Valentine’s Day Special : तुम्हारे ये घुंघराले बाल

Valentine’s Day Special :  ‘‘मैंभी चलूंगी कल से तुम्हारे साथ हौस्पिटल. कोरोना की वजह से मरीजों की तादाद कितनी बढ़ रही है. ऐसे में डाक्टर्स के अलावा नर्सों की भी तो जरूरत है न. जब कर सकती हूं मरीजों की सेवा तो क्यों बैठूं घर पर?’’ फोन पर कुशल के हैलो कहते ही गौरी बोल उठी.

‘‘प्लीज गौरी, बात को समझो. तुम्हारी तबीयत ठीक हुए अभी बहुत समय नहीं बीता है और उस से भी बड़ी बात है कि तुम्हारे पास नर्सिंग की डिग्री भी नहीं है.’’

‘‘तुम्हें तो पता है कि डिग्री क्यों नहीं मिली मुझे. फाइनल इयर के एग्जाम्स ही नहीं दे सकी थी. पढ़ाई तो पूरी कर ही ली थी न मैं ने. अपने साथ कल से मुझे ले जाना ही पड़ेगा तुम्हें.’’

‘‘मुझे पता है गौरी सब. अच्छा बताओ

क्या तुम चाहोगी कि कोई गैरकानूनी काम करें हम? बस तुम रोज एक बार फोन पर बात कर लिया करो मुझे और मैं लगा रहूंगा अपने कर्तव्य पालन में.’’ कुशल के मन की मिठास बातों में घुल रही थी.

‘‘डियर डाक्टर साहब, मैं क्या बेवकूफ लगती हूं तुम्हें? आज ही अपने इंस्टिट्यूट में फोन कर नर्स के रूप में काम करने की परमिशन ले ली है मैं ने. कालेज के मेरे पिछले रिकार्ड्स और समय की मांग को देखते हुए वीसी सर की ओर से स्पैशल परमिशन का मेल मिल गया है. मैं

उस मेल का प्रिंट दिखा कर काम कर सकती हूं. तीन महीने के लिए वैलिड होगी यह परमिशन… कुछ समझे?’’ खिलखिला कर हंसते हुए गौरी

ने बताया.

‘‘अरे वाह… ठीक है कल पिक कर लूंगा घर से तुम्हें.’’ कुशल अभिभूत हो उठा.

अगले दिन जाने की तैयारी कर गौरी सोने चली गई, लेकिन नींद तो आंखों के आसपास थी ही नहीं. कुछ था तो यादों का कारवां, जिस के साथ चलतेचलते गौरी पुराने दिनों में पहुंच गई.

यूपी के एक छोटे से कस्बे में कुशल के साथ खेलतेकूदते बीता था गौरी का बचपन. परिवार के नाम पर वह और मां 2 लोग ही थे. सालभर की गौरी को अपनी पत्नी के पास छोड़ उस के पिता शहर में नौकरी करने क्या गए कि आज तक नहीं लौटे. कुछ लोगों का कहना था

कि उन्होंने दूसरी शादी कर ली. गौरी की मां न

तो पढ़ीलिखी थी और न ही उस के पास इतना पैसा था कि घर की गुजरबसर हो पाए. उस का अपना मायका भी प्रदेश के दूसरे छोर पर पहले ही गरीबी की मार झेल रहा था. ऐसे में वह घर पर ही पापड़ और अचार बनाने का काम करने लगी थी.

कुशल के पिता आर्थिक रूप से संपन्न थे, निकट के एक गांव में बड़ेबड़े खेत और रहने को हवेलीनुमा घर भी. अपने पिता की व्यस्तता और मां के एक जानलेवा बीमारी का शिकार हो दुनिया छोड़ देने के बाद कुशल का अकेलापन गौरी की संगति में कम हो गया था. उसे गौरी के सिवाय किसी और का साथ अच्छा भी नहीं लगता था. गौरी को जब वह अपनी सहेलियों के साथ खेलते देखता तो दूर से ही आवाज लगा कर बुला लेता था. गौरी आश्चर्यचकित हो पूछती कि उस ने इतनी दूर से, इतनी सारी लड़कियों के बीच कैसे पहचान लिया उसे? कुशल हंसते हुए जवाब देता, ‘‘तुम्हारे घुंघराले बाल इतने सुंदर हैं कि दूर से ही चमकते हैं गौरी… बस पहचान लेता हूं बालों से तुम्हें.’’ सचमुच गौरी के रेशमी से सुनहरे घुंघराले बाल बहुत सुंदर थे.

गौरी और कुशल दोनों ही पढ़ने में अव्वल थे. कुशल को अपनी मां का बीमारी से छिन

जाना जबतब पीड़ा दे जाता था. कस्बे में अभी भी कोई बड़ा अस्पताल नहीं था. उस की इच्छा थी कि वह डाक्टर बन कर अपने लोगों की सेवा करे. गौरी चाहती थी कि वह भविष्य में कुशल का साथ दे पाए, डाक्टर बन कर न सही नर्स बन कर ही.

10वीं कक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने के बाद कुशल ने कोचिंग सैंटर जाना शुरू कर दिया था. गौरी जानती थी कि किसी अच्छे सरकारी कालेज में जहां फीस कम होगी, नर्सिंग में एडमिशन लेने के लिए उसे भी अपना सारा ध्यान पढ़ने में ही लगाना होगा. खेलनाकूदना कम कर इसलिए ही वह पढ़ाई में जुटी रहती. एक दूसरे के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए खूब परिश्रम कर रहे थे वे रातदिन.

दोनों की इस मेहनत का सुखद परिणाम भी सामने आया. कुशल को मुंबई के एक मैडिकल कालेज ने डाक्टर बनने का अवसर प्रदान कर दिया. गौरी को कुशल के कालेज में प्रवेश तो नहीं मिल सका, लेकिन नर्स बन कर कुशल का साथ निभाने का सपना अवश्य पूरा हो गया. मेरठ के एक इंस्टिट्यूट में नर्सिंग की डिग्री के लिए उस का नाम प्रथम लिस्ट में ही आ गया था. खुशियों को दोनों हाथों से बटोरते हुए वे प्रफुल्लित हुए ही थे कि बिछड़ने का समय भी आ गया.

उस दिन गौरी सामान तैयार कर मेरठ जाने को बस स्टैंड पर खड़ी थी. कुशल घर से निकल ही रहा था कि उस के पिता से मिलने कुछ लोग आ गए. पिता के किसी आवश्यक कार्य में व्यस्त होने के कारण कुशल को उन के साथ बैठना पड़ा. उधर गौरी कुशल की प्रतीक्षा करते हुए व्याकुल हो रही थी. बस से उतर कर नीचे आ वह चारों ओर निगाहें दौड़ाती हुई निराशा से घिरने लगी. कस्बे से मेरठ के लिए बसें लगभग 2 घंटे के अंतराल से चलती थीं.

अगली बस की प्रतीक्षा करती तो मेरठ पहुंचतेपहुंचते देर हो जाती. ‘लगता है जाने से पहले कुशल से मिलना नहीं हो सकेगा… एक तो मां से दूर जाने का दुख, उस पर कुशल से भी बिना मिले जाना होगा क्या मुझे? मां से तो हौस्टल में रहते हुए भी हर महीने मिलने आ सकती हूं. लेकिन कुशल… उस से तो पता नहीं अब कितने दिनों बाद मिलना होगा? वो भी तो अब चला जाएगा बहुत दूर. काश, मैं उस की

बात मान लेती. जिद कर रहा था कि अपने पापा से पैसे ले कर मुझे एक मोबाइल दिला दे, मैं ने क्यों मना कर दिया?’ सोच कर गौरी रुआंसी

हो गई.

कंडक्टर के यात्रियों को पुकारने पर गौरी बस में चढ़ आंखें मूंद कर सीट से सिर टिका कर बैठ गई. सहसा पीछे से किसी ने उस का कंधा थपथपाया. हड़बड़ा कर आंखें खोल गौरी ने पीछे मुड़ कर देखा तो खुशी से चहक उठी, ‘‘अरे, कुशल तुम… कितनी देर कर दी. कब से बाहर खड़ी इंतजार कर रही थी तुम्हारा.’’

‘‘पता है मैं घर से भागता हुआ आ रहा हूं. तुम आज यहां न मिलतीं तो पीछेपीछे तुम्हारे कालेज आ जाता.’’ बिछड़ने से पहले गौरी को हंसते हुए देखना चाहता था कुशल.

‘‘सच्ची? तुम मेरठ तक आ जाते? वैसे… एक बात बताओ मैं तो बस के अंदर आ चुकी थी. तुम्हें कैसे पता लगा कि मैं इस बस में ही हूं? हो सकता था कि मैं अभी घर से निकली ही न होती या पहले ही जा चुकी होती?’’ गौरी ने भौंहें नचाते हुए पूछा.

‘‘हा हा हा… मैं ने कैसे पता लगा लिया कि तुम बस में बैठी हो? तो आज तुम्हें फिर से बता देता हूं कि मुझे दूर से ही दिख जाते हैं तुम्हारे ये रेशमी घुंघराले बाल. पता है, आज भी बस की खिड़की से लहराते हुए दिख रहे थे मुझे. अब कभी मत भूलना कि मैं हमेशा तुम्हें दूर से ही इन बालों से पहचान लेता हूं.’’ कुशल ने बात पूरी की ही थी कि ड्राइवर ने बस स्टार्ट कर दी. भारी मन से एकदूसरे से बिछड़ते हुए दोनों का चेहरा निस्तेज हो गया था. नीचे उतर कर कुशल तब तक हाथ हिलाता रहा जब तक कि बस उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई.

बुझे मन से घर की ओर जाते हुए चप्पाचप्पा उसे अपनी दोस्त की याद दिला रहा था.

शाम ढलने लगी थी. मन की तरह ही आसपास अंधेरा घिर आया. भारी कदमों से चलते हुए घर पहुंच वह आज गौरी को याद करते हुए महसूस कर रहा था कि मन एक रेशमी सी डोर में बंधा जैसे उड़ कर गौरी के पास चले जाना चाहता है. यह खिंचाव महज दोस्ती तो नहीं कुछ और है… पर क्या नाम दे इसे? इसी उधेड़बुन में उलझते हुए वह अपने जाने की तैयारी करने लगा.

कुछ दिनों बाद वह भी अपने पिता और गांव से दूर मुंबई चला गया.

वहां पहुंच कर कुशल को लगा जैसे किसी और ही लोक में आ गया है. ‘क्या गौरी भी मुझे ऐसे ही याद कर रही होगी?’ अकसर वह सोचता. उधर गौरी को भी मेरठ का माहौल कस्बे से बहुत अलग लग रहा था. कदमकदम पर उसे कुशल के साथ की कमी महसूस होती. कुशल का हाथ थामने की ख्वाहिश बढ़ने के साथ ही उसे बेहद करीब से महसूस करने की तमन्ना भी अब सिर उठाने लगी थी.

छुट्टियों में गौरी तो अकसर मां के पास चली आती थी, लेकिन कुशल के लिए यह संभव नहीं हो पाता था. गौरी से उस की मुलाकात बहुत दिन बीत जाने पर तब हो सकी जब वह पहला समैस्टर पूरा होने पर घर आया.

दोनों मिले तो खुशियां जैसे पंख लगा कर उड़ान भरने लगीं. पूरा दिन अपनी नई दुनिया की बातें करतेकरते बीत जाता था. एक दिन कुशल के घर बैठे हुए दोनों एकदूसरे को कालेज, वहां की कैंटीन, हौस्टल, मित्रों आदि के विषय में बता रहे थे कि कुशल अचानक बोल उठा, ‘‘गौरी, दिन तो वहां पढ़तेपढ़ाते बीत जाता है, लेकिन रात होने पर मुझे यहां की बहुत याद आती है और सब से ज्यादा… तुम्हारी…!’’ अंतिम वाक्य कुशल के मुंह से न चाहते हुए भी निकल गया. गौरी का दिल इतनी तेजी से धड़क उठा जैसे निकल कर बाहर ही आ जाएगा.

‘‘मैं तो नई सहेलियों से तुम्हारी ही बातें करती हूं… कभीकभी वे कह देती हैं कि इतना याद कर रही हो तो उस के पास ही चली जाओ और मैं बस हंस देती हूं.’’

लाज से भरी गौरी की नम आंखों ने चुगली कर ही दी कि उस के मन में भी प्रेम

कर दरिया बह रहा है.

‘‘गौरी, मैं ने एअरपोर्ट से आते समय एक मोबाइल खरीदा था. मुंबई वापस लौटने से पहले उस में अपना नंबर सेव कर दूंगा. तुम से बात कर लिया करूंगा तो शायद चैन आ जाए मुझे.’’

मोबाइल से बातें कर एकदूसरे से जुड़े रहने की चाह में एक बार फिर दूर हो गए दोनों.

गौरी ने कुशल से मोबाइल पर कुछ दिन ही बात की थी. सोच रही थी कि अगली बार जब घर जाएगी तो किसी पड़ोसी का नंबर ले आएगी और कभीकभी मां से बात कर लिया करेगी, लेकिन बिछड़े हुए अपनों से जोड़ने वाला मोबाइल भी उस से जल्दी ही बिछड़ गया. एक दिन जब वह सहेलियों के साथ बाजार से लौट रही थी तो मोबाइल हाथ में लिए उस के बातों में मग्न होने का लाभ उठाते हुए एक मोटरसाइकिल सवार ने मोबाइल छीन लिया. बहुत रोई थी गौरी. अगले दिन क्लास खत्म होने के बाद उस ने कुशल को फोन छिन जाने की बात कहते हुए एक मेल कर दिया. जवाब में कुशल से सांत्वना पा कर गौरी की उदासी कुछ कम तो हुई लेकिन कुशल से यह जानकर कि अति व्यस्तता के कारण अब उस का घर आना और भी कम हो जाएगा, गौरी बेचैन हो उठी.

कुशल गौरी को मन में बसाए कठोर परिश्रम कर रहा था. लैब में रात देर तक काम करते हुए कभीकभी वह बहुत थक जाया करता था. गौरी को याद करते हुए एक दिन वह कुछ ज्यादा ही परेशान था. कुछ दिनों पहले गौरी का एक मेल आया था, जिस में उस ने अपनी तबीयत ठीक न होने की बात लिखी थी. उस के बाद कुशल ने 2-3 मेल किए, लेकिन किसी का उत्तर नहीं मिला. ‘शायद कालेज में कंप्यूटर के पर्सनल यूज पर रोक लगा दी गई हो’ सोच कर वह स्वयं को बहला रहा था.

सहसा कमरे की घंटी बजी. चपरासी कमरे में आया और रजिस्टर पर हस्ताक्षर ले एक और्डर की कौपी उसे थमा दी. और्डर पढ़ते ही कुशल की सारी थकान उड़न छू हो गई. संदेश था कि अगले सप्ताह उसे डाक्टरों के एक दल के साथ दिल्ली भेजा जा रहा है. वहां के एक कैंसर हौस्पिटल में मरीजों की स्थिति देख कर विशेष रिपोर्ट तैयार करने का काम सौंपा गया था. ‘दिल्ली से कुछ घंटों में मेरठ और फिर वहां से गौरी के कालेज… दिल्ली पहुंच तो जाऊं फिर उसे जबरदस्त सरप्राइज दूंगा.’ सोच कर कुशल का मन बल्लियों उछलने लगा.

निश्चित दिन उत्साहित हो वह टीम के

साथ निकल पड़ा. रात के 2 बजे सब दिल्ली पहुंचे. कुछ घंटे आराम करने के बाद सभी

सुबह अस्पताल के लिए चल दिए. वहां टीम

के एक डाक्टर से बात करते हुए कुशल ने

वार्ड में प्रवेश किया तो लगा कि उस के पैर जैसे वहीं जम गए हों. हिम्मत जुटा कर वह बैड के पास पहुंचा, ‘‘गौरी… तुम यहां?… कैसे… क्या… कब हुआ ये?’’ कुशल कुछ समझ ही नहीं पा रहा था.

गौरी ने कुशल का हाथ कस कर पकड़ लिया, ‘‘पहले बताओ तुम यहां कैसे?’’

‘‘मुझे तो केस स्टडी के लिए टीम के

साथ भेजा गया है… तुम्हारा मेल ही नहीं मिला था, परेशान तो था मैं. लेकिन तुम्हारे साथ ऐसा हुआ… मुझे पता भी नहीं लगा.’’ कुशल भर्राए गले से बोला.

‘‘मैं एग्जाम्स की तैयारी कर रही थी कि एक दिन अचानक चक्कर आ गया, फिर बहुत थकान लगने लगी. मैं ने सोचा कि पढ़ाई के प्रैशर से हो रहा है ऐसा. पर जब हालत ज्यादा खराब होने लगी तो हमारी मैम को कुछ शंका हुई. अस्पताल में दिखाया गया, टैस्ट हुए और पता लगा कि मुझे ब्लड कैंसर है. यह तो अच्छा है कि अभी पहली स्टेज पर है. टीचर ध्यान न देतीं तो जाने क्या होता?’’

‘‘मां जानती हैं इस बारे में?’’

नहीं, पता लगेगा तो तड़प उठेंगी. वे तो मुझे देखने भी नहीं आ सकती यहां. बोलतेबोलते गला रुंध गया गौरी का.

‘‘तुम चिंता मत करो. मैं आ गया हूं न अब. कुछ करता हूं.’’ प्यार से उस के गालों को थपथपाता हुआ कुशल बोला.

मरीजों को देखने के बाद जब सभी डाक्टर एकत्र हुए तो दल के सब से

सीनियर डाक्टर से कुशल ने गौरी के विषय में बात की. उन्होंने कुशल को मुंबई के एक विशेष हौस्पिटल में जाने की सलाह दी और बताया कि वहां पर ऐसे बहुत से मरीज ठीक हो चुके हैं. कुशल ने गौरी को अपने साथ मुंबई ले जाने का निश्चय किया. अपने घर फोन कर उस ने पिता को सारी स्थिति से अवगत करा दिया. गौरी की मां को अपने घर बुलवा कर कुशल के पिता ने गौरी और मां की बात करवा दी. गौरी की बीमारी के विषय में उस की मां को कुछ न बता कर कहा गया कि एक ट्रेनिंग के सिलसिले में गौरी को मुंबई जाना पड़ेगा, लेकिन चिंता की बात नहीं है क्योंकि कुशल उस के साथ होगा.

कुछ दिनों बाद दोनों मुंबई के लिए रवाना हो गए. इलाज शुरू हुआ और गौरी पर उस का असर जल्द ही दिखने लगा. अपनी पढ़ाई के साथसाथ कुशल गौरी का भी पूरा ध्यान रखता था. कीमोथैरेपी के लिए गौरी को जब अंदर ले जाया जाता तो वह बाहर बैठ कर इंतजार करता रहता. गौरी को अस्पताल में टाइम से दवाइयां दी गई या नहीं, गौरी ने ठीक से कुछ खाया या नहीं… इन सब बातों का भी ध्यान रखता था वह. थोड़ेथोड़े दिनों बाद बीमारी का बढ़ना या रुकना देखने के लिए टैस्ट होते तो कुशल पूरी स्थिति अच्छी तरह समझता. लगभग 6-7 महीने बाद गौरी की हालत में काफी सुधार आ गया. अब उसे केवल कुछ दवाइयां ही लेने की आवश्यकता थी.

गौरी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. कुशल गौरी को साथ ले कर घर छोड़ने आया तो मां को उस ने एकएक घटना विस्तार से बताई. उन्हें किसी प्रकार की चिंता न करने को कह अपने पिता से ले कर उन को कुछ रुपए भी दे दिए. जाने से पहले गौरी को हिदायत दे कर गया कि दवाई के साथसाथ खानेपीने में भी कोई कमी नहीं होनी चाहिए.

इधर गौरी का स्वास्थ्य सुधरने लगा था, उधर अपनी डिग्री पूरी कर कुछ समय बाद कुशल भी लौट आया.

वापस आ कर कुशल ने कस्बे से कुछ दूर स्थित एक हौस्पिटल में कार्य करना शुरू कर दिया. उस का लक्ष्य अपने कस्बे के लोगों की सेवा करना था, इस के लिए पुरानी पुश्तैनी हवेली तुड़वा कर अस्पताल बनवाने पर विचार हो रहा था. गौरी अपनी अधूरी डिग्री जल्द ही पूरी करने को बेताब थी, लेकिन कुशल ने एक डाक्टर के दृष्टिकोण से उसे कुछ दिन और रुक जाने की सलाह दी. गौरी को भी कभीकभी कमजोरी सी महसूस होती, इसलिए मन मार कर प्रतीक्षा करने के सिवाय कोई रास्ता भी नहीं दिखाई देता था. आज जब कोरोना महामारी का तांडव चारों ओर फैला है, ऐसे समय में अपनी सेवाएं देने से गौरी स्वयं को रोक नहीं सकी.

अगले दिन से वह अपने काम में पूरे मन से लग गई. कुशल उस की इस लगन को देख जैसे उन्स पर न्योछावर हुआ जा रहा था. लगातार बढ़ते रोगियों की देखभाल करते हुए उन दोनों को अन्य डाक्टर व नर्सों की तरह ही खानेपीने का समय नहीं मिल पाता था.

एक दिन थकेमांदे जब दोनों कैंटीन में चाय पी रहे थे तो कुशल मुसकराते हुए बोला,

‘‘गौरी तुम ने तो अपनी मनपसंद ड्रैस पहन ही ली यह नर्स की यूनिफौर्म, लेकिन मेरी मनपसंद ड्रैस कब पहनोगी? अब मैं देखना चाहता हूं तुम्हें लाल जोड़े में.’’

गौरी सिर झुका कर निराश स्वर में बोली, ‘‘क्या रखा है कुशल अब इस गौरी में? झड़ गए घुंघराले बाल कीमोथैरेपी से… बहुत अच्छे लगते थे न तुम्हें वो… मेरे घुंघराले बालों को देख कर तुम मुझे दूर से ही पहचान लेते थे. अब कहां रही है गौरी तुम्हारी वो घुंघराले बालों वाली लड़की.’’

कुशल प्यार से उस की ओर देखते हुए बोला, ‘‘गौरी… तुम अपने को नहीं जानती शायद… मुझे गर्व है तुम पर, जो दिनरात लोगों की सेवा में लगी हो… अपनी बीमारी से हुई कमजोरी की हालत में भी तुम ने मेरा साथ देने के लिए काम करने की परमिशन ली. बहुत प्यारा है तुम्हारा यह रूप… इसलिए ही तो घुंघराले बालों से कहीं ज्यादा कीमती है वह हैजमैट सूट जो तुम कोरोना मरीजों की सेवा करते हुए पहनती हो. अब जिस गौरी को मैं जानता हूं उस में इतनी खूबियां हैं कि दूर से क्या उसे आंखें बंद कर के भी पहचान सकता हूं.’’

‘‘आज मेरे प्यार की जीत हुई है, कोरोना को अब हारना ही होगा. फिर हमेशा के लिए कुशल की हो जाएगी घुंघराले बालों वाली लड़की,’’ कुशल के प्यार को पा कर गौर अभिभूत हो उठी.

दोनों प्रेम मन में संजोए इस महामारी से लड़ने के लिए कैंटीन से निकल वार्ड की ओर चल दिए.

Story In Hindi : विषकन्या बनने का सपना – जब खत्म होती है रिश्ते की अहमियत

Story In Hindi : इस महीने की 12 तारीख को अदालत से फिर आगे की तारीख मिली. हर तारीख पर दी जाने वाली अगली तारीख किस तरह से किसी की रोशन जिंदगी में अपनी कालिख पोत देती है, यह कोई मुझ से पूछे.

शादीब्याह के मसले निबटाने वाली अदालत यानी ‘मैट्रीमोनियल कोर्ट’ में फिरकी की तरह घूमते हुए आज मुझे 3 साल हो चले हैं. अभी मेरा मामला गवाहियों पर ही अटका है. कब गवाहियां पूरी होंगी, कब बहस होगी, कब मेरा फैसला होगा और कब मुझे न्याय मिलेगा. यह ‘कब’ मेरे सामने नाग की तरह फन फैलाए खड़ा है और मैं बेबस, सिर्फ लाचार हो कर उसे देख भर सकती हूं, इस ‘कब’ के जाल से निकल नहीं सकती.

वैसे मन में रहरह कर कई बार यह खयाल आता है कि शादीब्याह जब मसला बन जाए तो फिर औरतमर्द के रिश्ते की अहमियत ही क्या है? रिश्तों की आंच न रहे तो सांसों की गरमी सिर्फ एकदूसरे को जला सकती है, उन्हें गरमा नहीं सकती.

आपसी बेलागपन के बावजूद मेरा नारी स्वभाव हमेशा इच्छा करता रहा सिर पर तारों सजी छत की. मेरी छत मेरा वजूद था, मेरा अस्तित्व. बेशक, इस का विश्वास और स्नेह का सीमेंट जगहजगह से उखड़ रहा था फिर भी सिर पर कुछ तो था पर मेरे न चाहने पर भी मेरी छत मुझ से छीन ली गई, मेरा सिर नंगा हो गया, सब उजड़ गया. नीड़ का तिनकातिनका बिखर गया. प्रेम का पंछी दूर कहीं क्षितिज के पार गुम हो गया. जिस ने कभी मुझ से प्रेम किया था, 2 नन्हेनन्हे चूजे मेरे पंखों तले सेने के लिए दिए थे, उसे ही अब मेरे जिस्म से बदबू आती थी और मुझे उसे देख कर घिन आती थी.

अब से कुछ साल पहले तक मैं मिसेज वर्मा थी. 10 साल की परिस्थितियों की मार ने मेरे शरीर को बज्र जैसा कठोर बना दिया. अब तो गरमी व सर्दी का एहसास ही मिटने लगा है और भावनाएं शून्यता के निशान पर अटक गई हैं. लेकिन मेरे माथे की लाल, चमकदार बिंदी जब दुनिया की नजरों में धूल झोंक रही होती, मैं अकसर अपनी आंखों में किरकिरी महसूस किया करती.

उस दिन भी खूब जोरों की बारिश हुई थी. भीतर तक भीग जाने की इच्छा थी पर उस दिन बारिश की बूंदें, कांटों की चुभन सी पूरे जिस्म को टीस गईं और दर्द से आत्मा कराह उठी थी. मैं ने अपने बिस्तर पर, अपने अरमानों की तरह किसी और के कपड़े बिखरे देखे थे, मेरा आदमी, अपनी मर्दानगी का झंडा गाड़ने वाला पुरुष, हमेशा के लिए मेरे सामने नंगा हो चुका था.

‘‘हरामखोर तेरी हिम्मत कैसे हुई कमरे में इस तरह घुसने की?’’ शराब के भभके के साथ उस के शब्द हवा में लड़खड़ाए थे. मैं ने उन शब्दों को सुना. उस की जबान और मेरी टांगें लड़खड़ा रही थीं. मुझे लगा, जिस्म को अपने पैरों पर खड़ा करने की सारी शक्ति मुझ से किसी ने खींच ली थी. बड़ी मुश्किल से 2 शब्द मैं ने भी उत्तर में कहे थे, ‘‘यह मेरा घर है…मेरा…तुम ऐसा नहीं कर सकते.’’

इस से पहले कि मैं कुछ और कहती, देखते ही देखते मेरे जिस्म पर बैल्ट से प्रहार होने लगे थे. दोनों बच्चे मुझ से चिपके सिसक रहे थे, उन का कोमल शरीर ही नहीं आत्मा भी छटपटा रही थी.

इस के बाद बच्चों को सीने से लगाए मैं जिंदगी की अनजान डगर पर उतर आई थी. मेरी बेटी जो तब छठी में पढ़ती थी, आज 12वीं जमात में है, बेटा भी 8वीं की परीक्षा की तैयारी में है. उन दिनों मेरे बालों में सफेदी नहीं थी लेकिन आज सिर पर बर्फ सी गिरी लगती है. आंखों के ऊपर मोटे शीशे का चश्मा है. पीठ तब कड़े प्रहारों और ठोकरों से झुकती न थी लेकिन आज दर्द के एहसास ने ही बेंत की तरह उसे झुका दिया है. सच, यादें कितना निरीह और बेबस कर देती हैं इनसान को.

कुछ महीनों के बाद बातचीत, रिश्तेदारियां, सुलहसफाई और समझौते जैसी कई कोशिशें हुईं, पर विश्वास का कागजी लिफाफा फट चुका था, प्रेम की मिसरी का दानादाना बिखर गया था. बाबूजी का मानना कि आदमी का गुस्सा पानी का बुलबुला भर है, मिनटों में बनता, मिनटों में फूटता है, झूठ हो गया था. अकसर पुरुष स्वभाव को समझाते हुए कहते, ‘देख बेटी, मर्द कामकाज से थकाहारा घर लौटता है, न पूछा कर पहेलियां, उसे चिढ़ होती है…उसे समझने की कोशिश कर.’

मैं अपने बाबूजी को कैसे समझाती कि मैं ने इतने साल किस तरह अनसुलझी पहेलियां सुलझाने में होम कर दिए. सीने में बैठा अविश्वास का दर्द, बीचबीच में जब भी टीस बन कर उठता है तो लगता है किसी ने गाल पर तड़ाक से थप्पड़ मारा है.

मेरे, मेरे बच्चों और मेरे अम्मांबाबूजी के लंबे इंतजार के बाद भी कोई मुझे पीहर में बुलाने नहीं आया. मैं अमावस्या की रात के बाद पूर्णिमा की ओर बढ़ते चांद के दोनों छोरों में अकसर अपनी पतंग का माझा फंसा, उसे नीचे उतारने की कोशिश करती, लेकिन चांद कभी मेरी पकड़ में नहीं आया. मेरा माझा कच्चा था.

मेरी बेटी नींद से उठ कर अकसर अपनी बार्वी डौल कभी राह, कभी अलमारी के पीछे तो कभी अपने खिलौनों की टोकरी में तलाशती और पूछती, ‘‘मां, हम अपने पुराने घर कब जाएंगे?’’

उस के इस सवाल पर मैं सिहर उठती, ‘‘हाय, मेरी बेटी…भाग्य ने अब तुझ से तेरी बार्बी डौल छीन कर ऐसे अंधे कुएं में फेंक दी है, जहां से मैं उसे ढूंढ़ कर कभी नहीं ला सकती.’’

बेटी चुप हो जाती और मैं गूंगी. इसी तरह मेरी मां भी गूंगी हो जातीं जब मैं पूछती, ‘‘अम्मां, आप ने मेरे बारे में क्या सोचा? मैं क्या करूं, कहां जाऊं? मेरे 2 छोटेछोटे बच्चे हैं, इन को मैं क्या दूं? प्राइवेट स्कूल की टीचर की नौकरी के सहारे किस तरह काटूंगी पहाड़ सी पूरी जिंदगी?’’

मां की जगह कंपकंपाते हाथों से छड़ी पकड़े, आंखों के चश्मे को थोड़ा और आंखों से सटाते हुए बाबूजी, टूटी बेंत की कुरसी पर बैठते हुए उत्तर देते, ‘‘बेटी, अब जो सोचना है वह तुझे ही सोचना है, जो करना है तुझे ही करना है…हमारी हालत तो तू देख ही रही है.’’

ठंडी आह के साथ उन के मन का गुबार आंखों से फूट पड़ता, ‘समय ने कैसी बेवक्त मार दी है तोषी की अम्मां…मेरी बेटी की जिंदगी हराम कर दी, इस बादमाश ने.’

बस, इसी तरह जिंदगी सरकती जा रही थी. एक दिन सर्द हवा के झोंकों की तरह यह खबर मेरे पूरे वजूद में सिहरन भर गईं कि फलां ने दूसरी शादी कर ली है.

‘शादी, यह कैसे हो सकता है? हमारा तलाक तो हुआ ही नहीं,’ मैं ने फटी आंखों से एकसाथ कई सवाल फेंक दिए थे. लग रहा था कि पांव के नीचे की धरती अचानक ही 5-7 गज नीचे सरक गई हो और मैं उस में धंसती चली जा रही हूं.

अम्मां और बाबूजी ने फिर हिम्मत बंधाई, ‘उस के पास पैसा है, खरीदे हुए रिश्ते हैं, तो क्या हुआ, सच तो सच ही है, हिम्मत मत हारो, कुछ करो. सब ठीक हो जाएगा.’

मैं ने जाने कैसी अंधी उम्मीद के सहारे अदालत के दरवाजे खटखटा दिए, ‘दरवाजा खोलो, दरवाजा खोलो, मुझे न्याय दो, मेरा हक दो…झूठ और फरेब से मेरी झोली में डाला गया तलाक मेरी शादी के जोड़े से भारी कैसे हो सकता है?’ मैं ने पूछा था, ‘मेरे बच्चों के छोटेछोटे कपड़े, टोप, जूते और गाडि़यां, तलाक के कागजी बोझ के नीचे कैसे दब सकते हैं?’

मैं ने चीखचीख कर, छाती पीटपीट कर, उन झूठी गवाहियों से पूछा था जिन्होंने चंद सिक्कों के लालच में मेरी जिंदगी के खाते पर स्याही पोत दी थी. लेकिन किसी ने न तो कोई जवाब देना था, न ही दिया. आज अपने मुकदमे की फाइल उठाए, कचहरी के चक्कर काटती, मैं खुद एक मुकदमा बन गई हूं. हांक लगाने वाला अर्दली, नाजिर, मुंशी, जज, वकील, प्यादा, गवाह सभी मेरी जिंदगी के शब्दकोष में छपे नए काले अक्षर हैं.

आजकल रात के अंधेरे में मैं ने जज की तसवीर को अपनी आंखों की पलकों से चिपका हुआ पाया है. न्यायाधीश बिक गया, बोली लगा दी चौराहे पर उस की, चंद ऊंची पहुंच के अमीर लोगों ने. लानत है, थू… यह सोचने भर से मुंह का स्वाद कड़वा हो जाता है.

भावनाओं के भंवर में डूबतीउतराती कभी सोचती हूं, मेरा दोष ही क्या था जिस की उम्रकैद मुझे मिली और फांसी पर लटके मेरे मासूम बच्चे. न चाहते हुए भी फाड़ कर फेंक देने का जी होता है उन बड़ीबड़ी, लालकाली किताबों को, जिन में जिंदगी और मौत के अंधे नियम छपे हैं, जो निर्दोषों को जीने की सजा और कसूरवारों को खुलेआम मौज करने की आजादी देते हैं. जीने के लिए संघर्ष करती औरत का अस्तित्व क्यों सदियों से गुम होता रहा है, समाज की अनचाही चिनी गई बड़ीबड़ी दीवारों के बीच?

ये प्रश्न हर रोज मुझे नाग बन कर डंसते हैं और मैं हर रोज कटुसत्य का विषपान करती, विषकन्या बनने का सपना देखती हूं.

आसमान में बादल का धुंधलका मुझे बोझिल कर जाता है लेकिन बादलों की ही ओट से कड़कती बिजली फिर से मेरे अंदर उम्मीद जगाती है जीने की, अपनी अस्मिता को बरकरार रखने की और मैं बारिश में भीतर तक भीगने के लिए आंगन में उतर आती हूं.

Emotional Story : रिवाजों का दलदल – श्री के दिल में क्यों रह गई थी टीस

Emotional Story : गाड़ी छूटने वाली थी तभी डब्बे में कुछ यात्री चढ़े. आगेआगे कुली एक व्यक्ति को उस की सीट दिखाने में सहायता कर रहा था और पीछे से 2 बच्चों के साथ जो महिला थी उसे देख कर रजनी स्तब्ध रह गईं.

अपना सामान आरक्षित सीट पर जमा कर उस महिला ने अगलबगल दृष्टि घुमाई और रजनी को देख कर वह भी चौंक सी उठी. एक पल उस ने सोचने में लगाया फिर निकट आ गई.

‘‘नमस्ते, आंटी.’’

‘‘खुश रहो श्री बेटा,’’ रजनी ने कुछ उत्सुकता, कुछ उदासी से उसे देखा और बोलीं, ‘‘कहां जा रही हो?’’

श्री ने मुसकरा कर अपने परिवार की ओर देखा फिर बोली, ‘‘हम दिल्ली जा रहे हैं.’’

‘‘कहां हो आजकल?’’

‘‘दिल्ली में यश एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं. लखनऊ तो मम्मी के पास गए थे,’’ इतना कह कर वह उठ कर अपनी सीट पर चली गई. यश ने सीट पर अखबार बिछा कर एक टोकरी रख दी थी. बच्चे टोकरी से प्लेट निकाल कर रख रहे थे.

‘‘अभी से?’’ श्री ने यश को टोका था.

‘‘हां, खापी कर चैन से सोएंगे,’’ यश ने कहा तो वह मुसकरा कर बैठ गई. सब की प्लेट लगा कर एक प्लेट उस ने रजनी की ओर बढ़ा दी, ‘‘खाइए, आंटी.’’

‘‘अरे, नहीं श्री, मैं घर से खा कर चली हूं. तुम लोग खाओ,’’ रजनी ने विनम्रता से कहा और फिर आंखें मूंद कर वह अपनी सीट पर पैर उठा कर बैठ गईं.

कुछ यात्री उन की बर्थ पर बैठ गए थे. शायद ऊपर की बर्थ पर जाने का अभी उन लोगों का मन नहीं था इसलिए रजनी भी लेट नहीं पा रही थीं.

श्री का परिवार खातेखाते चुटकुले सुना रहा था. रजनी ने कई बार अपनी आंखें खोलीं. शायद वह श्री की आंखों में अतीत की छाया खोज रही थीं पर वहां बस, वर्तमान की खिलखिलाहट थी. श्री को देखते ही फिर से अतीत के साए बंद आंखों में उभरने लगे है.

श्रीनिवासन और उन का बेटा सुभग कालिज में एकसाथ पढ़ते थे. जाने कब और कैसे दोनों प्यार के बंधन में बंध गए. उन्हें तो पता भी नहीं था कि उन के पुत्र के जीवन में कोई लड़की आ गई है.

सुभग ने बी.ए. की परीक्षा पास करने के बाद प्रशासनिक सेवा का फार्म भर दिया और पढ़ाई में व्यस्त हो गया. सुभग की दादी तब तक जीवित थीं. उन के सपनों में सुभग पूरे ठाटबाट से आने लगा. कहतीं, ‘देखना, कितने बड़ेबड़े घरानों से इस का रिश्ता आएगा. हमारा मानसम्मान और घर सब भर जाएगा.’

उन के सपनों में अपने पोते का भविष्य घूमता रहता. सुभग के पापा तब कहते, ‘अभी तो सुभग ने खाली फार्म भरा है मां, अगर उस का चुनाव हो गया तो कुछ साल ट्रेनिंग में जाएंगे.’

‘अरे तो क्या? बनेगा तो जरूर एक दिन कलेक्टर,’ मांजी अकड़ कर कह देतीं.

श्री के पति ने खापी कर बर्थ पर बिस्तर बिछा लिया था. रजनी ने देखा अपनी गृहस्थी में श्री इतनी अधिक मग्न है कि उस ने एक बार भी रजनी से सुभग के बारे में नहीं पूछा. क्या उसे सुभग के बारे में कुछ भी पता नहीं है. मन ने तर्क किया, वह क्यों सुभग के बारे में जानने की चेष्टा करेगी. जो कुछ हुआ उस में श्री का क्या दोष. आह सी निकल गई. दोष तो दोनों का नहीं था, न श्री का न सुभग का. तो फिर वह सब क्यों हुआ, आखिर क्यों? कौन था उन बातों का उत्तरदायी?

‘‘बहनजी, बत्ती बुझा दीजिए,’’ एक सहयात्री ने अपनी स्लीपिंग बर्थ पर पसरने से पहले रजनी से कहा.

रजनी को होश आया कि ज्यादातर यात्री अपनीअपनी सीट पर सोने की तैयारी में हैं. वह अनमनी सी उठीं और तकिया निकाल कर बत्ती बुझाते हुए लेट गईं.

हलकीहलकी रोशनी में रजनी ने आंखें बंद कर लीं पर नींद तो कोसों दूर लग रही थी. कई वर्ष लगे थे उन हालात से उबर कर अपने को सहज करने में पर आज फिर एक बार वह दर्द हर अंग से जैसे रिस चला है. यादों की लहरें ही नहीं बल्कि पूरा का पूरा समुद्र उफन रहा था.

सुभग ने जिस दिन प्रशासनिक अधिकारी का पद संभाला था उसी दिन से मांजी ने शोर मचा दिया. रोज कहतीं, ‘इतने रिश्ते आने लगे हैं हम लड़कियों के चित्र मंगवा लेते हैं. जिस पर सुभग हाथ रख देगा वही लड़की ब्याह लाएंगे.’

सुभग ने भी हंस कर अपनी दादी के कंधे पर झूलते हुए कहा था, ‘सच दादी. फिर वादे से पलट मत जाइएगा.’

‘चल हट.’

घर के आकाश में सतरंगे सपनों का इंद्रधनुष सा सज गया था. खुशियां सब के मन में फूलों सी खिल रही थीं.

पापा ने अपने बेटे के लिए एक बड़ी पार्टी दे रखी थी. उन के बहुत से मित्रों में कई लड़कियां भी थीं. रजनी ने बारबार अनुभव किया कि सुभग के मित्र उसे श्री की ओर संकेत कर के छेड़ रहे थे. सुभग और श्री की मुसकराहट में भी कुछ था जो ध्यान खींच रहा था.

पार्टी के बाद सुभग उसे घर तक छोड़ने भी गया था. लौटा तो रजनी ने सोचा कि बेटे से श्री के बारे में पूछ कर देखें. पर उस से पहले उस की दादी एक पुलिंदा ले कर आ पहुंचीं.

सुभग ने कहा, ‘दादी, यह मुझे क्यों दिखा रही हैं?’

‘शादी तो तुझे ही करनी है फिर और किसे दिखाएं.’

‘शादी…अभी से…’ सुभग कुछ परेशान हो उठा.

‘शादी का समय और कब आएगा?’ दादी का प्यार सागर का उफान मार रहा था.

‘नहीं, दादी, पहले मुझे सैटल हो जाने दीजिए फिर मैं स्वयं ही…’ वह बात अधूरी छोड़ कर जाने लगा तो दादी ने रोका, ‘हम कुछ नहीं जानते. कुछ तसवीरें पसंद की हैं. तू भी देख लेना फिर उन की कुंडली मंगवा लेंगे.’

‘कुंडली,’ सुभग चौंक कर घूम गया था. जैसेजैसे उस की दादी का उत्साह बढ़ता गया वैसेवैसे सुभग शांत होता गया.

एक दिन वह अपने मन के सन्नाटे को तोड़ते हुए श्री को ले कर घर आ गया. रजनी चाय बनाने जाने लगीं तो सुभग ने बड़े अधिकार से श्री से कहा, ‘श्री, तुम बना लो चाय.’ तो वह झट से उठ खड़ी हुईं. उस के साथ ही सुभग ने भी उठते हुए कहा, ‘‘इसे रसोई में सब दिखा दूं जरा.’’

उस दिन उस की दादी का ध्यान भी इस ओर गया. श्री के जाने के बाद उन्होंने कहा, ‘शुभी, यह मद्रासी लड़की तेरी दोस्त है या कुछ और भी है?’

वह धीरे से मुसकराया.

‘आप ने वादा किया है न दादी कि जिस लड़की पर मैं हाथ रख दूंगा आप उसे ही ब्याह कर इस घर में ले आएंगी.’

दादी ने कदाचित अपने मन को संभाल लिया था. बोलीं, ‘कायस्थ घराने में एक मद्रासी लड़की तो आजकल चलता है लेकिन अच्छी तरह सुन लो, कुंडली मिलवाए बिना हम ब्याह नहीं होने देंगे.’

रजनी ने धीरे से कहा, ‘अम्मांजी, अब कुंडली कौन मिलवाता है. जो होना होता है वह तो हो कर ही रहता है.’

‘चुप रहो, बहू. हमारा इकलौता पोता है. हम जरा भी लापरवाही नहीं बरतेंगे,’ फिर सुभग से बोलीं, ‘तू इस की मां से कुंडली मांग लेना.’

‘दादी, जैसे आप को अपना पोता प्यारा है, उन्हें भी तो अपनी बेटी उतनी ही प्यारी होगी. अगर मेरी कुंडली खराब हुई और उन्होंने मना कर दिया तो.’

‘कर दें मना, तुझे किस बात की कमी है?’

‘लेकिन दादी…’

उसे बीच में ही टोक कर दादी बोलीं, ‘अब कोई लेकिनवेकिन नहीं. चल, अब खाना खा ले.’

सुभग का मन उखड़ गया था. धीरे से बोला, ‘अभी भूख नहीं है, दादी.’

रजनी जानती थी कि सुभग ने अपने बड़ों से कभी बहस नहीं की. उस की उदासी रजनी को दुखी कर गई थी. एकांत में बोलीं, ‘क्यों डर रहा है. सब ठीक हो जाएगा. तुम दोनों की कुंडली जरूर मिल जाएगी.’

‘और यदि नहीं मिली तो क्या करेंगे आप लोग?’ उस ने सीधा प्रश्न ठोक दिया था.

‘इतना निराशावादी क्यों हो गया है. दादी का मन रह जाने दे, बाकी सब ठीक होगा,’ फिर धीरे से बोलीं, ‘श्री मुझे भी पसंद है.’

गाड़ी धीरेधीरे हिचकोले खा रही थी. शायद कोई स्टेशन आ गया था. गाड़ी तो समय पर अपनी मंजिल तक पहुंच ही जाती है पर इनसान कई बार बीच राह में ही गुम हो जाता है. आखिर ये रिवाजों के दलदल कब तक पनपते रहेंगे?

वह फिर अतीत की उस खाई में उतरने लगीं जिस से बाहर निकलने की कोई राह ही नहीं बची थी.

दादी के हठ पर वह श्री की कुंडली ले आया था लेकिन उस ने रजनी से कह दिया था, ‘मम्मा, मैं यह सब मानूंगा नहीं. अगर श्री से शादी नहीं तो कभी भी शादी नहीं करूंगा.’

फिर सब बदलता ही चला गया. श्री की कुंडली में मंगली दोष था और भी अनेक दोष पंडित ने बता दिए. दादी ने साफ कह दिया, ‘बस, फैसला हो गया. यह शादी नहीं होगी, एक तो लड़की मंगली है दूसरे, कुंडली में कोई गुण भी नहीं मिल रहे हैं.’

‘मैं यह सब नहीं मानता हूं,’ सुभग ने कहा.

‘मानना पड़ेगा,’ दादी ने जोर दिया.

‘हमारे पोते पर शादी के बाद कोई भी मुसीबत आए यह नहीं हो सकता है.’

‘आप को क्या लगता है दादी, उस से शादी न कर के मैं अमर हो जाऊंगा.’

‘कैसे बहस कर रहा है उस मामूली सी लड़की के लिए. कितनी सुंदर लड़कियों के रिश्ते हैं तेरे लिए.’

‘दादी, सुंदरता समाप्त हो सकती है पर अच्छा स्वभाव सदा बना रहता है.’

सुभग का तर्क एकदम ठीक था पर उस की दादी का हठ सर्वोपरि था. सुभग के हठ को परास्त करने के लिए उन्होंने आमरण अनशन पर जाने की धमकी दे दी.

दिन भर दोनों अपनी जिद पर अड़े रहे. दादी बिना अन्नजल के शाम तक बेहाल होने लगीं. वह मधुमेह की रोगी थीं. पापा ने घबरा कर सुभग के सामने दोनों हाथ जोड़ दिए, ‘बेटा, तुम्हें तो बहुत अच्छी लड़की फिर भी मिल ही जाएगी पर मुझे मेरी मां नहीं मिलेगी.’

सुभग ने पापा की जुड़ी हथेली पर माथा टिका दिया.

‘पापा, दादी मुझे भी प्यारी हैं. यदि इस समस्या का हल किसी एक को छोड़ना ही है तो मैं श्री को छोड़ता हूं.’

पापा ने उसे गले से लगा लिया. जब उस ने सिर उठाया तो उस का चेहरा आंसुआें में डूबा हुआ था.

पापा से अलग हो कर उस ने कहा, ‘पापा, एक वादा मैं भी चाहता हूं. अब आप लोग कहीं भी मेरे विवाह की बात नहीं चलाएंगे. अगर श्री नहीं तो और कोई भी नहीं?’

पापा व्यथित से उसे देखते रह गए. बेटे से कुछ कह पाने की स्थिति में तो वह भी नहीं थे. जब दादी कुछ स्वस्थ हुईं तो पापा ने कहा, ‘मां, उसे संभालने का अवसर दीजिए. कुछ मत कहिए अभी.’

1 माह बाद दादी ने फिर कहना आरम्भ कर दिया तो सुभग ने कहा, ‘दादी, जब तक मैं नई पोस्ट और नई जगह ठीक से सैटल नहीं होता, प्लीज और कुछ मत कहिए.’

बहुत शीघ्र अपने पद व प्रतिष्ठा से वह शायद ऊब गया और नौकरी छोड़ कर दुबई चला गया. शायद विवाह से पीछा छुड़ाने की यह राह चुनी थी उस ने.

इसी तरह टालते हुए 3 वर्ष और बीत गए थे. सुभग दुबई में अकेले रहता था. फोन भी कम करता था. वहां की तेज रफ्तार जिंदगी में पता नहीं ऐसा क्या हुआ, एक दिन उस के आफिस वालों ने फोन से दुर्घटना में उस की मृत्यु का समाचार दिया.

जाने कब रजनी की आंख लग गई थी. कुछ शोर से आंख खुली तो पता चला दिल्ली का स्टेशन आने वाला है.

उन्होंने झट से चादर तहाई, बैग व पर्स संभाला और बीच की सीट गिरा कर बैठ गईं. श्री भी परिवार सहित सामान समेट कर स्टेशन आने की प्रतीक्षा कर रही थी. उन की आंखों में पछतावे के छोटेछोटे तिनके चुभ रहे थे. दादी का सदमे से अस्वस्थ हो जाना और उन का वह पछतावा कि अगर उसे इतना ही जीना था तो मैं ने क्यों उस का दिल तोड़ा?

दादी का वह करुण विलाप उन की अंतिम सांस तक सब के दिल दहलाता रहा था. काश, कभीकभी इस से आगे कुछ होता ही नहीं, सब शून्य में खो जाता है.

स्टेशन आ गया था. जातेजाते श्री ने उन का बैग थाम लिया था. स्टेशन पर उतर कर बैग उन्हें थमाया. उन की हथेली दबा कर धीरे से कहा, ‘‘धीरज रखिए, आंटी. मुझे मालूम है कि आप अकेली रह गई हैं,’’ उस ने अपना फोन नंबर व पते का कार्ड दिया और बोली, ‘‘मैं पटेल नगर में रहती हूं. जबजब अपने भाई के यहां दिल्ली आएं हमें फोन करिए. एक बार तो आ कर मिल ही सकती हूं.’’

रजनी ने भरी आंखों से उसे देखा. लगा, श्री के रूप में सुभग उस के सामने खड़ा है और कह रहा है, ‘मैं कहीं नहीं गया मम्मा.

Parenting Tips : पब्लिक प्लेस में बच्चों के टैट्रम्स को कुछ इस तरह करें हैंडल

Parenting Tips : बच्चों का टैट्रम होना एक सामान्य बात है, लेकिन जब यह पब्लिक प्लेस में हो, तो यह मां के लिए काफी तनावपूर्ण और शर्मनाक हो सकता है. ऐसे समय में मां को अपनी भावनाओं को काबू में रखते हुए बच्चे को सही तरीके से संभालना बहुत जरूरी होता है.

पब्लिक जगह पर बच्चा जब रोता है या गुस्से में आता है, तो मां के लिए उसे शांत करना एक चुनौती बन जाती है. लेकिन कुछ आसान तरीके हैं, जिन से मां बच्चे के टैट्रम्स को सुधार सकती हैं :

खुद को शांत रखें

जब बच्चा गुस्से में हो, तो मां को सब से पहले खुद को शांत रखना बहुत जरूरी है. यदि मां खुद गुस्से में आ जाए तो बच्चा और ज्यादा उलझ सकता है. बच्चों के टैट्रम्स में कई बार ऐसा भी होता है कि बच्चा सिर्फ ध्यान आकर्षित करने के लिए गुस्सा करता है. इसलिए खुद को शांत और काबू में रखना सब से पहला कदम है.

* आप का शांत रहना बच्चे को यह सिखाता है कि गुस्से से किसी समस्या का हल नहीं निकलता.

* बच्चे को प्यार से समझाएं.

अगर बच्चा बहुत गुस्से में हो, तो सब से अच्छा तरीका है उसे प्यार से समझाना. आप उसे यह बता सकती हैं कि आप उस का गुस्सा समझ रही हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से ऐसे व्यवहार को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता. छोटे बच्चों को बिना गुस्से के और नर्म तरीके से बात करने से वे जल्दी शांत हो जाते हैं।

* सरल शब्दों में समझाना बच्चों को आसानी से आप के संदेश को समझने में मदद करता है.

ध्यान भटकाना (Distraction)

कभीकभी बच्चों का ध्यान भटकाने से उन की समस्या हल हो सकती है. यदि बच्चा किसी चीज को ले कर परेशान हो, तो आप उसे कुछ और दिलचस्प चीज दिखा सकती हैं. जैसे उस का पसंदीदा खिलौना, गाना या कार्टून शो. इस तरह बच्चा थोड़ी देर के लिए अपनी परेशानी भूल सकता है.

* बच्चे का ध्यान दूसरी तरफ लगाने से उस का गुस्सा कम हो सकता है.

प्राइवेट जगह पर ले जाएं

अगर स्थिति ज्यादा बिगड़ जाए, तो मां को बच्चे को पब्लिक जगह से हटा कर एक शांत और प्राइवेट स्थान पर ले जाना चाहिए. बहुत ज्यादा शोर, भीड़ और लोग बच्चे के मूड को और खराब कर सकते हैं. एक शांत जगह पर बच्चा आराम से अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर सकता है.

अनुशासन बनाए रखें

अगर मां बच्चों को अनुशासन सिखाती है, तो बच्चे के टैट्रम्स कम हो सकते हैं. अनुशासन का मतलब यह नहीं कि बच्चे को डांटा जाए, बल्कि उन्हें यह समझाना कि किसी व्यवहार का क्या परिणाम हो सकता है. लगातार और सही रूप से यह दिखाना कि गलत व्यवहार के लिए कोई पौजिटिव रिवौर्ड नहीं मिलेगा, बच्चे को सुधारने में मदद करता है.

सकारात्मक प्रोत्साहन (Positive Reinforcement)

जब बच्चा अच्छा व्यवहार करता है या शांत रहता है, तो उसे सराहना दें. इस से बच्चा समझता है कि अच्छे व्यवहार के लिए उसे सराहना मिलती है और उसे सकारात्मक महसूस होता है. सकारात्मक प्रोत्साहन बच्चों को अच्छे आचरण के लिए प्रेरित करता है.

* प्रशंसा और प्रोत्साहन बच्चों को अपनी गलतियों से सीखने में मदद करते हैं.

धैर्य रखें

बच्चों के टैट्रम्स के दौरान धैर्य रखना बहुत जरूरी है. कभीकभी बच्चे गुस्से में या तनाव में होते हैं और उन्हें शांत होने में थोड़ा समय लग सकता है. मां को यह समझना चाहिए कि यह एक अस्थायी स्थिति है और इसे जल्द ही सुधारा जा सकता है.

बच्चे की भावनाओं को समझें

* कभीकभी बच्चे की गुस्से की वजह कुछ और हो सकती है, जैसेकि भूख, थकावट या अनचाही स्थिति. मां को अपने बच्चे की जरूरतों को समझ कर उन के व्यवहार को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए. जब बच्चा मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहता है, तो टैट्रम्स कम होते हैं.

* बच्चे के मूड और जरूरतों को पहचानना उन की स्थिति को सुधारने में मदद करता है.

सुंदर आईलैंड पर बसा Andaman, एक बार जरूर जाएं घूमने

Andaman : अपनी यात्राओं के सफर में हम ने सैलूलर अंडमान निकोबार के जेल, हैवलाक और नील आइलैंड जाने का प्रोग्राम बनाया. तीनों जगहों के बारे में बहुत कुछ सुना हुआ था. मुंबई से पोर्ट ब्लेयर जिस का नाम अब विजय नगर कर दिया गया है की फ्लाइट 3 घंटे की थी. तो शुरू हुआ मजेदार सफर.

मेरे बराबर में एक महिला और विंडो सीट पर उस का करीब 10 साल का बेटा गट्टू बैठा था जिस का मुंह लगातार चलता रहा, गट्टू उस का नाम था. गोलमटोल गट्टू खानेपीने वाला बच्चा था. उस का मुंह 3 घंटे लगातार चला.

मैं कभी फ्लाइट में सोती नहीं, किताब ले कर चलती हूं. फ्लाइट टाइम से पहुंची. एअरपोर्ट के बाहर ही सावरकर की बड़ी सी मूर्ति लगी है. बुक की हुई कैब लेने आई थी. होटल के रिसैप्शन पर सब को अच्छी हिंदी आती थी, इस ट्रिप में जहां भी गए, हिंदी सब को आती थी. यहां साउथ इंडियंस और बंगाली बहुत हैं.

फ्रैश हो कर होटल में ही लंच कर के आराम किया, फिर शाम को चाय पी कर यों ही शहर की सैर की, फिर सैलुलर जेल का साढ़े 7 बजे का ‘लाइट ऐंड साउंड’ शो बुक किया. यह नवंबर का आखिरी हफ्ता था. यहां सनसेट साढ़े 4 बजे हो जाता है, यह हमें जाने से पहले नहीं पता था. शो देखने के लिए काफी टूरिस्ट थे. सबकुछ बहुत व्यवस्थित था. अंदर जाने के लिए लंबी लाइन थी. अंदर जाते हुए जेल से जुड़ा इतिहास याद कर के दिल उदास होता है.

ऐतिहासिक आकर्षण

बैठने के लिए अच्छी चेयर्स थीं. आज भी एक ऐतिहासिक, बड़ा पेड़ है जो उस समय की क्रांति, पीड़ा और यातनाओं का साक्षी है. शो में  आवाज गुलजार, कबीर बेदी और आशीष विद्यार्थी की है. सूत्रधार पेड़ में गुलजार की आवाज बहुत प्रभावित करती है.

2 जगह अमर ज्योति जलती रहती है. शो में क्रांतिकारियों और आजादी के मतवालों के बलिदान के बारे में बहुत कुछ बताया गया है. शो काफी असरदार है. जेल के बाहर ही एक छोटा सा गार्डन है जहां कई शहीदों- बाबा भान सिंह, महावीर सिंह, रामरखा, इंदु भूषण राय, मोहन किशोर नामदास, मोहित मोइत्रा और सावरकर की गोल्डन मूर्तियां लगी हैं जो रात में चमक रही थीं.

जेल के बारे में और भी बहुत कुछ जानना था, दिन में भी विस्तार से देखना था इसलिए हम ने अगले दिन गाइडेड टूर लिया. इस का टिकट 2 सौ रुपए का था जिस में 5 फैमिली मैंबर जा सकते हैं. बहुत ईमानदार गाइड था, उस ने टिकट के पैसे भी खुद नहीं मांगे, बस जो रेट 200 बाहर लिखा था चुपचाप वही लिया.

छोटीछोटी कोठरियां देख कर उस समय के हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है. जेल 3 फ्लोर की है. कुल 689 एकांत कमरे हैं. इन सैलों के कारण ही जेल का नाम सैलुलर जेल पड़ा. किसी भी एक सैल से दूसरे सेल की ओर देखना संभव नहीं. मनोवैज्ञानिक मानसिक यातनाएं देने का यह षड्यंत्र और उस की व्यवस्था की क्रूरता है. 1942 में इस आइलैंड पर जापान ने कब्जा कर लिया था. कइयों को इसी जेल में बंदी बना कर रखा गया. सुभाष चंद्र बोस भारत को आजाद घोषित करने के नाम पर यहां आए पर जापानियों के जहाज में 3 दिन में चलते बने. जापानी सैनिकों ने यहां के तबके निवासियों के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया पर जापानियों ने कुछ न सुनने दिया न बोस को कुछ करने दिया था.

सावरकर की कोठरी कौन सी है, इस का अंदाजा इस बात से लगाया गया है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि फांसी वाले कमरे के सामने उन की कोठरी थी, उसी अंदाजे से उस कमरे में सावरकर की तसवीर रख दी गई है. फोटो ले सकते हैं.

राष्ट्रभक्ति का प्रमाण

विडंबना यह है कि वह गाइड रील बनाने वालों से दुखी था. ऐसी जगह भी बेहद आधुनिक लड़कियां बहुत छोटेछोटे कपड़ों में कोठरियों में रील बना रही थीं, गाइड इस बात से नाराज था कि इतिहास की इतनी गंभीर महत्त्वपूर्ण जगह पर भी लोग रील बना रहे हैं.

15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ तो सब स्वतंत्रता सेनानियों को जेल से मुक्त कर दिया गया. 11 फरवरी, 1979 को सैलुलर जेल राष्ट्रीय स्मारक घोषित हो गई. यह जेल आज देशविदेश में रहने वालों के लिए आकर्षण का केंद्र है और राष्ट्रभक्ति का प्रेरणास्रोत है. यहां रोज शाम को ‘लाइट ऐेंड साउंड’ शो होता है. यातनाओं की यादगार हथकड़ी बेड़ी, टाट के कपड़े, कोल्हू, फांसी के फंदे, बेंत आदि भी रखे हुए हैं.

एक जगह एक स्टैचू बना है, जिस में एक भारतीय कैदी ही एक क्रांतिकारी को कोड़े मार रहा है, यह अंगरेजों की कूटनीति थी. उस समय नारियल का तेल निकालने के लिए क्रांतिकारियों को कोल्हू के बैल की जगह जोत दिया जाता था.

एक स्टैचू में यह बताया गया है. कई क्रांतिकारी डेंगू, मलेरिया से मर जाते थे, कुछ ठंड से. आजादी के लिए संघर्ष करते दीवानों की बात ही कुछ और थी. आज भी अंगरेजों का बनाया हुआ आर्टिटैक्चर ही है, टूटफूट की रिपेयर कर दी जाती है.

क्रांतिकारियों की दुनिया

जहां अब कुछ युवा धार्मिक उन्माद में पागल हुए जा रहे हैं, वहां इन क्रांतिकारियों की दुनिया ही अलग थी. यहां एक म्यूजियम भी है जहां इतिहास से जुड़ी तसवीरें और आज के नेताओं की कुछ तसवीरें हैं.

जेल देख कर जब बाहर निकले तो एक मार्केट दिखी. मेरी आदत है अगर मुझे किसी शहर में कोई बुक शौप दिखती है तो मैं उस का एक चक्कर जरूर लगाती हूं. मुझे बड़ी खुशी हुई जब मुझे यहां 3 हिंदी की पत्रिकाएं- सरिता, गृहशोभा और सत्यकथा दिखी. पत्रिकाओं में यही 3 थीं.

शाम को हम कैब से चिडि़या टापू बीच गए. यह सुंदर बीच शहर से लगभग 28 किलोमीटर दूर है. यह बीच सनसेट देखने, मनोरम प्राकृतिक सुंदरता देखने और समुद्र के दृश्य देखने के लिए प्रसिद्ध है. कैब ड्राइवर ने बताया कि पोर्ट ब्लेयर में हर चीज बाहर से आती है, यहां कुछ भी नहीं बनता. खाने में सीफूड फेमस है. सनसैट का दृश्य बहुत ही सुंदर था.

अगले दिन हैवलाक बीच जो अब स्वराज द्वीप हो गया है, जाना था. नाटिका कंपनी की फेरी में सवा 12 की बुकिंग थी. फेरी 20 मिनट लेट चली. चली तो बहुत स्मूथ थी पर 5 मिनट के बाद ही फेरी ने जो उछाल मारी उस से सब की हालत खराब हो गई. बाद में पता चला कि ‘बे औफ बंगाल’ में फिंगल साइक्लोन के कारण ऐसा हुआ था जिस का फाल चेन्नई में हुआ था. फेरी 2 बज कर 20 मिनट पर हैवलाक पहुंचनी थी तब तक यात्रियों की हालत पस्त हो चुकी थी.

अटैंडैंट लड़की सब के साथ बहुत नम्रता से पेश आ रही थी, किसी यात्री का मुंह पोंछ रही थी तो किसी को हिम्मत बंधा रही थी, उस लड़की का यह काम बहुत मुश्किल रहता होगा.

हमारी हालत भी खराब थी पर हमें उलटी नहीं हुई क्योंकि हम ऐसी यात्राओं में पहले ही एवोमिन टैबलेट ले लेते हैं और उलटी से बच जाते हैं.

अंडरवाटर का रोमांच

इस फेरी में बैठते ही जो ?ाटके लगे थे, उन से पता नहीं क्यों थकान बहुत हुई थी, हम जल्द ही सो गए. अगले दिन सुबह स्कूबा डाइविंग का प्रोग्राम था. इस में 5-5 लोगों का गु्रप बना दिया जाता है. एक फौर्म पर साइन करने होते है. एक व्यक्ति से साढ़े 5 हजार लिए जाते हैं. पानी में अंदर जाने के लिए अलग कपड़े देते हैं. चेंजिंगरूम होता है, डिवाइस से आधा घंटा ब्रीदिंग और बाकी चीजें सिखाते हैं.

बोट से स्पौट पर ले जाते हैं. 1-1 गाइड सब के साथ रहता है, फिर गियर पहना देते हैं तथा हाथों से कुछ इशारे सिखा दिए जाते हैं. नीचे की दुनिया बहुत अलग और सुंदर है. ग्राउंड तक ले जाते हैं, कोरल लीव्स, मछलियां और भी बहुत कुछ होता है. 25 मिनट अंडरवाटर रहते हैं. यह नौनस्विमिंग ऐक्टिविटी है, वे लोग कहते हैं कि अगर स्विमिंग आती भी हो तो करनी नहीं है.

शाम को राधा नगर बीच गए जिसे भारत का बैस्ट बीच कहा जाता है. टाइम्स मैगजीन ने इसे दुनिया का 7वें नंबर का बैस्ट बीच कहा है. ऐसा साफ और सुंदर बीच कि आप हैरान हो जाएंगे, कहीं एक कंकर नहीं, कहीं एक जरा सा भी गंदगी का टुकड़ा नहीं. ऐसा लगता कि रेत जैसे मुलायम सा चिकना आटा या मैदा आप के पैरों के नीचे किसी ने बिछा दिया हो. यहां जाएं तो आराम से बैठनेलेटने के लिए एक चादर, एक तौलिया ले जाएं, जम कर स्विमिंग करें, भीगें, लहरों का आनंद लें. ऐसा बीच हम ने मौरिशस और थाईलैंड में ही देखा था. कोशिश करें कि वहां 3 बजे तक पहुंच जाएं और सनसैट का भरपूर आनंद लें.

Infertility के क्या हैं कारण, इससे बचने के लिए अपनाएं ये उपाय

Infertility : बांझपन के शिकार युगलों को शारीरिक कमी की चिंता मानसिक रूप से डावांडोल करते पूरे शरीर की व्यवस्था बिगाड़ देती है. न कह सकते हैं, न सह सकते हैं. बांझपन की वजह से तकरार की शुरुआत पहले तो एकदूसरे पर शक और दोषारोपण से होती है. दोनों को खुद स्वस्थ और सामने वाले में कमी नजर आती है.

कुछ मामलों में कभीकभी पति गलतफहमी का शिकार होते सोचता है कि शादी से पहले मुझे हस्तमैथुन की आदत थी कहीं उस की वजह से मुझ में तो कोई कमी नहीं आ गई? कहीं मेरा वीर्य तो पतला नहीं हो गया? कहीं शुक्राणु की संख्या तो कम नहीं हो गई. उस काल्पनिक डर की वजह से काम में तो ध्यान नहीं दे पाता साथ में सैक्स लाइफ पर भी उस का बुरा प्रभाव पड़ता है. चाह कर भी न खुद चरम तक पहुंच पाता है, न पत्नी को सुख दे पाता है. जिस की वजह से दोनों एकदूसरे से खींचेखींचे रहते हैं.

खुद को दोषी

ऐसे ही किसी मामले में पत्नी भी खुद को दोषी समझते सोचती है कि पीसीओडी की वजह से मेरे पीरियड्स अनियमित हैं उस की वजह से तो कहीं गर्भाधान नहीं हो पा रहा? या तो कभी किसी लड़की ने कुंआरेपन में किसी गलती की वजह से अबौर्शन करवाया होता है, यह बात न पति को बता सकती है न डाक्टर को. ऐसे में गिल्ट उसे अंदर ही अंदर खाए जाता है, जिस की वजह से अंतरंग पलों में पति को सहयोग नहीं दे पाती. तब प्यासा पति या तो पत्नी पर शक करने लगता है या पत्नी से विमुख होते किसी और के साथ विवाहेत्तर संबंध से जुड़ जाता है.

कई बार संयुक्त परिवार से अलग रहने वाले युगल उन्मुक्त लाइफस्टाइल जीते हैं, जिस में आए दिन पार्टियों में आनाजाना लगा रहता है और आजकल युवाओं की पार्टियां शराब, सिगरेट और जंक फूड के बिना तो अधूरी ही होती है. यों अल्कोहल, तंबाकू और जंक फूड का सेवन भी गर्भाधान में बाधा डालने का एक कारण बन सकता है.

समय और पैसे की बरबादी

कई बार यह भी देखा जाता है कि लाख कोशिश के बाद भी जब गर्भाधान में कामयाबी नहीं मिलती तब कुछ युगल अनपढ़ वैद, हकीम या बाबाओं के चक्कर में पड़ कर समय और पैसे बरबाद करते हैं और ऐसे गलतसलत उपचारों से निराश हो कर उम्मीद ही खो बैठते हैं और ऐसी परिस्थिति में कुछ लोग हार कर कभीकभी प्रयत्न करना ही छोड़ देते हैं.

लेकिन ऐसे हालात में अगर पतिपत्नी दोनों समझदार होंगे तो बांझपन के बारे में एकदूसरे पर दोषारोपण करने की बजाय खुल कर विचारविमर्श कर के डाक्टर के पास जा कर, सारे टैस्ट करवा कर उचित समाधान का रास्ता अपनाते हैं.

बांझपन के कई कारण हो सकते हैं. एक तो आज के दौर में कैरियर ओरिएंटेड लड़केलड़कियां शादी को टालमटोल करते 30-32 के हो जाते हैं, ऊपर से शादी के बाद कुछ समय घूमनेफिरने और ऐश करने में गंवा देते हैं. हर काम उम्र रहते हो जाने चाहिए यह नहीं सोचते.

ऊपर से मौजूदा समय में बदलती जीवनशैली, गलत खानपान, पर्यावरणीय फैक्टर और देरी से बच्चे पैदा करने सहित विभिन्न कारणों की वजह से बांझपन आम हो गया है. माना जाता है कि गर्भनिरोधक गोलियों के उपयोग ने भी बांझपन के बढ़ते मामलों में योगदान दिया है.

बांझपन मैडिकल कंडिशन यानी एक बीमारी है. जहां एक दंपति कई वर्षों से अधिक समय तक प्रयास करने के बाद भी गर्भधारण करने में असमर्थ होते हैं. यह समस्या दुनियाभर में एक चिंता का विषय है. इस बीमारी से लगभग 10% से 15% जोड़े प्रभावित होते हैं. साथ में ओव्यूलेशन की समस्या महिलाओं में बांझपन का सब से आम कारण है. एक महिला की उम्र, हार्मोनल असंतुलन, वजन, रसायनों या विकिरण के संपर्क में आना और शराब या सिगरेट पीना सभी प्रजनन क्षमता पर प्रभाव डालते हैं.

डाक्टर के अनुसार प्रैगनैंट होने के लिए सही उम्र 18 से 28 को मानते हैं. इसलिए इन वर्षों के बीच बच्चे के लिए किए गए प्रयास अधिक सफल होते हैं.

सब से पहले तो शादी सही उम्र में कर लेनी चाहिए और यदि शादी लेट हुई है तो बच्चे की प्लानिंग में देरी नहीं करनी चाहिए नहीं तो प्रैगनैंसी में दिक्कत हो सकती है.

जरूरी हैल्दी सैक्स लाइफ

पतिपत्नी की सैक्स लाइफ हैल्दी होनी चाहिए. जब तक आप बारबार मैदान ए जंग में नहीं उतरेंगे तब तक आप समस्या से लड़ेंगे कैसे, जीतेंगे कैसे? इसलिए प्रैगनैंसी के लिए सब से जरूरी है कि पीरियड्स के बाद जिन दिनों गर्भाधान की संभावना ज्यादा होती है उन दिनों में अपने पार्टनर के साथ नियमित सैक्स करना चाहिए जितना अधिक सैक्स होगा प्रैगनैंसी की संभावना भी उतनी अधिक बढ़ जाएगी.

ऐसे में जब कुदरती रूप से गर्भाधान में कामयाबी नहीं मिलती तब डाक्टर दंपत्ति के सामने कुछ औप्शन रखते हैं जैसे कि आईयूआई ट्रीटमैंट या आईवीएफ पद्धति से प्रैगनैंसी, यह एक सामान्य फर्टिलिटी ट्रीटमैंट है. इस प्रक्रिया में 2 स्टेप ट्रीटमैंट किया जाता है. यदि महिला के अंडाशय में एग का सही तरह से निर्माण नहीं हो रहा है और व फौलिकल से अलग नहीं हो पा रहे है. पुरुष साथी में शुक्राणु कम बन रहे हैं या वे कम ऐक्टिव हैं तो ऐसे में महिला को कुछ इंजैक्शन दिए जाते हैं, जिस से ऐग फौलिकल से सही तरह से अलग हो पाता है.

सफलता की दर

इस के बाद पुरुष साथी से शुक्राणु प्राप्त कर उन्हें साफ किया जाता है और उन में से क्वालिटी शुक्राणुओं को एक सिरिंज द्वारा महिला के गर्भाशय में छोड़े जाते हैं. इस के बाद की सारी प्रक्रिया कुदरती रूप से होती है. इस की सफलता की दर 10 से 15% होती है. कुछ मामलों में आईयूआई से सफलता मिल जाती है, लेकिन यदि समस्या किसी और तरह की है तो आईवीएफ ही सही उपचार होता है.

Besan Bhurji Recipe : डिनर में परोसें बेसन भुरजी, ये रही आसान रेसिपी

Besan Bhurji Recipe : डिनर में क्या बनाएं क्या ना बनाएं यह तय करना मुश्किल होता है तो आज हम आपको आसान रेसिपी के बारे में बताएंगे. बेसन भुरजी खाने में जितनी टेस्टी होती है उतनी ही हेल्दी और आसानी से बनने वाली रेसिपी भी होती है.

हमें चाहिए

–  1 कप बेसन

–  2 हरे प्याज कटे

–  1 टमाटर कटा

–  2 हरीमिर्चें कटी

–  1-1 बड़ा चम्मच लाल, पीली व हरी शिमलामिर्च कटी

–  एकचौथाई कप मटर के दाने

–  1 छोटा चम्मच अदरक कटा

–  1 बड़ा चम्मच तेल

–  एकचौथाई छोटा चम्मच हलदी पाउडर

–  1/2 छोटा चम्मच धनिया पाउडर

–  थोड़ा सा लालमिर्च पाउडर

–  1/2 चम्मच छोला मसाला

–  1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती कटी

–  नमक स्वादानुसार.

बनाने का तरीका

कड़ाही में तेल गरम कर अदरक, हरा प्याज सभी शिमलामिर्च भूनें. भुनने पर मटर के दाने व टमाटर व हरीमिर्च डालें. फिर हलदी पाउडर, धनिया पाउडर, लालमिर्च पाउडर व छोला मसाला डालें. बेसन में पानी और नमक डाल कर घोल बनाएं. इसे गरम कड़ाही में डालें और अच्छी तरह चलाती रहें. 3-4 मिनट तक पकाएं. पकने पर धनियापत्ती से सजा कर परोसें.

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सवाल

मैं एक औरत से 2 साल से प्यार कर रहा हूं. उस का पति नहीं है. एक दिन मैं ने उसे उस के देवर के साथ देख लिया, तब से मुझे उस से नफरत हो गई है. वह कहती है कि मैं उसे न छोड़ूं. आप बताएं कि मैं क्या करूं?

जवाब

आप को शादीशुदा औरत के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए. आप को उस से प्यार नहीं है, आप बस उस का फायदा उठा रहे थे. उस का देवर भी मौके का फायदा उठा रहा है. बेहतर होगा कि आप उस से दूर रहें.

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शारीरिक सेहत ही किसी पुरुष के स्वस्थ होने की निशानी नहीं होती. एक पुरुष का सेक्स की दृष्टि से भी स्वस्थ होना महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि स्त्री-पुरुष के बीच खुशहाल संबंधों में सेक्स एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

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हमारे समाज में अब लगभग हर खुशी का जश्न शराब के साथ मनाने का चलन हो गया है. कभी कभार शराब पीने से यूं तो कोई खास नुकसान नहीं होता लेकिन अगर इसकी लत लग जाए तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. उन पुरुषों को हिदायत है कि अगर इसकी लत लग गई है तो इसे फौरन छोड़ दें क्योंकि शराब शुक्राणुओं की सबसे बड़ी दुश्मन है.

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चिंता या तनाव एक ऐसे स्थिति है जो इंसान को धीरे-धीरे खाकर आखिरकार मौत के मुंह में ले जाती है. कहा भी जाता है कि चिंता चिता है. हमारी पुरुषों को सलाह है कि वे चिंता को छोड़ दें क्योंकि इससे उनकी प्रजनन क्षमता पर बहुत बुरा असर पड़ता है.

कुछ मीठा हो जाए

भारतीय समाज में खुशी के हर छोटे बड़े मौकों पर लोग मीठा खिलाकर खुशी का इजहार करते हैं. लेकिन आपको आगाह कर दें कि मीठा जरूर हो जाए लेकिन बस कुछ ही क्योंकि ज्यादा मीठा भी पुरुषों की मर्दानगी के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है.

वजन पर नजर

कहावत है माल-ए-मुफ़्त, दिल-ए- बेरहम. मतलब मुफ़्त का खाने को मिला तो टूट पड़े बिना सेहत की परवाह किए. हमारी आखिरी सलाह है कि अपने वजन पर नजर रखें वर्ना लग सकती है आपकी मर्दानगी पर ही नजर.

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Open Pores : इन 5 टिप्स से स्किन पोर्स का रखें ख्याल

Open Pores : अगर त्‍वचा पर पोर्स न हों तो हमारी त्‍वचा सांस नहीं ले पाएगी. दरअसल हमारे चेहरे की त्‍वचा के रोम छिद्र ही बता सकते हैं कि हमारी त्‍वचा कितनी स्‍वस्‍थ्‍य है. इसके साथ ही बुढ़ापे की निशानी भी हमारे स्किन पोर्स से ही पता चलती है. यह बताया जाता है कि अगर आपके चेहरे पर बड़े रोम छिद्र हैं तो आप बूढी होने लग गई हैं. इसलिए अगर आप को खिली और स्‍वस्‍थ्‍य त्‍वचा चाहिये तो अभी से ही उसका ख्‍याल रखना शुरु कर दें.

1. ब्‍लैकहेड हटाना : गंदगी से चेहरे पर ब्‍लैकहेड हो जाता है, जो अगर न हटाया गया तो पूरे चेहरे पर धब्‍बा छोड़ जाता है. इसको हटाने के लिए चेहरे को स्‍टीम करना चाहिये और उंगलियों से उसे दबा कर निकालना चाहिये. इसके आलावा आप घरेलू नुस्‍खे जैसे, बेकिंग पाउडर या फ्रूट पील का प्रयोग कर सकती हैं.

2. बंद पोर्स को खोलें : धूल और तेल एक साथ मिल कर आपकी स्‍किन में ब्‍लैकहेड जैसी समस्‍या पैदा करते हैं. इसलिए इस समस्‍या को दूर करने के लिए आपको हर दो घंटे में अपना चेहरा पानी से धोना चाहिये. इससे तेल और गंदगी साफ होगी और साथ में स्‍किन पोर्स भी खुलेंगे.

3. स्‍क्रब करे : आपको हफ्ते में 2-3 बार अपने चेहरे को स्‍क्रब करना चाहिये. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की आपके चेहरे पर ब्‍लैकहेड हैं या नहीं. इस विधि को अपनी रूटीन में शामिल कर लें जिससे चेहरे पर गंदगी न जमे और ब्‍लैकहेड न बने.

4. टोनर न भूलें : स्‍क्रबिंग के बाद चेहरे पर टोनर लगाना नहीं भूलना चाहिये क्‍योंकि स्‍क्रबिंग से स्‍किन के पोर्स खुल जाते हैं और बड़े हो जाते हैं. इसलिए इस खुले हुए पोर्स को छोटा करने के लिए टोनिंग करें.

5. स्‍किन को सांस लेने दें: जब आप कंपैक्‍ट आदि से अपने बढ़े पोर्स को बंद करने के लिए इस सब कौस्‍मैटिक का प्रयोग करती हैं, तो एक बात आप भूल जाती हैं. आपकी स्‍किन अच्‍छे से सांस ले सके उसके लिए जरुरी है कि कम से कम मेकअप किया जाए. पाउडर लगाने से स्‍किन ब्‍लौक हो जाती है.

Storytelling : महापुरुष – किस एहसान को उतारना चाहते थे प्रोफेसर गौतम

Storytelling : रवि प्रोफेसर गौतम के साथ व्यवसाय प्रबंधन कोर्स का शोधपत्र लिख रहा था. उस का पीएच.डी. करने का विचार था. भारत से 15 महीने पहले उच्च शिक्षा के लिए वह मांट्रियल आया था. उस ने मांट्रियल में मेहनत तो बहुत की थी, परंतु परीक्षाओं में अधिक सफलता नहीं मिली.

मांट्रियल की भीषण सर्दी, भिन्न संस्कृति और रहनसहन का ढंग, मातापिता पर अत्यधिक आर्थिक दबाव का एहसास, इन सब कारणों से रवि यहां अधिक जम नहीं पाया था. वैसे उसे असफल भी नहीं कहा जा सकता, परंतु पीएच.डी. में आर्थिक सहायता के साथ प्रवेश पाने के लिए उस के व्यवसाय प्रबंधन की परीक्षा के परिणाम कुछ कम उतरते थे.

रवि ने प्रोफेसर गौतम से पीएच.डी. के लिए प्रवेश पाने और आर्थिक मदद के लिए जब कहा तो उन्होंने उसे कुछ आशा नहीं बंधाई. वे अपने विश्वविद्यालय और बाकी विश्वविद्यालयों के बारे में काफी जानकारी रखते थे. रवि के पास व्यवसाय प्रबंधन कोर्स समाप्त कर के भारत लौटने के सिवा और कोई चारा भी नहीं था.

रवि प्रोफेसर गौतम से जब भी उन के विभाग में मिलता, वे उस को मुश्किल से आधे घंटे का समय ही दे पाते थे, क्योंकि वे काफी व्यस्त रहते थे. रवि को उन को बारबार परेशान करना अच्छा भी नहीं लगता था. कभीकभी सोचता कि कहीं प्रोफेसर यह न सोच लें कि वह उन के भारतीय होने का अनुचित फायदा उठा रहा है.

एक बार रवि ने हिम्मत कर के उन से कह ही दिया, ‘‘साहब, मुझे किसी भी दिन 2 घंटे का समय दे दीजिए. फिर उस के बाद मैं आप को परेशान नहीं करूंगा.’’

‘‘तुम मुझे परेशान थोड़े ही करते हो. यहां तो विभाग में 2 घंटे का एक बार में समय निकालना कठिन है,’’ उन्होंने अपनी डायरी देख कर कहा, ‘‘परंतु ऐसा करो, इस इतवार को दोपहर खाने के समय मेरे घर आ जाओ. फिर जितना समय चाहो, मैं तुम्हें दे पाऊंगा.’’

‘‘मेरा यह मतलब नहीं था. आप क्यों परेशान होते हैं,’’ रवि को प्रोफेसर गौतम से यह आशा नहीं थी कि वे उसे अपने निवास स्थान पर आने के लिए कहेंगे. अगले इतवार को 12 बजे पहुंचने के लिए प्रोफेसर गौतम ने उस से कह दिया था.

प्रोफेसर गौतम का फ्लैट विश्व- विद्यालय के उन के विभाग से मुश्किल से एक फर्लांग की दूरी पर ही था. उन्होंने पिछले साल ही उसे खरीदा था. पिछले 22 सालों में उन के देखतेदेखते मांट्रियल शहर कितना बदल गया था, विभाग में व्याख्याता के रूप में आए थे और अब कई वर्षों से प्राध्यापक हो गए थे. उन के विभाग में उन की बहुत साख थी.

सबकुछ बदल गया था, पर प्रोफेसर गौतम की जिंदगी वैसी की वैसी ही स्थिर थी. अकेले आए थे शहर में और 3 साल पहले उन की पत्नी उन्हें अकेला छोड़ गई थी. वह कैंसर की चपेट में आ गई थी. पत्नी की मृत्यु के पश्चात अकेले बड़े घर में रहना उन्हें बहुत खलता था. घर की मालकिन ही जब चली गई, तब क्या करते उस घर को रख कर.

18 साल से ऊपर बिताए थे उन्होंने उस घर में अपनी पत्नी के साथ. सुखदुख के क्षण अकसर याद आते थे उन को. घर में किसी चीज की कभी कोई कमी नहीं रही, पर उस घर ने कभी किसी बच्चे की किलकारी नहीं सुनी. इस का पतिपत्नी को काफी दुख रहा. अपनी संतान को सीने से लगाने में जो आनंद आता है, उस आनंद से सदा ही दोनों वंचित रहे.

पत्नी के देहांत के बाद 1 साल तक तो प्रोफेसर गौतम उस घर में ही रहे. पर उस के बाद उन्होंने घर बेच दिया और साथ में ही कुछ गैरजरूरी सामान भी. आनेजाने की सुविधा का खयाल कर उन्होंने अपना फ्लैट विभाग के पास ही खरीद लिया. अब तो उन के जीवन में विभाग का काम और शोध ही रह गया था. भारत में भाईबहन थे, पर वे अपनी समस्याओं में ही इतने उलझे हुए थे कि उन के बारे में सोचने की किस को फुरसत थी. हां, बहनें रक्षाबंधन और भैयादूज का टीका जब भेजती थीं तो एक पृष्ठ का पत्र लिख देती थीं.

प्रोफेसर गौतम ने रवि के आने के उपलक्ष्य में सोचा कि उसे भारतीय खाना बना कर खिलाया जाए. वे खुद तो दोपहर और शाम का खाना विश्वविद्यालय की कैंटीन में ही खा लेते थे.

शनिवार को प्रोफेसर भारतीय गल्ले की दुकान से कुछ मसाले और सब्जियां ले कर आए. पत्नी की बीमारी के समय तो वे अकसर खाना बनाया करते थे, पर अब उन का मन ही नहीं करता था अपने लिए कुछ भी झंझट करने को. बस, जिए जा रहे थे, केवल इसलिए कि जीवनज्योति अभी बुझी नहीं थी. उन्होंने एक तरकारी और दाल बनाई थी. कुलचे भी खरीदे थे. उन्हें तो बस, गरम ही करना था. चावल तो सोचा कि रवि के आने पर ही बनाएंगे.

रवि ने जब उन के फ्लैट की घंटी बजाई तो 12 बज कर कुछ सेकंड ही हुए थे. प्रोफेसर गौतम को बड़ा अच्छा लगा, यह सोच कर कि रवि समय का कितना पाबंद है. रवि थोड़ा हिचकिचा रहा था.

प्रोफेसर गौतम ने कहा, ‘‘यह विभाग का मेरा दफ्तर नहीं, घर है. यहां तुम मेरे मेहमान हो, विद्यार्थी नहीं. इस को अपना ही घर समझो.’’

रवि अपनी तरफ से कितनी भी कोशिश करता, पर गुरु और शिष्य का रिश्ता कैसे बदल सकता था. वह प्रोफेसर के साथ रसोई में आ गया. प्रोफेसर ने चावल बनने के लिए रख दिए.

‘‘आप इस फ्लैट में अकेले रहते हैं?’’ रवि ने पूछा.

‘‘हां, मेरी पत्नी का कुछ वर्ष पहले देहांत हो गया,’’ उन्होंने धीमे से कहा.

रवि रसोई में खाने की मेज के साथ रखी कुरसी पर बैठ गया. दोनों ही चुप थे. प्रोफेसर गौतम ने पूछा, ‘‘जब तक चावल तैयार होंगे, तब तक कुछ पिओगे? क्या लोगे?’’

‘‘नहीं, मैं कुछ नहीं लूंगा. हां, अगर हो तो कोई जूस दे दीजिएगा.’’

प्रोफेसर ने रेफ्रिजरेटर से संतरे के रस से भरी एक बोतल और एक बीयर की बोतल निकाली. जूस गिलास में भर कर रवि को दे दिया और बीयर खुद पीने लगे. कुछ देर बाद चावल तैयार हो गए. उन्होंने खाना खाया. कौफी बना कर वे बैठक में आ गए. अब काम करने का समय था.

रवि अपना बैग उठा लाया. उस ने 89 पृष्ठों की रिपोर्ट लिखी थी. प्रोफेसर गौतम रिपोर्ट का कुछ भाग तो पहले ही देख चुके थे, उस में रवि ने जो संशोधन किए थे, वे देखे. रवि उन से अनेक प्रश्न करता जा रहा था. प्रोफेसर जो भी उत्तर दे रहे थे, रवि उन को लिखता जा रहा था.

रवि की रिपोर्ट का जब आखिरी पृष्ठ आ पहुंचा तो उस समय शाम के 5 बज चुके थे. आखिरी पृष्ठ पर रवि ने अपनी रिपोर्ट में प्रयोग में लाए संदर्भ लिख रखे थे. प्रोफेसर को लगा कि रवि ने कुछ संदर्भ छोड़ रखे हैं. वे अपने अध्ययनकक्ष में उन संदर्भों को अपनी किताबों में ढूंढ़ने के लिए गए.

प्रोफेसर को गए हुए 15 मिनट से भी अधिक समय हो गया था. रवि ने सोचा शायद वे भूल गए हैं कि रवि घर में आया हुआ है. वह अध्ययनकक्ष में आ गया. वहां किताबें ही किताबें थीं. एक कंप्यूटर भी रखा था. अध्ययनकक्ष की तुलना में प्रोफेसर के विभाग का दफ्तर कहीं छोटा पड़ता था.

प्रोफेसर ने एक निगाह से रवि को देखा, फिर अपनी खोज में लग गए. दीवार पर प्रोफेसर की डिगरियों के प्रमाणपत्र फ्रेम में लगे थे. प्रोफेसर गौतम ने न्यूयार्क से पीएच.डी. की थी. भारत से उन्होंने एम.एससी. (कानपुर से) की थी.

‘‘साहब, आप ने एम.एससी. कानपुर से की थी? मेरे नानाजी वहीं पर विभागाध्यक्ष थे,’’ रवि ने पूछा.

प्रोफेसर 3-4 किताबें ले कर बैठक में आ गए.

‘‘क्या नाम था तुम्हारे नानाजी का?’’

‘‘रामकुमार,’’ रवि ने कहा.

‘‘उन को तो मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं. 1 साल मैं ने वहां पढ़ाया भी था.’’

‘‘तब तो शायद आप ने मेरी माताजी को भी देखा होगा,’’ रवि ने पूछा.

‘‘शायद देखा होगा एकाध बार,’’ प्रोफेसर ने बात पलटते हुए कहा, ‘‘देखो, तुम ये पुस्तकें ले जाओ और देखो कि इन में तुम्हारे मतलब का कुछ है कि नहीं.’’

रवि कुछ मिनट और बैठा रहा. 6 बजने को आ रहे थे. लगभग 6 घंटे से वह प्रोफेसर के फ्लैट में बैठा था. पर इस दौरान उस ने लगभग 1 महीने का काम निबटा लिया था. प्रोफेसर का दिल से धन्यवाद कर उस ने विदा ली.

रवि के जाने के बाद प्रोफेसर को बरसों पुरानी भूलीबिसरी बातें याद आने लगीं. वे रवि के नाना को अच्छी तरह जानते थे. उन्हीं के विभाग में एम.एससी. के पश्चात वे व्याख्याता के पद पर काम करने लगे थे. उन्हें दिल्ली में द्वितीय श्रेणी में प्रवेश नहीं मिल पाया था. इसलिए वे कानपुर पढ़ने आ गए थे. उस समय कानपुर में ही उन के चाचाजी रह रहे थे. 1 साल बाद चाचाजी भी कानपुर छोड़ कर चले गए पर उन्हें कानपुर इतना भा गया कि एम.एससी. भी वहीं से कर ली. उन की इच्छा थी कि किसी भी तरह से विदेश उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाएं. एम.एससी. में भी उन का परीक्षा परिणाम बहुत अच्छा नहीं था, जिस के बूते पर उन को आर्थिक सहायता मिल पाती. फिर सोचा, एकदो साल तक भारत में अगर पढ़ाने का अनुभव प्राप्त कर लें तो शायद विदेश में आर्थिक सहायता मिल सकेगी.

उन्हीं दिनों कालेज के एक व्याख्याता को विदेश में पढ़ने के लिए मौका मिला था, जिस के कारण गौतम को अस्थायी रूप से कालेज में ही नौकरी मिल गई. वे पैसे जोड़ने की भी कोशिश कर रहे थे. विदेश जाने के लिए मातापिता की तरफ से कम से कम पैसा मांगने का उन का ध्येय था. विभागाध्यक्ष रामकुमार भी उन से काफी प्रसन्न थे. वे उन के भविष्य को संवारने की पूरी कोशिश कर रहे थे. एक दिन रामकुमार ने गौतम को अपने घर शाम की चाय पर बुलाया.

रवि की मां उमा से गौतम की मुलाकात उसी दिन शाम को हुई थी. उमा उन दिनों बी.ए. कर रही थी. देखने में बहुत ही साधारण थी. रामकुमार उमा की शादी की चिंता में थे. उमा विभागाध्यक्ष की बेटी थी, इसलिए गौतम अपनी ओर से उस में पूरी दिलचस्पी ले रहा था. वह बेचारी तो चुप थी, पर अपनी ओर से ही गौतम प्रश्न किए जा रहा था.

कुछ समय पश्चात उमा और उस की मां उठ कर चली गईं. रामकुमार ने तब गौतम से अपने मन की इच्छा जाहिर की. वे उमा का हाथ गौतम के हाथ में थमाने की सोच रहे थे. उन्होंने कहा था कि अगर गौतम चाहे तो वे उस के मातापिता से बात करने के लिए दिल्ली जाने को तैयार थे.

सुन कर गौतम ने बस यही कहा, ‘आप के घर नाता जोड़ कर मैं अपने जीवन को धन्य समझूंगा. पिताजी और माताजी की यही जिद है कि जब तक मेरी छोटी बहन के हाथ पीले नहीं कर देंगे, तब तक मेरी शादी की सोचेंगे भी नहीं,’ उस ने बात को टालने के लिए कहा, ‘वैसे मेरी हार्दिक इच्छा है कि विदेश जा कर ऊंची शिक्षा प्राप्त करूं, पर आप तो जानते ही हैं कि मेरे एम.एससी. में इतने अच्छे अंक तो आए नहीं कि आर्थिक सहायता मिल जाए.’

‘तुम ने कहा क्यों नहीं. मेरा एक जिगरी दोस्त न्यूयार्क में प्रोफेसर है. अगर मैं उस को लिख दूं तो वह मेरी बात टालेगा नहीं,’ रामकुमार ने कहा.

‘आप मुझे उमाजी का फोटो दे दीजिए, मातापिता को भेज दूंगा. उन से मुझे अनुमति तो लेनी ही होगी. पर वे कभी भी न नहीं करेंगे,’ गौतम ने कहा.

रामकुमार खुशीखुशी घर के अंदर गए. लगता था, जैसे वहां खुशी की लहर दौड़ गई थी. कुछ ही देर में वे अपनी पत्नी के साथ उमा का फोटो ले कर आ गए. उमा तो लाजवश कमरे में नहीं आई. उस की मां ने एक डब्बे में कुछ मिठाई गौतम के लिए रख दी. पतिपत्नी अत्यंत स्नेह भरी नजरों से गौतम को देख रहे थे.

अपने कमरे में पहुंचते ही गौतम ने न्यूयार्क के उस विश्वविद्यालय को प्रवेशपत्र और आर्थिक सहायता के लिए फार्म भेजने के लिए लिखा. दिल्ली जाने से पहले वह एक बार और उमा के घर गया. कुछ समय के लिए उन लोगों ने गौतम और उमा को कमरे में अकेला छोड़ दिया था, परंतु दोनों ही शरमाते रहे.

गौतम जब दिल्ली से वापस आया तो रामकुमार ने उसे विभाग में पहुंचते ही अपने कमरे में बुलाया. गौतम ने उन्हें बताया कि मातापिता दोनों ही राजी थे, इस रिश्ते के लिए. परंतु छोटी बहन की शादी से पहले इस बारे में कुछ भी जिक्र नहीं करना चाहते थे.

गौतम के मातापिता की रजामंदी के बाद तो गौतम का उमा के घर आनाजाना और भी बढ़ गया. उस ने जब एक दिन उमा से सिनेमा चलने के लिए कहा तो वह टाल गई. इन्हीं दिनों न्यूयार्क से फार्म आ गया, जो उस ने तुरंत भर कर भेज दिया. रामकुमार ने अपने दोस्त को न्यूयार्क पत्र लिखा और गौतम की अत्यधिक तारीफ और सिफारिश की.

3 महीने प्रतीक्षा करने के पश्चात वह पत्र न्यूयार्क से आया, जिस की गौतम कल्पना किया करता था. उस को पीएच.डी. में प्रवेश और समुचित आर्थिक सहायता मिल गई थी. वह रामकुमार का आभारी था. उन की सिफारिश के बिना उस को यह आर्थिक सहायता कभी न मिल पाती.

गौतम की छोटी बहन का रिश्ता बनारस में हो गया था. शादी 5 महीने बाद तय हुई. गौतम ने उमा को समझाया कि बस 1 साल की ही तो बात है. अगले साल वह शादी करने भारत आएगा और उस को दुलहन बना कर ले जाएगा.

कुछ ही महीने में गौतम न्यूयार्क आ गया. यहां उसे वह विश्वविद्यालय ज्यादा अच्छा न लगा. इधरउधर दौड़धूप कर के उसे न्यूयार्क में ही दूसरे विश्वविद्यालय में प्रवेश व आर्थिक सहायता मिल गई.

उमा के 2-3 पत्र आए थे, पर गौतम व्यस्तता के कारण उत्तर भी न दे पाया. जब पिताजी का पत्र आया तो उमा का चेहरा उस की आंखों के सामने नाचने लगा. पिताजी ने लिखा था कि रामकुमार दिल्ली किसी काम से आए थे तो उन से भी मिलने आ गए. पिताजी को समझ में नहीं आया कि उन की कौन सी बेटी की शादी बनारस में तय हुई थी.

उन्होंने लिखा था कि अपनी शादी का जिक्र करने के लिए उसे इतना शरमाने की क्या आवश्यकता थी.

गौतम ने पिताजी को लिख भेजा कि मैं उमा से शादी करने का कभी इच्छुक नहीं था. आप रामकुमार को साफसाफ लिख दें कि यह रिश्ता आप को बिलकुल भी मंजूर नहीं है. उन के यहां के किसी को भी अमेरिका में मुझ से पत्रव्यवहार करने की कोई आवश्यकता नहीं.

गौतम के पिताजी ने वही किया जो उन के पुत्र ने लिखा था. वे अपने बेटे की चाल समझ गए थे. वे बेचारे करते भी क्या.

उन का बेटा उन के हाथ से निकल चुका था. गौतम के पास उमा की तरफ से 2-3 पत्र और आए. एक पत्र रामकुमार का भी आया. उन पत्रों को बिना पढ़े ही उस ने फाड़ कर फेंक दिया था.

पीएच.डी. करने के बाद गौतम शादी करवाने भारत गया और एक बहुत ही सुंदर लड़की को पत्नी के रूप में पा कर अपना जीवन सफल समझने लगा. उस के बाद उस ने शायद ही कभी रामकुमार और उमा के बारे में सोचा हो. उमा का तो शायद खयाल कभी आया भी हो, पर उस की याद को अतीत के गहरे गर्त में ही दफना देना उस ने उचित समझा था.

उस दिन रवि ने गौतम की पुरानी स्मृतियों को झकझोर दिया था. प्रोफेसर गौतम सारी रात उमा के बारे में सोचते रहे कि उस बेचारी ने उन का क्या बिगाड़ा था. रामकुमार के एहसान का उस ने कैसे बदला चुकाया था. इन्हीं सब बातों में उलझे, प्रोफेसर को नींद ने आ घेरा.

ठक…ठक की आवाज के साथ विभाग की सचिव सिसिल 9 बजे प्रोफेसर के कमरे में ही आई तो उन की निंद्रा टूटी और वे अतीत से निकल कर वर्तमान में आ गए. प्रोफेसर ने उस को रवि के फ्लैट का फोन नंबर पता करने को कहा.

कुछ ही मिनटों बाद सिसिल ने उन्हें रवि का फोन नंबर ला कर दिया. प्रोफेसर ने रवि को फोन मिलाया. सवेरेसवेरे प्रोफेसर का फोन पा कर रवि चौंक गया, ‘‘मैं तुम्हें इसलिए फोन कर रहा हूं कि तुम यहां पर पीएच.डी. के लिए आर्थिक सहायता की चिंता मत करो. मैं इस विश्वविद्यालय में ही भरसक कोशिश कर के तुम्हें सहायता दिलवा दूंगा.’’

रवि को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था. वह धीरे से बोला, ‘‘धन्यवाद… बहुतबहुत धन्यवाद.’’

‘‘बरसों पहले तुम्हारे नानाजी ने मुझ पर बहुत उपकार किया था. उस का बदला तो मैं इस जीवन में कभी नहीं चुका पाऊंगा पर उस उपकार का बोझ भी इस संसार से नहीं ले जा पाऊंगा. तुम्हारी कुछ मदद कर के मेरा कुछ बोझ हलका हो जाएगा,’’ कहने के बाद प्रोफेसर गौतम ने फोन बंद कर दिया.

रवि कुछ देर तक रिसीवर थामे रहा. फिर पेन और कागज निकाल कर अपनी मां को पत्र लिखने लगा.

आदरणीय माताजी,

आप से कभी सुना था कि इस संसार में महापुरुष भी होते हैं परंतु मुझे विश्वास नहीं होता था.

लेकिन अब मुझे यकीन हो गया है कि दूसरों की निस्वार्थ सहायता करने वाले महापुरुष अब भी इस दुनिया में मौजूद हैं. मेरे लिए प्रोफेसर गौतम एक ऐसे ही महापुरुष की तरह हैं. उन्होंने मुझे आर्थिक सहायता दिलवाने का पूरापूरा विश्वास दिलाया है.

प्रोफेसर गौतम बरसों पहले कानपुर में नानाजी के विभाग में ही काम करते थे. उन दिनों कभी शायद आप की भी उन से मुलाकात हुई होगी

आप का रवि

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