Valentine’s Day : इसे धर्म का झंडा न पकड़ाएं

Valentine’s Day :  जरा ठहरो, सांस लो और अपनी बुद्धि जो भले ही मोटी हो उस पर जोर डाल कर समझने की कोशिश करो. यह दिन प्यार का है, किसी धर्म, जाति, देश या वैलेंटाइन का ठेका नहीं है. यह दिन सिर्फ उन लोगों के लिए नहीं जो प्रेमीप्रेमिका हैं, बल्कि यह मातापिता, भाईबहन, दोस्त और हर उस इंसान के लिए है, जिस से हम सच्चा प्यार करते हैं.

अब जरा सोचो, वैलेंटाइन डे से इतनी दिक्कत क्यों है? सिर्फ इसलिए कि इस दिन से सेंट शब्द जुड़ा है या यह अंगरेजी कैलेंडर के हिसाब से आता है? अगर ऐसा है, तो शायद आप अपने जन्मदिन को भी हिंदी कैलेंडर के हिसाब से मनाते होगें? केक के लिए बेकरी के चक्कर काटने के बजाए घर में ही हलवापूड़ी बनाते होंगे या हो सकता है कि अपने बच्चों का जन्मदिन विक्रम संवत में गिनते हो? नहीं न, तो फिर प्यार का यह दिन आते ही देशभक्ति और आप के अंदर का भक्त क्यों जाग जाता है?

अंगरेजी वैलेंटाइन डे से परेशानी पर अंगरेजी न्यू ईयर का जश्न

31 दिसंबर की रात को जब पूरी दुनिया नाचगा रही होती है, तो कोई नहीं कहता कि यह विदेशी नया साल है, इसे मत मनाओ, तब तो पटाखे भी फूटते हैं, पार्टियां भी होती हैं और जश्न भी मनता है. और 25 दिसंबर को तो बच्चे ‘सांता क्लौज’ बन कर मिठाइयां तक बांटते हैं. पर जैसे ही 14 फरवरी आता है, कुछ लोगों को संस्कृति की याद आ जाती है. जब विदेशी चीजों से इतनी दिक्कत है तो अंगरेजी महीनों में क्यों जी रहे हो? हिंदी कैलेंडर अपनाओ, सब अपनेआप ठीक हो जाएगा.

प्यार को अनैतिकता से जोड़ना कब बंद करो

कुछ लोग तो जैसे ‘प्यार’ शब्द सुनते ही आगबबूला हो जाते हैं. लगता है जैसे प्यार कोई गुनाह है. क्या मातापिता से प्यार करना गलत है? भाईबहन से प्यार करना अनैतिक है? दोस्तों को प्यार देना पाप है? नहीं न, तो फिर एक दिन अगर खासतौर पर प्यार के नाम कर दिया जाए, तो इस में बुराई क्या है? कोई जबरदस्ती थोड़ी न कर रहा कि गिफ्ट दो, पार्क जाओ. लेकिन अगर कोई इस दिन को प्यार को समर्पित करना चाहता है तो उस से भी आप को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए.

वैसे भी, जब मदर्स डे, फादर्स डे और फ्रैंडशिप डे धूमधाम से मनाते हो, तो वैलेंटाइन डे में क्या बुराई है? क्या मांबाप के लिए प्यार दिखाने का एक दिन गलत हो सकता है? नहीं न, तो फिर वैलेंटाइन डे पर इतना बवाल क्यों?

असली संस्कृति की याद सिर्फ 14 फरवरी को आती है

जब कोई विदेशी ब्रैंड के कपड़े पहनता है, विदेशी गाड़ियों में घूमता है, इंग्लिश गाने सुनता है, विदेशी बर्गर और पिज्जा खाता है, तब तो कोई संस्कृति की दुहाई नहीं देता. मगर जब प्यार की बात आती है, तब अचानक से सभी ‘संस्कृति के रक्षक’ बन जाते हैं. वैलेंटाइन डे का विरोध करने वालों से पूछो, क्या वे अपने जन्मदिन पर हलवापूरी बांटते हैं? केक काटते समय तो संस्कृति नहीं याद आती?

प्यार कोई अपराध नहीं, बल्कि एक भावना है

प्यार का कोई रंग नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई सरहद नहीं. यह सिर्फ दिल से दिल का रिश्ता है. इस में राजनीति क्यों घुसेड़ रहे हो? अगर वैलेंटाइन डे का विरोध करना ही है तो फिर सारे ‘डे’ का विरोध करो. फिर कोई फ्रैंडशिप डे न मनाए, कोई मदर्स डे न मनाए, कोई फादर्स डे न मनाए. फिर तो सिर्फ एक ही दिन रह जाएगा,विरोध दिवस और त्याग दिवस. फिर तो बस ईद, दीवाली या होली आने का इंतजार कीजिए, खादी के धोती पहनिए, पांव में जूती, यह जींस या क्रौक्स के चक्कर में काहे पड़ते हैं?

प्यार को सम्मान दो, इसे बदनाम मत करो

अगर किसी दिन प्यार को सैलिब्रेट करने का मौका मिल रहा है, तो उसे बेवजह बदनाम न किया जाए तो बेहतर होगा. यह मत सोचो कि यह किसी विदेशी संत का दिन है. इसे इस नजर से देखो कि यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमें अपने अपनों से प्यार जताना चाहिए. हम अपने मातापिता से कह सकते हैं कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं, अपने भाईबहनों को गले लगा सकते हैं, दोस्तों को शुक्रिया कह सकते हैं.
इस दिन को गलत मत समझो, इसे अपनाओ. प्यार करने से डरने की जरूरत नहीं, नफरत से डरने की जरूरत है.

Family Strength : संयुक्त परिवार में रहने के कारण मैं काफी परेशान हूं, मैं क्या करूं?

Family Strength :  अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल-

मैं 29 वर्षीय विवाहिता हूं. हमारा संयुक्त परिवार है. शादी से पहले ही हमें यह बता दिया गया था कि मुझे संयुक्त परिवार में रहना है. वैसे तो यहां किसी चीज की दिक्कत नहीं है पर ससुराल के अधिकतर लोग खुले विचारों के नहीं हैं, जबकि मैं काफी खुले विचार रखती हूं. इस वजह से मुझे कभीकभी उन की नाराजगी भी सहनी पड़ती है और खुलेपन की वजह से मेरी ननदें व जेठानियां मुझे अजीब नजरों से भी देखती हैं. पति को कहीं और फ्लैट लेने को नहीं कह सकती. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब-

घरपरिवार में कभीकभी कलह, वादविवाद, झगड़ा आम बात है. मगर परिवार फेसबुक अथवा व्हाट्सऐप की तरह नहीं है जिस में आप ने सैकड़ों लोगों को जोड़ कर तो रखा है, मगर आप को कोई पसंद नहीं है तो आप उसे एक ही क्लिक में एक झटके में बाहर कर दें.

इस बात की कतई परवाह न करें कि परिवार के कुछ सदस्य आप को किन नजरों से देखते हैं और कैसा व्यवहार करते हैं. अच्छा यही होगा कि अपनेआप को इस तरीके से व्यवस्थित करें कि आप हमेशा खूबसूरत इंसान बनी रहें. कोई कैसे देखता है यह उस पर है.

आजकल जहां ज्यादातर लोग एकल परिवारों में रहते हुए तमाम वर्जनाओं के दौर से गुजरते हैं, वहीं आज के समय में आप को संयुक्त परिवार में रहने का मौका मिला है, जिस में अगर थोड़ी सी सूझबूझ दिखाई जाए तो आगे चल कर यह आप के लिए फायदेमंद ही साबित होगा.

बेहतर यही होगा कि छोटीछोटी बातों को नजरअंदाज करें और सब को साथ ले कर चलने की कोशिश करें. धीरेधीरे ही सही पर वक्त पर घर के लोग आप को हर स्थिति में स्वीकार कर लेंगे और आप सभी की चहेती बन जाएंगी.

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‘‘यह रिश्ता मुझे हर तरह से ठीक लग रहा है. बस अब तनु आ जाए तो इसे ही फाइनल करेंगे,’’ गिरीश ने अपनी पत्नी सुधा से कहा.

‘‘पहले तनु हां तो करे, परेशान कर रखा है उस ने, अच्छेभले रिश्ते में कमी निकाल देती है…संयुक्त परिवार सुन कर ही भड़क जाती है. अब की बार मैं उस की बिलकुल नहीं सुनूंगी और फिर यह रिश्ता उस की शर्तों पर खरा ही तो उतर रहा है. पता नहीं अचानक क्या जिद चढ़ी है कि बड़े परिवार में विवाह नहीं करेगी, क्या हो गया है इन लड़कियों को,’’ सुधा ने कहा.

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या हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- sampadak@delhipress.biz सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Oscar 2025 की दौड़ में भारतीय फिल्म ‘बैंड औफ महाराजा’ फेम ऐक्ट्रैस अलंकृता सहाय

Oscar 2025 : अभिनेत्री अलंकृता सहाय भारतीय मनोरंजन उद्योग में सबसे दुर्जेय और सम्मानित युवा नामों में से एक हैं. एक पेशेवर कलाकार के रूप में, वह अपनी शर्तों पर रहती हैं और आज, वह और उनके प्रशंसक गर्व से इस तथ्य की पुष्टि कर सकते हैं कि वह एक स्व-निर्मित स्टार हैं. मिस इंडिया होने से लेकर कई भाषाओं में संगीत वीडियो स्पेस पर हावी होने और समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्मों में विश्वसनीय काम करने तक, अलंकृता ने निश्चित रूप से दिल जीतने के लिए अपने ए गेम को आगे रखा है.

देर से, वह खबरों में रही हैं क्योंकि वह समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्म ‘बैंड औफ महाराजा’ की मुख्य अभिनेत्री हैं जो अब आधिकारिक तौर पर औस्कर 2025 की दौड़ में है. अलंकृता, फिल्म की पूरी टीम के साथ वैश्विक स्तर पर देश को गौरवान्वित करने में कामयाब रही हैं और इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि उन्हें सभी कोनों के लिए अपार प्यार और सम्मान दिया गया है. जब से ‘बैंड औफ महाराजा’ ने औस्कर 2025 की दौड़ में जगह बनाई है, तब से नेटिजन्स सेट और फिल्म की विशेष झलकियों के लिए अनुरोध कर रहे हैं क्योंकि वे पहले कभी रिलीज नहीं हुए हैं.

खैर, लोगों के व्यक्ति की तरह, अलंकृता ने इस अनुरोध को सबसे मधुर तरीके से पूरा किया है. उन्होंने फिल्म की शूटिंग के दौरान सेट की तस्वीरों से कुछ बीटीएस क्षण और अपने अनदेखे अवतार को साझा किया और हर कोई इसे वास्तव में पसंद कर रहा है.यह ध्यान रखना चाहिए कि फिल्म में अलंकृता का चरित्र वास्तविक जीवन में जो है, उसके बिल्कुल विपरीत है और जिस चतुराई के साथ वह चरित्र की त्वचा में प्रवेश करने में कामयाब रही और जिस रूप ने दर्शकों को इन चित्रों के बारे में सबसे अधिक आकर्षित किया है.

यदि आपने उन्हें पहले नहीं देखा है, तो यहां जाएं – बहुत शानदार और अद्भुत, है ना? अलंकृता और पूरी टीम को शुभकामनाएं और कामना है कि वह व्यक्तिगत और पेशेवर रूप से अपने जीवन में देश को गौरवान्वित और उत्कृष्ट बनाना जारी रखे. काम के मोर्चे पर, अभिनेत्री के पास कुछ दिलचस्प कार्य विकास हो रहे हैं, जिनकी आधिकारिक घोषणा बहुत जल्द आदर्श समयसीमा के अनुसार की जाएगी.अधिक अपडेट के लिए बने रहें.

Family Goals : शादी के कुछ सालों में बहू मोनिका से बनी कोमोलिका, कहीं सास ही तो नहीं इस बदलाव की वजह

Family Goals : शादी के वक्त जब एक लड़की अपना आंगन छोड़ कर दूसरे घर में प्रवेश करती है, तो क्या वह यह सोच कर पहला कदम रखती है कि मैं इस घर में रहने वाले सभी लोगों का जीना दुश्वार कर दूंगी? हर बात को सुनने से पहले पलट जवाब दूंगी या परिवार से कोई मतलब न रख कर सिर्फ पति की हमसफर बन कर रहूंगी? जवाब होगा नहीं क्योंकि सास भी तो कभी बहू थी, तो आप एक कोमल सी लड़की से खूंख्वार सास कैसे बनीं, यह सोचा है आप ने?

आप के बरताव में कैसे बदलाव आया, कैसे जो बहू सास की एक आवाज पर सहम जाती थी, वह अब खुद सास बनने के बाद शेरनी बन कर दहाड़ती है? इतने बदलाव का कारण है बहू के साथ ससुराल में हुआ व्यवहार.

सास खुद के अंदर झांक कर देखें

अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार को कोई भी लड़की शुरुआती कुछ वक्त तो बरदाश्त करती है लेकिन वक्त के साथ वह उस से डील करना सीख जाती है. जिसे कहते हैं न ईंट का जवाब पत्थर से देने का उस का भी दिल चाहता है और उस के मन में भी ससुराल के लोगों के प्रति खटास पैदा हो जाती है.

इसलिए बहू के स्वभाव पर दोष देने से पहले सास को चाहिए कि वह खुद के बरताव पर नजर डाले. सास न बन कर पहले घर की एक सदस्य बन कर बहू के दिल में घर करे, बातबात पर टोकने, ‘हमारे घर में ऐसा ही होता है’ का पुरातन डायलौग छोड़ कर मिल कर काम करने, दूसरे के अच्छे काम पर उस की तारीफ करने से झिझके नहीं. अगर गलत बात या काम पर टोकना आप का अधिकार है तो सही काम की तारीफ करना अपना कर्तव्य है.

बहू को नए परिवेश में ढलने का मौका दें

एक लड़की के लिए शादी सिर्फ अपना परिवार या घर छोड़ना नहीं होता, बल्कि उस को अपना पूरा लाइफस्टाइल बदलना पड़ता है. अपने मायके में जहां लड़की बिस्तर में बिना आंखों को खोले चिल्ला कर चाय की प्याली मांगती थी वह अब सब से पहले उठ कर परिवार में सब के लिए नाश्ते की तैयारी में लग जाती है. जो अपने घर में मनमरजी का खाना न मिलने पर फूड डिलिवरी कराती थी या अपनी मां से झगड़ती थी वह अब चुपचाप नापसंद सब्जियां बना रही है.

अचानक आए ये बदलाव किसी के लिए भी स्ट्रैस की वजह बन सकते हैं. इसलिए अपनी बहू को वक्त दें, जितना वह आप के परिवार में ढलने की कोशिश में लगी है उतना ही आप भी उस को खुला दिल कर के अपनाने की कोशिश करें. वह जैसी है स्वीकारें और अगर आप को कुछ अपनी दिनचर्या में बदलाव करने की जरूरत पड़े तो उस पर अड़ें नहीं, नर्म स्वभाव रखें.

हर छोटी बात पर टोकने से बचें

बहू के घर में कदम रखते ही सास को अपने दिनों की याद ताजा हो जाती हैं. कैसे वह घर में 10-12 लोगों का खाना बनाती, बच्चों व बड़ों की देखभाल, बिना हाउसहैल्प सारा काम खुद करना, बड़े से आंगन को सूरज चढ़ने से पहले लीपनापोतना और फिर वह उस की तुलना बहू के काम से करती है.

‘हम ने तो इतना काम किया, आजकल की बहुएं तो 5 लोगों की रोटियां गिन कर बनाती हैं’ जैसे तानें देने लगती हैं. लेकिन उन्हें समझना होगा कि अब वक्त बदला है, काम करने के तरीकों और संसाधनों में बढ़ोत्तरी हुई है. बच्चे की परवरिश के तरीके बदले हैं. तो ऐसे में हर काम में कंपेरिजन आप के और आप की बहू के बीच सिर्फ दूरियां बढ़ाता है. जरूरी है कि अब आप साथ मिल कर कैसे घर को संभालें उस पर ध्यान दें, न कि बहू ने आज क्या नहीं किया उस पर ध्यान दें.

बेटे को अच्छा हमसफर बनना सिखाएं

माना कि आप ने अपने बच्चे को नाजों से राजा बेटा बना कर पाला है. पानी का गिलास भी उस ने कभी खुद उठ कर नहीं लिया. लेकिन शादी के बाद अब वह आप का राजा बेटा नहीं बल्कि एक परिवार का कर्ताधर्ता है. उस के जीवन में बदलाव आया है और अगर ऐसे में अगर वह अपनी पत्नी की मदद करना चाहे तो उस की सराहना करें, नकि उसे तानें दें कि बहुरिया के आते ही कैसे बेचारा काम में लग गया, हम ने तो कभी काम नहीं कराया. बेटे को बहू का अच्छा हमसफर बनने के लिए उस की मदद के लिए प्रोत्साहित करें.

बहू की स्मार्टनैस का फायदा लें

कई बार बहू उस के ससुराल में परिवार से ज्यादा समझदार हो सकती है. ऐसे में बहू को भी चाहिए कि वह अपनी नीड और परिवार के लिए क्या सही है वह सोचसमझ कर काम करे. अपनी नालेज से दूसरों को नीचा दिखाने या खुद को बैटर साबित करने की कोशिश न करे. ऐसे में सास को भी चाहिए कि वह उस की स्मार्टनैस का फायदा उठाए. अगर वह किसी काम में बहू से सुझाव लेती है तो उस से बहू को भी अच्छा लगता है वह खुद को परिवार में इनक्लूडिड महसूस करती है और सास को बेहतर सुझाव भी मिल जाएगा.

पेरैंट्स के साथ आप की सोच का न हो टकराव

शादी के बाद आप अगर अपनी लाइफ में सासससुर की ज्यादा दखलंदाजी पसंद नहीं करती तो फिर आप के पेरैंट्स आप की लाइफ में शादी के बाद किस हद तक डिसिजन ले सकते हैं उस की भी लाइन खींच कर रखें. मातापिता को भी चाहिए कि वे अपनी बेटी को नए परिवार में सैटल होने मौका दें और बातबात पर उसे डिफैंड करने से पहले स्थिति को समझें.

दखलंदाजी परिवार में चाहे मातापिता की हो या सासससुर की, उस से डिफरैंस पैदा होते ही हैं. इसलिए सब को कैसे संभालना है ताकि कोई किसी पर हावी न हो पाए यह एक समझदार लड़की को पहले से अपने दिमाग में तय कर लेना चाहिए.

Live In Relationship बम है या बर्फ

Live In Relationship : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी में कहा है कि समाज में ‘लिव इन’ संबंधों को स्वीकृति नहीं मिली है, लेकिन युवा पीढ़ी इन संबंधों की ओर आकर्षित हो रही है. अदालत के मुताबिक, अब समय आ गया है कि समाज में नैतिक मूल्यों को बचाने के लिए हमें कुछ रूपरेखा तैयार करनी चाहिए और समाधान निकालना चाहिए.

न्यायमूर्ति नलिन कुमार श्रीवास्तव ने कहा,”हम बदलते समाज में रहते हैं जहां परिवार, समाज या कार्यस्थल पर युवा पीढ़ी का नैतिक मूल्य और सामान्य आचरण बदल रहा है.”

अदालत ने इस टिप्पणी के साथ वाराणसी जिले के आकाश केशरी को जमानत दे दी. आकाश के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत सारनाथ थाने में मामला दर्ज किया गया था। अदालत ने कहा कि जहां तक ‘लिव-इन संबंध’ का सवाल है, इसे कोई सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली है, लेकिन युवा लोग ऐसे संबंधों की ओर आकर्षित होते हैं क्योंकि वे अपने साथी के प्रति अपने उत्तरदायित्व से आसानी से बच सकते हैं.

लिव इन रिलेशनशिप एक प्रकार का संबंध है, जहां 2 व्यक्ति एकसाथ रहते हैं और एकदूसरे के साथ भावनात्मक और शारीरिक संबंध बनाते हैं, लेकिन वे विवाहित नहीं होते हैं या किसी भी प्रकार के औपचारिक संबंध में नहीं होते हैं.

क्या है लिव इन रिलेशनशिप

इस में 2 व्यक्ति एकसाथ रहते हैं. वे एकदूसरे के साथ भावनात्मक और शारीरिक संबंध बनाते हैं. वे विवाहित नहीं होते हैं या किसी भी प्रकार के औपचारिक संबंध में नहीं होते हैं. वे अपने संबंध को अपने तरीके से चलाते हैं और अपने निर्णय लेते हैं.

लिव इन रिलेशनशिप के फायदे

यह दोनों व्यक्तियों को अपने संबंध को अपने तरीके से चलाने की आजादी देता है. यह दोनों व्यक्तियों को एकदूसरे के साथ समय बिताने और एकदूसरे के साथ भावनात्मक और शारीरिक संबंध बनाने का अवसर देता है.

यह दोनों व्यक्तियों को अपने संबंध को अपने तरीके से समाप्त करने की आजादी देता है.

लिव इन रिलेशनशिप की हानियां

यह दोनों व्यक्तियों को समाज में अलगथलग महसूस करा सकता है. यह दोनों व्यक्तियों को अपने संबंध को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं दिला सकता है. यह दोनों व्यक्तियों को अपने संबंध को समाप्त करने के लिए कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है.

आइए, देखिए समझिए कई चर्चित लोगों के लव इन रिलेशनशिप रहे हैं :

सैफ अली खान और रोसा कैटरीना : सैफ अली खान और रोसा कैटरीना ने 2011 में लिव इन रिलेशनशिप शुरू किया था, लेकिन बाद में अलग हो गए.

करीना कपूर और सैफ अली खान : करीना कपूर और सैफ अली खान ने 2007 में लिव इन रिलेशनशिप शुरू किया था और 2012 में शादी की.

कोंकणा सेन शर्मा और रणवीर शौरी : कोंकणा सेन शर्मा और रणवीर शौरी ने 2007 में लिव इन रिलेशनशिप शुरू किया था और 2010 में शादी की.

नेहा धूपिया और रितिक रोशन के भाई रोहन रोशन : नेहा धूपिया और रोहन रोशन ने 2008 में लिव इन रिलेशनशिप शुरू किया था, लेकिन बाद में अलग हो गए.

अनुराग कश्यप और कल्कि कोचलिन : अनुराग कश्यप और कल्कि कोचलिन ने 2011 में लिव इन रिलेशनशिप शुरू किया था और 2015 में तलाक लिया.

दरअसल, यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और इन लोगों ने अपने रिश्तों के बारे में खुल कर बात की है.

Stories : उलटी धारा

यह बात आग की तरह पूरी बस्ती में फैल चुकी थी. सारा महल्ला गुस्से में था और हामिद शाह को खरीखोटी सुना रहा था.  बाय यह थी कि हामिद शाह अपनी बेटी कुलसुम को संभाल नहीं सके और कैसे उस ने एक हिंदू लड़के के साथ शादी कर ली. मौलवीमुल्ला सभी इकट्ठा हो कर एकसाथ मिल कर उन पर हमला बोल रहे थे. एक हिंदू लड़के से शादी कर के मजहब को बदनाम किया.

हामिद शाह का पूरा परिवार आंगन में खड़ा हो कर सब की जलीकटी बातें सुन रहा था. उन के खिलाफ जबान से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था. मगर बस्ती के कुछ मुसलिम समझदार भी थे, जो इसे गलत नहीं बता रहे थे, मगर ऐसे लोगों की तादाद न के बराबर थी.

भीड़ बड़ी गुस्से में थी खासकर नौजवान. वे कुलसुम को वापस लाने की योजना बनाने लगे. मगर हामिद शाह इस की इजाजत नहीं दे रहे थे, इसीलिए उन से सारी भीड़ नाराज थी. वे किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे थे.

धीरेधीरे सारी भीड़ अपने घरों में चली गई. हामिद शाह भी अपनी बैठक में आ गए. साथ में उन की बेगम नासिरा बी, दोनों बेटेबहुएं बैठे हुए थे.

नासिरा बी सन्नाटे को तोड़ते हुए बोलीं, ‘‘करमजली कुलसुम मर क्यों न गई. इस कलमुंही की वजह से ये दिन देखने पड़े. यह सब आप की वजह से हुआ. न उसे इतनी छूट देते, न वह एक हिंदू लड़के से शादी करती. नाक कटा दी उस ने जातबिरादरी में. देखो, पूरा महल्ला बिफर पड़ा. कैसीकैसी बातें कह रहे थे और आप कानों में तेल डाल कर चुपचाप गूंगे बन कर सुनते रहे.

‘‘अरे, अब भी जबान तालू में क्यों चिपक गई,’’ मगर हामिद शाह ने कोई जवाब नहीं दिया. उन की आंखें बता रही थीं कि उन्हें भी अफसोस है.

‘‘अब्बा, अगर आप कहें तो उस कुलसुम को उस से छुड़ा कर लाता हूं. आग लगा दूंगा उस घर में,’’ छोटा बेटा उस्मान अली गुस्सा हो कर बोला.

‘‘नहीं उस्मान, ऐसी भूल कभी मत करना,’’ आखिर हामिद शाह अपनी जबान खोलते हुए बोले. पलभर रुक कर वे आगे बोले, ‘‘इस में मेरी भी रजामंदी थी. कुलसुम को मैं ने बहुत समझाया था. मगर वह जिद पर अड़ी रही, इसलिए मैं ने फिर इजाजत दे दी थी.’’

‘‘यह आप ने क्या किया अब्बा?’’ नाराज हो कर उस्मान अली बोला.

‘‘उस्मान, अगर मैं इजाजत नहीं देता, तो कुलसुम खुदकुशी कर लेती. यह सारा राज मैं ने छिपा कर रखा था.’’

‘‘आप ने मुझे नहीं बताया,’’ नासिरा बी चिल्ला कर बोलीं, ‘‘सारा राज छिपा कर रखा. अरे, बस्ती के लड़कों को ले जाते उस के घर में और आग लगा देते. कैसे अब्बा हो आप, जो अपनी बेगम को भी नहीं बताया.’’

‘‘कैसी बात करती हो बेगम, ऐसा कर के शहर में दंगा करवाना चाहती थी क्या?’’ हामिद शाह बोले.

‘‘अरे, इतनी बड़ी बात तुम ने छिपा कर रखी. मुझे हवा भी नहीं लगने दी. अगर मुझ से कह देते न तो उस की टांग तोड़ कर रख देती. यह सब ज्यादा पढ़ाने का नतीजा है. मैं ने पहले ही कहा था, बेटी को इतना मत पढ़ाओ. मगर तुम ने मेरी कहां चलने दी. चलो, पढ़ाने तक तो ठीक था. नौकरी भी लग गई,’’ गुस्से से उफन पड़ीं नासिरा बी, ‘‘आखिर ऐसा क्यों किया आप ने? क्यों छूट दी उस को?’’

‘‘देखो बेगम, तुम चुप हो तो मैं तुम्हें सारा किस्सा सुनाऊं,’’ कह कर पलभर को हामिद शाह रुके, फिर बोले, ‘‘तुम तो आग की तरह सुलगती जा रही हो.’’

‘‘हां कहो, अब नहीं सुलगूंगी,’’ कह कर नासिरा बी खामोश हो गईं. तब हामिद शाह ने सिलसिलेवार कहानी सुनानी शुरू की, लेकिन उस से पहले उन के घर के हालात से आप को रूबरू करा दें.

हामिद शाह एक सरकारी मुलाजिम थे. वे 10 साल पहले ही रिटायर हुए थे. कुलसुम से बड़े 2 भाई थे. दोनों की साइकिल की दुकान थी. सब से बड़े का नाम मोहम्मद अली था, जिस के 5 बच्चे थे. छोटे भाई का नाम उस्मान अली था, जिस के 3 बच्चे थे.

कुलसुम से बड़ी 3 बहनें थीं, जिन की शादी दूसरे शहरों में हो चुकी थी. कुलसुम सब से छोटी थी और सरकारी टीचर थी.

कुलसुम जब नौकरी पर लग गई थी, तब उस के लिए जातबिरादरी में लड़के देखना शुरू किया था. शाकिर मियां के लड़के अब्दुल रहमान से बात तकरीबन तय हो चुकी थी. लड़का भी कुलसुम को आ कर देख गया था और उसे पसंद भी कर गया था. मगर कुलसुम ने न ‘हां’ में और न ‘न’ में जवाब दिया था.

एक दिन घर में कोई नहीं था, तब हामिद शाह ने कुलसुम से पूछा, ‘‘कुलसुम, तुम ने जवाब नहीं दिया कि तुम्हें अब्दुल रहमान पसंद है कि नहीं. अगर तुम्हें पसंद है तो यह रिश्ता पक्का कर दूं?’’

मगर 25 साल की कुलसुम अपने अब्बा के सामने चुपचाप खड़ी रही. उस के मन के भीतर तो न जाने कैसी खिचड़ी पक रही थी. उसे चुप देख हामिद शाह फिर बोले थे, ‘‘बेटी, तुम ने जवाब नहीं दिया?

‘‘अब्बा, मुझे अब्दुल रहमान पसंद नहीं है,’’ इनकार करते हुए कुलसुम बोली थी.

‘‘क्यों मंजूर नहीं है, क्या ऐब है उस में, जो तू इनकार कर रही है?’’

‘‘क्योंकि, मैं किसी और को चाहती हूं,’’ आखिर कुलसुम मन कड़ा करते हुए बोली थी.

‘‘किसी और का मतलब…?’’ नाराज हो कर हामिद शाह बोले थे, ‘‘कौन है वह, जिस से तू निकाह करना चाहती है?’’

‘‘निकाह नहीं, मैं उस से शादी करूंगी.’’

‘‘पर, किस से?’’

‘‘मेरे स्कूल में सुरेश है. मैं उस से शादी कर रही हूं. अब्बा, आप अब्दुल रहमान क्या किसी भी खान को ले आएं, मैं सुरेश के अलावा किसी से शादी नहीं करूंगी,’’ कह कर कुलसुम ने हामिद शाह के भीतर हलचल मचा दी थी.

हामिद शाह गुस्से से बोले थे, ‘‘क्या कहा, तू एक हिंदू से शादी करेगी? शर्म नहीं आती तुझे. पढ़ालिखा कर तुझे नौकरी पर लगाया, इस का यही सिला दिया कि मेरी जातबिरादरी में नाक कटवाना चाहती है.’’

‘‘अब्बा, आप मुझे कितना ही समझा लें, चिल्ला लें, मगर मैं जरा भी टस से मस नहीं होऊंगी.’’

‘‘देख कुलसुम, तेरी शादी उस हिंदू लड़के के साथ कभी नहीं होने दूंगा,’’ हामिद शाह फिर गुस्से से बोले, ‘‘जानती नहीं कि हमारा और उस का मजहब अलगअलग है. फिर हमारा मजहब किसी हिंदू लड़के से शादी करने की इजाजत नहीं देता है.

‘‘कब तक मजहब के नाम पर आप जैसे सुधारवादी लोग भी कठमुल्लाओं के हाथ का खिलौना बनते रहेंगे? कब तक हिंदुओं को अपने से अलग मानते रहेंगे,’’ इस समय कुलसुम को भी न जाने कहां से जोश आ गया. उस ने अपनी रोबीली आवाज में कहा, ‘‘अरे अब्बा, 5-6 पीढ़ी पीछे जाओ. इस देश के मुसलमान भी हिंदू ही थे. फिर हिंदू मुसलमान को 2 खानों में क्यों बांट रहे हैं. मुसलमानों को इन कठमुल्लाओं ने अपने कब्जे में कर लिया है.’’

‘‘अरे, चंद किताबें क्या पढ़ गई, मुझे पाठ पढ़ा रही है. कान खोल कर सुन ले, तेरी शादी वहीं होगी, जहां मैं चाहूंगा,’’ हामिद शाह उसी गुस्से से बोले थे.

‘‘अब्बा, मैं भी शादी करूंगी तो सुरेश से ही, सुरेश के अलावा किसी से नहीं,’’ उसी तरह कुलसुम भी जवाब देते हुए बोली थी.

इतना सुनते ही हामिद शाह आगबबूला हो उठे, मगर जवाब नहीं दे पाए थे. अपनी जवान लड़की का फैसला सुन कर वे भीतर ही भीतर तिलमिला उठे थे. फिर ठंडे पड़ कर वे समझाते हुए बोले थे, ‘‘देखो बेटी, तुम पढ़ीलिखी हो, समझदार हो. जो फैसला तुम ने लिया है, वह भावुकता में लिया है. फिर निकाह जातबिरादरी में होता है. तुम तो जातबिरादरी छोड़ कर दूसरी कौम में शादी कर रही हो.

‘‘बेटी, मेरा कहना मानो, तुम अपना फैसला बदल लो और बदनामी से बचा लो. तुम्हारी मां, तुम्हारे भाई और तुम्हारी बहनों को जातबिरादरी का पता चलेगा तो कितना हंगामा होगा, इस बात को समझो बेटी, मैं कहीं भी मुंह देखाने लायक नहीं रहूंगा.’’

‘‘देखिए अब्बा, आप की कोई भी बात मुझे नहीं पिघला सकती,’’ थोड़ी नरम पड़ते हुए कुलसुम बोली, ‘‘सुरेश और मैं ने शादी करने का फैसला कर लिया है. अगर आप मुझ पर दबाव डालेंगे, तब मैं अपने प्यार की खातिर खुदकुशी कर लूंगी.’’

कुलसुम ने जब यह बात कही, तब हामिद शाह ऊपर से नीचे तक कांप उठे, फिर वे बोले थे, ‘‘नहीं बेटी, खुदकुशी मत करना.’’

‘‘तब आप मुझे मजबूर नहीं करेंगे, बल्कि इस शादी में आप मेरा साथ देंगे,’’ कुलसुम ने जब यह बात कही, तब हामिद शाह सोच में पड़ गए. एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई. कुलसुम का साथ दें, तो समाज नाराज. अगर जबरदस्ती कुलसुम की शादी बिरादरी में कर भी दी, तब कुलसुम सुखी नहीं रहेगी, बल्कि खुदकुशी कर लेगी.

अपने अब्बा को चुप देख कुलसुम बोली, ‘‘अब्बा, अब सोचो मत. इजाजत दीजिए.’’

‘‘मैं ने कहा न कि बेटी घर में बहुत बड़ा हंगामा होगा. सचमुच में तुम सुरेश से ही शादी करना चाहती हो?’’

‘‘हां अब्बा,’’ कुलसुम हां में गरदन हिला कर बोली.

‘‘बीच में धोखा तो नहीं देगा वह?’’

‘‘नहीं अब्बा, वे लोग तो बहुत

अच्छे हैं.’’

‘‘तुम एक मुसलमान हो, तो क्या वे तुम्हें अपना लेंगे?’’

‘‘हां अब्बा, वे मुझे अपनाने के लिए तैयार हैं.’’

‘‘देख बेटी, हमारा कट्टर समाज इस शादी की इजाजत तो नहीं देगा, मगर मैं इस की इजाजत देता हूं.’’

‘‘सच अब्बा,’’ खुशी से झूम कर कुलसुम बोली.

‘‘हां बेटी, तुझे एक काम करना होगा, सुरेश से तुम गुपचुप शादी कर लो. किसी को कानोंकान हवा न लगे. इस से सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी…’’ सलाह देते हुए अब्बा हामिद शाह बोले, ‘‘जब तुम दोनों शादी कर लोगे, तब फिर कुछ नहीं होगा. थोड़े दिन चिल्ला कर लोग चुप हो जाएंगे.’’

इस घटना को 8 दिन भी नहीं गुजरे थे कि कुलसुम ने सुरेश के साथ कोर्ट में शादी कर ली. इस घटना की खबर आग की तरह पूरे शहर में फैल गई.

‘‘देखिएजी, इस शादी को मैं शादी नहीं मानती,’’ नासिरा बी झल्लाते हुए बोलीं, ‘‘मुझे कुलसुम चाहिए. कैसे भी कर के उस को उस हिंदू लड़के से छुड़ा कर लाओ.’’

‘‘बेगम, जिसे तुम हिंदू कह रही हो, वही तुम्हारा दामाद बन चुका है. कोर्ट में मैं खुद मौजूद था गवाह के तौर पर और तभी जज ने शादी बिना रोकटोक के होने दी थी.’’

‘‘मैं नहीं मानती उसे दामाद,’’ उसी तरह नासिरा बी गुस्से से बोलीं, ‘‘पुलिस को ले जाओ और उसे छुड़ा कर लाओ.’’

‘‘पुलिस भी कानून से बंधी हुई है बेगम. दोनों बालिग हैं और कुलसुम बयान देगी कि उस ने अपनी मरजी से शादी की है और बाप की गवाही है, तब पुलिस भी कुछ नहीं कर पाएगी. उसे अपना दामाद मान कर भूल जाओ,’’ समझाते हुए हामिद शाह बोले.

‘‘तुम बाप हो न, इसलिए तुम्हारे दिल में पीड़ा नहीं है. एक मां की पीड़ा को तुम क्या जानो?’’ गुस्से से नासिरा बी बोलीं, ‘‘मैं सब समझती हूं तुम बापबेटी की यह चाल है. खानदान में मेरी नाक कटा दी,’’ कह कर नासिरा बी गुस्से से बड़बड़ाती हुई चली गईं.

हामिद शाह मुसकराते हुए रह गए. नासिरा बी अब भी अंदर से बड़बड़ा रही थीं. इधर दोनों बेटे भी दुकान पर चले गए.

Best Stories : न इधर की, न उधर की

Best Stories : किचन के एक साफ कोने में फर्श पर बिछाए अपने बिस्तर पर मधुवंती करवटें बदल रही थी. क्यों न करवटें बदले, युवा सपनों में डूबी आंखों में कैसे नींद आए जब बैडरूम से ऐसी आवाज़ें आ रही हों कि अच्छाभला इंसान सोते से जग जाए. वह दम साधे लेटी थी. उसे पता था कि अभी  नशे में डूबी नायशा फ्रिज से ठंडा पानी लेने आएगी या उस से उठा नहीं  गया तो मधुमधु चिल्लाएगी या नायशा का बौयफ्रैंड देवांश ही पानी लेने आएगा. अब एक साल में  मधुवंती इतना तो समझ गयी थी कि नायशा जम कर शराब पीने के बाद बौयफ्रैंड के साथ जीभर वह सबकुछ करती है जिसे न करने देने के लिए नायशा के गांव में रहने वाले पेरैंट्स ने उसे अपनी बेटी के साथ भेज दिया था. पर मधुवंती कैसे नायशा की लाइफस्टाइल में दखल दे सकती थी, वह है तो एक नौकर ही. क्या उस की इतनी हैसियत है कि नायशा को ज्ञान दे? इतने में उसे क़दमों की आहट सुनाई दी. उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं. किचन में अंधेरा था. पर मधुवंती की आंखें अंधेरे में देखने की अभ्यस्त हो चुकी थीं. देवांश था. उस के डिओ की खुशबू मधुवंती को बहुत पसंद थी. मधुवंती का मन इस खुशबू से खिल उठा था. उस ने धीरे से आंखों को ज़रा सा खोल कर देखा. देवांश फ्रिज से पानी की बोतल निकाल रहा था. उस के  सुगठित शरीर पर मधुवंती की नज़रें टिकी रह गईं. देवांश चला गया. इतने में नायशा के खिलखिलाने की आवाज़ से मधुवंती फिर देर तक सो न सकी. फिर रोज़ की तरह नायशा के बैडरूम की तरफ ध्यान लगाएलगाए उस की आंख लग ही गई.

यह वाशी, मुंबई की एक बिल्डिंग का वन बैडरूम फ्लैट है. नायशा ने इस फ्लैट को मुंबई आते ही अपने कलीग्स की हैल्प से किराए पर  लिया है. वह मालेगांव की रहने वाली है और इस समय एक अच्छे पद पर काम करती है. उस के पेरैंट्स ने अपने घर में काम कर रही मेड की किसी दूर की रिश्तेदार मधुवंती को नायशा की देखभाल के लिए मुंबई साथ भेज दिया है. मुंबई में नायशा कैसे जीती है, इस की भनक उस के सीधेसादे पेरैंट्स को लग ही नहीं सकती. नायशा ने अपनी पढाई पुणे में रह कर की थी जहां उस के काफी बौयफ्रैंड्स रहे. अपनी आज़ाद लाइफ में जो सब से बुरी आदत उसे लगी है, वह है बेहिसाब शराब पीने की. दिन में औफिस, शाम होते ही कोई न कोई बौयफ्रैंड और शराब. बस, यही है नायशा की लाइफ.

मधुवंती हैरान होती है कि गांव की नायशा मुंबई में पहचान में भी नहीं आती. वहां वह इतनी सुशील, संस्कारी बन कर रहती कि लोग कहते कि लड़की हो तो ऐसी, अपने घर से बाहर रहने पर भी कोई बुरी आदत नहीं. वाह. अब मधुवंती मन ही मन हंसती है, उस ने तो अब तक लड़कों के ही ऐसे काम सुने थे, मूवीज में देखे थे लेकिन अब तो नायशा के रंगढंग उसे इतना हैरान कर चुके थे कि पता नहीं उस की भी कौन सी सुप्त इच्छाएं जागने को तैयार थीं.

सुबह मधुवंती ही सब से पहले उठी. फ्रैश हो कर नाश्ता और नायशा के टिफ़िन की तैयारी करने लगी. जब तक नायशा और देवांश सो कर उठे, वह काफी काम निबटा चुकी थी. उस ने दोनों को चाय का कप पकड़ा कर नायशा का टिफ़िन पैक कर के टेबल पर रखा. देवांश ने कहा, “यार नायशा, तुम्हारी बड़ी ऐश है. मधु सब काम संभाल  लेती है. मुझे तो सब काम करना पड़ता है. मधु, यार, तुम मेरे घर चलो,” कह कर देवांश मधु को देख कर मुसकराया तो मधु ने भी बड़ी अदा से उसे देखा और मुसकरा दी. नायशा ने देवांश को बनावटी डांट लगाई, “खबरदार, मधु पर नज़र डाली. वह कहीं चली गई, तो मैं तो मर ही जाऊंगी. अपने काम मुझ से होते नहीं, यह सच है. यार मधु, तुम इस पर ध्यान मत दो. इसे बढ़ावा  न दो. देवांश, मधु मेरी है, मेरी ही रहेगी.”

हंसीमज़ाक, छेड़छाड़ के साथ सुबह की चाय पी गई और देवांश अपने घर चला गया. वह थोड़ी दूर की ही बिल्डिंग में रहता था. नायशा भी औफिस के लिए तैयार होने लगी. नाश्ता करते हुए वह बोली, ”मधु, तुम्हारे साथ से मेरी लाइफ बहुत इजी रहती है, कोई काम नहीं करना पड़ता, थैंक यू, यार. तुम तो मेरी हमराज़ भी हो. मेरे घरवाले भी यही सोच कर खुश हैं कि मैं अकेली नहीं हूं. और सुनो, अगर रात देवांश मुझ से पहले आ जाए तो उस से खाना खाने को पूछ लेना. मेरी एक मीटिंग है, मुझे टाइम लग सकता है.”

मधु नायशा से 4 साल ही छोटी थी. गांव में उस के मातापिता उस की बड़ी 2 बहनों के विवाह के लिए परेशान थे. सो, वे लोग यही सोच कर तसल्ली कर लेते थे कि मधु फिलहाल जहां रह रही है, आराम से रह रही है. नायशा उसे  अपने घर भेजने के लिए अच्छेखासे पैसे भी दे देती थी.

मधु इस रोमांच से भर उठी थी कि देवांश नायशा से पहले आ सकता है. वह मन ही मन देवांश पर आसक्त थी. पर अपनी हैसियत याद कर के कोई भी गलत हरकत नहीं करना चाहती थी. देवांश को देखना उस के युवामन को खूब भाता. 7 बजे ही देवांश ने डोरबैल बजा दी. मधुवंती शाम से ही नहाधो कर साफ़सुथरे कपड़ों में सजी सी मन ही मन उस का इंतज़ार कर रही थी. सुंदर तो वह थी ही. देवांश आते ही सोफे पर ढह सा गया, बोला, ”नैश तो लेट आएगी न?”

”जी.”

मधुवंती हैरान हुई, जब वह जानता है कि नायशा लेट आएगी तो इतनी जल्दी क्यों आ गया. देवांश ने फिर उठ कर किचन में जा कर एक गिलास में थोड़ी शराब ली, बर्फ डाली और कहा, ”मधु, तुम ने कभी शराब पी है?”

”नहीं.”

”आओ, आज टैस्ट कर लो.”

”नहींनहीं, बिलकुल नहीं.”

”अरे, आओ न,” कहतेकहते देवांश ने अपना गिलास उस के मुंह से लगा दिया. घूंट भरते ही मधुवंती पीछे हटने लगी. देवांश उस के साथ थोड़ी नजदीकी बढ़ाते हुए आगे बढ़ने लगा. जैसे ही मधुवंती की कमर में देवांश ने हाथ डाला, डोरबैल हुई. देवांश तुरंत सोफे पर जा कर बैठ गया. नायशा आई थी, हैरान हो कर बोली, ”तुम जल्दी आ गए?”

”हां, मन नहीं लगता अब अकेले,” कहते हुए उस ने उठ कर नायशा के गाल पर किस कर दिया और मधु को देख कर शरारत से मुसकरा दिया. नायशा ने उस के रोमांस का आनंद उठाते हुए कहा, ”अरेअरे, मुझे हाथ तो सैनिटाइज़ करने दो. कोरोना के केस फिर बढ़ने लगे हैं.”

”अरे, अब क्या चिंता, हमारे  पास तो मधु है, लौकडाउन में लोग मेड के लिए रोते रह गए पर तुम ने तो आराम ही किया.”

”फ्रैश हो कर आती हूं. मेरे लिए भी एक पैग तैयार रखना, लाओ, एक घूंट पी ही लूं,” कह कर नायशा देवांश का पूरा गिलास खाली कर नहाने चली गई. वह हंसता हुआ किचन की तरफ जाने लगा. जातेजाते उस ने मधुवंती को जिन निगाहों से देखा, मधु रोमांचित हो उठी. वह डिनर की तैयारी करने लगी. अचानक देवांश से बोली, ”कुछ चीजें ख़त्म हो गई हैं, दीदी से कहना, अभी ले कर आई.”

नायशा का फ्लैट चौथी फ्लोर पर था. नीचे जा कर मधु ने थोड़ी सब्जी खरीदी. उस के पास इतना पैसा रहता था कि वह घर के सामान ला सके. वापस लौटते हुए वह बिल्डिंग के वौचमैन सुधीर से बातें करने लगी. वह भी उसी की उम्र का था और दोनों में 3 महीने से काफी नजदीकी आ चुकी थी.

मुंबई की सोसाइटी में जो वौचमैन ड्यूटी करते हैं, ज़्यादातर वे सब दूर राज्यों के छोटे गांवों से अकेले, बिना परिवार के आए होते हैं. एकएक रूम को कई लोग शेयर कर लेते हैं. सुधीर यहां दिन की ड्यूटी करता था और विमल रात की. दोनों ही वौचमैन से मधुवंती के नजदीकी संबंध बन चुके थे. आजकल इस सोसाइटी में अकेले रहने वाले बैचलर्स को फ्लैट किराए पर नहीं दिए जा रहे थे पर नायशा और मधुवंती को सब लोग बहुत शरीफ समझते थे, ये किसी को भी शिकायत का मौका नहीं देती थीं. नायशा के बौयफ्रैंड भी हमेशा चुपचाप आते, चुपचाप चले जाते. ये लोग साथ में कभी नहीं आतेजाते थे, इसलिए किसी की नज़रों में लड़कों का फ्लैट में आनाजाना ज़्यादा नहीं आ पाया था. नायशा के फ्लोर पर रहने वाले एक परिवार में बुजुर्ग दंपती ही थे. बाकी दोनों फ्लैट्स बंद रहते. सुधीर ने मधुवंती से कहा, ”कल दिन में आ जाऊं, तेरी मैडम औफिस जाएगी न?”

”आ जाना,” मधु ने शरारत से कहा, “और हां, आएगा तो थोड़ी मस्ती करेंगे, काफी सामान मैडम ने ला कर रखा है.”

”वाह, आता हूं,” सुधीर हंसा. आजकल नायशा के रंगढंग देख कर मधु भी  पूरी तरह वही सब करने लगी थी जो नायशा करती. ऊपर आने पर मधु ने देखा, देवांश और नायशा बैडरूम में बंद हो चुके थे. वह भी लाया हुआ सामान संभालने लगी. डिनर के समय ही दोनों बैडरूम से निकले. देवांश की आंखों की खुमारी देख मधु का मन उस की तरफ खिंचा. वह भी उसे ही देखता रहा. दोनों डिनर कर के, थोड़ी देर टी वी देख कर सोने चले गए. रात फिर वैसी ही थी, जैसी रोज़ होती थी.

देररात मधु की आंख एक झटके से खुली. उस के पास देवांश बैठा, उसे छू रहा था. वह झटके से उठ कर बैठी तो देवांश फुसफुसाया, “वह सो रही है. मधु, मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूं.”

नींद में डूबी मधु इस बात पर पूरी चौकन्नी हो गई, बोली, ”नहीं साब, आप अभी जाओ.”

”ठीक है, दिन में मिलता हूं.”

मधु को फिर नींद नहीं आई. उसे लगा, देवांश जैसा लड़का उस के पास आया है. वह अगर उसे थोड़ी ढील दे दे तो वह अपना जीवन बदल सकती है. सुधीर और विमल जैसे वौचमेन उसे जीवन में क्या देंगे. सब अपना टाइम पास ही तो कर रहे हैं, वह भी उन के साथ कौन सा सीरियस हो कर जीवन में आगे बढ़ने वाली है. ऐश तो देवांश के साथ ज़्यादा हो सकती है. उस ने बाकी की रात अपने भविष्य के बारे में सोचते हुए बिताई.

नायशा रोज़ की तरह शराब पी कर नशे में धुत सोई थी. वह सीधे सुबह ही उठती थी. अगली सुबह दोनों निकल गए तो मधु ने इंटरकौम से सुधीर को जल्दी आने के लिए कहा, सुधीर ने दूसरी बिल्डिंग के वौचमैन से कहा, ”मैं अभी आता हूं, तू इधर का भी ध्यान रखना.”

सब वौचमेन की आपस में खूब बनती थी.

सुधीर के साथ बैठ कर मधुवंती ने पहले थोड़ीथोड़ी शराब पी, फिर नायशा के बैड पर ही सारी दूरियां ख़त्म कर उसी के साथ बैठ कर खाना खाया. ऐसा वे कई बार करते. नायशा के बैड पर आज लेटते हुए वह कल्पना कर रही थी कि बहुत जल्दी देवांश भी उस के साथ यहां होगा. कई बार किसी वीकैंड पर नायशा और देवांश लोनावला या माथेरान चले जाते तो नायशा रात के वौचमैन विमल को भी ऐसे ही अपने पास बुला लेती. दोनों उस पर बुरी तरह मरते. अब मधुवंती गांव जल्दी जाना न चाहती. उसे शहरी आबोहवा, ये रंगढंग खूब अच्छे लगते. इस के कुछ ही दिनों बाद नायशा को एक रात के लिए पुणे जाना था, क्लाइंट मीटिंग थी. नायशा उसे सब निर्देश दे कर चली गई. रात 8 बजे देवांश आया. वह चौंकी नहीं. वह तो मन ही मन इस बात के लिए सजसंवर कर  तैयार थी. देवांश दीवाना सा उस का हाथ पकड़  कर प्रेम निवेदन करने लगा. वह सुंदर सपनों में डूबतीउतराती रही. फिर वही सब हुआ, जो होना ही था. देवांश वही था, वही बैडरूम, वही बैड, वही शराब के पैग. बस, नायशा की जगह मधुवंती थी जो इस समय खुद को नायशा की जगह पा कर अपनेआप को धन्य मान रही थी. धीरेधीरे यही रूटीन शुरू हो गया. दोनों बहुत जल्दी एकदूसरे में इतना डूबे रहने लगे कि अब तो कई बार मधुवंती ही नायशा के औफिस जाने के बाद देवांश के फ्लैट पर चली जाती. उस के घर की हर चीज की देखभाल अपने हाथों से करती. ऐसी बातें कब तक छिपतीं. एक रात नायशा की आंख खुल गई, देखा, देवांश बैड पर नहीं था. वह नशे में लड़खड़ाती लिविंगरूम में आई. सोफे पर देवांश और मधुवंती को जिस हालत में देखा, उस का नशा हिरन हो गया. ज़ोरज़ोर से चिल्लाने लगी. देवांश ‘सौरी नायशा’ कहता हुआ, अपने कपड़े ठीक करता हुआ, अपना सामान तुरंत ले कर फ्लैट से निकल गया. नायशा मधुवंती पर चिल्लाए जा रही थी. थोड़ी देर तो वह सुनती रही, फिर खुल कर मैदान में आ गई, बोली, ”मुझे जाने को कहोगी, दीदी, मैं चली जाऊंगी. कोई बात नहीं. करना फिर खुद सारे काम.  गांव जा कर आप की बोतलों का हिसाब सब को बताऊंगी न, तो देखना, कैसे आप के घरवाले आप को सुधारते हैं. खुद नशे में डूबी रहती हो, अपने घरवालों से इतने झूठ बोलती हो. मुझे रहना ही नहीं आप के साथ. मैं देवांश साब के घर में जा कर रह लूंगी. सोसाइटी वाले भी आप को ज़्यादा  दिन अकेले यहां रहने नहीं देंगे. आप की सारी बुरी आदतें सब को पता चल जाएंगी. मैं तो कल सुबह ही देवांश साब के घर चली जाऊंगी.”

नायशा सिर पकड़ कर बैठ गई, जिसे कम पढ़ीलिखी समझ कर अपने साथ नौकर की ही तरह रखा हुआ था, वह अब शेरनी की तरह गुर्रा रही थी. मधुवंती किचन में अपनी जगह जा कर लेट गई. नायशा सोफे पर सिर पकड़ कर बैठी थी. बुरी आदतों ने कहीं का न छोड़ा था उसे. इस से पहले जितने भी बौयफ्रैंड्स से रिश्ता ख़त्म हुआ था, उन का कारण कहीं  न कहीं आज़ादी के नाम पर कई बौयफ्रैंड्स से रिश्ते रखना और खूब शराब पीना था. लाइफ को बिलकुल फ्री हो कर जीने में यकीन रखने वाली नायशा को अभी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मधु का क्या करे. उसे पास रखने में भी नुकसान थे, निकाल देने में भी. वह गांव जा कर उस के रहनसहन की सारी पोल खोल सकती थी. बहुत बुरी फंसी थी वह. मधु जाती, तो मधु से मिलने वाले आराम ख़त्म होने वाले थे. देवांश का साथ भी छूट गया था. नुकसान ही नुकसान हुआ था.

Hindi Kahani : क्या हुआ फूड इंस्पैक्टर की रिश्वतखोरी का जब लालाजी ने किया विरोध?

Hindi Kahani :  ‘‘मेरे यहां न तो कोई गलत माल बनता है न ही मैं मिलावट करता हूं. मैं किस बात का महीना दूं?’’ लाला कुंदन लाल ने रोष भरे स्वर में कहा.

‘‘लालाजी, बात अकेली मिलावट की नहीं है…अब पुराने नियम और तरीके सब बदल चुके हैं. मिलावट के साथसाथ अब सफाई, रंग और कैलोरी आदि की भी जांच की जाती है,’’ स्वास्थ्य विभाग के चपरासी श्यामलाल ने धीमे स्वर में कहा.

‘‘मगर मेरे यहां सफाई का स्तर ठीक है. आप सारे रेस्तरां में कहीं भी गंदगी दिखाएं, किचन में सबकुछ स्टैंडर्ड का है.’’

‘‘ये सब बातें कहने की हैं. अफसर लोग नहीं मानते.’’

‘‘मांग जायज हो तो मानें. पिछले 3 साल से महीने की दर बढ़तेबढ़ते 10 गुनी हो गई है…यह तो सरासर लूट है.’’

‘‘महीना सब का बढ़ाया है, अकेले आप ही का नहीं.’’

‘‘मगर मैं इतना नहीं दे सकता.’’

‘‘सोचविचार कर लीजिए. खामख्वाह पंगा पड़ जाएगा,’’ एक तरह से धमकी देता श्यामलाल चला गया.

चपरासी के जाते दोनों बेटे सुरेश और अशोक भी पिता के पास आ गए. कहां तो 100 रुपए महीना था, अब 3 हजार रुपए महीना मांगा जा रहा है. पहले मिलावट के मामले में सजा अधिकतम 6 महीने से 1 साल तक थी साथ में 1 से 2 हजार रुपए तक जुर्माना था.

नए प्रावधानों में अब न्यूनतम सजा 3 साल की तथा जुर्माना 25 हजार से 3 लाख रुपए तक हो गया था. जैसे ही कानून सख्त हुआ था वैसे ही रिश्वत की दर भी आसमान पर पहुंच गई. सफाई या हाईजिन स्तर के नाम पर किसी प्रतिष्ठान, दुकान को बंद करवाने का अधिकार भी खाद्य निरीक्षक को मिल गया था. इस से भी अब लूट बढ़ गई थी.

लालजी की गोलहट्टी के नाम से खानेपीने की दुकान सारे शहर में मशहूर थी. माल का स्तर शुरू से काफी अच्छा था. मिलावट वाली कोई वस्तु नहीं थी.  मिलावट तो नहीं थी मगर प्रयोग- शालाओं में कई अन्य आधारों पर नमूना फेल हो जाता था. नमूने को कभी स्तरहीन या अखाद्य या ‘एक्सपायर्ड’ भी करार दे दिया जाता था, जिस से मुकदमा दर्ज हो जाता था या फिर दुकान बंद हो जाती.

जितने ज्यादा नए कानून बनते उतने नए अपराधी बनते. जितना सख्त कानून होता उतना ज्यादा रिश्वत का रेट होता. अपराध तो कम नहीं होते थे, भ्रष्टाचार जरूर बढ़ जाता था.  लाला कुंदन लाल ने जीवनभर मिलावट नहीं की थी. वे ऐसा करना पसंद नहीं करते थे. ग्राहकों को साफसुथरा खाना देना अपना कर्तव्य समझते थे. किसी जमाने में मिलावट का नाम भी नहीं था. मिलावट क्या होती है…कोई नहीं जानता था.  तब खाद्य निरीक्षक का पद भी नहीं था. नगर परिषद का सैनेटरी इंस्पैक्टर कभीकभार बाजार का चक्कर लगा लेता था. किसीकिसी का सैंपल या नमूना ले कर प्रयोगशाला को भेज दिया करता था. सैंपल फेल कम आते थे. सैंपल फेल आने पर जुर्माना होता था जो 50 रुपए से 400-500 रुपए तक था. मगर ऐसा कम ही होता था. कोई सजा का मामला नहीं था.

अब वक्त बदल चुका था. आबादी बहुत बढ़ गई थी. साथ ही कानून और अपराधी भी. अब सैंपल या नमूना फेल ज्यादा आते थे, पास कम होते थे. गेहूं के साथ घुन भी पिसता है, के समान मिलावट न करने वाले भी फंस जाते थे.

लाला कुंदन लाल के साथ दोनों बेटे भी विचारमग्न थे. क्या करें? कभी रिश्वत मात्र 100  रुपए महीना थी अब 3 हजार रुपए मांगे जा रहे थे. कल को या भविष्य में 30 हजार रुपए महीना भी मांगे जा सकते थे. वे मिलावट नहीं करते थे मगर हर जगह बेईमानी थी. प्रयोगशालाओं में नमूने फेल, पास करवाए जाते थे.  अपने विरोधी या प्रतिद्वंद्वी को फंसाने के लिए कई व्यापारी उस का नमूना प्रयोगशाला में फेल करवा देते थे. बदले समय के साथ अब व्यापार में भी घटियापन बढ़ गया था.

‘‘फूड इंस्पैक्टर 3 हजार रुपए महीना मांग रहा है,’’ लालाजी ने दोनों बेटों को बताया.

‘‘पिताजी, दे दीजिए. सैंपल भर लिया, फेल करवा दिया तब परेशानी बढ़ जाएगी,’’ छोटे बेटे अशोक ने कहा.

‘‘मगर इन की मांग सुरसा के मुंह के समान बढ़ती जा रही है. कभी 100 रुपए महीना था. अब 3 हजार रुपए मांग रहे हैं, साथ ही आधा दर्जन लोग खाने आ जाते हैं,’’ लालाजी ने रोष भरे स्वर में कहा.

इस पर दोनों बेटे खामोश हो गए. क्या करें? पुराना फूड इंस्पैक्टर शरीफ था. 100 रुपए महीना लेने पर भी विनम्रता से पेश आता था. नए जमाने का खाद्य निरीक्षक 3 हजार ले कर भी रूखे और रोबीले अंदाज में बात करता था.  लालाजी मिलावट पहले नहीं करते थे, अब भी नहीं करते. बात सिर्फ इंसाफ की थी. इंसाफ कहां था? प्रयोगशालाओं में निष्पक्षता न थी यही सब से बड़ी समस्या थी.  2 दिन बाद, चपरासी श्यामलाल दोबारा आया.

‘‘लालाजी, क्या इरादा है?’’

‘‘मैं ने पहले भी कहा है, मैं मिलावट नहीं करता. मैं महीना किस बात का दूं?’’ दोटूक स्वर में लालाजी ने कहा.

‘‘लालाजी, सोच लीजिए,’’ यह बोल कर गुस्से से तमतमाता चपरासी वापस चला गया.

‘‘पिताजी, आप ने यह क्या किया? अब यह हमारा सैंपल भरवा देगा?’’ दोनों बेटों ने पिताजी के पास आ कर कहा.

‘‘जो होगा देखेंगे. जोरजबरदस्ती की भी एक सीमा है. जब हम मिलावट ही नहीं करते तब महीना किस बात का दें.’’

‘‘पिताजी, वे प्रयोगशाला से नमूना फेल करवा देंगे.’’

‘‘जो होगा देखेंगे. अब मैं 60 साल का हूं. मुकदमा हो भी जाता है तो भी परवा नहीं है,’’ लालाजी के स्वर में एक निश्चय और चेहरे पर आभा थी.

शाम से पहले एक बड़ी स्टेशनवैगन गोलहट्टी के सामने आ कर रुकी. चिरपरिचित खाद्य निरीक्षक सोम कुमार और स्वास्थ्य अधिकारी मैडम शकुंतला उतर कर दुकान में प्रवेश कर गए.

‘‘दुकान का मालिक कौन है?’’ फूड इंस्पैक्टर ने रौब से पूछा.  लालाजी सब माजरा समझ रहे थे. दर्जनों बार परिवार सहित खापी कर जाने वाला पूछ रहा है कि दुकान का मालिक कौन है.

‘‘मैं हूं जी, बात क्या है?’’

इस दबंग जवाब की उम्मीद फूड इंस्पैक्टर को न थी.

‘‘क्याक्या बनाते हैं आप?’’

‘‘सामने काउंटर में रखा है, देख लीजिए.’’

‘‘आप के पास इस काम का लाइसैंस है?’’

‘‘हां, है जी. यह देखिए,’’ लालाजी ने शीशे से मढ़ी तसवीर के समान फ्रेम में जड़ी म्यूनिसिपैलिटी के लाइसैंस की कापी सामने रखते हुए कहा.

‘‘आप के खिलाफ स्तरहीन खाद्य- पदार्थ बनाने और बेचने की शिकायत है, आप का नमूना भरना है.’’

‘‘जरूर भरिए, किस चीज का नमूना दें?’’

इस बेबाक जवाब पर खाद्य निरीक्षक सकपका गया. काउंटर वातानुकूलित था. माल सब साफ था. दुकान में मक्खी, कीट, मच्छर का नामोनिशान तक न था. दुकान में सर्वत्र साफसफाई थी. रसोईघर साफसुथरा था.  गुलाबजामुन और रसगुल्लों का नमूना ले लिया. पहले कभी आने पर लालाजी ड्राईफू्रट से आवभगत करते थे मगर इस बार जानबूझ कर पानी भी नहीं पूछा. इस से इंस्पैक्टर चिढ़ गया.

नमूना ले सब चले गए.  ‘‘पिताजी, अगर नमूना फेल हो गया तो?’’ दोनों बेटों ने कहा, ‘‘पड़ोसी कहता है वह एक दलाल को जानता है जो प्रयोगशाला से नमूना पास करवा सकता है.’’

‘‘मगर हम तो मिलावट करते नहीं हैं, हौसला रखो, जो होगा देखेंगे.’’  शाम को चपरासी फिर आया. लालाजी ने प्रश्नवाचक निगाहों से घूरते हुए उस की तरफ देखा.

‘‘फूड इंस्पैक्टर कहता है अगर आप को मामला निबटाना है तो निबट सकता है.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘आप चाहें तो नमूना यहीं खत्म कर देते हैं. प्रयोगशाला में नहीं भेजेंगे और आप चाहें तो नमूना प्रयोगशाला से पास भी करवा सकते हैं. हमारे पास दोनों इंतजाम हैं.’’

‘‘जब मैं मिलावट नहीं करता तब कैसा भी इंतजाम क्यों करूं?’’

चपरासी चुपचाप चला गया. डेढ़ माह बाद नतीजा आया. दोनों नमूने पास हो गए. लालाजी का मनोबल ऊंचा हो गया. दुकान की साख बढ़ गई. 2 माह गुजर गए.  दोपहर को स्वास्थ्य विभाग की वही पहली वाली जीप दुकान के सामने आ कर रुकी.

‘‘आप के खिलाफ शिकायत है. किसी ग्राहक को आप के यहां नाश्ता करने के बाद पेट में दर्द हुआ था,’’ फूड इंस्पैक्टर ने कहा.

‘‘वह कौन है?’’

‘‘प्रमुख चिकित्सा अधिकारी के पास लिखित शिकायत आई थी. आप का नमूना भरना है.’’

‘‘जरूर भरिए.’’

लालाजी के स्वर की दृढ़ता से स्वास्थ्य अधिकारी भी थोड़ा विचलित था. खाद्य निरीक्षक ने दुकान में नजर दौड़ाई. दुकान छोटीमोटी रेस्तरां थी. 4-5 मिठाइयां जैसे रसगुल्ले, गुलाबजामुन, रसमलाई, मिल्ककेक, पिस्ता बर्फी और पुलावचावल के साथ राजमा और छोलेभठूरे आदि प्लेट और पीस रेट के हिसाब से बेचे जाते थे.  दीवार पर रेट लिस्ट लगी थी. साथ  ही लिखा था, ‘यहां गाय का दूध प्रयोग होता है.’, ‘मिल्क नौट फौर सेल’, ‘दूध बेचने के लिए नहीं है.’  प्रावधानों के अनुसार जो वस्तु बेचने के लिए न हो उस का नमूना नहीं लिया जा सकता था. मिठाई का सैंपल पास हो चुका था. चावल, पुलाव, राजमा, छोलेभठूरे में क्या मिलावट हो सकती थी?

‘‘जरा छोले दिखाइए.’’

लालाजी के इशारे पर कारीगर ने एक कटोरी में गैस पर रखे गरम छोले डाल कर दे दिए. नाक के समीप ला उस को सूंघते हुए फूड इंस्पैक्टर ने कहा, ‘‘मसाले की गंध कुछ अजीब सी है. आप इस का नमूना दे दीजिए.’’  मसालाचना, राजमा व छोले की तरी का नमूना अलग से ले टीम चली गई. इस बार चपरासी ‘इंतजाम’ की बात करने नहीं आया. बेटों के सामने भी ‘दलाल’ की मार्फत नमूना पास करवाने की बात नहीं उठाई.  डेढ़ महीने बाद नतीजा आया. राजमा, मसालाचना का नमूना पास हो गया था. छोलेतरी का नमूना निर्धारित मात्रा से ज्यादा मसाला मिलाने पर तकनीकी आधार पर फेल हो गया था.  रजिस्टर्ड डाक से लालाजी को नोटिस मिला. ‘आप का नमूना प्रयोगशाला द्वारा फेल घोषित किया गया है. आप इस तारीख को मुख्य दंडाधिकारी के न्यायालय में हाजिर हों. यदि आप राज्य प्रयोगशाला की रिपोर्ट से असहमत हैं तो केंद्रीय प्रयोगशाला में नमूने को दोबारा परीक्षण हेतु 10 दिन के अंदरअंदर भिजवा सकते हैं.’

लालाजी नोटिस की प्रति ले कर अपने परिचित वकील के पास पहुंचे.  ‘‘अरे, भाई, इस मामले को निचले स्तर पर निबटा देना था. जो मांग रहे थे दे देते,’’ वकील साहब ने नोटिस पढ़ कर कहा.

‘‘मांग जायज होती तो पूरी कर भी देता. कभी 100-200 रुपए महीना मांगते थे अब 3 हजार रुपए और ऊपर से कभी भी खानेपीने को आ जाते. साथ में रौब अलग से.’’  ‘‘मगर मुकदमा कई साल चल सकता है. पेशियों की परेशानी है. नमूना तकनीकी आधार पर फेल है इसलिए सजा का मामला नहीं है. सजा मिलावट के मामले में होती है,’’ वकील साहब ने कहा.  ‘‘और अगर इसे केंद्रीय प्रयोगशाला में दोबारा परीक्षण के लिए भेज दूं तो?’’

‘‘तब कई पहलू हैं. केंद्रीय प्रयोगशाला इसे पास कर सकती है. राज्य प्रयोगशाला की रिपोर्ट के समान ही रिपोर्ट दे सकती है. विभिन्न रिपोर्ट दे सकती है. मिलावट घोषित कर सकती है.’’

‘‘यह तो एक किस्म का जुआ है. ठीक है, हम नमूना दोबारा परीक्षण के लिए केंद्रीय प्रयोगशाला में भेज देते हैं.’’  निर्धारित तिथि को लालाजी, एक पड़ोसी दुकानदार को बतौर जमानती, एक पूर्व नगर पार्षद को बतौर शिनाख्ती और नमूना दोबारा भिजवाने के लिए लकड़ी का खाली डब्बा, रुई का बंडल, सफेद कपड़े का टुकड़ा ले अदालत पहुंच गए.  पहले जमानत हुई. फिर नमूना भेजने की तारीख पड़ी. तारीख वाले दिन नमूना दोबारा सील कर केंद्रीय प्रयोगशाला में रजिस्टर्ड पार्सल द्वारा भेज दिया गया.  चपरासी अब फिर आया.

‘‘लालाजी, हमारे पास केंद्रीय प्रयोगशाला में इंतजाम है.’’

‘‘नहीं भाई, मुझे इंतजाम नहीं करवाना. नमूना फेल भी आ जाता है तो भी कोई बात नहीं. जब तक अदालत फैसला सुनाएगी मैं इस दुनिया से बहुत दूर जा चुका होऊंगा.’’  लालाजी के इस बेबाक जवाब पर चपरासी चला गया. दुकान में खापी रहे ग्राहक खिलखिला कर हंस पड़े.

2 महीने बाद नतीजा आया. नमूना मिलावटी नहीं था. मसाले की मात्रा निर्धारित स्तर से कम थी जबकि राज्य प्रयोगशाला ने मसाले की मात्रा निर्धारित स्तर से ज्यादा बताई थी.  चार्ज की पेशी पर बहस हुई. माननीय न्यायाधीश ने दोनों प्रयोगशालाओं द्वारा दी गई अलगअलग परीक्षण रिपोर्टों के आधार पर लालाजी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया.  सारे सिलसिले में 7-8 महीने का समय लगा? और 12 हजार रुपए खर्च हुए. थोड़ी परेशानी तो हुई मगर लालाजी के नैतिक साहस और बेबाकी की सारे दुकानदारों और पड़ोसियों में चर्चा और प्रशंसा हुई.

Hindi Kahani : संबंधों का कातिल

Hindi Kahani :   ‘‘माफ करना भाई, तुम्हें तो बात भी करना नहीं आता,’’ इतना बोल कर सुबोध ने अपने हाथ जोड़ लिए तो मानव खीज कर रह गया.

अचानक बात करतेकरते दोनों को ऐसा करता देख मैं भी घबरा गया. कमरे में झगड़ा हो और नकारात्मक माहौल बन जाए तो बड़ी घुटन होती है. मैं तनाव में नहीं जी सकता. पता नहीं कैसाकैसा लगने लगता है. ऐसा लगता है जैसे किसी ने नाक तक मुझे पानी में डुबो दिया हो.

‘‘शांत रहो भाई, तुम दोनों को क्या हो गया है?’’

‘‘कुछ नहीं, मैं भूल गया था कि कुपात्र को सीख नहीं देनी चाहिए. जिसे कुछ लेने की चाह ही न हो उसे कुछ कैसे दिया जा सकता है. बरतन सीधे मुंह रखा हो तभी उस में कोई चीज डाली जा सकती है, उलटे बरतन में कुछ नहीं डाला जा सकता. चाहे पूरी की पूरी सावन की बदली बरस कर चली जाए पर उलटे पात्र में एक बूंद तक नहीं डाली जा सकती. जिस चरित्र का यह मालिक है उस चरित्र पर तो किसी की अच्छी सलाह काम ही नहीं कर सकती. ऐसे लोग कभी किसी के हो कर नहीं रहते.’’

मानव चेहरे पर विचित्र भाव लिए कभी मेरा मुंह देख रहा था और कभी सुबोध का…जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो, जैसे उस का कोई परदा उठा दिया हो किसी ने. अभी कुछ दिन पहले ही तो सुबोध हमारे साथ रहने आया है. हम तीनों एक ही कमरा शेयर करते हैं. हमारे पेशे अलगअलग हैं लेकिन रहने को छत एक ही है जिस के नीचे हमारी रात और सुबह बीतती है.

‘‘चरित्र से…क्या मतलब है तुम्हारा?’’

‘‘क्या इस का मतलब तुम्हें नहीं पता? इतने तो नासमझ नहीं हो तुम, जो तुम्हें चरित्र का मतलब पता ही न हो. पढ़ेलिखे हो, अच्छी कंपनी में काम करते हो, हर महीने अच्छाखासा वेतन पाते हो, जूता तक तो तुम्हारा ब्रांडेड होता है. कंपनी में ऊपर तक जाने की जितनी तीव्र इच्छा  तुम्हें है उस के लिए अनैतिकता के कितने गहरे गड्ढे में धंस चुके हो, तुम्हें खुद ही नहीं पता…तुम कहां से हो और कहां जा रहे हो तुम्हें जरा सी भी समझ है? क्या जानते भी हो, कहां जा रहे हो…और कहां तक जाना चाहते हो उस की कोई तो सीमा होगी?’’

‘‘सीमा…सीमा कौन? किस की बात कर रहे हो?’’

‘‘मैं तुम्हारी पत्नी सीमा की बात नहीं कर रहा हूं. मैं तो उस सीमा की बात कर रहा हूं जिसे हद भी कहा जाता है. हद यानी एक वह सूक्ष्म सी रेखा जिस के पार जाने से पहले मनुष्य को लाख बार सोचना चाहिए.’’

मैं आश्चर्यचकित रह गया. सीमा नाम की लड़की मानव की पत्नी है लेकिन मानव ने तो कहा था कि वह अविवाहित है और अपनी ही कंपनी में साथ काम कर रही एक सहयोगी के साथ उस के संबंध बहुत गहराई तक जुड़े हैं, सब जानते हैं. तो क्या मानव सब के साथ झूठ बोल रहा है? हाथ का काम छोड़ मैं सुबोध के समीप चला आया. मानव की शक्ल से तो लग रहा था जैसे काटो तो खून का कतरा भी न निकले. एक निश्छल सी मुसकान थी सुबोध के होंठों पर. बेदाग चरित्र है उस का. पहले ही दिन जब मिला था बहुत प्यारा सा लगा था. बड़े मस्त भाव से दाढ़ी बनाता जा रहा था.

‘‘हर इच्छा की सीमा होती है, कितनी भूख है तुम्हें पैसे की? सोचा जाए तो मात्र पैसे की ही नहीं, तुम्हें तो हर शह की भूख है. इतनी भूख से पेट फट जाएगा मानव, बदहजमी हो जाती है. प्रकृति ने इंसानों का हाजमा इतना मजबूत नहीं बनाया कि पत्थर या शीशा खा सके. हम अनाज या ज्यादा से ज्यादा जानवर खा सकते हैं.’’

यह कह कर मुंह धोने चला गया सुबोध और मानव मेरे सामने बुत बना यों खड़ा था मानो उसे बीच चौराहे पर किसी ने नंगा कर दिया हो.

‘‘तुम ये कैसी बातें कर रहे हो, सुबोध?’’ मैं ने पूछा.

‘‘क्या हुआ? जी मिचलाने लगा क्या? मानव का जी तो नहीं मिचलाता. पूछो, इसे इंसान का गोश्त कितना स्वाद लगता है. पिछले 4 साल से यह इंसान का गोश्त ही तो खा रहा है…अपने मांबाप का गोश्त, उस के बाद अपनी पत्नी और उस के पिता का गोश्त, यह तो एक बच्चे का पिता भी होता यदि पत्नी का गर्भपात न हो जाता. एक तरह से अपने बच्चे का गोश्त भी खा चुका है यह इंसान.’’

‘‘बकवास बंद करो सुबोध,’’ मानव ने चिढ़ कर कहा.

‘‘मेरी क्या मजाल है जो मैं बकवास करूं. उस का ठेका तो तुम ने ले रखा है. साल भर पहले घर गए थे तुम, सोचो, तब वहां क्या बकवास कर के आए थे? पत्नी को छोड़ना चाहते थे इसलिए उस पर चरित्रहीनता का आरोप लगा दिया.

‘‘एमबीए करने के लिए अपनी पत्नी के पिता से 8 लाख रुपए ले लिए. उन की बेटी का घरसंसार समृद्धि से भर जाएगा, उन को तुम ने ऐसा आश्वासन दिया था. पत्नी बेचारी घर पर इस के मातापिता की सेवा करती रही, इसी उम्मीद पर कि उस का पति बड़ा आदमी बन कर लौटेगा.

‘‘अजन्मा बच्चा अपने पिता का दोषारोपण सुनते ही चलता बना. मुड़ कर कभी नहीं देखता पीछे क्याक्या छूट गया. किसकिस के सिर पर पैर रख कर यहां तक पहुंचे हो, मानव. क्या जरा सा भी एहसास है?

‘‘अब क्या उस नेहा नाम की लड़की के कंधे पर पैर नहीं हैं तुम्हारे, जिस का भाई तुम्हें अमेरिका ले जाने वाला है? अमेरिका पहुंच कर नेहा को भी छोड़ देना. मानव नहीं हो तुम तो दानव बन गए हो. क्या तुम्हारे अंदर सारी की सारी संवेदनाएं मर गई हैं? पता है न तुम्हें कि कौनकौन कोस रहा है तुम्हें. तुम्हारे मातापिता, तुम्हारे ससुर…जिन की भविष्यनिधि भी तुम खा गए और उन की बेटी का घर भी नहीं बस पाया.’’

मानव की अवस्था विचित्र सी हो गई. बारबार कुछ कहने को वह मुंह खोलता तो सुबोध उस पर नया वार कर देता. प्याज के छिलकों की तरह परतदरपरत उस के भूतकाल की परतें उतारता जा रहा था. सफाई दे भी तो कैसे दे और शुरू कहां से करे, उस का तो आदि से अंत सब ही विश्वास और अपनत्व से शून्य था. जो इंसान अपने मांबाप का सगा न हुआ, अपनी पत्नी के प्रति वफादार न हुआ वह किसी और का भी क्या होगा? सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है. अपनी संतान के प्रति भी जिस ने कोई जिम्मेदारी न समझी, वह कहांकहां से पलायन कर रहा है समझा जा सकता है.

‘‘सुबोध, तुम यह सब कैसे जानते हो. जरा बताओ तो?’’ मैं ने सुबोध का हाथ पकड़ कर पूछा था. शांत रहने वाला सुबोध इस पल जरा आवेश में था.

‘‘तुम मुझ से क्यों पूछ रहे हो कि मैं यह सब कैसे जानता हूं. तुम इस नाशुक्रे इंसान से सिर्फ यह पूछो कि जो कुछ भी मैं ने इस के लिए कहा है वह सच है या नहीं. मैं कैसे जानता हूं कैसे नहीं, इस से क्या फर्क पड़ता है. पूछो इस से कि इस के मातापिता आजकल कहां हैं? जिंदा भी हैं या मर गए? तलाक के बाद इस की पत्नी और उस के पिता का क्या हुआ? क्या यह जानता है? अपने ससुर के 8 लाख रुपए यह कब लौटाने वाला है जो अब सूद मिला कर 10-12 लाख रुपए तो होने ही चाहिए.’’

‘‘सीमा ने अभी मुझे तलाक दिया कहां है…’’ पहली बार मानव ने अपने होंठ खोले, ‘‘और क्या सुबूत है उस के पास कि वे रुपए उस के पिता ने ही दिए थे.’’

‘‘जिस दिन अदालत का नोटिस तुम्हारे औफिस पहुंच जाएगा, उस दिन अपनेआप पता चल जाएगा किस के पास कितने और कैसे सुबूत हैं…इतना लाचार और बेवकूफ किसे समझ रहे हो तुम?’’

सुबोध इतना सब कह कर अपने कपड़े बदलने लगा.

‘‘आजकल मुंह छिपा कर भागना आसान कहां है. इंसान मोबाइल नंबर से पकड़ा जाता है, जिस कंपनी में काम करो वहां से छोड़ कर कहीं और भी चले जाओ तो भी सिरा हाथ में आ जाता है. यह दुनिया इतनी बड़ी कहां रह गई है कि इंसान पकड़ में ही न आए. जल्दी ही नेहा को भी पता चल जाएगा तुम्हारा कच्चा चिट्ठा. यह मत सोचो कि तुम सारी दुनिया को बेवकूफ बना लोगे.’’

बदहवास सा होने लगा मानव. 15 दिन पहले ही तो सुबोध हमारे साथ रहने आया है. उस ने कहा था जम्मू से है, मानव भी जम्मू से है, तब मुझे क्षण भर को लगा भी था कि मानव जम्मू का नाम सुन कर जरा सा परेशान हो गया था, बड़ी गहराई से परख रहा था कि वह किस हिस्से से है, किस कोने से है.

‘‘अगर इंसान जिंदा है और अच्छी नौकरी में है तो छिप नहीं सकता और मुझे पूरा विश्वास है तुम अभी जिंदा हो.’’

धड़ाम से वहीं बैठ गया मानव. सुबोध जल्दीजल्दी तैयार होने लगा. उस ने अपना नाश्ता किया और जातेजाते मानव का कंधा थपथपा दिया.

‘‘अभी भी देर नहीं हुई. मर जाओ या जिंदा रहो, अपने ही काम आते हैं. रोते भी अपने ही हैं, ऐसा दुनिया कहती है. अपना घरपरिवार संभालो, अपनों के साथ छल मत करो वरना वह दिन दूर नहीं जब यही छल घूमफिर कर तुम्हारे ही सामने परोसा जाएगा…अपने घर जाओ मानव, तुम्हारी मां बहुत बीमार हैं.’’

‘‘क्या?’’ मानव के होंठों से पहली बार यह शब्द अपनेआप ही निकला था.

‘‘अपनी मां तो याद हैं न. जाओ उन के पास. नेहा जैसी कल बहुत मिल जाएंगी. आज मां हाथ से निकल गईं तो पूरी उम्र जमीन से जुड़ने को ही तरस जाओगे. पत्नी को छोड़ा है, जाहिर है वह भी मर तो नहीं जाएगी. वह तो कल अपना रास्ता स्वयं ढूंढ़ लेगी, लेकिन आज जो छूट जाएगा वह कभी हाथ नहीं आएगा. अच्छे इंसान बनो मानव…मांबाप ने इतना अच्छा नाम रखा था…कुछ तो उसे सार्थक करो.’’

सुबोध चला गया. कहां से बात शुरू हुई थी और कहां आ पहुंची थी. हैरान हूं मानव के बारे में इतना सब जानते हुए वह 15 दिन से चुप क्यों था. और मानव का चरित्र भी कैसा था, जिस ने साल भर में कभी मांबाप का जिक्र तक नहीं किया. घर में पालतू जानवर पाल लो तो उस का भी नाम कभीकभार इंसान ले ही लेता है.

सुबोध ने बताया था कि उस के कई मित्र मानव के गांव से हैं. हो सकता है उन्हीं से उसे सारी कहानी पता चली हो. मैं तो कितना अच्छा दोस्त समझ रहा था मानव को. अब लग रहा है अपनी समझ को अभी मुझे और परिपक्व करना पड़ेगा. इंसान को परखना अभी मुझे नहीं आया.

मैं सोचने लगा हूं…मानव, जो अच्छा इंसान ही नहीं है वह अच्छा मित्र कैसे होगा. प्यार पाने के लिए तो प्यार बोना पड़ता है और विश्वास पाने के लिए विश्वास. मानव के तो दोनों हाथ खाली हैं, यह क्या लेगा जब कभी दिया ही नहीं. इस के हिस्से तो मात्र खालीपन और अकेलापन ही है.

मानव बुत बना चुपचाप बैठा रहा.

Story In Hindi : ब्रह्मपिशाच – क्या था ओझा का सच?

Story In Hindi : शारदा बाबू एक बैंक के कर्मचारी थे. शहर से थोड़ी दूर पर उन का गांव था. उन की पत्नी ज्यादातर अपने गांव में ही रहती थी. उन की बेटी पुनीता करीब 16 या 17 साल की रही होगी. प्राइवेट हाईस्कूल की परीक्षा दे रही थी.

शारदा बाबू के 4 बेटे थे. सब से बड़ा राजेंद्र कादीपुर ब्लाक में विकास अधिकारी था. शारदा बाबू के मकान की छत से लगी हुई मेरी भी छत थी. मैं भी बैंक में ही टाइपिस्ट थी.

एक दिन पुनीता खुशखुश मेरे पास आई, ‘‘भाभीजी, भैया की शादी तय हो गई है. सुना है कि भाभी का स्वभाव बहुत ही अच्छा है. कल हम सब लोग शादी में गांव जा रहे हैं. आप भी चलिए न.’’

‘‘तू जा, बेटी. मेरी छुट्टियां थोड़े ही हैं,’’ कह कर मैं ने उसे टाल दिया.

सब से छोटी और इकलौती बेटी होने के कारण पुनीता अपने मांबाप और भाइयों की बहुत दुलारी थी. बड़ा भाई राजेंद्र उसे बहुत प्यार करता था.

जब भी वह गांव से आता, भाभी लाने की बात चलने पर वह उसे बड़े प्यार से थपथपा कर कहता, ‘‘बहुत जल्दी आएगी तेरी भाभी. आते ही पहले ही दिन उस को समझा दूंगा मैं, ‘देखो भई, पुनीता मेरी प्यारी बहन है. इसे एक शब्द भी कभी कड़ा मत कहना. मेरे बच्चे की तरह है यह.’’’

पुनीता यह सुन कर खुशी से नाच उठती. यही कारण था कि भाभी के आने की बात सुन कर उस का तनमन खुशी से नाच उठा था. पुनीता को कई बार टाइफाइड हो चुका था. उस का मस्तिष्क बीमारी के कारण कुछ कमजोर हो चला था. यही कारण था कि शारदा बाबू परेशान हो कर स्कूल में कई बार फेल होने पर उस को प्राइवेट परीक्षा ही दिला रहे थे.

तीसरे दिन गांव से लौट कर पुनीता अपने स्वभाव के अनुसार मेरे पास आई तो उस के गुलाबी हंसमुख चेहरे पर परेशानी झलक रही थी. आंखें ऐसी लग रही थीं जैसे रात भर कोई भयानक स्वप्न देखा हो. उस के खूबसूरत चेहरे पर पीड़ा फैली हुई थी.

‘‘कैसी है तेरी भाभी? खूब मजा आया होगा न? मेरे लिए मिठाई लाई है?’’ मैं ने प्यार से पूछा.

‘‘मिठाई?…कभी नहीं. नई भाभी जो आ गई है. अब मिठाई कभी नहीं मिलेगी. भाभीजी ने मुझे बहुत डांटा. मुझ से दाल में ज्यादा हो गया था…अरे हां, नमक ज्यादा हो गया था. तब भी भैया और भाभी को ऐसा नहीं करना चाहिए था. आप ही बताइए, अब मैं क्या करूं? क्या नदी में कूद पड़ूं?’’ कह कर उस ने मुझे झिंझोड़ दिया.

‘‘पुनीता, तू क्या कह रही है? मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है. किसी भी छोटी सी बात का इतना बुरा नहीं मानते. तेरी तबीयत ठीक नहीं मालूम देती. अरे, तुझे तो तेज बुखार भी है. जा कर आराम कर.’’

मेरे कहने पर पुनीता चली गई

और मैं अपने काम में व्यस्त हो गई.

शाम को मैं दफ्तर से लौट कर कमरे में आई ही थी कि शारदा बाबू के घर

से चीखें और फिर बहुत शोरगुल सुनाई देने लगा.

मैं चाय पीना भूल कर उन की छत से लगी मुंडेर पर जा खड़ी हुई. शारदा बाबू की छत का दृश्य बहुत ही बुरा था. तिमंजिले की छत के किनारे पर बैठी पुनीता पागलों की तरह चीखचीख कर नीचे कूदने का प्रयास कर रही थी.

वह कभी हंसती, कभी रोती, अपना सिर झटकझटक कर कह रही थी, ‘‘मुझे छोड़ दो. नीचे वही बुला

रहा है…मैं नहीं कूदूंगी तो वह मुझे

खा जाएगा… वह हिंदुस्तान का राजा है. मुझे बहुत चाहता है, छोड़ दो मुझे, ह…ह…ह…’’

पुनीता को एक तरफ उस के पिताजी और दूसरी तरफ उस का छोटा भाई सुरेंद्र पकड़े हुए थे.

पुनीता की आंखें लाल सुर्ख और फूली हुई थीं. शायद उसे अब भी तेज बुखार था. उस के बाल खुले थे और चेहरे पर पूरे पागलपन के लक्षण थे.

उस को किसी प्रकार खींच कर शारदा बाबू नीचे ले गए और कमरे में बंद कर दिया.

पुनीता की मां जारजार रोती हुई बोलीं, ‘‘बहनजी, सुबह से यह कुछ बहकीबहकी बातें कर रही थी. मैं ने सोचा गांव में किसी से किसी बात पर नाराज हो कर बड़बड़ा रही होगी. लेकिन दोपहर के 12 बजतेबजते यह खूब जोर- जोर से रोने और बाहर भागने लगी. दरवाजे पर ताला लगा दिया तो सीढ़ी से चढ़ कर तिमंजिले पर भागी.

‘‘इस के पिताजी ने किसी काम के कारण छुट्टी ले रखी थी, नहीं तो अनर्थ हो जाता. पुनीता कूद कर आत्महत्या कर लेती. लड़की की जाति, अब मैं क्या करूं, बहनजी? कुछ भी समझ में नहीं  आ रहा है. आप ही बताइए न कोई उपाय…’’

यह कह कर पुनीता की मां दीनहीन सी बिलख पड़ीं. स्वाभाविक ही था

कि खूबसूरत जवान लड़की देखते ही देखते न जाने क्यों अपना संतुलन खो बैठी थी.

‘‘आप घबराइए नहीं. मुझे तो लगता है कि इसे किसी बात का धक्का पहुंचा है. कुछ दिमाग कमजोर तो है

ही इस का. बरदाश्त नहीं कर पाई और अपने दिमाग का संतुलन खो बैठी.

इस को जल्दी ही इलाहाबाद या लखनऊ ले जा कर किसी मानसिक इलाज

करने वाले डाक्टर को दिखाइए, नहीं तो इस की हालत खराब हो जाएगी. इस की जिंदगी आप को बचानी है तो जल्दी ही किसी बड़े डाक्टर के पास ले जाइए…’’

अभी मैं पुनीता की मां को सुझाव दे ही रही थी कि सामने रहने वाले नए किराएदार पंडितजी, हांफतेहांफते आ पहुंचे, ‘‘भाभीजी, काम हो गया, ओझा महाराज मिल गए. जरा सी देर में ही पुनीता ठीक हो जाएगी.’’

पंडितजी अपने शब्दों में करुणा भर कर बोल रहे थे, किंतु उन के चेहरे पर एक कुटिल मुसकान खेल रही थी. एक क्षण चुप रह कर वह अपनी आंख के कोरों को पोंछने लगे, ‘‘भाभीजी, अब देर मत कीजिए. दानदक्षिणा, जो कुछ भी ओझा महाराज मांगें, वह सब पूरा कर के अपनी बिटिया के प्राण लौटा लीजिए. इतनी खूबसूरत इकलौती बेटी है आप की. इस के लिए तो लाखों न्योछावर किया जा सकता है. इस की हालत देख कर तो मेरा कलेजा फटा जा रहा है…’’

कह कर अपनी लंबी चोटी ऐंठते हुए पंडितजी मुंह पोंछ कर धीरे से मुसकरा उठे, जिसे मेरे सिवा और कोई न देख सका.

पंडितजी के हृदय में बेटी के लिए इतनी करुणा देख कर पुनीता की मां को विश्वास हो गया कि ओझा महाराज अवश्य उस की बेटी के अंदर का भूतपिशाच अपनी मुट्ठी में कर के उस की बेटी को स्वस्थ कर देंगे.

पंडितजी सब को ले कर नीचे

उतर गए. मैं ने उन्हें रोक कर समझाना चाहा, किंतु इस समय तो उन लोगों पर पंडित और ओझा महाराज का पूरा विश्वास जम चुका था. जिज्ञासावश मैं भी छत पर से ही उन के आंगन का नजारा देखने लगी.

खद्दर का कुरताधोती, सिर पर पीली पगड़ी, एक फुट लंबी तोंद, कंधे पर लाल अंगोछा और बड़ा सा लटकता  झोला, ऐंठी सी खिचड़ी मूंछें और एक आंख पत्थर की. ऐसे थे ओझा महाराज.

उन की मनहूस सी सूरत देख कर पहले शारदा बाबू ने पत्नी को आंख के इशारे से मना किया, किंतु उन पर तो जैसे कोई जादू डाल दिया गया हो. ऐसी दृष्टि से उन्होंने शारदा बाबू को घूरा, जैसे कह रही हों, ‘चुप रहो, पैदा तो मैं ने किया है. फिर भला तुम क्या जानो संतान का दर्द?’

मरता क्या न करता. बेचारे शारदा बाबू चुप हो गए. अब ओझा महाराज ने अपना काम आरंभ किया.

उन्होंने एक थाली में फूल रख कर ढेर सारा गुग्गुल और लोबान सुलगा दिया. चारों तरफ धुआं फैलने लगा.

अब पुनीता को, जो कमरे में बंद थी, खोला गया. ओझा महाराज के सामने कई लोग उसे पकड़ कर बैठ गए. वह अपने को छुड़ाने के लिए हाथपैर मारने लगी और वहीं पास में रखे ओझा महाराज के डंडे को उठा कर उन्हीं की पीठ पर दे मारा.

अचानक इस मार से ओझा महाराज बिलबिला उठे, ‘‘देखा आप लोगों ने? यह कोई छोटामोटा भूतपिशाच नहीं है. पिशाचों में वरिष्ठ ब्रह्मपिशाच है. किसी निरपराध ब्राह्मण की हत्या होने पर उस की आत्मा ही ब्रह्मपिशाच बन जाती है. चलते समय ही मैं ने यह समझ लिया था कि यही होगा और एक मंत्र पढ़ कर मैं ने उस पर चोट कर दी थी. इसीलिए इस ने मुझे मारा है. अभी क्या, अभी तो यह ऐसी छलांग लगाएगी कि छत पर कूद जाएगी. जिस को यह पिशाच पकड़ता है, उस में हाथी की शक्ति आ जाती है. अरे बाबूजी, यह पिशाच कोई छोटीमोटी शक्ति नहीं है. चुटकी बजाते प्राण हर लेता है यह.’’

‘‘धन्य हैं, महाराज, आप बिलकुल ठीक बात कह रहे हैं. अभी यह छत से नीचे कूद रही थी…’’ पुनीता की मां अंतर्यामी ओझा महाराज पर पूरी तरह से न्योछावर होती हुई बोलीं.

वही नहीं, इस बात से वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्य से एकदूसरे का मुंह देखने लगे, सिर्फ पंडितजी मंदमंद मुसकरा रहे थे.

शारदा बाबू भी प्रभावित होते हुए बोले, ‘‘आप सच कह रहे हैं. इस के अंदर हाथी की ही शक्ति आ गई है. मुझे 2 जगह यह दांत भी काट चुकी है. जिस कमरे में यह बंद थी उस कमरे की सारी चीजों को तोड़फोड़ डाला है. कपड़ा देखिए, इस ने दांतों से फाड़फाड़ कर चिथड़ा कर दिया है. अब तो बेटी के प्राण आप ही बचा सकते हैं महाराज. अपनी मंत्र विद्या से जल्दी ही ब्रह्मपिशाच को अपनी मुट्ठी में कीजिए…’’ कहते- कहते शारदा बाबू भी रो पड़े.

‘‘आप चिंता न कीजिए, अभी मंत्र मार कर मैं इस की शक्ति अपनी मुट्ठी में जकड़ लेता हूं. हां, आप लोग इस को संभाल नहीं पाएंगे इसलिए चारपाई पर लिटा कर रस्सी से इस के हाथपैर इतने जकड़ दीजिए कि यह तनिक भी न हिलनेडुलने पाए. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो यह एकाध को घायल भी कर देगी.’’

‘‘नहीं…’’ पुनीता आंखें निकाल कर जोर से चीखी, लेकिन तभी ओझा महाराज का इतनी जोर का झापड़ उस के गाल पर पड़ा कि पांचों उंगलियों के निशान उभर आए.

पुनीता चीखती रही, किंतु ओझा महाराज की जादुई गिरफ्त में आने वाले लोग भला अब कहां कुछ भी सुन सकते थे? एक लड़की 4 मर्दों से भला कैसे अपने को छुड़ा पाती? नतीजा यह कि वह चीखती रही और लोग बेरहमी से उसे चारपाई में बांधते रहे. उस के दोनों पैर चारपाई तथा हाथ खिड़की की छड़ से बांध दिए गए.

अब ओझा महाराज अपने झोले में से एक दोना निकाल कर शारदा बाबू को देते हुए बोले, ‘‘लीजिए, यही मेरा प्रसाद है. इस में 5 बताशे हैं. इसे मैं घर से ही अभिमंत्रित कर के लाया हूं. बस, यही दवा है. इस में से 2 अभी, 2 कल सुबह और 1 परसों सुबह…’’

अब बताशा खिला कर ओझा महाराज पुनीता पर धीरेधीरे अपना मंत्र पढ़पढ़ कर फूंक मारने लगे.

और लोगों ने आश्चर्य से देखा कि ओझा के फूंक मारते ही बस 5 मिनट में पुनीता ने धीरेधीरे चुप हो कर अपनी आंखें बंद कर लीं.

पुनीता के शांत हो जाने पर ओझा महाराज मुसकराए और मूंछों पर ताव देते हुए बोले, ‘‘देखा आप ने, मंत्र ने काम करना शुरू कर दिया. ब्रह्मपिशाच शांत हो गया. लेकिन कम से कम 3 दिन इसी तरह इसे रखना होगा. मैं घर जा कर 3 दिन, 3 रात उपवास रख कर इस की पूजा करूंगा, तब जा कर इसे उतार पाऊंगा. जरा सी भूलचूक हुई तो यह मेरे ही प्राण हर लेगा.

‘‘अच्छा, अब चलूं बाबूजी. हां, 1 हजार रुपए पूजा के लिए चाहिए या मैं जो सामान कहूं, वह मंगवा दीजिए. बात ऐसी है कि अब 3 दिन ब्रह्मपिशाच के साथियों, बरातियों को न्योता खिलाना पड़ेगा, तब कहीं जा कर छोड़ेगा यह…अरे हां, हर चीज बिलकुल पवित्र होनी चाहिए.

‘‘जो भी खाना यह खाना चाहे, चम्मच से इस के मुंह में डाल दीजिए. जरूरी काम होने पर रस्सी खोल कर फिर इसी तरह बांध दी जाए. तीसरे दिन मैं ही आ कर इसे पूरी तरह खोलूंगा. किसी डाक्टर की दवा न खिलाएंपिलाएं, नहीं तो यह ब्रह्मपिशाच इसी को ही नहीं, सारे कुटुंब को निगल जाएगा,’’ कहतेकहते ओझा महाराज ने ऐसा भयंकर मुंह बनाया कि सारा परिवार भय से थरथर कांप उठा.

भयभीत शारदा बाबू उसी दिन रुपए के लिए बैंक जाने लगे तो मैं ने उन्हें रोका, ‘‘शारदा बाबू, पढ़ेलिखे इनसान हो कर भी आप इन ओझा और मौलवियों के चक्कर में पड़ रहे हैं. मेरी बात मानिए तो पुनीता को जल्दी ही टैक्सी से लखनऊ ले जाइए.’’

मेरी बात अनसुनी कर के शारदा बाबू ने कहा, ‘‘जिस पर मुसीबत आती है वही उस का दर्द जानता है, दूसरा नहीं,’’ और वह तेजी से ओझा महाराज के साथ बैंक की तरफ चल दिए.

शाम को दफ्तर से लौटी तो लोगों ने बताया कि पुनीता तब से बराबर आंखें बंद किए बड़बड़ा रही है. खायापिया कुछ भी नहीं, किंतु चीखीचिल्लाई भी नहीं. ओझा महाराज का प्रताप है कि उन्होंने अपने मंत्र के बल से ब्रह्मपिशाच को शांत कर दिया. 1,001 रुपए ही तो लिए बेचारे ने. बेटी के प्राण तो बचा दिए.

सुन कर विश्वास तो नहीं हुआ, लेकिन करती क्या? चुपचाप अपने काम में व्यस्त हो गई.

दूसरे दिन शनिवार की शाम को दफ्तर से लौट कर अपने घर लखनऊ जाने के लिए मैं अपनी अटैची ठीक कर रही थी कि शारदा बाबू का बड़ा बेटा राजेंद्र रोतासिसकता आ खड़ा हुआ.

‘‘बहनजी, पुनीता अब नहीं बचेगी.’’

‘‘क्या बात है? वह तो अब ठीक हो रही थी,’’ मैं चौंक पड़ी.

‘‘अरे, वह साला फरेबी, जालसाज निकला. उसी को बुलाने तो मैं गया था.’’

‘‘तब?’’

‘‘पता चला कि वहां इस नाम का कोई आदमी नहीं रहता.’’

‘‘और पंडित?’’

‘‘वह भी कल से गायब है. मकान में एक ही महीने तो रहा वह. आधा किराया पेशगी दिया था, बाकी आधा किराया भी मार कर भाग गया. धोखा देने के लिए कोठरी में एक सड़ा सा ताला डाल गया.’’

‘‘अच्छा, मैं तो पहले ही समझ रही थी कि ये सब जरूर जालसाज हैं. अरे हां, अब पुनीता का क्या हाल है? क्या पुनीता उसी तरह बंधी पड़ी है?’’

‘‘नहीं, बहनजी, अब उसे खोल दिया गया है. लेकिन जगहजगह रस्सियों से उस के हाथपैर में नीले निशान पड़ गए हैं. उस का रंग काला हो गया है और शक्तिहीन सी आंखें बंद किए वह पड़ी है. न कुछ बोलती है और न कुछ खाती- पीती है. माताजी खूब रो रही हैं. पिताजी ने आप के पास मुझे भेजा है. आप का परिचय लखनऊ मेडिकल कालिज में जरूर होगा…’’

राजेंद्र ने ऐसी याचनाभरी दृष्टि से मुझे देखा कि मैं अंदर तक करुणा से भर उठी. नतीजा यह हुआ कि उसी वक्त हम लोग पुनीता को ले कर लखनऊ चल दिए.

वहां एक मनोचिकित्सा के विशेषज्ञ मेरे परिचित निकल आए. उन्होंने फौरन पुनीता को देखाभाला. उन्होंने बताया कि पुनीता को ओझा ने बताशा किसी ऐसी नशीली चीज में डुबो कर दिया था जिस से उसे नींद आ रही है. ब्रह्मपिशाच नहीं, इसे किसी बात का गहरा आघात लगा है. जो लोग दिमाग से कमजोर होते हैं, आघात खा कर अपना संतुलन खो बैठते हैं. आप लोगों की आंखें समय से खुल गईं, नहीं तो ओझा के चक्कर में आप की बेटी के प्राण निकल जाते और आप बस, हाथ मलते रह जाते.’’

1 माह तक उस डाक्टर की दवा करने से पुनीता बिलकुल ठीक हो गई. अब वह बाकायदा अपनी परीक्षा दे रही है. तब से उस के परिवार वालों ने कान पकड़ लिया है कि वे किसी ओझा और पंडित का विश्वास नहीं करेंगे.

कहानी- डा. माया शबनम

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