गिफ्ट करें फलों का गुलदस्ता

हमारे यहां शुरू से चाहे बर्थडे पार्टी हो, मैरिज एनिवर्सरी हो, फूलों का बुके देने का चलन है. लेकिन जहां फ्लावर बुके की शोभा कुछ घंटों तक सीमित रहती है, वहीं फ्रूट बुके आकर्षक होने के साथ हैल्दी औप्शन भी देता है. खास मौकों पर फ्रूट बुके भेजने का यह एक यूनिक आइडिया है 28 वर्षीया नेहा अग्रवाल का. नेहा  कुछ हट कर करना चाहती थीं, जिस में नयापन हो और लोगों के लिए हैल्दी भी हो. चूंकि नेहा के पास फूड टैक्नौलौजिस्ट की डिगरी थी, सो उन्होंने लोगों के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए सोचा क्यों न कुछ ऐसा किया जाए कि लोगों को सेहतभरा तोहफा मिले और उन्होंने ‘फ्रूट्ज कौंसैप्ट्स’ के नाम से फ्रूट बुके का काम शुरू किया.

आज नेहा के फ्रूट बुके पसंद करने वालों की लिस्ट दिनबदिन लंबी होती जा रही है. फलों की कलात्मकता के साथ पेश करने का यह आइडिया लोगों को खासा पसंद आ रहा है. फ्रूट बुके में ताजा फलों के साथ चौकलेट्स व ड्राईफ्रूट्स को शामिल किया जाता है. फ्रूट बुके बनाते समय फलों की ताजगी का पूरा ध्यान रखा जाता है. आप चाहें तो अपनी पसंद के अनुसार मनचाहे आकार और फलों का बुके बनवा सकते हैं. यानी 

आप अपनी पसंद का फ्रूट बुके और्डर कर सकते हैं. नेहा बताती हैं कि फ्रूट बुके बनाते समय फलों की क्वालिटी व ताजगी का पूरा ध्यान रखा जाता है. बुके होम डिलीवरी करने से कुछ घंटे पहले ही तैयार किया जाता है. 

फलों का बुके सजाते समय साफसफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है. फलों को निर्धारित तापमान पर रखा जाता है, ताकि उन की ताजगी बरकरार रहे. बुके को बनाने के बाद उसे हाइजीनिक और जर्मफ्री रखने के लिए जर्म प्रोटैक्ट शील्ड से कवर किया जाता है. फ्रूट बुके को आकर्षक बनाने के लिए किस्मकिस्म की टोकरियों और वासेज का प्रयोग किया जाता है. कटर की सहायता से फलों को हार्ट फ्लावर्स आदि की आकर्षक शेप दी जाती है और फलों को इस तरह व्यवस्थित किया जाता है कि वे बुके का रूप ले लें.

फ्रूट बुके 3 साइज में उपलब्ध होते हैं – स्मौल, मीडियम और लार्ज. स्मौल फ्रूट बुके 5 लोगों के लिए काफी होता है, मीडियम बुके 8 लोगों के लिए और लार्ज बुके 12 लोगों के लिए काफी होता है. आप सप्ताह के सातों दिन चौबीसों घंटे औनलाइन और्डर कर सकते हैं. आप बुके में अपनी पसंद के फलों का चुनाव कर सकते हैं. 

बुके के पेमैंट आप क्रैडिट कार्ड, डैबिट कार्ड, नैट बैंकिंग द्वारा कर सकते हैं.

कॉलेज फैस्ट की तैयारी

कालेज सत्र आरंभ होने के साथ ही एक आजादी की भावना भी मन में हिलोरे लेने लगती है. स्कूल यूनीफौर्म से छुटकारा मिलता है और हम नितनई पोशाक पहनने को उत्सुक रहते हैं. कालेज में क्या पहनना है, यह तो आप ने सोच ही लिया होगा. लेकिन कालेज की जिंदगी में ‘कालेज फैस्ट’ और ‘रौक कौंसर्ट’ भी होते रहते हैं. वहां अगर हम सादे कपड़े पहन कर जाएं, तो अच्छा नहीं लगेगा, ऐसे मौकों के लिए चाहिए कुछ खास परिधान और खास तैयारी. तो जानिए कुछ टिप्स, जिन के द्वारा आप भीड़ में भी आकर्षक लगेंगे :

लुक पर दें ध्यान

मौसम के अनुसार ही कपड़ों का चुनाव करें. जैसे, सर्दी का मौसम हो तो लैदर की जैगिंग या स्किनी के ऊपर प्रिंट वाली जैकेट और साथ में रेशमी स्कार्फ या चेहरे पर फबती हैट पहनी जा सकती है. यदि गरमी का मौसम हो तो छोटा, बिना बाजू का जंपसूट या फूलों का प्रिंट वाला रोंपर जंचेगा.

डैनिम ऐसा कपड़ा है जो हर मौसम में अच्छा लगता है. इस की सब से खास बात यह है कि यह कितना भी गंदा हो जाए, फिर भी फैशनेबल लगता है. जहां गरमियों में आप डैनिम के शौर्ट्स के साथ फूलों के प्रिंट वाली शर्ट या टैंक टौप या बिना कंधों वाला टौप पहन इतरा सकती हैं, वहीं सर्दियों में डैनिम की अच्छी फिटिंग वाली जींस के साथ एक ही रंग या प्रिंट का जिपर या रंगीन प्रिंट वाली जैकेट पहन सकती हैं.

रौक कौंसर्ट में आप ‘बैंड’ की प्रिंट वाली टीशर्ट पहन कर अलग दिख सकती हैं. टीशर्ट पर ऐसा प्रिंट भी होता है जो रात के अंधेरे में चमकता है. तो क्यों न ऐसी कोई टीशर्ट पहन कर महफिल में चमका जाए?

लुक पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है. लुक का अर्थ है आप का पूरा व्यक्तित्व. यदि आप स्नीकर जूते पहनती हैं तो उन के साथ अच्छी फिटिंग की डैनिम जींस तथा आरामदेह टीशर्ट फबेगी. यदि आप घुटनों तक के ऊंचे बूट्स पहनती हैं तो उन के साथ स्किनी पैंट या जैगिंग और रंगीन टीशर्ट जंचेगी.

आप के जूते

याद रहे, कालेज फैस्ट जैसे मौकों पर आप को घंटों खड़े रहना है, वहां बज रहे गानों पर थिरकना है, तो ऐसे में आप के जूते इतने आरामदेह होने चाहिए कि आप 5-6 घंटे बिना थके खड़े रह सकें. कालेज फैस्ट में जूतों का स्टाइलिश होना भी अतिआवश्यक है.

ऊंची एढ़ी की सैंडिल न पहनें. आगे से खुली सैंडिल भी न पहनें ताकि भीड़ में आप के पैर कुचल न जाएं. फ्लैट सैंडिल पहनें. आप स्नीकर जूते भी पहन सकती हैं. आरामदेह होने के साथ ये फैशनपरस्ती में भी पीछे नहीं हैं.

आप का बैग

कालेज फैस्ट में आप के हाथ जितने खाली रहेंगे, आप उतना ही आनंद उठा सकेंगी. इसलिए ऐसा बैग लें जिसे आप कंधे से तिरछा डाल सकें, जिसे ‘क्रौस स्लिंग बैग’ कहा जाता है, ताकि जब आप नाच रही हों तो भी आप का बैग सहीसलामत रहे. इस के लिए थोड़ा बड़ा बैग अच्छा रहेगा.

आप के गहने

युवतियों को गहने बहुत पसंद होते हैं. कालेज कौंसर्ट जैसे अवसर पर गहने कैसे हों, यह जानना जरूरी है.

– ऐसे समय में कम से कम गहने पहनें. ऐसे गहने तो बिलकुल न पहनें, जिन के उलझने का खतरा हो.

– अपना लुक बढ़ाने के लिए केवल एक स्टाइल स्टेटमैंट रखें यानी एक बड़ी माला और कानों में आप के चेहरे को सूट करते झुमके. बालों में नकली फूल भी लगा सकती हैं.

– यदि आप ने पाश्चात्य कपड़े पहने हैं जैसे जींस तो संग में भारतीय लुक वाला कोई गहना कतई न पहनें. गहने आप के लुक से मेल खाने चाहिए.

– केवल एक हैट या ग्लैडिएटर सनग्लासेज भी आप का लुक सजा सकते हैं.

आप का मेकअप

मेकअप जितना कम करें उतना अच्छा, कालेज फैस्ट में नाचने में आप का पसीने में भीगना स्वाभाविक है. ऐसे में आप के चेहरे पर मेकअप की बहती लकीरें आप को हास्यास्पद बना देंगी, जो भी मेकअप करें वह वाटरप्रूफ हो. अच्छा रहेगा कि काजल और लिपस्टिक पर जोर दें, जो आसानी से ठीक की जा सकती है.

आप की केशसज्जा

आप चाहें तो बालों को खोल कर लहराएं. उन में आप रंगीन हेयर ऐक्सटैंशन लगा सकती हैं या फिर आजकल फैशन में विभिन्न आकार के हेयर स्टिकर भी चल रहे हैं. ऐसे में आप सुंदर तो अवश्य दिखेंगी किंतु भीड़ में बालों के खिंचने का खतरा हो सकता है. चाहें तो जूड़ा भी बना सकती हैं, जिसे आप कोई हेयर ऐक्सैसरीज जैसे नकली फूल या चमकदार जूड़ापिन से सजा सकती हैं.

प्रसिद्ध अभिनेत्रियों जैकलीन फर्नांडीस और आलिया भट्ट द्वारा युवतियों हेतु कुछ टिप्स :

जैकलीन फर्नांडीस

– बहुत अधिक गहने पहनने से पूरा लुक अटपटा लगने लगता है. सिर्फ एक स्टेटमैंट ज्वैलरी पहनें, चाहे वह नैकलेस हो या कौकटेल अंगूठी.

– डैनिम की शर्ट के साथ लैदर की कमर तक ऊंची स्कर्ट. स्कर्ट के ऊपर एक पतली बैल्ट और गले में स्टेटमैंट नेकलेस.

– चमकदार टौप के साथ शौर्ट्स और यदि मौसम हो तो शनील का एक कोट भी.

– पूरी लंबाई वाली मैक्सी ड्रैस, घेरदार हो या स्ट्रेटकट.

आलिया भट्ट

आलिया भट्ट ने एक औनलाइन शौपिंग साइट जबौंग के साथ मिल कर कालेज के लिए फैशन कलैक्शन निकाला है जिस में कई लुक हैं :

– युवतियां भड़कीले रंग और प्रिंट पहनें ताकि जहां जाएं वह जगह चमक उठे.

– युवतियों पर औफ शोल्डर टौप या ड्रैस खूब फबेंगी.

– थोड़े थुलथुले बदन की युवतियों के लिए ‘लेयरिंग’ सब से अच्छा है. लेयरिंग का तात्पर्य है एक के ऊपर एक कपड़े पहनना, चाहे कैप हो या किमोनो, श्रग हो या वेस्टकोट, आप का ‘चिक लुक’ पक्का.

– खिलंदड़ लुक के लिए युवतियां फटी जींस और आरामदायक पोलो टीशर्ट पहनें.

सब से खास बात जो याद रखनी चाहिए वह यह है कि कालेज फैस्ट में चूंकि आप को काफी देर खड़ा रहना पड़ेगा इसलिए वही कपड़े और जूते पहनें जो आरामदायक हों.

घर पर बनायें बेक्ड मसाला गोभी

सामग्री

– 1 फूल गोभी

– 4 प्याज

– 2 टमाटर

– 1 छोटा टुकड़ा अदरक

– 6 कलियां लहसुन 

– 1 छोटा चम्मच हलदी पाउडर 

– 2 तेजपत्ते

– 1 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

– 2 चम्मच धनिया पाउडर

– 1 छोटा चम्मच गरममसाला

– 1/2 छोटा चम्मच जीरा पाउडर

– 2 हरीमिर्च

– 10 ग्राम तेल

– 15 ग्राम पिज्जा चीज

– थोड़ी सी धनियापत्ती कटी गार्निशिंग के लिए

– नमक स्वादानुसार.

विधि

गोभी के निचले हिस्से को अलग कर बाकी गोभी को 5 मिनट के लिए नमक वाले गरम पानी में रखें और फिर पानी से निकाल कर सुखा लें. प्याज, टमाटर, हरी मिर्च, लहसुन और अदरक का पेस्ट बनाएं. इस पेस्ट में तेजपत्ते, नमक, धनिया पाउडर, हलदी, जीरा पाउडर, गरममसाला और लालमिर्च पाउडर डालें. अब इस मिश्रण को गोभी में लगा कर 30 मिनट के लिए अलग रख दें. अब बेकिंग ट्रे में तेल लगाएं और गोभी पर फौइल पेपर लगा कर 15 मिनट तक बेक करें. फिर पिज्जा चीज डालें और तब तक बेक करें जब तक चीज पिघल न जाए. फिर धनियापत्ती से गार्निश कर सर्व करें.

व्यंजन सहयोग: रुचिता जुनेजा कपूर

देश की पूर्व राजधानी: पाटलीपुत्र

पटना, बिहार की राजधानी. बिहार के बारे में लोगों की मानसिकता बहुत अच्छी नहीं है. सब वक्त का खेल है. एक वक्त था जब बिहार का पाटलीपुत्र ही पूरे देश की राजधानी थी और अब इस राज्य का नाम देश के पिछड़े राज्यों में शुमार है. पर आज हम आपको यहां के सुनहरे इतिहास के बारे में नहीं पर यहां के आज के बारे में बताने जा रहे हैं. किसी भी चीज के बारे में मानसिकता बना लेना आसान है और किसी भी चीज के बारे में करीब से जानना उतना ही मुश्किल.

बिहार की राजधानी ‘पटना’ देश की बाकि राजधानियों जैसी नहीं है. यहां के लोगों को मेट्रो या लोकल ट्रेन पकड़ने की हड़बड़ी नहीं होती. यहां डाक बंगलो चौराहे पर लगे जाम में लोग घंटों बिता देते हैं. पान की पिक से रंगी सड़कें छठ के मौके पर घरों से ज्यादा साफ हो जाती हैं. मेट्रो सिटी न होने के बावजूद यह शहर काफी दिलचस्प है. अगर आप कभी पटना जायें और आपके पास ज्यादा वक्त न हो, तो आप पटना के स्थानों पर घूम सकते हैं. इन जगहों से ही आपको शहर की आबोहवा का एहसास हो जाएगा.

1. बुद्ध स्मृति पार्क

पटना रेलवे स्टेशन के पास ही है बुद्ध स्मृति पार्क. जापान, थाईलैंड, श्री लंका, साउथ कोरिया से लाए गए अवशेष यहां संरक्षित कर रखे गए हैं. यहां रोजाना लाइट ऐंड साउंड शो दिखाया जाता है. यहां आकर आपको किसी विहार जैसी शांति का अनुभव होगा. यहां एक संग्रहालय है और यहां ‘पुराने जेल’ की कुछ वस्तुएं भी रखी हैं.

2. एनआईटी घाट पर गंगा आरती

पटना आए और एनआईटी घाट पर बने भागीरथी विहार नहीं गए तो क्या खाक पटना आए? वैसे ऐसी कोई कहावत नहीं है, पर कहने का मतलब यही है कि पटना आकर आपको एनआईटी घाट जाकर गंगा आरती जरूर देखना चाहिए. अगर आपकी किस्मत अच्छी हुई तो आपको डॉल्फीन भी दिख सकते हैं.

3. गोल घर

गांधी मैदान के पश्चिम की तरफ है गोल घर. इसे आजादी से पहले अनाज स्टोर करने के लिए बनवाया गया था. पर इसे कभी पूरा नहीं भरा जा सका. इसकी नक्काशी उस जमाने की कहानी बयां करती है. इसकी स्थापत्यकला बौद्ध स्तूप से मिलती-जुलती है. इसके ऊपर चढ़कर आप शहर और गंगा नदी के नजारे देख सकते हैं. कुछ कपल्स भी नजर आ सकते हैं, तो जरा सतर्क होकर जायें.

4. तारामंडल

तारामंडल एक प्लैनेटोरियम है. यह देश के सबसे पुराने प्लैनेटोरियम में से एक है. इसे इंदिरा गांधी प्लैनेटोरियम के नाम से भी जाना जाता है. यहां समय समय पर सेमिनार और प्रदर्शनियां लगाई जाती हैं.

5. खुदा बख्श नेशनल लाइब्रेरी

दुनिया भर से ऊर्दू प्रेमी यहां आते हैं. यहां ऊर्दू की तकरीबन 2.5 लाख किताबें और 21,000 पांडुलिपियां संरक्षित हैं. 1889 में यह लाइब्रेरी खोली गई थी. यहां मुगल जमाने की किताबें और पेंटिंग भी हैं. इतिहास को छू कर देखना हो तो यहां जरूर जायें.

6. संजय गांधी जैविक उद्यान

संजय गांधी जैविक उद्यान को पटना जू भी कहा जाता है. इस चिड़ियाघर का नाम भी देश के बड़े चिड़ियाघरों में शुमार है. यहां 800 से भी अधिक जानवर रखे गए हैं. टॉय ट्रेन, बैटरी रिक्शा यहां तक की आप हाथी की सवारी कर के भी जू घूम सकते हैं. यहां विभिन्न तरह के पेड़-पौधे भी हैं.

7. जलान म्यूजियम

गंगा किनारे बना है यह संग्रहालय. यहां के कलेक्शन में टीपू सुल्तान की पालकी से लेकर हुमांयु की तलवार तक शामिल हैं. यहां 10,000 से ज्यादा वस्तुएं संरक्षित हैं. पर यह एक प्राइवेट म्यूजियम है और यहां जाने के लिए आपको पहले से परमीशन लेना पड़ेगा.

8. अगम कुआं

इसे सम्राट अशोक ने बनवाया था. पुरातत्व से जुड़ा यह पटना में स्थित सबसे पुरानी संरचना है. लोगों पर जुल्म ढाने के लिए इसे बनवाया गया था. इतिहासकारों का कहना है कि अशोक ने गद्दी पाने के लिए अपने 99 भाईयों को इसी में डूबा कर मारा था.

9. पटना म्यूजियम

शहर के बीचो बीच बसा है पटना संग्रहालय. इसकी स्थापत्यकला मुगलों और राजपूतों से प्रभावित है. यहां 45,000 से भी अधिक वस्तुयें संरक्षित हैं. यहां की अशोक और गुप्तकालिन वस्तुएं भी रखी हैं. यहां एक पेड़ का फोसिल है, जो विश्व का सबसे बड़ा फोसिलाइज्ड पेड़ है.

अब इतना घूम फिर कर थकान तो हो ही गई होगी. तो लिट्टी चोखा का आनंद लें. एक दफा पटना जाकर तो देखिए, बिहार के बारे में आपकी मानसिकता थोड़ी सी जरूर बदल जाएगी.

दुनिया में कोई भी परफेक्ट नहीं है: यामी गौतम

विज्ञापनों से अभिनय के क्षेत्र में उतरी अभिनेत्री यामी गौतम को फिल्म ‘विकी डोनर’ से प्रसिद्धी मिली. हालांकि उन्होंने अपना कैरियर टीवी से शुरू किया था, लेकिन हमेशा से उन्हें फिल्मों में काम करने की इच्छा रही. 20 साल की उम्र में वह अभिनय के लिए मुंबई आई और जो भी काम मिला करती गईं. स्वभाव से नम्र और हंसमुख यामी की कुछ फिल्में सफल तो कुछ असफल रहीं, लेकिन उस पर वह ध्यान नहीं देती, इंडस्ट्री में गॉडफादर न होने के बावजूद काम के मिलने को अपना लक समझती हैं. हिंदी के अलावा उन्होंने पंजाबी,तमिल, तेलगू, मलयालम, कन्नड़ आदि सभी भाषाओं में फिल्में की हैं. इस समय वह फिल्म ‘काबिल’ के प्रमोशन पर हैं, जिसे लेकर वह काफी खुश हैं. उनसे मिलकर बात करना रोचक था. पेश है कुछ अंश.

प्र. इस फिल्म का मिलना कैसे हुआ? कितनी खुश हैं?

ये फिल्म मेरे लिए बड़ी बात है, केवल स्क्रिप्ट ही नहीं, ऋतिक रोशन के साथ काम करना, संजय गुप्ता द्वारा निर्देशन किया जाना, राकेश रोशन के द्वारा बनाया जाना आदि सब मेरे लिए एक्साइटमेंट है.

प्र. आपने इसमें एक अंधी लड़की की भूमिका निभाई है, अपने आप को कैसे तैयार किया?

ये कोई एक दो दिन में नहीं हुआ, काफी समय लगा. जिससे वह रियल लगे. हमने काम के दौरान मिलकर‘एक्स्प्लोर’ किया है. मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी, बहुत सारें यू ट्यूब पर रियल वीडियो देखी, जिसमें वे कैसे खाना बनातेहैं, कैसे चलते हैं, कैसे बात करते हैं, उनका बॉडी लैंग्वेज कैसा होता है आदि सारी बारीकियों को देखा. फिर ऋतिक ने बहुत सहयोग दिया, जिससे काम करना आसान हो गया.

प्र. निर्माता राकेश रोशन ने आपको क्या टिप्स दिए?

उनका कहना था कि लड़की आंखों से देख नहीं सकती, पर वह हर जगह जाने के लिए आजाद है. वह मासूम है पर उसका व्यवहार आम लड़की की तरह ही होना चाहिए. मैंने जब कहा कि मैं बहुत नर्वस हूं तो उन्होंने कहा कि मैं भी अपनी हर फिल्म में नर्वस होता था. ये अच्छी बात है और ऋतिक से हेल्प लेने की बात कही.

प्र. ऋतिक के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

मैं ऋतिक से पहले कभी मिली नहीं थी. पहली बार जब सेट पर मिली, तो मेरे दिमाग में काफी प्रश्न थे, क्योंकि उन्होंने धूम, बैंग-बैंग, कृष आदि कई बड़ी फिल्में की हैं. वे एक स्टाइलिस्ट इंसान हैं, उन्हें पूरा विश्व जानता है. लेकिन जब बात की तो पता चला कि ये बहुत ही सिंपल इंसान हैं. उनके साथ आप कुछ भी बात कर सकते हैं, 50 के दशक के गाने भी वे जानते हैं. इसके अलावा उनका ‘सेंस ऑफ़ ह्यूमर’ बहुत अच्छा है. काम के दौरान भी वे फन ढूंढ लेते हैं. हालांकि वे काम पर भी बहुत फोकस्ड रहते हैं, लेकिन शूटिंग करते हुए कुछ न कुछ ‘फनी जोक्स’ सुनाकर सबको खुश कर देते हैं. उनके साथ डांस करते हुए मुझे थोड़ी मुश्किल आई, पर मैंने काफी मेहनत की है. जब मुझे पता चला कि इसमें थोड़ा टैंगो डांस है, तो मैंने पहले से ही सीखनी शुरू कर दिया था, जिससे मुझे अधिक मुश्किलें नहीं आई. मैं कोई ‘रिटेक’ नहीं लेना चाहती थी.

प्र. इस फिल्म से आपने क्या सीखा? आंखों से न देख पाने वालों के लिए कुछ करना चाहती है?

मैंने जाना कि दुनिया में कोई भी परफेक्ट नहीं है. आंखों से न देख पाने के बावजूद वे एक सामान्य इंसान की तरह ही मौज-मस्ती, घूमना-फिरना, प्यार करना सब पसंद करते हैं. मैं खुद भी ऐसे ही प्यार की तलाश कर रही हूं, जो मुझे सच्चा प्यार करे. आजकल रिलेशनशिप के माइने बदल चुके हैं, उसे आप प्यार नहीं कह सकते. मेरे हिसाब से प्यार का अर्थ और एहसास बदला नहीं है. वे जैसे थे, वैसे ही हैं. मेरे पूरे परिवार ने आज से दस साल पहले अपनी आंखें दान कर  दी थी. ये एक छोटा प्रयास है, तब फिल्म की कोई बात नहीं थी.

प्र. आपने पिछले 5 सालों में बहुत कम फिल्में की हैं, इसकी वजह क्या है? क्या आप ‘चूजी’ हैं?

मैं अपने हिसाब से फिल्में करती हूं. कुछ सफल हुई कुछ नहीं. हमेशा से मैं ऐसी फिल्में करना चाहती हूं, जिससे मुझे लोग याद करें और मेरा प्रयास यही चलता रहता है. अगर मेरी फिल्में सफल नहीं भी हुई तो भी मैं अधिक नहीं  सोचती और इसकी क्रेडिट मैं अपने माता-पिता को देती हूं. जो हमेशा आगे बढ़ने की सलाह देते रहते हैं. मैं हो-हल्ला अधिक पसंद नहीं करती. पार्टी में अधिक नहीं जाती, इसलिए शायद मुझे आगे बढ़ने में थोडा समय लग रहा है. अभी मेरी दो फिल्में काबिल और सरकार 3 आ रही हैं.

प्र. परिवार के बिना मुंबई में अकेले रहना कितना मुश्किल होता है?

अकेले रहना मुश्किल होता है, पर मेरे माता–पिता हमेशा आते रहते हैं. यहां अगर काम न हो तो अपने आप को हमेशा ‘एंगेज’ रखना पड़ता है, ताकि आपकी ग्रूमिंग होती रहे.

प्र. आप की खूबसूरती का राज क्या है?

इसका श्रेय मैं अपने मेकअप आर्टिस्ट और माता-पिता को देती हूं. काबिल फिल्म में मेकअप ने काफी काम किया है, क्योंकि इसमें कही भी अधिक मेकअप दिखाना नहीं था. इस फिल्म में मैंने सुप्रिया की भूमिका निभाई है, जो पियानो की क्लास लेने जाती है. जो सजती भी है, क्योंकि बाहर जाती है. रियल लाइफ में मैं अधिक मेकअप नहीं पसंद करती.

यात्रा ही मेरा जीवन है: अमित साध

2002 में सीरियल ‘‘क्यों होता है प्यार’’ से अभिनय करियर की शुरुआत करने वाले अमित साध ने अब तक चंद सीरियलों के अलावा ‘काई पो चे’, ‘गुड्ड रंगीला’, ‘सुल्तान’ सहित कुछ फिल्मों में अभिनय कर अपनी अलग छाप छोड़ी है. अब वह तीन फरवरी को प्रदर्शित होने वाली अपनी नई फिल्म ‘‘रनिंग शादी डाट काम’’ को लेकर काफी उत्साहित हैं, जिसमें उनकी जोड़ी फिल्म ‘‘पिंक’’ फेम अदाकारा तापसी पन्नू के संग है. मगर बौलीवुड के सभी कलाकारों के मुकाबले वह कुछ अलग तरह के इंसान व कलाकार हैं. उन्हे एंडवेचर बहुत पसंद है. वह सायकल बाइक पर काफी यात्राएं करते रहते हैं. 2019 में माउंट एवरेस्ट फतह करने की योजना बना रहे अमित साध ने अपनी अब तक की यात्राओं, अपने एडवेंचर, अपनी भविष्य की योजनाओं आदि को लेकर‘‘सरिता’’ पत्रिका से खास बात की.

बौलीवुड में अक्सर आपके गायब हो जाने की चर्चाएं होती रहती हैं?

मैं गायब नही होता. मैं एंडवेचरस इंसान हूं. हर फिल्म की शूटिंग खत्म करने के बाद मैं बाइक पर घूमने निकल जाता हूं. मुझे हिमालय बहुत पसंद है. मैंने लद्दाख 6 बार बाइक पर घूमा हूं. मैंने कारगिल, ग्रास, मेन लद्दाख की 6 बार बाइक पर यात्रा की है. अभी मैं मनाली की यात्रा साइकल पर करने वाला हूं, जब बर्फ पिघल जाएगी. मतलब जून जुलाई में. पिनारी कलेशर चढ़ा हूं. 2019 में माउंट एवरेस्ट चढ़ने की योजना पर काम कर रहा हूं. मुझे एडवेंचर बहुत पसंद है. इसलिए भी मैं खुश रहता हूं. फिल्मों की शूटिंग करके मैं एडवेंचर्स काम करने निकल जाता हूं. लोगों को लगता है कि मैं नाराज हूं. मैं गुस्सैल हूं. मेरे पास काम नहीं है. मैं कही गायब हो गया हूं. वगैरह वगैरह. तो मैंने कहा कि एक ही चीज को देखने का नजरिया हर किसी का अलग होता है.

बाइक पर यात्रा करने के दौरान के आपके अनुभव क्या रहे? आप इस यात्रा के दौरान लोगों से मिलते होंगे. तो क्या बात हुई?

इन यात्राओं के दौरान मैं जिन जमीन से जुडे़ हुए लोगों से मिला. उन्होंने मुझे भी जड़ों से जोड़ कर रखा. इसलिए मेरा एक ब्ल्यू प्रिंट बन चुका है कि मुझे क्या करना है. हकीकत यह है कि फिल्मों में कलाकार को बिगाड़ा जाता है, यहां कोई कलाकार के लिए खाना ले आता है. तो कोई पीने का कोई सामान ले आता है. इतनी सुविधाएं कलाकार को मिल जाती हैं कि वह बिगड़ जाता है. पर जब आप आम लोगों के बीच बैठते हैं,तो वह आपको आपकी जड़ों से जुड़े रहने पर विवश करते हैं. इसलिए फिल्म की शूटिंग खत्म करने के बाद मैं एक आम इंसान बनकर इन आम लोगों के पास पहुंच जाता हूं. मुझे 14 से 15 हजार फुट उंचाई पर बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ आठ दस लोगों के साथ जमीन पर बैठकर कढ़ी चावल खाते हुए मजा आता है. मुझे पहाड़ों में टेंट में सोने में आनंद की अनुभूति होती है. यह सारी चीजें मुझे लोगों के साथ साथ कुदरत से जोड़ कर रखती हैं. जिस दिन आपका लगाव, आपका जुड़ाव कुदरत से खत्म हो जाता है. उस दिन आप भले ही दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकत बन जाए, पर आपकी जिंदगी खत्म हो जाती है.

भविष्य में भी कुछ खास करने की योजना है?

जी हां! सितंबर माह में मुंबई से एनएच 10 पकड़ कर पंजाब, जे के होते हुए लेह, खंडूरा 18500 फुट पर जाउंगा. फिर नीचे होते हुए लखीमपुर खीरी जाउंगा. वहां से काठमांडू जाउंगा. वहां से सिलीगुड़ी. सिलीगुड़ी से भूटान जाउंगा. भूटान जाने के लिए हमने इजाजत मांगी है. वहां से आसाम होते हुए नागालैंड में अपनी बाइक यात्रा खत्म करूंगा.

इस रूट को चुनने की वजह क्या है?

पहाड़ मुझे हमेशा बुलाते रहते हैं. मुझे पहाड़ों पर जाकर बहुत सकून मिलता है  और मैंने जो यह रूट चुना है,इसमें संघर्ष बहुत ज्यादा है. आसान यात्रा करने में कुछ नहीं है. इस रूट पर पहाड़ चढ़ने हैं, टूटे फूटे रास्ते हैं. यह यात्रा मैं 550 सीसी बुलेट पर करूंगा. यदि किसी ने स्पांसर कर दिया, तो ट्रैम्प पर करूंगा. मेरे लिए अच्छी बात यह है कि पहले यह सब करने के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते थे. अब मुझे यह सब मुफ्त में करने का मौका मिल रहा है. 

पर इस तरह के रूट बनाने के पीछे सोच क्या हैं?

सोच कुछ नहीं. वजह यह है कि मुझे 2 अच्छे लोगों का साथ मिल गया है. यह जमीन से जुड़े लड़के हैं. बहुत विनम्र हैं. इसमें से एक हैं दीपक जो कि सायकल चैंपियन हैं. यह पीछे वाले पहिए पर 40 किलोमीटर साइकल चलाते हैं. हवा में साइकल उड़ा देते हैं. दूसरा लड़का है गैरी दत्त. इन दोनों से मेरा मेलमिलाप बहुत ज्यादा है. हम लोग साइकल के जरिए आपस में बहुत मिलते हैं. जब हम लोगों ने बैठकर विचार विमर्श किया कि कहां जाना है, तो किसी ने आसाम कहा, मैंने काठमांडू कहा. मैं काठमांडू जाना चाहता था. क्योंकि मैंने काठमांडू में फिल्म ‘यारा’ की शूटिंग की है. वहां पर भूकप आ चुका है. वहां पर जो हैरिटेज साइट है, वहां पर हमने गाना फिल्माया था. तो मैंने कहा कि जब हम लोग इस यात्रा पर जा रहे हैं, तो काठमांडू के उस हैरिटेज क्षेत्र की भूकंप आने के बाद क्या स्थिति है, देखने जाना चाहूंगा. इसके अलावा इस बार हम लोग इस पूरी यात्रा को फिल्मा रहे है. हमारी पूरी टीम जा रही है. दस कैमरा हैं. यह बहुत बड़े पैमाने पर हम कर रहे हैं.

इस एडवेंचरस यात्रा को फिल्माने की क्या वजह है?

हम हमारी इस यात्रा को फिल्माकर दुनिया को भी दिखाना चाहते हैं. दुनिया को बताना चाहते हैं कि हमारा देश क्या है. हम लोग रास्ते में गांव में रूकेंगे. वहां के लोगों से बातचीत करेंगे. हमारी योजना यह है कि यदि किसी गांव में बीस बाइस साल की युवा लड़की मिली और उसने कहा कि उसे बाइक चलानी आती है, पर उसे बाइक चलाने का मौका नही मिलता है. तो हम उसे अपनी बाइक देंगे और अपने साथ चलने के लिए कहेंगे. पूरे40 दिन की हमारी यह यात्रा है. हम लोगों ने दिमाग में कई योजनाएं बना रखी है.

अब तक आप जो यात्राएं कर चुके हैं, उन यात्राओं ने देश के किस गांव ने आपको प्रभावित किया?

हमारा देश तो गांव का देश है. पर मैंने बेहतरीन गांव पाया मुक्तेश्वर में. नैनीताल से 5 किलोमीटर की दूरी पर मुक्तेश्वर है. वहां बहुत कम लोग जाते हैं. क्योंकि नजदीक में कोई एयरपोर्ट नहीं है. साधन उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए लोग कम जाते हैं. यदि मुक्तेश्वर के आस पास एअरपोर्ट होता, तो दिल्ली वाले जरूर पहुंचते . दिल्ली से मुक्तेश्वर 12 घंटे चाहिए, इसलिए लोग नहीं जाते. वहां पर एक जगह है, सरगा खेत. मैंने सरगा खेत में कैम्प किया था. मुझे यह जगह इतनी पसंद आयी थी, कि मैं कई माह रहा. मैंने वहां पर नौकरी भी की है. इस गांव से मेरा लगाव हो गया. हर वर्ष मौका मिलते ही चार पांच दिन के लिए इस गांव जाता रहता हूं. अभी 2015 मे फिल्म ‘सुल्तान’ की शूटिंग दिल्ली में कर रहा था, चार दिन की छुट्टी थी, तो मैं सरगा खेत चला गया था. एक जगह है-पीपला.  वहां एक एनजीओ काम कर रहा है– चिराग (सेंट्रल हिमालयन रूरल एक्शन ग्रुप). इसने पहाड़ों पर बहुत अच्छा काम किया है.इ नके साथ मिलकर हमने भी कुछ दिन काम किया. तो बहुत अमैजिंग अनुभव हैं. उनके जीवन की सरलता मुझे उन तक खींचती है. बिना किसी कारण मोहब्बत करने की उनकी जो क्षमता है, वह मुझे उन तक खींचकर ले जाती है.

क्या खाएं गर्भवती महिलाएं

मां बनना एक अलग अनुभव और एहसास है. लेकिन इस के साथ साथ कई प्रकार के शारीरिक बदलाव भी दिखाई देते हैं, जिन में पांवों का फूलना, उलटियां आना, अच्छी नींद का न आना आदि शामिल हैं. इतना ही नहीं, इस समय त्वचा में भी परिवर्तन दिखाई देता है. त्वचा रूखी और बेजान हो जाती है. ऐसे में बच्चे के साथसाथ मां की सेहत का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है. प्रैगनैंसी से ले कर पोस्ट डिलिवरी तक ये बदलाव किसी न किसी रूप में दिखाई देते हैं. मां बनने के बाद अधिकतर महिलाएं अपनी देखभाल करना छोड़ देती हैं. ऐसे में कुछ सालों बाद वे कई बीमारियों का शिकार हो जाती हैं.

इसी बात को ध्यान में रखते हुए ‘हिमालया’ ने ‘हिमालया फौर मौम्स’ लौंच किया. इस अवसर पर हिमालया की सीनियर रिसर्च साइंटिस्ट पूर्णिमा शंकर ने कहा, ‘‘महिलाएं डिलिवरी के बाद बच्चे और परिवार में पूरी तरह खो जाती हैं और अपनेआप को भूल जाती हैं. ऐसे में हम एक अवेयरनैस महिलाओं में इस प्रोडक्ट के लौंच के साथ जगाने की कोशिश कर रहे हैं. मां का खुद का ध्यान रखना बहुत जरूरी है. यह उत्पाद रिसर्च के द्वारा टैस्ट कर फिर बाजार में उतारा गया है. मां की इस समय की जरूरत का खास ध्यान रखा गया है. प्रैगनैंसी के दौरान महिला को अपने परिवार की हैल्प लेनी चाहिए, क्योंकि इस समय तनाव, डिप्रैशन, चिंता आदि बढ़ जाती है. कुछ खास खुशबुओं का प्रयोग करने पर ऐसी मनोदशा से उबरा जा सकता है. ऐलोवेरा, लैवेंडर, रोज आदि की सुगंध मां के मूड को बदल सकती है. पहले बच्चे के समय मां की चिंता बहुत अधिक बढ़ जाती है. यह साधारण समस्या है, जो हर मां को होती है. अत: निम्न टिप्स पर महिला का प्रैगनैंट होते ही अमल करना आवश्यक है :

– संतुलित आहार को पर्याप्त व्यायाम के साथ लें. अगर आप का भोजन आप के शारीरिक काम से अधिक है तो वजन बढ़ेगा. इसी प्रकार अगर आप का आहार आप की शारीरिक ऐक्टिविटी से कम है तो वजन कम हो जाएगा. प्रैगनैंसी के दौरान डाइट के साथसाथ ऐक्टिव भी रहे. इस से जो वजन बढ़ा है उसे डिलिवरी के बाद कम करना आसान होगा.

– खाने में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन्स, फैट्स, विटामिन्स और मिनरल्स का भरपूर प्रयोग करें.

– प्लेट पर रेनबो बनाएं अर्थात प्लेट के आधे भाग में फल और आधे में सब्जियां रखें. अधिक तलेभुने पदार्थ, शुगर, सोडा आदि को अवाइड करें.

– सभी फैट्स खराब नहीं होते. कुछ अच्छे तो कुछ बुरे फैट्स होते हैं. मसलन ‘मोनो ऐंड पौलिअनसैचुरेटेड फैट्स’ जो अधिकतर लिक्विड फैट्स होते हैं, में तेल आता है जो शरीर के लिए जरूरी है, क्योंकि यह बैड कोलैस्ट्रौल को कम कर गुड कोलैस्ट्रौल को बढ़ाता है. सैचुरेटेड फैट्स जो कमरे के तापमान में जम जाएं, उन्हें अवाइड करें.

– अपने भोजन को छोटे छोटे मील्स में बांट लें और फिर 2-3 घंटे के बाद लेती रहें. 2 मुख्य भोजन और 2 हैल्दी स्नैक्स काफी होते हैं.

– नमक की मात्रा कम से कम लें, क्योंकि अधिक मात्रा में नमक लेने पर ब्लड प्रैशर बढ़ता है. प्रैगनैंट महिलाओं में नमक की मात्रा अधिक होने पर प्रैगनैंसी इन्ड्यूस्ड हाइपरटैंशन का खतरा रहता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति व्यक्ति 5 ग्राम नमक हर दिन के लिए काफी होता है, क्योंकि हर खाने में नमक की मात्रा नैचुरली होती है.

– पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं. रोज करीब 10-12 गिलास पानी पीएं. तरल पदार्थों का सेवन अधिक करें. अधिक तरलपदार्थ लेने से ‘प्रीटर्म’ बेबी डिलिवरी की संभावना कम होती है.

– शारीरिक के अलावा मानसिक स्वास्थ्य का भी हमेशा खयाल रखना चाहिए. इस के लिए अपने आसपास के लोगों से घुलमिल कर बातचीत करें.

– अपने लिए व्यायाम का समय प्रैगनैंसी के समय से ले कर डिलिवरी के बाद भी निकालें, लेकिन जो भी व्यायाम करें डाक्टर की सलाह से ही करें.

डैंड्रफ से पाना है छुटकारा तो..

क्या आपने डैंड्रफ साफ करने के सभी तरीके अपना लिए हैं. लेकिन फिर भी आपको इससे छुटकारा नहीं मिल रहा है. हम आपके किचन में मौजूद ऐसी चीज के बारे में बता रहे हैं, जिसे शैंपू में मिलाने से आपको डैंड्रफ की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा.

1. अपने शैंपू में चुटकी भर नमक मिलाएं और उसे अपने स्कैल्प पर लगाएं.

2. जब बाल गीले हों तभी आप यह काम करें. फिर 5 से 10 मिनट तक इसे अपने स्कैल्प पर मलें. इसके बाद अपने बाल को धो लें.

3. सिर में नमक ना रह जाए इसलिए फिर से शैंपू से बालों को धो लें.

4. अगर आपके सिर में नमक रह जाएगा तो इससे बालों को नुकसान पहुंचेगा और बाल भी झड़ने लगेंगे. इसलिए बालों में से पूरा नमक साफ कर लें.

2016 के मशहूर शब्द

2015 में औक्सफोर्ड डिक्शनरी का साल का मशहूर शब्द एक पिक्टोग्राफ रहा, एक ईमोजी, खुशी के आंसू वाला चेहरा. पर 2016 में कई नए शब्द हमारे शब्दज्ञान में जुड़ गए, सोशल मीडिया के हैशटैग और ट्रैंड्स ने इन्हें और मशहूर कर दिया. इस साल के कई शब्द हमें याद रहेंगे, जैसे-

नोटबंदी

यह शब्द तो भारतीयों को कभी भूलेगा ही नहीं, यह तो ‘वर्ड औफ द ईयर’ बन गया है, जिस ने देशभर के लोगों को खूब प्रभावित किया. औक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार, ‘डीमोनेटाइजेशन’ का मतलब है किसी सिक्के या कीमती धातु का बंद हो जाना.

ब्रिक्सिट

जून में यूरोपियन यूनियन के इश्यू पर यह शब्द खूब सुनाई दिया. लोगों ने इस इश्यू पर बात करने के लिए ही जैसे यह शब्द अपना लिया.

जेनोफोबिया

जेनोफोबिया ‘डिक्शनरी कौम’ का ‘वर्ड औफ द ईयर’ है. इस शब्द के प्रचलन का श्रेय चुनावी रैलियों के समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रेसिस्ट रिमार्क्स को जाता है. इस शब्द का मतलब है दूसरे देशों से आए हुए लोगों के प्रति नापसंदगी. इस का शाब्दिक अर्थ है इंसान को इंसान से डर.

सर्जिकल स्ट्राइक

जब एक रात भारतीय सेना ने पाकिस्तान में आर्मी कैंपस पर हमला किया, यह शब्द लोकप्रिय हो गया. सर्जिकल स्ट्राइक का मतलब है सेना द्वारा किया गया आक्रमण. कई लोगों ने मोदी के नोटबंदी के फैसले को भी सर्जिकल स्ट्राइक कहा.

मूब्स

यह शब्द पुरुष के ब्रेस्ट्स के लिए प्रयोग होता है, मुख्यतया यह ब्रिटेन का बोलचाल का शब्द है. जो बूब्स से प्रभावित है.

पोस्ट ट्रुथ

औक्सफोर्ड डिक्शनरी ने इसे ‘वर्ड औफ द ईयर’ कहा है. यह शब्द यू एस के राष्ट्रपति चुनावों के समय बहुत लोकप्रिय हुआ.

मास्टरडेटिंग

यह शब्द कुछ समय से प्रचलन में रहा है पर इस साल इस शब्द का प्रयोग खूब किया गया. मास्टरडेटिंग का मतलब है अकेले ही बाहर जाना या कुछ चीजें करना.

योलो

‘यू ओनली लिव वंस’ यानी योलो पूरे सोशल मीडिया पर सब से लोकप्रिय बजवर्ड था. 2016 में इस ने भी औक्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘मूब्स’ के साथ जगह बनाई.

मित्रों

पीएम नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की, उस वक्त कई बार ‘मित्रों’ कहा, तभी से यह शब्द खूब पढ़ासुना गया. यह शब्द डिक्शनरी में भी जुड़ गया.        

सरकारी नौकरी का मोह

क्या नरेंद्र मोदी को इस बात के लिए धन्यवाद दिया जाए कि उन्होंने स्वच्छता अभियान का इतना अधिक प्रचार किया कि उत्तर प्रदेश में नगर पालिकाओं के लिए सफाई कर्मचारियों की नौकरी के लिए एमबीए, एमए और बीए पास लड़केलड़कियों ने आवेदन कर डाले और प्रैक्टिकल के लिए वे गंदे पानी के सीवर में उतर गए.

उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य की सभी नगर पालिकाओं को सफाई कर्मचारियों की भरती की अनुमति दी है और 20 हजार लोगों की भरती होनी है. इस के लिए 2 लाख आवेदन मिले हैं. यह मालूम करना तो मुश्किल है कि अभी ये 2 लाख अनुसूचित जनजातियों के हैं या नहीं पर इन में सैकड़ों अच्छेखासे पढ़ेलिखे हैं यानी पढ़ाईलिखाई के बाद बेकारी इतनी है और सरकारी नौकरी का मोह इतना है कि सफाई कर्मचारी की नौकरी के लिए भी हजारों मील चल कर लोग पहुंचे हैं, क्योंकि आवेदन करने वाले का उस शहर का वासी होना जरूरी नहीं है.

सफाई कर्मचारी बनना बुरा नहीं है. बुरा है सफाई कर्मचारियों के साथ बरताव. नरेंद्र मोदी ने सजीधजी झाड़ू से कूड़ा इधर से उधर कर हल्ला तो कर दिया पर यह नौटंकी ज्यादा साबित हुआ, चरित्र परिवर्तन नहीं, क्योंकि कहीं से भी सूटेडबूटेड नरेंद्र मोदी, उन की पार्टी के हजारों नेताओं, अफसरों, दूसरे दलों या आम जनता ने सफाई को जीवन का अंग नहीं बनाया.

सफाई करने वाला आज भी गंदा है. जाति से बाहर शादी की बातें तो बहुत होती हैं पर अछूत कन्याओं से शादी कहां हो रही है. जो बात 50 साल पहले की फिल्म में कही गई थी वह वहीं दफन हो गई.

स्कूलकालेजों में अनुसूचित जनजाति वालों को जगह मिली है पर ज्यादातर उन्हें अपने अबोध साथियों से भी एक अलगाव मिलता है, क्योंकि ऊंचीनीची जाति की भावना घरघर में कूट कर भरी है और बच्चों को भी कह दिया जाता है कि किसे दोस्त बनाएं, किसे नहीं.

अगर सैकड़ों आवेदन एमए, एमबीए, बीए पास युवकयुवतियों के सफाई कर्मचारी के लिए आए हैं तो यह दर्शाता है कि देश में गरीबी, भुखमरी की क्या हालात है कि आरक्षण की सीढ़ी से पढ़ाई करने के बाद भी इन युवकों को पक्की संतोषजनक नौकरी नहीं मिल रही. ये कोई व्यवसाय नहीं कर पा रहे. ये समाज में घुल नहीं पा रहे. पढ़ाई और नरेंद्र मोदी के अभियान ने जाति की दीवारें तोड़ी नहीं मजबूत की हैं.

सफाई कर्मचारियों की जाति नहीं होनी चाहिए पर दुनिया भर में रंग, मूल देश, जाति, भाषा आदि के नाम पर सफाई का कार्य परंपरागत बना दिया जाता है और उस में एक स्तर से दूसरे स्तर पर उभरना कठिन हो जाता है. भारत तो जातिगत वर्णव्यवस्था में मीलों गहरा गढ़ा है जहां निचली जातियों को जरा सा भी उठने की कोशिश करने पर धकेल कर फिर नीचे फेंक दिया जाता है. उन के लिए एक ही क्षेत्र है, अलग रह कर सफाई करना और इसीलिए पढ़लिख कर भी उन्हें नीचा समझा जाने वाला काम अपनाना पड़ा है.

पक्की सरकारी नौकरी एक मोह है पर जहां जाति का बिल्ला लगा हो वहां लालच है तो सिर्फ जिंदगी जीने का.                            

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