Valentine’s Day : न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन

Valentine’s Day : फरवरी का महीना प्यार का महीना कहलाता है. जैसे ही वैलेंटाइन डे का दिन 14 फरवरी आने वाला होता है, हर किसी के मन में प्रेम की भावना का संचार होना शुरू हो जाता है. शादीशुदा हो या कुंआरा, बूढ़ा हो या जवान, हर किसी के मन में कहीं न कहीं यह मुबारक दिन मनाने की इच्छा होती है.

विदेशियों ने भले हम से सबकुछ छीन लिया हो, लेकिन इस प्यार के दिन को मनाने की परंपरा उन्होंने ही सिखाई है. अंगरेज देश छोड़ कर चले गए लेकिन आज भी हम उन की परंपराओं को फौलो कर रहे हैं लिहाजा वैलेंटाइन डे हो, रोज डे हो, हग डे हो फरवरी महीने की शुरुआत से ही ये सारे प्यार के दिन की शुरुआत हो जाती है. ऐसे में जिन के पास प्रेमीप्रेमिका या लाइफ पार्टनर है उन में से कुछ लोग तो इस दिन को ले कर बावले हो जाते हैं कि अपने पार्टनर को खुश करने के लिए इस दिन क्या करें और क्या न करें और जिस के पास कोई लवर नहीं होता तो उस दिन वह अपनेआप को सब से बड़ा लूजर, निठल्ला और बदसूरत समझने लगते हैं। ऐसे लोग अपनी खुन्नस अर्थात गुस्सा निकालने के लिए वैलेंटाइन डे के दिन विरोधी बजरंग दल वालों के साथ मिल कर उन सारे प्रेमियों को दौड़ादौड़ा कर मारते हैं जो अपना वैलेंटाइन डे झाड़ियों के पीछे या पेड़ों के नीचे मजे से मना रहे होते हैं.

सच बात तो यह है कि वैलेंटाइन डे के दिन उन सभी को टेंशन रहता है जो अपने प्रेमी के साथ वैलेंटाइन डे मनाना चाहते हैं और उन को भी टेंशन और दुख होता है, जिन के पास वैलेंटाइन डे मनाने के लिए प्रेमी ही नहीं होता.

एक सच यह भी है कि उन्हीं प्रेमी या प्रेमिका का वैलेंटाइन डे जो सब से अच्छा बनता है जिन के पास अपने प्रेमी को खुश करने की ताकत होती है, जिन के पास अपने पार्टनर को खुश करने के लिए पैसे होते हैं. उन सभी का वैलेंटाइन डे अच्छा और यादगार बन जाता है.

जैसाकि कहते हैं, जितना गुड़ उतना मीठा, वैसे ही आज के जमाने में जिस के पास जितने ज्यादा पैसे होते हैं वही प्यार का हर दिन ऐंजौय कर पाता है क्योंकि वैलेंटाइन डे ही एक ऐसा दिन होता है जिस में हर प्रेमी को अपना प्यार दिखाने का पूरा मौका मिलता है.

बहुत सालों पहले एक गाना आया था,’यार दिलदार तुझे कैसा चाहिए प्यार चाहिए कि पैसा चाहिए…’ आज के समय में जबकि सबकुछ पैसों पर निर्भर है यह गाना पूरी तरह फिट बैठता है। आज के समय में ज्यादातर लड़कियां यही सोचती हैं कि यार दिलदार तेरे जैसा चाहिए मगर प्यार के लिए भी पैसा चाहिए.

बहुत ही कम लोग हैं जो प्यार के सहारे अपने प्रेमी के साथ बिना किसी शर्त और कम पैसों के साथ जिंदगी गुजारने को तैयार हैं क्योंकि अगर पैसा नहीं है तो प्यार में दम भी नहीं है.

अगर प्रैक्टिकली देखा जाए तो हर कोई अपने स्टेटस के हिसाब से प्यार, मोहब्बत और शादी करता है. कोई अमीर लड़की किसी औटो रिकशा वाले या मोची, डिलीवरी बौय से शादी नहीं करेगी. या कोई अमीर लड़का सेट पर टचअप करने वाली मेकअप आर्टिस्ट या झोपड़पट्टी में रहने वाली किसी गरीब लड़की से शादी नहीं करेगा क्योंकि आज लोगों का मानना है कि सिर्फ प्यार से काम नहीं चलता अच्छी जिंदगी जीने के लिए पैसा भी चाहिए.

वैसे, ऐसा नहीं है कि आज प्यार पूरी तरह खत्म हो गया है और हरकोई सिर्फ पैसों के पीछे भाग रहा है बल्कि आज के समय में प्यार भले ही कम पैसे वाले लड़के या लड़की से कर ले, लेकिन शादी तभी करते हैं जब सामने वाला उन के स्टेटस का या थोड़ा कम ही सही उन के टक्कर का बन जाता है.

आज के समय में कोई भी प्यार के नाम पर जिंदगीभर गरीबी में नहीं जीना चाहता. लिहाजा, वह ऐसे ही इंसान से प्यार या शादी करता है जो भले ही दूसरी जाति धर्म का हो, भले ही उम्र में लंबा फासला हो, लेकिन पैसे से कम नहीं होना चाहिए.

अगर बौलीवुड की बात करें, तो यहां पर कई लोगों ने अपने से बड़ी उम्र के लड़के और लड़कियों से शादी की है. अलग धर्म में भी सब के खिलाफ जा कर शादी की है. लेकिन इन में से किसी ने भी पैसे से कमजोर इंसान से शादी नहीं की है। आज लोग यही सोचते हैं कि या तो वह सेम स्टेटस का हो या बहुत अमीर हो.

बौलीवुड के वे सितारे जिन्होंने उम्र में लंबा फर्क और अलग धर्म की जाति में प्रेम विवाह रचाया.कहते हैं, प्यार जब होता है तो आगे पीछे कुछ नहीं दिखाई देता, न जाति न धर्म और न ही बड़ी उम्र. इसीलिए कहा जाता है कि प्यार अंधा होता है. बौलीवुड में कई ऐसे जोड़े हैं जिन्होंने उम्र का लंबा फासला और धर्मजाति को ताक में रख कर प्रेमविवाह किया जिन में कुछ का लंबे समय तक प्यार और रिश्ता टिका रहा है या कुछ जोड़े कुछ सालों में ही अलग भी हो गए.

दिलीप कुमार और सायरा बानो में 22 साल का फर्क था. धर्मेंद्र और हेमा मालिनी में 13 साल का फर्क है. संजय दत्त और मान्यता में 19 साल का फर्क है.  करीना कपूर और सैफ अली   9 साल का फर्क है.

करीना कपूर तो बचपन में ही अपने पति सैफ अली खान की पहली शादी में भी गई थी, जो अमृता सिंह के साथ हुई थी. किरण राव और आमिर ने में 9 साल का फर्क रहा।

फराह खान और शिरीष कुंदर में 8 साल का फर्क है. कौमेडियन भारती सिंह और उन के पति हर्ष में 10 साल का फर्क है. ऐश्वर्या राय अभिषेक बच्चन से 3 साल बड़ी हैं, राजेश खन्ना डिंपल कपाड़िया से 17 साल बड़े थे. मौडल मिलिंद सोमन ने अपने से 25 साल छोटी लड़की अंकित कुंवर से, प्रियंका चोपड़ा निक जोनस से 10 साल बड़ी हैं.

उर्मिला मातोंडकर अपने पति मोहसिन अख्तर से 10 साल छोटी हैं जबकि रणबीर कपूर आलिया भट्ट में 12 साल का गैप है.

बौलीवुड के वे सितारे जिन्होंने दूसरे धर्म में शादी की

रितेश देशमुख ने क्रिश्चियन जाति की जेनेलिया डीसूजा से शादी की. उर्मिला मातोंडकर ने भी मुसलिम से शादी की, सोनाक्षी सिन्हा ने जहीर खान से शादी जो कि मुसलिम है, करीना कपूर ने सैफ अली खान से शादी की, प्रीति जिंटा ने पति जीन गुडयंक जो प्रीति जिंटा से 10 साल छोटे हैं, क्रिश्चियन जाति के हैं, आदित्य पंचोली ने अपने से 5 साल बड़ी और मुसलिम जाति की अभिनेत्री जरीना बहाव से शादी की.

कैटरीना कैफ ने विकी कौशल से शादी की जो न सिर्फ अलग धर्म की है, बल्कि विक्की से 5 साल बड़ी भी हैं. मनोज बाजपेयी ने मुसलिम धर्म की नेहा से शादी की। सुनील दत्त ने नरगिस से शादी की, तो दीया मिर्जा ने वैभव रेखी से शादी की जो हिंदू हैं.

इन सब बातों से यही निष्कर्ष निकलता है कि प्यार और शादी में अलग धर्म और बड़ी उम्र का होने से कोई फर्क नहीं पड़ता बस स्टेटस और जेब में भरपूर पैसा होना चाहिए। उस के बाद शादी भी टिकेगी और वैलेंटाइन डे भी हर साल अच्छा मनेगा.

Shefali Shah से लेकर माधुरी दीक्षित तक सभी को पसंद है सूटेड बूटेड लुक

Shefali Shah : बौलीवुड ऐक्ट्रैस हमेशा से फैशन के क्षेत्र में ट्रेंड सेंटर रही है, जिस में आजकल वे अधिकतर स्टाइल को फौलो करने लगी हैं, जो उन के कौन्फिडेंट, अथौरिटी और ग्लैमर को दिखाती हैं. आज सभी ऐक्ट्रैसेज ने बाकी ड्रैसेज के अलावा ट्रेंड में पोपुलर ब्लैजर्स को अपने वार्डरोब में शामिल किया है, जो उन के वर्सटाइल और स्टाइलिश लुक को उजागर करती हैं.

उन्होंने यह भी सिद्ध कर दिया है कि फौर्मल ब्लैजर्स के ईजी कट्स और खूबसूरती केवल कारपोरेट सैक्टर्स के लिए नहीं होती, बल्कि ऐलीगैंस का एक अल्टिमेट स्टेटमैंट होता है, जो उन्हे ऐंपावर भी करती है.

शेफाली शाह की रैड हौट ब्लैजर लुक

अभिनेत्री शेफाली शाह की रैड हौट ब्लैजर लुक सब की नजर में तब आई, जब वे दिल्ली ‘क्राइम सीजन 3’ की एक इवेंट पर गई हुई थीं. उन का ये स्टनिंग लुक, कौन्फिडेंट और ऐलीगेंस को दिखा रही थी, जिसे उन्होंने डायमंड स्टडेड रिंग और इयररिंग्स के साथ कंप्लीट किया हुआ था. साथ में स्लीक ब्लैक हील्स उन के स्ट्रैंथ, ग्लैमर और बोसी लुक की प्रतीक थी.

माधुरी दीक्षित की ऐफर्टलैस ऐलिगेंस डार्क ब्लू ब्लैजर लुक

माधुरी दीक्षित स्टाइल में कभी भी समझौता नहीं करतीं, फिर चाहे वह इंडियन हो या वैस्टर्न वियर उन की हर आउटफिट उन के ग्रैस और कौन्फिडैंस को बताती है.

माधुरी दीक्षित ने एक इंटरव्यू में कहा है कि फिटनैस को लाइफस्टाइल बना लेना चाहिए और किसी भी नई ऐक्सपेरिमैंट को फैशन में करने से मना नहीं करना चाहिए.

उन का डार्क ब्लू ब्लैजर लुक उन की चार्म को बढ़ाती है, जिस में उन के लूज पैंट्स के साथ ब्लैजर, कौन्टेंपरी लुक को बल देती है. उन का फैशन के साथ खुद के स्टाइल की बैलेंस अद्भुत होती है.

विद्या बालन का ब्लैजर लुक

वैसे तो अभिनेत्री विद्या बालन का साड़ी लुक इंडस्ट्री में काफी पौपुलर है, लेकिन इन दिनों उन्होंने भी ब्लैजर लुक को कई बार अपनाया है. उन का पहनावा चाहे वैस्टर्न हो या इंडियन, हमेशा ऐफर्टलैस और ग्रैसफुल होता है.

पिछले दिनों एक इवेंट में वे ब्लैक ऐंड व्हाइट चैक वाले ब्लैजर के साथ एक स्लीक इनरवियर में दिखीं. उन की ऐक्सेसरीज में गोल्डन हूप इयररिंग्स थे, जो उन की इस लुक को ग्लैमरस बना रही थी.

शिल्पा शेट्टी का ग्रे ब्लैजर लुक

फिटनैस आइकन दीवा अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी की बात करें तो वे फैशन के मामले में सब को चकित करती हैं. उन का चिक ग्रे ब्लैजर उन की खूबसूरती और स्मार्टनैस में चार चांद लगाती हैं.

ब्लैजर की लूज सलीव्स और हाई कौलर, उन की बोल्ड लुक सोफिस्टिकैटेड टच और हूप इयररिंग्स उन के स्टाइल स्टेटमैंट को बताती है. शिल्पा शेट्टी ने फैशन पर कहा है कि वे जो भी पहनना पसंद करती हैं, उस में वे स्टाइलिश लुक को देखती हैं. फिर चाहे वह पश्चिमी परिधान हो या पारंपरिक, उन्हे नई ड्रैसेज आकर्षित करती हैं.

काजोल का बोसी लैडी ब्लैजर लुक

बौलीवुड की काजोल का बोसी ब्लैजर लुक हमेशा से ही सब को इंप्रैस करता आया है, क्योंकि उन का फैशन सेंस सब के मन को भाता है. बौलीवुड की वे एकमात्र ऐसी ऐक्ट्रैस हैं, जिन्होंने कभी भी किसी ऐक्सपेरिमैंट से खुद को अलग नहीं किया. उन की लैटस्ट शार्प ब्लैजर लुक सब से अलग है.

काजोल का स्लीक ब्लैक ब्लैजर लुक उन्हें बोसी लेडी होने की ऐनर्जी देती है. इस लुक में उन्होंने
चिक ब्लैक बैग और कोबरा प्रिंट हील्स को शामिल किया है, जिस से उन का लुक और भी अधिक बोल्ड और ब्यूटीफुल हो गया है.

इस प्रकार फैशन कैसा भी हो, उसे कैरी करने आना चाहिए, ताकि पोशाक व्यक्ति पर जंचे। इस के लिए फिजिकल फिटनैस, स्मार्टनैस और चेहरे की ऐक्सप्रेशन का सही होना, जिस में स्माइल बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं.

Family First : मां को छोड़ कर अलग रहना क्या उचित होगा?

Family First :  अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल-

मैं 34 वर्षीय युवक हूं. मेरी विधवा मां ने काफी कष्ट सह कर मेरी और मेरी बहन की परवरिश की. बहन की शादी के बाद मैं ने शादी की. मेरे विवाह को 8 वर्ष हो चुके हैं और 2 बच्चे भी हैं. मेरी समस्या यह है कि मेरी मां और पत्नी में हर समय खटपट रहती है. दोनों को समझातेसमझाते मैं आजिज आ चुका हूं. मेरी मां हमारे लिए जितनी ममतामयी रही हैं बहू को ले कर उतनी ही खड़ूस हैं. उन की पढ़ाईलिखाई (उच्च शिक्षिता हैं) और बड़प्पन कहीं नहीं दिखता. दूसरी ओर पत्नी भी कमतर नहीं है. आजकल मां रातदिन एक ही रट लगाए है कि मैं उसे ले कर अलग हो जाऊं. मैं कोई निर्णय नहीं कर पा रहा. मां पूरी तरह से स्वस्थ और सक्षम हैं. अपनी देखभाल स्वयं कर सकती हैं पर फिर भी मां को छोड़ कर अलग रहना क्या उचित होगा? लोग क्या कहेंगे? बताएं, क्या करूं?

जवाब-

सासबहू के रिश्ते में मधुरता प्राय: कम ही देखने को मिलती है. इसलिए आप के घर में यदि आप की मां और पत्नी के बीच 36 का आंकड़ा है, तो कोई अनहोनी बात नहीं है. आप के भरसक प्रयास के बावजूद यदि दोनों में तालमेल नहीं बैठ रहा तो रोजरोज की कलह से नजात पाने के लिए आप मां से अलग हो जाएं. अपने लिए घर थोड़े फासले पर ले लें. दूर रहने पर अमूमन रिश्तों में मिठास लौट आती है. दूर रह कर भी आप बीचबीच में आ कर और दिन में 1-2 बार फोन कर के उन का हालचाल पूछ सकते हैं. जहां तक लोगों की बात है तो लोग तभी तक बोलते हैं जब तक हम उन की परवाह करते हैं. अत: उन की बातों पर कान न दें.

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या हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- sampadak@delhipress.biz सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Halwa Recipe : नाश्ते में बनाए ब्रेड का हलवा, ये रही रेसिपी

Halwa Recipe : आज आपको ब्रेड का हलवा बनाने की बेहद आसान रेसिपी बताते है जो खाने में बहुत टेस्टी है. आपको जब भी झटपट नाश्ता बनाना हो, तो आप ब्रेड का हलवा बना सकती हैं. तो फिर देर किस बात की, आइए रेसिपी बताते है.

 सामग्री :

– घी ( 02 बड़े चम्मच)

– किशमिश ( 15-20)

– काजू (10-12 बारीक कतरे हुए)

– बादाम (07-08 बारीक कतरे हुए)

— ब्रेड ( 08 पीस)

– दूध (400 मिलीलीटर)

– शक्कर ( 200 ग्राम)

ब्रेड का हलवा बनाने की रेसिपी:

– सबसे पहले एक बरतन में दूध गर्म करें.

– जब तक दूध गर्म हो रहा है, ब्रेड के छोटे-छोटे टुकड़े कर लें.

– इसी के साथ काजू के भी छोटे-छोटे टुकड़े कर लें.

– जब दूध हल्का गर्म हो जाए, गैस की आंच एकदम धीमी कर दें, जिससे दूध गर्म होता रहे.

– अब एक नौन स्टिक कड़ाही में घी गर्म करें. जब घी गर्म हो जाए, तो उसमें ब्रेड के टुकड़े डाल दें और   चलाते हुए भूनें.

– जब ब्रेड के टुकड़े हलके भूरे और खस्ता हो जाएं, उसमें किशमिश और काजू के टुकड़े डाल दें.

Stories : एक मां का पत्र

Stories : ‘‘प्रियविभोर, ‘‘शुभाशीष,

‘‘जब तुम्हें मेरा यह पत्र मिलेगा तो तुम्हें हैरानी अवश्य होगी कि मुझे अचानक क्या हो गया जो मैं ने तुम्हे यह पत्र भेजा है, जबकि रोज ही तो हम दोनों की बात फोन पर होती और समय मिलने पर तुम वैबकैम पर भी मुझ से बात कर लेते हो. फिर ई मेल और व्हाट्सऐप के इस जमाने में पत्र लिखता ही कौन है. चैट करना आसान है. इसलिए तुम्हारे चेहरे पर आए आश्चर्य के भावों को बिना देखे भी मैं महसूस कर पा रही हूं. ‘‘तुम्हें होस्टल गए अभी मात्र 2 महीने ही हुए हैं. इस से पहले 19 साल तक तुम मेरे पास थे. लेकिन मुझे यह लगता है कि आज जो मैं तुम से कहना चाहती हूं उसे कहने का यही उपयुक्त समय है, जब तुम मुझ से और परिवार से दूर रहे हो. जब तुम पास थे तब शायद इन बातों को तुम सही तरीके से समझ भी नहीं पाते. हर बात समय पर ही समझ आती है, हालांकि बचपन से ही मैं ने तुम्हें अच्छे संस्कार देने की कोशिश की है और मैं जानती भी हूं कि तुम उन संस्कारों का मान भी करते हो.

‘‘मेरे बेटे मुझे लगता है कि समाज इस समय जिस दौर से गुजर रहा है और आधुनिकीकरण की एक अलग ही तरह की परिभाषा गढ़ जिस तरह से आज की पीढ़ी ऐक्सपैरिमैंट करने के चक्कर में अपने संस्कारों को धूल चटा रही है, ऐसे में तुम्हें सही दिशा दिखाना मेरा कर्तव्य है. ‘‘होस्टल का माहौल घर जैसा नहीं होता और फिर वहां तुम्हारे नएनए दोस्त भी बन गए होंगे. उस के अपने आदर्श होंगे, सोच होगी, जिन के साथ हो सकता है तुम तालमेल न बैठा पाओ और सही मार्गदर्शन के अभाव में अपने लक्ष्य से भटक जाओ. भिन्न परिवेश से आए और बच्चों के जीवन जीने के पैमाने तुम से अलग हो सकते हैं.

‘‘हो सकता है तुम्हें उन की सोच पसंद न आए, हो सकता है उन्हें तुम्हारे विचार दकियानूसी लगें या वे तुम्हारी परवरिश का मजाक उड़ाएं. इस तरह का माहौल जब होता है तो भटक जाने की संभावना ज्यादा होती है. ‘‘यह तुम्हारा अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने और उस के बाद कैरियर पर फोकस करने का वक्त है. बस इसीलिए तुम से कुछ कहना चाहती हूं. तुम्हें मेरी बातें अजीब लग सकती हैं पर एक मां होने के नाते मैं उन बातों को अनदेखा नहीं कर सकती हूं.

‘‘मैं तुम्हें समझाना चाहती हूं कि क्यों जरूरी है हर लड़की का सम्मान करना. उसे उस के शरीर के परे जा कर देखना. बुरी संगत में पड़ कर कोई ऐसी हरकत मत करना जिस से तुम खुद से नजरें न मिला सको. हां, मैं रेप जैसी वहशीपन की बात कर रही हूं. कुछ पल का मजा लेने के लिए एक लड़की की पूरी जिंदगी बरबाद करना. उस के परिवार को दुख और अपमान में जीने को विवश कर देना कैसा सुख है? ‘‘जब किसी लड़की के साथ बलात्कार होता है तो एक पूरा परिवार, एक पूरी पीढ़ी उस के दंश का शिकार होती है. कभीकभी तो उम्र निकल जाती है उस पीड़ा से बाहर आने में. फिर भी उस लड़की के जीवन में पहले जैसा कुछ भी सामान्य नहीं हो पाता है.

‘‘विडंबना तो यह है कि जो पुरुष एक पिता, एक भाई, एक बेटा और पति होता है वह अपने जीवन में आने वाली हर औरत की रक्षा करने की कोशिश करता है, उस के प्रति प्रोटैक्टिव रहता है तो फिर किसी अन्य औरत के साथ वह कैसे रेप करने की हिम्मत जुटा पाता है? क्या तुम अपनी बहन व दूसरे किसी की बहन में इस तरह का भेदभाव कर पाओगे? ‘‘बचपन में जब तुम देखते थे कि कोई तुम्हारी छोटी बहन को तंग कर रहा है तो कितना गुस्सा आता था तुम्हें. एक बार किसी लड़के ने खेलखेल में उस की चोटी खींच दी थी तो तुम आगबबूला हो गए थे कि आखिर उस की हिम्मत कैसे हुई ऐसा करने की? जब तुम किसी लड़की के साथ बुरा व्यवहार होते देखो या कभी तुम्हीं कुछ करना चाहो तो याद रखना वह भी किसी की बहन है और तब तुम खुद ही रुक जाओगे.

‘‘बेटा, रेप जैसा घिनौना कृत्य केवल औरतों से ही नहीं जुड़ा है, यह केवल उन की ही समस्या नहीं है, क्योंकि इस में 2 पक्ष शामिल होते हैं-एक दोषी और दूसरा पीडि़ता. मुझे यकीन है तुम्हें दिल्ली में हुए निर्भया गैंग रेप की बात याद होगी. जिस तरह की क्रूरता और वहशीपन देखने को मिला था उसे भूल पाना किसी के लिए संभव ही नहीं है. तब एक आश्चर्यजनक बात हुई थी. पूरा देश उस के विरोध में खड़ा हो गया था और विरोध करने वालों में पुरुष भी थे. तब कितने सवाल मन को झिंझोड़ गए थे कि आखिर ऐसा वहशीपन कहां से जन्म लेता है? ‘‘मानती हूं कि कामवासना ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है. औरत को मात्र भोग की वस्तु मानने से जन्म लेती है, उस पर पुरुष का अपना एकाधिकार मानने से जन्म लेती है. पुरुष जब उस के शरीर को रौंदता है तो वह उस की घृणा का पर्याय होता है तो यह घृणा आती कहां से है. जबकि हर पुरुष का जन्म एक औरत से ही होता है, वही उस का पालन करती है और उस के सुखदुख के पलों की साक्षी व बांटने वाली भी होती है.

‘‘जब सही समय आएगा तब तुम औरतपुरुष के सही संबंधों को खुद ही महसूस कर लोगे. सैक्स शब्द से तुम अपरिचित नहीं होगे बेटे, लेकिन इस खूबसूरत संबंध का रेप जैसे घिनौनेपन का सहारा लेना क्या तुम सही मान सकते हो…नहीं न…इसीलिए अगर अपने आसपास कभी ऐसा होते देखो तो बिना एक भी पल गंवाए उस का विरोध करना. ‘‘हमारे नेता, हमारे बुद्धिजीवी, हमारे समाज के तथाकथित सुधारक यह मानते हैं कि रेप के लिए खुद औरत ही जिम्मेदार होती है, क्योंकि वह देह दिखाने वाले कपड़े पहनती है, वह रात को देर तक बाहर रहती है, वह पुरुषों से दोस्ती करती है, जिस की वजह से बेचारे पुरुष बहक जाते हैं और उन से रेप हो जाता है.

‘‘औरत जिस तरह के कपड़े चाहे पहन कर आजादी से घूम सके, अपना मनचाहा कर सके, खुशी से जी सके और उन्मुक्त हो सांस ले सके. आखिर क्यों नहीं वह ताजा हवा को अपने भीतर उतरने दे सकती. सिर्फ इसलिए कि वह एक औरत है, क्योंकि उस की देह के कुछ हिस्से पुरुषों को आकर्षित करते हैं… ‘‘जब किसी लड़की के साथ बलात्कार होता है तो उस के ही चरित्र पर सवाल खड़ा कर उसे कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है. मानसिक व शारीरिक रूप से टूटी लड़की को ही इस के लिए दोषी माना जाता है और रेपिस्ट या तो कुछ दिनों में जेल से छूट जाता है या फिर उस का जुर्म साबित ही नहीं हो पाता है. त्रासदी तो यह है कि खुला घूमता वह रेपिस्ट फिर किसी मासूम को अपनी हवस का शिकार बनाता है.

‘‘लड़की अपनी इज्जत बचाने की खातिर चुप रहती है, वह अगर इस के खिलाफ शिकायत करती है तो अदालत में तरहतरह से उसे प्रताडि़त किया जाता है मानो एक बार बलात्कार हो गया तो अब किसी के साथ कभी भी संबंध बना लेने में हरज ही क्या है. उस से पूछा जाता है कहांकहां बलात्कारी ने तुम्हें छूआ था? क्या उस वक्त तुम्हें भी मजा आया था? तुम्हारी बिना मरजी के कोई तुम्हें हाथ नहीं लगा सकता. इस का मतलब है तुम ने ऐसा होने की छूट दी होगी… ‘‘मैं चाहती हूं कि तुम औरतों का सम्मान करो. उन्हें देखते समय उन के शरीर के उभारों पर नजर डालने के बजाय उन की योग्यता की प्रशंसा करो…अपनी मां से यह सब सुनना तुम्हें अजीब लग रहा होगा. सकुचाहट भी हो रही होगी.

‘‘प्रकृति ने स्त्री को भावुक, संवेदनशील, सहिष्णु व कोमल बनाया है और यही उस की सुंदरता व आकर्षण है और उस के इसी गुण को पुरुष अपने शारीरिक बल के आधार पर उस को स्त्री की कमजोरी समझ कर, अपने अहंकार व दंभ से उसे दबाना अपनी बहादुरी समझ बैठता है. ‘‘बलात्कार का सब से दुखद पहलू यह है कि पीडि़ता को शारीरिक और मानसिक कष्ट ही नहीं सामाजिक लांछन भी सहना पड़ता है. यह भयानक प्रताड़ना है. इसलिए मजबूरी में अकसर यह चुपचाप सह लिया जाता है. इस के लिए बदलाव मात्र कानूनों में ही नहीं सामाजिक मान्यताओं में भी लाना जरूरी है और आज की पीढ़ी को ही इस बदलाव को लाना होगा. यानी तुम भी उस बदलाव का एक हिस्सा बनोगे…

‘‘जब भी इस तरह की घटना देखो तो तुम्हारे अंदर रोष पैदा होना चाहिए. जिस समाज में रोष नहीं होता उस के लोग भुगतते रहते हैं, खासकर औरत… ‘‘आज मैं तुम से अपना एक सीक्रेट शेयर करना चाहती हूं. जानती हूं किसी भी मां के लिए अपने बेटे के सामने ऐसा राज रखना कितना अपमानजनक व पीड़ादायक हो सकता है. पर आज मुझे लगता है कि तुम्हारे साथ इसे बांटना जरूरी है. हो सकता है तुम यह जानने के बाद आक्रोश से भर जाओ या तुम इसे बरदाश्त न कर पाओ. वहां तुम्हें संभालने के लिए मैं नहीं हूं, पर मुझे विश्वास है कि तुम इतने लायक तो हो कि खुद को संभालोगे और इस बात को समझोगे भी. मुझे इस बात का भी डर है कि कहीं यह जानने के बाद मेरे प्रति तुम्हारे व्यवहार में अंतर न आ जाए. पर बेटा ये सब जानने के बाद कोई गलत कदम मत उठाना… संयम से काम लेना.

‘‘बेटा, जब मैं कालेज में पढ़ती थी तो एक लड़का मुझे चाहने लगा था. यह एकतरफा प्यार था. मैं ने उसे खूब समझाया कि मैं उसे पसंद नहीं करती और वह मुझ से दूर रहे. पर शायद उस का मेरे प्रति वह प्यार एक जनून बन गया था. उस ने मुझ से कहा कि वह मेरी हां सुनने के लिए इंतजार करेगा. पर उस ने मेरा पीछा करना नहीं छोड़ा. मैं उसे देख रास्ता बदल लेती. मेरी तरफ से कोई पौजीटिव रिस्पौंस न पा वह आगबबूला हो गया और एक दिन जब मैं कालेज जा रही थी तो उस ने जबरदस्ती मुझे अपने स्कूटर पर बैठा लिया. ‘‘वह मुझे अपने किसी दोस्त के घर ले गया. मैं ने उस से बहुत अनुनयविनय की कि वह मुझे छोड़ दे पर वह नहीं माना बस एक ही बात कहता रहा कि अगर तुम मेरी नहीं हो सकती तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं होने दूंगा. मेरा विरोध बढ़ता देख उस ने मुझे मारना शुरू कर दिया. फिर मेरी अर्धबेहोशी की हालत में मेरा रेप किया.

‘‘तभी उस का दोस्त वहां आ गया. यह देख उस ने उसे बहुत मारा. उसे पता नहीं था कि यह दुष्कर्म करने के लिए उस ने उस के घर की चाबी ली थी. वह स्वयं को दोषी मान रहा था. मुझे उसी ने घर छोड़ा, जानते हो वह दोस्त कौन था…तुम्हारे पापा…हां बाद में उन्होंने ही मुझ से शादी की…पर उस दिन के बाद से आजतक कभी उस हादसे का जिक्र तक नहीं किया. ‘‘यह समझ लो मैं ने पत्र में जो भी कुछ तुम्हें कहना चाहा है, वह मेरा ही भोगा हुआ सच और पीड़ा है…

‘‘आशा है तुम्हें मेरी बातें समझ आ गई होंगी और एकदम साफसुथरी व सुलझी हुई दृष्टि के साथ तुम अब संबंधों को समझ पाओगे और लड़कियों का सम्मान भी करोगे. और यह भी आशा करती हूं कि मेरे प्रति तुम्हारे व्यवहार में कोई अंतर नहीं आएगा. ‘‘ढेर सारा प्यार

‘‘तुम्हारी मां.’’

Hindi Satire : जिओ जमाई राजा

Hindi Satire : सुबह साढ़े 4 बजे जब उन की सास नित्य स्नानध्यान के लिए ऊपर के बेडरूम से नीचे आने के लिए निकलीं तो पुलिस की तरह ऐन मौके पर बिजली चली गई. अंधेरे में जीने पर पड़े केले के छिलकों पर उन का पैर पड़ गया. उन की चीख के साथ ही पूरा घर जाग पड़ा और आनन- फानन में उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया. चोट तो ज्यादा नहीं आई थी लेकिन बेचारी का दिल शायद कमजोर था इसलिए फेल हो गया. खैर, यह तो होनी थी, होनी को कौन टाल सकता है. लेकिन इसी बीच एक अनहोनी हो गई.

उसी रात ठाकुर अभयप्रताप के घर में एक चोर घुस आया. गेट पर खड़ा गार्ड शायद लघुशंका के लिए कोने में गया था, तभी मौका पा कर वह चोर गेट खोल कर धीरे से अंदर सरक आया. फिर बगीचे की झाडि़यों के पीछे छिपताछिपाता रसोई के पिछवाड़े पहुंच कर खिड़की की ग्रिल निकाल कर अंदर दाखिल हो गया.

नीचे के सारे कमरों का चोर ने जायजा लिया, सब खाली थे. दूर बरामदे में एक नौकर खर्राटे भर रहा था. चोर ने एकएक कर के सारा कीमती सामान उठाया और बड़ी सी गठरी बना कर रख ली.

अभी ड्राइंगरूम का काफी कीमती सामान बाकी था. वह दूसरी गठरी बनाने की फिराक में था कि तभी सामने सीढि़यों पर होती आहट से उस के कान खड़े हो गए. वह फौरन ड्राइंगरूम में लगे मोटे परदे के पीछे छिप गया. नाइट बल्ब की धुंधली रोशनी में उस ने देखा कि कोई भारी- भरकम कदकाठी का व्यक्ति जीने पर कुछ दूर तक आया फिर झुकझुक कर कुछ इधरउधर रखा और वापस ऊपर लौट गया.

कुछ देर तो चोर की सांस अटकी रही. लेकिन दोबारा जब कोई आहट नहीं हुई तो वह परदे से बाहर निकल कर अपनी दूसरी गठरी तैयार करने लगा. तभी अचानक किसी महिला की भयंकर चीत्कार से पूरा घर जाग गया. बाहर गेट पर खड़ा गार्ड अपनी बंदूक ले कर अंदर की तरफ दौड़ा. जल्दीजल्दी में 1-2 हवाई फायर भी कर दिए. जरूर किसी चोर ने घर की किसी महिला का गला रेत डाला है…आवाज ही ऐसी चिंचियाती हुई थी. लेकिन अंदर जा कर उसे पता चला कि मेम साहब की माताजी सीढि़यों से नीचे आ टपकी हैं.

उधर चोर ने मामला नाजुक देखा तो दूसरी गठरी बनाना छोड़ पहली गठरी ले कर खिड़की फांद गया. गेट पर गार्ड भी नहीं था, सो आराम से गेट से बाहर आ गया. लेकिन फायर की आवाज सुन सड़क पर गश्त लगा रहे 2 पुलिस वालों ने उसे थोड़ी दूर पर धर दबोचा.

ठाकुर साहब के घर पर अब मातमपुर्सी का दौर शुरू हो गया था. पुलिस महकमे के इतने आला अधिकारी की सास की मौत हुई थी. ठाकुर साहब भी एक हफ्ते की छुट्टी ले कर घर बैठ गए. साहब और मेम साहब दोनों सुबह नहाधो कर सफेद वस्त्र धारण कर, एक दर्जन सफेद रूमाल ले कर सोफे पर पसर जाते. आतेजाते लोगों के सामने मेम साहब वही रटीरटाई बातें दोहरातीं, आंसू गिरातीं, नाक साफ करतीं. उन का साथ देने के लिए ठाकुर साहब भी रूमाल नाक पर रख कर बीचबीच में सुनसुन करते रहते. बारीबारी से पुलिस वाले आते और ठाकुर साहब की दुखती रग पर हाथ रखते.

पिछले 5 सालों से मेम साहब की मां ने लगभग पूरे घर का चार्ज अपने मजबूत हाथों में ले लिया था. उन के अनुसार उन की अनुभवहीन नासमझ बेटी और ईमानदार पुलिस आफिसर उन के दामाद गृहस्थी चलाने योग्य नहीं थे. लिहाजा, अपनी बेटीदामाद की गृहस्थी को दमदार बनाने की गरज से उन्होंने पिछले 5 सालों से सब की नाक में दम कर रखा था. कहावत है कि मरे पूत की बड़ीबड़ी अंखियां. फिर ये तो साहब की सास की मातमपुर्सी की रस्म थी.

दारोगा चरनदास अपनी टेढ़ी नाक सहलाते हुए नकिया रहा था, ‘‘बड़ी ही नेकदिल थीं अम्मांजी. मजाल है कभी किसी के साथ ऊंचा बोली भी हों. मुझे तो सच, कभी अपनी मां से भी इतना प्यार नहीं मिला जितना अम्मांजी से मिला था.’’

पिछले साल चरनदास का हाथ थोड़ा तंग था, इसलिए दीवाली पर सोने की गिन्नी की जगह वह मेवों के डब्बे के साथ चांदी की गिन्नी ले कर अम्मांजी की खिदमत में उपस्थित हुआ था. बस, अम्मांजी ने आव देखा न ताव, गिन्नी समेत मेवे का डब्बा खींच कर उस के मुंह पर मार दिया. नाक से खून बह निकला. साल भर होने को आया लेकिन अब भी जब पुरवा हवा चलती है तो चरनदास की नाक की हड्डी में दर्द होने लगता है.

इंस्पेक्टर इसरार खान अपनी खिजाब लगी दाढ़ी खुजलाते हुए लखनवी अंदाज व अदब के साथ अम्मांजी की मातमपुर्सी कर रहे थे, ‘‘खुदा जन्नत बख्शे मरहूम को. क्या नायाब मोहतरमा थीं जनाब, अल्ला को भी न जाने क्या सूझी कि ऐसी पाकीजा और शीरीं जबान खातून को हम से छीन लिया.’’

पिछले 5 सालों से आमों की फसल पर मलीहाबादी दशहरी आमों की पेटियों का नजराना पेश करने की जिम्मेदारी खान साहब पर ही थी. अम्मांजी एकएक पेटी गिन कर अंदर रखवातीं. 2 साल पहले जब कीड़े के प्रकोप से मलीहाबादी आमों की पूरी फसल ही चौपट हो गई थी तब बेचारे खान साहब कहां से आम लाते. फिर भी बाजार से ऊंचे दामों में 2 पेटियां खरीद कर अम्मांजी की खिदमत में पेश कीं.

‘‘पूरे सीजन में सिर्फ 2 पेटियां?’’ यह कहते हुए अम्मांजी आगबबूला हो उठीं और फिर तो अपनी निमकौड़ी जैसी जबान से ऐसीऐसी परंपरागत तामसिक गालियों की बौछार की कि बेचारे खान साहब की रूह फना हो गई. लोग खामखाह पुलिस मकहमे को गालियों की टकसाल कहा करते हैं.

धीरेधीरे एक हफ्ता बीत गया. जख्म भरने लगा और ठाकुर अभयप्रताप भी आफिस जाने लगे. इस बीच उन्हें यह खबर लग चुकी थी कि उन के चोरी हुए सामान समेत चोर पकड़ा जा चुका है. सामान की शिनाख्त भी उन के मातहत कर्मचारियों ने कर ली थी. तकरीबन सारा सामान उन्हीं मातहतों के खूनपसीने की कमाई का ही तो था जिन्हें उन्होंने तोहफों की शक्ल में अम्मांजी को भेंट किया था. चोर के साथ पुलिस वाले बेहद सख्ती से पेश आए थे.

ठाकुर अभयप्रताप के सामने भी चोर की पेशी हुई. आखिर वह पुलिस के आला अफसर थे, वह भी देखना चाह रहे थे कि किस बंदे में इतनी हिम्मत थी जिस ने उन के घर में सेंध लगाई. बेडि़यों में जकड़ कर चोर को हाजिर किया गया. साहब की ओर देखते ही चोर चौंका. इन्हें तो पहले भी कहीं देखा है. कहां देखा है? वह याद कर ही रहा था कि सिपाही रामभरोसे ने एक जोरदार डंडा यह कहते हुए उस की पीठ पर जमा दिया, ‘‘ऐसे भकुआ बना क्या देख रहा है बे. यही वह साहब हैं जिन के घर घुसने की तू ने हिम्मत की थी. अब देख, साहब ही तेरी खाल में भूसा भरेंगे.’’

बेचारा चोर मार खाए कुत्ते जैसा कुंकुआने लगा. तभी उस के दिमाग में एक बिजली कौंधी. वह ठाकुर अभयप्रताप के सामने बैठ कर गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘मुझे बचा लीजिए माई बाप, मैं तो मामूली उठाईगीर हूं. मैं ने चोरी जरूर की है माई बाप, पर आप का सब सामान तो मिल गया है हुजूर. थोड़ी सजा दे कर मुझे छोड़ दीजिए साहब.’’

‘‘अबे, तेरी तो ऐसी की तैसी,’’ और सिपाही रामभरोसे ने दूसरा डंडा ठोंका, ‘‘सवाल तेरी चोरी का नहीं है ससुरे, सवाल है तू ने हमारे साहब के घर घुसने की हिम्मत कैसे की?’’

बेचारा चोर फिर कुंकुआने लगा और तेजी से ठाकुर का पैर पकड़ कर बोला, ‘‘साहब, उस रात जब मैं आप के घर घुसा था तब आप ही थे न जो रात में जीने के ऊपर केले के छिलके बिछा रहे थे?’’

‘‘अयं, यह क्या आंयबांय बक रहा है बे. एक ही हफ्ते की मार से दिमाग फेल हो गया है क्या तेरा,’’ सिपाही रामभरोसे ने जूता उस के सिर पर जोर से ठोंका.

लेकिन अभयप्रताप सिंह का सिंहासन तो डोल गया था. फौरन सिपाही रामभरोसे को यह कहते हुए बाहर भेज दिया कि मुझे इस चोर से अकेले में कुछ बात करनी है.

फिर तो चोर ने पूरा खुलासा किया, ‘‘साहब, उस रात जीने पर जब साहब आप 3 जगह झुक कर केले के छिलके रख रहे थे तो यह खुशकिस्मत इनसान वहीं परदे के पीछे छिपा था. बाद में हवालात में ही मुझे पता चला कि साहब की सास की मौत केले के छिलके पर फिसल कर हुई थी.’’

अब क्या था. पासा पलट चुका था. साहब ने आननफानन में आदेश दे दिया कि चोरी का सामान तो मिल ही चुका है, फिर बेचारे गरीब चोर को क्यों सजा हो. पूरा का पूरा महकमा इस अजीब फैसले से सकते में आ गया. लेकिन जब साहब ने खुद ही उस का गुनाह माफ कर दिया तो फिर केस ही नहीं बनता न.

वह दिन और आज का दिन. महीने की पहली तारीख को वह चोर अपनी मूंछ पर ताव देता हुआ  ठाकुर अभयप्रताप के घर के दरवाजे के सामने खड़ा उन का इंतजार करता है. उस के हाथ में 2-4 केले रहते हैं. इंतजार करतेकरते वह पट्ठा सामने की पुलिया पर बैठ कर केले खाता जाता है और उस के छिलके पास में जमा करता जाता है. जैसे ही साहब बाहर निकलते हैं वह एक हाथ में केले का छिलका हिलाते हुए दूसरे हाथ से उन्हें सलाम ठोंकता है.

ठाकुर अभयप्रताप इधरउधर नजर दौड़ा कर धीरे से उस के पास जाते हैं और जेब से कुछ रुपए निकाल उस के हाथ पर रख कर झट से गाड़ी में बैठ जाते हैं. गेट पर खड़ा गार्ड और ड्राइवर सब उस चोर की हिमाकत और ठाकुर साहब की दरियादिली देख कर सिर खुजलाते रह जाते हैं.

Hindi Story : स्वयंसिद्धा – दादी ने कैसे चुनी नई राह?

Hindi Story : रात 1 बजे नीलू के फोन की घंटी घनघना उठी. दिल अनजान आशंकाओं से घिर गया. बेटा विदेश में है. बेटी पुणे के एक होस्टल में रहती है. किस का फोन होगा, मैं सोच ही रही थी कि पति ने तेज कदमों से जा कर फोन उठा लिया. पापा का देहरादून से फोन था, मेरी दादी नहीं रही थीं. यह सुनते ही मैं रो पड़ी. इन्होंने मुझे चुप कराते हुए कहा, ‘‘देखो मधु, दादी अपनी उम्र के 84 साल जी चुकी थीं, आखिर एक न एक दिन तो यह होना ही था. तुम जानती ही हो कि जन्म और मृत्यु जीवन के 2 अकाट्य सत्य हैं.’’ उन्होंने मुझे पानी पिला कर कुछ देर सोने की हिदायत दी और कहा, ‘‘सवेरे 4 बजे निकलना होगा, तभी अंतिमयात्रा में शामिल हो पाएंगे.’’ मैं लेट गई पर मेरी अश्रुपूरित आंखों के सामने अतीत के पन्ने उलटने लगे…

मेरी दादी शांति 16 वर्ष की आयु में ही विधवा हो गई थीं. 2 महीने का बेटा गोद में दे कर उन का सुहाग घुड़सवारी करते समय अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो कर इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो गया. वैधव्य की काली घटाओं ने उन की खुशियों के सूरज को पूर्णतया ढक दिया. गोद में कुलदीपक होने के बावजूद उन पर मनहूस का लेबल लगा उन्हें ससुरालनिकाला दे दिया गया.

ससुराल से निर्वासित हो कर दादी ने मायके का दरवाजा खटखटाया. मायके के दरवाजे तो उन के लिए खुल गए पर सासससुर की लाचारी का फायदा उठा कर उन की भाभी ने उन्हें एक अवैतनिक नौकरानी से ज्यादा का दर्जा न दिया. मायके में दिनरात सेवा कर उन्होंने अपने बेटे के 10 साल के होते ही मायके को भी अलविदा कह दिया.

देहरादून में बरसों पहले ब्याही बचपन की सहेली का पता उन के पास था. बस, सहेली के आसरे ही वे देहरादून आ पहुंचीं. सहेली तो मिली ही, साथ ही वहां एक कमरे का आश्रय भी मिल गया. सहेली और उस के पति दोनों उदार व दयालु थे. उन्होंने उन के बेटे यानी हमारे पापा का दाखिला भी एक नजदीकी स्कूल में करवा दिया.

दादी स्वेटर बुनने और क्रोशिए व धागे से विभिन्न तरह की चीजें बनाने में सिद्धहस्त थीं. स्वेटर पर ऐसे सुंदर नमूने डालतीं कि राह चलने वाला एक बार तो गौर से अवश्य देखता. उन के बुने स्वेटरों और क्रोशिए के काम की धूम पूरे महल्ले में फैल गई. देखते ही देखते उन्हें खूब काम मिलने लगा. दिनरात मेहनत कर के वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गईं. उन्होंने सहेली को तहेदिल से धन्यवाद दिया और उसी के घर के पास 2 कमरों का मकान ले कर रहने लगीं, पर सहेली का उपकार कभी नहीं भूलीं. पापा भी 16-17 वर्ष के हो चुके थे. उन्हें भी किसी जानकार की दुकान पर काम सीखने भेजने लगीं. पापा होनहार थे, बड़ी मेहनत और लगन से वे काम सीखने लगे. मायका छोड़ते समय भाभी की नजर से बचा उन की मां ने एक गहने की छोटी सी पोटली उन्हें थमा दी थी. उन्होंने उसे लेने से स्पष्ट इनकार कर दिया था पर उन की मां ने अपनी कसम दे दी थी. अपनी मां की बेबसी और डबडबाई आंखें देख उन्हें वह पोटली लेनी पड़ी. दादी अपनी मां की निशानी बड़ी जतन से संभाल कर रखती आई थीं. कठिनतम परिस्थितियों में भी कभी उसे नहीं छुआ पर आज अपने होनहार बेटे का कारोबार जमाने की खातिर उस निशानी का भी मोलभाव कर दिया.

आज मैं स्वयं को और इस नई पीढ़ी को देखती हूं तो चारों और असहिष्णुता व आक्रोश फैला देखती हूं. छोटीछोटी बातों में गुस्सा, तुनकमिजाजी देखने को मिलती है. सारी सुखसुविधाएं होते हुए भी असंतुष्टता दिखाई देती है, पर दादी के जीवन में तो 16 वर्ष के बाद ही पतझड़ ने स्थायी डेरा जमा लिया था. जीवन में कदमकदम पर अपमान, अभाव व धोखे खाए थे पर इन सब ने उन में गजब की सहनशीलता भर दी थी. हम ने कभी घर में उन्हें गुस्सा करते, चिल्लाते नहीं देखा. अपनी मौन मुसकान से ही वे सब के दिलों पर राज करती थीं. मम्मीपापा को उन से कोई शिकायत न थी. वे उन को मां बन कर सीख भी देतीं और दोस्त बना कर हंसीमजाक भी करतीं.

दादीजी के बारे में सोचतेसोचते कब सवेरा हो गया, पता ही नहीं चला. पति टैक्सी वाले को फोन करने लगे. मैं ने जल्दी से 2 कप चाय बना ली. हम चल दिए दादी की अंतिमयात्रा में शामिल होने. टैक्सी में बैठते ही मैं ने आंखें मूंद लीं. दादी की यादों के चलचित्र की अगली रील चलने लगी…

दादी स्वयं पुराने जमाने की थीं लेकिन पासपड़ोस और महल्ले की औरतों की आजादी के लिए उन्होंने ही शंखनाद किया. ससुराल में घूंघट से त्रस्त कई महिलाओं को उन्होंने घूंघट से आजादी दिलवाई. घरों के बड़ेबुजुर्गों को समझाया कि सिर पर ओढ़नी, आंखों और दिल में बुजुर्गों के लिए आदरसेवा यही सबकुछ है. हाथभर का घूंघट निकाल कर बड़ेबूढ़ों का अपमान करना, उन की मजबूरी और लाचारी

में उन्हें कोसना गलत है. घूंघटों से बेजार महिलाओं को जीवन में बड़ी राहत मिल गई थी. दादी की बातें लोगों के दिलोजेहन में ऐसे उतरतीं जैसे धूप व प्यास से खुश्क गलों में मीठा शरबत उतरता.

दादी स्वयं पढ़ीलिखी न थीं. पर उन्होंने मम्मी के बीए की अधूरी पढ़ाई को पूरा करवाने का बीड़ा उठाया. घरपरिवार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले कर मम्मी को कालेज भेजा. मुख्य विषय संगीत था, इसलिए हारमोनियम मंगवाया. शाम के समय मां सुर लगातीं तो दादी मंत्रमुग्ध हो कर आंखें बंद कर बैठ जातीं और 2-3 गाने सुने बिना न उठती थीं. हमारे भाई का जन्मदिन भी वे बड़े निराले तरीके से मनवातीं. न तो पार्टी न डांस, बस, मां का बनाया मिल्ककेक काटा जाता. दोपहर को बड़ेबड़े कड़ाहों और पतीलों में जाएकेदार कढ़ीचावल और शुद्ध देशी घी में हलवा बनवाया जाता. विशेष मेहमान होते अनाथाश्रम के प्यारेप्यारे बच्चे जो अपने आश्रय का सुरीला बैंड बजाते हुए पंक्तिबद्ध हो कर आते और बड़े ही चाव से कढ़ीचावल व हलवे के भोजन से तृप्त होते थे.

साथ ही, रिटर्नगिफ्ट के रूप में एकएक जोड़ी कपड़े ले कर जाते थे. उस के बाद होता था महल्ले के सभी लोगों का महाभोज. एक बड़े से दालान में बच्चेबड़े सभी भोजन करते थे. हम सब घर वाले तब तक पंगत से नहीं उठते थे जब तक सब तृप्त न हो जाते. हलकेफुलके हंसी के माहौल में भोज होता मानो एक विशाल पिकनिक चल रही हो.

मैं तब 10वीं कक्षा में थी. स्कूल से घर आई तो देखा दीदी रो रही हैं और मम्मी पास ही में रोंआसी सी खड़ी हैं. दीदी ने आगे पढ़ने के लिए जो विषय लिया था, उस के लिए उन्हें सहशिक्षा कालेज में दाखिला लेना था. पर पापा आज्ञा नहीं दे रहे थे. दादी उन दिनों हरिद्वार गई हुई थीं. दीदी ने चुपके से उन्हें फोन कर दिया. दादी ने आते ही एक बार में ही पापा से हां करवा ली. उन्होंने पापा को सिर्फ एक बात कही, मीरा को हम सब ने मिल कर संस्कार दिए हैं. उन में क्या कुछ कमी रह गई है जो मीरा को उस कालेज में जाने से तू रोक रहा है. हमें अपनी मीरा पर पूरा भरोसा है. वह वहां पर लगन से पढ़ कर अच्छे अंक लाएगी और हमारा सिर ऊंचा करेगी. परोक्षरूप से उन्होंने मीरा दीदी को भी हिदायत दे दी थी और वास्तव में दीदी ने प्रथम रैंक ला कर घरपरिवार का नाम रोशन कर दिया. इसी क्षण टैक्सी के हौर्न की आवाज ने हमें यादों के झरोखों से बाहर निकाला.

टैक्सी रफ्तार पकड़े हुए थी. शीघ्र ही हम देहरादून पहुंच गए. घर में प्रवेश करते ही दादी के पार्थिव शरीर को देखते ही यत्न से दबाई हुई हिचकी तेज रुदन में बदल गई. सभी पहुंच चुके थे. बस, मेरा इंतजार हो रहा था. पापा ने मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘मधु बेटी, इस प्रकार रो कर तुम अपनी दादी को दुखी कर रही हो. वे तो संसार के मायाजाल से मुक्त हुई हैं. एक 16 साल की विधवा का, साथ में एक दूधमुंहे बच्चे के साथ, इस संसाररूपी सागर को पार करना बहुत ही कठिन था. मुझे अपनी मां पर गर्व है. उन्होंने अपने आत्मसम्मान व इज्जत को गिरवी रखे बिना इस सागर को पार किया. वे तो स्वयंसिद्धा थीं. उन्होंने समाज की खोखली रूढि़यों, पाखंडों से दूर रह कर अपने रास्ते खुद बनाए. जो उन्हें अच्छा और सही लगा उसे ग्रहण किया और व्यर्थ की मान्यताओं को उन्होंने अपने मार्ग से हटा दिया. उन के मुक्तिपर्व को शोक में मत बदलो.’’

कुछ देर बाद दादी की अंतिमयात्रा आरंभ हो गई. बहुत बड़ी संख्या में लोग साथ थे. दादी की मृत्यु प्रक्रिया उन की इच्छानुसार की गई. न तो ब्राह्मण भोज हुआ न पुजारीपंडों को दान दिया गया. लगभग 200 गरीबों को भरपेट भोजन कराया गया और 1-1 कंबल उन्हें दानस्वरूप दिए गए. पापा ने दादी की इच्छानुसार अनाथाश्रम, महिला कल्याण घर और अस्पताल में 2-2 कमरे बनवा दिए.

देखतेदेखते दादी हम से बहुत दूर चली गईं. वे अपने पीछे छोड़ गईं संघर्षों का ऐसा अनमोल खजाना जो सभी नारियों के लिए एक सबक है कि कैसे कठिन से कठिनतम परिस्थितियों में भी अपने मानसम्मान व इज्जत को बचाते हुए आगे बढ़ें. वे इस युग की ऐसी महिला थीं जिस ने अपनी मृतप्राय जीवनबगिया को नवीन विचारों, दृढ़संकल्पों, कर्मठता व मेहनत के बलबूते फिर से हरीभरी बना दिया. वास्तव में वे स्वयंसिद्धा थीं.

Short Story : जलन

Short Story : प्रिया बहुत खुश थी. उस ने कंफर्म कर लिया था कि वह मां बनने वाली है. इस खुशी के समाचार को अपने पति और घरवालों के साथ शेयर करने के बाद सब से पहले उस ने अपनी पक्की सहेली नेहा को फोन लगाया. नेहा और प्रिया बचपन से अपनी सारी खुशियां एकदूसरे से बांटती आई थीं. आज भी नेहा से बात कर वह इस खुशी को शेयर करना चाहती थी.

प्रिया ने फोन कर के नेहा को बताया, “यार नेहा, तू मौसी बनने वाली है.”

“मौसी?” अनजान बनते हुए नेहा ने पूछा.

“हां मौसी. अरे पगली, मैं मां बनने वाली हूं,” प्रिया ने उत्साहित स्वर में कहा.

मगर अपेक्षा के विपरीत नेहा ने बहुत ठंडा रिस्पौंस दिया, “ओ रियली, ग्रेट यार. मगर तेरी शादी को तो अभी चारपांच महीने भी नहीं हुए और तू …? ”

“हां यार, शायद फर्स्ट अटैम्प्ट में ही…,” कहते हुए वह शरमा गई.

“अच्छा है, तुझे मेरी तरह इंतजार नहीं करना पड़ेगा. मैं तो पिछले 4 साल से इंतजार में थी कि कब तुझे यह खुशखबरी सुनाऊं पर तू ने बाजी मार ली. वेरी गुड यार. अच्छा सुन, मैं बाद में फोन करती हूं तुझे. अभी जाना पड़ेगा. सासुमां बुला रही है,” बहाना बना कर नेहा ने फोन काट दिया.

नेहा के व्यवहार से प्रिया थोड़ी अचंभित हुई. फिर अपने मन को समझाया कि वाकई कोई जरूरी काम आ गया होगा, बाद में बात कर लेगी.

सहेली के बाद प्रिया ने अपनी बड़ी बहन को फोन लगाया. अपनी बहन के साथ भी प्रिया बहुत अटैच्ड थी. मगर बहन ने भी बहुत ठंडा रिस्पौंस दिया. उलटा, वह तो उसे डांटने ही लगी, “इतनी जल्दी करने की क्या जरूरत थी? अभी शादी को दिन ही कितने हुए हैं? थोड़ी जिंदगी जी कर तो देखती, घूमतीफिरती, ससुराल में ठीक से एडजस्ट हो जाती, वहां के तौरतरीके सीखती, तब जा कर बेबी प्लान करना था. मुझे देख, 3 साल हो गए, फिर भी बेबी नहीं किया. थोड़ी प्लानिंग से चलना पड़ता है और एक तू है कि अकल ही नहीं तुझे.”

“पर दीदी, बेबी तो जितनी जल्दी हो जाए उतना ही अच्छा है न. और फिर, जहां तक बात ससुराल में एडजस्ट करने की है, तो वह तो ऐसे भी प्रैग्नैंसी के इन महीनों में सब सीख ही जाऊंगी. वैसे भी सासुमां बहुत प्यार करती हैं. मुझे जो भी समझ नहीं आता, उन से पूछ लेती हूं.”

“मैं तो तेरे भले के लिए ही समझा रही थी पर बात तुझे समझ आती नहीं. अच्छा चल, मैं रखती हूं फोन. अब अपना ज्यादा ख़याल रखना होगा तुझे. अभी खुद को संभालना तो आया नहीं था, अब बच्चे की जिम्मेदारी और सिर पर ले ली,” कह कर बहन ने फोन काट दिया.

न कोई बधाई, न शुभकामना. बस, उलाहने मारना. बहन का यह रवैया महसूस कर वह बहुत देर तक गुमसुम बैठी रही. इस बातचीत के बाद तो उसे ऐसा लगने लगा था जैसे उस ने वाकई कोई गलती कर दी हो.

तब तक दूध का गिलास लिए सास कमरे में दाखिल हुईं और प्यार से बोलीं, “चल बहू, दूध पी ले. हमारा वारिस आने वाला है. उस का खयाल रख,” कह कर मुसकराती हुई वे चली गईं.

कुछ देर तक प्रिया दूध के गिलास की तरफ एकटक देखती रही. उस के दिमाग में बहन की बातें घूम रही थीं. तभी भाभी का फोन आ गया.

“बधाई हो प्रिया, मम्मीजी का फोन आया था. वे कह रही थीं कि तुम मां बनने वाली हो.”

“जी दीदी.”

“चल अच्छा है. मैं अब तक यह खुशी नहीं दे सकी. अब तू ही दे ले,” उदास स्वर में भाभी ने कहा.

प्रिया जल्दी से बोली, “दीदी, उदास क्यों होती हो? आप का ही बच्चा है यह भी.”

“अरे नहीं प्रिया, अपना तो अपना ही होता है. और फिर, मैं बड़ी बहू हूं. शादी के 4 साल होने वाले हैं. सब इस खुशी की बाट जोहते रह गए. पर मैं उन की यह इच्छा पूरी नहीं कर सकी. बच्चे के लिए कहांकहां नहीं गई. मंदिरों में जा कर मत्था टेका, बाबाओं के चरण पकड़े, मगर नतीजा कुछ भी नहीं निकला.”

भाभी की आवाज से ऐसा लग रहा था जैसे वे अभी रो देंगी. प्रिया कुछ कह नहीं पा रही थी. उस की खुशी किसी के दुख का कारण बन गई थी.

वह भाभी को सांत्वना देने लगी, “भाभी, आप दिल छोटा न करो. अभी समय ही कितना हुआ है? 4 साल कोई लंबा वक्त नहीं होता. आप बहुत जल्द मां बनोगी.”

” यह सब मन बहलाने की बातें होती हैं प्रिया. अच्छा चल, मैं फोन रखती हूं.”

प्रिया फोन की तरफ देखती हुई कुछ देर तक सोचती रही. उस के चेहरे पर खुशी के बजाय उदासी की रेखाएं घनीभूत हो गईं.

प्रिया की प्रैग्नैंसी का 8वां महीना चढ़ चुका था. इतने दिनों में भाभी, बहन या सहेली ने उसे बहुत कम फोन किया. कोई मिलने भी नहीं आई. कोविड का बहाना बना दिया. प्रिया फोन करती, तो तीनों का रिऐक्शन अलग होता. बहन उलाहने के रूप में बातें सुना देती. सहेली काम का बहाना बना कर जल्दी से फोन काट देती और भाभी अपना ही रोना ले कर बैठ जातीं. न तो किसी ने उस से मां बनने के पहलेपहले एहसास के बारे में पूछा और न ही उसे क्या खाना चाहिए या क्या करना चाहिए, इस पर ढंग से डिस्कशन किया या टिप्स दिए.

वह बहन या सहेली से कोई सवाल पूछती, तो वे सपाट सा जवाब दे देती, “मुझे क्या पता, मैं ने कौन से कई बच्चे पैदा कर लिए. डाक्टर से पूछ ले.”

प्रिया की इच्छा होती कि वह बच्चे के सुनहरे, प्यारे सपने उन के साथ शेयर करे. पर कुछ सोच कर ठहर जाती. प्रैग्नैंट होने की उस की खुशियां भी आधीअधूरी सी रह गई थीं.

उस दिन सुबहसुबह वह बालकनी पर खड़ी थी कि तभी उस के घर के आगे एक कैब आ कर रुकी. कैब में से मां को निकलता देख वह ख़ुशी से चीख पड़ी. मां के गले लग कर देर तक रोती रही.

मां ने उसे चुप कराते हुए पूछा, “इतने खुशी के पलों में रो क्यों रही है पगली?”

प्रिया कुछ कह नहीं सकी. उस के अंदर जो तकलीफ थी उसे कैसे बयां करती.

अगले 20- 25 दिन मां का साथ पा कर वह काफी खुश रही और फिर वह दिन भी आ गया जब डिलीवरी की मर्मांतक पीड़ा सहने के बाद नर्स ने उस की बांहों में उस का अंश थमाया. उस पल वह अपना सारा दर्द भूल गई थी. उस के हाथों में नन्हामुन्ना राजकुमार खिलखिला रहा था, किलकारियां मार रहा था. बेटे को गोद में उठाए जब उस ने अपने घर में प्रवेश किया तो उसे लगा जैसे सारा जहां उस की बांहों में सिमट आया हो.

बच्चे को देखने के लिए सब से पहले उस की बहन आई. मां के आगे बहन ने पहले की तरह कोई कड़वे वचन नहीं कहे. बस, देर तक बेबी को हाथों में लिए देखती रही. फिर मुसकरा कर बोली, “बिलकुल मुझ पर गया है.”

उस की बात सुन कर घर में सब हंसने लगे. प्रिया को भी यह बात बहुत प्यारी लगी. बहन ज्यादा देर तक रुकी नहीं. सुबह आई और शाम को निकल गई. करीब 10 दिन बच्चे और प्रिया की देखभाल कर मां भी अपने घर चली गई. इस बीच प्रिया की भाभी भी आ कर बच्चे को आशीर्वाद दे गई.

मां के जाने के बाद सासुमां उस का और बच्चे का पूरा खयाल रखने लगी. प्रैग्नैंसी और डिलीवरी के बाद वह काफी कमजोरी महसूस कर रही थी. उसे इस बात का भी दुख था कि उस की प्यारी सहेली बच्चे को देखने नहीं आई थी. उस ने तबीयत सही न होने का बहाना बना दिया था. वीडियो कौल पर ही उस ने बेबी को देख लिया था.

प्रिया का अकसर दिल करता कि बच्चे की प्यारीप्यारी हरकतों को अपनी सहेली या बहन से शेयर करे. उस के मन में ढेर सारी बातें थीं जिन्हें वह उन से डिस्कस करना चाहती थी. मगर उन की उदासीनता महसूस कर वह खामोश रह जाती. एक दिन हालचाल जानने के लिए प्रिया ने सहेली को फोन किया. थोड़ी देर दोनों के बीच नौर्मल बातचीत होती रही.

फिर जैसे ही उस ने बच्चे की बातें बतानी शुरू कीं, नेहा ने तुरंत बहाना बनाया, “यार, बहुत सिरदर्द हो रहा है मुझे. बाद में करती हूं तुझ से बात.”

इस एक छोटे से वाक्य ने प्रिया के दिल की उमंग और खुशियों पर फिर से पानी उड़ेल दिया. वह सोचने लगी कि यदि नेहा को अब तक बेबी नहीं हुआ तो भला इस में उस की क्या गलती है? वह क्यों अपनी खुशियों को एंजौय नहीं कर पा रही है? सच कहते हैं कि खुशियां तभी बढ़ती हैं जब उन्हें बांटा जाए, पर वह क्या करे जब कोई उस की खुशियों को बांटना ही नहीं चाहता. बहन भी तो अकसर ऐसे ही उस का दिल तोड़ देती है.

अभी 2 दिन पहले की बात थी. उस दिन प्रिया ने फोन कर के अपनी बहन को बताया था, “दीदी, पता है, आज मुझे मुन्ने ने पहली दफा मां कह कर पुकारा. बहुत खुश हूं मैं.”

“मां शब्द का मतलब समझती हो? मां सुन कर खुश होने के साथसाथ आने वाली जिम्मेदारियों के लिए भी तैयार होना पड़ता है. एक मां को बहुत सारे पापड़ बेलने पड़ते हैं, तब जा कर बच्चा बड़ा होता है. चल रखती हूं फोन.”

बहन का रिऐक्शन देख कर उस का सारा जोश ठंडा पड़ गया था. प्रिया की बहन वैसे तो पहले भी उस पर रोब झाड़ती थी मगर कभीकभी और साथ में बहनों के बीच मीठी चुहलबाजियां भी होती थीं. मगर जब से बच्चा हुआ था, प्रिया को लगने लगा था कि बहन उस से हमेशा तेवर में ही बात करती है. ऐसा जताती है जैसे उस ने बहुत बड़ी गलती कर दी हो. प्रिया समझती है कि साइकोलौजिकली बहन के दिल में बच्चा न होने की वजह से तकलीफ है और इसी तकलीफ को वह इस तरह प्रकट करती रहती है. मगर बहन इस बात को नहीं समझती थी कि ऐसे व्यवहार से प्रिया पर क्या गुजरती होगी.

धीरेधीरे बच्चा एक साल का हो गया. प्रिया के मन की कसक नहीं गई. उस की सब से प्यारी सहेली, सगी बहन और भाभी, तीनों ने एक बार मिलने आ कर, फिर न अपनी तरफ से कौल किया और न ही दोबारा मिलने आई थीं. आने की बात कहने पर बड़ी सहजता से तीनों कोविड-19 मुद्दा बना देतीं जबकि ऐसा नहीं था कि वे दूसरों के घर जाती नहीं थीं.

जब प्रिया का मन नहीं लगता था तो वह फोन लगा लेती थी. मगर उन का रिस्पौंस इतना ठंडा होता कि वह अंदर से टूट जाती. धीरेधीरे प्रिया ने भी उन्हें फोन करना छोड़ दिया.

कई दफा उसे ऐसा महसूस होता जैसे अपनों को ही उस की खुशी से जलन हो गई हो और वह इस जलन का उपचार भी नहीं जानती थी. न चाहते हुए भी इस का असर प्रिया के मन पर पड़ता जा रहा था और वह अकसर दुखी रहने लगी थी. पति और सास सवाल करते, तो वह सहज होने का नाटक करती और मुसकरा कर कहती कि ऐसी कोई बात नहीं. वह तो बहुत खुश है. वह ऊपर से मुसकरा रही होती मगर उस के दिल के अंदर गम का सागर लहरा रहा होता. अंदर ही अंदर यह गम उसे तकलीफ दे रहा था.

फिर एक दिन सुबहसुबह उस की बड़ी बहन की कौल आई. वह बहुत खुश थी, चहकती हुई बोली, “जानती है प्रिया, तू भी मौसी बनने वाली है. आज मुझे लग रहा है जैसे मैं आसमान में उड़ रही हूं. यह एहसास कितना खूबसूरत है, मैं बता नहीं सकती.”

“दीदी, मैं बहुत खुश हूं आप के लिए. कौंग्रैट्स,” प्रिया ने खुश हो कर कहा.

इस के बाद तो सुबहशाम हर रोज बहन का फोन आता. वह उस से अपनी खुशियां शेयर करती. धीरेधीरे प्रिया, जिसे अपनी खुशियां खुद तक सीमित रखना पड़ा था, भी खुलने लगी. उसे भी बहन के रूप में एक साथी मिल गया जिस से वह अपनी खुशियां शेयर कर सकती थी. दोनों एकदूसरे से बच्चे की बातें करतीं, भविष्य के सुनहरे सपने संजोतीं. प्रिया समझ गई थी कि वाकई खुशियां बांटने से बढ़ती हैं, मगर बांटने का मौका तब मिलता है जब सामने वाला भी उसी मैंटल स्टेटस में हो.

Kahaniyan : मीत मेरा मनमीत तुम्हारा

Kahaniyan :  ‘‘प्रेरणाभाभी, कहां हो आप?’’ अंबुज ने अपना हैल्मेट एक ओर रख दिया और दूसरे हाथ का पैकेट डाइनिंगटेबल पर रख दिया. बारिश की बूंदों को शर्ट से हटाते हुए वह फिर बोला, ‘‘अब कुछ नहीं बनाना भाभी… अली की शौप खुली थी अभी… बिरयानी मिल गई,’’ और फिर किचन से प्लेटें लेने चला गया.

प्रेरणा रूम से बाहर आ गई. वह नौकरी के लिए इंटरव्यू दे कर कानपुर से अभीअभी लौटी थी. रात के 8 बज रहे थे. पति पंकज अपने काम के सिलसिले में 1 सप्ताह से बाहर था. इसीलिए वह अंबुज की मदद से आराम से इंटरव्यू दे कर लौट आई वरना पंकज उसे जाने ही नहीं देता. गुस्सा करता. अंबुज ने ही विज्ञापन देखा, फार्म भरवाया, टिकट कराया और ट्रेन में बैठा कर भी आया. सुबहशाम हाल भी पूछता रहा. तभी तो नौकरी पक्की हो गई तो उसे बता कर प्रेरणा को कितनी खुशी हुई थी. पंकज से तो शेयर भी नहीं कर सकती.

‘‘अरे तुम बारिश में नाहक परेशान हुए अंबुज. मैं इतनी भी नहीं थकी हूं. अभी बना लेती फट से कुछ. मालूम है 3-4 दिनों से तुम सूपब्रैड, टोस्ट से ही काम चला रहे होंगे. बाहर का खाना भी तुम्हें सूट नहीं करता,’’ प्रेरणा उस के गीले कपड़ों को देखते हुए बोली.

‘‘कपड़े बदल आओ अंबुज. तब तक मैं अदरक वाली चाय बना लेती हूं.

पीनी है या नहीं?’’ वह उसे छेड़ते हुए बोली. उसे मालूम था उस के हाथ की अदरक वाली चाय अंबुज को पसंद है.

‘‘हां भाभी… चाय मुझ से सही नहीं बनती, इसलिए बनाई ही नहीं,’’ कह वह सिर खुजलाते हुए चेंज करने चला गया.

‘‘वाह मजा आ गया भाभी. लग रहा है बरसों बाद चाय पी रहा हूं,’’ अंबुज कपड़े बदल कर आ गया था.

‘‘हां, मुझे लग रहा है देवरानी का इंतजाम जल्दी करना पड़ेगा,’’ प्रेरणा मुसकराई, ‘‘इतने सारे फोटो दे कर गई थी कोई पसंद की?’’

‘‘छोडि़ए भाभी वह सब… ऐपौइंटमैंट लैटर कब मिल रहा है यह बताइए.’’

‘‘बस अगले हफ्ते. पर पहले यह सोचो कि तुम्हारे भैया को कैसे मनाएंगे. नौकरी तक पहुंचने में तुम ने ही सब कुछ किया है. इस में भी तुम्हारी ही मदद चाहिए. अंबुज बेटाजी मुझ से तो वे मानने से रहे. तुम्हें ही कुछ करना होगा वरना सारी मेहनत बेकार,’’ प्रेरणा हंसते हुए बोली.

‘‘अरे मैं उन्हें समझा लूंगा भाभी. आप चिंता क्यों करती हैं? फिर इस में बुराई भी क्या है?’’

‘‘हां, पता नहीं क्या सोच, क्या ईगो ले कर बैठे हैं. कभी तो मेरी भी पढ़ाईर् काम आए. उन्हें दूसरी नौकरी जबतक मिलेगी या इन का काम जबतक बनेगा मैं थोड़ा तो सहयोग कर ही सकती हूं. शुरू में कंपनी 30 हजार सैलरी दे रही है. घर आराम से चल जाएगा. अभी हम 3 ही तो हैं. शिफ्ट हो जाएंगे वहीं.’’

‘‘सो तो है पर…’’

‘‘परवर कुछ नहीं देवरजी. समझाओ उन्हें, वहां पापा का छोटा ही सही पर एक प्लाट भी है, जिसे वे मेरे नाम कर गए हैं. बेकार ही पड़ा है. इस्तेमाल हो जाएगा. वहीं कोई बिजनैस कर लेंगे अपने पैसों से, घर की चिंता छोड़ दें. तुम भी उन के साथ लग जाओ. दोनों ही औटोमोबाइल इंजीनियर हो, साथ में जम कर काम करो… अपना काम सब से बढि़या. नौकरी तो ये दिल से करना भी नहीं चाहते हैं. बेकार ही पीछे पड़े हैं… तुम्हारे कहने पर शायद मान जाएं.’’

‘‘हां सही कह रही हैं आप. पहले क्यों नहीं आया खयाल इस बात का?’’

‘‘कहा था एक बार, मगर वही ईगो की बात है न.’’

‘‘ठीक है, मैं बात करता हूं भैया से.’’

‘‘आते ही मत कहना. घर रात 12 बजे पहुंचेंगे. सुबह का इंतजार कर लेना,’’ अंबुज का उतावलापन देख कर प्रेरणा ने कहा.

‘‘हांहां, भाभी पर कल पहले आप ट्रीट तो दीजिए, इंटरव्यू सफल होने की खुशी में एक मूवी तो बनती है.’’

‘‘डन,’’ कहते हुए प्रेरणा मुसकरा दी.

जब से प्रेरणा ब्याह कर घर आई थी अंबुज उस का देवर कम दोस्त अधिक बन गया था. घर में और कोई तो था नहीं. पंकज की मां पहले ही चल बसी थीं. प्रेरणा केवल 1 साल अंबुज से बड़ी थी और पंकज प्रेरणा से 8 साल बड़ा. उम्र का फासला तो था ही पर अपने पिता के निधन के बाद उन की सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए पंकज और भी धीरगंभीर व्यक्तित्व का बन गया था. अपने मरने से पहले मां ने अपने पति के मित्र की लड़की प्रेरणा से शादी करने को राजी कर लिया था.

‘‘देख पंकज, अब बहुत जिम्मेदारी हो ली… बहन विदा कर दी. पापा का इलाज करवाया… अंबुज को भी पढ़ालिखा रहा है. अगले साल उस की भी नौकरी लग जाएगी. तुझे शादी करनी ही पड़ेगी अब वरना मेरा म…’’

‘‘अम्मां,’’ पंकज ने मां को आगे नहीं बोलने दिया.

‘‘तू हामी भर दे. मैं अभी फोन कर देती हूं घनश्यामजी को.’’

इस तरह प्ररेणा पंकज की दुलहन बन घर आ गई थी. पंकज के धीरगंभीर व्यक्तित्व में प्रेरणा सहज न रह पाती, जबकि उस के उलट अंबुज का हंसमुख स्वभाव उस से मैच करता. दोनों की पसंद भी मिलतीजुलती थी. अकसर पंकज के पास समय ही नहीं रहता न ही काम के अलावा उस का कहीं मन लगता. प्रेरणा ‘धमाल’ मूवी देखना चाहती थी. अंबुज 3 टिकट ले आया. पंकज को ये सब बातें बचकानी लगतीं, ‘‘ऐसी फिल्मों में मेरी कोई रुचि नहीं. तुम दोनों ही देख आओ.’’

पंकज जानता था कि उस की बोर कंपनी में वे भी ऐंजौय नहीं कर पाएंगे. प्रेरणा को अधिक साथ अंबुज का ही मिला. वह उस से काफी घुलमिल गई थी. दोनों की पसंद भी एक. मूवी हो या टीवी के प्रोग्राम अकसर समय मिलता तो साथ देखते. महिने की शौपिंग भी दोनों साथ कर आते.

मजाक में कभीकभी प्रेरणा कहती थी, ‘‘जरा सी चूक हो गई अम्मांजी से. बड़े से नहीं छोटे से मेरा ब्याह कराना चाहिए था. पसंद भी एकजैसी और स्वभाव भी. अंबुज हैल्पिंग भी है वरना मैं तो यहां गृहस्थी अकेले संभाल न पाती.’’

दोनों ने मिल कर पंकज को किसी तरह कानपुर शिफ्ट होने के लिए मना लिया.

‘‘इंडस्ट्रियल एरिया है भैया. चलो वहीं चल कर कुछ साथ करते हैं. यहां हर कोने में अम्मा की यादें बसी हैं… बड़ा खालीखाली सा लगता है… आप का भी मन नहीं लगता है. इसीलिए बाहर रहते हो. चलते हैं भैया,’’ अंबुज बोला.

सभी कानपुर शिफ्ट हो गए थे. प्रेरणा अपनी नौकरी पर जाने लगी. 2-3 सालों में भाइयों की मेहनत रंग लाई. वहां ‘कार ऐवरी सौल्यूशन पौइंट’ नाम से वे नामी गैराज के मालिक बन गए. मोटर पार्ट्स की फैक्टरी लगाई. फिर ‘ग्रीन कैब’ और कार डैकोर का बिजनैस भी चालू किया.

‘‘काम तो अच्छा चल पड़ा भाभी… आप महान हो. आप सही में प्रेरणा हो. बस अब आप काम छोड़ दो… बहुत हुआ. अब तो चाचा कहने वाली गुडि़या ला दो,’’  एक दिन प्रेरणा को सोफे पर बैठा कर अंबुज बोला.

‘‘क्यों नहीं अंबुज पर पहले मेरी देवरानी का इंतजाम करो. फिर आराम ही आराम करूंगी. तब चाचा कहने वाली गुडि़या भी आ जाएगी और पापा कहने वाला गुड्डा भी,’’ कह प्रेरणा जोर से हंस पड़ी थी.

‘‘सच घर इतना बड़ा हो गया पर रहने वाले वही 3… रहने वालों की संख्या बढ़नी ही चाहिए और उत्सव भी मनने चाहिए. अब शादी के लिए और मना नही करोगे आप देवरजी. रिश्ते के लिए आए फोटो में सुरुचि का फोटो बारबार उठा कर देख रहे थे. वह पसंद है न? शरमाने से काम नहीं चलेगा,’’ प्रेरणा न उस की कमर में चिकोटी काटी, तो उस का चेहरा गुलाबी हो गया.

प्रेरणा के आने के 5 साल बाद घर में 2 बंदों का इजाफा हुआ. एक प्रेरणा  ने बेटी को जन्म दिया और दूसरे अंबुज से शादी के बाद सुरुचि का घर में प्रवेश हुआ. शुरूशुरू में सब ठीक था, पर धीरेधीरे सुरुचि पैसों का हिसाब रखने लगी. प्रेरणा के प्रबंध में भी कोई न कोई नुक्स निकाली रहती. अंबुज का प्रेरणा से पूछपूछ कर काम करना भी उसे न भाता और न ही वह चाहती कि उस का अंबुज प्रेरणा के कहे पर चले. उसे साथ ले कर घूमनाफिरना, मूवी, मार्केट जाना, बिस्तर में बैठ कर साथ टीवी देखना, हंसीमजाक करना उस के कलुषित मन को और कसैला बना देता.

उस ने अंबुज से कई बार कहने की कोशिश की पर वह डपट देता कि कूड़ा दिमाग है तुम्हारा. साफ करो, मां के बाद भाभी मेरी मां समान हैं, बड़ी बहन भी हैं और दोस्त भी.

अंबुज के सामने तो वह चुप हो जाती पर प्रेरणा को रहरह कर ताने देने से बाज न आती. प्रेरणा का खून खौल उठता पर कलह बचाने के उद्देश्य से उस ने उसे कुछ न कहना ही उचित समझा. अंबुज से वह थोड़ी दूरी भी रखने लगी, जिस से सुरुचि को बुरा न लगे. उसे इस बात का ध्यान रहता. सुरुचि को तब भी चैन नहीं आया.

एक दिन उस ने मौका पा कर पंकज के कान भरने चाहे, ‘‘भैया आप तो बड़े भोले हो… काम में इतने व्यस्त रहे हैं… कुछ जानते ही नहीं कि घर में क्या हो रहा है.’’

‘‘क्या हो रहा है का मतलब?’’

तब सुरुचि ने अपने मन का सारा जहर उगल दिया. सुन कर पंकज उसी पर आपे से बाहर हो गया. बोला, ‘‘छि: ऐसी घटिया बातें सोची भी कैसे तुम ने? अंबुज को वह अपना देवर नहीं छोटा भाई मानती है… अंबुज ने भी उसे बड़ी बहन का दर्जा दिया… मैं अधिक व्यस्त रहता हूं तो वह उस के साथ मिल कर घर की हर जरूरत का खयाल रखता है तो इस का यह मतलब है?’’

इसी बीच प्रेरणा वहां आ गई. पूछा, ‘‘क्या हुआ पंकज?’’ पंकज को गुस्से में देख वह घबरा गई थी.

अंबुज भी वहां आ पहुंचा. वह समझ रहा था जो कड़वाहट सुरुचि ने उस के मन में घोलनी चाही थी वही जहर भैया के सामने उगल दिया होगा.

‘‘ऐसे शादी नहीं चल सकती. तुम्हें भाभी से माफी मांगनी होगी. फिर तुम चाहे जहां जाओ,’’ कह अंबुज ने वहां से खिसक रही सुरुचि को पकड़ लिया.

बीचबचाव करती प्रेरणा पास आ गई, ‘‘यह क्या तरीका है अंबुज पत्नी से बात करने का… छोड़ो इसे.’’

अंबुज ने पकड़ ढीली की तो सुरुचि एक ओर हट गई.

‘‘इस में गलत क्या है? किसी भी नवविवाहिता को बुरा लगेगा कि उस का पति उस से अधिक दूसरे को महत्त्व दे रहा है. यह तुम्हारे साथ अकेले कुछ समय बिताना चाहती है तो इस में हरज क्या है? हर जगह मुझे साथ ले चलो या हर बात में मैं घुसी रहूं यह भी ठीक नहीं. मैं ने पंकज से पहले ही कहा था… अंबुज अब तुम शादीशुदा हो. तुम दोनों की अपनी लाइफ, अपनी प्राइवेसी होनी चाहिए,’’ प्रेरणा बोली.

‘‘हां, प्रेरणा ने मुझ से पहले ही कहा था… मैं इसे नाहक ही गलत समझ रहा था. इस ने जिद कर के तुम्हें शादी की सालगिरह पर फ्लैट गिफ्ट करने के लिए खरीदवाया… यह तुम दोनों को सुखी देखना चाहती है. इस ने 2 बिजनैस भी अंबुज के नाम से अलग करवा दिए,’’ कह पंकज अलमारी से सारे पेपर्स निकाल लाया था, ‘‘तुम अगले हफ्ते क्या आज ही यह सब अपने पास रखो… जाओ तैयारी करो और खुश रहो.’’

‘‘भैयाभाभी, मुझे माफ कर दीजिए मैं ने आप को गलत समझा,’’ सुरुचि चरणों में गिर पड़ी.

अंबुज गुडि़या को गोद में उठाए उस के गाल पर प्यार करने के बहाने अपनी नम आंखों को पौंछ रहा था.

प्रेरणा समझ गई कि सब से अलग जाने की कल्पना से अंबुज का दिल कितना आहत हो उठा.

बोली, ‘‘कोई नहीं देवरजी पास ही तो हैं. दोनों जब चाहो आतेजाते रहना,’’ और फिर वह सुरुचि को प्यार से गले लगाते हुए बोली, ‘‘यह मीत मेरा पर मनमीत तुम्हारा ही है,’’ कह मुसकरा उठी.

Valentine’s Special : एक थी इवा

Valentine’s Special :  फ्रांस का बीच टाउन नीस, फ्रैंच रिवेरिया की राजधानी है, जहां रोचक संग्रहालय हैं, खूबसूरत चर्च हैं, रशियन और्थोडौक्स कैथिड्रल है, वहीं पास स्थित होटल नीग्रेस्को के कैफेटेरिया में बैठे इवा और जावेद कौफी पी रहे थे. इवा ने चिंतित स्वर में कहा, ‘‘जावेद, तुम मुझ से प्रौमिस करो कि तुम कोई भी गलत कदम नहीं उठाओगे.’’

‘‘इवा, मैं बहुत परेशान हो गया हूं… मेरे अंदर एक आग सी लगी रहती है. मैं ने अपना बहुत अपमान सहा है. ये लोग मुझे ऐसी नजरों से देखते हैं जैसे मैं बहुत छोटी चीज हूं. मैं अब बहुत आगे बढ़ चुका हूं… मेरे कदम अब पीछे नहीं लौट सकते.’’

‘‘नहीं जावेद, तुम जानते हो न… मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती… तुम अगर कभी पकड़े गए तो पता है न क्या हश्र होगा तुम्हारा? तुम्हें उसी पल भून दिया जाएगा.’’

‘‘हां, ठीक है… मुझे मंजूर है. क्यों ये लोग मुझे मेरी शक्लसूरत के कारण नीचे नजरों से देखते हैं?’’

इवा ने जावेद को समझाने की बहुत कोशिश की, अपने प्यार का, अपने साथ भविष्य में देखे गए सुनहरे सपनों का वास्ता दिया पर जावेद आतंक की राह पर बहुत आगे निकल चुका था.

जावेद ने घड़ी देखते हुए कहा, ‘‘इवा, मुझे जाना है, एक जरूरी मीटिंग है, मुझे पहली बार कोई काम दिया गया है जिसे मुझे हर हाल में पूरा करना है… शाम को मौका मिला तो मिलूंगा,’’ औरवोर (बाय), कह कर जावेद उस के गाल पर किस कर के निकल गया.

इवा ने ठंडी सांस लेते हुए जाते हुए जावेद को भीगी आंखों से देखा. उस की सुंदर आंखें आंसुओं की नमी से धुंधली हो गई थीं.

इवा होटल नीग्रेस्को में ही हौस्पिटैलिटी इंचार्ज थी. जावेद की बातों से उदास हो कर उस का मन फिर अपनी ड्यूटी में नहीं लग रहा था. वह अपनी दोस्त केरा को बता कर थोड़ी देर के लिए बाहर आ गई. उसे घुटन सी हो रही थी. फार्मूला वन का एक बहुत अच्छा सर्र्किट नीस है, जो होटल के बिलकुल पीछे से जाता है. उस रास्ते से वह बीच पर पहुंच गई. क्वैदे एतादयूनिस बीच पर एक किनारे बैठ कर वह वहां खेलते बच्चों को देखने लगी. बच्चे अपनी दुनिया में मस्त थे. कभी गुब्बारों के पीछे दौड़ रहे थे, तो कभी रेत में लेट रहे थे.

इवा जावेद के बारे में सोच रही थी. उसे जावेद से अपनी पहली मुलाकात याद आई…

2 साल पहले वह एलियांज रिवेरिया स्टेडियम में फुटबौल का मैच देखते हुए जावेद से मिली थी. दोनों पासपास बैठे थे. दोनों ही लिवरपूल टीम के फैन थे. दोनों ही अपनी टीम को चीयर कर रहे थे. हर गोल पर दोनों जम कर खुश हो रहे थे. जब भी दोनों की आंखें मिलतीं, दोनों मुसकरा देते थे और जब उन की टीम जीत गई तो दोनों खुशी और उत्साह से एकदूसरे के गले लग गए. दोनों को अपनी इस हरकत पर हंसी आ गई. पल भर में ही दोस्ती हो गई. फिर प्यार हो गया. दोनों जैसे एकदूसरे के लिए बने थे.

जावेद बंगलादेश से एमबीए करने आया था. जावेद को फुटबौल मैच देखने का नशा था. वह कई बार हंस कर इवा से कहता था, ‘‘मैं यहां पढ़ने थोड़े ही आया हूं, मैं तो मैच देखने आया हूं.’’

अपने स्कूल और फिर कालेज की टीम का कैप्टन रहा था जावेद. पढ़ने में होशियार, सभ्य, आकर्षक व्यक्तित्व वाले जावेद को इवा दिलोजान से चाहने लगी थी. जावेद की पढ़ाई के बाद नौकरी मिलने पर वे दोनों विवाह का मन भी बना चुके थे.

जावेद ने बताया था, ‘‘मेरे परिवार वाले बहुत कट्टर हैं… एक फ्रैंच लड़की को कभी बहू नहीं बनाएंगे, पर मैं तुम्हारे प्यार के लिए उन की नाराजगी सहन कर लूंगा.’’

यह बात सुन कर इवा ने उसे चूम लिया था. दोनों शारीरिक रूप से भी एकदूसरे के बहुत करीब आ चुके थे. जावेद फ्रैंच क्लास में अच्छी तरह फ्रैंच सीख चुका था. इवा ने जावेद से हिंदी में कुछ बातें करना सीख लिया था. प्यार वैसे भी कोई देश, भाषा, जाति, रंग नहीं जानता. हो गया तो बस प्यार ही रहता है और कुछ नहीं. एकदूसरे की भाषा, सभ्यता अपना कर दोनों प्यार में आगे बढ़ते जा रहे थे पर अब जावेद के अंदर आया परिवर्तन इवा को चिंतित किए जा रहा था. वह बहुत परेशान थी. किसी को अपनी चिंता बता भी नहीं सकती थी. वह वैसे ही दुनिया में अकेली थी. जो उस की दोस्त थीं, यह परेशानी वह उन्हें भी नहीं बता सकती थी.

कालेज में कई बार रेसिज्म का शिकार होने पर जावेद के अंदर एक विद्रोह की भावना पनपने लगी थी, जो इवा के समझाने पर भी समय के साथ कम न हो कर बढ़ती ही जा रही थी. आज इवा को जावेद की 1-1 बात याद आ रही थी. जावेद सीधासादा, शांतिप्रिय, अपने काम से काम रखने वाला लड़का था. वह यहां कुछ बनने ही आया था. अच्छा भविष्य और फुटबौल, बस इन्हीं 2 चीजों में रुचि थी उस की, पर जातिवाद की 1-2 घटनाओं ने उस के अंदर दुख सा भर दिया था. कालेज में कोच मार्टिन ने हमेशा उस के खेलने की बहुत तारीफ की थी, पर जब कालेज टीम के चुनाव का समय आया तो जावेद का कहीं नाम ही नहीं था. उस ने कारण पूछा तो जवाब वहां उपस्थित लड़कों ने दिया, ‘‘तुम हमारी टीम में खेलने का सपना भी कैसे देख सकते हो?’’

इस बात पर सब की समवेत हंसी उस का दिल तोड़ती चली गई थी. उस के बाद कई बार कालेज में किसी भी गतिविधि में अपने विचार देने पर उस का मजाक उड़ाया जाने लगा था कि अब बंगलादेश से आए स्टूडैंट्स हमें अपने विचार बताएंगे.

वह धीरेधीरे रेसिज्म का शिकार होता जा रहा था. अब वह फेसबुक पर सीरियस स्टेटस डालने लगा था. जैसे लाइफ इज नौट ईजी या यहां आप की पहचान आप के गुणों से नहीं, आप की जाति से होती है या मैं थकने लगा हूं. इसी तरह के कई स्टेटस जिन्हें पढ़ कर साफसाफ समझ आ जाता था कि उस के अंदर दुख भरे विद्रोह की भावना पनपने लगी है.

ऐसे ही कभी इस तरह का स्टेटस पढ़ कर कुछ लोगों ने उस से संपर्क स्थापित कर लिया और वह धीरेधीरे आतंक की उस दुनिया में घुसता चला गया जहां से निकलना असंभव था.

इवा उस की हर बात जानती थी, उसे डर लगने लगा था. उस ने एक दिन जावेद से कहा था, ‘‘जावेद, मुझे बस तुम्हारे साथ रहना है. अगर तुम यहां कंफर्टेबल नहीं हो तो हम तुम्हारे गांव चलेंगे. मैं वहां तुम्हारे परिवार के साथ रहने के लिए तैयार हूं. मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती.’’

‘‘नहीं इवा, मेरा परिवार तुम्हें नहीं अपनाएगा. मैं तुम्हें दुखी नहीं देख पाऊंगा… मुझे अब यहीं अच्छा लगता है.’’

‘‘पर जावेद, तुम्हें गलत रास्ते पर जाते देख दुखी तो मैं यहां भी हूं?’’

‘‘यह गलत रास्ता नहीं है… ये लोग मेरी जाति के लिए मुझे नीचा नहीं दिखाते, इन के लिए कुछ करूंगा तो इज्जत मिलेगी.’’

‘‘इस रास्ते पर चल कर तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा जावेद. हम खत्म हो जाएंगे. अभी तो हमारा जीवन शुरू भी नहीं हुआ… अभी तो हमें बहुत प्यार करना है… घर बसाना है, कितने मैच एकसाथ देखने हैं, जीवन जीना है, अभी तो हम ने कुछ भी नहीं किया.’’

पर इवा की सारी बातों को नजरअंदाज कर पूरी तरह से जावेद का ब्रेनवाश हो चुका दिलोदिमाग अब एक ही बात समझता था- आतंक और बरबादी की बात. वह बात जिस से न कभी किसी का भला हुआ है, न होगा. वह अब ऐसी दुनिया का इनसान था जहां सिर्फ चीखें थीं, खून था, लाशें थीं.

जावेद जब शाम को इवा से मिलने आया तो इवा घबरा कर जावेद की बांहों में सिमट कर जोरजोर से रोने लगी. इवा का मन अनिष्ट की आशंका से कांप रहा था.

जावेद ने कहा, ‘‘इवा, मुझे गुडलक बोलो, आज पहले काम पर जा रहा हूं.’’

‘‘कौन सा काम? कहां?’’

‘‘आज बेस्टिल डे की परेड में एक ट्रक ले कर जाना है.’’

‘‘क्यों? क्या करना है?’’

‘‘कुछ नहीं, बस भीड़ में चलते चले जाना है.’’

रो पड़ी इवा, ‘‘जावेद, पागल हो गए हो क्या? किसी की जान चली गई तो? नहीं, तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे.’’

वैसे इवा को विश्वास नहीं था कि जावेद ऐसा कुछ करेगा. वह पहले भी कई बार मरने की धमकी दे चुका था. कभी कहता कि वह आत्मघाती बन जाएगा. कभी कि गोली से खुद को मार लेगा. पर अगले दिन सामान्य हो जाता.

‘‘सौरी इवा, जिंदा रहा तो जरूर मिलेंगे.’’

‘‘नहीं जावेद, मत जाओ. ज्यादा नाटक मत करो.’’

इवा के होंठों पर किस कर के जावेद ने उसे गले लगाया. साथ बिताए कितने ही पल

दोनों की आंखों के आगे घूम गए. फिर एक झटके में इवा को अलग कर जावेद तेज कदमों से चला गया.

इवा आवाज देती रह गई, ‘‘जावेद, रुक जाओ, जावेद, रात को कमरे में इंतजार करूंगी.’’

जावेद चला गया.

इवा का इस बार बुरा हाल था. वह रो रही थी. फिर अगले ही पल अपने को संभाल सोचने लगी कि जावेद को रोकना होगा. क्या वह मेरे प्यार के आगे किसी की जान ले सकता है? नहीं मैं ऐसे नहीं बैठ सकती. कुछ करना होगा. मेरा प्यार इतना कमजोर नहीं कि जावेद को बरबादी के रास्ते से वापस न ला सके… वह मुझे मार कर आगे नहीं बढ़ पाएगा… वह वहां से भागी. जावेद का कहना था कि वह एक ट्रक भीड़ में ले कर घुस जाएगा.

अगले दिन 14 जुलाई को बैस्टिल डे, फ्रैंच नैशनल डे मनाया जाता है. इस दिन यूरोप में सब से बड़ी मिलिटरी परेड होती है. सड़कें भीड़ से भरी थीं, जवान, बूढ़े, बच्चे सब आतिशबाजी देख रहे थे.

रात को जावेद इवा के पास नहीं आया था. इवा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह

पुलिस को बताए. यह पक्का था कि बताने पर उसे खुद भी महीनों जेल में रहना पड़ेगा. शायद जावेद डरा रहा है. करेगा कुछ नहीं. फिर भी इवा जावेद की बताई जगह पहुंच गई. जावेद का फोन बंद था. इवा को उम्मीद थी कि शायद वह भीड़ में मिल जाए.

तभी भीड़ की तरफ बढ़ते ट्रक को देख कर एक बाइक सवार ने जावेद को रोकने की कोशिश की, लेकिन ट्रक नहीं रुका. इवा ने देख लिया कि ट्रक को जावेद चला रहा है. उसे और कुछ नहीं सूझा तो स्वयं ट्रक के आगे खड़ी हो गई.

जावेद के हाथ तब एक बार कांप गए जब उस ने इवा को ट्रक के आगे हाथ फैलाए खड़ी देखा. इवा रो रही थी. उस की टांगें कांप रही थीं, पर जावेद पर इतना जनून सवार था कि उस ने ट्रक की स्पीड कम न की. ट्रक इवा को कुचलता हुआ, साथ ही अनगिनत लोगों को भी कुचलता हुआ आगे बढ़ रहा था. पल भर में ही पुलिस की गोलियों ने जावेद को भून डाला. चारों तरफ चीखपुकार, सड़क पर पड़ी खून में डूबी लाशें, छोटे बच्चों को गोद में उठा कर इधरउधर भागते मातापिता, गिरतेपड़ते लोग, हर तरफ अफरातफरी का माहौल था.

इवा और जावेद दोनों इस दुनिया से जा चुके थे. एक बार फिर प्यार हार गया था, आतंक के खूनी खेल में. हर तरफ बिखरे सपने, टूटती सांसें, तड़पती जिंदगियां थीं, मातम था, खौफ था. अपने प्यार पर टूटा भरोसा लिए इवा जा चुकी थी और आतंक के रास्ते पर चलने के अंजाम के रूप में जावेद का रक्तरंजित शव पड़ा था.

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