Short Story : जो बोया सो काटा

Short Story : बच्चों के साथ रहने के मामले में मनीषा व निरंजन के सुनेसुनाए अनुभव अच्छे नहीं थे. अपने दोस्तों व सगेसंबंधियों के कई अनुभवों से वे अवगत थे कि बच्चों के पास जा कर जिंदगी कितनी बेगानी हो जाती है, लेकिन अब मजबूरी थी कि उन्हें बच्चों के पास जाना ही था क्योंकि वे शारीरिक व मानसिक रूप से लाचार हो गए थे.

उम्र अधिक हो जाने से शरीर कमजोर हो गया था. निरंजन के लिए अब बाहर के छोटेछोटे काम निबटाना भी भारी पड़ रहा था. कार चलाने में दिक्कत होती थी. मनीषा वैसे तो घर का काम कर लेती थीं लेकिन अकेले ही पूरी जिम्मेदारी संभालना मुश्किल हो जाता था. नौकरचाकरों का कोई भरोसा नहीं, काम वाली थी, कभी आई कभी नहीं.

छुट््टियां न मिलने की वजह से बेटा अनुज भी कम ही आ पाता था. इसलिए उन्हें अब मानसिक अकेलापन भी खलने लगा था. अकेले रहने में अपनी बीमारियों से भी निरंजनजी डरते थे.

यही सब सोचतेविचारते अपने अनुभवों से डरतेडराते आखिर उन्होंने भी लड़के के साथ रहने का फैसला ले ही लिया.

इस बारे में उन्होंने पहले बेटे को चिट्ठी लिखना ठीक समझा ताकि बेटे और बहू के मूड का थोड़ाबहुत पहले से ही पता

चल जाए.

हफ्ते भर के अंदर ही बेटे का फोन आ गया कि पापा, आज ही आप की चिट्ठी मिली है. आप मेरे पास आना चाह रहे हैं, यह हम सब के लिए बहुत खुशी की बात है. बच्चे और नीता तो इतने खुश हैं कि अभी से आप के आने का इंतजार करने लगे हैं. आप बताइए, कब आ रहे हैं? मैं लेने आ जाऊं या फिर आप खुद ही आ जाएंगे?

फोन पर बेटे की बातें सुन कर निरंजन की आंखें भर आईं. प्रत्युत्तर में बोले, ‘‘हम खुद ही आ जाएंगे, बेटे… परसों सुबह यहां से टैक्सी से चलेंगे और शाम 7 बजे के आसपास वहां पहुंच जाएंगे.’’

‘‘ठीक है, पापा,’’ कह कर बेटे ने फोन रख दिया.

‘‘अनुज हमारे आने की बात सुन कर बहुत खुश है,’’ निरंजन बोले.

‘‘अभी तो खुश है पर पता नहीं हमेशा साथ रहने में कैसा रुख हो,’’ मनीषा अपनी शंका जाहिर करती हुई बोलीं.

‘‘सब अच्छा होगा, मनीषा,’’ निरंजन दिलासा देते हुए बोले.

शाम के 7 बजे जब निरंजन और मनीषा बेटे के घर पर पहुंचे तो बेटेबहू और बच्चे उन के इंतजार में बैठे थे. दरवाजे पर टैक्सी रुकने की आवाज सुन कर चारों घर से बाहर निकल पड़े.

दादाजी…दादाजी कहते हुए दोनों बच्चे पैर छूते हुए उन से चिपक गए. बेटेबहू ने भी पैर छुए. सब ने एकएक सामान उठा लिया. यहां तक कि बच्चों ने भी छोटा सामान उठाया और सब एकसाथ अंदर आ गए.

मन में शंका थी कि थोड़े दिन रहने की बात अलग थी पर हमेशा के लिए रहना…न जाने कैसा हो.

नीता चायनाश्ता बना कर ले आई. सभी बैठ कर गपशप करने लगे.

‘‘मम्मीपापा, आप फ्रेश हो लीजिए,’’ बहू नीता बोली, ‘‘इस कमरे में आप का सामान रख दिया है. आज से यह कमरा आप का है.’’

‘‘यह हमारा कमरा…पर यह तो बच्चों का कमरा है…’’

‘‘बच्चे  छोटे वाले कमरे में शिफ्ट हो गए हैं.’’

‘‘लेकिन तुम ने बच्चों का कमरा क्यों बदला, बहू…उन की पढ़ाईलिखाई डिस्टर्ब होगी. फिर उस छोटे से कमरे में दोनों कैसे रहेंगे?’’

‘‘कैसी बात कर रही हैं, मम्मीजी आप, घर के सब से बड़े क्या सब से छोटे कमरे में रहेंगे. बच्चों की पढ़ाई और सामान वगैरह के लिए अलग कमरा चाहिए…रात में तो दोनों आप के साथ ही घुस कर सोने वाले हैं,’’ नीता हंसते हुए बोली.

मनीषा को सुखद एहसास हुआ. बेटा तो अपना ही है लेकिन बहू के मुंह से ऐसे शब्द सुन कर जैसे दिल की शंकाओं का कठोर दरवाजा थोड़ा सा खुल गया.

सुबह बहुत देर से नींद खुली. निरंजन उठ कर बाथरूम हो आए. अंदर खटरपटर की आवाज सुन कर नीता ने चाय बना दी. उस दिन रविवार था.  बच्चे व अनुज भी घर पर थे.

चाय की टे्र ले कर नीता दरवाजे पर खटखट कर बोली, ‘‘मम्मीजी, चाय.’’

‘‘आजा…आजा बेटी…अंदर आजा,’’ निरंजन बोले.

‘‘नींद ठीक से आई, पापा,’’ नीता चाय की ट्रे मेज पर रखती हुई बोली.

‘‘हां, बेटी, बहुत अच्छी नींद आई. बच्चे और अनुज कहां हैं?’’ मनीषा ने पूछा.

‘‘सब उठ गए हैं. बच्चों ने तो अभी तक दूध भी नहीं पिया है. कह रहे थे कि जब दादाजी उठ जाएंगे तो वे चाय पीएंगे और हम दूध.’’

‘‘तुम ने भी अभी तक चाय नहीं पी,’’ मनीषा ट्रे में चाय के 4 कप देख कर बोलीं.

‘‘मम्मीजी, हम एक बार की चाय तो पी चुके हैं, दूसरी बार की चाय आप के साथ बैठ कर पीएंगे.’’

तभी बच्चे व अनुज कमरे में घुस गए और दादादादी के बीच में बैठ गए.

‘‘दादाजी, पापा कहते हैं कि वह आप से बहुत डरते थे. आप जब आफिस से आते थे तो वह एकदम पढ़ने बैठ जाते थे, सच्ची…’’ पोता बोला.

‘‘पापा यह भी कहते हैं कि वह बचपन में बहुत शैतान थे और दादी को बहुत तंग करते थे. है न दादी?’’ पोती बोली थी.

दोनों बच्चों की बातें सुन कर निरंजन व  मनीषा हंसने लगे.

‘‘सभी बच्चे बचपन में अपनी मम्मी को तंग करते हैं और अपने पापा से डरते हैं,’’ निरंजन बच्चों को प्यार करते हुए बोले.

‘‘हां, और मम्मी कहती हैं कि सभी मम्मीपापा अपने बच्चों को बहुत प्यार करते हैं…जैसे दादादादी मम्मीपापा को प्यार करते हैं और मम्मीपापा हमें.’’

पोती की बात सुन कर मनीषा व निरंजन की नजरें नीता के चेहरे पर उठ गईं. नीता का खुशनुमा चेहरा दिल में उतर गया. दोनों ने मन में सोचा, एक अच्छी मां ही बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकती है.

दोपहर के खाने में नीता ने कमलककड़ी के कोफ्ते और कढ़ी बना रखी थी.

‘‘पापा, आप यह कोफ्ते खाइए. ये बताते हैं कि आप को कमलककड़ी के कोफ्ते बहुत पसंद हैं,’’ नीता कोफ्ते प्लेट में रखती हुई बोली.

‘‘और मम्मी को कढ़ी बहुत पसंद है. है न मम्मी?’’ अनुज बोला, ‘‘याद है मैं कढ़ी और कमलककड़ी के कोफ्ते बिलकुल भी पसंद नहीं करता था. और मेरे कारण आप अपनी पसंद का खाना कभी भी नहीं बनाती थीं. अब आप की पसंद का खाना ही बनेगा और हम भी खाएंगे.’’

बेटा बोला तो मनीषा को अपने भावों पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो गया. आंखों के कोर भीग गए.

‘‘नहीं बेटा, खाना तो बच्चों की पसंद का ही बनता है, जो बच्चों को पसंद हो वही बनाया करो.’’

रात को पोते व पोती में ‘बीच में कौन सोएगा’ इस को ले कर होड़ हो गई. आखिर दोनों बीच में सो गए.

थोड़ी देर बाद नीता आ गई.

‘‘चलो, बच्चो, अपने कमरे में चलो.’’

‘‘नहीं, हम यहीं सोएंगे,’’ दोनों चिल्लाए.

‘‘नहीं, दादादादी को आराम चाहिए, तुम अपने कमरे में सोओ.’’

‘‘रहने दे, बेटी,’’ निरंजन बोले, ‘‘2-4 दिन यहीं सोने दे. जब मन भर जाएगा तो खुद ही अपने कमरे में सोने लगेंगे.’’

दोनों बच्चे उस रात दादादादी से चिपक कर सो गए.

दिन बीतने लगे. नीता हर समय उन की छोटीछोटी बातों का खयाल रखती. बेटा भी आफिस से आ कर उन के पास जरूर बैठता.

एक दिन मनीषा शाम को कमरे से बाहर निकली तो नीता फोन पर कह रही थी, ‘‘मैं नहीं आ सकती… मम्मीपापा आए हुए हैं. यदि मैं आ गई तो वे दोनों अकेले रह जाएंगे. उन को खराब लगेगा,’’ कह कर उस ने बात खत्म कर दी.

‘‘कहां जाने की बात हो रही थी, बेटी?’’

‘‘कुछ नहीं, मम्मीजी, ऐसे ही, मेरी सहेली बुला रही थी कि बहुत दिनों से नहीं आई.’’

‘‘तो क्यों नहीं जा रही हो. हम अकेले कहां हैं, और फिर थोड़ी देर अकेले भी रहना पड़े तो क्या हो गया. देखो बेटी, तुम अगर नहीं जाओगी तो मैं बुरा मान जाऊंगी.’’

नीता कुछ न बोली और दुविधा में खड़ी रही.

मनीषा नीता के कंधे पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘बेटी, मम्मीपापा आ गए हैं इसलिए अगर तुम ने अपनी दिनचर्या में बंधन लगाए तो हम यहां कैसे रह पाएंगे. यह अब कोई 2-4 दिन की बात थोड़े न है, अब तो हम यहीं हैं.’’

‘‘कैसी बात कर रही हैं, मम्मीजी. आप का रहना हमारे सिरआंखों पर. मैं बंधन थोड़े न लगा रही हूं… और थोड़ाबहुत बंधन रहे भी तो क्या, बच्चों के कारण मांबाप बंधन में नहीं रहते हैं. फिर बच्चों को भी मांबाप के कारण बंधना पड़े तो कौन सी बड़ी बात है.’’

नीता की बात सुन कर मनीषा ने चाहा कि उस को गले लगा कर खूब प्यार करें.

मनीषा ने नीता को जबरन भेज दिया. धीरेधीरे मनीषा की कोशिश से नीता भी अपनी स्वाभाविक दिनचर्या में रहने लगी. उस ने 1-2 किटी भी डाली हुई थीं तो मनीषा ने उसे वहां भी जबरदस्ती भेजा.

उस की सहेलियां जब घर आतीं तो मनीषा चाय बना देतीं. नाश्ते की प्लेट सजा देतीं. नीता के मना करने पर प्यार से कहतीं, ‘‘तुम जो हमारे लिए इतना करती हो, थोड़ा सा मैं ने भी कर दिया तो कौन सी बड़ी बात कर दी.’’

अनुज व नीता को अब कई बातों की सुविधा हो गई थी. कहीं जाना होता तो दादादादी के होने से बच्चों की तरफ से दोनों ही निश्ंिचत रहते.

महीना खत्म हुआ. निरंजन को पेंशन मिली. उन्होंने अपना पैसा बहू को देने की पेशकश की तो अनुज व नीता दोनों नाराज हो गए.

‘‘पापा, आप कैसी बातें कर रहे हैं. पैसे दे कर ही रहना है तो आप कहीं भी रह सकते हैं. आप ने हमारे लिए जीवन भर इतना किया, पढ़ायालिखाया और मुझे इस लायक बनाया कि मैं आप की देखभाल कर सकूं,’’ अनुज बोला.

‘‘लेकिन बेटा, मेरे पास हैं इसलिए दे रहा हूं.’’

‘‘नहीं, पापा, पैसा दे कर तो आप मेरा दिल दुखा रहे हैं… जब दादीजी और दादाजी आप के पास रहने आए थे तो उन के पास देने के लिए कुछ भी नहीं था तो क्या आप ने उन की देखभाल नहीं की थी. जितना आप से  बन सकता था आप ने उन के लिए किया और आप के पास पैसा है तो आप हम से हमारा सेवा करने का अधिकार क्यों छीनना चाहते हैं.’’

निरंजन निरुत्तर हो गए. मनीषा आश्चर्य से अपने उस लापरवाह बेटे को देख रही थीं जो आज इतना समझदार हो गया है.

अनुज ने जब पैसे लेने से साफ मना कर दिया तो निरंजन ने पोते और पोती के नाम से बैंक में खाता खोल दिया और जो भी पेंशन का पैसा मिलता उस में डालते रहते. बेटे ने उन का मान रखा था और वे बेटे का मान रख रहे थे.

एक दिन निरंजन सुबह उठे तो बदन टूट रहा था और कुछ हरारत सी महसूस कर रहे थे. मनीषा ने उन का उतरा चेहरा देखा तो पूछ बैठीं, ‘‘क्या हुआ…तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

‘‘हां, कुछ बुखार सा लग रहा है.’’

‘‘बुखार है,’’ मनीषा घबरा कर माथा छूती हुई बोली,  ‘‘अनुज कोे बुलाती हूं.’’

‘‘नहीं, मनीषा, उसे परेशान मत करो…शाम तक देख लेते हैं…शायद ठीक हो जाए.’’

मनीषा चुप हो गई.

लेकिन शाम होतेहोते बुखार बहुत तेज हो गया. दोपहर के बाद निरंजन लेटे तो उठे ही नहीं. शाम को आफिस से आ कर अनुज पापा के साथ ही चाय पीता था.

निरंजन जब बाहर नहीं आए तो नीता कमरे में चली गई. मनीषा निरंजन का सिर दबा रही थीं.

‘‘पापा को क्या हुआ, मम्मीजी?’’

‘‘तेरे पापा को बुखार है.’’

‘‘बुखार है…’’ कहती हुई नीता ने बहू की सारी औपचारिकताएं त्याग कर निरंजन के माथे पर हाथ रख दिया.

‘‘पापा को तो बहुत तेज बुखार है, तभी पापा आज सुबह से ही सुस्त लग रहे थे. आप ने बताया भी नहीं. मैं अनुज को बुलाती हूं,’’ इतना कह कर नीता अनुज को बुला लाई.

अनुज जल्दी ही आ गया और मम्मीपापा को तकलीफ न बताने के लिए एक प्यार भरी डांट लगाई, फिर डाक्टर को बुलाने चला गया. डाक्टर ने जांच कर के दवाइयां लिख दीं.

‘‘मौसमी बुखार है, 3-4 दिन में ठीक हो जाएंगे,’’ डाक्टर बोला.

बेटाबहू, पोता और पोती सब निरंजन को घेर कर बैठ गए. नीता ने जब पढ़ाई के लिए डांट लगाई तब बच्चे पढ़ने गए.

‘‘खाने में क्या बना दूं?’’ नीता ने पूछा.

निरंजन बोले,’’ तुम जो बना देती हो वही स्वादिष्ठ लगता है.’’

‘‘नहीं, पापा, बुखार में आप का जो खाने का मन है वही बनाऊंगी.’’

‘‘तो फिर थोड़ी सी खिचड़ी बना दो.’’

‘‘थोड़ा सा सूप भी बना देना नीता, पापा को सूप बहुत पसंद है,’’ अनुज बोला.

निरंजन को अटपटा लग रहा था कि अनुज उन के लिए इतना कुछ कर रहा है. उन की हिचकिचाहट देख कर अनुज बोला, ‘‘मैं कुछ नया नहीं कर रहा. आप दोनों ने दादा व दादी की जितनी सेवा की उतनी तो हम आप की कभी कर भी नहीं पाएंगे. पापा, मैं तब छोटा था. आज जो कुछ भी हम करेंगे हमारे बच्चे वही सीखेंगे. बड़ों का तिरस्कार कर हम अपने बच्चों से प्यार और आदर की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. यह कोई एहसान नहीं है. अब आप आराम कीजिए.’’

‘‘हमारा बेटा औरों जैसा नहीं है न…’’ मनीषा भर्राई आवाज में बोलीं.

‘‘हां, मनीषा, वह बुरा कैसे हो सकता है. तुम ने सुना नहीं, उस ने क्या कहा.’’

‘‘हां, बच्चों में संस्कार उपदेश देने से नहीं आते, घर के वातावरण से आते हैं. जिस घर में बड़ों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है उस घर में बच्चे बड़ों को आदर देना सीखते हैं और जिस घर में बड़ों का तिरस्कार होता है उस घर के बच्चे भी तो वही सीखेंगे.’’

एक पल रुक कर मनीषा फिर बोली, ‘‘हम दोनों ने अपने मातापिता की सेवा व उचित देखभाल की. हमारी गृहस्थी में उन का स्थान हमेशा ही महत्त्वपूर्ण रहा, वही हमारे बच्चों ने सीखा. लेकिन अधिकतर लोग अपने बच्चों से तो सेवा व आदर की उम्मीद करते हैं, लेकिन वे अपने जीवन में अपने बड़ों की मौजूदगी को भुला चुके होते हैं.’’

मनीषा के मन से आज सारे संशय खत्म हो चुके थे.

उन के सगेसंबंधियों, दोस्तों ने उन्हें अपने अनुभव बता कर उन के मन में बेटेबहू के प्रति डर व नकारात्मक विचार पैदा किए, अब वे अपने अनुभव बता कर दूसरों के मन में बेटेबहू के प्रति प्यार व सकारात्मक विचार भरेंगे.

निरंजन ने संतोष से आंखें मूंद लीं और मनीषा कमरे की लाइट बंद कर बहू की सहायता करने के लिए रसोई में चली गईं. आखिर इनसान जो अपनी जिंदगी में बोएगा वही तो काटेगा. कांटे बो कर फूलों की उम्मीद करना तो मूर्खता है.

Hindi Satire : वेलेंटाइन बेकरारियों को सादर चेतावनी

Hindi Satire : अहा ! फिर चौदह फरवरी का जानी दुश्मन दिन फिर आ रहा है. इस दिन का इंतजार असली तो असली, तथाकथित मजनू तक को बेकरारी से रहता है. आह! देखो तो वह हाथ में गुलाब लिए खून की कमी से लथपथ हो गुलाल हुआ कैसे मचल रहा है. कामदेव! उसकी रक्षा करें!

हे चौदह फरवरी का कभी मेरी तरह बेकरारी से इंतजार करने वाले न्यू मजनुओ. मैंने भी कभी हाथ में उधार का रोज़ ले तुम्हारी तरह चौदह फरवरी का बेकरारी से इंतजार किया था. आज मेरा जो ये हाल लाख छुपाने के बाद भी जग जाहिर है न! सब चौदह फरवरी की वजह से है. न उस दिन हाथ में उधारी का रोज लिए हाय! हाय! किया होता, न आज आठ पहर चौबीस घंटे सौ प्रतिशत शुद्ध जहर का घूंट पिया होता. तब सोचा था, इधर मेरा उधारी का रोज कुबूल हुआ तो उधर मुझे जन्नत मिली. पर मुझे क्या पता था कि जिसे मैं जन्नत समझ रहा था, वह मेरे लिए नरक साबित होगा.

इसलिए हर फरवरी की तरह इस फरवरी भी तुम्हें अगाह करना अपना नैतिक दायित्व मानते हुए  तुम्हें वैधानिक चेतावनी दे रहा हूं कि किसीको रोज देने से पहले रोजगार का इंतजाम करो. क्योंकि रोज लेने वाली पहले बंदे का रोजगार देखती है. उसके बाद उसका रोज देखती है. प्रेम से पहले पेट के लिए रोजगार जरूरी है.

आज के समय में जिसके पास रोजगार नहीं, उसे रोज देने का कोई हक नहीं. भले ही उसके दिल में प्रेम आठ समुद्र हिलोरें क्यों न मार रहा हो. और सरकार है कि उसके पास अपने युवाओं को देने के लिए और तो सबकुछ है, पर रोजगार नहीं है.

हे चौदह फरवरी का मंत्री बनने वाले एमएलए टाइप के इंतजार कर रहे प्रेमियो! चौदह फरवरी को अपने पांव पर रोज़ क्यों मारते हो? स्मरण रहे, चौदह फरवरी को अपने हाथों अपने पांव पर रोज़ मार पांव में चोट लगने से सारी जिंदगी लंगड़ा कर दौड़ना पड़ता है, मेरी तरह. भले ही जिंदगी के सारे जख्म भर जाएं ,पर चौदह फरवरी को अपने पांव पर अपने हाथों से मारे रोज़ से हुआ जख्म लाख इलाज कराने के बाद भी नहीं भरता. इस जख्म के बाद और तो बंदे का सबकुछ मरता है, बस, नहीं मरता तो अपने भीतर का चौदह फरवरी का मारा नहीं मरता.

पांव में इस रोज़ से हुए जख्म के बाद न हंसा जाता है ,न रोया जाता है. न जागा जाता है, न सोया जाता है. न किसीसे कहा जाता है, न सहा जाता है. रोज़ किसीके द्वारा कुबूल हो जाने के बाद घर में घर का मुखिया होने के बाद भी मैन सर्वेंट बन चार चार बार झाड़ू, पोंछा करना पड़ता है. जो नहीं करता है, वह घर की मालकिन के ताने सुनता दिन में सौ सौ बार मरता है. दोनों वक्त चपातियां बेलनी पड़ती हैं. बीवी को चाय बनानी पड़ती है. कपड़े धोने पड़ते हैं. बरतन धोने पड़ते हैं. और ऊपर से कहना ये कि काम न काज के, दुश्मन सरकारी राशन की दुकान के सड़े अनाज के. और भी न पूछो क्या क्या! मत ही पूछो तो भला. अपना सारा दुःख बयान कर दूंगा तो बदतमीज से बदतमीज का चौदह फरवरी को किसीको रोज़ देने से विश्वास उठ जाएगा और फूलों की दुकानों में चौदह फरवरी को ताले लग जाएंगे.

तुम जो हंसते हुए मेरा ये दर्दनाक हाल देख रहे हो न,  या मैं तुम्हारे सम्मुख अपना जो हाल बयान कर रहा हूं ,ये सब चौदह फरवरी का ही तोहफा है. न तब मैं चौदह फरवरी के दिन हाथ में उधारी का रोज़ लिए बीए प्रथम श्रेणी पागल हुआ होता और न आज गृहस्थी की चक्की में सड़े गेहूं की तरह पिस रहा होता. ये जो आज मेरा हाल है न! यह सब इस कंबख्त चौदह फरवरी ने ही किया है. मेरे इस हाल के लिए मैं नहीं, चौदह फरवरी जिम्मेदार है. जबसे चौदह फरवरी का शिकार हुआ हूं, तबसे हर महीने बैंक की किस्त चुकाने के लिए किस्त लेनी पड़ रही है. इसलिए मेरा हर साल की तरह इस साल भी नए प्रेमियों से केवल और केवल करबद्ध यही निवेदन है कि जो मजे से जीना चाहते हो तो चौदह फरवरी को किसीको गलती से भी रोज़ देने का अपराध मत करना. इस अपराध की सजा बहुत लंबी होती है.

पर मैं यह भी जानता हूं कि जब जवानी में मैं ही समझदार नहीं था तो तुम क्यों होने वाले! जवानी में समझदार होना सबसे बड़ा अपराध होता है. या कि जवानी में जीव सबकुछ होता है, पर समझदार बिल्कुल नहीं होता. और जितने को उसे समझ आती है तब तक चौदह फरवरी बीत चुकी होती है. उसके बाद सिर में हाथ देकर रोने के सिवाय मेरे जैसे प्रेमी के पास और कुछ शेष बचा नहीं होता.

हे चौदह फरवरी का इंतजार करने वालो मासूम प्रेमियो! आज से पचास साल पहले मैं भी तुम्हारी तरह जवान था.  मेरे दिल में भी चौदह फरवरी को कुछ भी कर गुजरने का तूफान था. उन दिनों मैं हर महीने की चौदह तारीख को चौदह फरवरी ही मानता था. बस, एक ही तमन्ना थी किसीको अपना दिल दे दूं. असल में उन दिनों मेरे पास किसीको दिल देने के सिवाय और कुछ न था. सो मैं हर महीने जेब में दिल लिए फिरता था इस उम्मीद से कि किसी ने इधर दिल मांगा और उधर मैंने उसे दिल पेश कर दिया गांव की राम लीला में रावण के डायलाग डायलाग फरमाइश पर कि नाचने वाली को पेश किया जाए की तर्ज पर.

 

Social Story : धंधा अपना अपना

Social Story : ‘‘भक्तजनो,यह शरीर नश्वर है. इस के अंदर निवास करने वाली आत्मा का परमात्मा से मिलन ही परमानंद है. किंतु काम, क्रोध, लोभ नामक बेड़ियां इस मिलन में सब से बड़ी बाधा हैं. जिस दिन तुम इन बेड़ियों को तोड़ दोगे उस दिन तुम मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो जाओगे,’’ स्वामी दिव्यानंद की ओजस्वी वाणी गूंज रही थी.

महानगर के सब से वातानुकूलित हाल में एक ऊंचे मंच पर स्वामीजी विराजमान थे. गेरुए रंग के रेशमी वस्त्र, गले में रुद्राक्ष की माला, माथे पर चंदन का तिलक और उंगलियों में जगमगा रही पुखराज की अंगूठियां उन के व्यक्तित्व को अनोखी गरिमा प्रदान कर रही थीं.

प्रचार करा गया था कि स्वामीजी को सिद्धि  प्राप्त है. जिस पर उन की कृपादृष्टि हो जाए उस के कष्ट दूर होते देर नहीं लगती. पूरे शहर में स्वामीजी के बड़ेबड़े पोस्टर लगे थे. दूरदूर के इलाकों से आए भक्तजन स्वामीजी की महिमा का बखान करते रहते. जन सैलाब उन के दर्शन करने के लिए उमड़ा पड़ा था.

सुबह, दोपहर, शाम स्वामीजी दिन में 3 बार भक्तों को दर्शन और प्रवचन देते थे. इस समय उन का अंतिम व्याख्यान चल रहा था. पूरा हाल रंगबिरंगे बल्बों की रोशनी से जगमगा रहा था. मंच की सज्जा गुलाब के ताजे फूलों से की गई थी, जिन की खुशबू पूरे हाल में बिखरी थी.

स्वामीजी के चरणों में शीश झुका कर आशीर्वाद लेने वालों का तांता लगा था. आश्रम के स्वयंसेवक भी श्रद्धालुओं को अधिकाधिक चढ़ावा चढ़ा कर आशीर्वाद लेने के लिए प्रेरित कर रहे थे.

रात 9 बजे स्वामीजी का प्रवचन समाप्त हुआ. उन्होंने हाथ उठा कर भक्तों को आशीर्वाद दिया तो उन के जयघोष से पूरा हाल गुंजायमान हो उठा. मंदमंद मुसकराते हुए स्वामीजी उठे और आशीर्वाद की वर्षा करते हुए मंच के पीछे चले गए. उन के जाने के बाद धीरेधीरे हाल खाली हो गया. स्वामीजी के विश्वासपात्र शिष्यों श्रद्धानंदजी महाराज और सत्यानंदजी महाराज ने स्वयंसेवकों को भी बाहर निकालने के बाद हाल का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

‘‘चलो भाई, आज की मजदूरी बटोरी जाए’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने अपने गेरुए कुरते की बांहें चढ़ाते हुए कहा.

‘‘दिन भर इन बेवकूफों का स्वागतसत्कार करतेकरते यह नश्वर शरीर थक कर चूरचूर हो गया है. अब इसे तत्काल उत्तम किस्म के विश्राम की आवश्यकता है. इसलिए सारी गिनती शीघ्र पूरी कर ली जाए,’’ सत्यानंदजी महाराज ने अंगड़ाई लेते हुए सहमति जताई.

‘‘जो आज्ञा महाराज, श्रद्धानंदजी महाराज ने मुसकराते हुए मंच के सामने लगे फूलों के ढेर को फर्श पर बिखरा दिया. फूलों के साथ भक्तजनों ने दिल खोल कर दक्षिणा भी अर्पित की थी. दोनों तेजी से उसे बटोरने लगे, किंतु उन की आंखों से लग रहा था कि उन्हें किसी और चीज की तलाश है.

श्रद्धानंदजी महाराज ने फूलों के ढेर को एक बार फिर उलटापुलटा तो उन की आंखें चमक उठीं. वे खुशी से चिल्लाए, ‘‘वह देखो मिल गया.’’

सामने लाल रंग के रेशमी कपड़े में लिपटी कोई वस्तु पड़ी थी. सत्यानंदजी महाराज ने लपक कर उसे उठा लिया. शीघ्रता से उन्होंने उस वस्त्र को खोला तो उस के भीतर 1 लाख रुपए की नई गड्डी चमक रही थी.

‘‘महाराज, आज फिर वह 1 लाख की गड्डी चढ़ा गया है,’’ सत्यानंदजी गड्डी ले कर दिव्यानंदजी के कक्ष की ओर लपके. श्रद्धानंदजी महाराज भी उन के पीछेपीछे दौड़े.

स्वामी दिव्यानंद शानदार महाराजा बैड पर लेटे हुए थे. आवाज सुनते ही वे उठ बैठे. उन्होंने एक लाख की गड्डी को ले कर उलटपुलट कर देखा. उस के असली होने का विश्वास होने पर उन्होंने पूछा, ‘‘कुछ पता चला कौन था वह?’’

‘‘स्वामीजी, हम ने बहुत कोशिश की, लेकिन पता ही नहीं चल पाया कि वह गड्डी कब और कौन चढ़ा गया,’’ सत्यानंद महाराज ने कहा.

‘‘तुम दोनों माल खाखा कर मुटा गए हो. एक आदमी 5 दिनों से रोज 1 लाख की गड्डी चढ़ा जाता है और तुम दोनों उस का पता नहीं लगा पा रहे हो,’’ स्वामीजी की आंखें लाल हो उठीं.

‘‘क्षमा करें महाराज, हम ने पूरी कोशिश की…’’

‘‘क्या खाक कोशिश की,’’ स्वामीजी उस की बात काटते हुए गरजे, ‘‘तुम दोनों से कुछ नहीं होगा. अब हमें ही कुछ करना होगा,’’ इतना कह कर उन्होंने अपना मोबाइल निकाला और एक नंबर मिलाते हुए बोले, ‘‘हैलो निर्मलजी, मैं जिस मंच पर बैठता हूं उस के ऊपर आज रात में ही सीसी टीवी कैमरा लग जाना चाहिए.’’

‘‘लेकिन स्वामीजी, आप ही ने तो वहां कैमरा लगाने से मना किया था. बाकी सभी जगहों पर कैमरे लगे हुए हैं और उन की चकाचक रिकौर्डिंग हो रही है,’’ निर्मलजी की आवाज आई.

‘‘वत्स, यह सृष्टि परिवर्तनशील है. यहां कुछ भी स्थाई नहीं होता है,’’ स्वामीजी हलका सा हंसे फिर बोले, ‘‘तुम तो जानते हो कि मेरे निर्णय समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं. इसी कारण सफलता सदैव मेरे कदम चूमती है. तुम तो बस इतना बतलाओ कि यह काम कितनी देर में पूरा हो जाएगा. काम तुम्हारा और पैसा हमारा.’’

‘‘सूर्योदय से पहले आप की आज्ञा का पालन हो जाएगा,’’ निर्मलजी ने आश्वासन दिया. फिर झिझकते हुए बोले, ‘‘स्वामीजी कुछ जरूरी काम आ पड़ा है. अगर कुछ पैसे मिल जाते तो कृपा होती.’’

‘‘1 पैसे का भी भरोसा नहीं करते हो मुझ पर,’’ स्वामीजी ने कहा और फिर श्रद्धानंद की ओर मुड़ते हुए बोले, ‘‘निर्मलजी को अभी पैसे पहुंचा दो वरना उन्हें कोई दूसरा जरूरी काम याद आ जाएगा.’’

‘‘जो आज्ञा महाराज,’’ कह श्रद्धानंदजी महाराज सिर नवा कर चले गए.

निर्मलजी ने वादा निभाया. सूर्योदय से पहले स्वामीजी के मंच के ऊपर सीसी टीवी कैमरा लग गया. उधर उस भक्त ने भी अपनी रीति निभाई. आज फिर वह लाल वस्त्र में लिपटी 1 लाख की गड्डी स्वामीजी के चरणों में अर्पित कर गया था. श्रद्धानंद और दिव्यानंद आज भी उस भक्त का पता नहीं लगा पाए.

रात के 11 बजे स्वामीजी बड़ी तल्लीनता के साथ सीसी टीवी की रिकौर्डिंग देख रहे थे. अचानक एक दृश्य को देखते ही वे बोले, ‘‘इसे रिवाइंड करो.’’

श्रद्धानंद ने रिकौर्डिंग को रिवाइंड कर के चला दिया. स्वामीजी ने 2 बार और रिवाइंड करवाया. श्रद्धानंद को उस में कोई खास बात नजर नहीं आ रही थी, लेकिन स्वामीजी की आज्ञा का पालन जरूरी था.

‘‘रोकोरोको, यहीं पर रोको,’’ अचानक स्वामीजी चीखे, श्रद्धानंद ने रिकौर्डिंग तुरंत रोक दी.

‘‘जूम करो इसे,’’ स्वामीजी ने आज्ञा दी तो श्रद्धानंद ने जूम कर दिया.

‘‘यह रहा मेरा शिकार,’’ स्वामीजी ने सोफे से उठ कर स्क्रीन पर एक जगह उंगली रख दी. फिर बोले, ‘‘हलका सा रिवाइंड कर स्लो मोशन में चलाओ इसे.’’

श्रद्धानंद ने स्लो मोशन में रिकार्डिंग चला दी. रिकौर्डिंग में करीब 45 साल का एक व्यक्ति हाथों में फूलों का दोना लिए स्वामीजी के करीब आता दिखाई पड़ा. करीब आ कर उस ने फूलों को स्वामीजी के चरणों में अर्पित करने के बाद अपना शीश भी उन के चरणों में रख दिया. इसी के साथ उस ने अत्यंत शीघ्रता के साथ अपनी जेब से लाल रंग के वस्त्र में लिपटी गड्डी निकाली और फूलों के नीचे सरका दी. एक बार फिर शीश नवाने के बाद वह उठ कर तेजी से बाहर चला गया.

‘‘यह कोई तगड़ा आसामी मालूम पड़ता है. इस का चेहरा तुम दोनों ध्यान से देख लो. मुझे यह आदमी चाहिए… हर हालत में चाहिए,’’ स्वामीजी की आंखों में अनोखी चमक उभर आई.

‘‘आप चिंता मत करिए. कल हम लोग इसे हर हालत में पकड़ लाएंगे,’’ सत्यानंद ने आश्वस्त किया.

‘‘नहीं वत्स,’’ स्वामीजी अपना दायां हाथ उठा कर शांत स्वर में बोले, ‘‘वह मेरा अनन्य भक्त है. उसे पकड़ कर नहीं, बल्कि पूर्ण सम्मान के साथ लाना. स्मरण रहे कि उसे कोई कष्ट न होने पाए.’’

‘‘जो आज्ञा,’’ श्रद्धानंद और सत्यानंद ने शीश नवाया और कक्ष से बाहर चले गए.

अगले दिन उन दोनों की दृष्टि हर आनेजाने वाले भक्त के चेहरे पर टिकी थी. रात के करीब 8 बजे जब शरीर थक कर चूर होने लगा तब वह व्यक्ति आता दिखाई पड़ा.

‘‘देखो वह आ गया,’’ श्रद्धानंद ने सत्यानंद को कुहनी मारी.

‘‘लग तो यही रहा है. चलो उसे उधर ले कर चलते हैं,’’ सत्यानंद ने कहा.

‘‘अभी नहीं. पहले उसे गड्डी चढ़ा लेने दो ताकि सुनिश्चित हो जाए कि यह वही है जिस की हमें तलाश है,’’ श्रद्धानंद फुसफुसाए.

पिछले कल की तरह वह व्यक्ति आज भी मंच के करीब आया. फूल अर्पित करने के बाद उस ने स्वामीजी के चरणों में शीश नवाया, लाल रंग में लिपटी नोटों की गड्डी को चढ़ाने के बाद वह तेजी से उठ कर बाहर चल दिया.

‘‘मान्यवर, कृपया इधर आइए,’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने उस के करीब आ कर सम्मानित स्वर में कहा.

‘‘क्यों?’’

‘‘स्वामीजी आप से भेंट करना चाहते हैं,’’ सत्यानंदजी महाराज ने बताया.

‘‘मुझ से? किसलिए?’’ वह व्यक्ति घबरा उठा.

‘‘वे आप की भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हैं. इसलिए आप को साक्षात दर्शन दे कर आशीर्वाद देना चाहते हैं,’’ श्रद्धानंदजी महाराज ने बताया, ‘‘बड़ेबड़े मंत्री और अफसर स्वामीजी के दर्शनों के लिए लाइन लगा कर खड़े होते हैं. आप अत्यंत सौभाग्यशाली हैं, जो स्वामीजी ने आप को स्वयं मिलने के लिए बुलाया है. अब आप का भाग्योदय निश्चित है.’’

यह सुन उस व्यक्ति के चेहरे पर राहत के चिह्न उभर आए. श्रद्धानंदजी महाराज और सत्यानंद महाराज ने उसे एक खूबसूरत कक्ष में बैठा दिया.

करीब आधा घंटे बाद स्वामीजी उस कक्ष में आए और अत्यंत शांत स्वर में बोले, ‘‘वत्स, तुम्हारे ललाट की रेखाएं बता रही हैं कि तुम्हें जीवन में बहुत बड़ी सफलता मिलने वाली है.’’

स्वामीजी की वाणी सुन वह व्यक्ति उन के चरणों में लेट गया. उस की आंखों से श्रद्धा सुमन बह निकले. स्वामीजी ने उसे अपने हाथों से पकड़ कर उठाया और फिर स्नेह भरे स्वर में बोले, ‘‘उठो वत्स, अश्रु बहाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि एक नया सवेरा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है.’’

‘‘स्वामीजी, आप के दर्शन पा कर मेरा जीवन धन्य हो गया,’’ वह व्यक्ति हाथ जोड़ कर बोला. भावातिरेक में उस की वाणी अवरुद्ध हो रही थी.

स्वामीजी ने उसे अपने साथ सोफे पर बैठाया और फिर बोले, ‘‘वत्स, एक प्रश्न पूछूं तो क्या उस का उत्तर सचसच दोगे?’’

‘‘आप आज्ञा करें तो उत्तर तो क्या आप के लिए प्राण भी देने के लिए तैयार हूं,’’ उस व्यक्ति ने कहा.

स्वामीजी ने अपनी दिव्यदृष्टि उस के चेहरे पर टिका दी फिर सीधे उस की आंखों में झांकते हुए बोले, ‘‘तुम प्रतिदिन 1 लाख रुपयों की गड्डी मेरे चरणों में क्यों चढ़ा रहे हो?’’

यह सुन उस व्यक्ति ने अपनी आंखें बंद कर लीं. उस के चेहरे पर छाए भावों को देख कर लग रहा था कि उस के भीतर भारी संघर्ष चल रहा है. चंद पलों बाद उस ने अपनी आंखें खोलीं और बोला, ‘‘स्वामीजी, मैं एक अरबपति आदमी था, लेकिन व्यापार में घाटा हो जाने के कारण मैं पूरी तरह बरबाद हो गया. सभी रिश्तेदारों और परिचितों ने मुझ से मुंह मोड़ लिया था. एक दिन मुझे पता चला कि यूरोप में एक बंद फैक्टरी कौड़ियों के भाव बिक रही है. मेरी पत्नी आप की अनन्य भक्त है. उस की सलाह पर मैं ने अपना मकान और पत्नी के गहने बेच कर वह फैक्टरी खरीद ली. आप को उस फैक्टरी में 20% का साझेदार बना कर मैं ने उस फैक्टरी को दोबारा चलाना शुरू कर दिया. शुरुआती दिनों में काफी परेशानियां हुईं लेकिन आप के आशीर्वाद से पिछले सप्ताह से वह फैक्टरी फायदे में आ गई. इस समय उस से 5 लाख रुपये रोज का फायदा हो रहा है. इसलिए 20% के हिसाब से मैं रोज 1 लाख रुपए आप के चरणों में अर्पित कर देता हूं.’’

‘‘लेकिन तुम ने यह बात गुप्त क्यों रखी?’’ मुझे बता भी तो सकते थे? स्वामीजी ने पूछा.

‘‘मैं ने सुना है कि आप मोहमाया और लोभ से काफी ऊपर हैं. इसलिए आप को बता कर आप की साधना में विध्न डालने का साहस मैं नहीं कर सका.’’

‘‘वत्स, धन्य हो तुम. तुम जैसे ईमानदार व्यक्तियों के बल पर ही यह दुनिया चल रही है वरना अब तक अपने पाप के बोझ से यह रसातल में समा चुकी होती,’’ स्वामीजी ने गंभीर स्वर में सांस भरी फिर आशीर्वाद की मुद्रा में आते हुए बोले, ‘‘ईश्वर की कृपा दृष्टि तुम पर पड़ चुकी है. जल्द ही तुम्हें 5 लाख रुपए नहीं, बल्कि 5 करोड़ रोज का मुनाफा होने वाला है.’’

‘‘सत्य वचन महाराज,’’ उस व्यक्ति ने श्रद्धा से शीश झुकाया फिर बोला, ‘‘यूरोप में ही एक और बंद पड़ी खान का पता लगा है, मैं ने हिसाब लगाया है कि अगर उसे ठीक से चलाया जाए तो 5 करोड़ रुपए रोज तो नहीं लेकिन 5 करोड़ रुपए महीने का फायदा जरूर हो सकता है.’’

‘‘तो उस फैक्टरी को खरीद क्यों नहीं लेते?’’

‘‘खरीद तो लेता, लेकिन उस के लिए करीब 20 करोड़ रुपए चाहिए. मैं ने काफी भागदौड़ की, लेकिन फंड का इंतजाम नहीं हो पा रहा है. एक बार मुझे व्यापार में घाटा हो चुका है, इसलिए फाइनैंसर मुझ पर दांव लगाने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं,’’ उस व्यक्ति के स्वर में निराशा झलक उठी.

‘‘वत्स, फंड की चिंता मत करो. ऊपर वाले ने तुम्हें मेरी शरण में भेज दिया है, इसलिए अब सारी व्यवस्थाएं हो जाएंगी,’’ स्वामीजी मुसकराए.

‘‘वह कैसे?’’

‘‘तुम जैसे व्यक्तियों का दिया मेरे पास बहुत कुछ है. वह मेरे किसी काम का नहीं है. तुम उसे ले जाओ और फैक्टरी खरीद लो,’’ स्वामीजी ने कहा.

‘‘आप मुझे इतना रुपया दे देंगे?’’ उस व्यक्ति की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.

‘‘अकारण नहीं दूंगा,’’ स्वामीजी मुसकराए, ‘‘मुझे अपने भक्तों के कल्याण के लिए बहुत सारे कार्य करने हैं. इस सब के लिए बहुत पैसा चाहिए. इसलिए इस पैसे से तुम फैक्टरी खरीद लो, लेकिन उस में 51 प्रतिशत शेयर मेरे होंगे.’’

‘‘आप धन्य हैं महाराज,’’ वह व्यक्ति एक बार फिर स्वामीजी के चरणों में लोट गया.

‘‘श्रद्धा और सत्या, तुम दोनों अभी इन के साथ इन के निवास पर जाओ.

साझेदारी के कागजात तुरंत बना लो ताकि फैक्टरी को जल्द से जल्दी खरीद लिया जाए,’’ स्वामीजी ने आज्ञा दी.

अगले ही दिन साझेदारी के कागजात तैयार हो गए. स्वामीजी ने हजारों भक्तों की चढ़ाई की कमाई अपने अनन्य भक्त को सौंप दी. वह भक्त फैक्टरी खरीदने यूरोप चला गया.

स्वामीजी की आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने जगमगा रहे थे. किंतु जब 1 महीने तक उस भक्त का कोई संदेश नहीं आया तो उन्होंने श्रद्धानंद और सत्यानंद को उस के निवास पर भेजा. वहां उपस्थिति गार्ड ने उन दोनों को देखते ही बताया, ‘‘उन साहब ने तो 2 महीने के लिए यह कोठी किराए पर ली थी, किंतु आप लोगों के आने के 2 दिनों बाद वे अचानक ही इसे खाली कर के चले गए थे. किंतु जाने से पहले वे आप लोगों के लिए एक लिफाफा दे गए थे. कह रहे थे कि आप लोग एक न एक दिन उन से मिलने यहां जरूर आएंगे.’’

इतना कह कर गार्ड अपनी कोठरी के भीतर से एक लिफाफा ले आया. डगमगाते कदमों से वे दोनों स्वामी दिव्यानंद के पास लौट आए और लिफाफा उन्हें पकड़ा दिया.

स्वामीजी ने लिफाफा फाड़ा तो उस के भीतर से एक पत्र निकला, जिस में लिखा था:

‘‘आदरणीय स्वामी जी,

सादर चरण स्पर्श. अब तो आप को विश्वास हो गया होगा कि यह शरीर नश्वर है. इस के अंदर निवास करने वाली आत्मा का परमात्मा से मिलन ही परमानंद है. किंतु काम, क्रोध, लोभ नामक बेड़ियां इस मिलन में सब से बड़ी बाधा हैं. जिस दिन कोई व्यक्ति इन बेड़ियों को तोड़ देगा उस दिन वह मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो जाएगा. आप ने अपने भक्तों की बेड़ियां तोड़ने का कार्य किया है और मैं ने आप की इन बेड़ियों को तोड़ने की छोटी सी चेष्टा की है. आप इसे ‘धंधा अपना अपना’ भी कह सकते हैं.

आप का एक सेवक.

स्वामीजी उस पत्र को अपलक निहारे जा रहे थे और श्रद्धा और सत्या उन के चेहरे को.

Valentine’s Day Special : प्यार का रंग

Valentine’s Day Special : ‘‘आज शाम को 5 बजे कनाट प्लेस के कौफी शौप में मिल सकते हो?’’ निराली ने आदित्य से फोन पर पूछा.

‘‘समथिंग स्पैशल. बहुत एक्साइटेड लग रही हो? आज क्या तुम मुझे प्रपोज करने वाली हो?’’ आदित्य ने निराली से शरारती अंदाज में पूछा.

‘‘डोंट बी फनी औल द टाइम. मैं नहीं तुम मुझे प्रपोज करोगे आज मिलने के बाद. न्यूज ही कुछ ऐसी है. बस, टाइम पर मिल जाना,’’ निराली अपनी रौ में बोलती जा रही थी.

‘‘लगता है, अवश्य ही कोई खास समाचार है, नहीं तो तुम मुझे काम छोड़ कर आने के लिए नहीं कहतीं. चलो, मिलते हैं.’’

निराली सचमुच बहुत एक्साइटेड थी और उस वक्त उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह किस के साथ अपनी इस खुशी को बांटे. उस का बस चलता तो तुरंत ही आदित्य को आने को कह देती, पर जानती थी कि लंच के बाद उस की कोई मीटिंग थी, इसलिए वह नहीं आ पाएगा. उसे लग रहा था कि काश, समय के पंख होते तो वह जल्दी से उड़ कर बीत जाता. हालांकि निराली जैसी बुद्धिमान लड़की के लिए यह खबर कोई हैरानी की बात नहीं थी, पर फिर भी वह बहुत उत्साहित थी.

आदित्य और निराली स्कूल के साथी थे. कालेज की पढ़ाई और अपने प्रोफैशनल कोर्स भी उन्होंने अलगअलग जगह से किए थे. हालांकि उन के विषय और अध्ययन के क्षेत्र लगभग समान ही थे. इस के बावजूद स्कूल की वह दोस्ती आज तक कायम थी और इतना वक्त एकदूसरे के साथ गुजारने, एकदूसरे को अच्छी तरह समझने और अपनी हर बात एकदूसरे के साथ शेयर करने के कारण यह तो तय था कि वे आगे भी साथ ही रहेंगे. निराली के मातापिता भी इस ओर से निश्चिंत थे कि आदित्य जैसा लड़का उन की बेटी ने चुना है.

हालांकि दोनों ने कभी शादी के विषय पर डिसकस नहीं किया था, पर आंखों की मुखरता मानो जैसे स्वीकृति दे चुकी थी. वैसे भी उन दोनों के रिश्ते में किसी तरह की औपचारिकता तो थी ही नहीं.

‘‘अब बता भी दो निराली,’’ कौफी का सिप लेते हुए आदित्य ने उस की ओर सैंडविच बढ़ाते हुए कहा.

‘‘तुम तो मुझे इतनी अच्छी तरह समझते हो. कुछ अनुमान लगाओ कि क्या बात हो सकती है?’’ निराली बढ़ते सस्पेंस का आनंद ले रही थी. वैसे भी ग्रिल सैंडविच उसे इतने पसंद थे कि कुछ पल के लिए उस ने अपनी एक्साइटमैंट पर काबू पा लिया था.

‘‘लगता है कि तुम्हारी शादी तय हो गई है. कौन है वह बदनसीब?’’ आदित्य ने चुटकी ली.

‘‘अपनी इस मजाक करने की आदत से बाज आ जाओ, वरना मैं तुम से बात नहीं करूंगी,’’ निराली ने ऐसा चेहरा बनाया मानो वह उस से रूठ गई है.

‘‘ओके बाबा, गलती हो गई, लेकिन अब बता भी दो,’’ आदित्य ने उसे सैंडविच खिलाते हुए कहा.

‘‘मुझे एक इंटरनैशनल ब्रांड, जो भारत में अपने और आउटलेट्स खोलना चाहता है, उस में रिटेल मैनेजर की जौब मिल गई है. बढि़या पैकेज है और ग्रो करने की संभावनाएं भी बहुत हैं. अगर यहां के आउटलेट्स का रिजल्ट मैं 100 प्रतिशत देने में कामयाब हो गई तो विजुअल मर्केंडाइजर का पद भी मिल सकता है. है न कमाल की खबर?’’

निराली की खुशी उस के अंगअंग से टपक रही थी. उसे लग रहा था कि अभी आदित्य उसे बधाई देगा और उस की प्रशंसा करेगा.

‘‘बहुत एक्सीलेंट खबर है, यानी कि तुम्हें लटकेझटके दिखा कर मनपसंद जौब मिल ही गई. कितने समय से तुम इस बात को ले कर परेशान थीं कि मनचाही जौब नहीं मिल पा रही है और वह भी इसी शहर में.’’

‘‘लटकेझटके दिखाने से तुम्हारा क्या मतलब है आदित्य? यानी तुम्हें लगता है कि मैं इस जौब के काबिल नहीं हूं? तुम्हारा इस तरह से मेरे बारे में सोचना साफ बता रहा है कि तुम मुझ से जलते हो. मेरी कामयाबी तुम्हें हीनता का एहसास दिला रही है, वरना मुझे इतने लंबे समय से जानने के बावजूद तुम मेरे बारे में इस तरह न कहते,’’ निराली क्रोध और अपमान से कांपने लगी थी.

‘‘अरे, तुम तो नाराज हो गई. मैं तो बस, ऐसे ही कह रहा था. डौंट टेक मी रौंग,’’ आदित्य उसे कुछ समझा पाता, उस से पहले ही निराली कौफी हाउस से बाहर निकल चुकी थी. उस के लिए अपने आंसुओं को रोकना मुश्किल हो रहा था. उसे यह बात तीर की तरह चुभ रही थी कि स्कूल के समय से उसे जानने वाला आदित्य उस के बारे में इतनी घटिया सोच रखता है. उस से तो मैं ने कोई भी बात कभी छिपाई नहीं. और इसी आदित्य के साथ वह सारी जिंदगी बिताने की सोच रही थी.

निराली को अब अपने पर ही झुंझलाहट होने लगी थी. आखिर वह कैसे आदित्य को समझने में चूक गई. हमेशा उस से आगे रहने वाली निराली शायद अब तक समझ ही नहीं पाई थी कि उस के अंदर एक हीनभावना भी पनप सकती है.

उस के बाद आदित्य ने जब भी निराली को फोन किया या उस से मिलने की कोशिश की, वह नाकामयाब ही रहा. निराली उस के इस मजाक को ले कर इतनी टची हो जाएगी, उस ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी. उसे इस बात का दुख हो रहा था कि निराली उस के प्यार को अनदेखा कर रही है और उस की इस बात को पकड़ कर बैठ गई है. वह एक बार बात कर लेती तो शायद उस के मन में पड़ी गांठ को खोल पाता.

निराली के लिए इस नौकरी को पाना किसी चुनौती से कम नहीं था, इसलिए वह जीजान से अपने काम में जुट गई. उस ने सोच लिया था कि आदित्य नामक अध्याय उस के जीवन में बंद हो चुका है, इसलिए वह उस के साथ न होने से पैदा हुई रिक्तता को भरने के लिए पूरी तरह से काम के प्रति समर्पित हो गई. रिटेल मैनेजर का काम आउटलेट के लिए प्लान तैयार करने से ले कर कोऔर्डिशन तथा औपरेशन आदि होता है. लेआउट के मर्केंडाइज, रिटेल और्डर तथा स्टौक की मौनिटरिंग, कार्यरत लोगों की रिपोर्ट तैयार करना भी उस के विभाग के अंतर्गत आने वाले काम थे.

उस औफिस में अपने प्रति लोगों का व्यवहार देख पहले तो उसे आश्चर्य हुआ था कि लोग कितना इनडिफरेंट एटीट्यूड रखते हैं, लेकिन एक महीने बाद फिर पता चला कि एक खास व्यक्ति सारे काम पर नजर रखने के लिए नियुक्त किया गया है. जो सीधे तो नहीं, पर उस के सीनियर के माध्यम से उस के काम की रिपोर्ट लेगा. उन से मिलने की उत्सुकता निराली के मन में जागी, पर कभी मिलने का मौका नहीं मिला, क्योंकि एक तो वह कहीं  और बैठते थे और उन को ले कर एक गोपनीयता भी रखी गई थी. बाकी लोगों का भी सहयोग उसे मिलने लगा.

आउटलेट का प्लान तैयार हो गया था. प्रेजेंटेशन देने के बाद वह अपने केबिन में आ गई थी. अगले दिन उस के सीनियर उस के केबिन में आए और बोले, प्लान तो अच्छा है, पर अगर तुम इस में रेखांकित जगहों पर संशोधन और सुधार कर सको तो इसे अप्रूवल मिल जाएगा. निराली को थोड़ा आश्चर्य हुआ था, यह देख कर, वरना अकसर सीनियर तो अपने मातहतों को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं और यहां उस की कमियों को छिपाया जा रहा था.

आउटलेट खुल जाने के बाद अपने ब्रांड को इस तरह बाजार में उतारना था कि भारतीय मार्केट पर भी उस का कब्जा हो जाए. इस के लिए निराली ने जितने भी प्रपोजल दिए, वे पसंद किए गए. हालांकि हमेशा उस के सीनियर ने उस से पहले कहींकहीं सुधार करवाया और बाद में सब के सामने प्रशंसा भी की. उन की प्रोडक्ट सर्विस भी लाजवाब रही.

उन की कंपनी को लगातार और्डर मिलने लगे. ब्रांड प्रमोशन के लिए वह हमेशा नई योजनाएं बनाती रहती. उसे इस बात की भी हैरानी होती थी कि पहले तो उस के प्रपोजल इतनी आसानी से अप्रूव नहीं होते थे, थोड़ी कमी होने पर ही दोबारा प्लान तैयार करने के आदेश दिए जाते थे, लेकिन अब उसे सुझाव मिलते रहते हैं, ताकि वह उन के अनुसार चीजों को सुधार व अपडेट कर सके.

अब निराली को समयसमय पर अपने काम का क्रेडिट मिलने लगा, पर न जाने क्यों उसे लगता था कि उस की गलतियों या कमियों को उस तरह से उजागर नहीं किया जाता है जैसेकि बाकी सहयोगियों की. लोग दबी जबान कहते भी थे कि उस के साथ फेवर हो रहा है, पर क्यों? वह जितना सोचती उतना उलझती जाती. एक बार अपने सीनियर से उस ने इस विषय पर बात करनी चाही तो वह कहने लगे, यह सब तुम्हारी काबिलियत का फल है. अपने को अंडरएस्टिमेट मत करो.

आदित्य से मिले निराली को 6 महीने हो चुके थे. पहले तो उस ने भी निराली को मिलने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में वह भी खामोश हो गया था. उसे तो पता भी नहीं था कि आजकल आदित्य कहां है. यह तो उसे पता लगा था कि वह अपनी नौकरी छोड़ चुका है. अब किसी और जगह काम कर रहा है, पर कहां?

अकेले में अकसर उसे आदित्य की याद आती, पर उस की बात याद आते ही वह अपने दिलोदिमाग पर उसे हावी होने से रोक देती. उसे बस यही अफसोस था कि किसी लड़की को आगे बढ़ते देख उस के बारे में ऐसा सोचा जाता है. क्या कोई लड़की अपनी काबिलियत से आगे नहीं बढ़ सकती है? कमियां तो सभी में होती हैं, फिर लड़कियों पर ही क्यों फिकरे कसे जाते हैं?

अपने ब्रांड के पसंद किए जाने और अपने आउटलेट्स की बढ़ती बिक्री से केवल निराली ही नहीं, कंपनी भी बहुत खुश थी. कंपनी को यकीन हो गया था कि भारत के और शहरों में भी आउटलेट्स खोले जा सकते हैं. निराली को यह काम सौंपने की बात चल रही थी.

‘‘हमारे बौस इस पर बात करने के लिए तुम से मिलना चाहते हैं,’’ उस के सीनियर ने उसे सूचना दी तो पल भर को वह अवाक रह गई कि आज तक उन के माध्यम से संपर्क रखने वाले बौस उस से क्यों मिलना चाहते हैं? लेकिन अपने अंदर उन से मिलने की उत्सुकता उसे बेकाबू कर रही थी.

एक आलीशान औफिस के विशालकाय केबिन में जब उस ने प्रवेश किया तो बौस की पीठ उस की तरफ थी.

‘‘तुम्हारे परफौर्मेंस और काबिलियत से कंपनी बहुत खुश है, इसलिए वह तुम्हें प्रमोट करना चाहती है,’’ आवाज सुन कर निराली सकते में आ गई, फिर अपना वहम समझ कर कुछ कहना ही चाह रही थी कि कुरसी घूमी और एक चेहरा उस के सामने आ गया.

‘‘तुम?’’ आदित्य को अपने सामने देख वह कुरसी से गिरतेगिरते बची. माथे पर एसी चलने के बावजूद पसीने की बूंदें छलक आईं.

‘‘इट्स मी.’’

‘‘तुम ने तो मुझ से मिलने से मना कर दिया था, फिर क्या करता? आखिर पुरानी दोस्ती है हमारी. न तो दोस्ती का रंग फीका पड़ता है और न ही प्यार का. क्यों ठीक कह रहा हूं न? क्या तुम मुझे भुला पाई हो? यू स्टिल लव मी. एक छोटी सी बात का बुरा मान कर बरसों के साथ को नकार रही थीं तुम.’’

‘‘यानी कि तुम मेरी मदद कर रहे थे, पर क्यों? मुझे तुम्हारे सपोर्ट की जरूरत नहीं है.’’ निराली के दिल में तो आग सुलग रही थी, पर आंखों में नमी झलकने लगी थी.

‘‘मदद नहीं, तुम्हारी प्रतिभा को उभारने और लोगों के सामने लाने का मेरा यह छोटा सा प्रयास था. जिसे आप प्यार करते हैं, उस के लिए इतना सा तो किया ही जा सकता है,’’ आदित्य उस के पास आ कर खड़ा हो गया था. निराली के कंधे पर उस ने हाथ रखा तो वह खड़ी हो गई और झट से आदित्य के सीने से लग गई.

‘‘मुझे माफ कर दो, मैं ने तुम्हें समझने में भूल की. एक छोटे से मजाक को सच मान तुम्हारी दोस्ती और प्यार की अवहेलना की. यह समझ ही नहीं पाई कि न दोस्ती का रंग और न ही प्यार का रंग फीका पड़ता है, बल्कि वह तो समय के साथ और गहरा होता जाता है.’’

‘‘अब तुम कोई बेवकूफी करो, उस से पहले ही मैं तुम्हें जीवन भर के लिए अपने से बांध लूंगा,’’ आदित्य घुटनों के बल नीचे बैठ गया और बोला, ‘‘क्या तुम मुझ से शादी करोगी निराली?’’

आदित्य के हाथ में अपना हाथ देते हुए निराली मुसकराई. आंखों की नमी बाहर छलक आई थी, पर खुशी की धारा बन कर.

कुकिंग शो Celebrity Masterchef में आयशा जुल्का ने की वाइल्ड कार्ड एंट्री

Celebrity Masterchef : एक समय की प्रसिद्ध अभिनेत्री आयशा जुल्का जिन्होंने आमिर खान के साथ जो जीता वह सिकंदर और अक्षय कुमार के साथ खिलाड़ी जैसी हिट फिल्में दी है. वही आयशा जुल्का एक बार फिर सोनी चैनल पर प्रसारित सेलिब्रिटी मास्टर शेफ में बतौर वाइल्ड कार्ड एंट्री किया हैं. आयशा की एंट्री पर कुकिंग शो का माहौल गर्मा गया है. इस शो के प्रतियोगियों के मन में यह सवाल कुलबुला रहा है कि क्या आयशा जुल्का को खाना बनाने की प्रैक्टिस है? क्या उनको खाना बनाना आता है? सवालों का जवाब आयशा जुल्का खुद अपने अंदाज में देने जा रही हैं.

गौरतलब है सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन का यह शानदार रियलिटी शो सेलिब्रिटी मास्टर शेफ में लगातार ट्विस्ट और टर्न्स आ रहे हैं. जिसकी वजह से शो रोमांचक होता जा रहा है. रेड कार्पेट पर चलने वाले सितारे कुकिंग शो के किचन में खाना बनाने का हुनर दिखा रहे हैं. जिसकी मेजबानी कर रही हैं सदाबहार निर्माता ,निर्देशक ,कोरियोग्राफर फराह खान और उनके साथ मशहूर शेफ विकास खन्ना और रणवीर बरार. ये दोनों जज कठिन रेसिपी देकर मुकाबला और कड़क बना रहे हैं.

आयशा जुल्का इस सेलिब्रिटी मास्टर शेफ में बतौर प्रतियोगी व्यंजनों में भी जादू बिखरने के लिए तैयार हैं . बहरहाल आयशा इस शो को लेकर बेहद उत्साहित हैं आयशा जुल्का के अनुसार बचपन से ही मुझे खाना बनाने का शौक रहा है. नए नए व्यंजनों के साथ प्रयोग के लिए मै हमेशा रोमांचक रही हूं. बतौर प्रतियोगी सेलिब्रिटी मास्टर शेफ में होना मेरे लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है.

मुझे खुशी है कि मैं प्रतिभाशाली प्रतियोगियों के साथ और लाजवाब जजों के मार्गदर्शन में अपना टैलेंट जांचने के लिए तैयार हूं . यह मेरे लिए एक नया अध्याय है और मैं बहुत उत्साहित हूं . यह देखने के लिए कि मैं इसमें कितना कामयाब हो पाती हूं. मुझे देखना है कि मैं इस सफर में कितना आगे बढ़ती हूं और सफल हो पाती हूं या नहीं . बहरहाल इस चुनौती को मैंने दिल से स्वीकार किया है. सेलेब्रिटी मास्टर शेफ का प्रसारण हर सोमवार से शुक्रवार रात 8 बजे सोनी चैनल और सोनी लिव पर होता है. जो स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ मनोरंजन से भरपूर है.

Gardening Tips : विंटर में ऐसे करें गार्डनिंग, पौधों को नहीं होगा नुकसान

Gardening Tips : बागबानी के शौकीन कई लोग अपने घर के बगीचे में खूबसूरत पौधे लगा तो लेते हैं पर उन की देखभाल नहीं कर पाते. ऐसी स्थिति में बगीचे की सुंदरता तो खत्म होती ही है, साथ ही पेड़पौधे भी देखरेख के अभाव में मरने लगते हैं खासकर सर्दियों के मौसम में कम तापमान और रात को पाला पड़ने से पौधों को बहुत नुकसान होता है.

आइए, कुछ तरीके जाने जिन से सर्दियों में पौधों की देखरेख आसानी से हो जाएगी और आप का बगीचा भी हराभरा और फूलों से महकता रहेगा:

रोजाना पानी न दें : सर्दी में तापमान कम होने के कारण पौधों को पानी की बहुत कम जरूरत होती है. गरमियों में पौधों को जहां दिन में 2 बार पानी देना पड़ता है, वही सर्दियों में 4-5 दिन में 1 बार पानी देना चाहिए. जब तक ऊपरी मिट्टी 1-2 इंच सूख नहीं जाती, तब तक पानी नहीं देना चाहिए. पौधों में पानी देने से पहले कम से कम 1 इंच की गुड़ाई कर के फर्टिलाइजर दें, अगले दिन पानी देना चाहिए. सर्दियों में पौधों की मिट्टी में काफी दिन तक नमी बनी रहती है.

इंडोर प्लांट्स में मिट्टी पूरी तरह से सूखने पर ही पानी देना चाहिए. ज्यादा पानी देने से उन की जड़ें गल जाती हैं. जहां तक संभव हो पानी स्प्रे से दें. स्प्रे पौधों के तनों या पत्तियों में न दे कर सीधे मिट्टी में दें. वाटर स्प्रे से पूरी मिट्टी गीली हो जाती है. अगर ठंड ज्यादा न हो तो पत्तियों पर भी स्प्रे कर सकते हैं. ऐसा करने से आप का पौधा हराभरा रहेगा.

गमलाप्लेट में पानी न जमने दें : ज्यादा मात्रा में पौधों को पानी देने से गमलों के नीचे रखी प्लेट्स में पानी भर जाता है. इस से पौधों की जड़े खराब होने लगती हैं. इस से बचने के लिए या तो प्लेट्स को हटा दें या फिर समयसमय पर प्लेट्स का पानी निकालते रहें. ऐसा करने से पौधे की जड़ें गलेंगी और सड़ेंगी नहीं और पौधा सुरक्षित रहेगा.

धूप बहुत जरूरी : आप फूलोंफलों वाले पौधों को ज्यादा से ज्यादा सूरज की रोशनी में रखें. इस से उन्हें पर्याप्त गरमी मिलेगी और पौधों में फूल ज्यादा आएंगे, पौधों को धूप मिले इस के लिए आप को पेड़पौधों के सूखे हिस्से अथवा टहनियों की छंटाई करनी चाहिए. इस से पौधों को आसानी से धूप भी मिलने लगेगी और ये खूब फूलेंगेफलेंगे.

गुड़ाई है जरूरी : बगीचे या गमलों में लगे पौधों के आसपास अनचाही जंगली घास या पौधे उग आते हैं जो हमारे पौधों को नुकसान पहुंचाते है उन पौधों को हटाने के लिए सप्ताह में कम से कम 1 बार खुरपी से गुड़ाई जरूर करें ताकि मिट्टी में हवा अंदर जा सके और जड़ें मजबूत हों और पौधे सुरक्षित रह सकें.

फंगसनाशी स्प्रे करें : बगीचे या गमलों के पौधों को फंगस के प्रकोप से बचाने के लिए पौधों के पत्तों और मिट्टी पर 15-20 दिन में एक बार नीम के तेल का स्प्रे जरुर करें. स्प्रे करने से कीटों और पानी से पौधों पर जो फंगस लग जाती है उस से आप पौधों को बचा सकती हैं और पौधों को सुरक्षित रख सकती हैं.

ओस से बचाव : ओस पौधों के लिए हानिकारक होती है. सर्दियों में ओस पड़ने से पौधों के पत्ते जल जाते हैं और फूल और कलियां गल जाती हैं. उन्हें इस से बचाने के लिए सुबह के समय पौधों के पत्तों को सूखे कपड़े से पोंछ दें या फिर पानी का स्प्रे करें ताकि ओस धुल जाए और पौधों के पत्ते सुरक्षित रहें. ओस से बचाने के लिए पौधों के ऊपर जालीनुमा कपड़ा या चादर लगा दें ताकि पौधों पर ओस न पड़े और पौधे सुरक्षित रहें.

पौधों को मुरझाने से बचाएं : सर्दियों के मौसम में अधिक ठंड पड़ने के कारण अकसर पौधे मुर?ा जाते हैं. पौधे मुरझाएं नहीं इस के लिए आप पौधों को कमरे, बालकनी, खिड़की आदि पर ऐसी जगहों पर रखें ताकि तेज ठंडी हवाएं सीधी पौधों पर न लगें. ऐसा करने से पौधों को मुर?ाने या खराब होने से बचाया जा सकता है.

मल्चिंग करें : पौधों की जड़ों को सर्दी से बचाने के लिए गमले की मिट्टी के ऊपर मल्चिंग करना चाहिए. इस से पौधे सुरक्षित रहते हैं. इस के लिए छोटेछोटे पत्थर, नारियल के रेशे, नीम के सूखे पत्ते, अंडों के छिलकों को गमलों या बगीचे में लगे पौधों के आसपास बिछा सकते हैं. ये चीजें दिन में गरमी को सोख लेते हैं और पौधों की जड़ों को रात को ठंडक से बचाते हैं. ऐसा करने से आप अपने पौधे को सुरक्षित रख सकती हैं.

संतुलित खाद

आप को पौधों में सर्दियों में भी खाद अवश्य डालनी चाहिए. आप चाहें तो खाद बाजार से खरीद सकती हैं या फिर आप घर पर भी खाद तैयार कर सकती हैं. सर्दियों में खाद बनाने के लिए गोबर और नीम की खली को एकसाथ मिला खाद तैयार कर सकती हैं.

नीम की खली में कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम होता है जो सर्दियों में पौधों के लिए बहुत लाभदायक होता है. इस खाद का उपयोग करने से सर्दियों में पौधों में चींटियां और फंगस भी नहीं लगती है. आप को पर्याप्त मात्रा में ही खाद डालनी चाहिए. बहुत अधिक खाद पौधों के लिए हानिकारक होती है.

लिक्विड फर्टिलाइजर: सर्दियों के मौसम में पौधों को 25-30 दिन में लिक्विड फर्टिलाइजर देनी चाहिए ताकि सर्दियों में भी उन की ग्रोथ होती रहे. वैसे तो पौधे लगाते समय फर्टिलाइजर दी जाती है. बारबार खाद डालने से पौधे खराब हो जाते हैं. इसलिए समय पर सब चीजों का ध्यान रखना चाहिए.

Winter Hair Care : सर्दियों में बालों की कैसे करें सही देखभाल, जानिए ऐक्सपर्ट से…

Winter Hair Care : सर्दियों का मौसम ठंडी हवाओं और कम नमी के साथ आता है जो न केवल हमारी त्वचा बल्कि बालों पर भी गहरा प्रभाव डालता है. इस मौसम में बाल रूखे, बेजान और कमजोर हो सकते हैं. अगर सही देखभाल न की जाए तो बालों का टूटना, दोमुंहे बाल और डैंड्रफ जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.

आइए, जानते हैं सर्दियों में बाल कमजोर क्यों हो जाते हैं और उन की देखभाल के सही तरीके:

नमी की कमी: सर्दियों में हवाओं में नमी की मात्रा कम होती है जिस से बाल रूखे और कमजोर हो जाते हैं.

गरम पानी का उपयोग: ठंड के कारण महिलाएं बाल धोने के लिए गरम पानी का इस्तेमाल करती हैं जो स्कैल्प के प्राकृतिक तेलों को हटा देता है और बालों को और अधिक रूखा बना देता है.

ठंडी हवा और प्रदूषण: ठंडी हवाएं बालों की नमी छीन लेती हैं और प्रदूषण से बाल बेजान हो जाते हैं.

डैंड्रफ की समस्या: स्कैल्प का रूखापन बढ़ने से डैंड्रफ हो सकता है जो बालों के झड़ने और खुजली का कारण बनता है.

सर्दियों में बालों की देखभाल के टिप्स

बालों को पोषण देने के लिए नियमित तेल मालिश करें.

जोजोबा औयल: बालों में गहराई तक जाकर नमी बनाए रखता है.

नारियल तेल: बालों को प्राकृतिक नमी देता है और ठंडी हवाओं से बचाता है.

लैवेंडर एसेंशियल औयल: रूखापन दूर करने में मदद करता है.

सही शैंपू और कंडीशनर का चुनाव करें

सल्फेट और पैराबेन मुक्त शैंपू का उपयोग करें.

रोजमैरी ऐसैंशियल औयल वाला कंडीशनर बालों को गहराई से पोषण देता है.

बाल धोने के बाद कंडीशनर लगाना न भूलें.

हेयर मास्क लगाएं.

सप्ताह में एक बार हेयर मास्क लगाएं.

ड्राई स्कैल्प के लिए: ऐलोवेरा, शहद और टीट्री औयल का मिश्रण बनाएं.

डैमेज्ड बालों के लिए: आर्गन औयल और एवोकाडो से बना मास्क लगाएं.

बाल धोने का सही तरीका अपनाएं

गुनगुने पानी से बाल धोएं.

बाल धोने के बाद ठंडे पानी से रिंस करें ताकि नमी लौक हो सके.

डैंड्रफ से बचाव करें

शैंपू में टी ट्री ऑयल मिलाएं.

हफ्ते में 1 बार एप्पल साइडर विनेगर से

स्कैल्प धोएं.

बाल टूटने से बचाएं

बालों को धोने के बाद हेयर सीरम लगाएं.

गीले बालों को ब्रश करने से बचें.

सर्दियों में क्या करें और क्या न करें

क्या करें

हाइड्रेटेड रहें: पर्याप्त पानी पीएं ताकि बाल और शरीर दोनों हाइड्रेटेड रहें.

संतुलित आहार लें: प्रोटीन, विटामिन ई और ओमेगा-3 फैटी ऐसिड से भरपूर भोजन करें.

सौफ्ट फैब्रिक का इस्तेमाल करें: साटन या सिल्क तकिया कवर का उपयोग करें ताकि बालों की नमी बनी रहे.

प्राकृतिक रूप से बाल सुखाएं: हेयर ड्रायर का कम से कम उपयोग करें.

क्या न करें

हीट स्टाइलिंग टूल्स का अधिक

उपयोग न करें: स्ट्रेटनर का इस्तेमाल सीमित करें.

रसायनयुक्त उत्पाद न लगाएं: हार्श कैमिकल्स बालों को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

गीले बालों को न बांधें: बालों को पूरी तरह सूखने के बाद ही बांधें.

खास ध्यान देने योग्य बातें

बालों को ओवर स्टाइलिंग से बचाएं.

बालों को थोड़ी देर धूप दिखाएं ताकि उन्हें विटामिन डी मिल सके.

नियमित हेयर स्पा कराएं.

ठंडी हवाओं से बचाने के लिए स्कार्फ या कैप से बालों को ढकें.

-ब्लौसम कोचर, सौंदर्य विशेषज्ञ 

Extramarital Affair : मैं अपनी पत्नी को धोखा दे रहा हूं… अगर उसे पता चल गया तो…

Extramarital Affair :  अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल

मैं 28 साल का हूं. मेरी शादी को 4 साल हो चुके हैं. मेरी छोटी साली भी हमारे साथ रहती है.

एक दिन बीवी घर पर नहीं थी और मैं टीवी देख रहा था, तभी साली अचानक कमरे में आई और मुझे गिरा कर चूमने लगी. मेरे मना करने पर भी उस ने अपने सारे कपड़े उतार दिए और उस ने वह सब कर डाला, जो अमूमन बीवी करती है.

अब वह मुझ से रोजाना संबंध बनाने को कहती है और रात में भी अपने साथ सोने को कहती है. मना करने पर अपनी बहन को बताने की धमकी देती है. मैं क्या करूं?

जवाब

आप का तो घर बैठे ही बंपर ड्रा निकल आया, मगर यह बम की तरह खतरनाक भी हो सकता है. साली कहीं पेट से हो गई, तो और बवाल हो जाएगा. बीवी को पता चलेगा, तो भी फसाद ही होगा.

बेहतर यही होगा कि आप किसी बहाने से साली को वापस उस के घर भेज दें और हो सके तो अपना तबादला कहीं दूर करा लें.

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भौजाई से प्यार, पत्नी सहे वार

19 जनवरी, 2017 को उत्तर प्रदेश के जिला सिद्धार्थनगर के थाना जोगिया उदयपुर के थानाप्रभारी शमशेर बहादुर सिंह औफिस में बैठे मामलों की फाइलें देख रहे थे, तभी उन की नजर करीब 4 महीने पहले सोनिया नाम की एक नवविवाहिता की संदिग्ध परिस्थितियों में ससुराल में हुई मौत की फाइल पर पड़ी. सोनिया की मां निर्मला देवी ने उस के पति अर्जुन और उस की जेठानी कौशल्या के खिलाफ उस की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. घटना के बाद से दोनों फरार चल रहे थे. उन की तलाश में पुलिस जगहजगह छापे मार रही थी. लेकिन कहीं से भी उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली थी.

आरोपियों की गिरफ्तारी को ले कर एसपी राकेश शंकर का शमशेर बहादुर सिंह पर काफी दबाव था, इसीलिए वह इस केस की फाइल का बारीकी से अध्ययन कर आरोपियों तक पहुंचने की संभावनाएं तलाश रहे थे. संयोग से उसी समय एक मुखबिर ने उन के कक्ष में आ कर कहा, ‘‘सरजी, एक गुड न्यूज है. अभी बताऊं या बाद में?’’

‘‘अभी बताओ न कि क्या गुड न्यूज है,ज्यादा उलझाओ मत. वैसे ही मैं एक केस में उलझा हूं.’’ थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘जो भी गुड न्यूज है, जल्दी बताओ.’’

इस के बाद मुखबिर ने थानाप्रभारी के पास जा कर उन के कान में जो न्यूज दी, उसे सुन कर थानाप्रभारी का चेहरा खिल उठा. उन्होंने तुरंत हमराहियों को आवाज देने के साथ जीप चालक को फौरन जीप तैयार करने को कहा. इस के बाद वह खुद भी औफिस से बाहर आ गए. 5 मिनट में ही वह टीम के साथ, जिस में एसआई दिनेश तिवारी, सिपाही जय सिंह चौरसिया, लक्ष्मण यादव और श्वेता शर्मा शामिल थीं, को ले कर कुछ ही देर में मुखबिर द्वारा बताई जगह पर पहुंच गए. वहां उन्हें एक औरत और एक आदमी खड़ा मिला.

पुलिस की गाड़ी देख कर दोनों नजरें चुराने लगे. पुलिस जैसे ही उन के करीब पहुंची, उन के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं. शमशेर बहादुर सिंह ने उन से नाम और वहां खड़े होने का कारण पूछा तो वे हकलाते हुए बोले, ‘‘साहब, बस का इंतजार कर रहे थे.’’

‘‘क्यों, अब और कहीं भागने का इरादा है क्या?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, आप क्या कह रहे हैं, हम समझे नहीं, हम क्यों भागेंगे?’’ आदमी ने कहा.

‘‘थाने चलो, वहां हम सब समझा देंगे.’’ कह कर शमशेर बहादुर सिंह दोनों को जीप में बैठा कर थाने लौट आए. थाने में जब दोनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपने नाम अर्जुन और कौशल्या देवी बताए. उन का आपस में देवरभाभी का रिश्ता था.

अर्जुन अपनी पत्नी सोनिया की हत्या का आरोपी था. उस की हत्या में कौशल्या भी शामिल थी. हत्या के बाद से दोनों फरार चल रहे थे. थानाप्रभारी ने सीओ महिपाल पाठक के सामने दोनों से सोनिया की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने सारी सच्चाई उगल दी. सोनिया की जितनी शातिराना तरीके से उन्होंने हत्या की थी, वह सारा राज उन्होंने बता दिया. नवविवाहिता सोनिया की हत्या की उन्होंने जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले का एक थाना है जोगिया उदयपुर. इसी थाने के अंतर्गत मनोहारी गांव के रहने वाले जगदीश ने अपने छोटे बेटे अर्जुन की शादी 4 जुलाई, 2013 को पड़ोस के गांव मेहदिया के रहने वाले रामकरन की बेटी सोनिया से की थी. शादी के करीब 3 सालों बाद 25 अप्रैल, 2016 को गौने के बाद सोनिया ससुराल आई थी.

पति और ससुराल वालों का प्यार पा कर सोनिया बहुत खुश थी. अपने काम और व्यवहार से सोनिया घर में सभी की चहेती बन गई. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक सोनिया ने पति अर्जुन में कुछ बदलाव महसूस किया. उस ने गौर करना शुरू किया तो पता चला कि अर्जुन पहले उसे जितना समय देता था, अब वह उसे उतना समय नहीं देता.

पहले तो उस ने यही सोचा कि परिवार और काम की वजह से वह ऐसा कर रहा होगा. लेकिन उस की यह सोच गलत साबित हुई. उस ने महसूस किया कि अर्जुन अपनी भाभी कौशल्या के आगेपीछे कुछ ज्यादा ही मंडराता रहता है. वह भाभी के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताता है.

जल्दी ही सोनिया को इस की वजह का भी पता चल गया. अर्जुन के अपनी भाभी से अवैध संबंध थे. भाभी से संबंध होने की वजह से वह सोनिया की उपेक्षा कर रहा था. कमाई का ज्यादा हिस्सा भी वह भाभी पर खर्च कर रहा था. यह सब जान कर सोनिया सन्न रह गई.

कोई भी औरत सब कुछ बरदाश्त कर सकती है, लेकिन यह हरगिज नहीं चाहती कि उस का पति किसी दूसरी औरत के बिस्तर का साझीदार बने. भला नवविवाहिता सोनिया ही इस बात को कैसे बरदाश्त करती. उस ने इस बारे में अर्जुन से बात की तो वह बौखला उठा और सोनिया की पिटाई कर दी. उस दिन के बाद दोनों में कलह शुरू हो गई.

सोनिया ने इस बात की जानकारी अपने मायके वालों को फोन कर के दे दी. उस ने मायके वालों से साफसाफ कह दिया था कि अर्जुन का संबंध उस की भाभी से है. शिकायत करने पर वह उसे मारतापीटता है. यही नहीं, उस से दहेज की भी मांग की जाती है. सोनिया की परेशानी जानते हुए भी मायके वाले उसे ही समझाते रहे.

वे हमेशा उस के और अर्जुन के संबंध को सामान्य करने की कोशिश करते रहे, पर अर्जुन ने भाभी से दूरी नहीं बनाई, जिस से सोनिया की उस से कहासुनी होती रही, पत्नी की रोजरोज की किचकिच से अर्जुन परेशान रहने लगा. उसे लगने लगा कि सोनिया उस के रास्ते का रोड़ा बन रही है. लिहाजा उस ने भाभी कौशल्या के साथ मिल कर एक खौफनाक योजना बना डाली.

24-25 सितंबर, 2016 की रात अर्जुन और कौशल्या ने साजिश रच कर सोनिया के खाने में जहरीला पदार्थ मिला दिया. अगले दिन यानी 25 सितंबर की सुबह जब सोनिया की हालत बिगड़ने लगी तो अर्जुन उसे जिला अस्पताल ले गया.

उसी दिन सुबह सोनिया के पिता रामकरन को मनोहारी गांव के किसी आदमी ने बताया कि सोनिया की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है, वह जिला अस्पताल में भरती है. यह खबर सुन कर वह घर वालों के साथ सिद्धार्थनगर स्थित जिला अस्पताल पहुंचा. तब तक सोनिया की हालत बहुत ज्यादा खराब हो चुकी थी. डाक्टरों ने उसे कहीं और ले जाने को कह दिया था.

26 सितंबर की सुबह 4 बजे पता चला कि सोनिया की मौत हो चुकी है. बेटी की मौत की खबर मिलते ही रामकरन अपने गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर बेटी की ससुराल मनोहारी गांव पहुंचा तो देखा सोनिया के मुंह से झाग निकला था. कान और नाक पर खून के धब्बे थे. हाथ की चूडि़यां भी टूटी हुई थीं. लाश देख कर ही लग रहा था कि उस के साथ मारपीट कर के उसे कोई जहरीला पदार्थ खिलाया गया था.

बेटी की लाश देख कर रामकरन की हालत बिगड़ गई. उन के साथ आए गांव वालों ने पुलिस कंट्रोल रूम को हत्या की सूचना दे दी. सूचना पा कर कुछ ही देर में थाना जोगिया उदयपुर के थानाप्रभारी शमशेर बहादुर सिंह पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गए. उन्होंने सोनिया के शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

बेटी की मौत से रामकरन को गहरा सदमा लगा था, जिस से उन की तबीयत खराब हो गई थी. उन्हें आननफानन में इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया. इस के बाद पुलिस ने सोनिया की मां निर्मला की तहरीर पर अर्जुन और उस की भाभी कौशल्या के खिलाफ भादंवि की धारा 498ए, 304बी, 3/4 डीपी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था.

2 दिनों बाद जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि सोनिया के साथ मारपीट कर के उसे खाने में जहर दिया गया था. घटना के तुरंत बाद अर्जुन और कौशल्या फरार हो गए थे. लेकिन पुलिस उन के पीछे हाथ धो कर पड़ी थी. उन दोनों की गिरफ्तारी न होने से लोगों में आक्रोश बढ़ रहा था.

आखिर 4 महीने बाद मुखबिर की सूचना पर अर्जुन और कौशल्या गिरफ्तार कर लिए गए थे. पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें सक्षम न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे तक दोनों की जमानतें नहीं हो सकी थीं.पुलिस अधीक्षक राकेश शंकर ने घटना का खुलासा करने वाली पुलिस टीम की हौसलाअफजाई करते हुए 2 हजार रुपए का नकद इनाम दिया है.

भाभी के चक्कर में अर्जुन ने अपना घर तो बरबाद किया ही, भाई का भी घर बरबाद किया. इसी तरह कौशल्या ने देह की आग को शांत करने के लिए देवर के साथ मिल कर एक निर्दोष की जान ले ली.

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या हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- sampadak@delhipress.biz सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Loveyapa Review : दिल जीत लेगी खुशी-जुनैद की फिल्म, इमोशन्स से भरपूर है ‘लवयापा’

Loveyapa Review : आमिर खान के बेटे जुनैद खान और श्रीदेवी की छोटी बेटी खुशी कपूर की पहली फिल्म लवयापा सिनेमाघरों में रिलीज हुई.अद्वैत चंदन के निर्देशन में बनी इस फिल्म में आज की पीढ़ी का मोबाइल प्रेम और उस मोबाइल प्रेम की वजह से प्यार भरे रिश्तों में भारी दरार फ़िल्म की हाईलाइट है और उसके बाद ए आई टेक्निक के जरिए प्यार और लड़की अथार्त हिरोइन खुशी की बची खुची इज्जत की नीलामी लवयापा का सियापा होने की पूरी कहानी है.

वैसे तो यह एक सिंपल खूबसूरत सी पारिवारिक कहानी वाली फिल्म है, लेकिन इस फिल्म के जरिए आज के युग में यंग जनरेशन के लोंगो का मोबाइल से जुड़े रहने की बीमारी या यूं कहें मोबाइल प्रेम कितना घातक हो सकता है , वह इस फ़िल्म में दर्शाया गया है. आज के समय में जनरेशन के लोग मोबाइल पर इतने निर्भर हैं कि वह अपने मोबाइल को खाते उठते बैठते सोते अपने पास ही रखते है.

लव्यापा फिल्म में प्यार में सियापा की शुरुआत तब होती है जब खुशी के पिता बने आशुतोष राणा शादी पक्की करने से पहले प्रेमी जुनैद खान से एक दिन के लिए खुशी के साथ मोबाइल एक्सचेंज करने के लिए बोलते हैं. जिसके बाद दोनों प्रेमियों के बीच 1 दिन के लिए मोबाइल की अदला बदली होती है और दोनों का ही सच सामने आना शुरू होता है जो इस फिल्म की हाईलाइट है.

इसके अलावा आज के समय में ए आई का इस्तेमाल जो कोई भी आम इंसान कर सकता है और किसी भी लड़की को बदनाम करके उसे मरने पर भी मजबूर कर सकता है. इस नाजुक मुद्दे को भी फिल्म में दिखाया गया है. जहां एक ओर फिल्म से जुड़े सभी कलाकारों का अभिनय सशक्त है, वही जुनैद खान और खुशी कपूर ने भी अच्छी और नेचुरल एक्टिंग की है. ऐसे में कहना गलत न होगा कि खुशी कपूर और जुनैद खान की फिल्म लवयापा सिर्फ रोमांटिक फिल्म ही नहीं है बल्कि शिक्षाप्रद भी है. जिसमे रोमांस के साथ साथ हल्का फुल्का मधुर संगीत, बेहतरीन डायरेक्शन और मनोरंजन से भरपूर है .

Family Drama : थैंक्यू अंजलि – क्यों अपनी सास के लिए फिक्रमंद हो गई अंजलि

Family Drama : सुबह-सुबह मीता का फोन आया, “भैया जी, अम्मा को बुखार हो रहा है. कल से कुछ खापी नहीं रहीं हैं.”

“यह क्या कह रही हो मीता? ऐसा था तो कल ही क्यों नहीं बताया? राकेश ने हड़बड़ा कर कहा.

“असल में अम्मां जी ने ही मना किया था.”

“अम्मां ने मना किया और तुम मान गईं? जानती हो आजकल कैसी बीमारी फैली हुई है? कोरोना का कितना डर है? अच्छा रुको मैं आ रहा हूं.”

बदहवास से राकेश निकलने लगे तो मैं ने पीछे से टोका,” सुनो पहले मास्क पहनिए. पाकेट में सैनिटाइजर रखिए और देखिए प्यार में होश खोने की जरूरत नहीं. चेहरे से मास्क बिल्कुल भी मत हटाना. अगर अम्मां जी को कोरोना हुआ तो फिर इस का खतरा आप को भी हो सकता है न. अम्मां को छूने के बाद याद कर के सैनिटाइजर लगाना और हां अम्मां से थोड़ी दूर ही बैठना.”

राकेश ने थोड़ी नाराजगी से मेरी तरफ देखा तो मैं ने सफाई दी,” अपनी या मेरी नहीं तो कम से कम बच्चों की चिंता तो करो.”

“ओके. चलो मैं आता हूं.” कहते हुए राकेश चले गए.

मैं जानती हूं कि राकेश कहीं न कहीं अम्मा के मसले पर मुझ से नाराज रहते हैं. दरअसल मेरा अपनी सास के साथ हमेशा से 36 का आंकड़ा रहा है. वैसे तो अमूमन सभी घरों में सासबहू के बीच इसी तरह का रिश्ता होता है. मगर मेरे साथ कुछ ज्यादा ही था.

मैं जिस दिन से घर में बहू बन कर आई उसी दिन से अपनी सास के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था. सास ने मुझे सर पर पल्लू रखने को कहा पर मैं ने उन की नहीं सुनी. सास ने मुझे नॉनवेज से दूर रहने को कहा मगर मैं ने यह बात भी स्वीकार नहीं की क्यों कि मैं अपने घर में अंडा मछली खाती रही हूं. सास पूजापाठ में लिप्त रहतीं और मुझे यह सब अंधविश्वास लगता. सास जरूरत से ज्यादा सफाई पसंद थीं जबकि मैं बेफिक्र सी रहने की आदी थी. मैं खुद को एक प्रगतिशील स्त्री मानती थी जबकि सासू मां एक रूढ़िवादी महिला थीं. इन सब के ऊपर हमारे बीच विवाद की एक वजह राकेश भी थे. हम दोनों ही राकेश से बहुत प्यार करते थे और इसी उलझन में रहते थे कि राकेश किसे अधिक प्यार करते हैं.

मैं मानती हूं कि अम्मां जी ने बचपन से राकेश को पालापोसा और प्यार दिया. इसलिए उन के प्यार पर पहला हक अम्मां का ही है. मगर कहीं न कहीं मेरा यह मानना भी है कि शादी के बाद पति को अपनी मां का पल्लू छोड़ देना चाहिए और उस स्त्री के प्रति अपना दायित्व निभाना चाहिए जो उस के लिए अपना घरपरिवार छोड़ कर आई है.

मुझे सास की हर बात में टोकाटाकी भी पसंद नहीं थी. हमारी शादी के 2 साल बाद मोनू हो गया और फिर गुड्डी. गुड्डी उस वक्त करीब 3 साल की थी जब मैं ने राकेश से अलग घर लेने की जिद की.

राकेश ने बहुत समझाया ,”देखो अंजलि, बड़े भैया बरेली में हैं और छोटे भैया मुंबई में. अम्मां बाबूजी के पास में ही हूं. ऐसे में हमारा इन दोनों को अकेला छोड़ कर जाना उचित नहीं.”

मगर मैं अड़ी रही,” अरे वाह दोनों बड़े भाइयों को अपने मांबाप की नहीं पड़ी. केवल तुम ही श्रवण कुमार बनते फिरते हो. तुम्हारी दोनों भाभियां ऐश कर रही हैं और बीवी घुटघुट कर मरने को विवश है. देखो तुम ने मेरी बात नहीं मानी न तो मैं हमेशा के लिए अपनी मां के घर चली जाऊंगी.  फिर संभालते रहना अपने बच्चों को.”

मेरी धमकी का असर हुआ. राकेश ने पुराने घर के पास ही एक नया घर खरीदा. अम्मां बाबूजी को पुराने घर में छोड़ कर हम यहां शिफ्ट हो गए.

भले ही राकेश ने मेरी बात मान ली मगर हम दोनों के बीच एक अदृश्य दीवार भी खड़ी हो गई थी. राकेश के दिल में मेरे लिए पहले जैसा प्यार नहीं रह गया था. वह केवल पति का दायित्व निभा रहा थे.

इस बात को 4 साल बीत चुके हैं. पिताजी भी दो साल पहले गुजर गये. अब अम्मां उस घर में नौकरानी मीता के साथ अकेली रहती हैं. मुझे इस बात का एहसास है कि अम्मां के लिए अकेले रहना काफी कठिन होता होगा. मगर न मैं ने कभी उन्हें लाने की बात की और न कभी अम्मां ने ही कोई शिकायत की.

राकेश अंदर ही अंदर अम्मां के प्रति खुद को अपराधी महसूस करते हैं पर इस संदर्भ में मुझ से कुछ कहते नहीं.

आज अम्मां की बीमारी के बारे में सुन कर जैसे राकेश ने मुझे भेजती नजरों से देखा था इस से जाहिर था कि वे इन सारी बातों के लिए मुझे ही कसूरवार मान रहे थे.

मैं बेसब्री से राकेश के लौटने का इंतजार कर रही थी. कहीं न कहीं अम्मां को ले कर मुझे भी चिंता होने लगी थी. आखिर वे बुजुर्ग हैं और बुजुर्गों के लिए कोरोना ज्यादा घातक सिद्ध हो रहा था.

मैं ने राकेश को फोन कर अम्मां के बारे में जानना चाहा तो राकेश ने संक्षेप में जवाब दिया,” अम्मां को तेज बुखार है. मैं ने एंबुलेंस वाले को फोन कर दिया है. बस वे आने ही वाले हैं. फिर मैं अम्मा को ले कर हॉस्पिटल निकल जाऊंगा. सारा इंतजाम कर के और कोरोना का टेस्ट करवा कर ही लौटूंगा. मीता ने बताया है कि अम्मां से मिलने शर्मा जी का लड़का आया था जो कुछ दिन पहले विदेश से लौटा था. ”

“ठीक है मगर जरा ध्यान से. प्लीज अपना भी ख्याल रखना.”

“हूं ठीक है.” कह कर राकेश ने फोन काट दिया. मेरे दिल में खलबली मची हुई थी, अम्मां को सच में कोरोना निकला तो? उन्हें कुछ हो गया तो ? राकेश तो मुझे कभी भी माफ नहीं करेंगे. इधर मुझे यह डर भी लग रहा था कि कहीं अम्मां के कारण कहीं राकेश भी बीमारी ले कर घर न आ जाएं.

शाम ढले राकेश वापस लौटे.

“क्या हुआ? अम्मां कैसी हैं और आप ने अपना ध्यान तो रखा? मास्क हटाया तो नहीं ? हाथों में सैनिटाइजर तो लगाते रहे न? अम्मां की रिपोर्ट कब तक आएगी?किस हॉस्पिटल में एडमिट किया है?”

मैं ने सवालों की झड़ी लगा दी तो वे मुंह बनाते हुए बाथरूम में नहाने चले गए.

मैं ने खुद को शांत किया और फिर एकएक कर के सवाल पूछे. राकेश ने बताया कि रिपोर्ट 36 घंटे में आ जाएगी और तब तक अम्मां एडमिट रहेगीं.

रात में सोते समय राकेश ने मुझ से सवाल किया,”दोतीन महीने पहले तुम ने अम्मां से उन का पुश्तैनी सोने का हार मांगा था?”

सवाल सुन कर मैं सकते में आ गई,” हां मैं ने तो बस सुरक्षा के लिहाज से कहा था. असल में मुझे लगा कि बाबूजी भी नहीं हैं और अम्मा अकेली रहती हैं. ऐसे में कहीं हार चोरी न हो जाए.”

“क्या बात है अंजलि, हार के जाने का डर है तुम्हें पर अम्मां के जाने का कोई डर नहीं? “कह कर राकेश उठ कर दूसरे कमरे में चले गए.

मैं अम्मां को मन ही मन बुराभला कहने लगी, कैसी हैं अम्मा भी? बीमारी में भी मेरे खिलाफ अपने बेटे के कान भरने से बाज नहीं आईं. मैं ने बुरा सा मुंह बनाया और लेट गई.

तब तक राकेश एक ज्वैलरी बॉक्स ले कर अंदर आए,” यह लो अंजलि, अम्मा ने यह हार तुम्हारे बर्थडे के लिए तैयार कराया था. अपने पुश्तैनी हार मेंअपने अब तक के बचाए हुए रुपए लगा कर यह भारी हार बनवाया है तुम्हारे लिए. यह हीरे की अंगूठी मेरे लिए, यह कंगन गुड्डी और यह घड़ी मोनू के लिए.”

कहते कहते राकेश फफकफफक कर रोने लगे थे. मेरी आंखों में भी आंसू छलक आए. तोहफे में हार दे कर अम्मां ने मुझे हरा दिया था.

तभी राकेश ने रुंधे हुए स्वर में फिर कहा,” जानती हो अम्मां ने यह सब देते हुए क्या कहा? वे बोलीं कि बेटा क्या पता मुझे कहीं कोरोना हो और मैं लौट कर न आ सकूं. ऐसे में अंजलि को जन्मदिन पर अपने हाथों से नहीं दे पाऊंगी इसलिए तू ही उसे दे देना. आखिर वह भी है तो मेरी बच्ची ही न.”

मैं निशब्द जमीन को एकटक निहार रही थी. शायद अम्मा के प्रति आज तक के अपने व्यवहार पर शर्मिंदा थी. राकेश सोने चले गए मगर मैं रात भर करवटें बदलती रही. मेरी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे. मैं सोचती रही अम्मां मेरा इतना ख्याल रखती हैं और मैं ही हमेशा उन के बारे में गलत सोचती रही हूं. यह बात मुझे अंदर से बेधे जा रही थी.

किसी तरह 36 घंटे बीते. राकेश ने फोन कर के बताया कि अम्मां को कोरोना नहीं है. सिंपल बुखार है जो अब लगभग ठीक हो चुका है.”

मेरी आंखों से खुशी के आंसू बह निकले. मैं ने राकेश से कहा, सुनो अम्मां जैसे ही हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हों तो उन्हें हमारे घर ले कर आना. उन्हें देखभाल की जरूरत है और फिर कोरोना फैल रहा है. वे खुद अपनी सुरक्षा का ख्याल नहीं कर पाएंगी. मैं उन का ख्याल रखना चाहती हूं हमेशा. … वैसे भी आखिर मैं हूं तो उन की बच्ची ही न. ” कहते कहते मैं रो पड़ी थी.

राकेश गदगद स्वर में इतना ही बोल पाए,” थैंक्यू अंजलि.”

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