले द्वारा बताई गई सत्यशोधक पद्धति से की, जिस में बहुत ही सरल तरीके, कम खर्च और बिना किसी बिचौलिए (पंडित, पुरोहित, मौलवी) के शादी हो जाती है. शादी के दौरान स्त्रीपुरुष असमानता को दूर करने के लिए वरवधू के पक्ष से समानता का गीत गाया जाता है. जैसे- स्त्री गाते हुए कहती है कि हमारे समाज में स्त्रियों को कोई हक नहीं दिया जाता, अगर तुम मुझे अपनी पत्नी बनाना चाहते हो, तो कहो कि तुम मुझे मेरा हक दोगे. फिर पुरुष गीत के माध्यम से कहता है कि मैं विश्वास दिलाता हूं कि ऐसा ही होगा. इस तरह बिना किसी खर्च और रस्मों के सिर्फ एकदूसरे के वादे के आधार पर शादी संपन्न हो जाती है.’’

शादी में सही जगह खर्च

तुषार नरेश शिंदे और नंदना: अंधश्रद्वा निर्मूलन समिति से जुड़े 29 वर्षीय तुषार नरेश शिंदे कहते हैं, ‘‘मुझे लगता है कि हिंदू परंपरा की विवाह पद्धति महिलाओं के साथ अन्याय करती है. इस पद्धति में मंगलसूत्र, सिंदूर जैसे वैवाहिक चिन्ह स्त्रियों के लिए बंधन हैं, जबकि पुरुष इन से मुक्त रहते हैं. इस के साथ ही विवाह में रिश्तेदारों को भेंटस्वरूप सामान देने का रिवाज भी है, जो मेरे अनुसार फुजूलखर्ची है. इसलिए मैं ने अपनी शादी सत्यशोधक पद्धति से की और भेंटस्वरूप खर्च होने वाले 50 हजार 2 संस्थाओं में दान दे दिए, जो अनाथ और मंदबुद्धि महिलाओं के लिए काम करती हैं.’’

अपनी पत्नी नंदना के बारे में तुषार कहते हैं, ‘‘मैं जब उस से मिला था, तब मुझे उस की जातिधर्म आदि की जानकारी नहीं थी, लेकिन मेरे लिए यह बात माने नहीं रखती थी, क्योंकि मैं जाति,धर्म, वर्ण को शादी का आधार नहीं मानता था. मैं ऐसे इनसान को अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहता था, जिसे मेरी जरूरत हो.’’

विधवाएं रहीं विवाह की विशेष मेहमान

रवि और मोनाली: कोई भी किसी शुभ मौके पर विधवा महिलाओं को अपने आसपास नहीं फटकने देता, लेकिन गुजरात के जीतूभाई पटेल के बेटे रवि की शादी में विधवा महिलाएं विशेष मेहमान रहीं. जीतूभाई की माने तो उन की यह दिली ख्वाहिश थी कि उन के बेटे की शादी में विधवाएं आएं और उन्हें आशीर्वाद दें. इसलिए उन्होंने 18 हजार से भी अधिक विधवा महिलाओं को आमंत्रित किया, जो गुजरात के 5 अलगअलग जिलों से विवाहस्थल पर उपस्थित हुईं. शादी में आई इन सारी विधवाओं को भेंटस्वरूप कंबल दिए गए. इन में से 500 विधवाओं को गाएं भी दी गईं ताकि दूध बेच कर वे अपना जीवनयापन कर सकें. जीतूभाई ऐसा कर लोगों तक यह संदेश पहुंचाना चाहते थे कि विधवा महिलाएं अशुभ नहीं होतीं, यह केवल लोगों का भ्रम है.

फिल्म रिव्यू : कुंगफू योगा

क्या हम यह मानते हैं कि भारत आज 21वीं सदी में भी महज जादू टोने व सांप संपेरों का देश है? कम से कम चीन की फिल्म निर्माण कंपनी के साथ संयुक्त रूप से सोनू सूद द्वारा निर्मित फिल्म ‘‘कुंगफू योगा’’ तो इसी बात को साबित करती है. फिल्म के नाम के साथ योगा शब्द जुड़ा है, मगर फिल्म में योगा नदारद है. फिल्म के एक सीन में जब जैक खलनायकों से जान बचाते हुए पानी में गिर जाते हैं, तब अश्मिता उनसे कहती है कि योगा के बल पर आठ मिनट तक सांस ली जा सकती है. अन्यथा पूरी फिल्म से योगा नदारद है. हकीकत में यह फिल्म न सिर्फ भारतीय दर्शकों के साथ खिलवाड़ करती है, बल्कि देश की अस्मिता के साथ भी खिलवाड़ करती है. फिल्म देखने के बाद सबसे पहला व अहम सवाल उठता है कि आखिर सोनू सूद की क्या मजबूरी थी, जो कि उन्होंने न सिर्फ फिल्म ‘‘कुंगफू योगा’’ में अभिनय किया, बल्कि इसका सह निर्माण व भारत में वितरण भी किया? यह फिल्म सोनू सूद के करियर पर एक बड़ा धब्बा साबित हो जाए, तो कोई आश्वर्य नहीं होना चाहिए. कथानक के नाम पर भी यह फिल्म शून्य है. बहुत बारीकी से सोचा जाए तो यह फिल्म पूर्णरूपेण भारत को लेकर चीन की जो सोच है, उसे जरुर परिलक्षित करती है. 

रोमांचक नाटकीय फिल्म ‘‘कुंगफू योगा’’ की शुरुआत प्राचीन भारत व 300 ईसापूर्व के इतिहास  और उस वक्त के एक युद्ध के बारे में बताते हुए होती है. जबकि कहानी के केंद्र में चीन के एक म्यूजियम में कार्यरत पुरातत्वविद जैक (जैकी चैन) हैं. जिनसे मिलने के लिए एक दिन भारत से एक प्रोफेसर अश्मिता (दिशपटानी) और उनकी टीचिंग सहायक कायरा (अमायरा दस्तूर) पहुंचते हैं. अश्मिता ने अपने साथ एक हजार साल पुराना मैप लिया हुआ है, जिसकी मदद से जैक मगध का पुराना खजाना खोजने की कोशिश करता है. कहानी चीन से दुबई और फिर भारत में राजस्थान पहुंचती है. राजस्थान में एक किले के बाहर सांप व संपेरों का खेल तथा जादू टोना आदि का खेल दिखाया गया है. (अब यह सोनू सूद या जैकी चैन या फिल्म के चीनी निर्देशक स्टैनली टांग ही बेहतर बता सकते हैं कि भारत में किस किले के पास पर्यटकों को लुभाने के लिए आज भी जादू टोना या सांप सपेरों का खेल चलता रहता है.)

बहरहाल, मगध के खजाने की तलाश के सिलसिले में जैक की पूरी टीम की मुलाकात रैंडल (सोनू सूद) से होती है. जिसकी कोशिश रहती है कि वह पूरे खजाने को अपना बना ले. उसका दावा है कि यह खजाना उसकी पुश्तैनी परिवारिक संपत्ति है. फिल्म का क्लायमेक्स और अंत बहुत बचकाना सा है. फिल्म के कुछ रोमांचक सीन छोटी उम्र के बच्चों को जरुर आकर्षित कर सकते हैं. फिल्म को अच्छे सेट बनाकर फिल्माया गया है. कैमरामैन ने बेहतरीन काम किया हैं. मगर फिल्म आकर्षित नहीं करती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो इस फिल्म में सोनू  सूद किसी जोकर से कम नजर नहीं आते. वह फिल्म के मुख्य खलनायक हैं, मगर वह निराश करते हैं. फिल्म की पटकथा भी उनके रैंडल के किरदार को बहुत कमजोर बनाती है. सोनू सूद का पात्र रैंडल, मगध के खजाने को हर हाल में अपने कब्जे में करने के लिए जैक की पूरी टीम से अपने दलबल के साथ मंदिर में युद्ध करता है, मगर अचानक कुछ साधु व भक्त आ जाते हैं और जैक कहता है कि यह खजाना तुम्हारा नहीं पूरी दुनिया का है और फिर जैक के साथ साथ रैंडल भी खुशी में नृत्य करने लगता है. यह मंदिर जिस जगह है, वहां पर जैक व रैंडल के लोगों को पहुंचने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा. यह जमीन से नीचे लगभग पाताल में है, तो फिर यह साधु व भक्त वहां कैसे पहुंच गए. फिल्म के एक्शन दृश्यों में 62 वर्षीय जैकी चैन कमजोर नजर नहीं आते हैं. दिशा पटानी का अभिनय ठीक ठाक हैं.

फिल्म के तमाम सीन रोमांच पैदा करने की बजाय बोर करते हैं. फिर चाहे वह दुबई में हीरो की नीलामी का मसला हो या भेड़ियों से लड़ाई के दृश्य हों. यहां तक कि गाड़ी के अंदर शेर की मौजूदगी और जैकी चैन का उस गाड़ी में रहना तथा रैंडल का पीछा करना हास्यास्पद लगता है. यूं तो कार चेजिंग के सीन अच्छे बन पड़े हैं, मगर गाड़ी के अंदर जैकी चैन व शेर की मौजूदगी..डर या रोमांच पैदा नहीं कराता..समझ में नहीं आता कि इस सीन को रखकर निर्देशक दर्शकों को क्या नया परोसने की इच्छा रखते है.

फिल्म के निर्देशक व पटकथा लेखक पूरी तरह से विफल नजर आते हैं. यह फिल्म नहीं बल्कि  किसी सीरियल के कुछ एपीसोड नजर आते हैं. एक घंटा बयालिस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘कुंगफू योगा’’ के निर्देशन स्टैनली टांग, संगीतकार नाथन वांग कोमैल शिवान हैं.

इन बड़ी फिल्मों में हुई कुछ छोटी गलतियां

फिल्म बनाते समय फिल्म मेकर्स से भी गलतियां हो जाती हैं. लेकिन आमतौर पर दर्शक उसे देख नहीं पाते हैं. हम कुछ ऐसी ही फिल्मों की गलतियों के बारे में आपको बता रहे हैं जिसे फिल्म देखते समय आपने नजरअंदाज कर दिया होगा.

लगान

यह फिल्म 1892 की कहानी थी. फिल्म में एक ओवर में छह बॉल दिखाया गया है. लेकिन 1892 में इंग्लैंड ने एक ओवर में सिर्फ पांच बॉल की ही अनुमति दी थी.

रा वन

फिल्म में शाहरुख को साउथ इंडियन दिखाया गया है लेकिन उनको क्रिश्चियन नियमों के अनुसार दफनाया जाता है. हद तो तब हो गई जब करीना कपूर उनकी अस्थियों को पानी में बहाती हैं.

दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे

फिल्म का दुसरा पार्ट पंजाब पर आधारित था लेकिन क्लाइमेक्स में जिस स्टेशन को दिखाया गया है, वो आपटा का है. आपटा पंजाब में नहीं बल्कि महाराष्ट्र में है.

पीके

फिल्म में सरफराज (सुशांत सिंह राजपूत), जग्गू (अनुष्का शर्मा) से कहता है कि वो ब्रूज के पाकिस्तानी एम्बेसी में काम करता है. लेकिन ब्रूज में पाकिस्तान की कोई एम्बेसी ही नहीं है.

ये जवानी है दीवानी

इस सीन में ट्रेन में चढ़ने से पहले बनी (रणबीर कपूर), नैना (दीपिका पादुकोण) की किताब उनके हाथ से ले लेते हैं लेकिन अगले सीन में नैना के हाथ में किताब फिर से आ जाता है.

हैदर

फिल्म 90 के दौर के कश्मीर के हालात पर आधारित है. लेकिन ‘बिस्मिल’ गाने में पीछे मोबाइल का टॉवर नजर आ रहा है. उस समय कश्मीर में मोबाइल का टॉवर नहीं था.

अमर अकबर एंथॉनी

फिल्म में अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर और विनोद खन्ना एक ही समय पर अपनी ऑनस्क्रीन मां निरुपा रॉय को खून दे रहे हैं.

प्यार का पंचनामा

फिल्म के ओपनिंग सीक्वेंस में तीनों दोस्त ढ़ाबा बाइक पर आते नजर आते हैं और जाते समय उनके पास जीप कैसे आ जाती है, वो तो वही जानते हैं.

सीट के लिए खुद को प्रेग्नेंट बताती थीं ये एक्ट्रेस

बॉलीवुड में अपनी एक्टिंग का लोहा मनवा चुकी एक्ट्रेस विद्या बालन ने हाल ही में अपने कुछ ऐसे किस्से सुनाए, जिन्हें सुन आप चौंक जाएंगे. दरअसल, हाल ही में विद्या अनुपम खेर के स्कूल में पहुंची, जहां उन्होंने अपने कई दिलचस्प खुलासे किए.

विद्या ने बताया कि जब वो जेवियर्स की स्टूडेंट थीं, तब वो चैंबूर से वीटी ट्रेन से जाया करते थे. उनकी जितनी दोस्त थीं, सब काफी शरारती थी, जिनमें से एक विद्या भी थीं.

विद्या ने कहा, हम जब भी ट्रेन से जाते थे, तो खूब मस्ती करते थे. जब मुझे सीट चाहिए होती थी तो मैं प्रेग्नेंट होने की एक्टिंग करती थी और मुझे सीट मिल जाया करती थी.

विद्या की प्रोफेशनल लाइफ के बारे में बात करें तो अभी कुछ समय पहले ही उनकी फिल्म ‘कहानी 2’ रिलीज हुई थी. फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर खास कमाई तो नहीं की, लेकिन विद्या को उनकी एक्टिंग के लिए काफी सराहा गया.

एक ही दिन रिलीज हुई इस एक्टर की दो फिल्में

पिछले सप्ताह रिलीज हुई दो बिग बजट की फिल्म रईस और काबिल ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की है. लेकिन क्या आपको मालूम है कि एक ही दिन रिलीज हुई इन दोनों फिल्मों में एक एक्टर ऐसा है जिसने दोनों फिल्मों में काम किया है.

इस एक्टर का नाम नरेंद्र झा है. बॉलीवुड एक्टर नरेंद्र झा छोटे पर्दे पर काफी फेमस रहे हैं. नरेंद झा इससे पहले 2014 की बेहतरीन फिल्म हैदर में काम कर चुके हैं. इस फिल्म में उन्होंने डॉक्टर हिलाल मीर का रोल निभाया था. साल 1993 में दूरदर्शन पर काफी फेमस सीरियल शांति से पहला ब्रेक मिला. लेकिन असली पहचान नरेंद्र को टीवी सीरियल ‘रावण’ से मिली.

पिछले सप्ताह रिलीज हुई दो बड़ी फिल्में रईस और काबिल में नरेंद्र झा ने अभिनय किया है. रईस में नरेंद्र झा ने मूसा भाई का किरदार निभाया है. वहीं काबिल में उन्होंने पुलिस अधिकारी चौबे का किरदार निभाया है.

नरेंद्र झा को इन दोनों फिल्मों में रईस फिल्म में अधिक स्क्रीन शेयर करने का मौका मिला है. नरेंद्र झा इससे पहले फिल्म हमारी अधूरी कहानी, फोर्स-2, घायल वन्स अगेन, मोहनजोदड़ो, बॉस, फनटूश में काम चुके हैं.

डिप्रेशन का इलाज, अब है आपके पास

डिप्रेशन एक आम लफ्ज और हमारी जिन्दगी का एक अहम हिस्सा बन गया है. अहम हिस्सा ही तो है. जो किसी के घर में ही घर बना ले, वो उस घर का अहम हिस्सा बन जाता है. और जो हर जिन्दगी में जगह बना ले वो? डिप्रेशन कॉमन कोल्ड जैसी ही कॉमन बिमारी हो गई है. कुछ लोग इसे अमीरों की बिमारी कहते हैं. पर यह उन लोगों की गलतफहमी है. डिप्रेशन कोई अमीरों वाली बिमारी नहीं है, कोई भी इंसान इससे पीड़ित हो सकता है.

‘मैं आपका दर्द समझ सकती हूं…’ कई बार हम एक दूसरे से ऐसी बातें कहते हैं. पर यह बस कहने की बात है. समझता वही है जिस पर बितती है. ठीक उसी तरह डिप्रेशन से पीड़ित व्यक्ति का दर्द सिर्फ वही समझ सकता है जिसे कभी डिप्रेशन ने जकड़ा हो. डिप्रेशन कोई नई पीढ़ी के द्वारा ट्रेंड की हुई बीमारी नहीं है, जैसा की कुछ लोगों का मानना है.

मान लीजिए आप एक अंधेरे कमरे में हैं. कमरे में इतना ज्यादा अंधेरा है कि आपको खुद अपना शरीर भी महसूस न हो रहा हो. घुप्प अंधेरे में डूबा हुआ कमरा और आप बिल्कुल अकेली हैं. आप कैसा महसूस करेंगी? डिप्रेशन में कुछ ऐसा ही होता है. भीड़ में तन्हाई का एहसास होता है और तेज रौशनी में भी घने काले अंधेरे का. और अगर यह किसी की जिन्दगी में रोज का किस्सा हो जाए तो? अवसाद ग्रस्त या डिप्रेस्ड इंसान की जिन्दगी भी कुछ ऐसी ही हो जाती है. इंसान खुद को पूरी तरह से अकेला महसूस करने लगता है.

पर टेंशन न लें. हर मर्ज की कोई न कोई दवा और हर परेशानी का हल जरूर होता है. डिप्रेशन से भी बाहर निकलने के कई तरीके हैं. आप बिना दवाईयों के भी डिप्रेशन से खुद को आजाद कर सकती हैं. बस जरूरत है थोड़े से वक्त की और जरा से आत्मविश्वास की.

1. पता करें अपनी परेशानी की वजह

किसी भी परेशानी का हल तभी संभव है जब आप उसकी जड़ों तक पहुंचेगी. सबसे पहले अपने डिप्रेस्ड होने की वजह का पता लगायें. ये उतना मुश्किल भी नहीं है. क्या आप अपने जॉब से असंतुष्ट हैं या क्या आपको नौकरी में प्रतिदिन अपने उसूलों से समझौता करना पड़ता है? या फिर क्या आप अपने निजी जीवन से परेशान हैं? सबसे पहले अपनी परेशानी की वजह का पता लगायें. अपने आप से झूठ बोलना बंद करें और अपनी प्रौबलैम की जड़ तक पहुंचे.

2. रूटीन बनायें

कुछ मनोचिकित्सकों का मानना है कि डिप्रेस्ड लोगों को एक रूटीन बनाना चाहिए. पर रूटीन बनाना एक बात है और उस पर चलना दूसरी बात. डिप्रेशन का आपकी रोजमर्रा की जिन्दगी पर बहुत बुरा असर पड़ता है. इसलिए रूटीन बनाना भी जरूरी है और उसे फौलो करना भी. खुद पर दवाब न बनायें, पर अनुशासन में रहकर अपने रूटीन को फौलो करें.

3. लक्ष्य तय करें

डिप्रेशन में किसी भी इंसान के मन में एक ही बात घर कर लेती है कि ‘मैं किसी काबिल नहीं’. इंसान खुद को हारा हुआ समझने लगता है. इसलिए लक्ष्य निर्धारित करना बहुत जरूरी है. ऐसे लक्ष्य निर्धारित करें जिन्हें आप जल्द से जल्द पूरा कर सकें. जैसे, हर दिन एक नई डिश बनाना. इससे आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा.

4. एक्सरसाइज या व्यायाम

एक्सरसाइज करने से आपके शरीर में ‘फील गूड’ होर्मोन्स बनते हैं और आप लाइट महसूस करेंगी. डिप्रेस्ड इंसानों के लिए व्यायाम करना बहुत लाभदायक साबित हो सकता है. एक्सरसारइज का मतलब यह नहीं की आप प्रतिदिन घंटों जिम में पसीना बहायें. रोज सुबह या शाम में पार्क में कुछ देर टहलना भी काफी है.

5. किसी भी किमत पर ‘उपवास न रखें’

डिप्रेशन में भूख नहीं लगती. कितनी भी कोशिश कर लें पर एक निवाला भी गले के नीचे नहीं उतरता, पर खाना बहुत जरूरी है. किसी भी किमत पर उपवास न रखें. थोड़ा ही खाएं पर हेल्डी फूड खाएं. जो पसंद हो वो खाएं, पर खाना न भूलें.

कुछ डिप्रेस्ड इंसान ज्यादा खाने लगते हैं. उन्हें अपने खाने पर कंट्रोल करना जरूरी है.

6. गहरी नींद लें

डिप्रेशन में पलकें मूंदना आसान नहीं लगता. चाहे आप कितने भी थके हों पर नींद ही नहीं आती. पर गहरी नींद लेना बहुत जरूरी है. तो क्या करें जिससे नींद आए? आप रोजाना एक ही समय पर सोने और उसी वक्त पर उठने की आदत डालें. अपने कमरे से फोन, कंप्यूटर जैसे सभी सामानों को हटा लें. ये चीजें नींद में खलल डालने का काम करतीं हैं.

7. प्रकृति का स्पर्श

प्रकृति का स्पर्श सिर्फ खूबसूरती ही नहीं निखारता पर आपको खुशी भी देता है. उगते सूरज को देखें और रात में आसमान में चांद और तारों को. प्रकृति के बीच आप अच्छा महसूस करेंगी. खुली हवा में सांस लें. अगर आप ऐसे शहर में रहती हैं जहां समुद्र है तो आप बीच पर टहलने भी जा सकती हैं.

8. कुछ अलग करें, कुछ नया करें

डिप्रेस्ड इंसान अपनी जिन्दगी से परेशान होता है. तो क्यों न कुछ नया किया जाए? अगर आपको लगता है कि आप डिप्रेश्ड हैं तो यह अच्छा मौका है कि आप कुछ नया करें. जैसे की अगर आप कूकिंग नहीं आती, तो आप कूकिंग सीखें. आप किसी नई भाषा का कोर्स भी कर सकती हैं. या फिर कोई डांसिंग क्लास भी जोएन कर सकती हैं.

सेहत का खजाना ब्रॉकली टोमैटो सलाद

ब्रॉकली टोमैटो सलाद एक कॉन्टिनेंटल रेसिपी है. इसमें मुख्य रूप से ब्रॉकली, टमाटर, सिरका और जैतून के तेल का इस्तेमाल किया जाता है. इसे आप वाइन के साथ सर्व कर सकती हैं. इसके अलावा डिनर पार्टी में भी इसे पेश कर सकती हैं. इसे बनाना काफी आसान है और यह बहुत कम वक्त में बन भी जाती है.

सामग्री

तीन कप ब्रॉकली

एक चम्मच सिरका

नमक स्वादानुसार

एक टमाटर

दो चम्मच ऑलिव ऑयल

ऑरेगेनो

विधि

सबसे पहले ब्रॉकली को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर स्टीम कर लें. टमाटर को भी छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर ऊपर से थोड़ा नमक छिड़क लें.

इसके बाद ऑलिव ऑयल, सिरका, नमक और ऑरेगेनो को एक बाउल में अच्छी तरह मिला लें. इसके बाद टमाटर और ब्रॉकली को मिला लें.

तैयार मसालों को ब्रॉकली और टमाटर पर डालें और अच्छी तरह मिला लें. अब यह सर्व करने के लिए तैयार है.

आपके अंडर आर्म्स भी हैं काले!

क्या स्लीवलेस कपड़े पहनना आपके लिए सपना हो चुका है? अंडर आर्म्स के कालेपन की वजह से कई महिलाओं को इस मुसीबत से दो-चार होना पड़ता है. कई बार ऐसा होता है जब आप स्लीवलेस सूट, ब्लाउज और वेस्टर्न ड्रेसेज सिर्फ इसलिए नहीं पहन पाती हैं क्योंकि उनके अंडर आर्म्स बेहद काले होते हैं.

अंडर आर्म्स का कालापन आत्मविश्वास को भी कम कर देता है. अंडर आर्म्स के कालेपन की कई वजह हो सकती हैं लेकिन रेजर का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं में ये समस्या आम होती है. इसके अलावा हेयर-रीमूवर क्रीम भी अंडर आर्म्स की त्वचा को गहरा करने का काम करती हैं. अगर आप इस समस्या से जूझ रहे हैं तो इन सब्ज‍ियों और फलों के इस्तेमाल से अंडर आर्म्स की रंगत को हल्का कर सकती हैं.

नींबू

नींबू एक नेचुरल ब्लीच है. इसके इस्तेमाल से त्व्चा की रंगत हल्की होती है और अंडर आर्म्स का कालापन धीरे-धीरे दूर हो जाता है. एक नींबू को बीच से काटकर सर्कुलर मोशन में अंडर आर्म्स में लगाने से फायदा होता है. नींबू के रस को सूखने दें और कुछ समय बाद फिर लगाएं. एक महीने तक हर रोज दो बार इस प्रक्रिया को करने से फायदा होगा.

टमाटर

टमाटर को पीसकर उसका पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को काले पड़ चुके अंडर आर्म्स पर लगाएं. ऐसा करने के कुछ दिनों बाद ही आपको असर दिखना शुरू हो जाएगा.

आलू

आप चाहें तो अंडर आर्म्स की त्वचा को आलू के इस्तेमाल से भी साफ कर सकते हैं. इसके लिए एक आलू का छिलका उतारकर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को अंडर आर्म्स पर लगाकर लेट जाएं. जब यह लेप सूख जाए तो उसे साफ कर लें. नियमित रूप से इस उपाय को करने पर फायदा होगा.

खीरा

अंडर आर्म्स के कालेपन को दूर करने के लिए खीरे का इस्तेमान भी बहुत फायदेमंद होता है. इसका इस्तेमाल भी उसी प्रकार करना है जिस प्रकार नींबू का. अच्छी बात यह है कि ये ठंडक देने का काम करता है और प्रभावित त्वचा को मॉइश्चराइज भी करता है.

संतरा

संतरे में भी नींबू जैसे गुण होते हैं. अगर आपके अंडर आर्म्स बहुत काले हैं तो आप संतरे के छिलके को सुखाकर पीस लें. इस पाउडर में कुछ मात्रा में नींबू का रस मिलाकर प्रभावित जगह पर लगाएं. कुछ ही दिनों में आपको असर दिखना शुरू हो जाएगा.

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