आपने देखा दीपिका का ये हॉट फोटोशूट

दीपिका पादुकोण स्टनिंग हैं यह बात सभी जानते हैं लेकिन दीपिका की एनर्जी उनकी सुंदरता को और भी बढ़ा देती है. दीपिका ने हाल ही में फिल्मफेयर मैग्जीन के कवर पेज के लिए फोटोशूट कराया था. दीपिका ने अपनी खूबसूरती और स्टाइल से मैग्जीन के कवर पेज की शोभा बढ़ाई.

दीपिका के इस फोटोशूट का ‘बिहाइंड द सीन्स’ वीडियो भी फिल्मफेयर ट्विटर अकाउंट से शेयर किया गया है.

इस वीडियो में दीपिका काफी एनर्जी से भरी हुई दिखाई दे रही हैं. वहीं फोटोशूट के दौरान वह कैमरे के सामने बेहद ही पर्फेक्शन के साथ पोज देती दिखाई दे रही हैं. दीपिका ने हर पोज में अपना बेस्ट देने की कोशिश की है. काम को पर्फेक्शन के साथ करने के अलावा दीपिका ने मजाक मस्ती भी करती दिखाई दी.

 

फिल्म रिव्यू: काबिल

पुराने कथानक पर नेत्रहीन किरदारों को फिट कर बनायी गयी फिल्म ‘‘काबिल’’. रितिक रोशन व यामी गौतम की बेहतरीन परफार्मेंस के चलते लोग इस रोमांचक फिल्म को पसंद कर सकते हैं. फिल्म‘‘काबिल’’ की कहानी दो नेत्रहीनों रोहन भटनागर (रितिक रोशन)और सुप्रिया शर्मा(यामी गौतम) से शुरु होती है. रोहन एक अच्छे वायस डबिंग आर्टिस्ट और सुप्रिया बेहतरीन पियानो वादक हैं. नेत्रहीन होने के बावजूद जिंदगी के प्रति दोनों का रवैया सकारात्मक है. दोनों पहली मुलाकात में एक दूसरे से कहते हैं कि उन्हें शादी नहीं करनी है. पर धीरे धीरे दोनों में प्यार हो जाता है और दोनों शादी कर एक दूसरे के सहारा बन जाते हैं.

लेकिन एक दिन शहर का एक गुंडा अमित शेलार (रोहित राय) और उसका साथी शकील (सहीदुर रहमान) ,सुप्रिया का बलात्कार कर देते हैं. वसीम एक कसाई (अखिलेंद्र मिश्रा) का बेटा है. जिसे वसीम व अमित की दोस्ती पसंद नहीं. पर बेटा अपने पिता की नहीं सुनता है. सुप्रिया के साथ हुई दुर्घटना के बाद रोहन की जिंदगी में अंधेरा छा जाता है. पर वह हार नहीं मानता. वह अपनी पत्नी सुप्रिया के साथ हुए अपराध के लिए बदला लेने की ठान लेता है.

उधर अमित शेलार को चिंता नहीं है. उसका भाई माधवराव शेलार (रोनित राय) नगर सेवक है. भ्रष्ट पुलिस अफसर बलात्कार के केस की सही जांच नही होने देते. इस बीच सुप्रिया फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेती है. जब रोहन को एहसास होता है कि पुलिस के भरोसे उसे न्याय नहीं मिल पाएगा, तो वह खुद बदला लेने की ठान लेता है.

रोहन पुलिस से कहता है कि वह बदला लेगा, पर पुलिस उसे देख नहीं पाएगी, सबूत नही मिलेंगे. उसके बाद फिल्म में कुछ रोमांचक घटनाएं घटित होती हैं. अपनी डबिंग की खूबी का उपयोग कर रोहन लोगों को फोन कर आपस में लड़वाता है. फिर एक एक को मारने की योजना बनाकर पहले शकील, फिर अमित शेलार की हत्या कर देता है. बाद में माधव शेलार भी मारा जाता है.

फिल्म देखकर निर्देशक संजय गुप्ता को बदला लेने की कहानियों से ज्यादा ही लगाव नजर आता है. वह अतीत में ‘जज्बा’ जैसी कई बदले की भावना पर आधारित फिल्में निर्देशित कर चुके हैं, जो कि बॉक्स ऑफिस पर असफल रही हैं. ‘‘काबिल’’ में कहानी के स्तर पर कुछ नयापन नहीं है. यह फिल्म संदेश देती है कि बदला अंधा होता है.

सवाल यह है कि आखिर फिल्म निर्माता राकेश रोशन ओर निर्देशक संजय गुप्ता दर्शकों को समझाना क्या चाहते हैं? क्या वे ये बताना चाहते हैं कि दर्शकों को अपने साथ हुए हर अन्याय के लिए बदला लेना चाहिए? यानी कि खून के बदले खून…? इस तरह के संदेश को परोसकर आखिर फिल्मकार किस तरह का समाज व देश रचना चाहते हैं? इस तरह के कथानक पर कई फिल्में हौलीवुड में और बौलीवुड में भी कई फिल्में बन चुकी हैं. फिल्म ‘‘काबिल’’ देखते समय कई पुरानी फिल्में याद आती रहती हैं.

डॉर्क और अति हिंसात्मक दृष्यों से भरपूर फिल्म‘‘काबिल’’ इंटरवल से पहले काफी धीमी गति से आगे बढ़ती है. फिल्म की कमजोर कड़ी इसका वीएफएक्स और रोहित राय व रोनित राय का अभिनय है. इंटरवल के बाद के तमाम संवाद प्रभावित करने की बजाय जबरन थोपे हुए लगते हैं. फिल्म में ह्यूमर की कमी है. एक्शन सामान्य दर्जे का है. रोमांस व इमोशन की भी कमी है. रितिक रोशन व यामी गौतम ने बेहतरीन अभिनय किया है. रितिक रोशन के प्रशंसकों को यह फिल्म जरुर पसंद आएगी.

2 घंटे 19 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘काबिल’’ के निर्माता राकेश रोशन, निर्देशक संजय गुप्ता, संगीतकार राजेश रोशन, लेखक संजय मासूम और विजय मिश्रा, कैमरामैन सुदीप चटर्जी व अयंका बोस तथा कलकार हैं रितिक रोशन, यामी गौतम, रोहित राय, रोनित राय, अखिलेंद्र मिश्रा व अन्य.

शिरीन पुलाव खाया है आपने!

शिरीन पुलाव एक बहुत ही टेस्‍टी नॉन वेज पुलाव है, जिसे आप घर पर आसानी से बना सकती हैं. यह इतना टेस्‍टी होता है कि आप इसे बार बार बनाएंगी. इसका स्‍वाद थोड़ा मीठा होता है.

अगर आपके परिवार वाले नॉन वेज खाने के शौकीन हैं, तो आप शिरीन पुलाव जरुर बनाइये. तो देर मत कीजिये और सीखिये कि इसे कैसे बनाते हैं.

सामग्री

चिकन- 1-1/2 किलो

बासमती चावल- 1/2 किलो

संतरे- 2 मीडियम साइज

गाजर- 3

प्‍याज- 2

बटर- 1 चम्‍मच

तेल- 3/4 कप

बादाम- 4 चम्‍मच

कुटी हुई पिस्‍ता- 2 चम्‍मच

केसर पावडर- 1/4 चम्‍मच

नमक- स्‍वाद अनुसार

लाल मिर्च पावडर- 1/4 चम्‍मच

पानी – 1 कप

करी पावडर- 1/2 चम्‍मच

शक्‍कर- 3 चम्‍मच

विधि

चिकन पीस को बटर, नमक और मिर्च पावडर में मैरीनेट करें. चावल उबाल लें और छान कर किनारे रख दें. प्‍याज काट लें, संतरे को छील कर छोटे पीस में काट कर उसे पानी में 1 मिनट के लिये पका लें और फिर छान कर रख दें. गाजर को पतली स्‍लाइस में काटें.

अब एक पैन में तेल गरम करें. उसमें मैरीनेट किया चिकन गोल्‍डन ब्राउन होने तक फ्राई करें. उसके बाद इसमें कटे प्‍याज डालें और ऊपर से पानी डाल कर चिकन को पका लें. अब दूसरे पैन में तेल डाल कर गरम करें, उसमें गाजर डालें, संतरे के पीस, बादाम, पिस्‍ते और केसर डाल कर मिलाएं.

अब चिकन और गाजर को एक एक लेयर में बिछाएं. चावल को टॉप पर रखें और 10 मिनट तक धीमी आंच पर पकाएं. जब यह पक जाए तब इसे गरमा गरम सर्व करें.

फैशन छोटे शहरों का

अकसर दो-ढाई साल में होने वाले तबादलों के कारण सीमा इतने सारे शहरों प्रदेशों से गुजरी है कि हर बार कपड़ों को ले कर नई उलझन में पड़ जाती है कि क्या पहने और क्या नहीं? क्या आप के साथ भी ऐसा ही होता है? अगर महानगर में हैं तब तो आप बेहिचक जो चाहे पहन सकती हैं, मगर छोटे शहरों में यह देखना पड़ता है कि वहां का माहौल कैसा है. क्या अब भी घूंघट प्रथा चल रही है या महिलाओं का पल्ला सिर तक सीमित रह गया है? उसी माहौल के अनुसार अपने वार्डरोब को तैयार करना होता है वरना आप अपनेआप को सब के बीच सहज नहीं महसूस कर पातीं.

2004 में सीमा जब तबादला होने पर हरदोई, उत्तर प्रदेश पहुंची थी तब वहां सभी महिलाएं साड़ी पहने सिर ढके होती थीं व लड़कियां सूट पहनती थीं. बहुत कम किशोरियां जींस पहनती थीं और वह भी कभीकभी. आज इतने सालों में अब बहुत अंतर आ गया है. अब वही महिलाएं लैगिंग्स और कुरतियां पहनने लगी हैं और लड़कियां जींस टौप. आज यही हाल अनूपपुर, मध्य प्रदेश का है. अब कोई हरदोई से फोन कर यहां के हालचाल पूछता है तो सीमा यही कहती है कि बिलकुल वैसा ही है जैसा 12 वर्ष पहले हरदोई था, तो पूछने वाला भी हंस पड़ता है.

क्या पहनें

यह तो सच है कि जैसा देश वैसा भेष. जब पूरे शहर में सभी महिलाएं साड़ी पहने रहती हैं, तो इस का मतलब यह नहीं कि आप भी साड़ी के अलावा कुछ नहीं पहन सकतीं, बल्कि ऐसे में साड़ी के अतिरिक्त सलवारकमीज, चूड़ीदार, लैगिंग, पैरलर आदि पहनने में झिझक न करें. एक दूसरे को देख कर इस तरह के कपड़े पहनने का जल्द ही आसपास की महिलाओं का मन भी मचलने लगता है.

यदि आप किसी शादी में जा रही हैं, तो साड़ी से बेहतर कुछ नहीं लगेगा. ऐसे में आप भी पारंपरिक रूप से तैयार हो कर सब को फैशन की टक्कर दे सकती हैं. रोज साड़ी, चूड़ीदार से सजी रहने वाली महिलाएं आप का पारंपरिक रूप देख कर दंग रह जाएंगी. लेकिन ऐसे ही मिलने मिलाने के अवसर पर पैरलर, लैगिंक या सलवारसूट के साथ दुपट्टा लहरा सकती हैं. यदि आप को जेठ या ससुर से परदा करना है, तो अपने दुपट्टे को सिर पर अच्छी तरह ओढ़ कर पिन से फिक्स कर लें. ऐसा करने पर आप का सिर से पल्ला भी नहीं सरकेगा और आप के फैशन पर भी ऊंगली नहीं उठेगी.

यदि साड़ी से मन भर गया है, तो उत्सवों में लहंगाचोली (गुजराती वर्क मिरर और गोटे से सजी, राजस्थानी बंधेज कपड़े से बनी या कशीदाकारी से सजी राजसी वैभव वाली) जैसी भी आप को पसंद हो उसे पहन कर लुभाएं. चाहें तो रैडीमेड लहंगासाड़ी भी अपनी सुविधा के हिसाब से पहन सकती हैं.

युवतियां जींस या पैंट के साथ घुटनों तक साइज की कुरती व स्टोल पहन कर अपना शौक पूरा कर सकती हैं. यह पहनावा दूर से कुरती व लैगिंग का लुक देता है. इस से आप भीड़ से अलग भी नहीं दिखेंगी. यदि कम उम्र की युवती हैं तो लौंग स्कर्ट और शौर्ट कुरती के साथ स्टोल पहन कर तीज त्योहार में अपना अलग लुक रख सकती हैं.

यदि आप का मिनी मिडी या हौट पैंट पहनने का मन हो और आप का है संयुक्त परिवार, तो आप पति के साथ एकांत में, अपने बैडरूम में यह ड्रैस पहन इतरा सकती हैं और अगर कहीं दूसरे शहर घूमने जा रही हैं, तो वहां भी अपनी मनपसंद ड्रैस पहन सकती हैं. बस अपना फोटो सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, व्हाट्सऐप आदि पर पोस्ट न करें, क्योंकि लौट कर तो उन्हीं लोगों के बीच आ कर रहना है. अत: बेकार में बात का बतंगड़ क्यों बनाएं.

क्या न पहनें

अब कुछ अति उत्साही महिलाएं या बहुएं ऐसे ऊटपटांग कपड़े पहन लेती हैं कि हंसी का पात्र बनती हैं. जैसे नैट की साड़ी पहन कर घूंघट निकाल के घूमती हैं. अब कोई इन से पूछे कि क्या ढका है और क्या खुला है? कुछ महिलाएं स्किन टाइट लैगिंग के साथ कुरता पहन लेती हैं, तो ऐसा दिखता है जैसे सिर्फ कुरता ही पहना है, ऐसे में बहुत ही भद्दा दृश्य उत्पन्न होता है. अत: चुस्त लैगिंग पहनते समय उस के रंग पर अवश्य ध्यान दें.

कुछ महिलाएं गाउन पहने ही घर से सब्जीभाजी लेने या फिर पड़ोसिन से गपियाती घंटों रोड पर खड़ी रहती हैं. ऐसे में वे बहुत अभद्र दिखाई देती हैं. अत: घर से बाहर निकलते समय अपनी वेशभूषा का विशेष खयाल रखें.

साड़ी अपनेआप में संपूर्ण पोशाक है, मगर इसे भी पहनने के कई तरीके हैं. साड़ी सीधे पल्ले, उलटे पल्ले या फिर किसी भी पारंपरिक तरीके से पहनी गई हो मगर उस के संग मैचिंग ब्लाउज, पेटीकोट न हो तो उस का सौंदर्य जाता रहता है. यदि सलीके से बांधी न गई हो जैसे ऊंची उठी हुई, फौल उधड़ा हुआ, पल्लू लटका हुआ हो तो वह भी बहुत बेहूदा दिखाई देता है.

यदि जींस या पैंट पहनें तो शौर्ट टौप या स्किन टाइट जींस पहनने से बचें. लौंग स्कर्ट के साथ टाइट कमीज या टीशर्ट न पहनें. छोटे शहरों में ऐसे कपड़े पहनने वाली को लोग ऐसे घूरते हैं जैसे कोई जानवर चिडि़याघर से निकल रोड पर आ गया हो. चूंकि आप किसी की मानसिकता नहीं बदल सकते, इसलिए अपना पहनावा बदल लें.

परिधान चाहे कोई भी पहनें अगर वह करीने से न पहना गया हो तो वह आप के रूप को बढ़ाने की जगह घटा देता है. कुछ महिलाओं का मानना है कि महंगे वस्त्र ही सुंदर लगते हैं, मगर ऐसा नहीं है. रोजमर्रा की पोशाक में रंग संयोजन, डिजाइन आदि का ज्यादा महत्त्व होता है बजाय मूल्य का. अत: जो भी पहनें सलीके से पहनें. उस के रंग से मिलते रंग की चूडि़यां, कड़े, ब्रेसलेट, आर्टिफिशियल ज्वैलरी पहन कर आप अपने सौंदर्य में चार चांद लगा सकती हैं.      

बर्थडे स्पेशलः कविता कृष्णमूर्ति से जुड़े रोचक तथ्य

नौ साल की उम्र में लता मंगेशकर के साथ एक बंगाली गीत के साथ अपने संगीत करियर की शुरुआत करने वाली कविता कृष्णमूर्ति का आज जन्मदिन है. 

कविता कृष्णमूर्ति को बचपन से ही संगीत का शौक था. बचपन से लता जी एवं मन्ना डे के गानों को सुनकर उन्हें गुनगुनाना उनकी आदत थी. कॉलेज के दिनों में कविता जी ने जब विभिन्न संगीत प्रतियोगिताओं में अपना नाम रौशन किया तो उन्हें अपनी आदर्श लता जी से मिलने का मौका मिला. 1971 में कविता कृष्णमूर्ति ने लता जी के साथ अपना पहला गाना गाया था.

कविता कृष्णमूर्ति लंदन स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स जाने वाली थीं, चाहती तो वे एक इकोनॉमिस्ट बन सकती थी लेकिन उनके संगीत प्रेम ने ऐसा होने न दिया.

कविता कृष्णमूर्ति का जन्म अय्यर परिवार में 25 जनवरी 1958 को दिल्ली में हुआ था. उनके पिता शिक्षा विभाग में अधिकारी थे. कविता जी को संगीत की प्रारंभिक शिक्षा घर से ही प्राप्त हुई थी. इसके बाद उन्होनें बलराम पुरी से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेना शुरु की.

उन्हेंने 8 साल की उम्र में एक संगीत प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता था. 9 साल की उम्र में लता जी के साथ बंगाली में गीत गाया. यहीं से कविता जी ने अपने संगीत करियर के सपने देखना शुरु कर दिया. संगीत की सभी प्रतियोगिताओं में वह बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती थीं. इसी दौरान उनकी मुलाकात मन्ना डे से हुई और उन्होनें कविता को विज्ञापनों में गाने का ऑफर दिया.

कविता ने 1980 में अपना पहला गाना ‘काहे को ब्याही’ फिल्म ‘मांग भरो सजना’ के लिए गाया. इसके बाद 1985 में उन्हें फिल्म प्यार झुकता नहीं के गानों ने अपार सफलता दिलाई.

इसके बाद मिस्टर इंडिया के गानों ने उन्हें सुपरहिट गायिका का दर्जा दिया. 90 के दशक में कविता एक सफल गायिका के रूप में उभरी. उन्होनें ए आर रहमान, उदित नारायण, अन्नु मलिक जैसे गायकों और संगीत निर्देशकों के साथ काम किया है.

कविता को 4 बार फिल्मफेयर अवार्ड मिल चुका है. उन्हें पदमश्री से भी नवाजा गया है.

कविता के लोकप्रिय गानें

आज में ऊपर आसमान नीचे

मेरा पिया घर आया

प्यार हुआ चुपके से

डोला रे डोला

इन एक्टर्स की पहली फिल्म ही हो गई थी फ्लॉप

हर एक्टर को अपनी डेब्यू फिल्म से बहुत उम्मीदें होती हैं, क्योंकि वही बॉलीवुड में उसके लिए रास्ता खोलती है. लेकिन जब यह फिल्म फ्लॉप हो जाए तो सारी उम्मीदों पर पानी फिरता दिखता है. एक तरह से यह कड़ी परीक्षा और धैर्य की घड़ी होती है. कोई निराश हो जाता है तो कोई मेहनत के साथ नए सिरे से अपना करियर बनाने में जुट जाता है.

ये हैं बॉलीवुड के वो स्टार्स जिनके करियर के पहली फिल्म ही हुई फ्लॉप.

हर्षवर्धन कपूर

बॉलीवुड अभिनेता अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन कपूर की फिल्म ‘मिर्ज्या’ बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं कर पाई. इस फिल्म से हर्षवर्धन को काफी उम्मीद थी, लेकिन यह बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिट गई.

अमिताभ बच्चन

आज के सुपरस्टार अमिताभ की पहली ही फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई थी. इस फिल्म के लिए बिग बी ने बहुत मेहनत की थी. लेकिन इस बॉलीवुड स्टार ने हार नहीं मानी और मेहनत से कभी जी नहीं चुराया.

सलमान खान

बॉलीवुड के सुल्तान सलमान खान की फिल्में आज भले ही हिट की गारंटी होती है, लेकिन पहली फिल्म के फ्लॉप होने के बाद सलमान काम की तलाश में इधर-उधर भटकते थे. 1988 में आई फिल्म ‘बीवी हो तो ऐसी’ में उन्होंने एक छोटा सा रोल किया था, जिसे लोगों ने नोटिस भी नहीं किया था.

अभिषेक बच्चन

बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन के बेटे अभिषेक बच्चन की पहली फिल्म थी ‘रिफ्यूजी’, इस फिल्म से अभिषेक और करीना कपूर दोनों ने ही अपने करियर की शुरुआत की थी, लेकिन ये फिल्म फ्लॉप साबित हुई.

रणबीर कपूर

वैसे रणबीर कपूर भले ही बॉलीवुड के रॉकस्टार बन गए हों, लेकिन उनकी पहली फिल्म ‘सांवरिया’ बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल नहीं कर पाई थी.

तब्बू

वैसे तो तब्बू ने एक्टिंग की शुरुआत छोटी उम्र में कर दी थी लेकिन हिंदी फिल्मों में बतौर हीरोइन उनकी पहली फिल्म बोनी कपूर की ‘प्रेम’ थी. इसकी शुरुआत बड़े स्केल पर हुई थी लेकिन बाद में किन्ही कारणों से फिल्म बीच में ही अटक गई. करीबन आठ साल के बाद जाकर यह रिलीज हुई.

फिर तब्बू ने फिल्म ‘पहला पहला प्यार’ में बतौर हीरोइन काम किया. प्रेम भले ही तब्बू की पहली साइन की हुई फिल्म थी लेकिन रिलीज ‘पहला पहला प्यार’ थी. ये दोनों ही फ्लॉप हो गईं.

डेजी शाह

सलमान खान के साथ एक्टिंग करियर की शुरुआत करना अपने आप में बड़ी बात होती है. डेजी की पहली फिल्म ‘जय हो’ थी. इस फिल्म में सलमान के होने के बावजूद भी यह फ्लॉप हो गई. ‘जय हो’ के बॉक्स आफिस पर ना चलने से डेजी का करियर वहीं रुक गया जहां से शुरू हुआ था.

सोनम कपूर

हर्षवर्धन की तरह ही उनकी बहन सोनम कपूर की पहली फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं कर पाई थी. सोनम ने संजय लीला बंसाली जैसे बड़े डायरेक्टर की फिल्म ‘सांवरिया’ से करियर शुरू किया, लेकिन ये फिल्म फ्लॉप साबित हुई. इस फिल्म के लिए सोनम ने खास तौर पर अपना वजन 30 किलो कम किया था.

करीना कपूर

करीना कपूर बेबो भले ही आज बॉलीवुड की बड़ी हिरोइन मानी जाती हैं, लेकिन उनकी फिल्म रिफ्यूजी बुरी तरह फ्लॉप रही थी. फर्स्ट फिल्म की असफलता के बावजूद करीना को इस बात का यकीन हो गया था कि दर्शकों ने भले ही उनकी पहली फिल्म को नकार दिया है लेकिन उनके काम को पसंद किया है.

कटरीना कैफ

कटरीना का हिन्दी फिल्मों में काम करने का कोई इरादा नहीं था. वह मुंबई मॉडलिंग के लिए आईं थी. लेकिन जब उन्हें ‘बूम’ मे काम करने का मौका मिला तो उन्होंने इसे आजमाया. लेकिन यह फिल्म फ्लॉप रही और कटरीना को निराशा हाथ लगी. इसके बाद कटरीना की फिल्में ‘मैंने प्यार क्यूं किया’ और ‘नमस्ते लंदन’ हिट हो गई और उनकी एक्टिंग की गाड़ी चल निकली.

माधुरी दीक्षित

माधुरी ने तो अपने करियर की शुरुआत में कई फ्लॉप फिल्में दीं. माधुरी की पहली ‘अबोध’ 1984 में रिलीज हुई थी जो अच्छी नहीं चली थी. 1988 में तेजाब के बाद माधुरी के करियर में उठाव आया और इस फिल्म से उन्हें गहरी सफलता मिली.

श्रद्धा कपूर

श्रद्धा की पहली फिल्म ‘तीन पत्ती’ थी. ये फिल्म कब आई कब गई पता ही नहीं चला. श्रद्धा की दूसरी फिल्म भी फ्लॉप रही. लेकिन ‘आशिकी 2’ के बाद से उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में नाम कमाया.

सैफ अली खान

सैफ की पहली फिल्म ‘परंपरा’ थी जो मल्टी स्टारकास्ट थी और इसमें एक से एक दिग्गज हस्तियां थी जैसे विनोद खन्ना, सुनील दत्त, आमिर खान, रवीना टंडन. बावजूद इसके ये फिल्म फ्लॉप हो गई.

रानी मुखर्जी

शादाब खान के साथ रानी की पहली फिल्म ‘राजा की आएगी बरात’ सुपर फ्लॉप थी. फिल्म की कहानी अच्छी थी फिर भी फिल्म फ्लॉप हो गई. शायद इसलिए आज के समय में लोग सच्चाई पर आधारित फिल्में कम ही देखना चाहते हैं. लेकिन पहली ही फिल्म में रानी के काम की सराहना हुई थी.

“पाबन्दी बगावत की शुरुआत होती है”

पिता की एडवरटाइजिंग कंपनी से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक राहुल ढोलकिया ने कई डॉक्यूमेंट्री और कमर्शियल फिल्में बनायीं. फिल्मों की बारीकियां सीखने के लिए वे साल 1990 में न्यूयार्क इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गए. वे हमेशा सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्में बनाने के शौकीन हैं. इस कड़ी में गुजरात दंगे पर आधारित फिल्म ‘परजानिया’ काफी पोपुलर रही. कई पुरस्कारों के अलावा उन्हें दर्शकों ने भी उसे खूब पसंद किया.

राहुल हर फिल्म को बनाने में काफी समय लेते हैं जिसकी वजह उनका फिल्म के विषय पर अधिक रिसर्च का करना है. ‘रईस’ का प्रमोशन करते हुए उन्होंने कहा कि भले ही इसे बनाने में 5 साल लगे ,पर दर्शक इसे खूब पसंद करेंगे. उनसे मिलकर बात करना रोचक था पेश है बातचीत के अंश.

प्र. ‘रईस’ फिल्म की कांसेप्ट कहां से मिली?

जब मैं अमेरिका में था, तो मेरे दोस्तों ने ‘लिकर बैन’ पर कुछ बनाने का सुझाव दिया था. मुझे स्टोरीलाइन अच्छी लगी थी. उस समय बैन सिर्फ गुजरात में था. अब तो बिहार में भी बैन है. फिर मैंने इस पर काम करना शुरू किया. तो मैंने रिसर्च कर पाया कि अपराध करना कभी भी सही नहीं होता, चाहे अपराध कैसा भी हो. रईस का अर्थ केवल अधिक पैसे का होना नहीं है, आप दिल से भी रईस हो सकते हैं.

प्र. ‘लिकर बैन’ को आप किस तरह से देखते हैं?

मेरे हिसाब से बैन कभी भी सही नहीं होता. किसी भी बात की पाबन्दी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि पाबन्दी बगावत की शुरुआत होती है.

प्र. फिल्म को अच्छा बनाने में टीम का कितना सहयोग होता है?

हर व्यक्ति के लिए काम विभाजित होता है, जिसमें सबको जिम्मेदारी दी जाती है अगर किसी ने भी अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई, तो इसका खामियाजा पूरी टीम को भुगतना पड़ता है. ठीक से काम तभी हो सकता है जब आपको अपना काम पसंद आये. भले ही कितनी मेहनत हो, चाहे कितनी भी देर तक आपको काम करना पड़े, पर हर दिन आप अपने काम को करने के बाद ही आपको सुकून मिलता है. किसी भी निर्माता, निर्देशक को हमेशा इस बात का ध्यान रखना है कि आपके टीम के सदस्य किसी भी चीज को आपसे भी बेहतर समझ सकते हैं.

प्र. शाहरुख खान को ‘रईस’ को लेने की खास वजह क्या है? माहिरा को लेकर फिल्म विवादों में भी घिरी है, इसके बारे में आपका क्या कहना है?

शाहरुख खान इस चरित्र के लिए परफेक्ट थे इसलिए उन्हें फिल्म में लिया गया. अपने अभिनय को सजीव बनाने के लिए वे बहुत मेहनत करते हैं और अलग अलग विषयों पर अपनी राय भी देते हैं. उनके साथ काम करने में आसानी होती है. उनकी फैन फोलोविंग बहुत है और वे हमेशा शाहरुख में कुछ नया देखना चाहते हैं. इसलिए शाहरुख हमेशा कुछ नया लेकर आते हैं. विवादें फिल्मों के लिए आती और जाती हैं इसे अधिक महत्व नहीं देनी चाहिए. सबको पिक्चर बनानी है, यही सबका विजन होता है. उस पर फोकस्ड रहना ही ठीक होता है.

प्र. फिल्मों पर ‘स्टार फैक्टर’ कितना हावी होता है?

एक ‘स्टार’ फिल्म को आगे बढ़ाने में काफी सहायक होता है. शाहरुख खान के साथ तो कमर्शियल लेवल पर ये कुछ अधिक ही होता है. शाहरुख अपने किरदार में इस तरह घुसते हैं कि फिल्म का अंदाज ही बदल जाता है. इसके अलावा नवाजुद्दीन सिद्दीकी, अतुल कुलकर्णी आदि जब एक साथ मिलकर आते हैं तो एक स्कूल बन जाता है. ऐसे कलाकार फिल्म वर्ल्ड के अंदर पूरी तरह फिट बैठ जाते हैं.

यह हमेशा ही लाभदायक होता है. अगर मुझे स्टार के साथ-साथ उसके आस-पास के चरित्र भी सही मिलते हैं, तो यही सिनेमा है. आज दर्शक भी अलग-अलग हैं. उन्हें हर तरह की फिल्में देखना पसंद है. बड़ी बजट की फिल्मों के लिए स्टार्स बहुत जरुरी है.

प्र. पुराने जमाने के संवाद और एक्शन को फिर से एक बार बड़े पर्दे पर लाने की वजह क्या है?

बचपन से ही हमने संवाद सुने है और ये फिल्म के रिलीज के बाद भी लोगों की जुबान पर होते हैं. दीवार, शोले, काला पत्थर आदि सब ऐसी ही फिल्में थी. जब इस कहानी को लिखा गया, तो अनायास ही संवाद आते गए, जैसे ‘बैटरी नहीं बोलने का’, ’बनिए का दिमाग मियां भाई की डेअरिंग’ आदि कुछ पंचेज आते गए. इसके अलावा गुजरात में लोग किसी को संबोधन के लिए अधिकतर ‘पार्टी’ शब्द का प्रयोग करते हैं और ये सब लिखने में मजा आया. फिर सबने बैठकर बातचीत की और जो जहां फिट होता गया, उसे वहां कलाकारों ने सहजता से प्रयोग किया. एक्शन तो है ही जिसे बहुत ही सुंदर तरीके से फिल्माया गया है.

प्र. फिल्म की सफलता का ताज कलाकारों को पहना दिया जाता है, जबकि असफलता का ठीकरा निर्देशक के माथे पर फोड़ दिया जाता है, आप इसके लिए कितना तैयार रहते हैं?

मेरे लिए मेरी जर्नी ‘फिल्म मेकिंग’ है, एक ‘फ्राइडे’ के लिए मैं इसे छोड़ नहीं सकता. इस फिल्म को बनाने में मैंने 5 साल का समय लिया. मैंने अगर मेहनत की है, तो जो भी ‘आउटकम’ हो, सोचना नहीं चाहिए. मैंने इस प्रोसेस को एन्जॉय किया है. पर इतना सही है कि फिल्म असफल होने पर कलाकारों को भी बहुत दुःख होता है, क्योंकि उन्होंने भी अपना समय दिया है और मेहनत की है.

प्र. क्या आगे कुछ खास फिल्म बनाने की इच्छा है?

मैं 5 साल में इस फिल्म को बनाया. अब इससे निकलकर अवश्य कुछ बनाऊंगा. मैं ने सबसे पहले एक स्टोरी लिखी थी. जो मेरी पहली स्क्रिप्ट थी, जिसे मैंने ‘इल्लीगल इम्मीग्रेशन’ के ऊपर लिखी थी. वह भी एक सच्ची कहानी है, उसे भी बनाना चाहता हूं.

प्र. आप इतना कम फिल्म क्यों बनाते हैं?

फिल्म बनाने में समय लगता है, ओरिजिनल स्क्रिप्ट है, इसलिए रिसर्च बहुत करना पड़ता है, इसलिए समय लगता है. कुछ कारण कई बार अलग से हो जाते हैं, इस फिल्म के दौरान शाहरुख खान को काफी चोंटे आई थी, जिससे काम को रोकना पड़ा.

प्र. इतने सालों में आप इंडस्ट्री में कितना बदलाव महसूस करते हैं और इसकी दिशा कितनी सकारात्मक है या कितनी नकारात्मक?

नई तकनीक के आने की वजह से आज कई तरह की फिल्में बन रही है. जो पहले हम नहीं बना सकते थे. न तो पैसा था और ना ही साधन. अब तो लोग फोन पर भी फिल्म बना सकते हैं. अन्तर्राष्ट्रीय एक्सपोजर होने की वजह से लोग अलग-अलग फिल्म बना सकते हैं और उसे कही भी, चाहे यू-ट्यूब हो या वेब साईट पर रिलीज कर सकते है. ये अच्छी बात है. खराबी ये हुई है कि लोगो में ‘सेल्फ सेंसरशिप’ अधिक बढ़ी है.

ना उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन

कहने वाले सही कहते हैं कि जब सच्चा प्यार होता है तो उम्र केवल एक नंबर के अलावा और कुछ नहीं होता. ऐसी ही कहानियां हमारे कुछ स्टार कपल्स की भी है. यहां हम कुछ उन कपल्स की बात कर रहे हैं जिन्हें एक दूसरे से प्यार हुआ और उन्होंने शादी रचा ली, बावजूद इसके कि उनके बीच उम्र का फासला बहुत ज्यादा है. चाहे अभिनेत्री की बात करें या अभिनेता की, शादी करने के लिये उम्र को प्यार के बीच किसी ने भी नहीं आने दिया. फिर चाहे ये उम्र का फासला 10 साल का हो या और ज्यादा का.

आईए जामते हैं उन कपल्स के बारे में जिन्होंने अपने रिश्ते के बीच में उम्र को नहीं आने दिया.

उर्मिला-मोहसिन

यूं तो इस लिस्ट में और भी लोग शामिल हैं पर बीते साल मतलब 2016 में 3 मार्च को अपनी उम्र से 10 साल छोटे मॉडल मोहसिन अख्तर से शादी के बंधन में बंधकर उर्मिला मातोंडकर ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं.

कबीर बेदी-परवीन दुसंज

उर्मिला के अलावा कबीर बेदी एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने पिछले साल जनवरी में अपनी बेटी से भी कम उम्र की, परवीन दुसंज से शादी की है. आपको बता दें कि परवीन दुसंज, कबीर बेदी और उनकी पहली पत्नी और डांसर प्रोतिमा की बेटी पूजा बेदी से भी छोटी हैं.

असिन-राहुल

हमारी गजनी गर्ल असिन ने भी 19 जनवरी 2016 को अपनी उम्र से 10 साल बड़े राहुल शर्मा से शादी की है.

शाहिद-मीरा

हाल ही में एक बेटे को जन्म देने वाली मीरा अपने पति शाहिद कपूर से 13 साल छोटी हैं. जहां शाहिद 34 के हैं वहीं मीरा केवल 21 साल की हैं.

करीना-सैफ

साथ ही बात करते हैं शाही जोड़े सैफ और करीना की जिनकी लव स्टोरी हमेशा ही किसी न किसी वजह सुर्खियों में रहती है. करीना भी अपने पति यानि कि सैफ से 10 साल छोटी हैं.

धर्मेंद्र-हेमा मालिनी

बॉलीवुड की खूबसूरत जोड़ियों में शुमार हेमा मालिनी और धर्मेंद्र की उम्र में भी 13 साल का अंतर है. जब हेमा की धर्मेंद्र से मुलाकात हुई तब वे पहले से ही शादीशुदा थें.

दिलीप कुमार-सायरा बानो

बॉलीवुड के ‘ट्रेजेडी किंग’ दिलीप कुमार, गोल्डन गर्ल कही जाने वाली उनकी पत्नी सायरा बानो से उम्र में 22 साल बड़े हैं. साल 1966 में जब दोनों शादी के बंधन में बंधे तब सायरा 22 साल की थीं. पर ये उम्र का फासला कभी दोनों के प्यार के बीच नहीं आया.

फरहा-शिरिश

डायरेक्टर, कोरयोग्राफर और टीवी होस्ट फराह खान ने साल 2004 में शिरिश के साथ सात फेरे लिये. शिरिश फराह से 8 साल छोटे हैं. दोनों की पहली मुलाकात फिल्म मैं हूं न के सेट पर हुई थी.

फिल्म रिव्यू: रईस

‘धर्म पर मैं धंधा नहीं करता’, ‘बनिए का दिमाग और मियां भाई की डेयरिंग’, ‘कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता, जिससे किसी का बुरा न हो’ आदि कई अलग-अलग संवादों से सजी हुई एक्शन, क्राइम, थ्रिलर फिल्म है ‘रईस’. इस फिल्म को निर्देशक राहुल ढोलकिया ने 5 साल की रिसर्च के बाद बनाया है, जिसमें शाहरुख खान ने फिर से एक नए अवतार के रूप में आने की कोशिश की है.

पूरी फिल्म में शाहरुख शुरू से लेकर अंत तक हावी रहे, उनका बार-बार पर्दे पर आना अच्छा लगा, उनका गेटअप और संवादों का आदान-प्रदान काफी सहज था, जिससे फिल्म रोचक लगी. हालांकि ये कहानी गुजरात के क्रिमिनल अब्दुल लतीफ के जीवन से प्रभावित दिखी, पर निर्देशक ने अपने इंटरव्यू में इसे एक फिक्शन स्टोरी बताया.

बात जो भी हो इसमें साल 1970 और 80 के दशक को दिखाया गया है. जब गुजरात में ‘लिकर बैन’ कर दिया जाता है. इसके लिए निर्देशक ने गुजरात के दृश्य को उस समय के हिसाब से फिल्माया है. जो अच्छा रहा. फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी कुछ खास प्रभाव नहीं जमा पाए. ऐसा लगा कि उन्हें उभर कर आने का मौका नहीं मिला. चोर-पुलिस का खेल अंत तक चलता रहा. शाहरुख खान के दोस्त के रूप में मोहम्मद जीशान अय्यूब ने काफी अच्छा काम किया. महिरा खान फिल्म में न के बराबर थी. शाहरुख खान के साथ उनकी केमिस्ट्री एकदम सही नहीं बैठ पायी.

फिल्म की कहानी

रईस (शाहरुख खान) गुजरात के फतेहपुरा में अपनी मां (शीबा चड्ढा) के साथ बहुत मुश्किल में गुजर- बसर करता है. दिमाग से तेज रईस बचपन से ही जयराज (अतुल कुलकर्णी) के लिए ‘लिकर’ का आदान-प्रदान कर पैसा कमाता है, इसमें साथ देता है उसका दोस्त सादिक (मोहम्मद जिशान) जो हर वक्त किसी भी परिस्थिति में उसका साथ देता है.

धीरे-धीरे रईस को लगने लगता है कि उसे अब अपना व्यवसाय कर, अपनी प्रेमिका आशिया (महिरा खान) के साथ घर बसाना है. इसके बाद वह बड़ा ‘लिकर’ तस्कर व्यवसायी मूसा भाई (नरेन्द्र झा) से मिलकर जयराज को खत्म करने की साजिश रचता है. आई पी एस ऑफिसर मजमुदार (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) इस काम में उसे रंगे हाथ पकड़ने की जी-जान से कोशिश करता है, लेकिन उसकी कोशिश हमेशा नाकामयाब होती है. रईस कभी उसके हाथ नहीं आता, बल्कि वह राजनेता का सहारा लेकर मजमुदार का ट्रान्सफर करवा देता है. फिर भी मजमुदार अपनी जिद नहीं छोड़ता और हर मोड़ पर रईस की ‘लिकर’ की तस्करी के आड़े आता है. इस प्रकार कई एक्शन, फाइट और मर्डर के बाद कहानी अंजाम तक पहुंच कर यह बताने की कोशिश करती है कि गलत काम का फल कभी सही नहीं होता.

फिल्म को राहुल ढोलकिया ने मसाला फिल्म बनाने की कोशिश की है, पर वे थोड़े उसमें कम नजर आये. फिल्म की शुरूआती भाग से दूसरे भाग में फिल्म की पकड़ अच्छी रही. फिल्म का गाना ‘उरी-उरी जाये….’ सिचुएशन के हिसाब से था. बहरहाल फिल्म एक बार देखने लायक है. इस फिल्म को शाहरुख खान की एक अच्छी और अलग फिल्म की लिस्ट में शामिल की जा सकती है. इसे थ्री स्टार दिया जा सकता है.

आजादी के रंगों से रंगीन हो घर

घर की सजावट में घोलें आजादी के रंग. गणतंत्रता दिवस के मौके पर अगर आप घर के रंग-रोगन की प्लैनिंग कर रही हैं, तो क्यों न तिरंगे के रंगो से घर को सजाया जाए. देशभक्ति किसी पर थोपी नहीं जा सकती, सच है. क्यों न इस गणतंत्र दिवस को हम लोग अपने घर को आजादी के रंगों से रंग कर मनायें? देश के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले शहीदों को श्रद्धांजलि देने का ये एक अनूठा तरीका है. इसे जरूर आजमाइए.

केसरिया

केसरिया या सैफरॉन रंग साहस और वीरता का प्रतीक है. किसी भी कमरे को अगर सैफरॉन पेंट से कलर किया जाए तो वह कमरा ऊर्जा से भर जाता है. वैसे भी हमारी लाइफ में इतनी टेंशन रहती है कि हमें पॉजिटिव ऐनर्जी की जरूरत पड़ती ही है. सैफरॉन या औरेंज के किसी भी टोन से घर को पेंट करने से घर के वातावरण में भी अलग चेंज आता है. आप इस रंग से घर के हॉल को पेंट कर सकती हैं.

सफेद

सफेद यानी एकता और शांति का प्रतीक. यह रंग तो सभी के घरों में होना ही चाहिए. वैसे भी आपके आस पास बहुत ज्यादा अशांति फैली हुई है. घर के इंटीरियर में इस रंग का इस्तेमाल एक अलग ही एहसास जगाता है.

पर पूरे घर को सफेद रंग से रंग देना भी अच्छा नहीं है. क्योंकि पूरी सफेदी के कारण आपके मेहमान भी असहज महसूस करेंगे. और आप भी हमेशा इस फिक्र में रहेंगी कि कहीं दीवार गंदी तो नहीं हो रही. पर सफेद रंग आपके घर को एक एलिगेंट लुक देगा.

नीला

तिरंगे की सफेद पट्टी पर लगा नीला अशोक चक्र सत्यता का प्रतीक है. इंटीरियर डिजाइनरों के अनुसार नीले रंग के साथ आप बहुत सारे एक्सपेरिमेंट कर सकती हैं. ब्लू एक ऐसा रंग है जो बोल्ड लुक के साथ ही आपके घर को सोफ्ट लुक भी दे सकता है. नीले रंग से गर्मियों में ठंडक भी रहती है.

हरा

उर्वरता, भूमि की पवित्रता को दर्शाता है हरा रंग. हरियाली किसे नहीं भाती? लिविंग रूम को हरे रंग से पेंट करें. इससे लिविंग रूम एक खुशनुमा एहसास से भर जाएगा. दिवारों के रंग के हिसाब से ही घर के परदे और फर्नीचर सेलेक्ट करें.

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